सब तजि तेरी शरण में आऊँ
हे सतगुरु सब तजि, तेरी शरण में आऊँ
अकथ अगाध है तेरी महिमा, फिर भी निज मति मैं गाऊँ।।
हे सतगुरु सब.....
नुगरा कोई क्या जानेगा तुझको, तेरी लीला का उसको मिलै न ठाऊँ।।
जितना उतरूँ उतना गहरा तू, तेरा अन्त नहिं मैं पाऊँ।।
हे सतगुरु सब.....
तुझ बिनु और न कोई सहारा जग में, तुझे छोड़ कहाँ मैं जाऊँ।।
हे सतगुरु सब.....
दृष्टा बन कर तू सब कुछ देखे, अब तुझसे मैं क्या छुपाऊँ।।
हे सतगुरु सब.....
लक्ष्मीनारायण पड़ा है शरण में तेरी, जैसे तू चाहे वैसे मैं नचाऊँ।।
हे सतगुरु सब.....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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