त इन्द्र
जीव तू बिरथा जग भरमाई ।
चित है इन्द्र इन्द्री परी सुहाई ॥
शान्त चित सोई देवराज इन्द्र कहाई ।
काम क्रोध मद लोभ देखि विचलाई ।
काम क्रोधादि असुर हैं सब भाई ।
प्रबल होते असुर इन्द्र जाई भगाई ॥
इन्द्र विकल होती बिनु इन्द्र भाई ।
शची जो पावन होय बस असुराई ॥
दया दान बिरागादि इन्द्र बलदाई ।
सोम रस पान करे विजय इन्द्र पाई ॥
इन्द्र रस सोमरस साधु कहहिं समझाई ।
गो तप से सोम निकले करो पान मन लाई ॥
कहत लक्ष्मी पान करो इन्द्रपद पाई ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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