मानव धर्म शास्त्र (Manav Dharma Shastra) एक सनातन धर्म ग्रन्थ है, जिसकी रचना सतगुरु Awadhoot Devidas Maharaj की दिव्य कृपा से गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी (Laxminarayan Meena, IPS) ने की है। यह ग्रन्थ प्रथम बार 2013 में हिन्दी में, 2022 में अंग्रेज़ी में तथा 2023 में बांग्ला में प्रकाशित हुआ (प्रकाशक: Kirti Publication; ISBN: 978-81-965006-1-0)
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ॐ गुरुदेवाय नमः
ॐ परमात्मने नमः
द्वितीय स्कन्ध
ॐ शान्तम् सनातनम् शाश्वतम् सिद्धेश्वरम् संसारपारम् ।
हृदय देशे: वासितम् परमेश्वरम् अहम् त्वमेव शरणम् ॥ १ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप शान्त, सनातन, शाश्वत, सिद्धियों के ईश्वर, संसार से परे, हृदय देश में निवास करनेवाले हैं । हे परमपिता! मैं आपकी शरण में हूँ ।
ॐ वाणीपारम् अचिन्तयम् आनन्दघनम् एकरसम् भावाधारम् ।
निजस्वरूपमगनम् तिरोहितम् भक्तवत्सलम् जगतेश्वराय नमो नमः ॥ २॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप वाणी से परे, चिन्तन की सीमा से भी बाहर, आनन्द के घर, एकरस, समस्त भावों के आधार, स्वयं के स्वरूप में ही मगन रहनेवाले, छिपकर रहने वाले व भक्त वत्सल हैं। हे जगत के स्वामी ! आपको नमस्कार ! नमस्कार ।
दो० - तुम समान प्रभु तुम्हीं अरु न जग दूजा कोय ।
सब तजि शरण तिहारी सद्बुद्धि दीजै मोय ॥ १ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आपके समान तो आप ही हैं और संसार में आपके समान दूसरा कोई नहीं है । अब मैं सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में पड़ा हूँ । मुझे सद्बुद्धि दीजिए ।
तोर कृपा जानऊँ जुग मरमा । अब कहु बुझाय मोहि धरमा ॥
पंथ मत सुनि सुनि बहु बाता । मन मोर निसि दिन अकुलाता ॥
व्याख्या - हे प्रभु ! आपकी कृपा से मुझे चारों युगों का रहस्य समझ में आ गया है । अतः मुझे अब वास्तविक धर्म समझा कर कहिए । पंथ और मतों की बहुत-सी बातें सुन सुन कर मेरा मन रात-दिन व्याकुल हो रहा है ।
काह आचरण धरम आधारा । केहि विधि होवइ तोर दीदारा ॥
सकल सुलभ सब सुखदाई । सोई विधि मोहि देहउ बताई ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! कौन सा आचरण धर्म का आधार होता है तथा कौन-सी विधि से आपके दर्शन होते हैं ? हे प्रभु ! मुझे ऐसी विधि बताइये जिसका सब लोग पालन कर सकें तथा सबको सुख देने वाली हो ।
सुन सुत कहऊँ बारम्बारा । देखहउ निज हृदय बिचारा ॥
मन अनुरूप धरम सुहाई । मन बाहिर जगत किछु नाई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! मैं तुमको बार-बार समझा कर कह रहा हूँ । तुम स्वयं के हृदय में विचार करके देखो । मन के अनुरूप ही धर्म का स्वरूप बनता है । मन के बाहर संसार में कुछ भी नहीं है ।
मन आधार सकल मत पंथा । मन ही हेतु जगत सब टंटा ॥
सो बुझहउ मन ध्यान लगाई । हियँ माझ सब देउ समुझाई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! मन ही समस्त पंथ व मतों का आधार होता है तथा मन के ही कारण संसार में समस्त फसाद होते हैं । इसलिए ध्यान लगा कर मन को समझो । मैं तुम्हारे हृदय में ही सब कुछ समझा दूंगा ।
दो०- धन्य धन्य प्रभु धन्य धन्य जगत गुसाईं ।
शरण आऊँ तोरी हृदय देश ध्यान लगाई ॥ २ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप धन्य हैं, हे जगत के स्वामी आप धन्य हैं । हे प्रभु! मैं हृदय देश में ध्यान लगा कर आप की शरण में आ रहा हूँ ।
छ० - जय जग पालक जन सुखदायक सर्वव्यापक भगवंता ।
गुण गोतीता सहज प्रीता निरंजन अलख बिलख अनन्ता ॥
पालन देह धरनी जाई न बरनी मरम न जानई कोउ ।
दीन दयाला सहज कृपाला प्रसन्न अब मोहि पर होउ ॥
व्याख्या - हे जगत के पालन करनेवाले, सभी जीवों को सुख देनेवाले, सर्वत्र व्यापक भगवान आपकी जय हो ! हे प्रभु ! आप तो गुण और इन्द्रियों से परे हैं तथा जीवों से विशेष प्रीत रखनेवाले हैं, आप जानने में नहीं आने पर निरंजन हैं तथा जानने में आ जाने पर अनन्त हैं । आप ही जीवों के शरीरों का पालन करते हैं, जिसके रहस्य को कोई नहीं जानते हैं । इसलिए हे दीन दयाल, सहज कृपालु ! आप प्रसन्न होइए ।
छ० - अनुग्रह करउ मारग दिखाउ तुम बिनु अरु न दूजा कोई ।
भाव अनुसारा रूप तुम धारा सुन सब जग भ्रमित होई ॥
जानऊँ मरमा पालऊँ धरमा मन चाहूँ होई मुकुन्दा ।
अह निसि ध्यावऊँ शरण आवऊँ कृपा करहु सच्चिदानन्दा ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! कृपा करके मुझे रास्ता दिखा दीजिए । क्योंकि आपके बिना मेरा दूसरा कोई नहीं है । आप तो भाव के अनुरूप रूप धारण कर लेते हो । इसलिए विभिन्न रूपों की बाते सुन सुन कर समस्त संसार भ्रमित हो रहा है । मैं आपकी शरण में आया हूँ । अतः मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मैं आपके मर्म को जान सकूँ तथा वास्तविक धर्म का पालन कर सकूँ और रात-दिन आपको भज सकूँ ।
छ० - भव अति त्राता मन दुःख पाता तबहु तहँ जाइ रमहिं ।
बुद्धि अनुरूपा पथ सरूपा सब जगत रहा उरझहिं ॥
अब काह उपार्इ तू ही सहाई करउ कृपा गुरुदेव की नाई ।
मन कर्म वाणी छाड़ि नादानी आवहउँ अब शरणाई ॥
