हर घट में राम रमै, दुनियाँ समझ नहिं पाती रे।
हर काठ में अग्नि रहती जैसे, छुअत देखत अग्नि नहिं मिल पाती रे।।
हर घट में…..
हर तिल में तेल छुपा रहता, हाथ लिए तिल समझ नहिं आती रे।।
दूध में घी रहता सदाई, पर बाहिर से समझ नहिं आती रे।।
हर घट में…..
गन्ने में शर्करा रहती छूपी, पर बाहिर दिखायी नहीं आती रे।।
ऐसे ही हर घट में राम रमता, बिनु क्रिया समझ नहीं आती रे।।
हर घट में…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, सतगुरु शरण में बात समझ आ जाती रे।।
हर घट में…..