जुग रहस्य
मन तू बिरथा मत जग भरमाय ।
चार गुणन को जग जुग दियो बताय ॥
तम प्रबल जब देह यन्त्र सम लगाय ।
यन्त्र ही कलि है सोइ कलियुग कहाय ॥
सुख इच्छा प्रबल जग कल्पना देव कराय ।
द्वैत भाव हिय रहे सोइ द्वापर जग समझाय ॥
पर सेवा हियं उठत दया दान बहु कराय ।
त्रिगुण मरम बुझहिं सोइ जुग त्रेता कहाय ॥
गुण गोतीत जीव जब बन्धन मुक्त सुहाय ।
कृत कृत तब भया सोइ जुग कृत बताय ॥
चारउ अवस्था जीव की जुग भ्रम पड़ जाय ।
कहत लक्ष्मी गुण समझो मुक्ति मिले आय ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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