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विषय-सूची, आमुख, मानव धर्मशास्त्र का महात्म्य

Manav Dharma Shastra (Hindi)
मानव धर्म शास्त्र (Manav Dharma Shastra) एक सनातन धर्म ग्रन्थ है, जिसकी रचना सतगुरु Awadhoot Devidas Maharaj की दिव्य कृपा से गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी (Laxminarayan Meena, IPS) ने की है। यह ग्रन्थ प्रथम बार 2013 में हिन्दी में, 2022 में अंग्रेज़ी में तथा 2023 में बांग्ला में प्रकाशित हुआ (प्रकाशक: Kirti Publication; ISBN: 978-81-965006-1-0) ❀ ऊर्जा ही शक्ति है, शक्ति ही ब्रह्म है, मानव धर्मशास्त्र ब्रह्म अखण्ड है, मानव सब एक है ❀ विषय-सूची विषय पृष्ठ संख्या 1. आमुख ……………………………………… 8-10 2. मानव धर्मशास्त्र का महात्म्य …………. 11-16 3. ॐ परमात्मा श्लोका प्रश्नावली ………. 17-19 4. मानव धर्मशास्त्र के परायण की विधि …. 19-23 5. प्रथम स्कन्ध ……………………………….. 25-71 स्व अनुभूति वर्णन-37, कर्म मर्म-40, कलियुग में नरक-45, द्वापर मर्म-48, द्वापर स्वर्ग-53, द्वापर नरक-55, त्रेता युग मर्म-56, सतयुग मर्म-64 6. द्वितीय स्कन्ध ……………………………… 73-92 धर्म मर्म-75, शरीर रहस्य-77 7. तृतीय स्कन्ध ……………………………….. 93-112 नाम रूप मर्म-94, माया और परमात्मा-97, प्राण और परमात्मा-101, पाप-पुण्य कर्म मर्म-103, निष्काम कर्म मर्म-107, यज्ञ मर्म-108 8. चतुर्थ स्कन्ध ……………………………… 113-147 सृष्टि रहस्य-114, देव उत्पत्ति-115, तन मन निरोग उपाय-122, शक्ति रिझावन विधि-123, रोग नाशक उपाय-126, प्रकृति शरण और वैभव प्राप्ति-130, सुखी दाम्पत्य उपाय-133, कृषि हेतु उपाय-136, व्यवसाय लाभ-141, पुरोहित हेतु-141, देह आरोग्य-143 9. पंचम स्कन्ध ……………………………… 149-218 सुख उपाय-149, जगत व्यवहार-151, मंगल स्तुति-152, लोकतन्त्र-157, पंथ संस्था-157, शिक्षा नीति-160, मंगल पाठ-164, प्रशासक नीति-168, प्रशिक्षित ध्यान विधि-169, ईश पंच प्रणाम-170, पंथ नीति-173, न्यास नीति-176, परिवार नीति-178, पति स्तुति-189, पति हेतु उपदेश-190, गुरु मिलन उपाय-193, गुरु स्तोत्र-195, अर्थ नीति-202, प्रकृति स्तुति-203, आनन्द स्तुति-208, प्रशासन नीति-213 10. षष्ठम स्कन्ध ……………………………… 219-412 तुलसी अनुभूति (222), परमात्मा स्तुति (229), प्रभु स्तुति (252), व्यास अनुभूति (255), सांख्य दर्शन (260), परमात्मा स्तुति (264), कृष्ण मर्म (273), एकलव्य द्वारा ब्रह्म उपदेश (279), ध्यान विधि (283), कृष्ण को ज्ञान की अनुभूति (285), एकलव्य कथा (288), कबीर अनुभूति (327), इस्लाम मर्म (342), अष्टावक्र अनुभूति (350), नानक अनुभूति (368), नामदेव की अनुभूति (374), रविदास की अनुभूति (377), ओशो की अनुभूति (380), ईसाई पंथ (386), बुद्ध की अनुभूति (390), महावीर की अनुभूति (394), लोकनाथ की अनुभूति (397), रामकृष्ण की अनुभूति (399), बालक ब्रह्मचारी की अनुभूति (404), साईं की अनुभूति (407) 11. सप्तम स्कन्ध ……………………………… 413-480 शक्ति मर्म (414), शक्ति नाम मर्म (420), जगदम्बा स्तोत्र (433), आदिशक्ति की प्रार्थना (443), महासक्ति स्तोत्र (445), आदि शक्ति जगदम्बा स्तुति (454), मार्कण्डेय अनुभूति (461), विष्णु द्वारा परमात्मा के बाल रूप की स्तुति (469), शिव द्वारा परमात्मा की स्तुति (470), ब्रह्माजी द्वारा परमपिता की स्तुति (472), मुनि मार्कण्डेय द्वारा स्तुति (477) 12. अष्टम स्कन्ध ……………………………… 481-615 शिव महिमा (481), शिव प्रतीक मर्म (481), परमात्मा स्तुति (503), आत्म ज्ञान (510), स्वर मर्म (521), ध्यान विधियाँ (531), परमात्मा स्तुति (567), प्रतिवेशी पूजा महात्म (597), पंच तत्व स्तोत्र (601), चन्द्र स्तुति (602), पार्वती द्वारा शिव स्तुति (605) 13. नवम स्कन्ध ……………………………… 617-703 हू पा कजिजका (619), प्रभु की अनुभूति (623), परमात्मा स्तुति (628), संसार मुक्ति उपाय (638), देह स्वरूप वर्णन (642), परमात्मा स्तुति (644), परमात्मा के स्वरूप की स्तुति (648), नाम मर्म (651), मानव धर्मशास्त्र का महत्व (669), साधना सूत्र (678), मानवता के लक्षण (698) 14. आरती धर्मशास्त्र की ………………………….. 