हद-अनहद में मत भरमावो
हद-अनहद में मत भरमावो, वहाँ नहि किछु सार रे।
अकथ अगाध अनन्त अविनाशी, वो गुण गोतीत सबके पार रे।।
हद-अनहद.....
नेति-नेति कहकर वेद रह गए, उसकी लीला अपरम्पार रे।।
शब्द नहीं निशब्द है परमात्मा, शब्द का तो है वो सार रे।।
हद-अनहद.....
ज्योति प्रकाश इन्द्रियाँ देखें, मत उलझो ये बातें बेकार रे।।
खलक भी वो खालिक भी वो, सब जग ही तो उसका विस्तार रे।।
हद-अनहद.....
कहीं मत खोजो प्रभु को जगत में, निज घट में समझो यह सारों का सार रे।।
अवधूत देवीदास के प्रताप से, अनुभव कहता लक्ष्मी पुकार रे।।
हद-अनहद.....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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