व्याख्या - संसार के भावों का ताप मन को दुःख देनेवाला होता है । परन्तु मन फिर भी संसार में रमण करता है । बुद्धि के अनुरूप नाना पंथों का उद्भव हो गया है, जिसमें सारा संसार उलझ रहा है । अतः हे परमपिता ! अब आप ही गुरुदेव की तरह कृपा करके उपाय बताइये तथा आप ही सहायता कीजिए । मैं मन-वचन-कर्म से आपकी शरण में हूँ ।
ध्यान मगन जब होवन लागा । हृदय माझ उमगइ अनुरागा ॥
नाना भाँति मैं अनुभव कीन्हा । निज हियँ प्रभु परहिं चीन्हा ॥
व्याख्या - जब परमपिता की शरण में जाकर, मैं ध्यान मगन होने लगा, तो मेरे हृदय में विशेष अनुराग पैदा हो गया तथा मैंने बहुत प्रकार की अनुभूति की तथा परमपिता का स्वरूप मेरे हृदय में ही पहचान में आने लगा ।
प्राण डोर बंधहउँ प्रभु संगा । मन प्रसन्न हियँ बहु उमंगा ॥
मन ही मन उठइ प्रश्न नाना । पायउँ सकल सहज निधाना ॥
व्याख्या - जब मैं ध्यान में प्राण के माध्यम से परमात्मा से जुड़ गया, तब मन प्रसन्न हो उठा तथा हृदय में उमंग उठने लग गयी तथा मन ही मन में नाना प्रकार के प्रश्न उठने लगे तथा उनका मन में ही सहज समाधान मिलने लग गया ।
हियँ माझ बुझहूँ अब धरमा । सहज छाड़ि नहिं कछु मरमा ॥
विगत वासना नहिं कुटिलाई । सहज सरल धरम सुहाई ॥
व्याख्या - अब मैंने मेरे हृदय में ही धर्म के रहस्य को समझ लिया कि सहजता के अलावा धर्म का कोई दूसरा रहस्य नहीं है । जब जीव के मन में विषय-वासना तथा कुटिलता नहीं होती है, तब वह अवस्था ही सहज व सरल होती है तथा वही धर्म होता है ।
धरम आचरण कहूँ बखानी । मम हियँ माहि जो परा समानी ॥
नहिं कोउ दूसरा धरम समाना । निगम पुराण नाना भांति बखाना ॥
व्याख्या - अब मैं यहाँ धर्म के आचरण को बताता हूँ, जो मुझे मेरे हृदय के अन्दर समझ में आया है । धर्म के समान संसार में दूसरा कोई नहीं है । इसी को वेद-पुराणों में नाना प्रकार से बताया गया है।
दो० - बुद्धि मत नाना पंथ बनहि मनुज तहँ रहई उरझाय।
हिन्दू मुस्लिम धारणा भयी धरम न कोउ समझाय ॥ ३ ॥
व्याख्या - बुद्धि की मत भिन्नता से नाना पंथों का उद्भव हो जाता है। जिससे मनुष्य पंथवादिता में फँस जाता है। पंथवादिता से ही हिन्दू-मुस्लिम की धारणा दृढ़ हो गयी है और यथार्थ धर्म को कोई नहीं समझता है।
धरम एकहि बरनन नाना। मति भिन्नता सो हेतु सुजाना ॥
विगत वासना नहिं राग द्वेषा। अद्वेष तब काह जीव क्लेसा ॥
व्याख्या - वास्तव में तो धर्म एक ही होता है। परन्तु मति की भिन्नता के कारण एक ही अवस्था का नाना प्रकार से वर्णन किया जाता है। जब जीव विषय वासनाओं से मुक्त हो जाता है, तब उसके हृदय में राग-द्वेष नहीं टिक पाते हैं तथा बिना राग-द्वेष के जीव को क्लेश नहीं हो पाता है।
सरल सहज अरु मन संतोषा। धरम पुरुष लच्छन विशेषा ॥
परनिंदा नहिं आवहहिं भावा। श्रेष्ठ बनिन नहिं मन चावा ॥
व्याख्या - सच्चे धार्मिक पुरुष की विशेषता यह होती है कि वह सहज, सरल और संतोषी होता है तथा दूसरे की निंदा करने का भाव उसके मन में ही नहीं आता है। क्योंकि उसके मन में श्रेष्ठ बनने की इच्छा ही नहीं होती है।
श्रेष्ठ दम्भ हेतु परनिंदा। नहिं समझै सो जीव महा अंधा ॥
भूत भविष्य करै नहिं चिंता। पुरुष सोइ धार्मिक अरु सन्ता ॥
व्याख्या - परनिंदा का कारण तो श्रेष्ठ बनने की चाह ही होती है। इसको जो जीव नहीं समझता है, वह मूर्ख होता है। जो जीव भूत काल और भविष्य काल की चिन्ता नहीं करता है, वही वास्तविक रूप में धार्मिक होता है तथा वही सन्त होता है।
धरम रत मानहि नहिं भेदा। सम लगहि कुरान पुरान वेदा ॥
धीर वीर वर्तमान रमन्ता। प्रभु शरण सो जानि अनन्ता ॥
व्याख्या - वास्तविक धार्मिक पुरुष तो भेद करता ही नहीं है। उसके लिए कुरान, पुराण व वेद एक समान होते हैं। वह धीरजवान, वीर और वर्तमान में रमण करनेवाला होता है तथा परमात्मा को अनन्त जान कर, पूरी तरह उसकी शरण में होता है।
दो० - धरम रत ब्रह्मवत सदा हियँ नहिं मान गुमान।
सम लगहि प्राणी सब तब काह हिन्दू मुसल्मान ॥ ४ ॥
व्याख्या - धार्मिक वृत्तिवाला जीव ब्रह्मस्वरूप ही होता है तथा उसके हृदय में कोई मान-गुमान का भाव भी नहीं होता है । धर्मरत जीव को तो समस्त प्राणी ही समान लगते हैं । तब वह हिन्दू-मुसलमान का कैसे भेद कर सकता है ?
बिनयशील गुण आत्म ग्यानी । ब्रह्मरत सुरता ईश समानी ॥
सहज रखहिं हिय क्षमा भावा । निज अपकर करहिं न दुरावा ॥
व्याख्या - धार्मिक जीव का विनय-भाव गुण होता है तथा वह आत्मज्ञानी होता है तथा सदा ब्रह्म भाव में सुरता लगा कर ईश्वरीय अनुभूति करता रहता है । उसके हृदय में सहज में ही क्षमा-भाव होता है तथा स्वयं का अपहित करनेवाले के प्रति भी वह दुराव नहीं रखता है ।
सहज ईश शरणागति भावा । विगत वासना स्वाधीन सुहावा ॥
देह गेह सब गुमान भुलाई । परहित रत सहज सदाई ॥
व्याख्या - धर्मरत जीव सहज होता है तथा सदा परमपिता के प्रति शरणागत रहता है और समस्त वासनाओं से मुक्त तथा स्वाधीन होता है । वह शरीर और घर के अभिमान को भुला कर परहित (आत्मा का हित) में सहजता से लगा रहता है ।
करहिं उपदेश समयानुसारी । दिखावहिं मारग मंगलकारी ॥
बुझावहि मरम बहु प्रकारा । जानत मिटहिं सकल विकारा ॥
व्याख्या - धर्मरत जीव समय के अनुकूल उपदेश करते हैं तथा जीवों को मंगलकारी राह दिखाते हैं । वे बहुत प्रकार से परमपिता के रहस्य को समझाते हैं । जिसको समझने से ही समस्त विकारों का नाश हो जाता है ।