704 15. मानव धर्मशास्त्र मासपरायण प्रथम पड़ाव (45), द्वितीय पड़ाव (71), तृतीय पड़ाव (92), चतुर्थ पड़ाव (112), पंचम पड़ाव (135), षष्ठम पड़ाव (147), सप्तम पड़ाव (172), अष्टम पड़ाव (198), नवम पड़ाव (218), दशम पड़ाव (240), एकादशम पड़ाव (259), द्वादशम पड़ाव (280), त्रयोदशम पड़ाव (302), चतुर्दशम पड़ाव (321), पंचदशम पड़ाव (341), षोडशम पड़ाव (360), सप्तदशम पड़ाव (379), अष्टदशम पड़ाव (399), नवदशम पड़ाव (412), विंशति पड़ाव (439), एकविंशति पड़ाव (466), द्वाविंशति पड़ाव (480), त्रयोविंशति पड़ाव (502), चतुर्विंशति पड़ाव (524), पंचविंशति पड़ाव (545), षड्विंशति पड़ाव (566), सप्तविंशति पड़ाव (587), अष्टाविंशति पड़ाव (615), नवविंशति पड़ाव (639), त्रिंशत पड़ाव (661), एकत्रिंशत पड़ाव (678), द्वात्रिंशत पड़ाव (703) 16. मानव धर्मशास्त्रस्य नवाहपरायण प्रथम पड़ाव (92), द्वितीय पड़ाव (147), तृतीय पड़ाव (218), चतुर्थ पड़ाव (284), पंचम पड़ाव (348), षष्ठम पड़ाव (412), सप्तम पड़ाव (480), अष्टम पड़ाव (615), नवम पड़ाव (703) आमुख मानव धर्मशास्त्र संसार में परमपिता परमेश्वर का प्रमाणित धर्मग्रन्थ है। इस अमृततुल्य महाग्रन्थ के एक-एक शब्द स्वयं परमशक्ति की प्रेरणा एवं कृपा का साक्षात प्रमाण है। इस पवित्र व अनमोल महाग्रन्थ में किसी दूसरे द्वारा कही या सुनी गयी बातों को नहीं दोहराया गया है। ब्रह्म की सनातन सत्यवाणी को ज्यों का त्यों लिखा गया है। ब्रह्म की वाणी को जगत की वाणी बनाना ही इस दिव्य ग्रन्थ का प्रमुख उद्देश्य है। यह ग्रन्थ मानव मात्र के लिए अखण्ड, अद्वितीय, अभेद व सर्वव्यापी परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। इसलिए इस ग्रन्थ का जितना अधिक प्रसार व प्रचार होगा, उतना ही अधिक मंगलमय संसार होगा। इसे घर-घर पहुँचाना सम्पूर्ण मानव जाति का परम कर्तव्य है। सम्पूर्ण जगत एक ही महाशक्ति की रचना है। सारी सृष्टि का मूल एक ही परमात्मा है, जिसे विद्वानों ने समय-समय पर ईश्वर, अल्लाह, महाकाली, महादुर्गा, नारायण आदि कई नामों से पुकारा है। वास्तव में सब नाम मनुष्य की बुद्धि की भिन्नता का ही परिणाम है। यह प्रथम धर्मग्रन्थ है, जिसे सभी जाति, पंथ व भाषा के लोग एक साथ बैठकर पढ़ सकते हैं। इसका श्रद्धा व विश्वास के साथ पठन एवं मनन करने से क्षण भर में ही सारे शरीर में एक अद्भुत रोमांच फैल जाता है तथा जीव पल भर में ही असीम ईश्वरीय कृपा का रसास्वादन करने लगता है। ब्रह्मज्ञान के मूल तत्वों को इस ग्रन्थ में बहुत ही सहज एवं रोचक भाव से समझाया गया है, ताकि साधारण सांसारिक एवं साधक दोनों ही इस गंभीर विषय को अति सहजता से ग्रहण कर सकें। यह अखण्ड महाग्रन्थ सभी सम्प्रदायों व मतावलम्बियों के लिए समान रूप से लाभकारी है। इस ग्रन्थ में सारे पंथों एवं मतों का सार लिखा गया है। यह सम्पूर्ण मानव जाति को एक सूत्र में बाँधने वाला, हर एक खण्ड को अखण्ड बनाने वाला, परमशक्तिशाली अखण्ड ब्रह्म का अखण्ड धर्मशास्त्र है । यह ग्रन्थ कोई कथा कहानियों वाला ग्रन्थ नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर का दर्शन है । ईश्वर को मानने से ज्यादा जानना जरूरी है । कौन है सृष्टि का मूल ? प्रकृति क्या है ? माया क्या है ? चारों युगों का रहस्य क्या है ? धर्म क्या है ? देवी-देवता कौन हैं ? अवतारों का रहस्य क्या है ? नाम व रूप का रहस्य क्या है ? नर नारी (नाड़ी) का भेद क्या है ? पाप पुण्य क्या है ? यज्ञ क्या है ? ध्यान क्या है ? कर्म व भाव क्या हैं ? क्यों सब कुछ करनेवाला परमात्मा अकर्ता कहलाता है ? प्रकृति शक्ति को कैसे प्रसन्न किया जाय ? रोग व चिन्ता से मुक्ति के सहज उपाय क्या हैं ? घर, कृषि व व्यापार में कैसे ईश्वर की कृपा को पाया जाय ? इतना ही नहीं, समाज, परिवार, लोकतंत्र, शिक्षा इत्यादि को कैसे आदर्श बनाया जाय । अपना राष्ट्र ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को कैसे शान्ति, प्रेम व अहिंसा के महामंत्र से जोड़ा जाय ? ऐसे अनेक प्रश्नों का सविस्तार मार्गदर्शन किया गया है । ताकि सम्पूर्ण संसार का मंगल हो एवं यह संसार ही स्वर्ग बन जाए । सारे धर्म व पंथों के सन्तों ने किस मार्ग से ईश्वर का दर्शन किया ? तुलसी, व्यास, राम, कृष्ण, एकलव्य, कबीर, पैगम्बर मोहम्मद, नानक, नामदेव, ओशो, ईसा, गौतम बुद्ध, महावीर, लोकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, बालक ब्रह्मचारी, साँई बाबा, देवगिरि आदि महा सन्तों ने जिस गूढ़ रहस्य को समझा व समझाना चाहा, वह परम सनातन सत्य क्या है? यह सर्वधर्मों के लिए सर्वोपकारी अखण्ड महाग्रन्थ है, जिसमें सारे धर्मों का सार निहित है । स्वयं भगवान प्रसन्न होकर जिस शास्त्र में निवास करते हों, उसकी