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Lyrics

रामायण - अयोध्या काण्ड

Ramayan
।। ॐ परमात्मने नम:।। ।। ॐ सतगुरुदेवाय नम:।। ।। ॐ गरुवे नम:।। ।। ॐ परमात्मने नम:।। अयोध्या काण्ड श्लोक यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविर्धुगले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सो%यं भूतिबिभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा शर्व: सर्वगत: शिव: शशि निभ: श्रीशंकर: पातु माम्।।1।। व्याख्या : इस श्लोक में शक्ति के रहस्य को बताया गया है कि शक्ति साधक के शरीर के अन्दर सुशोभित रहती है। जिसे कुछ साधना पंथों में कुण्डलिनि शक्ति कहा गया है। जब साधक की शक्ति सुप्त अवस्था में रहती है तब वह भूधरसुता अर्थात् पर्वत (जड़) की पुत्री के प्रतीक के माध्यम से बतायी गयी है और जब शक्ति की ऊर्जा मस्तिष्क में जागृत होकर पहुँच जाती है, तो वही देवापगा मस्तके अर्थात् दैवीय भावों को धारण करने वाली कहलाती है। जब शक्ति की ऊर्जा भृकुटि में रहती है तो साधक को वासनाओं से शान्ति मिल जाती है। उसी को बाल चन्द्रमा को ललाट पर धारण करना बताया गया है। जब शक्ति की ऊर्जा अधोगामी होने लगती है तो गले से नीचे आने पर नाना प्रकार की वासनाएँ पैदा करने लग जाती है। उसी को गले में वासना रूपी सर्पों का लपेटना बताया गया है। उसी ऊर्जा के रस अर्थात् रसायन से वासनाओं रूपी सर्पों की उत्पत्ति होती है। इसलिए मैं उसी विभूतियों को भूषित करने वाली, स्वरों के माध्यम से सर्वत्र व सदा शरीर में संचरित होने वाली, शव अर्थात् शरीर को धारण करने वाली व शंकाओं का निवारण करने वाली परम शक्ति की शरण में जाता हूँ। प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदु:खत:। मुखाम्बुज श्री रघुनन्दनस्य में सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।।2।। व्याख्या : मैं सदैव आत्मा की उस अवस्था को प्राप्त करना चाहता हूँ जो भोगों की प्राप्ति पर प्रसन्न नहीं हो और न ही भोग नहीं मिलने की अवस्था में दु:खी हो। मैं तो उस अवस्था को चाहता हूँ कि मेरी आत्मा सदैव कमल की तरह निर्विकार रहकर आनन्द व मंगल करने वाली हो। नीलाम्बुजश्यामलकोमलांगं सीतासमारोपितवाम भागम्। पाणौ महासायक चा डिग्री चापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।3।। व्याख्या : मैं उस परम आत्मा को नमस्कार करता हूँ जो नीले आकाश के समान श्याम वर्ण व कोमल अंगोवाली है तथा जिसके बाएँ तरफ सुरता रूपी सीता शोभायमान होती है तथा जो यम, नियम, संयमादि सुन्दर धनुष वाणों को धारण किए होती है। इस श्लोक में आत्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। दो0 श्रीगुर चरन सरोज रज निज मनु मुकु डिग्री सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।1क।। व्याख्या : मैं श्री गुरु के चरण कमलों की धूल से मेरे मन रूपी दर्पण को साफ करके परमात्मा के निर्मल यश का वर्णन करूँगा, जो धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फलों को देने वाला होता है। जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।। भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी।। व्याख्या : इन चौपाइयों में ध्यान की पूर्णता के बाद जब साधक देह भाव में बरतने लगता है तो जो सुखद अनुभूति होती है, उसका वर्णन किया गया है। इसलिए कहा गया है कि जब आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता से विवाह (मिलन) करके शरीर रूपी अयोध्या नगरी में आए, तो नित्य नए-नए मंगल व आनन्द होने लगते हैं और उस अवस्था में भुवन चारिदस अर्थात् दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित व अहंकार का देह रूपी पर्वत पर आभास होने लगता है। उस अवस्था में साधक के अन्दर अच्छे कार्य करने की भावना उमड़ने लगती है और सुख रूपी वर्षा होने लगती है। रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।। मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक के लिए रिद्धि-सिद्धियों रूपी सम्पत्ति की नदियाँ बहने लगती हैं अर्थात् साधक रिद्धि-सिद्धियों से युक्त हो जाता है। जिससे ऐसा लगने लगता है कि सम्पत्ति रूपी समुद्र देह रूपी अयोध्या में उमड़कर आ गया हो। उस अवस्था में शरीर रूपी पुर के मन के भाव व नर-नाड़ियाँ सद्गुणों वाले हो जाते हैं तथा सब प्रकार से अनमोल पवित्रता व सुंदरता आ जाती है। कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतिनिअ बिरंचि करतूती।। सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक के देह रूपी नगर की विभूतियों का वर्णन नहीं किया जा सकता है। ऐसा लगने लगता है मानो ब्रह्मा की इतनी ही क्षमता (कार्यकुशलता) है। उस अवस्था में शरीर रूपी नगर के सब भाव सुखी हो जाते हैं तथा सभी भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं। उसी को ""रामचंद मुख चंदु निहारी"" बोल कर लिखा गया है। मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।। राम रूपु गुन सील सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।। व्याख्या : उस अवस्था में माताओं रूपी तीनों (सुष्मना, ईड़ा, पिंगला) नाड़ियाँ व वृति रूपी सहेलियाँ मनोकामना रूपी बेल को फलित हुआ देखकर प्रसन्न होती हैं। उस समय दसरथ रूपी स्थूल शरीर का भाव आत्मा रूपी राम के स्वरूप, गुण व शील स्वभाव को देखकर व सुनकर प्रसन्न होने लगता है। दो0 सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु। आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1ख।। व्याख्या : उस अवस्था मे देह रूपी नगर के सब भावों की यही अभिलाषा रहती है इसलिए महाऐश्वर्य (महेश) के भाव को मनाकर अर्थात् महाऐश्वर्य की भावना को मन में लाकर यही चाहने लगते हैं कि दसरथ रूपी राजा अपने रहते हुए आत्मा रूपी राम को युवराज पद दे दें अर्थात् शरीर भी बना रहे और महाऐश्वर्य की अवस्था भी प्राप्त हो जाए। यह अवस्था प्रत्येक साधक के साधना पथ पर आती है। एक अवस्था ऐसी आती है, जिसमें साधक की सुरता परमात्मा में लगी रहती है परन्तु वह शरीर के मोह को नहीं छोड़ पाता है। यहाँ पर उसी अवस्था का सूक्ष्मता के साथ वर्णन किया गया है। एक समय सब सहित समाजा। राज सभाँ रघुराजु बिराजा।। सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।। व्याख्या : साधक के मन में समय-समय पर नाना विचार आते रहते हैं। अत: यहाँ पर उसी एक अवस्था का वर्णन किया गया है। इसलिए कहा गया है कि एक बार सब समाज सहित अर्थात् समस्त भावों सहित स्थूल चित रूपी राजा दसरथ भाव रूपी सभा में बैठे हुए थे अर्थात् चित का स्थूल भाव, भाव रूपी सभा से घिरा हुआ था। नर की धड़कन को वश में रखने वाला (नरनाहू) चित समस्त सुकृत्यों की मूर्ति लग रहा था तथा आत्मा रूपी राम के सुयश को सुनकर बहुत उत्साहित हो रहा था। नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रूख राखें।। त्रिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरिभाग दसरथ सम नाहीं।। व्याख्या : नृप अर्थात् नर की धड़कन कृपा अर्थात् करके प्राप्त करने की अभिलाषा से धड़कती है और लोकप अर्थात् शरीर स्थित चक्र भावों की प्रीत के अनुसार संचालित होते हैं। तीनों भुवन अर्थात् तीनों प्रकार के भावों (सत, रज, तम) व तीनों कालों में शरीर रूपी संसार में चित रूपी दसरथ के समान अच्छे भाव वाला अर्थात् प्रभाव वाला कोई नहीं होता है। मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिअ थोर सबु तासू।। रायँ सुभायँ मुकु डिग्री कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट समकीन्हा।। व्याख्या : जिस चित रूपी राजा का मंगल का मूल करने वाला आत्मा रूपी राम पुत्र होता है, उसके बारे में जो कुछ भी कहा जाए वो थोड़ा होता है। चित रूपी राजा ने स्वभाव वश ही दर्पण हाथ में लिया अर्थात् निज स्वरूप का चिन्तन किया और अपने स्वरूप को देखकर समता रूपी मुकुट को ठीक किया अर्थात् समता की अवस्था में स्थिर होने का प्रयास किया। श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।। नृप जुबराजु रामु कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।। व्याख्या : इन चौपाईयों में साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। कानों के पास सफेद बाल दिखायी पड़ने का तात्पर्य यह है कि साधक को सुनकर यह विश्वास हो जाता है कि एक दिन मृत्यु अवश्यम्भावी है। उसी को ""श्रवन समीप भए सित केसा"" कहा गया है। सफेद बालों का आभास होना मृत्यु के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में साधक को विश्वास हो जाता है कि एक दिन यह नश्वर शरीर नहीं रहेगा। उसी को ""जरठपनु अस उपदेसा"" बोलकर लिखा गया है। तब चित रूपी दसरथ सोचता है कि आत्मा रूपी राम को ही युवराज करना अच्छा है अर्थात् देहभाव से आत्मभाव में लीन होना ही अच्छा है, जिससे जन्म लेने का लाभ मिल जायेगा अर्थात् मनुष्य जीवन का ध्येय (ईश्वर प्राप्ति) पूर्ण हो जायेगा। दो0 यह बिचा डिग्री उर आनि नृप सुदिनु सुअवस डिग्री पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।। व्याख्या : जब साधक के हृदय में वैराग्य दृढ़ होने लगता है तो यह विचार आने लगता है कि अब आत्मानुशासन को मानकर अर्थात् पूर्ण रूप से परमात्मा के शरणागत होकर शरीर को रखते हुए जीवन जीया जाए। उसी अनुभूति को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है कि दृढ़ वैराग्य के भाव के आने पर चित रूपी दसरथ राजा ने समय की अनुकूलता को देखते हुए विचार किया और प्रसन्न होते हुए विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ के पास गया अर्थात् वैराग्य के भाव की प्रबलता से विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव भी जागृत हो गया। उसी को राजा दसरथ का वशिष्ठ मुनि के पास जाना कहा गया है। कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।। सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।। व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी दसरथ कहते हैं कि हे मन के स्वामी (मुनि नायक अर्थात् विशिष्ट ज्ञान)! आत्मा रूपी राम (अर्थात् चेतन आत्मा) सब प्रकार से सब कुछ करने के लायक हो गया है। जब ध्यान के अभ्यास से आत्मा चेतन हो जाती है और सुरता रूपी सीता का साथ मिल जाता है, तो वह सब कुछ करने की क्षमता से युक्त हो जाती है। उस चेतनात्मा की अवस्था में समस्त मन्त्रणा के भाव व शरीर स्थित सब भाव जो सात्विक, आसुरी व उदासीन वृति वाले होते हैं। सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।। बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं।। व्याख्या : उन समस्त भावों को आत्मा रूपी राम वैसे ही प्रिय लगते हैं जैसे मुझे लगते हैं। उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है जैसे परमात्मा की कृपा पूरे शरीर में रोम-रोम में छायी हुई हो। उस अवस्था में विशुद्ध प्रकाश के भावों सहित गोसाईं अर्थात् गो अ साईं यानी इन्द्रियाँ भी अनुकुल होकर शुभकारी हो जाती हैं। इसमें कोई संशय नहीं है। जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।। मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें ।। व्याख्या : साधक को उस अवस्था में समझ में आ जाता है कि जो गुरु के चरणों की धूल को अपने सिर पर धारण करते हैं अर्थात् जो पूर्ण रूप से गुरु शक्ति के सामने समर्पण करते हैं, वे समस्त वैभवों को अपने वश में कर लेते हैं। दसरथ रूपी राजा यही कहते हैं कि यह अनुभव मेरे समान दूसरे का किसी का नहीं है क्योंकि मैंने गुरु चरणों की धूल की पूजा करके ही सब कुछ पाया है। अर्थात् चित रूपी दसरथ ही इस अवस्था का अनुभव कर पाता है। अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें।। मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।। व्याख्या : चित रूपी दसरथ कहते हैं कि समस्त वैभवों को प्राप्त करके बस मेरी एक अभिलाषा है, जो आपकी कृपा (विशिष्ट ज्ञान) से पूर्ण हो सकती है। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ ने चित रूपी दसरथ को प्रसन्न देखकर व सहज प्रेममय देखकर कहा कि हे चित रूपी राजा! कहिए क्या आज्ञा है? अर्थात् क्या चाहते हो? दो0 राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाष तुम्हार।।3।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ मुनि कहते हैं कि हे चित रूपी राजा! आपके नाम के अनुसार ही अर्थात् चित की चेतना के अनुसार ही सब फलों की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए चित की चेतना से उत्पन्न अभिलाषा का फल सदैव अनुसरण करता है। अर्थात् जो साधक की चेतना में चिन्तन आता है, वो सब परमात्मा की कृपा से पूर्ण हो जाता है। उसी अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव दृढ़ता लाता है। अत: उसी को यहाँ लिखा गया है। सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।। नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।। व्याख्या : उस अवस्था में सब प्रकार से विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव को प्रसन्न जानकर चित रूपी राजा मधुर वाणी बोले कि हे नाथ! आत्मा रूपी राम को युवराज कर दीजिए। आप कृपा करके समस्त भावों रूपी समाज को बता दीजिए अर्थात् समस्त भावों को प्रेरणा कर दीजिए, जिससे आत्मारूपी राम को युवराज स्वीकार कर लें अर्थात् समस्त भाव आत्मोन्मुखी हो जाएँ। मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।। प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।। व्याख्या : चित रूपी राजा दसरथ कहते हैं कि मेरे रहते यह उत्सव हो जाए अर्थात् देह का आभास रहे और समस्त भाव आत्मोन्मुखी हो जाएँ। उसी को ""सब लोचन लाहू"" बोलकर लिखा है। यह विश्वास रूपी शिव की कृपा से पूर्ण हो। यही मेरे मन में बस एक अभिलाषा है। पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।। सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।। व्याख्या : जब समस्त भाव आत्मोन्मुखी हो जायेंगे तो मुझ (चित रूपी दसरथ) को शरीर के रहने या नहीं रहने की चिन्ता नहीं रहेगी। यह वैज्ञानिक सत्य है कि जब शरीर की ही चिन्ता नहीं रहती है, तो किसी भी प्रकार का पश्चाताप नहीं हो सकता है। अत: उसी को ""जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ"" बोलकर लिखा गया है। चित रूपी दसरथ की जब आत्मोन्मुखी अवस्था हो जाती है, तो वह मंगल व आनन्द का मूल होने के कारण विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव को बहुत अच्छी लगती है। सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।। भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि वशिष्ठ चित रूपी राजा से कहते हैं कि हे राजन! जब भाव आत्मा से विमुख होते हैं, तब पश्चाताप होता है क्योंकि बिना आत्मोन्मुखी हुए जीव की चिन्ता नहीं मिटती है। वही चेतन आत्मा साधक के शरीर की स्वामी होती है। वह आत्मा परम पवित्र व प्रेम के भाव का अनुसरण करने वाली होती है। दो0 बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव कहते हैं कि हे चित रूपी राजन! अब देर मत कीजिए और समस्त भाव रूपी समाज को सजाकर अर्थात् आत्मोन्मुखी करके आत्मा रूपी राम को युवराज कर दीजिए। क्योंकि वही समय व वही दिन मंगलकारी होगा, जब आत्मा रूपी राम युवराज होंगे। अर्थात् आत्मोन्मुखी होने पर ही मंगल होगा। मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।। कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।। व्याख्या : उस अवस्था में चित प्रसन्न होकर अपने मन के अन्दर (मन्दिर उ मन अ अन्दर) आए अर्थात् स्वचिन्तन की अवस्था आ गयी और सुमन्त्रणा रूपी सचिव व सेवकों को बुला लिया। उन समस्त सुमन्त्रणा रूपी भावों ने जय जीव कहा और सीस झुकाया अर्थात् समर्पण कर दिया। तब चित रूपी राजा ने सुमंगल रूपी वचन सुनाए अर्थात् आत्मोन्मुखी होने की प्रेरणा करी। जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।। मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।। व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने कहा कि अगर पंच भूतों को मेरा मत अच्छा लगे तो हर्ष के साथ आत्मा रूपी राम का राज तिलक कर दीजिए अर्थात् अगर ज्ञानेन्द्रियों को अच्छा लगे तो आत्मोन्मुखी अवस्था में प्रवेश कर जाइये। तब मंत्रणा रूपी सुमन्त्रि प्रिय वाणी को सुनकर प्रसन्न हो गया तथा ऐसा लगा जैसे इच्छा रूपी वृक्ष पर जल पड़ गया हो। बिनती सचिव करहिं कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।। जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।। व्याख्या : तब उस अवस्था में मन्त्रणा रूपी सचिव हाथ जोड़ करके बिनय करने लगते हैं कि हे जगतपति! (चित से समस्त जगत की उत्पत्ति होती है इसलिए चित ही जगतपति होता है) आप करोड़ों वर्ष जिएँ क्योंकि आपने आत्मोन्मुखी होने का मंगलकारी कार्य विचारा है। अत: इस कार्य में अर्थात् आत्मोन्मुखी होने में देरी मत कीजिए। नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।। व्याख्या : तब सचिव रूपी भावों की सुभाषा अर्थात् आत्मोन्मुखी भावना को सुनकर चित रूपी राजा को बहुत प्रसन्नता हुई जैसे बेल के बढ़ने पर उसे शाखाओं का सहारा मिल गया हो। दो0 कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ। राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।। व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ से कहा कि आत्मा रूपी राम के अभिषेक के लिए जो आपकी आज्ञा हो, वो सब जल्दी-जल्दी करवा लेता हूँ। हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।। औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि ने हर्षित होकर चित रूपी राजा से कहा कि सब तीर्थों का (अर्थात् अपने आपको तीन गुणों से परे करके अमृत रूपी रस ले आओ) रसायनरूपी जल लेकर आओ। जब चित की धड़कन भृकुटि पर धड़कने लगती है, तो वह तीन गुणों के उद्गम स्थल पर पहुँच जाती है और वहाँ से जो रस निकलता है, वही सुतीर्थों का जल कहलाता है। उस अवस्था में भाव रूपी रोगों के निवारण में वही जल नाना प्रकार की औषधियों का मूल होता है तथा वही फल व फूलों का काम करता है। उस सुतीर्थों के जल से (भृकुटि से निकलने वाले रसायन से) नाना प्रकार से जीव का मंगल होने लगता है। यह साधना का परम रहस्य है। इसे सूक्ष्मता के साथ समझ लेना जरूरी है। तीन गुणों से परे होने पर जब चित का चिन्तन चलने लगता है तब वह समस्त भव रोगों के लिए औषधियों का मूल बन जाती है और वही मंगलकारी होकर जीवात्मा का उद्धार करने में सहायक हो जाती है। चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।। मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।। व्याख्या : उस अवस्था में इच्छाओं की बहुत प्रकार की वासना जो रोम-रोम में असंख्य रूप में छुपी रहती हैं। उन सबको लाने के लिए बोला अर्थात् जो इच्छाओं की वासना है, उसको भी विशिष्ट ज्ञान ने प्रकट करने को बोला। जिससे बाद में साधना के पथ पर कोई बाधा नहीं आए। विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने मन के गुणों से मंगलकारी भावना को प्रकट करने को कहा जिससे आत्मा रूपी राम का राजतिलक किया जा सके। क्योंकि जब मन के भावों में मंगलकारी भावना होती है, तभी भावों की आत्मोन्मुखी अवस्था हो पाती है। आत्मोन्मुखी अवस्था ही राम का राजतिलक होता है। बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबुध बिताना।। सफल रसाल पूगफल केरा । रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि ने अनुभव में आने वाले सब विधान को बताया तथा कहा कि शरीर रूपी नगर में चक्रों रूपी मंडप बना दो और शरीर रूपी नगर की नाड़ियों रूपी गलियों में सफल अर्थात् अच्छी भावना रूपी रस व दृढ़ता रूपी फल, सुपारी व पवित्रता रूपी केला के पेड़ों को लगा दो। रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।। पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।। व्याख्या : सुन्दर मन के भावों का चौक बनवा दो और शरीर में भावों रूपी बाजार को जल्दी सजवा दो। गणपति अर्थात् गुणों के स्वामी यानी चित, गुरु अर्थात् विवेक व कुलदेवता अर्थात् सद्भावों की पूजा करो यानी विवेक द्वारा सद्भाव पैदा करके चित की धड़कन में मन को लीन करो और शरीर के समस्त स्वरों को साधना करके वश में कर लो। दो0 ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।। व्याख्या : जब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु चित में प्रेरणा कर देते हैं, तो ध्वज-पताका अर्थात् प्राण रूपी ध्वज-पताका स्थिर होने लग जाते हैं और तोरण-कलश रूपी भाव सज जाते हैं, जिससे मन रूपी घोड़े और इन्द्रियों रूपी रथ सज जाते हैं तथा नाग प्राण वायु से उठने वाले भाव निर्मल होने लग जाते हैं। उस अवस्था में सभी भाव विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की आज्ञा के अनुसार निज-निज कार्य करने लगते हैं। जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।। बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।। व्याख्या : उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है कि सभी भाव मानो विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की आज्ञा का पहले से ही अनुसरण किए हुए हों। उस अवस्था में चित रूपी राजा विशुद्ध प्रकाश के भावों (विप्र), साधना के भावों और स्वरों का पूजन करने लगता है अर्थात् विशुद्ध प्रकाश के भावों व साधना के भावों का स्वरों के माध्यम से उद्गम होने लग जाता है। तब ये सब भाव आत्मा रूपी राम के कल्याण के लिए मंगलमय कार्य करने लगते हैं अर्थात् इन समस्त सात्विक भावों से आत्मा का कल्याण होने लग जाता है। सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।। राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को राजतिलक की बातें सुनकर शरीर रूपी अयोध्या नगरी में उत्साह रूपी बाजे बजने लगते हैं और आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता से उत्पन्न सद्गुण शरीर में स्पष्ट होने लग जाते हैं। पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।। भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।। व्याख्या : उस अवस्था में सभी भाव आपस में बातें करने लगते हैं कि ये सद्गुण तो भावरत रूपी भरत के आगमन के संकेत हैं। अर्थात् उस अवस्था में साधक के हृदय में भावरत व वैराग्य के भाव पैदा होने लग जाते हैं। भावरत रूपी भरत से मिले बहुत दिन हो गए हैं और ये सद्गुण अपने प्रिय से मिलने के ही संकेत हैं। भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।। रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती।। व्याख्या : भावरत (भरत) भाव के समान मुझे संसार में कौन प्रिय है? अत: ये सद्गुण भावरत रूपी भरत से मिलने का ही संकेत दे रहे हैं। आत्मा रूपी राम को भावरत रूपी भाई का रात-दिन वैसे ही सोच बना रहता है जैसे अंडों पर कछुए का हृदय लगा रहता है। दो0 एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।। व्याख्या : इसी समय के परम मंगल समाचारों को सुनकर नाड़ियों रूपी रानियों में आनन्द वैसे ही बढ़ने लगता है, जैसे चन्द्रमा को देखकर समुद्र में लहरों का उल्लास बढ़ने लगता है। प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।। प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।। व्याख्या : जो भाव पहले जाकर त्रिनाड़ियों रूपी रानियों को जाकर आत्मा रूपी राम के राजतिलक की सूचना देते हैं। उनकी नाना प्रकार की इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। साधना जब सधने लग जाती है तो प्रारम्भ में मन की समस्त इच्छाएँ स्वत: पूर्ण होने लग जाती हैं। उसी को ""भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए"" बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में नाड़ियों में प्रेम की पुलकावली उठने लगती है और शरीर व मन में पमरात्मा के प्रति अनुराग पैदा हो जाता है। तब समस्त नाड़ियों में मंगलकारी भावों का प्रवाह होना शु डिग्री हो जाता है। उसी को ""मंगल कलश"" सजना बताया गया है। चौकें चा डिग्री सुमित्राँ पूरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी।। आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।। व्याख्या : सुमित्रा रूपी ईड़ा नाड़ी ने सुन्दर भाव रूपी चौक सजा दिया, जो मन की भावना के अनुसार बहुत प्रकार से सुन्दर था। सुष्मना रूपी कौशल्या आनन्द मग्न हो रही थी तथा उस अवस्था में विशुद्ध प्रकाश के भाव प्रकट हो रहे थे, जिससे वासनाओं का त्याग हो जा रहा था। उसी को ""दिए दान विप्र हँकारी"" बोलकर लिखा है। पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।। जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।। व्याख्या : उस समय सुष्मना नाड़ी में प्राण वायु का संचार होने लग जाता है, जिससे समस्त दैवीय इच्छाएँ पूर्ण होने लग जाती हैं और स्वरों (चन्द्र व सूर्य) में नाग प्राण वायु उद्गार पैदा करके इच्छाओं के त्याग की भावना पैदा कर देती है। उस समय सुष्मना नाड़ी में ऐसे भाव उठने लगते हैं, जिससे सब प्रकार से आत्मा रूपी राम का कल्याण हो सके। आत्म कल्याण की चाह ही प्रबल हो जाती है। गावहिं मंगल कोकिल बयनीं। बिधुबदनी मृग सावक नयनी।। व्याख्या : उस समय मधुर-मधुर सुन्दर सात्विक इच्छाएँ मंगल की भावना के साथ प्रकट होने लग जाती हैं। वे सात्विक इच्छाएँ चन्द्रमा के समान शीतलता देने वाली और मृग के बच्चों के समान चंचल स्वभाव वाली होती हैं। साधारण अवस्था में इच्छाएं पैदा होने पर शीतल नहीं होती हैं बल्कि वे तो जीव को जलाने वाली होती हैं। परन्तु साधना में परिपक्व होने पर जो इच्छाएँ पैदा होती हैं, वे शीतल होती हैं, इसलिए उनकी उपमा ""बिधु बदनी"" बोलकर दी गयी है। दो0 राम राज अभिषेक सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के राजतिलक होने की बात सुनकर अर्थात् सभी भावों के आत्मोन्मुखी होने पर शरीर के नर-नाड़ियों में उमंग छा जाती है और सभी नाड़ियों में मंगलकारी भावों का प्रवाह होने लग जाता है। उस समय भावों की मंगल भावना की क्रिया भी अनुकूल हो जाती है। तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।। गुर आगमन सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में चित की धड़कन (नरनाहा) से विशिष्ट ज्ञान का भाव प्रबल हो उठता है। उसी को ""बसिष्ठु बोलाए"" बोलकर लिखा गया है। जब विशिष्ट ज्ञान का भाव प्रबल हो उठता है तो वह आत्मा को विकारों से मुक्त होने की प्रबल प्रेरणा करने लग जाता है। उसी को राम को सिख (शिक्षा) देना कहा गया है। आत्मा भी विशिष्ट ज्ञान को देखकर बन्धनों से मुक्त होने के लिए तत्पर हो उठती है। उसी को ""द्वार आइ पद नायउ माथा"" बोलकर लिखा गया। सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।। गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।। व्याख्या : अर्थात् पूरी तरह समर्पित होते हुए आत्मा रूपी राम ने विशिष्ट ज्ञान को स्वीकार किया और सोलह प्रकार की प्रकृति सहित विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की पूजा की अर्थात् समस्त वृतियों सहित विशिष्ट ज्ञान के सामने समर्पण कर दिया। जब पूर्ण समर्पण हो जाता है तभी सूरता रूपी सीता भी आत्मा के साथ विशिष्ट ज्ञान के सामने समर्पण कर देती है। उसी को सीता सहित राम द्वारा वशिष्ट के चरणों में झुकना बताया गया है। तब आत्मा रूपी राम बोले अर्थात् आत्म अनुभूति हुई कि -- सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।। तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।। व्याख्या : सेवक के घर स्वामी का आना मंगल का मूल व अमंगल को दूर करने वाला होता है अर्थात् आत्मा के साथ विशिष्ट ज्ञान के आने से मंगलकारी अवस्था आती है और अमंगल का नाश हो जाता है। हालाँकि उचित तो यह होता है कि सेवक को स्वामी के पास जाना चाहिये परन्तु गुरु कृपा होने पर स्वामी ही सेवक के पास चला जाता है। उसी को यहाँ आत्मा रूपी राम कहते हैं कि नीति तो ऐसी है कि आप (विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु) मुझे बुलवा लेते। प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।। आयसु होइ सो करौं गोसाईं। सेवकु लहइ स्वामि सेवकाईं।। व्याख्या : आपने अपने बड़प्पन को छोड़कर मुझ पर स्नेह किया है, जिससे मेरा यह घर अर्थात् आत्मा पवित्र हो गयी है। हे इन्द्रियों के स्वामी (गो अ साईं)! आपकी जो आज्ञा हो वही मैं करूँगा क्योंकि मुझ आत्मा को विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की सेवा का मौका मिला है। दो0 सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।। व्याख्या : तब वसिष्ठ रूपी विशिष्ट ज्ञान ने आत्मा रूपी राम के प्रेम भरे वचनों को सुनकर कहा कि हे आत्मा रूपी राम! तुम ऐसा क्यों नहीं कहोगे क्योंकि तुम तो हंस बंस अर्थात् हकार सकार अर्थात् प्राण की गति जब निर्मल होकर हंसाकार हो जाती है, तो अवतंस यानी केवल निर्मल चेतना मात्र बच जाती है। उसी को ""हंस बंस अवतंस"" कहा गया है। जब प्राण निर्मल होकर हंसाकार हो जाता है तो केवल समर्पण और प्रेम बच जाता है। बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।। भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।। व्याख्या : इस प्रकार आत्मा के शील स्वभाव का वर्णन करके विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु प्रेमपूर्वक बोले कि चित रूपी राजा ने राजतिलक करने की तैयारियाँ की हैं क्योंकि वे आत्मा रूपी राम को युवराज का पद देना चाहते हैं। अर्थात् चित आत्मोन्मुखी होकर देह भाव से बाहर आना चाहता है। राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।। गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ। राम हृदयँ अस बिसमय भयऊ।। व्याख्या : इसलिए हे आत्मा रूपी राम! आप आज संयम का पालन कीजिए जिससे कुशलतापूर्वक चित रूपी राजा देह भाव से मुक्त होकर आत्मोन्मुखी हो सके। इस प्रकार विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव आत्मा रूपी राम को सिखावन (बल) देकर चित रूपी राजा दसरथ के पास गए। अब इस अवस्था में आत्मा रूपी राम के हृदय में विस्मय पैदा हो गया। जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।। करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को विस्मय इस बात का हुआ कि सभी भावरत (भरत) लक्षणों को पहचानने वाला (लक्ष्मण) कामादि शत्रुओं का दमन करे वाला (शत्रुघ्न) भाव रूपी भाई एक साथ पैदा हुए हैं अर्थात् एक ही प्राण ऊर्जा से ये सब भाव पैदा होते हैं और सभी भावों का आहार भी एक ही प्राण ऊर्जा से मिलता है तथा भावों का शान्त होना व भावों का क्रीड़ा करना भी एक ही ऊर्जा के स्रोत से होता है। एक ही ऊर्जा के द्वारा भावों की वृति, उपवृति व मिलन आदि होता है और साथा-साथ में भावों में उत्साह व उमंग छा जाती है। इसी बात का आत्मा रूपी राम को विस्मय होता है। बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।। प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।। व्याख्या : विमल वंश अर्थात् प्राण ऊर्जा के अति निर्मल हो जाने का एक यही दोष होता है कि आत्मा से भाव रूपी भाइयों का अलगाव हो जाता है और आत्मा समस्त भाव रूपी समाज का राजा बन जाता है। यह अवस्था प्राण की निर्मलता आने पर साधक स्वयं ही समझ सकात है। क्योंकि जब आत्मा का राज होने लगता है तो अन्य भावों का मोह आत्मा को आकर्षित करने का प्रयास करता है। उसी भाव दशा का यहाँ वर्णन किया गया है। आत्मा में उस समय प्रेमपूर्वक पश्चाताप होने लगता है और साधना में लगे हुए साधक की मन की कुटिलता धीरे-धीरे दूर होने लग जाती है। दो0 तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।। व्याख्या : उस अवस्था में प्रेम व आनन्द में मग्न होता हुआ लक्षणों को जानने वाला लखन भाव प्रकट हो जाता है और सम्मानपूर्वक आत्मा रूपी राम से प्रिय वचनों द्वारा संवाद स्थापित होने लग जाता है। बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।। भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।। व्याख्या : उस अवस्था में अवधी रूपी शरीर में नाना प्रकार के उत्साह व उमंग रूपी बाजे बजने लगते हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। सभी भाव उस समय भावरत रूपी भरत के आगमन की मनोकामना करने लगते हैं कि त्याग रूपी भरत जल्दी आ जाएँ। आत्म चिंतन की उस अवस्था में साधक के मन में आत्म भाव में रत पैदा होने की प्रबल चाह होने लग जाती है। उसी मनोस्थिति को यहाँ लिखा गया है। हाट बाट घर गली अथाईं। कहहिं परसपर लोग लोगाईं।। कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।। व्याख्या : हाट-बाट अर्थात् शरीर के समस्त चक्र व नाड़ियों में भाव रूपी नर-नारी आपस में बातें करने लगते हैं कि काल व लग्न अच्छा है, जिससे हमारी आत्मोन्मुखी होने की इच्छा पूर्ण होगी। कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।। सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता सहित माया रूपी सिंहासन पर बैठेंगे अर्थात् माया को वश में कर लेंगे, तब चित की चेतना के अनुसार सब कुछ होने लग जायेगा। परन्तु देव भाव अर्थात् भोग वासना के भाव इस अवस्था में विघ्न डालना चाहते हैं, इसलिए अज्ञान रूपी रात्रि के आने की बाट देखते हैं। तिन्हहि सौहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।। सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।। व्याख्या : भोग रूपी देव भावों का अवधी रूपी शरीर का उत्सव अच्छा नहीं लगता है, जैसे काम रूपी चोरों को ज्ञान रूपी चाँदनी रात अच्छी नहीं लगती है। तब स्वरों रूपी सरस्वती को मनाकर देव रूपी भाव बार-बार भोगों में रमण करने के प्रयास करने लगते हैं। दो0 बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु। रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।। व्याख्या : सभी देव भाव सरस्वती रूपी माता को मनाते हुए कहते हैं कि हे माता! हमारी विपत्ति को देखकर (देव भावों के लिए विरक्ति का आना ही विपत्ति के समान होता है) आप ऐसा कीजिए जिससे आत्मा रूपी राम राज का त्याग करके वन को चले जाएँ अर्थात् भोग भावों को आत्मोन्मुखी नहीं होना पड़े जिससे भोगों के आनन्द को लिया जा सके। उसी भाव अवस्था को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।। देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।। व्याख्या : देव भावों की ऐसी प्रार्थना सुनकर स्वरों की गति में पश्चाताप होने लगता है, उसी को सरस्वती का पश्चाताप करना बताया गया है। यह अवस्था वैसी ही होती है जैसे आनन्द रूपी कमलों पर अज्ञान रूपी बर्फ पड़ गयी हो। तब स्वरों की गति को देखकर पुन: देव भाव कहते हैं कि हे सरस्वती माता! आपका इसमें कोई खोट नहीं है। बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।। जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो विस्मय व हर्ष से रहित हैं। तुम तो आत्मा के प्रभाव को जानती हो। जीव तो कर्म के वशीभूत होकर सुख-दु:ख भोगता है। इसलिए आप तो शरीर के भोग भावों के हित के लिए आत्मा रूपी राम को वन में भेज दीजिए। बार-बार गहि चरन सँकोची। चली बिचारी बिबुध मति पोची।। ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।। व्याख्या : तब बार-बार देव भावों की विनती से स्वरों की गति में बदलाव होने लगता है। उस अवस्था में स्वरों में संकोचन होने लगता है। उसी को देव भावों की बुद्धि को मलिन जानकर सरस्वती अर्थात् स्वरों की गति का चलना बताया गया है। देव भावों का निवास तो ऊँचा होता है अर्थात् देखने पर तो उच्च कोटि के भाव लगते हैं परन्तु इनकी करणी ओछी होती है। देव भाव कभी भी पराई विभूति को देख नहीं पाते हैं अर्थात् प्रकृति से परे जो ऐश्वर्य होता है उस पर अ विभूति उ परम ऐश्वर्य को देख नहीं पाते हैं। आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी।। हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।। व्याख्या : परन्तु सरस्वती (स्वरों की गति) आगे का कार्य विचार करके कि कुशल कवि मेरी चाह करेंगे अर्थात् परम अनुभूति को लिखने के लिए मेरी कामना करेंगे इसलिए हर्षपूर्वक स्वरों की गति (सरस्वती) चित रूपी दसरथपुर में आई। वह उस समय ऐसे लग रही थी कि मानो कठिन ग्रहों की दशा दु:ख देने के लिए आयी हो। जब वासनाओं का त्याग करके स्वरों की गति आगे बढ़ती है, तो प्रारम्भ में साधक को सुखद नहीं लगती है। उसी भाव अवस्था को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। दो0 नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।। व्याख्या : स्वरों की गति से मन के भावों का मंथन होना शु डिग्री हो जाता है। मन के मंथन से मंदबुद्धि जो कि कैकई रूपी रजोगुणी वासनाओं की दासी होती है पर प्रभाव पड़ने लग जाता है अर्थात् मंद बुद्धि वासनाओं को प्रबल करने का प्रयास करती है, जिससे आत्मा रूपी राम का राजतिलक न हो सके। इसी को मंथरा का अपयश कहा गया है। दीख मंथरा नग डिग्री बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा ।। पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।। व्याख्या : मन के मंथन से उत्पन्न मन्दमति रूपी मंथरा ने जब देह रूपी नगर की सजावट को देखा और सुन्दर मंगल गान बजते सुना तो भाव रूपी लोगों से पूछा कि ये इतना उत्साह किसलिए है? तब आत्मारूपी राम के राजतिलक की बात सुनकर मन्दमति रूपी मंथरा को बहुत जलन हुई। करइ बिचा डिग्री कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।। देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।। व्याख्या : कुबुद्धि रूपी मंथरा विचार करने लगती है कि किस प्रकार से अकाज हो अर्थात् आत्मा रूपी राम का जिससे राजतिलक नहीं हो। कुबुद्धि के भाव को हमेशा भोग वासनाएँ ही अच्छी लगती हैं। अत: वो हमेशा यही प्रयास करती है कि जिससे आत्मोन्मुखी अवस्था न आ पाए। वह आत्मोन्मुखी अवस्था रूपी शहद को वैसे ही चुराना चाहती है जैसे भीलनि मधुमक्खी के छत्ते को देखकर घात लगाती है कि कैसे इसे उखाड़ लूँ? भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कहि हँसि रानी।। उत डिग्री देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।। व्याख्या : कुबुद्धि रूपी मंथरा रजोगुणी रूपी कैकयी के पास रोती हुई गयी। तब रजोगुण रूपी रानी ने हँसकर पूछा कि उदास क्यों हो? तब मन्दमति रूपी मंथरा ने कोई उत्तर नहीं दिया और लम्बे श्वास ले लेकर नारी चरित्र करके आँसू गिराने लगी। हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।। तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ श्वास कारि जनु साँपिनि।। व्याख्या : तब रजोगुण रूपी कैकयी ने हँस कर कहा कि तू बढ़-बढ़कर बोलती है इसलिए लगता है तुमको लखन रूपी लक्ष्मण ने दण्ड दिया है। अर्थात् लक्षणों को जानने वाले भाव ने तेरा मर्म जान लिया है। तब भी वह कुबुद्धि रूपी महापापिनि दासी कुछ भी नहीं बोली तथा ऐसे श्वास छोड़ रही थी मानो काली नागिन फूफकार रही हो। दो0 सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।। व्याख्या : उस अवस्था में रजोगुणी रूपी कैकयी रानी ने डरती हुई मंथरा से पूछा कि अरी! कहती क्यों नहीं है? राम, राजा, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न कुशल तो हैं? अर्थात् रजोगुणी रानी अन्दर से डरी हुई होकर आत्मा रूपी राम, स्थूल शरीर रूपी राजा दसरथ, लक्षणों को जानने वाला लक्ष्मण व कामादि शत्रुओं का नाश करने वाले शत्रुघ्न का कुशल जानना चाहती है। यह भाव देखकर मन्दबुद्धि (कुबुद्धि) रूपी मंथरा के हृदय में जलन हो उठती है। कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।। रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।। व्याख्या : मन्दगति रूपी मंथरा कहती है कि मुझे कौन दण्ड देगा और मैं बड़ी-बड़ी बातें भी किसके बल पर करूँगी? आज आत्मा रूपी राम को छोड़कर कुशल कौन है? आज चित रूपी राजा उन्हें युवराज बना रहा है। भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।। देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।। व्याख्या : आज कौशल्या रूपी सुष्मना नाड़ी के लिए सब क्रियाएँ अनुकूल हो गयी हैं। उस अवस्था को देखने पर हृदय में गर्व नहीं रह पाता है। तुम स्वयं क्यों नहीं उस शोभा को देख लेती हो, जिसे देखकर मेरे मन में क्षोभ हुआ है। यहाँ क्षोभ का कारण यह है कि भोगों वाली मन्द बुद्धि को आत्मोन्मुखी अवस्था कभी भी अच्छी नहीं लगती है। पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।। नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।। व्याख्या : तुम्हारा पुत्र विदेश में है अर्थात् रजोगुणी रुपी रानी का त्याग रूपी भरत पुत्र विदेश में है अर्थात् उदासीन है और तुम केवल ये जानती हो कि चित रूपी राजा तुम्हारे वश में है। तुमको तो तुरीया अवस्था में नींद (अर्थात् तुरीया अवस्था में रजोगुण सुप्त हो जाता है) बहुत प्रिय लगती है, परन्तु तुम चित रूपी राजा की चतुराई नहीं जानती हो। चित रूपी राजा की चतुराई यह है कि तुरीया अवस्था में प्रवेश करने पर फिर भोगों की तरफ नहीं लौटता है। वही अवस्था रजोगुणी रूपी रानी के लिए चित रूपी राजा का कपट होता है। सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।। पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।। व्याख्या : रजोगुणी रूपी रानी अपने अनुकूल प्रिय वचन सुनकर परन्तु मलिन बुद्धि जानकर डाँटती हुई बोली कि हे घरफोड़ी अर्थात् भेद बुद्धि! पुन: ऐसा कभी मत कहना। वरना तेरी जीभ निकलवा दूँगी। दो0 काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरत मातु मुसुककानि।।14।। व्याख्या : कानों, लंगड़ों व कुबड़ों को कुटिल और कुचाली जानना चाहिए। वास्तव में जो मंदबुद्धि या कुटिल बुद्धि होती है वो कानों, लंगड़ों व कुबड़ों में ही आती है। बुद्धि स्त्रीलिंग होती है और वासनाओं की दासी होती है, इसलिए मंथरा रूपी कुबुद्धि को ये सब संज्ञा दी गयी है। ऐसा कहकर रजोगुणी रूपी कैकयी मुस्कुरा दी। रजोगुण कैकयी के मुस्कराने का कारण यह है कि रजोगुण को भी मंथरा रूपी कुबुद्धि ही प्रिय लगती है। परन्तु रजोगुण की एक विशेषता यह होती है कि वह ऊपर से सात्विक दिखने का प्रयास करता है। यहाँ पर उसी भाव अवस्था को लिखा गया है। प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।। सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।। व्याख्या : तब रजोगुणी भोगवासना रूपी कैकयी बोली कि हे प्रिय बोलने वाली मंथरा! मैंने तो तुम्हें यह शिक्षा (सीख) दी है। मुझे तो स्वपन में भी तुम पर क्रोध नहीं आता है। यह वास्तविकता भी है कि रजोगुणी भोगवासना कुबुद्धि पर कभी क्रोध नहीं कर पाती है। परन्तु रजोगुण की सहज वृति अपने-आपको सात्विक दिखाने की होती है, इसलिए रजोगुणी भोगवासना रूपी कैकयी कहती है कि अच्छा दिन मंगल करने वाला तब होगा, जब तेरा कहा अर्थात् आत्मा रूपी राम का राजतिलक होगा। अर्थात् जब समस्त भाव आत्मोन्मुखी होंगे। जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।। राम तिलक जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।। व्याख्या : बड़ा भाई स्वामी और छोटे भाई सेवक होना ही सूर्यवंश की परम्परा होती है। अर्थात् आत्मोन्मुखी होना ही जीव का ध्येय होता है। आत्मोन्मुखी होने पर ही परम ज्ञान के सूर्य का प्रकाश होता है। अगर आत्मारूपी राम का सत्य ही राजतिलक हो रहा है तो मैं तुम्हें मन पसन्द वर दूँगी। जब जीव के समस्त भाव आत्मोन्मुखी होने लगते हैं तो राजसिक इच्छाएँ भी पूर्ण होने लग जाती हैं। उसी को मन पसन्द वर देना कहा गया है। कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।। मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को सभी नाड़ियों रूपी माताएँ कौशल्या (सुष्मना) के समान ही होती हैं। आत्मा रूपी राम को तो पिंगला नाड़ी रूपी कैकयी पर विशेष स्नेह होता है। इस प्रेम की मैंने परीक्षा करके देखा है। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है क्योंकि रजोगुण का संचार पिंगला नाड़ी के माध्यम से होता है, जो आत्मतत्व को मोह के भावों से आच्छादित करने लगता है। मोह से उत्पन्न आसक्ति ही कैकयी की प्रेम परीक्षा होती है। जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।। प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह के तिलक छोभु कस तोरें।। व्याख्या : अगर किसी क्रिया (विधि) द्वारा परमात्मा की कृपा से भावों की उत्पत्ति (जन्म) हो तो आत्मा रूपी पुत्र (भाव) और सुरता रूपी पुत्रवधु ही पैदा हो अर्थात् अगर भाव पैदा हो तो आत्मोन्मुखी ही होने चाहिये। आत्मा रूपी राम तो मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं। तब तुम्हें आत्मोन्मुखी (राजतिलक) होने पर दु:ख क्यों हो रहा है? दो0 भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।। व्याख्या : तब रजोगुणी रूपी कैकयी मन्दबुद्धि रूपी वासनायुक्त बुद्धि से पूछती है कि तुम सत्य बताओ तुमको भावरत रूपी भरत की शपथ है। इसलिए वासनाओं के कपट को छोड़कर बताइये कि तुम्हें हर्ष के समय दु:ख क्यों हो रहा है? अर्थात् जब समस्त भाव आत्मोन्मुखी हो रहे हैं तो फिर तुमको क्लेश क्यों हो रहा है? वास्तविकता में यही होता है जब साधक के भाव आत्मोन्मुखी होने लगते हैं तो कुबुद्धि रूपी वासना युक्त मंथरा भयभीत होकर दु:खी हो जाती है कि अब भोगों का क्या होगा? परमात्मा के भजन से क्या लाभ होगा? संसार में क्या मिलेगा? आदि-आदि व्यर्थ के प्रश्न साधक के मन में कुबुद्धि रूपी मंथरा उठाने लगती है। यहाँ पर उसी भाव दशा का वर्णन किया गया है। एकहि बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।। फोरै जोगु कपा डिग्री अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।। व्याख्या : मन्दमति रूपी मंथरा बोली कि एक बार कहने पर ही सब आशा पूरी हो गयी अर्थात् मेरी बात को माना नहीं अत: अब तो दूसरी जीभ से ही कुछ कहूँगी। आगे की चौपाई में बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि जब योग सधने लगता है (फौरे जोगु) तो वासनायुक्त बुद्धि के भाव को लगने लगता है कि क्या होगा? अर्थात् सांसारिक भोग तो मिट जायेंगे। इसलिए उसे ही कपा डिग्री अभागा अर्थात् कपाल (भृकुटि) में ध्यान लगने पर अभोग (भोगों के त्याग) की अवस्था में आ जायेगी। योग की साधना को कहते तो सभी अच्छा हैं परन्तु प्रारम्भ में दु:ख का सा आभास होता है। उसे ""दु:ख रउरेहि लागा"" बोलकर लिखा है। कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करूइ मैं माई।। हमहुँ कहब अब ठकुर सोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।। व्याख्या : इसलिए मैं (मन्दमति मंथरा) भी झूठी बात बनाकर ही अब कहूँगी, जिससे तुम खुश रहो अर्थात् जिससे रजोगुण का भाव प्रसन्न रहे। अब मैं (मंदगति) भी आत्मोन्मुखी बातें ही कहूँगी। वरना मैं रात-दिन चुप रहूँगी। साधना में यह अवस्था प्रत्येक साधक के सामने आती है कि जब मंदबुद्धि (वासनायुक्त बुद्धि) की बात को रजोगुण का भाव नहीं सुनता है तो मन्दबुद्धि का भाव या तो शान्त होने लग जाता है या फिर आत्मोन्मुखी ही बातें करना लग जाता है। करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।। कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।। व्याख्या : हमको तो (मन्दबुद्धि) कुरूप करके अर्थात् वासनायुक्त करके बिधि ने (क्रिया) प्रकृति के वश (पर अ बस उ प्रकृति के वश में) कर दिया है। इसलिए आपतो अर्थात् रजोगुणी भाव आत्मोन्मुखी होकर हमारे जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहा है। कोई भी राजा क्यों ना हो हमें क्या हानि है? हम (मंदबुद्धि) तो दासता छोड़कर रानी नहीं बन सकते हैं। अर्थात् अगर आत्मोन्मुखी अवस्था आ भी जायेगी तो हम तो वही दासी ही रहेंगे अर्थात् मंदबुद्धि तो दासी ही बनी रहेगा। जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।। तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।। व्याख्या : हमारा तो अर्थात् मंदबुद्धि का तो योग से जलने का ही स्वभाव है अर्थात् मंदबुद्धि को तो कभी भी परमात्मोन्मुखी अवस्था अच्छी नहीं लगती है क्योंकि मंदबुद्धि रजोगुणी भोगों में आनेवाली बाधा को नहीं देख पाती है। इसलिए हमने उसी के अनुसार कुछ बातें कहीं है अर्थात् भोगों में आनेवाली खलल के बारे में आपको चेताया है। मेरी इस भूल को क्षमा कर दीजिए। दो0 गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि।।16।। व्याख्या : तब उस अवस्था में अधर बुद्धि अर्थात् दोनों तरफ को आकर्षित रहने वाली रजोगुणी रानी ने गूढ़ व कपट अर्थात् वासनाओं से युक्त गूढ़ बातों को सुनकर तीय अर्थात् तीनों गुणों में रमन करने वाली रजोगुणी रूपी रानी ने स्वरों के माध्यम से उत्पन्न भावों (सुरमाया) को अपना हितैषी जानकर विश्वास कर लिया अर्थात् रजोगुणी रूपी रानी मंदबुद्धि रूपी मंथरा पर विश्वास कर ली। सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।। तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।। व्याख्या : तब रजोगुणी रूपी कैकयी बार-बार मंदबुद्धि रूपी मंथरा से पूछने लगती हैं। जैसे सबरी अर्थात् संतोष के भाव पैदा होने पर इच्छा रूपी मृग मोहित हो जाते हैं यानी इच्छाएँ वश में हो जाती हैं वैसे ही मंदबुद्धि रूपी मंथरा के प्रभाव में रजोगुण रूपी कैकयी मोहित हो गयी। क्योंकि यह भाव विज्ञान है कि जैसे भाव होते हैं (भावी) वैसी ही बुद्धि पैदा हो जाती है क्योंकि भावों के अन्तर्द्वन्द्व से ही तो बुद्धि पैदा होती है। इसलिए ऐसी अवस्था में वासनायुक्त मंदबुद्धि शिकार का घात लगाकर तैयार रहती है अर्थात् गुणों को वासना के वश में करने के लिए घात लगाकर रहती है। तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ।। सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।। व्याख्या : तुम हमको पूछ रही हो परन्तु हमें कहने में डर लग रहा है क्योंकि तुमने पहले ही हमारा नाम घर फोड़ी रख दिया है। इस प्रकार ऊपर वैराग्य पूर्ण हाव-भाव दिखाकर जब रजोगुणी रूपी कैकयी को छल लिया अर्थात् अपने वश में कर लिया, तब अवधी रूपी शरीर के लिए साढ़े साती दशा के समान मंदबुद्धि रूपी मंथरा बोली। प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।। रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरे रिपु होहिं पिरीते।। व्याख्या : हे रजोगुणी रूपी रानी! तुमने कहा है कि आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता तुम्हें बहुत प्रिय हैं और आत्मारूपी राम को भी तुम प्रिय हो। यह बात सत्य है। परन्तु ये बात पहले सत्य थी परन्तु अब स्थिति बदल गयी है क्योंकि समय बदलने पर अपने प्रिय भी दुश्मन हो जाते हैं। यहाँ पर साधना का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। वास्तविकता में यही होता है कि जब साधक साधना शु डिग्री करता है, तो उसकी रजोगुण पर बहुत प्रीत होती है और सुरता भी भोगों पर ही लगी रहती है। उसी अवस्था को राम-सीता की कैकयी पर प्रीत बताया गया है। परन्तु जब साधना परिपक्व हो जाती है तो सुरता परमात्मा में लग जाती है और भोगों के प्रति उदासीन हो जाती है। अत: मंदबुद्धि रूपी मंथरा अब कैकयी रूपी रजोगुणी रानी को समझाती है कि अब पहले जैसी बात नहीं है क्योंकि जो सुरता भोगों से हठकर परमात्मा में लग जायेगी, तो वही रजोगुण के लिए शत्रु का काम करेगी। भानु कमलकुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।। जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।। व्याख्या : जैसे सूर्य कमल का पोषण करने वाला होता है परन्तु जल सूख जाने पर वही सूर्य कमल को सूखा डालता है। वैसे ही आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता भोगों को बढ़ाने वाले होते हैं परन्तु वासना रूपी जल सूख जाने पर ये भी कमल रूपी भोगों को जला डालेंगे। उससे तुम्हारी अर्थात् रजोगुण की समस्त इच्छाएँ वृतियोंे सहित नष्ट हो जायेंगी। इसलिए बलपूर्वक वासना रूपी जल को रोकने का प्रयास करो। दो0 तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ।।17।। व्याख्या : हे रजोगुण रूपी रानी तुमको सोहाग (अर्थात् सो अ हाग यानी श्वास के बल पर चित का वश में होना) के बल पर चित रूपी राजा अपने वश में लगता है परन्तु चित रूपी राजा मन का मलीन है व मीठा बोलने से सरल स्वभाव का लगता है। चित तो जो भाव प्रबल होते हैं उन्हीं के अनुरूप हो जाता है, इसलिए सरल स्वभाव की संज्ञा दी गयी है। चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।। पठए भरतु भूप ननि अउरें। राम मातु मत जानब रउरें।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता बहुत चतुर है इसलिए आत्मा रूपी राम को ईड़ा व पिंगला नाड़ियों के बीच में अर्थात् सुष्मना नाड़ी में पाकर अपनी बात बना ली। कौशल्या सतोगुण का प्रतीक है इसलिए जब सुष्मना में प्राण व सुरता प्रवेश करते हैं तो सभी भाव आत्मोन्मुखी होने लगते हैं। उसी को कौशल्या का बात बना लेना बताया गया है। भावरत रूपी भरत को तो ननिहाल में भेज दिया और आत्मा रूपी राम की माता चित रूपी राजा का मत जानती थी। भरत का ननिहाल जाने का मर्म यह है कि समस्त वासनाएँ उदर से ही पैदा होती है। अत: जब उदर की वासनाओं में भावरत का भाव दृढ़ हो जाता है तो उसी को भावरत रूपी भरत का उदर रूपी ननिहाल कहा गया है। रजोगुण की उत्पत्ति भी उदर से ही होती है इसलिए उदर रूपी कैकय देश ही कैकयी का पिहर कहलाता है। सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी के।। सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।। व्याख्या : रजोगुणी रुपी कैकयी तो चित रूपी राजा के बल पर गर्वित रहती है कि उसे समस्त वृतियाँ (सवति) अच्छी तरह से प्रेम करती हैं। मंदबुद्धि रूपी मंथरा कहती है कि तुम्हारी (रजोगुण) दुश्मन तो सतोगुणी रूपी कौशल्या है जो कपट को प्रकट नहीं होने देती हैं। रजोगुण को सबसे ज्यादा खतरा सतोगुण से ही होता है क्योंकि सतोगुण अति प्रबल होने पर समस्त भाव आत्मोन्मुखी होने लग जाते हैं। परन्तु सतोगुण का मोह रजोगुण पर बना ही रहता है। इसी को कपट का प्रकट नहीं होने देना बोलकर लिखा गया है। राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहीं देखी।। रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।। व्याख्या : तुम पर अर्थात् रजोगुण पर चित रूपी राजा का विशेष स्नेह होता है इसलिए सात्विक वृतियाँ उस स्नेह को देख नहीं पाती हैं। इसलिए प्र अ पंच अर्थात् प्रकृति के पाँच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश को निर्मल करके चित रूपी राजा से आत्मारूपी राम के राजतिलक की घोषणा करा ली। यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।। आगिलि बात समुझि ड डिग्री मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।। व्याख्या : यह तो जीव रूपी कुल की रीति होती है कि उसे परमात्मोन्मुखी होना चाहिये। जीव का परमात्मोन्मुखी होना सभी को अच्छा लगता है और मुझे भी यह अच्छा लगता है। परन्तु मुझे (मंदबुद्धि को) तो आगे बात जानकर डर लगता है कि फिर तो देव जो करेगा वही फल होगा। दो0 रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।। व्याख्या : नाना प्रकार से मन्दबुद्धि रूपी मंथरा ने कुटिलपन करके रजोगुणी रूपी कैकयी को कपट के भावों का आभास करा दिया और नाना प्रकार की वृतियों की बात कह-कह कर कौशल्या रूपी सतवृति से भेद बढ़ा दिया। अर्थात् रजोगुण को भोगवासना में दृढ़ करा दिया। भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।। का पूँछहु तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।। व्याख्या : भावों की प्रबलता के कारण रजोगुणी रूपी कैकयी के हृदय में भोगवासनाओं के प्रति विश्वास हो गया। अत: रजोगुण रूपी कैकयी ने पुन: शपथ दिलाकर पूछा अर्थात् मन के मंथन के समय रजोगुणी भाव बार-बार द्वन्द्व करने लगते हैं। उसी भाव अवस्था का यहाँ प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। तब मन्दबुद्धि रूपी मंथरा बोली कि बार-बार क्या पूछती हो। अपना हित अनहित तो पशु-पक्षी भी जानते हैं। भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।। खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।। व्याख्या : मन्दबुद्धु रूपी मंथरा बोली कि भाव रूपी समाज को आत्मोन्मुखी होने के लिए सजते हुए एक पक्ष हो गया परन्तु तुमने तो सबसे पहले मुझसे ही खबर पायी है। हे रजोगुणी रूपी कैकयी! मैं तो अर्थात् मन्दबुद्धि तो तुम्हारे राज में ही खाती-पीती हूँ इसलिए सत्य कहने में कोई दोष नहीं है। अर्थात् वासनायुक्त मन्द बुद्धि को तो राजसिक अवस्था से बल मिलता है। इसलिए राजसिक सत्ता की रक्षा का प्रयास करने का मन्द बुद्धि के लिए दोष नहीं लगता है। जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।। रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।। व्याख्या : अगर मैं (मन्द बुद्धि) कुछ बनाकर असत्य कहूँ तो विधि (क्रिया) मुझको दण्ड देगी। इसलिए अगर आत्मारूपी राम का शरीर रूपी कलि (यंत्र) पर राज हो गया, तो तुम भोग रूपी रानी के लिए विपत्ति का बीज लग जायेगा अर्थात् भोग सम्भव नहीं हो पायेंगे। रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।। जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।। व्याख्या : इसलिए मैं (मन्द बुद्धि) रेखा खींच कर कहती हूँ कि तुम्हारी (रजोगुण) अवस्था वैसी ही हो जायेगी जैसे दूध में पड़ी हुई मक्खी की हो जाती है। अगर तुम भावरत रूपी भरत पुत्र सहित सेवा करोगी तो ही तुम रह पावोगी वरना दूसरा कोई उपाय नहीं है। दो0 कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।। व्याख्या : जैसे वासना की लालसा विनती के भाव को नचाती है, वैसे ही आत्मा रूपी राम का राज हो जाने पर सतोगुण रूपी कौशल्या रजोगुण रूपी कैकयी को नचायेगी। उस अवस्था में भावरत रूपी भरत भी स्वत: ही आत्मोन्मुखी भावों का बन्दी हो जायेगा तथा लक्षणों का लखने वाला लखन प्रेमपूर्वक आत्मोन्मुखी हो जायेगा। कैकयसुता सुनत कटुबानी। कहि न सकइ कछु सहम सुखानी।। तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।। व्याख्या : रजोगुण रूपी कैकयी मन्द बुद्धि रूपी मंथरा की कटु बानी अर्थात् विपरीत बातें सुनकर सहम गयी अर्थात् पूरी तरह भ्रम में पड़ गयी और शरीर में पसीना आ गया और प्राण वायु केले के पत्तों के समान काँप उठी। जब रजोगुणी भाव भोग विरुद्ध बातें सुनता है तो शरीर में कम्पन हो उठता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। उस अवस्था में मन्द बुद्धि रूपी मंथरा अपने-आपको दृढ़ करने का प्रयास करती है। उसी को ""जीभ तब चाँपी"" बोलकर लिखा है। कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।। फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।। व्याख्या : तब मन्दबुद्धि रूपी मंथरा ने नाना प्रकार की (कोटिक अर्थात् स्तर की) कपटपूर्ण कहानी कह-कहकर रजोगुणी रूपी कैकयी को धैर्य बँधाया। जब मन्दबुद्धि की प्रबलता से कपट के भाव प्रबल होने लग जाते हैं तो प्राण की गति बदल जाती है अर्थात् अपान वायु प्रबल हो उठती है, जिससे कुचाल के भाव ही प्रिय लगने लग जाते हैं। जैसे बगुले को ही हंस मानकर सराहना करने लगे हो। सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।। दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।। व्याख्या : उस अवस्था में रजोगुणी रूपी कैकयी कुबुद्धि रूपी मंथरा से कहने लगती है कि तेरी बात सत्य है क्योंकि बहुत दिनों से मेरी दाहिनी आँख फड़क रही है और रात में मुझे नाना प्रकार के बुरे सपने आते हैं परन्तु मोह के कारण मैंने तुझे नहीं बताया। वास्तव में दाहिने अंगों में दैवीय भावों का निवास होता है और बाँयें अंगों में आसुरी भाव निवास करते हैं। अत: रजोगुण के भाव के लिए दाहिने अंगों का फड़कना अशुभकारी लगता है क्योंकि दाहिने अंगों का फड़कना तो दैवीय सम्पद को बढ़ाने वाला होता है। काह करौं सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।। व्याख्या : हे मन्द बुद्धि रूपी सखी! मैं क्या करूँ? मेरा तो स्वभाव ही सरल है। इसलिए मैं (रजोगुणी) तो दाहिना व बाँया अर्थात् हित अनहित को नहीं जानती हूँ। दो0 अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह। केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।। व्याख्या : रजोगुणी रूपी कैकयी कहती है कि मैं तो कभी मेरे बल पर चली ही नहीं हूँ और मैंने कभी भी किसी का बुरा भी नहीं किया है। परन्तु फिर भी न जाने किस पाप के कारण से मुझे यह दु:ख दिया जा रहा है। वास्तव में रजोगुण का स्वभाव यही होता है कि वो स्वयं के बल पर कभी नहीं चलता है। वो तो बुद्धि के भावों के अनुसार ही चलता है और रजोगुण तो केवल भोग भोगने के लिए ही बढ़ता है। उसी को ""अनभल काहुक कीन्ह"" बोलकर लिखा गया है। नैहर जनमु भरब ब डिग्री जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई।। अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।। व्याख्या : मैं (रजोगुणी रूपी कैकयी) चाहे जन्म भर पिहर में रह लूँगी अर्थात् शान्त हो जाऊँगी परन्तु कभी भी सतवृति रूपी कौशल्या की सेवा नहीं करूँगी। विपरीत अवस्था में जीने से तो मरना अच्छा होता है। वास्तव में रजोवृति कभी भी सतोवृति के अनुसार नहीं चल सकती है। वे चाहे साथ-साथ भले ही रह लें परन्तु रजवृति सतवृति के अधीन कभी नहीं रह सकती है। उसी को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। दीन बचन कह बहु बिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।। अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।। व्याख्या : रजोगुणी रूपी कैकयी के दीन वचनों (समर्पण करने की भावना) को सुनकर कुबुद्धि रूपी मंथरा ने तीन गुणों में माया के भावों का प्रभाव कर दिया। हे रजगुण रुपी रानी! तुम ऐसे छोटा मन मत करो। तुम को दिन दूना सुख व भोग मिलेगा। कुबुद्दि ही रजोवृति को भोगवासना की तरफ खींचने का प्रयास करती है और कुबुद्धि के प्रभाव में आकर शान्त रजोवृति भी भोगवादी होकर अशान्त हो जाती है। जेहि राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।। जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनी। भूख न बासर नीद न जामिनि।। व्याख्या : जो चित रूपी राजा ने आपका (रजोगुण) बुरा किया है तो उसका फल भोगना पड़ेगा अर्थात् चित रूपी राजा को विचलित होना पड़ेगा। मैंने (कुबुद्धि रूपी मंथरा) जब से यह कुमत अर्थात् सत्ववृति के प्रभाव में आकर चित्त रूपी राजा ने समस्त भावों को आत्मोन्मुखी कर दिया है, तब से मुझे दिन में भूख नहीं लगती है और रात को नींद नहीं आ रही है। जब भाव आत्मोन्मुखी होने लगते हैं तो कुबुद्धि व्याकुल हो उठती है। उसी भाव दशा को यहाँ लिखा गया है। पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।। भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।। व्याख्या : मैंने (कुबुद्धि रूपी मंथरा ने) तीनों (सत, रज व तम) गुणों में बरतकर देखा है और सभी गुणों ने यह बात दृढ़ता से कही है कि भावरत रूपी भरत ही भावों रूपी समाज का राजा बनेगा और यह बात सत्य भी है क्योंकि भावरत का भाव ही राजा की तरह प्रभावी होता है। अत: हे रजोगुण रूपी रानी! तुम एक उपाय करो क्योंकि चित रूपी राजा तो तुम्हारी सेवा के अधीन है। दो0 परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।। व्याख्या : रजोगुण की वृति सदैव कुबुद्धि की बातों पर विश्वास कर लेती है और कुबुद्धि के प्रभाव में आकर त्याग रूपी पुत्र व चित रूपी पति को भी भुला देती है। क्योंकि कुबुद्धि रूपी मंथरा तो रजोगुणी भोगवासनाओं को प्रबल करने के लिए ही प्रेरित करती रहती है। अत: रजोगुणी रूपी कैकयी कैसे कुबुद्धि की प्रेरणा के अनुसार नहीं करेगी अर्थात् रजोगुणी वृति कुबुद्धि के अनुसार चलने को बाध्य हो जाती है। कुबरीं करि कबुली कैकई। कपट छुरी उर पाहन टेई।। लखइ न रानि निकट दुखु कैसें। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।। व्याख्या : कुबुद्धि रूपी मंथरा ने रजोगुणी रूपी रानी को अपने वश में कर लिया और कपट रूपी छुरी को हृदय रूपी पत्थर पर घिसने लगी। उस अवस्था में रजोगुणी रूपी रानी कुबुद्धि के संग से होने वाले दु:ख को वैसे ही नहीं देख पा रही है, जैसे बलि का बकरा हरी-हरी घास को चरता हुआ अपने काल को नहीं देख पाता है। सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी ।। कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।। व्याख्या : कुबुद्धि रूपी मंथरा वासना रूपी मधुर बातें सुनाती है जैसे शहद में घोर जहर मिला हुआ हो। तब मंथरा रूपी दासी बोली कि हे रानी! आपको याद है कि नहीं आपने ही मुझे एक बात बतायी थी अर्थात् रजोगुण के भावों के द्वन्द्व से ही कुबुद्धि पैदा होती है तथा भोग वासना से ही कुबुद्धि को बल मिलता रहता है। दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।। सुतहि राजु रामहि बनबासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू।। व्याख्या : तुम्हारे दो वरदान चित रूपी राजा के पास अमानत के रूप में रखे हुए हैं। अत: आज उन वरदानों को माँगकर अपनी छाती को ठण्डा कर लो। रजोगुण की द्वैत वृति ही चित के पास रखे दो वरदान हैं। अर्थात् रजोगुण की एक वृति तो भोग भोगना चाहती है और दूसरी वृति आत्मोन्मुखी होना चाहती है। इसलिए कुबुद्धि रूपी मंथरा कहती है कि भावरत रूपी भरत पुत्र के लिए राजा का पद माँग लो अर्थात् भावरत का भाव रखते हुए भोगों को भोग लो और आत्मारूपी राम को वनवास माँग लो अर्थात् आत्मारूपी राम अर्थात् प्राण निर्मल होकर निर्लिप्त अवस्था में रहें ऐसी अवस्था को प्राप्त कर लो। यहाँ पर अनुभवों को सूक्ष्मता से समझने की आवश्यकता है। साधना में साधक के सामने यह अवस्था जरूरी आती है, जिसमें रजोवृति भोगों को भी छोड़ना नहीं चाहती और दूसरी तरफ आत्मोन्मुखी भी होना चाहती है। उसी भाव अवस्था का यहाँ प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। भूपति राम शपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।। होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।। व्याख्या : हे रजोगुण रूपी रानी! जब चित रूपी राजा आत्मा रूपी राम की शपथ खा लें तबी वरदानों को माँगना। जिससे चित रूपी राजा वचनों से हटेगा नहीं। यहाँ गम्भीर साधना का रहस्य छुपा हुआ है। जब चित की वृति चित में लीन होकर चित को स्थिर करने लगती हैं तो उस अवस्था में त्यागवृति प्रबल हो उठती है और दूसरी तरफ आत्मोन्मुखी वृति भी प्रबल हो उठती है। उसी अवस्था में रजोगुण रूपी रानी को वर माँगने की कुबुद्धि रूपी मंथरा सलाह देती है। कुबुद्धि कहती है कि अगर आज रात बीत गयी तो कार्य नहीं बनेगा अर्थात् चित चंचल हो गया तो बात नहीं बनेगी। इसलिए मेरे वचनों को मन लगाकर मानों। दो0 बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु। काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।। व्याख्या : इस प्रकार कुबुद्धि रूपी मंथरा ने विषयों रूपी घात करके रजोगुणी रूपी कैकयी से कहा कि आप कोप भवन (अर्थात् चित के विपरीत हो जाओ) में चली जाओ और सावधानीपूर्वक कार्य को करो, जिससे पश्चाताप नहीं करना पड़े। कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।। तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।। व्याख्या : उस अवस्था में रजोगुण रूपी रानी को कुबुद्धि रूपी मंथरा प्राणों से प्यारी लगने लगती है इसलिए बार-बार कुबुद्धि रूपी मंथरा की सराहना करने लगी और बोली कि तुम्हारे समान संसार में मेरा (रोजगुण) का हित करने वाला कोई नहीं है क्योंकि तुम तो बहती हुई को सहारा बनकर आयी हो। जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरी आली।। बहु बिधि चेरिहि आद डिग्री देई। कोप भवन गवनी कैकई।। व्याख्या : तब रजोगुणी रूपी कैकयी कुबुद्धि रूपी मंथरा को नाना प्रकार से सम्मान देती हुई बोली कि जिस क्रिया से मेरी मनोकामना पूर्ण होगी, मैं वही तुरंत करूँगी। इस प्रकार कह कर रजोगुण रूपी कैकयी कोप भवन में चली गयी अर्थात् जब इच्छा पूर्ण नहीं होने लगती है तो रजोगुण के भावों में क्षोभ पैदा हो जाता है। उसी क्षोभ को कोप भवन बोला गया है। बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकई केरी।। पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।। व्याख्या : वासना विपत्ति बीज का काम करती है और वासनाओं की आसक्ति (गुलामी) ऋतु का काम करती है तथा रजोगुण का कुबुद्धि के संग हो जाना बुआई का काम करता है। कपट रूपी जल पाकर विपत्ति रूपी बीज अंकुरित हो जाता है और द्वैत भाव का परिणाम दु:ख के फल के रूप में प्रकट होता है। कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।। राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।। व्याख्या : रजोगुण के भावों में क्षोभ पैदा हो जाने पर कुभाव रूपी भावों का समाज सज जाता है क्योंकि भोगवासना से रजोगुणी रूपी कैकयी वृति कुबुद्धि के चक्कर में फँस जाती है। चित रूपी राजा के नगर में आत्मोन्मुखी भावों का कोलाहल होने लगता है परन्तु रजोगुण व कुबुद्धि की इस कुचाल को कोई नहीं जान पाता है। दो0 प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।। व्याख्या : आत्मोन्मुखी भावों में आनन्द छाया रहता है तथा शरीर की नर-नाड़ियों में मंगल आचरण की भावना का संचार होने लगता है और चित रूपी राजा के दरबार में भाव लीन व पैदा होने लगते हैं। बाल सखाँ सुनि हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।। प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहि कुसल खेम मृदु बानी।। व्याख्या : आत्मोन्मुखी होने की अवस्था में निर्मल भाव रूपी बाल सखा पाँच दस मिलकर आत्मा में लीन होने के लिए आते हैं। पन्द्रह प्रकृतियों को ही पाँच-दस बाल सखा कहा गया है क्योंकि आत्मोन्मुखी अवस्था जब आने लगती है तो पन्द्रह प्रकृतियों के भाव निर्मल होकर आत्मा में ही लीन होने लग जाते हैं। उस अवस्था में निर्मल प्रेम की भावना को देखकर आत्मा भी प्रकृति के भावों को आत्मसात कर लेती है। उसी को कुशलक्षेम पूछना कहा गया है। फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।। को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेहु निबाहनिहारा।। व्याख्या : सभी प्रकृति के भाव आत्मा में लीन होकर पुन: अपनी सहज अवस्था में लौट आते हैं। उसी को फिरहिं भवन बोलकर लिखा गया है। आत्मा में लीन होकर फिरने पर प्रकृति के भाव अति निर्मल व सहज हो जाते हैं और आत्मा रूपी राम के परस्पर गुणगान करने लग जाते हैं। उस अवस्था में प्रकृति के भावों को समझ में आ जाता है कि आत्मा के बराबर कोई शील व प्रेम का निर्वाह करने वाला संसार में नहीं होता है। जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहुँ ईसु देउ यह हमहीं।। सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।। व्याख्या : तब प्रकृति के भाव कामना करने लगते हैं कि जहाँ-जहाँ पर भी कर्म के वशीभूत होकर हमारा जन्म हो, तो हम सूरता के स्वामी आत्मा रूपी राम के ही सेवक हों। यह निर्मल सम्बन्ध सदैव बना रहे। अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदयँ अति दाहू।। को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।। व्याख्या : ऐसी अभिलाषा शरीर रूपी नगर के सब भावों की हो जाती है परन्तु रजोगुणी रूपी कैकयी के हृदय में जलन होने लगती है। क्योंकि संसार में ऐसा कौन है जो कुसंगत पाकर नाश को प्राप्त नहीं होता है। नीच भावों के संसर्ग में आने पर चतुराई नहीं रह पाती है। दो0 साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहँ। गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।। व्याख्या : संध्या के समय चित रूपी राजा रजोगुणी रूपी कैकयी के घर में गया अर्थात् चित जब थोड़ा शिथिल हुआ तो चित में रजोवृति की अवस्था आयी। उसीको चित रूपी राजा का कैकयी के घर में जाना बताया गया है। उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है मानो स्नेह शरीर धारण करके निष्ठुरता के पास जा रहा हो। कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।। सुरपति बसइ बाँहबल जाकें। नरपति सकल रहहिं रूख ताकें।। व्याख्या : रजोगुणी भावों में क्षोभ की अवस्था को देखकर चित रूपी राजा संकोच में पड़ गए और चित में भय की तरंग सी उठने लग गयी, जिससे चित की चेतना आगे नहीं बढ़ पा रही थी। जिस चित रूपी राजा के वश में स्वरों की गति होती है और नर (धड़कन) की गति भी जिस पर निर्भर करती है। सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।। सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।। व्याख्या : वही चित रूपी राजा रजोवृति रूपी रानी के क्षोभ को देखकर सूख गया। क्योंकि काम की वासना चित को विचलित कर देती है जो चित त्रिगुणों को पैदा करने वाला होता है, वही काम वासना के भावों से आहत हो जाता है। यह बड़ी विडम्बना की बात है कि समस्त गुण चित की तरंगों से ही पैदा होते हैं परन्तु काम के भाव उसी चित को विचलित कर देते हैं। सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।। भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना।। व्याख्या : जब चित में काम वासना का प्रभाव हो जाता है, तो चित में भय के भावों से कम्पन होने लग जाता है। उसी को सभय चित रूपी राजा का रजोगुणी वृति के पास जाना बताया गया है। रजोगुण की दशा को देखकर चित रूपी राजा को बहुत दु:ख होता है। उस अवस्था में रोजगुणी रुपी कैकयी पृथ्वी पर पुराने वस्त्र धारण करके लेटी हुई होती है अर्थात् भोगों की आसक्ति में लिपटी पड़ी होती है। उस अवस्था में हालाँकि शरीर के भोगों की वासना का कुछ सीमा तक त्याग हो जाता है परन्तु मन की आसक्ति बनी रहती है। यह बहुत ही सूक्ष्म अनुभूति का विषय है। कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।। जाइ निकट नृपु कह मृदुबानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।। व्याख्या : कुबुद्धि के प्रभाव से रजोगुणी वृति पर वासनाओं का कुभेष ऐसा लगने लगता है मानो आने वाले भावों में अहिवातु अर्थात् सर्प जैसी वायु (वासनाओं) का प्रभाव होने वाला है। अर्थात् जब रजोगुण कुबुद्धि के प्रभाव में आ जाता है तो सर्प के समान भय देने वाली वासनाओं का आभास होना शु डिग्री हो जाता है। तब चित रूपी राजा ने रजोगुणी रूपी रानी के पास जाकर प्रिय वाणी में कहा कि हे प्रिय! तुम किस कारण रूठी हो अर्थात् किस कारण से रजोगुण के भावों में क्षोभ पैदा हुआ है। छ0 केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई।। दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाह डिग्री देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई।। व्याख्या : हे रजोगुणी रूपी रानी! तुम किसलिए क्रोधित हो रही हो। चित रूपी राजा ने हाथ से स्पर्श करते हुए रजोगुणी वृति को देखा। अर्थात् चित से उत्पन्न तरंग के माध्यम से रजोवृति को स्पर्श किया। उस अवस्था में रजोगुणी वृति ऐसी टेढ़ी नजरों से चित रूपी राजा को देखने लगी मानो क्रोधपूर्वक नागिनि देख रही हो। उस नागिनि के दोनों वासना रूपी वर दाँत व जीभ्या के रूप होते हैं, जो खाने के लिए नरम स्थान खोजती रहती है। तुलसीदास कहते हैं कि नर की धड़कन अर्थात् चित से उत्पन्न भावों को वश में करके रजोवृति काम क्रीड़ा करने लगती है। अर्थात् रजोगुण पर कुबुद्धि का प्रभाव हो जाने पर चित की चेतना (भवतब्यता) में काम के भाव क्रीड़ा करने लगते हैं। सो0 बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि। कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर।।25।। व्याख्या : बार-बार चितरूपी राजा रोजगुणी वृति रूपी कैकयी से कहने लगता है (अर्थात् चित रजोवृति पर आकर्षित होने लगता है) कि हे सुन्दर नेत्रों वाली व कोयल जैसी वाणी वाली! तुम मुझे कारण बताओ कि तुम्हारी हाथी जैसी चाल के होते हुए भी तुम्हारे अन्दर भावों में क्षोभ कैसे पैदा हो गया। यहाँ पर भाव अवस्था को बहुत ही सूक्ष्मता से समझाया गया है। क्योंकि रजोवृति की तरंगें चित की स्थिर अवस्था को चंचल कर देती हैं। चित की चंचलता, भय को पैदा करने लगती है। उसी अवस्था को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।। कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू ।। व्याख्या : हे प्रिय (रजोगुणी वृति सदैव चित को प्रिय होती है)! तुम्हारा बुरा किसने किया है? कौन है जो मृत्यु को प्राप्त होना चाहता है? तुम बोलो किस भिखारी को राजा बना दूँ और किस राजा को देश निकाला दे दूँ? अर्थात् चित रजोगुणी वृति से कहता है कि किस भाव को प्रबल करूँ और किस भाव का त्याग करूँ, जिससे तुम्हें सुख मिले। सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।। जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।। व्याख्या : मैं (चित) तुम्हारे दुश्मन अगर देवता हैं, तो उनको भी मार सकता हूँ अर्थात् अगर कोई भाव तुम्हारा दुश्मन है तो उसका दमन कर सकता हूँ। फिर बेचारे शरीर के नर-नाड़ियों की तो क्या बात है? तुम मेरा स्वभाव तो जानती ही हो कि मैं सदैव तुम्हारे चन्द्रमा के समान मुख का चकोर हूँ। अर्थात् चित रजोगुणी वृति रूपी चन्द्रमा का चकोर होता है अर्थात् रजोगुण की तरफ सदैव चित आकर्षित रहता है। प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरे।। जौं कुछ कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।। व्याख्या : इन चौपाइयों में साधना की भाव अवस्था का परम रहस्य छुपा हुआ है। इन चौपाइयों में चित की अवस्था और रजोगुण के प्रभाव को बताया गया है। चित रूपी राजा कहता है कि प्राण, आत्मा व स्वर सब मेरे वश में है और भाव व भावों से उत्पन्न इच्छाएँ सब रजोगुण रूपी कैकयी के वश में हैं। मैं अर्थात् चित कुछ भी कपट करके नहीं कह रहा हूँ क्योंकि आत्मा रूपी राम के संग (स अ पथ) रहने पर मेरी सत्य की अवस्था होती है अर्थात् चित अगर आत्मोन्मुखी होकर रहता है तो वह सत्य की अवस्था में रहता है। बिहसि मागु मन भावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।। घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।। व्याख्या : हे प्रिय! तुम हँसकर मन को अच्छा लगने वाला वर माँग लो और मन को हरण करने वाले सुन्दर अंगों पर वासना रूपी वस्त्रों को धारण कर लो। चित रजोगुण को क्षुब्ध देखकर रजोगुण के अनुसार ही चलने लगता है। उसी को यहाँ चित रूपी राजा का रजोगुणी रुपी कैकयी के सामने समर्पण के प्रतीक के रूप में बताया गया है। चित रूपी राजा कहता है कि हे प्रिय! समय कुसमय को तो समझो और जल्दी कुबुद्धि से प्रभावित वासना रूपी कुभेष को छोड़ दो। चित रजोगुण के प्रभाव में आने पर भी रजोगुण को आत्मोन्मुखी करने का प्रयास करता रहता है क्योंकि आत्मोन्मुखी होना चित का सहज स्वभाव है। दो0 यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मति मंद। भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।। व्याख्या : चित रूपी राजा की बात सुनकर और चित की आत्मा रूपी राम के संग (स अ पथ उ सपथ) चलने की बात सुनकर मूढ़ रजोवृति रूपी कैकयी हँसती हुई उठी और वासना रूपी वस्त्रों को धारण करने लगी। उस समय वह ऐसी लग रही थी मानो हरिण को देखकर भीलनि फँसाने के लिए फँदा तैयार कर रही हो। चित मृग की तरह चंचल होता है और वासनाओं की लालसा ही उसके लिए फँदे का काम करती हैं। पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजलु बानी।। भामिनि भयउ तोर मन भावा। घर घर नगर अनंद बधावा।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने रजोगुणी रूपी कैकयी को सुहृदय जानकर अर्थात् हृदय को अच्छी लगने वाली जानकर प्रेम में पुलकित होते हुए मधुरवाणी में कहा कि हे प्रिय! तुम्हारा मन चाह हो रहा है, इसलिए शरीर रूपी नगर में प्रत्येक कोष रूपी घर-घर आनन्द के बाजे बज रहे हैं। यहाँ बहुत ही सूक्ष्मता से चित की दुविधा समझ में आ पाती है। क्योंकि जब भाव आत्मोन्मुखी होने लगते हैं तो शरीर का रोआँ-रोआँ पुलकित हो उठता है परन्तु चित में रजोगुण की वृति बहुत सूक्ष्मता से क्षोभ पैदा करती रहती है। जो स्वयं चित को भी समझ में नहीं आ पाती है। उस अवस्था में साधक समझ ही नहीं पाता क्या करूँ? उसी जटिल भाव अवस्था को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।। दलकि उठेउ सुनि हृदय कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने कहा कि आत्मा रूपी राम को कालि अर्थात् देह रूपी नगर का युवराज कर दूँगा। इसलिए हे सुलोचनि! तुम मंगल भावना से भर जाओ। चित रूपी राजा रजोगुणी वृति को मंगल भावना से भरना चाहता है। परन्तु रजोवृति को भावों का आत्मोन्मुखी होना अच्छा नहीं लगता है। इसलिए चित रूपी राजा की ये बातें सुनकर रजोवृति का कठोर हृदय जल उठा, जैसे पका हुआ बालतोड़ छू जाने पर दर्द करता है वैसे ही रजोवृति का हृदय जल उठा। ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।। लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरु पढ़ाई।। व्याख्या : परन्तु जैसे चोरी पकड़ में आ जाने के भय से चोर की स्त्री जोर से नहीं रोती है वैसे ही रजोवृति रूपी कैकयी ने यह दर्द हँसकर छुपा लिया। चित रूपी राजा रजोवृति की कुटिलता को नहीं समझ पाता है क्योंकि मन की कुबुद्धि रूपी भावों का रजोवृति को अच्छी तरह सिखाया हुआ होता है। जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारि चरित जलनिधि अवगाहू।। कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।। व्याख्या : हालाँकि चित रूपी राजा नीति में निपुण होता है परन्तु नाड़ी से उत्पन्न भाव का सागर अथाह होता है। इसलिए रजोवृति रूपी कैकयी ने कपट युक्त प्रेम बढ़ाकर मुँह व आँखों को मोड़ती हुई हँसते हुए बोली। दो0 मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।। व्याख्या : हे चित रूपी पति! तुम सदा माँगो-माँगो की बात तो करते हो परन्तु कभी देते हो नहीं। आपने दो वरदान देने की बात कही थी परन्तु उनको पाने में भी मुझे संदेह हो रहा है। चित की चेतना से सदैव दो (बाहरी मन व आंतरिक मन के) भावों की धारा बहती रहती है। ये दोनों धाराएँ सदैव चेतना तो करती हैं परन्तु वास्तविक रूप से भावों से उत्पन्न कल्पनाओं का रूपायन नहीं हो पाता है। जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।। थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।। व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने हँसते हुए कहा कि हे प्रिय! तुम्हें मान करना अच्छा लगता है। मैं तुम्हारे इस मर्म को समझ गया हूँ। तुम्हारे दोनों वरदान अमानत के रूप में हैं और तुमने कभी माँगे नहीं और मेरा भूलने का स्वभाव है। वास्तव में तो चित द्वैत की प्रेरणा करता है। वह तो वृति पर निर्भर करता है कि वह किस भाव के साथ जाना चाहती है। क्योंकि चित तो बाहरी व आंतरिक मन की तरंगें उठाकर सहज रहता है। झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।। रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ ब डिग्री बचनु न जाई।। व्याख्या : चित रूपी राजा बोला कि झूठ-मूठ हमको दोष मत लगाओ। तुम भले ही दो वर की जगह चार वर माँग लो। रघुकुल (अर्थात् रघु यानी जीवन और कुल यानी चित) अर्थात् चित की सदैव यह रीति होती है कि चित से प्राण पैदा होते हैं परन्तु वाणी चित से पैदा नहीं होती है। क्योंकि वाणी तो भावों से पैदा होती है और भाव प्राण से पैदा होते हैं। अत: यहाँ चित रूपी राजा कहते हैं कि मुझसे तो केवल प्राण का जन्म होता है, वाणी का नहीं होता है। नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुँजा।। सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए ।। व्याख्या : असत्य के समान पाप का पूँज नहीं होता है अर्थात् असहज अवस्था के समान चिन्ता पैदा करने वाला कोई नहीं होता है। क्योंकि पर्वत के समान कभी करोड़ों घोंघे नहीं हो सकते हैं। सत्य अर्थात् सहजता की मूल जड़ अच्छे कर्म होते हैं। इसी बात को वेदों, पुराणों व सब मुनियों ने बताया है। तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।। बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।। व्याख्या : अगर सहजता (सत्य) के साथ आत्मा रूपी राम का संग (स अ पथ उ सपथ) मिल जाए अर्थात् वृतियाँ अगर आत्मोन्मुखी हो जाएँ तो चित सूक्ष्म होकर अच्छे कार्यों का प्रेरणता और प्रेम की सीमा बन जाता है। चित रूपी राजा की बात में दृढ़ता देखकर कैकयी रूपी रजोवृति हँसकर बोली मानो उसने कुबुद्धि, कुविचार और कलह की पोटली खोल दी हो। जब चित आत्मोन्मुखी हो रहा होता है, तब अगर रजोवृति अपना प्रभाव दिखाती है तो वह कुबुद्धि, कुमत व कलह को ही पैदा करने वाली होती है। दो0 भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु। भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंक डिग्री बाजु।।28।। व्याख्या : चित रूपी राजा की आत्मोन्मुखी प्रेरणा सुभग अर्थात् सु अ भग उ अच्छी प्रकृति रूपी वन होता है, जिसमें सुख रूपी पक्षियों का समाज होता है। परन्तु उसी वन में रजोवृति रूपी भिलनि होती है, जो सुख रूपी पक्षियों का शिकार करना चाहती है। ।। मास पारायण, तेरहवाँ विश्राम।। सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।। मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।। व्याख्या : तब रजोवृति रूपी कैकयी बोली कि हे प्राणों को प्रिय लगने वाले! मुझे एक वर तो भरत रूपी भावरत भाव को राजतिलक करने का दे दो अर्थात् समस्त भावों में रतता भाव की प्रबलता कर दो। दूसरा वरदान मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, इसलिए मेरी मनोकामना का पूर्ण करना। तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी ।। सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।। व्याख्या : हे चित रूपी राजा! आत्मा रूपी राम को तपस्वी के भेष में सांसारिक भोगों से विशेष उदासी बनाकर चौदह वर्ष का वनवास दीजिए। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। तपस्वी के भेष का तात्पर्य है तप की अवस्था (अर्थात् मन व इन्द्रियों के एकीरण की अवस्था) में विषय भोगों से उदासीन रहते हुए चौदह यानी दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित व अहंकार के चौदह रसों से परे रहने का वर दीजिए। इस प्रकार के रजोवृति के मधुर वचनों को सुनकर चित रूपी राजा के हृदय में शोक छा गया अर्थात् चित से उठने वाली तरंगे रूक गयी। जैसे चन्द्रमा की किरणों को छू कर चकवा व्याकुल हो जाता है। गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।। बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ त डिग्री तालू।। व्याख्या : रजोगुणी रूपी कैकयी वचनों को सुनकर चितरूपी राजा थम सा गया अर्थात् चित स्थिर अवस्था में आ गया जैसे बाज मानों वन में बटेर पक्षी पर झपटकर संतुष्ट हो जाता है। उस अवस्था में जब रजोवृतियाँ भावरत के भाव में दृढ़ हो जाती हैं, तो चित से उठने वाली उमंग की तरंगे शांत हो जाती है और चित वैसे ही निस्तेज हो जाता है जैसे ताल के वृक्ष पर बिजली गिरने पर ताल का वृक्ष बदरंग हो जाता है। माथें हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लागु जनु सोचन।। मोर मनोरथ सुरत डिग्री फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।। व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी राजा की दोनों आँखें बन्द हो जाती हैं। वास्तविकता भी यही है कि जब चित विषय वासना से मुक्त हो जाता है तो भाव पैदा होना बन्द हो जाते हैं और बिना भावों के कभी भी दृष्टि बन ही नहीं सकती है। अत: दोनों आँखें स्वत: बन्द हो आती है। तब ऐसा लगने लगता है मानो चेतना ने ही शरीर को धारण कर रखा है और चेतना चेतना में ही समाने लग जाती है। उस समय चित की कामनारूपी रथ जो स्वरों के माध्यम से चलायमान रहता है, उसकी भी गति रूक जाती है मानों उसके फिरने वाले पहिए एकदम जड़ हो गए हो। अर्थात् इच्छाएं पैदा होना बन्द हो जाती है। अवध उजारि कीन्हि कैकई। दीन्हिसि अचल बिपति कैनेई।। व्याख्या : जब रजोवृति विषयी भाव रतता में दृढ़ हो जाती है तो अवधी रूपी शरीर में ज्ञान का प्रकाश उजड़ हो जाता है। उसी को ""अवध उजारि"" बोलकर लिखा गया है। जब भावरत की भावना दृढ़ हो जाती है तो विपत्ति के आगमन के समस्त कारण नष्ट हो जाते हैं उसीको ""अचल बिपत्ति कै नेई"" बोलकर लिखा गया है। क्योंकि जब वासनाओं में भावरत की भावना आ जायेगी तो विपत्ति तो आयेगी। दो0 कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास।।29।। व्याख्या : जब नारी (नाड़ी) की धड़कन में विषयी भाव प्रबल हो जाता है तो विश्वास अर्थात् विश्व अ आस यानी सांसारिक इच्छाएँ हो जाती हैं जैसे योग की सिद्धि होने के समय योगी का अविद्या से नाश हो जाता है। उसी प्रकार भावरतता की भावना प्रबल होने पर सांसारिक अपेक्षाओं की वृद्धि हो जाती है। कौन चीज कब हो जाए साधना में पता ही नहीं चलता। एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।। भरतु कि राउर पूत न होंही। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।। व्याख्या : इस प्रकार चित रूपी राजा ने अपनी चेतना से अपनी चेतना में ही देखा। तब चित को दिखायी दिया कि कुबुद्धि की विषयवासनाओं से मन सना हुआ है अर्थात् वासना के कुभाव मन में ही छुपे हुए हैं। भावरत रूपी भरत भाव चित रूपी राजा का पुत्र नहीं होता है क्या? अर्थात् भावरत भाव भी चित की चेतना से ही तो पैदा होता है। परन्तु रजोगुणी वृति तो वासना के सहारे से मोहादि के रूप में बलवती होती है। जो सुनि स डिग्री अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारें।। देहु उत डिग्री अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।। व्याख्या : हे चित रूपी राजा! अगर मेरे वचन अर्थात् रजोवृति के वचन बाण के समान लगते हैं तो क्यों नहीं सम्भाल कर बोलते हो अर्थात् भावरतता में दृढ़ होना बाण के समान लगता है तो फिर क्यों समस्त भावों को आत्मोन्मुखी करते हो। मेरे इस प्रश्न का जवाब दीजिए या फिर ना कर दीजिए क्योंकि आप तो अर्थात् चित तो रघुकुल यानी जीवन के लिए सत्य की सन्धि का स्थान होता है। चित ही वह स्थान होता है, जिसके बल से जीव सहजता (सत्य) की अवस्था को प्राप्त करता है और चित की चंचला से ही जीव माया के जाल में फँसता है। इसलिए चित को सत्य सन्ध अर्थात् सत्य का सन्धि स्थल कहा गया है। देन कहेहु अब जनि ब डिग्री देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू।। सत्य सराहि कहेहु ब डिग्री देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।। व्याख्या : आपने मनचाहा वर देने की बाती कही है तो दीजिए वरना सत्य का त्याग करके संसार में अपयश लीजिए अर्थात् सहजता को छोड़कर वासनओं के जाल में फँस जाइये। आपने सत्य (सहजता) की सराहना करके वर देने की बात कही थी, तो आपने सोचा था कि कोई छोटा-मोटा वर माँग लोगी अर्थात् सिद्धियाँ का वर प्राप्त करके संतुष्ट हो जायेगी। सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।। अति कटु बचन कहति कैकई। मानहुँ लोन जरे पर देइ।। व्याख्या : शिबि अर्थात् शव (शरीर) को धारण करने वाली शक्ति और दधीचि अर्थात् दत्त चित की अवस्था तथा ऊर्जा का बल ये सब शरीर रूपी धन का त्याग करके भी प्राण से उत्पन्न भाव की रक्षा करते हैं अर्थात् भाव का अनुसरण करते हैं। रजोवृति रूपी कैकई कड़ुवे वचन कह कर मानो जले पर नकम छिड़क रही हो। रजोवृति का विषयी भावरतता में दृढ़ता लाना जले पर नमक जैसा होता है। दो0 धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सि डिग्री धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।। व्याख्या : तब धर्म अर्थात् धारणा को धारण करने वाले चित रूपी राजा ने अपने नयन खोले अर्थात् चित की चेतना में कम्पन हुआ और चित पश्चाताप करते हुए लम्बे श्वास लेते हुए सोचने लगा कि मुझे कु जगह पर मारा है। वास्तविकता में साधना पथ पर चलते हुए चित धारणा कराने लगता है कि आत्मोन्मुखी हो जाना चाहिए। परन्तु भोगों से डरता रहता है। यहाँ पर रजोवृति रूपी कैकयी यही कहती है कि जब आपको आत्मोन्मुखी होना ही है तो भरत रूपी भावरतता भाव को राजतिलक कर दीजिए अर्थात् दृढ़ भावरतता का भाव ले आइए। परन्तु चित भावरतता की बात सुनकर सहम उठता है। यही दसरथ रूपी राजा रजोवृति रुपी कैकयी की बात सुनकर सहम उठता है। यही दसरथ रूपी राजी की व्यथा का मूल मर्म है। क्योंकि साधक ऊपर-ऊपर से अपने आपको आत्मोन्मुखी करना चाहता है परन्तु मोह लालसा की भावरतता करने से भयभीत होने लगता है। उसी द्वन्द्व की अवस्था का यहाँ बहुत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।। मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।। व्याख्या : रजोगुणी वृति रूपी कैकयी को देखकर चित रूपी राजा क्रोध से जल उठा। तब ऐसा लग रहा था मानों क्रोध ने ही तलवार निकाली है। वासनाओं के त्याग के द्वन्द्व से क्षोभ पैदा हो जाता है और क्षोभ ही तीव्र क्रोध में बदल जाता है। उस क्षुब्धता की अवस्था में कुबुद्धि ही क्रोध रूपी तलवार की मूठ बन जाती है और निष्ठुरता धार बनकर उभर कर आती है। कुटिल कुबुद्धि रूपी शान पर ही वह धार पैनी होती रहती है। लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।। बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने जहर भरी रजोगुणी वृति की कठोरता को जाना तो लगने लगा कि ये तो वास्तव में सत्यता के जीवन का अन्त कर देगी अर्थात् असहज कर देगी। इसलिए चित रूपी राजा हृदय को कठोर करके बोले अर्थात् चित में स्थिरता उठने लगी। जिस चित को प्रार्थना युक्त वाणी अच्छी लगती है, वही कठोरता धारण कर लिया अर्थात् चित में स्थिरता आ गयी। प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।। मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहुउँ करि संक डिग्री साखी।। व्याख्या : हे प्रिय! ऐसे वचन क्यों कह रही हो। वासनाओं अर्थात् भोगों की प्रतीति (आभास) का परमात्मा में प्रेम लगाने पर हनन हो जाता है। चित रूपी राजा कहना चाहते हैं कि भोग के त्याग की क्या जरूरत है क्योंकि परमात्मा में प्रेम लगाने पर भोगों का आभास तो वैसे ही मिट जाता है। फिर भोगों के त्याग की क्या आवश्यकता है? त्याग से बचने के लिए नाना तर्क उठने लगते हैं। इसलिए तर्क देते हुए चित रूपी राजा आगे कहते हैं कि आत्मा रूपी राम और भरत रूपी त्याग तो मेरी दो आँखों के समान हैं। मैं यह सब शंकाओं का समाधान करते हुए सहज होकर कह रहा हूँ। अवसि दुतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।। सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।। व्याख्या : मैं अवश्य ही त्याग रूपी भरत भाव को प्रबल करने के लिए प्रेरणा रूपी दूत भेजूँगा और वे दोनों भाई अर्थात् त्याग रूपी भरत और कामादि शत्रुओं का दमन करने वाला शत्रुघ्न रूपी भाव जल्दी ही आ जायेंगे। मैं तब अच्छा समय देखकर लग्न सजाकर अर्थात् त्याग भाव में लग्न लगाकर दृढ़ हो जाऊँगा। जब चित त्याग में दृढ़ हो जाता है, तो स्वत: त्याग रूपी भरत का राजतिलक हो जाता है। दो0 लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को राज से कोई मोह नहीं है क्योंकि आत्मा तो समस्त भावों से निरस व एकरस रहती है और आत्मा का त्याग रूपी भरत पर विशेष स्नेह रहता है क्योंकि त्याग के भाव की प्रबलता होने पर आत्मा सहज व एकरस हो जाती है। परन्तु चित रूपी राजा ही भावों को छोटा बड़ा मानकर आत्मा रूपी राम को राजतिलक करना चाहता है अर्थात समस्त भावों को आत्मोन्मुखी कराना चाहता है। राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।। मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछे। तेहि ते परेउ मनोरथ छूछें।। व्याख्या : हे रजोगुणी रूपी वृति कैकयी! आत्मा रूपी राम का संग (स अ पथ उ संग) करना ही सहजता (सत्य) का स्वभाव होता है। इसमें सुष्मना रूपी कौशल्या का किसी का कुछ कहना नहीं होता है। जब साधना परिपक्व होने में आ जाती है, तब सुष्मना नाड़ी भी शान्त होकर रह जाती है और भाव स्वत: ही आत्मोन्मुखी होने लग जाते हैं। मैंने अर्थात् चित ने रजोवृति से पूछे बिना ये सब किया अर्थात् भोगादि वृतियों को न समझकर भावों को आत्मोन्मुखी करने का प्रयास किया है। इसलिए मन रूपी रथ अर्थात् भोग लालसा ने क्षोभ पैदा कर दिया है। रिस परिह डिग्री अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।। एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।। व्याख्या : इसलिए हे रजोवृति रूपी कैकयी! तुम क्रोध त्याग कर मंगल की भावना से भर जाओ क्योंकि कुछ दिनों में ही भरत रूपी त्याग भाव युवराज हो जायेगा। परन्तु मुझे एक ही बात का दु:ख है कि तुमने दूसरा वर बड़े असमंजस का माँगा है। वास्तविकाता में यह होता है कि चित आत्मा में लीन होने का उद्यम तो करता है परन्तु भोगों के त्याग का भय क्षोभ पैदा कर देता है। कई बार साधक को ऐसा भी लगने लग जाता है कि सांसारिक भोगों को भी छोड़ दिया और परमात्मा नहीं मिले तो क्या होगा? पता नहीं साधना का यह पथ सही है या नहीं है, आदि-आदि प्रश्न साधक के हृदय में क्षोभ पैदा करते रहते हैं। यहाँ पर उसी जटिल द्वन्द्व की अवस्था का वर्णन किया गया है। अजहूँ हृदय जरत तेहिआँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।। कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।। व्याख्या : अभी भी मेरा हृदय उसी अग्नि में जल रहा है अर्थात् भोगों के त्याग की बात सुनकर चित रूपी राजा का हृदय जलने लग जाता है और चित को विश्वास नहीं हो पाता है कि क्या सचमुच रजोवृति भोगों का त्याग करना चाहती है या फिर त्याग का भ्रम हो रहा है। इसलिए चित रूपी राजा कहते हैं कि हे रजोवृति रूपी कैकयी! तुम क्रोध को छोड़कर आत्मारूपी राम का अपराध क्या है? बताइये क्योंकि सभी भाव तो कहते हैं कि आत्मा रूपी राम तो सहज व साधू स्वभाव के हैं। तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।। जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।। व्याख्या : हे रजोवृति रूपी कैकयी! तुम भी तो सदैव आत्मा रूपी राम की सराहना करती रहती हो परन्तु अब भावरत रूपी भरत को राजतिलक देने की बात सुनकर मुझे संदेह हो रहा है कि तुम्हारा आत्मा रूपी राम पर सच्चा स्नेह है। वास्तव में यह सत्य ही है कि रजोवृति का आत्मा पर सच्चा स्नेह नहीं हो सकता है क्योंकि सच्चा स्नेह होते ही तो रजोवृति रजोगुण का परित्याग करके सात्विक हो जायेगी। क्योंकि आत्मा के स्वभाव के कारण शत्रु भाव भी सब अनुकूल हो जाते हैं। इसलिए आत्मा रूपी राम किसी भी वृति रूपी माता के प्रतिकूल व्यवहार नहीं कर सकता है। दो0 प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखीं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।। व्याख्या : अत: हे रजोवृति रूपी प्रिया! तुम हँसी और क्रोध का त्याग करके विवेकपूर्वक वर माँगों, जिससे मैं मेरी आँखों से भरत रूपी भावरत भाव के राज अभिषेक को देख सकूँ। वास्तव में यह उस द्वन्द्व अवस्था का वर्णन है जब साधक का चित आत्मा में लीन होना चाहता है परन्तु भोगों के प्रति आसक्ति का मोह द्वन्द्व पैदा कर देता है। उस अवस्था में साधक का एक मन तो कहता है कि परमात्मा में लीन होना ही ठीक है। तो दूसरा मन कहता है कि अगर परमात्मा में लीन हो गए तो सांसारिक उपलब्धियों का भोग कैसे सम्भव होगा। उस अवस्था में साधक को भय लगने लग जाता है। उसी सूक्ष्म द्वन्द्व का यहाँ वर्णन किया गया है। इसलिए चित रूपी राजा कहते हैं कि भावरत रूपी भरत का राजतिलक कर दिया जाए परन्तु आत्मा रूपी राम को वनवास मत दो अर्थात् आत्मा में लीन होओ वरना त्याग के भाव के प्रभाव को भी नहीं देख पायेंगे। जिऐ मीन ब डिग्री बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।। कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।। व्याख्या : भले ही मछली पानी के बिना जीवित रह ले और चाहे सर्प बिना मणि के दीन-दु:खी होकर जी ले परन्तु मैं निष्कपट भाव से कहता हूँ कि आत्मा रूपी राम के बिना मेरा जीवन सम्भव नहीं है। आत्मा के परमात्मा में लीन होने पर चित का द्वैत मिट जाता है और बिना द्वैत के संसार का आभास ही सम्भव नहीं होता है, इसलिए चित रूपी राजा का जीवन आत्मा रूपी राम के अधीन होता है। समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।। सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।। व्याख्या : हे रजोवृति रूपी चतुर प्रिया! तुम समझकर देखो मेरा (चित) जीवन आत्मा रूपी राम के अधीन होता है। इस प्रकार की आत्मोन्मुखी बातें सुनकर कुबुद्धि के भाव ऐसे जलने लगते हैं, मानों अग्नि में घी की आहूति पड़ गयी हो। कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।। देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।। व्याख्या : तब रजोवृति रूपी कैकयी बोली कि आप करोड़ों कहने व करने के उपाय कीजिए परन्तु मुझे राउरि अर्थात् चित से उत्पन्न माया नहीं प्रभावित करेगी। आप या तो वर देने की हाँ कर दीजिए या ना करके अपयश को लीजिए। मुझे ज्यादा प्रपंच (बखेड़ा) अच्छा नहीं लगता है। रजोवृति कहती है कि या तो भावरत भाव को प्रबल कीजिए वरना वासना रूपी अपयश को लेना पड़ेगा। रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।। जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम साधु हैं और आप (चित) चतुर साधु हैं तथा आत्मा रूपी राम की सुष्मना रूपी कौशल्या माता भी अच्छी हैं। मैंने सबको जान लिया है। अत: जिस प्रकार सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या ने मेरा भला सोचा है अर्थात् रजोवृति को माया का आवरणों से मुक्त कराने का प्रयास किया है। वैसा ही मैं भी उसको फल दूँगी अर्थात् रजोवृति भी सात्विक भावों को भोग भावों लगाउँगी। दो0 होत प्रातु मुनि बेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।। व्याख्या : सुबह होते ही अगर आत्मा रूपी राम मुनि का भेष धारण करके वन को नहीं गए अर्थात् आत्म चिन्तन को नहीं छोड़ा तो मुझ रजोवृति की मृत्यु निश्चित है अर्थात् रजोवृति के भाव का मरण निश्चित है और चित रूपी राजा को अपयश अर्थात् वासनाओं का सामना करना पड़ेगा। अत: हे चितरूपी राजा! इसे अपने मन में समझिए। अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।। पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई।। व्याख्या : ऐसा कहकर रजोवृति का कुटिल स्वरूप जाग उठा, मानो क्रोध की तरंग बढ़ गयी हो, जो चिन्ता रूपी पर्वत से प्रकट हो रही हो। वह क्रोध रूपी जल से भरी हुई बह रही होती है। दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भँवर कूबरी बचन प्रचारा।। ढाहत भूपरूप त डिग्री मूला। चली बिपती बारिधि अनुकूला।। व्याख्या : दोनों वर अर्थात् द्वैत भाव उस कठोर धारा के दो किनारें होते हैं तथा कुबुद्धि की मंत्रणा भँवर की तरह होती है। वह कुटिल रजोवृति रूपी नदी चित रूपी राजा को जड़ सहित उखाड़ना चाहती है तथा जो विपत्ति रूपी समुद्र की तरफ बहती चली जाती है। लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।। गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।। व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने रजोवृति के जटिल रूप को देखा तो सत्य मान लिया कि तीन गुणों की नाड़ियों में से रजोवृति रूपी नाड़ी के बहाने मेरी मृत्यु सिर पर नाच रही है। तब चित रूपी राजा ने रजोवृति की नाड़ी के सामने समर्पण करते हुए कहा कि तुम ज्ञान रूपी कुल को काटने के लिए कुल्हाड़ी मत बनो। मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।। राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।। व्याख्या : हे रजोवृति रूपी कैकयी! तुम मेरा सिर माँग लो अर्थात् मेरे समस्त चिंतन पर कब्जा कर लो। मैं तुरन्त यह अवस्था स्वीकार कर लूँगा परन्तु मुझे आत्मा रूपी राम के विरह में मत तड़पाओ। तुम जैसे-तैसे राम को रख लो वरना तुम्हारी छाती जलती रहेगी अर्थात् आत्मा अगर परमात्मा में लीन हो गयी तो भोग लालसा सदैव सताती रहेगी और उसका पश्चाताप होता रहेगा। दो0 देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।। व्याख्या : तब उस जटिल अवस्था को देखकर चित रूपी राजा माथा धुनकर पृथ्वी पर गिर पड़े अर्थात् चित रूपी राजा जटिलता को देखकर असहाय हो गया। वह परम दु:खी होकर आत्मा रूपी राम राम कहने लगा। साधना के दौरान प्रत्येक साधक के चित की ऐसी जटिल अवस्था जरूर आती है, जिसमें वह फँस जाता है। एक तरफ तो वह आत्मामय होकर परमात्मा में लीन होना चाहता है और दूसरी तरफ उसका भोग-वासनाओं में आकर्षण भी बना रहता है। ऐसी द्वन्द्व की अवस्था बहुत कष्टकारी होती है। ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कल्पत डिग्री मनहुँ निपाता।। कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।। व्याख्या : ऐसी अवस्था में चित रूपी राजा शिथिल हो जाता है जिसके कारण भावों की कल्पना रूपी पेड़ का नाश हो जाता है अर्थात् भाव शांत हो जाते हैं और कल्पना मिट जाती है। उस अवस्था में मुख में वाणी भी नहीं आती है क्योंकि भाव ही मिट जाते हैं तो वाणी कैसे पैदा हो सकती है? और चित वैसे ही निस्तेज हो जाता है, जैसे मछली बिना जल के दीन हो जाती है। पुनि कह कटु कठोर कैकई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई ।। जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।। व्याख्या : तब कैकयी रूपी कठोर रजोवृति ने कुछ कड़वे वचन कहे जो ऐसे लग रहे थे मानो घाव में नमक डाला जा रहा हो। कठोर रजोवृति कहने लगी कि जब ऐसा करना ही था तो वर माँगने को क्यों कहा अर्थात् आत्मोन्मुखी होने की प्रेरणा क्यों करी? दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।। दानि कहाउब अ डिग्री कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।। व्याख्या : एक साथ दोनों बात कैसे हो सकती हैं, जैसे हँसना और रोना दोनों एक साथ सम्भव नहीं है। अर्थात् भोगों की लालसा की पूर्ति और आत्मोन्मुखी होना एक साथ सम्भव नहीं है। कृपणता रखने वाला दानि कैसे कहा जा सकता है, जैसे युद्ध में जाने वाला कुशल क्षेम के साथ कैसे रह सकता है? कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों विपरीत चीजें एक साथ नहीं हो सकती हैं। अर्थात् परमात्मा में मिलन या संसार में रमण एक साथ सम्भव नहीं हो सकता है। छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करूना करहू।। तनु तिय तनय दामु धनु धरनी। सत्य संध कहुँ तृन सम बरनी।। व्याख्या : अब आप या तो वचनों का त्याग करिए या फिर धैर्य धारण करो। व्यर्थ में अबला नारी की तरह विलाप मत कीजिए। क्योंकि सत्य की अवस्था को प्राप्त कर लेने वालों के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन व पृथ्वी सब तिनके के समान होते हैं। दो0 मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।। व्याख्या : इस प्रकार मर्म भेदी वचनों को सुनकर चित रूपी राजा बोला कि हे रजोवृति रूपी कैकयी! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है क्योंकि पिशाच रूपी काल तुम्हें लग गया है। जो ये सब तुमसे कहलवा रहा है। चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।। सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।। व्याख्या : भावरत रूपी भरत भाव तो सपने में भी राजा नहीं होना चाहता है परन्तु विधि वश अर्थात् क्रिया के कारण तुम्हारे हृदय में कुमति पैदा हो गयी है। ये सब मेरे पापों अर्थात् चिंताओं का परिणाम है। इसी कारण से विपरीत क्रिया हो जाने की वजह से आज कुठाराघात हुआ है। भावरत बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।। करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।। व्याख्या : स्वयं के भावों के वशीभूत होने के कारण ही शरीर रूपी अवध बसती है। क्योंकि आत्मा रूपी राम की प्रभुता तो यह है कि वो समस्त गुणों के घर होते हैं। आत्मा रूपी राम की तो समस्त भाव रूपी भाई सेवा करते हैं अर्थात् अनुसरण करते हैं, जिसके कारण ही आत्मा रूपी राम की तीनों लोकों में बड़ाई होती है। तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ।। अब तोहि नीक लाग क डिग्री सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।। व्याख्या : तेरा कलंक अर्थात् रजोवृति की आसक्ति एवं चित की वासनाओं के प्रति आसक्ति का पश्चाताप मरने पर भी नहीं मिट पाता है अर्थात् वासनाओं की आसक्ति चेतना में समा जाती है, तो वह मिट नहीं पाती है। अत: अब तुमको (रजोवृति) जो उचित लगे वही करो परन्तु मेरी आँखों के सामने से हट जाओ अर्थात् चित में रजोवृति उठना बन्द हो जाओ। जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।। फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहा डिग्री लागी।। व्याख्या : जब तक मैं जीउँ अर्थात् जब तक चित की चेतना रहे, तब तक तुम (रजोवृति) मुझसे कुछ मत कहना। वरना अंत काल में तुमको पश्चाताप होगा। क्योंकि तुम इऩ्िद्रयों का दमन कर रही हो। उसी को ""मारसि गाइ नहा डिग्री लागी"" बोलकर लिखा गया है। दो0 परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानी न कहित कुछ जागति मनहुँ मसानु।।36।। व्याख्या : ऐसा नाना प्रकार से कहकर चित रूपी राजा पृथ्वी पर गिर पड़े अर्थात् चित शरीर रूपी पृथ्वी पर शिथिल हो गया। उस अवस्था में कपट में चतुर रजोवृति कुछ भी नहीं कहती है और ऐसी लगती है मानो श्मशान को जगा रही हो। राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।। हृदयँ मनाव भो डिग्री जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।। व्याख्या : व्याकुल चित रूपी राजा आत्मा रूपी राम राम के नाम की रट लगाता रहा जैसे बिना पंख के पक्ष होकर पड़ा रहता है। उस अवस्था में बार-बार परन्तु चित में ये भाव उठता रहता है कि ज्ञान रूपी सबेरा नहीं हो, जिससे आत्मा रूपी राम को ये सब रजोवृति की बातों को कोई जाकर नहीं बताये। उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।। भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।। व्याख्या : अवधी रूपी शरीरर को देखकर बहुत कष्ट होगा, इसलिए ज्ञान रूपी सूर्य का उदय नहीं होना चाहिए। वास्तविकता में जब साधक का चित आत्मा में लीन हो जाता है, तो शारीरिक सुख भोगों की लालसा की आसक्ति चित को मोह के बंधन में बाँधे रखती है, जो चित को बहुत कष्ट देती है इसलिए चित रूपी राजा चाहते हैं कि शरीर का ज्ञान रूपी सूर्य उदय ही नहीं हो तो अच्छा है। चित रूपी राजा की आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम प्रीति और रजोवृति रूपी कैकयी की कठोरता इन दोनों के बीच में चित रूपी राजा फँस गया। बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।। पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।। व्याख्या : इस प्रकार विलाप करते हुए अर्थात् ग्लानि करते हुए ज्ञान रूपी सवेरा हो गया और दरवाजे पर वीणा, बेनु व शंख आदि की ध्वनि बजने लगी। चारण-भाट गुणगान करने लगे। परन्तु जब चित आत्मा में लीन होने लग जाता है, तो ये सब गुण गान (यशोगाथा) काँटों की तरह लगने लग जाते हैं। मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगा मिनिहि बिभूषन जैसें।। तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू।। व्याख्या : उस अवस्था में मंगल के भाव भी वैसे ही अच्छे नहीं लगते हैं जैसे संभोग के समय नारी पर आभूषण नहीं सोहाते हैं। क्योंकि जब चित आत्मा में लीन होने लगता है, तो उसे द्वैत भाव एकदम नहीं अच्छे लगते हैं। जब आत्मोन्मुखी अवस्था आती है तो समस्त भावों में उत्साह छा जाता है। उसी उत्साह की अवस्था को रात में नींद नहीं आना बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में सभी भाव आत्मा रूपी राम के दर्शन करने को लालायित रहते हैं। दो0 द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।। व्याख्या : उस अवस्था में समस्त भाव उर्ध्वगामी होने लग जाते हैं और भृकुटि रूपी द्वार पर समस्त प्रकार के भावों की भीड़ बढ़ने लग जाती है। तब समस्त भाव आपस में बातें करने लगते हैं कि ज्ञान रूपी सूर्य के उदित होने पर भी शरीर रूपी अवध के स्वामी चित आज जाग नहीं रहे हैं अर्थात् चित में आज चंचलता की तरंगें नहीं उठ रही हैं। इसका क्या विशेष कारण है? पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।। जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।। व्याख्या : हमेशा तो चित रूपी राजा रात्रि के पिछले पहर में ही जाग उठते थे परन्तु आज बड़ा आश्चर्य हो रहा है। रात्रि के पिछले पहर से तात्पर्य यह है कि पहले तो चित तमो गुणों रूपी रात्रि के अंतिम पहर में जाग उठते थे अर्थात् चंचल हो उठते थे परन्तु आज क्या हुआ? इसलिए हे सुमंत्र अर्थात् सात्विक मंत्रणा वाले भाव! तुम जाओ और जाकर जगाओ तथा जैसी चित रूपी राजी की आज्ञा हो वैसा ही करना। गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं।। धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।। व्याख्या : तब सुमंत्रणा रूपी भाव चित रूपी राजा के पास गया परन्तु जाते हुए बहुत डर लग रहा था। वास्तविकता में ध्यान की अवस्था में यही होता है कि जब चित आत्मा में लीन होने लगता है तो कल्पनातीत अवस्था में प्रवेश कर जाता है और कल्पनातीत अवस्था में किसी भी प्रकार के भाव चित के पास जाने में डरने लगते हैं। तब ऐसा लगने लगता है कि दौड़कर कोई खाने को आ रहा है और विपति व विषाद ने मानो दस्तक दी हो। पूछें कोउ न ऊत डिग्री देई। गए जेहिं भवन भूप कैकई।। कहि जयजीव बैठ सि डिग्री नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई।। व्याख्या : उस अवस्था में कोई भाव पूछने पर भी उत्तर नहीं दे पाता है। ऐसी अवस्था में सुमंत्रणा रूपी भाव चित रूपी राजा और रजोवृति रूपी कैकयी के पास गया। तब सुमंत्रणा रूपी भाव ने चित रूपी राजा को सीस झुकाया और जय जीव कहा अर्थात जीव का स्मरण कराया। तब सुमंत्रणा रूपी भाव भी चित रूपी राजा की गति को देखकर सूख गया। वास्तव में चित की तरंगों से ही प्राण पैदा होकर भाव पैदा होते रहते हैं परन्तु जब चित आत्मा में लीन होने लगता है, तो तरंगें शांत हो जाने के कारण भाव पैदा होना बन्द हो जाते हैं। अत: सुमंत्रणा रूपी भाव का सूखना भी स्वाभाविक ही हो जाता है। सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।। सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी।। व्याख्या : इस प्रकार चिंता में व्याकुल चित रूपी राजा धरती पर बेहाल (बिबरन) पड़े हुए हैं, मानो कमल जड़ उखड़ जाने पर मुरझा कर पड़ा हो। सुमंत्रणा रूपी सचिव भय के कारण कुछ पूछ नहीं पा रहा है। तभी रजोवृति रूपी कैकयी जो अशुभ से भरी हुई होती है, शुभता का आभास कराती हुई बोली। दो0 परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भो डिग्री किय कहइ न मरमु महीसु।।38।। व्याख्या : आज रात को राजा सोए नहीं हैं, इसका कारण तो परमेश्वर ही जानते हैं। परन्तु रात भर राम राम करते हुए सुबह कर ली है। क्या रहस्य है? पता नहीं है। अर्थात् चित रूपी राजा आत्मा रूपी राम का स्मरण करते-करते ही ज्ञान रूपी सुबह कर लिए हैं। आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार सब पूँछेहु आई ।। चलेउ सुमंत्रु राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।। व्याख्या : हे सुमंत्रणा रूपी सचिव! तुम जल्दी आत्मा रूपी राम को बुलाकर लाइये। तब आकर रहस्य को जानने का प्रयास कीजिए। चित रूपी राजा का रूख देखकर सुमंत्रणा रूपी सचिव भाव आत्मा रूपी राम को बुलाने चले गए। परन्तु मन में जान लिया था कि कुटिल रजोवृति रूपी कैकयी ने जरूर कुछ न कुछ कुचाल की है। सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।। उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें।। व्याख्या : सुमन्त्रणा रूपी भाव चिन्तन में व्याकुल होकर चले परन्तु पैर नहीं चल पा रहे थे। वो सोचे जा रहे थे कि चित रूपी राजा आत्मा रूपी राम को बुलाकर क्या कहेंगे? परन्तु हृदय में धीरज धारण करके भृकुटि रूपी द्वार पर सुमंत्रणा रूपी भाव गया, तो सुमंत्रणा रूपी भाव को उदास देखकर सभी भावों ने पूछा। समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।। राम सुमंत्रहि आवत देखा। आद डिग्री कीन्ह पिता सम लेखा।। व्याख्या : तब सुमन्त्रणा भी भावों को समझाते हुए वहाँ गए, जहाँ पर जीव का विशुद्ध स्वरूप आत्मा रूपी राम रहते हैं। आत्मा रूपी राम ने जब सुमंत्रणा रूपी भाव को आते हुए देखा तो अपने चित रूपी पिता के समान ही मानकर आदर सत्कार किया। साधना की अनुभूतियाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखी जाती हैं, वरना ध्यान की गम्भीर अवस्था में ही ये अच्छी तरह से समझी जा सकती हैं। निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुल दीपहि चलेउ लेवाई।। रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।। व्याख्या : तब सुमंत्रणा रूपी भाव ने आत्मा रूपी राम को देखा और चित रूपी राजा की आज्ञा को सुनाया और अपने साथ आत्मा रूपी राम को लेकर चले। आत्मा रूपी राम को सुमंत्रणा रूपी भाव के साथ जाता देखकर सभी भाव रूपी नर-नारी बिलखने (बि अ लख अर्थात् विशुद्ध आत्म स्वरूप का आभास करने लगे) लगे। दो0 जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु। सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने चित रूपी राजा को निस्तेज अवस्था में पड़ा देखा, तो वैसे ही सहम गए जैसे बूढ़ा शेर शेरनी को देखकर सहम जाता है। सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।। सरूष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई।। व्याख्या : चित की निस्तेज अवस्था होने पर सभी भावों के होठ सूखने व अंग जलने लगते हैं क्योंकि भावों को बल तो चित की तरंगों से मिलता है। तरंगहीन चित तो बिना मणि के सर्प के जैसा हो जाता है। रजोवृति रूपी कैकयी चित रूपी राजा के पास क्षुब्ध होकर बैठी थी, मानो वह चित रूपी राजा की मृत्यु की घड़ी गिन रही हो। करूनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।। तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का तो स्वभाव करूणामय व मधुर होता है। वह न तो कभी दु:ख देखता है और न कभी दु:ख के बारे में सुनता है क्योंकि आत्मा का स्वरूप एकरस होता है। फिर बुरे समय का विचार करके और धैर्य धारण करके आत्मा रूपी राम ने रजोवृति रूपी कैकयी से पूछा। मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।। सुनहु राम सबु कारनु एहू । राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू।। व्याख्या : हे रजोवृति रूपी माता! मुझे चित रूपी पिता के दु:ख का कारण बताइये, जिससे उसे दूर करने का प्रयास किया जाए। हे आत्मा रूपी राम! चित रूपी राजा के दु:ख का कारण यही है कि उनका तुम पर बहुत ज्यादा स्नेह है। देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।। सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने मुझे (रजोवृति) दो वरदान माँगने के लिए कहा था और मैंने मेरी पसन्द के वरदान माँग लिए। उसी को सुनकर चित रूपी राजा चिन्ता में पड़ गए हैं क्योंकि वे (चित) तुम्हारे (आत्मा) कारण संकोच में पड़ गए हैं। दो0 सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।। व्याख्या : एक तरफ को चित रूपी राजा को आत्मा रूपी राम के स्नेह और दूसरी तरफ वचन की मर्यादा ने संकट में डाल दिया है। इसलिए हे आत्मा रूपी राम! तुम पिता की आज्ञा मानकर इस कठिन क्लेश का निधान कर सकते हो। निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।। जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी निधड़कर होकर कटु वाणी बोल रही थी, जिससे कठोरता का भाव भी सुनकर व्याकुल हो उठता है। रजोवृति रूपी कैकयी की जीभ्या धनुष के समान और वाणी बाणों के समान लग रही थी और जो चित रूपी राजा के मृदु स्थल को भेद सी रही थी। जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुष विधा बर बीरू।। सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।। व्याख्या : उस समय ऐसा लग रहा था मानों निष्ठुरता शरीर धारण करके धनुष विद्या को सीख रही हो। रजोवृति रूपी कैकयी समस्त प्रसंग को आत्मा रूपी राम को ऐसे बता रही थी, जैसे निष्ठुरता ने शरीर धारण कर रखा हो। मन मुसुकाई भानकुलु भानू। रामु सहज आनंद निधानू।। बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।। व्याख्या : तब सूर्य कूल के सूर्य आत्मा रूपी राम मुस्कुराते हुए, जो सहज व आनन्द के कारण हैं, विकार रहित वाणी बोले, जो आनन्ददायक और वाणी की शोभा बढ़ाने वाली थी। सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।। तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।। व्याख्या : हे माता! वही पुत्र बड़ा भाग्यवान होता है, जो माता-पिता की आज्ञा का अनुराग के साथ पालन करता है। माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र इस संसार में दुर्लभ होता है। अर्थात् चित रूपी माता-पिता को संतुष्ट करना संसार में बहुत कठिन कार्य है। दो0 मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।। व्याख्या : हे रजोवृति रूपी माता! वन में अर्थात् संसार से उदासीन हो जाने पर तो मेरा सब प्रकार से हित ही हित होगा क्योंकि मन के समस्त भावों से मिलन होगा अर्थात् मन का मर्म समझ में आ जायेगा, जिससे बन्धन टूट जायेंगे। और तुम्हारी सहमति होने से तो बहुत अच्छा हो जायेगा क्योंकि चित रूपी पिता की तो ऐसी आज्ञा है। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर रजोवृति सहमत हो जाये तो आत्मा का बन्धन शीघ्र ही खुल जाता है। भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू।। जौं न जाऊँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।। व्याख्या : प्राण प्रिय भावरत रूपी भरत भाव राज पायेंगे अर्थात् भावरत की भावना प्रबल रहेगी तो सब प्रकार से समस्त क्रियाएँ मेरे अनुकूल होंगी। ऐसी अनुकूल परिस्थितियों में भी अगर मैं उदासीनता में न बरतूँ तो मूर्ख लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती होगी। सेवहिं अरँडु कलपत डिग्री त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।। तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारी मातु मन माहीं।। व्याख्या : अगर मैं फिर भी वन में नहीं जाऊँ अर्थात् पमरात्मा में लीन नहीं होउँ तो ये तो वैसा ही होगा जैसे कोई कल्पत डिग्री को छोड़कर अरण्डु के पेड़ को पाना चाहे। इस अवसर को छोड़ना तो अमृत को छोड़ विष माँगने जैसा होगा। मूर्ख लोग भी ऐसे सुअवसर को नहीं छोड़ना चाहेंगे। हे रजोवृति रूपी माता! तुम हृदय में विचार करके देखो। अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नर नायकु देखी।। थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।। व्याख्या : परन्तु हे रजोवृति रूपी माता! चित रूपी राजा को निस्तेज और व्याकुल देखकर मुझे बहुत दु:ख हो रहा है। बात तो छोटी सी है और चित रूपी पिता का दु:ख बहुत बड़ा है। यह देखकर मुझे विश्वास नहीं हो रहा है। राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू।। जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।। व्याख्या : चित रूपी राजा तो गुणों के अथाह समुद्र हैं। निश्चित रूप से मुझसे ही कुछ भूल हुई है, जिसके कारण मुझसे तो चित रूपी राजा कुछ कह नहीं पा रहे हैं। अत: हे रजोवृति रूपी माता! तुम मुझे सहजता के भाव के साथ बताइये कारण क्या है? दो0 सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के सरल व सहज वचनों को भी कुबुद्धि रूपी वृति ने कुटिल जाना, जैसे जल निर्मल होता है परन्तु जोंक तो फिर भी टेढ़ी ही चलती है। रहसी रानि राम रूख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।। सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछु जाना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के रूख को देखकर रजोवृति रूपी रानि कपटपूर्वक प्रेम जताते हुए बोली कि मुझे तुम्हारी शपथ और भरत रूपी भावरत भाव की आन है। मुझे चित रूपी राजा के दु:ख का दूसरा कोई कारण पता नहीं है। तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।। राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! तुम अपराध करने वाले नहीं हो क्योंकि तुम तो चित व चित की वृतियों व भावों को सुख देने वाले हो। हे आत्मा रूपी राम! तुमने जो कहा है, वो सब सत्य है कि तुम चित व वृतियों रूपी पिता-माताओं की आज्ञा मानने वाले हो। अर्थात् आत्मा चित व चित की वृतियों का अनुसरण करने वाली होती है। पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेपन जेहिं अजसु न होई।। तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निराद डिग्री कीन्हे।। व्याख्या : अत: हे आत्मा रूपी राम! तुम चित रूपी पिता को समझाकर कहिए, जिससे चौथेपन अर्थात् गुणातीत अवस्था में अपयश नहीं हो अर्थात् वासनाओं का प्रभाव नहीं हो। जिसने तुम्हारा जैसा पुत्र दिया है अर्थात् जब आत्मा निर्मल हो ही गयी है, तो उसका निरादर नहीं करना चाहिए। लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।। रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी के मुख से ये शुभ वचन वैसे ही लगते हैं जैसे मगध में गया आदि के तीर्थ लगते हैं। आत्मा रूपी राम को माता के वचन अच्छे लगे जैसे गंगा में जल मिलने पर गंगा जल ही हो जाता है। दो0 गइ मुरूछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का स्मरण करके मुर्छा जाने पर चित रूपी राजा ने करवट ली। तब सुमंत्रणा रूपी भाव ने समय को देखकर आत्मा रूपी राम के आगमन की बात कही। अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।। सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने आत्मा रूपी राम के आगमन की बात सुनकर धैर्य धारण करके आँखें खोली अर्थात् चित ने आत्मा को देखने का प्रयास किया। उस अवस्था में सुमंत्रणा रूपी भाव ने चित रूपी राजा को सहारा देकर बैठाया। तब आत्मा रूपी राम को चरणों में पड़ता हुआ देखा अर्थात् आत्मा को समर्पण की अवस्था में देखा। लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।। रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।। व्याख्या : तब प्रेम में ब्याकुल होकर चित रूपी राजा ने आत्मा रूपी राम को अपनी गोदी में बैठा लिया। तब चित रूपी राजा को ऐसा लगा मानो सर्प को अपनी खोई हुई मणि मिल गयी हो। आत्मा रूपी राम को चित रूपी राजा एकटक देखते रहे अर्थात् चित आत्मा में लीन होने लग गया। उस अवस्था में साधक की आँखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ती है। सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।। बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।। व्याख्या : शोक में व्याकुल चित रूपी राजा कुछ कह नहीं पा रहा था। इसलिए बार-बार आत्मा रूपी राम को बार-बार गले लगा रहा था। मन ही मन चित रूपी राजा क्रिया (विधि) की सोच रहा था, जिससे आत्मा विषय भोगों से निरस होकर परमात्मा में लीन न हो। वास्तव में साधना के दौरान ये अनुभूति बहुत सूक्ष्मता से घटित होती है। आत्मा जब परमात्मा में लीन होने लगती है, तो वासनाओं की आसक्ति चित को व्याकुल कर देती है। सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।। आसुतोष तुम्ह अवढ़र दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।। व्याख्या : महाऐश्वर्य के भाव को याद करके बार-बार चित रूपी राजा परमेश्वर सदाशिव से प्रार्थना करते हैं कि तुम तो शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। अत: आप मेरे दु:ख को दूर कर दीजिए अर्थात् भोग और वैराग्य की दुविधा को मिटा दीजिए। दो0 तुम्ह प्रेरक सबके हृदयँ सो मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।। व्याख्या : हे सदाशिव! तुम तो सबके हृदय में प्रेरणा करने वाले हो इसलिए आत्मा रूपी राम को ऐसी प्रेरणा करो, जिससे वह मेरे वचनों को न मानकर घर पर ही रह जाए। भले ही शील व स्नेह को छोड़ दे। वास्तविकता में साधना के दौरान जब साधक को लगने लगता है कि बस मंजिल मिलने वाली ही है तो सांसारिक आसक्ति अंतिम बार अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास करती है। उसी भाव अवस्था का इस दोहे में वर्णन किया गया है। अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ।नरक परौं ब डिग्री सुरपु डिग्री जाऊ।। सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंहि।। व्याख्या : चाहे अपयश मिल जाए अर्थात् वासनाओं में भले ही फँस जाऊँ और सुयश अर्थात् पुण्य यानी चिन्ता मुक्त अवस्था का नाश हो जाए। चाहे चिन्ता रूपी नरक मिले या बिना कुण्ठा का बैकुण्ठ मिले। चाहे कठोर दु:ख मिल जाएँ परन्तु आत्मा रूपी राम मेरी आँखों से दूर नहीं जाना चाहिए। असमन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।। रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।। व्याख्या : ऐसा मन में भाव लाकर चित रूपी राजा कुछ भी नहीं बोला परंतु पीपल के पत्तों के समान उसके मन के भावों में हलचल मच गयी। तब आत्मा रूपी राम ने चित रूपी राजा को अपने प्रेम के वश में देखा और सोचा कि रजोवृति रूपी कैकयी पुन: कुछ न कह दे। देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।। तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचित छमब जानि लरिकाई।। व्याख्या : इसलिए समय व स्थान के अनुसार आत्मा रूपी राम विनयपूर्वक विचार करके बोले कि हे तात! कहिए क्या मुझसे कोई भूल हो गयी है? मेरी भूल को बच्चा समझ कर क्षमा कर देना। अर्थात् मुझ आत्मा को निर्मल जानकर क्षमा कर देना। अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहिप्रथम जनावा।। देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता । सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।। व्याख्या : यह बात तो बहुत छोटी सी है परन्तु आपको कष्ट बहुत हुआ है। आप पहले ही मुझे ये बता देते। आपको (इन्द्रियों के स्वामी उ गो अ साँई) देखकर मैंने रजोवृति रूपी माता से कारण जाना तो मुझे शान्ति मिली। दो0 मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।। व्याख्या : मंगल के समय अर्थात् परमात्मा से मिलने की बेला में आप चिन्ता करना छोड़ दो अर्थात् वासनाओं की आसक्ति का त्याग कर दो और परमात्मा में लीन होने की प्रसन्नता के साथ आज्ञा प्रदान करो। धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।। चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।। व्याख्या : हे चित रूपी पिता! संसार में उसी भाव का जन्म लेना धन्य होता है, जिसके चरित्र को देखकर चित रूपी पिता को आनन्द मिले। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों पदार्थ उसके हाथ में होते हैं, जिसको माता-पिता प्राणों के समान प्रिय होते हैं। आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।। बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।। व्याख्या : आपकी आज्ञा का पालन करके मैं आत्मा धन्य हो जाऊँगा और जन्म लेने का फल मिल जायेगा अर्थात् परमात्मा में लीन हो जाऊँगा। इसलिए मुझे जल्दी आज्ञा दीजिए। मैं सतोवृत्ति रूपी कौशल्या माता से बिदा ले आता हूँ फिर मैं आपके चरणों में पुन: समर्पण करूँगा। अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उत डिग्री न दीन्हा।। नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।। व्याख्या : ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम सतोवृति रूपी कौशल्या के पास चले गए और चित रूपी राजा शोक के कारण कुछ उत्तर नहीं दे पाए। अवधी रूपी शरीर में यह बात तेजी से फैल गयी जैसे बिच्छु के काटे ही पूरे शरीर में दर्द चढ़ जाता है। अर्थात् समस्त भावों को आभास हो गया कि अब विषय भोगों का त्याग करके आत्मा रूपी राम परमात्मा में लीन होंगे। सुनिभए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।। जो जहँ सुनइ धुनइ सि डिग्री सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।। व्याख्या : इस बात को सुनकर समस्त भाव रूपी नर-नारी व्याकुल हो उठे जैसे जंगल की आग को देखकर लताएँ व वृक्ष दु:खी हो जाते हैं। जो भी भाव इस बात को सुनता अर्थात् आत्मा का विषय त्याग कर परमात्मा में (आनन्द रूपी वन) लीन होने की बात सुनता तो सिर धुनने लगता और बहुत दु:ख हुआ। कोई भी भाव धैर्य धारण नहीं कर पा रहा था। दो0 मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करून रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।। व्याख्या : सभी भावों का मुख सूखा जा रहा था और अश्रुओं की धारा बह रही थी तथा हृदय में दु:ख नहीं समा रहा था। तब ऐसा लग रहा था, मानो करूणा के रस की सेना ही अवधी रूपी शरीर में उतर आयी हो। मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी।। एहि पापिनिहि बुझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।। व्याख्या : बीच रास्ते में ही क्रिया (विधि) के कारण बात बिगड़ गयी। जहाँ-तहाँ सभी लोग रजोवृति रूपी कैकयी को गाली देने लगे कि इस पापिनि रजोवृति को क्या हुआ? जो इसने भावरत रूपी भरत भाव को राजा बनाना चाहा है और विषय रस को छोड़कर आत्मा रूपी राम को परमात्मा में लीन कराना चाहती है। इसने तो विषय वासना रूपी घास-फूस के घर पर ज्ञान रूपी अग्नि रख दी है। समस्त भावों को दु:ख यही हो रहा है कि आत्मा जब परमात्मा में लीन हो जायेगी तो विषय रस का क्या होगा? निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।। कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुवंस बेनु बन आगी।। व्याख्या : स्वयं की आँखें निकालकर जैसे कोई देखना चाहे और अमृत को छोड़कर विष खाना चाहे, ऐसा ही कुबुद्धि व कठोर रजोवृति ने किया है, जो समस्त विषय भोगों का त्याग करके आत्मा को परमात्मा में लीन कराना चाहती है। यह रजोवृति तो रघुबंस अर्थात् जीवात्मा के भाव रूपी वन के लिए अग्नि के समान हो गयी है। वास्तव में जब साधना की अंतिम घड़ी आती है तो रजोवृति भी त्याग-वैराग्य से प्रभावित होकर आत्मा को विषय रसों से दूर रहने की प्रेरणा करने लग जाती है परन्तु सांसारिक भावों को यही अवस्था कष्टकारी लगने लग जाती है। अत: इसी भाव दशा का यहाँ वर्णन किया गया है। पालव बैठि पेड़ एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।। सदा राम एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी ने जिस डाल पर बैठी थी उसी को काट डाला अर्थात् चित से प्राप्त ऊर्जा से ही तो रजोवृति को बल मिल रहा था परन्तु रजोवृति ने तो चित रूपी पेड़ को ही काट डाला। सुख प्राप्त होने की अवस्था में जिससे दु:ख का आभास होने लगा है। आत्मा रूपी राम तो सदैव रजोवृति रूपी कैकयी को प्राणों के समान प्रिय लगते थे अर्थात् आत्मा को रजोगुण आच्छादित किए रहता था परन्तु पता नहीं किस कारण से रजोवृति रूपी कैकयी ने कुटिलपन का व्रत लिया है। सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।। निज प्रतिबिंबु बरूकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।। व्याख्या : सभी कवियों ने नारी के स्वभाव के बारे में सत्य कहा है अर्थात् नाड़ी की धड़कन से उत्पन्न भावों के बारे में सही कहा है कि सब प्रकार से नारी से उत्पन्न भावों को समझना व जानना अगम, अगाध व दुस्तर कार्य है। भले ही स्वयं का प्रतिबिम्ब पकड़ में आ जाए परन्तु नाड़ी की धड़कन की गति को जानना मुश्किल काम है। दो0 काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।। व्याख्या : किस वस्तु को अग्नि नहीं जला सकती है और कौन सी वस्तु समुद्र में समा नहीं जाती है अर्थात् ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे अग्नि नहीं जला सके और समुद्र में समा नहीं सके। उसी प्रकार ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसे अबला स्त्री अर्थात शरीर की नाड़ी प्रबल हो उठने पर कर न सके। अर्थात् नाड़ी की धड़कन प्रबल हो उठने पर कर न सके। अर्थात् नाड़ी की धड़कन प्रबल होने पर भाव पैदा करके असम्भव को भी सम्भव कर देती है। संसार में ऐसा भी कोई नहीं है, जिसे काल नहीं खाता है। का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।। एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। ब डिग्री बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।। व्याख्या : क्या सुनाकर क्रिया (विधि) ने क्या कर दिया। साधक प्रारम्भ में साधना की शुरूआत तो सुख, वैभव व शान्ति की प्राप्ति के लिए करता है परन्तु साधना परिपक्व हो जाने पर आत्मा परमात्मा में लीन होने लगती है और सांसारिक सुख व वैभव की इच्छा भी नहीं रह पाती है। उसी को यहाँ लिखा गया है कि क्रिया ने क्या कर दिया? उस समय सभी भाव कहने लगते हैं कि चित रूपी राजा ने एक कार्य ठीक नहीं किया कि कुबुद्धि युक्त रजोवृति को वर सोच-समझ कर नहीं दिया अर्थात् सांसारिक सुख भोगों का त्याग करना उचित नहीं हुआ। यह त्याग-संग्रह का द्वन्द्व बहुत सूक्ष्मता के साथ साधना के दौरान चलता रहता है। उसी द्वन्द्व की अवस्था का यहाँ वर्णन किया है। जो हटिभयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।। एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहिं दोसु नहिं देहिं सयाने।। व्याख्या : हठपूर्वक साधना करने पर ही यह दु:ख का कारण पैदा हुआ है अर्थात् हठपूर्वक साधना करने पर ही नाड़ी की धड़कन त्याग के भाव को प्रबल करने के लिए बाध्य हो गयी। इसलिए चित रूपी राजा आत्मा रूपी राम में लीन होना चाहने लगे हैं और उसी अवस्था से बलपूर्वक विषय रसों का त्याग सम्भव हो गया है। सांसारिक भावों के लिए त्याग का प्रबल होना और आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही दु:ख का कारण होता है। इसलिए इस धारणा अर्थात् परमात्मा में लीन होने की धारणा के रहस्य को जानकर चतुर लोग चित रूपी राजा को दोष नहीं लगायेंगे। सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।। एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।। व्याख्या : शिबि, दधीचि व हरिश्चन्द्र के त्याग की कुछ लोग (भाव) कहानी बताते हैं, तो कुछ भाव रूपी लोग भरत रूपी त्याग की सहमति बताते हैं, तो कुछ भाव उदासीन होकर (कुछ भी नहीं कहकर) रह जाते हैं। कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।। सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रान पिआरे।। व्याख्या : कुछ भाव रूपी लोग कान बन्द करके कहते हैं कि यह कहना कि भरत रूपी भावरत भाव की इसमें सहमति है, अनुचित है। ऐसा कहने से पुण्यों का नाश हो जायेगा अर्थात् चिन्ता पैदा हो जायेगी। क्योंकि आत्मा रूपी राम तो भरत रूपी भावरत भाव को प्राणों के समान प्रिय होते हैं। अर्थात् आत्मा और भावरत भाव में बहुत मेल होता है। दो0 चंदु चवै ब डिग्री अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।। व्याख्या : चाहे चन्द्रमा शीतल किरणों की जगह अग्नि के कण बरसाने लग जाए और अमृत भले ही जहर का काम करने लग जाए परन्तु भावरत रूपी भरत भाव कभी भी आत्मा रूपी राम के प्रतिकूल नहीं हो सकता है। एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।। खरभ डिग्री नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।। व्याख्या : कुछ भाव क्रिया पद्धति को दोष लगाते हैं कि क्रिया पद्धति ने अमृत दिखाकर जहर दे दिया अर्थात् जय, रूप, यश, वैभव की कल्पना कराकर त्याग भाव को प्रबल कर दिया। यह बात सुनकर समस्त शरीर रूपी नगर में खलबली मच गयी और भाव रूपी लोग दु:खी हो गए और उनका उत्साह ठंडा पड़ गया। बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी । जे प्रिय परम कैकई केरी।। लगीं देन सिख सीलु सराही। वचन बानसम लागहिं ताही।। व्याख्या : विशुद्ध प्रकाश वाली जो कुछ इच्छाएँ थी और जो कुलमान्य अर्थात् जीवात्मा को प्रभावित करने वाली थी तथा रजोवृति रूपी कैकयी को जो बहुत प्रिय थी। वे सब रजोवृति के शील व स्नेह की सराहना करते हुए शिक्षा देने लगी। परन्तु उनके वचन रजोवृति रूपी कैकयी को बाण के समान लग रहे थे। भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।। करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।। व्याख्या : हे रजोवृति रूपी कैकयी! तुम तो सदा कहती थी कि राम के समान तो मुझे भरत भी प्रिय नहीं है अर्थात् आत्मा के समान तो मुझे भावरत भाव पसन्द नहीं है। इस बात को समस्त भाव रूपी संसार जानता है। तुम तो आत्मा रूपी राम पर सदैव सहज प्रेम करती रहती हो परन्तु अब किस अपराध के कारण उसे वनवास अर्थात् विषयों से दूर कर रही हो। अर्थात् तुम तो आत्मा पर सदैव भोगों का आवरण रखती हो परन्तु अब क्यों त्याग भाव को प्रबल कर रही हो। कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सब देसू।। कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।। व्याख्या : तुमने तो कभी भी आत्मा रूपी राम के साथ सौतेला व्यवहार नहीं किया है। तुम्हारे प्रेम और विश्वास को तो सभी भाव रूपी संसार जानता है। परन्तु अब सतो वृति रूपी कौशल्या ने तुम्हारी क्या बुरा कर दिया जो तुम समस्त शरीर रूपी नगर पर विषयों से विमुख रूपी वज्र का प्रहार कर रही हो। दो0 सीय कि पिय सँगु परि हरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहिं बिनु राम।।49।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता बिना आत्मा रूपी राम के नहीं रह पायेगी और लक्षणों को लखने वाला लक्ष्मण रूपी भाव भी बिना आत्मा रूपी राम के शरीर रूपी घर में नहीं रह पायेगा और त्याग रूपी भरत भी शरीर रूपी नगर का राज नहीं करेगा तथा चित रूपी राजा भी बिना आत्मा रूपी राम के जीवित नहीं रह पायेगा। अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।। भरतहि अवसि देहु जुबराजु। कानन काह राम कर काजू।। व्याख्या : ऐसा विचार कर हे रजोवृति रूपी कैकयी! तुम क्रोध करना छोड़ दो और चिन्ता के कलंक का घर मत बनो। तुम जरूर त्याग रूपी भरत भाव को युवराज कर दो अर्थात् त्याग भाव में जरूर बरतो परन्तु आत्मा रूपी राम को विषयों से विमुख करने का क्या लाभ है? नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।। गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस ब डिग्री दूसर लेहू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम राज के भूखे नहीं है अर्थात् आत्मा विषयों में लिप्त नहीं होती है। आत्मा तो धर्म को धारण करने वाली धुरी होती है और सहज में विषयों से निर्लिप्त रहती है। तुम (रजोवृति) चित रूपी राजा से दूसरा वरदान ये ले लो कि आत्मा रूपी राम गुरु के घर में जाकर रह लें अर्थात् विशिष्ट ज्ञान की अवस्था में रहें परन्तु उन्हें वनवास अर्थात् विषयों से विमुख मत करो। जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहिह कुछ हाथ तुम्हारे।। जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।। व्याख्या : जो तुम (रजोवृति) हमारा कहना नहीं मानोगी तो तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं लगेगा। अगर तुमने हँसी मजाक किया है तो उसे प्रकट कर दो। राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहँ लोगू।। उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम वनवास अर्थात् विषय विमुख करने योग्य नहीं है। तुम सोचो तुम्हें भाव रूपी लोग क्या कहेंगे? इसलिए जल्दी उठो और वह उपाय करो जिससे शोक का कलंक मिट जाए। अर्थात् भावों में विषयों से विमुख होने का जो शोक छाया है, वो मिट जाए ऐसा उपाय करो। छ0 जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फे डिग्री रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही।। जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी।। व्याख्या : जिस भी प्रकार से शोक का कलंक मिट जाए ऐसा उपाय करो। अर्थात् ऐसी विधि का पालन करो, जिससे आत्मा निर्मल भी रहे और विषय भोग भी भोग लिए जाएँ। इसलिए आत्मा रूपी राम को हठपूर्वक परमात्मा में लीन होने से रोको। उसी को आत्मा रूपी राम को वन जाने से रोकना बोलकर लिखा गया है। क्योंकि जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चन्द्रमा के बिना चाँदनी नहीं हो सकती हैं, वैसे ही आत्मा रूपी राम के बिना शरीर रूपी अयोध्या में आनन्द का रस नहीं रहेगा। इसलिए हे रजोवृति रूपी कैकयी! इस बात को अपने हृदय में समझो। सो0 सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।50।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी को सहज भोगवृति रूपी सखियों ने नाना प्रकार से मधुर परिणाम वाली शिक्षा (सिखावन) दी। परन्तु कुबुद्धि रूपी मंथरा द्वारा कुटिलतापूर्वक सिखाई हुई रजोवृति रूपी कैकयी ने सब अनसुना कर दिया। उत डिग्री न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।। ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी ।। व्याख्या : उस अवस्था में रजोवृति रूपी वृति कोई उत्तर नहीं देती है और सद्इच्छा रूपी वृतियों को ऐसे देखती है मानो भूखी शेरनी हिरणियों को देखती है। ऐसी अवस्था में सात्विक इच्छाओं रूपी वृतियों ने रजोवृति की हठ को देखकर उसे मन्द बुद्धि व अभागी कहकर छोड़कर चली गयी। अर्थात् सद्इच्छाओं की वृतियाँ भी रजोवृति को दृढ़ त्याग से नहीं हटा सकी। राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।। एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।। व्याख्या : यह रजोवृति तो राज पाने पर डूबो देगी क्योंकि इसने ऐसा किया है जो कोई नहीं करता है अर्थात् विषयों भोगों का पूर्णत: त्याग कोई नहीं करता है। इस प्रकार शरीर रूपी नगर के नड़-नाड़ी नाना प्रकार से विलाप करने लगे अर्थात् व्याकुल हो गए और कुचाल को नाना प्रकार से गाली देने लगे। जब साधना में साधक मंजिल प्राप्ति के निकट पहुँचने लगता है, तो त्याग-वैराग्य भाव प्रबल हो उठता है। उससे शरीर की नड़-नाड़ियों में प्रारम्भ में व्याकुलता सी होने लग जाती है। क्योंकि कभी-कभी तो ऐसा भी लगने लग जाता है कहीं शरीर नहीं छूट जाए। कभी लगता है सांसारिक भोगों को छोड़ने का क्या लाभ है? आदि-आदि प्रश्न मस्तिष्क में आने लगते हैं, जिससे नाड़ियों व नाड़ियों से उत्पन्न भावों में विकलता पैदा हो जाती है। जरहिं बिषम जर लेहिंउसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।। बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी ।। व्याख्या : शरीर रूपी नगर के भाव रूपी नर-नारियाँ विषयों से विमुख होने के कारण जलने लगते हैं और लम्बा श्वास लेते हुए कहते हैं कि आत्मा रूपी राम के बिना विषयों के भोगों की क्या उम्मीद है? इस प्रकार आत्मा रूपी राम के वियोग हो जाने के कारण भाव रूपी प्रजा व्याकुल हो उठी। जैसे जल में रहने वाले जलचर प्राणी जल सूखने पर व्याकुल हो उठते हैं। वैसे ही विषयी भाव विषयों के त्याग होने की अवस्था में व्याकुल हो उठते हैं। अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं।। मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।। व्याख्या : भाव रूपी नर-नारी तो विषाद अर्थात् विषयों के त्याग के भय के वश में हो गए और आत्मा रूपी राम जो इन्द्रियों के स्वामी होते हैं, सतोवृति सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता के पास गए। अर्थात् आत्म ऊर्जा ने सुष्मना नाड़ी में प्रवेश किया। उस अवस्था में साधक का मुख प्रसन्न व चित चार गुना उत्साह से भर जाता है और आत्मा रूपी राम का विषाद भी मिट जाता है कि चित रूपी पिता ने रोका नहीं। दो0 नव गयंदु रघुबीर मनु राज अलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का मन अर्थात् साधक का मन नए हाथी के समान होता है तथा राज की प्राप्ति अर्थात् सांसारिक विषय सुख भोग मन रूपी हाथी के लिए काँटेदार लोहे की जंजीर होते हैं। अत: आत्मा रूपी राम को वन गमन अर्थात् परमात्मा में लीन होने की चाह ने हृदय में बहुत अधिक आनन्द पैदा कर दिया। क्योंकि उस अवस्था में साधक विषय सुख भोग के बंधन से अपने आपको मुक्त पाता है। यही साधक के आनन्द का मूल कारण है। रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।। दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने दोनों हाथ जोड़कर अर्थात् पूरी तरह द्वैत भाव से मुक्त होकर प्रसन्न होते हुए सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता के सीस झुकाया अर्थात् निर्मलता के साथ सुष्मना नाड़ी में आत्मा रूपी राम ने समर्पण कर दिया। तब सुष्मना नाड़ी रूपी माता ने आत्मा रूपी राम को हृदय से लगा लिया अर्थात् आत्म चेतना सुष्मना नाड़ी में प्रवेश कर गयी, जिससे वासनाओं व भोगों की बची हुई इच्छाओं का भी त्याग हो गया। बार-बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।। गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता बार-बार चुम्बन करने लगी अर्थात् सुष्मना नाड़ी में ध्यान गहरा होने लगा। जिससे आँखों में प्रेम का जल आ गया और अंग-अंग पुलकित हो उठे। फिर कौशल्या रूपी माता ने गोद में बैठाकर बार-बार हृदय से लगा लिया अर्थात् आत्म चेतना सुष्मना नाड़ी में स्थिर होकर रमण करने लग गयी। जिससे प्रेम रस की वर्षा होने लग गयी। प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।। सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।। व्याख्या : प्रेम के आनन्द में वाणी मौन होने लग गयी। साधना में जब ध्यान सुष्मना नाड़ी में स्थिर होने लगता है, तो भावों का वार्तालाप भी बन्द होने लग जाता है। उसी अवस्था को वाणी का मौन होना कहा जाता है। उस समय आनन्द उमड़ पड़ता है तथा ऐसे लगने लगता है मानो भिखारी को कुबेर का पद मिल गया हो। तब आत्मा रूपी राम के निर्मल स्वरूप को देखकर कौशल्या रूपी माता बोली। कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।। सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।। व्याख्या : हे आत्मरूपी राम! बताइये मंगलकारी लग्न कब है। जो पुण्य, शीलता व सुख की सीमा है तथा जन्म लेने के फल की अवधि का लाभ है। अर्थात् परमात्मा में मिलने की वह शुभ लग्न कब आयेगी, जो समस्त सुखों की मूल है। दो0 जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।। व्याख्या : जिस परम मिलन की अवस्था का समस्त भाव रूपी नर-नारियाँ बड़ी आतुरता से इंतजार कर रहे हैं, जैसे प्यासे चातक व चातकी शरद ऋतु के स्वाति नक्षत्र की वर्षा का इंतजार कर रहे हैं। तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।। पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैया।। व्याख्या : हे तात (आत्मा)! मैं आपकी बलिहारी जाती हूँ और शीघ्र आनन्द रूपी जल में स्नान करती हूँ और मन के भावों के अनुसार जो अच्छा लगे खा लो। ध्यान की इस अवस्था में साधक को सिद्धि लाभ हो जाता है। उसी को ""मधुर कछु खाहू"" बोलकर लिखा गया है। तब तुम चित रूपी पिता के पास जाना क्योंकि ध्यान की अवस्था में रहते बहुत देर हो गयी है। मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरत डिग्री के फूला।। सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भँव डिग्री न भूला।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता के अति अनुकूल वचनों को सुनकर, जो प्रेम के कल्पत डिग्री के फूलों के समान थे और जो सुख के रस से भरे हुए व श्री के मूल थे। अर्थात् जो रिद्धि-सिद्धियों को देने वाले थे। उनको भी देखकर आत्मा रूपी राम का मन रूपी भ्रमर नहीं लुभाया अर्थात् आत्मा का सिद्धियों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा। धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।। पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भांति मोर बड़ काजू।। व्याख्या : धर्म को धारण करने वाले व धर्म की गति को जानने वाले आत्मा रूपी राम ने अति मधुर वाणी में सुष्मना रूपी कौशल्या माता से कहा कि मुझे तो चित रूपी पिता ने वन का राज दिया है अर्थात् मुझे तो परमात्मा से मिलने की प्रेरणा की है, जिससे मेरा सब प्रकार से बड़ा कार्य होगा। आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।। जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।। व्याख्या : अत: हे माता! अब प्रसन्न मन से मुझे आज्ञा दीजिए, जिससे वन में जाना मेरे लिए मंगलकारी हो अर्थात् परमात्मा में लीन होकर मंगलकारी अवस्था को प्राप्त कर सकूँ। तुम प्रेम के वश में होकर नहीं डरना। तुम्हारी कृपा से अर्थात् सुष्मना नाड़ी की अनुकूलता से मेरा आनन्द ही आनन्द होगा। दो0 बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान। आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।। व्याख्या : मैं चौदह (बरस उ ब अ रस उ अर्थात् बिना रस के) वर्ष अर्थात् दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार में बिना रस के बरतता हुआ, चित की प्रेरणा को सिद्ध करता हुआ परमात्मा में लीन होकर पुन: सहज अवस्था में आकर आप सबको आकर मिलूँगा। इसलिए मन में किसी प्रकार की ग्लानि मत करो। बचन बिनीत मधुर रघबुर के। सर सम लगे मातु उर करके।। सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के निर्मल मधुर वचन कौशल्या रूपी माता को बाण के समान लगे। वह आत्मा रूपी राम की शीतल वाणी अर्थात् वासना रहित वाणी को सुनकर वैसी ही मुरझा गयी, जैसे जवासा का पेड़ वर्षा के पानी पड़ जाने पर मुरझा जाता है। कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।। नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।। व्याख्या : उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी के विषाद (विषयों के अंत होने का दु:ख) का वर्णन नहीं किया जा सकता है। जैसे शेर की आवाज को सुनकर हिरनी सहम जाती है। सुष्मना नाड़ी में विशेष हार्मोन निकलने लग गया और कम्पन पैदा हो गया जैसे पहली वर्षा ऋतु के फेन को खाकर मदहोश मछली की अवस्था हो जाती है। जब ध्यान स्थिर होता है तब आनन्द की अवस्था रहती है परन्तु ध्यान में जब विषय वासना छूट ने लगती है तो एक भय सा पैदा हो जाता है। उसी को विषाद बोलकर लिखा है। उससे ध्यान में कम्पन आ जाता है और ध्यान विचलित हो जाता है। धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।। तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।। व्याख्या : तब धैर्य धारण करके और आत्मा रूपी राम के स्वरूप को देखकर सुष्मना नाड़ी रूपी माता गदगद वाणी बोली कि हे तात! तुम तो चित रूपी राजा को प्राणों के समान प्रिय हो और तुम्हारे चरित को देखकर तो चित रूपी राजा नित्य प्रसन्न होता रहता है। राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।। तात् सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने तो तुमको राजतिलक करने के लिए शुभ दिन का विचार किया था अर्थात् समस्त भावों को आत्मोन्मुखी करने का विचार किया था परन्तु अब किस अपराध के कारण समस्त भावों को व विषय भोगों को छोड़ने के लिए कह रहे हैं। हे तात्! तुम मुझे इसका कारण बताओ कि कौन जीवात्मा के सुख भोगों को नष्ट करना चाह रहा है? दो0 निरखि राम रूख सचिव सुत कारनु कहेउ बुझाइ। सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम के मनोभाव को जानकर सुमंत्रणा रूपी सचिव के निर्मल मंत्रणा रूपी पुत्र ने कारण समझा कर बताया। उस प्रसंग को सुनकर सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या एकदम मूक हो गयी। उस अवस्था का किसी भी प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता है। राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारून दाहू।। लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी उस अवस्था में न तो आत्म चेतना को रहने के लिए बोल पाती है और न ही जाने को बोल पाती है। लिख तो चन्द्रमा रहे थे परन्तु लिख दिया राहू क्योंकि विधि अर्थात् क्रिया की गति सबको विपरीत होती है। अर्थात् क्रिया की प्रतिक्रिया स्वभाविक है। धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।। राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अ डिग्री बंधु बिरोधू।। व्याख्या : धर्म और प्रेम दोनों के बीच में बुद्धि घिर गयी और सुष्मना नाड़ी विचार करने लगी कि अगर अनुरोध करके आत्मा रूपी राम को रख लूँ तो धारणा मिट जायेगी और भावों में विरोध पैदा हो जायेगा। कहउँ जान बन तौ बड़िहानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।। बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।। व्याख्या : अगर आत्मा रूपी राम को विषयों का त्याग करके परमात्मा में लीन होने को बोलूँ तो विषय भोगों की बड़ी हानि होगी। इस प्रकार सुष्मना नाड़ी विवश होकर सोच में पड़ गयी। तब बहुत प्रकार से तीन गुणों के धर्म को जानकर और आत्मा व भावरत भाव को समान समझकर। सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।। तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।। व्याख्या : सरल स्वभाव वाली सुष्मना नाड़ी रूपी आत्मा रूपी राम की माता धैर्य धारण करके बोली कि हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा ही किया है कि चित रूपी पिता की आज्ञा मानना ही अर्थात् चित की प्रेरणा का अनुसरण करना ही धर्म का प्रतीक है। दो0 राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु। तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।। व्याख्या : तुमको चित रूपी राजा ने राज देने की बात कहकर अर्थात् सभी भावों को आत्मोन्मुखी करने की बात कहकर तुम्हें वनवास दे दिया अर्थात् भावों से उदासीन होकर परमात्मा में लीन होने की प्ररेणा कर दी। इस बात का मुझे लेशमात्र भी क्लेश नहीं है। परन्तु तुम्हारे बिना भावरत भाव रूपी भरत का राजा होने से प्रजा बहुत दु:खी होगी। जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।। जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना।। व्याख्या : अगर केवल चित रूपी पिता की ही प्रेरणा है, तब तो चित वृति रूपी माता को बड़ी जानकर तुम विषयों से विमुख (वनवास) मत होवो। परन्तु अगर चित रूपी पिता व चितवृति रूपी माता की आज्ञा है, तो विषयों से विमुख (वनवास) होना करोड़ों अवधी रूपी शरीरों के समान होगा। पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरूह सेवी।। अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।। व्याख्या : चित रूपी पिता वन का देवता अर्थात् विषय विरक्त और चितवृति रूपी माता वन की देवी अर्थात् वासनारहित होती है। नाना इच्छा रूपी खग व मृग उनकी सेवा करते हैं। अंत में भी चित रूपी राजा को वनवास अर्थात् विषयों से विरक्त होना उचित ही तो है। परन्तु मैं तो तुम्हारी किशोर अवस्था को देखकर थोड़ा दु:खी होती हूँ। बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुवंस तिलक तुम्ह त्यागी।। जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।। व्याख्या : विषयों से मुक्त अवस्था ही बड़े भाग्यवाली होती है। जबकि शारीरिक भोगों की अवस्था बन्धन वाली होती है। अत: तुमने विषय भोग रूपी राज का त्याग कर दिया है, तो तुम बड़े भाग्यवान हो। हे वत्स! अगर मैं (सुष्मना) तुम्हारे साथ चलने को कहूँ तो तुम्हें संदेह हो जायेगा। पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।। ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।। व्याख्या : हे वत्स! तुम तो समस्त भावों व वृतियों को प्रिय हो और प्राणों के प्राण हो तथा जीव का जीवन हो। अत: तुम तो विषयों से विरक्त होना चाहते हो और मैं बैठकर पश्चाताप करती हूँ। दो0 यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ। मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।। व्याख्या : मैं झूठा स्नेह बढ़ाकर हठ नहीं करूँगी वरना तुम्हारी परमात्मा में लीन होने की सुरता विचलित हो जायेगी। वास्तव में जब आत्म चेतना परमात्मा में लीन होने लगती है तो सुष्मना नाड़ी भी द्वैत भाव में फँस जाती है। एक तरफ तो सोचती है कि विषय भोग मिट जायेंगी और दूसरी तरफ परमात्मा में लगी सूरता के विचलित होने की शंका सताने लगती है। उसी भाव द्वन्द्व की अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहुँ पलक नयन की नाईं।। अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करूनाकर धरम धुरीना।। व्याख्या : हे इन्द्रियों के स्वामी (गो साईं)! तुम ही देवता व पितृ सब कुछ हो अर्थात् आत्म चेतना से भाव रूपी देवता पैदा होते हैं और आत्म चेतना से जीव की उत्पत्ति होती है। इसलिए जैसे पलक आँखों की रक्षा करते हैं, वैसे तुम समस्त भावों की सहज में ही पालना करते हो। अवधी रूपी शरीर समुद्र के जल समान है और प्रिय-परिजनों के भाव मछलियों के समान है तथा तुम करूणाकर धर्म को धारण करने वाली धुरी के समान हो। अस बिचारी सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटहु आई।। जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।। व्याख्या : इसलिए ऐसा विचार करके ऐसा उपाय कीजिए जिससे भाव रूपी कुटुम्बियों और प्रियजनों को पुन: भेंट हो सके। अर्थात् गुणों के गुणों में बरतने की अवस्था पैदा कर दीजिए। मैं बलिहारी जाती हूँ कि तुम भाव रूपी प्रियजनों और गाँव को अनाथ करके अर्थात् छोड़कर सुखपूर्वक वन में जाओ अर्थात् परमात्मा में लीन हो जाओ। सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।। बहु बिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।। व्याख्या : आज सब पुण्यों की सीमा आ गयी है, जिसके कारण भोग रूपी सर्पो के काल विपरीत हो गया है अर्थात् आत्मा के परमात्मा में लीन होने पर समस्त भोगों का त्याग हो जायेगा। भोगों का त्याग ही साधना के दौरान कष्टकारी लगने लगता है। उसी भाव अवस्था को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। इस प्रकार नाना प्रकार से सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या विलाप करती हुई आत्मा रूपी राम के चरणों में लिपट गयी अर्थात् सुष्मना नाड़ी ने भी समर्पण कर दिया। सुष्मना नाड़ी अपने आपको परम अभागिनि अर्थात् भोगों से रहित मानकर आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर देती हैं। दारून दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।। राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।। व्याख्या : भोगों के त्याग को देखकर हृदय में प्रारम्भ में बहुत कष्ट होता है, जिसके विलाप करने की क्रिया का वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब उस अवस्था में आत्म चेतना रूपी राम ने सुष्मना नाड़ी रूपी माता को अपने हृदय से लगा लिया और फिर बहुत प्रकार से समझाकर मधुर वचन कहे। दो0 समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ। जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।। व्याख्या : ध्यान की उस गहरी अवस्था को देखकर सुरता रूपी सीता व्याकुल होकर उठ गयी और सुष्मना नाड़ी रूपी सासु के चरणों में सीस झुकाकर बैठ गयी अर्थात् आत्म चेतना के साथ सुरता भी सुष्मना नाड़ी में लग गयी। दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।। बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।। व्याख्या : अब सुष्मना नाड़ी रूपी सासु ने मधुर वाणी में आशीर्वाद दिया और सुरता रूपी सीता को निर्मल देखकर व्याकुल हो गयी अर्थात् सुरता को भी निर्मल देखकर लगने लगा कि अब सचमुच में परमात्मा में लीनता की अवस्था आ जायेगी। यह वास्तविकता है जब परमात्मा में लीनता की अवस्था आती है तो साधक भीतर से व्याकुल हो उठता है क्योंकि अन्त:करण में कहीं न कहीं भोग वासना छुपी रहती है। वो भोगवासना ही व्याकुलता पैदा करती है। सुरता रूपी सीता मुख झुकाकर सोच मग्न होकर बैठी है, जो रूप की राशि हैं व आत्मा रूपी पति के पवित्र प्रेम से युक्त हैं। चलन चहत बन जीवन नाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।। की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।। व्याख्या : इन चौपाइयों में साधक की सुरता की मनोदशा का बहुत सूक्ष्मता के साथ वर्णन किया गया है। सुरता रूपी सीता सोचती हैं कि आत्मा रूपी जीवन के स्वामी वन को अर्थात् परमात्मा में लीन होना चाहते हैं परन्तु कौन से सुकृत्य से इनके साथ परमात्मा में लीन हुआ जा सकता है। क्या प्राण व शरीर दोनों के सहित लीन हुआ जा सकता है या फिर केवल प्राणों के माध्यम से ही लीन हुआ जा सकता है। साधना की क्रिया के परिणाम को जाना नहीं जा सकता है। चारूचरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।। मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।। व्याख्या : जब ध्यान सुष्मना नाड़ी में गहराने लगता है तो सुरता धीरे-धीरे उर्ध्वगामी होने लगती है और उसी समय नूपुरों की ध्वनि सुनाई पड़ने लग जाती है, जिसकों कवियों ने मधुर भाषा में बताया है। तब उस अवस्था में नूपुर ध्वनि ऐसी विनती करने लगते हैं कि हम सुरता रूपी सीता से अलग नहीं हो। साधना में जब नूपुर ध्वनि आने लग जाती है, तो सुरता और ध्वनि अभिन्न से हो जाते हैं। उसी को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा है। मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।। तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सास ससुर परिजनहि पिआरी।। व्याख्या : उस ध्यानावस्था में आँखों से प्रेमाश्रु झरने लगते हैं। अत: उस अवस्था को देखकर सुष्मना नाड़ी रूपी माता बोली कि हे तात! सुरता रूपी सीता अभी सुकुमारी है अर्थात् सुरता अभी किशोरावस्था में है और सास-श्वसुर व कुटुम्बियों को अर्थात् चित व चित की नाड़ियों व भाव रूपी कुटुम्बियों सबको प्यारी लगती है। दो0 पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता के पिता विदेह रूपी जनक राजाओं के शिरोमणि हैं और चित रूपी श्वसुर सूर्यकुल के सूर्य हैं अर्थात् चित के द्वारा स्वरों का उद्गम होता है। सुरता रूपी सीता के पति रविकुल अर्थात् स्वरों से उत्पन्न भावों के कुमुद रूपी वन अर्थात् इच्छाओं को शान्त करने के लिए चन्द्रमा के समान शीतल हैं और रूप व गुणों के घर है। मैं पुनि पुत्र बधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।। नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानकिहिं लाई।। व्याख्या : मैंने सुरता रूपी प्रिय बहू को प्राप्त किया है, जो रूप की राशि, गुणों व शील से युक्त है। मैंने आँखों की पुतली की तरह उससे प्रेम किया और अपने प्राण इसमें लगा रखे हैं। साधना में जब प्राण सुरता में लग जाते हैं, तब ही सुरता उर्ध्वगामी हो पाती है। कल्पबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।। फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।। व्याख्या : मैंने सुरता रूपी कल्पना की बेल को प्रेम रूपी जल से सींच कर बहुत प्रकार लाड-चाव से पाला है और साधना क्रिया के कारण फूलने फलने के समय कल्पना का त्याग करके परमात्मा में लीन होने को चली है। पता नहीं अब इसका क्या परिणाम होगा? पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।। जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता ने कभी पलंग के ऊपर से उतर कर गोदी के अलावा कठोर भूमि पर पैर नहीं रखा है। यहाँ पलंग का तात्पर्य चार गुणों की अवस्था से है। सत, रज, तम व गुणातीत का तात्पर्य ये पलंग के चार पाए होते हैं और गोदी का तात्पर्य गो अ दि अर्थात् इन्द्रियों से है। कहने का तात्पर्य यह है कि सुरता या तो गुणों की चार अवस्थाओं में बरतती है या फिर इन्द्रियों में रमण करती है। साधारणत: कभी भी सुरता भावहीन अवस्था में प्रवेश नहीं करती है। भावहीन अवस्था को ही कठोर भूमि कहा गया है। सुष्मना नाड़ी कहती है कि मैंने तो संजीवनी बूटी की तरह सुरता को पाला है और कभी भी दीपक बाती करने को नहीं कहा है अर्थात् सहज रखा है कभी भी ज्ञान-अज्ञान की बात नहीं कही है। सुष्मन नाड़ी में जब सुरता रहती है, तो हमेशा सहज (सुकुमारी) अवस्था में ही रहती है। सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।। चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रूख नयन सकइ किमि जोरी।। व्याख्या : वही सुरता रूपी सिय वन को अर्थात् आपके साथ परमात्मा में लीन होना चाहती हैं। आपकी क्या आज्ञा है? क्योंकि जैसे चन्द्रमा की किरणों की रस लेने वाली चकोरी क्या कभी सूर्य की तरह देख सकती है? अर्थात् जो सुरता परमात्मा में लग गयी है, वो क्या विषय वासनाओं की तरफ आकर्षित हो सकती है? दो0 करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि। विष वाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।। व्याख्या : जिस वन में सिंह, राक्षस व अन्य दुष्ट जीव जंतु विचरण करते हैं अर्थात् परमात्मा में लीन होने के रास्ते में जो कठिनाइयाँ हैं, उनको क्या सुरता रूपी सीता सहन कर सकती है? विष की वाटिका में क्या संजीवनी जड़ी शोभा देती है? बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।। पाहन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।। व्याख्या : वन के लिए तो कोल-किरातों की किशोरी (अर्थात् त्याग वैराग्य से उत्पन्न इच्छाएँ जो विषयों के सुखों से परे होती हैं) उपयुक्त होती हैं। जिनका हृदय का स्वभाव पत्थर के कीड़ों के समान कठोर होता है और जिन्हें कभी मन में कोई क्लेश नहीं होता है। कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।। सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्र लिखित कपि देखि डेराती।। व्याख्या : या फिर वन तपस्वी स्त्रियों के लिए उपयुक्त होता है, जिन्होंने तपस्या के लिए सब भोगों का त्याग कर दिया अर्थात् विषय से विमुख तो वे वृतियाँ या इच्छाएँ हो सकती हैं, जो तपरत हैं। सुरता रूपी सीता कैसे विषयों से विमुख (वन में रह सकती है) हो सकती है, जो चित्रों के दृश्य को देखकर भी विचलति हो जाती हो। सुरता दृश्यों को देखकर भी चंचल हो उठती है। सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।। अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।। व्याख्या : जो सुरता स्वरों से उत्पन्न सुभग उ सुभ अ भग अर्थात् अच्छे देव भावों में रहने वाली है, वो क्या विषय रस हीन तलैयों में रह सकती है? अर्थात् परमात्मा में लीन तो हंसकुमारी अर्थात् हकार सकार से उत्पन्न सुरता ही हो सकती है। ऐसा विचार कर बताइये जैसी आज्ञा हो मैं वैसी सुरता रूपी सीता को शिक्षा दूँ। अर्थात् स्वरों के माध्यम से उत्पन्न सुरता तो देव भावों में रमण करने वाली होती है और हकार सकार से उत्पन्न सुरता परमात्मा में लीन होने वाली होती है। अत: जैसी आत्म चेतना हो, वैसी ही सुरता को तैयार किया जाए। जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।। सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी माता बोली कि अगर सुरता रूपी सीता भवन यानी भावों में रमण करे, तो मुझे बहुत सहारा मिल जायेगा। इस प्रकार सुष्मना नाड़ी की बाणी को सुनकर जो शील व प्रेम रूपी अमृत से सनी हुई थी, आत्मा रूपी राम बोले। दो0 कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।। व्याख्या : तब मधुर व विवेकपूर्ण बातें करके आत्मा रूपी राम ने सुष्मना नाड़ी रूपी माता को समझाया और फिर सुरता रूपी सीता को वन के प्रकट गुण दोषों का वर्णन करके समझाया। ।। मास पारायण, चौदहवाँ विश्राम।। मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।। राजकुमारि सिखावनु सुनहू।आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम सुष्मना नाड़ी रूपी माता के सामने कहने में संकोच करते हैं परन्तु समय की आवश्यकता को मन में समझकर बोले कि हे राजकुमारी रूपी सुरता! तुम मेरी सिखावन ध्यान से सुनो। मेरी बात को हृदय में दूसरी तरह मत समझ लेना। आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।। आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।। व्याख्या : हे सुरता रूपी सीता! तुम अगर अपना और मेरा भला चाहती हो तो मेरे वचनों को मानकर घर में ही रहो अर्थात् सहज रहो और गुणों को गुणों में बरतने दो। मेरी आज्ञा का पालन होगा और श्वास रूपी सासु की सेवा होगी, जिससे सब प्रकार से भावों में बरतने पर भी भलाई ही होगी। एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।। जब जब मातु करहिं सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।। व्याख्या : श्वास रूपी सासु और स्वरों की सेवा अर्थात् श्वास और सुरों की साधना करने के बराबर दूसरा कोई धर्म नहीं होता है। जब-जब सुष्मना नाड़ी रूपी माता मुझआत्मा को याद करेंगी और तब उनकी बुद्धि भोली हो जायेगी अर्थात् सुष्मना नाड़ी में तब आत्म चिन्तन चलने पर बुद्धि के भाव स्वत: निर्मल हो जाते हैं। तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।। कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।। व्याख्या : तब-तब तुम पुरानी बातें कह कर अर्थात् सुष्मना नाड़ी रूपी माता की सुरता को पिछली बातों की याद दिलाकर मधुर वाणी में समझाना। मैं (आत्मा) तुम्हें यह सब सपथ सत्य अर्थात् सहजता का अनुसरण करते हुए कहता हूँ। हे सुमुखि! मैं तुमको सुष्मना नाड़ी रूपी माता के हित के लिए ही यहाँ रखना चाहता हूँ। दो0 गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।। व्याख्या : श्वास रूपी सासु और सुर रूपी श्वसुर की सेवा अर्थात् साधना करने से ज्ञान रूपी प्रकाश और सुरता से होने वाली वेद अनुभूति का फल बिना ही कष्ट के मिल जाता है। हठपूर्वक साधना करने पर तो गाल्वमुनि व नहुष राजा ने व्यर्थ में कष्ट भोगे थे। मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।। दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।। व्याख्या : मैं पुन: चित रूपी पिता की आज्ञा का पालन करके अर्थात् परमात्मा में लीन होकर हे निर्मल सुरता! पुन: आ जाऊँगा। दिनों को निकलने में समय नहीं लगता है। अत: हे सुन्दरी! हमारी सिखावन को ध्यान से सुनो। जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।। काननु कठिन भयंक डिग्री भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।। व्याख्या : हे प्रिय! अगर तुम प्रेम के वश में होकर हठ करोगी तो परिणाम में दु:ख ही मिलेगा। क्योंकि परमात्मा से मिलना कठिन कार्य है। परमात्मा के रास्ते में माया का भँवर जाल आता है और कहीं-कहीं विषय भोगों की शीतलता आती है, तो कहीं विषय रस रूपी जल व वायु आती है। जिसमें भटकने का डर रहता है। कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।। चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।। व्याख्या : परमात्मा से मिलने के रास्ते में नाना प्रकार के रिद्धि-सिद्धियों रूपी कंकड़-पत्थर होते हैं, जिन पर सहज होकर चलना बहुत कठिन होता है। तुम्हारे चरण कमल तो कोमल हैं अर्थात् सुरता रिद्धि-सिद्धियों के भोगों में भटक सकती है। परमात्मा से मिलने का रास्ता बहुत दुर्गम है तथा बीच-बीच में पर्वत रूपी बाधाएँ भी आती हैं। कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।। भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।। व्याख्या : पर्वतों की गुफाएँ, खोह, नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखा तक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे भयानक शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है। ध्यान में नाना प्रकार की बाधाएँ आती हैं और ध्यान जब गहरा होने लगता है, तब शरीर की सूक्ष्म नाड़ियाँ, गुफाओं, खोह, नदियाँ, नद व नालों की तरह अनुभव में आने लगती हैं तथा नाना पशु-पक्षियों की आवाजें आने लगती हैं। उसी ध्यान अनुभूति को इन चौपाइयों में नाना प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। दो0 भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।। व्याख्या : परमात्मा से मिलने की राह बहुत दुर्गम होती है। अत: इस दोहे में उसी दुर्गमता को समझाते हुए आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता से कहते हैं कि परमात्मा मिलन के लिए सहज होकर विषय वासनाओं से दूर रहना पड़ेगा तथा बलकल वसन अर्थात् वासनाओं की इच्छाओं का भी त्याग करना पड़ेगा तथा मूल परमात्मा में ध्यान रत रहना होगा। यह ध्यान की अवस्था भी सभी समय नहीं रह पाती है और परमात्मा से मिलने की अनुकूलता भी सब समय नहीं रह पाती है। अर्थात् सुरता को आत्म चेतना के साथ परमात्मा में सब समय लीन करना बहुत मुश्किल कार्य है। क्योंकि सुरता को परमात्मा में लीन करने के लिए वासना रूपी वस्त्रों का त्याग करके बलकल अर्थात् सहज होकर रहना पड़ेगा। नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।। लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।। व्याख्या : आसुरी भाव नर की धड़कन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, जो नाना प्रकार का कपटपूर्ण भेष धारण कर लेते हैं। अर्थात् नर की धड़कन से उत्पन्न ऊर्जा से नाना प्रकार के आसुरी भाव पैदा हो जाते हैं। उन आसुरी भावों से निकलने वाले हार्मोन जीव की प्रकृति को बदल देते हैं अर्थात् माया जाल में फँसा देते हैं, जिससे माया रूपी वन में घोर विपत्ति आ जाती है। जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। पहार पर पानी लगने का तात्पर्य पहार उ प अ हार अर्थात् जब आसुरी भाव सहज प्रकृति का हरण करके असहज कर देते हैं। उसे प्रतीकात्मक भाव से पहार पर पानी लगना बोलकर लिखा गया है। ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।। डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भी डिग्री सुभाएँ।। व्याख्या : जब जीव की प्रकृति असहज हो जाती है, तो वासना रूपी जहरीले सर्प व प्राणी पैदा हो जाते हैं। उस समय माया के भाव नर व नाड़ी की धड़कन को प्रभावित कर देते हैं। उसी को निशाचरों द्वारा नारियों का हरण करना बोलकर लिखा गया है। उस माया की भाव अवस्था में धीर साधक भी डरने लग जाता है। तुम तो हिरनी की आँखों की तरह चंचल व डरपोक स्वभाव की वैसे ही हो अर्थात् सुरता चंचल व भी डिग्री स्वभाव की होती है, जो भावों के द्वारा डर जाती है। हंस गवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।। मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।। व्याख्या : हंस गवनि शब्द में साधना का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में सुरता ह कार सकार के रूप में चलती रहती है इसलिए बन के योग्य नहीं कहा गया है। क्योंकि परमात्मा में सुरता के लीन होने की अवस्था बहुत कठिनता से आ पाती है। अगर सुरता को जबरदस्ती परमात्मा में लीन कराया जाए तो बीच-बीच में भावों में विषयों के विकार आ जाते हैं। उसी को भाव रूपी लोगों द्वारा अपयश देना बताया गया है। सुरता रूपी हंसिनि तो मन की चेतना (मानस) रूपी जल में पलती है अर्थात् मन के भावों से सुरता पैदा होती है। इसलिए भावहीन अवस्था अर्थात् परमात्मा में लीन होने की अवस्था में सुरता रूपी हंसिनि कैसे जीवित रह सकती है? सांसारिक भावों के लिए परमात्मा में लीनता ही लवण के समुद्र के समान होती है। नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।। रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।। व्याख्या : नए-नए विषयों के रस रूपी वन में विचरण करने वाली कोयल क्या वैराग्य रूपी करील के वन में रह पायेगी? इसलिए ऐसा विचार कर हे सुरता रूपी सीता! तुम भाव रूपी भवन में ही निवास करो क्योंकि वैराग्य रूपी बन में बहुत कष्ट है। दो0 सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।। व्याख्या : जो सुहृदय, गुरु व स्वामि की सिखावन को नहीं मानते हैं, उनको पश्चाताप करना पड़ता है और अवश्य ही नुकसान होता है। सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।। सीतल सिख दाहक भइ कैसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें।। व्याख्या : ऐसी अवस्था में आत्मा रूपी प्रिय राम के वचन सुनकर सुरता रूपी सीता के नयनों में जल आ गया और आत्मा रूपी राम की शीतल सीख ऐसी जलाने वाली लगी जैसे शरद चन्द्रमा की शीतल किरणों को छूकर चकवी जल उठती है। वास्तविकता में साधना के दौरान जब परमात्मा से लग्न लग जाती है, तो सुरता स्वत: ही आत्म चेतना के साथ परमात्मा में विलीन होना चाहती है, इसलिए सांसारिक सुख उसे कष्टकारी व बन्धनकारी लगने लग जाते हैं। उत डिग्री न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचित स्वामि सनेही।। बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनि कुमारी।। व्याख्या : उस अवस्था में सुरता रूपी सीता कोई जवाब नहीं दे पाती है और सोचती है कि आत्मा रूपी राम मुझ प्रेमी सुरता को छोड़ना चाहते हैं। तब जबरदस्ती सुरता रूपी सीता ने आँसूओं को रोक कर हृदय में धैर्य धारण किया। लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।। दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता हाथ जोड़कर सुष्मना नाड़ी रूपी सासु से बोली (अर्थात् श्वास के साथ सुरता सुष्मना नाड़ी में स्थिर होने लगी) कि हे देवी! मेरी अविनय को क्षमा करना (अर्थात् सुरता सुष्मना नाड़ी को छोड़कर आत्म चेतना के साथ उर्ध्वगामी होना चाहती है)। मुझे प्राण प्रिय आत्मा रूपी राम ने मेरे लिए कल्याणकारी सीख दी है। अर्थात् मुझे भाव रूपी भवन में रहने को बोला है। मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।। व्याख्या : परन्तु मैंने मेरे मन में अच्छी तरह समझ लिया है कि आत्मा रूपी स्वामी से बिछुड़ने के समान संसार में दूसरा कोई दु:ख नहीं होता है। दो0 प्राननाथ करूनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता बोली कि हे प्राणनाथ अर्थात् प्राणों के स्वामी! आप करूणा के स्वरूप, सुंदर व सुख को देने वाले हैं। आप जीवात्मा के कुमुद को खिलाने के लिए चन्द्रमा के समान हैं। आपके बिना सुरपुर अर्थात् स्वरों में रमण करना, चिंताओं को पैदा करने वाला होता है। मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवा डिग्री सुहृद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। व्याख्या : बिना आत्मा रूपी राम के चित रूपी पिता, नाड़ियों रूपी माताएँ, नाड़ियों से उत्पन्न प्रकृति की वृतियाँ रूपी बहीने, भाव रूपी प्रिय भाई, भाव समुदाय रूपी परिवार, श्वास, शरीर के स्वर ज्ञान के भाव रूपी गुरु, मोह रूपी सुंदर पुत्र, सुशीलता आदि के भावों का समूह। जहँ लगि नाथ नेह अ डिग्री नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। व्याख्या : हे नाथ! जहाँ तक प्रेम और नातों का सम्बन्ध है, वे सब बिना आत्मा रूपी राम के कष्टकारी होते हैं अर्थात् बिना आत्मोन्मुखी हुए सुख देने वाले नहीं होते हैं। शरीर, धन अर्थात् माया के भाव और शरीर आसक्ति के भाव, ये सब बिना आत्मा के चिन्ता के समाज के समान होते हैं। भोग रोग सम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसा डिग्री ।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। व्याख्या : बिना आत्मचिन्तन के भोग रोगों के समान व वासनाएँ बन्धनकारी हो जाती हैं, जो संसार में यम के समान कष्ट देने वाली होती है। हे आत्मा रूपी राम! तुम्हारे बिना संसार में बिल्कुल भी कहीं सुख नहीं मिल सकता है। जिय बिनु देंह नदी बिनु बारी। तैसि नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।। व्याख्या : जैसे बिना जीव के शरीर और बिना पानी के नदी होती है, वैसे ही बिना आत्मा रूपी पुरुष के सुरता रूपी नारी होती है। हे स्वामी! सब सुख तो तुम्हारे साथ ही हैं क्योंकि आपके निर्मल शरद चन्द्रमा के समान स्वरूप को देखने से ही शान्ति मिल जाती है। दो0 खग मृग परिजन नग डिग्री बनु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।। व्याख्या : सात्विक इच्छाओं रूपी पक्षी व हिरण आदि ही शरीर रूपी नगर के निवासी हैं और वैराग्य रूपी भाव ही वस्त्र हैं तथा आत्मा रूपी राम का साथ ही सुरसदन अर्थात् चिन्ता मुक्त स्वर्ग की अवस्था है तथा पर्णशाल रूपी सहजता ही सुख का मूल होती है। जब सुरता आत्म चिन्तन में लग जाती है, तब उसी अवस्था में होने वाली अनुभूति को ही इन चौपाइयों में लिखा गया है। बन देवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।। कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।। व्याख्या : वैराग्य की इच्छा और वैराग्य के भाव ही चित व चित की नाड़ियों के समान सुरता रूपी सीता की रक्षा करते हैं तथा निर्मल अहंकार रूपी सुंदर बिछौना होता है तथा आत्मा रूपी राम का साथ ही सुरता रूपी सीता के लिए कामदेव का तोशक होता है। कंदमूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।। छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।। व्याख्या : सहज इच्छा रूपी कंदमूलों के फलही मेरे लिए अमृत के समान भोग होंगे और वैराग्य रूपी दृढ़ता (वन के पहाड़) ही अवधी रूपी शरीर के राजमहलों के समान होगी। प्रत्येक क्षण-क्षण में आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को देखकर मैं (सुरता) ऐसी प्रसन्न रहूँगी, जैसे दिन में चकवी रहती है। बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।। प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।। व्याख्या : हे नाथ! आपने वैराग्य रूपी वन के बहुत से दु:ख बताये हैं और बहुत से भय, विषाद व कष्ट बताएं हैं परन्तु आत्मा रूपी राम के क्षणमात्र के वियोग के समान कष्ट देने वाले, ये सब मिलकर भी नहीं होते हैं। अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहिछाड़िअ जनि।। बिनती बहुत करौं का स्वामी। करूनामय उर अंतरजामी।। व्याख्या : इसलिए ऐसा हृदय में विचार कर मुझे आपके साथ (आत्मा के साथ) ले लिजिए। मैं और ज्यादा क्या विनती करूँ, आप तो सब हृदय के अन्दर की बातों को जानने वाले हैं। दो0 राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान ।।66।। व्याख्या : अगर आप अर्थात् आत्मा रूपी राम मुझ सुरता रूपी सीता को अवधी रूपी शरीर में रहने को बोलोगे तो मेरे प्राण नहीं रहेंगे अर्थात् सुरता निर्मल प्राण से श्वास में रमण करने लग जायेगी। हे आत्मा रूपी राम! आप तो दीनबंधु, सुन्दर, सुख देने वाले, शील व प्रेम के घर हैं। यहाँ साधना की गहरी अनुभूति को बतायी गयी है क्योंकि जब सुरता निर्मल प्राण में रमण करती है, तो वह आत्मोन्मुखी होती है और जब आत्म चिन्तन को छोड़कर शरीर का चिन्तन चलने लग जाता है, तो प्राण की निर्मलता खत्म हो जाती है और फिर सुरता श्वास में रमण करने लग जाती है और श्वास में रमण करने की अवस्था से माया के भावों का प्रादुर्भाव हो आता है। मोहि मगचलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।। सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता कहती हैं कि मुझे दृढ़ वैराग्य रूपी वन के रास्ते में चलने पर थकान नहीं होगी क्योंकि क्षण-क्षण में मैं आपके (आत्मा रूपी राम के) चरण कमलों को देखती रहूँगी। अर्थात् सुरता जब आत्म चिंतन में लीन रहती है तो दृढ़ वैराग्य रूपी वन के कष्ट उसे नहीं व्यापते हैं। सुरता सब प्रकार से आत्मा में लीन होकर जब चलने लगती है, तो उसी को सब प्रकार से आत्मा रूपी राम की सेवा करना बोलकर लिखा गया है। आत्म चिंतन में लगे रहने पर साधना पथ के परिश्रम की थकान स्वत: दूर हो जाती है। पाय पखारि बैठि त डिग्री छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।। श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।। व्याख्या : मैं (सुरता) आपके चरणों को धोकर अर्थात् सुरता जब आत्म चिंतन में लग जाती है, तो विषय वासना रूपी धूल मिट जाती है। उसी को पेड़ की छाया में बैठना बोलकर लिखा गया है। विषय वासना मिट जाने पर मन में प्रसन्नता छा जाती है। उसी को प्रसन्न मन से हवा करना बताया गया है। आपके अर्थात् आत्मा रूपी राम के निर्मल स्वरूप को देखने पर बताइये दु:ख कहाँ हो सकता है? अर्थात् जब सुरता आत्मा में लीन हो जाती है, तो दृढ़ वैराग्य रूपी वन के दु:ख कैसे बच सकते हैं। सम महि तृन तरूपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी।। बार बार मृदु मूरति जोही। लागिहि तात बयारि न मोही।। व्याख्या : संयम व समता रूपी भूमि पर सहजता रूपी घास व पत्ते बिछाकर समस्त रात आत्मा रूपी राम के पैर दबाऊँगी अर्थात् सहज व सरलता के साथ सुरता आत्मचिंतन में लीन रहने पर विषयों रूपी गर्म हवा सुरता रूपी सीता को नहीं लग पाती है। उसी को सुरता रूपी सीता कह रही हैं कि निरन्तर आपकी (आत्मा) मूर्ति को देखते रहने पर मुझे विषयों की गर्म हवा नहीं लगेगी। को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।। मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।। व्याख्या : कौन भाव हैं, जो मुझे परमात्मा में लीन रहने पर अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं? जैसे शेरनी की तरफ जंगल के खरगोश व सियार नहीं देख पाते हैं, वैसे ही परमात्मा में लीन सुरता को सांसारिक भाव प्रभावित नहीं कर पाते हैं। मैं अर्थात् सुरता कोमल हूँ और आप (आत्मा) दृढ़ वैराग्य रूपी वन के योग्य है और आपको (आत्मा) तप उचित है और मुझ सुरता को भोग उचित हैं। अर्थात् सुरता व आत्मा के बिना ये दोनों चीज ही सम्भव नहीं हैं। दो0 ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान। तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता बोली कि जब ऐसे कठोर वचन सुनकर हृदय नहीं टूटा अर्थात् सुरता आत्मा से विलग नहीं हुई, तो आत्मा का वियोग होने पर भी सुरता आत्मचिंतन में लगी रहेगी, जिससे प्राणों में तनाव पैदा होगा। उसी को प्राणों का दु:ख पाना बताया गया है। वास्तविकता में यह होता है कि अगर सुरता आत्मा से विलग रहती है तो प्राणों में माया के भाव पैदा होकर तनाव पैदा कर देते हैं। उसी तनाव को चिन्ता के रूप में जाना जाता है। परन्तु अगर सुरता आत्मा में लीन रहती है, तो प्राणों में निर्मलता बनी रहती है और प्राणों की निर्मलता ही सहजता का मूल होती है। अस कहि सीय बिकल भइभारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।। देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहीं राखिहि प्राना।। व्याख्या : ऐसा कह कर सुरता रूपी सीता वियोग के वचनों को सुनकर व्याकुल हो उठी अर्थात् सुरता में वियोग के वचनों से कम्पन आ गया। सुरता रूपी सीता की ऐसी दशा देखकर आत्मा रूपी राम को लगा कि अगर हठ करके अर्थात् हकार ठकार की गति रही तो प्राण शांत हो जायेंगे। जब ध्यान में सुरता आत्मा में लीन हो जाती है, तो प्राण हकार ठकार की गति से चलते-चलते एकदम स्थिर हो जाते हैं जिससे प्राणों का आभास भी मिट जाता है और सुरता आत्म चिंतन में लीन होकर परमात्मा में लीन होने लग जाती है। जब प्राणों की गति शान्त हो जाती है, तो साधक की भाव हीन अवस्था आ जाती है, जिससे साधक की सुरता निर्मल होकर उर्ध्वगामी हो जाती है। कहेउ कृपाल भानुकुल नाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।। नहिं बिषाद करअवस डिग्री आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।। व्याख्या : तब आत्म सूर्य रूपी राम बोले कि तुम्हारे भावों का चिंतन मिट गया है। अत: अब दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए मेरे साथ चलो। जब भावों का चिंतन मिट गया है, तो अब किसी प्रकार के दु:ख का अवसर ही नहीं है। अत: जल्दी करो और वैराग्य रूपी वन के लिए चलो। कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।। बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी प्रिय सीता को समझाकर कहा और सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता के चरणों में झूक गए अर्थात् ध्यान सुष्मना नाड़ी से उर्ध्वगामी होने लगा। तब सुष्मना रूपी माता ने कहा कि परमात्मा में लीन होकर जल्दी वापस आकर भाव रूपी प्रजा के दु:खों को दूर करना। सुष्मना रूपी नाड़ी को कठोर समझकर भूल मत जाना अर्थात् पुन: आकर सहजता के भावों में बरतना। फिरिह दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।। सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।। व्याख्या : जब ध्यान उर्ध्वगामी होने लगता है तो सुष्मना नाड़ी भी निस्तेज होने लग जाती है। उसी दशा का यहाँ प्रतीकों के माध्यम से वर्णन करते हुए लिखा गया है। उसी को सुष्मना नाड़ी कहती हैं कि मेरी क्या आगे जैसी अवस्था फिरेगी जिससे मैं आत्मा व सुरता दोनों की मन को हरण करने वाली अवस्था को देख सकूँ। वह अच्छा समय व अच्छी घड़ी कब आयेगी, जिससे मैं (सुष्मना नाड़ी) शीतल चन्द्रमा के समान आत्मा व सुरता के स्वरूप को देख सकूँ। दो0 बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघबुर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी माता कहने लगी कि अब मैं दोबारा कब हे लाल, हे तात, हे रघुपति, हे रघुवर कहकर पुकारूँगी तथा कब हर्षित होकर हृदय से लगाऊँगी तथा कब दोबारा प्रसन्न होकर आत्मा के निर्मल स्वरूप को देखूँगी? लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।। राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने देखा कि सुष्मना नाड़ी रूपी माता स्नेह के वश में होकर अधीर हो गयी है और व्याकुलता के कारण बोल नहीं पा रही हैं, तो सुष्मना रूपी माता को नाना प्रकार से समझाया। उस अवस्था के प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। अर्थात् जब आत्म चेतना सुष्मना नाड़ी को छोड़कर उर्ध्वगामी होने लगती है, उस समय की अनुभूति का वर्णन करना कठिन कार्य है। तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।। सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता सुष्मना नाड़ी रूपी सासु के पैर लगी अर्थात् सुरता सुष्मना नाड़ी के श्वास की गति के साथ उर्ध्वगामी होने लगी और कहने लगी कि हे सुष्मना रूपी माता! मैं बहुत अभागी अर्थात् मैं प्रकृति से परे हो गयी हूँ। इसलिए सांसारिक सुख भोगों के समय मुझे दृढ़ वैराग्य रूपी वन मिल गया है और मेरी मन की इच्छाओं रूपी रथ अब चलना बन्द हो गया है। तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।। सुनि सिय बचन सास अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।। व्याख्या : इसलिए हे सुष्मना रूपी माता! आप क्षोभ को छोड़कर कभी कृपा मत छोड़ना क्योंकि कर्म की गति कठिन होती है, उसमें मुझ सुरता का कोई दोष नहीं होता है। इस प्रकार के सुरता रूपी सीता के वचनों को सुनकर सुष्मना नाड़ी रूपी सासु व्याकुल हो उठी। उस समय की सुष्मना नाड़ी की अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्हीं।। अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जलधारा।। व्याख्या : तब बार-बार सुरता रूपी सीता को सुष्मना नाड़ी रूपी सासु ने हृदय से लगा लिया अर्थात् सुष्मना नाड़ी में सुरता रमण करने लगी। तब धैर्य धारण करके सुष्मना रूपी सासु ने सुरता रूपी सीता को नाना प्रकार से सीख व आशीर्वाद दिया अर्थात् सुरता को दृढ़ वैराग्य में स्थिर करने में नाना प्रकार से सहयोग किया। सुष्मना नाड़ी रूपी सासु ने कहा कि तुम्हारा अहिवात अर्थात् सुहाग सदा अचल रहे यानी तुम्हारी लग्न सदैव आत्मा में लगी रहे, जब तक गंगा और यमुना में जल की धारा बहती रहे। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। गंगा-यमुना का तात्पर्य ईंगला व पिंगला नाड़ियों से है। अत: जब तक इन दोनों नाड़ियों में भाव रूपी जल का प्रवाह रहता है, तब तक परमात्मा में लीन बनी रहना। क्योंकि गंगा-यमुना रूपी नाड़ियाँ ही सुरता को सांसारिक भावों में खींचकर लाती हैं। अत: यहाँ सुष्मना नाड़ी सुरता को दृढ़ता प्रदान करती हुई कहती है कि तुम सदैव आत्म चिंतन में लगी रहना, जब तक गंगा-यमुना नाड़ियों में भाव रूपी जल का प्रवाह रहे। दो0 सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सि डिग्री अति हित बारहिं बार।।69।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता को सुष्मना नाड़ी रूपी सासु ने नाना प्रकार से शिक्षा दी। तब सुरता रूपी सीता सुष्मना नाड़ी रूपी सास के चरण कमलों में बार-बार सीस झुकाकर चली अर्थात् सुरता भी आत्म चेतना के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन को जाने को तैयार हो गयी। समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।। कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।। व्याख्या : जब सुरता और आत्म चेतना उर्ध्वगामी होकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने को तैयार हो जाते हैं, तो लक्षणों को लखने वाला (पहिचानने वाला) भाव व्याकुल हो उठता है कि जब चेतना व सुरता ही दृढ़ वैराग्य में चले जायेंगे, तो फिर मैं यहाँ क्या करूँगा? उस अवस्था में लक्षणों को लखने वाले भाव के शरीर में कम्प पैदा हो जाता है और नयनों में जल आ जाता है। तब उस अवस्था में लखन भाव आत्मा रूपी राम के सामने पूरी तरह से समर्पण कर देता है। उसी को ""गहे चरन अति प्रेम अधीरा"" बोलकर लिखा गया है। कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल ते काढ़ें।। सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।। व्याख्या : उस अवस्था में लक्षणों को लखने वाला भाव कुछ कह नहीं पा रहा है क्योंकि ध्यान की अवस्था में तो भावहीन अवस्था आ जाती है और भावहीन अवस्था में लखन भाव भी चितवत् हो जाता है परन्तु उस अवस्था में लखन भाव में तड़प वैसे ही पैदी हो जाती है जैसे मछली को जल से बाहर करने पर होती है। तब लखन भाव सोचने लगता है कि इस ध्यान क्रिया से पता नहीं क्या होगा? लगता है कि सभी सुख भोग के भावों में भी वैराग्य आ गया है। मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।। राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृन तोरें।। व्याख्या : लखन भाव सोचने लगता है कि पता नहीं मुझे आत्मा रूपी राम क्या कहेंगे? मुझे भाव रूपी भवन में रखेंगे या फिर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में लेकर जायेंगे। आत्मा रूपी राम को देखकर जो शरीर रूपी घर का मोह छोड़कर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने को तैयार खड़े थे, लखन रूपी भाव ने दोनों हाथ जोड़ लिए अर्थात् आत्मा रूपी राम के समक्ष समर्पण का भाव ले आया। बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।। तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम जो शील, प्रेम, सरलता व सुख के सागर हैं, बोले कि हे लखन रूपी भाव! तुम परिणाम में होने वाले आनंद को देखकर अधीर मत होओ अर्थात् जब आत्मा का परमात्मा में मिलन होगा तो उस आनन्द के बारे में सोचकर अधीर मत होओ। दो0 मातु पितु गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नत डिग्री जनमु जग जायँ।।70।। व्याख्या : जो सहज होकर नाड़ियों रूपी माताओं, विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और अन्तर्रात्मा के भावों में रमण करते हैं, उनको ही जन्म लेने का फल मिलता है। अन्यथा संसार में जन्म लेना व्यर्थ ही जाता है। साधारण शब्दों में जो लोग माता-पिता, गुरु व स्वामी की आज्ञा का पालन करते हैं, उनका ही जन्म लेना सफल होता है। अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।। भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं । राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।। व्याख्या : अत: ऐसा हृदय में जानकर मेरी सीख को सुनो और सहज होकर नाड़ियों रूपी माताओं और चित रूपी पिता की सेवा करो अर्थात् चित व नाड़ियों में सहज होकर बरतो। भाव रूपी भवन में भावरत रूपी भरत भाव व कामादि शत्रुनाशक शत्रुघन रूपी भाव नहीं है और चित रूपी राजा बूढ़े हैं अर्थात् चित निस्तेज होता जा रहा है और भावरत व शत्रुदमन रूपी भाव उदासीन है। ऐसी अवस्था में भावों के लक्षणों को लखने (जानने) के लिए तुम्हारा भाव रूपी घर में रहना जरूरी है। मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अबध अनाथा।। गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।। व्याख्या : अगर मैं (आत्मा) तुमको (लखन भाव) लेकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाऊँगा, तो शरीर रूपी अवध सब प्रकार से अनाथ हो जायेगी और विशिष्ट ज्ञान के भाव, चित, नाड़ियाँ व भाव रूपी प्रजा के परिवार दु:खी हो जायेंगे। वास्तविकता यह होती है कि जब तक भावों के लक्षणों को लखने का भाव रहता है, तभी तक भावों में उत्साह रहता है और जब लक्षणों का विवेचन भी बन्द हो जाता है, तो निरसता आ जाती है। रहहु करहु सब कर परितोषू। नत डिग्री तात होइहि बड़ दोषू।। जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।। व्याख्या : इसलिए तुम शरीर रूपी अयोध्या में रहकर समस्त भावों को संतुष्ट करना वरना बहुत दोष लगेगा। जिस राजा को राज प्रिय होता है और प्रजा दु:खी होती है, वर राजा अवश्य नरक का अधिकारी होता है। शरीर के भावों के साथ भी यही होता है कि अगर कोई भाव प्रबल हो जाता है और अन्य भावों का ख्याल नहीं रखता है, तो शरीर में तनाव पैदा हो जाता है। रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।। सिअरें बचन सूखि गए कैसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।। व्याख्या : ऐसा विचार करके हे लखन रूपी भाव! तुम अयोध्या रूपी शरीर में ही रहो। ऐसा सुनकर लखन भाव व्याकुल हो उठा और इन शीतल वचनों को सुनकर वह वैसी ही सूख गया, जैसे पाले के स्पर्श से कमल सूख जाता है। दो0 उत डिग्री न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।। व्याख्या : ऐसी अवस्था में लखन भाव कोई उत्तर नहीं दे पाता है। अत: व्याकुल होकर आत्मा रूपी राम के चरणों को पकड़ लेता है अर्थात् पूर्ण समर्पण कर देता है। तब कहने लगता है कि आप (आत्मा) तो मेरे स्वामी हैं और मैं आपका दास हूँ। अत: आप अगर मुझे छोड़ते हैं, तो मेरा क्या वश है? दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराई।। नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।। व्याख्या : आपने तो मुझे अच्छी शिक्षा ही दी है परन्तु मेरी कायरता के कारण मुझे दुर्गम लग रही है। क्योंकि नर वर अर्थात् नर की धड़कन की दृढ़ता ही धर्म को धारण करने की धुरी होती है। नर की धड़कन से ही वेदों की अनुभूति व नीति का ज्ञान होता है। मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंद डिग्री मे डिग्री कि लेहिं मराला।। गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहुँ सुभाउ नाथ पतिआहू।। व्याख्या : हे प्रभु! मैं तो आपके स्नेह के द्वारा पाला गया बच्चा हूँ। कभी हंस भी क्या सुमे डिग्री पर्वत को उठा सकता है? मैं तो गुरु, माता व पिता किसी को नहीं जानता हूँ। आप विश्वास कीजिए यह मैं स्वभाव से ही कह रहा हूँ। यहाँ पर लखन भाव स्पष्ट कर देता है कि मेरा पालन तो आत्मा के प्रेम से होता है। इसलिए लक्षणों को लखने (जानने) वाले भाव के न तो कोई गुरु होता है और नही कोई जन्मदाता होता है। लखन भाव तो समस्त भावों के लक्षणों को जानने वाला होता है। इसलिए लखन भाव केवल आत्मा का अनुसरण करता है। जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।। मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।। व्याख्या : जहाँ तक संसार के प्रेम व सम्बन्धों की बात है, जिसे स्वयं अनुभव करके जाना जाता है। मेरे तो सब प्रकार से तुम ही (आत्मा) स्वामी हो। आप दीनबंधु व सबके हृदय के अन्दर की बात जानने वाले हो। धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।। मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपा सिंधु परिहरिअ कि सोई।। व्याख्या : धर्म व नीति का उपदेश तो उसे करना चाहिये, जिसे यश, सम्पदा व सुगति प्रिय लगती हो। परन्तु जो मन, वचन कर्म से आत्मा में लीन रहता है, उस भाव का क्या त्याग करना चाहिये? अर्थात् जो भाव आत्मा में लीन रहता है, उसका त्याग नहीं करना चाहिये। दो0 करूनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।। व्याख्या : तब करूणा के समुद्र आत्मा रूपी राम ने लखन भाव के मधुर व विनयी वचनों को सुनकर लखन भाव को समझाकर व प्रेम में भयभीत जानकर अपने हृदय से लगा लिया। अर्थात् आत्मा में लखन भाव की लीनता हो गयी। मागु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।। मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे भाई! तुम जल्दी ईड़ा नाड़ी रूपी माता से आज्ञा लेकर आ जाओ, तब दृढ़ वैराग्य रूपी वन को चलेंगे। अर्थात् नाड़ियों से उत्पन्न भावों से निवृत होकर आ जाओ क्योंकि बिना भावों से निवृत हुए वैराग्य रूपी वन में नहीं जाया जा सकता है। आत्मा रूपी राम की वाणी को सुनकर लखन भाव बहुत प्रसन्न हुआ कि बड़ा लाभ हुआ है और सांसारिक जंजालों में फँसने से होने वाली हानि से बच गए। हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।। जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।। व्याख्या : तब लखन रूपी भाव हर्षित होकर ईड़ा नाड़ी रूपी सुमित्रा माता के पास आए। ऐसी प्रसन्नता हो रही थी मानों अंधें को फिर से आँखें मिल गयी हो। जाकर के लखन भाव ने सुमित्रा अर्थात् ईड़ा नाड़ी के सामने सिर झुकाया यानी समर्पण कर दिया परन्तु लखन भाव का मन तो आत्मा व सुरता में ही लगा हुआ था। पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।। गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।। व्याख्या : सुमित्रा रूपी माता ने लखन भाव के मन को आत्मा व सुरता में लीन हुआ देखकर कारण पूछा तो लखन भाव ने सब कथा बता दी। लखन भाव के परम वैराग्यवान वचनों को सुनकर ईड़ा नाड़ी रूपी माता सहम गयी अर्थात् ईड़ा वैसे ही व्याकुल हो गयी जैसे हिरनि चारों तरफ आग लगी हुई देखकर व्याकुल हो उठती है। लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।। मागत बिदा सभय सकुचाहीं।जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं।। व्याख्या : लखन भाव को लगने लगा कि अब तो ईड़ा नाड़ी रूपी माता के स्नेह के कारण अनर्थ हो जाएगा क्योंकि माता के स्नेह में पड़कर कहीं आत्मा व सुरता में लीनता ना छूट जाए। इसलिए ईड़ा नाड़ी रूपी माता से भयपूर्वक विदा माँगता है कि पता नहीं कहीं मोहवश दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने को कहीं ना नहीं कर दे। अर्थात् ध्यान विधि (क्रिया) से पता नहीं परमात्मा में लीनता होगी कि नहीं, इसकी दुविधा लखन भाव को भयभीत करा देती है। दो0 समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सि डिग्री पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।। व्याख्या : सुमित्रा रूपी ईड़ा नाड़ी ने आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के शील स्वभाव को देखकर तथा चित रूपी राजा के स्नेह को जानकर अपना सिर धुन लिया कि कैकयी रूपी पिंगला नाड़ी ने कुघात कर दिया अर्थात् अचानक त्याग की भावना पैदा कर दी। सांसारिक भावों के लिए त्याग का प्रबल हो जाना ही कुदाव होता है। धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृदय बोली मृदु बानी।। तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।। व्याख्या : कुसमय को देखकर सुमित्रा रूपी माता धैर्य धारण करके सहज व मधुर वाणी में बोली कि हे तात! सुरता रूपी सीता तुम्हारी माता है और आत्मा रूपी राम ही तुम्हारे पिता हैं, जो सब प्रकार से तुम्हें प्रेम करने वाले हैं। अर्थात् लक्षणों को लखने का भाव आत्मा व सुरता से ही पैदा होता है। अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं।। व्याख्या : जहाँ पर आत्मा रूपी राम का निवास होता है, वहीं पर अवध होती है अर्थात् आत्म चिन्तन में रहने पर ही अमरता की अवस्था प्राप्त होती है। जैसे जहाँ पर सूर्य का प्रकाश होता है, वहीं दिन होता है। इसलिए आत्मा रूपी राम और सुरता रूपी सीता अगर दृढ़ वैराग्य रूपी वन को जाते हैं, तो तुम्हारा शरीर रूपी अयोध्या में कुछ भी कार्य नहीं है। गुर पितु मातु बंधु सुर साईं। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।। रामु प्रान प्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के।। व्याख्या : गुरु, माता-पिता, बन्धु, देवता व स्वामी की सेवा प्राणों के समान करनी चाहिये। अर्थात् प्राणों की सेवा यानी साधना करने से ज्ञान रूपी गुरु, चित रूपी पिता, नाड़ी रूपी माता, भाव रूपी बंधु और स्वरों पर स्वत: नियंत्रण हो जाता है। आत्मा रूपी राम प्राणों को प्रिय होते हैं और जीव का जीवन होते हैं। आत्मा स्वार्थ से परे व समस्त भावों की सखा होती है। पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।। अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।। व्याख्या : जगत में जहाँ तक पूज्यनीय जो लोग हैं, वे आत्मा रूपी राम के कारण ही पूजनीय हुए हैं अर्थात् जिन्होंने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, वे लोग ही संसार में पूज्यनीय हुए हैं। अत: ऐसा हृदय में जानकर तुम आत्मा रूपी राम के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाओ और जीवन के लाभ को प्राप्त करो। दो0 भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाऊँ। जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।। व्याख्या : हे पुत्र! तुम मेरे सहित सौभाग्यशाली हो कि तुम्हारे चित ने छल छोड़कर आत्मा रूपी राम के चरणों में प्रेम किया है। अत: मैं बलिहारी जाती हूँ। अर्थात् नाड़ी भी अब आत्मोन्मुखी होने लग गयी। पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।। नतरूबाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।। व्याख्या : संसार में वही युवती पुत्रवती होती है जिसका पुत्र आत्मा रूपी राम का भक्त हो अर्थात् शरीर रूपी संसार में नाड़ियाँ तभी ही यौवनपूर्वक बहती हैं जब भाव रूपी पुत्र परमात्मा की भक्ति में लीन होने लगते हैं। वरना भक्तिहीन पुत्रों से जो अपना हित चाहती है, तो उसके बजाय तो बाँझ ही अच्छी हैं। अर्थात् माया के भावों के बजाय तो भावहीन अवस्था ही अच्छी होती है। तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।। सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।। व्याख्या : हे वत्स! तुम्हारे भाग्य से ही आत्मा रूपी राम दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जा रहे हैं। वैराग्य रूपी वन में जाने का दूसरा कोई कारण नहीं है। समस्त पुण्यों का यह फल होता है कि आत्मा व सुरता में सहजता के साथ ही लीनता हो जाती है। रागु रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।। सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।। व्याख्या : तुम कभी भी राग, क्रोध, ईर्ष्या, मद व मोह के भावों के सपने में भी वश में मत होना। तुम समस्त विकारों से दूर रहकर आत्मा व सुरता की सेवा (साधना) करना। तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।। जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।। व्याख्या : तुमको दृढ़ वैराग्य रूपी वन सब प्रकार से सुख देने वाला होगा क्योंकि तुम्हारे साथ आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता होंगे। अत: तुम ऐसा उपाय करना जिससे आत्मा रूपी राम को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं हो। यही मेरा उपदेश है। छ0 उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।। तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।। व्याख्या : हे वत्स! मेरा (ईड़ा नाड़ी रूपी सुमित्रा) तो यही उपदेश है कि आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता सुखी रहने चाहिये अर्थात् निर्विकार व निर्मल रहने चाहिए। तुम वही करना जिससे वैराग्य की अवस्था में चित व नाड़ियों के भावों से उत्पन्न सुख भोगों को भूल जाएँ अर्थात् सुरता व आत्मा देह सुखों को याद नहीं करें। इस प्रकार ईड़ा नाड़ी रूपी माता ने लखन भाव को शिक्षा देकर व आशीर्वाद रूपी बल प्रदान करके वैराग्य रूपी वन में जाने की आज्ञा दी। तुम्हारे हृदय में अर्थात लखन भाव में सदैव आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता में अविरल लीनता की भावना रहे। सो0 मातु चरन सि डिग्री नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।। व्याख्या : माता के चरणों में सीस झुकाकर लखन भाव शंकित होते हुए (कहीं वैराग्य रूपी वन में जाने में और कोई विघ्न नहीं आ जाए) ऐसे भागा जैसे कोई हिरण कठिन फन्दे को तुड़ाकर भागा हो। लखन भाव तो सभी भावों के लक्षणों को लखता है। अत: विषयी भावों के फंदे से मुक्त होकर अब ध्यान की अवस्था में आत्मा व सुरता के साथ दृढ़ वैराग्य में प्रवेश करने को तैयार हो गया। इसी को कठिन विषयों के फंदे को काटना बोलकर बताया गया है। गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।। बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।। व्याख्या : तब लक्षणों को लखने वाला लखन भाव आत्मा रूपी राम के पास गए और अपने प्रिय का संग पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तब लखन भाव ने आत्मा व सुरता के सामने पूर्ण रूप से समर्पण कर दिया अर्थात् सुरता, आत्मा व लखन भाव एक से हो गए। उस अवस्था में सभी चित में समाहित होने लगते हैं। उसी ध्यान अनुभूति को आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता और लखन रूपी लक्ष्मण का चित रूपी दसरथ राजा के महल में जाना बताया गया है। कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।। तन कृस मन दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधुछीने।। व्याख्या : उस अवस्था में शरीर के नर-नाड़ियों से उत्पन्न भाव आपस में बातें करने लगते हैं कि बिधि (क्रिया) के कारण बात बिगड़ गयी अर्थात् ध्यान क्रिया के कारण दृढ़ वैराग्य पैदा हो गया है। दृढ़ वैराग्य पैदा हो जाना ही सांसारिक भावों के लिए बात बिगड़ना होता है। उस ध्यान की अवस्था में शरीर कृश अर्थात् सूक्ष्म शरीर का आभास होने लग जाता है और ऐसा लगने लग जाता है मानो स्थूल शरीर छूट रहा हो। उसी ध्यान की अनुभूति को इन चौपाईयों में बहुत ही सूक्ष्मता के साथ लिखा गया है। उस अवस्था में साधक के मन में अजीब भय सा व्याप्त होने लग जाता है और सांसारिक भाव व्याकुल हो उठते हैं। जैसे मधुमक्खियाँ शहद के छत्ते को तोड़ने के बाद व्याकुल हो उठती हैं। कर मीजहिं सि डिग्री धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।। भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।। व्याख्या : उस अवस्था में सभी भाव हाथ मसलने लगते हैं और सिर धुन-धुन करके पश्चाताप करने लगते हैं। उस अवस्था में भाव इन्द्रियों से सिमट कर चित में समाहित होने लग जाते हैं। उसी अवस्था को चित रूपी राजा के दरबार में भाव रूपी प्रजा की भीड़ बोलकर बताया गया है। सचिव उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।। सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।। व्याख्या : जब ध्यान में चित भावों के विषाद के कारण व्याकुल हो जाता है, तो सुमन्त्रणा रूपी सुमन्त सचिव चित को सहारा प्रदान करता है। उसी को सुमन्त द्वारा राजा को बैठाना बोलकर लिखा गया है। सुमन्त्रणा रूपी भाव चित रूपी राजा से कहता है कि आत्मा रूपी राम आए हैं अर्थात् आत्मा, सुरता व लखन भाव आए हैं। तब चित रूपी राजा ने आत्मा व लखन भाव रूपी लखन व सुरता रूपी सीता को देखा और शरीर रूपी भूमि को धारण करने वाला चित रूपी राजा व्याकुल हो गया। वास्तव में ध्यान की उस अवस्था में चित का स्थूल भाव छटपटा उठता है और सूक्ष्म शरीर का आभास होने लगता है, जिससे सांसारिक सुख भोग के भावों में विषाद पैदा हो जाता है और भावों के विषाद से चित व्याकुल हो उठता है। दो0 सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुरता, आत्मा व लखन भाव बहुत सुभग अर्थात् निर्मल हो जाते हैं, जिन्हें देख-देखकर चित और व्याकुल हो उठता है क्योंकि आत्मा, सुरता व लखन भावों की निर्मलता सांसारिक भावों में और ज्यादा विषाद पैदा कर देती है, जिसके कारण चित की व्याकुलता बढ़ जाती है। परन्तु उस अवस्था में चित आत्मा, सुरता व लखन भाव को अपने आप में समाहित करने लगता है, उसी को चित रूपी राजा द्वारा बार-बार हृदय से लगाना बोलकर लिखा गया है। सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारून दाहू।। नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।। व्याख्या : उस अवस्था में भावों के विषाद से व्याकुल चित रूपी राजा कुछ बोल नहीं पाता है और भावों के शोक के कारण विशेष जलन महसूस करने लगता है। तब आत्मा रूपी राम ने चित रूपी राजा को सीस झुकाकर तथा परमात्मा के प्रति अनुराग पैदा करके विदा माँगी। पितु आसीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।। तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे चित रूपी पिताजी! मुझे परमात्मा में लीन होने के लिए बल और आज्ञा दीजिए। परमात्मा में लीन होने का समय तो हर्ष का समय होता है। आप क्यों व्यर्थ में शोक कर रहे हो। हे तात! वासना के भावों से प्रेम करने पर संसार में यश चला जायेगा अर्थात् जीव की सहजता असहजता में बदल जायेगी। सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।। सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।। व्याख्या : यह सुनकर चित रूपी राजा ने आत्मा रूपी राम की भाव रूपी बाँह पकड़कर बैठा लिया और कहने लगे कि हे तात! तुम्हारे बारे में अर्थात् आत्मा के बारे में मुनि लोग अर्थात् मन का एकाग्रह करने वाले कहते हैं कि तुम समस्त चराचर जगत के स्वामी हो अर्थात् आत्मा समस्त चराचर जगत में व्यापक है। सुभ अ डिग्री असुभ करम अनुहारी। ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी।। करइ करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।। व्याख्या : शुभ और अशुभ अर्थात् अच्छा और बुरा तो कर्मों के अनुसार घटित होता है और कर्म का फल परमात्मा हृदय में विचार कर देते हैं। जो जैसा कर्म करता है, उसको वैसा ही फल मिलता है। इस बात को सभी वेद व पुराणों में कहा गया है। दो0 औ डिग्री करै अपराधू कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।। व्याख्या : भगवंत अर्थात् प्रकृति में रत जीव की गति बहुत विचित्र होती है क्योंकि मोहादि प्रकृति के भावों के अधीन होने पर अपराध कोई दूसरा करता है और कष्ट कोई दूसरा भोगता है। प्रकृति की इस सूक्ष्म गति के योग को कोई नहीं जान पाता है। रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।। लखी राम रूख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने आत्मा रूपी राम को रोकने के लिए निश्छल भाव से बहुत प्रयास किया अर्थात् चित ने आत्मा को सांसारिक भावों को न छोड़ने के लिए मनाने का प्रयास किया परन्तु जब जाना कि आत्मा परमात्मा में लीन होने की दृढ़ धारणा से युक्त है। तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।। कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।। व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने सुरता रूपी सीता को अपने हृदय से लगा लिया और बहुत प्रकार से शिक्षा दी अर्थात् चित ने सुरता को सांसारिक भावों में रहने की बहुत प्रकार से प्रेरणा करी। चित रूपी राजा ने दृढ़ वैराग्य रूपी वन के भयंकर दु:खों का वर्णन किया और श्वास व स्वरों में रमण करने के सुखों का वर्णन किया। सिय मनु राम चरन अनुरागा। घ डिग्री न सुगमु बनु बिषमु न लागा।। औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।। व्याख्या : परन्तु सुरता रूपी सीता के मन में तो आत्मा रूपी राम के प्रति अनुराग था, इसलिए सांसारिक भाव रूपी घर अच्छा नहीं लगा और दृढ़ वैराग्य रूपी वन बुरा नहीं लगा। दूसरे और भावों ने भी सुरता रूपी सीता को दृढ़ वैराग्य रूपी वन की कठिनता का वर्णन कर-करके बहुत समझाया। सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।। तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।। व्याख्या : तब सुमन्त्रणा रूपी सचिव की नाड़ी रूपी पत्नी और ज्ञान का प्रकाश करने वाली नाड़ी ने प्रेम पूर्वक मधुर वाणी में समझाया कि तुमको थोड़े ही दृढ़ वैराग्य रूपी वन मिला है। अत: तुम तो स्वरों, श्वास व ज्ञान की अवस्था में भावों में रमण करो अर्थात् हे सुरता! तुम सहज होकर सांसारिक भावों रूपी भवन में रहो। दो0 सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।। सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।। व्याख्या : सांसारिक भावों में सहजता पूर्वक रमण करने की मधुर सीख सुरता रूपी सीता को अच्छी नहीं लगी, इसलिए वह वैसे ही व्याकुल हो गयी जैसे शरद ऋतु के चन्द्रमा की किरणों से चकवी व्याकलु हो उठती है। सीय सकुच बस उत डिग्री न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।। मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता संकोच के कारण कोई उत्तर नहीं दे पा रही हैं अर्थात् सुरता निश्चित नहीं कर पा रही हैं कि दृढ़ वैराग्य में जाउँ या सांसारिक भावों रूपी भवन में रहूँ। इस द्विविधा की अवस्था को देखकर रजोवृति रूपी कैकेयी उत्तेजित हो उठती है और दृढ़ वैराग्य में आत्मा व सुरता को भेजने के लिए मन के भावों को दृढ़ कराने लगती है। उसी को वन में जाने के वस्त्रों को सामने लाकर रख देना बोलकर लिखा गया है। अर्थात् मन के भावों को वश में करने लगी। नृपहिं प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।। सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।। व्याख्या : तब रजोवृति रूपी कैकेई बोली कि हे आत्मा रूपी राम! तुम चित रूपी राजा को प्राणों से प्रिय हो, इसलिए वे तुमको शील व स्नेह के कारण छोड़ नहीं पा रहे हैं अर्थात दृढ़ वैराग्य में नहीं जाने दे रहे हैं। चाहे चित की सहजता चली जाए तथा परमात्मा से बिलगता हो जाए परन्तु वे कभी तुमको (आत्मा) दृढ़ वैराग्य में जाने को नहीं कहेंगे। अर्थात् चित कभी भी सांसारिक भोग भावों को छोड़कर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने को नहीं कहेंगे। अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।। भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।। व्याख्या : अत: ऐसा विचार कर हे आत्मा रूपी राम! तुम वही करो, जो तुम्हें अच्छा लगे। रजोवृति रूपी माँ के वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम को बहुत सुख मिला। परन्तु चित रूपी राजा को ये वचन बाणों के समान लगे। उस अवस्था में प्राणों की गति स्थिर सी हो जाती है और स्थिर प्राण प्रकृति से परे होने लग जाते हैं, उसी को अभागे (अर्थात् अ अ भग यानी प्रकृति से परे) कहा गया है। लोग बिकल मुरुछित नर नाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।। रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सि डिग्री नाई।। व्याख्या : उस अवस्था में आत्मा रूपी राम को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने को तैयार देखकर भाव रूपी लोग व्याकुल हो उठे और चित रूपी राजा को बेहोशी आ गयी। किसी को कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि क्या करें? तब आत्मा रूपी राम ने तुरन्त मन की एकाग्रता को दृढ़ किया और चित व चित की नाड़ियों को सीस झुकाकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए चल दिया। दो0 सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।। व्याख्या : जब ध्यान चित व चित की नाड़ियों को छोड़कर उर्ध्वगामी होने लगता है, तब जो अनुभूति होती है, उसी को इस दोहे में बताया गया है कि आत्मा रूपी राम भावों को एकाग्रह करके सुरता व लखन भावों के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए चल दिए। उस समय समस्त बन्दना आदि के भाव व विशुद्ध ज्ञान आदि के भाव सबका साथ छूट जाता है और चित सहित ये समस्त भाव अचेत हो जाते हैं अर्थात इनका कोई आभास नहीं रहता है। निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।। कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।। व्याख्या : जब ध्यान चित व नाड़ियों से ऊपर उठने लग जाता है और भृकुटि पर पहुँच जाता है, तो भृकुटि को ही साधना में विशिष्ट द्वार कहा जाता है। क्योंकि भृकुटि एक ऐसा द्वार है जहाँ से उर्ध्वगामी होने पर परमात्मा का रास्ता मिल जाता है और अधोगामी होने पर संसार का जन्म होना शु डिग्री हो जाता है। भृकुटि पर ध्यान पहुँचने पर सांसारिक भोगों के भाव विरह में तड़प उठते हैं और विरह की अग्नि बढ़ने लग जाती है। तब आत्मा रूपी राम समस्त भावों को समझाने की कोशिश करते हैं और कुछ विशुद्ध प्रकाश वाले भावों को अपने पास बुलाते हैं। गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।। जाचक दान मान संतोषे । मीत पुनीत प्रेम परितोषे ।। व्याख्या : भृकुटि में ध्यान लगने पर बहुत सूक्ष्म-सूक्ष्म अनुभूतियाँ होने लग जाती हैं। उस अवस्था में सांसारिक सुख भोग के भाव आत्मा को उर्ध्वगामी होने से रोकना चाहते हैं तथा साधक के अन्दर सिद्धियों की लालसा भी पैदा हो जाती है। तब आत्मा का भाव विशुद्ध ज्ञान के बल पर सांसारिक भावों को अपार सिद्धियों की प्राप्ति का आश्वासन देने लगता है। उसी को बरषासन अर्थात् सिद्धियों का आश्वासन देना बोलकर लिखा गया है। सिद्धियों के आश्वासन से सभी सांसारिक भाव संतुष्ट हो जाते हैं और मन में सिद्धियों की प्राप्ति का संतोष पैदा हो जाता है। उस अवस्था में आत्मा में सांसारिक भावों के प्रति भी पवित्र प्रेम पैदा हो जाता है परन्तु किसी प्रकार की आसक्ति नहीं होती है। दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरुहिं सौंपि बोले कर जोरी।। सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाईं।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने बहुत सी दमित इच्छाओं रूपी दास-दासियों को बुलाया और विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु को सौंप दिया अर्थात् ज्ञान द्वारा दमित इच्चाओं को समझाकर शान्त कर दिया। तब आत्मा रूपी राम ने विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु से दमित इच्छाओं के प्रति सजग रहने को कहा और कहा कि इच्छाओं के पैदा होने के कारण (माता-पिता) के प्रति सजग रहना। यह वास्तविकता है कि जब साधक इच्छाओं के उत्पत्ति के कारण को जान लेता है, तो इच्छाएँ स्वत: शान्त हो जाती हैं। बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदुबानी।। सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।। व्याख्या : बार-बार विनयपूर्वक आत्मा रूपी राम समस्त भावों से कहते हैं कि वे भाव ही मेरे हितकारी होंगे, जिनकी वजह से चित रूपी राजा सुखों के जाल में नहीं पड़े। सुखारी (अर्थात् सुख अ अरि उ सुखारी) की अवस्था ही अर्थात् जब सुख भोग का भाव नहीं रहे, तब ही आत्मा का कल्याण सम्भव हो पाता है। दो0 मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाइ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि नाड़ियों रूपी माताएँ मेरे विरह में दु:खी हैं अर्थात् शिथिल पड़ गयी हैं। अत: आप सब शरीर रूपी नगर में रहने वाले चतुर सुजान हैं। अत: वैसा ही करो जिससे नाड़ियों रूपी माताओं को दु:ख नहीं हो। एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सि डिग्री नावा।। गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।। व्याख्या : इस प्रकार आत्मा रूपी राम समस्त भावों को समझाकर और विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु को हर्ष के साथ सीस नवा कर और गणपति (अर्थात् गुणों को वश में करने की अवस्था) गौरी (अर्थात् गो अ अरि यानी इन्द्रियों से विमुख होकर) और गिरीसु (अर्थात् वासनाओं के मूल को समझकर) को मनाकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए चल दिए। अर्थात् जब आत्म भाव सुरता के साथ भृकुटि से ऊपर उठने लगता है, तो गुणों, इन्द्रियों व वासनाओं का मर्म समझ में आ जाता है। उसी अवस्था को गणपति, पार्वती व महेश को मनाना बोलकर बताया गया है। राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।। कुसगुन लंक अवधि अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू।। व्याख्या : आत्म भाव के द्वारा दृढ़ वैराग्य में प्रवेश करने पर समस्त भावों में विषाद पैदा हो जाता है और उस समय शरीर रूपी नगर के आर्तनाद का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था में वासना रूपी लंका के लिए अपशकुन होने लग जाते हैं और शरीर रूपी अवध शोकग्रस्त हो जाती है तथा शरीर के स्वर हर्ष और विषाद से युक्त हो जाते हैं। अर्थात् कुछ स्वर तो परमात्मा में मिलने के आनन्द से हर्षित हो उठते हैं और कुछ अद्योगामी स्वर विषाद के भावों से भर जाते हैं। गइ मुरूछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।। रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।। व्याख्या : जब आत्म भाव उर्ध्वगामी होकर ध्यान में उठने लगता है और देह भावों को छोड़ देता है, तो देह भावों के विषाद से चित पुन: चंचल हो उठता है। उसी को चित रूपी राजा की मूर्छा चली जाना कहा गया है। मुर्छा चले जाने पर चित रूपी राजा सुमंत्रणा रूपी सचिव से कहता है कि आत्मा रूपी राम तो दृढ़ वैराग्य रूपी वन को चल दिए परन्तु प्राण आत्मा के साथ नहीं जा रहे हैं। पता नहीं किस सुख की लालसा से ये देह में रहना चाहते हैं। एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।। पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।। व्याख्या : इससे (आत्म विरह) बलवान और दु:ख क्या होगा, जिसका दु:ख पाकर प्राण शरीर का त्याग करेंगे? फिर पुन; चित ने धैर्य धारण किया अर्थात् चित स्थिर हुआ और सुमंत्रणा रूपी भाव को बोला कि तुम वृति रूपी रथ को साथ लेकर जाओ। दो0 सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।। व्याख्या : हे सुमंत्रणा रूपी भाव! तुम आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता और लखन भाव रूपी लक्ष्मण को वृति रूपी रथ पर चढ़ाकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन को दिखलाकर चारों गुणों (सत, रज, तम व गुणातीत) में बरतते हुए वापस ले आना। जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्य संध दृढ़ब्रत रघुराई।। तौ तुम्ह बिनय करेहु करजोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।। व्याख्या : अगर आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण दोनों धीर भाव वाले व सत्य की सन्धि में दृढ़ता वाले वापस नहीं आएँ, तो विनय करके सुरता रूपी सीता को लौटा कर ले आना। जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवस डिग्री पाई।। सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।। व्याख्या : जब सुरता रूपी सीता दृढ़ वैराग्य रूपी वन को देखकर डर जाए, तब अवसर पाकर श्वास व स्वरों के संदेश को कहना कि हे पुत्री! तुम वापस सांसारिक सुख भोग केभावो में लौट चलो क्योंकि वैराग्य रूपी वन में बहुत कष्ट होते हैं। पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रूचि होइ तुम्हारी।। एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।। व्याख्या : तुम सुरता रूपी सीता से कहना कि तुम कभी प्राणों में (पितृगृह) और कभी स्वरों में जहाँ रूचि हो वहाँ पर रमण करना। इस प्रकार तुम सुरता को लौटा कर ले आना, जिससे प्राणों को कुछ आधार मिल जायेगा। नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कुछ न बसाइ भएँ बिधि बामा।। अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।। व्याख्या : नहीं तो परिणाम में मेरा (चित) मरण सुनिश्चित है क्योंकि क्रिया की विपरीत अवस्था में कोई उपाय नहीं बचता है। ऐसा कहकर चित रूपी राजा मुर्छित हो गए और कहने लगे कि सुरता, लखन व आत्मा को लाकर दिखाओ। जब साधना में ध्यान चित व नाड़ियों को छोड़कर उर्ध्वगामी होने लगता है, तब चित व नाड़ियाँ निस्तेज हो जाती हैं और चित की गति रूक सी जाती है। उसी अवस्था को चित रूपी राजा की मूर्छा बताया गया है। दो0 पाइ रजायसु नाइ सि डिग्री रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।। व्याख्या : तब सुमंत्रणा रूपी भाव चित रूपी राजा को सीस नवा कर वृति रूपी रथ को लेकर भृकुटि से ऊपर (नगर से बाहर) चला, जहाँ पर आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव थे। अर्थात् सुमंत्रणा रूपी भाव भी वृति रूपी रथ को लेकर ध्यान में उर्ध्वगामी होने लगा। तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।। चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सि डिग्री नाई।। व्याख्या : तब सुमंत्रणा रूपी भाव ने चित रूपी राजा की बात बतायी और आत्मा रूपी राम को विनय करके वृति रूपी रथ पर चढ़ा लिया। तब सुरता रूपी सीता और लखन भाव भी वृति रूपी रथ पर चढ़ गए और अब अवध रूपी देह भाव का त्याग करके ध्यान में उर्ध्वगामी होने लगे। चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।। कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को गम्भीर ध्यान में जाते हुए देखकर भाव रूपी लोगों को देह रूपी अवध अनाथ लगने लगी, इसलिए सभी भाव रूपी लोग व्याकुल होकर आत्मा रूपी राम के साथ हो गए। तब आत्मा रूपी राम ने समस्त भावों को नाना प्रकार से समझाया परन्तु प्रेम के कारण भाव पुन: फिर-फिर कर वापस आत्मा के साथ आने लगे। ध्यान जब गम्भीर होने लगता है और चित स्थिर हो जाता है, तो देह का आभास मिट जाता है। उस अवस्था में भाव आत्मोन्मुखी होकर ध्यान में उर्ध्वगामी होने लगते हैं। तब कुछ भाव वापस लौटते हैं तो कुछ पुन: आत्मा के साथ हो लेते हैं। यह भावों की सूक्ष्म अनुभूति गहरे ध्यान के माध्यम से ही अच्छी तरह जानी जा सकती है। उसी अनुभूति को सूक्ष्मता के साथ यहाँ लिखा गया है। लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।। घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।। व्याख्या : जब देहाभास मिट जाता है तो एक अजीब सा भय लगने लगता है। उसी को अवध रूपी शरीर का भयंकर लगना बोलकर लिखा है। उस समय ऐसा लगने लगता है मानो कालरात्रि में अंधकार छा रहा हो। उस समय समस्त भाव रूपी नर-नाड़ी भी भयानक लगने लग जाते हैं और साधक को उस अवस्था में डर भी लगने लग जाता है। कभी-कभी तो ऐसा भय भी लग आता है, मानो शरीर ही छूट जायेगा। घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।। बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोबर देखि न जाहीं।। व्याख्या : उस अवस्था में शरीर के चक्र रूपी घर श्मशान जैसे और चक्रों से पैदा होने वाले भाव भूतों जैसे लगने लगते हैं। मोह व बन्धन आदि के भाव यमदूतों जैसे लगने लगते हैं। उस ध्यान की गम्भीर अवस्था में मनोरथ रूपी बाग की इच्छा रूपी बेल मुर्झाने लग जाती हैं और नाड़ियों रूपी नदियों व चक्रों रूपी तालाबों की दशा का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता है। दो0 हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।। व्याख्या : ध्यान की गम्भीर अवस्था में शरीर के सब भाव आत्मा के वियोग से व्याकुल हो उठते हैं। उसी अनुभूति को यहाँ लिखते हुए कहा गया है कि मन रूपी घोड़ा, इन्द्रियों रूपी गाय, नाना प्रकार की इच्छाएँ, पुर पसु अर्थात् वासनायुक्त भाव, प्रेम भाव रूपी चातक, अहंकार रूपी मोर, मधुरता रूपी कोयल, वृति रूपी चकवे, आसक्ति रूपी तोता-मैना, लालसा रूपी सारस, हकार सकार रूपी हंस व लग्न रूपी चकोर। राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।। नग डिग्री सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।। व्याख्या : आत्मा के वियोग से ये सब भाव खड़े के खड़े रह गए अर्थात् निष्प्रभावी से हो गए, मानो चित्र में दिख रहे हों। क्योंकि ध्यान की अवस्था से पहले तो शरीर रूपी नगर भाव व इच्छा रूपी फलों से भरा हुआ वन था, जिसमें नर-नाड़ी रूपी पशु-पक्षी रहते थे। अर्थात् नाना प्रकार के भाव शरीर में पैदा होते रहते थे, जो नर-नाड़ियों के माध्यम से प्रवाहित होते रहते थे। बिधि कैकई किरातिनि कीन्ही। जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।। सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।। व्याख्या : परन्तु रजोवृति रूपी कैकेई विधि (क्रिया) के कारण भीलनी बन गयी है, जिसने शरीर के भाव रूपी वन में विरह रूपी अग्नि जला दी है, जिसे भाव आत्मा के विरह को नहीं सहन कर पाने के कारण व्याकुल होकर आत्मोन्मुखी होकर दौड़ रहे हैं। सबहिं बिचा डिग्री कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।। जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।। व्याख्या : सभी भाव मन में विचार करने लगे कि आत्मा, सुरता व लखन भाव के बिना कोई सुख नहीं हो सकता है। क्योंकि जहाँ आत्म चेतना होती है, वहीं पर समस्त भावों का समाज होता है। अत: बिना आत्मा के हमारा शरीर रूपी अवध में कोई काम नहीं है। चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ।। राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।। व्याख्या : इस प्रकार समस्त भाव मन को दृढ़ करके आत्मा रूपी राम के साथ स्वरों की गति से प्राप्त नहीं होने वाले सुखों का त्याग करके चले। जिन भावों की आत्मा में प्रीत हो जाती है, वे कभी विषय भोगों में नहीं भटकते हैं। दो0 बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।। व्याख्या : तब बाल रूप व वृद्ध रूप सभी भाव अपने-अपने कोष रूपी घरों को छोड़कर ध्यान में आत्मा रूपी राम के साथ लग गए। भृकुटि से ऊपर ध्यान उठने पर बाँयी तरफ ललाट से उठने लगता है और तमोगुण का मर्म पता लगना शु डिग्री हो जाता है, उसी अवस्था को तमसा नदी का किनारा कहा जाता है। रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।। करूनामय रघुनाथ गोसाँईं। बेगि पाइअहिं पीर पराई।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने भाव रूपी प्रजा के प्रेम को देखा और उसे देखकर हृदय में बहुत दु:ख हुआ। इन्द्रियों के स्वामी आत्मा तो सहज में ही करूणा करने वाले होते हैं। इसलिए वे जल्दी दूसरों के कष्ट को देखकर द्रवित हो जाते हैं। कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहु बिधि राम लोग समुझाए।। किए धरम उपदेश घनेरे। लोग प्रेमबस फिरहिं न फेरे।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने मधुर वचनों द्वारा बहुत प्रकार से भाव रूपी लोगों को समझाया परन्तु प्रेम के कारण कोई भी भाव लौटाने पर भी नहीं लौट रहा था। ध्यान में भावों के इस वार्तालाप को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।। लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।। व्याख्या : शील व प्रेम के कारण आत्मा भी उन भावों को छोड़ नहीं पाती है, इसलिए आत्मा रूपी राम असमंजस में पड़ जाते हैं। परन्तु ध्यान में दृढ़ता बनी रहने पर भाव शिथिल हो जाते हैं और कुछ भावों की मति बदल जाती है, तो उनका आत्मा के प्रति आकर्षण कम हो जाता है। जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।। खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।। व्याख्या : जब भावों का प्रभाव कम हो गया तो आत्मा रूपी राम ने सुमंत्रणा रूपी भाव से कहा कि अब वृति रूपी रथ की चाल को बदलकर खोज मिटाकर अर्थात् वृति से भाव आकर्षित न हो ऐसा उपाय करो। वरना दूसरा कोई उपाय नहीं है, जिससे ध्यान में आगे बढ़ा जा सके। वास्तव में वृति का अनुसरण करके ही भाव आत्मा का पीछा करते हैं। दो0 राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सि डिग्री नाइ। सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता और लखन भाव रूपी लक्ष्मण शंभु के चरणों में सीस नवाकर अर्थात् स्वयं के स्वरूप में दृढ़ होकर वृति रूपी रथ पर चढ़कर चले और तब धारणा की वृति रूपी रथ इधर-उधर खोज छुपाकर चलने लगा। वास्तव में जब ध्यान दृढ़ता से आगे बढ़ने लगता है, तो धारणा की वृति रूप बदलती हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगती है। उसी को यहाँ लिखा गया है। जागे सकल लोग भएँ भोरू। गए रघुनाथ भयउ अति सोरू।। रथ कर खोज कतहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहुँ दिसि धावहिं।। व्याख्या : प्रात: होते ही समस्त भाव रूपी लोग जागे अर्थात् भावों में पुन: चंचलता आ गयी, तो आत्मा रूपी राम को गया हुआ देखकर शोरगुल मच गया। उस अवस्था में भावों को धारणा के वृति रूपी रथ के रास्ते का अंदाज नहीं लग पा रहा था। इसलिए सभी भाव आत्मा-आत्मा कहकर चारों दिशाओं में दौड़ने लगे अर्थात् गुणों की चारों अवस्थाओं में आत्मा को खोजने लगे। मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।। एकहि एक देहिं उपदेसू । तजे राम हम जानि कलेसू ।। व्याख्या : उस अवस्था में देह भाव वैसे ही व्याकुल हो जाते हैं, जैसे समुद्र में जहाज डूबने पर बनियों का समाज व्याकुल हो जाता है। उस समय एक भाव दूसरे भाव को उपदेश देने लगता है कि आत्मा रूपी राम ने हमें क्लेश होगा, यह सोचकर हमारा परित्याग कर दिया है। क्योंकि दृढ़ वैराग्य की अवस्था में देह भावों को बहुत कष्ट होता है। निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।। जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।। व्याख्या : उस अवस्था में भाव रूपी लोग मछली के जीवन की प्रशंसा करने लगते हैं कि मछली की पानी से सच्ची प्रीत होती है, जो पानी से अलग होने पर तड़फ उठती है। परन्तु हम भाव तो आत्मा से विलग होकर भी नहीं तड़प रहे हैं। अगर ध्यान की क्रिया (विधि) ने हमें आत्मा से अलग कर दिया है, तो फिर हम भावों को मरना क्यों नहीं बताया है? एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।। बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।। व्याख्या : इस प्रकार भाव प्रलाप करते हुए दु:खी होते हुए अवधी रूपी शरीर में लौट आए। ध्यान की उस अवस्था में देह भाव पुन: देह में लौट आते हैं। उस समय भावों के वियोग का वर्णन नहीं किया जा सकता है। वे सब भाव अवधी रूपी शरीर की आशा में प्राण रखते हैं अर्थात् पुन; आत्मा शरीर में अवतरित होगी, इसी उम्मीद में सभी भाव बचे रहते हैं। दो0 राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।। व्याख्या : तब भाव रूपी नर-नारियाँ आत्मा रूपी राम के दर्शन के लिए नियम व व्रतों का पालन करने लगे और वैसे ही आत्मा के बिना व्याकुल व दु:खी हो गए जैसे चकवा, चकवी और कमल सूर्य के बिना व्याकुल हो जाते हैं। सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई ।। उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता, लखन भाव रूपी लक्ष्मण, व सुमन्त्रणा भाव रूपी सचिव को लेकर श्रृगवेरपुर पहुँचे अर्थात् तमस कोष को पार करके श्रृंग कोष पहुँचे। श्रृंग कोष वह कोष होता है, जिसको पार करने पर साधक के शरीर में आनन्द की सुरसुरी उठने लग जाती है। उसी अवस्था को आनन्द रूपी गंगा के किनारे उतरना कहा जाता है। उस अवस्था में पहुँचने पर साधक को विशेष हर्ष हो उठता है। लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। व्याख्या : तब आनन्द रूपी गंगा को लखन रूपी लक्ष्मण, सुरता रूपी सीता व सुमन्त्रणा रूपी सचिव ने प्रणाम किया और इन सबके सहित आत्मा रूपी राम ने बहुत सुख पाया। क्योंकि सुरसरि कोष समस्त प्रसन्नता व मंगल का मूल होता है, जो समस्त सुखों को देखने वाला व कष्टों का हरण करने वाला होता है। कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।। सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम नाना प्रकार से अनुभूति करने लगता है और आत्म आनन्द की उठने वाली तरंगों की अनुभूति करने लगता है और उसी अनुभूति को सुमन्त्रणा रूपी सचिव, सुरता रूपी सीता और लखन भाव को नाना प्रकार से सुनाता है तथा आनन्द रूपी गंगा की महिमा का नाना प्रकार से वर्णन करने लगता है। मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।। सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक व्यवहारू।। व्याख्या : सुरसरि रूपी आनन्द गंगा में मज्जन करने से अर्थात् सुरसरि कोष में ध्यान पहुँच जाने पर साधक की थकावट दूर हो जाती है और उस अवस्था में निकलने वाले हार्मोन के पान करने से मन प्रसन्न हो जाता है। जिस सुरसरि रूपी आनन्द गंगा के स्मरण करने से विषयी थकावट दूर हो जाती है क्योंकि विषयों की थकावट तो जगत के व्यवहार से पैदा होती है। दो0 सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरति करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।। व्याख्या : ध्यान की उस गहन अवस्था में समझ आता है कि आत्मा शुद्ध सतचित आनन्द का मूल व ज्ञान रूपी सूर्य का प्रकाश करने वाली होती है। आत्मा तो नाना प्रकार के चरित्र करती है परन्तु नर (नड़) की धड़कन निर्मल हो जाने पर सांसारिकता के समस्त संशय व क्लेश मिट जाते हैं और नर की धड़कन ही संसार सागर को पार करने के लिए सेतु का काम करती है। यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।। लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा।। व्याख्या : जब यह समाचार निषाद राज गुह ने पायी तो प्रसन्न होकर अपने प्रियजनों व भाई बंधुओं को बुला लिया। यहाँ पर निषादराज के रहस्य को समझ लेना जरूरी है। साधना में एक अवस्था यह आती है, जब निषेध भाव पैदा हो जाता है और निषेध भाव पैदा होने पर साधक आसुरी भावों व इच्छाओं का निषेध करना शु डिग्री कर देता है और सद्वृतियों को प्रबल करना शु डिग्री कर देता है। यहाँ पर निषाधराज गुह उसी निषेध भाव का प्रतीक है। जब निषेध भाव आत्मा रूपी राम को देखता है, तो प्रसन्न हो उठता है और सद्वृति रूपी प्रिय जनों व बन्धुओं को भी बुला लेता है। उस अवस्था में निषेध भाव समस्त इच्छाओं रूपी कंद मूल फलों की भेंट चढ़ाने चला आता है अर्थात् इच्छाओं की आसक्ति से दूर रहने की प्रेरणा करने लगता है। उस अवस्था में निषाध राज भाव को बहुत प्रसन्नता होती है। करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।। सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।। व्याख्या : निषाध भाव इच्छा रूपी कंद मूल फलों की भेंट सामने रखकर आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर देता है और आत्मा को बहुत अनुराग के साथ देखने लगता है। तब आत्मा भी सहज स्नेह के वश में हो जाती है और निषेध भाव को अपने पास बैठा लेती है और निषेध भाव से कुशलक्षेम पूछने लगती है। नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भाग भाजन जन लेखें।। देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।। व्याख्या : तब निषेध भाव रूपी निषादराज बोलता है कि हे आत्मा रूपी राम! आपके चरण कमलों को देखकर ही कुशलता छा गयी है और मैं धन्य हो गया हूँ। हे देव! यह शरीर रूपी धरती, इच्छा रूपी धन का घर ये सब आपके हैं अर्थात् आपकी प्रेरणा से ही शरीर व शरीर की इच्छाएँ पैदा होती हैं। मैं तो परिवार सहित अर्थात् निषेध की वृतियों सहित आपका एक नीच सेवक हूँ। कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।। कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाधराज गुह बोला कि आप कृपा करके शरीर रूपी पुर में पैर रखिए और सभी भाव रूपी लोगों को धन्य कर दीजिए। अर्थात् निषेध भाव कहता है कि आप तो निर्मल आत्मा हैं। अत: आप अगर देहभाव में बरतोगे तो सभी भाव रूपी लोग धन्य हो जायेंगे। तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे मित्रों व सज्जनों। मैं सत्य कह रहा हूँ कि मुझे चित रूपी पिता की दूसरी ही प्रेरणा (आज्ञा) है। दो0 बरस चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारू। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारू।।88।। व्याख्या : मुझे चौदह रसों में नहीं बरतने की आज्ञा है अर्थात् मुझे दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार इन चौदह में नहीं बरतना है और मन को दृढ़ कर के परमात्मा में लगाना है इसलिए वासना रूपी गाँव में मैं निवास नहीं कर सकता हूँ। इतना सुनकर निषेध भाव दु:खी हो गया। राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता और लखन रूपी लक्ष्मण को देखकर निषेध के भाव रूपी नर-नारी प्रेम से कहने लगे कि इनके माता-पिता कैसे होंगे? जिन्होंने इन्हें दृढ़ वैराग्य रूपी वन में भेजा है। एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।। तब निषादपति उर अनुमाना। त डिग्री सिंसुपा मनोहर जाना।। व्याख्या : एक भाव रूपी ग्रामवासी कहने लगा कि चित रूपी राजा ने अच्छा ही किया है, जिससे हमें इनके दर्शन हो गए हैं। तब निषेध भावों के अधिपति रूपी निषाधराज ने हृदय में सोचा और सिंसुपा के पेड़ को मनोहर जाना। वास्तविकता में यह होता है कि जब ध्यान में निषेध भावों को भी देख लिया जाता है, तो शोक रहित अवस्था आ जाती है। वह शोक रहित अवस्था ही अशोक के वृक्ष के रूप में बतायी जाती है। जब अशोक की अवस्था आ जाती है, तब स्वत: ही मन का हरण हो जाता है। इसलिए अशोक के वृक्ष को मनोहर कहा गया है। लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।। पुरजन करि जोहा डिग्री घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।। व्याख्या : तब निषाध भाव ने आत्मा रूपी राम को शोक रहित स्थान बताया, जिसे देखकर आत्मा को बहुत सुख हुआ। तब ध्यान की उस अवस्था में निषेध भाव के देहाभास वाले भाव लौटकर शरीर रूपी पुर में आ गए और आत्मा शोक रहित होकर संध्या करने लगी अर्थात् परमात्मा के ध्यान में आत्मा स्थिर होने लगी। गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।। सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।। व्याख्या : जब आत्मा परमात्मा के ध्यान में लीन होने लगती है, तो निषेध भाव भी आत्मा को दृढ़ता प्रदान करने लगता है और परमात्मा में लीन होने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करने लगता है। उसी को यहाँ निषाद राज द्वारा कुश की सुन्दर व नरम साँथरी बनाना बताया गया है। परिस्थितियों को अनुकूल करने को ही मधुर फल व मूल के दोने भर-भर कर खाने के लिए सामने रखना बोलकर बताया है। दो0 सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुवंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।। व्याख्या : तब ध्यान की उस गम्भीर अवस्था में सुमन्त्रणा रूपी भाव, सुरता रूपी सीता, व लखन भाव रूपी लक्ष्मण सहित कंद-मूल फल खाए अर्थात् इच्छाओं के मूल को सहजता के साथ समझ लिए। जब इच्छाओं का मूल अच्छी तरह समझ में आ जाता है, तब आत्मा की चेतना परमात्मा के ध्यान में दृढ़ हो जाती है। उसी को यहाँ आत्मा रूपी राम का सोना बोलकर बताया गया है। जब आत्मा परमात्मा के ध्यान में दृढ़ हो जाती है, तो लक्षणों को लखने का भाव आत्मा के सामने पूरी तरह समर्पण कर देता है। उसी को लखन भाव रूपी भाई द्वारा आत्मा रूपी राम के पैर दबाना बताया गया है। उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।। कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को सोता हुआ जानकर अर्थात् पूरी तरह परमात्मा के ध्यान में दृढ़ जानकर लखन भाव रूपी लक्ष्मण उठ गए और सुमंत्रणा रूपी भाव को मधुर वाणी में सोने के लिए बोले। वास्तविकता में ध्यान में यह होता है कि जब आत्म चेतना दृढ़ होकर सुरता के साथ परमात्मा में लग जाती है, तो लक्षणों को लखने वाला भाव जागा ही रहता है और लखन भाव यह प्रयास करता रहता है कि कोई सांसारिक भाव आकर आत्मा की लीनता में व्यवधान न डाल दे। इसलिए लखन भाव सुमन्त्रणा के भाव को भी शान्त (सोने के लिए) होने को बोलकर स्वयं जागृत होकर आत्मा रूपी राम की धनुष-बाण लेकर पहरेदारी करने लगता है। गुहँ बोलाइ पाह डिग्री प्रतीती। ठाँव ठाँव राखे अति प्रीती।। आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी गुह ने अपने विश्वास पात्र पहरेदारों को प्रेम से बुलाकर जगह-जगह बैठा दिया और आप स्वयं कमर में तरकश बाँधकर व हाथ में धनुष बाण लेकर लखन भाव के पास जाकर बैठ गया। वास्तव में जब आत्म चेतना दृढ़ता के साथ परमात्मा में लग जाती है, तो निषेध (वासनाओं का निषेध करने वाला) भाव व लखन भाव दोनों दृढ़ता के साथ आत्म चेतना की आसुरी भावों से रक्षा करने का प्रयास करते हैं। यहाँ पर उसी अनुभूति को लिखा गया है। सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस हृदयँ बिषादू।। तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को सोता हुआ देखकर अर्थात् आत्म को दृढ़ता के साथ परमात्मा में लीन होता हुआ देखकर निषेध भाव प्रेम में भर गया परन्तु हृदय में सांसारिक सुख भोगों का विचार करने से विषाद पैदा हो गया। निषेध भाव रूपी निषाद की आँखों से जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो उठा। तब निषेध भाव ने प्रेम पूर्वक लक्षणों को लखने वाले लखन भाव से कहा। भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।। मनिमय रचित चा डिग्री चौबारे। जनु रति पति निज हाथ सँवारे।। व्याख्या : भूपति अर्थात् भावों के पति चित रूपी राजा का भवन तो स्वभाव से ही सुन्दर है, जिसकी तुलना इन्द्रियों का पति अर्थात् इन्द्रियों के भाव भी नहीं कर सकते हैं। क्योंकि मन के रूप में चारों गुण से (सत, रज, तम व गुणातीत) उत्पन्न भावों के चौबारे बने हुए होते हैं, जो ऐसे लगते हैं मानों कामदेव अर्थात् वृतियों के पति ने स्वयं बनाएँ हों। दो0 सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास। पलँग मंजु मनि दीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।। व्याख्या : जो पवित्र, बड़े ही विलक्षण, सुन्दर भोग पदार्थों से पूर्ण और फूलों से सुगंधित हैं, जहाँ सुंदर पलंग और मणियों के दीपक हैं तथा सब प्रकार का आराम है। यहाँ पर चित के भाव व चित वृतियों की विशेषताओं का निषेध भाव वर्णन कर रहा है। बिबिध बसन उपधान तुराईं। छीर फेन मृदु बिसद सुहाईं।। तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।। व्याख्या : यहाँ पर निषेध भाव देह भाव में बरतने पर होने वाले सुखों व आरामों का वर्णन कर रहे हैं कि नाना प्रकार की वासनाओं व इच्छाओं वाले गद्दे व तकिये हुआ करते थे, जिनमें कुछ इच्छाएँ तो निर्मल व सात्विक हुआ करती थी। उन इच्छाओं रूपी बिस्तरों पर आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता जब सोते थे अर्थात् देहभाव की इच्छाओं में जब बरतते थे, तो उनकी सुन्दरता के आगे कामदेव का भी मद चूर-चूर हो जाता था। ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।। मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अ डिग्री दासी।। व्याख्या : वे ही आत्मा रूपी राम अब देह भावों से परे होकर निषेध भाव द्वारा तैयार की गयी साँथरी पर सो रहे हैं। आज वे बिना वासना रूपी वस्त्रों के ही सो रहे हैं, जिन्हें देखा नहीं जा सकता है। माता-पिता अर्थात् चित व चित की नाड़ियाँ, प्रियजन अर्थात् वृतियाँ, नगरवासी अर्थात् देह के भाव, सखा अर्थात् संग के भाव, शीलता, दास व दासियाँ अर्थात् काम व इच्छाएँ। जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाईं। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।। पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।। व्याख्या : जिन आत्मा व सुरता से ये सब भाव प्राण के माध्यम से जुड़े रहते हैं। आज वे ही आत्मा रूपी राम इन्द्रियों को वश (गो अ साईं उ इन्द्रियों को वश में कर लेने वाला) में करके महामहिम अवस्था अर्थात् परमात्मा के ध्यान में स्थिर हो रहे हैं। जिस सुरता के पिता प्राण रूपी जनक का प्रभाव समस्त संसार जानता है और स्वरों के मूल चित रूपी ससुर जो इन्द्रियों के पति इन्द्र के सखा हैं। रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।। सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।। व्याख्या : उसी सुरता रूपी सीता के आत्मा रूपी राम पति हैं, जो महामहिम की अवस्था अर्थात् परमात्मा में दृढ़ ध्यान की अवस्था में सो रहे हैं। ध्यान की क्रिया द्वारा ललाट के बायें तरफ ध्यान लगने की इस अवस्था को कैसे कहें? अर्थात् पूरी तरह से ध्यान की क्रिया के अनुभवों को कहना कठिन कार्य है। दो0 कैकयनंदिनि मंद मति कठिन कुटिलपनु कीन्ह। जेहिं रघुनन्दन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।। व्याख्या : कैकयपुत्री अर्थात् रजोगुणी वृति रूपी कैकयी ने मंदबुद्धि के कारण कुटिलपन कर दिया, जिसके कारण सुख भोग के समय आत्म रूपी राम और सुरता रूपी सीता को दु;ख प्रदान कर दिया। वास्तविकता में ध्यान की गहन अवस्था में भावों का आपसी वार्तालाप समझ में आता है। जब दृढ़ वैराग्य होने लगता है तो अचानक कभी-कभी ये भाव आने लगते हैं कि वैराग्य से क्या लाभ है? शरीर के रहते सुख भोग लेते तो ज्यादा अच्छा होता। इस प्रकार के भावों के वार्तालाप को ही यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।। भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।। व्याख्या : निषेध भाव कहता है कि रजोवृति रूपी कैकयी की मन्द बुद्धि के कारण आज समस्त भावरूपी संसार दु:खी हो रहा है। मन्दबुद्धि रजोवृति जीवात्मा के कुल अर्थात् सुख भोग के भावों को काटने के लिए कुल्हाड़ी बन गयी है। अर्थात् कुबुद्धि के कारण आत्मा को सुख भोग नहीं होने दिए और व्यर्थ में दृढ़ वैराग्य करा दिया। साधना के दौरान बीच-बीच में ऐसे नकारात्मक विचार आते रहते हैं। निषेध भाव आत्मा व सुरता को महामहिम (अर्थात् परमात्मा में लीन होने की दशा) की दशा में देखकर दु:खी हो गया। बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।। काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में फिर लखन भाव समझाते हुए ज्ञान, वैराग्य व भक्ति में सनी हुई मधुर वाणी बोले कि हे भ्राता! कोई भी किसी को सुख-दु:ख देने वाला नहीं होता है क्योंकि सभी लोग अपने किए हुए कर्मों का फल भोगते हैं। जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।। जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अ डिग्री कालू।। व्याख्या : मिलना, बिछुड़ना, अच्छे-बूरे भोग, हित-अनहित, भला-बुरा आदि के भ्रम का फंदा, जन्म-मरण, सम्पदा, आपदा, कर्म और काल तथा जहाँ तक जगत के सब जंजाल हैं। धरनि धाम धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि व्यवहारू।। देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।। व्याख्या : धरती, घर, धन, गाँव, परिवार, स्वर्ग व नरक ये सब जगत के व्यवहार से ही आभासित होते हैं। इनको देखकर, सुनकर व मन में समझकर देख लो, इन सबका मूल मोह का कारण ही होता है। परमार्थ की अवस्था में ये नहीं भासते हैं। दो0 सपनें होइ भिखारी नृपु रंकु नाकपति होइ। जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।। व्याख्या : जैसे सपने में भिखारी राजा हो जाता है और राजा भिखारी हो जाता है परन्तु जाग जाने पर सपने के प्रपंच का कोई लाभ व हानि नहीं होता है। वैसे ही संसार के रिश्ते मोह के कारण आभासित हो रहे हैं। अत: मोह निद्रा जब टूट जाती है, तो समस्त भ्रम मिट जाता है। अस बिचारि नहीं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।। मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। व्याख्या : इसलिए ऐसा मन में विचार करके किसी को दोष नहीं देना चाहिये तथा न किसी पर क्रोध ही करना चाहिये। क्योंकि जीव तो मोह रूपी रात्रि में सो रहे हैं और नाना प्रकार के सपने देख रहे हैं। एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी ।। जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब विषय बिलास बिरागा।। व्याख्या : इस संसार रूपी रात्रि में तो योगी लोग ही जागते हैं जो परमार्थी हैं और संसार के प्रपंचों से दूर रहते हैं। जीव को तब ही जागा हुआ जानना चाहिये, जब उसके अन्दर विषयों के प्रति वैराग्य पैदा हो जाए। होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।। सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।। व्याख्या : जब मोह के भ्रम का नाश हो जाता है, तब विवेक पैदा हो जाता है और विवेक पैदा होने से परमात्मा के चरणों में अनुराग पैदा हो जाता है। हे सखा! परम परमार्थ तो यही है कि मन, वचन, कर्म से परमात्मा के चरणों में प्रेम होना चाहिये। राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।। सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।। व्याख्या : परमार्थ के रूप में आत्मा ही ब्रह्म होती है क्योंकि आत्मा का स्वरूप अविगत, अलख, अनादि व अनुपम होता है। जब आत्मा के सब विकार मिट जाते हैं तो वही ब्रह्म का स्वरूप हो जाती है। इसी स्वरूप का वेदों ने वर्णन किया है। दो0 भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल।।93।। व्याख्या : वही ब्रह्म भयहीन अवस्था पैदा करते हैं और वही ब्रह्म की ऊर्जा स्वरों के माध्यम से गमनागमन करती रहती है तथा वही ब्रह्म की ऊर्जा मन के अनुसार शरीर धारण करके नाना चरित करती रहती है। जिन चरित्रों को सुनने मात्र से संसार के जाल कट जाते हैं। ।। मासा पारायण, पन्द्रहवाँ विश्राम।। सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू।। कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।। व्याख्या : लखन भाव बोला कि हे निषेध भाव रूपी सखा। ऐसा समझकर मोह का परित्याग करो और आत्मा रूपी राम में सुरता सहित लीन हो जाओ। इस प्रकार आत्म चिंतन करने से ज्ञान रूपी सवेरा हो जाता है और आत्मा जाग उठती है, जो सुख व मंगल को देने वाली होती है। सकल सौच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।। अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।। व्याख्या : जब ज्ञान रूपी सवेरा हो जाता है, तो आत्मा सब प्रकार से निर्मल हो जाती है और उस अवस्था में परमात्मा के प्रति बरगद के पेड़ की तरह दृढ़ता बढ़ने लग जाती है। उसी दृढ़ता को बट का दूध मँगाना बोलकर लिखा गया है। जब परमात्मा में आत्मा की दृढ़ता बढ़ने लग जाती है तो लखन भाव भी दृढ़ता के साथ दृढ़ वैराग्य में अवस्थित होने लगता है। उसी अवस्था को वट का दूध मँगाकर लक्ष्मण सहित जटा बनाना बताया गया है। जब लखन भाव व सुरता भी दृढ़ वैराग्य में स्थिर होने लग जाते हैं, तो सुमंत्रणा का भाव असहाय होकर उदास हो जाता है। उसी को सुमंत्रणा रूपी भाव की आँखों में आँसू आ जाना बताया गया है। हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।। नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम के साथा।। व्याख्या : तब सुमन्त्रणा रूपी भावके हृदय में बहुत दाह होने लगता है तथा शरीर भी मलीन हो जाता है। उस समय सुमन्त्रणा का भाव समर्पण करते हुए कहने लगता है कि हे आत्मा रूपी राम! चित रूपी राजा ने मुझसे वृति रूपी रथ को आपके साथ लाने को कहा था। बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।। लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।। व्याख्या : मुझसे चित रूपी राजा ने कहा था कि वैराग्य रूपी वन को दिखलाकर और आनन्द रूपी सुरसरि (गंगा) में स्नान करा करके दोनों (आत्मा व लखन भाव को) को जल्दी वापस ले आना। समस्त संशयों का निवारण करके आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण को वापस ले आना। दो0 नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोई। करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोई।।94।। व्याख्या : हे इन्द्रियों को वश में करने वाले! चित रूपी राजा ने तो वापस लौटाने के लिए कहा है। अब आप जैसा कहें मैं तो वैसा ही करूँगा। इस प्रकार सुमन्त्रणा का भाव आत्मा रूपी राम के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया। इसी को पैर पकड़ना व बालक की तरह रोना बोलकर लिखा है। तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।। मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।। व्याख्या : अत: हे आत्मा रूपी राम! आप कृपा करके वही कीजिए जिससे अवधी रूपी शरीर अनाथ नहीं हो। तब आत्मा रूपी राम ने सुमंत्रणा रूपी सचिव को उठाकर बहुत समझाया और कहा कि हे तात! तुम तो धर्म (धारणा के मर्म) के रहस्य को जानने वाले हो। सिबि दधीच हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।। रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।। व्याख्या : शिबि, दधीचि व हरिश्चन्द्र राजा ने धर्म (धारणा) के कारण नाना प्रकार के क्लेश सहन किए थे। बुद्धिमान राजा रन्तिदेव और बलि ने धर्म को धारण करके नाना कष्ट सहन किए थे। वास्तविकता में यह होता है कि साधक अपनी धारणा के कारण संसार में नाना कष्ट भोगता है। जब कोई धारणा साधक के दिमाग में घर कर जाती है, तो उसी के अनुसरण करने के लिए नाना कष्ट भोगने को तैयार रहता है और अपनी धारणा को ही धर्म मानकर उसका त्याग नहीं करता है। जबकि धर्म का रहस्य अलग ही होता है, जिसे ध्यान की अवस्था में ही समझा जा सकता है। धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।। मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।। व्याख्या : जब ध्यान में आत्मा परमात्मा में लीन होने लग जाती है, तब उसे धर्म का असली स्वरूप समझ में आ जाता है, उसी को उपर्युक्त चौपाइयों में बताया गया है कि सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं होता है। साधारणत: साधक सत्य शब्द को सुनकर भ्रम में पड़ जाते हैं और सत्य का मतलब झूठ-साँच से समझ लेते हैं। परन्तु वेद-पराणों में वर्णित सत्य झूठ-साँच वाला सत्य नहीं होता है। सत्य का मतलब सहजता से होता है और सहजाता तीनों गुणों के जाल से मुक्त होने पर ही आ पाती है। अत: यहाँ आत्मा रूपी राम कहते हैं कि मैंने उसी सहजता के धर्म को आसानी से पाया है और अगर सहजता का परित्याग कर दूँगा, तो तीनों गुणों से उत्पन्न वासनाएँ छा जायेगी। संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारून दाहू।। तुम्ह सन तात बहुत काकहऊँ। दिएँ उत डिग्री फिरि पातकु लहऊँ।। व्याख्या : वासनाओं में पड़ने पर मृत्यु के समान नाना प्रकार के कष्ट होने लगते हैं। हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! तुम से बहुत ज्यादा क्या कहूँ? क्योंकि वासनाओं का चिन्तन करने पर भी चिन्ता रूपी पाप पैदा हो जाता है। दो0 पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि। चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।। व्याख्या : हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! आप चित रूपी पिता के चरणों में मेरी तरफ से विनय करना कि मुझ आत्मा की किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं करें। तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।। सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।। व्याख्या : हे तात्! तुम चित रूपी पिता के समान मेरे हितकारी हो अर्थात् सुमन्त्रणा का भाव भी आत्मा को चित के समान ही बल प्रदान करता है। इसलिए आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे तात! तुम्हारा यह कर्तव्य है कि चित रूपी पिता किसी प्रकार से क्लेश नहीं पाएँ। क्लेश पाने का मतलब यह है कि चित किसी प्रकार से चंचल नहीं होना चाहिए, वरना चित की चंचलता ध्यान की दृढ़ता को हिला सकती है। सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।। पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।। व्याख्या : तब आत्मा और सुमन्त्रणा के संवाद को सुनकर निषेध भाव सहयोगी भावों सहित दु:खी हो गया। तब लखन भाव ने कुछ कटु शब्द कहे, परन्तु आत्मा रूपी राम ने अनुचित जानकर लखन भाव को रोक दिया। सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।। कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।। व्याख्या : संकोच में पड़कर आत्मा रूपी राम ने लखन भाव के कटु संदेश को चित रूपी राजा को न कहने की सुमंत्रणा रूपी सुमंत भाव को शपथ दिलाई। तब सुमन्त्रणा रूपी सुमंत ने चित रूपी राजा का संदेश सुनाया कि सुरता रूपी सीता दृढ़ वैराग्य रूपी वन के क्लेसों को नहीं सह सकेगी। जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।। नत डिग्री निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।। व्याख्या : इसलिए जिस भी प्रकार से सुरता रूपी सीता अवधी रूपी शरीर में आए, वो सब उपाय करना। वरना बिना आधार के मैं जीवित नहीं रह पाऊँगा जैसे जल के बिना मछली नहीं रह पाती है। यह वास्तविक सत्य है कि चित को कुछ न कुछ आधार चाहिए, वरना चित की चेतना शून्य में चली जाती है और शून्य में चेतना का समावेश होने पर शरीर का आभास मिट जाता है। दो0 मइकें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान। तहँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता को प्राण (जनक) रूपी मायके और चित रूपी ससुराल में सुख ही सुख हैं। अत: जहाँ सुरता रूपी सीता का मन लगे, वहाँ रह लेगी। सुरता रूपी सीता के अवलम्बन से सभी जीवित रह पायेंगे। बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।। पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।। व्याख्या : जिस प्रकार चित रूपी राजा ने विनती की है, उस आर्त अवस्था व प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। चित रूपी राजा का संदेश सुनकर आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता को नाना प्रकार से समझाया। सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरहु त सब कर मिटै खभारू।। सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।। व्याख्या : श्वास रूपी सासु, स्वर रूपी ससुर, ज्ञान रूपी गुरु और प्रिय भाव रूपी परिवार के तुम्हारे लौटने पर सब कष्ट मिट जायेंगे। तब आत्मा रूपी पति के वचन सुनकर सुरता रूपी सीता बोली कि हे प्राणपति व परम स्नेही! सुनिए। प्रभु करूनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।। प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चन्द्रिका चंदु तजि जाई।। व्याख्या : आप तो करूणामय व परम विवेकी हैं, तब आप ही बताइये क्या छाया बिना शरीर के रह सकती है और बिना सूर्य के क्या किरणें रह सकती हैं तथा चाँदनी क्या चन्द्रमा को छोड़ सकती है? पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।। तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उत डिग्री देउँ फिरि अनुचित भारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी पति को बिनती सुनाकर सुरता रूपी सीता सुमंत्रणा रूपी सचिव से बोली कि आप तो चित रूपी ससुर के समान कल्याण करने वाले हो। अत: मैं उत्तर दे रही हूँ मुझे क्षमा करना। वास्तव में सुरता चित की प्रेरणा से और सुमन्त्रणा की प्रेरणा से ही चलती है। इसलिए ध्यान में जब सुरता आत्मा में लीन हो जाती है तो चित व सुमन्त्रणा का भी त्याग कर देती है। उसी को यहाँ प्रतीकात्मक रूप से सीता का उत्तर देना कहा गया है। दो0 आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात। आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।। व्याख्या : किन्तु हे तात! मैं आर्त होकर ही आपके (सुमन्त्रणा) सन्मुख हुई हूँ। आप बुरा मत मानना क्योंकि बिना परमात्मा के आत्मा रूपी पुत्र के बिना मेरे (सुरता) संसार में कोई नाते नहीं हो सकते हैं। पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।। सुख निदान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।। व्याख्या : मैंने मेरे प्राण रूपी पिता (जनक) के वैभव को देखा है, जिसके मुकुट से अर्थात् जिनसे भाव पैदा होकर चित से जुड़ते हैं। इस प्रकार मेरे प्राण रूपी पिता का सुखपूर्वक घर भी मुझे आत्मा रूपी पति के बिना भूलकर भी अच्छा नहीं लगता है। ससुर चक्कवइ कोसल राऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।। व्याख्या : मेरे (सुरता) चित रूपी ससुर चक्रवर्ती सम्राट अर्थात् गुणों की चारों सत, रज, तम व गुणातीत अवस्थाओं को पैदा करने वाले हैं। जिनका प्रभाव दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि चित व अहंकार सबमें होता है। जिनकी अगवानी सुरपति अर्थात् इन्द्र रूपी इन्द्रियों का पति करता है और आधा सिंहासन बैठने को देता है। वास्तव में चित ही दसरथ अर्थात् दस इन्द्रियों को पैदा करने वाला और चित ही इन्द्र अर्थात् इन्द्रियों का पति है। चित को इसलिए इन्द्र द्वारा आधा सिंहासन देना बताया गया है। ससुर एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवा डिग्री मातु सम सासू।। बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।। व्याख्या : ऐसे ऐश्वर्यशाली चित रूपी ससुर जो शरीर रूपी अवध के निवासी हैं और भाव रूपी प्रिय परिवार व वृतियों रूपी सासुएँ बिना आत्मा रूपी राम के मुझे सपने में भी सुख देने वाले नहीं लगते हैं। अर्थात् बिना आत्मा के अनुराग के सुरता को चित, चित की वृतियों व चित के भावों से सुख नहीं मिलता है। अगम पंथ बन भूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।। कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।। व्याख्या : वैराग्य रूपी वन के दुर्गम रास्ते, पहाड़, सिंह, नदियाँ, सहज भोग रूपी कोल, किरात व सहज इच्छाओं रूपी हिरण व पक्षी आत्मा रूपी राम के साथ मुझे (सुरता) सुख देने वाले होंगे। अर्थात् आत्म चिन्तन में सुरता लगी रहने पर सब प्रकार से सुख मिलेगा। दो0 सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ। मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता सुमन्त्रणा रूपी सचिव से बोली कि आप तो मेरी तरफ से वृति नाड़ियों रूपी सासुओं और चित रूपी ससुर के पैर पकड़ कर प्रार्थना करना कि वे मेरी चिन्ता न करें। मैं तो दृढ़ वैराग्य रूपी वन में सहजता से ही सुखी हूँ। प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।। नहिं मग श्रम भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।। व्याख्या : मेरे साथ प्राणों के स्वामी आत्मा हैं और साथ में लखन रूपी देवर हैं, जो वीर हैं और नियम संयम रूपी धनुष बाण धारण किए हुए हैं। मुझे (सुरता) दृढ़ वैराग्य रूपी वन के मार्ग पर चलने में न कोई कष्ट है और न ही कोई भ्रम है। अत: वे मेरे बारे में भूलकर भी चिन्ता न करें। सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।। नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।। व्याख्या : सुमन्त्रणा रूपी सचिव सुरता रूपी सीता की मधुर व शीतल वाणी सुनकर वैसे ही व्याकुल हो गया जैसे मणि के खो जाने पर नाग व्याकुल हो जाता है। उस अवस्था में आँखों को कुछ नहीं दीख रहा था और कानों को सुनाई नहीं पड़ रहा था। इसलिए अति व्याकुल होकर सुमन्त्रणा रूपी भाव कुछ कह नहीं पा रहा था। वास्तव में जब ध्यान में सुरता दृढ़तापूर्वक आत्मा में लीन हो जाती है तो आँखों के सामने दृश्य आना बन्द हो जाते हैं तथा कानों में आवाजें आना भी बन्द हो जाती हैं। इन चौपाइयों में उसी अनुभूति को लिखा गया है। राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। तदपि होति नहीं सीतलि छाती।। जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने सुमन्त्रणा रूपी भाव को समझाने के बहुत प्रयास किए परन्तु फिर भी सुमन्त्रणा रूपी सचिव को शान्ति नहीं मिल रही थी। इसलिए वह सुरता रूपी सीता को साथ लौटा ले जाने का अनेक प्रयास किया परन्तु आत्मा रूपी राम ने उचित उत्तर देकर अर्थात् सहज प्रेरणा करके समझाने का प्रयास किया। मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।। राम लखन सिय पद सि डिग्री नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गँवाई।। व्याख्या : तब सुमन्त्रणा रूपी भाव ने मन में विचार किया कि आत्मा की प्रेरणा को टाला नहीं जा सकता है। कर्म की गति बहुत कठिन होती है। यहाँ कर्म का तात्पर्य ध्यान अवस्था में अपान का पान में हवन होने की क्रिया से है। जब ध्यान दृढ़ होने लगता है तब कर्म की क्रिया स्वत: घटित होने लगती है। कर्म की उस गति को ही कठिन गति कहा गया है। सुमन्त्रणा रूपी भाव ने कर्म की कठिन गति को जानकर समझ लिया इसलिए आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव के आगे समर्पण करते हुए अवधी रूपी शरीर में लौटने लगा जैसे कोई व्यवसायी अपने मूलधन को गँवा कर चला हो। दो0 रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।। व्याख्या : जब दृढ़ ध्यान की अवस्था में सुमन्त्रणा रूपी भाव वृतियों रूपी रथ के साथ वापिस देह रूपी अवध में लौटने लगता है, तो उस समय जो सूक्ष्म अनुभूति होती है। उसी को इस दोहे में लिखा गया है कि वृति रूपी रथ चलाने पर भी नहीं चल पा रहा था और मन रूपी घोड़े हिनहिना कर आत्मा की तरफ ही आकर्षित हो रहे थे। इस विषाद की अवस्था को देखकर निषेध भाव रूपी निषाधराज भी सिर धुन-धुन कर पश्चाताप करने लगा। अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में निषेध का भाव भी व्यथित हो उठा। जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।। बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।। व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम के वियोग से मन के भाव रूपी पशु ऐसे दु;खी हो जाते हैं। उन आत्मा के बिना चित रूपी राजा, नाड़ियों रूपी माता व भाव रूपी प्रजा कैसे जीवित रह सकते हैं? आत्मा रूपी राम ने जबरदस्ती सुमन्त्रणा रूपी सचिव को वापस देह रूपी अवध के लिए भेज दिया और आप स्वयं आनन्द की गंगा रूपी सुरसरि के तट पर आ गए। अर्थात् ध्यान में आनन्द की सुरसरि उठने लगी। ऐसी अवस्था में साधक के रोएँ-रोएँ खड़े होने लग जाते हैं। प्रतिश्वास के साथ आनन्द का प्रवाह हो उठता है। कुछ साधना पंथों में इसे ही ब्रह्मानन्द कह कर पुकारा जाता है। मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।। चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।। व्याख्या : साधक का ध्यान जब आनन्द कोष में पहुँच जाता है, तो वह कैवल्य को प्राप्त करने के लिए आनन्द की सुरसरि को भी पार करना चाहता है। केवट ही यहाँ कैवल्य का प्रतीक है। जब साधक कैवल्य प्राप्त करना चाहता है तो केवल्य रूपी केवट भाव कहता है कि मैंने आपका मर्म जान लिया है कि आपके (आत्मा) चरण कमलों में ऐसी रज (धूल) है जिसके छूने से मानुष अर्थात् मन के भाव पैदा हो जाते हैं। छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें नहिं काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।। व्याख्या : जब वासना रूपी शिला भी आपके चरणों की धूल से सद्वृति रूपी नाड़ी बनकर प्रवाहित होने लग जाती है, तो वासनाओं से तो केवल्य की भावना कठिन नहीं होती है। जब मोक्ष की भावना भी मानुष (मन की चेतना) बनकर मन के अधीन हो जायेगी, तो मोक्ष प्राप्ति का भाव भी मानुष (मन की चेतना) बनकर कैवल्य का रास्ता ही बन्द हो जायेगा अर्थात् तब मोक्ष प्राप्ति की चाह भी नहीं बचेगी। एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।। जौं प्रभु पार अवसिगा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।। व्याख्या : मैं तो इस मोक्ष की भावना रूपी नाव से ही समस्त भावों का पालन-पोषण करता हूँ। मैं तो और कुछ वासनाओं का खेल नहीं जानता हूँ। अत: हे आत्मा रूपी राम! अगर आप अवश्य ही आनन्द की सुरसरि रूपी गंगा को पार ही करना चाहते हो तो मुझे आपके चरण कमलों को धोने दो अर्थात् मोक्ष की भावना में दृढ़ता लाने दो। वास्तविकता में साधक के साथ यह होता है कि मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य रखने पर भी साधक मोक्ष के बहाने मन की चेतना के साथ सिद्धियों की प्राप्ति में उलझ जाता है और उसका मानुष (मन की चेतना) मोक्ष प्राप्ति का नहीं रहकर सिद्धियों की प्राप्ति का हो जाता है। अत: यहाँ कैवल्य भाव रूपी केवट कहते हैं कि आपको अगर आनन्द रूपी गंगा को अवश्य ही पार करना है तो मोक्ष के भाव में दृढ़ता ले आओ। छ0 पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराईं चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं।। ब डिग्री तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पा डिग्री उतारिहौं।। व्याख्या : कैवल्य भाव रूपी केवट बोला कि हे आत्मा रूपी नाथ! मैं आपके चरण कमलों को धोकर अर्थात् वासना रूपी चरण धूल को हटाकर मोक्ष रूपी नाव पर चढ़ाऊँगा। मुझे उसके बदले में कुछ उतराई नहीं चाहिये अर्थात् मोक्ष के भाव की कुछ चाहने की इच्छा नहीं रहती है। मुझे आत्मा रूपी राम की आन है और दस इन्द्रियों रूपी दसरथ की शपथ है कि मैं सत्य कह रहा हूँ, मुझे कुछ नहीं चाहिये। वास्तव में मोक्ष का भाव तो आत्मा से कुछ नहीं चाह रखता है और न ही इन्द्रियों से कुछ चाह रखता है। यह मोक्ष के भाव की सहजता होती है। मोक्ष भाव कहता है कि चाहे लखन भाव मुझे तीर मार दे अर्थात् भले ही लखन भाव मेरे मर्म को लख कर देख ले, मुझे कुछ नहीं चाहिये। इसलिए मैं जब तक आपके (आत्मा) चरण कमलों की वासना रूपी धूल को धो नहीं लूँगा, तब तक पार नहीं उतारूँगा। तुलसीदास अपने अनुभव को लिखते हुए कहते हैं कि जब तक जीवात्मा वासना की धूल को नहीं धो लेता है, तब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो पाती है। सो0 सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करूनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।100।। व्याख्या : कैवल्य भाव रूपी केवट के प्रेम व अनुराग से लपेटे हुए वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम मुस्कुराए और सुरता रूपी सीता, लखन भाव रूपी लक्ष्मण की तरफ देखे अर्थात् सुरता व लखन का आभास किया और मन में विचार किया कि बिना वासनाओं रूपी इच्छाओं को छोड़े मोक्ष की अवस्था को प्राप्त नहीं किया जा सकता है और बिना मोक्ष रूपी नाव पर चढ़े आनन्द रूपी गंगा को पार करना मुश्किल कार्य है। यही आत्मा रूपी राम की हँसी का रहस्य है। कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ क डिग्री जेहिं तव नाव न जाई।। बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम हँसते हुए बोलते हैं कि हे कैवल्य भाव रूपी केवट! आप वही कीजिए जिससे मोक्ष रूपी नाव नहीं नष्ट हो। अत: शीघ्र ही भक्ति रूपी जल लाकर वासना रूपी धूल को दूर कीजिए और जल्दी आनन्द रूपी सुरसरि से पार उतार दीजिए। जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भव सिंधु अपारा ।। सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।। व्याख्या : जिसका नाम का एक बार ही स्मरण करने से नर (धड़कन) भाव रूपी समुद्र को पार कर जाता है अर्थात् आत्मा स्वयं के स्वरूप को जान लेती है, तो भावों के अपार समुद्र से पार हो जाती है। परन्तु वही सहज आत्मा कैवल्य भाव रूपी केवट का निहोरा करती है अर्थात् मोक्ष रूपी नाव पर चढ़ कर भाव रूपी सागर को पार करना चाहती है। जबकि निर्मल आत्मा अपने स्वरूप में जब स्थित होती है, तो तीनों गुणों से विस्तार को प्राप्त जगत को माप लेती है अर्थात् जगत के भावों से परे हो जाती है। पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।। केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के चरण नखों को देखकर आनन्द रूपी गंगा हर्षित हो उठी अर्थात् ध्यान में जब आत्म चेतना सुरसरि कोष में पहुँचती है तो आनन्द प्रस्फुटित हो उठता है। आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर मोह से ग्रस्त बुद्धि का नाश हो जाता है और कैवल्य भाव उमंग में भर जाता है। तब कैवल्य भाव मोह के बन्धनों से मुक्त होकर आत्म चेतना में लीन हो जाता है। उसी को राम की आज्ञा पाकर जल का कठोती भर लाना बताया गया है। अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।। बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।। व्याख्या : उस समय कैवल्य भाव रूपी केवट आनन्द व अनुराग से भर उठता है और आत्म चेतना में लीन होने लग जाता है। उस अवस्था में समस्त देव भाव सराहना करने लग जाते हैं और कहने लगते हैं कि इस अवस्था के बराबर दूसरा कोई पुण्य नहीं होता है। दो0 पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पा डिग्री करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।। व्याख्या : तब कैवल्य भाव रूपी केवट आत्मा रूपी राम के चरणों को धोकर परिवार सहित चरणामृत का पान करके अपने पितरों का उद्धार करके प्रसन्न होकर मोक्ष रूपी नाव पर आत्मा रूपी राम को बैठाकर आनन्द रूपी सुरसरि से पार ले गया। अर्थात् जब कैवल्य का भाव निर्मल आत्म चेतना में लीन हो गया, तो आत्म चेतना सुरता व लखन भाव सहित आनन्द रूपी गंगा के पार चले गए। अर्थात् अब साधक के मन में ब्रह्मानन्द की चाह भी नहीं बची। उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता।। केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।। व्याख्या : मोक्ष रूपी नाव से आनन्द रूपी गंगा को पार करके आत्म चेतना सुरता, लखन व निषेध भाव के साथ खड़े हो गए अर्थात् ध्यान आनन्द कोष के पार पहुँच गया। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम ने सोचा कि कैवल्य भाव को कुछ नहीं दिया अर्थात् कैवल्य भाव रूपी केवट को कुछ रिद्धि-सिद्धि रूपी धन तो देना चाहिए। क्योंकि ध्यान की गहराई में पल-पल रिद्धि-सिद्धियाँ पैदा होती रहती हैं। पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी पति के हृदय की गति को सुरता रूपी सीता जान लेती हैं। इसलिए सुरता रूपी सीता ने प्रसन्न मन से मन की मणि रूपी मुदरी (मुद्रा) को उतार दिया अर्थात् मनोवांछित फल को देने वाली प्रेरणा रूपी अंगूठी को दे दिया। तब आत्मा रूपी राम ने कैवल्य भाव रूपी केवट से कहा कि आप उतराई ले लिजिए अर्थात् मनोवांछित वर ले लीजिए। तब कैवल्य भाव व्याकुल होकर आत्मा रूपी राम के चरणों में पड़ गया अर्थात् कैवल्य भाव ने पूरी तरह समर्पण कर दिया। अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में किसी भी प्रकार की चाह बाकी नहीं बची। नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।। बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।। व्याख्या : कैवल्य भाव रूपी केवट बोला कि हे आत्मा रूपी नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया है अर्थात् अब तो पूर्ण काम की अवस्था आ गयी है जिससे सब प्रकार के दु:ख व दारिद्रय मिट गए हैं। मैंने बहुत समय तक मजूरी की है परन्तु आज की ध्यान की क्रिया ने मुझे पूर्ण संतोष प्रदान कर दिया है। अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीन दयाल अनुग्रह तोरें।। फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।। व्याख्या : अब मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। बस अब तो केवल आपकी कृपा चाहिये। जब आप वापस लौटोगे, तब मुझे जो भी आप देंगे, उसको प्रसाद के रूप में मैं सिर पर धारण कर लूँगा। जब ध्यान चढ़ने की अवस्था में होता है, तो रिद्धि-सिद्धियों की चाह भी नहीं बचती है परन्तु ध्यान दोबारा जब उतरता है, तो परिणामस्वरूप सहज में ही नाना सिद्धियाँ पैदा हो जाती हैं और साधक सहज होकर उनको ग्रहण भी कर लेता है। उसी अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। दो0 बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करूनायतन भगति बिमल ब डिग्री देइ।।102।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम, लखन भाव व सुरता रूपी सीता के बहुत कहने पर भी अर्थात् नाना प्रकार से प्रेरणा करने पर भी कैवल्य भाव ने कुछ नहीं लिया। तब आत्मा रूपी राम ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर कैवल्य भाव को विदा कर दिया। तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।। सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।। व्याख्या : तब स्नान करके अर्थात् पूरी तरह वासनाओं से मुक्त होकर आत्मा रूपी राम ने पार्थिव पूजा की और सीस नवाया अर्थात् निजस्वरूप में स्थित होकर परमात्मा के प्रति समर्पण किया। तब सुरता रूपी सीता ने आनन्द की सुरसरि रूपी गंगा को हाथ जोड़े और कहा कि हे माता! मेरे मनोरथ को पूर्ण करना अर्थात् मैं (सुरता) आत्मा के साथ परमात्मा में लीन हो जाऊँ। पति देवर सँग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।। सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।। व्याख्या : मैं आत्मा रूपी पति और लखन भाव रूपी देवर के साथ वापस सकुशल लौटकर तेरी पूजा कर सकूँ। इस प्रकार सुरता रूपी सीता की विनय व प्रेम रस से भरी हुई वाणी को सुनकर सुरसरि रूपी गंगा के निर्मल जल से आकाशवाणी हुई अर्थात् सुरसरि रूपी भाव बोल उठा। सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।। लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।। व्याख्या : तब सुरसरि रूपी गंगा भाव बोल उठा कि हे आत्मा रूपी राम की प्रियतमा सुरता! तुम्हारा प्रभाव जगत में किसी को मालून नहीं है क्योंकि तुम्हारे द्वारा देखने पर भाव लोकपाल हो जाते हैं अर्थात् जिस भाव में सुरता लगती है, वही भाव प्रबल हो उठता है। तुम्हारी सेवा करने पर अर्थात् सुरता को साध लेने पर सिद्धियाँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।। तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा।। व्याख्या : तुमने विनय करके जो मुझे सम्मान दिया है। फिर भी मेरी वाणी को सिद्ध करने के लिए मैं तुम्हें आशीष देती हूँ। दो0 प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।। व्याख्या : तुम आत्मा रूपी पति व लखन भाव रूपी लक्ष्मण सहित कुशलतापूर्वक वापस सुष्मना नाड़ी रूपी कौशलपुर में आवोगी और उस अवस्था में तुम्हारी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होगी और जगत में सुयश छायेगा। वास्तव में यहाँ पर ध्यान पूर्ण रूप से लग जाने पर वापस लौटकर आने वाली अवस्था का वर्णन किया गया है। क्योंकि जब ध्यान दृढ़ होकर परमात्मोन्मुख होता है, तो बीच-बीच में साधक के मन में ध्यान के परिणामों का चिन्तन उठ आता है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ लिखा गया है कि परमात्मा में ध्यान का अनुभव करके पुन: सुष्मना नाड़ी द्वारा कौशलपुर रूपी शरीर में सकुशल आगमन होगा और उस अवस्था में परम सहजता की अवस्था आ जायेगी। परम सहजता की अवस्था को ही जगत में यश प्राप्त करने की अवस्था कहा गया है। गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला।। तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।। व्याख्या : सुरसरि रूपी गंगा के मंगल के मूल वचनों को सुनकर और गंगा को अनुकूल जानकर सुरता रूपी सीता प्रसन्न हो गयी। तब आत्मा रूपी राम ने निषेध भाव रूपी निषाद को वापस घर जाने को कहा तो निषेध भाव का मुख सूख गया और छाती में जलन हो गयी। दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।। नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।। व्याख्या : तब निषेध भाव रूपी निषाद ने विनय पूर्वक कहा कि हे चेतन आत्मा रूपी राम! आप मेरी प्रार्थना सुनिए। मैं आपके साथ रहकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन का मार्ग दिखला दूँगा और आचरण द्वारा आपकी सेवा कर लूँगा। अर्थात् निषेध भाव आत्मा रूपी राम का संग चाहता है जिससे कोई वासना की चाह ध्यान में विघ्न नहीं डाल सके। जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।। तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।। व्याख्या : जिस वैराग्य वृति में आप निवास करना चाहेंगे, मैं उसी वैराग्यवृति रूपी वन में नियम संयम रूपी घास-फूस की कुटिया बना दूँगा। उसके बाद जैसी आपकी प्रेरणा होगी मैं (निषेध भाव) वैसा ही करूँगा। वास्तव में साधना के प्रारम्भ व मध्य में निषेध भाव का बहुत महत्व होता है परन्तु जब साधना परिपक्व हो जाती है, तो नियम-संयम के निषेध भी मिट जाते हैं। अत: यहाँ पर उसी अनुभूति को समझाया गया है कि किस प्रकार निषेध भाव आत्मा का संग करता है और किस सीमा तक संग कर पाता है। सहज सनेह राम लखि तासू। संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू।। पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हें।