पाखण्ड रहित नहिं अभिलाषा । निमिष न छाड़हिं ईश सुपासा ॥
सोहम् वृत्ति रखहिं अखण्डा । हियँ माझ बूझहिं सब ब्रह्मण्डा ॥
व्याख्या - धार्मिक जीव पाखण्डरहित तथा अभिलाषाओं से मुक्त होता है तथा क्षण भर के लिए भी परमात्मा से दूर नहीं होता है । उसके हृदय में सोहम् वृत्ति अखण्ड रूप से रहती है तथा वह अपने हृदय में ही समस्त सृष्टि को समझ लेता है ।
दो० - धरम करम पाखण्ड नहिं हिय नहिं लव लेस अज्ञान ।
तिन्ह पालन प्रभु करै सोहि जीव ब्रह्म समान ॥ ५ ॥
व्याख्या - धार्मिक जीव धर्म-कर्म का पाखण्ड नहीं करता है तथा उसके हृदय में तनिक भी अज्ञान नहीं होता है । उस जीव का पालन स्वयं परमात्मा करते हैं तथा वही जीव ब्रह्म के समान होता है ।
धरम रत लच्छन मैं बखानी । अब कहूँ धरम मूल कहानी ॥
धरम न दूसरा सत्य समाना । अहिंसा भयउ ता ध्वजा निसाना ॥
व्याख्या - मैंने धर्मरत जीव के लक्षण बता दिये हैं । अब यहाँ मैं धर्म को बता रहा हूँ । सत्य के समान और कोई दूसरा धर्म नहीं होता है तथा अहिंसा ही सत्य धर्म की ध्वजा-पताका होती है ।
सत्य ही धरम नहीं दूजा कोई । प्रकृति ऋतु सत्य हय सोई ॥
नाना भांति सो ऋतु वेद बखानी । ऋषि मुनि निज अनुभव जानी ॥
व्याख्या - सत्य ही वास्तविक धर्म होता है और दूसरा कोई धर्म नहीं होता है तथा प्रकृति की ऋतु ही सत्य होती है । वेदों ने भी ऋतु का नाना प्रकार से वर्णन किया है तथा ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव से उसी ऋतु को पहचाना है ।
सहज सोई ऋतु समझउ भाई । रहस्य परम सत्य बताई ॥
प्रकृति ऋतु महतत्व विशेषा । मोहादि विकार नहिं लव लेशा ॥
व्याख्या - प्रकृति की सहजता ही ऋतु होती है । यह परम गुप्त रहस्य है, मैं सत्य बता रहा हूँ । प्रकृति की ऋतु ही सृष्टि का महतत्व होती है । जहाँ पर मोह-विकार लेशमात्र भी नहीं होते हैं ।
महतत्व सोई प्रकृति नारी । ममतादि बसहि तहँ अपारी ॥
चेतनता सोहि नर कहावई । नर-नारी प्रभु चित्त सुहावई ॥
व्याख्या - जो सृष्टि का महतत्व होता है, वही परमपुरुष की प्रकृति नारी (नाड़ी) होती है । जहाँ ममता आदि मातृत्व के अपार गुण होते हैं । ब्रह्माण्ड में व्याप्त चेतना ही परमपुरुष का नर कहलाता है तथा नर-नारी (नाड़ी) दोनों मिल कर ही परमपिता के चित्त कहलाते हैं ।
दो०- नर-नारी प्रभु चित्त भया नर नारी ते सकल जहान ।
परम पिता के हम सब हिन्दू मुस्लिम एक समान ॥ ६ ॥
व्याख्या - नर (चेतन) नारी (प्रकृति) ही परमपिता के चित्त होते हैं तथा नर-नाड़ी से ही समस्त जगत की उत्पत्ति हुई है । इसलिए हम सब एक ही परमपिता की सन्तान हैं । अतः हिन्दू-मुसलमान का कोई भेद नहीं है ।
सकल ब्रह्माण्ड प्रभु शरीरा । करहिं न संशय मतिधीरा ॥
ऋतु सोई प्रभु चेतना सुहाई । चेतन ते चलई सृष्टि सबाई ॥
व्याख्या - समस्त ब्रह्माण्ड ही परमपिता का शरीर होता है । इसमें बुद्धिमान लोग संशय नहीं करते हैं । प्रकृति की ऋतु ही परमपिता की चेतना है, जिससे समस्त सृष्टि का संचालन हो रहा है ।
रोम राज सोई वनस्पति सारा । सूरज चन्द नयन विस्तारा ॥
प्रभु श्वास सोई दस प्रकारा । दस दिशा जाहि निगम पुकारा ॥
व्याख्या - परमपिता के शरीर के जो रोम हैं, वह चराचर वनस्पति ही है । सूरज व चन्द्र ही परमपिता के नयन हैं । परमपिता की प्राण वायु दस प्रकार की होती है । उसी को वेदों में दस दिशाओं के रूप में बताया गया है ।
अस्थि शैल सरिता नसजारा । प्रभु उदर भयउ जलधि सारा ॥
नासिका रन्ध्र अश्विनि कुमारा । निगम जाहि सुर वैद्य पुकारा ॥
व्याख्या - पर्वत ही परमपिता की हड्डियाँ हैं तथा समस्त नदियाँ ही नसों का जाल है तथा समुद्र ही परमपिता के उदर का विस्तार है । नाक ही अश्विनीकुमार हैं । जिनको वेदों ने देववैद्य पुकारा है ।
घर घरनी जानि एक समाना । संशय करहिं न मन सुजाना ॥
पिण्ड भीतर सोई ब्रह्माण्डा । जानई जेहि सो ग्यानी प्रचण्डा ॥
व्याख्या - जीव का शरीर और पृथ्वी दोनों एक समान होते हैं । इसमें विद्वान संदेह नहीं करते हैं । जो जीव के शरीर में होता है, वही ब्रह्माण्ड में होता है । अतः जो इस रहस्य को जान लेता है, वही सच्चा ज्ञानी होता है ।
दो०- जो जानहिं मरम पिण्ड का सोई धर्म समझ पाय ।
घरम जो समझ सकै वोहि जीव मुक्त कहाय ॥ ७ ॥
व्याख्या - जो जीव देह के रहस्य को समझ लेता है, वो ही धर्म के रहस्य को समझ पाता है और जो धर्म को समझ सकता है, वो ही जीव मोक्ष प्राप्त करने वाला कहलाता है ।
केहि विधि सुन्दर देह बनाई । नश्वर तद्यपि मोह नहिं जाई ॥
बीज इक तबहुँ भिन्न सरूपा । कोउ छोट बड़ कोउ रूप कुरूपा ॥
व्याख्या - हे परम पिता ! इस सुन्दर शरीर का निर्माण कैसे होता है क्योंकि शरीर नश्वर होते हुए भी इससे मोह नहीं छूटता है । एक ही ब्रह्म बीज से पैदा होते हुए भी कोई शरीर छोटा होता है, तो कोई बड़ा शरीर होता है, कोई रूपवान होता है और कोई कुरूप होता है ।
कवन हेतु कोह घरहिं शरीरा । सब समझाई कहउ रघुबीरा ॥
धारण हरण नित्य सुहाई । कारण कवन इहँ देह बनाई ॥
व्याख्या - हे प्रभु ! इस शरीर को कौन धारण करता है और किसलिए धारण करता है ? ये सब मुझे समझा कर कहिये । इस शरीर का नित्य जन्म और मरण होता है, फिर किसलिए इस शरीर को बनाया गया है ?
सुत जीव गेह सो देह सुहाई । पंच भूत मिलइ इहँ बनाई ॥
गगन अनल जल अरु समीरा । धरणी घरहिं अद्भुत शरीरा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! जीव का घर ही शरीर के रूप में जाना जाता है, जो पाँच महाभूतों के मिलने से बनता है । आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से ही इस अद्भुत शरीर की रचना होती है ।
गगन शून्य अनल तेज सुहाई । जल रस समीर प्राण समाई ॥
धरणी धारण करहिं सबाई । एहि भाँति जीव गेह उपजाई ॥
व्याख्या - आकाश शून्य रूप होता है तथा अग्नि का मतलब तेज है और जल रस होता है तथा प्राण के रूप में वायु तत्व होता है । पृथ्वी तत्व ही इन सबको धारण करता है । इस प्रकार जीव का घर पैदा हो जाता है ।
दो०- गृह ते गृही लगाव बहु कबहूँन चाई बिलगाय ।
बन्धन परहिं मोह का सोई हेतु जीव उरुझाय ॥ ८ ॥
व्याख्या - शरीर रूपी घर से जीव रूपी स्वामी का बहुत लगाव हो जाता है, इसलिए जीव रूपी स्वामी कभी भी शरीर से अलग नहीं होना चाहता है । घर और स्वामी के आपसी लगाव से ही मोह का बन्धन पड़ जाता है, जिसमें जीव उलझता ही चला जाता है ।
दस इन्द्रि दस रथ सुहाए । निश्चित अवधि अवध कहाए ॥
सहज सुभाव सोई सुख मूला । त्रिगुण ब्यारि चलहिं अनुकूला ॥
व्याख्या - इस शरीर की दस इन्द्रियाँ ही दशरथ होती हैं तथा शरीर की निश्चित अवधि होने के कारण ही इसे अवध के नाम से जाना जाता है । सत, रज, तम गुण जब अनुकूल होते हैं, तभी सहज स्वभाव बना रहता है, जो सुख का मूल होता है ।
रिद्धि सिद्धि बसहिं देह माहीं । काह कहहूँ बरनिन जाहीं ॥
त्रिवेणी संगम निर्मल नीरा । सोई आज्ञा चक्र सुनु मतिधीरा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! इस अवधि रूपी शरीर में समस्त ऋद्धि-सिद्धियाँ निवास करती हैं । क्या कहूँ ? उनका वर्णन करना बहुत कठिन है । भृकुटि स्थित आज्ञा चक्र ही इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना (गंगा, यमुना व सरस्वती) का संगम है, जहाँ पर निर्मल गुण रूपी जल रहता है ।
दृढ़ परकोट नव दरवाजा । मंत्री अहंकार मन तहँ राजा ॥
भाव दास दासी अरु बुद्धि रानी । मन युवराज देह रजधानी ॥
व्याख्या - इस शरीर रूपी नगर में परकोटा बना हुआ है तथा नौ शरीर रूपी नगर के दरवाजे हैं, जहाँ पर मन राजा होता है और अहंकार राजा का मन्त्री होता है। भाव ही राजा के सेवक होते हैं तथा बुद्धि ही जीव रूपी राजा की रानी होती है तथा मन ही जीव रूपी राजा का युवराज होता है तथा शरीर ही जीव की राजधानी होता है ।
चौदह भुवन प्राण पति होई । देह मरम नहिं जानई कोई ॥
स्वर्ग नरक नहिं देह पारा । उभय मिलहिं भाव अनुसारा ॥
व्याख्या - इस शरीर के रहस्य को कोई नहीं जानता है कि इसी में चौदह भुवन हैं, जिनका प्राण ही स्वामी होता है । स्वर्ग-नरक भी इस शरीर से बाहर नहीं होते हैं तथा दोनों का निर्धारण भाव के अनुसार ही होता है ।
दो० - सकल भूमण्डल देह बसै जानइ सोहि ग्यानी कहाय ।
बिनु जाने राह न मिलै मूरख जन जग भरमाय ॥ ९ ॥
व्याख्या - समस्त भूमण्डल ही इस शरीर में सूक्ष्म रूप से बसा हुआ है, अतः जो इस रहस्य को जान लेता है, वही ज्ञानी होता है । बिना जाने रास्ता नहीं मिल पाता है, इसलिए मूर्ख लोग संसार में भटकते रहते हैं ।
सुनहुँ देह भुवन विस्तारा । बिनु जानइ नहिं शंका निस्तारा ॥
ब्रह्मरन्ध्र सोई कहहिं ब्रह्म लोका । जानहिं तबहिं गत सब शोका ॥
व्याख्या - हे वत्स ! शरीर में स्थित भुवनों को विस्तार पूर्वक बताता हूँ, क्योंकि बिना जाने शंका का समाधान नहीं होता है । ब्रह्मरन्ध्र ही ब्रह्मलोक होता है, जिसको जान लेने पर समस्त दुःखों का नाश हो जाता है ।
अमरावती नगरी चित्त प्रदेशा । चित्त इन्द्र करहिं राज हमेशा ॥
इन्द्रिय सकल परी कहावहिं । भाव भोग सोई देव सुवावहिं ॥
व्याख्या - चित्त ही अमरावती नगरी है तथा जिस नगरी का राजा चित्त रूपी इन्द्र ही होता है तथा समस्त इन्द्रियाँ ही इन्द्र की परी होती हैं और भोग भोगने के भाव ही देवता होते हैं ।
भाव अमर मरहिं नहिं मारे । देह हीन देव सकल पुकारे ॥
प्रति इन्द्रिय कोटि तीन भावा । दस मिलहिं कोटि तैंतीस गिनावा ॥
व्याख्या - भावों का कभी नाश नहीं होता है, इसलिए सभी देवों को अमर कहा जाता है । भावों के स्थूल शरीर का भी साधारण बुद्धि से आभास नहीं होता है, इसलिए समस्त देवता शरीर हीन ही माने जाते हैं । प्रत्येक इन्द्रि के भोगों के भावों की संख्या तीन करोड़ होती है, इसलिए दस इन्द्रियों के समस्त भाव मिलकर तैंतीस करोड़ कहलाते हैं ।
नासिका द्वार भाव गमनागमन । प्राण संग करहिं देह रमन ॥
अनुकूल भोग सुरपुर बासा । खल्ल भोग सोई असुर त्रासा ॥
व्याख्या - नासिका के द्वारा भावों का शरीर में आना जाना होता है तथा प्राण के साथ समस्त भाव शरीर में रमन करते हैं । जब तक जीव को मन-अनुकूल भोग मिलते रहते हैं, तब तक उसका देवलोक में ही निवास करना माना जाता है और जब अनुकूल भोग नहीं मिल पाते हैं, तो उसी को देवलोक पर असुरों का आक्रमण माना जाता है ।
चित्त ही इन्द्र चित्त ही दशरथ । ताते उपजइ सकल मनोरथ ॥
मनोरथ हेतु घटहिं सब काजा । सुरपुर पति चित्त देव राजा ॥
व्याख्या - चित्त ही इन्द्र और चित्त ही दशरथ कहलाता है और चित्त से समस्त मनोकामनाएँ पैदा होती हैं तथा मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए ही कर्म की प्रक्रिया होती है । इस प्रकार चित्त ही देवलोक का राजा इन्द्र होता है ।
दो० - हृदयँ गूहा चित्त जीव का तहँ सकल जगत समाय ।
भाव उपजत चित्त प्राण ते ताते पुनि मनोरथ उपजाय ॥ १० ॥