महिमा का आकलन करना ही अज्ञानता है। परमात्मा सब जीवों के हृदय में प्राण के रूप में एक समान निवास करते हैं । प्रभु कहते हैं कि मेरे व माया के बीच केवल भाव का अन्तर है । मैं सदा भावों में ही निवास करता हूँ तथा भावों के अनुरूप मैं ही नाना नाम व रूप धारण कर लेता हूँ। मैं ही माया के रूप में और मैं ही ईश्वर के रूप में आभासित होता रहता हूँ। नाम का भी नाम, राम का भी राम मैं ही हूँ। मैं ही ईसा का ईश्वर हूँ तथा इस्लाम का नूर हूँ। महावीर का भगवान व बुद्ध का ज्ञान भी मैं ही हूँ। मैं ही ज्ञानियों का ज्ञान व अभिमानियों का मान हूँ। मैं ही सब घटो में निवास करने वाला सबका मालिक हूँ। इस पवित्र महाग्रन्थ को नौ भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक स्कन्ध अनमोल व अद्वितीय हैं। यह पवित्र ग्रन्थ अनुभूति पर आधारित है, इसलिए इसकी प्रमाणिकता स्वतः सिद्ध है। मानव जाति के लिए यह ग्रन्थ सद्गुरुदेव का वरदान है। मानव धर्मशास्त्र का महात्यम् यह धर्म शास्त्र ब्रह्म वाणी है । इसलिए यह ब्रह्म स्वरूप है तथा इसमें ब्रह्म का ही वर्णन किया गया है, इसलिए यह ब्रह्ममय है । इस ग्रन्थ का प्रत्येक वाक्य ब्रह्म का ही चिन्तन कराता है तथा ब्रह्म की जानकारी कराता है, इसलिए यह “ब्रह्मवेद” है । इसमें धर्म के सत्य स्वरूप का वर्णन किया गया है, इसलिए यह धर्म के मर्म को जनाने वाला होने के कारण इसका दूसरा नाम “धर्म वेद” भी है । यह ग्रन्थ धर्म के रहस्य को समझाने वाला है, इसलिए “राजधर्म” भी है । इस ग्रन्थ में साक्षात् परमात्मा की वाणी को ही लिखा गया है । इसलिए यह ग्रन्थ सभी पंथों के लिए सर्वमान्य होगा । इसमें पंथों के नाम पर दीवार खड़ी नहीं की गयी है । इसलिए यह अखण्ड महापंथ दिखाने वाला है । इसमें समस्त साधना पंथों के मर्म को सूक्ष्मता के साथ लिखा गया है, जिससे मानव जाति को कोई भ्रम नहीं रह जाये । इस ग्रन्थ में परमात्मा के रहस्य को स्वयं परमात्मा की वाणी द्वारा समझाया गया है । इसलिए इसकी सत्यता व प्रमाणिकता पर कोई संदेह नहीं है । इसमें प्रत्येक अनुभूत सत्य के सूत्रों को लिखा गया है । आत्मा क्या है ? आत्मा को कैसे पहचाना जाये ? मन क्या है ? मन का खेल क्या है ? जीव सुख-दुःख क्यों भोगता है ? प्रारब्ध क्या है ? देवताओं का रहस्य क्या है ? प्रकृति व पुरूष का रहस्य क्या है ? सृष्टि की उत्पत्ति कैसे होती है ? जन्म-मरण क्या है ? मोक्ष क्या है ? सुखी कैसे रहा जाये ? पंथों की उत्पत्ति कैसे हुई ? पंथों का रहस्य क्या है ? राज धर्म क्या है ? शासन व समाज व्यवस्था कैसी हो ? वैभवता कैसे प्राप्त हो ? आरोग्य कैसे मिले ? आनन्द में कैसे रहें ? प्रकृति कैसे अनुकूल हो ? ग्रह-नक्षत्र कैसे अनुकूल हों ? भूत-प्रेतों से कैसे मुक्ति मिले ? स्वर्ग-नरक का क्या रहस्य है ? चार युग क्या हैं ? परमात्मा को कैसे जानें ? सिद्धियाँ क्या हैं ? मूर्ति रहस्य क्या है ? ध्यान, ज्ञान व भक्ति के रास्ते क्या हैं ? परिवार में प्रेम व शान्ति कैसे रहे ? तलाक आदि परिवार की समस्याएँ कैसे मिटें ? आदि-आदि जटिल से दिखने वाले प्रश्नों को इस ग्रन्थ में बहुत ही सरलता से समझाया गया है । इसलिए पाठकों व श्रोताओं को यह ग्रन्थ मनोकामना सिद्धि प्रदान करने वाला है । यह ग्रन्थ खण्डन व मण्डन की प्रवृति से पूर्णतः मुक्त है तथा इसमें यथार्थ सत्य की सत्ता का ही वर्णन किया गया है । गुरु शक्ति के परम रहस्य को इसमें बहुत सरलता से समझाया गया है । इसमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौद्ध व अन्यान्य पंथों के रहस्य को समझाकर सत्य की परम सत्ता के रहस्य को जनसाधारण को समझाने का प्रयास किया गया है, जिससे पंथवादिता की दीवार मिट सके । इसमें कबीर, नानक, रविदास, नामदेव, ओशो, लोकनाथ, साँई, देवगिरि, रामकृष्ण आदि सन्तों के साधना अनुभवों को बताया गया है । यह ग्रन्थ सामाजिक समरसता व एकता स्थापित करने वाला है तथा पूरी तरह से पाखण्डवाद से मुक्त है । यह ग्रन्थ मानव जाति के कल्याण के लिए साक्षात् परमात्मा का वरदान है। इस ग्रन्थ के प्रत्येक शब्द में ब्रह्म तत्व का ही वर्णन है । इसलिए यह पुरूषार्थ के चारों फलों (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) को देने वाला है । यह ग्रन्थ ब्रह्मशक्ति से परिपूरित है । इसलिए जिस घर में इस ग्रन्थ की पूजा होगी, वहाँ पर भूत, प्रेत व पिशाच आदि शक्तियाँ नहीं रह पायेंगी । जो भी श्रद्धापूर्वक इस ग्रन्थ को अपने घर में रखेंगे, उनको अतुलनीय पुण्य की प्राप्ति होगी तथा समस्त ग्रह-नक्षत्र सदा अनुकूल बने रहेंगे और जो लोग नित्य इसका पाठ करेंगे, उनको नवद्या भक्ति स्वतः प्राप्त हो जायेंगी । यह ग्रन्थ ब्रह्म स्वरूप है । इसलिए इसका प्रचार व प्रसार स्वयं ब्रह्म का ही प्रसार-प्रचार होगा, जिससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी । इस ग्रन्थ का एक बार पाठ करना ही सैकड़ों करोड़ों रामायणों के पाठ करने के बराबर होगा । इस ग्रन्थ के एक बार का पाठ ही दस हजार गीताओं के पाठ के बराबर होगा तथा बाइबिल व कुरान को पढ़ने का फल स्वतः प्राप्त हो जायेगा । इस ग्रन्थ में दुनिया के अब तक के समस्त ग्रन्थ निवास करेंगे, इसलिए यह अतुलनीय ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ का एक बार का अध्ययन ही एक हजार करोड़ गायों के दान का फल देने वाला है तथा जो नित्य बार-बार अध्ययन करेंगे, उनको इन्द्र तुल्य पद की प्राप्ति होना अवश्यम्भावी है । इस ग्रन्थ का एक बार का श्रद्धापूर्वक किया गया पाठ ब्राह्मण व गौ हत्या के पाप से मुक्त करा देता है । इस ग्रन्थ में स्वयं “पार ब्रह्म” की शक्ति निवास करती है । इसलिए इसकी निन्दा व अपमान करना घोर अपराध होगा । जो भी इस ग्रन्थ की निन्दा व अपमान करेंगे, उनको चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ेगा तथा घोर चिन्ता रूपी नरक की यातनाएँ मिलेंगी । इस ग्रन्थ में परम गुरु शक्ति भी निवास करती है, इसलिए इस ग्रन्थ के अपमान व निन्दा के पाप से जीव को ब्रह्माण्ड में कोई भी शक्ति नहीं बचा सकती है । जानबूझकर निन्दा व अपमान करने पर जीव को कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकती है । परन्तु अपनी भूल स्वीकार करके पूरी श्रद्धा के साथ इस ग्रन्थ की शरण में आने से क्षमादान मिल जायेगा । अन्यथा क्षमा का दूसरा कोई रास्ता नहीं है । आम के वृक्ष के नीचे इस ग्रन्थ का सात बार पाठ करने से समस्त सात्विक मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा बरगद के नीचे बैठकर सुनने या सुनाने से सिद्धियों की प्राप्ति होने लग जाती है तथा हृदय में ब्रह्मज्ञान उतर आता है। पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर पाठ करने व ध्यान करने से परम शक्ति का साक्षात्कार हो जाता है । इस ग्रन्थ पर प्रवचन करने से वाणी की सिद्धि प्राप्त होगी तथा प्रवचन कर्ता को मोक्ष की प्राप्ति अवश्यम्भावी होगी । इसमें बतायी गयी रोग निवारण विधि से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं । इस ग्रन्थ में लिखी गयी “कृपा कुञ्जिका” का पाठ करने से परमात्मा की कृपा प्राप्त हो जाती है । इस ग्रन्थ का प्रचार-प्रसार करने वाले को अपूर्व वैभव, यश व परम ज्ञान की प्राप्ति होगी और परिवार सहित परम सुख की अनुभूति होगी । जन्मोत्सव के समय इस ग्रन्थ का दान करने से बच्चों में दिव्य संस्कार आ जाते हैं तथा वह भगवान की भक्ति करने वाला हो जाता है । विवाह के शुभ अवसर पर ग्रन्थ की प्रतियाँ दान करने से पति-पत्नी में अटूट सम्बन्ध बना रहता है तथा वैवाहिक जीवन सुखद बना रहता है । व्यवसाय की शुरूआत करते समय ग्रन्थ का दान करने से व्यवसाय में बढ़ोतरी होने लग जाती है तथा कोई विघ्न बाधाएँ नहीं आती हैं । नए गृह प्रवेश के समय ग्रन्थ का दान करने से उस घर में वैभव व शान्ति बनी रहती है । कुण्डली में काल सर्प योग होने पर धर्म शास्त्र की प्रतियाँ श्रद्धा अनुरूप दान करने व ग्यारह बार पाठ कराने से समस्त कुण्डली के दोष दूर हो जाते हैं । जिस दम्पति के सन्तान नहीं होती हो, तो स्वयं दम्पति द्वारा धर्मशास्त्र का एक सौ आठ बार पाठ करने से सन्तान पैदा हो जायेगी । इस धर्मशास्त्र को श्रद्धापूर्वक घर में रखने से कोई भी भूत, प्रेत आदि के करतूत नहीं सताते हैं तथा समस्त आसुरी बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। इस धर्मशास्त्र का पूर्णिमा के दिन पठन-पाठन करने से सहस्र अश्वमेध यज्ञों के फल की प्राप्ति होती है तथा हृदय में गुरु शक्ति जागृत होने लग जाती है, जो जीव को समस्त बन्धनों से मुक्त करा देती है । सामूहिक पाठ करने से ग्राम, नगर, राज्य व देश पर आयी हुई विपदा टल जाती है और अकाल व सूखा से राहत मिल जाती है । सामूहिक पाठ करने से समस्त प्राकृतिक आपदाएँ दूर हो जाती हैं । जहाँ पर सामूहिक पाठ किया जाता है, उस जगह की मिट्टी अड़सठ तीर्थों के फल को देने वाली हो जाती है । स्वयं की अनुभूति ही इस धर्म शास्त्र की सत्यता का प्रमाण होती है । स्वयं परमात्मा ने धर्मशास्त्र के महत्व को बताते हुए कहा है कि – दो०- सरल सुचि सुलभ सकल सरस मधुर सुधा समान । ध्यान ग्यान मरम बुझावहिं ग्रन्थ इहँ सतगुरु करि जान ॥ अर्थात यह ग्रन्थ सरल, पवित्र व सबके लिए है तथा सरस, मधुर व अमृत के समान है। इसमें ध्यान व ज्ञान के रहस्य को समझाया गया है। इसलिए इसे सत्गुरु के समान ही मानना चाहिए । इहँ शास्त्र धर्म वेद सुहाई । परम ते परम ग्यान बताई ॥ बुध जन हेतु इहँ ज्ञान आधारा । साधक हेतु भा धरम आचारा ॥ यह शास्त्र धर्म का वेद है, जिसमें परम से परम ज्ञान को बताया गया है । यह ग्रन्थ विद्वानों के ज्ञान का आधार है तथा साधक लोगों के लिए आचरण करने का धर्म है । पावन परम हय गंग समाना । सत्य सरूप मम बचन प्रमाना ॥ गुरु सम मानहिं इहँ शास्त्र जेही । बिनहिं प्रयास सब सुख लेही ॥ यह गंगा के समान पवित्र है तथा सत्य स्वरूप है । मेरे वचन ही इसका प्रमाण हैं। जो लोग इस ग्रन्थ को गुरु के समान मानते हैं, वे सहज में बिना प्रयास के ही समस्त सुखों को प्राप्त कर लेते हैं । राज धर्म इहँ हेतु सरकारा । आचरण हेतु जग व्यवहारा ॥ सिद्ध जन हेतु इहँ सिद्धि मूला । करइ प्रकृति सकल अनुकूला ॥ सरकारों के लिए यह राज धर्म है तथा आचरण करने के लिए जगत का व्यवहार है । सिद्ध लोगों के लिए सिद्धियों का मूल है तथा प्रकृति को अनुकूल करने वाला है । कामना हेतु कल्पतरू गाछा । कामधेनु सम इहँ भगत बाछा ॥ तन्त्र मन्त्र इहँ मरम बुझाई । गुरु कृपा बिनु हेतु बरसाई ॥ कामना पूर्ण करने के लिए यह कल्पतरू का पेड़ है तथा बछड़ों रूपी भक्तों के लिए कामधेनु रूपी गाय है । यह तन्त्र व मन्त्र के रहस्य को बताने वाला तथा अकारण ही गुरु कृपा बरसाने वाला ग्रन्थ है । इहँ माझ में करूँ सदा निवासा । मोर नाम रूप सब भ्रम नासा ॥ भूत प्रेतादि मिटहिं सब ब्याधा । कामद सिन्धु कहा कहूँ ज्यादा ॥ इस ग्रन्थ में मैं स्वयं निवास करता हूँ क्योंकि यह मेरे नाम व रूप के समस्त संशयों को मिटाने वाला है । इससे भूत-प्रेत आदि की समस्त बाधाएँ दूर हो जाती हैं ।मैं ज्यादा क्या कहूँ, यह ग्रन्थ कामना पूर्ण करने वाला समुद्र है। इहँ शास्त्र पूजा मोर समाना । प्रगट रूप मोर जानि सुजाना ॥ जेहि पढ़हिं सुनहिं इक बारा । पावहिं पुण्य प्रताप अपारा ॥ इस शास्त्र की पूजा मेरी पूजा करने के समान ही है । इसलिए इस ग्रन्थ को मेरा प्रकट रूप जानना चाहिये । जो लोग इसे एक बार भी पढ़ते व सुनते हैं, उन्हें अपार पुण्य की प्राप्ति होती है । दो० - सत कोटि रामायण सम सहस्र भागवत गीता समान । वेद पुराण सब मरम इहाँ वास बाइबिल कुरान ॥ यह करोड़ों रामायणों के समान व हजारों भागवत व गीताओं के समान है। इसमें समस्त वेदों व पुराणों का रहस्य है तथा इसमें बाइबिल और कुरान भी निवास करते हैं । सकल ग्रन्थन इहँ सार सुहाई । ऐहि सम ऐहि अरु कोउ नाई ॥ साधक हेतु पथ मंजिल भाई । सरल प्रयास तहँ मोहि पाई ॥ इसमें समस्त ग्रन्थों का सार है, इसलिए इसके समान तो यही ग्रन्थ है और कोई नहीं है । साधक लोगों के लिए यह मंजिल का रास्ता है, जिससे सरलता से ही मुझे प्राप्त किया जा सकता है । इहँ ग्रन्थ महापंथ अखण्डा । मानहिं एक सकल ब्रह्माण्डा ॥ जे अनुसरहिं तेहि होइब संता । मुक्ति मार्ग सरल इहँ पंथा ॥ यह ग्रन्थ अखण्ड महापंथ दिखाता है, जो समस्त ब्रह्माण्ड को ही एक मानता है । जो इसका अनुसरण करते हैं, वे सन्त हो जाते हैं । यह मुक्ति प्राप्त करने का सरल रास्ता है । सकल पंथ इहाँ आइ मिलाइ । नहिं भेद भाव भ्रम किछु भाई ॥ ग्रन्थ सब करहिं मोर इसारा । प्रथम ग्रन्थ देइब जो सहारा ॥ समस्त पंथ इसमें आकर मिल जाते हैं, इसलिए इस ग्रन्थ में किसी प्रकार के भेद-भाव का भ्रम नहीं है । समस्त ग्रन्थ तो मेरी तरफ इशारा मात्र करते हैं परन्तु यह पहला ग्रन्थ है, जो मुझसे मिलने के लिए सहायता करता है। कामद सिन्धु इहँ मोर सरूपा । अनुसरहिं पावहिं भक्ति अनूपा ॥ निन्दा स्तुति इहँ उभय पारा । सत्य सनातन नहिं मोते न्यारा ॥ यह कामना पूर्ति का समुद्र है तथा मेरा स्वरूप है अतः जो अनुसरण करते हैं, उनको अनुपम भक्ति प्राप्त होती है । यह निन्दा व स्तुति दोनों से परे हैं । यह सनातन सत्य है, जो मुझसे अलग नहीं है । मंगल मूल सकल सुखदाई । मानव जाति कल्याण कराई ॥ मास दिवस जेहि करहिं पाठा । आवइ तिन्ह गृह विभूति आठा ॥ यह मंगल का मूल व सबको सुख देनेवाला है तथा मानव जाति का कल्याण करने वाला है । जो लोग एक महीने इसका पाठ करते हैं, उनके घरों में आठ प्रकार की विभूतियाँ आ जाती हैं । जेहि पाठ करहिं बरस इक्कीसा । तिन्ह आइ मिलहुँ मैं जगदीसा ॥ श्रद्धा सह करहिं पाठ इकबारा । कटहहिं अघ सहस्र अपारा ॥ जो इक्कीस वर्ष पाठ करेंगे, उनको मैं स्वयं आकर मिल जाऊँगा और जो श्रद्धापूर्वक एक बार भी पढ़ेंगे, उनके हजारों पाप नष्ट हो जायेंगे । जेहि करहिं इहँ पाठ अखण्डा । हियँ प्रटगइ शक्ति प्रचण्डा ॥ जय रूप यश वैभव अपारा । पावहिं सुख शान्ति परिवारा ॥ जो इसका अखण्ड पाठ करते हैं, उनके हृदय में प्रचण्ड दिव्य शक्ति पैदा हो जाती है तथा उन्हें अपार जय, रूप, यश व वैभव प्राप्त हो जाता है और परिवार में सुख-शान्ति आ जाती है । दो०- जेहि गृहस्थ नित्य पूजहिं जानि मोर रूप इहँ ग्रन्थ । धर्म अर्थ काम मोच्छ मिलहिं पावइ जग यश अनन्त ॥ जो गृहस्थ लोग इस ग्रन्थ को मेरा ही रूप मान कर नित्य पूजा करेंगे, उनको धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी तथा संसार में अनन्त यश की प्राप्ति होगी। निज मुख प्रभु महिमा बखानी । सो नहिं कोउ इहँ समानी ॥ परमात्मा ने स्वयं अपने मुख से इसकी महिमा को बताया है । इसलिए इस ग्रन्थ के समान दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं है । यह ग्रन्थ अपने-आप में अद्वितीय व अनुपम है तथा भक्ति का सागर है । इस ग्रन्थ में धर्म के सत्य स्वरूप को सरल भाषा में बताया गया है । इसलिए यह “मानव धर्म शास्त्र” है । धर्म के सूक्ष्म राज को खोला गया है इसलिए यह शास्त्र “राज धर्म” भी है । इस ग्रन्थ की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें सभी पंथों को समान महत्व दिया गया है, इसलिए सब पंथों के लिए यह अनुसरणीय है । यह ग्रन्थ सामाजिक सद्भाव के लिए सेतु बन्ध का काम करेगा । संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ भक्ति का सागर व ज्ञान का घर है तथा परमपिता परमेश्वर का साक्षात् प्रकट स्वरूप है । ॥ अवधूत देवीदास ॥ “ऊर्जा ही शक्ति है, शक्ति ही ब्रह्म है, ब्रह्म अखण्ड है, मानव सब एक हैं ।” ॐ परमात्मा शलाका प्रश्नावली मानव कल्याण के लिए परमात्मा शलाका प्रश्नावली दी जा रही है। इसकी महत्ता स्वतः सिद्ध है। इसका स्वरूप सत्गुरु की कृपा से प्रकट हुआ है। यहाँ पर इसके स्वरूप को अंकित करके प्रश्नोत्तर निकालने की विधि दी जा रही है। परमात्मा शलाका से प्रश्नों का उत्तर कोई भी जाति, धर्म व सम्प्रदाय के लोग निकाल सकते हैं, क्योंकि परमात्मा तो समस्त जड़-चेतन के पिता हैं। जाति, पंथ व सम्प्रदाय तो सब मानव निर्मित हैं। पाठकों की सुविधा के लिए विधि व स्वरूप नीचे लिखा जा रहा है। इस शलाका द्वारा जिस किसी को भी अपने अभीष्ट प्रश्न का उत्तर जानना हो, तो उसे सर्वप्रथम हाथ जोड़कर परमपिता परमेश्वर को नमस्कार करना चाहिये तथा स्वयं को परमपिता का पुत्र मानकर, जाति व पंथ के सब भेद भुलाकर, प्रश्न का मन में चिंतन करके शलाका के किसी भी मन चाहे कोष्ठक में अँगुली रख कर अक्षर को सादे कागज या स्लेट पर लिख लें । फिर प्रत्येक नौवें अक्षर को लिखना शुरू कर दें । इस प्रकार लिखने से चौपाई पूर्ण हो जायेगी। यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि किसी-किसी कोष्ठक में केवल “आ” की मात्रा (T) और किसी-किसी कोष्ठक में दो-दो अक्षर हैं । इसलिए गिनते समय न तो मात्रा वाले कोष्ठक को छोड़ें और न ही दो अक्षरों वाले कोष्ठक को दो बार गिनना चाहिये । इस परमात्मा शलाका प्रश्नावली से जो भी चौपाइयाँ बनती हैं, उन सबका फल सहित नीचे उल्लेख किया जा रहा है । मंगल भावना रखहि मन माहीं । तिन्ह जग दुर्लभ किछु नाहीं ॥ फल :- प्रश्नकर्ता की इच्छा भावों पर आधारित है, इसलिए मंगल भावना रखने पर ही मन इच्छा पूर्ण होगी । सरल सुगम मंगल दायक । नहिं संशय कुञ्जिका भव तारक ॥ फल :- प्रश्नकर्ता की इच्छा सुगमता से पूर्ण हो जायेगी, अगर वह इस ग्रन्थ में लिखी गयी कृपा कुञ्जिका का पाठ करेगा । समरप सम नहिं मारग दूजा । नहिं दरकार जप तप पूजा ॥ फल :- प्रश्नकर्ता को अपने ईष्ट देव के सामने पूरी तरह समर्पण कर देना चाहिये । उसकी इच्छा पूर्ण हो जायेगी । होइब पूर्ण अभिलाष तुम्हारी । सुन इहँ सत्य आशीष हमारी ॥ फल :- प्रश्नकर्ता की इच्छा पूर्ण होगी । रहिहिं शरण बिगत सब बाधा । मरम सरल नहिं किछु ज्यादा ॥ फल :- प्रश्नकर्ता को भगवान की शरण में रहना चाहिये, जिससे उसकी समस्त बाधाएँ मिट जायेंगी और इच्छा पूर्ण हो जायेगी । होइब कृत कृत्य मोर दासा । पूर्ण होवहिं सकल अभिलाषा ॥ फल :- प्रश्नकर्ता को भगवान के भरोसे रहने से कर्म का फल नहीं बाँधेगा तथा सहज में ही इच्छा पूर्ण हो जायेगी । जो पढ़हि इहँ स्तुति पावन । पूरण करहि मातृ मन भावन ॥ फल :- प्रश्नकर्ता को धर्मशास्त्र में लिखी हुई प्रकृति माता की स्तुति श्रद्धापूर्वक करनी चाहिये। जिससे इच्छा पूर्ण हो जायेगी। जो करहि स्तुति मंगलकारी। होइब सत इच्छापूर्ण सारी ॥ फल :- प्रश्नकर्ता अगर ग्रन्थ में लिखी हुई मंगला स्तुति को नित्य करेगा तो समस्त सात्विक इच्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी। उचित नित करहिं मंगलपाठा। होवइ अनुकूल प्रकृति आठा ॥ फल :- प्रश्नकर्ता के लिए उचित होगा कि वह ग्रन्थ में लिखे गए मंगल पाठ को नित्य करे, जिससे प्रकृति अनुकूल होकर इच्छा पूर्ण कर देगी। ● ● ● मानव धर्मशास्त्र के परायण की विधि “मानव धर्म शास्त्र” का पाठ करने के लिए किसी भी प्रकार के नियमों की आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी पाठक अगर नित्य स्नान व ध्यान करके एकान्त में बैठकर पठन व मनन करे, तो शीघ्र मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जायेगी। पीपल, बरगद व आम के पेड़ के नीचे बैठकर पाठ करने से कई गुना फल की प्राप्ति होती है। इस शास्त्र को जिस भी स्थान पर बैठकर सुनाया जाता है, वह स्थान “नारायण” का स्थान हो जाता है अर्थात वहाँ पर स्वयं भगवान अवतरित हो जाते हैं। इसलिए इस शास्त्र का आचार्य “नारायण पीठ” का आचार्य कहलाता है। नारायण पीठ पर बैठने के लिए किसी भी जाति व पंथ का भेदभाव नहीं होता है। क्योंकि भगवान के लिए तो ब्राह्मण और शूद्र दोनों बराबर ही होते हैं। श्रद्धा व सच्चे विश्वास के साथ जो भी आचार्य नारायण पीठ से बोलेगा, उसकी प्रत्येक बात की भगवान स्वयं लाज रखते हैं। नारायण पीठ से बोला गया प्रत्येक शब्द “भगवत वाणी” बन जाता है। आवाहन और ध्यान की सरल विधि नीचे लिखी गई है। अथ आवाहन मंत्र :- गुरु आवाहन मंत्र :- ॐ कृपा निधानम् अज्ञान निवारणम् सृष्टि संचालकम् । मम सर्व पाप हरो गुरुदेव नमस्तुभ्यम् नमस्तुभ्यम् ॥ श्रद्धापूर्वक गुरु शक्ति का आवाहन करने के बाद आसन पर नारायणी शक्ति का आवाहन करें। ॐ नारायणाय नमः हाथ में जल लेकर ॐ नारायणाय नमः बोलें और जल को आसन व आसन के आस-पास छिड़क दें तथा दोनों हाथ जोड़कर मन ही मन नारायणी शक्ति का आवाहन करें कि हे प्रभु ! आप के नाना नाम व रूप सुने हैं । मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है । प्रभु ! आप तो हृदय स्थित नर को ही अयन (घर) बनाकर रहते हैं, इसलिए मैं तो आपका नारायण के नाम से ही आवाहन करता हूँ । हे प्रभु ! आप स्वयं आसन पर आकर बिराजें तथा मेरे हृदय में रथी बनकर मेरी वाणी के माध्यम से प्रकट होइये । हे प्रभु ! धर्मशास्त्र आपका ही स्वरूप है, इसलिए आप अपनी पूरी दिव्य शक्ति सहित इस मानव धर्मशास्त्र में आकर निवास कीजिए । हे परमपिता ! यह नारायण पीठ जगत का कल्याण करे, ऐसा आशीर्वाद दीजिए । श्रद्धापूर्वक इतना कहकर आसन पर बैठ जाएँ और मन ही मन मानव धर्म शास्त्र को प्रणाम करें । धर्म शास्त्र को प्रणाम करने के बाद प्रकृति शक्ति का आवाहन करें । ॐ प्रकृति दैव्याय नमः दोनों हाथ जोड़कर मन ही मन बोलें कि हे प्रकृति माँ ! आप परमपिता की योग माया हैं । इसलिए आप आपकी समस्त विभूतियों सहित मेरे अनुकूल रहिये तथा नारायण पीठ को अपनी दिव्य विभूतियों से सुशोभित करिए, जिससे जनकल्याण हो सके । हे माँ प्रकृति ! समस्त श्रोताओं को दिव्य ज्ञान व दिव्य दृष्टि प्रदान कीजिए । हे माँ ! आप प्रेरणा करके समस्त ग्रह नक्षत्रों को हमारे अनुकूल कर दीजिए तथा समस्त वातावरण को सौम्य व सुखी बना दीजिए। हे माँ ! हम सबके मन एक हों तथा हम जन कल्याण की भावना से परिपूरित हों । हे माँ प्रकृति ! समस्त दिशाएँ आपकी प्राण हैं, अतः समस्त दिशाओं को हमारे अनुकूल कर दीजिए । अब दोनों हाथ जोड़कर चारों दिशाओं की तरफ नजर डालें तथा मन ही मन प्रकृति शक्ति को नमस्कार करते हुए, मन ही मन में आभार व्यक्त करें । इत्यावाहनम् हृदय स्थितं नारायणं दिव्यास्तरणं शोभितम् । आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणि चित्रितम् ॥ इति षोडशोपचारैः पूजयेत् ॐ अस्य मानव धर्मशास्त्रस्य श्री देवगिरी लक्ष्मीनारायण ऋषयः श्री नारायण देवता श्री नारायण बीज भव रोग हरी भक्तिः शक्ति मन नियन्त्रिता शेष विज्ञतया श्री परमात्मा प्रीतिपूर्वकम् सकल मनोरथः सिद्ध्यर्थम् पाठेः विनियोगः । अथ आचमनम् ॐ गुरु देवाय नमः ॐ नारायणाय नमः ॐ परमात्मने नमः ॐ ईश्वराय नमः ॐ रामाय नमः ॐ शिवाय नमः अथ करन्यासः ॐ नारायणाय नमः अंगुष्ठाभ्याम् नमः, ॐ नारायणाय नमः तर्जनीभ्याम् नमः, ॐ नारायणाय नमः मध्यमाभ्याम् नमः, ॐ नारायणाय नमः अनिकाभ्याम् नमः, ॐ नारायणाय नमः कनिष्ठाकाभ्याम् नमः, ॐ नारायणाय नमः करतलकर पृष्ठाभ्याम् नमः । अथ ध्यानम ध्यान करने से पहले दोनों हाथ जोड़कर परमपिता से भाव विभोर होकर प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमपिता ! यह समस्त जगत आपका ही अंश है । हे प्रभु ! यह जगत तो आपका ही विस्तार है । हे प्रभु ! मैं आपका ही अंश हूँ परन्तु विषय वासनाओं के जाल में पड़कर, मैं आपको भूल गया हूँ । हे प्रभु ! अब आप मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे इच्छाओं से मुक्त करा कर, आपकी शरण में ले लीजिए । हे प्रभु ! आप न तो हिन्दू हैं और न ही आप मुसलमान हैं । प्रभु आप तो एकरस, अखण्ड, अजन्मा, अजय व अद्वितीय हैं । प्रभु आप की महिमा को तो आप ही जानते हैं । हे परमपिता ! आपने तो जीव को मात्र आनन्द के लिए पैदा किया है, परन्तु आपसी स्वार्थों के कारण जीव आनन्द को छोड़कर भावों के भवसागर में डूब रहे हैं । अतः हे प्रभु ! आप मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे भावों के भवसागर से बचा कर आपकी शरण में ले लीजिए । प्रभु आप तो जाति, पंथ, सम्प्रदाय व समस्त भेदभावों से परे हैं । आप तो प्रभु आनन्दस्वरूप हैं । अतः हे परमपिता ! मुझे आपकी शरण में ले लीजिए । हे प्रभु ! अब मैं धर्म शास्त्र के प्रवचन के लिए नारायण पीठ पर आसीन हो रहा हूँ। इसलिए मुझे दिव्य ज्ञान व दिव्य वाणी प्रदान कीजिए। हे प्रभु! मुझे जनकल्याण की भावना से परिपूरित कर दीजिए। ऐसी प्रार्थना करके आसन पर बैठ जाएँ और मन में आभास करें कि परमपिता दिव्य ज्ञान प्रदान कर रहे हैं, जिससे वाणी में मधुरता और ओजस्विता आ रही है। फिर दोनों हाथ जोड़कर मानव धर्म शास्त्र को प्रणाम करें और मानव धर्म शास्त्र की निम्न स्तुति का पाठ करें। ॥ स्तुति धर्मशास्त्र की ॥ सर्व देवस्य सुख सदनं सारं सकलेन ग्रन्थम् । परमपुरुषस्य वाणीम् मोक्षार्थम् सहज साधनम् ॥ कलिमल अघ नाशकम् नाश्यति सकल विपदाम् । ज्ञान वैराग्य भक्ति दायकम् ददाति शुभ संपदाम् ॥ विधि हरिहर सेवितम् वासति अत्रपरमपुरुषाम् । गुरुरूपेण साक्षात्म् नाश्यति सकलेन कल्मषाम् ॥ जयरूपयशवैभवम् दायकम् करोति सर्वकल्याणम् । ग्रहनक्षत्रादि अनुकूलम् करोति त्वम् मोक्षप्रदायकम् ॥ पंचम् वेदम् पथअखण्डम् परमपुरुषस्य सरल मार्गम् । अहम् त्वमेव शरणम् ब्रह्मरूपेण सर्वमंगल दायकम् ॥ मानव धर्म शास्त्र की उपर्युक्त स्तुति को करने के बाद दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करके पाठ की शुरुआत करें। कथा विसर्जन विधि जब पाठ पूर्ण हो जाए, तो प्रवचनकर्ता या पाठक को परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे परमपिता ! हम आज धर्मशास्त्र की कथा को विराम देते हैं । हे प्रभु ! आप समस्त श्रोताओं के हृदय में निवास कीजिए और हम सब पर कृपा कीजिए, जिससे हमें शान्ति, वैभव, यश, रूप और आपकी अनुपम भक्ति प्राप्त हो । हे प्रभु ! हमारे समस्त अवगुणों को क्षमा कर दीजिए और हमें अभय दान प्रदान कीजिए । हे प्रभु ! हम सब के परिवारों में प्रेम व सौहार्द की हवा चलती रहे और हम सब सदा आपका स्मरण करते रहें । हमारे हृदय में सदगुण पैदा होते रहें और आपका सत्संग हमें प्राप्त होता रहे । हे परमपिता ! हम सब आपकी सन्तान हैं, इसलिए आप हम पर कृपा कीजिए । हे प्रभु ! हमें आपकी शरण प्राप्त हो तथा सदैव आपका कृपा हस्त हमारे ऊपर बना रहे । हे प्रभु ! हम सबके हृदय में प्रेम, सहयोग, भ्रातत्व, दया, दान व परहित के भाव पैदा होते रहें तथा आपके चरणों में हमारे मन में श्रद्धा व विश्वास बना रहे । हम आपको कोटि-कोटि नमस्कार करते हैं । हे प्रभु ! हम आपकी शरण में हैं । हे प्रभु ! समस्त ग्रह-नक्षत्र हमारे अनुकूल हों तथा आपकी प्रकृति शक्ति हमारे अनुकूल बनी रहे तथा समस्त चराचर जगत का मंगल हो । पंचभूत मंगलमय हों व समस्त वनस्पति मंगलमय हो । हे प्रभु ! चारों तरफ मंगल ही मंगल हो । इसप्रकार प्रार्थना करके पाठक या प्रवचनकर्ता को धर्मशास्त्र की आरती करनी चाहिए और फिर कथा को विराम देना चाहिए ।
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