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने निषेध भाव रूपी गुह का निश्छल प्रेम देखकर प्रसन्नता के साथ अपने संग ले लिया। जब साधना में निषेध वृति भी सहज हो जाती है, तो उसे ही निषाद का सहज प्रेम बताया गया है। सहज होने की अवस्था में निषेध भाव समस्त नकारात्मकता का त्याग कर देता है, उसी को निषाद राज गुह द्वारा अपनी जाति के लोगों को बुलाकर संतुष्ट कराकर भेजना बताया गया है। दो0 तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ।।104।। व्याख्या : तब ध्यान दृढ़ वैराग्य रूपी वन में गहराई से लगने लगा और गुणों की उत्पत्ति का मर्म समझ में आने लगा तथा परम कल्याण का भाव प्रबल होने लगा। उसी को गणपति व शिव को स्मरण करना बताया गया है। ध्यान की उस गहराई में आनन्द की सुरसरि भी पीछे रह जाती है तथा आत्म चेतना सुरता, लखन व निषेध भाव के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन में प्रवेश करने लगती है। तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।। प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथ राजु दीख प्रभु जाई।। व्याख्या : उस दिन अर्थात् अगले क्षण में धैर्य रूपी वृक्ष के नीचे विश्राम किया और लखन भाव व निषेध भाव ने धैर्य रूपी विश्राम की सब व्यवस्था कर दी। फिर सुबह प्रात: क्रिया करके अर्थात् ध्यान में नवस्फूर्ति का अनुभव करके आत्म चेतना ने तीन गुणों के मिलन स्थान (अर्थात् तीरथ राज प्रयाग) का दर्शन किया। पाठकों को मैं यहाँ बता देना चाहता हूँ कि ध्यान के दौरान साधक को नाना स्तरों का अनुभव होता है। भृकुटि के आस-पास ही विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं। ध्यान में ही तीनों गुणों का मर्म समझ में आता है। तीरथ राज प्रयाग उन्हीं तीन गुणों के मिलन स्थान का प्रतीक है। गुणों के मिलन स्थान रूपी तीरथ राज प्रयाग की क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं, उन्हीं को नीचे की चौपाइयों में स्पष्ट किया गया है। सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।। चारि पदारथ भरा भँडारू। पुन्य प्रदेस देस अति चारू।। व्याख्या : उस तीर्थराज का सत्य (सहजता) ही सचिव होता है और श्रद्धा की भावना ही प्रिय नारी होती है। उनका भावों की माधुर्यता ही परम हितकारी मित्र होता है। वहाँ पर धर्म, अर्थ्, काम व मोक्ष के भण्डार भरे हुए होते हैं। वह तीन गुणों का मिलन स्थल रूपी तीर्थराज बहुत सुन्दर प्रदेश होता है। छेत्रु अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।। सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।। व्याख्या : यह तीन गुणों का मिलन स्थान ही (तीर्थराज) प्रगाढ़ दुर्ग होता है, जिसके सपने में भी दुश्मन नहीं होते हैं। समस्त भाव ही तीर्थराज की विशाल वीर सेना होती है, जो विकारों की सेना को कुचलने में महारणधीर होते हैं। संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मन मोहा।। चँवर जमुन अ डिग्री गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भँगा।। व्याख्या : तीन गुणों का मिलन स्थल ही सुन्दर सिंहासन होता है, जो मुनियों के मन के मोह को दूर करनेवाला होता है। ईड़ा व पिंगला रूपी नाड़ियों की तरंगे ही इस तीर्थराज के चँवर है, जिनका ज्ञान होने पर समस्त दु:खों का नाश हो जाता है। दो0 सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।। व्याख्या : जो साधक पवित्र भावना से ध्यान करते हैं, वे तीर्थराज की सेवा करके समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर लेते हैं और उसी साधना के अनुभवों को वेदों व पुराणों में निर्मलता के साथ गाया गया है। को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।। व्याख्या : ऐसे तीर्थराज (तीनों गुणों के संगम स्थल) के प्रभाव का वर्णन कौन कर सकता है, क्योंकि तीर्थराज का प्रभाव तो वासनाओं के विकारों को मिटाने वाला होता है। ऐसे तीर्थराज को देखकर अर्थात् ऐसी अवस्था में ध्यान पहुँच जाने पर सहज सुख मूल आत्मा रूपी राम को बहुत शकुन मिलता है। कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्री मुख तीरथ राज बड़ाई।। करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अऩुरागा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने सुरता, लखन व निषेध भाव को तीर्थराज (तीनों नाड़ियों के संगम स्थल) के महत्व को बताया। तीर्थराज के तट पर सुन्दर भाव रूपी वन को देखते हुए और अनुराग सहित महत्व को बताते हुए। एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।। मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।। व्याख्या : इस प्रकार तीर्थराज के महात्म्य को बताते हुए त्रिवेणी का दर्शन किया अर्थात् सुष्मना, ईड़ा व पिंगला नाड़ियों के संगम स्थल का ध्यान में आभास हुआ, जिसका आभास होना ही समस्त मंगलों को देने वाला होता है। उस त्रिवेणी संगम में साधक का मन प्रसन्न होकर स्नान करता है तो परम कल्याणकारी भावना से भर जाता है। उसी को त्रिवेणी स्नान करके शिव की पूजा करना बताया गया है। उस अवस्था में दैवीय भाव प्रबल हो उठते हैं। वही अवस्था यथा सम्मान देकर देवों की पूजा करना बताया गया है। तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।। मुनि मन मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।। व्याख्या : जब ध्यान तीनों नाड़ियों के संगम स्थल पर दृढ़ हो जाता है, तो नाना प्रकार के सात्विक भाव प्रबल हो जाते हैं और फिर ध्यान धीरे-धीरे भृकुटि के बाँयी तरफ चढ़ने लगता है। उस अवस्था में प्रकाश से भृकुटि भर जाती है। दिव्य प्रकाश से भृकुटि का भर जाना ही भरद्वाज ऋषि का आश्रम कहलाता है। जब ध्यान में दिव्य प्रकाश का आभास होता है, तो आत्मा पूरी तरह परमात्मा के प्रति समर्पण की भावना से भर जाती है। उसी अवस्था को आत्मा रूपी राम का भरद्वाज मुनि को दंडवत करना बताया गया है। उस अवस्था में दिव्य प्रकाश भी आत्मा को देखकर और दिव्य हो उठता है। उसी को भरद्वाज मुनि के मन की प्रसन्नता कहा गया है। उस समय ऐसा लगने लगता है मानो ब्रह्मानन्द का खजाना ही मिल गया हो। दो0 दीन्हि असीस मुनिस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।। व्याख्या : दिव्य प्रकाश रूपी मुनि ने आत्मा रूपी राम को दिव्य आशीर्वाद दिया और यह जानकर हृदय में बहुत आनन्द हुआ कि ध्यान की इस विधि से इन्द्रियों को पुण्य पथ का दर्शन होगा अर्थात् अब गुणों के मर्म को जान लेने के बाद इन्द्रियाँ सहज व निर्मल हो जायेंगी। कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।। कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।। व्याख्या : दिव्य प्रकाश रूपी भरद्वाज मुनि ने आत्मा रूपी राम की कुशलक्षेम पूछकर आसन दिया और सहज प्रेम द्वारा पूजा की अर्थात् सहज प्रेम का आभास किया। तब दिव्य प्रकाश ने आत्मा को गुण व गुणों की क्रिया के मूल को समझाया जो मन को बहुत सुखद लगने वाला था तथा अमृत तुल्य फल को देने वाला था। उसी को अमृत से भी मीठे कंदमूल फल खाने को देने की बात कही गयी है। सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रूचि राम मूल फल खाए।। भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण सहित आत्मा रूपी राम ने गुणों के मूल को समझा। जिससे परम विश्राम मिल गया और आत्मा को बहुत सुख मिला। तब दिव्य प्रकाश रूपी भरद्वाज मुनि ने कहा। आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।। सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहिअवलोकत आजू।। व्याख्या : आज अर्थात् ध्यान की इस अवस्था में पहुँच जाने से तप, तीर्थ व त्याग का फल मिल गया है। इस अवस्था में पहुँचने से जप, योग व वैराग्य की सिद्धि भी हो गयी है। हे आत्मा रूपी राम! इस अवस्था में तुम्हें देखने से समस्त शुभ साधन सज गए हैं अर्थात् परम कल्याणकारी अवस्था आ गयी है। लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हरें दरस आस सब पूजी।। अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।। व्याख्या : दिव्यप्रकाश रूपी भरद्वाज मुनि बोले कि ध्यान की इस अवस्था के बराबर लाभ की और कोई सीमा नहीं है तथा इसके बराबर दूसरा कोई सुख भी नहीं है क्योंकि निज स्वरूप को देख लेने पर सब मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। अत: हे आत्मा रूपी राम! अब तो आप निज पद अर्थात् निजस्वरूप का ही वरण करो, क्योंकि निजस्वरूप का वरण करने पर ही सहज प्रेम का कमल खिल उठेगा। दो0 करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।107।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! जब तक साधक मन, वचन व कर्म से छल कपट का त्याग नहीं करता है, तब तक वह निज स्वरूप को नहीं जान पाता है और बिना निजस्वरूप के जाने करोड़ों प्रयास करने पर भी सपने में भी सुख नहीं मिल पाता है। सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।। तबरघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।। व्याख्या : दिव्य प्रकाश रूपी मुनि भरद्वाज के भाव व भक्ति से भरे वचनों को सुनकर आनन्द में तृप्त आत्मा रूपी राम सकुचा गए अर्थात् निज प्रभुता का आभास होते ही आत्मा को संकोच हुआ कि समस्त जगत का मूल तो मैं स्वयं ही थी। निज स्वरूप को पहचानने पर जो आश्चर्य होता है, वही आत्मा रूपी राम का संकोच बताया गया है। जब आत्मा निज स्वरूप को जान लेती है तो नाना भावों का मर्म समझ में आ जाता है। इसलिए यहाँ आत्मा रूपी राम दिव्यप्रकाश रुपी भरद्वाज के सुयश को सभी को सुनाते हैं। सो बड़ सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।। मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे मुनि! वही भाव बड़ा व गुणों का घर होता है, जिसे मन आदर देता है। इस प्रकार दिव्य प्रकाश रूपी भरद्वाज व आत्मा रूपी राम परस्पर एक दूसरे के सामने समर्पण करने लगते हैं और इन्द्रियों से परे जो सुख प्राप्त होता है उसका अनुभव करने लगते हैं। यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।। व्याख्या : जब यह समाचार तीर्थराज पर रहने वाले ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध व उदासी भावों को मिला तो सभी भाव दिव्यप्रकाश रूपी भरद्वाज के आश्रम पर चित रूपी दसरथ के पुत्रों को देखने के लिए आ गए। अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में सभी भाव दिव्यप्रकाश के पास आ गए। पाठकगणों को मैं यह बता देना चाहता हूँ कि मन में बिल्कुल भी संशय नहीं करें क्योंकि प्रत्येक भाव एक दूसरे भाव से बात करता है तथा इसकी अनुभूति कोई भी साधक ध्यान के अभ्यास के द्वारा कर सकता है। राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोचन लाहू।। देहिं असीस परम सुख पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने सभी भावों को प्रणाम किया और सभी भाव आत्मा रूपी राम को देखकर प्रसन्न हो गए। आत्मा रूपी राम को आशीर्वाद देकर सबको बहुत सुख मिला और सभी भाव आत्मा की निर्मलता रूपी सुंदरता का बखान करते हुए वापस लौट गए। दो0 राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सि डिग्री नाइ।।108।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने रात को दिव्यप्रकाश रूपी मुनिके आश्रम में विश्राम किया अर्थात् ध्यान भरद्वाज (दिव्य प्रकाश के कोष में) कोष में स्थिर रहा और प्रात:काल तीनों नाड़ियों के संगम जल में स्नान किया अर्थात तीनों गुणों से उत्पन्न भावों के मर्म को समझा। जब दिव्य प्रकाश की सहायता से तीनों गुणों का मर्म समझ में आ जाता है, तो ध्यान में आत्म चेतना, सुरता व लखन भाव और गहराई में चले जाते हैं। उसी को आत्मा रूपी राम का सुरता रूपी सीता व लखन भाव सहित प्रसन्न होते हुए दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने के लिए दिव्यप्रकाश रूपी मुनि से आज्ञा लेना बताया गया है। राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।। मुनि मन बिहसि राम सब कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने प्रेम पूर्वक दिव्य प्रकाश रूपी मुनि से कहा कि हमें दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए किस रास्ते से जाना चाहिये। तब दिव्य प्रकाश रूपी मुनि ने हँसकर कहा कि तुम्हारे लिए अर्थात निर्मल चेतन आत्मा के लिए तो सभी रास्ते सुगम होते हैं। साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।। सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा।। व्याख्या : दिव्य प्रकाश रूपी मुनि ने आत्मा रूपी राम के साथ भेजने के लिए इक्यावन वृतियों के भावों को बुलाया। सभी भाव सुनकर प्रसन्न होते हुए आए। सभी भावों का आत्मा रूपी राम पर अपार स्नेह होता है, इसलिए सभी भाव कहते हैं कि दृढ़ वैराग्य रूपी वन का रास्ता हमारा देखा हुआ है। मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जन्म सुकृत सब कीन्हे।। करि प्रनामु रिषि आयुस पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।। व्याख्या : तब दिव्य प्रकाश रूप मुनि ने चार ब्रह्म में रत रहने वाले जप, तप, नियम व संयम रूपी चार भावों को जिन्होंने बहुत समय तक अच्छे कृत किए थे, आत्मा रूपी राम के साथ कर दिए। तब आत्मा रूपी राम दिव्यप्रकाश रूपी मुनि को प्रनाम करके प्रसन्न होते हुए ध्यान में आगे के लिए चल दिए। ग्राम निकट जब निकसहिं जाई। देखहिं दरसु नारि नर धाईं।। होहिं सनाथ जनमु फलु पाई। फिरहिं दुखित मनु संग पठाई।। व्याख्या : जब ध्यान में आत्म चेतना सुरता व लखन भाव सहित छोटे-छोटे कोषों के पास से गुजरते हैं, तो अति सूक्ष्म नर-नाड़ियों (जिन्हें सूक्ष्म कोशिका भी कह सकते हैं) में कम्पन हो उठता है और वे आत्मा की तरफ आकर्षित हो उठती हैं। ध्यान के द्वारा सूक्ष्म-सूक्ष्म कोशिकाएँ जागृत हो उठती हैं। इसी को जन्म का फल पाना व सनाथ होना बताया गया है। उस अवस्था में कोशिकाओं (नर-नाड़ियों) का मन तो आत्म चेतना में मिल जाता है और कोशिकाएँ अपने स्थान पर लौट जाती हैं। इसी को दु:खी होकर घर लौटना बताया गया है। दो0 बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।। व्याख्या : तब ध्यान भृकुटि के बाएँ धीरे-धीरे आगे के कोषों में बढ़ने लगता है, तो आत्मा सहज होती चली जाती है। इसलिए जप, तप, नियम व संयम रूपी ब्रह्मचारियों की भी आवश्यकता नहीं रह जाती है। इसलिए उसी अवस्था को विनय करके ब्रह्मचारियों को बिदा करना बताया गया है। जब नियम-संयम की आवश्यकता नहीं रहती है तो समता का भाव आ जाता है और साधक के लिए तमो गुण में भी सहजता आ जाती है। उसी अवस्था को तमोगुणी रूपी यमुना में स्नान करना बताया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि साधक धीरे-धीरे गुणों को गुणों में बरतने लग जाता है। सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।। लखन राम सिय सुंदरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।। व्याख्या : ईड़ा रूपी यमुना के किनारे बसने वाले नर-नारी रूपी भाव आत्मा रूपी राम के आगमन की बात सुनकर स्वयं की वृतियों को छोड़-छोड़कर दौड़ पडे। वे सभी भाव आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण की सुन्दरता को देखकर अपने भाग्य की सराहना करने लगे। अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ।। जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।। व्याख्या : ईड़ा रूपी यमुना के तट निवासियों अर्थात् तामसिक भावों के मन में आत्मा रूपी राम का परिचय जानने की बहुत लालसा होती है परन्तु पूछने में संकोच करते हैं। परन्तु कुछ भाव जो तुलनात्मक दृष्टि से थोड़े सयाने होते हैं, वे युक्ति से आत्मा रूपी राम को पहचान लेते हैं। सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।। सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।। व्याख्या : उन सयाने भावों ने सब बात बाकी भावों को बतायी कि आत्मा रूपी राम चित रूपी राजा व रजोवृति रूपी माता की आज्ञा लेकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए चले हैं। यह बात सुनकर भोगों की बात को याद करके सभी भाव विषाद पूर्वक पश्चाताप करने लगे और कहने लगे कि चित रूपी राजा और रजोवृति रूप रानी ने ठीक नहीं किया। तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेज पुंज लघुबयस सुहावा।। कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।। व्याख्या : जब ध्यान में तामसिक भावों का सम्पर्क आत्म चेतना के साथ होता है, तो उस अवसर पर कुछ तामसिक भाव आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित हो उठते हैं। तब तामसिक भाव ज्ञान स्वरूप प्रकाश पुंज बन जाता है, जिसकी गति को कोई कवि भी नहीं जान पाता है। उस अवस्था में अचानक भावों में वैराग्य पैदा हो जाता है। इसलिए उसे लघु बयस अर्थात् तुरन्त पैदा होने वाला भाव रूपी तपस्वी बताया गया है। उस भाव के मन, वचन व कर्म में आत्मा के प्रति अनुराग पैदा हो जाता है। अर्थात् वह अपनी वृति को छोड़कर आत्मोन्मुखी हो जाता है। इन भावों की गति को ध्यान में अच्छी तरह से समझा जा सकता है। दो0 सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।। व्याख्या : वह तेजपुँज रूपी तापस अर्थात् आत्मोन्मुखी हुआ भाव के नयनों में जल आ गया और अपने आत्म देव रूपी इष्ट को पहचान कर पुलकित हो उठा तथा पूरी तरह आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर दिया। उस दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।। मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सबु कोऊ।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने पुलकित होते हुए उस तेज पुँज स्वरूप भाव को हृदय से लगा लिया। तब उस भाव को लगा मानो परम भिखारी को पारस पत्थर मिल गया हो। उस समय ऐसा लगने लगा मानो प्रेम और परमार्थ दोनों शरीर धारण करके आपस में मिल रहे हों। बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।। पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।। व्याख्या : तब तेजपुँज रूपी तपस्वी भाव लखन भाव के आगे समर्पण कर दिया। फिर लखन भाव ने बहुत अनुराग के साथ उसे गले लगा लिया। फिर सुरता रूपी सीता को भावों की माता जानकर चरणों में सीस झुकाया और सुरता रूपी सीता ने भी आशीर्वाद दिया। कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।। व्याख्या : तमस भाव से उत्पन्न तेजपुँज को देखकर निषाद अर्थात् निषेध भाव ने भी समर्पण कर दिया। वास्तव में जब साधना परिपक्व हो जाती है तो निषेध वृति भी सहज वृति में बदल जाती है। निषेध वृति का सहज हो जाना ही निषाद का दण्डवत करना बताया गया है। निषेध भाव तमस भाव रूपी तपस्वी को आत्मोन्मुखी हुआ देखकर बहुत प्रसन्न होकर मिला। ध्यान की उस अवस्था में नयन एकटक होकर अमृतमयी रूप का पान करने लगते हैं और साधक को ऐसे लगने लगता है जैसे किसी भूखे को अच्छा भोजन मिल गया हो। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में कुछ तामसिक प्रभाववाली वृतियों रूपी नारियाँ आपस में बातें करने लगती हैं कि वे माता-पिता अर्थात् चित और चितवृतियाँ कैसे हैं? जिन्होंने आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी बालकों को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में भेज दिया है। तब आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव के सौन्दर्य को देखकर सभी तामसिक वृति रूपी नर-नाड़ियाँ व्याकुल हो उठी। ध्यान जब-जब गहरा होता चला जाता है तो आत्म चेतना की शक्ति से सुप्त कोशिकाएँ भी जागृत हो उठती हैं। उन्हीं को व्याकुल होना बताया गया है। दो0 तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह।।111।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कोशिकाओं रूपी सखियों को बहुत प्रकार से समझाया तो वे आत्मा की प्रेरणा को मानकर अपने भाव रूपी भवन में चलीं गयी अर्थात् समस्त तामसिक कोशिकाएँ सहज हो गयीं। पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।। चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबि तनुजा कइ करत बड़ाई।। व्याख्या : जब तामसिक कोशिकाएँ सहज हो जाती हैं तो ध्यान आगे के कोष में चढ़ने लग जाता है। उसी भाव अवस्था की अनुभूति को आत्मा रूपी राम, सुरता व लखन भाव द्वारा तामसिक भावों के प्रवाह वाली ईड़ा नाड़ी रूपी यमुना नदी को प्रणाम करना बताया गया है। जब तामसिक कोष सहज हो जाता है, तो ध्यान आगे के कोष में बढ़ जाता है। उसी को आत्मा व लखन भाव का सुरता सहित प्रसन्न होकर चलना बताया गया है। उस अवस्था में तामसिक कोष का मर्म समझ में आ जाता है, इसलिए उसी को यमुना नदी की महिमा का बखान करना बताया गया है। पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहि सप्रेम देखि दोउ भ्राता।। राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारे।। व्याख्या : जब ध्यान आगे को कोषों में बढ़ता है तो रास्ते में बहुत सारी सूक्ष्म-सूक्ष्म कोशिकाओं से पैदा होने वाले भाव आते हैं, जो आत्मा व लखन भावों को प्रेम से देखने लगते हैं अर्थात् वे सब भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं। वे भाव कहने लगते हैं कि आत्मा व लखन भावों के लक्षण तो राज भोग के हैं अर्थात् सहज सुख भोग के हैं परन्तु वैराग्य रूपी वन में जा रहे हैं। इसको देखकर उन भावों के हृदय में आश्चर्य होता है। मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।। अगमु पंथु गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।। व्याख्या : ये आत्मा रूपी राम व लखन भाव वैराग्य रूपी वन के लिए बिना ही वासना के चल रहे हैं। इसका मतलब है, हमारी ज्योतिष अर्थात् दृष्टि को शायद कुछ भ्रम हो रहा है। कोशिकाओं से पैदा होने वाले भावों को लगता है कि बिना किसी इच्छा के आत्म चेतना लखन भाव व सुरता सहित कैसे दृढ़ वैराग्य रूपी वन चले जा रहे हैं। जबकि दृढ़ वैराग्य रूपी वन का मार्ग बहुत अगम है और दृढ़ता व धैर्य रूपी बहुत से पर्वत व वन हैं और इनके साथ सुकोमल सुरता है। करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई।। जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरइ बहोरि तुम्हहि सि डिग्री नाई।। व्याख्या : धैर्य रूपी हाथी और भय रूपी सिंहों के वैराग्य रूपी वन की तरफ देखा तक नहीं जा पाता है। अगर आपकी आज्ञा हो तो हम आपके साथ चलें। ध्यान में रास्ते में कोशिकाओं से उत्पन्न भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा का संग करना चाहते हैं। उन भावों के लिए वैराग्य रूपी वन भयावह लगता है। इसलिए वे भाव कहते हैं कि जहाँ तक आप जायेंगे, वहाँ तक हम भी पहुँच जायेंगे और फिर आपकी आज्ञा लेकर वापस आ जायेंगे। यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि ये भाव स्थायी रूप से वैराग्य रूपी वन में नहीं रहना चाहते हैं। इसलिए वापस आने की बात करते हैं। दो0 एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपा सिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।। व्याख्या : इस प्रकार ध्यान के रास्ते में कोशिकाओं से उत्पन्न भाव आत्मोन्मुखी होकर प्रेमवश पुलकित होते हुए आत्मा रूपी राम से संग चलने की बात पूछते हैं। परन्तु आत्मा रूपी राम मधुर वाणी द्वारा विनय करके उन्हें वापस लौटा देते हैं। जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।। व्याख्या : जो गाँव व नगर रूपी कोशिकाएँ व कोष ध्यान के रास्ते में आते हैं, उन्हें नाग प्राण वायु व स्वरों से उत्पन्न ऊर्जा जागृत करके प्रशंसा करने लगते हैं। वे कोष व कोशिकाएँ सुकृत्य के भाव पैदा करने वाले हो जाते हैं। अत: वह अवस्था धन्य कर देती है और पुण्य छा जाता है। जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।। पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।। व्याख्या : जहाँ-जहाँ पर आत्म चेतना पहुँचती है, उन-उन कोषों के समान देव भाव पैदा करने वाले और कोई नहीं होते हैं। अर्थात् आत्मा की चेतना जिन-जिन कोषों व कोशिकाओं को स्पर्श करती है, वे सभी दैवीय भावों को पैदा करने वाले हो जाते हैं। इसलिए वे सभी कोष व कोशिकाओं के भाव पुण्यमय हो जाते हैं, जिन्हें सभी दैवीय वृतियाँ सराहने लगती हैं। जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।। जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।। व्याख्या : जो भाव आत्मा रूपी राम को देखते हैं अर्थात् आत्मोन्मुखी हो जाते हैं, उन्हें सुरता व लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम घनश्याम जैसे दीखते हैं अर्थात् आत्मा, सुरता व लखन भाव का आभास बादलों जैसे होता है, जिसका कोई स्थायी आकार नहीं होता है। जिस कोष और नाड़ी में आत्म चेतना प्रवेश करती है, वे सब दैवीय शक्ति से भर जाते हैं। उसी को देवों द्वारा कोष व नाड़ियों (तालाब व नदियों) की सराहना करना बताया गया है। जेहि त डिग्री तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपत डिग्री तासु बड़ाई।। परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।। व्याख्या : जिस भी वृक्ष के नीचे आत्मा रूपी राम बैठते हैं अर्थात् जिस भी कोष में आत्म चेतना पहुँचती है, वो कोष की कल्पना शक्ति असीम हो जाती है। जहाँ-जहाँ पर भी आत्मा रूपी राम के चरण कमलों की धूल पड़ती है अर्थात् आत्म चेतना पहुँचती है, वही कोशिकाएँ जागृत होकर सात्विक हो उठती हैं। उसे ही पृथ्वी का धन्य मानना बताया गया है। दो0 छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।। व्याख्या : ध्यान में आत्म चेतना जब ऊपर उठने लगती है तो ऐसा लगने लगता है जैसे बादल छाया कर रहे हों और फूलों की मानो बरसात हो रही हो। इस प्रकार आत्म चेतना विभिन्न नर-नाड़ियों रूपी पर्वत, गुफाओं व वन को देखते हुए ध्यान में समाने लगती है। उस समय अनेक इच्छाएँ भी दिखायी पड़ने लगती हैं। अर्थात् ध्यान में जिस कोष में आत्म चेतना प्रवेश करती है, उस कोष की वृति के अनुसार ही इच्छा रूपी मृग दिखाई देने लगते हैं। सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।। सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी।। व्याख्या : जब सुरता व लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम जिस भी गाँव रूपी कोष के पास पहुँचते हैं, तो सभी प्रकार के बाल, वृद्ध, कोष व कोशिकाओं के भाव अपनी वृतियों को छोड़कर आत्मोन्मुखी होने के लिए दौड़ पड़ते हैं। राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।। सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।। व्याख्या : तब सब भाव आत्मा रूपी राम, लखन भाव व सुरता को देखकर सहज हो जाते हैं। उस अवस्था में सभी भाव पुलकित हो उठते हैं और आत्म चेतना व लखन भाव में मग्न हो जाते हैं। बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।। एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में उन भावों की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उनको तो ऐसा लगता है जैसे भिखारियों को मानो मणियों का ढेर मिल गया हो। उस अवस्था में वे भाव आपस में एक दूसरे को शिक्षा देने लगते हैं कि इस क्षण में आत्म दर्शन से अपने नेत्रों को धन्य कर लो। ये भावों का वार्तालाप ध्यान में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।। एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।। व्याख्या : उस अवस्था में कुछ भाव आत्म दर्शन में चितवत लीन होकर साथ चलने लगते हैं और कुछ भाव आत्मा रूपी राम के चलते हुए की छवि को हृदय में लाकर तन, मन व वाणी से मौन हो जाते हैं। अर्थात कुछ भाव आत्मा का संग करना चाहते हैं तो कुछ भाव आत्मा के स्वरूप में लीन होकर शान्त हो जाते हैं। दो0 एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गँवाइअ छिनकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।। व्याख्या : जब ध्यान गहन होता चला जाता है तो प्रत्येक कोष की वृतियों के अनुसार रिद्धि-सिद्धियाँ भी प्रकट होने लगती हैं। इस दोहे में उन्हीं रिद्धि-सिद्धियों के बारे में बताया गया है। ये रिद्धि-सिद्धियों के सुख भोग के भाव साधक की साधना को बीच में ही रोकना चाहते हैं। इसलिए ऐश्वर्य व सुख रूपी बड़ के पेड़ की छाँह को देखकर ये आत्मा रूपी राम से अनुरोध करते हैं और कोमल सुख भोग रूपी चटाई बिछाकर आत्मा रूपी राम को आगे जाने से रोकना चाहते हैं। इसलिए कहते हैं कि आप थोड़ा विश्राम कर लीजिए, फिर चाहे अभी चले जाना या प्रात:काल चले जाना। अर्थात् ये भाव आत्मा रूपी राम से कहना चाहते हैं कि कुछ समय के लिए सहज सुखों का भोग कर लीजिए, फिर आगे के वैराग्य रूपी वन में चले जाइए। एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।। सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।। व्याख्या : उस अवस्था में कुछ भाव आसक्ति रूपी जल भरकर लाकर के आत्मा को ग्रहण करने का अनुरोध करने लगते हैं। उसी को भावों की मधुर वाणी द्वारा आत्मा रूपी राम को जल का आचमन कराना बोलकर लिखा गया है। परन्तु आत्मा चेतन रहने पर इन भावों के विशेष प्रेम को देखकर शीलता के साथ आसक्ति से बच जाता है। जानी श्रमति सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।। मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।। व्याख्या : ध्यान में यह बात समझ में आती है कि सुरता का भाव दृढ़ वैराग्य के पथ पर चलते हुए प्रारम्भ में थक जाता है। इसलिए ध्यान के रास्ते में आने वाले सुख भोगों के प्रति सूक्ष्म आकर्षण रह जाता है। सुरता की उस अवस्था को आत्मा रूपी राम जान लेते हैं, इसलिए सुख भोग रूपी वट वृक्ष के नीचे थोड़ा सुस्ता लेते हैं। जो साधक दृढ़ नहीं होते हैं, वे साधना पथ में आने पर इन सुख भोगों में भटक जाते हैं। ध्यान की इस अवस्था में कोष के नर-नाड़ी प्रसन्न होकर इस सुख अवस्था का अनुभव करते हैं और उस अनुपम अवस्था में नयन व मन लुभा जाते हैं। एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचन्द्र मुख चंद चकोरा।। तरून तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में सभी भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं। उसी को आत्मा रूपी राम के चन्द्रमा के समान मुख को भाव रूपी चकोरों द्वारा एकटक होकर देखना बताया गया है। उस समय आत्मा का स्वरूप नव उदित तमाल के समान दिखायी देता है, जिसे देखने पर अर्थात् जिसमें लीन होने पर करोड़ों प्रकार की कामवासना भी शान्त हो जाती है। दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।। मुनि पट कटिन्ह कसें तुनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा।। व्याख्या : लखन भाव बिजली की तरह सुन्दर दिखते हैं, जो नख से शिख तक समस्त भावों को लखने की क्षमता से युक्त होते हैं। वे दोनों भाई (आत्मा व लखन भाव) मन को एकाग्रह करके संयम रूपी तरकश कमर में बाँधे हुए हैं और दम व नियम रूपी धनुष बाण हाथों में शोभा पा रहे हैं। दो0 जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।। व्याख्या : इस दोहे में ध्यान की अवस्था में आत्मा व लखन भाव कैसे लगते हैं, उसी शोभा का वर्णन किया गया है। उस समय आत्मा व लखन भाव उर्ध्ववृति धारी होने के कारण जटाओं का धारण करना बताया गया है तथा उस अवस्था में दिव्य दृष्टि आ जाती है, इसलिए विशाल नयनों वाला बताया गया है। उस समय भावों में सद्वृति आ जाती है, जिससे सुभग यानी शुभ प्रकृति वाला बताया गया है। वह अवस्था साधक की वासनाओं को जीतने वाली होती है इसलिए विशाल वक्ष स्थल व बड़ी-बड़ी भुजाओं की उपमा दी गयी है। उस अवस्था में साधक के मुख पर शान्ति छा जाती है इसलिए मुख की उपमा चन्द्रमा के समान शीतलता से दी गयी है। मुख पर कुछ-कुछ पसीने की बूँदें सूक्ष्म बची हुई भोग व यश की इच्छाओं का प्रतीक होती है। इस प्रकार ध्यान में साधक की आत्मा लखन भाव सहित दिव्य शोभायमान हो जाती है। बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।। राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण की मन को हरण करने वाली जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि आत्मा व लखन भाव की सुन्दरता तो बहुत है परन्तु मेरी बुद्धि की सीमा है। उस अवस्था में आत्मा, सुरता व लखन भाव की सुन्दरता को सभी भाव चितवत अर्थात् लीन होकर मन-बुद्धि को एक करके देखने लगते हैं। थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिया से।। सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में नर-नाड़ियाँ भी प्रेम के भाव पैदा हो जाने से शिथिल हो जाती हैं, जैसे इच्छा रूपी हिरण व हिरनी ज्ञान रूपी दीपक को देखकर स्तब्ध हो जाते हैं। तब सुरता रूपी सीता के पास कोषों से उत्पन्न नाड़ियाँ रूपी स्त्रियाँ जाती हैं और प्रेम के कारण पूछने में संकोच करने लगती हैं। अर्थात् सुरता को ध्यान में सूक्ष्म-सूक्ष्म नाड़ियाँ प्रभावित करना चाहती हैं परन्तु आत्मोन्मुखी अवस्था के कारण कर नहीं पाती हैं। यही गाँव की नारियों का संकोच है। बार-बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।। राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।। व्याख्या : बार-बार सब सुरता रूपी सीता के सामने समर्पण करती हैं और सहजता के साथ मधुर वाणी में कहती हैं कि हे राजकुमारी अर्थात् राजयोग को सिद्ध कराने वाली सुरता। हम त्रिगुणात्मक वृति वाली होने के कारण आपसे कुछ पूछने में डरती हैं। स्वामिनी अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गँवारी।। राजकुँअर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।। व्याख्या : हे भावों की स्वामिनि! तुम हमारी ढ़ीठता को क्षमा करना और हमें विषयी जानकर आपसे अलग मत करना। ये जो सहज में ही सुन्दर दो राजकुमार हैं, जिनसे माया के भाव भी चमक लेते हैं अर्थात आत्मा की चेतना व लखन भाव से ही माया के भाव भी पैदा होते हैं। दो0 स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरूह नैन।।116।। व्याख्या : ये जो श्यामल व गौर वर्ण के तथा सुन्दरता के घर हैं तथा शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान परमशीतल हैं और जिनके नयन कमल के समान हैं। अर्थात् जो आत्मा रूपी राम व लखन भाव सुंदरता की सीमा हैं तथा परम सहज व वासनाओं से मुक्त हैं तथा जिनकी दृष्टि कमल के समान निर्मल है। ।। मास पारायण, सोलहवाँ विश्राम।। ।। नवाह्न पारायण, चौथा विश्राम।। कोटि मनोज लजावन निहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।। सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।। व्याख्या : हे सुमुखि! ये करोड़ों प्रकार की कामनाओं को शान्त करने वाले तुम्हारे कौन है? तब प्रेम मय मधुर वाणी सुनकर सुरता रूपी सीता संकोच करके मुस्कुराने लगी। तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी।। सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता ग्राम की नाड़ियों रूपी नारियों को देखकर देह रूपी पृथ्वी को देखने लगी। सुरता रूपी सीता को दोनों तरफ से संकोच हो रहा था। तब संकोच करती हुई बाल मृगी के समान नेत्रों वाली व कोयल के समान मधुर बोलने वाली सुरता रूपी सीता बोली। सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।। व्याख्या : जो सहज स्वभाव व सुभग अर्थात् अच्छी प्रकृति के भाव वाले हैं तथा जिनका शरीर गोरा है, उनका नाम लखन अर्थात् लक्षणों को लखने वाला लक्ष्मण मेरे देवर हैं। फिर सुरता रूपी सीता ने अपने चन्द्रमुख को आँचल से ढँककर और आत्मा रूपी पति की तरफ देखकर भौंहे टेढ़ी करके। खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।। भईं मुदित सब ग्राम बधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।। व्याख्या : खंजन पक्षी के से सुन्दर नयनों को तिरछे करते हुए इशारों से कहा कि ये मेरे आत्मा रूपी पति हैं। तब ये सुनकर गाँव रूपी कोष की नाड़ियाँ प्रसन्न हो गयी। जैसे मानो रंकों ने धन की राशियाँ लूट ली हों। दो0 अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।। व्याख्या : तब गाँव रूपी कोष की कोशिकाओं रूपी नारियाँ (नाड़ियाँ) प्रेम में अधीर होकर सुरता रूपी सीता के सामने समर्पण कर दिया और सुरता सदैव परमात्मा में लगी रहे ऐसी कामनाएँ करने लगी। उसी को जब तक पृथ्वी को शेष नाग धारण करता रहे, तब तक सुहागिन रहने की कामना करना बताया गया है। पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।। पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।। व्याख्या : इन चौपाइयों में ""पारबती सम प्रतिप्रिय होहू"" का बहुत गूढ़ रहस्य छुपा हुआ है। पारबती का तात्पर्य पार वती अर्थात् प्रकृति से परे रहने की वृति से है क्योंकि प्रकृति से परे रहने पर सुरता निरन्तर परमात्मा में ही लगी रहती है। प्रकृति का प्रभाव होने पर ही सुरता सांसारिक भावों में लगती है। इसलिए आत्मोन्मुखी हुई ग्राम रूपी कोष की नारियाँ (नाड़ियाँ) प्रकृति से परे रहने की कामना करती हैं। ग्राम की नारियाँ (नाड़ियाँ) कहती हैं कि हे सुरता रूपी देवी। हम पर कृपा बनाए रखना और बार-बार प्रार्थना करती हैं कि लौटते हुए इसी मार्ग से आना। दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।। मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनी कौमुदी पोषीं।। व्याख्या : हे सुरता रूपी देवी! आप हमें दर्शन देती रहना। ग्राम रूपी कोष की नारियों (नाड़ियों) को प्रेम की प्यासी जानकर सुरता रूपी सीता ने उन्हें संतोष करादिया जैसे चाँदनी ने कुमुदिनियों को खिलाकर पुष्ट कर दिया हो। अर्थात् जिन कोषों पर सुरता व आत्म चेतना का प्रभाव हुआ, उन कोषों की कुमुदिनि रूपी कोशिकाएँ खिलकर पुष्ट हो गयी। तबहिं लखन रघुबर रूख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।। सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।। व्याख्या : तब लखन रूपी लक्ष्मण ने आत्मा रूपी राम की चेतना के रूख को जान लिया और आगे के कोषों में जाने के लिए राह पूछने लगे अर्थात् आत्म चेतना अब ध्यान में आगे के कोषों में जाने लगी। यह बात सुनकर नर-नारियाँ (नाड़ियाँ) व्याकुल हो उठे अर्थात् नर-नाड़ियों की धड़कन की गति बदल गयी, जिससे पुलकावली छा गयी और आँखों से पानी निकलने लगा अर्थात् धड़कन से विशेष रसायन निकलने लगा। मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।। समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।। व्याख्या : जब आत्म चेतना कोषों को छोड़कर आगे बढ़ने लगे तो कोषों की कोशिकाओं की दिव्य ऊर्जा मन्द पड़ने लग गयी। उसी को नर-नाड़ियों के मोद का मिटना कहा गया है। परन्तु कर्म की गति को समझकर अर्थात् ध्यान में अपान का पान में हवन की क्रिया को जानकर धैर्य धारण किया और ध्यान का सुगम रास्ता बता दिया अर्थात् भावो को अनुकूल कर दिया। भावों का अनुकूल होना ही सुगम रास्ता बताना कहा गया है। दो0 लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण के साथ आगे के कोषों में ध्यान के लिए प्रस्थान किया और इन कोषों के भावों को मधुर वचन बोलकर उन्हें मन से आत्मोन्मुखी बनाकर शान्त करके चले। फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहिं दोषु देहिं मन माहीं।। सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सबह अहहीं।। व्याख्या : लौटते हुए नर-नाड़ियाँ बहुत पश्चाताप करने लगते हैं और मन ही मन में दोष लगाने लगते हैं। पश्चाताप करने का कारण यह है कि जब तामसिक कोषों के भाव भी आत्म चेतना से सात्विक ऊर्जा से भर गए फिर भी आत्मा में लीन नहीं हो पाए। इसलिए स्वयं के मन में दोष देते हुए पश्चाताप करने लगते हैं। सब आपस में विषादपूर्वक कहने लगते हैं कि ध्यान की इस क्रिया के प्रभाव सब उल्टे हैं अर्थात् ध्यान में प्रारम्भ में निरसता लगती है परन्तु बाद में तो अनुराग व प्रेम का रस बरसने लगता है। निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरूज सकलंकू।। रूख कलपत डिग्री साग डिग्री खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।। व्याख्या : इन चौपाइयों में दृढ़ वैराग्य रूपी वन में आने का कारण बताया गया है कि आत्मा रूपी राम, सुरता व लखन भाव परमात्मा को प्राप्त करने के लिए दृढ़ वैराग्य रूपी वन में आए हैं। परमात्मा जो कि निपट अर्थात् वासना से रहित, निरंकुश अर्थात् जो परम स्वतंत्र, निठुर अर्थात् कठोरता से रहित (नि अ ठुर) व शंकाओं से रहित है। जिस पर शक्ति की ऊर्जा से ही परमशान्त मन अर्थात चन्द्रमा के समान शीतल मन भी वासना रूपी कलंक से जल उठता है। जिस परमशक्ति के बल पर ही कल्पनाओं का अम्बार लग जाता है और वासना रूपी जल से भाव रूपी समुद्र खारा हो जाता है। उन्हीं परमात्मा की प्रेरणा से आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण दृढ़ वैराग्य रूपी वन में आए हैं। जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।। ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।। व्याख्या : अगर आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता और लखन भाव दृढ़ वैराग्य रूपी वन में विचरण करेंगे तो भोग व विलासों का क्या प्रयोजन है? अगर ये दृढ़ वैराग्य रूपी वन के रास्ते में दृढ़ संयम के साथ चलेंगे तो वैराग्य की बाकी क्रियाएँ व्यर्थ हैं। अर्थात् दृढ़ संयम के साथ वैराग्य के पथ पर चला जा सकता है। ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।। तरूबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।। व्याख्या : अगर ये वैराग्य रूपी भूमि पर अनासक्ति रूपी कुश-पत्ता डालकर सोयेंगे तो सुख भोग के साधनों की सृजना की कोई आवश्यकता ही नहीं होगी। अगर ध्यान की क्रिया द्वारा इन्हें संतोष रूपी वृक्ष के नीचे वास करना है तो सुख भोग रूपी आशाओं की कल्पना करने का परिश्रम करना ही व्यर्थ होगा। दो0 जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार।।119।। व्याख्या : अगर इन सुंदर व सहज राजकुमारों (आत्मा व लखन भाव) ने मन रूपी वस्त्र को वश में करके धारण किया हुआ है तो नाना प्रकार की वासनाओं रूपी आभूषण व्यर्थ होते हैं। जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।। एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।। व्याख्या : अगर ये (आत्मा रूपी राम, सुरता व लखन) वासनाओं के मूल को ही खायेंगे अर्थात् वासना को जड़ से नही नष्ट कर देंगे तो अमृतमयी भोगों की कल्पना ही व्यर्थ होगी। कुछ भाव रूपी नर-नारी कहते हैं कि ये सहज होने के कारण इस परम वैराग्य रूपी वन में आए हैं। किसी भी प्रकार की क्रिया के परिणामस्वरूप नहीं आए हैं। अर्थात् आत्मा, सुरता व लखन भाव निर्मल होने पर ही सहज होकर वैराग्य रूपी वन में पहुँचते हैं। जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।। देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ अस नारी।। व्याख्या : जहाँ तक ध्यान के अनुभवों के वर्णन की बात है, वो तो उतना ही सम्भव है जितना कान, आँख, मन व इन्द्रियाँ समझ पाते है। पूरे शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के चौदह भुवन अर्थात् भावों के चौदह कोषों को (दस इन्द्रियाँ अ मन अ बुद्धि अ चित अ अहंकार उ 14) खोज करके देख लो आत्मा के समान पुरुष और सुरता के समान नारी नहीं होती है। इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।। कीन्ह बहुत श्रम एक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।। व्याख्या : आत्मा व सुरता को देखकर ही ध्यान में क्रिया के द्वारा मन में अनुराग पैदा हो जाता है, जिससे परमात्मा से आत्मा का मिलने का योग बनने लग जाता है। उसी परमात्मा के अनुराग के कारण ये आत्मा व सुरता लखन भाव सहित वैराग्य रूपी वन में आए हैं। बहुत परिश्रम करने पर भी जब परमात्मा से एक्य नहीं हो पाया तो सुख भोगों से अनासक्त होकर वैराग्य रूपी वन में आत्मा व सुरता आए हैं। एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।। ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।। व्याख्या : कुछ भाव कहते हैं कि हम तो बहुत नहीं जानते हैं परन्तु आत्म चेतना की ऊर्जा के सम्पर्क में आने से हम धन्य हो गए हैं। क्योंकि आत्म चेतना की ऊर्जा के कारण भावों में सात्विक जागृति आ गयी है। इस अवस्था को तो वही साधक समझ सकता है जिसने अनुभव करके ध्यान में इसको देखा है। दो0 एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।। व्याख्या : इस प्रकार कोषों व कोशिकाओं से उत्पन्न भाव आँखों में जल भर-भर कर कहते हैं कि आत्मा, सुरता व लखन भाव कैसे दृढ़ वैराग्य रूपी वन के दुर्गम रास्ते पर चलेंगे? नारी सनेह बिकल बस होहीं। चकईं साँझ समय जनु सोहीं।। मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।। व्याख्या : उस अवस्था में नाड़ी की धड़कन, प्रेम के भाव पैदा हो जाने से व्याकुल हो उठती है, जैसे संध्या के समय चकवी व्याकुल हो जाती है। वैराग्य रूपी वन के कठोर रास्ते को देखकर नाड़ी की धड़कन हृदय को गहराई से झकझोरने लगी और कहने लगी। परसत मृदुल चरन अरूनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।। जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।। व्याख्या : आत्मा, सुरता व लखन भाव के चरण छूने में ही कोमल होते हैं अर्थात् इनकी वृति ही निर्मल होती है, इसलिए वैराग्य रूपी भूमि वैसे ही संकोच करने लगती है जैसे प्रेम में विह्वल होने पर नाड़ी की धड़कन से हृदय संकुचित होने लगता है। अगर परमात्मा ने इन्हें वैराग्य रूपी वन की तरफ आकर्षित किया है तो क्यों नहीं वैराग्य के लिए सुगम मार्ग तैयार किया? जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।। जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखने पाए।। व्याख्या : अगर ध्यान की इस विधि से मनोकामना पूर्ण होती है तो हमारी (कोष-कोशिकाओं से उत्पन्न भाव की) कामना यह है कि ये सदैव हमारी आँखों में बसे रहें अर्थात् हम सदैव आत्मोन्मुखी बने रहें। जो नर-नाड़ीं आत्म चेतना की ऊर्जा के सम्पर्क में नहीं आ पाए, वे आत्मा व सुरता को अनुभव नहीं कर पाते हैं। सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।। समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनम फलु पाई।। व्याख्या : ध्यान में जब कुछ कोष व कोशिकाएँ आत्म चेतना की ऊर्जा से भर जाते हैं तो उन कोष-कोशिकाओं से उत्पन्न भावों के सम्पर्क में आने पर अन्य कोष भी आत्मोन्मुखी होने को उतावले हो उठते हैं। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है कि आत्मा व सुरता के बारे में सुनकर व जानकर भाव पूछने लगते हैं कि अब तक कहाँ तक गए होंगे? ऐसी अवस्था में जो भाव अच्छी तरह से जागृत हो जाते हैं, वे आत्मोन्मुखी होकर आत्म दर्शन के लिए लालायित होकर दौड़ पड़ते हैं। उसी को समर्थ भावों का आत्मा रूपी राम के दर्शनों के लिए दौड़ना व प्रसन्न होकर वापस आना बताया गया है। दो0 अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं। होहिं प्रेम बस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में कुछ निर्बल भाव जो वासनाओं की आसक्ति में फँसे होते हैं, पश्चाताप करने लगते हैं। इस प्रकार आत्म चेतना जिन जिन कोषों व कोशिकाओं में जाती है, वहाँ के सभी भाव प्रेम के वश में होकर आत्मोन्मुखी हो उठते हैं। गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।। जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।। व्याख्या : आत्म चेतना जिस जिस गाँव रूपी कोष में पहुँचने लगती है, उन सब कोषों में आनन्द छा जाता है। जब आत्म-सूर्य वासनाओं के आवरण से मुक्त हो जाता है, तो चन्द्रमा की सी शीतलता का आभास होने लगता है। उसे ही भानुकुल अर्थात् आत्मसूर्य कैरव अर्थात् वासना और चंदू अर्थात् शीतलता देने वाला कहा गया है। कहहिं एक अति भलनर नाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।। कहहिं परसपर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।। व्याख्या : कुछ भाव रूपी नर-नारी कहने लगे कि चित रूपी राजा ने अच्छा किया है जो हमलोगों को आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण के दर्शन हो गए। ऐसी वार्तालाप ध्यान की अवस्था में भाव आपस में करने लगते हैं। यह भावों की अवस्था बहुत सरल व प्रेम से भरी होती है। ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नग डिग्री जहाँ तें आए।। धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।। व्याख्या : भाव आपस में कहने लगे कि वे नर-नारी (चित व चितवृति की नाड़ियाँ) धन्य हैं, जिनसे ये आत्मा, सुरता व लखन भाव पैदा हुए हैं और वह चित प्रदेश रूपी नगर भी धन्य है, जहाँ से ये आए हैं। वे शरीर रूपी नगर की कोशिकाएँ और कोष धन्य हैं, जिनसे होकर ये गुजरे हैं। वे सभी अंग धन्य हैं जहाँ से आत्म चेतना की ऊर्जा गुजरी है। सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।। राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।। व्याख्या : ब्रह्मा ने भी रचकर जिसे सुख पाया है और जो सब प्रकार से सबके प्रिय हैं अर्थात् आत्म तत्व सभी भावों का प्रिय होता है। इस प्रकार ध्यान की अवस्था में आत्मा व लखन भावों का वर्णन समस्त वैराग्य रूपी वन के रास्ते में फैल गया। दो0 एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।। व्याख्या : इस प्रकार ध्यान की अवस्था में आत्म चेतना, सुरता व लखन भाव समस्त कोष व कोशिकाओं से उत्पन्न भावों को सुख देते हुए दृढ़ वैराग्य रूपी वन के लिए चले। अर्थात् आत्म चेतना ध्यान में दृढ़ वैराग्य में प्रवेश करने लग गयी। आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।। उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें।। व्याख्या : ध्यान में आत्म चेतना आगे-आगे चलती है और लक्षणों को लखने का लखन भाव आत्मा का अनुसरण करते-करते पीछे चलता है तथा बीच में सुरता चलती है। उस अवस्था में इन पर वैराग्य की वृति रूपी भेष बहुत शोभा देता है और ऐसा आभास होता है, जैसे आत्मा ब्रह्म है और लखन भाव जीव है तथा सुरता भावों को पैदा करने वाली माया है। बहुरि कहुँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।। उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।। व्याख्या : मैं यहाँ पर आत्मा, सुरता व लखन भाव की छवि का वर्र्णन वैसे ही कर रहा हूँ जैसी मेरे मन में समझ आ रही है। इनकी अवस्था तो वैसी ही लगती है जैसे काम की मधुरता में रति अर्थात् रमण की वृति शोभा पाती है। इनकी उपमा बार-बार मन में चिन्तन करने पर ऐसी लगती है जैसे चन्द्रमा और बुध के बीच में रोहणी नक्षत्र शोभा पाता है। प्रभु पद देख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।। सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के चरणों के बीच में सुरता रूपी सीता भयभीत होती हुई सी पैर रखती हैं। यहाँ पर साधना की अनुभूति का बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है क्योंकि जब आत्म चेतना उर्ध्वगामी होकर ध्यान में वैराग्य रूपी वन में प्रवेश करती है तो सुरता में कम्पन सा होने लगता है। उसी कम्पन की अवस्था को ""चलति सभीता"" बोला गया है। उस अवस्था में लखन भाव भी आत्म चेतना व सुरता का अनुसरण करते हुए भावों को अनुकूल करता हुआ चलने लगता है। राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।। खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा, सुरता व लखन भाव की जो आपसी प्रीत होती है, उसका वर्णन इसलिए नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह इन्द्रियों से परे की अनुभूति का विषय है। वैराग्य रूपी वन के रास्ते में आत्मा, सुरता व लखन भाव को देखकर इच्छा रूपी मृग व भोग रूपी पक्षी सब आत्मोन्मुखी हो उठते हैं। दो0 जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।। व्याख्या : जिन-जिन भावों ने सुरता सहित आत्मा व लखन भाव रूपी भाईयों को देखा तो भाव रूपी अगम्य रास्ते के आनन्द को बिना थके ही सराहने लगे। अर्थात् जब आत्म चेतना वैराग्य रूपी वन में प्रवेश करती है तो रास्ते में आने वाले भावों के आनन्द की सभी भाव बिना थके सराहना करने लगते हैं। अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।। राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।। व्याख्या : साधक अपने ध्यान की अनुभूति का वर्णन करते हुए कहना चाहता है कि आज भी सपने में भी आत्म चेतना, सुरता व लखन भाव के साथ वैराग्य रूपी वन के रास्ते में चल लेते हैं, तो राम के धाम की प्राप्ति हो जाती है। जिस अवस्था को मुनि लोग कठिन साधना करके कभी-कभी प्राप्त करते हैं। तब रघुबीर श्रमति सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।। तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता को थका हुआ जाना तो धैर्य रूपी वट वृक्ष के निकट संतोष रूपी शीतल जल जानकर रूक गए और वहाँ पर सहज विश्राम रूपी फल खाए अर्थात् जब सुरता ध्यान में थकने लगती है अर्थात् विरक्त सी होने लगती है तो आत्म चेतना धैर्य बँधाने का प्रयास करती है और उससे परम संतोष का भाव पैदा होकर सुरता की विरक्ति को दूर करने लगता है। उसी को कंद मूल फल खाकर प्रात: स्नान करना बताया गया है। स्नान का तात्पर्य है ध्यान में पुन: नव स्फूर्ति का आभास करना। देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।। राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।। व्याख्या : तब आत्म चेतना ध्यान मेंे कोष-कोशिकाओं व नाड़ियों से होकर बाल्मिकी कोष (अर्थात् ऐसा कोष जहाँ पर चेतना पहुँच जाने पर साधक बाल स्वभाव को प्राप्त कर लेता है) में प्रवेश किए। तब आत्म चेतना ने बाल्मिकी ऋषि के सुन्दर आश्रम व रहने की व्यवस्था को देखा जहाँ पर वासना व वासनाओं की इच्छा रूपी पर्वत, वन व जल पवित्र था अर्थात् जिस कोष में परम सहज बाल्य अवस्था के भाव थे। सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।। व्याख्या : सहजता रूपी कमलों से वन खिला हुआ था और सद्गुण रूपी भ्रमर आनन्द रूपी रस पान करते हुए स्वयं को भूले हुए थे। उस बाल कोष में नाना प्रकार की बाल क्रीड़ा रूपी पक्षी व हिरण आवाज कर रहे थे और सभी भाव निर्द्वन्द्व होकर सहज प्रसन्न थे। दो0 सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।। व्याख्या : बाल कोष रूपी बाल्मिकी मुनि के सहज परम सौम्य आश्रम को देखकर आत्मा रूपी राम बहुत हर्षित हुए। यहाँ पर राम को कमल नयन कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि जब दृष्टि निर्मल होकर दिव्य हो जाती है, तो उसे कमलनयन के प्रतीक से समझाया गया है। जब आत्म चेतना बालकोष में पहुँचती है तो बालकोष के भावों में आनन्द का संचार हो उठता है और परमात्मा से एकता की अवस्था का आभास सा होने लगता है। उसी को बाल्मिकी का आत्मा रूपी राम को लाने के लिए आगे आना कहा गया है। मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।। व्याख्या : बाल स्वभाव रूपी बाल्मिकी भाव को देखकर आत्म चेतना रूपी राम ने दण्डवत प्रणाम किया अर्थात् बालकोष में पूरी तरह समर्पण कर दिया। तब विशुद्ध प्रकाश स्वरूप बाल भाव रूपी बाल्मिकी ने आशीर्वाद दिया अर्थात् प्रेरणा करी। तब आत्मा रूपी राम की सोभा को देखकर बालभाव रूपी बाल्मिकी के नेत्र स्थिर हो गए तथा सम्मान देते हुए आश्रम में लाए अर्थात् बाल कोष में समान महत्व देकर लाए। मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।। सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।। व्याख्या : बाल भाव रूपी बाल्मिकी मुनि ने प्राणों के समान प्रिय अतिथियों को पाकर मधुर कंद-मूल फल मँगवाए अर्थात् सुखद सहज सुख भोग की इच्छा पैदा की और सुरता, लखन व आत्मारूपी राम भावों ने सहजता रूपी फल खाए और बाल भाव रूपी मुनि ने बाल कोष में विश्राम करने का सुन्दर व सहज स्थान बता दिया। बालमीकि मन आनंदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।। तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में बाल भाव रूपी मुनि के मन में मंगल की मूर्ति सहज आत्मा को देखकर बहुत आनन्द छा रहा था। तब आत्मा रूपी राम ने कमल रूपी हाथों को जोड़कर कानों को सुखद लगने वाले वचन कहे। तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।। अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।। व्याख्या : हे मन के स्वामी! तुम तीनों कालों को जानने वाले हो और यह समस्त विश्व आपकी हथेली पर रखे हुए बैर के समान है। ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम ने समस्त बात बतायी, जिस प्रकार रजोवृति रूपी रानी ने वैराग्य रूपी वन प्रदान किया। दो0 तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।। व्याख्या : यहाँ पर वैराग्य रूपी वन में आने का कारण बताते हुए आत्मा रूपी राम कहते हैं कि चित रूपी पिता की प्रेरणा और रजोवृति रूपी माता का हित व भावरत रूपी भाई का भावों का राजा होना और मुझे मुनियों के दिव्य दर्शन होना, ये सब मेरे पुण्यों का प्रभाव है। देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।। अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।। व्याख्या : हे बालभाव रूपी मुनि! आपको देखकर हमारे समस्त कृत्य सफल हो गए हैं अर्थात् आत्म चेतना दिव्य भावना से भर गयी। अब जहाँ पर आपकी आज्ञा हो और कोई मन का भाव दु:खी नहीं हो। मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।। मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।। व्याख्या : क्योंकि जिन भावों से मन के सात्विक भाव दु:खी होते हैं, उस अवस्था में नर की धड़कन अग्नि की तरह जलने लगती है। इसलिए विशुद्ध प्रकाश वाले भावों को संतुष्टि प्रदान करना ही मंगल का मूल होता है, वरना स्वरों से पैदा होने वाले भावों में विकार आने पर नाना प्रकार से जीव को कष्ट होने लग जाते हैं। अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।। तहँ रचि रूचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला।। व्याख्या : इसलिए ऐसा विचार कर जिससे भावों को उद्वेग नहीं हो कोई ऐसा स्थान बताइये जहाँ पर सुरता व लखन भाव सहित जाकर प्राण को स्थिर करके रूचि के अनुसार रह सकें। यहाँ लक्ष्मण के लिए सौमित्रि शब्द को प्रतीक के लिए लिखा गया है क्योंकि जब ध्यान गहन होकर बाल कोष में प्रवेश कर जाता है तो लखन भाव बाल भावों के प्रति मैत्रीपूर्ण हो उठता है, इसलिए सौमित्रि शब्द का प्रयोग किया गया है। सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।। कस न कहहु अस रघुकुल केतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की सरल व सहज वाणी को सुनकर बाल भाव रूपी बाल्मिकी मुनि साधु - साधु बोले। क्यों नहीं निर्मल आत्मा रूपी राम ऐसा नहीं कहेंगे, क्योंकि निर्मल आत्मा ही तो समस्त अनुभूतियों का आधार होती है। छ0 श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की।। जो सहससीसु अहीसु महिध डिग्री लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! तुम सुरता (श्रुति) की रक्षा करने वाले हो तथा जगत का मूल हो इसलिए जगदीश हो तथा प्राण की शक्ति (जानकी) से माया के भाव पैदा होते हैं। प्राण की शक्ति से उत्पन्न भावों से ही जगत का उद्भव, पालन व संहार होता है तथा वह शक्ति आपका (आत्मा) रूख देखकर ही ऐसा करती है। जिस शक्ति के बल पर ही लखन भाव हजारों माया के भावों के लक्षणों को लख पाता है। अत: आज ध्यान में स्वरों के माध्यम से नर की धड़कन बनकर ही आप इन समस्त माया के भावों का दमन करने के लिए चले हो। सो0 राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबगित अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।।126।। व्याख्या : हे आत्मारूपी राम! तुम्हारे वचन राम (परमात्मा) के समान बुद्धि व इन्द्रियों से परे हैं, जिन्हें वेदों ने अविगत्, अकथनीय, अपार व ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं बोला है। ध्यान की इस परम अवस्था में साधक को निज स्वरूप अनुभव में आने लग जाता है। उसी अनुभूति को आगे की चौपाइयों में लिखा गया है। उस अवस्था में आत्मा ही परमात्मा के समान लगने लगती है। जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।। तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औ डिग्री तुम्हहि को जाननिहारा।। व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में साधक को समझ में आ जाता है कि यह जगत दृश्य है और आत्मा इस जगत का दृष्टा है। यह आत्मा ही ब्रह्मा, विष्णु व महेश को नचानेवाली है। अर्थात् आत्मा ही जगत का सृजन, पालन व संहार करती है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी तुम्हारे रहस्य को नहीं जान पाते हैं अर्थात् जीवात्मा स्वयं ही सब कुछ करता है, इस मर्म को स्वयं जीवात्मा नहीं जान पाती है। सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।। व्याख्या : तुमको तो वही जान पाता है, जिसे तुम जनाते हो क्योंकि तुम्हें जानते ही तो जानने वाला भी तुम्हारे समान ही हो जाता है। यहाँ पर वास्तव में आत्मा जब परमात्मा के रूप में आभासित होने लगती है, तो उस अवस्था का बहुत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। उस अवस्था में आत्मा-परमात्मा एक होकर आपस में बातें करने लगते हैं जो ऊपरी तौर पर तो एक ही लगते हैं परन्तु वास्तविकता में दो बातें करते हैं। उसी को कुछ संतों ने ""एक डाल पर दो पक्षी बैटे एक गुरु एक चेला"" बोलकर समझाने का प्रयास किया है। उस समय आत्मा बाल भाव में आकर कहती है कि हे परमात्मा! तुम्हारी कृपा से जीवात्मा को आनन्द की प्राप्ति होती है और भक्त लोग आपको हृदय में जान पाते हैं। चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।। व्याख्या : तुम्हारा स्वरूप तो चितानन्दमय है और जो विकारों से रहित होता है, वही तुमको जानने का पात्र होता है। तुम शरीर को नर के बल पर धारण करते हुए स्वरों का संचालन करने वाले हो और जीवात्मा के संशयों को मिटाने वाले हो। इसलिए जैसी जीवात्मा की प्रकृति होती है आप वैसा ही कहते और करते हो। राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।। व्याख्या : हे परमात्मा! आपके चरित्रों को देखने व सुनने से मूर्ख लोग तो भ्रमित हो जाते हैं और समझदार लोग सुखी होते हैं। इसलिए तुम जैसा कहते हो वैसा करते हो क्योंकि जैसा भेष धारण किया हो वैसा ही नाचना चाहिए। अर्थात् जैसे भाव पैदा होते हैं वैसे ही कर्म घटित हो जाते हैं। दो0 पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! तुम मुझसे (बाल भाव) पूछ रहे हो कि कहाँ रहूँ परन्तु मैं तो आपसे पूछने में संकोच कर रहा हूँ कि ऐसी कौन सी जगह है जहाँ पर आप नहीं (परमात्मा) रहते हो। जहाँ आप नहीं रहते हैं कोई जगह नहीं है अर्थात् परमात्मा सर्व व्यापक है, फिर रहने की कौनसी जगह बताऊँ? सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम महुँ मुसुकाने।। बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।। व्याख्या : बाल भाव रूपी बाल्मिकी मुनि के प्रेम से सने हुए वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम संकोच करके मुस्कुराने लग गए। अर्थात् जब आत्मा को निज स्वरूप का आभास होने लगता है तो स्वयं को स्वयं पर ही हँसी आने लगती है। उसी अनुभूति को संकोच करना व मुस्कुराना बोल कर लिखा गया है। तब बाल भाव रूपी बाल्मिकी मुनि हँस कर अमृत रस में भीगे हुए वचन बोला। अर्थात् उस अवस्था में साधक को आत्मा का स्वरूप समझ में आ जाता है और आत्मा की निर्मलता का प्रभाव भी समझ में आ जाता है। अत: यहाँ आगे की चौपाइयों में आत्म स्वरूप के अनुभव को ही प्रतीकों के माध्यम से लिखा है। सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।। जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! अब आप सुनिए जहाँ पर आप सुरता व लखन भाव सहित रह सकते हैं। अर्थात् यहाँ ये बताया गया है कि कैसे आत्म स्वरूप का साधक को परिचय होता है। उसी पात्रता को बताते हुए कहा गया है कि जिनके कान परमात्मा के गुणों को सुनने के लिए समुद्र के समान गम्भीर होते हैं और आपकी कथा अच्छे गुणों वाली नदियों के समान होती हैं। भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।। व्याख्या : जिन साधकों या भक्तों के कान आपकी कथा रूपी नदियों से कभी भरते नहीं, उनके हृदय आपके रहने का सुन्दर घर हैं। अर्थात् ऐसे लोग आत्मा के स्वरूप को जान पाते हैं, जो लोग अपनी आँखों को चातक पक्षी की तरह बना कर, आपके दर्शन रूपी मेघ के लिए सदा लालायित रहते हैं। निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।। व्याख्या : तथा जो भोग व सुख रूपी भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य (रूपी मेघ) की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं। उनके हृदय आपके रहने के लिए सुखदायक भवन हैं। इसलिए ऐसे लोगों के हृदय में आप लखन भाव व सुरता सहित निवास कीजिए। दो0 जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।। व्याख्या : आपके यश रूपी मन के भावों के निर्मल सरोवर में जिनकी जीभ्या हंसिनी बनी होती है और आपके गुणगान रूपी मोतियों को चुगती रहती है। हे आत्मा रूपी राम! आप उनके हृदय में निवास कीजिए। प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।। तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।। व्याख्या : जिनकी नाक आपके पवित्र भावों रूपी फूलों की खुशबू को नित्य ग्रहण करती है अर्थात् जिनके स्वरों के माध्यम से पवित्र भाव पैदा होते हों और जो सदैव आपको निवेदन करके भोजन करते हैं और आपकी कृपा रूपी वस्त्रों को धारण करते हैं अर्थात् जो पूरी तरह आपकी शरणागति भाव में रहते हैं। सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा।। व्याख्या : जो गुरु, देव वृति वालों, द्विजों अर्थात् दिव्यगुणों वालो के सामने सीस झुकाते हों अर्थात उनकी बातों को ग्रहण करते हो और प्रेम सहित विनम्रता के गुणों से भरे हों, जो नित्य आत्म चिंतन में लगे रहते हों और परमात्मा के अलावा और किसी का भरोसा नहीं करते हों। चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। मंत्र राजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।। व्याख्या : जिनके चरण राम के तीर्थों पर चले जाते हों अर्थात् तीनों गुणों के चिन्तन द्वारा गुणातीत अवस्था को जो प्राप्त करने का प्रयास करने वाले हों। उन लोगों के मन में आत्मा का स्वरूप प्रकट होता है। जो लोग मंत्र के मर्म को जानकर नित्य मंत्र का जाप करते हों और समस्त भाव रूपी परिवार सहित जो आत्मा का चिंतन करते हों। तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।। तुम्ह ते अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।। व्याख्या : जो नाना प्रकार से तर्पण व हवन करते हों अर्थात् नाना प्रकार से प्राण का संयम करके पान में अपान का हवन करते हों और विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश (विप्र) वाले भावों के सामने काम, क्रोध व मदादि भावों का त्याग करते हों तथा जो आत्मा से बढ़कर परमगुरु को मानते हों और सब प्रकार से परमगुरु (परमात्मा) की सेवा करते हों। दो0 सबु करि मागहि एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह के मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।।129।। व्याख्या : जो सब समय एक ही फल की चाह मन में रखते हैं कि हमारी परमात्मा के चरणों में प्रीत हो। हे आत्मा रूपी राम! आप ऐसे लोगों के मन के अन्दर निवास करते हैं। काम क्रोध मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह के कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया।। व्याख्या : जिनके मन में काम, क्रोध, मद, मान, मोह, लोभ, क्षोभ, राग, द्वेष, कपट, दम्भ व माया नहीं रहती है, उनके हृदय में परमात्मा का निवास होता है। सबके प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। व्याख्या : जो सबके प्रिय व सबके हितकारी होते हैं और सुख, दु:ख, प्रशंसा व निन्दा में समान रहते हैं तथा जो विचार कर सत्य बोलते हैं और सोते-जागते सब समय आपके शरणागति भाव में रहते हैं। तुम्हहि छाड़ि गति दूसर नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव विष तें विष भारी।। व्याख्या : जिनकी आपको छोड़कर दूसरी कोई गति नहीं है। हे आत्मा रूपी राम! आप उनके मन में निवास कीजिए। जो पर नारी अर्थात् प्रकृति के वश में चलने वाली नाड़ी को भावों की जननी मानते हैं और उससे पैदा होने वाली विषय वासनाओं को विष के समान मानते हैं। जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।। व्याख्या : जो पर सम्पति अर्थात् प्रकृति से परे के दैवीय गुणों को देखकर हर्षित होते हैं और दैवीय वृतियों के ह्रास होने पर दु:खी होते हैं और जिन्हें परमात्मा प्राणों के समान प्यारा लगता है। उनके हृदय ही, हे आत्मा रूपी राम! तुम्हारे रहने के लिए सुखदायक स्थान होता है। दो0 स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह के बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।। व्याख्या : जो आपको स्वामी, मित्र, माता, पिता व गुरु सब कुछ मानते हैं, आप उनके मन के अन्दर सुरता व लखन सहित निवास कीजिए। अर्थात् जो आपको ही सब कुछ मानते हैं, उनको आपके स्वरूप का ज्ञान होता है। अवगुन तजि सबके गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।। नीति निपुन जिन्ह कई जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।। व्याख्या : जो अवगुणों का त्याग करके सबके सद्गुणों को ग्रहण करते हैं और विशुद्ध ज्ञान व इन्द्रियों की रक्षा के लिए संयम (कष्ट) सहते हैं। जो नीति पारायण होकर संसार में चलते हैं। उनके मन ही आपके निवास के लिए सुंदर घर हैं। गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।। व्याख्या : जो सद्गुण तो आपके द्वारा पैदा किया मानता है और विषयी अवगुणों का कारण स्वयं को मानता है तथा जो सब प्रकार से आप परमात्मा का भरोसा करता है। जिसे आत्मोन्मुखी भाव प्रिय लगते हैं। आप उनके हृदय में सुरता सहित निवास कीजिए। जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।। सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।। व्याख्या : जो जाति, धन व धारणा की बड़ाई, व प्रिय परिवार और सुखदायक घर को छोड़कर आप परमात्मा को हृदय में धारण करते हैं। आप उनके हृदय में ही निवास कीजिए। सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।। व्याख्या : जिनके लिए सुख व दु:ख एक समान होता है और जो सब अवस्था में संयम द्वारा परमात्मा का ही ध्यान करते हैं तथा मन, वचन व कर्म से परमात्मा के दास होते हैं। आप उनके हृदय में निवास कीजिए। दो0 जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।। व्याख्या : जिनको कभी कुछ चाहने की मन में इच्छा नहीं रहती और परमात्मा से सहज में ही प्रेम करते हैं। आप (परमात्मा) उनके हृदय में निरन्तर निवास कीजिए। एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।। कह मुनि सुनहु भानुकूल नायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।। व्याख्या : इस प्रकार बाल भाव रूपी बाल्मिकी मुनि ने परमात्मा के आभासित होने की अनुभूति का वर्णन किया। ध्यान में बाल भाव रूपी मुनि के वचन आत्मा रूपी राम को बहुत अच्छे लगे। तब बाल भाव रूपी बाल्मिकी मुनि ने आत्मा रूपी राम से कहा कि सुखदायक आश्रम बताता हूँ अर्थात् सहज होकर रहने की विधि बताता है। चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।। सैल सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।। व्याख्या : बाल भाव रूपी मुनि ने आत्मा रूपी राम से कहा कि चित्रकूट पर्वत पर निवास करो, जहाँ पर सब प्रकार की अनुकूलता होगी। वास्तव में जब ध्यान बालकोष में सिद्धि हो जाता है, तो बाल भाव आत्मा को प्रेरित करता है कि चित्रकोष में जाओ क्योंकि चित्रकोष में ध्यान सिद्ध हो जाने पर सब प्रकार से अनुकूलता आ जाती है। चित्र कोष ऐसा कोष होता है, जिसमें समस्त सृष्टि का चित्रमय स्वरूप छुपा रहता है। चित्रकोष में जब ध्यान सिद्ध हो जाता है, तो काम को जीतने की क्षमता साधक में आना शु डिग्री हो जाती है। वहाँ की कोशिकाएँ सुहावनी व कोष सुन्दर होता है। जहाँ पर हाथी, सिंह, हिरण व पक्षी सभी घूमते हैं अर्थात् सब प्रकार के भाव व इच्छाएँ पैदा होती रहती हैं। नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी।। सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।। व्याख्या : चित्र कोष में पवित्र नाड़ी रूपी नदी बहती है, जिसे अत्रि ऋषि की पत्नी तप के बल पर लेकर आयी हैं। वास्तविकता में हमारे मस्तिष्क में अनेक कोष व अनेक कोशिकाएँ होते हैं। चित्रकोष के पास ही अत्र कोष होता है, जिसमें ध्यान सिद्ध होने पर इत्र की सी खुशबू फैल जाती है। वहीं पर एक पवित्र नाड़ी होती जो अगर जागृत हो जाती है तो साधक निद्रा को जीत लेता है। वही अत्रि ऋषि की अनसूइया पत्नी कहलाती है। सुष्मना नाड़ी आगे जाकर सूक्ष्म से सूक्ष्म होती चली जाती है तथा सुष्मना में पुन: सूक्ष्म नाड़ियाँ भी होती हैं। उन्हीं नाड़ियों में सुरसरि नाड़ी होती है, जिसमें ध्यान लग जाने पर आनन्द की धारा फूट पड़ती है। उसे ही शास्त्रों में गंगा के नाम से बताया गया है। सुरसरि नाड़ी में सूक्ष्म नाड़ियाँ होती हैं। उन्हीं सूक्ष्म नाड़ियों में से मन्दाकिनि नाड़ी रूपी नदी होती है। उसे ही मन्दाकिनि नदी बताया गया है। मन्दाकिनि नाड़ी में ध्यान लगने पर समस्त चिन्ताओं का नाश हो जाता है, इसलिए इसे समस्त पापों का नाश करने वाली बताया गया है। अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।। चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू ।। व्याख्या : मन्दाकिनि नाड़ी के पास ही अत्रि आदि ऋषियों का निवास है। वास्तव में मन्दाकिनि नाड़ी से जो रस निकलता है, उसकी खुशबू इत्र के समान होती है। इसलिए मन्दाकिनि के पास में ही अत्रि ऋषि का आश्रम बताया गया है। अत्रि कोष में ध्यान सिद्ध होने पर परमात्मा से मिलने का योग बन जाता है और इन्द्रियों का मन में विलय हो जाता है, जिससे शरीर का संयम सध जाता है। इसलिए हे राम! चलकर अत्रि कोष में ध्यान सिद्ध करिए और वहाँ पर स्थित चित्रकूट पर्वत को भी गौरव प्रदान कीजिए। दो0 चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ। आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।। व्याख्या : चित्रकोष की अमित महिमा का वर्णन मुनियों ने किया है। वास्तव में चित्रकोष ऐसा कोष होता है जिसमें ध्यान सिद्ध हो जाने पर साधक को समस्त जगत चित्रमय दिखायी पड़ने लग जाता है और मायादि के विकारों का ज्ञान हो जाता है। बालकोष से निकलकर अब आत्म चेतना चित्रकोष में प्रवेश कर गयी तथा मन्दाकिनि नाड़ी में चेतना पहुँच गयी। उसी को नदी में दोनों भाईयों का सुरता सहित नहाना बोलकर बताया गया है। रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।। लखन दीख पय उतर करारा। चहुँदिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव से कहा कि हे लखन! यह अच्छा घाट है, अत: यहाँ रूकने की कुछ व्यवस्था कीजिए। अर्थात् चित्रकोष में मन्दाकिनी नाड़ी में ध्यान लगने पर आत्मा को बहुत सहजता का अनुभव हुआ। उसी कारण आत्म चेतना अब चित्रकोष में रमण करना चाहती है। यहाँ आत्मा लखन भाव को समझा रहे हैं कि देखो मन्दाकिनी नाड़ी रूपी नदी का किनारा दूध के समान श्वेत दिखायी पड़ रहा है अर्थात् यहाँ पैदा होने वाले सब भाव सात्विक व शान्त वृति के हैं। इसलिए चारों तरफ संयम रूपी धनुष जैसा नाला दिखायी पड़ रहा है। नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।। चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।। व्याख्या : इन चौपाइयों में चित्रकोष की विशेषताओं को बताया गया है कि मन्दाकिनी नाड़ी धनुष की प्रत्यंचा के समान है और संयम, दम व दान के भाव बाणों के समान हैं तथा कलियुग अर्थात् देहभाव के विकार ही नाना प्रकार के शिकार हैं और चित्रकोष मानो धैर्य वाला शिकारी है, जिसका कभी निशाना चूकता ही नहीं है। अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।। रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।। व्याख्या : ऐसा कहकर लखन भाव ने रहने का स्थान बताया अर्थात् ध्यान में आत्म चेतना को दृढ़ता प्रदान करी। तब आत्मा ने चित्रकोष व मन्दाकिनी नाड़ी का आधार पाकर बहुत सुख पाया। जब चित्रकोष में आत्म चेतना समाने लगी तो मन के नाना दैवीय वृति वाले भाव आ गए। उस अवस्था में देव भाव भी आत्म चेतना को ध्यान में स्थिर होने में ही सहायता करते हैं। उसी को देवताओं द्वारा विश्वकर्मा को लेकर आना बताया गया है। कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।। बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।। व्याख्या : उस अवस्था में दैवीय भाव अनासक्त होकर आते हैं। अत: उन्हीं को कोल-किरातों की संज्ञा दी गयी है। उस अवस्था में दैवीय भावों ने अनासक्त इच्छाओं रूपी सुंदर घर बना दिए। उस अनासक्त व सुखद अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उन्होंने दो सुंदर कुटिया बनायी जो एक अनासक्ति रूपी थी तथा दूसरी सहजता रूपी थी। दो0 लखन जानकी सहित प्रभु राजत रूचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।। व्याख्या : तब लखन व सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम उस सहज व अनासक्ति रूपी सुंदर कुटिया में विराजित हुए। उस समय आत्मा की शोभा ऐसी लगने लगती है, जैसे कामदेव अपनी पत्नी रति और बसन्त ऋतु के साथ विराजमान हों। जब पूर्ण सहजता आ जाती है तो तृप्ति हो जाती है और तृप्त अवस्था पूर्ण काम की होती है। उसी को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। ।। मास पारायण, सत्रहवाँ विश्राम।। अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।। राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।। व्याख्या : जब ध्यान चित्रकोष में लग जाता है, तो नाग व किन्नर प्रकार की प्राण वायु चित्रकोष में पहुँच जाती है। तब आत्म चेतना नाग व किन्नर प्राण से उत्पन्न दैवीय भावों को प्रणाम करते हैं और देव भाव भी आत्म दर्शन का लाभ लेने लगते हैं। बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।। कर बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।। व्याख्या : उस समय दैवीय भाव हर्षित होकर पुष्प बरसाने लगते हैं अर्थात् जब दैवीय भावों में सहजता व आनन्द छा जाता है तो उस अवस्था में पुष्प वर्षा का सा आभास होने लगता है। उस अवस्था में समस्त दैवीय भावों का समाज आत्म चेतना में लीन होकर धन्य हो जाता है। तब दैवीय भाव विनय करके अपनी असहज अवस्था के दुखों को बताते हैं और अब आत्मोन्मुखी होने के कारण हर्षित होकर अपनी सहज अवस्था में आ जाते हैं। सहज हो जाने को ही हर्षित होकर अपने-अपने घर लौटना बताया गया है। चित्रकूट रघुनंदनु छाये। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।। आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।। व्याख्या : जब आत्म चेतना चित्रकोष में पहुँच जाती है, तो मन के भावों के समूह के समूह आत्म चेतना की तरफ आकर्षित होकर चले आते हैं और सभी भाव आत्मा रूपी राम को देखकर प्रसन्न होते हैं तथा सभी भाव आत्मा रूपी राम को दण्डवत प्रणाम करते हैं अर्थात् सभी भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं। मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।। सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।। व्याख्या : मन के भावों के समूह आत्म चेतना को गले लगा लेते हैं अर्थात् मन के भाव आत्मोन्मुखी हो उठते हैं और सुफल अर्थात परमात्मा में लीन होने की कामना करने लगते हैं। उस अवस्था में मन के भाव सुरता व लखन भावों की छवि को देखकर अपने आपको धन्य कर लेते हैं अर्थात् परम सहजता का अनुभव कर लेते हैं। दो0 जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद। करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने मन के भावों को यथायोग्य सम्मान देकर अर्थात् अपनी-अपनी वृति के अनुसार सहजता प्रदान करके विदा किया अर्थात शान्त कर दिया और सभी भावों से कहा कि अपनी-अपनी वृतियों सहित सभी भाव योग, यज्ञ व तप स्वतंत्र होकर करना अर्थात् अपनी सहजता के अनुसार परमात्मोन्मुखी बनने का प्रयास करना। यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।। कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।। व्याख्या : जब आत्म चेतना की चित्रकोष में पहुँचने की खबर कोल-किरात रूपी वासनाओं को मिली तो वै ऐसे हर्षित हो उठी जैसे कोई नया खजाना मिल गया हो। वे सब कंद-मूल रूपी भोग इच्छाओं रूपी दोना भर-भर कर आत्म चेतना के पास ऐसे चले जैसे भिखारी सोना लूटने के लिए जा रहा हो। ध्यान में अचानक नाना प्रकार के भाव व इच्छाएँ पैदा होती रहती हैं। अत: पाठकों को यह पढ़कर आश्चर्य नहीं करना चाहिये। ध्यान की गहरी अवस्था में भाव व इच्छाएँ बात करते हुए स्पष्ट दिखायी पड़ते हैं और अनुभव में आते हैं। तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता।। कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।। व्याख्या : उन भावों में से जिन भावों ने आत्म चेतना व लखन भाव रूपी भाइयों को पहले देखा, उनसे अन्य भाव रास्ता पूछते हैं अर्थात् अन्य भाव जानना चाहते हैं कि कैसे आत्म दर्शन होते हैं। इस प्रकार सबने आत्मा रूपी राम की सुन्दरता का बखान करते हुए आत्मा का दर्शन किया। करहिं जोहा डिग्री भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।। चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।। व्याख्या : सभी कोल-किरात रूपी वासनाओं के भावों ने आत्मा रूपी राम के सामने वृति रूपी भेंट रखकर समर्पण कर दिया और आत्मा रूपी राम को देखकर अनुराग से भर गए। उस अवस्था में सब वासनाओं के भावअपनी आसक्ति को भूलकर चित्रवत खड़े हो जाते हैं अर्थात् वासनाओं की आसक्ति पूरी तरह निष्प्रभावी हो जाती है और शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों में जल भर आता है। राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।। प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने समस्त कोल-किरात रूपी भोग वासनाओं के भावों को प्रेम में मग्न जाना अर्थात् अनासक्त जाना तो सबको सम्मान देते हुए प्रिय वचन बोले। उस अवस्था में कोल-किरात रूपी भोगवासना के भाव भी बार-बार समर्पण करते हुए विनय पूर्वक बोलते हैं। दो0 अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय।।135।। व्याख्या : उस ध्यान अवस्था में कोल-किरात रूपी भोग वासनाओं के भाव सहज हो जाते हैं और सहज होकर आनन्द का अनुभव करते हैं तथा उनमें आसक्ति का त्याग करके आत्मोन्मुखी वृति प्रबल हो उठती है। अत: उसी अवस्था का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे आत्मा रूपी राम! सब भाव आपके चरणों को देखकर धन्य हो गए हैं और सनाथ हो गए हैं अर्थात् हमारी वृति आत्मोन्मुखी हो गयी है। इसलिए आपका आना हमारे भाग्य को जगाने वाला सिद्ध हुआ है। इस दोहे में भोग वासना के भाव आत्म चेतना के प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं। धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।। धन्य बिहग मृग कानन चारी। सफल जन्म भए तुम्हहि निहारी।। व्याख्या : कोल किरात रूपी भोग वासना के भाव कहते हैं कि हे नाथ! वे कोष व नाड़ियाँ धन्य हैं जिन-जिन पर आपने पैर रखा है अर्थात् वे कोष व कोशिकाएँ धन्य हो गयी हैं जिनमें होकर आत्म चेतना गुजरी है। वे भाग्य भाव, भोग इच्छाएँ व वैराग्य के भाव भी धन्य हो गए हैं जिनमें होकर आत्म चेतना की ऊर्जा का संचार हुआ है। उन सब भावों का जन्म सफल हो गया है जिन्होंने आत्म दर्शन कर लिया है। हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।। कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।। व्याख्या : हम सब भोग-वासनाओं के भाव परिवार सहित धन्य हो गए हैं क्योंकि हमने आँखों से आपके दर्शन कर लिए हैं। आपने यहाँ चित्रकोष में रहने का जो विचार किया है वो अच्छा है क्योंकि यहाँ सभी ऋतुओं में सुखद अवस्था बनी रहेगी। अर्थात् चित्रकोष में ध्यान सिद्ध हो जाने पर समस्त गुणों की वृति रूपी ऋतुएँ सहज व सुखद हो जायेंगी अर्थात् गुण गुणों में बरतने लग जायेंगे। हम सब भांति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।। बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।। व्याख्या : हम आपकी सब प्रकार से हाथी, सिंह, सर्प व बाघ रूपी हिंसा के भावों से बचाकर सेवा करेंगे। क्योंकि प्रत्येक कंदरा, खोह व पर्वत रूपी कोष-कोशिकाएँ हमारी जानी हुई हैं। तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।। हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।। व्याख्या : हम आपको जहाँ-तहाँ वासना रूपी शिकार खिलवायेंगे और आनन्द रूपी जल के स्थानों को दिखायेंगे। हम सब कोल-किरात रूपी भोग-वासनाओं के भाव परिवार सहित आपके सेवक हो गए हैं अर्थात पूरी तरह आत्मोन्मुखी हो गए हैं। इसलिए हमें आज्ञा देने में में संकोच मत करना। दो0 बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करूना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।। व्याख्या : परमात्मा की करूणामयी अवस्था का ज्ञान वेद व मुनियों को भी अगम होता है अर्थात् उस अवस्था की अनुभूति को वेदों व मुनियों द्वारा भी वर्णन नहीं किया जा सकता है। वे करूणामय परमात्मा कोल-किरात रूपी भोग वासना के भावों की बातें ऐसे सुनते हैं जैसे पिता अपने बालकों की बातों को सुनते हैं। रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।। राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।। व्याख्या : परमात्मा को केवल प्रेम ही प्यारा होता है, इसको कोई जानने वाला ही जान पाता है। आत्मा रूपी राम ने चित्रकोष में विचरण करने वाले सभी भावों को मधुर वचन कह कर संतुष्टि प्रदान की। बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।। एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।। व्याख्या : तब सभी भावों को आत्मा रूपी राम ने संतुष्ट करके विदा कर दिया अर्थात् शान्त कर दिया तो सभी भाव परमात्मा के गुण-गान करते हुए अपने घरों को लौट गए अर्थात् सहज हो गए। इस प्रकार स्वरों व मन को सुख देने वाले आत्मा रूपी राम, सुरता व लखन भावसहित वैराग्य रूपी वन में निवास करने लगे। अर्थात् चित्रकोष में ध्यान स्थिर हो गया, जिससे समस्त भाव शान्त होकर सहज हो गए। जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।। फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु बलित बर बेलि बिताना।। व्याख्या : जब से ध्यान में आत्म चेतना चित्रकोष में पहुँच कर स्थिर होने लग जाती है तब से ही वैराग्य रूपी वन मंगल को करने वाला हो जाता है और नाना प्रकार की लोक कल्याण व करूणा रूपी बेल व पेड़ फूलने-फलने लगते हैं और क्षमा, दया व करूणा रूपी भावों की बेलें लिपटने लगते हैं। सुरत डिग्री सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।। गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।। व्याख्या : वे सुरत डिग्री अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में स्वरों से पैदा होने वाले भाव स्वभाव से ही सहज होते हैं, मानो वे माया के नाना भावों का हरण करने के लिए ही आए हों। उस अवस्था में मधुर-मधुर भावों की पंक्तियाँ पैदा होने लग जाती हैं और सत, रज व तम के भावों की बयार सुख देने वाली हो जाती है अर्थात् त्रिगुणों में सहजता आ जाती है। दो0 नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक चकोर। भाँति-भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।। व्याख्या : ध्यान जब चित्रकोष में स्थिर होता है तो नाना प्रकार के सात्विक भाव सहज होकर प्रकट होते हैं। उन भावों को ही नीलकंठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षियों के प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। उस अवस्था में भावों की सहजात इतनी सुखद होती है कि वे चित को स्थिर करने लगते हैं। उसी को चित चोर बोलकर लिखा गया है। करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।। फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृग बृंद बिसेषी।। व्याख्या : हाथी, सिंह, बन्दर, सूअर और हिरण रूपी सभी भाव आपसी वैर को छोड़ एक संग सहज होकर विचरण करने लगते हैं अर्थात् उस समय सभी भावों का आपसी द्वन्द्व मिट जाता है और सहजता आ जाती है। ये भाव रूपी पशुओं का समूह आत्मा रूपी राम को वासना रूपी शिकार करता हुआ देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं। बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि रामबनु सकल सिहाहीं।। सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।। व्याख्या : जहाँ तक संसार में वैराग्य के भाव रूपी वन हैं, उन सब में आत्मा रूपी राम के वैराग्यवान होने पर जो शोभा होती है, वो अन्य वैराग्य के भावों में नहीं होती है। आत्मा जब वैराग्य में दृढ़ हो जाती है तो स्वरों से निकलने वाले भाव व ज्ञान का प्रकाश करने वाले भावों का संचार करने वाली नाड़ियाँ व इन्द्रियों का आभास कराने वाली नाड़ियाँ भी धन्य हो जाती हैं अर्थात् स्वरों व नाड़ियों में परम सहजता छा जाती है। सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनी कर करहिं बखाना।। उदय अस्त गिरि अ डिग्री कैलासू। मंदर मे डिग्री सकल सुरबासू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समस्त स्वर व नाड़ियाँ व नाड़ियों से उत्पन्न भाव समूह मंदाकिनी नाड़ी के यश का खूब बखान करते हैं कि मंदाकिनी नाड़ी में ध्यान सिद्ध होने पर यह सुखद अवस्था प्राप्त हुई है, जो उदयाचल (अर्थात् जहाँ से भाव उदय होते हैं), अस्ताचल, (अर्थात जहाँ भाव छूपते हैं) कैलाश (अर्थात् जहाँ से कैवल्य का आभास होता है) मंदराचल (अर्थात् भाव मन के अन्दर से चलते हैं), और सुमे डिग्री (अर्थात् जहाँ भावों में दृढ़ता आ जाती है) रूपी कोष जहाँ पर नाना प्रकार के भावों का निवास होता है। सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।। बिधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।। व्याख्या : हिमाचल आदि कोष कोशिकाएँ जो हैं वे सब चित्रकोष के यश का बखान करते हैं। यहाँ चित्रकूट के यश गान का कारण यह है कि भाव चाहे जिस कोष से पैदा होते हों परन्तु भावों का चित्रण तो चित्रकोष की क्षमता से ही होता है। इसलिए सभी कोष व कोशिकाएँ चित्रकोष का यशोगान करते हैं। बिन्ध्याचल कोष रूपी पर्वत मन में बहुत प्रसन्न व सुख का अनुभव करता है क्योंकि बिना श्रम के ही उसे बड़ाई मिल गयी अर्थात् चित्रकोष में आत्म चेतना पहुँचने पर बिन्ध्याचल रूपी कोष स्वत: ही धन्य हो उठता है। अर्थात् अति सूक्ष्म बिन्दु में भी विराट जगत का चित्र दिखायी देने लगता है। दो0 चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में चित्रकोष से पैदा होने वाले जो पक्षियों, हिरणों, लताओं, पेड़ों और तृण जाति के होते हैं अर्थात् नाना प्रकार की वृतियों वाले भाव पुण्य के पुँज से प्रकाशित होकर धन्य हो जाते हैं। वासनाओं की आसक्ति मिट जाना ही पुण्य का पुँज होता है। उस अवस्था में भावों में दिन-रात सहजता आ जाती है। नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।। परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।। व्याख्या : उस अवस्था में जिन भावों में सहजता आ जाती है, वे आत्मा रूपी राम को देखकर जन्म लेने का फल प्राप्त करके शोक रहित हो जाते हैं और आत्मोन्मुखी होकर स्थिर सुख को प्राप्त करके परम पद के अधिकारी हो जाते हैं। सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।। महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुख सागर जहँ कीन्ह निवासू।। व्याख्या : उस अवस्था में कोश व कोशिकाएँ स्वभाव से ही सहज सुन्दर हो जाते हैं तथा मंगल की भावना से भरकर बहुत पवित्र हो जाते हैं। उस ध्यान की विधि का कैसे वर्णन किया जा सकता है, जिससे आत्मा रूपी राम ने चित्रकोष में निवास किया है अर्थात् उस विधि का कैसे वर्णन किया जा सकता है, जिससे आत्मा की चेतना चित्रकोष में प्रवेश कर स्थिर हो जाती है। पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।। कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन।। व्याख्या : यहाँ पर ध्यान की अनुभूति का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वासनारूपी क्षीर सागर अर्थात् नाभी मण्डल व शरीर रूपी अवध का त्याग करके आत्म-चेतना, सुरता व लखन भाव चित्रकोष में आकर रहे हैं, तो उस वैराग्य रूपी वन की शोभा का कैसे वर्णन किया जा सकता है? अगर सत अर्थात् सौ भाव हजारों में बदल जाएँ, तो भी उस अवस्था की अनुभूति का वर्णन नहीं किया जा सकता है। सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।। सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।। व्याख्या : अत: उस परमानन्द की अवस्था का मैं कैसे वर्णन कर सकता हूँ? क्या कभी पोखरे में रहने वाला कश्छप भी मंदराचल को उठा सकता है? अर्थात् विषय वासना रूपी पोखर में रहनेे पर इन्द्रियों के दम व संयम करने पर भी विषयों की आसक्ति को छोड़ा नहीं जा सकता है। परन्तु जब ध्यान में आत्म चेतना उर्ध्वगामी होकर चित्रकोष में पहुँच जाती है, तो लखन भाव मन, वचन व कर्म से आत्मा की सेवा करने लगते हैं अर्थात् विषय वासनाओं के लक्षणों को जानकर सदैव आत्मा को बल प्रदान करते हैं। उस अवस्था के शील व स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।। व्याख्या : क्षण-क्षण में आत्मा व सुरता में लीन रहने से तथा अपने ऊपर सहज स्नेह जानकर लखन भाव सपने में भी चित, चितवृति की नाड़ियों और भावों में रमण नहीं करता है। अर्थात् लखन भाव पूर्ण समर्पण के साथ ध्यान में आत्मा में लीन हो जाता है। राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।। छिनु छिनु पिया बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोर कुमारी।। व्याख्या : ध्यान जब चित्रकोष में स्थिर होने लग जाता है, तो आत्म चेतना के साथ सुरता रूपी सीता देह व भावों को भूलाकर सहज सुखी रहने लगती हैं। उस अवस्था में क्षण-क्षण आत्मा रूपी राम के चन्द्रमा के समान शीतल मुख को देखकर सुरता रूपी सीता वैसे ही प्रसन्न रहती है, जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोरी प्रसन्न रहती है। नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवस सहस सम बनु प्रिय लागा।। व्याख्या : सुरता आत्मा रूपी राम को देखकर वैसे ही हर्षित रहने लगती हैं जैसे दिन को देखकर चकवी प्रसन्न रहती है क्योंकि ध्यान में जब सुरता आत्मा में लीन रहती है तो आत्मा का भी आकर्षण सुरता पर बढ़ जाता है। सुरता रूपी सीता के मन में आत्मा रूपी राम के चरणों में अनुराग पैदा हो गया। इसलिए अब वैराग्य रूपी वन हजारों देह रूप अवध से अच्छा लगने लग गया अर्थात् ध्यान की इस अवस्था में समस्त देह सुख भोग के भाव विस्मृत हो गए। परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवा डिग्री कुरंग बिहंगा।। सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।। व्याख्या : दृढ़ वैराग्य के भावों से बनी हुई संतोष रूपी घास-फूस की पर्णकुटी आत्मा के संग रहने से प्रिय लगने लगती है। मृग और पक्षी अर्थात् सहज इच्छाओं रूपी भाव ही प्रिय परिवार लगता है तथा मन के तीनों गुणों की सहज अवस्था ही सास-ससुर जैसे लगते हैं और वासना रहित अर्थात् अनासक्ति पूर्ण भोग ही अमृत के समान लगते हैं। नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।। लोक होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि एक बिषय बिलासू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के साथ ध्यान में समान स्तर पर (साँथ री) सुरता के लीन हो जाने पर पूर्णकाम की अवस्था के समान सुख देने वाली अवस्था आ जाती है। उस समय की अवस्था में जीव लोकपाल की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। अत: उस अवस्था में विषय भोगों का मोह नहीं हो सकता है। दो0 सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम विषय बिलासु। राम प्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।। व्याख्या : केवल आत्मा रूपी राम का चिन्तन करने से ही साधक संसार के विषय भोगों का त्याग कर देता है। अत: सुरता के आत्मा में लीन होने की अवस्था के परिणामों को देखकर कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि सुरता से ही भाव पैदा होते हैं और भाव ही संसार को जन्म देते हैं। इसलिए तो सुरता रूपी सीता को जग जननी कहा गया है। सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय सुखु मानी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्म चेतना भी वो सब प्रेरणा करने लगती है, जिससे सुरता व लखन भाव सुख का अनुभव करें। इसलिए आत्मा प्रेरणा करके पुरातन अर्थात् शरीर रूपी नगर के (पुरअतन) रहस्य को नाना प्रकार से समझाने को कोशिश करते हैं। जिससे सुरता व लखन भाव अनुभूति करके सुख का अनुभव करने लगते हैं। जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।। सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।। व्याख्या : जब-जब ध्यान में आत्म चेतना में देह स्मृति चली आती है, तब-तब आँखों में पश्चाताप रूपी जल भर आता है अर्थात् आत्मा परमात्मा में लीन होने के परमसुख को याद करके देह भावों में बरतने के समय का विचार करके पश्चाताप करने लगती है। ध्यान के दौरान कभी-कभी आत्म चेतना में चित, चित की नाड़ियों व भावों का चिन्तन हो आता है तथा त्याग भावरत रूपी भरत की सेवा व प्रेम का भी चिन्तन चला आता है। इस अवस्था को साधक स्वयं ही अपने हृदय में समझ पाता है। कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।। लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरूषहि अनुसर परिछाहीं।। व्याख्या : ध्यान में बीच-बीच में देह रूपी अवध की स्मृति हो आने से आत्मा रूपी राम दु:खी हो उठते हैं परन्तु कुसमय अर्थात् वासनाओं की आसक्ति के प्रभाव का विचार करके धैर्य धारण करके परमात्मा में ही लीन रहने का प्रयास करते हैं। आत्मा रूपी राम की उस अवस्था को देखकर सुरता व लखन भाव भी व्याकुल हो जाते हैं, क्योंकि वे तो आत्मा का वैसे ही अनुसरण करते हैं, जैसे जीव का उसकी छाया अनुसरण करती है। प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अ डिग्री सीता।। व्याख्या : सुरता व लखन भाव की व्याकुलता को देखकर निर्मल आत्मा धैर्य धारण करके निर्भय होने की प्रेरणा करती हैं। उस समय पवित्र कथा अर्थात् अनासक्ति के भाव की प्रबलता बढ़ने लगती है, जिसके कारण सुरता व लखन भाव सुख का अनुभव करने लग जाते हैं। दो0 रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में अनासक्त भाव रूपी घर में आत्मा, सुरता व लखन भाव ऐसे शोभा पाने लगते हैं जैसे निर्मल चित होने पर शरीर में पवित्रता रूपी शची, जयंत रूपी भाव और इन्द्र रूपी चित शोभा पाते हैं। जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरूष सरीरहि।