व्याख्या - हृदय रूपी गूफा ही जीव का चित्त होता है, जिसमें सूक्ष्म रूप से समस्त संसार समाहित रहता है । चित्त में प्राण से भाव पैदा होते हैं और भावों से इच्छाएँ पैदा होती हैं ।
भाव आधार सदा प्राण सुहाहिं । ताते पुनि होत कर्म सबाहिं ॥
कर्म अनुसार सुख दुःख पाई । उभय घटित इहँ देह सदाई ॥
व्याख्या - प्राण से भावों की उत्पत्ति होती है और भावों के द्वारा कर्म की क्रिया घटित होती है तथा कर्म के अनुसार जीव को सुख-दुःख मिलता है तथा सुख-दुःख की घटना इस शरीर में घटित होती रहती है ।
सुख सर्ग राह करम पुनिता । दुःख नरक हेतु सदा अनीता ॥
करहिं करम पाव फल सोई । क्रिया तें विधि विधि ते क्रिया होई ॥
व्याख्या - सुख मिलना ही स्वर्ग की अवस्था होती है, जिसका रास्ता पुण्य कर्म ही होते हैं तथा दुःखों का नाम ही नरक होता है, जिसका कारण अनीति होती है । जो जैसा कर्म करता है, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप वैसा ही फल मिल जाता है, क्योंकि क्रिया से ही कर्म की विधि बनती है और विधि से ही क्रिया बनती है ।
कार्य करण कर्म विधि विधाना । भाव हेतु करण भाव ही निधाना ॥
करम गहन भाव अनुरूपा । सोई मम विधि विधान अनूपा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! प्रकृति का कार्य-कारण सिद्धान्त ही विधि का नियम होता है । भाव से ही कारण पैदा होता है तथा भाव (विचार) से ही कारण का समाधान होता है । इसलिए भाव के अनुसार कर्म की गति अति गंभीर होती है । भाव के अनुसार कारण पैदा होना और कारण के अनुरूप कर्म होना, यही मेरा विधि (क्रिया) का अनुपम नियम होता है ।
काह भल मन्द जानिन कोई । बिनु जानइ सुत मुक्ति न होई ॥
स्वार्थ हेतु कर्म भल मंदा । निज दोष न देखइ जग अंधा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! संसार में कौन सा कर्म अच्छा है और कौन सा बुरा है, कोई नहीं जानते हैं और बिना कर्म की गति को जाने संसार में मुक्ति नहीं हो पाती है । स्वयं के स्वार्थ के आधार पर ही लोग कर्म को अच्छा-बुरा मानते हैं, इसलिए यह संसार अन्धा है, क्योंकि स्वयं के दोषों को कोई जानने का प्रयास ही नहीं करता है।
दो० - भाव रजु सब जग बंधा वासना क्षुधा रहइ सताय ।
निज बंधन हेतु निज बना बिरथा मोहि दोष लगाय ॥ ११ ॥
व्याख्या - भाव (विचार) रूपी रस्सी में सारा संसार बंधा हुआ है और वासना की भूख संसार को सता रही है । स्वयं के बन्धन का कारण जीव स्वयं ही होता है, परन्तु मुझ परमेश्वर को व्यर्थ में ही दोष लगाया जाता है ।
मम भजन शुधु एक उपाई । नाहित भव बंध कटै न कटाई ॥
कटहिं बंधन सुख पाई जीवा । तबहिं सत् चित्त आनन्द सीवा ॥
व्याख्या - मेरा भजन ही भाव रूपी बन्धन को काटने का एक मात्र उपाय है, वरना किसी भी प्रकार से भावों का बन्धन काटने में नहीं आता है । जब भावों का बंधन कट जाता है, उस समय ही जीव को सच्चा सुख मिलने लगता है तथा तब ही जीव की अवस्था परम शान्त, सत् चित्त आनन्द स्वरूप की होती है ।
देह जानहुँ भव गृह समाना । तहँ मन बुद्धि चित्त अहम् स्थाना ॥
भाव ते मन अरु मन ते भावा । भाव तेहि जीव सुख दुःख पावा ॥
व्याख्या - शरीर को भावों का घर समझना चाहिये, जहाँ पर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार अपना स्थान बनाकर रहते हैं । भावों से मन पैदा होता है और मन से भाव पैदा होते हैं तथा भावों से ही जीव को सुख-दुःख का आभास होता है ।
कृत कृत्य भयउँ मैं कृपा निधाना । तुम्हार कृपा जानहुँ विधाना ॥
अबहुँ जिज्ञासा मम मन माहिं । भाव बस काह उत्तम उपाहिं ॥
व्याख्या - हे परमेश्वर ! आपकी कृपा से अब मैं कृत कृत्य हो गया हूँ अर्थात कर्म बन्धन से मुक्त हो गया हूँ, परन्तु अभी भी मेरे मन में प्रबल जिज्ञासा हो रही है कि भावों को वश में करने का उत्तम उपाय क्या है ?
सुनु सुत कहूँ मरम गंभीरा । सकल भाव करहिं चित्त बसीरा ॥
मन अरु बुद्धि भाव उपजार्इ । उभय मिलि भव सिन्धु बनार्इ ॥
व्याख्या - हे वत्स ! मैं तुमको बहुत ही गम्भीर रहस्य बताता हूँ, सुनो :- समस्त भाव चित्त में ही निवास करते हैं और मन व बुद्धि भी भाव से ही पैदा होते हैं तथा मन व बुद्धि मिलकर ही भाव रूपी भव सागर बनाते हैं ।
घरकन चित्त निकसहिं ऊर्जा । सोई प्राण चलहिं देह पुरजा ॥
प्राण तेहि उपजइ भाव जीवाणु । सूक्ष्म अति देह जिमि परमाणु ॥
व्याख्या - चित्त की धड़कन से ऊर्जा निकलती है तथा उसी ऊर्जा को प्राण के नाम से जाना जाता है, जिससे शरीर के समस्त अंग चलायमान होते हैं । प्राण से भावों के जीवाणु पैदा होते हैं तथा भाव के जीवाणुओं का शरीर परमाणु की तरह सूक्ष्म होता है ।
दो० - भाव जीवाणु सूक्ष्म सदा तद्यपि प्रजनन शक्ति अगाध ।
एकहिं ते सहस उपजहिं ताते पल में खुशी पल में विषाद ॥ १२ ॥
व्याख्या - भाव के जीवाणु हमेशा सूक्ष्म ही होते हैं, परन्तु उनकी प्रजनन क्षमता बहुत विशाल होती है, इसलिए एक ही भाव के जीवाणु से पल भर में हजारों भाव के जीवाणु पैदा हो जाते हैं, जो क्षण भर में खुश कर सकते हैं और क्षण में दु:खी कर सकते हैं ।
दो० - भाव गति गहन अति अरु भाव ही मन कहाय ।
ताते मन समझत कठिन समझहिं सो भव तर जाय ॥ १३ ॥
व्याख्या - भाव ही मन होता है और भाव की गति बहुत गहन होती है, इसलिए मन को समझना बहुत कठिन होता है, परन्तु जो मन को समझ लेता है, वह भाव रूपी भवसागर को पार कर जाता है ।
मन ही मनु प्रथम सृष्टि भूपा । सत वृति सोई रानि शतरूपा ॥
शत वृत्ति भाव सौभाग्य कहाई । निज स्वभाव जीव बरताई ॥
व्याख्या - मन ही को सृष्टि का प्रथम रचयिता महाराज मनु के नाम से जाना जाता है तथा मन की सौ वृत्तियाँ ही रानी शतरूपा के नाम से जानी जाती हैं । भावों की सौ वृत्तियाँ ही सौ भाव (स्वभाव) कहलाती हैं और जीव हमेशा इन सौ वृत्तियों में ही बरतता रहता है ।
