सतगुरु तो है प्रेम का सागर
सतगुरु तो है प्रेम का सागर, जो भी नहाया वो भव तर गया।
जिसने मिटा लिए राग-द्वेष मन के, वो जग में सुख पा लिया।।
हे सतगुरु....
जिसने राह पकड़ली प्रेम की, वो माया का बन्धन काट लिया।।
जिसने काम, क्रोध, मद, लोभ को तजा, वो सब दुश्मन जीत लिया।।
हे सतगुरु....
जिसने सुमिरण किया सतगुरु का, वो भगति के पथ को जान लिया।।
जिसने किया समर्पण सतगुरु के चरणों में, वो मोक्ष गति पा लिया।।
हे सतगुरु....
लक्ष्मीनारायण ने करके भरोसा सतगुरु का, जीवन अपना सवाँर लिया।।
हे सतगुरु....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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