जो सुख चाहो तुम जग में
जो सुख चाहो तुम जग में, परहित की सोचो सदा मन में।।
पर प्रशंसा की आदत बनालो, पर निन्दा तजो सब पल में।।
जो सुख चाहो....
सदभावना सबसे रखना, लगाना अपना मन को हरि जप में।।
जो सुख चाहो....
असहाय की सदा सहायता करना, जो भी क्षमता हो तुम्हारी जग में।
जो सुख चाहो....
पड़ोसी से प्रेम सम्बन्ध रखना, मत भरमना काम, क्रोध, मद में
जो सुख चाहो....
मानव धर्मशास्त्र का चिन्तन-मनन करना, सुख मिलेगा हर हालत में।।
जो सुख चाहो....
गुरु चरणन में लगन लगाना, आनन्द मिलेगा जीवन में।।
जो सुख चाहो....
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, सुख का सार इन कथनन में।
जो सुख चाहो....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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