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम सुरता व लखन भाव से ऐसे जुड़े रहते हैं जैसे आँखें और पलक जुड़े रहते हैं। ध्यान की उस अवस्था में लखन भाव भी सुरता व आत्मा की वैसे ही सेवा करते हैं अर्थात् अनुसरण करते हैं, जैसे कोई अविवेकी पुरुष शरीर का अनुसरण करता है। एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।। व्याख्या : इस प्रकार ध्यान में आत्मा रूपी राम वैराग्य रूपी वन में सुखी होकर रहते हैं। उस अवस्था में सहज इच्छा रूपी पक्षी, मृग, स्वर तथा मन व इन्द्रियों की कल्याणकारी अवस्था आ जाती है। फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।। व्याख्या : जब ध्यान चित्रकोष में स्थिर हो जाता है, तो निषेध भाव रूपी निषाद वापस सहज होकर लौट आता है। उसी को निषाद का राम को छोड़कर लौट आना बताया गया है। तब निषाद भाव सुमंत्रणा रूपी सुमन्त सचिव के सम्पर्क में आता है तथा वृतियों रूपी रथ व मन रूपी घोड़ों को देखता है। निषाद भाव को देखकर सुमन्त्रणा रूपी मंत्री व्याकुल हो उठता क्योंकि निषेध भाव तो अब सहज हो गया है और मन रूपी घोड़े व इन्द्रियों रूपी वृतियाँ तो सहजता की अवस्था में व्याकुल हो ही जाते हैं। राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।। व्याख्या : तब सुमंत्रणा का भाव आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण की याद करके व्याकुल होकर धरनितल अर्थात देह अवस्था में आ जाता है। उस अवस्था में मन रूपी घोड़े दक्षिण दिशा में देखकर अर्थात वासना भोगों की याद करके हिनहिनाने लगे और व्याकुल हो गए जैसे पंखों के बिना पक्षी व्याकुल हो जाते हैं। मन रूपी घोड़ों की व्याकुलता का कारण यह है कि बिना आत्मा सुरता व लखन भाव के भोगों की सुखानुभूति नहीं हो सकती है। उसी को पंखहीन पक्षी की उपमा दी गयी है। दो0 नहिं तृन चरहिं न पिअहि जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मन रूपी घोड़े न तो वासना रूपी घास चरते हैं और न ही भोग रूपी जल ही पीते हैं तथा उनकी हृदय रूपी आँखों से पश्चाताप रूपी जल निकलने लगता है। मन रूपी भावों के घोडों की ऐसी अवस्था देखकर निषेध भाव रूपी निषाद व्याकुल हो गया। धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।। तुम्ह पंडित परमार्थ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता।। व्याख्या : तब निषेध भाव रूपी निषाद ने धैर्य धारण करके सुमन्त्रणा रूपी भाव से विषाद को दूर करने के लिए कहा कि हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! तुम तो पंडित हो अर्थात् पिण्ड (शरीर) के रहस्य को जानने वाले व आत्मा (परमार्थ) को भी जानने वाले हो। अत: क्रिया की विपरीत अवस्था (बिमुख बिधाता) को देखकर धैर्य धारण करो। बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।। व्याख्या : तब निषेध भाव रूपी निषाद ने नाना प्रकार की कथा मधुर वाणी में कही और सुमन्त्रणा रूपी भाव को वृतियों रूप रथ पर चढ़ाकर जबरदस्ती रवाना कर दिया। अर्थात् निषेध भाव ने सुमन्त्रणा रूपी भाव को देह में बरतने के लिए वृतियों रूपी रथ पर जोर देकर चढ़ा दिया। उस अवस्था में सुमन्त्रणा रूपी भाव आत्म वियोग के कारण वृतियों रूपी रथ को नहीं चला पा रहा था। क्योंकि आत्मा से वियोग हो जाने पर सुमन्त्रणा का भाव शिथिल पड़ जाता है। चरफराहिं मग चलहि न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।। अढ़कि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।। व्याख्या : ध्यान जब चित्रकोष में स्थिर हो जाता है तो मन के भावों रूपी घोड़े तड़फड़ा उठते हैं और वे वृति रूपी रथ को नहीं खींच पाते हैं। उस अवस्था में ऐसा लगता है जैसे जंगली हिरणों को अर्थात् नयी दिशाहीन इच्छाओं को वृति रूपी रथ में लगा दिया हो। इसलिए वे कभी आगे बढ़ते हैं और कभी पीछे मुड़ जाते हैं क्योंकि आत्म वियोग होने पर मन के भाव व्याकुल हो उठते हैं। जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।। बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।। व्याख्या : मन के भाव रूपी घोड़ों को जब आत्मा, सुरता व लखन भावों का नाम सुनाई पड़ता है तो वे हिन-हिनाने लगते हैं। इस प्रकार मन के भाव रूपी घोड़ों के आत्म वियोग की अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। वे तो वैसे ही व्याकुल हो उठते हैं, जैसे मणि के बिना सर्प व्याकुल हो उठता है। दो0 भयउ निषादुबिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।। व्याख्या : उस अवस्था में निषेध भाव रूपी निषाद सुमन्त्रणा रूपी सचिव व मन के भाव रूपी घोड़ों को देखकर विषाद के वश में हो गया अर्थात् निषेध भाव भी विषयों से मुक्त हो गया। तब सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अहिंसा रूपी चार सेवकों को सुमन्त्रणा रूपी सचिव के साथ कर दिए। अर्थात् निषेध भाव ने प्रेरणा कर दी कि सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और अहिंसा का सहारा लेकर शरीर रूपी अवध में लौट जाओ। गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।। चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा।। व्याख्या : निषाध राज गुह सारथियों को पहुँचाकर वापस लौट गया अर्थात् अपनी सहज अवस्था में आ गया। उस अवस्था में निषेध भाव के आत्मा से वियोग की अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। गुह राज द्वारा सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अहिंसा रूपी दिए गए सारथी मन के भावों व वृति रूपी रथ के देह रूपी अवध के लिए लेकर चले अर्थात् देह भाव का आभास करने लगे। वे सब क्षण-क्षण में विषयों से रहित अवस्था में मगन होने लगे। विषयों का अभाव ही देह भावों के लिए विषाद कहलाता है। सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।। व्याख्या : आत्मा के बिना जीवन जीना धिक्कार है, इस प्रकार सोच-सोच कर सुमन्त्रणा रूपी सचिव व्याकुल व दु:खी होने लगता है। वो सोचने लगता है कि देह रूपी अवध में बरतने का लाभ क्या है? क्योंकि अन्तकाल में तो यह शरीर भी मिट जायेगा। अत: आत्मा रूपी राम से वियोग का अपयश ही क्यों ले? अर्थात् देह भाव के विषयों में क्यों बरतें? भे अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय हेतु दुइ टूका।। व्याख्या : सुमन्त्रणा का भाव देह भाव में जाने पर विचार करने लगता है कि ये प्राण विषयों का संवाहन करने वाले बन गए हैं। पता नहीं किस कारण से उर्ध्वगामी नहीं हो रहे हैं। ये मन मूर्ख परमात्मा में लीन होने के अवसर को चूक गया है। पता नहीं फिर भी हृदय के दो टुकड़े नहीं हो रहे हैं अर्थात अभी तय नहीं हो पा रहा है कि विषयों में बरता जाए या फिर आत्मोन्मुखी होकर रहा जाए। सुमन्त्रणा का भाव कहना चाहता है कि न तो देह भावों में ही रहने का निश्चय हो पा रहा है और न ही परमात्मा में लीन रहने का ही तय हो पा रहा है। यह भाव अवस्था बहुत सूक्ष्मता के साथ ही ध्यान में समझ आ पाती है। मीजि हाथ सि डिग्री धुनि पछिताई। मनहुँ कृपन धन रासि गँवाई।। बिरिद बाँधि बर बी डिग्री कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुमन्त्रणा का भाव आत्म वियोग के कारण ऐसे पश्चाताप करने लगता है जैसे मानो कोई कंजूस धन खो जाने पर करता है। जैसे कोई बीर का बाना पहनकर वीर कहलाता हो परन्तु युद्ध से पराजित होकर भागा हो, ऐसे ही सुमन्त्रणा का भाव पश्चाताप करने लगता है। दो0 बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।। व्याख्या : सुमन्त्रणा का भाव वैसे ही पश्चाताप करने लगता है जैसे कोई विशुद्ध ज्ञान के प्रकाशवाला, विवेकी व वेदों को जानने वाला साधक सज्जन धोखे से विषयों का मद पान करके पश्चाताप करता है। जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारून दाहू।। व्याख्या : जैसे कोई कुलीन सज्जन व चतुर स्त्री अपने पति को मन, वचन, कर्म से जो सब कुछ मानती हो, को कर्म के वश में पड़कर अलग रहे, पर जो संताप होता है वैसा ही संताप सुमन्त्रणा रूपी भाव को होता है। लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखहिं अधर लागि मुँह लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।। व्याख्या : आँखों में जल आ गया है और दृष्टि (विषय वासना की दृष्टि) भी मन्द पड़ गयी है और कानों से सुनायी भी नहीं पड़ रहा है तथा बुद्धि भी व्याकुल होकर बेठिकाने हो गयी है और होठ सूखने लग गए हैं और मुँह में लाटा लगने लग गया है परन्तु हृदय में देह भावों का आभास होने के कारण मृत्यु नहीं हो रही है अर्थात देह आभास रहने से विषय-वासना के भाव पूरी तरह मर नहीं पाते हैं। हालाँकि ध्यान में वे बेसुध जरूर हो जाते हैं। बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।। हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।। व्याख्या : सुमन्त्रणा का भाव ध्यान की ऐसी अवस्था में वैसे ही फीका पड़ जाता है। जैसे कोई अपने माता-पिता को मारकर बदहवास हो जाता है। उस अवस्था में उसके मन में हानि व ग्लानि के नाना भाव उठने लगते हैं जैसे कोई पापी यमपुर के बारे में नाना प्रकार की कल्पना कर-करके सोचने लगता है। बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोह बिलोकत सोई।। व्याख्या : सुमन्त्रणा के भाव के हृदय में कोई वचन नहीं आ पा रहा था और पश्चाताप हो रहा था कि मैं अवधी रूपी शरीर में क्या देखूँगा? बिना आत्मा रूपी राम के वृतियों रूपी रथ को भाव रूपी लोग देखेंगे, तो मुझे देखते ही भाव रूपी लोग संकोच कर जायेंगे। दो0 धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उत डिग्री देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।। व्याख्या : सुमन्त्रणा रूपी भाव विचार करने लगता है कि जब शरीर रूपी नगर के भाव रूपी लोग दौड़कर आत्मा रूपी राम के बारे में पूछेंगे तो मैं उन सबको हृदय पर बज्र रखकर क्या उत्तर दूँगा? पूछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।। पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।। व्याख्या : जब दु:खी नाड़ियों रूपी माताएँ उनके (आत्मा, सुरता व लखन) बारे में पूछेंगी तो मैं उन्हें कौनसी विधि का फल बताऊँगा? जब लखन भाव को संचारित करने वाली नाड़ी रूपी माता पूछेंगी, तो मैं कौन सा सुख देने वाला संदेश कहूँगा? राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लबाई।। पूँछत उत डिग्री देब मैं तेही। गए बनु राम लखनु बैदेही।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम की सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता दौड़कर आयेंगी जैसे बछड़े के लिए नयी व्याही गाय दौड़कर आती है तो मैं क्या उत्तर दूँगा कि आत्मा रूपी राम, लखन भाव व सुरता दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले गए हैं। जोइ पूँछिहि तेहि उत डिग्री देवा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।। पूँछिहिं जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।। व्याख्या : जो भी जो कुछ पूछेंगे मैं अवधी रूपी शरीर में जाकर उसका उत्तर देने का क्या यही सुख लूँगा अर्थात् मुझे इस कष्टकारी अवस्था का सामना करना पड़ेगा। जब आत्म वियोग से दु:खी चित रूपी राजा मुझसे पूछेंगे, जिनका जीवन आत्मा रूपी राम पर ही निर्भर करता है। देहउँ उत डिग्री कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।। सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिह नरेसू।। व्याख्या : मैं किस मुँह से चित रूपी राजा को उत्तर दूँगा कि आपके पुत्रों को सकुशल वैराग्य रूपी वन में पहुँचाकर आ गया हूँ। चित रूपी राजा तो आत्मा रूपी राम, लखन भाव व सुरता के संदेश को सुनकर तिनके के समान अपने देह भाव का परित्याग कर देंगे। दो0 हृदय न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरू। जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरू।।146।। व्याख्या : सुमन्त्रणा भाव विचार करता है कि जब जल के समान निर्मल आत्मा के बिछुड़ने पर मेरा कीचड़ रूपी हृदय नहीं फटा तो मुझे लगता है, इस ध्यान विधि से मुझे शरीर आभास से देहभाव के कष्टों का ज्ञान होगा। एहिं बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।। बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।। व्याख्या : इस प्रकार रास्ते में पश्चाताप करता हुआ सुमन्त्रणा का भाव वृति रूपी रथ सहित तमस कोष अर्थात् ईड़ा नाड़ी के तट पर पहुँच गया। तब निषेध भाव द्वारा दिए गए सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अहिंसा रूपी सारथियों को विदा कर दिया। तब निषेध भाव के सेवक विषयों से अनासक्त होकर लौैट गए। वास्तव में सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अहिंसा रूपी निषेध भाव के सेवक तमस कोष को पार करके देह भाव में नहीं जा पाते हैं। इसलिए उसी अवस्था को निषाध भाव के सेवकों को विदा करना बोलकर लिखा है। पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।। बैठि बिटप तर दिवसु गँवावा। साँझ समय तब अवस डिग्री पावा।। व्याख्या : देह रूपी नगर में प्रवेश करने में अर्थात् देहबुद्धि के भावों में बरतने में सुमन्त्रणा रूपी सचिव को संकोच होने लगता है जैसे गुरु, ब्राह्मण और गाय को मारने पर अपराध बोध का संकोच होता है। इसलिए आशा-लालसा रूपी पेड़ के नीचे बैठकर जब ध्यान से उदित ज्ञान रूपी सूर्य छुप गया, तब अज्ञानता रूपी अंधकार होने पर देह रूपी नगर में प्रवेश किया। जब तक ध्यान के प्रभाव से ज्ञान रूपी सूर्य का प्रकाश रहता है, तब तक सुमन्त्रणा का भाव देह भावों में बरतने में संकोच करता है। अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।। जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।। व्याख्या : ज्ञान रूपी सूर्य के अस्त हो जाने पर अज्ञान रूपी अंधकार होने पर वृति रूपी रथ को द्वार पर छोड़कर सुमन्त्रणा का भाव अवधी रूपी देह नगर में प्रवेश करता है। उस अवस्था में देह के जिन-जिन भावों को सुमन्त्रणा के भाव के आने का आभास हुआ, वे चित रूपी राजा के द्वार पर वृतियों रूपी रथ को देखने के लिए आए। रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।। नगर नारि नर ब्याकुल कैसें। निघटत नीर मीनगन जैसें।। व्याख्या : वृति रूपी रथ को पहचान कर और मन के भाव रूपी घोड़ों को व्याकुल देखकर देह भाव रूपी लोगों के अंग-अंग ऐसे गले जा रहे हैं जैसे गर्मी में ओले गलते हैं। देह भाव रूपी नर-नारी ऐसे व्याकुल हो रहे हैं जैसे जल कम होने पर मछलियाँ व्याकुल हो उठती हैं। दो0 सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवनु भयंक डिग्री लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।। व्याख्या : सुमन्त्रणा रूपी सचिव के देह रूपी नगर में आगमन की बात सुनकर समस्त देह की नाड़ियों में व्याकुलता आ गयी। उस अवस्था में देह रूपी घर ऐसा लगने लगता है जैसे भूत या प्रेतों का निवास स्थान हो। अति आरति सब पूँछहिं रानी। उत डिग्री न आव बिकल भइ बानी।। सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा।। व्याख्या : उस अवस्था में समस्त नाड़ियाँ रूपी रानियाँ दु:खी होकर सुमन्त्रणा रूपी भाव से आत्मा, सुरता व लखन भाव के बारे में पूछती हैं परन्तु सुमन्त्रणा के भाव की वाणी व्याकुल हो उठने के कारण उत्तर नहीं बन पा रहा है। उस अवस्था में कानों को सुनायी नहीं पड़ता है और आँखें नहीं देख पाती हैं। उस अवस्था में तो सुमन्त्रणा का भाव चित रूपी राजा के बारे में ही पूछने लगता है कि चित रूपी राजा कहाँ है? अर्थात् चित की धड़कन शरीर में कहाँ पर हो रही है, इसे सुमन्त्रणा का भाव समझने का प्रयास करता है। क्योंकि सुरता और लखन भाव जब आत्म चेतना के साथ चित्रकोष में लग जाते हैं, तो चित की अवस्था का पता नहीं रहता है। दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।। जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।। व्याख्या : तब दमित इच्छा रूपी वृतियों ने सुमन्त्रणा भाव की व्याकुलता को देखा तो वे सुमन्त्रणा के भाव को सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के पास ले गयी। वहाँ पर चित रूपी राजा को सुमन्त्रणा के भाव ने ऐसे देखा जैसे बिना अमृत के चन्द्रमा बैठा हो अर्थात् चित को निस्तेज अवस्था में देखा। आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।। लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।। व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी राजा सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के भवन में बिना वासना व इच्छाओं के भूमितल अर्थात् देहभाव को आभास करते हुए निस्तेज होकर पड़ा था। वह लम्बे-लम्बे श्वास लेकर ऐसे सोच कर रहा था जैसे ययाति राजा स्वर्ग से निकलने पर सोच कर रहा था। यहाँ पर चित की द्विवधा को बहुत सूक्ष्मता के साथ समझाने का प्रयास किया गया है। चित जब देह भाव में रह जाता है और आत्म चेतना उर्ध्वगामी होकर परमात्मा में लीन होने लग जाती है। उस अवस्था में चित को इसी प्रकार का पश्चाताप होता है। ध्यान में अनुभव करके इसे समझा जा सकता है। नर-नारी की धड़कन ही चित होती है। लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।। राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।। व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी राजा को क्षण-क्षण में पश्चाताप होने लगता है जैसे पंख जलने पर सम्पाती को होने लगा। इसलिए बार-बार आत्मा रूपी राम, राम कहने लगा और फिर आत्मा, सुरता व लखन भाव को पुकारने लगा। दो0 देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।। व्याख्या : तब सुमन्त्रणा रूपी भाव ने चित रूपी राजा को देखकर जय जीव कहा अर्थात् देह भाव का आभास कराते हुए चित रूपी राजा के सामने समर्पण कर दिया। सुमन्त्रणा भाव की बातें सुनकर चित रूपी राजा व्याकुल होकर उठ गया और पूँछने लगा कि आत्मा रूपी राम कहाँ हैं? यह सूक्ष्म अनुभूति साधकों को ध्यान में ही समझ आ पाती है। उस अवस्था में समस्त भाव आपस में बातें करते हुए स्पष्ट समझ में आने लगते हैं। भूप सुमन्त्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु आधार जनु पाई।। सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में चित रूपी राजा ने सुमन्त्रणा रूपी सचिव को हृदय से लगा लिया और उस अवस्था में चित की अवस्था ऐसी लग रही थी मानो डूबते हुए को कुछ आधार मिल गया हो। तब सुमन्त्रणा भाव रूपी सचिव को चित ने प्रेम से अपने पास बैठाया और आँखों में जल भर कर आत्मा रूपी राम के बारे में पूछने लगा। राम कुसल कहु सखा सनेही। कहुँ रघुनाथु लखनु बैदेही।। आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।। व्याख्या : चित रूपी राजा बोला कि हे परम स्नेही सखा! तुम आत्मा रूपी राम की कुशल क्षेम बताओे। आत्मा रूपी राम, लखन व सुरता रूपी सीता कहाँ पर हैं? वे वापस क्या देह भाव में आ गए हैं या फिर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले गए हैं? यब बात सुनकर सुमन्त्रणा भाव रूपी सचिव की आँखों में जल आ गया। ध्यान में जब भावों में आपसी वार्तालाप होता है तो इतनी सूक्ष्म-सूक्ष्म घटनाएँ घटती हैं कि जिनका वर्णन करना बहुत कठिन कार्य होता है। अत: भावों के वार्तालाप को पढ़कर पाठकों को आश्चर्य नहीं करना चाहिये। सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।। राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।। व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी राजा बार-बार व्याकुल होकर आत्मा, लखन व सुरता के बारे में पूछने लगते हैं। बार-बार आत्मा रूपी राम के गुण, शील व स्वभाव को याद कर करके चित में बार-बार सोच होने लगता है। राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।। सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।। व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम को भोग रूपी राज की बात कहकर वैराग्य रूपी वन दे दिया परन्तु उसके मन में कोई हर्ष व शोक के भाव पैदा नहीं हुए। ऐसे आत्मा रूपी पुत्र के बिछुड़ने पर भी मेरे (चित रूपी राज) प्राण नहीं गए। अत: मुझसे बड़ा पापी इस संसार में कौन है? दो0 सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।। व्याख्या : हे मित्र! मुझे (चित को) जहाँ पर आत्मा, सुरता व लखन भाव हैं, वहाँ पर पहुँचा दो, वरना अब मेरे प्राण निकलना चाहते हैं। पाठकों को मैं यहाँ बता देना चाहता हूँ कि जब ध्यान में आत्म चेतना चित्रकोष में लग जाती है तो ऐसा आभास होने लगता है कि प्राण अब छूटे, अब छूटे। कभी ऐसा भी लगता है कि शायद मर तो नहीं जाऊँगा, वापस आ पाऊँगा या नहीं। उस अवस्था का यह चित की व्याकुलता के रूप में वर्णन किया गया है। पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।। करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। राम लखनु सिय नयन देखाऊ।। व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी राजा बार-बार सुमन्त्रणा रूपी मंत्री से बार-बार आत्मा रूपी राम के बारे में पूछने लगता है। उस अवस्था में चित रूपी राजा सुमन्त्रणा के भाव से कहने लगता है कि हे सखा! आप वही उपाय कीजिए, जिससे मैं आत्मा, लखन व सुरता को आँखों से देख सकूँ अर्थात् मैं भी आत्मा व सुरता में लीन हो सकूँ। सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।। बीर सुधीर धुरुंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।। व्याख्या : तब सुमन्त्रणा के भाव ने धैर्य धारण करके मधुरवाणी में कहा कि हे चित रूपी महाराज! तुम तो पण्डित अर्थात् पिण्ड यानी शरीर रूपी पिण्ड के आधार हो और ज्ञानी हो। तुम तो वीर, धैर्यवान, धुरंधर अर्थात् शरीर को धारण करने वाले हो और समस्त साधु समाज अर्थात् साधु भावों का सृजन करने वाले हो। जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा।। काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।। व्याख्या : हे चित रूपी राजा! आप तो शरीर रूपी पिण्ड के मर्म को जानने वाले हैं। जन्म-मरण, सुख-दु:खों का भोग, हानि-लाभ, प्रिय लोगों का मिलना-बिछुड़ना ये सब समय और कर्म के अनुसार होता है, जैसे समय पाकर रात व दिन की प्रक्रिया होती रहती है। सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।। धीरजु धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।। व्याख्या : इसलिए मुर्ख लोग ही सुख होने पर हर्षित होते हैं और दु:ख होने पर रोते हैं। धैर्यवान पुरुष तो सुख-दु:ख की अवस्था में समान रहते हैं। अत: ऐसा विचारकर विवेक करके धैर्य धारण करो और समस्त भावों का हित करने के लिए चिन्ता का त्याग कर दीजिए। चित समस्त भावों का हित करने वाला होता है क्योंकि चितवृति के अनुसार ही भावों की अवस्था होती है। दो0 प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर। न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।। व्याख्या : इस दोहे में सुमन्त्रणा का भाव आत्मा, लखन व सुरता के भावों की ध्यान अवस्था के अनुभवों को चित को बता रहा है। इसलिए कहता है कि ध्यान का प्रथम पड़ाव तमस कोष पर हुआ और तामसिक कोष को पार करके सुरसरि रूपी आनन्दकोष आया और वहाँ पर दूसरा पड़ाव हुआ। आनन्दकोष की सुरसरि रूपी गंगा में आत्मा, लखन व सुरता भावों ने स्नान किया। केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गँवाई।। होत प्रात बट छी डिग्री मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।। व्याख्या : उस अवस्था में कैवल्य के भाव ने बहुत सेवा करी और इसलिए बन्धन रूपी रात्रि श्रृंगवेरपुर में बितायी अर्थात् साधना में निषेध भावों का बन्धन भी श्रृंगवेरपुर कोष में पहुँच जाने पर टूट गया और सहजता बढ़ गयी। तब ज्ञान रूपी सवेरा हो गया, तो आत्मा रूपी राम ने दृढ़ता रूपी वट का दूध मंगवाया और लग्न रूपी जटाओं को बनाया अर्थात् दृढ़ता के साथ परमात्मा में लगन लगा ली। उसी को बड़ के वृक्ष का दूध मंगवाकर जटा बनाने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।। लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।। व्याख्या : ज्ञान रूपी सवेरा हो जाने पर आत्मा रूपी राम के निषेध भाव रूपी निषाद ने तब संयम रूपी नाव मँगायी और तब सुरता के साथ आत्मा रूपी राम उस संयम रूपी नाव पर चढ़कर चल दिए। ध्यान में जब निषेध भाव का बन्धन टूट जाता है और निषेध का भाव भी सहज होकर आत्मा का सखा बन जाता है तो सहज संयम की अवस्था आ जाती है। उसी को राम के सखा द्वारा नाव मँगाना बोलकर लिखा गया है। उस संयम रूपी नाव पर लखन भाव रूपी लक्ष्मण समस्त इच्छा रूपी धनुषों को संभार कर रखते हैं और संयम रूपी नाव पर आत्मा रूपी राम को चढ़ाकर चलते हैं। बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।। तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार-बार पद पंकज गहेहू।। व्याख्या : उस अवस्था में सुमन्त्रणा के भाव को देखकर आत्म चेतना व्याकुल हो उठती है। क्योंकि निषेध भावों के सहज हो जाने पर सुमन्त्रणा का भाव ध्यान में आत्म चेतना के साथ आगे नहीं जा पाता है। परन्तु आत्मा का आकर्षण सुमन्त्रणा के भाव पर बना ही रहता है। उसी भावावस्था को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम धैर्य धारण करके सुमन्त्रणा के भाव से कहते हैं कि हे तात! चित रूपी पिताजी के चरण कमलों को पकड़कर मेरा बार-बार प्रणाम कहना। करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।। बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।। व्याख्या : पाँवों में पड़कर अर्थात् पूरी तरह समर्पण करके बार-बार प्रार्थना करना कि वे (चित) मेरी बिल्कुल भी चिन्ता नहीं करें अर्थात् चित को सुमन्त्रणा देना कि आत्मा के बारे में बिल्कुल भी चिन्ता नहीं करें। क्योंकि दृढ़ वैराग्य रूपी वन के रास्ते में आप (चित) की कृपा, अनुग्रह व पुण्य के प्रताप से हमारा मंगल व कुशल ही होगी। छ0 तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं।। जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी। तुलसी करहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी।। व्याख्या : चित की प्रेरणा से दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने में सब प्रकार के सुख मिलेंगे तथा चित की प्रेरणा रूपी आज्ञा का पालन करके पुन: सहज होकर वापस चित में ही आकर समा जायेंगे। इसलिए हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! आप माता रूपी वृतियों को भी अच्छी तरह से संतुष्ट कर देना। हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! तुम वो सब करना, जिससे चित व चित की वृतियाँ शान्त (कुशल) रहें। दो0 गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।151।। व्याख्या : हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! तुम बार-बार विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के चरण कमलों को पकड़कर प्रार्थना करना कि वे (विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ) भी चित रूपी राजा को वही उपदेश करें, जिससे चित कुशल रहे अर्थात् चित व चित की वृतियाँ शान्त बनी रहें। पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।। सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।। व्याख्या : हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! तुम देह के भाव व भावों से उत्पन्न समस्त भावों को मेरी विनती सुनाना कि वे ही भाव मेरे हितकारी होंगे, जो चित रूपी राजा को सुखी रखेंगे अर्थात् चित को शान्त रखने में सहायक होंगे। कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।। पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।। व्याख्या : हे सुमन्त्रणा रूपी भाव! आप भरत रूपी भावरत भाव के चित प्रदेश में आने पर यह संदेश देना कि राजपद को प्राप्त करके नीति का त्याग नहीं करे अर्थात् भावरत भाव को सलाह देना कि भावों में प्रबल होकर नीति अर्थात् सहजता का त्याग न करे। समस्त भाव रूपी प्रजा को मन, वचन व कर्म से सहजता के साथ पालन करे तथा वृति रूपी माताओं को समता का भाव रखकर पालन करें अर्थात् पूर्ण तरह से सहजता में बरतें। ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।। तात भांति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।। व्याख्या : भरत रूप भावरत भाव से कहना कि वो भाईपना अर्थात् भावों की सहजता का निर्वाह करे तथा चित रूपी पिता व नाड़ियों रूपी माताओं व सात्विक भावों रूपी सज्जनों की सेवा करे। चित रूपी राजा को वैसे ही सब प्रकार से रखें, जिससे वे मेरी चिन्ता नहीं करें। लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।। बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।। व्याख्या : सुमन्त्रणा रूपी भाव चित रूपी राजा से बोला कि हे तात! लखन भाव रूपी लक्ष्मण ने कुछ कठोर वचन कहे थे परन्तु आत्मा रूपी राम ने बार-बार शपथ दिलाकर लखन भाव की लड़कपन की बात को आपसे कहने के लिए मना किया है। वास्तविकता में ध्यान में आत्मा तो परमात्मा में लीन होने के लिए प्रयासरत हो जाती है परन्तु लखन भाव तो चित व चितवृतियों के दोष भावों को लखता रहता है। परन्तु दोष भावों का चिन्तन करने से प्रतिक्रिया स्वरूप दोष भाव ही पैदा होते हैं। इसलिए आत्मा रूपी राम लखन भाव की लड़कपन की बातों को चित रूपी राजा से कहने को मना करते हैं। दो0 कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता ने प्रणाम करके कुछ कहना चाहा पन्तु सुरता आत्मा में लीन होने के कारण शिथिल पड़ गयी अर्थात् सुरता का भाव चित व चितवृतियों की तरफ शिथिल हो गया परन्तु सुरता को चित व चितवृतियों की याद आ जाती है। उसी को सीता द्वारा कुछ बोल न पाना व आँखों में आँसू आ जाना बोलकर लिखा गया है। तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई ।। रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम की परमात्मा में मिलने की लग्न को देखकर कैवल्य रूपी केवट भाव ने संयम रूपी नाव चला दी। इस प्रकार आत्म चेतना गहरे ध्यान में प्रवेश कर गयी और मैं बज्र की छाती करके देखता रह गया। वास्तविकता में यह होता है कि जब ध्यान में निषेध भावों का बन्धन टूट जाता है और साधक सहज हो जाता है तो सुमन्त्रणा का भाव आत्म चेतना के साथ आगे नहीं जा पाता है क्योंकि सहजता आ जाने पर साधक को सुमन्त्रणा के भाव की जरूरत ही नहीं रह जाती है। ऐसी अवस्था में सुमन्त्रणा का भाव चित व चित वृतियों के पास वापस आ जाता है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर सुमन्त का अयोध्या वापस लौटना बोलकर लिखा गया है। मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।। अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।। व्याख्या : हे चित रूपी राजा! मैं (सुमन्त्रणा का भाव) मेरे दु:ख का वर्णन कैसे करूँ कि बिना आत्मा रूपी राम के जीवित अवध रूपी शरीर में लौटकर आ गया हूँ। ऐसा बोलते-बोलते सुमन्त्रणा का भाव हानि व लाभ के सोच में पड़ गया और बोली बन्द हो गयी। सूत बचन सुनतहिं नर नाहू। परेउ धरनि उर दारून दाहू।। तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।। व्याख्या : सुमंत्रणा रूपी भाव के वचन सुनते ही चित रूपी राजा निस्तेज हो गया और आत्मा के मोह से व्याकुल होकर तड़पने लगा, मानों पहली बरसात के पानी के लग जाने पर मछली तड़प रही हो, ऐसा हो गया। करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपती किमि जाइ बखानी।। सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।। व्याख्या : जब चित निस्तेज हो जाता है तो वृति रूपी रानियाँ विलाप करने लगती हैं। उस समय की भाव अवस्था की वेदना का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था में तो दु:ख के भावों को भी दु:ख लगने लग जाता है तथा धैर्य के भावों का धैर्य भी भाग खड़ा होता है। वास्तव में ध्यान में जब आत्मा, सुरता व लखन भाव जब परमात्मा में लीन होने लगते हैं, तो चित व चित की नाड़ियाँ व्याकुल हो उठते हैं और ऐसी अवस्था में कभी-कभी भय व दु:ख के भाव प्रबल होकर साधक को हिला देते हैं। उसी भावावस्था की सूक्ष्मता को यहाँ लिखा गया है। दो0 भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरू। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरू।।153।। व्याख्या : चित रूपी राजा व वृति रूपी रानियों की व्याकुलता से अवध रूपी शरीर में कोलाहल मच गया, मानो इच्छा रूपी पक्षियों के भोग रूप वन में वासना रूपी रात्रि में बज्र पड़ गया हो। प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।। इन्द्री सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।। व्याख्या : उस अवस्था में चित पूरी तरह निस्तेज सा हो जाता है, उसी को प्राणों का कण्ठ में आना बोलकर लिखा है। उस समय चित रूपी राजा की अवस्था ऐसी हो जाती है, जैसे मणि के बिना सर्प व्याकुल हो जाता है। उस समय इन्द्रिय भाव भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे तालाब में कमल पानी कम होने पर मुरझाने लग जाता है, वैसे ही आत्म चेतना परमात्मा में लग जाने पर इन्द्रियों के भाव भी मुरझाने लग जाते हैं। कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।। उर धरि धीर राम महतारी। बोलि बचन समय अनुसारी।। व्याख्या : उस अवस्था में सुष्मना रूपी कौशल्या नाड़ी ने चित रूपी राजा को निस्तेज देखा, तो समझ गयी कि अब भावों को पैदा करने वाले चित रूपी सूर्य अस्ताचल को जाना चाह रहे हैं। अर्थात् सुष्मना नाड़ी को आभास होने लग गया कि अब चित स्थूल भाव से निकलकर सूक्ष्म अवस्था में प्रवेश करना चाहते हैं। इसलिए सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या रूपी माता ने हृदय में धैर्य धारण करके समय के अनुसार वचन बोली। नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।। करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी और चित के बीच ध्यान की गहरी अवस्था में वार्तालाप होने लगता है। उसी वार्तालाप को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। इसलिए सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या बोली कि हे नाथ! मन में विचार कीजिए क्योंकि आत्म वियोग रूपी अपार समुद्र है और तुम (चित) ही इस वियोग रूपी समुद्र को पार करने के लिए कर्णधार हो और यह शरीर रूपी अवध ही जहाज है तथा समस्त भाव रूपी यात्री उस पर चढ़ने वाले पथिक हैं। धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।। जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।। व्याख्या : अगर आप (चित) धैर्य धारण करेंगे तो समस्त भाव परिवार बच जायेगा, वरना सभी डूब जायेंगे अर्थात् समस्त भाव शांत हो जायेंगे। हे नाथ! अगर आप धैर्य धारण करेंगे, तो आत्मा, सुरता व लखन भाव पुन: आकर मिल जायेंगे। अर्थात् ध्यान से बाहर आने पर सभी का सहज अवस्था में फिर मिलन हो जायेगा। दो0 प्रिया बचन मृदु सुनत नृप चितयउ आँखि उघारि। तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के मधुर व प्रिय वचनों को सुनकर चित रूपी राजा ने आँखें खोलकर देखा और उस समय चित की अवस्था ऐसी हो रही थी जैसे तड़पती हुई मछली को मानो ठण्डे जल के छींटे पड़ गए हों। अर्थात् सुष्मना नाड़ी से चित को थोड़ा ढाँढ़स मिला। धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।। कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।। व्याख्या : तब चित रूपी राजा धैर्य धारण करके उठकर बैठ गया अर्थात् चित में थोड़ी चेतना आयी। चेतना आते ही चित ने सुमन्त्रणा के भाव से कहा कि आत्मा रूपी राम कृपालु कहाँ हैं? आत्मा का प्रिय लखन भाव कहाँ है? तथा आत्मा की प्रिया सुरता कहाँ पर है? बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।। तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।। व्याख्या : चित उस अवस्था में नाना प्रकार से व्याकुल हो उठता है और अज्ञान रूपी रात्रि युगों के समान बीतने लगती हैं। उसी अवस्था में तापस अंध अर्थात् वासना से युक्त तप की याद आ गयी अर्थात् जब मन में कोई वासना रहती है तो उसका क्या फल होता है, उसकी याद आ गयी। वह सब अवस्था चित रूपी राजा ने सुष्मना रूपी कौशल्या को बतायी अर्थात् सुष्मना नाड़ी को भी वासनायुक्त तप के प्रभाव को आभासित कराया। भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।। सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा।। व्याख्या : वासना की लालसा से किए गए तप के इतिहास का वर्णन करते हुए चित रूपी राजा व्याकुल हो गए तथा मन में विचार करने लगे कि बिना आत्मा के स्थूल शरीर को आभासित करना ही धिक्कार है। इसलिए इस स्थूल शरीर को रखने का क्या लाभ है, जिसने आत्मा के प्रति निश्छल प्रेम का निर्वाह ही नहीं किया है। ध्यान की अवस्था में साधक की ऐसी अवस्था आती है, जिसमें उसका चित कहने लगता है कि जब आत्मा परमात्मा में लीन हो गयी है, तो फिर अब स्थूल शरीर को रखने का लाभ ही क्या है? ऐसे विचार साधना के दौरान साधक को आते ही रहते हैं। उसी भावावस्था को यहाँ बहुत सूक्ष्मता के साथ लिखा गया है। हा रघुनंदन प्रान पिरीतै। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।। व्याख्या : उस अवस्था में चित आत्मा को पुकारने लगता है कि हे जीव को आनन्द देने वाले आत्मा रूपी राम! तुम कहाँ पर हो। तुम्हारे बिना बहुत दिन बीत गए हैं। हे प्राण से उत्पन्न सुरता, लखन व जीव स्वरूप आत्मा! तुम कहाँ पर हो। हे चित रूपी चातक का हित करने वाले मेघ समान आत्मा तुम कहाँ हो? अर्थात् चित आत्मा के विरह में तड़प उठता है। दो0 राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।। व्याख्या : ध्यान की उस गम्भीर अवस्था में जब आत्म चेतना व सुरता चित्रकोष में लग जाती है, तो चित भी स्थूल भाव का त्याग करके सूक्ष्म भाव में आ जाता है। क्योंकि बिना आत्म चेतना के सुरता के चित में भावों की तरंगे उठना ही बन्द हो जाती है। उस अवस्था में चित रूपी राजा आत्मा, लखन भाव व सुरता भाव को स्मरण करते करते एकदम शिथिल हो जाता है। उसी भाव अवस्था को चित रूपी राजा द्वारा राम राम पुन: राम और पुन: राम राम कहकर पुन: राम कहते हुए माया के भावों का हरण करते हुए स्थूल भाव का त्याग करना कहा गया है। उसी अवस्था को दसरथ राजा के मरने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब चित पूरी तरह शिथिल हो जाता है, तो स्वरों का चलना भी बन्द हो जाता है। उसी मूल अवस्था में सुरधाम (अर्थात् जहाँ से स्वर पैदा होते हैं) कहा जाता है। जिअन मरन फलन दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।। जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।। व्याख्या : आत्मा में लीन चित रूपी राजा ने ही जन्म व मरण का लाभ उठाया है अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर रहने पर ही भोगों के त्याग का आनन्द मिल पाता है। क्योंकि आत्मोन्मुखी रहने पर निर्मलता बनी रहती है और चारों तरफ यश फैल जाता है। क्योंकि आत्मोन्मुखी रहने पर भोगों का बन्धन भी नहीं व्यापता और त्याग करने पर आसक्ति का दु:ख भी नहीं होता है। उसी को जीवित आनन्द लेना व मरने पर आत्मोन्मुखी होना बोलकर लिखा है। सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी।। करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहिं भूमितल बारहिं बारा।। व्याख्या : चित के शिथिल हो जाने पर वृतियाँ रूपी रानियों में व्याकुलता छा जाती है और रानियाँ रूपी वृतियाँ चित के रूप, बल व शील का बखान करके विलाप करने लगती हैं अर्थात् वृतियों में चित के प्रति आकर्षण बना रहता है, जो वृतियों को व्याकुल कर देता है। उस अवस्था में वृतियाँ बार-बार व्याकुल होने लगती हैं और फिर बार-बार शिथिल होकर शरीर रूपी पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। ध्यान की अवस्था में ही यह समझ आता है कि वृतियाँ सहज में ही शान्त नहीं हो पाती हैं। वृतियों की छटपटाहट को ही रानियों का विलाप करना बोलकर लिखा गया है। बिलपहिं बिकल दास अ डिग्री दासी। घर घर रूदनु करहिं पुरबासी।। अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।। व्याख्या : उस अवस्था में दास अ डिग्री दासी अर्थात् कुछ आसक्ति के भाव व इच्छाएँ भी व्याकुल हो उठते हैं और देह के प्रत्येक कोष में भाव आपस में विलाप करने लग जाते हैं। उस अवस्था में भावों व वृतियों को समझ में आ जाता है कि भावों व वृतियों को पैदा करने वाला चित रूपी सूर्य अब अस्त हो गया है। चित रूपी सूर्य ही धारणा की सीमा व गुणों का आधार होती है। गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।। एहि बिधि बिलपत रैनी बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।। व्याख्या : उस अवस्था में समस्त देह भाव रजोवृति रूपी कैकयी को गाली देने लगते हैं कि अचानक समस्त देह भावों को वासनाहीन करने की हठधर्मिता के कारण ही यह अवस्था आयी है। वास्तविकता में यह होता है कि रजोगुण में जब अचानक त्याग का भाव आ जाता है तो आत्मा, लखन व सुरता भाव में परमात्मा से मिलने की लग्न लग जाती है परन्तु देह भावों की कुछ वासनाएँ बच जाती हैं। इसलिए देह के भाव व्याकुल होकर रजोवृति रूपी कैकयी को गाली देने लगते हैं। इस प्रकार रोते-बिलखते वासना रूपी रात्रि कट गयी और फिर महाज्ञान के भाव रूपी मुनि आए अर्थात् वासना रूपी रात्रि मिट जाने के बाद मन में ज्ञान के भावों का उदय हुआ। उसी को महामुनि ज्ञानियों का आना बोलकर लिखा है। दो0 तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।। व्याख्या : उस अवस्था में देह भावों को समझाने के लिए विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ मुनि का आगमन हुआ और उन्होंने नाना प्रकार से देह के भावों को समझाकर शोक को दूर किया और ज्ञान का प्रकाश किया अर्थात् वासनाओं के भावों को शान्त कराया। तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।। धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ ने चित रूपी राजा के शरीर को तेल की नाव में रखवा दिया अर्थात् चित शिथिल होने पर ध्यान से निकलने वाले हार्मोन्स (रसायनों) में डूब गया, जिससे देह का आभास पूरी तरह मिट गया। अर्थात् उस अवस्था में चित को देह भावों व देह का एकदम आभास नहीं रहा। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी रूपी ने भरत रूपी भावरत भाव को बुलाने के लिए विशेष दूत भेजे। वास्तविकता में यह होता है जब ध्यान में चित भी पूरी तरह शिथिल हो जाता है, तो उदर रूपी ननिहाल से भावरत रूपी भरत भाव को बुलाने के लिए विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने प्रेरणा रूपी दूत भेजे। उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु प्रेरणा करके भावरत रूप भरत भाव को भावों का संचालक बनने के लिए बुलावा भेजते हैं। ध्यान की उस अवस्था में भावों का यह वार्तालाप बहुत ही सूक्ष्म तरीके से होता है। इसकी अनुभूति साधक स्वयं ही कर सकता है। उस समय विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु प्रेरणा रूपी दूतों को समझाते हुए कहते हैं कि चित रूपी राजा की शिथिलता की खबर किसी भी भाव को मत बताना वरना भावों में भी शिथिलता आ जायेगी। एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई।। सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।। व्याख्या : केवल भावरत रूपी भावरत भाव से इतना ही कहना कि दोनों भाईयों को गुरु ने बुलाया है। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव की आज्ञा पाकर प्रेरणा रूपी दूत घोड़ों को भी लजाते हुए अर्थात् मन की तरंगों से भी तेज दौड़ते हुए चले। अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।। देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।। व्याख्या : जब से अवधी रूपी शरीर में अनर्थ होने लगा अर्थात् वासनाओं का नाश होने लगा तब ही से भावरत भाव को अपशकुन होने लगे अर्थात् वासनाओं के त्याग की भावना प्रबल होने लगी। सांसारिक दृष्टि से वासनाओं की अपूर्ति होना ही अपशकुन माना जाता है इसलिए भावरत भाव के अपशकुन के प्रतीक रूप में ही लिखा गया है। वासना रूपी रात्रि में भावरत रूपी भरत ने भयानक सपना देखा जिसके कारण नींद खुल गयी और नाना प्रकार की कल्पना भावरत भाव के मन में आने लगी। बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।। मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।। व्याख्या : भरत भाव विशुद्ध प्रकाश के भावों को प्रबल करके नाना प्रकार की वासनाओं का त्याग करने लगा और कल्याणकारी भावना नाना प्रकार से पैदा करने लगा। तथा महाऐश्वर्य के भाव को मनाकर नाना प्रकार से चित व चित वृतियों की व भाव रूपी भाईयों की कुशलक्षेम की कामना करने लगा। दो0 एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ। गुर अनुसासन श्रवण सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।। व्याख्या : जब भरत रूपी भाव ऐसे मन में सोच ही रहा था, तो इतने में प्रेरणा रूपी दूत आ पहुँचे। तब भरत रूपी भाव ने विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की आज्ञा सुनकर अर्थात् प्रेरणा का आभास कर तुरन्त गुणों के ईश्वर को (गणेश) मनाकर तुरन्त चित रूपी प्रदेश के लिए चल दिए। चले समीर बेग हय हाँके। लाघत सरित सैल बन बाँके।। हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।। व्याख्या : भरत रूपी भाव ने अपने मन रूपी घोड़ों को हवा की गति से चलाया और विकट भोग रूपी नदियों, आसक्ति रूपी पर्वतों व मोह रूपी टेढ़े वनों को लाँघते हुए चले। भरत रूपी भाव के हृदय में बड़ी चिन्ता हो रही थी और मन में ऐसा लग रहा था कि उड़कर पहुँच जाउँ। एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।। असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।। व्याख्या : उस समय भरत भाव को एक-एक क्षण वर्षों के समान लग रहा था। इस प्रकार चिन्ता करते हुए भरत रूपी भावरत भाव चित प्रदेश रूपी नगर के पास पहुँचा। चित प्रदेश रूपी नगर में प्रवेश करते ही अपशकुन होने लगे अर्थात् वासना व लालसाएँ उजड़ती हुई सी दिखने लगी और अतृप्त भोग रूपी कौए बुरी तरह काँव-काँव करने लगे। अर्थात् चित के पूरी तरह शिथिल हो जाने से इच्छाओं रूपी उपवन उजड़ गए और भोग भाव रूपी कौए दु:खी होकर काँव-काँव करने लगे। खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।। श्रीहत सर सरिता बन बागा। नग डिग्री बिसेषि भयावनु लागा।। व्याख्या : अज्ञान व धूर्तता रूपी गधे व सियार प्रतिकूल बोलने लगे, जिन्हें सुन-सुनकर भरत रूपी भाव को कष्ट होने लगा। समस्त इच्छाओं रूपी तालाब, नदियाँ, वन व उपवन श्रीहीन लग रहे थे अर्थात् इच्छा व लालसाएँ उजड़ सी गयी और चित प्रदेश रूपी नगर भयंकर लगने लगा। खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।। नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वियोग रूपी रोग से ग्रस्त इच्छा रूपी पक्षी व मृग व मन के भाव रूपी घोड़े व हाथियों को देखा नहीं जाता है अर्थात् सभी भाव दु:ख से दु:खी हो गए। देह रूपी नगर की नर व नाड़ियाँ भी चित के शिथिल हो जाने से बहुत दु:खी हो गयी। ऐसा लग रहा था, उस समय कि सभी भावों ने मानों सब सम्पत्ति को खो दिया हो। दो0 पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गँवहि जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।। व्याख्या : जब भरत रूपी भावरत भाव उदर प्रदेश रूपी ननिहाल से चितप्रदेश रूपी अयोध्या में प्रवेश करता है, तो भाव रूपी परिजन केवल नमस्कार करके रह जाते हैं परन्तु संकोचवश कुछ कह नहीं पाते हैं। दूसरी तरफ, भय और विषाद के कारण भरत रूपी भाव भी कुशलक्षेम नहीं पूछ पाते हैं। वास्तविकता में जब ध्यान में चित शिथिल हो जाता है तो सांसारिक देह भावों में भय और विषाद छा जाता है कि अब हमारा क्या होगा? उसी भाव अवस्था को यहाँ लिखा गया है। हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु परु दहँ दिसि लागि दवारी।। आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरूह चंदिनि।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में हाट-बाट अर्थात् शरीर के चक्र स्थान व नाड़ियों रूपी राहों में भी उदासीनता छा जाती है। उसी को हाट-बाट को नहीं देख पाना बोलकर लिखा है। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे भावों रूपी नगर में चारों तरफ ज्ञान रूपी आग लग गयी हो। भरत रूपी त्याग भाव रूपी पुत्र को आता देखकर पिंगला नाड़ी रूपी कैकयी हर्षित हो उठी अर्थात् त्याग भाव के चित प्रदेश में आने पर कैकयी रूपी सूर्य नाड़ी प्रबल होकर प्रवाहित होने लगी। सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।। भरत दुखित परिवा डिग्री निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।। व्याख्या : जब भावरत रूपी भरत भाव चित प्रदेश में आता है अर्थात् अनाहत चक्र में आता है, तो सूर्य नाड़ी रूपी कैकयी प्रबल हो उठती है। उसी को प्रसन्न होकर आरती लेने को दौड़ना कहा गया है। उस अवस्था में सूर्य नाड़ी रूपी कैकयी द्वार पर ही भरत रूपी भाव के भवन में ले आती है। परन्तु भरत रूपी भावरत भाव तो भावरूपी परिवार को देखकर दु:खी हो जाता है मानो कमल के वन को पाला मार गया हो। कैकई हरषित एहि भाँती। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।। सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।। व्याख्या : सूर्य नाड़ी रूपी कैकयी उसी प्रकार प्रसन्न हो रही है, मानो भीलनि जंगल में आग लगाकर प्रसन्न हो रही हो। अर्थात् भाव रूपी जंगल में आग लगाकर सूर्य नाड़ी रूपी कैकयी भावरत रूपी भरत के आगमन को देखकर प्रसन्न होने लगती है। परन्तु भरत रूपी पुत्र को चिन्तामगन देखकर पूछती है कि उदर रूपी ननिहाल में सब कुशल हैं तो। अर्थात् सूर्य नाड़ी रूपी कैकयी उदर रूपी ननिहाल की भावावस्था का कुशलक्षेम पूछती हैं। सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।। कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।। व्याख्या : तब भावरत रूपी भाव ने सब कुशल क्षेम बताया तथा फिर अपने कुल अर्थात् चितप्रदेश की कुशलक्षेम पूछा और कहा कि सभी नाड़ियों रूपी माताएँ कहाँ हैं और सुरता रूपी सीता, आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी प्रिय भाई कहाँ हैं? दो0 सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।। व्याख्या : भावरत का भाव जब आत्मोन्मुखी हो जाता है, तब वही अवस्था भाव रत अर्थात् भरत की कहलाती है, अत: भरत का तात्पर्य भाव रत अवस्था से भी होता है। इसलिए भावरत अवस्था रूपी भरत के प्रेममय वचनों को सुनकर सूर्य नाड़ी रूपी कैकयी के आँखों में कपट के आँसू आ गए अर्थात् भावरत अवस्था को देखकर सूर्य नाड़ी में विशेष रसायन का स्राव होने लग गया। इस अवस्था को ध्यान की अवस्था में ही समझा जा सकता है। तब वह कपट रूपी रसायन भाव रत रूपी भरत के कानों में काँटे के समान लगता है। अत: उसी को कैकयी द्वारा शूल के समान कटू बचन बोलना बताया गया है। तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।। कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।। व्याख्या : हे तात! मैंने सब बात बना ली थी और मन के मंथन भाव रूपी मंथरा ने मेरी सहायता भी की अर्थात् मन के विचारों के मंथन से कैकयी रूपी रजोवृति ने भरत रूपी भावरत भाव को सब भावों का राजा बनवा लिया परन्तु ध्यान की क्रिया (विधि) ने सब बात बिगाड़ दी और चित रूपी राजा सुरपति अर्थात् अपनी मूल अवस्था में चला गया, जिससे भावों का प्रवाह ही रूक गया। अर्थात् ध्यान की क्रिया से चित एकदम शिथिल हो गया। सुनत भरतु गए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।। तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।। व्याख्या : भरत रूपी भावरत भाव रजोवृति रूपी कैकयी की बातें सुनकर भयंकर विषाद में पड़ गया जैसे हाथी सिंह की दहाड़ सुनकर सहम जाता है। तात, तात कहते हुए चित रूपी राजा को पुकारते हुए भावरत रूपी भरत धरती पर गिर पड़ा अर्थात् भरत भाव व्याकुल होकर चित प्रदेश रूपी धरती पर गिर गया। चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।। बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।। व्याख्या : हे चित रूपी तात! मैं आपको चलता हुआ देख नहीं पाया अर्थात् आप मूल अवस्था में चले गए और मैं उसको देख नहीं पाया। आपने मुझे आत्मा रूपी राम को भी नहीं सौंपा। वास्तविकता यह होती है कि जब चित अपनी मूल अवस्था में चला जाता है, तो भावों की तरंगें भी शिथिल हो जाती हैं और तरंगों के अभाव में भावों का आत्मोनमुखी होना भी कठिन हो जाता है। इसलिए भरत रूपी भाव कहता है कि आपने मुझे आत्मोन्मुखी भी नहीं किया (राम को नहीं सौंपा) और आप शिथिल हो गए। फिर त्याग भाव रूपी भरत धैर्य धारण करके उठा और रजोवृति रूपी कैकयी से चित की शिथिलता का कारण पूछा। सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।। आदिहु ते सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।। व्याख्या : भरत भाव रूपी भावरत के वचन सुनकर कैकयी ऐसे बोली मानो मर्म स्थान को चीरकर जहर भर रही हो। तब कैकयी रूपी रजोवृति ने प्रारम्भ से लेकर अन्त तक की ध्यान क्रिया की सब बातें कुटिल व कठोर मन से प्रसन्न होते हुए बतायी। यहाँ पर भावों के आपसी संवाद को बहुत सूक्ष्मता के साथ समझने की आवश्यकता है। क्योंकि सांसारिक भावों के लिए यह अवस्था भयंकर दु:ख की होती है, तो दूसरी तरफ आत्मोन्मुखी भाव भी इस अवस्था में बिना राम के दु:खी हो जाते हैं। इसलिए अवधी रूपी देह के भावों के लिए यह ध्यान अवस्था दु:ख देने वाली लगती है। यह बहुत ही सूक्ष्मता के साथ ध्यान में समझ आ पाता है। दो0 भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकति रहे धरि मौनु।।160।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाना सुनकर भरत रूपी भावरत भाव चित रूपी पिता के मरण को भूल गया और अपने आपको इसका मूलजानकर भावरत भाव मौन हो गया। बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।। तात राउ नहिं सोचै जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।। व्याख्या : भावरत भाव रूपी भरत को व्याकुल देखकर रजोवृति रूपी कैकयी समझाने लगी मानो जले हुए पर नमक छिड़क रही हो। रजोवृति कहने लगी कि चित रूपी राजा सोच करने लायक नहीं है क्योंकि सुकृत्य और यश दोनों का बहुत भोग किया है। जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।। अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने समस्त फलों को प्राप्त किया है अर्थात् समस्त भावों के भोग का रसास्वादन किया है और अन्तकाल में इन्द्रोलक को चले गए अर्थात चित अपनी मूल अवस्था में चला गया। अत: ऐसा विचारकर चिन्ता का त्याग कर दो और समस्त भाव रूपी समाज सहित देह रूपी नगर पर राज करो। सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।। धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापिनी सबहि भाँति कुल नासा।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी की यह वाणी सुनकर भरत भाव रूपी राजकुमार सहम गया मानों पके हुए घाव पर अँगारा लग गया हो। परन्तु फिर भी धैर्य धारण करके और लम्बा श्वास लेकर भरत रूपी भावरत भाव बोला कि चिंताओं को पैदा करने वाली रजोवृति रूपी पापिनी! तुमने चित से उत्पन्न भाव रूपी कुल का नाश कर दिया है। अर्थात् समस्त भावों के प्रवाह को रोक दिया है। जौं पै कुरूचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।। पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।। व्याख्या : अगर तुम्हारी इतनी ही कुरूचि भी अर्थात् भावों से विपरीतता थी तो मुझे (भावरत भाव) पैदा होते ही क्यों नहीं मार दिया? तुमने तो पेड़ को काटकर पत्ते को सींचा है और जल को उलीच कर मछली को जिन्दा रखने का प्रयास किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब चित शिथिल होकर मूल अवस्था में चला गया है और आत्मा सुरता व लखन भाव दृढ़ वैराग्य रूपी वन में स्थिर हो गए हैं, तो बाकी भाव कैसे जीवित रह सकते हैं। दो0 हंसबंसु दसरुथ जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।। व्याख्या : ध्यान की क्रिया के कारण दसरथ अर्थात् इन्द्रियों का मूल चित, प्राण (जनक), आत्मा व लखन भाव हंसबंसु अर्थात् हकार सकार की गति में समा गए हैं। परन्तु हे रजोवृति रूपी माता! तू तो जननी है अर्थात् भावरत भाव को पैदा करने वाली है, इसलिए तेरे सामने वश नहीं चलता है। अर्थात् भावरत भाव रूपी भरत न तो आत्मोन्मुखी हो पा रहा है और न ही देह भावों में ही रमण कर पा रहा है। जब तै कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदय न गयऊ।। बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुँह परेउ न कीरा।। व्याख्या : जब कुमत का भाव हृदय में उठा तो हे कुमति! तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हो गए? अर्थात् रजोवृति के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हुए। वरदान माँगते समय मन में पीड़ा क्यों नहीं हुई और जीभ क्यों नहीं गली तथा मुँह में कीड़े क्यों नहीं पड़े? अर्थात् जब आत्मा रूपी राम को दृढ़ वैराग्य रूपी वन माँगा तो कष्ट क्यों नहीं हुआ? भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।। बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने तुम पर (रोजवृति पर) कैसे विश्वास कर लिया? मृत्यु के समय अर्थात् ध्यान की विधि से बुद्धि का हरण हो गया, इसलिए तुम पर प्रीत कर ली। बुद्धि की उत्पत्ति भावों के आपसी द्वन्द्व से होती है और ध्यान की क्रिया द्वारा (विधि) भाव शान्त हो जाते हैं। अत: उसी को बुद्धि का हरण कहा गया है। ध्यान की क्रिया से भी हृदय स्थित नाड़ी की गति का पता नहीं चलता है। क्योंकि नाड़ी की गति से ही समस्त कपट व चिन्ता के भाव पैदा होते हैं। इसलिए नारी (नाड़ी) को ही समस्त अवगुणों की खान बताया गया है। सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जाने तीय सुभाऊ।। अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।। व्याख्या : चित रूपी राजा तो सरल, सुशील व धर्मरत होता है, अत: वो कैसे तीनों नाड़ियों (सुष्मना, ईड़ा व पिंगला) से उत्पन्न माया के भावों को जान सकता है। ऐसा कौन-सा जगत में जीव जन्तु है, जिसे अपनी आत्मा प्रिय नहीं होती है। भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।। जो हसि सो हसि मुँह मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहि जाई।। व्याख्या : परन्तु तुम तो आत्मा रूपी राम के भी विरूद्ध हो गयी हो। आप सत्य बताओ, कौन हो? अब तुम जो भी हो परन्तु अब मुँह पर कालिख लगा कर मेरी आँखों के सामने से हट जाओ। अर्थात् वासना रूपी कालिख को लगाकर मेरे सामने से हट जाओ। दो0 राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मो समान को पातकी बादि कहुँ कछु तोही।।162।। व्याख्या : भरत रूपी भावरत भाव कहता है कि ध्यान की क्रिया (विधि) के कारण मेरी उत्पत्ति रजोवृति रूपी कैकयी से हुई है, जो आत्मा की विरोधी होती है। इसलिए मैं व्यर्थ में तुमको दोष दे रहा हूँ क्योंकि मेरे समान पातकी कौन है? अर्थात् त्याग भाव के बराबर और कोई दूसरा भाव नहीं होता जो भावों को, आत्मा को व चित को कष्ट देता हो। सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।। तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।। व्याख्या : रजोवृति रूपी माता की कुटिलतापूर्ण बातें सुनकर शत्रुघन को बहुत क्रोध आया और गुस्से में अंग जलने लगे। उसी अवस्था में भावों के मंथन से कुबुद्धि रूपी कुबरी वासना रूपी आभूषण पहने आ जाती है। अर्थात् वासनायुक्त कुबुद्धि का भाव प्रकट हो जाता है। लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।। हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।। व्याख्या : तब कामादि भावों को लखने वाला लखन का छोटा भाई शत्रुघन कुबुद्धि के भाव को पहचान गया, जिसने शत्रुघन के गुस्से में अग्नि में घी पड़ने जैसा काम किया। शत्रुघन भाव ने कुबुद्धि रूपी कुबरी मंथरा को देखकर दमन रूपी लात मारी, जिससे कुबरी रूपी मंथरा मुँह के बल चिल्लाती हुई जमीन पर गिर गयी। अर्थात् कुबुद्धि के भाव का दमन हो गया। कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रूधिर प्रचारू।। आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।। व्याख्या : शत्रुघन रूपी भाव के दमन रूपी प्रहार से कुबुद्धि रूपी कूबरी भाव का कूबड़ टूट गया और कपाल फूट गया अर्थात् कुबुद्धि के भाव का दमन हो गया और वासना रूपी दाँत टूट गए और आसक्ति रूपी खून बहने लग गया। तब कुबुद्धि रूपी कूबड़ी ने कहा कि हे देव! मैंने क्या बिगाड़ा है, जो भला करते हुए भी बुरा फल मिला है। कूबड़ी रूपी कुबुद्धि के भाव को तो विषय भोग अच्छे लगते हैं, इसलिए उसी को अच्छा करना बताया गया है। सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।। भरत दयानीधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गए दोउ भाई।। व्याख्या : रिपुदमन रूपी भाव ने कुबुद्धि रूपी कूबड़ी को नखों से शिखा तक जानकर चोटी पकड़कर अर्थात् वासना रूपी मूल को पकड़कर घसीटने लगा। ध्यान की अवस्था में जब रिपुदमन का भाव कुबुद्धि को जान लेता है, तो उसे जड़ सहित नष्ट करना चाहता है। उसी को चोटी पकड़कर घसीटना बोलकर लिखा है। तब भावरत रूपी भरत भाव को दया आ गयी, इसलिए कुबुद्धि को छुड़वा दिया और अब दोनों भाई सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के पास चले। अर्थात् भावरत रूपी भरत व रिपुदमन रूपी भाव सूर्य नाड़ी से अब सुष्मना नाड़ी में प्रवेश कर गए। उसी अवस्था को भरत-शत्रुघन को कौशल्या के पास जाना कहा गया है। दो0 मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या मलिन वस्त्रों को धारण किए हुए हैं अर्थात् वासनाओं की धूल सुष्मना नाड़ी पे छाई हुई है। उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी का रंग भी उड़ा हुआ सा लगने लगता है और सुष्मन नाड़ी कृश तन अर्थात् मुरझाई हुई सी लगती है। उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी ऐसे दिखती है, मानों स्वर्ण की कल्पना लता को पाला मार गया हो। भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरूछित अवनि परी झइँ आई।। देखत भरत बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।। व्याख्या : भावरत भाव को आया देखकर सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या उठकर दौड़ पड़ी परन्तु धरती पर चक्कर खाकर गिर पड़ी। अर्थात् भावरत भाव के आने पर सुष्मना नाड़ी में कम्पन हो उठा परन्तु फिर शान्त हो गया। भावरत भाव सुष्मना नाड़ी की यह दशा देखकर बहुत व्याकुल हो गया और सुष्मना नाड़ी में पूरी तरह समर्पण कर दिया अर्थात् भावरत भाव सुष्मना नाड़ी में स्थिर होने लगा। उसी अवस्था को चरणों में गिरना बोलकर लिखा है। मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।। कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।। व्याख्या : हे माता! चित रूपी पिताजी कहाँ पर हैं? सुरता, आत्मा, व लखन भाव कहाँ पर है? वास्तविकता में यह होता है कि जब ध्यान चित्रकोष में स्थिर हो जाता है तो चित पूरी तरह शिथिल हो जाता है और भावरत आदि भाव भी आत्मा व चित को देखने के लिए व्याकुल हो उठते हैं। इस समय इसलिए ही भावरत भाव सुष्मना नाड़ी के माध्यम से चित व आत्मा के बारे में जानना चाहता है। तब रजोवृति पर भावरत भाव को गुस्सा आ जाता है, इसलिए भावरत रूपी भरत कहता है कि रजोवृति रूपी कैकयी का संसार में क्यों आभास होता है और अगर आभास होता भी है, तो ये भावों को क्यों पैदा करती है? कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।। को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।। व्याख्या : जिस रजोवृति रूपी कैकयी ने मुझ भावरत भाव को चित के भाव रूपी कुल में भावरत रूप कलंक के रूप में पैदा किया है और वासनाओं व प्रियजन भावों का द्रोही बनाया है। मेरे समान तीनों गुणों के भावों में अभागी अर्थात् अ भागी यानी किसी भी भाव से मेरी कोई आसक्ति नहीं है, जिसके कारण ही सुष्मना रूपी माता तुम्हारी आज यह गति हुई है। सुष्मना नाड़ी भी निरासक्ति की अवस्था में ही खुलती है। पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू।। धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।। व्याख्या : चित रूपी पिता सुरपुर में हैं अर्थात अपनी मूल अवस्था में हैं और वैराग्य रूपी वन में आत्मा रूपी राम हैं। मैं (भावरत) ही इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मेरा जीवन धिक्कार है क्योंकि मैं वासना रूपी बाँस के वन से आग बनकर प्रकट हुआ हूँ और दु:खों व दोषों का भागी बना हूँ। वास्तव में जब साधना में त्याग का भाव प्रबल होने लगता है, तब वासनाओं व भोगों को त्यागने में बहुत कष्ट होने लगात है। पूर्ण परिपक्व अवस्था में ही त्याग की सुखद अनुभूति होती है, वरना बीच में तो बहुत कष्ट का कारण बन जाता है। उसी भाव अवस्था को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। दो0 मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।। व्याख्या : तब सुष्मना रूपी कौशल्या माता भावरत रूपी भरत के मधुर वचनों को सुनकर अपने आपको सँभालकर उठी और आँखों से आँसू पोछते हुए भावरत भाव को अपने हृदय से लगा लिया। सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।। भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।। व्याख्या : सुष्मना रूपी कौशल्या माता ने सरल स्वभाव से भावरत भाव को गले लगा लिया, मानो आत्म चेतना ही फिर लौटकर आ गयी हो। कामादि भावों को दमन करने वाला रिपुदमन भाव भी बहुत प्रकार से सुष्मना रूपी कौशल्या माता से मिला। उस अवस्था में स्नेह और शोक के भाव हृदय में नहीं समा पाते हैं। देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।। माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पोंछि मृदु बचन उचारे।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के स्वभाव को देखकर सभी भाव कहने लगे कि ऐसा क्यों नहीं होगी, वे तो आत्मा रूपी राम की माता जो हैं। तब भावरत भाव को सुष्मना रूपी माता ने अपनी गोदी में बैठाया अर्थात् भावरत भाव सुष्मना नाड़ी में स्थिर हो गया, तब माता ने आँसू पोछ कर मधुर वचन कहे। अर्थात् सुष्मना नाड़ी से भावरत व रिपुदमन भावों को ऊर्जा मिलने लगी। अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।। जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या बोली कि हे वत्स! अब धैर्य धारण करो और कुसमय अर्थात् वासनाओं के प्रभाव वाला समय जानकर शोक को छोड़ दो। मन में किसी भी प्रकार की हानि की ग्लानि मत करो और काल व कर्म की गति को अमिट जानो। काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।। जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।। व्याख्या : किसी भी भाव को दोष मत लगाओ। मुझे आज सब प्रकार से विधाता अर्थात् विधि को करने वाला विपरीत हो गया है, जिसके कारण इतने भाव द्वन्द्व की अवस्था में भी मैं जीवित हूँ। अब कौन जाने उसे क्या चाहिये? अर्थात् क्रियाकर्ता (विधाता) साधक से क्या चाहता है? अब कौन जाने। दो0 पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर।।165।। व्याख्या : चित रूपी पिता की प्रेरणा से आत्मा रूपी राम ने भोग व भोग वासनाओं का त्याग कर दिया और उसे उनका त्याग करते हुए हर्ष व शोक कुछ नहीं हुआ तथा उसने सहजता रूपी वस्त्रों को धारण कर लिया। मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।। चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।। व्याख्या : हे वत्स! आत्मा रूपी राम का चेहरा प्रसन्न था और मन में कोई आसक्ति भी नहीं थी और रोष भी नहीं था। वह तो सभी भावों को सांत्वना देकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन को चल दिए। वैराग्य रूपी वन में आत्मा रूपी राम को जाते देखकर सुरता रूपी सीता भी साथ चल दी क्योंकि उसका आत्मा के प्रति अनुराग होने के कारण रह नहीं सकी। सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।। तब रघुपति सबही सि डिग्री नाई। चले संग सिय अ डिग्री लघु भाई।। व्याख्या : वैराग्य रूपी वन में जाने की बात सुनकर लखन भाव भी उठ दौड़ खड़ा हुआ और आत्मा रूपी राम के प्रयास करने पर भी वह नहीं रूका। तब आत्मा रूपी राम ने सबको प्रणाम किया और सुरता व लखन भाव के साथ वैराग्य रूपी बन को चले गए। रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।। यहु सभु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले गए परन्तु मैं तो उनके साथ नहीं गयी और न ही मेरे प्राण साथ गए। यह सब कुछ मेरी आँखों के सामने हुआ है फिर भी अनासक्त जीव ने शरीर का त्याग नहीं किया है। मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।। जिए मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।। व्याख्या : मुझे मेरे स्नेह को देखकर कोई लज्जा नहीं है क्योंकि मैं तो आत्मा रूपी राम की माता हूँ अर्थात् आत्म चेतना मुझ सुष्मना नाड़ी से ही पैदा होती है। जीने और मरने का लाभ तो चित रूपी राजा ने जाना है। मेरा हृदय तो बज्र के समान है। दो0 कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।। व्याख्या : सुष्मना रूपी कौशल्या के वचनों को सुनकर भावरत भाव रूपी भरत सहित समस्त नाड़ियों रूपी रनिवास में व्याकुलता व तड़फड़ाहट आ गयी तथा उस समय राजगृह अर्थात भृकुटि पर भावों के शोक की छाया छा गयी। बिलपहि बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।। भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा के विरह में भाव रत रूपी भरत व शत्रुघ्न दोनों भाई विलाप करने लगते हैं, तो सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या उनको हृदय से लगा लेती है अर्थात् आत्म भाव रत रूपी भरत व कामादि विकारों का दमन करने वाला शत्रुघ्न भाव सुष्मना नाड़ी में स्थिर होने लग जाते हैं। उस अवस्था में आत्मा रत भाव रूपी भरत को नाना प्रकार से बल मिलने लगता है। उसी को भरत को नाना प्रकार से समझाना बोलकर लिखा है। उस समय आत्मरत भाव के साथ-साथ विवेक का भाव भी बलवान हो उठता है। उसी को विवेकमय वचन सुनाना बोलकर लिखा है। भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।। छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समस्त नाड़ियों में ही आत्म रत भाव रूपी भरत का प्रवाह होने लग जाता है। उसी को सभी नाड़ियों रूपी माताओं का भरत को समझाना बोलकर लिखा गया है। समस्त नाड़ियाँ रूपी माताएँ आत्मरत भाव रूपी भरत को पुराण व वेदों की बातें बताने लगती हैं अर्थात् पुराण यानी पुर अ आन अर्थात् शरीर से पर श्रुति यानी सुरता को लगाने पर आत्मोन्मुखी अवस्था आ जाती है। इसी मर्म को समस्त नाड़ियाँ भाव रत रूपी भरत को समझाती हैं। तब भाव रत रूपी भरत छल रहित, सहज, व सरल बाणी बोलते हैं अर्थात भाव रत रूपी भरत विनयपूर्वक बोलता है कि- जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।। जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मात महीपति माहुर दीन्हें।। व्याख्या : जो पाप रूपी चिन्ता, माता-पिता, पुत्र को मारने और गोशाला अर्थात् इन्द्रियों के बलपूर्वक दमन करने पर जो चिन्ता रूपी पाप होता है और महिसुर अर्थात् शरीर रूपी पृथ्वी में चलने वाले स्वरों में वासनारूपी जलन बढ़ने पर जो चिन्ता रूपी पाप होता है और जो चिन्ता रूपी पाप तीनों नाड़ियों से उत्पन्न सहजता रूपी बाल भाव का वध करने पर होता है तथा मैत्रीपूर्ण सद्भावों व चित रूपी राजा को वासना रूपी जहर देने से जो पाप रूपी चिन्ता होती है। जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।। ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होई मोर मत माता।। व्याख्या : मन, वचन कर्म से कवि लोग जितनी भी पाप व महापाप रूपी चिन्ताओं का वर्णन करते हैं, वे सब पाप रूपी चिन्ता मुझे लगेगी, अगर हे सुष्मना नाड़ी रूपी माता! मेरी भी इस ध्यान क्रिया (विधि) में सहमति होगी अर्थात् अगर मैं भी ध्यान द्वारा देह भावों से परे होऊँगा, तो मुझे ये सब पाप रूपी चिन्ताएँ सतायेंगी। वास्तविकता में यह होता है कि जब साधक ध्यान में साधना द्वारा लीन होता चला जाता है तो प्रारम्भ में उसे इन्द्रियों के सुख की चिन्ता सताती है और स्वरों से उत्पन्न भावों की चिन्ता भी सताती है। साधक परमात्मा को प्राप्त करने के लिए इन्द्रियों, स्वरों, नाड़ियों व गुणों आदि को बलपूर्वक दबाकर अनुकूल करने का प्रयास करता है, परन्तु बलपूर्वक प्रयास करने पर नाना प्रकार की चिन्ताएँ साधक को परेशान करने लगती हैं। उन्हीं को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है और भाव रत रूपी भरत भाव भी यही कहता है कि अगर मैं भी बलपूर्वक उसी विधि का अनुसरण करूँगा, तो ये सब पाप रूपी चिन्ता मुझे लगेगी। दो0 जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि हे सुष्मना नाड़ी रूपी माता! जो माया को हरण करने की क्रिया का त्याग करके भौतिक गुणों को पाने के लिए प्रयास (क्रिया) करते हैं। मुझे भी वही क्रिया करने पर वही गति मिलेगी। अर्थात् भौतिक सुखों की चाह करने पर परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। बेचहि बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। व्याख्या : जो वेदों को बेच देते हैं अर्थात् अपनी साधना की अनुभूति को प्रकट कर देते हैं और धारणा को दुह लेते हैं अर्थात् अपनी यश प्राप्त करने के लिए अपनी अनुभूति को धारणा बनाकर प्रकट कर देते हैं, वे चुगलखोरी और दूसरों की बुराई करने वाले भावों से ग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे लोग कपटी, कुटिल, कलह प्रिय और क्रोधी होते हैं तथा अनुभूति को विकृत रूप में प्रकट करके विश्व विरोधी हो जाते हैं अर्थात् असहज हो जाते हैं। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। व्याख्या : जो गति लोभी, लम्पट, लोलुप व परधन व पराई स्त्री को देखने वालों की होती है, वही गति मेरी हो माता अगर मेरी देह भावों का अधिष्ठाता बनने की चाह या सहमति हो। अर्थात् हे सुष्मना नाड़ी रूपी माता। अगर मैं भाव रत रूपी भरत भाव सांसारिक भोगों में रमण करने की सहमति वाला होउँ, तो मेरी भी वही गति होगी, जो कामी, क्रोधी, मदी, लोभी लम्पट, ढोंगी व पाखण्डियों की होती है। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नर तनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। व्याख्या : जो लोग साधु संगति पाकर अनुराग से नहीं भरते हैं और परमार्थ पथ से विमुख होकर प्रकृति विरूद्ध कार्य करते हैं तथा मनुष्य का शरीर पाकर के भी जो माया के भावों का हरण नहीं करते हैं और जिन्हें माया का हरण व माया को हरने वाला भाव अच्छा नहीं लगता है। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।। व्याख्या : जो लोग परमात्मा में सुरता नहीं लगाकर संसार रूपी विपरीत पथ पर चलते हों और ढोंग-पाखण्ड का भेष धारण करके संसार में छल करते हों। उनकी जो गति होती है, वो ही गति हे सुष्मना नाड़ी रूपी माता। अगर सपने में भी मैं सांसारिक भोगों को भोगने की लालसा रखता हूँ तो मेरी भी हो। अर्थात् अगर सांसारिक भावों में रमण करने की भाव रत रूपी भरत की इच्छा हो, तो उनकी भी गति सांसारिक भोगों वालों जैसी ही हो सकती है। दो0 मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत के सच्चे व सरल स्वभाव वाले वचनों को सुनकर सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता बोली कि हे तात! तुम वचन, कर्म व शरीर से सदैव आत्मा रूपी राम के प्रिय हो। अर्थात् आत्म रत भाव रूपी भरत भाव सदैव आत्मा का प्रिय होता है। राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।। बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता कहती हैं कि हे भाव रत रूपी भरत! तुम्हें तो आत्मा रूपी राम प्राणों के समान प्रिय हैं तथा तुम भी आत्मा को प्राणों से ज्यादा प्रिय हो। भाव रत भरत और आत्मा रूपी राम की प्रीत अटूट होती है। चाहे चन्द्रमा जहर उगलने लग जाए और बर्फ भले अग्नि की तरह गर्म हो जाए और भले ही जलचर जीवों को जल से विरक्ति हो जाए परन्तु आत्मा व भाव रत भरत की प्रीत अटूट बनी रहती है। भएँ ग्यानु ब डिग्री मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।। मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।। व्याख्या : चाहे ज्ञान होने पर मोह नहीं मिटै परन्तु भाव रत रूपी भरत भाव कभी आत्मा के प्रतिकूल नहीं हो सकता है। जो लोग यह कहते हैं कि भाव रत रूपी भरत संसार के सुख भोग चाहता है, तो उन लोगों को सपने में भी सुख नहीं मिल सकता है और न ही अच्छी गति की प्राप्ति हो सकती है। अर्थात् त्याग भाव सदैव आत्मोन्मुखी ही रहता है और जो भाव त्याग भाव को संसारोन्मुखी देखते हैं, वे भ्रम में पड़े हुए होने के कारण सुख व सद्गति को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए।। करत बिलाप बहुत एहि भाँती। बैठेहिं बीति गई सब राती।। व्याख्या : इस प्रकार कहकर सुष्मना रूपी कौशल्या माता ने भाव रत रूपी भरत को हृदय से लगा लिया और ध्यान की उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी से विशेष रस का स्राव होने लग गया। उसी को ""थन पय स्रवहिं नयन जल छाए"" बोलकर लिखा गया है। इस प्रकार विशुद्ध वार्तालाप करते हुए अज्ञान रूपी रात्रि बीत गयी। बामदेव बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। मुनि बहुभाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में शरीर के बाएँ अंगों में भी दैवीय वृति आ जाती है और बाएँ अंगों से भी दैवीय भाव पैदा होने लग जाते हैं। अत: उसी को प्रतीक रूप में बामदेव का आना बताया गया है। उस अवस्था में ज्ञान की विशिष्ट अवस्था हो जाती है। वही अवस्था वशिष्ठ मुनि का आना बताया गया है। उस अवस्था में सुमन्त्रणा के भाव व उदारता के भाव पैदा होने लग जाते हैं। अत: उन्हीं को सचिव व महाजन के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। ध्यान की उस अवस्था में मन की एकाग्रता बढ़ जाती है और मन की एकाग्रता भाव रत रूपी भरत को नाना उपदेश करने लगती है अर्थात् मन में उस समय परमार्थ पथ पर चलने के लिए नाना विचार आने लगते हैं। उसी को भाव रत भरत भाव को नाना उपदेश देना बोलकर लिखा है। दो0 तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ ने भाव रत रूपी भरत भाव को समझाया और धैर्य धारण करके अवसर के अनुसार कार्य करने को कहा। अर्थात् विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु ने भरत भाव को सहज होने का उपदेश दिया। तब भाव रत रूपी भरत भाव गुरु (विशिष्ट ज्ञान) की बातें सुनकर सभी भावों को सहज होने की प्रेरणा करने लगे। नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।। गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।। व्याख्या : चित रूपी राजा के शरीर को अर्थात् चित की उस परम स्थिर अवस्था में अनुभूति रूपी स्नान कराया और परम विचित्र अर्थात् भावहीन अवस्था को प्राप्त किया। परम विचित्र अवस्था का बहुत गम्भीर रहस्य होता है, क्योंकि सांसारिक अवस्था होने पर समस्त सृष्टि चित्रमय दिखायी देती है परन्तु जब चित परम स्थिर हो जाता है तो दृश्य भी दिखायी नहीं पड़ते हैं। उसी से विचित्र अर्थात् दृश्य रहित अवस्था आती है और यह वैज्ञानकि सत्य है कि दृश्यों के अभाव में भावहीन अवस्था स्वत: ही आ जाती है। अत: उसी भाव हीन अवस्था को ही ""परम विचित्र बिमान बनावा"" बोलकर लिखा है। तब उस अवस्था में भाव रत भाव नाड़ियों रूपी माताओं में रमण करने लगता है। उसी को चरण पकड़कर माताओं को रखना बताया गया है। नाड़ियाँ भी आत्मोन्मुखी होने की चाह में प्रवाहित होती रहती हैं। उसी को माताओं का आत्मा रूपी राम के दर्शनों की अभिलाषा करना बताया गया है। चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।। सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।। व्याख्या : जब ध्यान में भावहीन अवस्था आती है तो चन्दन की सी शीतलता आ जाती है, जिससे आनन्द रूपी सुगंध फैल जाती है। तब सरयु के तीर पर चिता बनायी अर्थात् भाव रत भाव रजोगुण के भावों का समन करता हुआ पिंगला नाड़ी को निर्मल करने का प्रयास करता है। पिंगला नाड़ी की निर्मलता ही सुरपुर अर्थात् भृकुटि पर पहुँचने की सीढ़ी होती है। यहाँ साधना का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है क्यंकि जब रजोगुणी भावों की चिता बन जायेगी अर्थात् पिंगला नाड़ी के रजोगुणी भाव निर्मल हो जायेंगे, तब ही साधक का ध्यान सुरपुर अर्थात जहाँ से स्वर प्रकट होते हों यानी भृकुटि पर पहुँच पाता है। एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजलि दीन्ही।। सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।। व्याख्या : इस प्रकार भाव रत भाव ने दाह क्रिया अर्थात् विकार समन की सब क्रियाएँ की और ध्यान क्रिया द्वारा तिलांजलि अर्थात् तीनों गुणों के बन्धन को काट दिया। फिर भाव रत भाव ने समस्त प्रकार की अनुभूतियों को समझकर शरीर के दसों अंगों अर्थात् दस इन्द्रियों की व्यवस्था की अर्थात् दसों इन्द्रियों को सहज बिधि का अनुसरण कराया। जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।। भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।। व्याख्या : जहाँ पर जैसे-जैसे मन की एकाग्रता ने प्रेरणा की वो सब हजारों प्रकार से भाव रत रूपी भरत भाव ने किया। मैं यहाँ पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि क्षण भर में मन की एकाग्रता हजारों विधियों की प्रेरणा कर देती है। यह सूक्ष्म भाव दशा गहरे ध्यान में ही समझी जा सकती है। परन्तु उस अवस्था में ध्यान पहुँचने पर समस्त विकार मिट जाते हैं और विशुद्ध पवित्रता की अवस्था आ जाती है और समस्त वासनाओं का त्याग हो जाता है। उसी को धेनु यानी इच्छाओं, अश्व यानी मन रूपी घोड़ा और गज यानी मन के भावों की चाल रूपी हाथी आदि नाना प्रकार के वाहनों का दान देना बताया गया है अर्थात् उस अवस्था में साधक इच्छा, भाव व आसक्ति आदि से मुक्त हो जाता है। दो0 सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम। दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।। व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में भाव रत रूपी भरत स्वभाव ने वासना, वासनाओं की आसक्ति, भोग भावों, संग्रह आदि के भावों का त्याग करके भूमिसुर अर्थात् देह के स्वरों को निर्मल कर लिया। जब देह के स्वर अर्थात् भूमि सुर निर्मल हो जाते हैं और वासनाओं की आसक्ति इच्छा रहित हो जाती है तो साधक के अन्दर परम संतोष की अवस्था आ जाती है। उसी अवस्था को ""परिपूरन काम"" अर्थात् पूर्ण काम की अवस्था बोलकर लिखा गया है। पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।। सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। व्याख्या : चित रूपी पिता के लिए भाव रत रूपी भरत ने जो किया उस करनी का लाखों मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता है। वास्तव में जब त्याग रूपी भरत वासनाओं व इच्छाओं का त्याग कर देता है, तो इससे और बड़ा उपकार चित का नहीं हो सकता है। क्योंकि वासनाओं से ही तो चित बन्धन में पड़ता है और जब वासना व इच्छाएँ मिट जाती हैं तो चित आनन्द की अवस्था में स्थिर हो जाता है। उसी को चित रूपी दसरथ का स्वर्ग सिधारना बोलकर लिखा गया है। तब ध्यान की उस अवस्था में मन की एकाग्रता रूपी मुनिवर आए और समय की अनुकूलता देखकर सुमन्त्रणा रूपी सचिव व भावों को बुलाया अर्थात् सुमन्त्रणा व अन्य सद्भाव प्रकट हो गए। बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।। भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।। व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में सभी भाव भृकुटि रूपी राजसभा में बैठ गए अर्थात् समस्त भाव भृकुटि पर पहुँच गए और भाव रत रूपी भरत व शत्रुघन रूपी कामादि नाशक भाव को भी बुला लिया। उस अवस्था में भाव रत भाव को विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव बहुत सहारा प्रदान करते हैं। उसी को भाव रत रूपी भरत का विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ के पास बैठना बोलकर लिखा गया है। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु भाव रत रूपी भरत को सहारा प्रदान करते हुए नीतिमय बातों की धारणा को बताते हैं। प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।। भूप धरमुब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबारा।। व्याख्या : सबसे पहले विशिष्ट ज्ञान रूपी मन की एकाग्रता के भाव ने रजोवृति रूपी कैकयी की कुटिल करणी का वर्णन किया और फिर चितरूपी राजा की धारणा की वृति को सराहा कि चित रूपी राजा ने शारीरिक सुखों का त्याग करके आत्मा के साथ प्रेम का निर्वाह किया है। कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।। बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के गुण, शील व स्वभाव का वर्णन करते हुए मन की एकाग्रता (मुनिवर) रूपी भाव के आँखों में जल आ गया और शरीर पुलकित हो उठा। फिर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने लखन भाव व सुरता का आत्मा के प्रति प्रेम भाव का वर्णन किया और इस प्रकार विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि वर्णन कहते-कहते शोक व प्रेम में मगन हो गया। विशिष्ट ज्ञान के लिए आत्मा से विरह ही शोक कारण होता है। दो0 सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनि नाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।। व्याख्या : तब उस ध्यान अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव भाव रत रूपी भरत को समझाते हुए कहते हैं कि हे भाव रत भरत! मैंने बिलख अर्थात् वि अ लख यानी अच्छी तरह से विशुद्ध प्रकार से जाना है कि भावों की गति (भावी) बहुत प्रबल होती है। इसलिए भावों की विधि (क्रिया) के अनुसार ही जीव को हानि, लाभ, जन्म-मरण, यश-अपयश आदि की प्राप्ति होती है। अस बिचारी केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।। तात बिचा डिग्री करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।। व्याख्या : इसलिए भावों की क्रिया (विधि) का विचार करके व्यर्थ में किसी को दोष नहीं देना चाहिये और क्रोध भी नहीं करना चाहिये। हे भावरत रूपी भरत! तुम मन में विचार करो क्योंकि चितरूपी राजा दसरथ सोच करने लायक नहीं है। सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु विषय लयलीना।। सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।। व्याख्या : हे भाव रत रूपी भरत! वो विशुद्ध प्रकाश (ज्ञान) सोचनीय होता है जिसको अनुभूति नहीं हुई हो और निज स्वरूप की धारणा को छोड़कर जो विषयों की तरफ ले जाता हो। ऐसा राजा सोचनीय होता है, जिसे नीति का ज्ञान नहीं होता है और जिसे अपनी प्रजा प्रिय नहीं होती हो। सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।। सोचिअ सुद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।। व्याख्या : ऐसे धनवान का सोच करना चाहिये जो कंजूस हो और जो आतिथ्य सत्कार नहीं करता हो। ऐसे शूद्र का सोच करना चाहिए जो विप्र अर्थात् ज्ञान विरोधी हो और वाचाल, मान चाहने वाला व ज्ञान का अहंकार करने वाला हो। सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।। सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।। व्याख्या : उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को छलने वाली, कुटिल, कल्हप्रिय व स्वेच्छाचारी होती है तथा उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिए जो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं करता हो और गुरु की आज्ञा का अनुसरण नहीं करता हो। दो0 सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।। व्याख्या : उस गृहस्थ का सोच करना चाहिये जो मोह में पड़कर सहज पथ का त्याग करके कर्म करने लग जता है और उस साधु का सोच करना चाहिये जो पाखण्ड में रूचि रखने लग जाता है और विवेक व वैराग्य से रहित हो। बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।। सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।। व्याख्या : वानप्रस्थी वही सोचने योग्य है जिसे तप अच्छा नहीं लगता हो और भोगों की चाह करने वाला हो। सोच उसका करना चाहिये जो बिना कारण ही चुगलखोरी करने वाला हो तथा अकारण क्रोध करने वाला हो तथा माता-पिता, गुरु व भाईयों का विरोध करने वाला हो। सब बिधि सोचिअपर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।। सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।। व्याख्या : दूसरों को नुकसान करने वालों का सब प्रकार से सोच करना चाहिये तथा जो स्वयं के शरीर का पोषण करने वाले व निर्दयी होते हैं, उनका सोच करना चाहिये। सब प्रकार से सोच करने योग्य तो वे हैं, जो माया के छल को छोड़कर परमात्मा का भजन नहीं करते हों। सोचनीय नहिं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।। व्याख्या : कोशलराऊ अर्थात् चित रूपी राजा सोच करने योग्य नहीं होता क्योंकि चित रूपी राजा का प्रभाव तो चौदह भावों के कोषों में होता है। ये चौदह भावों के कोष ही दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार का आभास कराते हैं। हे भावरत रूपी भरत भाव! तुम्हारे चित रूपी पिता के समान प्रभाव वाला न तो कोई दूसरा है, न हुआ है और न ही हो पायेगा। यह वास्तवकि सत्य है क्योंकि देह रूपी अयोध्या में चित के समान दूसरा कोई न है, न होता है और न ही होना सम्भव होता है। बिधि हरि ह डिग्री सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।। व्याख्या : इस चौपाई में साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि चित क्रिया द्वारा माया हरन करके हरने वाला हो जाता है और उस अवस्था में चित समस्त स्वरों का स्वामी (सुरपति) हो जाता है तथा चित से उत्पन्न प्राण की तरंगें ही जीव की दसों दिशाओं की अधिष्ठाता हो जाती हैं। ध्यान की उस गम्भीर अवस्था में चित रूपी दसरथ का मर्म समझ में आ जाता है। उसी को दसरथ की गुण गाथा का वर्णन करना बताया गया है। दो0 कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।। व्याख्या : हे भावरत रूपी भरत! चित रूपी राजा की कोई कैसे बड़ाई कर सकता है क्योंकि चित की तो आत्मा, लखन, भाव रत व शत्रुघन रूपी चार अवस्थाएँ ही बहुत पवित्र होती हैं। अर्थात् चित की चार अवस्थाओं का ही वर्णन नहीं किया जा सकता है। फिर चित की मूल अवस्था का कैसे वर्णन किया जा सकता है? सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।। यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।। व्याख्या : चित रूपी राजा तो सब प्रकार से भाग्यशाली होता है, इसलिए उसके लिए सोच करना व्यर्थ है। इसलिए सोच एवम् समस्त शोकों को दूर कर दो और चित की प्रेरणा के अनुसार भावों का अधिष्ठाता (राजा) बनकर समस्त भावों का संचालन करो। अर्थात् समस्त भावों को त्याग भावना में लीन कराकर आत्मोन्मुखी कर लो। रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।। तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरागी ।। व्याख्या : चित रूपी राजा ने तुमको भाव समाज रूपी राज दिया है। इसलिए चित रूपी पिता की प्रेरणा का अनुसरण करना चाहिए। जिस चित रूपी राजा ने आत्मा रूपी राम के विरह में शरीर का त्याग कर दिया अर्थात् स्थूल भाव का परित्याग कर दिया। नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।। करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।। व्याख्या : चित रूपी राजा को वाणी (शब्द) प्रिय होते हैं, उसे प्राण प्रिय नहीं होते हैं। यहाँ साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वचन प्रिय होने का मतलब यह होता है कि चित शब्द से ज्यादा प्रभावित होता है। प्राण की तरंगे तो चित से उठती हैं परन्तु शब्द की चोट चित को हिला देती है। इसलिए यहाँ विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ कहते हैं कि हे भाव रत रूपी भरत! तुम चित रूपी पिता की प्रेरणा को सत्य करो अर्थात् अनुसरण करो। चित की प्रेरणा का सहज होकर अनुसरण करने में ही सबकी भलाई है। परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।। व्याख्या : साधना के परसु अर्थात् कठोर साधना रूपी परशुराम भाव ने चित की प्रेरणा का अनुसरण किया और माया रूपी माता को मार दिया, जिसका सभी भाव रूपी लोक साक्षी हैं। ययाति को पुत्र ने अपना यौवन दे दिया फिर भी संसार में पिता की आज्ञा पालने के कारण अपयश नहीं हुआ। ययाति व ययाति पुत्र दोनों का गम्भीर रहस्य है। ययाति चित की उस अवस्था का प्रतीक है, जो साधना करते-करते भी भोगों की आसक्ति से मुक्त नहीं हो पाता है। जब साधक यम-नियम-संयम द्वारा भोगों को जीतने का प्रयास करता है, तो भी भोग लालसाएँ चित की वृति में रह जाती हैं और समय व देश के वातावरण के अनुसार पुन: हावी हो उठती हैं। तब बाध्य होकर साधक को सहजता का रास्ता समझ में आता है। उसी सहजता की अवस्था में अवस्थित होकर चित धीरे-धीरे भोगों की आसक्ति को छोड़ पाता है। यह सहजता की अवस्था ही पुत्र द्वारा यौवन देने का प्रतीक है। सहज होकर भोग भोगने से संसार में अपयश नहीं होता है अर्थात् कर्मों का बन्धन नहीं ब्यापता है। दो0 अनुचित उचित बिचा डिग्री तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपित ऐन।।174।। व्याख्या : इसलिए जो उचित अनुचित का विचार नहीं करके चित रूपी पिता की अन्त: प्रेरणा का अनुसरण करते हैं तो वे सुख व सुयश प्राप्त करने के अधिकारी हो जाते हैं और अमरपति अर्थात् सतचित आनन्द के लोक में निवास करने लगते हैं। अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।। सरपुर नृपु पाइहि परितोषू। तुम्ह कहँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।। व्याख्या : हे भाव रत रूपी भरत! इसलिए तुम अवश्य ही चित रूपी पिता की प्रेरणा का अनुसरण करके भाव रूपी प्रजा का पालन करो और सब शोकों का निवारण कर दो। तभी सुरपुर अर्थात् भृकुटि में परम संतोष की अवस्था आ पायेगी और तुम्हें सुयश की प्राप्ति होगी और कुछ दोष भी नहीं लगेगा। बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।। करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।। व्याख्या : यह सभी की अनुभूति का मत है कि जिस भाव को चित रूपी पिता अन्त: प्रेरणा करते हैं, वही भाव भावों का अधिष्ठाता हो जाता है। इसलिए तुम ग्लानी का त्याग करके भाव समाज पर राज करो और मेरे वचनों को हितकारी जानकर अनुसरण करो। सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।। कौसल्यादि सकल महतारी। