घट में राम रमै, मूर्ख बन कन्दरा भरमाई रे।
नाम रूप सब कल्पना, समझो ध्यान लगाई रे।।
राम तो सबका पिता है, नहिं काउ को बेटा भाई रे।।
राम तो बल है जीव का, राम ही शक्ति सुहाई रे।।
श्वास श्वास में राम रमै, बात सत्य बताई रे।।
राम तो राम ही है, रोम-रोम रमण कराई रे।
नाम रुप में जो भरमे, वो मूर्ख भाई रे।।
ईश्वर अल्लाह नाम तो, इन्साँ धराई रे।
ऊर्जा है राम जगत का, समझो घट माई रे।।
राम ही बोले राम ही सुने, राम ही समझाई रे।।
राम ही सोता राम ही खाता, राम ही सब कराई रे।
निज राम जानि लक्ष्मीनारायण, आनन्द पाई रे।।
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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