मन अनुरूप दिखहिं जग सारा । सकल जगत मन विस्तारा ॥
पल पल मन जाई बदलार्इ । सो ब्रह्म सत्य जग मिथ्या कहार्इ ॥
व्याख्या - मन के अनुसार ही समस्त संसार दिखाई देता है, इसलिए सारा संसार मन का विस्तार मात्र होता है तथा मन के भाव क्षण-क्षण में बदलते रहते हैं, इसलिए ब्रह्म सत्य और जगत को मिथ्या कहा जाता है ।
जग पावन जो मन पावन । मीत अमीत सब मन भावन ।
मन जितहहिं बस जग सारा । ऋषि मुनि जन सब संत पुकारा ॥
व्याख्या - अगर मन पवित्र होता है, तो सारा संसार ही पवित्र दिखाई देता है तथा मित्र व शत्रु आदि तो मन की भावना के ही परिणाम होते हैं। ऋषि, मुनियों व सभी सन्तों ने यही कहा है कि मन को जीत लेना ही जगत को जीत लेना है।
तन दसरथ ध्वज अहंकारा। मन अश्व बुद्धि भइ असवारा ॥
श्वास रजु दृष्टि हर्यक पंथा। वासना मंजिल नहिं कहीं अंता ॥
व्याख्या - हे वत्स ! यह शरीर ही दस इन्द्रियों रूपी दस रथ हैं तथा अहंकार ही इस रथ की पताका है और मन रूपी घोड़ा रथ में लगा हुआ है, जिसको बुद्धि रूपी सवार चलाता है। मन रूपी घोड़ा श्वास रूपी लगाम से बंधा हुआ है और दृष्टि ही मन रूपी घोड़े की मार्ग होती है तथा मन रूपी घोड़े की भोग वासना रूपी मंजिल होती है, जिसका कभी अन्त नहीं होता है।
दो० - शब्द चाबुक मन अश्व का व्याधि सकल जगत व्यवहार ।
दल दल मोह फँसहि तब होवहिं मन वाजि लाचार ॥ १४ ॥
व्याख्या - मन रूपी घोड़े का वाणी ही चाबुक होती है तथा समस्त सांसारिक व्यवहार ही मन रूपी घोड़े का रोग होता है तथा मन रूपी घोड़े का रथ जब मोह के दल दल में फँस जाता है, तब मन रूपी घोड़ा लाचार हो जाता है।
तन रथ फँसहि बढ़ै न बाढ़े। बुद्धि विकल अश्व मन ठाढ़े ॥
मन संताप दुखित तन सारा। मन विवश केहि विधि जाउँ पारा ॥
व्याख्या - शरीर रूपी रथ मोह रूपी दल-दल में फंसने से आगे नहीं बढ़ पाता है, जिससे बुद्धि रूपी सवार व्याकुल हो जाता है और मन रूपी घोड़े खड़े रह जाते हैं। जिससे मन में संताप हो जाता है और मन के संताप से सारे शरीर को कष्ट होने लगता है तथा उसी से मन विवश हो जाता है कि इस मोह के दल-दल से कैसे पार होऊँ।
विवशवत् मन मोहि पुकारे। तब मम कृपा रथ आन उबारे ॥
जीव हियँ तबहि में प्रकटाउँ। मन तन सब संताप मिटाउँ ॥
व्याख्या - मन जब पूरी तरह विवश हो जाता है, तभी जाकर जीव मुझ परमात्मा को पुकारता है और तब मेरी कृपा ही मोह रूपी दल-दल से देह रूपी रथ को बाहर निकालती है। उसी समय मैं जीव के हृदय में प्रकट होकर मन और तन के सब कष्टों का निवारण करता हूँ।
प्रेरहउँ जीव तब विधि नाना। नासहि मूढ़ मति होहिं सुजाना ॥
शरणागत प्रिय प्राण समाना। सत्य शपथ वचन प्रमाना ॥
व्याख्या - हे वत्स ! तब मैं जीव के हृदय में नाना प्रकार से प्रेरणा करने लगता हूँ, जिससे जीव की मूढ़ मति का नाश हो जाता है और वह सुजान बन जाता है। है । हे वत्स ! शरण में आया हुआ जीव मुझे प्राणों के समान प्रिय होता है । मेरे वचन ही इसका प्रमाण हैं, यह सत्य शपथ है ।
जे मोर भरोस मन नहिं आसा । तिनि हियँ करउँ सदा मैं वासा ॥
मोर तोर कबहूँ करहिं न भेदा । ते सज्जन परहिं न भव खेदा ॥
व्याख्या - जो मेरा पूरा भरोसा करते हैं और मनुष्यों से अपेक्षा नहीं रखते हैं, मैं उनके हृदय में सदा निवास करता हूँ और जो संसार में अपने-पराये का भेद नहीं करते हैं, उनको कोई भी दुःख संसार में सताता नहीं है ।
दो० - परमारथ रत निसि दिवस पर दुःख हेतु न करहिं काज ।
ते जनु मम हृदय बसहिं जग में रखहउँ उनकी लाज ॥ १५ ॥
व्याख्या - हे वत्स ! जो लोग रात-दिन परमार्थ में लगे रहते हैं और कभी भी दूसरों को दुःख देने के लिए काम नहीं करते हैं, वे लोग मेरे हृदय में निवास करते हैं तथा संसार में ऐसे लोगों की मैं लाज रखता हूँ ।
छ० - जय जय जग स्वामी सब अन्तर्यामी अब आवहुँ शरण तुम्हार ।
सब गुण आगर करुणा सागर सो विनती सुनहुँ नाथ आमार ॥
परहित कारी होवउँ सदाचारी तजहुँ काम कोह मद अति चार ।
तोर सहारा जहाज हमारा करहु कृपा मिटहि तन मन विकार ॥
व्याख्या - हे जगत के स्वामी ! आपकी जय हो, जय हो ! हे प्रभु ! आप सबके अन्तर्यामी हैं, इसलिए अब मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे परमपिता ! आप समस्त गुणों के भण्डार हैं तथा करुणा के समुद्र हैं, इसलिए हे प्रभु ! मेरी प्रार्थना सुनिए । हे प्रभु ! मैं परोपकार करने वाला होऊँ तथा मेरे आचरण में सदाचार आ जाए तथा मैं काम, क्रोध, मद व अत्याचार का त्याग कर सकूँ, ऐसी शक्ति दीजिए । हे परमपिता ! आपकी कृपा का सहारा ही भाव रूपी भव सागर को पार करने का हमारा जहाज है । हे परमपिता, हे परमेश्वर ! आप कृपा कीजिए, जिससे मेरे मन व तन के समस्त विकार मिट जाएँ ।
छ० - भगति न पूजा जानुन दूजा तब केहि विधि करउँ मनुहार ।
तर्क कुतर्का मन भटका बुद्धि विकल बंधन उरुझहि संसार ॥
कोमल चित्त भगतहित धरि आन उबारहुँ अब मोहि करतार ।
तुम पितु माता जग सब भ्राता सो हरि तारहुँ सकल जग परिवार ॥
व्याख्या - हे परम पिता ! मैं भक्ति और पूजा दोनों को ही नहीं जानता हूँ, अतः अब कैसे मैं आपको प्रसन्न करूँ ? मेरा मन भी तर्क व कुतर्क के जाल में भटक रहा है, जिससे बुद्धि व्याकुल होकर संसार के बन्धनों में उलझ गयी है । अतः हे परम पिता! अब भक्त का कल्याण करने के लिए आप कोमल चित्त धारण करके आइये और इस भक्त को इस भव सागर से बचाइये। हे परम पिता ! आप सबके माता-पिता हैं, इसलिए यह समस्त संसार मेरा भाई है, अतः हे प्रभु ! आप मुझे मेरे परिवार (जगत) सहित भव से पार कराइये अर्थात समस्त संसार का ही कल्याण कीजिए।
दो० - सब जग का कल्याण करो चराचर तुम्हार सन्तान ।