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारी।। व्याख्या : इस बात को सुनकर कि भाव रत रूपी भरत भाव समस्त भावों का राजा बन गया है, आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को बहुत प्रसन्नता होगी। इसे शरीर संरचना को जानने वाले भी अनुचित नहीं कहेंगे। पण्डित का तात्पर्य ""जो जानहि पिण्ड सो पण्डित होई"" अर्थात् जो शरीर संरचना को जानता है वही विद्वान पण्डित होता है। उस अवस्था में सुष्मना आदि नाड़ियाँ रूपी रानियाँ भी सहज हो जायेंगी और भाव भी सहज होकर सुखी हो जायेंगे। परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।। सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ।। व्याख्या : जो तुम्हारे और आत्मा रूपी राम के सम्बन्धों के परम मर्म को जानते हैं, वे सब प्रकार से भलाई मानेंगे। जब आत्मा रूपी राम दृढ़ वैराग्य रूपी वन से लौट कर आ जाएँ, तो उन्हें भावों का राज सौंप देना और प्रेम से आत्मोन्मुखी हो जाना। दो0 कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुमन्त्रणा रूपी सचिव भी हाथ जोड़कर भाव रत रूपी भरत से गुरु (विशिष्ट ज्ञान) की आज्ञा का अवश्य पालन करने के लिए अनुरोध करते हैं तथा कहते हैं कि जब आत्मा रूपी राम वापिस सहज अवस्था में आ जाएँ, तब जो उचित लगे वो करना। कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।। सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।। व्याख्या : तब सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता धैर्य धारण करके अर्थात् ध्यान में स्थिर होकर बोली कि हे वत्स! विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रेरणा ही अनुकरणीय है। इसलिए आदरपूर्वक गुरु (ज्ञान) की प्रेरणा का अनुसरण करो और समय की गति को जानकर विषयों की आसक्ति का त्याग कर दो। बन रघुपति सुरपुर नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।। परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।। व्याख्या : दृढ़ वैराग्य रूपी वन में आत्मा रूपी राम हैं और चित रूपी राजा अपनी मूल अवस्था (अर्थात् जहाँ से स्वरों की उत्पत्ति होती है) में हैं। इसलिए हे भाव रत रूपी भरत भाव! तुम इस प्रकार पलायन मत करो। ध्यान की इस अवस्था में तो भाव रत रूपी भरत तुम ही समस्त नाड़ियों व भावों के आधार हो। लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।। सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।। व्याख्या : समय की प्रतिकूलता व क्रिया की विपरीतता को देखकर धैर्य धारण करो क्योंकि समस्त नाड़ियाँ रूपी माताएँ तुम पर बलिहारी हैं। इसलिए हे भाव रत रूपी भरत! तुम विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की अन्त:प्रेरणा का अनुसरण करो और समस्त भावों व उपभावों को सहज करके दु:खों को दूर करो। गुर के वचन सचिव अभिनंदनु सुने भरत हित हित जनु चंदनु।। सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और मन्त्रणा रूपी सचिव की बातें सुनकर भाव रत रूपी भरत भाव के हृदय में चंदन जैसी शीतलता मिली। फिर भाव रत रूपी भरत भाव ने सुष्मना नाड़ी रूपी माता कौशल्या की शील, स्नेह व सरलता के रस में सनी हुई बातें सुनी। अर्थात् भावरत भाव ने शील, स्नेह व सरलता का अनुभव किया। छ0 सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए। लोचन सरोरूह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।। सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की।। व्याख्या : प्रेम रस में सनी हुई सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता की बातों को सुनकर भाव रत रूपी भरत भाव व्याकुल हो उठा और आत्मा रूपी राम को याद कर-करके आँखों से जल बहने लगा, जिससे विरह के नए-नए अंकुर लगने की दशा को देखकर सभी भाव अपने शरीर को भूल गए। उस अवस्था में साधक के सभी भाव आपस में भाव रत रूपी भरत के आत्मा के प्रति प्रेम को देखकर सराहना करने लगते हैं। सो0 भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि।।176।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत रूपी भरत भाव धैर्य धारण करके व हाथ जोड़कर विनयपूर्वक अमृत के समान वचन बोलकर सभी भावों को उत्तर देने लगता है। वास्तविकता में यह होता है कि जब आत्म चेतना चित्रकोष में होती है और चित मूल अवस्था में चला जाता है तो भाव रत रूपी भरत भाव ही समस्त भावों का आधार बन जाता है तथा भाव रत रूपी भरत के अनुसार ही समस्त नाड़ियों की गति बन जाती है। उस अवस्था में आत्मा के प्रति सहज स्नेह से आत्मोन्मुखी होने लग जाता है। उसी भाव अवस्था का यहाँ बहुत ही सूक्ष्म प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। ।। मास पारायण, अठारहवाँ विश्राम।। मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।। मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत रूपी भरत भाव कहता है कि मुझे विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु देव ने अच्छा ही उपदेश दिया है और समस्त भाव रूपी प्रजा का भी यही मत है तथा नाड़ियों रूपी माताओं की भी यही आज्ञा है कि मैं भाव रूपी समाज का अधिष्ठाता बनूँ। मैं इन सबकी आज्ञा को सिर पर धारण करना चाहता हूँ। गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।। उचित की अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।। व्याख्या : गुरु, माता, पिता व स्वामी की कल्याणकारी वाणी को सुनकर प्रसन्न मन से अच्छा जानकर मानना चाहिये। उचित-अनुचित का विचार करने पर धारणा नष्ट हो जाती है और चिन्ता रूपी पाप का भार बढ़ जाता है। तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।। जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।। व्याख्या : आप लोगों ने तो मुझे सहज व सरल शिक्षा दी है, जिसका अनुसरण करने पर मेरा कल्याण ही होगा। इस बात को मैंने अच्छी तरह समझ लिया है परन्तु फिर भी मेरे हृदय में संतोष नहीं हो रहा है। अर्थात् विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु, नाड़ियों रूपी माताएँ और भाव रूपी प्रजा ये सभी भाव रत रूपी भरत को भावों का अधिष्ठाता करना चाहते हैं परन्तु आत्म भाव रत रूपी भरत भाव राजा बनने से संतुष्ट नहीं होता है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।। उत डिग्री देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।। व्याख्या : इसलिए अब मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरी बात को सुन लिजिए और फिर मुझे जो उचित हो वो आज्ञा देना। मैं आपको उत्तर दे रहा हूँ, मेरे इस अपराध को क्षमा करना क्योंकि दु:खी व्यक्ति के गुण-दोषों को दु:ख की अवस्था में साधु लोग विचार नहीं करते हैं। यहाँ भाव रत रूपी भरत भाव राजा नहीं बनने के लिए अपनी मनोदशा को प्रकट करना चाहता है। क्योंकि जब भाव आत्मा में रत हो जाता है अर्थात् आत्मोन्मुखी हो जाता है तो उसे सांसारिक भावों का आकर्षण अपनी तरफ नहीं खींच पाता है। उसी मनोदशा का वर्णन यहाँ किया गया है। दो0 पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।। व्याख्या : चित रूपी पिता सुरपुर (अर्थात् चित की मूल सहज अवस्था) में हैं और आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता दृढ़ वैराग्य रूपी वन में हैं और ऐसी अवस्था में आप लोग मुझसे (भाव रत, भाव समाज) राजा बनने को कहते हो और इसी में आप मेरा और आपका कल्याण समझ रहे हो। अर्थात् यहाँ पर आत्मा में रत रहने वाला भरत भाव कहना चाहता है कि चित की मूल अवस्था में और आत्मा व सुरता के दृढ़ वैराग्य में अवस्थित होने पर भाव रूपी समाज पर राज करना सम्भव नहीं हो सकता है। क्योंकि उस अवस्था में तो सभी भाव सहज शान्त होने लग जाते हैं। हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।। मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।। व्याख्या : हम सब भावों का कल्याण सियपति अर्थात् सुरता के पति आत्मा रूपी राम की सेवा करने में ही है। जिसे रजोवृति रूपी माता की कुटिलता ने दूर कर दिया है। अब मैंने मन में विचार करके देख लिया है कि हमारा कल्याण बिना आत्मोन्मुखी हुए नहीं हो सकता है। सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।। बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।। व्याख्या : भाव रूपी समाज पर राज करना बिना लखन, आत्मा व सुरता के शरण में रहे शोक का कारण होता है। अर्थात् बिना आत्मोन्मुखी हुए भावों का अधिष्ठाता बनना दु:ख का कारण हो जाता है। जैसे बिना वस्त्रों के आभूषण भार के समान लगते हैं और बिना वैराग्य के ब्रह्म ज्ञान बेकार होता है। इसी प्रकार बिना आत्मोन्मुखी हुए भावों में बरतना कष्ट का कारण बन जाता है। सरूज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जायँ जप जोगा।। जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।। व्याख्या : जैसे स्वस्थ शरीर के बिना भोगों का कोई मतलब नहीं है और बिना भक्ति के जैसे जप व योग नहीं रह पाते हैं तथा बिना जीव के शरीर नहीं रह पाता है, वैसे ही बिना आत्मा रूपी राम के मेरे लिए भाव रूपी समाज व्यर्थ है। जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।। मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत कहता है कि अब मुझे तो एक ही बात में मेरा कल्याण दीख रहा है, इसलिए आप मुझे आज्ञा दीजिए, जिससे मैं आत्मा रूपी राम के पास जाऊँ अर्थात् आत्मोन्मुखी हो जाऊँ। मुझ भाव रत रूपी भरत भाव को आप भावों का अधिष्ठाता बनाकर अपना कल्याण चाहते हो, ये आपको जड़ता व भोगों के प्रति स्नेह के कारण आभासित हो रहा है। दो0 कैकई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।। व्याख्या : मैं तो रजोवृति रूपी कैकयी से पैदा कुटिल बुद्धि वाला हूँ तथा आत्मा रूपी राम से विमुख हूँ तथा मेरी लज्जा चली गयी है और तुमलोग भोगों के मोह में पड़कर मुझ जैसे अधम वृति के भाव को भावों का अधिष्ठाता बनाकर सुख चाहते हो। कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।। मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव कहता है कि तुमलोग मेरा विश्वास करो क्योंकि धर्मशील राजा ही होना चाहिए अर्थात् भावों का अधिष्ठाता भाव दृढ़ धारणा वाला होना चाहिए। मुझे अगर हठपूर्वक राज दे दोगे तो भावों से उत्पन्न रसायन रसातल अर्थात् अधोगामी हो जायेगा। मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।। रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।। व्याख्या : मेरे समान और कौन-सा भाव पाप का घर अर्थात् चिन्ता का कारण होगा क्योंकि मेरे कारण तो आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले गए हैं। चित रूपी राजा ने आत्मा रूपी राम को दृढ़ वैराग्य की प्रेरणा कर दी और स्वयं चित रूपी राजा अमरपुर अर्थात् परम शान्त अवस्था में चले गए। मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।। बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव कहता है कि मैं सठ ही समस्त अनर्थों का कारण हूँ कि सचेत होकर अर्थात् आत्मोन्मुखी होने के लाभों को जानकर भी सांसारिक भोगों की बातों को सुन रहा हूँ। सचेत का मतलब साधक की उस अवस्था से होता है, जिसमें साधक को ज्ञान तो होता है परन्तु अवस्था की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए भरत भाव कहता है कि बिना आत्मा रूपी राम को देखे अगर मेरे प्राण रहेंगे, तो जग में मेरी हँसी ही होगी अर्थात् बिना आत्मोन्मुखी हुए अगर मैं भावों का अधिष्ठाता बन गया तो सांसारिक भोगों में फँसने की अवस्था आ सकती है। उसी को जगत में हँसी होना बताया गया है। राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।। कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो पवित्र हैं तथा विषय सुख भोगों से अनासक्त होते हैं। जो लोलुप वृति वाले होते हैं, वे ही देह रूपी भूमि के भोगों की कामना करते हैं। मैं कहाँ तक हृदय की जटिलता का वर्णन करूँ क्योंकि हृदय की जटिलता (कठोरता) तो बज्र को भी हरा देती है। दो0 कारण तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव कहता है कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है क्योंकि कार्य से तो कारण ज्यादा जटिल होता ही है। बज्र हड्डी से और लोहा पत्थर से कठोर होता ही है। जैसे हड्डी से बनने वाला बज्र हड्डी से कठोर हो जाता है और पत्थर से निकलने वाला लोहा पत्थर से कठोर हो जाता है, वैसे ही भाव से पैदा होने वाला कारण भाव से कठोर हो जाता है और कारण से पैदा होने वाला कार्य कारण से कठोर हो जाता है। कैकई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे।। जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।। व्याख्या : इन चौपाइयों में अनुभव को बहुत स्पष्टता के साथ लिखा गया है। इसलिए भरत भाव कहता है कि रजोवृति (कैकयी) के भावों के कारण शरीर में अनुराग पैदा हो जाता है और शरीर में अनुराग होने पर प्राण अधोगामी होकर अभागे अर्थात् असहज हो जाते हैं, जिससे चिंता रूपी पाप पैदा हो जाता है। अगर प्रिय के विरह में अर्थात् आत्मा से विमुख होकर प्राण प्रिय लगने लग जाते हैं, तो बहुत सांसारिक जाल फैल जाता है और जीव को नाना प्रकार के बन्धन जकड़ लेते हैं। लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।। लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी ने लखन भाव, आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को तो वैराग्य रूपी बनवास दे दिया। जिससे चित रूपी पति मूल (सहज) अवस्था में चला गया। चित का मूल अवस्था में जाना ही चित का हित कहलाता है। चित के मूल अवस्था में जाने पर रजोवृति भी निस्तेज हो जाती है परन्तु उसकी आसक्ति नहीं मिट पाती है। उसी अवस्था को कैकयी के विधवापन व अपयश के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। ऐसी भाव द्वन्द्व की अवस्था से भावों को संताप हो जाता है। उसी को भाव रूपी प्रजा का संताप व शोक बताया गया है। मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकईं सब कर काजू।। एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।। व्याख्या : मुझे रजोवृति रूपी कैकयी ने सुख भोग रूपी राज दिया है जिससे समस्त भोगवादी भावों का कार्य सिद्ध हो गया है। परन्तु इस भोग रूपी राज से मेरा क्या भला होगा? अर्थात् भोगों के भावों में बरतने से कुछ लाभ नहीं है। उस पर आप मुझे भोग भाव रूपी समाज का अधिष्ठाता बनाना चाहते हो। कैकइ जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।। मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मेरा तो जन्म ही रजोवृति रूपी कैकयी से हुआ है, इसलिए लोग कुछ कहेंगे अर्थात् भाव रूपी लोग कुछ कहेंगे तो अनुचित नहीं है। मेरी बात को तो विधि (क्रिया) ने बना दिया है अर्थात् ध्यान की क्रिया द्वारा मेरी तो वृति अब आत्मोन्मुखी हो गयी है। अब तो यह देखना है कि पाँच इन्द्रियों रूपी प्रजा कैसे आत्मोन्मुखी होने में मेरी सहायता करती हैं। दो0 ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारूनी कहहु काह उपचार।।180।। व्याख्या : जो व्यक्ति ग्रहों से पीड़ित होकर वात रोग से ग्रस्त हो और उसे बीछी खा लेता है और उपचार के लिए अगर कोई मद पिला देता है, तो कैसा उपचार होगा? अर्थात् रोग की तीव्र वेदना बढ़ जायेगी। इसी प्रकार अगर सांसारिक भोगों की चाह हो और उसमें वासना रूपी बीछी खा जाए और फिर आसक्ति रूपी मद पिला दिया जाए, तो माया विकार चरम पर पहुँच जायेंगे। कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।। दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।। व्याख्या : मैं तो रजोवृति से पैदा हूँ इसलिए मेरा तो सांसारिकता का योग बनता ही है, इसलिए बुद्धि की चातुरता ने मुझे सांसारिक भोग भावों का राजपद दिया है। परन्तु चित रूपी दसरथ का पुत्र व आत्मा रूपी राम का छोटा भाई होने का क्रिया (विधि) ने बढ़-चढ़ कर मुझे यश दिया है। अर्थात् ध्यान क्रिया के प्रभाव के कारण रजोवृति से उत्पन्न होने पर भी मैं आत्मोन्मुखी हो गया हूँ। तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राम रजायसु सब कहँ नीका।। उत डिग्री देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रूचि जेही।। व्याख्या : तुम सब भाव रूपी समाज मुझे भावों का अधिष्ठाता बनने की कह रहे हो और चित रूपी राजा की सद्प्रेरणा भी बता रहे हो। परन्तु मैं (भाव रत) किस प्रकार ध्यान की क्रिया के प्रभाव को बताऊँ। उसका सुख तो भावों को अपनी रूचि के अनुसार मिलता है। ध्यान क्रिया की यह विशेषता होती है कि भावों की रूचि के अनुसार ही फल मिलता चला जाता है। मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।। मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव कहता है कि भावों का अधिष्ठाता बनने पर बताइये मेरे और रजोवृति के अलावा किसकी भलाई होगी अर्थात् भाव रत भाव अगर सांसारिक सुख भोगों का अधिष्ठाता बनता है तो केवल रजोवृति ही प्रबल होती है। ऐसी अवस्था में समस्त भाव रूपी चराचर में ऐसा मेरे (भाव रत रूपी भरत) अलावा कौन होगा, जिसे आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता प्राणों के समान प्रिय नहीं होंगे। परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहीं दूषन काहू।। संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।। व्याख्या : सांसारिक सुख भोगों में भाव लगाने पर बहुत हानि होती है परन्तु ऊपर-ऊपर से प्रारम्भ में सुख भोग के नाना लाभ दिखाई देते हैं। ये तो मेरे बुरे समय के कारण होता है, किसी का इसमें दोष नहीं है। इस चौपाई में स्पष्ट लिखा गया है कि सांसारिक सुख भोग के भावों को हानि में भी लाभ दिखाई देता है। उसी अवस्था को भाव रत रूपी भरत स्वयं का बुरा समय कहता है। भाव रत भरत कहता है कि ये भ्रम की अवस्था संशय, शील, मोह व प्रेम के कारण पैदा होती है, इसलिए जो भाव जैसा सोचते हैं, वो सब अपने हिसाब से उचित ही सोचते हैं। अर्थात् भावों को अपनी वृति व स्वभाव के अनुसार ही हानि-लाभ दिखाई पड़ता है। दो0 राम मातु सुठि सरल चित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी आत्मा रूपी राम की माता तो सहज व सरल चित हैं और उनका मुझ भाव रत भरत पर विशेष प्रेम भी है, इसलिए उन्होंने तो मेरी दीनता (समर्पण) को देखकर कह दिया अर्थात् आत्मोन्मुखी वृति का समर्थन कर दिया। गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।। मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव कहते हैं कि विशिष्ट ज्ञान अर्थात् परमात्मा के ज्ञान रूपी गुरु का विवेक समुद्र के समान गहरा होता है। इसलिए विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के लिए संसार हथेली पर रखे बेर के समान होता है। आप लोग ऐसी अवस्था में मुझसे सांसारिक भावों का राजा बनने के लिए कहोगे तो क्रिया (विधि) विपरीत हो जायेगी और क्रिया के विपरीत हो जाने पर सब कुछ उल्टा हो जायेगा। यहाँ भाव रत रूपी भरत कहना चाहता है कि अगर मैंने सांसारिक सुख भोगों में रमण शु डिग्री कर दिया तो क्रिया विपरीत होकर सब भावों को आत्मा से विमुख कर देगी और माया का प्रभाव छा जायेगा। परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।। सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।। व्याख्या : परिहरि अर्थात् प्रकृति के प्रभाव को हरने वाले संसार में आत्मा व सुरता के समान कोई नहीं होता है। इस बात को कोई भी भाव नहीं कहते हैं। परन्तु मेरा ऐसा मत नहीं है अर्थात् मेरे मत के अनुसार तो आत्मा व सुरता प्रकृति के प्रभाव को हर लेती है और इनकी गति परमात्मोन्मुखी हो जाती है। इसलिए मैं ऐसा सुखपूर्वक सुनता हूँ क्योंकि जहाँ पर माया रूपी जल होता है, वहाँ पर विकार रूपी कीचड़ जरूर होता है। यहाँ भाव रत भाव स्पष्ट कह देते हैं कि मैं सुख भोग रूपी माया के भावों को सुखपूर्वक सुनता हूँ परन्तु जहाँ पर माया होगी वहाँ विकार होंगे ही होंगे, यह जानकर मैं सहमत नहीं होता हूँ। ड डिग्री न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु पर नाहिन सोचू।। एकइ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।। व्याख्या : इसलिए भाव रूपी संसार के लोग क्या कहेंगे, इसका मुझे डर नहीं लगता है और न परलोक की चिन्ता सताती है। बस मेरे हृदय में तो एक ही चिन्ता जल रही है कि मेरे कारण सुरता व आत्मा दु:खी हो रहे हैं। यहाँ साधना का बहुत गहरा अनुभव छुपा हुआ है। वास्तव में जब आत्म चेतना व सुरता परमात्मा में लग जाती है तो भाव रत भाव के कारण सुरता व चेतना में विचलन पैदा होता रहता है। यही विचलन सुरता व चेतना का दु:ख होता है। जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।। मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।। व्याख्या : जन्म लेने का लाभ तो लखन भाव ने उठाया है जो सब कुछ छोड़कर आत्म चेतना में लीन हो गए हैं। मेरा तो जन्म ही आत्मा रूपी राम के वैराग्य रूपी वन के लिए ही होता है। इसमें कुछ भी झूठ नहीं है। इसलिए तो असहज भाव अर्थात् सांसारिक भाव बैठ कर पश्चाताप कर रहे हैं। वास्तव में जब रजोवृति से त्याग रूपी भरत भाव पैदा होता है तो तभी जाकर आत्मा व सुरता में भावों के रमण की अवस्था अर्थात् भाव रत अवस्था आती है। जब भाव में भावों का रमण आत्मोन्मुखी हो जाता है तो सांसारिक सुख भोग के भाव पश्चाताप करने लगते हैं। उसी अवस्था की अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। दो0 आपनि दारून दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।। व्याख्या : भाव रत भरत कहता है कि आप सबकों मैं मेरी असहायता सिर झूकाकर बताता हूँ कि बिना आत्म दर्शन के मेरे हृदय की जलन नहीं मिटेगी। यहाँ भाव रत रूपी भरत भाव स्पष्ट कर देता है कि बिना आत्मोन्मुखी हुए हृदय की जलन शान्त नहीं हो सकती है। आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।। एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।। व्याख्या : मुझे आत्मोन्मुखी होने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं दीख रहा है क्योंकि बिना परमात्मा के अनुभूति के हृदय में कैसे समझ आयेगा? इसलिए मेरे मन में तो एक ही बात दृढ़ हो गयी है कि प्रात:काल अर्थात् पूर्ण स्फूर्ति व उमंग के साथ आत्मोन्मुखी हो जाऊँ। जद्यपि मैं अनभल अपराधी। मैं मोहि कारन सकल उपाधी।। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।। व्याख्या : हालाँकि मैं बुरा करने का अपराधी हूँ अर्थात् विषयों के रस में भी रमण करने वाला हूँ और इसलिए सब कष्टों का कारण भी हूँ। परन्तु मुझ भाव रत भरत को सामने देखकर अर्थात् आत्मोन्मुखी देखकर वे मेरा सब अपराध क्षमा कर देंगे और मुझ पर विशेष कृपा करेंगे। सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।। अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहता है कि आत्मा शील, संकोची, पवित्र व सरल स्वभाव वाली होती है और सहज प्रेम व कृपा की घर होती है। निर्मल आत्मा का तो कोई शत्रु होता ही नहीं है फिर किसी का बुरा कैसे कर सकती है। इसलिए मुझ भाव रत रूपी बालक को बच्चा व सेवक मानकर क्षमा कर देंगे, भले ही मैं विमुख वृति वाला ही क्यों ना होऊँ। तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।। जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।। व्याख्या : इसलिए भाव रत रूपी भरत भाव पाँचों इन्द्रियों रूपी पंच समाज से कहता है कि अगर तुमको मेरा (भाव रत भाव) आत्मोन्मुखी होना अच्छा लगे तो मुझे आत्मोन्मुखी होने का आशीर्वाद व आज्ञा अर्थात् प्रेरणा करो। क्योंकि मेरी विनय को सुनकर अर्थात् भाव रत भाव के प्रभाव में आकर आत्मा रूपी राम पुन: चित रूपी राजधानी में आ सकते हैं। दो0 जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।। व्याख्या : हालाँकि मेरा अर्थात् भाव रत रूपी भरत भाव का जन्म रजोवृति रूपी माता से होता है इसलिए भरत भाव समस्त भावों का भरणपोषण करने वाला होता है। अत: सदैव दोषयुक्त होता है। परन्तु आत्मा के प्रति लगन व समर्पण आ जाने पर भाव रत भाव को आत्मा अपना लेती है। इसी बात का भरत भाव को पूरा भरोसा होता है। भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।। लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत के वचन समस्त भावों को प्रिय लगे क्योंकि वे आत्मा के प्रेम रस में सने हुए थे अर्थात् आत्मा के प्रति प्रेम की भावना लिए हुए थे। भाव रत भरत के वचनों को सुनकर जो भाव आत्मा के वियोग रूपी जहर से अचेत पड़े थे, वे सब मानों संजीवन मंत्र सुनकर जाग उठे हों। अर्थात् समस्त भावों में आत्मा में लीन होने की भावना संचरित हो उठी। मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।। भरतहि कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब भाव रत रूपी भरत भाव भी आत्मोन्मुखी हो उठता है, तो समस्त नर-नाड़ियों, ज्ञान व देह के भावों में प्रेम की उमंग उठने लग जाती है, जिससे आत्म दर्शन की व्याकुलता पैदा हो जाती है। उस अवस्था में सभी भाव रत रूपी भरत भाव की सराहना करने लगते हैं और कहने लगते हैं कि भरत भाव तो आत्म प्रेम की मूर्ति हैं। तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।। जो पावँ डिग्री अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।। व्याख्या : भरत भाव ऐसा क्यों नहीं कहेगा क्योंकि भाव रत रूपी भरत के लिए तो आत्मा प्राणों के समान प्रिय होती है। जो अपनी मूर्खता के कारण जड़ हो गए हैं, वे लोग ही रजोवृति रूपी माता की कुटलिता में आपकी सहमति बताते हैं अर्थात् जिनको भावों का मर्म समझ नहीं आता है, वे ही ऐसी बातें करते हैं कि भरत रूपी भाव सुख भोग चाहते हैं। सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।। अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।। व्याख्या : ऐसे मूर्ख लोग कठोर नरक अर्थात् घोर चिन्ता में पड़ जाते हैं और जैसे-जैसे उनके भावों की कल्पना होती रहती है वैसा-वैसे उनकी चिन्ता (नरक) बढ़ती रहती है। चिन्ता बढ़ने की अवस्था को ही नरक का घर कहा जाता है। मणि सर्प के अवगुणों को ग्रहण नहीं करती है बल्कि विष और दरिद्रता को दूर कर देती है। वैसे ही जब भाव आत्मा में रमण करने लग जाते हैं तो वे सांसारिक विकारों को दूर कर देते हैं। इन चौपाइयों में भाव रत अवस्था को मणि की संज्ञा दी गयी है। क्योंकि जब भावों की भावना आत्मोन्मुखी हो जाती है, तो विषय रूपी जहर और आसक्ति रूपी गरीबी दूर हो जाती है। दो0 अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबुन दीन्ह।।184।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव की बातें सुनकर सभी भाव रूपी समाज ने दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चलने की हाँ कर दी। सभी भावों को उस समय भरत भाव का मत शोक रूपी समुद्र में डूबते हुए को आधार प्रदान कर दिया। इसलिए सभी भाव कहने लगे कि अवश्य दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चलना चाहिये। हे भाव रत रूपी भरत! तूने तो हम सबको शोक समुद्र में डूबने से बचने के लिए आधार प्रदान कर दिया है। भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।। चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रान प्रिय भे सबही के।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत रूपी भरत भाव की आत्मोन्मुखी होने की बातें सुनकर सभी भावों को बहुत प्रसन्नता हुई जैसे बादलों की आवाज सुनकर चातक व मोर पक्षियों को प्रसन्नता होती है। प्रात:काल अर्थात् नव स्फूर्ति व लग्न के साथ आत्मोन्मुखी हुआ जानकर भरत भाव सभी भावों का प्राण प्रिय हो गया। मुनिहि बंदि भरतहि सि डिग्री नाई। चले सकल घर बिदा कराई।। धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सभी भाव मन की एकाग्रता के सामने समर्पित हो गए। उसी को मुनि (मन की एकाग्रता) की वन्दना करना बताया गया है। उस अवस्था में समस्त भाव भरत भाव का ही अनुसरण करने लगते हैं। उसी अनुसरण करने की बात को भरत को सीस झुकाना बोलकर लिखा गया है। जब भाव मन की एकाग्रता व भरत के प्रति समर्पित हो जाते हैं, तो सहजता आ जाती है। उसी सहजता को घर जाने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में सभी देह भाव, भाव रत भरत के प्रेम व शील की सराहना करने लगते हैं तथा भाव रत भरत भाव के जन्म को धन्य मानने लगते हैं। कहहिं परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।। जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदन मारी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सभी भाव आपस में बातें करने लगते हैं कि आज बड़ा कार्य हो गया अर्थात् हम सब आत्मोन्मुखी होने चल दिए हैं। इसलिए सभी भाव सहज होकर चलने लगे। जिस भी भाव को घर की रखवाली के लिए रखना चाहते हैं (अर्थात् कोई भी भाव अब देह नगरी में रहना नहीं चाहता है), उसे ही ऐसा लगता है मानो उसकी गर्दन काट दी हो। कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।। व्याख्या : उस ध्यान अवस्था में कुछ भाव कहते हैं कि किसी भी भाव को देह रूपी नगर के घर में रहने को मत कहिए क्योंकि कौन ऐसा भाव है, जो आत्मोन्मुखी होने का लाभ नहीं उठाना चाहेगा? दो0 जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।। व्याख्या : भाव ध्यान की उस अवस्था में आपस में बातें करते हुए कहने लगते हैं कि वे सम्पत्ति, घर, सुख, सुहृदयी, माता, पिता व भाई जल जाएँ अर्थात् ऐसे भाव नष्ट हो जाएँ, जिनके चिंतन से आत्मोन्मुखी होने में सहज सहायता नहीं मिलती हो। संक्षेप में कहना चाहते हैं कि जो आसक्ति के भाव हैं, वो जलकर नष्ट हो जाएँ। जिससे सहजतापूर्वक आत्मोन्मुखी हुआ जा सके। घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।। भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नग डिग्री बाजि गज भवन भँडारू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में देह के चक्र रूपी घरों में वृति रूपी नाना वाहन सजने लगे तथा भावों के हृदय में आत्मोन्मुखी होने की खबर से उमंग छा गयी। भाव रत रूपी भरत ने सहज होकर विचार किया कि देह रूपी नगर, मन रूपी घोड़े, व वृति रूपी हाथी आदि भाव सब आत्मा की ऊर्जा से ही पैदा होते हैं। संपति सब रघुपति कै आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही।। तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साईं दोहाई।। व्याख्या : समस्त भाव रूपी सम्पति आत्मा की ऊर्जा से ही पैदा होती है। अत: बिना युक्ति के भावों को छोड़कर या दमन करके जाना उचित नहीं होगा। क्योंकि अगर बलपूर्वक भावों व इच्छाओं का दमन किया जायेगा, तो चिन्ता रूपी पाप लगेगा क्योंकि बलपूर्वक दमन से इन्द्रियाँ स्रावित होकर चिन्ता रूपी पाप पैदा कर देती हैं। करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।। अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।। व्याख्या : जो स्वामी की भलाई करे वही सच्चा सेवक होता है, चाहे दूसरा कितना ही दोष लगाए। अर्थात् वे ही भाव निर्मल होते हैं, जो आत्मोन्मुखी होते हैं। चाहे दूसरे विषयी भाव कितने प्रभावी क्यों ना हों। ऐसा विचार कर भाव रत रूपी भरत भाव ने संयम रूपी सेवक भावों को बुलाया अर्थात् संयम के भावों में दृढ़ता पैदा की, जो सपने में भी विषयों में आसक्त नहीं हो सके। ध्यान में आत्मोन्मुखी होने पर कोई विषयी भाव व्यवधान पैदा नहीं कर दे, इसलिए भाव रत रूपी भरत भाव ने संयम रूपी सेवकों से दृढ़ता पैदा कर दी। कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।। व्याख्या : संयम रूपी सेवक के भावों को धारणा का सब रहस्य भावों की योग्यता के अनुसार समझाकर भाव रत-भरत युक्तिपूर्वक संयम में दृढ़ता बढ़ाकर सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के पास गए। अर्थात् ध्यान में अब भाव रत भरत भाव सुष्मना नाड़ी में प्रवेश कर गया। भाव रत रूपी भरत का सुष्मना में प्रेवश करना ही कौशल्या के पास भरत का जाना बताया गया है। दो0 आरत जननी जान सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता जो आत्मा रूपी राम के विरह में दु:खी थी, ने भरत रूपी भाव के प्रेम को जान लिया और पालकी बनाने के लिए बोली अर्थात् ध्यान को उर्ध्वगामी करने को बोली और सहज सुखासन की प्रेरणा की। चक्क चक्की जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।। जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।। व्याख्या : देह स्थित नारियाँ चकवा व चकवी की तरह व्याकुल हो रहे थे तथा सभी उत्सुकतापूर्वक ज्ञान रूपी प्रात:काल की इंतजार कर रहे थे। इस प्रकार लगन पूर्वक जागे रहने से वासना रूपी अज्ञान रात्रि मिट गयी। तब भाव रत रूपी भरत भाव ने मंत्रणा रूपी भावों को बुलाया। कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू।। बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत ने मंत्रणा रूपी सचिवों से कहा कि आप सब तुरन्त राजतिलक का सामान सजा लो अर्थात् मन में भावों की दृढ़ता ले आओ कि हम सब आत्मोन्मुखी होंगे। आत्मोन्मुखी होने को ही मन की एकाग्रता द्वारा आत्मा रूपी राम को राज तिलक करना बोलकर लिखा गया है। वन में राज देने का तात्पर्य यह है कि सभी भाव आत्मोन्मुखी होकर दृढ़ वैराग्य में अवस्थित हो जायेंगे। इस बात को सुनकर मंत्रणा रूपी सचिव भाव जोहार करते हुए अर्थात् भाव रत रूपी भरत के आगे समर्पण करते हुए जल्दी चले और तुरन्त वृति रूपी रथों और नाग प्राण वायु को सँवारने लगे। जब सभी भाव ध्यान में उर्ध्वगामी होने लगते हैं, तो नाग प्राण वायु उर्ध्वगामी होकर भावों को उर्ध्वगामी करने में बहुत सहायक हो जाती है। उसी को नागों को सजाना बोला गया है। अरूंधती अ डिग्री अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।। बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।। व्याख्या : इन चौपाइयों में ध्यान की गति को बहुत सूक्ष्मता के साथ बताया गया है। जब ध्यान सुष्मना नाड़ी से उर्ध्वगामी होकर चढ़ने लगता है, तो सबसे पहले अरूंधती को चढ़ना बताया गया है। अरूंधती का मतलब पेड़ पर चढ़ने से होता है। अत: ध्यान में भी अरूंधती भाव को अग्नि के साथ वृति रूपी रथ पर सबसे पहले चढ़ना बताया गया है। जब प्राण ज्योति स्वरूप (अग्नि) होकर उर्ध्वगामी होने लगता है, तो अरूंधती भाव भी पेड़ पर चढ़ने के समान उर्ध्वगामी हो उठता है। उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान का भाव भी उर्ध्वगामी हो उठता है। उसी को अरूंधती व अग्निहोत्र सामग्री के साथ वशिष्ठ का रथ पर उठना बताया गया है। जब विशिष्ट ज्ञान का भाव उर्ध्वगामी हो जाता है तो विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वाले भावों का समूह (विप्रवृन्द) भी उर्ध्वगामी हो उठता है। उस अवस्था में तप की अवस्था आ जाती है अर्थात् मन के समस्त भावों में इन्द्रियों के भाव भी समा जाते हैं। इन्द्रियों के भावों का मन में समा जाना ही तप निधान कहलाता है। नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।। सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में शरीर रूपी नगर के सब भाव उर्ध्वगामी होकर चित्रकोष रूपी चित्रकूट के लिए रवाना हो गए अर्थात् देह के भाव, भाव रत रूपी भरत के साथ चित्रकोष के लिए चल दिए। उस अवस्था में समस्त भावों की वृतियाँ व प्रकृति निर्मल हो जाती है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। सुभग का मतलब सु अ भग अर्थात अच्छी प्रकृति या दूसरे शब्दों में निर्मल प्रकृति कह सकते हैं, से होता है। उस अवस्था में समस्त नाड़ियाँ रूपी रानियाँ भी उर्ध्वगामी हो जाती हैं। उसी को वृति रूपी रथ पर रानियों का चढ़कर जाना बताया गया है। दो0 सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।। व्याख्या : शरीर रूपी नगर में ध्यान की उस अवस्था में शून्यता छा जाती है परन्तु संयम का आभास बना रहता है। अत: उसी अनुभूति को देह रूपी नगर को निर्मल संयम के भाव रूपी सेवकों को सौंपकर आत्म चिंतन व सुरता में लीन होकर भाव रत भरत व शत्रुघ्न रूपी कामादि नाशक भाव चित्रकोष के लिए चल दिए। राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।। बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समस्त भाव व नर-नाड़ियों में आत्मोन्मुखी होने का उत्साह छा जाता है। इसी को राम के दर्शन की तीव्र अभिलाषा बोलकर लिखा है। उस समय भाव व नाड़ियों की गति ऐसी हो जाती है मानो जल को देखकर प्यासे हाथी और हथिनि उतावले होकर चल रहे हो। आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता दृढ़ वैराग्य रूपी वन में होने के कारण भाव रत भरत भाव व कामादि नाशक शत्रुघ्न भाव भी पूर्ण इच्छाहीन अवस्था में ही चित्रकोष के लिए चल दिए। इच्छाहीन अवस्था को भरत व शत्रुघ्न के पैदल चलने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।। जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव के आत्मा के प्रति प्रेम को देखकर सभी भाव अनुराग से भर गए और घोड़ों, हाथी व रथों रूपी वृतियों का त्याग करके अनुराग से भरकर ही उर्ध्वगामी होने लगे। तब सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या ने अपनी उर्ध्ववृति को स्थिर करते हुए भाव रत रूपी भरत को बोली। तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवा डिग्री दुखारी।। तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।। व्याख्या : हे वत्स! तुम वृति रूपी रथ पर चढ़ों वरना इच्छाहीन अवस्था में परिवार रूपी भाव अर्थात् दया, करूणा, मैत्री आदि के भाव दु:खी हो जायेंगे। क्योंकि तुम्हारा अनुसरण करते हुए ही सब भाव रूपी लोग चलेंगे। इच्छाहीन अवस्था में ये भाव रूपी लोग कमजोर हो जायेंगे और दृढ़ वैराग्य रूपी वन की राह पर नहीं चल पायेंगे। वास्तविकता यह है कि ध्यान में भी भाव बिना वृति के बल के उर्ध्वगामी नहीं हो पाते हैं। भावों को भी आत्मोन्मुखी होने के लिए वृति रूपी बल लगता ही है। परन्तु इच्छाहीन अवस्था में वृति कमजोर हो जाती है और इच्छा के कमजोर हो जाने पर भाव आत्मोन्मुखी राह पर नहीं चल पाते हैं। सिर धरि बचन चरन सि डिग्री नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।। तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।। व्याख्या : तब भाव रत रूपी भरत ने व कामादि नाशक शत्रुघ्न ने सुष्मना नाड़ी रूपी माता के सामने समर्पण कर दिया और सद्वृति रूपी पथ पर चढ़कर दोनों भाव रूपी भाई चले। जब देह के भाव उर्ध्वगामी होकर चलते हैं, तो तमस कोष पर प्रथम पड़ाव होता है तथा तमस कोष अर्थात् तामसिक गुणों का मर्म जब समझ में आ जाता है तो दूसरा पड़ाव गोमती का तट होता है अर्थात् देह बुद्धि से अब इन्द्रिय बुद्धि का कोष आ जाता है। जहाँ पर ध्यान लगने पर इन्द्रियों का मर्म समझ में आने लग जाता है और साधक दृष्टा बन कर इन्द्रियों के व्यवहार को देखने लगता है। उसी अनुभूति को गोमती का तट कहा गया है। दो0 पथ अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में कुछ भाव दूध पीते हैं अर्थात् निर्मल सात्विक इच्छा ग्रहण करते हैं, तो कुछ फल अर्थात् सात्विक भोग की इच्छा करते हैं, तो कुछ अज्ञान रूपी रात्रि के प्रभाव में आकर एक बार ही भोजन करते हैं अर्थात् कभी-कभी कोई एक इच्छा पैदा हो जाती है। इस प्रकार आत्मोन्मुखी होने के लिए भावों ने वासनाओं की आसक्ति का त्याग कर दिया। सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।। समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।। व्याख्या : सई नदी के तट का साधना में गहरा रहस्य होता है। जब साधक तमस कोष को पार करके गोमती अर्थात् गो अ मती यानी इन्द्रिय बुद्धि के मर्म को समझ कर दृष्टा की अवस्था को समझ लेता है तो फिर परमात्मा से मिलने की ललक और तीव्र हो उठती है और लगन स्थिर होने लग जाती है तथा साधक के लिए यम-नियम के बन्धन भी शिथिल पड़ जाते हैं। उसी अवस्था को सई नदी अर्थात् परमात्मा से मिलने की तीव्र लगन रूपी नदी कहा गया है। जब सई नदी को साधक साधना में पार कर लेता है, तो श्रृंगबेरपुर कोष नजदीक आ जाता है। श्रृंगवेरपुर मस्तिष्क का वह कोष है, जिसमें निषेध भाव प्रबल होता है अर्थात् साधक के अन्दर विषयों से बचने का विवेक पैदा हो जाता है। इसलिए श्रृंगवेरपुर का राजा निषाध को बताया गया है। श्रृंगवेर ऐसा कोष है, जिसमें सद्वृतियों की तरंगें उठती हैं तथा आसुरी वृतियों का निषेध होता रहता है। इसलिए यहाँ के निषाद् रूपी निषेध भाव को आत्मा रूपी राम का मित्र बताया गया है। जब निषेध भाव रूपी निषाद ने भाव रत रूपी भरत के आगमन की खबर पायी तो हृदय में सोचकर विषाद छा गया। निषाद के हृदय में विषाद का कारण यह होता है कि भाव रत रूपी भरत भाव तो आत्मा का प्रिय होता है परन्तु भाव रत भाव के साथ तो देह भावों की सेना व प्रजा है। अत: इन सबका निषेध कैसे होगा। इस विचार के कारण विषाद पैदा हो गया। वास्तविकता में श्रृंगवेरपुर मस्तिष्क का वह कोष होता है जिसमें समस्त भावों का शुद्धिकरण होता है और जो सात्विक भाव होते हैं, वे आगे के कोषों में जाते हैं और जो आसुरी भाव होते हैं, उनका वहीं पर निषेध हो जाता है। कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।। जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाद मन में ध्यान की उस अवस्था में विचार करने लगता है कि भाव रत रूपी भरत भाव के मन में कुछ कुटिलता है, वरना देह के भावों रूपी सेना को क्यों साथ में लिया है? निषेध भाव रूपी निषाद सोचता है कि अगर भाव रत भरत आत्मोन्मुखी होना चाहता है, तो देह के सुख भोग रूपी भावों को क्यों साथ में लिए हुए है? जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।। भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।। व्याख्या : निषेध रूपी निषाद भाव सोचता है कि भाव रत रूपी भरत क्या आत्मा रूपी राम व लखन भाव को जीतकर अकंटक भावों का अधिष्ठाता बनना चाहता है। परन्तु भाव रत भरत को राजनीति समझ में नहीं आयी है अर्थात् आत्मा का राज (रहस्य) समझ में नहीं आया है। आत्मा को वनवास रूपी दृढ़ वैराग्य होने से विषयों में रमण करना तो असहजता पैदा कर देता है और आत्मोन्मुखी होने पर भावों का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं बच पाता है अर्थात् भाव आत्मा में ही लीन हो जाते हैं। अत: इसी अनुभूति को ""जीवन हानी"" बोलकर लिखा गया है। सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीत निहारा।। का आचरजु भरतु अस करहीं।नहीं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाद भाव सोचता है कि अगर समस्त आसुरी और दैवीय भाव भी आत्मा के साथ युद्ध करने लग जाएँ, तो भी आत्मा रूपी राम को कोई भाव अपने वश में नहीं कर सकता है। परन्तु इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भाव रत रूपी भरत भाव आत्मा रूपी राम को वश में करने को चले हैंक्योंकि रजोवृति रूपी विषयी बेल से उत्पन्न भाव तो विषय रूपी जहर ही उगलता है। अर्थात् भाव रत रूपी भरत रजोवृति रूपी कैकयी से उत्पन्न होने के कारण निषेध भाव रूपी निषाद को लगता है कि विषयी सुख भोगों के लिए भाव रत भरत आत्मा व सुरता को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में अकेला जानकर वश में करना चाहता है। दो0 अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत के बारे में विचार करके निषेध भाव रूपी निषाद ने अपनी जाति के भावों से कहा कि तुमलोग सावधान हो जाओ अर्थात् अपनी-अपनी वृति को दृढ़ कर लो। भावों को पार करने वाली नाव को पकड़ लो अर्थात् नाड़ी की धड़कन को स्थिर कर लो और भावों के घाटों को रोक लो। होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठारहु सकल मरै के ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।। व्याख्या : तुम सावधान होकर भावों के घाटों को रोक लो अर्थात् नाड़ी की धड़कन को स्थिर करके भावों की गति को ही रोक लो। इस प्रकार सब भाव मरने का सामान सजा लो। वास्तविकता में जब नाड़ी की धड़कन किसी कोष में स्थिर हो जाती है, तो नए भावों की उत्पत्ति तो बन्द हो ही जाती है और पुराने भाव भी शान्त होना शु डिग्री हो जाते हैं। निषेध भाव रूपी निषाद कहता है कि मैं भाव रत भरत भाव का सामना करूँगा और जीते जी आनन्द रूपी गंगा को पार नहीं होने दूँगा। ध्यान में भावों में बहुत सूक्ष्मता से प्रतिक्रियाएँ होती हैं। निषेध भाव रूपी निषाद भाव भावरत रूपी भरत भाव का भी निषेध करना चाहता है, जिससे आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के आनन्द में व्यवधान नहीं पहुँचे। उसी भाव स्थिति को भरत का सामना करना बताया गया है। समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।। भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव के साथ युद्ध और वह भी आनन्द की सुरसरि रूपी गंगा के तट पर होगा तो मेरा शरीर आत्मा रूपी राम के कार्य में आ जायेगा। अर्थात् मेरा शरीर चला भी जायेगा तो आत्मा के चिंतन में ही काम आयेगा। भाव रत भाव नर की धड़कन में (नृप) रहता है और मैं निषेध भाव नाड़ी की नीच गति में रहता हूँ। अत: ऐसा मरण तो मुझे बड़े भाग्य से मिलेगा। निषेध भाव कहना चाहता है कि अगर मैं भाव रत भरत का सामना नहीं कर पाया तो कम से कम मैं भाव में लीन होकर आत्मोन्मुखी तो हो जाऊँगा। उसी को राम काज आना बताया गया है। स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।। तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।। व्याख्या : मैं निषेध भाव रूपी निषाद भावों के युद्ध में लड़कर आत्मा रूपी स्वामी का कार्य करूँगा, जिससे चौदह भुवन अर्थात् चौदह भावों के कोष (दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित, अहंकार) निर्मल हो जायेंगे। अगर मैंने आत्मा रूपी राम के लिए प्राण छोड़ दिया, तो भी मेरे दोनों हाथों में लड्डू होंगे। साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।। जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।। व्याख्या : जो भाव साधना के भावों में नहीं गिना जाता है, वह आत्मोन्मुखी होकर भयहीन (भक्ति) अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाता है। ऐसे भाव का तो जन्म लेना भी भार के समान ही होता है और नाड़ी रूपी माता के यौवन के लिए कुल्हाड़े का काम करता है। दो0 बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।। व्याख्या : ऐसा विचार करके निषेध भाव रूपी निषाद शोक रहति हो गया और सभी निषेध वृति के भावों का उत्साह बढ़ा दिया। उस अवस्था में आत्म चिंतन करके निषेध भाव रूपी निषाद ने वासना भोगों से बचने के लिए कवच लगा लिया और इच्छाओं रूपी धनुष को हाथ में ले लिया और दृढ़ता रूपी तरकश बाँध लिया। बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।। भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।। व्याख्या : सभी निषेध भावों को उत्साहित करते हुए निषाद भाव ने कहा कि तुम सब जल्दी साज सज लो अर्थात् देह भावों से युद्ध करने के लिए तैयारी कर लो। मेरी आज्ञा सुनकर देह भावों से डरना नहीं है। निषेध भाव रूपी निषाद की बातें सुनकर सभी श्रृंगवेर कोष के भावों ने हर्ष पूर्वक बहुत अच्छा कहा और एक से एक निषेध वृति के भाव देह भावों से लड़ने के लिए उत्साह दिखाने लगे। चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।। सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।। व्याख्या : निषेध वृति के सब भाव निषाद रूपी भाव को जोहार करके देह भावों से युद्ध की इच्छा करके तैयार हो गए। ध्यान की अवस्था में भावों का यह सूक्ष्म युद्ध समझ में आ पाता है। इसलिए जब कभी गहरा ध्यान लगा रहता है तो अचानक नए-नए भाव पैदा होकर मन को उलझा देते हैं। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। सब निषेध वृति के भावों ने आत्मोन्मुखी होकर नियम संयम रूपी बाणों की मुट्ठी भरकर धनुष पर चढ़ा लिए। अर्थात् इच्छा रूपी धनुष पर नियम-संयम रूपी बाण चढ़ा लिए क्योंकि जब देह भावों से इच्छाएँ पैदा होती हैं, तो नियम-संयम के द्वारा ही उन इच्छाओं के प्रभाव से बचा जा सकता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।। एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़ें।। व्याख्या : यम-नियम रूपी कवच लगाकर संयम रूपी कूँड़ि (हेल्मेट) सिर पर रखकर निषेध वृति वाले भाव दम रूपी फरसा को दृढ़ता रूपी पत्थर पर घिसकर तेज धार करने लगते हैं। निषेध वृति के भावों में कुछ भाव तो विषयी इच्छाओं रूपी तलवार से बचने में कुशल होते हैं, तो कुछ भाव आत्मोन्मुखी होने के उत्साह व उमंग में आकाश में उछलने लगते हैं अर्थात् उर्ध्वगामी होने लगते हैं। निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।। देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।। व्याख्या : सभी निषेधवृति के भावों ने अपनी वृति के अनुसार भाव रूपी साज-सामान बना लिया और सब निषाद भाव रूपी गुह की जोहार करने लगे। निषेध भाव रूपी गुहराज ने सब निषेध वृति के भावों की प्रबलता को देखकर नाम ले लेकर उत्साहित करके सम्मान प्रदान किया अर्थात् सभी भावों में देह भावों को नकार कर आत्मोन्मुखी होने की वृति समान स्तर पर आ गयी। उसी को सम्मान अर्थात् सम अ मान देना बताया गया है। दो0 भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी गुह राज बोला कि हे भाइयों! तुम मन में धोखा मत खाना क्योंकि आज मेरा बड़ा कार्य पड़ा है। अर्थात् निषेध भाव रूपी निषाद अपने भाव रूपी भाइयों से कहना चाहता है कि तुम देह भावों से धोखा मत खा जाना अर्थात् उनके प्रति आकर्षित मत हो जाना क्योंकि हमको तो आत्मोन्मुखी होना है। ऐसा सुनकर सभी भाइयों रूपी भाव बोले कि हे निषेध भाव रूपी वीर! तुम अधीर मत होवो। राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।। जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रूंड मुंडमय मेदिनि करहीं।। व्याख्या : हम आपके (निषेध वृति) के बल और आत्मा रूपी राम के प्रताप से देह भावों की भाव रूपी सेना को माया रहित कर देंगे अर्थात् देह के भावों के प्रभाव को निष्प्रभावी कर देंगे। हम जीते जी पीछे नहीं हटेंगे और इस निषेध वृति के श्रृंगवेरपुर रूपी कोष को माया के भावों से रहित कर देंगे। अर्थात् माया के भाव परास्त हो जायेंगे। दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।। एतना कहत छींक भइ बाएँ। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।। व्याख्या : निषेध रूपी निषाद भाव ने निषेध भावों के उत्साह को देखा तो कहा कि युद्ध के लिए ढोल बजा दो अर्थात् देह भावों का निषेध कर दो। इतना कहते ही बाँयी तरफ छींक हो गयी। वास्तविकता में जब ध्यान में निषेध वृतियाँ देह वृतियों का निषेध करके निर्मलता पैदा करती हैं, तो साधक के बाएँ अंगों में फड़फड़ाहट होने लग जाती है। उसी फड़फड़ाहट को बाएँ छींक होना बोला गया है। जब ध्यान में अंग फड़कने लग जाएँ, तब साधक को समझ लेना चाहिए कि अब कुछ बात बनने वाली है। उसी अनुभूति को शरीर रूपी खेत में सगुण होना बोलकर लिखा गया है। बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।। रामहिं भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।। व्याख्या : अनुभवी साधक रूपी बूढ़ा बाएँ अंग फड़कने के सगुनों का विचार करके कहता है कि बाएँ अंगों की फड़कन से भाव रत रूपी भरत से मिलना होता है और भावों का द्वन्द्व मिट जाता है। क्योंकि जब सभी भाव आत्मा में रत अर्थात् रमण करने लग जायेंगे, तो फिर तो सहजता स्वत: ही आ जाएगी। क्योंकि आत्मरत भाव होने पर सहजता आना स्वभाविक हो जाता है। उसी को भाव रत रूपी भरत का आत्मा रूपी राम को मनाने जाना बताया गया है। सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।। व्याख्या : अनुभवी साधक की बात सुनकर निषेध भाव रूपी गुह राज कहता है कि अनुभव ही सही होता है। सहसा करके अर्थात् अचानक किसी निष्कर्ष पर पहुँचने पर तो मूर्ख लोग पश्चाताप करते हैं। अत: भाव रत रूपी भरत भाव के स्वभाव व शील को समझे बिना भावों में द्वन्द्व पैदा करने से तो बड़ी हानि हो जाती है। अर्थात् बिना भावों की भावना को समझे सहसा किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिये। दो0 गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आई।।192।। व्याख्या : इसलिए निषेध भाव रूपी निषाद कहता है कि तुम निषेध वृति रूपी वीरों तुम सुरसरि रूपी आनन्द धारा के घाटों को रोक लो और मैं मिलकर भाव रूपी भरत के मर्म को जान लेता हूँ। जब मैं मित्रता या शत्रुता जैसा भी इशारा करूँ, उसके अनुसार आप लोग कार्यवाही करना। यहाँ पर निषेध भाव बहुत ही सूक्ष्मता से भाव रत भरत के मर्म को जानना चाहता है। क्योंकि अगर देह भाव आत्मोन्मुखी होकर निर्मलता व सहजता के साथ अगर चित्रकोष के लिए जा रहे हैं, तब तो भावों में द्वन्द्व पैदा करने से क्या लाभ है? तब तो सहजता का अनुसरण करना ही उचित होगा। लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बै डिग्री प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।। अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाद राज कहता है कि भावों की सहजता व असहजता छुपाने से नहीं छुपती है, वो सहज में प्रकट हो जाती है। ऐसा कहकर निषेध वृति रूपी निषादराज भावों रूपी भेंट सजाने लगे। उन भाव रूपी भेंटों में इच्छा रूपी कंद-मूल, फल और आसक्ति आदि के भाव थे। वास्तविकता में ध्यान की उस अवस्था में निषेध भाव के सामने इच्छा और इच्छा फलों के भाव पैदा हो जाते हैं। उन्हीं इच्छा व फलों की आसक्ति के आधार पर ही भाव रत रूपी भरत की असल पहचान हो पाती है कि वास्तव में देह भाव चाहते क्या हैं? उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर यहाँ लिखा गया है। मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।। मिलन साजु सजि मिल सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।। व्याख्या : जब ध्यान में निषेध वृतियाँ प्रबल होती हैं, तो देह भावों में छुपी हुई पुरानी इच्छाएँ, पुराने भोगासक्ति के भाव प्रकट होने लगते हैं। उस अवस्था में साधक इन सब पुरानी इच्छाओं व पुराने भोगासक्ति के भावों का त्याग करने को तैयार हो जाता है। अत: उसी अवस्था की अनुभूति को पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियों के थार भर-भर करके भेंट देने की तैयारी कहा गया है। इस प्रकार सब प्रकार की वस्तुएँ लेकर मिलने के लिए निषाद राज रूपी भाव चला अर्थात् निषेध भाव प्रकट हुआ तो मंगल के मूल शुभ सगुन होने लगे। क्योंकि जब पुरानी दमित इच्छाओं के त्याग की भावना साधक के मन में आ जाती है, तो वही मंगल का मूल हो जाती है। देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।। जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।। व्याख्या : इन चौपाइयों में निषेध वृति के भावों और देह भावों के मिलने की अनुभूति को बहुत सूक्ष्मता के साथ बताया गया है। निषादराज रूपी निषेध वृति के भाव ने मन के भावों को देख कर दूर से अपना नाम बताकर प्रणाम किया। तब मन की एकाग्रता रूपी विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ मुनि ने भाव रत रूपी भरत को समझाकर बताया कि ये निषाद रूपी निषेध भाव आत्मा रूपी राम का बहुत प्रिय है। मन की एकाग्रता रूपी वशिष्ठ भाव ने फिर निषेध भाव रूपी निषाद को बल प्रदान किया, उसी को मुनि द्वारा आशीर्वाद देना कहा गया है। राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।। गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहा डिग्री माथ महि लाई।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव ने जब सुना कि निषाद रूपी निषेध भाव आत्मा रूपी राम का बहुत प्रिय होता है, तो भाव रत भरत भाव ने वृति रूपी रथ का त्याग कर दिया और अनुराग में भरकर निषाद रूपी निषेध भाव से मिलने चला। वास्तविकता यह है कि जब साधक निषेध वृति के सम्पर्क में आता है, तब उसकी वृतियाँ भी बदल जाती हैं और वह अनुराग से भर जाता है। तब निषेध भाव रूपी निषाद ने अपना गाँव, जाति व नाम बताया अर्थात् अपनी अवस्था, वृति व स्वभाव बताया और भाव रत भरत के आत्मा के प्रति अनुराग को देखकर सीस झुकाया अर्थात् समर्पण कर दिया। दो0 करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ।।193।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाद भाव को समर्पण करता हुआ देखकर भाव रत रूपी भरत भाव ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया। तब भाव रत भरत भाव को ऐसा लगा कि मानो लखन भाव से (लक्षणों को लखने वाले भाव) भेंट हो गयी हो। उस समय भाव रत भरत भाव के हृदय में प्रेम नहीं समा रहा था। निषाद से मिलने की तुलना लखन (लक्ष्मण) से मिलने से की गयी है क्योंकि लखन भाव भी लक्षणों को पहचानता है और निषेध भाव भी लक्षणों को पहचानता है। भेंटत भरतु ताहि अति प्रींती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।। धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में निषेध भाव रूपी निषाद भाव रत रूपी भरत से बहुत प्रेम से मिला, जिसे देखकर अन्य भाव प्रेम की रीति की सराहना करने लगे। क्योंकि आत्मा में रत भाव रत रूपी भरत और निषेध रूपी निषाद का मिलना मंगल का मूल होता है । उस अवस्था में स्वरों की गति सहज हो जाती है तथा आनन्द रूपी फूलों की वर्षा होने लग जाती है। लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।। तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।। व्याख्या : जो निषेध का भाव होता है, वो लोक मत व वेद के अनुसार नीचा होता है और निषेध वृति का प्रभाव पड़ते ही देह आदि के भाव पवित्र हो जाते हैं। अत: उसी निषेध वृति रूपी निषाद भाव को भाव रत रूपी भरत गले मिलने लगा अर्थात् देह भावों में निषेध वृति के प्रति सहजता आ गयी। ऐसी भावों की मिलन अवस्था आ जाने पर शरीर के अंग पुलकित हो उठते हैं। राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।। यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।। व्याख्या : जो उबासी लेते समय भी आत्मा रूपी राम का नाम लेते हैं, उनको भी चिंता के भावों का समूह नहीं सताता है। अत: यह तो निषेध भाव रूपी निषाद है, जिसे आत्मा रूपी राम ने छाती से लगाया है अर्थात् सांसारिक सुखों की निषेधवृति सदैव आत्मा को प्रिय होती है। उसी को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा है। जब निषेध वृति आत्मोन्मुखी हो जाती है, तो समस्त सांसारिक भाव भी निर्मल व पवित्र हो जाते हैं। करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।। उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।। व्याख्या : जब निषेध वृति की प्रबलता से साधक के कर्मों का बंधन नष्ट हो जाता है, तो आनन्द की सुरसुरि उठने लग जाती है। उस आनन्द की अवस्था को कौन है जो सिर पर धारण नहीं करेगा अर्थात् स्वीकार नहीं करेगा। यहाँ पर साधना का बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। कर्मनाश का मतलब कर्म फल के प्रति आसक्ति के भाव के नाश से होता है। जब फल की आसक्ति मिट जाती है तो आनन्द की तरंगें उठने लग जाती हैं। उन आनन्द की तरंगों को ही सुरसरि (गंगा) के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उल्टा नाम जपने का भी गहरा रहस्य है और इसमें ही सफलता का मंत्र छुपा हुआ है। राम नाम को उल्टा जपने का मतलब मरा मरा जपने से नहीं है। राम का नाम साधक के प्राण की गति की ध्वनि होता है। साधारणत: ऐसा लगता है कि श्वाँस बाहर से भीतर आ रही है और भीतर से बाहर जा रही है। परन्तु ध्यान की परिपक्व अवस्था आ जाने पर समझ में आता है कि प्राण नाभी मण्डल से रा ध्वनि के साथ उठ रहा है और म ध्वनि के साथ निकल जा रहा है। जब राम के नाम के साथ प्राण की गति लयबद्ध हो जाती है, तब रा के साथ प्राण नाभी से भीतर से उठता है और म के साथ निकल जाता है। तब उस अवस्था में प्राण की उल्टी गति समझ में आती है। उसी को उल्टा नाम जपना कहा गया है। बाल्मीकि मुनि इसी ध्यान विधि का अनुसरण करके ब्रह्ममय हो गया था। दो0 स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।। व्याख्या : इस प्रकार उल्टा नाम जपने से (रा के साथ श्वास नाभी से उठ रहा है और म के साथ निकल रहा है) स्वपच अर्थात् स्वार्थ के भाव, सबर अर्थात् संतोष के भाव, रइस अर्थात् तमस भाव, जमन अर्थात् मन की लालसा भाव, जड़ अर्थात् जिद्दी भाव और कोल-किरात रूपी भोग-वासना के भाव परम पवित्र होकर समस्त भावों के कोषों में छा जाते हैं। अर्थात् उल्टा नाम जप करने से सात्विक, राजसिक व तामसिक सब भाव परम पवित्र हो जाते हैं। नहिं अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।। राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं।। व्याख्या : इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उल्टा नाम जपने से क्षण-क्षण में भावों में निर्मलता बढ़ने लगती है और समस्त भाव आत्मोन्मुखी हो उठते हैं। राम के नाम की महिमा का आभास तो स्वरों (सुरों) के माध्यम से अपने-आप होने लग जाता है। इस प्रकार राम के नाम की महिमा को सुन-सुनकर देह रूपी अवध के भाव निर्मल होकर सुख का अनुभव करने लगते हैं। राम सखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।। देखि भरत कर सीलु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के सखा भावों से प्रेम पूर्वक मिलकर भाव रत भरत भाव ने कुशल क्षेम और मंगल के बारे में पूछा। उस अवस्था में भाव रत भरत भाव के शील व स्नेह को देखकर निषेध रूपी निषाद भाव विदेह हो गया अर्थात् परम सहज हो गया। सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।। धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।। व्याख्या : ऐसी अवस्था में निषेध भाव रूपी निषाद का संकोच, प्रेम व मन का आनन्द बढ़ गया और भाव रत भरत भाव को देखकर स्थिर हो गया। स्थिर हो जाने को ही चितवत होना कहा गया है। फिर निषेध रूपी निषाद भाव ने भाव रत भरत भाव के सामने समर्पण करते हुए प्रार्थनापूर्वक कहा। कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।। अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।। व्याख्या : निषाद भाव बोला कि आपके चरण कमलों को देखना ही तो मंगल का मूल होता है। अर्थात् आत्मा में रत भाव की मूल भावना यानी निरासक्त भावना ही मंगल का मूल होती है। भाव रत भरत भाव पूरी तरह आत्मोन्मुखी होकर आत्मा में ही लीन होने के लिए चित्रकोष की तरफ जा रहा है, इसलिए भरत के चरण कमल देखना ही मंगल के मूल के प्रतीक के रूप में लिखे गए हैं। निषाद भाव कहता है कि हे भाव रत रूपी भरत! आपके परम अनुग्रह अर्थात् अनासक्त प्रेम के कारण मेरे समस्त निषेधवृति रूपी कुल के भाव मंगल की भावना से भर गए हैं। दो0 समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।। व्याख्या : निषाद भाव कहता है कि मेरे कुल अर्थात् मेरी निषेध वृति को देखकर और आत्मा की महिमा देखकर जो लोग परमात्मा को नहीं भजते हैं, वे जगत के द्वारा ठगे गए हैं। अर्थात् वे माया में फँस गए हैं। कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।। राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।। व्याख्या : कपट, कायरता, कुमति व असहजता वाले भाव सदैव लोक मत व वेद मत के विपरीत होते हैं। परन्तु जब से निषाद रूपी भाव को आत्मा रूपी राम ने अपना बना लिया है अर्थात् सहज कर लिया है, तब से वह निषेध रूपी निषाद भाव समस्त भावों का आभूषण बन गया है। यहाँ पर निषेध वृति के भावों की सहज अवस्था आ जाने की अनुभूति का वर्णन किया गया है। क्योंकि जब तक आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता है, तब तक साधक यम-नियम के द्वारा निषेध वृति का पालन करता रहता है। परन्तु जब आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो निषेध वृति सहज हो जाती है और यम-नियम के बन्धन भी छूट जाते हैं। उस अवस्था में साधक स्नान किया नहीं किया, नाम जपा नहीं जपा, सब अवस्था में सहज हो जाता है। देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानी। सादर सकल जोहारीं रानी।। व्याख्या : निषाद भाव के सहज प्रेम व विनय को देखकर भाव रत भरत का छोटा भाई शत्रुघन (कामादि भावों का दमन करने वाला) मिला। तब निषाद भाव ने अपना नाम बताया अर्थात् अपना मर्म बताया। फिर समस्त नाड़ियों रूपी रानियों को प्रणाम किया अर्थात् नाड़ियों में निषेध की वृतियाँ समर्पित हो गयीं। जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।। निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।। व्याख्या : निषाद भाव को लखन भाव के समान जानकर सबने आशीर्वाद दिया अर्थात् बल प्रदान किया और कहा कि सुखी होकर अर्थात् सहज होकर लाख वर्षों तक जिओ अर्थात् सहज होकर समस्त प्राणों में संचरति होते रहो। तब शरीर रूपी नगर के नड़-नाड़ियों को देखकर निषाद भाव ऐसे सुखी हो गया, जैसे लखन भाव को देखने पर हुआ था। कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ राम भद्र भरि बाहू।। सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सभी भाव कहने लगते हैं कि निषाद रूपी भाव से मिलकर इस जन्म का लाभ ले लो क्योंकि कल्याणकारी आत्मा रूपी राम निषाद भाव से बाँहें भर-भर कर मिले हैं। इस प्रकार निषाद भाव अपने भाग्य की तारीफ सुनकर प्रसन्न होता हुआ सभी भावों को श्रृंगबेरपुर रूपी कोष के लिए लेकर चल दिया। अर्थात् ध्यान अब देह भावों सहित निषेधवृति रूपी कोष में चढ़ने लगा। सभी भाव आत्मोन्मुखी हो जाने से निषेध वृतियाँ सहज हो जाती हैं और निषेध वृतियों के सहज हो जाने पर ध्यान भी सहजता के साथ उर्ध्वगामी होने लग जाता है। दो0 सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रूख पाई। घर त डिग्री तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।। व्याख्या : निषेध वृति कोष के भाव निषाद रूपी स्वामी का इशारा पाकर घर, पेड़, तालाब, बाग व जंगल में निवास स्थान बनाने लगे अर्थात् श्रृंगबेरपुर रूपी कोष की समस्त कोशिकाएँ क्रियाशील होकर देह भावों के प्रति सहज होने लग गयी। उसी अनुभूति को घर, बाग, वन आदि को सजाना बोलकर लिखा गया है। सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।। सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।। व्याख्या : जब भाव रत रूपी भरत भाव ने निषेध वृति के श्रृंगबेरपुर रूपी कोष को देखा तो प्रेम पैदा हो गया और सब अंग शिथिल हो गए। निषेध वृति कोष में पहुँचने पर किसी भी भाव के अंग शिथिल हो जायेंगे क्योंकि निषेध वृति समस्त वासनाओं का निषेध करके भावों को निर्मल कर देती है। निर्मलता आ जाने पर स्वत: प्रेम भी पैदा हो जाता है। उस अवस्था में भाव रत भाव और निषाद भाव ऐसे लगने लगते हैं जैसे विनय और अनुराग ने शरीर धारण कर रखा हो। एहि बिधि भरत सेनु सब संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।। रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामु।। व्याख्या : इस प्रकार भाव रत भरत भाव सभी भाव रूपी सेना के साथ पवित्र सुरसरि अर्थात् पवित्र आनन्द रूपी गंगा को देखने पहुँच गए और रामघाट अर्थात् आत्मा रूपी राम जिस घाट से पार हुए उसे देखकर सबने प्रणाम किया और मन में मगन हो गए मानों आत्मा रूपी राम ही मिल गए हों। सुरसरि कोष में पहुँचने पर आनन्द की तरंगें उठने लगती हैं, जिनसे मन मगन हो उठता है और तब ऐसे लगने लगता है मानो आत्मा में लीनता हो गयी हो। उसी को राम के मिलने के समान बताया है। करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।। करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।। व्याख्या : उस अवस्था में देह रूपी नगर की सब नर-नाड़ियाँ भी सुरसरि रूपी गंगा को प्रणाम करने लगते हैं अर्थात् समस्त नर-नाड़ियों में भी आनन्द की सुरसरि उठने लगती है। उस अवस्था में परमानन्द का रसायन स्रवित होने लग जाता है, उसी को ब्रह्म के समान जल को देखकर प्रसन्न होना बताया गया है। उस अवस्था में परमात्मा के प्रति सभी भावों में निश्छल प्रेम होने लग जाता है। और सभी भाव आत्मोन्मुखी होने की चाह करने लगते हैं। भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।। जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव भी उस समय सुरसरि (गंगा) रूपी आनन्द तरंगों से यही कहता है कि हे सुरसरि। आपकी धूल समस्त स्वरों व इच्छाओं को सुख देने वाली है। अत: मुझे यह वर दीजिए कि मेरी आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के चरणों में सहज अटूट प्रीत बनी रहे। दो0 एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ। मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।। व्याख्या : इस प्रकार भाव रत भरत भाव आनन्द रूपी गंगा में विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ की प्रेरणा अनुसार नाड़ियों रूपी माताओं को स्नान करा करके डेरा पर ले चले अर्थात् सहज अवस्था में पहुँच गए। जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।। सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।। व्याख्या : सहजता की अवस्था आ जाने पर भाव प्रत्येक अवस्था में सुखी हो जाते हैं। उसी को देह रूपी अवध के भाव रूपी लोगों का जहाँ-तहाँ डेरा लगाना बताया गया है। उस अवस्था में भाव रत भरत भाव सभी भावों को आत्मा में रत रहने की प्रेरणा करता रहता है। अत: उसी अवस्था को भरत द्वारा सब लोगों की खैर-खबर लेना बताया गया है। ध्यान की ऐसी अवस्था आ जाने पर स्वर स्वत: ही निर्मल हो जाते हैं। उसी को सुर सेवा करना बताया गया है। जब स्वर निर्मल हो जाते हैं, तो भाव रत भरत भाव और कामादि का शत्रु भाव शत्रुघन स्वत: ही सुष्मना नाड़ी में उर्ध्वगामी होने लगते हैं। उसी को भरत व शत्रुघन का राम की माता कौशल्या के पास जाना बताया गया है। चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।। भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत भरत भाव पूरी तरह से सुष्मना नाड़ी रूपी माता के सामने समर्पित हो गया और सब प्रकार से सुष्मना रूपी कौशल्या माता का सम्मान किया अर्थात् भाव रत भरत भाव पूरी तरह से सुष्मना नाड़ी में समा गया। तब शत्रुघ्न रूपी भाई को माता कौशल्या की सेवा सौंपकर स्वयं ने निषेध भाव रूपी निषाद को अपने पास बुला लिया। वास्तव में ध्यान में जब आत्मा में रत भाव रूपी भरत भाव सुष्मना नाड़ी में समा जाता है, तो शत्रुघ्न भाव काम, क्रोध, मद व लोभादि भावों को सुष्मना नाड़ी में प्रवेश करने से रोकता है और भाव रत रूपी भरत भाव निषेध वृति के मर्म को समझने का प्रयास करने लगता है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को शत्रुघ्न को माता की सेवा सौंपकर निषाद को भरत द्वारा अपने पास बुलाना बोलकर लिखा गया है। चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरी डिग्री सनेह न थोरें।। पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।। व्याख्या : तब भाव रत रूपी भरत भाव निषाद रूपी भाव का हाथ पकड़कर चले अर्थात् निषेध भाव का सहारा लेकर उर्ध्वगामी होने की युक्ति सोचने लगे। उस अवस्था में भाव रूपी भरत का शरीर प्रेम के कारण शिथिल हो रहा था। भाव रत रूपी भरत निषेध भाव रूपी निषाद से पूछने लगे कि मुझे वह स्थान बताइये, जिससे मेरी आँखों व मन का जुड़ाव हो जाए अर्थात् ध्यान में एकाग्रता आ जाए और शांति मिल जाए। जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।। भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।। व्याख्या : जहाँ पर आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता रात को सोए, वह स्थान बताइये। इतना कहते ही भाव रत रूपी भरत भाव के आँखों में जल छा गया। यहाँ साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। भाव रत भरत भाव आत्मोन्मुखी होने के लिए सुरता व आत्मा की गति के बारे में निषाद भाव से पूछना चाह रहा है तथा आत्मोन्मुखी चिंतन करने से भाव रत भरत की आँखों में प्रेम रूपी जल भर आता है। तब भाव रत भरत की बातों को सुनकर विषाद अर्थात् विषय अ आद यानी विषयी भावों का अन्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में निषाद भाव उस कोष में भाव रत भरत भाव को ले जाता है, जहाँ पर आत्मा व सुरता ने विश्राम करके अज्ञान रूपी रात्रि को पार किया। दो0 जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु। अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।। व्याख्या : जहाँ पर संतोष रूपी सिंसुपा का वृक्ष था, जिसके नीचे आत्मा रूपी राम ने विश्राम किया था, उस स्थान को भाव रत भरत भाव ने आदरपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया। वास्तविकता में यह होता है कि निषेध वृतियाँ जिस श्रृंगवेर रूपी कोष में रहती हैं, वहाँ से संतोष का भाव भी पैदा होता है। उसी संतोष के भाव को सिंसुपा का पेड़ बताया गया है। भाव रत भरत भाव भी जब ध्यान में उस स्थान पर पहुँचता है, तो पूरी तरह समर्पण कर देता है, उसी को दण्डवत प्रणाम करना बताया गया है। कुस साँथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।। चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।। व्याख्या : कुशों की सुंदर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजी के चरण-चिह्नों की रज आँखों में लगाई। उस समय के प्रेम की अधिकता कहते नहीं बनती।।1।। कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे। सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।। व्याख्या : भरतजी ने दो-चार स्वर्णविन्दु (सोने के कण या तारे आदि जो सीताजी के गहने-कपड़ों से गिर पड़े थे) देखे तो उनको सीताजी के समान समझकर सिरपर रख लिया। उनके नेत्र (प्रेमाश्रुके) जल से भरे हैं और हृदय में ग्लानि भरी है। वे सखा से सुन्दर वाणी में वचन बोले - ।।2।। श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।। पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जल जेही।। व्याख्या : ये स्वर्ण के कण या तारे भी सातीजी के विरह से ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे (रामवियोग में) अयोध्या के नर-नारी विलीन (शोक के कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजी के पिता राजा जनक हैं, इस जगत् में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठी में हैं, उन जनकजी को मैं किसकी उपमा दूँ?।।3।। ससुर भानुकूल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावति पालू।। प्राननाथु रघुनाथ गोसाईं। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता के चित रूपी सूर्य ससुर हैं अर्थात् चित से चलने वाले स्वरों से सुरता रूपी सीता प्रभावित होती है और इन्द्रियों का पालन भी चित रूपी इन्द्र के द्वारा ही होता है। सुरता रूपी सीता के इन्द्रियों के स्वामी आत्मा रूपी राम ही पति होते हैं। परन्तु वही बड़प्पन को प्राप्त होता है, जिसे आत्मा रूपी राम बल देते हैं। यहाँ पर तो साधना का स्पष्ट भेद खोला गया है कि चित से सुरता पैदा होती है और चित से ही सुरता प्रभावित होती है तथा चित से ही इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। परन्तु वह भाव प्रबल होता है, जिसको आत्मा का बल मिल जाता है। दो0 पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि। बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि ते कठिन बिसेषि।।199।। व्याख्या : जब साधक के भाव रूपी देवता व मन के निर्मल त्रिगुण परमात्मा में सुरता की दृढ़ता रूपी साँथरी को देखकर भी माया से मुक्त नहीं होते हैं, तो पत्थर से भी कठिन भावों की जड़ता समझना चाहिये। लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।। पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे।। व्याख्या : परमात्मा से योग की पालना करने के लिए अर्थात् परमात्मा से जुड़ने के लिए लखन भाव बहुत सूक्ष्मता से सहायता करता है क्योंकि बिना माया के लक्षणों को जाने योग हो ही नहीं सकता है। लखन भाव को आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता प्राणों से प्यारे लगते हैं और आत्मा व सुरता को भी लखन भाव प्राणप्रिय ही होता है। इसलिए ऐसा भाव रूपी भाई जो सब देह भावों सहित नाड़ियों रूपी माताओं व चित रूपी पिता को प्रिय होता है। मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।। ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।। व्याख्या : भाव रत रूपी भरत भाव कहता है कि आत्मा, सुरता व लखन भावों की मधुर वृति व कोमल स्वभाव होता है इसलिए शरीर के किसी भी भाव को उनसे कष्ट नहीं होता है। वे वैराग्य रूपी वन में सब प्रकार की विपत्तियों को सहते हैं परन्तु मेरी छाती इतनी कठोर हो गयी है कि बज्र भी कुछ नहीं है। भाव रत भरत भाव को ग्लानि हो रही है कि क्यों नहीं मुझे भी आत्मा में लीनता की अवस्था प्राप्त हो रही है। राम जनम जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।। पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के जन्म से ही जगत की उत्पत्ति होती है अर्थात् आत्मा जब देह भाव में बरतती है, तभी जगत की उत्पत्ति होती है अन्यथा नहीं। आत्मा तो रूप, शील, सुख व समस्त गुणों का सागर होती है। इसलिए आत्मा का तो स्वभाव ही होता है कि वो देह भावों, ज्ञान रूपी गुरु, चित व चित की नाड़ियों रूपी माता-पिता को सहज में सुख प्रदान करती है। बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।। सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।। व्याख्या : बैरी भी अर्थात् विषयों के भाव भी आत्मा का यश ही गाते हैं क्योंकि बोलने से व मिलने से आत्मा मन का हरण कर लेती है। अर्थात् आत्म चिंतन करने से आत्मा मन का हरण कर देती है। इसलिए शारदा व नाना प्रकार से ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं करने से भी आत्मा के गुणों का वर्णन नहीं किया जा सकता है। शेष का तात्पर्य वर्णन करते-करते जो शेष बच जाता है, वह भी आत्मा का वर्णन नहीं कर पाता है। वेद उसी अनुभूति को नेति, नेति कहकर समझाने की कोशिश करते हैं। दो0 सुखस्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।। व्याख्या : शुद्ध निर्मल आत्मा सुख का स्वरूप, मंगल व प्रसन्नता का घर होती है। वही आत्मा ध्यान क्रिया द्वारा समझ में आती है कि किस प्रकार सूक्ष्मता रूपी कुश डालकर सुप्त अर्थात् सहज उदासीन अवस्था में रहती है। राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनत डिग्री जिमि जोगवइ राऊ।। पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननी सकल दिन राती।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने कभी दु:ख कानों से भी नहीं सुना अर्थात् आत्मा तो सुख-दु:ख से निर्लेप होती है तथा चित रूपी राजा जीवन वृक्ष की तरह उसका पोषण करने का प्रयास करता रहता है। जैसे - पलक आँखों की रक्षा करती हैं, वैसे ही समस्त नाड़ियों रूपी माताएँ आत्मा रूपी राम की पालना करती हैं। ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।। धिग कैकई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।। व्याख्या : परन्तु अब आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव दृढ़ वैराग्य रूपी वन में विचरण कर रहे हैं अर्थात् सुरता सहति आत्मा वैराग्य में अवस्थित हो गयी है और इच्छाओं के मूल का अहार कर रहे हैं। अर्थात् अब इच्छाएँ मूल से नष्ट हो रही है। रजोवृति रूपी कैकयी को धिक्कार जो विषयों का मूल होती है। आध्यात्म में विषय ही अमंगल के मूल होते हैं। रजोवृति ही चित रूपी राजा के प्रतिकूल हो गयी। मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।। कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मैं उदर रूपी समुद्र से उत्पन्न अभागी अर्थात् प्रकृति के विपरीत भाव हूँ। मुझे धिक्कार है क्योंकि मेरे कारण अर्थात् रजोवृति रूपी कैकयी से पैदा होने के कारण भोगों में असहजता आने से ही सब उत्पात होते हैं। यहाँ साधना का बहुत ही गहरा रहस्य छुपा हुआ है। उदर को ही कैकय प्रदेश कहा गया है और उदर को ही समुद्र की संज्ञा दी गयी है। भाव रत भरत भाव को पोषण का भाव भी कहा जाता है तथा भावरत भरत को त्याग के प्रतीक के रूप में भी बताया जाता है। इसलिए भाव रत भरत सब भावों की उथल-पुथल का कारण बताया गया है। भाव रत भरत भाव समस्त भावों का सहज पोषण करता रहता है परन्तु ध्यान की क्रिया द्वारा भरत भाव आत्मोन्मुखी हो उठता है, इसलिए भोग वासना के भावों को क्लेश हो जाता है। क्योंकि रजोवृति रूपी कैकयी माता तो भाव रत भाव को सहज भोगों में बरतने देना चाहती है, जबकि भाव रत भाव आत्मा रूपी राम में मिलना चहता है। ऐसी अवस्था में भावों में द्वन्द्व पैदा हो जाता है। उसे ही उत्पात की संज्ञा दी गयी है। सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।। राम तुम्हहि प्रिय रामहिं। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव का आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम को देखकर निषेध भाव रूपी निषाद समझाने लगा कि विषयों के मिट जाने (विष अ आद उ विषयों का अन्त) पर व्यर्थ में शोक मत करो। क्योंकि तुम्हें आत्मा रूपी राम प्रिय हैं और तुम आत्मा रूपी राम को प्रिय हो। यह भाव द्वन्द्व जो पैदा हो रहा है, वो तो ध्यान क्रिया की विपरीतता के कारण हो रहा है। अर्थात् ध्यान के दौरान भावों के ऐसे द्वन्द्व तो पैदा होते हैं। छ0 बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी।। तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ।। व्याख्या : ध्यान की विपरीत क्रिया की गति बहुत कठोर होती है, जिसने रजोवृति रूपी कैकयी के मन में क्षोभ पैदा कर दिया। उस रात को अर्थात् आत्मा रूपी राम ने जब अज्ञान रूपी रात्रि बितायी तो बार-बार चित रूपी राजा की प्रशंसा की और शपथपूर्वक कह रहे थे कि मुझे (आत्मा रूपी राम को) भाव रत भरत के समान प्रिय दूसरा कोई भाव नहीं होता है। इसलिए ध्यान की क्रिया का परिणाम मंगलमय होगा, ऐसा विचारकर धैर्य धारण कीजिए। दो0 अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन। चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारी दृढ़ आनि मन।।201।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाद भाव रत भरत से कहते हैं कि आत्मा रूपी राम तो अन्तर्यामी होते हैं और प्रेम के कारण संकोच करने वाले व कृपा के घर होते हैं। अत: ऐसा मन में विचारकर दृढ़ता ले आइये और अब विश्राम कीजिए। सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।। यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।। व्याख्या : निषाद भाव रूपी सखा की बातें सुनकर भाव रत भरत भाव ने हृदय में धीरज धारण किया और आत्म चिंतन करते हुए अपने निवास स्थान पर चला गया अर्थात् सहज हो गया। जब शरीर रूपी नगर के नड़-नाड़ियों व भावों को इसका आभास हुआ तो सब भाव रत भरत को देखने चले अर्थात् जब भाव रत भरत भाव आत्म चिन्तन में मग्न हो गया तो सभी भाव भी भाव रत भरत का अनुसरण करने को चले। इसी को भरत को देखने जाना बोलकर लिखा है। परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।। भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं। बाम बिधातहि दूषन देहीं।। व्याख्या : सभी भाव भाव-रत भरत की तरफ आकर्षित होने लगते हैं। उसी को परिक्रमा करना बताया गया है। उस अवस्था में सभी भाव रजोवृति रूपी कैकयी को दोष देने लगते हैं कि निष्काम अवस्था में रजोवृति का कोई काम नहीं है। उसी को "निकामा"" बोलकर लिखा गया है। सभी भावों की आँखों में प्रेम रूपी जल भर आता है और आत्मा रूपी विरह का कारण क्रिया की विपरीतता (बाम बिधाता) को देते हैं। एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।। निंदहि आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।। व्याख्या : कुछ भाव भाव रत भरत के आत्मा के प्रति प्रेम की सराहना करते हैं, तो कुछ भाव चित रूपी राजा के आत्मा के प्रति प्रेम के निर्वहन की बात करते हैं। कुछ भाव अपने आपकी निंदा करते हैं और निषेध भाव रूपी निषाद की प्रशंसा करते हैं। विषयों से निर्मूल होने की अवस्था का वर्णन कौन कर सकता है। एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।। गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।। व्याख्या : इस प्रकार समस्त देह भाव अज्ञान रूपी रात्रि में भी जागते रहे और ज्ञान रूपी सवेरा का आगाज हो गया। फिर भाव रत भरत ने विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ को सुनावँ अर्थात् सद्गुणों रूपी नाव पर चढ़ाकर फिर नाड़ियों रूपी माताओं को नाव पर चढ़ाया। अर्थात् अब विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ की प्रेरणा से ध्यान उर्ध्वगामी होकर आनन्द रूपी सुरसरि कोष को पार करने लगा। दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।। व्याख्या : इस चौपाई में साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। दण्ड चारि का तात्पर्य साम, दाम, दण्ड व भेद के नीति भावों से हैं। क्योंकि जब ध्यान उर्ध्वगामी होने लगता है तो निषेध भाव के कारण समस्त विकारों का समन हो जाता है। इसलिए साम, दाम, दण्ड व भेद के चारों नीति भाव भी शान्त हो जाते हैं और ध्यान आनन्द रूपी सुरसरि कोष को सद्वृति रूपी नाव पर चढ़कर पार हो जाता है। जब सब भाव आनन्द रूपी गंगा को पार कर लेते हैं, तो भाव रत भरत पुन: समस्त भावों को सँभारता है अर्थात् भाव रत भरत यह देखता है कि कहीं किसी भाव में कोई विषयी विकार तो नहीं बचा है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को इस चौपाई में लिखा गया है। दो0 प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सि डिग्री नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।। व्याख्या : प्रात:क्रिया करके अर्थात् आत्मचिंतन की नव स्फूर्ति भर कर भाव रत भरत भाव समस्त नाड़ियों रूपी माताओं के चरणों में समर्पण करते हुए विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ को सीस झुकाकर निषेध भाव रूपी निषाद को आगे करके समस्त भाव रूपी सेना सहित चले। कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।। साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।। व्याख्या : निषेध भाव रूपी निषाद को आगे करके और नाड़ियों रूपी माताओं को पालकी में चढ़ाकर भाव रत भरत चले। भाव रत भरत भाव ने साथ में काम, क्रोध मदादि नाशक शत्रुघन रूपी भाई को कर दिया। इस प्रकार विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के भावों के साथ विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ सहित आत्मा रूपी राम से मिलने के लिए प्रस्थान किया। आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।। गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरि आए।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव ने लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता का स्मरण करके आनन्द रूपी सुरसरि कोष को प्रणाम किया और भाव रत भरत भाव सहज होकर ध्यान रत होकर चले। ध्यान की उस अवस्था में मन रूपी घोड़े (कोतल) लगन रूपी डोरी से बँधे हुये स्वत: ही भाव -रत भरत के साथ चलने लगे। कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।। रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सद्गुण रूपी अच्छे सेवक बार-बार भाव रत भत भाव से कहने लगते हैं कि आप मन के भाव रूपी घोड़ों पर चढ़िए। क्योंकि ध्यान ज्यों-ज्यों गम्भीर होने लगता है, तब साधक को बीच-बीच में लगने लगता है कि कहीं ध्यान टूट नहीं जाए। इसलिए सद्वृति वाले भाव किसी सात्विक वृति रूपी भाव के घोड़े पर चढ़ने का भरत से आग्रह करते हैं। परन्तु भाव रत भरत भाव कहता है कि जब आत्मा रूपी राम बिना ही भाव रूपी घोड़े के ही चले गए हैं, तो फिर मेरे लिए भाव रूपी घोड़ों की क्या जरूरत है? सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।। देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहते हैं कि उचित तो यह है कि मैं मस्तिष्क की चेतना में समा जाउँ क्योंकि परमात्मा से एक्यता की अवस्था आना बहुत कठिन होता है। सेवक का तात्पर्य भी से अ व अ एक अर्थात् परमात्मा व जीवात्मा एक हैं कि धारणा कठिन होती है। भाव रत भरत भाव की इस प्रकार मधुर वाणी को सुनकर सभी भाव ग्लानि से भरने लग गए अर्थात् परमात्मोन्मुखी हो उठे। दो0 भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव ने तीसरे पहर अर्थात् तीन गुणों को पार करके प्र अ याग उ यानी प्रकृति के भोग के मर्म को समझा। साधक को ध्यान में पहले तीनों गुणों सत, रज व तम का मर्म समझ में आता है, फिर वह प्रकृति के मर्म को समझ पाता है। जहाँ पर तीनों गुणों का त्रिवेणी रूपी संगम हो जाता है। झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।। भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।। व्याख्या : ध्यान जब त्रिवेणी रूपी संगम पर पहुँचता है तो भावों की गति निराली हो जाती है। उसी भाव-रत भरत भाव की गति की अनुभूति को यहाँ पैरों के छालों को कमल पर ओस की बूँद की संज्ञा देकर बताया गया है। भाव रूपी भरत भाव आज बिना मन के भाव रूपी घोड़ों के पैदल ही आये हैं कि बात सुनकर सभी भाव समाज में उदासी छा गयी। खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।। सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव ने तब जाना कि सभी भाव त्रिवेणी रूपी संगम में पवित्रता रूपी स्नान कर लिए हैं, तो स्वयं भावरत भरत त्रिवेणी संगम पर आए और प्रणाम किया तथा सब प्रकार से पवित्रता रूपी जल में स्नान करके देह के स्वरों को निर्मल करके समान कर लिया। वास्तव में जब ध्यान त्रिवेणी संगम अर्थात् भृकुटि पर लगने लगता है, तो भावरूपी जल निर्मल हो जाता है तथा स्वरों की गति निर्मल होकर सम हो जाती है। उस अवस्था में इच्छाएँ स्वत: ही शान्त होने लग जाती है। उसी को महिसुरों अर्थात् देह के स्वरों को इच्छाओं का दान देना अर्थात् त्याग कर देना बताया गया है। देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।। सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सात्विक, राजसिक व तामसिक भावों की हिलोरों को देखकर भाव रत भरत भाव पुलकित हो उठता है। यह ध्यान के अनुभव में आने वाली बात और उसका साधक पर प्रकट प्रभाव भी दिखायी पड़ने लग जाता है तथा भृकुटि का तीनों गुणों के संघर्ष को मिटाकर समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। माँगउ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।। अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।। व्याख्या : दु:खी व्यक्ति कुछ भी कर सकता है क्योंकि वह असहजता के कारण ही तो दु:खी होता है और असहज होने पर स्वयं के (निज) धर्म का त्याग हो जाता है। इसलिए इन चौपाइयों में समझाया गया है कि असहज होने पर धर्म अर्थात् स्वयं की धारणा का त्याग हो जाता है और दु:खी व्यक्ति चाहे जो कुकर्म कर बैठता है। इसलिए सज्जन साधक लोग इस मर्म को जानकर भीख माँगने वालों को दान देते हैं। दो0 अर्थ न धर्म न काम रूचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मुझे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की भी चाह नहीं हैं। मैं तो सदैव यह वरदान चाहता हूँ कि आत्मा रूपी राम के चरणों में मेरी जन्म-जन्मों में प्रीति बनी रहे। जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।। सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।। व्याख्या : चाहे आत्मा रूपी राम मुझे कुटिल जाने और चाहे भाव रूपी लोग मुझे गुरु द्रोही कहें। परन्तु मेरी तो यही चाह है कि रात दिन मेरा अनुराग आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के चरणों में बढ़ता रहे। जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।। चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई।। व्याख्या : मेघ चाहे जन्म भर चातक की सुध भूल जाए और चाहे जल माँगने पर पत्थरों की वर्षा करने लगें, चाहे चातक की रटन घट जाए, चाहे चातक की बात ही घट जायेगी परन्तु उसकी तो प्रेम बढ़ने पर ही सब प्रकार से भलाई है। कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।। भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।। व्याख्या : जैसे सोने को तपाने पर उसी चमक बढ़ जाती है, वैसे ही अपने प्रियतम आत्मा के प्रति प्रेम का निर्वाह करना चाहिये। इस प्रकार भाव रत भरत के वचनों को सुनकर भृकुटि रूपी त्रिवेणी में मंगल को करने वाली मधुर वाणी हुई। अर्थात् साधक को ध्यान में परमात्मा के प्रति निर्मल प्रेम का परिणाम अनुभव में आ गया। तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।। बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।। व्याख्या : हे तात भाव रत भरत! तुम सब प्रकार से साधु हो क्योंकि तुम्हारा आत्मा रूपी राम के चरणों में अगाध प्रेम है। इसलिए सब प्रकार की ग्लानि का मन से त्याग कर दो, क्योंकि भाव रत भरत भाव के समान आत्मा रूपी राम को दूसरा कोई भाव प्रिय नहीं होता है। दो0 तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।। व्याख्या : भृकुटि रूपी त्रिवेणी पर मधुर वाणी सुनकर भाव रत भरत का तन पुलकित हो गया और हृदय में अपार हर्ष छा गया। उस समय सभी भाव रूपी देवता भाव रत भरत को धन्य मानने लगे तथा आनन्द रूपी फूलों की वर्षा करने लगे। प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।। कहहिं परस्पर मिलि दस पाँचा। भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा।। व्याख्या : भृकुटि पर पैदा होने वाले समस्त तामसिक, राजसिक, सात्विक व उदासीन (अर्थात गुणातीत) भाव सहज होते हैं तथा पांच-दस भाव आपस में मिलकर कहते हैं कि भाव-रत भरत भाव का आत्मा के प्रति प्रेम व शील सच्चा है। सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।। दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।। व्याख्या : इस प्रकार आत्मा रूपी राम के गुण समूहों का वर्णन करते हुए अर्थात् सभी भाव आत्म चिंतन करते हुए विशुद्ध विवेक रूपी भरद्वाज मुनि के आश्रम पर आए। जब विशुद्ध विवेक रूपी भरद्वाज ने समस्त भावों को समर्पित होते हुए देखा तो अपने भाग्य को देखकर मूर्ति की तरह खड़े रह गए। अर्थात् विशुद्ध विवेक का भाव दृढ़ व स्थिर हो उठा। धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।। आसनु दीन्ह नाइ सि डिग्री बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।। व्याख्या : तब विशुद्ध विवेक रूपी भरद्वाज मुनि ने भाव रत भरत को उठाकर छाती से लगा लिया अर्थात् भाव रत भरत भाव को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ हो गए। तब भाव- रत भाव को आसन दिया। तब वे सिर झुकाकर ऐसे बैठे मानो संकोच के घर में समा रहे हों अर्थात् संकोच की परम अवस्था की अनुभूति होने लगी। मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।। सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव को संकोच इस बात का हो रहा है कि विशुद्ध विवेक रूपी भरद्वाज मुनि कुछ पूछेंगे। तब विशुद्ध विवेक रूपी भरद्वाज भाव रत भरत के संकोच को समझकर बोले कि हे भाव- रत भरत! हमको सब पता है परन्तु ध्यान की क्रिया (विधि) के सामने किसी भी भाव का वश नहीं चलता है। दो0 तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति। तात कैकइहिं दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।। व्याख्या : हे तात! तुम रजोवृति रूपी कैकयी माता की करतूत समझकर ग्लानि मत करो क्योंकि ध्यान क्रिया द्वारा रजोबुद्धि के कारण कैकयी रूपी माता की बुद्धि फिर गयी थी। यहु कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ।। तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।। व्याख्या : यह कहने पर भी कोई भला नहीं कहेगा क्योंकि लोक व वेद मत ही विद्वानों को मान्य होता है। अर्थात् विद्वान लोग इस बात को नहीं मानेंगे कि ध्यान की क्रिया (विधि) के कारण आत्मा को वैराग्य हो जाता है। परन्तु हे भाव रत भरत! तुम्हारा निर्मल यश गाने से अर्थात् तुम्हारी तरह आत्म चिंतन में रत हो जाने से लोक वेद दोनों में ही यश प्राप्त हो जाता है अर्थात् निरन्तर भावों को आत्मोन्मुखी करने से परमात्मा से मिलन हो जाता है। इसको विद्वान लोग अनुभव (वेद) भी कर सकते हैं और लोक में उसके प्रभाव को देख भी सकते हैं। लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।। राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।। व्याख्या : लोक व वेद मत दोनों का यही मानना है कि जिस भी भाव को चित रूपी राजा प्रबल करते हैं, वही सभी भाव समाज पर राज करता है। इसलिए सत्य स्वरूप चित रूपी राजा अगर बुलाकर तुमको भावों का अधिष्ठाता बनाते तो सहज सुख की धारणा बलवती होती। राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।। सो भावी बस रानि अयानी। कर कुचालि अंतहुँ पछितानी।। व्याख्या : परन्तु सब अनर्थों का कारण तो आत्मा रूपी राम का दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले जाना है, जिसके कारण शरीर रूपी विश्व के समस्त भाव दु:खी हो रहे हैं। रजोवृति रूपी कैकयी तो भावों के प्रभाव में आकर ऐसा कर बैठी और अब अंत में पश्चाताप कर रही है। अर्थात् रजोवृति से अचानक तीव्र वैराग्य आ जाने पर आत्मा वैराग्य रूपी वन में चली जाती है परन्तु अन्य भावों की इच्छाएँ जीवात्मा को दु:खी करती रहती है। यहाँ उसी अवस्था का वर्णन किया गया है। तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।। करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।। व्याख्या : ऐसी अवस्था में अगर कोई तुमको थोड़ा भी दोष देगा तो वह अधम व बेसमझ होगा। तुम अगर भावों के अधिष्ठाता होते तो कोई दोष नहीं होता और आत्मा रूपी राम को भी संतुष्टि मिलती। दो0 अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।। व्याख्या : परन्तु भाव रत भरत अब तुमने अच्छा ही किया है कि तुम्हारी आत्मा रूपी राम के चरणों में अटूट प्रीत हो गयी है, जो समस्त मंगलों का मूल होती है। सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।। यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।। व्याख्या : हे भाव रत भरत! तुम्हारा जन्म धन्य है। तुम्हारे समान अच्छे भाग्य वाला अर्थात अच्छे निर्मल भावों वाला कौन है? