गरीबी का मरम जानो मेरे भाई
गरीबी का मरम जानो मेरे भाई, मन का भरम लो मिटाई।।
धनहीन दरिद्रता होती, दरिद्रता जग में सदा दु:खदाई।।
धनहीन को मान सम्मान ना मिलता, उदर भरण की चिन्ता सताई।।
गरीबी का मरम.....
अभिशाप है जीवन का दरिद्रता, दरिद्र का नहिं कोउ सहाई।।
गरब रहित अवस्था मन की, गर्वहीन सोई गरीबी कहाई।।
गरीबी का मरम.....
गर्व रहित प्रिय होता प्रभु का, सोई प्रभु गरीब नवाज कहाई।।
कोई बिरला पाए भाव गरीबी का, दरिद्र तो घर-घर सुहाई।।
गरीबी का मरम.....
काम, क्रोध, मद, लोभ को तज दो, सहजहि गरीबी आई।
सच्चा होता जो दिल का गरीब, प्रभु वा पे पल-पल कृपा बरसाई।।
गरीबी का मरम.....
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, गरीबी सम कछु सुख नाईं।।
गरीबी का मरम.....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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