सतगुरु ही सब जगत का आधारा रे
सतगुरु ही सब जगत का आधारा रे।
भेद-भाव नहिं तनिक उसके मन में, सब पर करता कृपा इकसारा रे।
सतगुरु ही सब.....
सतगुरु बिनु पत्ता नहिं हिलता जगत में, सतगुरु ही सबका पालनहारा रे।।
दृष्टा बन सबके कर्मों को देखे सतगुरु, सबको देता फल भावानुसारा रे।।
सतगुरु ही सब.....
सतगुरु की कृपा जो चाहो जग में, तो करलो निर्मल भाव सारा रे।।
जिसने किए भाव निर्मल अपने, वो हो गया सतगुरु का प्यारा रे।।
सतगुरु ही सब.....
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, सतगुरु ही सच्चा जग में सहारा रे।।
सतगुरु ही सब.....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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