मन मुदित मंगल सब करें इह विनती रखहु भगवान ॥ १६ ॥
व्याख्या - हे परम पिता ! आप समस्त जगत का ही कल्याण कीजिए, क्योंकि समस्त चराचर जगत तो आपकी ही सन्तान है। सभी लोग प्रसन्न मन से मंगल कर सकें, हमारी इस प्रार्थना को भगवान पूर्ण कर दीजिए।
सब घट सदा सद्गुण बासा । छुपत रहहिं वासना कुहासा ॥
सो दयालु अब बिलम्बु न करहु । करि कृपा सब कल्मष हरहु ॥
व्याख्या - हे परम पिता ! सभी के हृदय में सद्गुणों का निवास होता है, परन्तु सब सद्गुण वासना रूपी कोहरे से छुपे रहते हैं। अतः हे प्रभु ! आप विलम्ब मत कीजिए और कृपा करके समस्त कल्मषों को दूर कर दीजिए।
प्रगटहिं कृपा तुम्हार अनयासा । होय सुजन जीव बिनु प्रयासा ॥
जग सुत सुता तुम्हार स्वामी । सो करहउँ करुणा अन्तर्यामी ॥
व्याख्या - हे प्रभु ! जब आपकी कृपा अचानक मिल जाती है, तो बिना प्रयास के ही जीव सज्जन हो जाता है। ये समस्त संसार आपके पुत्र-पुत्रियाँ हैं, अतः हे अन्तर्यामी भगवान ! आप समस्त संसार पर करुणा कीजिए।
सब हियँ प्रेम होई दिनु राति । मिटहिं भेद सकल जाति पाति ॥
मंगल हेतु करहिं सब कर्मा । पालहिं अहिंसा परमो धरमा ॥
व्याख्या - हे भगवन् ! सबके हृदय में रात-दिन प्रेम भावना पैदा होती रहे तथा जाति-पाति के भाव मिट जाएँ। सभी दूसरों के मंगल के लिए कर्म करें तथा सदा अहिंसा के परम धर्म का पालन करें।
मंगलमय होय सब संसारा । तोर प्रेरणा बल महिमा अपारा ॥
सो सबहिं आशीष देउ भगवाना । सहज दयाल प्रभु कृपा निधाना ॥
व्याख्या - अतः हे भगवान ! हम सबको आप आशीर्वाद दीजिए कि समस्त संसार का मंगल हो। हे परमपिता! आपकी प्रेरणा की शक्ति की महिमा अपार होती है, अतः हे सहज में ही दया करने वाले, हे कृपा के धाम भगवान! आप कृपा कीजिए।
दो० - मंगल देखउँ मंगल सुनउँ मंगल हेतु करि सकउँ काज ।
धरम आचरण सदा करूँ सोइ करहउ कृपा प्रभु आज ॥ १७ ॥
व्याख्या - हे परम पिता ! चारों तरफ मंगल ही मंगल देखूँ तथा मंगल ही मंगल सुनूँ और मंगलदायक कर्म ही कर सकूँ तथा सदा मैं धर्म का आचरण करूँ, इसलिए हे प्रभु ! मुझपर कृपा कीजिए।
मुक्ति मोक्ष नहिं अपर लोका । पावहिं ते जनु निज मन रोका ॥
विषय वासना मुक्त जब होई । तब तब धरम कहावहि सोई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! मुक्ति या मोक्ष लोक की अवस्था नहीं होती है, इसको तो वे लोग पाते हैं, जो अपने मन को वश में कर लेते हैं। जब जब विषय वासनाओं से मन मुक्त होता है, उसी समय धर्म की अवस्था होती है।
नहिं कोई धरम जुग अनुसारी । सदा भयउ इहँ जीव वृत्ति धारी ॥
ग्रन्थन लिखा मरम छुपाई । पुनि बरनिन बहु भरमाई ॥
व्याख्या - धर्म कोई युगों के अनुसार नहीं होता है। धर्म तो सदा जीव की वृत्ति के अनुसार बनता है। इसी रहस्य को शास्त्रों में छिपा कर लिखा हुआ है और व्याख्याकारों ने अपने मन से व्याख्या कर जीवों को ज्यादा भ्रमित कर दिया है।
वृत्ति अनुरूप भयउ जुग चारी । विप्र जन सो नाना भांति विचारी ॥
तम वृत्ति सोइ जुग कलि घोरा । काम क्रोध लोभ मदादि चहुँओरा ॥
व्याख्या - चारों युग (कलि, द्वापर, त्रेता व सत्युग) जीव की वृत्ति की अवस्था ही होते हैं। जिसको विद्वानों ने नाना प्रकार से विचार कर बताया है। जब जीव की तामसिक वृत्ति होती है, तब वह अवस्था ही घोर कलियुग की होती है। जिसके कारण काम, क्रोध, मद, लोभ आदि भाव चारों तरफ फैल जाते हैं।
रज वृत्ति चावहिं सुख सदाई । द्वापर सोई सब ग्रन्थन गाई ॥
सतवृत्ति तहँ सदा सेवा भावा । सोइ जुग त्रेता सब जन गावा ॥
व्याख्या - जीव की रजोवृत्ति सदा सुख चाहती है। उसी रजोवृत्ति जीव की अवस्था को द्वापर के प्रतीक के रूप में ग्रन्थों में बताया गया है। जीव की सतोवृत्ति होने पर, उसमें सेवाभाव जागृत हो जाता है। जिससे जीव सेवा में लगा रहता है। उसी अवस्था को त्रेतायुग के प्रतीक के रूप में सब लोगों ने बताया है।
निवृत्ति पूरन जब मन माहि । जुग सत सोइ सत्य बताहि ॥
अभिन्न धरम अरु जुग चारी । निज मन भयी अवस्था सारी ॥
व्याख्या - जब मन में पूर्ण रूप से निवृत्ति आ जाती है, तब जीव की वह अवस्था सत्युग की होती है। इस प्रकार धर्म और युग अवस्था एक ही होती है । ये सब अवस्थाएँ स्वयं के मन की अवस्थाएँ ही होती है ।
दो०- त्रिगुण सोई तीन जुग त्रिगुण ही धारणा आधार ।
धारणा रूप धरम सकल कहूँ सच हियँ विचार ॥ १८ ॥
व्याख्या - तम, रज व सत गुण ही कलि, द्वापर और त्रेता युग होते हैं तथा धारणा भी तीन गुणों के अनुरूप ही होती है और धारणा के अनुरूप ही धर्म (व्यवहार) बनता है । यह मैं हृदय में विचार कर सत्य कह रहा हूँ ।
कहूँ सरल धरम समझाई । जीव व्यवहार धरम कहाई ॥
जीव व्यवहार गुण अनुसारी । ताई हेतु धरम नाना प्रकारी ॥
व्याख्या - बहुत सरल तरीके से अगर धर्म को समझाया जाये, तो कह सकते हैं कि जीव का व्यवहार ही जीव का धर्म होता है और जीव का व्यवहार गुणों के अनुसार ही होता है । इसलिए नाना प्रकार के धर्म का उद्भव हो गया है ।
गुणमय धरम बन्धन कारी । कहहूँ सत्य पुकारी पुकारी ॥
गुण पार सोइ सत्य धरमा । मंगलमय नहि बंधन करमा ॥
व्याख्या - तीनों गुणों से पैदा होनेवाला धर्म हमेशा बन्धन देनेवाला होता है । मैं पुकार-पुकार के यह सत्य कह रहा हूँ । जो धर्म गुणों से पार होता है, वही सत्य, मंगलकारी और कर्म-बन्धन से मुक्त होता है ।
शुभाशुभ नहिं तहँ करमा । विगत देह गेह सोई धरमा ॥
जब जब होवइ गुण विचारा । नहिं धरम तहँ आई विकारा ॥
व्याख्या- जब शुभ-अशुभ का भाव भी मिट जाता है और जीव देह व गृह के मोह से मुक्त हो जाता है, तभी वह धर्म का अनुसरण करता है । जब जीव गुणों का विचार करने लग जाता है, तब धर्म नहीं होता है, बल्कि जीव विकारों में फँस जाता है।
