साधु भाई मत पाखण्ड में उलझावो
दया शील संतोष धारण करके
जीवन अपना सफल बनाओ।
पाखण्ड करोगे कल्मष बढ़ेगी मन की
मत बिरथा जन्म गँवावो।।
झूठा-साँचा मत दो झाँसा
मत जनता कू भरमावो।।
संयम राखो इन्द्रियों का
मत भोग वासना में ललचावो।।
लोक प्रतिष्ठा अनल सम है
मत हियँ अनल जलावो।।
कुसंग है दुश्मन साधु का
कुसंग से खुद को बचावो।।
जटा जूट छाप तिलक सब पाखण्ड हैं
मत इनमें भरमावो।।
लक्ष्मीनारायण कहता समझाकर
निज स्वरूप जानि परमपद पावो।।
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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