मैं तो अवगुणों का था भण्डार, धन्य-धन्य सतगुरु तेरा, तू ने कर दी कृपा अपार।।
करुणामय है सतगुरु स्वभाव तुम्हारा, वरना मेरा तो हो जाता पण्टाडार।।
मैं तो अवगुणों …..
क्राम, क्रोध में रचा बसा था मैं, मेरे अन्दर था बहुत विषय विकार।।
मोह निसा में मैं सोवत था, ओढ़ के चादर अहंकार।।
मैं तो अवगुणों …..
अपना पराया मोहि सता रहा था, दु:ख दे रहा था जग का व्यवहार।।
तू ने बिनु कारण करुणा कर दी सतगुरु, मेरे घट में कर दिया ज्ञान उजियार।।
मैं तो अवगुणों …..
जीवन मेरा तू ने सहज बना दिया, मिटा दिए सब मन के विकार।।
ज्ञान की ज्योति जब तू ने जलाई, मेरा मिट गया विषयों का अहंकार।।
मैं तो अवगुणों …..
ज्यों-ज्यों तूने कृपा बरसाई, मेरा मिट गया मोह विकार।।
काम, क्रोध की तू ने तप्त मिटा दी, मेरा मिटा दिया मद, लोभ, अहंकार।।
मैं तो अवगुणों …..
मैं जब भी तेरा सुमिरण करता, तुरत बरसे आनन्द की धार।।
लक्ष्मीनारायण तेरा आभारी सतगुरु, तू है सतगुरु करुणा का भण्डार।।
मैं तो अवगुणों …..
सदा तू मुझ पर कृपा दृष्टि रखना, हे सतगुरु तू है जगत का करतार।।
तू निर्बल का बल रहा है सदा, लक्ष्मीनारायण तेरे चरणों में बार-बार बलिहार।।
मैं तो अवगुणों …..