राम नाम
राम राम जग करता भेद न कोइ जाने रे ।
रोम रोम में जो बस रहा क्यों नहीं माने रे ।।
गोदी का छोड पेट की आस तू करता ।
पत्थर में ढूंढे भगवान वो तो तेरे घट में बसता ।।
फिर भी तू नहीं माने रे ............
राम राम जग करता ............
श्वास को दूध मान ले ग्यान का देले जामन रे ।
बिरती रूपी दही बनाले मन की लगा मथनी रे ।।
फिर भी तू नहीं माने रे ............
राम राम जग करता ............
भोग रूपी छछिया फेंको संतोष का मक्खन थाम रे ।
कहत लक्ष्मी सुनो भाई साधु ये ही सच्चा राम रे ।।
फिर भी तू नहीं माने रे ............
राम राम जग करता ............
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangit Mahotsav,