परनिन्दा मत करो
परनिन्दा मत कर बन्दा
मिट जायेगा आनन्दा ।
करि प्रशंसा पराई तू
मन तेरा होगा मुकुन्दा ॥
भल करेगा भल ही पायेगा
मन्द करे तो होगा मन्दा ॥
परनिन्दा मत .........................
बैरभाव बढ़े परनिन्दा से
बिरथा मन होय कुन्दा ॥
परनिन्दा मत .........................
क्रोध बढ़ाये बैर भाव सदा
क्रोध से होय जीव अन्धा ॥
परनिन्दा मत .........................
सुख जो चाहे जीव तू
तुरत करो त्याग परनिन्दा ॥
परनिन्दा मत .........................
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
हरि भजन ही असल आनन्दा ॥
परनिन्दा मत .........................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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