जब हिय होय धरम अनुभूति । बूझ परहिं तब प्रभु करतूति ॥
सदा कर्ता तउ अकर्ता सुहाई । परइ समझ तब हिय माई ॥
व्याख्या - जब जीव के हृदय में धर्म की अनुभूति होती है, तब ही परमपिता की लीला समझ में आती है । परमपिता सब कुछ करनेवाले होते हैं, तब भी वे अकर्ता ही कहलाते हैं । यह सब मर्म तब जीव के हृदय में समझ आ जाता है ।
दो० - धरम घट अन्दर बसै नहिं बाहिर सकइ उपजाय ।
निज हियँ जो देख न सकै सो नयन सह अंध कहाय ॥ १९ ॥
व्याख्या - धर्म हृदय के अन्दर की अवस्था होती है । अतः सच्चा धर्म बाहर पैदा नहीं होता है । जो जीव स्वयं के हृदय में धर्म को देख नहीं पाता है, वह मूर्ख तो आँखों के होते हुए भी अन्धा ही कहलायेगा ।
गुण युक्त करम नहिं धरमा । कहउँ सत्य अति गुप्त मरमा ॥
धारण रमण मंगल काजा । बड़ छोट तहँ नहिं लाजा ॥
व्याख्या - जब तक कर्म करते समय गुणों का विचार रहता है, तब तक धर्म की अवस्था नहीं होती है । मैं यहाँ बहुत ही गुप्त रहस्य को बता रहा हूँ । जब जीव सहज में ही परमार्थ को धारण करता है और परमार्थ में ही रमण करता है तथा छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं करता है, तभी धर्म की अवस्था होती है ।
पूजा जप तप जग विधि नाना । मूढ़ जेहि इहँ धरम बखाना ॥
सकल पूजादि हेतु अभिलाषा । स्वारथ पूरण इहँ प्रयासा ॥
व्याख्या - पूजा, जप, तप आदि की संसार में बहुत-सी विधियाँ प्रचलित हैं, मूर्ख लोग ही इन विधियों को धर्म कहते हैं । समस्त पूजा आदि तो इच्छापूर्ति के कारण किये जाते हैं । अतः ये तो सब स्वार्थ पूर्ण करने के प्रयास मात्र होते हैं ।
जब लगि स्वारथ मन माहिं । नहिं धरम सत्य बताहिं ॥
हिय परमार्थ नहिं अभिलाषा । सो धरम सहज ग्यान प्रकाशा ॥
व्याख्या - जब तक मन में स्वार्थ रहता है, तब तक धर्म नहीं होता है । जब हृदय में परमार्थ की भावना हो और कोई इच्छा नहीं हो, तभी धर्म की अवस्था होती है, जहाँ सहज में ज्ञान का प्रकाश होता है ।
नहिं बन्धन नहिं मुक्ति चाह । इदम परमार्थ दूसरा नाह ॥
जन्म मरण भय न सताई । तब बन्धन सकहिं कि टिकाई ॥
व्याख्या - जब कोई बन्धन नहीं होता है तथा मोक्ष की भी इच्छा नहीं रहती है, तब यह अवस्था ही परमार्थ की अवस्था होती है और कोई दूसरी अवस्था परमार्थ की नहीं होती है । जब जन्म-मरण का भय भी नहीं रहता है, तब बन्धन कैसे रह सकता है ?
दो० - परमार्थ धरम आधार भया नहिं जग दूजा कोय ।
पथ परमार्थ जब जीव चले तब तब धरम होय ॥ २० ॥
व्याख्या - परमार्थ ही संसार में धर्म का आधार होता है । दूसरा कोई नहीं है । अतः जब जीव परमार्थ के पथ पर चलता है, तब तब वह धर्म का पालन करता है ।
छ० - नाम न रूपा एक सरूपा नहिं तहँ कछु भेद बिलगाई ।
सबहिं एका एकहि अनेका मरम अद्भुत तब परइ बुझाई ॥
साधु सन्ता जानि अनन्ता निज मन भरम लहहिं मिटाई ।
नयन न दिखाहिं कथन न कथाहिं निज हियँ धरम प्रगटाई ॥
व्याख्या - नाम और रूप भी जहाँ एक हो जाते हैं तथा वहाँ कुछ भी भेद नहीं रह पाता है । तब सब में एक परमात्मा तथा एक में ही सब दिखाई देते हैं तथा ऐसी अवस्था में नाना स्वरूपों का रहस्य समझ में आ जाता है । साधु- सन्त भी परमात्मा को अनन्त समझ कर स्वयं के मन का भ्रम मिटा लेते हैं । धर्म की अवस्था तो जीव के स्वयं के हृदय में प्रगट होती है । जिसको आँखों से देखा नहीं जा सकता है तथा वाणी से बखाना नहीं जा सकता है ।
छ० - जाति पंथा सकल अन्ता नहिं तहँ कोई लघु बड़ भेदा ।
सहज सुभावा मन उछावा आनन्द मगन विगत भव खेदा ॥
ईश्वर अल्लाह एकहि भव मल्लाह जानि आव जीव शरणाई ।
ज्ञान प्रकाशा हिय उजासा समता भाव सहज मन उमगाई ॥
व्याख्या - जब हृदय में धर्म प्रकट हो जाता है, तब जाति व पंथों के समस्त भेद मिट जाते हैं तथा छोटे-बड़े का भी कोई भेद नहीं रहता है । उस समय जीव सहज स्वभाव में बरतने लग जाता है । जिससे मन में उत्साह छा जाता है तथा जीव आनन्द में मगन हो कर सब कष्टों को भूल जाता है । उस समय ईश्वर-अल्लाह आदि नामों का भेद मिट जाता है तथा एक ही परम शक्ति का ज्ञान हो जाता है । जिससे जीव में शरणागति का भाव आ जाता है । जब हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, तब हृदय में समता का भाव आ जाता है ।
दो०- जिन्ह हिय समता बसै तिन्ह हिय नहिं रहई द्वन्द ।
बिनु द्वन्द आनन्द सदा अब तो समझ मन मन्द ॥ २१ ॥
व्याख्या - जिनके हृदय में समता का भाव रहता है, उनके हृदय में कभी भी द्वन्द नहीं रहता है और बिना द्वन्द के सदा आनन्द की अवस्था रहती है । इसलिए मूर्ख मन अब तो समझो ।
छ०- धन्य रघुराई धरम समुझाई संशय नहिं रहा मन माहिं ।
पढ़हिं गुनहि ते भव तरहि सुगम सरल इहँ सत बताहिं ॥
अबहु न मानहिं मूढ़ जानहिं तिन्ह हियहु ज्ञान आवहिं ।
मम अनुरोध करो मन बोधा देखउ निज आनन्द पावहिं ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप धन्य हैं कि आपने नाना प्रकार से मुझे धर्म को समझाया है । जिससे मन में संशय नहीं रह गया है । इसको जो भी लोग पढ़ व सुनकर समझेंगे, वे भवसागर पार कर जायेंगे । क्योंकि उनके लिए यह सुगम व सरल है । मैं सत्य बता रहा हूँ । अभी भी जो लोग इसको नहीं मानते हैं, तो वे मूर्ख हैं । फिर भी उनके हृदय में यह अनुभूति-कथा ज्ञान ही पैदा करेगी । इसलिए मेरा अनुरोध है कि आप स्वयं इसको पढ़ कर अनुभूति कीजिए । फिर देखिए आपको स्वयं को क्या आनन्द मिलता है?
॥ इति श्री सत्यधर्मशास्त्रस्य ज्ञानार्थम च धर्मार्थमर्मम् ॥
॥ द्वितीय सोपान सम्पूर्णम् ॥
॥ मानवधर्मशास्त्रस्य मासपरायण तृतीय पड़ाव ॥
॥ मानवधर्मशास्त्रस्य नवाहपरायण प्रथम पड़ाव ॥