गुरु सम दाता नहीं नहिं जाचक शिष्य समान ।
याचत याचत दाता करे सोई सच्चा सतगुरु जान ॥
ज्ञान नाम गुरु का अज्ञान नाम शिष्य सुहाय ।
ज्ञान अज्ञान उभय मिटावै सतगुरु हृदय प्रकटाव ॥
लोभ लालच हृदय राखै नहिं सतगुरु सूँ नेह ।
आपै डूबे कुटुम्ब डुबावै डुबावे सतगुरु का गेह ॥
लालच राखै मन में मन्त्र फूँके कान ।
भेष धरि संग्रह करै वाकू गुरु पाखण्डी जान ॥
लोभ लालच की करणी करै कथनी में त्याग विशाल ।
भेष जति का धरै जान असली कपटी कुटिल कंगाल ॥
सन्तन की सी भाषा बोले दिल में राखै गाँठ ।
जाति बरण में डूबा रहे ऐसे नर जानि कुजात ॥
लम्बों लम्बों तिलक लगावै मधुर मधुर बोले बाणी ।
इनसून बेटा बचतो रहो नहीं होय भक्ति की हानी ॥

‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।

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