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि तुम चित रूपी दसरथ के पुत्र व आत्मा रूपी राम के प्रिय भाव रूपी भाई हो। सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।। लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।। व्याख्या : हे भाव रत भरत! आत्मा रूपी राम के लिए तुम्हारे समान दूसरा कोई प्रेम का पात्र नहीं होता है। तुम पर लखन भाव, आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता का बहुत प्रेम है क्योंकि तुम्हारे प्रेम की सराहना करते हुए ही उन्होंने अज्ञान रूपी रात्रि को बिताया था। जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।। तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम भृकुटि रूपी प्रयाग में स्नान कर रहे थे अर्थात् जब आत्म चेतना भृकुटि में थी, तब यह मर्म मुझे समझ में आया था। तुम पर आत्मा रूपी राम का ऐसा स्नेह है, जैसा मूर्ख व्यक्ति का विषय सुखों से होता है। यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।। तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।। व्याख्या : यह आत्मा रूपी राम की बड़ाई नहीं है क्योंकि आत्मा तो प्राणों से पैदा होने वाले सभी भावों का पालन करती है। परन्तु तुम तो मेरे (परम विवेक) विचार से साक्षात् आत्मा के प्रेम का शरीर ही धारण किए हुए हो। दो0 तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।। व्याख्या : इस दोहे में साधना की अनुभूति का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। विशुद्ध विवेक रूपी मुनि (मन का भाव) कहते हैं कि हे भाव रत भरत! तुम्हारे लिए तो यह अवस्था कलंक की लगती है अर्थात् तुम तो आत्मा के विरह का कारण बन रहे हो, परन्तु बाकी समस्त भावों के लिए यह उपदेश देने वाली है क्योंकि ध्यान की इस अवस्था में पहुँचने पर भक्ति के रस की प्राप्ति हो जाती है और समस्त गुणों पर साधक का आधिपत्य (गण अ ईश उ गणेश) हो जाता है, जिससे साधक गुणों को गुणों में बरतने लगता है। नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।। उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।। व्याख्या : हे भाव रत भरत! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा की तरह है तथा अन्य भाव कुमुद और चकोर की तरह होते हैं। तुम्हारा यह निर्मल यश रूपी चन्द्रमा उदित होने पर कभी छिपता नहीं है, उल्टा आकाश में दिनों-दिन दुगुना आकार धारण करता रहता है। अर्थात् आत्मोन्मुखी होने पर भाव आत्मा की तरफ और तेजी से आकर्षित होने लगते हैं और विषय रूपी कलंक नहीं होने के कारण शान्ति रूपी शीतलता प्राप्त होती रहती है। आत्मा के चिंतन में जब एक बार लगन लग जाती है, तो वो फिर कमती नहीं है, बल्कि दिनों दिन बढ़ती ही रहती है। कोक तिलोक प्रीति अति करिहि। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।। निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।। व्याख्या : अब यह चकवा तीन गुणों से प्रीत नहीं करेगा और आत्म सूर्य के प्रताप से इसको कष्ट भी नहीं होगा। यह अवस्था सभी को दिन रात सुख देने वाली हो जायेगी और रजोवृति रूपी कैकयी का राहू भी इसे ग्रास नहीं करेगा अर्थात् वासनाओं का भी अब असर नहीं पड़ेगा। पूरन राम सुप्रेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।। राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।। व्याख्या : भाव रत भरत रूपी चकवा आत्म प्रेम के अमृत से परिपूर्ण है तथा ज्ञान रूपी गुरु की अवमानना का दोषी नहीं है। जो भी साधक आत्मचिंतन करके निर्भय हो जाते हैं, वे इस अमृत का पान कर सकते हैं। इस शरीर रूपी पृथ्वी में ही यह अमृत सुलभ हो पाता है। भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुमंगल खानी।। दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।। व्याख्या : राजा भगीरथ अर्थात् चित की सहज मूल अवस्था से आनन्द रूपी सुरसरि का अवतरण हुआ जिसका स्मरण करना ही मंगलों को देने वाला हो जाता है। इसलिए चित रूपी दसरथ के गुणों का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता है। अधिक क्या कहें, चित रूपी दसरथ के समान तो चित रूपी दसरथ ही होता है। दो0 जासु सनेह संकोच बस राम प्रगट भए आइ। जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।। व्याख्या : जिस चित रूपी दसरथ के प्रेम से आत्मा रूपी राम प्रकट हो गए और जिस आत्मा रूपी राम के स्वरूप को देखकर विश्वास रूपी शिव कभी अघाते नहीं हैं अर्थात् कभी तृप्त नहीं होते हैं। कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम प्रेम मृगरूपा।। तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।। व्याख्या : तुमने तो अनासक्त शीतलता रूपी चन्द्रमा को पैदा किया है, जिसमें आत्मा रूपी राम हिरण की छवि के रूप में बसते हैं। अत: तुम (भावरत भरत) व्यर्थ में ही हृदय में ग्लानि करते हो। तुम तो पारस पाकर भी विषय रूपी दरिद्रता से डर रहे हो। सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।। सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसु पावा।। व्याख्या : हे भाव रत भरत! हम अर्थात् विशुद्ध विवेक झूठ नहीं कहते हैं क्योंकि विवेक का भाव तो उदासीन होकर वैराग्य रूपी वन में रहता है। सब साधनों का एक ही फल होता है कि आत्मा, सुरता व लखन भाव का दर्शन हो। तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।। भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ।। व्याख्या : उसी दर्शन का फल यह है कि भाव रत भरत भाव का दर्शन हुआ है। तुम्हारे दर्शन से त्रिवेणी सहित अर्थात् तीनों गुणों सहित प्रकृति सुभग अर्थात् अच्छी वृति वाली हो गयी है। अत: हे भाव रत भरत भाव! तुम्हारे यश ने जगत को जीत लिया है। ऐसा चिंतन करते-करते मन का विशुद्ध विवेकी भाव प्रेम में मगन हो गया। सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।। व्याख्या : विशुद्ध विवेक रूपी मन के भाव की वाणी को सुनकर सभी भाव रूपी सभासद हर्षित हो उठे और स्वरों के माध्यम से सुमन अर्थात् मन के अच्छे भाव पैदा होने लग गए। आकाश में और प्रयाग में धन्य-धन्य की वाणी सुनकर भाव रत भरत भाव आत्मा के अनुराग में मगन हो गया। दो0 पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरूह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत रूपी भरत भाव का शरीर पुलकित हो उठता है और हृदय में आत्मा व सुरता का चिंतन रहता है तथा आँखों में प्रेम का जल भर आता है। तब भाव रत भरत मन के भावों को प्रणाम करते हुए बोले। मुनि समाजु अ डिग्री तीरथ राजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।। एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।। व्याख्या : भृकुटि पर ध्यानस्थ अवस्था में सच्ची शपथ लेना भी पाप बन जाता है अर्थात् अर्थात् सच्ची शपथ से भी चिन्ता उठ जाती है। ऐसी अवस्था में कल्पना करके कुछ कहने से तो नाना प्रकार की चिन्ता पैदा होकर पतन करा देती है। वास्तव में भृकुटि पर ध्यान की अवस्था में अगर कोई सहज विचार भी उठ आता है, तो वह बहुत गहराई तक चला जाता है। ऐसे में अगर कोई विषय वासना का चिंतन हो आए, तो साधक का पतन हो सकता है। अर्थात् साधक पुन: जागतिक व्यवहार में फँस सकता है। तुम सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।। मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।। व्याख्या : मैं सहज ही कह रहा हूँ कि आप तो सब कुछ जानने वाले हो अर्थात् परम विवेक का भाव तो सब कुछ जानने वाला होता है और अन्तरात्मा रूपी राम भी सब कुछ जानने वाले होते हैं। इसलिए आपसे तो कुछ छुपा हुआ नहीं रहेगा। मुझे रजोवृति रूपी माता की करणी का सोच नहीं है और न ही मन में इस बात का डर है कि जगत में भाव रूपी लोग मुझे नीच समझेंगे। नाहिन ड डिग्री बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।। सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।। व्याख्या : न ही यह डर है कि परलोक बिगड़ जायेगा और न ही चित रूपी पिता के मरने (निस्तेज) का शोक है। उनका सुन्दर सुयश तो समस्त भाव रूपी भुवनों में छाया हुआ है क्योंकि लखन व आत्मा रूपी राम जिनके पुत्र हैं। राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।। राम लखन सिय बिनु पग मनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के विरह में जिस चित रूपी राजा ने शरीर का मोह त्याग दिया, ऐसे राजा का सोच करने का कोई कारण नहीं है। बस सोच इसी बात का है कि आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता व लखन भाव रूपी लक्ष्मण बिना आसक्ति के दृढ़ वैराग्य रूपी वन में हैं, जो मन को एकाग्रही करके दृढ़ से दृढ़ वैराग्य रूपी वन में विचरण कर रहे हैं। दो0 अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि त डिग्री तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।। व्याख्या : वे अनासक्ति रूपी वस्त्र पहनते हैं और वासना रूपी इच्छाओं का भोजन करते हैं अर्थात् भक्षण करते हैं और संयम रूपी कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं। और दृढ़ता रूपी वृक्षों के नीचे सुख-दु:ख रूपी सर्दी-गर्मी को सहन करते हैं। एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नींद न राती।। एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।। व्याख्या : बस इसी दु:ख से निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है और न दिन में भूख लगती है और न रात को नींद आती है। मैंने समस्त भाव रूपी संसार खोज लिया परन्तु इस कुरोग की कोई औषधि नहीं मिली है। मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।। कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू।। व्याख्या : यह चिंता रूपी पाप रजोवृति रूपी कैकयी माता के कुमत से बढ़ता रहता है और हमारे हित को अर्थात् मुझे वासना रूपी सूल चूभोती है। बँसुला का तात्पर्य ब उ वासना अ सूल यानी वासनाओं का कष्ट से होता है। रजोवृति रूपी माता ने देह बुद्धि रूपी कुकाठ अर्थात् वासनाओं का यंत्र बनाया है, जिसे अवधी रूपी शरीर में कुमंत्र के साथ गाड़ दिया है। मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।। मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।। व्याख्या : मेरे लिए ही उसने (रजोवृति) यह कुठार रचा है और जगत के बारह रास्ते खोल दिए। दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि बारह जगत में जाने के रास्ते बताए गए हैं। इन्हें ही बारह बाटा बोलकर लिखा है। बस आत्मा रूपी राम अगर लौटकर पुन: अवधी रूपी शरीर में आ जाए, तो यह विरह रूपी कुयोग मिट जाए वरना शरीर रूपी अयोध्या किसी भी उपाय से नहीं बस सकती है। भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई।। तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।। व्याख्या : भाव रत भरत के वचनों को सुनकर परम विवेक रूपी भरद्वाज मुनि को बहुत सुख मिला और सभी भाव समाज ने भी भावरत भरत की बड़ाई की। तब विवेक रूपी मन के भाव ने कहा कि हे तात! तुम मन में चिन्ता मत करो। आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को देखने से सब सोच मिट जायेगा। दो0 करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।। व्याख्या : इस प्रकार विवेक रूपी मन के भाव ने नाना प्रकार से समझाकर कहा कि अब हे भावरत भरत! हमारे प्रेम के अतिथि बनिए और अनासक्ति रूपी कंद, मूल, फल जो हम दें, उन्हें स्वीकार कर लीजिए। सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।। जानि गरूइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।। व्याख्या : विवेक रूपी मन के भाव के वचनों को सुनकर भाव-रत भरत भाव को बहुत सोच हुआ कि कुसमय पर संकोच हो आया। फिर गुरुजनों की वाणी को समझकर हाथ जोड़कर वन्दना करते हुए बोला। सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।। भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।। व्याख्या : हे नाथ! आपकी आज्ञा को मैं सिर पर चढ़ाकर पालन करूँगा क्योंकि यही मेरा परम धर्म है अर्थात् परम विवेक की आज्ञा का पालन करना ही परम धर्म होता है। भाव-रत भरत भाव के वचन विवेक रूपी मुनि को बहुत अच्छे लगे। तब मुनि ने अपने पवित्र सेवक व शिष्यों को बुलाया। चाहिअ कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।। भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।। व्याख्या : भाव रत भरत की पहुनई करनी चाहिये। इसलिए जाकर कंद-मूल फल लेकर आओ। बहुत अच्छा कह कर प्रसन्नचित होकर परम विवेक रूपी मुनि के सेवक व शिष्य काम पर लग गए। मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।। सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं। आयसु होई सो करहिं गोसाईं।। व्याख्या : परम विवेक रूपी मुनि के मन में बड़ा सोच हुआ कि भाव रत भरत रूपी बड़े मेहमान को निमंत्रण तो दे दिया। परन्तु उसी के अनुरूप आतिथ्य सत्कार करना चाहिए क्योंकि जैसा देवता हो वैसी ही पूजा करनी चाहिए। परम विवेक रूपी मुनि के मन में ऐसा भाव आते ही रिद्धियाँ व सिद्धियाँ प्रकट हो गयी और कहने लगी की हे इन्द्रियों के स्वामी (गोअ साईं)! आपकी जैसी आज्ञा हो, हम वैसा ही करेंगे। वास्तव में ध्यान जब परम विवेक के कोष में चला जाता है तो साधक को कल्पना के अनुसार रिद्धि-सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। उसी अनुभूति को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। दो0 राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज। पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनि राज।।213।। व्याख्या : तब परम विवेक रूपी भरद्वाज मुनि ने कहा कि भाव रत भरत व कामादि नाशक शत्रुघन देह भावों सहित आत्मा के विरह से व्याकुल हैं। अत: इनकी सेवा करके इनके परिश्रम को दूर करो। ध्यान में जब परम विवेक का भाव प्रकट होता है तो आत्मा के विरह में व्याकुल भावों को नाना प्रकार से सांत्वना देने का प्रयास करता है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनी आपुहि अनुमानी।। कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।। व्याख्या : रिद्धि-सिद्धियों ने परम विवेक रूपी मुनि की वाणी को सिर पर धारण किया और अपने आपको सौभाग्यशाली माना और सिद्धियों के भावों के समूह आपस में बात करने लगे कि आत्मा रूपी राम का छोटा भाई भाव रत रूपी भरत अतुल्य है। अर्थात् भाव रत भरत भाव की किसी भी भाव से तुलना नहीं की जा सकती है। मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।। अस कहि रचेउ रूचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।। व्याख्या : रिद्धि-सिद्धियों का समाज आपस में बातें करना लगा कि हम को परमविवेक रूपी मुनि की आज्ञा के अनुसार वो सब करना चाहिये, जिससे भाव रूपी राज समाज सुखी हो। इस प्रकार आपस में बातें करते हुए सिद्धियों के समाज ने नाना प्रकार के रूचिकर घर बना दिए, जिन्हें देखकर विमान भी लज्जा पा जाते हैं। वास्तविकता में यह होता है कि जब ध्यान में परम विवेक पैदा हो जाता है, तो उस समय साधक को सिद्धियों की अवस्था प्राप्त हो जाती है, परन्तु परम विवेक के कारण उस अवस्था में साधक सिद्धियों के जाल में नहीं फँसता है। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। भोग बिभूति भूरि भूरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।। दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।। व्याख्या : उस अवस्था में नाना प्रकार की विभूतियाँ और सुख भोग प्रकट हो जाते हैं, जिनकी देव भावों को भी बहुत अभिलाषा होती है। उस अवस्था में भाव रूपी दास-दासी साधक के मन की कल्पना के अनुसार सुख भोगों के साधनों को सजाकर तैयार रहते हैं अर्थात् साधक की कल्पना के अनुसार समस्त सुख-भोगों की प्राप्ति होने लगती है। सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।। प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रूचि जेही।। व्याख्या : जो सुख देवलोक में सपने में भी नहीं मिलते हैं, वे सब सुख ध्यान की अवस्था में सिद्धियाँ पल भर में सजा देती है। सबसे पहले तो सिद्धियाँ भावों को उनकी रूचि के अनुसार रहने का स्थान देती हैं और उसके बाद रूचि के अनुसार सुख भोग के साधन प्रकट कर देती हैं। दो0 बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायक बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।। व्याख्या : परम विवेक रूपी मुनि की आज्ञानुसार सिद्धियों ने सब सुख भोग की सुविधा देह भावों को प्रदान की और उसके बाद भाव रत भरत भाव को रूचि के अनुसार सुख भोग के साधन प्रदान किए। ध्यान की उस परम अवस्था में ध्यान क्रिया द्वारा मन के तप के कारण विस्मयकारी वैभव प्रकट हो जाता है। अर्थात् ध्यान जब परम विवेक के कोष में पहुँच जाता है, तो वैभव की वर्षा होना शु डिग्री हो जाती है और ज्यों-ज्यों मन का तप बढ़ने लगता है, त्यों-त्यों सुख-भोग स्वत: प्रकट होने लग जाते हैं। मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।। सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी।। व्याख्या : जब भाव रत भरत भाव ने परम विवेक रूपी मन के भाव के प्रभाव को देखा तो चक्रों से उत्पन्न वैभव आदि के लोक छोटे लगने लगे। परम विवेक के कोष से उत्पन्न सुख भोगों का वर्णन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उन सुख भोगों को देखकर तो ज्ञानियों का वैराग्य भी हिल जाता है। वास्तव में सिद्धियों के वैभव को देखकर अच्छे-अच्छे ज्ञानियों का वैराग्य हिल जाता है और साधक सिद्धियों के जाल में फँस जाता है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।। सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।। व्याख्या : जब साधक की साधना से सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, तो वे प्रथमत: सात्विक मन में अच्छा सात्विक इच्छाओं का जाल बना देती हैं। उसी को समन अर्थात् स अ मन अर्थात् सात्विक मन व सुबसन यानी सु अ बसन उ सात्विक वासनाएँ कहकर लिखा गया है। उस अवस्था में वैराग्य रूपी वन में भी कई प्रकार की चंचल इच्छाएँ पैदा हो जाती हैं। वे सुख भोग की इच्छाएँ सुगंध रूपी हवा, फूल व अमृतमय फल प्रदान करने लगती है। प्रारम्भ में सात्विक इच्छाएँ रहने के कारण भोग वासना रूपी जलाशय निर्मल बना रहता है। वास्तविकता में साधक जब सिद्ध होता है, तो प्रारम्भ में सात्विक बना रहता है परन्तु धीरे-धीरे असावधान होने पर वह सिद्धियों के माया जाल में फँसता चला जाता है। असन सयन सुचि अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।। सुर सुरभी सुरत डिग्री सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।। व्याख्या : बिना वासना (असन) के सिद्धियों को ग्रहण करना अमृत के समान होता है, क्योंकि अनासक्त भाव वाली सिद्धियों से वासना के भाव सकुचा जाते हैं। परन्तु परम विवेक से उत्पन्न सिद्धियाँ सभी भावों को सहज सुख भोग सुलभ कराने वाली होती हैं। परम विवेक से उत्पन्न सिद्धियाँ तो स्वरों की निर्मलता के माध्यम से समस्त भावों के अनुसार सहज सुख प्रदान करने वाली होती हैं। रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।। स्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।। व्याख्या : उस परम ध्यान की अवस्था में तीनों गुणों (सत, रज, तम) की हवा बसंत ऋतु की तरह निर्मल होकर बहने लगती है। जिससे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की सहज अवस्था प्राप्त हो जाती है। उस अवस्था में विषयों के सुख भोग भी चन्दन की तरह शीतल हो जाते हैं। उस परम सुख भोगमय अवस्था को देखकर सभी भाव रूपी लोगों को आश्चर्य होने लगता है। दो0 संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार। तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।। व्याख्या : विषय सुख भोग रूपी सम्पति चकवी की तरह होती है और भाव रत भरत चकवा की तरह है तथा परम विवेक रूपी मुनि की आज्ञा खेल खिलाने वाली है। ध्यान की उस अवस्था में परम विवेक रूपी मुनि के आश्रम में सुख भोग रूपी चकवी और भाव रत भरत रूपी चकवा संयम रूपी पिंजरें में बन्द होते हैं। जो अज्ञान रूपी रात्रि में एक साथ होने पर भी स्पर्श तक नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार परम विवेक रूपी मुनि के आश्रम में ज्ञान रूपी सवेरा हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब साधक का ध्यान परम विवेक के कोष में चला जाता है और वहाँ से नाना सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं तो परम विवेक के प्रभाव के कारण साधक उन सिद्धियों की आसक्ति के जाल में नहीं पड़ता है और इस प्रकार ज्ञान रूपी सवेरा हो जाता है। ।। मास पारायण, उन्नीसवाँ विश्राम।। कीन्ह निमज्जनु तीरथ राजा। नाइ मुनिहि सि डिग्री सहित समाजा।। रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।। व्याख्या : ध्यान की उस गम्भीर अवस्था में भाव रत भरत भाव ने तीन गुणों की त्रिवेणी में स्नान किया और समस्त भाव समाज सहित परम विवेक रूपी भरद्वाज मुनि को सीस झुकाया अर्थात् परम विवेक के भाव की महत्ता को स्वीकार किया। जब भाव रत भरत भाव परम विवेक की महत्ता का स्वीकार कर लेता है तो भरत भाव के हृदय में नाना प्रकार का विनय भाव पैदा हो जाता है। उसी को दण्डवत करके बहुत प्रकार से विनती करना बताया गया है। पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।। रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।। व्याख्या : ध्यान अब और गहरा होता हुआ परम विवेक के कोष से चित्रकोष की तरफ बढ़ने लगता है। परम विवेक से उत्पन्न धैर्य, संयम व धारणा रूपी सेवक ऐसी अवस्था में कुशल पथ प्रदर्शक का काम करने लगते हैं। उसी को कुशल पथ-प्रदर्शक लेकर भाव रत भरत का चित्रकोष के लिए जाना बोलकर लिखा है। ध्यान की उस अवस्था में रामसखा अर्थात् निषेध भाव रूपी निषाद भाव रत भरत के साथ साथ चलने लगता है, जो उस समय ऐसा लगने लगता है मानों अनुराग ही शरीर धारण करके चल रहा हो। नहीं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।। लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।। व्याख्या : ध्यान की उस गति में न तो विषय रूपी कोई आधार होता है और न ही कोई फल की आसक्ति रूपी छाया ही रहती है। उस अवस्था में तो परमात्मा के प्रति अटूट प्रेम व नियम-संयम की धारणा मात्र होती है, जो अमाया अर्थात् प्रपंच रहित होती है। उस अवस्था में तो बस लखन भाव, आत्मा व सुरता का चिंतन ही चलता रहता है। भाव रत भरत निषेध भाव रूपी निषाद से प्रेमपूर्वक पूछते हैं और निषाद मधुर वाणी में बताता है। राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकें।। देखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के ठहरने की जगह और वृक्षों को देखकर भाव रत भरत के हृदय में अनुराग प्रकट होने से नहीं रूक पा रहा था। भाव रत भरत भाव की ऐसी दशा को देखकर देव भाव आनन्द रूपी फूलों की वर्षा करने लगे, जिससे ध्यान की राह कोमल हो गयी और मंगल का मूल बन गयी। दो0 किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात। तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव ज्यों-ज्यों भाव समाज सहित ध्यान में चित्रकोष की तरफ चलते हैं, तो ध्यान का रास्ता बहुत सुगम व सरल होता चला गया। उतना सुगम व सरल तो आत्मा के चित्रकोष में जाने के समय भी नहीं हुआ था। क्योंकि भाव रत भरत के चलने पर तो कृपा रूपी बादल छाया करने लग गए और तीनों गुणों की सुखद हवा बहने लगी अर्थात् गुण गुणों में बरतने की सहज अवस्था आ गयी। जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।। ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।। व्याख्या : ध्यान के रास्ते में कोशिकाओं व कोषों से नाना प्रकार के जड़-चेतन भाव पैदा होते रहते हैं। वे सब आत्मा रूपी राम को देखकर परम पद प्राप्त करने के पात्र बन गए। परन्तु भाव रत भरत भाव को देखकर तो वे भव रोगों से मुक्त हो गए अर्थात् परम पद की अवस्था को प्राप्त कर लिए। यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।। बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।। व्याख्या : यह भाव रत भरत के लिए कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि आत्मा स्वयं भाव रत भरत भाव का मन में स्मरण करती रहती है। वास्तविकता यह है कि अगर कोई भाव आत्म चिंतन में लग जाता है तो आत्मा भी उसी भाव का चिन्तन करने लग जाती है। इसलिए एक बार भी कोई भाव अगर आत्मा रूपी राम का नाम ले लेता है तो वह भाव, भाव रूपी भव सागर को पार करने व कराने वाला हो जाता है। अर्थात् एक बार भी अगर आत्मा का स्पर्श या दर्शन हो जाता है, तो व तारण हार व तरने वाला हो जाता है। भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।। सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।। व्याख्या : इसलिए भाव रत भरत तो आत्मा रूपी राम के प्रिय व छोटा भाई रूपी भाव हैं। तब क्यों नहीं वे मंगल को देने वाले होंगे। इसलिए साधक, सिद्ध व मन की एकाग्रता के भाव ऐसा कहते हैं और भाव-रत भरत को देखकर हृदय में आनन्दित होने लगते हैं। देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।। गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेट न होई।। व्याख्या : भाव रत भरत के आत्मोन्मुखी होने के प्रभाव को देखकर स्वरों के मूल इन्द्र को चिन्ता होने लगी। यह सत्य है कि संसार भले भाव के लिए भला और बुरे भाव के लिए बुरा होता है। अत: जैसा भाव आता है, वैसा ही प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन्द्र रूपी स्वरों का मूल बृहस्पति रूपी गुरु से कहने लगा कि आप ऐसा कीजिए, जिससे आत्मा व भाव रत भरत का मिलन नहीं हो। क्योंकि इन्द्र भाव को लगने लगा कि अगर आत्मा व भाव रत भरत का मिलन हो गया तो सुख भोग जड़ मूल से नष्ट हो जायेंगे। दो0 रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि। बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो संकोची और प्रेम के वश में होते हैं और भाव रत भरत तो प्रेम के समुद्र हैं। अर्थात् आत्मा तो भाव के अनुसार व्यवहार करना शु डिग्री कर देती है परन्तु भाव अगर आत्मा में रमण करने लग जाता है, तो वह तो प्रेम का समुद्र बन जाता है। ऐसी अवस्था में आत्मा रूपी राम भी भाव रत भरत के प्रेम के वश में हो जायेंगे। अत: इन्द्र भाव (सुख भोग का भाव) ज्ञान रूपी गुरु भाव से कहता है कि कोई ऐसी चाल चलिए, जिससे भाव रत भरत भाव आत्मोन्मुखी न हो सके। बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहस नयन बिनु लोचन जाने।। माया पति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।। व्याख्या : इन्द्र भाव के वचनों को सुनकर बृहस्पति रूपी गुरु मुस्कराने लग गए और सोचने लगे कि हजारों भाव रूपी आँखें होते हुए भी सुख भोग रूपी इन्द्र भाव नयनों के बिना ही लगता है। आत्मा रूपी राम तो माया के स्वामी हैं। अत: जो भाव आत्मोन्मुखी हैं, अगर उनके साथ कुछ छेड़-छाड़ की गयी तो उल्टा परिणाम ही मिलेगा। अर्थात् आत्मा में रत भाव को अगर रोका गया तो भाव की आत्मोन्मुखी वृति और प्रबल हो उठेगी। तब किछु कीन्ह राम रूख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।। सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।। व्याख्या : आत्मा का रूख जान कर ही कोई विषय सुख की कुचाल की जा सकती है, परन्तु अब भाव रत भरत के साथ कुचाल करने पर परिणाम उल्टा ही हो सकता है। इसलिए सुख भोग रूपी स्वरों के मूल इन्द्र भाव! आत्मा रूपी राम का स्वभाव सुनो। वे (आत्मा) कभी भी स्वयं के प्रति किए गए अपराध पर क्रोधित नहीं होते हैं। यह वास्तविकता है कि आत्मा कभी क्रोधित नहीं होती है परन्तु अपराध देखकर ग्लानि से भर जाती है और आत्म ग्लानि अपराधी को छोड़ती नहीं है। जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।। लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।। व्याख्या : इसलिए जो कोई भक्त के प्रति अपराध करता है, वो आत्मा रूपी राम की क्रोधाग्नि में जल जाता है। अर्थात् भयहीन अवस्था यानी सहज अवस्था (उसी को भक्त की अवस्था कहा गया है) में अगर कोई वासना का भाव विकार पैदा कर देता है तो आत्मा की ज्ञान ज्वाला में जलकर भष्म हो जाता है। यह लोकमत अर्थात् कहने सुनने में भी आता है और वेद मत अर्थात् अनुभूति में भी आता है। दुर्वासना के भाव आत्मा की महिमा को अच्छी तरह जानते हैं। भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।। व्याख्या : इसलिए भाव रत भरत के समान आत्मा को कौन प्रिय है? क्योंकि आत्मा रूपी राम का जप तो सारा संसार करता है अर्थात् समस्त भाव आत्मा का जप करते हैं परन्तु आत्मा रूपी राम तो भाव रत भरत भाव का जप करता है। दो0 मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु। अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।। व्याख्या : इसलिए हे इन्द्रियों के मूल इन्द्र। आप वासनाओं के भाव मन में भी मत लाइये। वरना देह रूपी लोक में वासनाओं की आसक्ति बढ़ जायेगी और परलोक अर्थात् आत्म चिंतन में भी दु:ख के भाव दु:ख पैदा करने लगेंगे। सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।। मानत सुखु सेवक सेवकाईं। सेवक बैर बै डिग्री अधिकाई।। व्याख्या : हे स्वरों के ईश्वर इन्द्र। हमारी बात सुनिए। आत्मा को आत्मा सेवक अर्थात् आत्म चिंतन करने वाला भाव परम प्रिय होता है। इसलिए जो आत्म चिंतन में भाव लगा रहता है, उस भाव की सेवा करने पर आत्मा प्रसन्न होती है और उस आत्म चिन्तन वाले भाव का विरोध करने पर आत्मा में खिन्नता पैदा हो जाती है। जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।। करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ जो तस फलु चाखा।। व्याख्या : हालाँकि आत्मा में राग व द्वेष दोनों नहीं होता है, इसलिए आत्मा पाप व पुण्य को भी ग्रहण नहीं करती है। इन चौपाइयों में गहरा दर्शन समाया हुआ है। आत्मा सदैव निर्लेप व एकरस रहती है। इसलिए आत्मा का पाप-पुण्य से भी कोई बन्धन नहीं होता है। विश्व अर्थात् भावों का जो विधान है, वो कर्म की प्रधानता पर टिका हुआ है, इसलिए जो जैसा करता है, उसको वैसा ही फल मिल जाता है। आध्यात्म में यज्ञ को ही कर्म कहा गया है और यज्ञ एक ही है वो है अपान का पान में हवन करना। अत: जैसी यज्ञ की क्रिया होगी वैसा ही भाव पैदा होगा और भाव के अनुसार कर्म घटित होगा और उसी के अनुसार फल की प्राप्ति होगी। इसलिए कर्म से आत्मा का बन्धन नहीं होता है। परन्तु अगर कोई भाव आत्मा का चिन्तन करता है, तो आत्मा उसी भाव के अनुसार ढ़ल जाती है। यह आत्मा का गहरा दर्शन है जो ध्यान की क्रिया द्वारा ही अनुभव अच्छी तरह समझा जा सकता है। तदपि करहि सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।। अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का यह लक्षण होता है कि आत्मा भक्त व अभक्त अर्थात् सहज व असहज अवस्था के अनुसार सम व विषम व्यवहार करती है। क्योंकि आत्मा तो गुणों से निर्लिप्त, मान रहित व एकरस रहती है। परन्तु भावों के प्रेम वश आत्मा गुणों में बरतने लगती है। इन चौपाइयों में भी गहरा दर्शन है। क्योंकि आत्मा सबके हृदय में व्यवहार करती है, चाहे वो भक्त हो या अभक्त हो। परन्तु जैसे भावों का प्रेम होता है आत्मा वैसे ही भावों में बरतने लग जाती है। राम सदा सेवक रूचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।। अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो सदा सेवक की रूचि रखने वाले होते हैं अर्थात् जो भाव आत्मा का चिन्तन करता है, वैसा ही आत्मा रूख कर लेती है। यह अनुभव गत बात है, जिसे साधना द्वारा स्वरों की गति को जानकर जाना जा सकता है। इसलिए हे सुखभोग रूपी इन्द्र। तुम ऐसा विचारकर वासनाओं की कुटिलता का त्याग कर दो और भाव रत भरत के चरणों में प्रेम करो अर्थात् भावरत भरत के समान आत्मोन्मुखी हो जाओ। दो0 राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल। भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219। व्याख्या : हे सुख भोग रूपी इन्द्र! आत्मा रूपी राम के भक्त सदैव आत्मकल्याण (पर उ आत्मा अ हित उ कल्याण उ आत्म कल्याण) में लगे रहते हैं, इसलिए आत्मा के दु:ख को देखकर दु:खी होते रहते हैं। इसलिए भाव-रत भरत भाव तो आत्मोन्मुखी भावों में शिरोमणि है, इसलिए हे स्वरों द्वारा पालित इन्द्र भाव! तुम डरो मत। अर्थात् वासनाओं की आसक्ति से उत्पन्न भय का त्याग कर दो, डरो मत। सत्यसंघ प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।। स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू।। व्याख्या : सत्य संध अर्थात् परम सहजता की अवस्था आने पर परमात्मा स्वरों के माध्यम से कल्याणकारी भाव पैदा करके कल्याण करने लगते हैं और ऐसी अवस्था में आत्मा में रत रहने वाला भाव रत भरत आत्मा के रूख के अनुसार व्यवहार करने लगता है अर्थात् सहजता का अनुसरण करने लगता है। इसलिए हे सुख भोग रूपी इन्द्र! तुम विषयों की आसक्ति में मत पड़ो। इसमें भाव रत भरत भाव का कोई दोष नहीं है। इसमें तो तुम्हारा विषयों के प्रति मोह ही दोषी है। सुनि सुरबर सुरगुर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी।। बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ।। व्याख्या : सुख भोग रूपी इन्द्र स्वरों से उत्पन्न ज्ञान रूपी गुरु की बातें सुनकर प्रसन्न हो गया और मन की ग्लानि मिट गयी। तब ध्यान की उस अवस्था में स्वरों से आनन्द रूपी फूलों की वर्षा होने लगती है और सभी भाव समाज भाव-रत भरत भाव की सराहना करने लगता हैं। एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।। जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा।। व्याख्या : इस प्रकार भाव रत भरत भाव ध्यान में चित्रकोष के रास्ते पर चले जा रहे हैं और उनकी दशा को देखकर मन की एकाग्रता, व सिद्ध भाव सराहना करने लगते हैं। ध्यान की उस अवस्था में ज्योंहि आत्मा रूपी राम का श्वास के साथ चिंतन होने लगता है, तो ऐसा लगने लगता है, मानों चारों तरफ प्रेम उमड़ रहा हो। द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना।। बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नी डिग्री लोचन जल छाए।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के आत्मोन्मुखी प्रेम को देखकर तो जड़ भाव भी द्रवित हो उठते हैं और देह के भावों के प्रेम का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार नाना कोष व कोशिकाओं को पार करके भाव-रत भरत भाव यमुना नाड़ी रूपी नदी के तट पर आए अर्थात् ध्यान नाना नाडियों व कोषों को पार करके यमुना नाड़ी के पास पहुँच गए। यमुना नाड़ी रूपी नदी के तमस रूपी जल को देखकर भाव-रत भरत की आँखों में अश्रु आ गए। दो0 रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज। होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज।।220।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के श्याम वर्ण के समान तमस कोष के भाव रूपी जल को देखकर भाव-रत भरत भाव विरह रूपी समुद्र को पार करने के लिए भाव समाज सहित विवेक रूपी जहाज पर चढ़ गए। अर्थात् तमस कोष के भावों से विवेकपूर्वक बचते हुए ध्यान चित्रकोष के लिए आगे बढ़ने लग गया। जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।। रातिहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी।। व्याख्या : तमस कोष को पार करने में ध्यान में थोड़ा समय लगता है क्योंकि तामसकि भाव बीच-बीच में बाधा पैदा करने के प्रयास करते रहते हैं। परन्तु जब साधक का भाव आत्मा में रत हो जाता है, तो निषेध भाव तमस कोष को पार कराने में सहयोग करने लगता है। उसी सहयोग की अवस्था को घाट-घाट पर निषाद भाव द्वारा नाव लगा देना बोलकर लिखा गया है। ध्यान में तमस कोष भी सहज हो जाता है, इसलिए उसी को ""भयउ समय सम सबहि सुपासू"" बोलकर लिखा गया है। प्रात पार भए एकहि खेवाँ। तोषे राम सखा की सेवाँ।। चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।। व्याख्या : जब विवेक द्वारा ज्ञान रूपी सवेरा हो गया तो सभी भाव, भाव रत भरत सहित एक ही खेप में तमस कोष को पार कर गए। सभी भावों ने निषेध भाव रूपी निषाद भाव की सेवा की सराहना की। तब सब भाव समाज तमस कोष में स्नान करके अर्थात् तामसिक भावों में सहज होकर ध्यान में आगे बढ़े। निषेध भाव रूपी निषाद भाव भी भाव रत भरत व कामादि नाशक शत्रुघन के साथ ध्यान में साथ-साथ आगे चित्रकोष के लिए चले। आगें मुनिबर बाहन आछें। राज समाज जाइ सबु पाछें।। तेहि पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें।। व्याख्या : ध्यान में आगे-आगे विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु का बाहन चल रहा है अर्थात् विशिष्ट ज्ञान का भाव आत्मा से मिलने में सहयोग कर प्रेरणा रूपी पथ दिखा रहा है। विशिष्ट ज्ञान के भाव का ही सब भाव समाज अनुसरण करने लगता है। उन भाव समाज के पीछे भाव रत भरत भाव व कामादि भावों का शत्रु भाव शुत्रघ्न भाव चले। उस अवस्था में वासनाएँ शांत हो गयी थीं। सेवक सुहृद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा।। जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा।। व्याख्या : उस ध्यान अवस्था में सेवा के भाव, सुहृदयता के भाव व सुमंत्रणा से उत्पन्न भाव, सभी आत्मोन्मुखी होकर चलने लगते हैं। जिन-जिन कोषों व कोशिकाओं से होकर आत्म चेतना गुजरी थी, उन सब जगहों को सभी भाव प्रनाम करते हुए चलने लगे। अर्थात् आत्म चेतना से जागृत कोष व कोशिकाओं के प्रभाव का अनुभव होने लगता है। दो0 मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ। देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ।।221।। व्याख्या : चित्रकोष के रास्ते में पड़ने वाले नर-नाड़ियाँ ज्योंहि भाव रत भरत के भाव समाज सहित आगमन की खबर पाते, तो दौड़कर सब कामना छोड़कर चले आते हैं। वे सब नर-नाड़ियाँ भाव रत भरत व भावों को आत्मोन्मुखी देखकर अपना जन्म सफल मानने लगते हैं। कहहिं सपेम एक एक पाहीं। राम लखनु सखि होहिं कि नाहीं।। बय बपु बरन रूपु सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में एक दूसरी नाड़ियाँ एक दूसरी नाड़ियों से बातें करने लगती हैं कि ये आत्मा व लखन भाव जैसे लगते हैं, परन्तु वे नहीं है। इनका रूप व उम्र तो वैसी ही है और शील व स्नेह भी वैसा ही लगता है। वास्तव में जब भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं, तो भावों में भी आत्मा के लक्षण परिलक्षित होने लग जाते हैं। उसी को यहाँ लिखा गया है कि भाव रत भरत व शत्रुघ्न भाव भी आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण जैसे ही लगते हैं। बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगे अनी चली चतुरंगा।। नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।। व्याख्या : इन चौपाइयों में अनुभूति को बहुत ही सूक्ष्मता के साथ लिखा गया है। भाव रत भरत और शत्रुघ्न भाव का भेष आत्मा रूपी राम जैसा नहीं होता है। आत्मा रूपी राम तो निर्लेप व एकरस होते हैं परन्तु भाव रत भरत भाव तो समस्त भाव रूपी सेना को साथ लिए हुए हैं। आत्मा तो एकरस होने के कारण सहज प्रसन्न होती है परन्तु भाव रत भरत व भाव समाज तो आत्मा के विरह में दु:खी व उदासीन होते हैं। यही सूक्ष्म अंतर आत्मा और आत्मोन्मुखी भावों में होता है। तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी।। तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी।। व्याख्या : उस नाड़ी का तर्क समस्त त्रिगुणों को प्रवाहित करने वाली नाड़ियों को अच्छा लगा और सब कहने लगे कि तुम्हारी बात सच्ची है। इस प्रकार मधुर वाणी बोलकर उस तर्कमयी सयानी नाड़ी का सबने सम्मान किया। वास्तव में ध्यान में अनुभव आता है कि हमारे मस्तिष्क में बहुत सूक्ष्म-सूक्ष्म नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें प्राण का प्रवाह होने पर नाना भाव व तर्क पैदा होने लग जाते हैं। ध्यान में ही नाड़ियों और भावों के वार्तालाप को समझा जा सकता है। कहि सपेम सब कथा प्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू।। भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।। व्याख्या : वह सयानी नाड़ी पुन: प्रेमपूर्वक आत्मा रूपी राम के राज के रस के भंग होने की कथा का वर्णन करने लगी कि किस प्रकार आत्मा रूपी राम उदासीन होकर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले गए। फिर नाना प्रकार से भाव रत भरत के शील, स्नेह व स्वभाव की सराहना करने लगी। दो0 चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु। जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।222।। व्याख्या : वह सयानी नाड़ी रूपी स्त्री बोली की भाव रत भरत भाव सहज होकर और आसक्ति का त्याग करके, चित रूपी राजा द्वारा दिए गए भावों के अधिष्ठाता पद का त्याग करके आत्मा रूपी राम को मनाने जा रहे हैं। अर्थात् भाव रत भरत भाव निष्काम भाव से आत्मोन्मुखी हो रहे हैं, इसलिए भरत के समान कौन भाव है? भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।। जो किछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।। व्याख्या : इसलिए भाव रत भरत के भ्रातत्व व भक्ति के भावों का वर्णन करने से दु:ख दूर होना स्वाभाविक है। तब दूसरी नाड़ी रूपी सहेली बोली कि हे सखी! तुमने जो भी भाव रत भरत के बारे में कहा है, वो थोड़ा ही कहा है। क्योंकि भाव रत भरत के गुणगान दु:खों को क्यों नहीं हरेंगे, आखिर वे आत्मा रूपी राम के भाई हैं अर्थात् वह आत्मोन्मुखी हैं। आत्मोन्मुखी भाव के गुण व शील के वर्णन से स्वत: ही दु:खों का हरण हो जाता है। हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।। सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।। व्याख्या : भावों का प्रवाह करने वाली नाड़ियाँ कहने लगी कि आज हम भाव-रत भरत को शत्रुघन रूपी भाई के साथ देखकर धन्य हो गयी हैं। नाड़ियों में उस समय आनन्द व उमंग के भाव प्रवाहित होने लग जाते हैं, जिससे नाड़ियों में यौवन छा जाता है। परन्तु भाव रत भरत और शत्रुघन के गुण व शील को देखकर पश्चाताप करने लगती हैं कि इनके गुण, शील, स्नेह व स्वभाव तो रजोवृति से मेल नहीं खाते हैं। कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।। कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।। व्याख्या : नाड़ियाँ आपस में बातें करती हुई कहने लगती हैं कि इसमें रजोवृति रूपी चित की रानी का दोष नहीं है। ये अनुभूति तो हमें ध्यान की क्रिया (विधि) के अनुकूल हो जाने के कारण हुई है। वरना हम तो लोक व वेद से हीन तुच्छ नाड़ियाँ हैं। नाड़ियाँ आपस में कहती हैं कि जो आज परम अनुभूति हो रही है, वो तो हमें ध्यान की क्रिया के अनुकूल हो जाने के कारण हो रही है वरना हम तुच्छ नाड़ियों को तो न तो लोक नीति के भाव आते हैं और न ही आत्मा की अनुभूति (वेद) के भाव आते हैं। बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।। अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरूभूमि कलपत डिग्री जामा।। व्याख्या : नाड़ियाँ कहती हैं कि हम तो कुदेस अर्थात् वासनाओं के देश में निवास करती हैं और कुगाँव अर्थात् असहज रहती हैं और कुबामा अर्थात् विपरीत कार्य करने वाली होती हैं। परन्तु इनके दर्शन तो किसी पुण्य के परिणामस्वरूप ही हुए हैं। ऐसा आश्चर्य व आनन्द प्रत्येक नाड़ियों व कोषों में होने लगता है। जैसे मरूस्थल में कल्पत डिग्री का पेड़ लग गया हो। दो0 भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु। जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।223।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के दर्शन करने से नाड़ियों व कोषों से उत्पन्न भावों के भाग्य का उदय हो गया अर्थात् सभी भावों में आत्मोन्मुखी होने की प्रवृति प्रबल हो उठी। जैसे सिंहल द्वीप के निवासियों को मानो प्रयाग के दर्शन हो गए हों। अर्थात् नाड़ियों व कोषों की तमसता निर्मल हो गयी और गुणों को गुणों में बरतने की अवस्था आ गयी। निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।। तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा।। व्याख्या : ध्यान में भाव रत भरत भाव निज गुणों सहित आत्मा के गुण समूहों की अनुभूति करते हुए तथा आत्मोन्मुखी होते हुए चले जा रहे हैं। उस ध्यान की अवस्था में भाव रत भरत भाव तीनों गुणों को पार कर लेते हैं, उसी को तीर्थ की अवस्था कहा गया है। उस अवस्था में मन भी एकाग्रही होकर आत्मोन्मुखी ही हो जाता है, वही मन की एकाग्रता ही मुनि का प्रतीक है। उस अवस्था में स्वरों के मूल में ही सहजता आ जाती है, उसी को ""आश्रम सुरधामा"" बोलकर लिखा गया है। इस सब अवस्थाओं की अनुभूति करते-करते भाव रत भरत भाव निर्मल होता चला जाता है और प्राण में रमण करता हुआ उर्ध्वगामी होने लग जाता है। मनहीं मन मागहिं ब डिग्री एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।। मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।। व्याख्या : भाव रत भरत का भाव मन ही मन यह चाह रखता है कि आत्मा व सुरता में लगन लगी रहे। ध्यान के रास्ते में किरात व कोल रूपी उदासीन इच्छाओं के भाव भी प्रकट होते रहते हैं, तो कुछ त्याग, वैराग्य, साधना व उदासीनता के भाव भी प्रकट होते रहते हैं। करि प्रनामु पूँछहिं जेहि तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही।। ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में निर्मल प्राण की तरंगों के माध्यम से एक दूसरे भावों से सूक्ष्म वार्तालाप होने लगता है परन्तु उस समय भाव रत भरत भाव केवल आत्मा, लखन व सुरता से मिलने का ही रास्ता खोजने का प्रयास करता है। उसी को सबको प्रणाम करके राम, लखन व सीता के बारे में पूछना बोलकर लिखा है। उस अवस्था में सब भाव आत्मा रूपी राम की तरफ ही उन्मुख होते रहते हैं और भाव रत भरत भी उन्मुख होते रहते हैं और भाव रत भरत की लग्न को देखकर जन्म का फल पाते हैं। जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।। एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी।। व्याख्या : जो भाव आत्मा के दर्शन की बात कहते हैं, उन्हें भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण के समान ही प्रिय मानते हैं। यह वास्तविक सत्य भी है कि जो भाव आत्म दर्शन कर लेता है, वो तो आत्मामय ही हो जाता है। इस प्रकार सब भावों की वाणी को समझते हुए और आत्मा रूपी राम के दृढ़ वैराग्य रूपी वन के वास की बातें सुनते हुए, भाव रत भरत भाव चलते जाते हैं। दो0 तेहि बासर बसि प्रातही चले सुमिरि रघुनाथ। राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।। व्याख्या : ध्यान में ज्ञान रूपी दिन से दृढ़ता लेकर नव स्फूर्ति रूपी प्रात:काल का आभास करते हुए भाव रत भरत भाव आत्मचिंतन करते हुए चले। इस समय भाव-रत भरत भाव के समान ही सब भावों को आत्मदर्शन की प्रबल लालसा हो रही थी। अर्थात् ध्यान में सभी भावों की आत्म दर्शन की लालसा प्रबल हो उठती है। मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।। भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सभी भावों में मंगल की भावना प्रबल हो उठती है और उससे सबके अंग, आँख व बाहें फड़कने लगते हैं। जब ध्यान में अंगों का फड़कना शु डिग्री हो जाता है, तब मान लेना चाहिए कि मंजिल नजदीक आने वाली है। यहाँ पर भी भावरत भरत भाव के अंग फड़कने लगते हैं, जिससे आत्मा से मिलने का उत्साह और बढ़ जाता है तथा संकेत मिलने लग जाते हैं कि अब आत्मा रूपी राम के दर्शन होने वाले हैं। करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।। सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जिस भाव का जैसा सहज स्वभाव होता है, वो वैसा ही मनोरथ करते हुए चलता है। परन्तु उस अवस्था में स्वरों के माध्यम से प्रेम उमड़ने लगता है। प्रेम उमड़ने से सब अंग शिथिल होने लग जाते हैं और जिसके कारण भाव रास्ते में चलते हुए डगमगाने लगते हैं। प्रेम में विह्वल हो उठने के कारण वाणी भी गदगद हो उठती है। अर्थात् उस ध्यान अवस्था में प्रेम के कारण वाणी लड़खड़ाने लग जाती है, जिससे धीरे-धीरे अन्त:स्थल में मौन बढ़ने लग जाता है। राम सखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।। जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।। व्याख्या : ध्यान की उस गहन अवस्था में निषेध भाव रूपी निषाद भाव संकेत देने लगता है कि कोशिकाओं रूपी पर्वतों में श्रेष्ठ कोशिका रूपी जो सहज पर्वत हैं और जिसके पास से पावन रसायन रूपी नदी बहती है, वहाँ पर सुरता सहित आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण रहते हैं। देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा।। प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू।। व्याख्या : उस अवस्था में चित्रकोष की पवित्र कोशिकाओं को देखकर सभी भाव समाज प्राणों के माध्यम से जुड़ गया तथा सुरता व आत्मा की जय बोलने लगा। इस प्रकार समस्त भाव समाज प्रेम में मग्न हो उठा, जैसे आत्मा रूपी राम पुन: अवधी रूपी शरीर में लौटकर आ गयी हो। दो0 भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकि न सेषु। कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के उस समय के प्रेम का वर्णन तो शेष भी नहीं कर सकते। ममता व अहंता में लिपटे हुए जीवों के लिए उस ब्रह्मसुख का अनुभव अगम्य होता है। सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।। जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के प्रेम में समस्त भाव शिथिल हो गए इसलिए आनन्द मग्न होकर ध्यान स्थिर सा हो गया। अत: केवल दो कोषों को ही पार कर पाया। ध्यान में कभी-कभी ऐसी अवस्था आ जाती है जिसमें ध्यान ब्रह्मानन्द का सुख लेते-लेते किसी कोष या कोशिका में स्थिर हो जाता है। यहाँ पर यही हुआ है कि ध्यान आनन्द के कारण धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगता है। ब्रह्मानन्द रूपी जल व भूमि का आधार पाकर ध्यान सुख रूपी रात्रि में आसक्त होकर स्थिर हो जाता है। परन्तु भाव-रत भरत सुख भोग रुपी रात्रि में भी आत्मा रूपी राम से मिलने के लिए चल देता है। उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा।। सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन पाए।। व्याख्या : उधर आत्मा रूपी राम आसक्ति रूपी रात्रि में ही जाग गए क्योंकि सुरता रूपी सीता ने सपना देखा मानो कि भाव रत भरत भाव समस्त भाव समाज सहित आया हो। उसका तन आत्मा के वियोग में तप रहा था। वास्तव में ध्यान में जब भाव आत्मोन्मुखी होकर उर्ध्वगामी होने लगते हैं तो सुरता के भावों की गति का अनुमान हो आता है और सुरता को अनुमान होने पर आत्मा को भी आभास हो जाता है। उसी भाव अवस्था की अनुभूति को बहुत ही सूक्ष्म तरीके से यहाँ लिखा गया है। सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।। सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता को तब ऐसा लगता है मानों सभी भाव आत्मा के विरह में दु:खी हो रहे हों और श्वासों की गति भी नाड़ियों में उसी प्रकार बह रही हो। सुरता रूपी सीता के सपने को सुनकर आत्मा रूपी राम के नेत्रों में जल छा गया और चिन्ता को मिटाने वाला आत्मा भावों के चिंतन में लग गया। लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।। अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम लखन भाव से कहते हैं कि हे लखन! यह सपना अच्छे संकेतों वाला नहीं है। इस चौपाई में गहरा रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि जब सुरता के माध्यम से भाव रत भरत सहित भाव समाज के आने के संकेत मिलते हैं तो आत्मा भावों के अनुसार बरतने को बाध्य हो जाती है। इसलिए आत्मा रूपी राम कहते हैं कि पता नहीं भाव समाज किस कुचाह अर्थात् वासना के कारण यहाँ आ रहा है। ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम लखन भाव सहित नहाने चले गए अर्थात् आत्मा व लखन भाव अनासक्ति के प्रति सजग होकर साधना में दृढ़ हो गए और पुरारि अर्थात् पुर अ अरि उ पुरारि यानी देह भाव के शत्रुओं को पूजकर अर्थात् परम भाव में स्थिर हो गए। संयम, नियम व वैराग्यादि भाव ही देह भावों से उत्पन्न विषयों के शत्रु माने गए हैं। इसलिए इन्हें ही पुरारि कहा जाता है। छ0 सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए। नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए।। तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे। सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में जब आत्मा वैराग्य में दृढ़ हो जाती है तो स्वर व मन के भाव भी संयमित हो जाते हैं। उसी अनुभव को स्वर व मन की गति बन्द करके उत्तर दिशा की तरफ मुख करके बैठना बताया गया है। उत्तर दिशा की तरफ मुँह करने का कारण यह है कि उत्तर दिशा को सात्विक दैवीय वृतियों वाला माना जाता है। उस अवस्था में गगन मण्डल में ध्यान चढ़ने लगता है तो भावों की धूल, इच्छाओं रूपी मृग व पक्षी भी दौड़े हुए आत्मोन्मुखी होते हुए दौड़े चले आते हैं। तब आत्मा रूपी राम इन भावों को दौड़ता हुआ आता देख खड़े हो जाते हैं अर्थात् आत्मा सजग हो उठती है। तब कोल व किरात रूपी इच्छाओं के भाव, भाव रत भरत सहित भाव समाज के आने की बात बताते हैं। सो0 सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर। सरद सरोरूह नैन तुलसी भरे सनेह जल।।226।। व्याख्या : सुन्दर सुमंगल के वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम का मन बहुत प्रसन्न हुआ और शरीर पुलकित हो उठा अर्थात् आत्मा भी भाव रत भरत के प्रेम को देखकर प्रफुल्लित हो उठी। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम के नेत्र शरद ऋतु के कमल के समान जल से भर गए अर्थात् सहज प्रेम का जल पैदा हो गया। बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।। एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुरता में रमण करने वाले आत्मा रूपी राम सोच के वश में हो गए कि किस कारण से भाव रत भरत भाव आया है। इतने में एक भाव ने आकार कहा कि भाव रत भरत के साथ सत, रज, तम व गुणातीत भावों की विशाल चतुरंगी सेना है अर्थात् सभी भाव आ रहे हैं। सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।। भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं।। व्याख्या : ऐसा सुनकर आत्मा रूपी राम को बहुत सोच हुआ कि एक तरफ तो चित रूपी पिता के वचन हैं और दूसरी तरफ भाव रत भरत भाव का संकोच है। भाव रत भरत के स्वभाव को मन में समझकर आत्मा भी थाह नहीं पा पाती है। समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।। लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम को समाधान हुआ कि भाव रत भरत भाव सज्जन व सयाना है तथा मुझ आत्मा की प्रेरणा का अनुसरण करने वाला है। ध्यान की उस अवस्था में लखन भाव ने आत्मा रूपी राम के अन्त:करण के भावों के लक्षणों को जान (लख) लिया। तब लखन भाव समयानुकूल नीति का विचार करके बोला। बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं।। तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।। व्याख्या : लखन भाव बोला कि हे इन्द्रियों के स्वामी। मैं बिना पूछे कुछ कहना चाहता हूँ क्योंकि सेवक समय पर ढिठाई करने पर ढीठ नहीं समझा जाता है। तुम तो सर्वग्य हो परन्तु मैं मेरी समझ के अनुसार आपका अनुगामी होने के कारण कहना चाहता हूँ। दो0 नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान। सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।। व्याख्या : इस दोहे में लखन भाव आत्मा के लक्षणों को लखकर वर्णन करते हुए कहता है कि हे प्रभु! आपका हृदय सरल, शील व प्रेम का भण्डार है। आपका सभी भावों पर प्रेम व विश्वास होता है और सबको अपने हृदय में अपने समान ही मानते हो। बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।। भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना।। व्याख्या : परन्तु विषयी भाव प्रभुता पाकर मोह के कारण अपने असली स्वरूप को प्रकट कर देते हैं। भाव रत भरत भाव नीति परायण व साधना में लगा हुआ सज्जन भाव है और आत्मा के चरणों में उसके प्रेम को समस्त भाव जगत जानता भी है। तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।। कुटिल कुबंधु कुअवस डिग्री ताकी। जानि राम बनबास एकाकी।। व्याख्या : वो भाव रत भरत भाव आज आत्मोन्मुखी होकर धारणा की मर्यादाओं को तोड़ते हुए चला आ रहा है। ऐसी अवस्था में कुटिल व असहज भाव कुअवसर अर्थात् विषयी भोगों की बाट देखने वाले आत्मा रूपी राम को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में अकेला देखकर प्रभावित करने का प्रयास कर सकते हैं। करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।। कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।। व्याख्या : कहीं ये विषयों रूप कुमंत्र को सजाकर भावों का अधिष्ठाता बनने के लिए तो नहीं आए हैं। नाना प्रकार की भोग लालसाओं की कल्पना करके दोनों भाई भाव समाज को इकट्ठा करके ले आए हैं। ध्यान की अवस्था में लखन भाव भाव रत भरत सहित भाव समाज के लक्षणों को जानने का प्रयास करता है और आगमन के कारण को लखना चाहता है। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।। भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।। व्याख्या : लखन भाव कहता है कि अगर भाव-रत भरत भाव के हृदय में विषय रूपी कपट और कुचाल नहीं होता तो क्यों वृति रूपी रथ और भोग इच्छा रूपी हाथी घोड़े अच्छे लगते। इसमें भाव रत भरत भाव का ही क्या दोष है? क्योंकि कोई भी भाव चिंतन का बल पाकर मद में भर जाता है। अर्थात् किसी भी भाव का ज्यादा चिंतन चलने पर वह भाव प्रबल हो उठता है। दो0 ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान। लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।। व्याख्या : इस दोहे में बहुत गहरा आध्यात्मिक रहस्य छुपा हुआ है। जब ज्ञान रूपी गुरु की कृपा से वासनाओं के भाव चन्द्रमा के समान शीतल हो जाते हैं, तो भी विषयों का चिंतन चलने पर वह तीन गुणों में बरतता हुआ वासनाओं में फँस जाता है और वासनाओं का चिंतन ही देह रूपी भूमि के स्वरों के माध्यम से चिंतन में चढ़ जाता है अर्थात् विशुद्ध प्रकाश के भाव भी विषयों के चिंतन के आगे दब जाते हैं। उसी को राजा नहुष का विप्रो की पालकी पर चढ़ना बताया गया है। विषयों का जब चिंतन बढ़ जाता है तो लोक व वेद से विमुखता बढ़ जाती है और वाणी भी अधम वृति की हो जाती है। लोक वेद से विमुखता का तात्पर्य असहजता के बढ़ने से होता है। सहस बाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।। भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।। व्याख्या : जब विषयों का चिंतन बढ़ने लग जाता है तो तीनों गुणों से उत्पन्न भाव सत, रज व तम की त्रिशंकू धारा में प्रवाहित होने लग जाते हैं और भावों को विषयों के मद भ्रमित कर देते हैं। इसलिए भाव- रत भरत ने यह उचित ही उपाय किया है कि विषयों का रंच मात्र भी चिंतन नहीं चले। एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।। समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।। व्याख्या : लखन भाव कहता है कि भाव रत भरत ने आत्मा रूपी राम का निरादर करके अच्छा नहीं किया है। वह भूल भाव रत भरत को आत्मा रूपी राम को भाव युद्ध में क्रोधित देखकर समझ आ जायेगी। यहाँ पर लखन भाव भावरत भरत के लक्षणों को सूक्ष्मता से लखने का प्रयास करता है परन्तु अभी पूरी तरह लख नहीं पाने के कारण भाव रत भरत में उसे कमी दिखायी देती है। एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।। प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।। व्याख्या : इतना कहते-कहते लखन भाव नीति लक्षणों के लखने की नीति को भूल गया और भाव युद्ध के वीर रस में डूब गया। तब लखन भाव ने आत्मा रूपी राम के चरणों में सीस झुकाया और सहज होकर बोला। वास्तविकता यह है कि लखन भाव भी भावों के चिंतन के अनुसार प्रभावित हो उठता है। अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।। कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।। व्याख्या : हे प्रभु! आप बुरा मत मानिए क्योंकि भाव रत भरत भाव ने हमें कम नहीं छेड़ा है। हम कब तक मन को मार कर रहेंगे, जबकि आत्मा रूपी स्वामी आप साथ हैं और विषयों रूपी इच्छाओं का धनुष हमारे हाथ में है। अर्थात् आत्मा अपने निजस्वरूप में स्थित है और इच्छाएँ वश में हैं, तो फिर भाव रत भरत भाव क्यों हमें छेड़ने आ रहा है? दो0 छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान। लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।। व्याख्या : तीन गुणों का क्षय होने पर आत्मा का चिंतन शु डिग्री होता है परन्तु आत्मा का चिंतन शु डिग्री हो जाने पर आत्मोन्मुखी अवस्था आ जाती है, इसे समस्त संसार जानता है। उस अवस्था में वासना रूपी धूल को लात मारने पर भी वह आत्मोन्मुखी होकर उर्ध्वगामी हो उठती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तीनों गुणों की जड़ संधि टूट जाती है तो आत्मा का चिंतन शु डिग्री हो जाता है तथा उस अवस्था में सभी भाव आत्मोन्मुखी हो उठते हैं, चाहे वे वासना रूपी धूल के समान नीच प्रवृति के ही क्यों ना हों। उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।। बाँधि जटा सिर कसि कटि माथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।। व्याख्या : तब लखन भाव ने दृढ़ होकर आत्मा रूपी राम की आज्ञा माँगी अर्थात् लखन भाव ने लक्षणों को लखकर भावों के आगमन को रोकने की तैयारी की। उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है मानों भाव युद्ध के लिए सोता हुआ वीर रस जाग गया हो। तब लखन भाव ने दृढ़ता लाकर संयम रूपी कमर में तरकश बाँध लिया और धनुष रूपी इच्छा को सजाकर अर्थात् वश में करके प्रेरणा रूपी बाण को हाथ में लेकर कहा। आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।। राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।। व्याख्या : लखन भाव ने कहा कि आज मैं आत्मा रूपी राम का सेवक होने का फल लूँगा और भाव रत भरत भाव को भावों के युद्ध में अच्छी शिक्षा दूँगा। आत्मा रूपी राम का निरादर करने के फलस्वरूप भाव- रत भरत और शत्रुघन भाव रण सैय्या पर सोवेंगे अर्थात् भाव युद्ध में पराजित होंगे। आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।। जिमि करि निकर दलि मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।। व्याख्या : लखन भाव कहता है कि आज अच्छा हुआ कि समस्त भाव समाज ही आ गया है। मैं आज पिछला सब क्रोध प्रकट करूँगा अर्थात् वासना व लालसा किस प्रकार जीवात्मा को बंधन में डालती हैं, वो सब आज प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियों के झूण्ड को कुचल डालता है और बाज लवा पक्षी को लपेट लेता है। आज मैं भी वैसे ही देह भावों के समाज को कुचल डालूँगा। तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।। जौं सहाय कर संक डिग्री आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।। व्याख्या : जैसे ही भाव रत भरत भाव, भाव रूपी सेना सहित आयेगा, मैं वैसे ही शत्रुघन भाव सहित मार डालूँगा। अगर विश्वास रूपी शंकर का भाव भी सहायता करेगा तो आत्मा रूपी राम की शपथ मैं मार डालूँगा। लखन भाव एकदम दृढ़ होकर भाव समाज को आत्मा से दूर रखना चाहता है ताकि आत्मा पर देह भावों का असर नहीं हो। दो0 अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान। सभय लोक लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।। व्याख्या : लखन भाव के क्रोध भरे वचनों व सत्य शपथ को सुनकर ध्यान में समस्त कोषों में भय व्याप्त हो गया और सभी कोषों में भागने की हलचल सी मच गयी। ध्यान में यह अवस्था जब आती है, तो कई बार साधक को भय भी लगने लग जाता है। कई बार ऐसा भी लगने लग जाता है कि पता नहीं शरीर नहीं छूट जाए, आदि-आदि भय के भाव पैदा होने लग जाते हैं। जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।। तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रूपी संसार में भय व्याप्त हो जाता है। तब ध्यान में गगन मण्डल में आकाशवाणी होती है और लखन भाव के प्रभाव को बताती है कि हे लखन भाव! तुम्हारे प्रताप व प्रभाव को कोई नहीं जानने वाला है। अर्थात् लखन भाव यानी लक्षणों को लखने के भाव के प्रभाव को कोई भाव नहीं जान पाता है। क्योंकि जिस भाव को लखन भाव लख लेता है, वो भाव उसी क्षण प्रभावहीन हो जाता है। अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।। सहसा करि पाछें पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।। व्याख्या : इसलिए उचित व अनुचित जो भी काज हो उसे अच्छी तरह समझकर ही करना चाहिये। क्योंकि अचानक बिना समझे भावों के निष्कर्ष पर पहुँच जाने पर पश्चाताप ही करना पड़ता है। इसलिए वे लोग समझदार नहीं होते हैं जो अचानक बिना समझे करते हैं। सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।। कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।। व्याख्या : स्वरों से उत्पन्न आकाशवाणी को सुनकर लखन भाव संकोच में पड़ गए। तब सुरता व आत्मा ने लखन भाव का आदर किया अर्थात् सहारा प्रदान किया, जिससे लखन भाव को ग्लानि नहीं हो। इसलिए आत्मा रूपी राम ने कहा कि हे तात! तुमने नीतिपूर्ण बात ही कही है कि सबसे कठिन राजमद अर्थात् भाव की प्रभुता होती है। जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधु सभा जेहिं सेई।। सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।। व्याख्या : नर की धड़कन (नृप) से उत्पन्न वो भावमद करते हैं जो सहज नहीं होते हैं। हे लखन! भाव रत भरत भाव सरीखा दूसरा भला भाव कोई नहीं होता है। ऐसा भाव न कभी देखा और न कभी सुना है। दो0 भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाई। कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीर सिंधु बिनसाइ।।231।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव को किसी भी क्रिया (विधि), माया का हरण होने की अवस्था व माया का हरने वाला होने पर भी राजमद नहीं हो सकता है। क्या कभी काँजी की बूँदों से क्षीर सागर फट सकता है? आत्मा रूपी राम कहना चाहते हैं कि भाव-रत भरत को कभी मद नहीं हो सकता है क्योंकि वह तो लगन लगाकर सदैव समर्पण की चाह रखता है। तिमि डिग्री तरून तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।। गोपद जल बूड़हि घटजोनी। सहज छमा ब डिग्री छाड़ै छोनी।। व्याख्या : अंधकार चाहे सूर्य को निगल जाए। आकाश चाहे बादलों में मिल जाए। चाहे इन्द्रियों के जल में पूरा शरीर डूब जाए और पृथ्वी चाहे अपनी सहज क्षमा को छोड़ दे। मसक फूँक मकु मे डिग्री उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।। लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।। व्याख्या : मच्छर की फूँक से चाहे सुमे डिग्री उड़ जाए। परन्तु हे भाई! भाव-रत भरत भाव को राज मद नहीं हो सकता है। हे लखन! मैं तुम्हारी शपथ और चित रूपी पिता की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि भावरत भरत भाव के समान पवित्र और उत्तम भाव संसार में नहीं होता है। सगुनु खी डिग्री अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।। भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।। व्याख्या : हे तात! गुण रूपी दूध और अवगुण रूपी जल के मिल जाने पर क्रिया कर्ता (विधाता) द्वारा इस संसार के प्रपंच का निर्माण होता है। परन्तु भाव-रत भरत भाव ने सूर्यवंश रूपी सरोवर में जन्म लेकर हंस की तरह गुण व दोष रूपी दूध व जल को अलग कर दिया। अर्थात् रजोवृति से उत्पन्न भाव रत भरत भाव ने गुण व दोषों में भेद करके हंसाकार अवस्था को प्राप्त कर लिया है। गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।। कहत भरत गुन सील सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव ने गुण रूपी दूध को ग्रहण करके जल रूपी विषयों का त्याग कर दिया है और स्वयं के यश से भाव रूपी संसार में ज्ञान रूपी प्रकाश कर दिया है। इस प्रकार भाव रत भरत भाव के गुण व शील का वर्णन करते-करते आत्मा रूपी राम प्रेम के समुद्र में मग्न हो गए। दो0 सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु। सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।। व्याख्या : इस प्रकार आत्मा रूपी राम की वाणी को सुनकर और भाव रत भरत भाव पर उनका सनेह देखकर समस्त भाव रूपी देवता उनकी सराहना करने लगे कि आत्मा रूपी राम के समान और कोई कृपा करने वाला नहीं है। जौं न होत जग जन्म भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।। कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।। व्याख्या : अगर भाव रत भरत का भाव पैदा नहीं होता तो धारणा के आधार पर इस देह रूपी पृथ्वी को कौन धारण करता। जब भाव किसी में रत हो जाता है, तो उससे धारणा बन जाती है और धारणा के अनुसार ही जीव शरीर धारण करता है। इसलिए कवियों के लिए भी भाव रत भरत की गुण गाथा का वर्णन करना कठिन होता है। भाव रत भरत को मूल रूप से तो आत्मा ही जान पाती है। लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।। इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनी पुनीत नहाए।। व्याख्या : दैवीय भावों की वाणी को सुनकर लखन भाव, आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को बहुत सुख हुआ जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। इधर भाव रत भरत समस्त भाव समाज सहित मंदाकिनी नाड़ी रूपी नदी में स्नान किए अर्थात् भाव रत भरत भाव भाव समाज सहित मंदाकिनी नाड़ी में प्रवेश कर गए। मंदाकिनी नाड़ी में जब ध्यान प्रवेश कर जाता है, तो भावों में अति निर्मलता आ जाती है। उसी को भरत का भाव समाज सहित मंदाकिनी में स्नान करना बताया गया है। सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।। चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।। व्याख्या : मंदाकिनी नाड़ी में जब ध्यान प्रवेश कर जाता है, तो भावों में अति निर्मलता आ जाने के कारण भावों की गति बहुत धीमी हो जाती है, इसलिए सहज में ही भाव मंदाकिनी नाड़ी से बाहर निकल नहीं पाते हैं। उसी को भाव समाज को मंदाकिनी रूपी नदी के तट पर छोड़ना बताया गया है। परन्तु भाव रत भरत की आत्मा से मिलने की लगन तो बहुत तीव्र होती है, इसलिए भाव रत भरत नाड़ियों रूपी माताओं और विशिष्ट ज्ञान भाव को भी छोड़कर अकेला ही आगे बढ़ जाता है। इस प्रकार भाव रत भरत भाव निषेध भाव रूपी निषाद और शत्रुघन रूपी छोटे भाई को लेकर आत्मा व सुरता से मिलने के लिए नजदीक गए। समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।। राम लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी माता की करणी को सोचकर भाव रत भरत को संकोच होने लगता है और उसी के कारण मन में नाना प्रकार के कुतर्क उठने लगते हैं। भाव रत भरत को लगने लगता है कि कहीं लखन भाव, आत्मा व सुरता रजोवृति के प्रभाव का विचार कर अन्यत्र नहीं चले जाएँ। वास्तव में जब ध्यान में आत्म दर्शन होने वाला होता है तो बीच-बीच में भावों में भय का कम्पन पैदा होने लग जाता है और ध्यान टूटा या कहीं ध्यान वापस नहीं आया तो क्या होगा आदि-आदि विचार साधक को हिलाते रहते हैं। दो0 मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर। अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव मन में सोचता है कि रजोवृति रूपी कैकयी माता के मत को देखकर तो वे मेरे बारे में जो भी सोचें वह थोड़ा ही होगा अर्थात् भाव रत भरत भाव को अगर रजोवृति से प्रभावित जानकर विचार किया जाए तो भाव रत भरत की विषयी लालसा की सीमा की थाह नहीं लगायी जा सकती है। परन्तु भाव-रत भरत सोचता है कि आत्मा रूपी राम तो मुझे आत्मोन्मुखी देखकर मेरे विषयी विकारों व अवगुणों को क्षमा कर देंगे। जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवकु मानी।। मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।। व्याख्या : जो आत्मा रूपी राम मुझ भाव रत भाव को मलिन अर्थात् विकारों से युक्त मानकर त्याग दें या फिर आत्मोन्मुखी जानकर मेरा सम्मान कर दें। मेरे तो सब प्रकार से आत्मा रूपी राम की जूतियों में मेरी शरण है। यहाँ भाव-रत भरत भाव के चरण समर्पण की अवस्था को बताया गया है। भाव रत भरत सोचता है कि आत्मा रूपी स्वामी तो सदैव निर्विकारी ही होता है, अगर दोष होता है तो भाव रूपी सेवक का ही होता है। जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।। अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।। व्याख्या : जगत में यश के पात्र तो चातक और मछली ही होते हैं, जो अपने नियम व प्रेम के पालन करने में निपुण होते हैं। इस प्रकार मन में विचार करता हुआ भाव रत भरत भाव ध्यान मग्न होता हुआ चला जाता है। ध्यान की उस अवस्था में आत्मा के प्रति निश्छल प्रेम के कारण उसके अंग शिथिल पड़ गए। फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।। जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी माता का खोट मानों भाव रत भरत को लौटाता है परन्तु ध्यान में भक्ति के बल पर धैर्य धारण करते हुए भाव रत भरत चले जाते हैं। जब आत्मा रूपी राम का सहज स्वभाव चिंतन में आता है, तब ऐसा लगने लगता है जैसे रास्ते में कदम तेजी से उठने लगे हों। भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।। देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव-रत भरत भाव की गति ऐसी होती है जैसे बहते हुए जल में बहते हुए भ्रमर की होती है। भाव रत भरत भाव के उस समय के सोच व आत्मा के प्रति प्रेम को देखकर निषाद भाव अपनी सुध-बुध खो दिया। दो0 लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु। मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मंगलदायक सकुन होने लगते हैं जिसका आभास निषाद भाव को होने लग जाता है। उन्हीं सगुनों को समझकर निषाद भाव कहता है कि आत्मा से मिलने पर सोच मिट जायेगा, हर्ष होगा और परिणाम के फलस्वरूप बिषाद अर्थात् विषयी विकारों का अंत हो जायेगा। विषयी विकारों का मिटना अध्यात्म में शुभ माना जाता है तो सांसारिक दृष्टि से विषाद को दु:ख स्वरूप माना जाता है। इस प्रकार विषाद शब्द का बहुत गहरा रहस्य होता है। सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।। भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।। व्याख्या : भाव रत भरत ने निषाद रूपी सेवक के वचनों को सत्य माना और आत्मा रूपी राम के आश्रम के निकट पहुँच गए। तब चित्रकोष के वैराग्य रूपी कोष व कोशिकाओं को देखकर भाव रत भरत भाव ऐसे प्रसन्न हुआ मानों भूखे को अच्छा भोजन मिल गया हो। इति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।। जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।। व्याख्या : जैसे इति के भय से दु:खी व तीन प्रकार के तापों से पीड़ित व ग्रहों की मार से दु:खी प्रजा किसी उत्तम देश में जाकर सुखी हो जाती है, वैसी ही दशा भाव रत भरत की हो रही है। वास्तव में तीन गुणों से उत्पन्न ताप व वासनाओं के भय से भयभीत भाव वैराग्य रूपी वन में पहुँच जाते हैं तो परम शान्ति का आभास होता है। राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।। सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को पाकर वैराग्य रूपी वन की सम्पदा ऐसे सुखी होती है जैसे अच्छा राजा पाकर प्रजा सुखी हो जाती है। दृढ़ वैराग्य रूपी वन ही सुन्दर देश है और विरक्ति रूपी मंत्री होता है तथा विवेक रूपी राजा वहाँ का राजा होता है। इस प्रकार दृढ़ वैराग्य रूपी वन सुन्दर प्रदेश होता है। भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।। व्याख्या : यम अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह तथा नियम अर्थात् शौच, संतोष, तप स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी योद्धा होते हैं और कोशिकाएँ ही वैराग्य प्रदेश की राजधानी होते हैं। शांति, सुमति व पवित्रता रूपी उस पावन प्रदेश की रानियाँ होती हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्य के सब अंगों अर्थात् धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष से परिपूर्ण होता है। आत्मा रूपी राम के चरणों में आश्रित रहने से उसके चित में आनन्द व उत्साह रहता है। यहाँ पर ध्यान की अनुभूति का ही वर्णन किया गया है कि चित्रकोष में ध्यान पहुँचने पर क्या-क्या अनुभव में आता है? दो0 जीति मोह महिपालु दल सहति बिबेक भुआलु। करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।। व्याख्या : वैराग्य रूपी पावन देश में मोह रूपी राजा को सेना सहित जीत कर विवेक रूपी राजा राज करने लगता है। जब विवेक रूपी राजा राज करने लग जाता है तो चारों तरफ सुख व सम्पदा का सुसमय चला आता है। बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।। बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।। व्याख्या : वैराग्य रूपी वन में जो मन के सात्विक भावों के समूह होते हैं, मानों वे ही शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ों का समूह होता है। बहुत से विचित्र पक्षियों रूपी दृष्टा भाव व सहज इच्छाएँ ही मानों उस राजा की प्रजा व समाज हैं। खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।। बय डिग्री बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।। व्याख्या : सहज भोग रूपी गैंडा, स्थिर मन रूपी हाथी, माया का हरण करने वाले मन के हरि रूपी भाव, वासनाओं का शिकार करने वाले बाघ रूपी भाव, दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि के बाराह रूपी भाव, वासना रूपी भैंसों व बैलों को देखकर विवेक रूपी राजा के साज को सरहाते ही बनता है। अर्थात् जब विवेक पैदा हो जाता है, तो समस्त प्रकार के भावों में सहजता व साम्यता आ जाती है। उसी अवस्था को परम सहज अवस्था कहा जाता है। उस अवस्था में सत, रज, तम व गुणातीत भाव विरोध का त्याग करके एकदम सहज हो जाते हैं। इसी को चतुरंगिनि सेना कहा गया है। झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिध बिधि बाजहिं।। चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में ऐसे लगने लगता है मानो आनन्द रूपी जल के झरने बह रहे हो और मन की स्थिरता रूपी हाथी चिंघाड़ रहा हो और नाना प्रकार के नगाड़ें बज रहे हों। इसी अवस्था को कुछ साधना पंथों में अनहद नाद कह कर समझाया गया है। उस ध्यान की अवस्था में चकवा, चकोर, चातक, पपीहा, तोता तथा कोयलों के समूह और सुंदर हंसों की गूँज सुनायी देती है। अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।। बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।। व्याख्या : लगन रूपी भँवरे गूँजने लगते हैं और संयम रूपी मोर नाचने लगते हैं, मानों परम सहज अवस्था मंगल को पैदा करती हुई चारों तरफ फैल गयी हो। उस अवस्था में समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होने की अवस्था आ जाती है। उसी को समस्त वृक्षों और बेलों को फल-फूलों से लदा हुआ बताया गया है। उस ध्यान अवस्था में समस्त भावों में प्रसन्नता व मंगल की भावना पैदा हो जाती है। दो0 राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु। तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में जब भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम के पास पहुँचता है तो अत्यन्त प्रेम पैदा हो जाता है। उसी अनुभूति को इस दोहे में बताया गया है कि भाव रत भरत भाव ने जब आत्मा रूपी राम की वैराग्य रूपी वन में दृढ़ता रूपी पर्वत को देखा तो प्रेम से भर गया। उस समय भाव- रत भरत की ऐसी दशा थी मानों तपस्वी नियम की समाप्ति पर तपस्या के फल को पाकर सुखी हो जाता है। ।। मास पारायण, बीसवाँ विश्राम।। ।। नवाह्न पारायण, पाँचवाँ विश्राम।। तब केवट ऊँचे चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।। नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में केवट रूपी कैवल्य का भाव दौड़कर ऊँचाई पर चढ़ जाता है और भाव रूपी भुजा उठाकर कहने लगता है कि हे नाथ! उस विशाल सहजता रूपी वृक्षों को देखिए जिसमें पाकर रूपी धैर्य, जामु रूपी संतोष, आम रूपी शान्ति, व तमाल रूपी मंगल के वृक्ष हैं। जिन्ह त डिग्री बरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।। नील सघन पल्लव फल लाला। अविरल छाँह सुखद सब काला।। व्याख्या : जिन धैर्य, संतोष, शान्ति व मंगल रूपी वृक्षों के बीच में भक्ति रूपी बट वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर मन भी लुभा जा रहा है। उस भक्ति रूपी बट वृक्ष के पत्ते नीले और सघन हैं तथा उसमें लाल फल लगे हुए हैं। उस भक्ति रूपी वृक्ष की छाया सभी कालों में सुखद होती है। मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।। ए त डिग्री सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटि जहँ छाई।। व्याख्या : मानो ध्यान की क्रिया (विधि) से अंधकार का नाश हो गया हो और अरुनमय अर्थात् ज्ञान रूपी सवेरा हो उठा हो, उस समय ऐसी शोभा छा जाती है। कैवल्य भाव रूपी केवट कहता है कि इस भक्ति रूपी वट वृक्ष के पास आनन्द रूपी नदी बहती है और उसके पास वाले कोष में ही आत्मा रूपी राम अपनी पर्ण कुटिया में अर्थात् प्राण के अति सूक्ष्म रूप में निवास करते हैं। तुलसी तरूबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।। बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।। व्याख्या : वहाँ पर पवित्रता रूपी तुलसी के नाना वृक्ष सुशोभित हैं। जो कहीं-कहीं सुरता रूपी सीता से पवित्रता के भाव पैदा हुए हैं, तो कहीं-कहीं लखन भाव द्वारा पवित्रता रूपी वृक्ष लगाए गए हैं। इसी भक्ति रूपी वट वृक्ष के नीचे सुरता रूपी सीता ने पवित्र वेदिका बनायी है। दो0 जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।। व्याख्या : उस यज्ञ रूपी वेदिका पर बैठकर आत्मा रूपी राम मन के भावों को अगम्य परमात्मा की कथा व इतिहास सुनाते हैं। अर्थात् आत्मा परमात्मा के चिंतन में मग्न रहती है। सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।। करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।। व्याख्या : कैवल्य रूपी केवट सखा की बात सुनकर भाव रत भरत भाव ने भक्ति रूपी वट वृक्ष को देखा तो आँखों में प्रेम का जल आ गया। भक्ति रूपी वृक्ष को प्रणाम करते हुए भाव रत भरत व शत्रुघन रूपी भाव चले। उस समय उनके आत्मा रूपी राम के प्रति जो प्रेम था, उसका वर्णन करने में तो सरस्वती भी संकोच करने लग जाती है। हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।। रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम के पद चिन्हों को देखकर ऐसे प्रसन्न हुये मानों भिखारी को पारस पत्थर मिल गया हो अर्थात् विषयी पुरुष को मानो इन्द्रियों का सुख मिल गया हो। तब भाव रत भरत- भाव ने आत्मा रूपी राम के चरणों की धूल को आँखों पर लगाकर हृदय में धारण किया और आत्मा से मिलने के बराबर ही सुख का अनुभव किया। वास्तव में ध्यान में जब आत्मा से साक्षात्कार का समय आ जाता है तो आत्मा से निकलने वाली विशुद्ध किरणें भी आत्मा के समान ही निर्मल आनन्द देने लग जाती है। देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।। सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के अकथनीय व अतुल्य प्रेम को देखकर समस्त भाव रूपी मृग, पक्षी, जड़ व चेतन भाव प्रेम में मग्न हो गए। प्रेम की जब अधिकता हो जाती है तो निषाद भाव भी प्रेम में विवश होकर थम सा जाता है। उसी अवस्था को निषाद का रास्ता भूलना बोलकर लिखा गया है। उस समय की ध्यान अवस्था में सात्विक भाव स्वरों के माध्यम से फूलों की तरह झरने लगते हैं। निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।। होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर पर अचर करत को।। व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था को प्राप्त करके सिद्ध जन व साधक लोग अनुराग से भर जाते हैं और उस सहज प्रेम की अवस्था की सराहना करने लगते हैं। उस समय मर्म समझ में आता है कि अगर भाव रत भरत भाव देह रूपी शरीर में पैदा नहीं होता तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता। अर्थात् बिना भाव-रत भरत भाव के जड़-चेतन का मर्म समझ में नहीं आता। दो0 पेम अमिअ मंद डिग्री बिरहु भरतु पयोधि गंभीर। मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।। व्याख्या : प्रेम का भाव अमृत के समान होता है और मंद डिग्री अर्थात् मन के अन्दर ही विरह का भाव पैदा होता है तथा भाव रत भरत भाव गहरा समुद्र के समान होता है। अत: उस गहरे भाव रूपी समुद्र को मथने पर ही साधक के स्वरों के माध्यम से ही कृपा के समुद्र परमात्मा साधक का कल्याण करने के लिए प्रकट होते हैं। सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।। भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।। व्याख्या : भाव रत भरत व निषाद भाव की अति निर्मल अवस्था के कारण (मनोहर का मतलब होता है, जब मन का हरण हो जाता है) लखन भाव इन दोनों भावों की मनोहर अवस्था को नहीं लख पाया। वास्तव में लखन भाव तो मन की अवस्था में भावों को लख पाता है, मन के अभाव में वह कैसे लख पायेगा? उसी अवस्था का यहाँ बहुत सुन्दर व सटीक प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। भाव रत भरत भाव ने मंगल के मूल सुन्दर आत्मा रूपी राम के आश्रम को देखा अर्थात् भरत भाव आत्मा के स्वरूप का आभास करने लगा। करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।। देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहते अनुरागे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के आश्रम में प्रवेश करते ही समस्त दु:खों का नाश हो गया अर्थात् आत्मा के स्वरूप के आभास से दु:खों का निवारण होने लग जाता है, जैसे योगी सहज में परमार्थ की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। तब भाव रत भरत भाव ने देखा कि लखन भाव आत्मा रूपी राम के सामने खड़े हैं और पूछे हुए प्रश्नों का अनुराग सहित उत्तर दे रहे हैं। वास्तव में लखन भाव सदैव भावों के लक्षणों को लखने में तत्पर रहता है और वह लक्षणों से आत्मा को अवगत कराता रहता है। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। सीस जटा कटि मुनि पट बाँधे। तून कसें कर स डिग्री धनु काँधें।। बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।। व्याख्या : इन चौपाइयों में प्रतीकों का सहारा लेकर अकथनीय आत्मा की अवस्था को संकेतों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। सिर पर जटा का तात्पर्य उर्ध्वमूल से होता है। आध्यात्म में परमात्मा रूपी वृक्ष उर्ध्वमूल वाला होता है जिसमें इन्द्रियों रूपी अधोगामी शाखाएँ होती हैं। अत: यहाँ पर आत्मा रूपी राम के सिर पर जटा बतायी गयी है तथा कमर पर मुनियों के वस्त्र बाँधने से तात्पर्य पर मन की एकाग्र अवस्था से है। अर्थात् उर्ध्वमूल वाले आत्मा रूपी राम मन को एकाग्र करके निर्मलता में दृढ़ होकर इच्छाओं व वासनाओं को वश में किए हुए हैं। इस प्रकार मन के समस्त भाव बेदी अर्थात् त्याग भाव की अवस्था में बैठे हैं और आत्मा व सुरता निर्मल होकर बैठे हैं। बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा।। कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।। व्याख्या : शरीर की वासनाएँ बहुत जटिल होती हैं परन्तु ध्यान की उस अवस्था में समस्त वासनाएं मन की एकाग्रता में समा जाती हैं और कमल की डण्डी की तरह वासनाएँ और वासनाओं की तरंगे फिरना बन्द कर देती हैं अर्थात् शान्त हो जाती हैं, जिससे साधक के हृदय की जलन मिट जाती है और सहज हँसी चेहरे पर आ जाती है। दो0 लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु। ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु।।239।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मन के एकाग्रता की अवस्था में सुरता और आत्मा चन्द्रमा के समान शीतल हो जाते हैं जैसे ज्ञान की अवस्था में सतचित आनन्द की अवस्था मानों शरीर धारण करके प्रकट हो गयी हो। सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।। पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत भरत भाव काम मदादि नाशक शत्रुघन रूपी भाव व निषाद भाव सहित आत्मा रूपी राम के प्रेम में मग्न होकर सुख, दु:ख, हर्ष व शोक को भूल गए। हे गोसाईं अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी! (गो अ साईं उ इन्द्रियों के स्वामी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, ऐसा कहकर दण्डवत पड़ गए अर्थात् पूर्म रूप से आत्मा के प्रति समर्पण का भाव आ गया। बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।। बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।। व्याख्या : भाव रत भरत के प्रेम भरे वचनों को सुनकर लखन भाव ने भाव रत भरत भाव को लख (जान) लिया। परन्तु एक तरफ को भाव रत भरत भाई का प्रेम व दूसरी तरफ आत्मा रूपी राम की सेवाका दायित्व अर्थात् आत्मा में लीनता की अवस्था होने से लखन भाव दुविधा में पड़ गया। मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।। रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।। व्याख्या : लखन भाव की उस दुविधा की अवस्था का वर्णन तो कोई सुकवि ही कर सकता है, जो लखन भाव के मन की गति को जानता हो। आखिर में दुविधा की स्थिति में लखन भाव आत्मा की लीनता में दृढ़ होकर रह गए, मानों चढ़ी हुई पतंग को खिलाड़ी और चढ़ाने के लिए खींच रहा हो। अर्थात् आत्मा में लीनता रूपी पतंग को और चढ़ा लिया। कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।। उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव को प्रणाम करता हुआ देखकर लखन भाव ने आत्मा रूपी राम से कहा कि हे प्रभु! भाव रत भरत प्रणाम कर रहे हैं अर्थात् प्राणों की तरंगों के माध्यम से लीन होने को समर्पित हो रहे हैं। इतना सुनते ही आत्मा रूपी राम प्रेम में अधीर हो उठे और उस अवस्था में कहीं पर इच्छाओं रूपी वस्त्र गिर गया तो, कहीं पर अनासक्ति (निषंग) के भाव गिर गए तो कहीं पर नियम-संयम रूपी धनुष बाण गिर गए। वास्तव में जब आत्मा किसी भाव के निश्छल प्रेम को प्राणों की तरंगों के माध्यम से आभासित करती है तो वह प्रेम में अधीर हो उठती है और भावों के अनुरूप व्यवहार करने लगती है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। दो0 बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान। भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भावों के प्रेम को देखकर निसंग आत्मा भी बरबस भावों की तरफ आकृष्ट हो उठती है। उसी को बरबस (जबरदस्ती) भाव रत भरत को आत्मा द्वारा हृदय से लगाना बताया गया है। जब ध्यान की अवस्था में आत्मा व भाव रत भरत भाव का मिलन हो जाता है तो अपान प्राण की गति थम जाती है। मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।। परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुदि चित अहमित्ति बिसराई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम व भाव रत भरत भाव के मिलने की प्रीत का वर्णन कैसे किया जा सकता है क्योंकि वह मिलन की अनुभूति तो मन, वचन व कर्म से अगम्य होती है। दोनों भाई अर्थात् आत्मा व भाव रत भरत प्रेम की पूर्णता हैं तथा दोनों मन, बुद्धि, चित व अहंकार से मुक्त पूर्ण प्रेम हैं। कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।। कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्राप्त होने वाले सुप्रेम को कौन प्रकट करे? क्योंकि कवि की बुद्धि किसकी छाया का अनुसरण करे? ध्यान की उस अवस्था में तो दूसरा भाव बचता ही नहीं है फिर कैसे वर्णन सम्भव है। कवि को तो अर्थ और अक्षर का ही बल सच्चा होता है अर्थात् कवि तो अर्थ और अक्षर का सहारा लेकर ही तो लिख सकता है। परन्तु पूर्ण ध्यान की अवस्था में तो अर्थ और अक्षर का अस्तित्व ही नहीं बच पाता है। जैसे नट ताल के बल पर नाचता है वैसे ही कवि अर्थ और अक्षर के बल पर चलता है। अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।। सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव व आत्मा रूपी राम का प्रेम अगम्य होता है, जहाँ पर ब्रह्मा, विष्णु व महेश अर्थात् सत, रज व तम गुणों का भी वश नहीं चल पाता है। अत: मैं कुमति कैसे उस परम प्रेम की अवस्था का वर्णन कर सकता हूँ। भला गाँडर की ताँत से भी क्या सुन्दर राग बज सकता है? इन चौपाइयों में आत्मा व भाव रत भरत के प्रेम को अगम्य व अकथनीय बताया गया है। मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।। समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।। व्याख्या : आत्मा व भाव रत भरत के मिलन को देखकर समस्त स्वरों की धड़कन भय से धड़कने लगी। वास्तव में ध्यान में जब भाव आत्मा में लीन होने लगते हैं तो साधक को कई बार शरीर छूटने का भय सताने लग जाता है। उसी अवस्था को ""सुरगन सभय धकधकी धरकी"" अर्थात् स्वरों की धड़कन भयभीत होकर धड़कने लगती है, बोला गया है। तब विशेष ज्ञान रूपी बृहस्पति ने स्वरों को समझाया अर्थात् उसी ध्यान की अवस्था में विशेष ज्ञान के भाव पैदा होकर भय का निवारण करते हैं। तब विशेष ज्ञान के प्रभाव से भय दूर हो जाता है और आनन्द रूपी फूल बरसने लगते हैं। दो0 मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम। भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम काम-मदादि नाशक शत्रुघन रूपी भाव से मिलकर कैवल्य रूपी केवट भाव से मिले। ध्यान की अवस्था में भावों का यह सूक्ष्म मिलन स्पष्ट समझ में आ जाता है। तब लखन भाव व भरत भाव प्राण की तरंगों के माध्यम से बहुत प्रेम से आपस में मिले। भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।। पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।। व्याख्या : तब लखन भाव रूपी लक्ष्मण बहुत उमंग के साथ शत्रुघन रूपी कामादि नाशक भाव से मिले। फिर बहुत प्रकार से निषेध भाव रूपी निषाद भाव से मिले और निषाद भाव को छाती से लगा लिया अर्थात् लीन कर लिया। फिर भाव रत भरत व शत्रुघन रूपी भाव ने मन की एकाग्रता रूपी मुनि भावों को प्रणाम करके वन्दना की अर्थात् मन की एकाग्रता को स्वीकार करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया अर्थात् आत्मा में लीनता के लिए बल प्राप्त किया। सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।। पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।। व्याख्या : छोटे भाई शत्रुघन रूपी भाव सहित भाव रत भरत भाव प्रेम की उमंग में भरकर बार-बार सुरता रूपी सीता के चरणों की धूल को सिर पर धारण करने लगे अर्थात् सुरता के प्रति पूर्ण समर्पण की अवस्था आ गयी। उस अवस्था में सुरता का भाव भी भावों को लीन होने में सहायता प्रदान करने लगता है। उसी को सुरता रूपी सीता का सिर पर हाथ फेरना बोलकर लिखा गया है। सीयँ असीस दीन्ही मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।। सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता ने मन ही मन आशीर्वाद दिया क्योंकि ध्यान की उस अवस्था में सुरता तो परमात्मा में मग्न होती है, उसे तो अपने शरीर की सुध ही नहीं होती है। इस प्रकार सब तरह से सुरता रूपी सीता को अनुकूल जानकर भाव रत भरत व शत्रुघन रूपी भाव का सोच मिट गया और निर्भयता की अवस्था आ गयी। वास्तव में ध्यान में कभी भय तो कभी निर्भयता की अवस्था भावों के अनुसार प्रकट-अप्रकट होती रहती है। कोउ किछु कहि न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।। तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में एकदम मौन की अवस्था आ जाती है, जिसमें कोई भी भाव किसी भी भाव से कुछ नहीं पूछता है और मन प्रेम से भर जाने के कारण अपनी गति से रहित हो जाता है अर्थात् मन स्थिर हो जाता है। उस अवस्था में कैवल्य भाव रूपी केवट धैर्य धारण करके प्राण की तरंगों के माध्यम से बोलता है। उसी को प्राण रूपी हाथ जोड़कर केवट का बोलना बताया गया है। दो0 नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग। सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।। व्याख्या : हे नाथ! मुनिनाथ अर्थात् विशिष्ट ज्ञान रूपी मन के एकाग्रता रूपी भाव के साथ समस्त नाड़ियों रूपी माताएँ व देह नगर के समस्त भाव आए हैं। उनके साथ आपके वियोग में दु:खी सेवक भाव भाव रूपी सेना व मंत्रणा रूपी सचिव सब भाव आए हैं। सील सिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।। चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम जो शीलता के समुद्र के समान होते हैं। विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के आगमन की बात सुनकर सुरता रूपी सीता के पास काम-मदादि नाशक शत्रुघन को रखकर अति वेग से चले। अर्थात् ध्यान में आत्म भाव विशिष्ट ज्ञान के भाव के प्रति आकृष्ट हो गया और सुरता हिले नहीं इसलिए शत्रुघन भाव को सहारा देने के लिए छोड़ दिया। आत्मा रूपी राम धैर्य धारण करने वाले व दीन दयाल अर्थात् विकार रहित सहज दयाल होते हैं। गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।। मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु को देखकर लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम अनुराग से भर गए। उस अवस्था में आत्म भाव विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ के सामने समर्पण कर देता है, उसी को दण्डवत प्रणाम करना बताया गया है। उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव भी आत्मा के प्रति आकृष्ट हो जाता है। उसी को मुनिवर का दौड़कर आत्मा रूपी राम को हृदय से लगाना बताया गया है। ध्यान की उस अवस्था में लखन भाव व आत्म भाव प्रेम में भरकर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु से मिलते हैं। प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।। रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्रेम में पुलकित होते हुए कैवल्य भाव (केवट) ने अपना परिचय देकर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु को दूर से ही प्रणाम किया अर्थात् प्राण की तरंग के माध्यम से जुड़ गया। