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Lyrics

गुरु है सुरत शब्द का जानिनहारा

Satyavani Bhajan (Part -4)
गुरु है सुरत शब्द का जानिनहारा रे। गुरु बिनु नहिं कोई जग में सहारा रे।। गुरु देकर अंकुश मन्त्र का, चंचलता मिटाते मन हस्ति का गुरु ही देते भगति का आधारा रे। गुरु है सुरत..... गुरु कराते निर्मल प्राण को, प्रभु से जुड़ाले भाव को गुरु ही करता ज्ञान का उजियारा रे।। गुरु है सुरत..... काम, क्रोध का गुरु बन्धन छुड़ाते, मोहादि ब्याधि से मुक्त कराते गुरु ही मार्ग दिखानेवाला रे।। गुरु है सुरत..... गुरु भटके को राह दिखाता, सुरत शब्द का मर्म बताता गुरु ही प्रभु से लगन लगवानेवाला रे। गुरु है सुरत..... गुरु ही सुरत को शब्द में मिलवाते सहजहि जीव काल फाँस कटवाते गुरु ही जुगति बतानेवाला रे।। गुरु है सुरत..... गुरु अवधूत देवीदास ने जब कृपा बरसाई लक्ष्मीनारायण ने सब मरम घट में समझाई गुरु ही भव पार कराने वाला रे।। गुरु है सुरत..... ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangeet Ki Jubani, Satyavani Sangit Mahotsav,
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