धन्य धन्य सतगुरु तेरा
धन्य धन्य सतगुरु तेरा, तू ने जीवन जीना सिखा दिया।
मैं तो मोह की बेड़ी में था बंधा, तू ने सहज ही बन्धन खुला दिया।।
धन्य धन्य सतगुरु.....
विषय वन में मैं भटक रहा था, तू ने मारग सहज दिखा दिया।।
धन्य धन्य सतगुरु.....
चिन्ता साँपिनि मुझे सता रही थी, तू ने मुझे बचा लिया।।
धन्य धन्य सतगुरु.....
पंथ मतों में मेरा मन उलझा था , तुने सबका सार बता दिया।।
धन्य धन्य सतगुरु.....
धन्य धन्य करुणा सिन्धु सतगुरु, लक्ष्मीनारायण को करुणा में नहलाय दिया।
धन्य धन्य सतगुरु.....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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