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु ने जबरदस्ती आत्मा का मित्र जानकर मिला लिया। उस समय ऐसा अनुभव होने लगा मानो साक्षात् प्रेम को ही जमीन पर समेट लिया हो। रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।। एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।। व्याख्या : आत्मा की सहज अवस्था (भयहीन अवस्था ही भक्ति की अवस्था होती है और सहजता में भय नहीं रह पाता है) ही सुमंगल का मूल होती है। उस सहज अवस्था में स्वर उर्ध्वगामी होकर आनन्द रूप भावों की पुष्प वर्षा करने लगते हैं। तब समझ में आता है कि निषेध भाव रूपी निषाद के समान नीच अर्थात् बन्धनकारी भाव कोई नहीं होता है और विशिष्ट ज्ञान के समान बड़ा भाव कोई नहीं होता है। निषाद भाव अर्थात् निषेधवृति नीच मानी जाती है क्योंकि निषेध का आभास असहजता में होता है। इसलिए जब साधक असहज होता है तब ही उसको बोला जाता है, ये मत करो, वो मत करो इत्यादि-इत्यादि। परन्तु जब आत्मा का विशिष्ट ज्ञान का भाव पैदा हो जाता है तो वह आत्मा का पथ-प्रदर्शक बनकर निषेध वृति को भी सहज करके अपने में मिला लेता है। उसी भाव अवस्था को वशिष्ठ द्वारा निषाद का गले मिलना बोलकर बताया गया है। दो0 जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ। सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।। व्याख्या : कैवल्य भाव रूपी निषाद के मर्म को जानकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ लखन भाव से भी अधिक प्रेम से निषाद भाव से मिले। यहाँ निषाद भाव का गहरा रहस्य है। निषेध वृति का भाव धीरे-धीरे निषेध वृति का पालन करते-करते एकदम वासना रहित हो जाता है। उस वासना रहित अवस्था को ही कैवल्य रूपी केवट के प्रतीक से समझाया जाता है। इसलिए निषेध भाव को कैवल्य अवस्था में पहुँचा देखकर विशिष्ट ज्ञान का भाव लखन भाव से भी ज्यादा प्रेम से कैवल्य भाव से मिलता है। यह सब आत्मोन्मुखी होने के प्रभाव का फल है। अर्थात् निषेध वृति रूपी निषाद भाव आत्मोन्मुखी होने के कारण ही इतनी उत्तम कैवल्य अवस्था को प्राप्त कर पाया है। उसी को आत्मा रूपी राम के भजन का प्रभाव बताया गया है। आरत लोग राम सबु जाना। करूनाकर सुजान भगवाना।। जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रूख राखी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने समस्त देह भाव रूपी लोगों को दु:खी अर्थात् आत्मा के विरह में दु:खी जाना तो करूणा कर सुजान भगवान (भग अ वान उ प्रकृति को वश में करने वाला) जिस भाव की जैसी रूचि थी, उसी के अनुसार मिल लिए। यह बहुत गहरा भाव विज्ञान है। जब भावों की जैसी रूचि होती है, आत्मा वैसा-वैसा रूख धारण करने लगती है। आत्म चेतना सदैव भावों के रूख को धारण करती है। सानुज मिलि पल महुँ सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारून दाहू।। यह बड़ि बात राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम लखन भाव सहित पल भर में समस्त भावों से मिल लिए और उनके विरह रूपी भयंकर दु:ख को दूर कर दिया। यह आत्मा रूपी राम के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती है जैसे करोड़ों घरों में एक सूर्य ही समान रूप से प्रकाश कर देता है। वैसे ही आत्मा रूपी सूर्य पल भर में समस्त भावों से एक साथ में मिल लेता है। मिलि केवटहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।। देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।। व्याख्या : समस्त देह रूपी नगर के भाव रूपी लोग कैवल्य रूपी निषाद से उमंगपूर्वक मिलकर उसके भाग्य की सराहना करते हैं। ध्यान की उस में अवस्था में नाड़ियों रूपी माताओं को आत्मा रूपी राम ने दु:खी देखा। मानों सुन्दर लताओं की पंक्तियों को पाला मार गया हो। नाड़ियों का दु:खी होने का गहरा रहस्य है। वास्तव में जब भाव वासनाओं से मुक्त होकर निर्मल हो जाते हैं, तो नाड़ियों का प्रवाह धीमा हो जाता है। उसी धीमी गति को नाड़ियों रूपी माताओं के दु:ख के प्रतीक के रूप में बताया गया है। प्रथम राम भेंटी कैकई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।। पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम सबसे पहले रजोवृति रूपी कैकयी से मिले जो अब सरल स्वभाव व भक्ति की बुद्धि वाली थी। इस चौपाई में बहुत गहरा रहस्य है। ध्यान जब गहरा हो जाता है तो रजोवृति भी सहज व सरल हो जाती है और वासनाओं की आसक्ति मिट जाने से भयहीन अवस्था में पहुँच जाती है। अत: उसी अवस्था को समझाने के लिए यहाँ कैकयी को सरल स्वभाव व भक्ति की बुद्धि वाली बताया गया है। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम रजोवृति की गति को धारण करके नाना प्रकार से रजोवृति रूपी कैकयी को समझाता है कि काल, कर्म व क्रिया ही सुख-दु:ख व यश-अपयश के मूल होते हैं। दो0 भेंटी रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु। अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।। व्याख्या : समस्त नाड़ियों रूपी माताओं से मिलकर आत्मा रूपी राम ने सबको समझाया कि सब कुछ जगत में ईश्वर अर्थात् जीव के स्वरों की गति पर निर्भर करता है, इसलिए किसी को दोष नहीं देना चाहिए। यहाँ पर आत्म चेतना नाड़ियों रूपी माताओं को समझाती है कि भावों की गति तो स्वरों पर निर्भर करती है, इसलिए स्वरों की गति को स्वीकार करके सहज रहना चाहिये। गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे सँग आईं।। गंग गौरि सम सब सनमानीं। देहिं असीस मुदित मृदु बानीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में गुरुतिय अर्थात् विशिष्ट ज्ञान की त्रिधारी रूपी पत्नी अरून्धती के पैरों की आत्म रूपी राम व लखन भाव ने वन्दना की। जब विशिष्ट ज्ञान के भावों की गति उर्ध्वगामी हो जाती है तो तीनों गुणों से उत्पन्न विशिष्ट ज्ञान की पत्नी अरून्धती पूजनीय हो जाती है। अरून्धती का तात्पर्य ज्ञान के भावों के उर्ध्वगामी होने की वृति से होता है। उस अवस्था में विशुद्ध प्रकाश (विप्र) के भावों की वृतियाँ भी उर्ध्वगामी हो उठती हैं, उन्हीं को विप्रतिय बोलकर लिखा है। विशुद्ध प्रकाश की वृतियों को भी आत्मा रूपी राम सम्मान देते हैं, अत: उसी को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। उस ध्यान की अवस्था में उर्ध्वगामी होने वाली वृतियाँ गंगा व पार्वती के समान पवित्र हो जाती हैं अर्थात् पूर्ण निर्मलता की अवस्था आ जाती है। उस समय समस्त वृतियाँ आशीर्वाद देने लगती हैं अर्थात् समस्त वृतियाँ मंगल कामना से भर जाती हैं। गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेंटी संपति अति रंका।। पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।। व्याख्या : फिर ध्यान में सुमित्रा रूपी माता के चरण छू कर गोद में जा लिपटे अर्थात् ईड़ा नाड़ी रूपी सुमित्रा से लिपट गए। ईड़ा नाड़ी की यही विशेषता होती है कि वो उदासीन भावों का संचार करने वाली होती है और उदासीन भाव आत्मा को अपनी और आकृष्ट कर लेते हैं। अत: उसी अवस्था को सुमित्रा की गोदी में लिपटना बोलकर लिखा गया है। फिर आत्मा रूपी राम व लखन भाव सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के चरणों में गिर गए अर्थात् सुष्मना नाड़ी के सामने समर्पण कर दिया। उस अवस्था में प्रेम की अधिकता से समस्त अंग व्याकुल हो उठते हैं। अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।। तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता बहुत अनुराग के साथ छाती से लगाया और आँखों से प्रेम जल बहने लगा जिससे आत्मा रूपी राम व लखन भाव नहा गए। उस ध्यान की अवस्था के हर्ष और विषाद (विषयों का अन्त होना विषाद कहलाता है) का वर्णन कोई कवि वैसे ही नहीं कर सकता जैसे गूंगा स्वाद का वर्णन नहीं कर पाता है। मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।। पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।। व्याख्या : लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम से सुष्मना नाड़ी रूपी माता ने मिलकर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु से कहा कि अब आप आधार प्रदान कीजिए, जिससे भाव रूपी समाज कोई आधार पा सके। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु ने प्रेरणा की और उनकी प्रेरणा पाकर देह रूपी नगर के भाव रूपी लोग निज-निज स्वभाव के अनुसार आधार पाकर चित्रकोष में उतर गए अर्थात् थम से गए। दो0 महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ। पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में महिसुर अर्थात् शरीर के स्वर, मंत्रणा के भाव, नाड़ियों रूपी माताएँ, विशिष्ट ज्ञान के भाव व कुछ सद्गुणों को लेकर भाव रत भरत, लखन भाव व आत्मा रूपी राम पवित्र चित्रकोष रूपी आश्रम के लिए चले। सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।। गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में चित्रकोष में जब गुरु भाव पहुँचते हैं तो सुरता विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि के सामने समर्पण कर देती हैं। उसी को सुरता रूपी सीता का गुरु के चरणों में प्रणाम करना बोला गया है। उस अवस्था में सुरता को उसके रूख के अनुसार विशिष्ट ज्ञान भाव बल प्रदान करने लगते हैं। उसी को मन माँगा आशीर्वाद देना बोला गया है। उसके बाद सुरता रूपी सीता विशिष्ट ज्ञान की वृति रूपी गुरु पत्नी सहित मन की वृतियों रूपी मुनि पत्नियों से मिली। उस अवस्था के प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।। सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारी।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता ने सभी भावों की चरण वन्दना करके सबका आशीर्वाद लिया अर्थात् चित्रकोष में पहुँचने वाले समस्त भावों को वन्दना करके सबको आत्मोन्मुखी करके बल प्राप्त किया। उसी को सबका आशीर्वाद प्राप्त करना बोलकर लिखा है। जब समस्त नाड़ियों रूपी सासुओं ने सुरता रूपी सीता को देखा तो निर्मल सुरता को देखकर सबके नेत्र बन्द हो गए अर्थात् सुरता के तेज को नाड़ियाँ रूपी सासुएँ देख नहीं पायी। परीं बधिक बस मनहुँ मराली। काह कीन्ह करतार कुचाली।। तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता ने जब नाड़ियों रूपी सासुओं को देखा तो ऐसा लगा मानो राजहंसनियाँ बधिक के वश में पड़ गयी हों। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वास्तविकता में नाड़ियाँ हकार व सकार की गति से भावों का संचार करती रहती हैं। इसलिए उन्हें हंसिनी की संज्ञा दी गयी है। ध्यान में जब भावों का प्रवाह शांत हो जाता है तो नाड़ियों की गति भी निस्तेज हो जाती है। उसी को हंसिनियों का बधिक के वश मे आने की उपमा दी गयी है। जब नाड़ियों रूपी सासुओं को सुरता रूपी सीता ने देखा तो सहज में बिना कारण के ही नाड़ियों की दशा को देखकर दु:ख पाया और सोचा कि जो भाव रूपी देव सहाते हैं, वो सहना पड़ता है। अर्थात् भावों की गति के अनुसार ही नाड़ियों की गति होती है। जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।। मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करूना महि छाई।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में सुरता रूपी सीता व प्राण रूपी जनक की पुत्री हृदय में धैर्य धारण करके नील कमल के समान नेत्रों में जल भरकर समस्त नाड़ियों रूपी सासुओं से मिली अर्थात् नाड़ियों में प्राण की तरंगों के माध्यम से सुरता का मिलन हुआ। उस अवस्था में करूणा का भाव समस्त शरीर रूपी पृथ्वी पर छा जाता है। दो0 लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग। हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता प्राण की तरंगों के माध्यम से नाड़ियों रूपी सासुओं व मुनि पत्नियों के अनुराग सहित पैरों में लग-लग कर मिलने लगती हैं अर्थात् सुरता का भाव समस्त नाड़ियों में संचरित होने लगता है। तब उस अवस्था में समस्त नाड़ियों से प्रेम की धारा बह उठती है और सब ये कामना करने लगती हैं कि सुरता सदैव परमात्मा में लगी रहे। सदैव परमात्मा में लगे रहने की कामना को ही सदा सुहागिन बनी रहना बताया गया है। बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानी।। कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।। व्याख्या : सुरता सहित सब नाड़ियाँ रूपी रानियाँ प्रेम में व्याकुल हो उठी। तब प्रेम की व्याकुलता के देखकर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने बैठने के लिए कहा अर्थात् प्रेम में धैर्य धारण करने की प्रेरणा की। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने जगत की गति को माया कहकर कुछ परमार्थ की बातें कही। अर्थात् विशिष्ट ज्ञान भाव ने परम अवस्था को प्राप्त करने की प्रेरणा की। नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।। मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने चित रूपी राजा का सुरपुर गवन अर्थात् स्वरों की मूल अवस्था में समाना बताया तो आत्मा रूपी राम ने बहुत दु:ख पाया। स्वयं के स्नेह को चित रूपी राजा के मरण का कारण जानकर धैर्य धारण करने वाले आत्मा रूपी राम भी व्याकुल हो उठे। यह अनुभूति ध्यान की बहुत गहरी अवस्था की अनुभूति है। पाठकों को पढ़ने में अटपटा लग सकता है परन्तु जब आत्मा देह मोह को छोड़कर सुरता सहित परमात्मा में लीन हो जाती है, तो उसे चित, बुद्धि, अहंकार आदि का भी आभास नहीं रह पाता है। परन्तु देह भावों के पुन: सम्पर्क में आती है तो पुन: देह भावों के रूख के अनुसार आत्मा प्रभावित होने लग जाती है। यहाँ पर उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।। सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।। व्याख्या : बज्र के समान कठोर वाणी सुनकर लक्ष्मण रूपी लखन भाव, सुरता व नाड़ियों रूपी रानियों में कोहराम मच गया। उस अवस्था में समस्त भाव समाज शोक में व्याकुल हो उठा, मानो आज ही चित रूपी राजा मरा हो। वास्तव में ध्यान में कई बार ऐसी अवस्था आ जाती है जिसमें ध्यान करना ही व्यर्थ लगने लग जाता है कि जब विषय भोग ही नहीं करने तो फिर साधना किस बात के लिए की जाए? नाना प्रकार के व्यर्थ के प्रश्न उठने लग जाते हैं, तो उस अवस्था में भावों में व्याकुलता पैदा हो जाती है। इन चौपाइयों में उसी अनुभूति का वर्णन किया गया है। मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।। ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।। व्याख्या : ध्यान में हताशा की अवस्था जब आ जाती है तो मन का विशिष्ट ज्ञान का भाव आत्मा रूपी राम को नाना प्रकार से समझाता है और समस्त भाव समाज सहित सुसरित अर्थात् सात्विकता रूपी नदी में स्नान करने लगते हैं। अर्थात् विशिष्ट ज्ञान की प्रेरणा से पुन: ध्यान में परमात्मा से मिलने की सकारात्मक सोच पैदा हो जाती है। तब आत्मा रूपी राम निरंबु अर्थात् विषय-वासनाओं से रहित होकर रह जाते हैं। और विशिष्ट ज्ञान का भय भी निरासक्त होकर रह जाता है। दो0 भो डिग्री भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु साद डिग्री कीन्ह।।247।। व्याख्या : जब ध्यान में पुन: उत्साह रूपी सवेरा हो गया तो विशिष्ट गुरु रूपी भाव ने जो जो प्रेरणा आत्मा रूपी राम को की, वो सब आत्मा रूपी राम ने श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ आदरपूर्वक की। करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।। जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने चित रूपी पिता कि क्रिया को समझ लिया अर्थात् चित किस प्रकार मूल अवस्था में प्रवेश कर गया है, उस मर्म का अनुभव कर लिया और उस अनुभव ज्ञान से आत्मा रूपी सूर्य ने अंधकार रूपी अज्ञान का नाश कर दिया। जिस परमात्मा का नाम पाप रूपी रूई को जलाने के लिए अग्नि के समान होता है, उस परमात्मा का स्मरण करना ही समस्त मंगलों को करने वाला होता है। सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।। सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।। व्याख्या : जब अज्ञान रूपी अंधकार का नाश हो जाता है तब पवित्रता आ जाती है, ऐसा संत मत है। जैसे तीनों गुणों का मर्म समझ आ जाने पर आनन्द रूपी सुरसरि पैदा हो जाती है। जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गए अर्थात् जब शुद्धता में सहजता आ गयी और वासनाओं का प्रभाव मिट गया तो आत्मा रूपी राम विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु से बोले। नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।। सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।। व्याख्या : हे नाथ! सब भाव रूपी लोग निपट अर्थात् भोगों के बिना दु:खी हैं क्योंकि इनको सहज कंद मूल फलों का आहार करना पड़ रहा है अर्थात् विषयी भोगों के अभाव में इनकी सहजता कमती जा रही है। जिसके कारण शत्रुघन रूपी भाव, भाव रत भरत भाव, मंत्रणा रूपी भाव व नाड़ियों रूपी माताओं को देखकर मुझे पल-पल युगों की तरह बीत रहे हैं। यहाँ आत्मा रूपी राम को चिन्ता है कि कहीं भावों की असहजता परमात्मा में लीनता को भंग नहीं कर दे। इसलिए पल-पल युगों के समान लगने लगता है। सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।। बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।। व्याख्या : अत: आप समस्त भावों सहित देह नगर रूपी अयोध्या में पधारिए। क्योंकि आप तो चित्रकोष में हैं और चितरूपी राजा अमरावती (मूल अवस्था में) हैं। मैंने बहुत कुछ कहने की ढीठता की है। अत: हे इन्द्रियों के स्वामी। जैसा उचित हो, वैसा कीजिए। ध्यान में कई बार दुविधा की अवस्था आती है। कई बार ऐसा होता है कि एक भाव चाहता है कि ध्यान से बाहर हो जाएँ, तो दूसरा भाव चाहता है अभी ध्यान में रहें। इसी अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। दो0 धर्म सेतु करूनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ ने कहा कि हे आत्मा रूपी राम! तुम धर्म के सेतु व करूणा के घर हो, अत: ऐसा क्यों नहीं कहोगे? भाव रूपी लोग दु:खी हैं। दो दिन तुम्हारे दर्शन करके शान्ति प्राप्त कर लें। विशिष्ट ज्ञान भाव कहना चाहते हैं कि देह भाव विषयी ताप से दु:खी हैं। अत: तुम्हारा सान्निध्य कुछ समय बना रहे, जिससे शान्ति मिल सके। राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।। सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारूत अनुकूला।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर भाव रूपी समाज भयभीत हो गया जैसे समुद्र में जहाज डगमगाने पर व्याकुलता हो जाती है। यहाँ पर साधना की सूक्ष्मता को समझने की जरूरत है। वास्तव में जब ध्यान में देहभाव व परमात्म भाव विलग होने की अवस्था में आते हैं तो ऐसी अवस्था आ जाती है और अजीब सी भय पैदा करने वाली व्याकुलता आ जाती है। तब भाव समाज विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु भाव की प्रेरणा रूपी वाणी सुनकर ऐसा सुखी हो गए जैसे डगमगाते जहाज को मानों हवा अनुकूल हो गयी है। पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं।। मंगल मूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रूपी सभी लोग ध्यान से निकलने वाले पवित्र रसायन में तीनों कालों में स्नान करते हैं, जो समस्त प्रकार की चिंताओं से उत्पन्न पाप का नाश करने वाला होता है। उस पवित्र रसायन में स्नान करने पर मंगल की मूर्ति आत्मा रूपी राम को नेत्र भरके देखते हैं और आत्मा को देखकर दण्डवत प्रणाम करते हैं अर्थात् प्राण के माध्यम से समर्पण करते हैं। राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।। झरना झरहिं सुधा सम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रूपी लोग आत्मा रूपी राम जिस कौशिका रूपी पर्वत पर रहते हैं उस कामना पूर्ण करने वाली कोशिका व कोष को देखते हैं। उस कोशिका में सब सुख होते हैं तथा समस्त दु:खों का अभाव होता है। उस कोशिका से अमृत के समान रसायन झरता रहता है, जो दैहिक, दैवीक व भौतिक कष्टों का निवारण करने वाला होता है तथा तीनों गुणों की सहजता रूपी ब्यार चलाने वाला होता है। बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।। सुंदर सिला सुखद त डिग्री छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।। व्याख्या : उस पवित्र कोष में असंख्य जाति के दृढ़ता रूपी वृक्ष, सात्विकता रूपी बेलें, सद्भाव रूपी तृण होते हैं। जिनमें परमात्मा की लगन रूपी फल, फूल व पत्ते लगे हुए हैं। उस कोष में शिव संकल्प रूपी सुंदर शिला होती है, जो दृढ़ता रूपी वृक्ष के नीचे है। उस सुखद अवस्था का किसी भी प्रकार वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 सरनि सरोरूह जल बिहग कूजत गुजंत भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।। व्याख्या : उस पवित्र कोष में पवित्र रसायन रूपी जल से भरा हुआ तालाब है जिसमें भाव रूपी पक्षी कूज रहे हैं, लग्न रूपी भ्रमर गुंजार कर रहे हैं और बहुत प्रकार के भाव व इच्छाएँ सहज होकर वैराग्य रूपी वन में विचरण कर रहे हैं अर्थात् उस पवित्र कोष में परम सहजता की अवस्था है। कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।। भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।। व्याख्या : कोल, किरात व भील रूपी इच्छाएँ जो वैराग्य रूपी वन में रहने वाली हैं, उनकी सहजता के कारण वे इच्छाएँ पवित्र, सुन्दर व अमृतमयी हो जाती हैं। वे सहज इच्छाएं देह भावों में रूचि के अनुसार उमंग भर देती हैं तथा सहजता रूपी अंकुर लगा देती है। इसी को प्रतीकों के माध्यम कंद, मूल, फल भर-भर कर लाना बोला गया है। सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।। देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।। व्याख्या : वे सहजता रूपी इच्छाएँ सभी भावों से प्राण की तरंगों के माध्यम से जुड़कर नाना प्रकार के स्वादों का गुण व नाम बताने लगती हैं। उस अवस्था में देह भाव रूपी लोग दाम देने लगते हैं अर्थात् आसक्ति रूपी मूल्य देने लगते हैं परन्तु वे सहज इच्छाएँ आत्मा रूपी राम की दुहाई देकर आसक्ति के जाल में नहीं पड़ती हैं। कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।। व्याख्या : वैराग्य रूपी वन की कोल-किरात रूपी सहज इच्छाएँ प्रेम में मगन होकर मधुर वाणी कहते हैं जिसे साधक प्रेम को जानकर पहचान सकते हैं। सहज इच्छाएँ कहती हैं कि आप तो सुकृत्य करने वाले अर्थात् कर्म फल की इच्छा करने वाले हैं और हम तो निषेध वृति से उत्पन्न हैं। आप लोगों से तो मिलना आत्मा की कृपा से हुआ है अर्थात् आपलोग जब आत्मोन्मुखी हुए हो तभी यह मिलन सम्भव हुआ है। हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।। राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।। व्याख्या : कोल किरात रूपी सहज इच्छाओं के भाव कहते हैं कि हमें तो आपके अर्थात् देह भावों के दर्शन बहुत दुर्लभ होते हैं, जैसे मरूस्थल में गंगा की धारा दुर्लभ होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि चित्रकोष रूपी वैराग्य वन में देह भाव रूपी लोगों का आना बहुत दुर्गम कार्य है। आत्मा रूपी राम ने निषेध भाव रूपी निषाद को अपनाया है अर्थात् आत्मा ने विषयों की आसक्ति का निषेध करने वाले भाव को अपनाया है। अत: हम प्रजा व परिजनों को भी कैवल्य भाव रूपी निषाद भाव की तरह ही निरासक्त रहना चाहिये। दो0 यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।। व्याख्या : सहज इच्छाओं के भाव देह भावों से कहने लगते हैं कि आप संकोच को छोड़कर सहजता के प्रेम को जानकर हम सहज इच्छाओं का कृतार्थ करने के अनासक्ति रूपी फल को धारण कर लो, जिसका अंकुरण होने पर सहज इच्छाएँ कृतार्थ हो जायेंगी। तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।। देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईंधनु पात किरात मिताई।। व्याख्या : वैराग्य रूपी वन के कोल-किरात रूपी सहज इच्छाओं के भाव कहते हैं कि तुम तो (देह भाव) पाहुने अर्थात् प्राण की गति के साथ वैराग्य रूपी वन में आए हो। इसलिए हमारी प्रकृति में आपसे मिलने का योग नहीं है। हे इन्द्रियों को वश में करने वाले (गो अ साँई)! हम आपको क्या दे सकते हैं क्योंकि हमारा तो सम्बन्ध अर्थात् सहज इच्छाओं का तो सम्बन्ध सहजता से उत्पन्न इच्छा रूपी पत्तों व इच्छा पैदा करने वाले प्राण रूपी ईंधन से ही होता है। यह हमारी अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई।। हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।। व्याख्या : सहज इच्छा रूपी कोल-किरात कहते हैं कि यही हमारी बड़ी सेवा है कि हमलोग देह भावों की वासना व आसक्ति को नहीं चुरा रहे हैं अर्थात् वासनाओं की आसक्ति को ग्रहण नहीं करते हैं। पाठकों को यहाँ बता देना चाहता हूँ कि परम ज्ञान की अवस्था आ जाती है तो उसे भी आध्यात्म की भाषा में जड़ ही कहा जाता है। इसलिए सहज इच्छा रूपी कोल-किरात भाव कहते हैं कि हम तो गुणों को मारकर जड़ हो गए हैं क्योंकि गुणों को मारने से अर्थात् जीतने से कुटिलता, कुचालता व कुबुद्धि के भाव भी मिट गए हैं और जब कुटिलता व कुबुद्धि के भाव मिट जाते हैं तो परम सहज अवस्था जिसे जड़वत कहा जाता है, आ जाती है। पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पर कटि नहिं पेट अघाहीं।। सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।। व्याख्या : सहज इच्छा रूपी कोल-किरात अपना स्वभाव बताते हुए कहते हैं कि हम रात दिन भोग रूपी पाप करते हैं फिर भी हमारी कमर में कपड़ा नहीं है और न ही पेट भरा है। यहाँ बहुत गहरा दर्शन छुपा हुआ है कि सहजता आ जाने पर नित्य भोग भोगने पर भी आसक्ति रूपी कपड़े का बन्धन नहीं हो सकता है और न ही कर्म फल रूपी भोजन से पेट ही भरता है अर्थात् सदैव निरासक्त अवस्था बनी रहती है। जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुखु दोष हमारे।। बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।। व्याख्या : कोल-किरात रूपी सहज इच्छाओं के भाव कहते हैं कि जब से हमने आत्मा रूपी राम के दर्शन किए हैं तब से हमारे आसक्ति रूपी दुसह दु:खों का दोष मिट गया है। सहज इच्छाओं रूपी कोल-किरातों के इस प्रकार के वचन सुनकर समस्त देह भाव अनुराग से भर गए और उनकी सहजता की प्रकृति की सराहना करने लगे। छ0 लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।। नर-नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सहजता रूपी कोल-किरातों की सब देह भाव अनुराग में भर कर सराहना करने लगते हैं। उन कोल-किरात रूपी सहजता के भावों के बोलने व मिलने के ढंग व आत्मा व सुरता में लीनता को देखकर देह भावों को सुख मिलने लगता है। उस ध्यान की अवस्था में नर व नाड़ियों की गति का निरादर करके देह भाव सहजता रूपी कोल-किरातों के प्रेम में डूबने लगते हैं। तुलसीदास अपने अनुभव का वर्णन करते हुए कहते हैं कि परमात्मा की कृपा का फल देखिए अनासक्ति रूपी लोहे के बल पर आसक्ति रूपी नाव तैर गयी। सो0 बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम।।251।। व्याख्या : ध्यान की उस गम्भीर अवस्था में देह नगर के भाव रूपी लोग वैराग्य रूप वन में प्रसन्न होकर विचरण करने लगते हैं। उनकी अवस्था उस समय ऐसी होती है मानों प्रथम वर्षा पाकर मेढ़क व मोर तरोताजा हो जाते हैं। उसी प्रकार सहजता व वैराग्य रूपी जल को पाकर देह भाव प्रसन्न हो जाते हैं। पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।। सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।। व्याख्या : देह रूपी नगर की नाड़ियाँ उस अवस्था में प्रेम के भावों में मग्न हो जाती हैं और वासना रूपी भाव पलकों में बीत जाते हैं। उस अवस्था में सुरता भी प्रत्येक नाड़ियों रूपी सासुओं के अनुसार भेष धारण करके अर्थात् सुरता भी तीनों नाड़ियों में प्रेम के भावों के साथ रमण करने लगती है। उसी को सुरता रूपी सीता का सासुओं की सादर सेवा करना बताया गया है। लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।। सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।। व्याख्या : बिना आत्मा रूपी राम के कोई भी भावों के मर्म को नहीं जान पाता है। क्योंकि सभी भाव तो माया ही होते हैं और सुरता भी भावों से ही बनती है। इसलिए आत्मा रूपी राम ही इस मर्म को जान पाते हैं। सुरता रूपी सीता ने समस्त नाड़ियों रूपी रानियों को अपनी सेवा के वश में कर लिया अर्थात् सुरता के भावों का ही नाड़ियों में संचरण होने लगा। जिससे नाड़ियों ने भी सुरता को बल प्रदान किया और सुख (सहजता) का अनुभव किया। लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।। अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता लखन भाव व आत्मारूपी राम की सहजता को देखकर रजोवृति रूपी कैकयी पश्चाताप करने लगी। वह धारणा रूपी पृथ्वी और सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अस्तेय रूपी यम से प्रार्थना करने लगती है कि क्रिया द्वारा कष्ट नहीं हो और सहजता की धारणा कहीं टूट नहीं जाए अर्थात् अब सदैव सहजता व सरलता बनी रहे। लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।। यहु संसय सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।। व्याख्या : यह लोक में और वेद (अनुभव) में भी पता है कि आत्मा से विमुख होने पर अर्थात् असहज होने पर चिन्ता रूपी नरक की थाह नहीं मिलती है अर्थात् अपार चिंता का जाल बन जाता है। अब ध्यान की इस गम्भीर अवस्था में सभी भावों के मन में यही संशय है कि पता नहीं आत्मा रूपी राम देह रूपी अयोध्या में लौटेंगे की नहीं अर्थात् पता नहीं परम ध्यान में पहुँचने के बाद आत्मा दोबारा देह भावों में बरतेगी या नहीं, यह संशय सब भावों को बना हुआ है। दो0 निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में भाव रत भरत भाव सोच करके बहुत व्याकुल है क्योंकि भाव रत भरत तो आत्मोन्मुखी होकर रहना चाहता है इसलिए भरत भाव व्याकुल है कि आत्मा के सान्निध्य की अवस्था कहीं कम न हो जाए। जैसे मछली कीचड़ के नीचे चिंतित रहती है कि कहीं जल कम न हो जाए। कीन्हि मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पावत साली।। केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि रजोवृति रूपी कैकयी माता के बहाने काल (समय) ने कुचाल चली है अर्थात् परमात्मा में लीन होने की अवस्था में अब वैसे ही बाधा आ रही है जैसे धान का खेत पक जाने पर ईतिका भय आ उपस्थित हो जाता है। ध्यान में यह अनुभूति बहुत ही सूक्ष्मता से समझ में आ पाती है। वास्तव में जब ध्यान में मग्न अवस्था होती है तो कुछ रजोवृति भाव पैदा होकर साधक के मन में भय सा पैदा कर देते हैं कि काफी देर हो गयी है, अब तो फला काम बाकी है, फला जगह जाना है इत्यादि-इत्यादि के विचार आकर भाव रत भाव जो आत्मा में लीन होना चाहता है, को व्याकुल कर देते हैं। उस अवस्था में भाव-रत भरत भाव सोचने लगता है कि किस प्रकार आत्मा में लीनता की अवस्था को बनाए रखा जाए। मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ रहा है। इस प्रकार भाव- रत भरत भाव के मन में नाना विचार आने लगते हैं। अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रूचि जानी।। मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।। व्याख्या : भाव रत भाव सोचता है कि आत्मा रूपी राम विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की बात मानकर अवश्य ही देह नगरी रूपी अयोध्या में लौट जायेंगे। परन्तु विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु आत्मा के परमात्मा में लीनता के रूख को देखकर लौटने के लिए कभी नहीं कहेंगे। सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या रूपी माता के कहने से लौट सकते हैं, परन्तु सुष्मना नाड़ी रूपी माता कहने का हठ नहीं करेंगी। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में जब आत्मा व सुरता परमात्मा में लीन होने लग जाते हैं तो नाड़ियों का प्रवाह उन्हें प्रभावित नहीं कर पाता है। जब तक चेतना हकार व ठकार के रूप में चलती है, तब तक ही सुष्मना नाड़ी का प्रभाव रहता है वरना चेतना नाड़ियों के प्रभाव से मुक्त हो जाती है। इसलिए भाव रत भरत भाव सोचते हैं कि सुष्मना नाड़ी में तो अब प्राण की हकार-ठाकर वाली गति हो नहीं सकती है। इसलिए आत्मा रूपी राम देह नगरी रूपी अयोध्या में कैसे लौटेंगे। मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।। जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हर गिरि तें गुरु सेवक धरमू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव सोचता है कि मुझ अनुचर अर्थात् भावों के रूख का अनुसरण करने वाले की तो बात ही कितनी है? उसमें भी ध्यान की क्रिया से विषय विमुखता प्रबल है। विषयों की प्राप्ति के प्रतिकूल समय ही कुसमय कहलाता है। इसलिए यहाँ विधि (क्रिया) और समय को कुसमय अर्थात् प्रतिकूल बताया गया है। ऐसी अवस्था में अगर मैं हठ करूँगा तो कुकरमू अर्थात् असहजता का कारण बन जाऊँगा। क्योंकि अनुचर अर्थात् अनुसरण कर्ता का धर्म माया के हरण करने वाले भाव से भी कठिन होता है। एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।। प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के मन में एक भी उपाय टिक नहीं पा रहा था। इस प्रकार चिंतन-मनन करते-करते अज्ञान रूपी रात्रि बीत गयी। तब ज्ञान रूपी सवेरा देखकर आत्मा रूपी राम को सिर झुका कर अर्थात् पूरी तरह से आत्मोन्मुखी होकर भाव रूपी ऋषियों को बुला लिया। ऋषि बुलाने का साधना में बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में जब भाव ध्यान में आत्मोन्मुखी होते हैं तो उस अवस्था में एक विशेष हार्मोन का रस निकलना शु डिग्री हो जाता है। उसी बलिष्ठ हार्मोन के रस को ही ऋषि के प्रतीक के रूप में बताया गया है। दो0 गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव ध्यान की उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ की आज्ञा पाकर अर्थात् विशिष्ट ज्ञान की प्रेरणा से बैठ गए अर्थात् आत्मा में रत हो गए। जब भाव आत्मा में रत होने लग जाते हैं तो उस अवस्था में विशुद्ध प्रकाश (विप्र) के भाव, महाजन यानी वैभव के महाभाव, सचिव यानी मंत्रणा के भाव व अन्य सात्विक भाव अपने आप प्रकट हो जाते हैं। उसी को विप्रों, महाजनों और सचिवों का आना बोलकर लिखा गया है। बोले मुनिब डिग्री समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।। धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।। व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी मन का भाव बोला कि हे भाव रूपी सभासदों! हे भाव- रत भरत भाव रूपी सुजान! आत्मसूर्य रूपी राम धारणा को धारण करने के लिए धुरी का काम करती है। जब आत्मा स्वयं में रमण करती है तो प्रकृति को वश में कर लेती है। इसलिए स्वयं के वश में प्रकृति को कर लेने के कारण वह भगवान (भग अ वान उ प्रकृति को वश में करने वाला) है। सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।। गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।। व्याख्या : आत्मा सत्य का पालन करने वाली व सुरता का आधार होती है। आत्मा का जन्म अर्थात् आत्मा चिंतन करना ही जगत में मंगल करने वाला होता है। आत्मा रूपी राम विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु, चित रूपी पिता व नाड़ियों रूपी माताओं के भावों के अनुसार खल दल अर्थात् आसुरी भावों का नाश करने वाली व सात्विक भावों को बढ़ाने वाली होती है। नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।। बिधि हरि ह डिग्री ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।। व्याख्या : इन चौपाइयों में आत्मा के लक्षणों को बताते हुए कहा गया है कि नीति, प्रेम, परमार्थ व स्वार्थ में आत्मा के समान दूसरा कोई नहीं होता है। अर्थात् नीति, प्रेम, स्वार्थ व परमार्थ का आधार केवल आत्मा ही होती है। बिधि यानी क्रिया, हरि अर्थात् माया के भावों का हरण करने वाला, हर अर्थात् माया के भावों को हर लेने की अवस्था, चन्द्र, सूर्य व सब दिशाओं के प्राण रूपी दिसिपाल, माया, जीव, कर्म और काल। अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।। करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सब ही कें।। व्याख्या : अहिप अर्थात् शेष अवस्था, महिप यानी देह भावों की अवस्था व भावों का जहाँ तक विस्तार होता है तथा योग व सिद्धियों जिनका वर्णन शास्त्र-पुराणों में किया गया है, इन सबका हृदय में विचार करके देख लो सबके मूल में आत्मा रूपी राम की प्रेरणा ही होती है। अर्थात् समस्त भावों का आधार आत्म चेतना ही होती है। दो0 राखें राम रजाइ रूख हम सब कर हित होइ। समुझि सयाने कहहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।। व्याख्या : इसलिए विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु भाव कहते हैं कि हम समस्त भाव रूपी लोगों का इसी में कल्याण है कि हमें आत्मा रूपी राम की प्रेरणा अनुसार ही कार्य करना चाहिए। इसलिए हे सयानों! सब वही कीजिए जिसमें समस्त भावों का मत हो। सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।। केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।। व्याख्या : सब भावों के लिए आत्मा रूपी राम का राज अभिषेक सुखद है। मंगल और आनन्द का मूल यही एकमात्र रास्ता है। इसलिए किस प्रकार आत्मा रूपी राम देह रूपी अवध को चलें? ऐसा उपाय सोच समझकर बताइये। विशिष्ट ज्ञान का भाव कहता है कि आत्मोन्मुखी होना ही मंगल व आनन्द का मूल होता है। परन्तु किस प्रकार आत्मा देह भावों में रमण करे, ऐसा उपाय समझ कर बताइये। सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।। उत डिग्री न आव लोग भए भोरे। तब सि डिग्री नाइ भरत कर जोरे।। व्याख्या : सब भाव रूपी लोगों ने नीति, परमार्थ व स्वार्थ में सजी हुई विशिष्ट ज्ञान भाव की वाणी को आदरपूर्वक सुना। परन्तु ध्यान की उस अवस्था में किसी भी भाव को उत्तर देते नहीं बनता क्योंकि सब भाव तो भोरे अर्थात् भावहीन अवस्था में थे। तब भाव रत भरत भाव ने सिर झुकाकर अर्थात् समर्पण करते हुए हाथ जोड़कर बोला। भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।। जनम हेतु सब कहुँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।। व्याख्या : आत्मसूर्य रूपी वंश में एक से एक भाव पैदा होते रहे हैं और एक भाव से एक भाव प्रबल हुए हैं। परन्तु सब भावों का जन्म चित रूपी पिता और नाड़ियों रूपी माताओं से ही हुआ है। कर्म की शुभता व अशुभता तो बिधाता अर्थात् क्रिया कर्ता पर निर्भर करती है। दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।। सो गोसाईं बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।। व्याख्या : इन चौपाइयों में साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। आत्मा जब निर्मल हो जाती है तो दु:खों का नाश हो जाता है और कल्याण सज जाता है। वही साधक गोसाईं (अर्थात् जो यानी इन्द्रियों को वश में कर लेता है) होता है जो इन्द्रियों को वश में करके क्रिया (बिधि) की गति को रोक देता है। उस टेक को संसार में कोई नहीं टाल सकता है। दो0 बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि ऐसी अवस्था में अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं तो यह तो मेरी असहजता (अभाग) है। क्योंकि सहजता तो आत्मा में लीन होने में ही है। इस प्रकार प्रेममय वचनों को सुनकर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के हृदय में भावरत भरत भाव के लिए अनुराग पैदा हो गया। तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।। सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।। व्याख्या : हे तात! सब बातें तो आत्मा की कृपा से ही सच हो पाती हैं। आत्मा से विमुख होने वाले को तो सपने में भी सिद्धियाँ नहीं मिल पाती हैं। हे तात! मैं एक बात कहने में संकोच कर रहा हूँ। विद्वान लोग सब जाने पर आधा तजने को तैयार हो जाते हैं। अर्थात् विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु भाव भाव रत भरत भाव को मध्यम मार्ग पर चलने की प्रेरणा करते हैं। तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।। सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।। व्याख्या : तुम दोनों भाव रूपी भाई (भाव रत भरत भाव और कामादि नाशक शत्रुघन भाव) दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाइये और लखन भाव, सुरता रूपी सीता व आत्मा रूपी राम को फेरिए अर्थात् उनका अनुसरण कीजिए। विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव के सुवचन सुनकर दोनों भाव रूपी भाई हर्षित हो गए और आनन्द से सब अंग पुलकित हो उठे। मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।। बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि की बातों से भाव रत भरत भाव व शत्रुघन भाव के शरीर में तेज छा गया, मानों आत्मा रूपी राम ही भावों के अधिष्ठाता (राजा) बन गए हों। ध्यान की इस अवस्था में भाव रूपी लोगों को बड़ा लाभ हुआ और कम हानि हुई लगती है। परन्तु नाड़ियों रूपी रानियों की तो वही भावहीन अवस्था के कारण रोने की अवस्था ही बनी रहती है। क्योंकि जब भावों का संचार नाड़ियों में कम हो जाता है तो वे उदास हो जाती हैं। कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।। कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव बोले कि मुनि (विशिष्ट ज्ञान का मन का भाव) ने जो कहा है, उसका पालन करने पर जीव को इच्छित फल की प्राप्ति हो जाती है। मैं तो वैराग्य रूपी वन में जन्म भर निरन्तर निवास कर सकता हूँ क्योंकि इससे बढ़कर मुझे और कोई सुख नहीं मिल सकता है। दो0 अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव बोला कि आत्मा रूपी राम व सुरता तो अन्त: करण की बात को जानने वाले हैं और आप (विशिष्ट ज्ञान) सर्वज्ञ सुजान हैं। आप जो यह सत्य कह रहे हैं, तो अपने वचनों को प्रमाण कीजिए अर्थात् प्राण की शक्ति द्वारा भाव रत भरत और शत्रुघन भाव को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में भेजकर आत्मा व सुरता को देह नगर रूपी अयोध्या में लौटा दीजिए। भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।। भरत महा महिमा जल रासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के वचनों को सुनकर और प्रेम को देखकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ विदेह हो गए अर्थात् समस्त देह भावों सहित देह के आभास को भूल गए। क्योंकि भावरत भरत भाव की महिमा तो समुद्र के समान है और विशिष्ट ज्ञान के भाव की बुद्धि समुद्र तट पर खड़ी अबला नारी जैसी है। गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।। औ डिग्री करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।। व्याख्या : वह अबला नारी की तरह मुनि की बुद्धि भाव रत भरत भाव रूपी समुद्र को पार करना चाहती है, इसलिए हृदय में बहुत उपाय खोजा परन्तु पार करने के लिए कोई युक्ति रूपी नाव नहीं मिल रही है। भरत भाव की और क्या बड़ाई करूँ? क्या तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समा सकता है? अर्थात् भाव रत भरत भाव की थाह नहीं पायी जा सकती है। भरतु मुनिब डिग्री मन भीतर आए। सहित समाज राम पहिं आए।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।। व्याख्या : ध्यान की ऐसी अवस्था में विशिष्ट ज्ञान का भाव और भाव रत भरत भाव एक हो जाते हैं। उसी को भरत और वशिष्ठ का मन के भीतर समा जाना बोलकर लिखा है। जब सारे भाव मन में समा जाते हैं, तो मन एकाग्रही होकर आत्मा रूपी राम के पास पहुँच जाता है। उसी को मुनि सहित समस्त समाज का आत्मा रूपी राम के पास जाना बताया गया है। तब आत्मा रूपी राम ने प्रणाम करके अर्थात् प्राण के माध्यम से जुड़कर आसन दिया तो समस्त भाव मन की एकाग्रता के साथ स्थिर हो गए। बोले मुनिबर बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।। सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।। व्याख्या : तब मन की एकाग्रता रूपी मुनि भाव विचारकर समय व ध्यान की अवस्था के अनुसार बोला कि हे आत्मा रूपी राम! तुम तो सर्वज्ञ व अच्छी तरह जानने वाले हो तथा धारणा की नीति, गुणों व ज्ञान का भण्डार हो। दो0 सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।। व्याख्या : मुनि भाव बोले कि आप (आत्मा) तो सबके हृदय के अन्दर निवास करते हो इसलिए सभी भाव-कुभावों को जानने वाले हो। अत: वही उपाय बताइये जिससे शरीर के समस्त भावों, नाड़ियों रूपी माताओं व भाव-रत भरत भाव सब का हित हो। वास्तव में आत्मा की सत्ता सब भावों के अन्दर भी वैसे ही निवास करती है जैसे मनुष्य के शरीर में आत्मा की सत्ता करती है। आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ।। सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।। व्याख्या : आर्त अर्थात दु:खी जीव कभी विचारकर नहीं बोलता है। क्योंकि उसे तो अपना दु:ख दूर करने का स्वार्थ ही अच्छा लगता है। जैसे जुआरी तो सदैव अपने दाव की ही सोचता है। तब आत्मा रूपी राम मन रूपी मुनि की बात सुनकर बोले कि हे मन की एकाग्रता रूपी मुनि भाव! उपाय तो तुम्हारे पास ही है। कहने का तात्पर्य यह है कि मन के पास ही समस्त समस्याओं का समाधान होता है। क्योंकि मन ही समस्याओं की जड़ होता है और मन ही समाधान कर्ता होता है। सब कर हित रूख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।। प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौं सिख सोई।। व्याख्या : सबका हित तो आपकी आज्ञा का पालन करने में ही होता है अर्थात् मन की एकाग्रता का अनुसरण करने में ही सबका हित होता है। आपकी सहज आज्ञा का पालन करने में प्रसन्नता होती है। इसलिए मुझ आत्मा के लिए कोई आज्ञा हो तो बताइये। मैं तो सिर पर धारण करके आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। वास्तव में आत्मा भी मन की एकाग्रता के अनुसार रूख धारण कर लेती है। पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भांति घटिहि सेवकाईं।। कह मुनि राम सत्य तुम भाषा। भरत सनेहँ बिचा डिग्री न राखा।। व्याख्या : पुन: आप जो भी जैसा भी कहेंगे, वो सब तो आपकी सेवा में हो ही जायेगा। इस चौपाई में गहरा रहस्य है। यहाँ मुनि को गोसाईं अर्थात् गो यानी इन्द्रयों का साईं यानी स्वामी बोला गया है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि मन की एकाग्रता के अधीन सब इन्द्रियाँ होती हैं। इसलिए जो मन की एकाग्रता का भाव चाहता है, इन्द्रियाँ तो वैसा ही कर देंगी। इसलिए ""सो सब भाँति घटिहि सेवकाई"" बोलकर लिखा गया है। तब मुनि रूपी मन की एकाग्रता का भाव बोला कि हे आत्मा रूपी राम! तुमने सही कहा है परन्तु भाव रत भरत भाव के प्रेम में पड़ जाने से मुझे इस बात का विचार ही नहीं रहा कि मन की एकाग्रता के अनुसार ही सब कुछ हो जायेगा। तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।। मोरें जान भरत रूचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।। व्याख्या : इसी कारण से मैंने बार-बार कहा है क्योंकि भाव रत भरत भाव की लीनता के कारण मेरी बुद्धि वश में हो गयी थी। अत: मेरी समझ में तो भाव रत भरत भाव के रूख को देखकर जो कुछ किया जायेगा, वही शुभ व कल्याण का साक्षी होगा अर्थात् शुभ व कल्याणकारी होगा। दो0 भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचा डिग्री बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।। व्याख्या : इसलिए हे आत्मा रूपी राम! भाव रत भरत की विनय को सुनकर और फिर विचारकर साधुमत, लोकमत व नर की धड़कन का विचार करके और वेदमत अर्थात् अनुभव का निचोड़ निकालकर जो उचित हो वही कीजिए। गुर अनुरागु भरत पर देखी। राम हृदयँ आनंदु बिसेषी।। भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु का भाव रत भरत भाव पर विशेष अनुराग देखकर आत्मा रूपी राम को बहुत आनन्द हुआ। भाव रूपी भरत को धारणा को धारण करने में धुरन्धर जानकर और तन, मन व वाणी से आत्मोन्मुखी देखकर। बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगल मूला।। नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम विशिष्ट ज्ञान भाव के अनुकूल ही मधुर व मंगल करने वाले वचन बोले कि हे विशिष्ट ज्ञान रूपी स्वामी! मुझे आपकी शपथ अर्थात् मैं आपके पथ के साथ चलने वाला हूँ (सअ पथ उ पथ पर संग चलना) और चित रूपी पिता की दोहाई अर्थात् मैं चित के दोहन से ही उत्पन्न हूँ। अत: मैंने देखा है कि समस्त भावों के कोष में (भुवनों) भाव रत भरत भाव के समान दूसरा कोई भाव नहीं होता है। जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।। राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।। व्याख्या : जिस भाव का विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के चरण कमलों में अनुराग हो, वो तो लोक व वेदों में बड़ा भाग्यवान कहलाता है। अत: जिस भाव रत भरत भाव पर विशिष्ट ज्ञान के भाव का इतना अनुग्रह है तो उसके भाग्य की सराहना कौन कर सकता? लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।। भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव रूपी छोटे भाई को देखकर आत्मा रूपी राम की बुद्धि सकुचा गयी कि भाव-रत भरत भाव के सामने बड़ाई करना ठीक नहीं है। इसलिए आत्मा रूपी राम बोले कि जो भाव-रत भरत भाव कहता है, उसी को करने में सबकी भलाई है और ऐसा कहकर चुप हो गए। दो0 तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात। कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मन का भाव भावरत भरत भाव से बोला कि हे तात! तुम सब संकोच छोड़कर आत्मा रूपी प्रिय भाई जो कृपा के समुद्र हैं से अपने हृदय की बात कहिए। सुनि मुनि बचन राम रूख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छ डिग्री भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि की बात सुनकर और आत्मा रूपी राम के रूख को देखकर तथा गुरु और स्वामी अर्थाति विशिष्ट ज्ञान और आत्मा रूपी राम को अपने अनुकूल जानकर और अपने ऊपर सब भार समझकर भाव रत भरत भाव अब कुछ नहीं बोल पा रहा है। इसलिए भाव रत भाव विचार करने लगा। पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव पुलकित होकर भाव रूपी समाज की सभा में उठ खड़ा हो गया अर्थात् प्रबल होकर उत्साह में भर गया। उस अवस्था में भावरत भरत भाव की आँखों में आँसू आ गए। तब भाव- रत भरत भाव मन में सोचने लगा कि जो मुझे कहना था वो मन की एकाग्रता रूपी मुनिनाथ ने कह ही दिया। अब मुझे क्या कहना है? मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहुँ देखी।। व्याख्या : मैं (भावरत भरत) तो आत्मा रूपी राम के स्वभाव को जानता हूँ कि वे तो अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते हैं अर्थात् आत्मा तो सहज व निर्लेप रहती है। मुझ भाव-रत भरत भाव पर तो आत्मा का विशेष स्नेह होता है। इसलिए कभी भी खेल में भी मुझसे नाराज नहीं हुए अर्थात् आत्मा में भावों के खेल से भी क्षोभ पैदा नहीं होता है। सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।। मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।। व्याख्या : बचपन से मैंने आत्मा रूपी राम का साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी तोड़ा नहीं है। मैंने आत्मा की रीति को हृदय में जाना है कि वे हमेशा मुझे ही जिताते हैं अर्थात् भाव-रत भरत भाव के रूख को ही मानते हैं। दो0 महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।। व्याख्या : मैंने भी प्रेम व संकोच के कारण सामने कभी मुँह नहीं खोला। इस दोहे में बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में जब भाव आत्म रत हो जाता है तो आत्मा के प्रति विशेष प्रेम पैदा हो जाता है और प्रेम की अधिकता में भाव मौन होता चला जाता है। उसी को संकोच कहा गया है। अत: आत्मलीनता की अवस्था में भाव रूपी भरत का कभी बोलने को मुँह खुलता ही नहीं है। आत्मा में ज्यों-ज्यों लीनता बढ़ती है त्यों-त्यों प्रेम की प्यास बढ़ने लगती है और आत्म दर्शन अर्थात् आत्म अनुभव से कभी नेत्र तृप्त नहीं होते हैं। बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।। यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।। व्याख्या : ध्यान की क्रिया भी मेरे दुलार को नहीं सह पाती है। इसलिए रजोवृति रूपी कैकयी माता के बहाने ध्यान रत अवस्था में व्यवधान डाल देती है। यह कहते हुए मुझे अच्छा नहीं लगता है कि मैं (भाव रत भरत भाव) तो साधना में लगा पवित्र भाव हूँ और दूसरे भावों में दोष है। अर्थात् अपने मानने व कहने से कौन-सा भाव पवित्र हुआ है। मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।। व्याख्या : हृदय में ऐसा विचार लाना ही कुटिलता है कि रजोवृति रूपी माता तो मंद अर्थात् बुरी है और मैं भाव रत भरत भाव साधु व सज्जन हूँ। क्या कोदों की बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है? सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।। बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि सपने में भी दूसरे का दोष नहीं होता है। मेरा अभाग अर्थात् मेरी असहजता ही समस्त दु:खों का सागर होती है। बिना सोचे ही मैंने मेरे दोषों को नहीं देख कर रजोवृति रूपी माता पर दोष मढ़ दिए। यह वास्तविकता है कि कोई भी भाव सुख-दु:ख का कारण स्वयं ही होता है परन्तु अज्ञानतावश दोषारोपण दूसरों पर करता रहता है। हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।। व्याख्या : भाव रत भरत भावको अब समझ में आ गया इसलिए कहता है कि मैं मेरे हृदय में सब प्रकार से खोज लिया हूँ कि सब प्रकार से मेरी भलाई एक ही बात में है कि विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु जिससे इन्द्रियाँ वश में रहती हैं और आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता में लीनता से ही शुभकारी परिणाम निकलेगा। अर्थात् भाव रत भरत को समझ में आ गया कि आत्मा, सुरता विशिष्ट ज्ञान भाव में लीन (रत) रहने पर ही कल्याणकारी होगा। दो0 साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहुँ सुथल सतिभाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।। व्याख्या : साधुओं की सभा में अर्थात् साधना में लगे हुए भावों की सभा में, विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु व आत्मा रूपी राम के सामने सुथल अर्थात् अच्छी तरह से दृढ़ होकर सत्य भाव से यानी सहजता के साथ कहता हूँ। यह प्रेम पता नहीं झूठा है या सत्य है ये तो विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और आत्मा रूपी राम ही जानते हैं। भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।। देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं।। व्याख्या : चित रूपी राजा के मरण ने तो प्रेम के प्रण का निर्वाह किया है अर्थात् चित का निर्मल होकर मूल सहज अवस्था में चले जाना तो प्रेम का निर्वाह होता है क्योंकि चित की निर्मल अवस्था में वासना हो ही नहीं सकती है और वासनाहीन अवस्था ही प्रेम कहलाती है। जबकि रजोवृति माता की कुबुद्धि अर्थात् विषयी भोगों की वृद्धि से जगत प्रकट होता है अर्थात् जगत दिखायी देने लगता है। उस अवस्था में नाड़ियों रूपी माताओं की व्याकुलता को देखा नहीं जाता है क्योंकि शरीर के नर-नाड़ी विषयी लालसा के भावों से जलने लगते हैं। महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समझि सहिउँ सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मैं ही सब अनर्थों का मूल हूँ अर्थात् भावों में लीनता से ही विषयी लालसा पैदा होती है और भावों की लीनता से आत्मोन्मुखी अवस्था आती है। अत: भावों के इस मर्म को समझकर व सुनकर भी सब कष्टों को सहन करता हूँ। भावों की लीनता से ही आत्मा रूपी राम लखन भाव व सुरता सहित वैराग्य रूपी वन में गए हैं। अर्थात् भावों की लीनता से ही आत्मा परमात्मोन्मुखी होती है। बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संक डिग्री साखि रहेउँ एहि घाएँ।। बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बिना वासना व लालसा के ही परमात्मोन्मुखी हो गए, जिससे शंका रहित अवस्था आ गयी। फिर निषेध भाव के सहज प्रेम को देखकर भी मेरा कठोर हृदय टूटा नहीं अर्थात् अभी भी मेरी पूर्ण आत्मोन्मुखी अवस्था नहीं आ पायी है। अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि ऐसी जटिल भावों की अवस्था को अब मैं मेरी आँखों से देख रहा हूँ कि जड़ जीव जीते जी किस प्रकार भावों की उलझन को सहन करता है। अब भाव रत भरत भाव को यह भी समझ में आ गया कि जिस आत्मा रूपी राम को देखकर विषय रूपी साँप व भोग रूपी बिच्छु विषय रूपी आसक्ति व तमसता का त्याग कर देते हैं। दो0 तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।। व्याख्या : वही आत्मा रूपी राम, लखन भाव व सुरता रूपी सीता जिन भावों को शत्रु लगते हैं तो उस रजोवृति रूपी कैकयी से उत्पन्न भावों को दैव स्वत: ही दु:ख सहावेगा अर्थात् आत्मोन्मुखी नहीं होने पर तो जीव को विषयों की लालसा दु:ख पैदा करेगी ही करेगी। सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।। सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव की प्रीत, विनय व नीति से सनी हुई वाणी को सुनकर सब भावों में क्षोभ पैदा हो गया मानों कमल के वन में पाला पड़ गया हो। कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मन के भाव ने नाना प्रकार के अनुभवों को बताकर भाव रत भरत भाव को समझाया। तब आत्मा रूपी राम उचित वचन बोले। वास्तव में भावों में जब क्षोभ पैदा हो जाता है, तो आत्मा समयोचित प्रेरणा करने लगती है जिससे विषय रूपी वन में चन्द्रमा रूपी शीतलता छा जाती हैं अर्थात् आत्मा की प्रेरणा से विषयों की जलन मिट जाती है। उसी को ""दिनकर कुल कैरव बन चंदू"" अर्थात् आत्मा रूपी सूर्य का प्रकाश हो जाता है और विषय रूपी वन में चन्द्रमा जैसी शीतलता आ जाती है, बोलकर लिखा है। तात जायँ जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।। तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्य सिलोक तात तर तोरें।। व्याख्या : हे तात! अर्थात् भाव रत भरत तुम हृदय में ग्लानी मत करो क्योंकि जीव की गति तो ईश्वर अर्थात् स्वरों पर निर्भर करती है। तीनों काल व त्रिगुणों से उत्पन्न भावों को देखकर मेरा मत यही है कि पुण्यों में सब भाव तुम से (भाव रत भरत भाव से) नीचे हैं। उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहीं सेई।। व्याख्या : हृदय में भाव रत भरत भाव पर ही कुटिलता रखने पर लोक-परलोक दोनों का नाश हो जाता है अर्थात् भाव रत भाव के प्रति सहज रहने पर भाव स्वरों के माध्यम से जीव को स्वत: ही आत्मोन्मुखी कर देते हैं। परन्तु कुटलिता आने पर विषयों का जाल उलझ जाता है जिससे असहजता बढ़ जाती है। रजोवृति रूपी माता को भी वे ही लोग दोष देते हैं जिन्हें साधना का ज्ञान नहीं होता है। दो0 मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।। व्याख्या : हे भाव रत भरत भाव! तुम्हारा नाम स्मरण करने से अर्थात् भाव रत भरत भाव में लीन होने से सब प्रकार की चिन्ता, प्रपंच (अज्ञान) और समस्त अमंगल के समूह मिट जाते हैं और लोक-परलोक में सुयश छा जाता है अर्थात् सहजता आ जाती है। कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहीं दुरइ दुराएँ।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि मैं सहजता के साथ दृढ़ विश्वास से कहता हूँ कि यह शरीर रूपी भूमि तुमने ही रख रखी है। यहाँ बहुत गहरे दर्शन की बात कही गयी है। शरीर रूपी भूमि वास्तव में भावों की लीनता के अनुसार ही बनती है। इसलिए हे तात! मन में कुतर्क मत करो। क्योंकि प्रेम और बैर छुपाए नहीं छुप सकता है। मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।। व्याख्या : मुनिगन अर्थात् जब मन की एकाग्रता बढ़ जाती है तो इच्छा रूपी पक्षी व मृग मन में समाहित हो जाते हैं परन्तु दमन करने की वृति रखने पर वे दूर चले जाते हैं अर्थात् वश में नहीं आ पाते हैं। भला-बुरा तो पशु-पक्षी भी जानते हैं। मानस और मन की चेतना से ही शरीर में गुण व ज्ञान पैदा होते हैं। तात तुम्हहिं मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।। राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।। व्याख्या : हे तात! तुम्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। परन्तु क्या करूँ? मेरे मन में असमंजस (दुविधा) है। अर्थात् आत्मा भाव रत भरत भाव को अच्छी तरह से जानती है परन्तु भाव रत भरत की गति को देखकर दुविधा हो जाती है। क्योंकि भावों में रत (लीन) होने पर जीव की गति निर्भर करती है। जिस प्रकार के भावों में रत हुआ जायेगा, उसी प्रकार जीव के शरीर की गति बन जायेगी। इसलिये मोह का त्याग करके सत्य का पालन करो अर्थात् पूर्ण रूप से सहज हो जाओ। देह भाव को भूलकर प्राण में प्रेम का अनुभव करो। तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।। व्याख्या : प्रेम का अनुभव करने पर मन का सोच मिट जायेगा और उससे ज्यादा तुम्हारे संकोच की अवस्था दूर हो जायेगी अर्थात् भाव-रत भरत भाव को भी प्रेम मार्ग पर चलने पर दृढ़ता आ जायेगी और प्रेम का निर्वाह हो जायेगा। उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रेरणा होगी, जिससे जो तुम चाहोगे, वो ही कर पाओगे। दो0 मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।। व्याख्या : इसलिए हे भावरत भरत भाव! तुम मन को प्रसन्न करके और संकोच का त्याग करके जो कहोगे मैं (आत्मा) वही करूँगा अर्थात् आत्मा भी भाव रत भाव का ही अनुसरण करती है। जैसे भाव होते हैं वैसी ही आत्मा की गति हो जाती है। परम सहज आत्मा रूपी राम के निर्मल वचनों को सुनकर भाव रूपी भाव समाज सुखी हो गया अर्थात् भावों में सहजता आ गयी। सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।। बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस गहन अवस्था में देव भाव व सद्गुणी भाव सुरराजू अर्थात् नर की धड़कन सहित भयभीत से हो जाते हैं। उस समय जब लगने लगता है कि बस अब पूर्ण रूप से परमात्मा में लीनता की अवस्था आने वाली है तो विषयी भोगों की इच्छा भय सा पैदा कर देती है कि अब क्या सचमुच ही विषयों से मुक्ति हो जायेगी। गहराई से देखने पर समझ में आता है कि कुछ विषयी भाव साधक को परमात्मा में लीन होने से दूर रखना चाहते हैं। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ ""चाहत होन अकाजू"" बोलकर लिखा गया है। परन्तु दैवीय भावों को समझ में आ जाता है कि अब कोई उपाय नहीं है। इसलिए अब तो आत्मा रूपी राम की शरण में ही फायदा है। इसलिए सब दैवीय भावों का मन भी आत्मोन्मुखी हो गया। बहुरि बिचारी परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।। व्याख्या : सभी दैवीय भाव आपस में विचार कर कहने लगे कि परमात्मा तो भक्त की भक्ति के वश में होते हैं। इसलिए अम्बरीष और दुर्वासा की घटना को याद करके दैवीय भाव व नर की धड़कन निपट व निरस अर्थात् वासनाओं की इच्छाओं से मुक्त हो गयी। अम्बरीष और दुर्वासा यहाँ भोग इच्छाओं व वासनाओं के प्रतीक हैं। इसलिए प्रतीकों का सहारा लेकर बताया गया है कि परमात्मा तो भक्ति का रूख देखकर भोग इच्छाओं व बुरी वासनाओं (दुर अ वासा उ बुरी वासना) से भक्त को बचा लेते हैं। सहे सुरन्ह बहुकाल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।। लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।। व्याख्या : जब स्वरों में बहुत समय तक विषयी भावों का अभाव (विषय अ अन्त उ विशाद) हो जाता है तो नर हरि अर्थात् नर की धड़कन माया के भावों का हरण करने वाली हो जाती है और प्रकृति में आह्लाद (प्रह्लाद) प्रकट हो जाता है। इसलिए कुछ साधना पंथों में साधना के प्रारम्भ में केवल स्वरों की श्वास की गति को देखने का अभ्यास कराते हैं, जिससे विषयी भाव शान्त होने लग जाते हैं। जब अभ्यास द्वारा विषयी भावों का अभाव हो जाता है तो साधक की प्रकृति (स्वभाव) में आह्लाद (प्रसन्नता) छा जाता है। अब ध्यान की इस अवस्था में नाद की ध्वनि को सुनकर व देखकर सब भाव आपस में कहने लगते हैं कि अब तो आगे की गति भाव रत भरत भाव के रूख पर निर्भर करती है। आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।। हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहिं।। व्याख्या : दैवीय भाव अब और दूसरा कोई उपाय भोगों का नहीं देखते हैं क्योंकि आत्मा रूपी राम तो सेवक अर्थात् साधक के रूख को मानते हैं। इसलिए सभी दैवीय भाव प्रेम पूर्वक भाव-रत भरत भाव का स्मरण करने लगे क्योंकि भाव-रत भरत भाव स्वयं के गुण व शील से आत्मा को वश में कर लेता है अर्थात् भाव की लीनता के अनुसार आत्मा वैसा ही रूख धारण कर लेती है। दो0 सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुराग।।265।। व्याख्या : दैवीय भावों के मत को देखकर दैवीय भावों के गुरु बृहस्पति (दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि इन बारहों के मर्म को जानने वाला ही बृह अ पति अर्थात् बारहों का स्वामी होती है) ने बोला कि हे दैवीय भावों! तुम्हारा बड़ा भाग्य है कि तुम्हारे हृदय में भरत भाव के चरणों में सच्चा अनुराग पैदा हो गया है। क्योंकि भाव रत भरत के चरणों में अनुराग ही सकल सुमंगलों को करने वाला है। अर्थात् भाव रत भरत के रूख के अनुसार ही भोगों की प्राप्ति हो सकती है। दैवीय भावों के लिए सुख भोगों की प्राप्ति ही सुमंगल की अवस्था होती है। सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।। भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।। व्याख्या : सुरता के स्वामी परमात्मा की सेवा साधक के लिए कामधेनु के समान होती है। परन्तु तम्हारे मन में तो भाव रत भरत के चरणों में अनुराग पैदा हुआ है, अत: अब चिन्ता छोड़ दो। क्योंकि इस क्रिया (विधि) से लगता है बात बन गयी। अर्थात् भाव रत भरत भाव के चरणों में अनुराग होने से सुख भोगों की प्राप्ति हो जायेगी क्योंकि भाव रत भरत भाव का रूख ही परमात्मा रखते हैं। देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।। मन थिर करहु देव ड डिग्री नाहीं। भरतहिं जानि राम परिछाहीं।। व्याख्या : बृहस्पति रूपी ज्ञान भाव बोले कि हे देवपति! तुम भाव रत भरत भाव के प्रभाव को देखो, वह सहज में भी आत्मा को अपनी रूचि के अनुसार रूख धारण करने के लिए बाध्य कर देता है। इसलिए हे दैव भावों! तुम मन को शान्त करो। अब किसी प्रकार का डर नहीं है क्योंकि भाव रत भरत भाव को आत्मा रूपी राम की छाया जैसा समझना चाहिये। सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।। निज सिर भा डिग्री भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम जो कि सब भावों के अन्तर्यामी होते हैं ने दैव भाव व देव गुरु बृहस्पति के मत को जानकर बहुत संकोच किया। यहाँ संकोच का कारण यह है कि दैव भाव तो सुख भोगों की चाह करते हैं और आत्मा तो निर्विकार होकर परमात्मा में लीन रहना चाहती है। अत: यही आत्मा रूपी राम को संकोच होता है। उधर को भाव रत भरत भाव ने निर्णय का सब भार अपने सिर पर जान कर नाना प्रकार के विचार करने लगा, जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। वास्तव में ध्यान में कई बार ऐसी अवस्था आ जाती है कि परमात्मा में लीन हुआ जाए या सिद्धियों की चाह की जाए या सुख-वैभव की चाह की जाए, आदि-आदि भावों में अन्तर्द्वन्द्व शु डिग्री हो जाते हैं। इन चौपाइयों में प्रतीकों का सहार लेकर उसी अन्तर्द्वन्द्व को समझाने का प्रयास किया गया है। करि बिचा डिग्री मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।। निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।। व्याख्या : इन भावों के अन्तर्द्वन्द्व की अवस्था में आखिर में भाव रत भरत भाव मन में निश्चय कर लेता है कि आत्मा रूपी राम की प्रेरणा ही कल्याणकारी होगी। क्योंकि आत्मा का स्वभाव ही है कि वो स्वयं का प्रण तोड़कर हमेशा मेरा (भाव रत) प्रण ही रखा है। कभी भी आत्मा का स्नेह व कृपा कम नहीं होती है। दो0 कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीता नाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता के पति आत्मा रूपी राम ने सदैव अपार अनुग्रह ही किया है। इसलिए भाव रत भरत भाव दोनों हाथ जोड़कर बोला। कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।। गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।। व्याख्या : यहाँ भाव रत भरत भाव में पूर्ण समर्पण का भाव आ गया इसलिए बोला कि हे कृपा सिन्धु! हे अन्तर्यामी! हे स्वामी! मैं अब क्या कहूँ? विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की अनुकूलता और आपकी अनुकूलता से मेरे मन में कल्पना से पैदा होने वाली चिन्ता मिट गयी है। अपडर डरेउँ न सोच समुलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।। मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव को अब समझ में आ गया कि वो बिना कारण ही कल्पना से भय पैदा करके ही डर गया जबकि वास्तविकता में डर का कोई कारण था ही नहीं। जैसे दिशा भूल जाने पर सूर्य का कोई दोष नहीं होता है वैसे ही जीव स्वयं की कल्पना से डर पैदा कर लेता है। उसमें आत्मा का कोई दोष नहीं होता है। जो भय पैदा हुआ वो तो मेरी (भाव रत भरत) असहजता व रजोवृति रूपी माता की कुटिलता से ही पैदा हुआ है। क्योंकि भावों की क्रिया अगर विषयों के चिन्तन में लग जाती है तो समय कठिन हो जाता है। पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।। यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।। व्याख्या : मुझे तो सब भावों ने मिलककर घेर लिया था परन्तु आपने (आत्मा) प्राण के माध्यम से प्रेरित कर मेरी रक्षा कर ली। यह कोई नयी नीति नहीं है क्योंकि इसे तो अनुभव में प्रकट रूप से समझा जा सकता है। अर्थात् आत्मा प्रेरणा के माध्यम से साधना में लगे भावों का उत्थान करती है। इसे अनुभव द्वारा समझा जा सकता है। जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।। देउ देवत डिग्री सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।। व्याख्या : जगत का चिंतन तो बुरा करने वाला होता है। केवल भलाई करने वाला तो इन्द्रियों को वश में (गो अ साईं उ इन्द्रियों का वश) करने वाला ही होता है। ऐसी अवस्था बताइये किस प्रकार कौन भलाई कर सकता है? हे आत्मा रूपी देव! आप तो कल्पत डिग्री वृक्ष की तरह हैं अर्थात् आप तो कल्पना के मूल हैं इसलिए न तो आप किसी के विरोधी हैं और न ही किसी के अनुकूल हैं। अर्थात् आत्मा तो सहज व एक रस है। दो0 जाइ निकट पहिचानि त डिग्री छाँह समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।। व्याख्या : उस कल्पत डिग्री रूपी वृक्ष अर्थात् कल्पना के मूल को पहचान लेने पर सब चिंताओं का समन हो जाता है और राजा या रंक के भले-बुरे भावों के अनुसार सब फलों की प्राप्ति हो जाती है। इस दोहे में आत्म सिद्धि की अवस्था का वर्णन किया गया है कि आत्मा को मूल से समझ लेने पर कल्पना का रहस्य समझ में आ जाता है और कल्पना के भावों के अनुसार फल प्राप्ति का मर्म भी समझ में आ जाता है। लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।। अब करूनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।। व्याख्या : सब प्रकार से विशिष्ट ज्ञान व आत्मा के प्रेम को समझकर भाव रत भरत भाव का क्षोभ व मन का संदेह मिट गया। अत: हे करूणाकर! अब वही कीजिए जिससे मेरे कारण अर्थात् भाव रत भरत भाव के कारण क्षोभ पैदा नहीं हो। जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।। सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।। व्याख्या : इन चौपाइयों में नीतिगत बात बतायी गयी है कि जो सेवक स्वामी के सँकोच का कारण बनता है, उस सेवक की बुद्धि मलीन होती है। सेवक का तो कल्याण इसी में है कि उसे अपने स्वामी की सेवा सुख का लोभ छोड़कर करनी चाहिए। भावों की दृष्टि से देखा जाए तो भावों को बिना सुख लोभ के ही आत्मोन्मुखी होना चाहिए। तभी कल्याण सम्भव है। स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।। यह स्वारथ परमार्थ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी स्वामी! आपके देह भाव में लौट जाने का ही समस्त भावों का स्वार्थ है। परन्तु आपकी प्रेरणा का अनुसरण करने पर कोटी अर्थात् नाना प्रकार से कल्याणकारी है। सब स्वार्थ व परमार्थ का यही एक सार है। यही सुकृत्यों के फलों का श्रृंगार है। देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।। तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी देव! मेरी (भरत भाव की) एक प्रार्थना सुन लो, फिर आपको जो उचित लगे वो करना। मैं राजतिलक का सब सामान लेकर आया हूँ। अत: अगर आपका मन माने तो उसे सफल कीजिए। अर्थात् समस्त भाव समाज आत्मा रूपी राम को देह रूपी अयोध्या नगर का राजा बनाना चाहता है। अत: आपको (आत्मा) अगर उचित लगे तो देह भाव में बरतने की प्रार्थना को सफल कर दीजिए। दो0 सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नत डिग्री फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी देव! या तो मुझ भाव रत भरत भाव को कामादिनाशक शत्रुघन रूपी भाई के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन में भेज दीजिए। या फिर लखन भाव और शत्रुघन भाव को देह रूप नगर में भेज कर मुझ भाव रत भरत भाव को वैराग्य रूपी वन में साथ ले लीजिए। नत डिग्री जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।। जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करूना सागर कीजिअ सोई।। व्याख्या : अगर ऐसा उचित नहीं लगे तो तीनों भाई रूपी भाव (भाव रत भाव, लखन भाव व शत्रुघन भाव) दृढ़ वैराग्य रूपी वन में चले जाएँ और आप (आत्म) सुरता रूपी सीता सहित देह रूपी अयोध्या को लौट जाएँ। हे दया के सागर! जैसे आपका मन प्रसन्न हो, वैसा ही कीजिए। देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू। मोरें नीति न धरम बिचारू।। कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी देव! आपने सब भार मुझ पर रख दिया है। परन्तु मुझमें न तो नीति का विचार है और न धर्म का विचार है। मैं तो सब बातें स्वार्थ के लिए ही कह रहा हूँ। क्योंकि दु:खी जीव के चित में ज्ञान चेतना नहीं रह पाती है। उत डिग्री देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।। अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामी सनेहँ सराहत साधू।। व्याख्या : जो स्वामी की प्रेरणा पाकर उत्तर दे अर्थात् तर्क करे तो ऐसे सेवक भाव को देखकर तो लज्जा भी लज्जित हो जाती है। मैं भाव रत भरत भाव तो अवगुणों का अथाह समुद्र हूँ परन्तु आत्मा में लीनता के कारण साधु भाव मेरी सराहना करते हैं। अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।। प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।। व्याख्या : हे कृपालु! मुझे (भाव रत भरत भाव) तो एक मत ही अच्छा लगता है जिससे स्वामी (आत्मा) को संकोच न हो, वही किया जाए। मैं आत्मा रूपी प्रभु की सपथ अर्थात आत्मा का अनुसरण करते हुए सहज भाव से कहता हूँ कि जगत के कल्याण का यही एक उपाय है। दो0 प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी प्रभु! आप संकोच छोड़कर जो जो आज्ञा देंगे अर्थात् प्रेरणा करेंगे। वो सब भाव सिर पर धारण करके आपकी प्रेरणा का अनुसरण करेंगे। जिससे सब भावों का आपसी द्वन्द्व मिट जायेगा। भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के निर्मल वचनों को सुनकर दैवभाव हर्ष से भर गए और साधु वृति के भाव सराहना करने लगे। जिससे सुमन अर्थात् निर्मल मन हो गया और स्वरों में आनन्द के भाव संचरित होने लग गए। वैराग्य रूपी वन के तापस व सहज इच्छाओं रूपी भाव तो प्रसन्न हो गए परन्तु देह रूपी अयोध्या के भावों का असमंजस बना रह गया। चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।। जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठ सुनि बेगि बोलाए।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत भरत भाव की स्नेहमय वाणी को सुनकर आत्मा रूपी राम संकोचवश चुप ही रहे। जिससे भाव समाज रूपी सभा सोच में पड़ गयी। जब ध्यान में मौनता आने लगती है, तब ऐसी अवस्था आती है। मौन की अवस्था आती देखकर प्राण रूपी जनक का आगमन हो आता है। अर्थात् प्राण भी आत्मा में लीन होने के लिए उर्ध्वगामी हो उठता है। उसी को प्रतीकों के माध्यम से जनक के दूतों का आना बताया गया है। प्राण की लीनता के आभास से विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ बहुत प्रसन्न होते हैं। अत: शीघ्र जनक रूपी प्राण को आने की प्रेरणा करते हैं। ध्यान में भावों और प्राण की गति बहुत ही सूक्ष्म तरीके से समझ में आ पाती है। करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।। दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के दूतों ने प्रणाम करके आत्मा रूपी राम को देखा तो बहुत दु:खी हुए। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मन के भाव ने दूतों से बातें पूछी कि जनक रूपी प्राण के कुशलता के समाचार कहो। अर्थात् ध्यान में प्राण रूपी जनक की तरंगें जब चित्रकोष में पहुँचती हैं तो आत्मा रूपी राम को दृढ़ वैराग्य रूपी वन में तापस भेष में देखकर बहुत दु:ख हुआ। तब मन के विशिष्ट भाव ने प्राण के तरंग रूपी दूतों से प्राण रूपी जनक की कुशलता पूछी। सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चरबर जोरें हाथा।। बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।। व्याख्या : तब प्राण की तरंगों रूपी दूतों ने सकुचा कर सीस झुकाते हुए अर्थात् समर्पण करते हुए दोनों हाथ जोड़कर बोले कि आपका आदर के साथ पूछना ही कुशलता का कारण बन गया है। दो0 नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गइ नाथ। मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।। व्याख्या : नहीं तो हे नाथ! कुशलक्षेम तो सब चित रूपी राजा दसरथ के साथ ही चली गयी। उनके चले जाने से वैसे तो समस्त जगत ही अनाथ हो गया अर्थात् चित के मूल अवस्था में चले जाने से वैसे तो जगत का आभास मिट गया परन्तु विशेष कर देह रूपी अवध और मन रूपी मिथिला विशेषकर अनाथ हो गए। कौसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।। जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।। व्याख्या : चित रूपी राजा के शिथिल हो जाने की खबर सुनकर मन रूपी मिथिला के सब भाव रूपी नर-नारी बावले हो गए। जिस भी भाव ने उस समय प्राण रूपी जनक को देखा तो उनका विदेह नाम सत्य नहीं लग रहा था। रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।। भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।। व्याख्या : नरपालहि अर्थात् नर की धड़कन से उठने वाले प्राण रूपी जनक ने जब रजोवृति रूपी रानी की कुचाल सुनी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था जैसे मणि के बिना सर्प को कुछ भी नहीं सूझता है। भाव रत भरत भाव को भावों का अधिष्ठाता बनने की बात और आत्मा रूपी राम का दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाने की बात जानकर प्राण रूपी जनक के हृदय में बहुत दु:ख हुआ। नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारी उचित का आजू।। समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण रूपी जनक राजा ने बुध भाव रूपी सचिवों व मंत्रियों से पूछा कि इस अवस्था में क्या करना उचित होगा? अयोध्या रूपी शरीर की अवस्था को देखकर प्राण रूपी जनक को असमंजस हो आया कि वैराग्य रूपी बन में चलना चाहिए या अवधी रूपी शरीर में ही रहना चाहिए। नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।। बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।। व्याख्या : तब नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण रूपी जनक ने हृदय में धैर्य धारण किया और अवधी रूपी शरीर में प्राण की तरंगों रूपी चतुर दूत भेजे। उन प्राण की तरंग रूपी दूतों से बोला कि तुम लोग भाव- रत भरत भाव के भाव कुभाव को समझकर तुरन्त मुझे बताओ कि भाव-रत भरत वास्तव में चाहता क्या है? दो0 गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के तरंगों रूपी दूत अवधी रूपी शरीर में गए और भाव रत भरत भाव की करतूत (करणी) को समझ लिया कि भाव रत भरत भाव आत्मोन्मुखी होकर चित्रकोष के लिए चल दिए हैं। तब प्राण रूपी जनक के दूत देह भावों से निकल कर तुरीया रूपी मिथिला को चल दिए। दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।। सुनि गुर परिजन सचिव महिपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के तरंग रूपी दूतों ने भाव रत भरत भाव की सब करणी को ज्यों का त्यों आकर प्राण रूपी जनक की भाव सभा को बताया। तरंगों रूपी दूतों की बातों को सुनकर ज्ञान रूपी गुरु भाव, भाव रूपी कुटुम्बि, मंत्रणा रूपी मंत्री व प्राण रूपी जनक सबको बहुत सोच हुआ और सब व्याकुल हो गए। वास्तव में ध्यान में कई बार ऐसी अवस्था आती है जिससे भावों में क्षोभ पैदा हो जाता है। क्षोभ पैदा होना ही व्याकुलता के प्रतीक के रूप में बताया जाता है। धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।। घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।। व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक व सब भावों ने धैर्य धारण करके भाव-रत भरत भाव की बहुत बड़ाई की तथा सुभट यानी सात्विकता के प्रबल भावों व सहजता की वृति रूपी साहनियों को बुला लिया। ध्यान में स्वत: ही सात्विक भाव रूपी सुभट व वृति रूपी साहनी पैदा हो जाते हैं। उन्हीं को प्रतीकों का सहारा लेकर समझाया गया है। घर, पुर व देश अर्थात् कोष, कोशिकाओं व चक्रों के लिए सहजता रूपी रखवारे रखकर मन रूपी घोड़ों, इच्छा रूपी हाथियों व वृति रूपी रथों को व बहुत से मनोभाव रूपी वाहनों को सजाया। दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला।। भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।। व्याख्या : वास्तव में ध्यान में जब सुरता, लखन भाव, आत्मा व भाव रत भरत भाव चित्रकोष में होते हैं तो प्राण को उर्ध्वगामी होने में देर नहीं लगती है। इसलिए दुघरी अर्थात् नर-नाड़ी की धड़कन को निहारते ही तत्काल प्राण रूपी राजा बिना विश्राम किए ही उत्साहपूर्वक (प्रात:काल) प्रयाग में अर्थात् तीन गुणों का मर्म जानकर यानी स्नान करके ईड़ा नाड़ी रूपी यमुना को पार करने लगते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ध्यान में प्राण रूपी जनक व प्राण रूपी जनक के भाव रूपी योद्धा व कुटुम्बि तीनों गुणों के मर्म को समझकर तामसता रूपी यमुना नदी को पार करने लगते हैं। खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।। साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के तरंग रूपी दूत बोले कि राजा ने हमें समाचार लेने के लिए भेजा है। ऐसा कहकर दूतों ने अर्थात् प्राण की तरंगों ने सिर झुकाया। अर्थात् समर्पण कर दिया। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने बिना देर किए तरंग रूपी दूतों को विदा कर दिया और साथ में यम, नियम, संयम, प्राणायाम, प्रत्याहार व धारणा रूपी छ: सात किरातों को साथ में कर दिया। जिससे प्राण रूपी जनक भाव समाज सहित सहजता के साथ चित्रकोष में चले आ सकें। दो0 सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजू।।272।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के आगमन की खबर पाकर समस्त देह रूपी नगर के भाव प्रसन्न हो गए परन्तु आत्मा रूपी राम संकोच में पड़ गए और दैवीय भाव विवश होकर सोच में पड़ गए कि अब क्या होगा? ध्यान में भावों की यह प्रतिक्रिया बहुत सूक्ष्मता से घटित होती है। गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।। अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।। व्याख्या : रजोवृति रूपी कैकयी को ऐसी अवस्था में बहुत ग्लानि होने लगती है कि सब भाव अब उसे ही दोष लगायेंगे। परन्तु देह नगर के नड़-नाड़ियाँ प्रसन्न होने लगे कि अब प्राण रूपी जनक के आ जाने से अभी चित्रकोष में रहने का और मौका मिलेगा। वास्तव में ध्यान की अवस्था में कुछ भाव ध्यान से बाहर आना चाहते हैं तो कुछ भाव निरन्तर ध्यान में ही रहना चाहते हैं। इन चौपाइयों में उसी भाव द्वन्द्व की अनुभूति को लिखा गया है। एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।। करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।। व्याख्या : इस प्रकार भाव द्वन्द्व में ज्ञान रूपी दिन बीत गया और दूसरे दिन स्फूर्ति रूपी प्रात:काल आ गया जिसमें सब लोग स्नान करने लगे अर्थात् सब भाव नव ऊर्जा से भर गए। ज्ञान रूपी जल में स्नान करके भाव रूपी नर-नारी गुण, गौरि यानी गौ अ अरि अर्थात् इन्द्रियों के शत्रु भाव रूपी श्रद्धा, तिपुरारि अर्थात् तीनों गुणों के शत्रु भाव रूपी विश्वास भाव व तमारी यानी तम अ अरि अर्थात् अज्ञान के शत्रु भावों की पूजा करने लगे। कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान रूपी जल में स्नान करने से गुणों रूपी गणेश, गौरी रूपी श्रद्धा, शंकर रूपी विश्वास व तमारी रूपी ज्ञान के भावों का उद्भव हो गया। रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।। राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब भाव रूपी लोग श्रद्धा व विश्वास के भावों से भर जाते हैं तो रोम-रोम में रमण करने वाली शक्ति की हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगते हैं। उस अवस्था में भावों की चाह हो उठती है कि आत्मा रूपी राम भावों के राजा हों तथा सुरता रूपी सीता रानी हो जिससे आनन्द की सीमा बनकर अवधी रूपी शरीर में रहा जाए। सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।। एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।। व्याख्या : समस्त भाव समाज सहित स्वयं के वश में रहा जाए तथा भाव रत भरत भाव को आत्मा रूपी राम युवराज कर दें अर्थात् भावों की लीनता सदैव आत्मोन्मुखी बनी रहे। इसी प्रकार की भावना रूपी बेल को सभी भाव सींचना चाहते हैं, जिससे भाव रूपी देवता जन्म लेने का फल दे सकें अर्थात् सुख भोगों के साथ आनन्दपूर्वक अवधी रूपी शरीर में निवास किया जा सके। दो0 गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु भावों, भाव रूपी भाईयों सहित अवधी रूपी शरीर पर आत्मा रूपी राम का राज हो। आत्मा रूपी राम के अवधी रूपी देह के राजा रहते ही हम (भावों) लोगों का मरण हो। ऐसी कामना सब भाव करने लगे। अर्थात् समस्त भावों की चाह है कि आत्मा रूपी राम देह नगर रूपी अयोध्या पर राज करें अर्थात् देह भाव में बरतें। सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहि जोग बिरति मुनि ग्यानी।। एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।। व्याख्या : देह रूपी नगर के भावों की प्रेममय बाणी को सुनकर मन का ज्ञान भाव योग व वैराग्य के भावों की निंदा करने लगता है अर्थात् योग व वैराग्य को सारहीन मानने लग जाता है। ध्यान में योग-वैराग्य की सारहीनता का साधक को कई बार आभास होता है। कभी-कभी तो मन में ये विचार भी आने लगते हैं कि योग-वैराग्य से क्या होगा? इस प्रकार देहनगर के भाव लोग नित्य कर्म करके अर्थात् चिंतन करके प्राण के माध्यम से आत्मा रूपी राम से पुलकित होते हुए जुड़ गए। ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।। सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।। व्याख्या : उत्तम, मध्यम व नीच गति वाले नर-नाड़ियों से उत्पन्न भाव अपनी रूचि अर्थात् भावना के अनुसार आत्म दर्शन करने लगते हैं। आत्मा रूपी राम सावधानीपूर्वक सब भावों का रूचि के अनुसार ही सम्मान करते हैं। उस अवस्था में सभी भाव रूपी नर-नारियाँ आत्मा रूपी राम की सहजता की सराहना करने लगते हैं। लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।। सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।। व्याख्या : आत्म रूपी राम की सहजता की यही रीत (बान) है कि वे प्रेम की नीति का पालन करते हैं। आत्मा शील व संकोच का समुद्र होती है तथा सुमुख अर्थात् सहजवाणी वाली, दिव्य लोचनों वाली व सरल स्वभाव वाली होती है। कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।। हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।। व्याख्या : इस प्रकार प्रेम से आत्मा रूपी राम के गुण-गान करने से सभी भाव अनुराग से भर गए। जिससे सभी भाव अपने भाग्य (प्रकृति) की सराहना करने लगे कि हमारे समान पुण्य का पुँज थोड़े भाव ही होते हैं जिन्हें आत्मा रूपी राम अपना जानते हैं अर्थात् जिन भावों को आत्मा आत्मसात कर लेती है, ऐसी भाव थोड़े ही होते हैं। दो0 प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।। व्याख्या : इस दोहे में भी साधना के गहरे अनुभव का वर्णन किया गया है। प्राण रूपी जनक के आगमन की खबर सुनकर अर्थात् प्राण भी चित्रकोष में उर्ध्वगामी होकर आ रहा है कि खबर सुनकर आत्मा रूपी राम प्रेम में मग्न हो गए। वास्तव में जब प्राण उर्ध्वगामी हो जाता है तो वासनाएँ मिट जाती हैं और वासना रहित अवस्था ही प्रेम की अवस्था होती है। प्राण के आगमन की खबर से आत्मा रूपी राम संभ्रम होकर भावों सहित उठ खड़े होते हैं। अर्थात् आत्मा में भ्रम तो कभी नहीं होता है परन्तु भ्रम के भाव आवरण जरूर बना देते हैं। अत: उसी भ्रम के आवरण की अवस्था को संभ्रम बोला गया है। यहाँ भ्रम का कारण यह है कि प्राण रूपी जनक चित्रकोष में आकर क्या करेंगे। इसलिए सूर्य रूपी आत्मा भ्रम के आवरण में आच्छादित हो गयी। उसी को सूर्य कुल के कमल की संज्ञा दी गयी है। भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।। गिरिब डिग्री दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं।। व्याख्या : ध्यान में समझ में आता है कि भाव एक दूसरे भाव के प्रति आकर्षित होने लगते हैं। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन करते हुए कहा गया है कि आत्मा रूपी राम ने भाव रूपी भाइयों, मंत्रणा रूपी सचिवों, गुरु भाव व कुटुम्बियों रूपी भावों के साथ आगे गमन किया अर्थात् प्राण रूपी जनक के प्रति आकर्षित हुए। दूसरी तरफ भी ऐसा ही हुआ। अत: प्राण रूपी जनक ने ज्योंहि चित्रकूट रूपी पर्वत देखा तो वृति रूपी रथ का त्याग कर दिया। राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।। मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के मन में आत्मा रूपी राम के दर्शन की प्रबल लालसा है, इसलिए लेशमात्र भी पथ पर चलने की थकावट नहीं है। क्योंकि मन जब आत्मा और सुरता में लग जाता है तो बिना मन के शरीर को सुख-दु:खों का कैसे आभास हो सकता है? आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।। आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक इस प्रकार उतावले होकर आत्मा रूपी राम से मिलने को चले आ रहे हैं और सभी भावों की बुद्धि प्रेम में मतवाली हो रही है। जब प्राण रूपी जनक भाव समाज सहित चित्रकोष में आत्मा रूपी राम के निकट पहुँच गए तो अनुराग से भर गए तथा आपस में आदरपूर्वक मिलने लगे। लगे जनक मुनि जन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।। भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ मुनि के पैरों की वन्दना करने लगे और आत्मा रूपी राम भावों से निकलने वाले रसायन (रस रूपी ऋषियों) से प्राण के माध्यम से जुड़ गए। प्राण के माध्यम से जुड़ जाना ही प्रणाम कहलाता है। तब भाव रूपी भाईयों सहित आत्मा रूपी राम प्राण रूपी राजा से मिले और समस्त भाव समाज सहित चित्रकोष में लेकर चले। दो0 आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करूना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।। व्याख्या : चित्रकोष रूपी आश्रम मानो शान्त रस का पवित्र समुद्र है और भाव रूपी सेना मानो करूणा रूपी नदी है जिसे आत्मा रूपी राम प्रेरणा करके ले जा रहे हैं। बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरूबर कर भंगा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जो अनुभूति होती है, उसी का बहुत सूक्ष्मता के साथ प्रतीकों के माध्यम से यहाँ वर्णन किया गया है। यह करूणा रूपी नदी ध्यान में इतनी बढ़ जाती है कि ज्ञान-वैराग्य रूपी किनारों को भी डुबाती हुई चलने लगती है। जो इस करूणा रूपी नदी में मानो शोक भरे बचन नद और नाले हैं, जो इस करूणा रूपी नदी में मिलते हैं। सोच की लम्बी श्वासें ही वायु के झकोरों से उठने वाली तरंगें हैं, जो धैर्य रूपी किनारे के उत्तम वृक्षों को तोड़ रही हैं। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भँवर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। व्याख्या : भयानक बिषाद अर्थात् विषय के अन्त की भाव धारा ही उस नदी की तेजधारा है। भय और भ्रम रूपी उसमें असंख्य भँवर और चक्र हैं। कैवल्य का भाव ही विद्वान मल्लाह है, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उस नाव को खेव नहीं सकते अर्थात् ध्यान में सब भाव तो आत्मा के प्रेम में मग्न रहाते हैं। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाईं। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। व्याख्या : वैराग्य रूपी वन में विचरने वाले सहज इच्छाओं के भाव रूपी कोल-किरात ही यात्री हैं, जो करूणा रूपी नदी को देखकर हृदय में हार गए हैं। जब यह करूणा रूपी नदी चित्रकोष रूपी आश्रम में जाकर मिलि तो मानो भाव रूपी समुद्र अकुला उठा। यह अवस्था उस समय आती है जब ध्यान में सब भाव चित्रकोष में आकर लीन होने लगते हैं तो अचानक हजारों सालों पुराने भावों की भी स्मृति हो उठती है। उसी को भाव समुद्र का अकुला उठना बोलकर लिखा गया है। सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।। भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।। व्याख्या : दोनों राज समाज अर्थात् देह भाव व प्राण भाव रूपी समाज लीनता की अवस्था में पहुँचकर व्याकुल हो गए। उस अवस्था में भावों का ज्ञान व धैर्य नहीं टिक पाता है। सब भाव रूपी लोग चित रूपी राजा दसरथ के गुणों, शीलता व रूप की सराहना कर करके रोने लगते हैं मानों शोक समुद्र में डुबकी लगा रहे हों। यहाँ पाठकों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि शोक का कारण देह भावों व प्राण के भावों की कुछ भोग इच्छाएँ होती हैं, जो परमात्मा में लीनता की अवस्था में व्याकुल हो उठती है क्योंकि उन्हें लगने लगता है कि अब हमारे भोगों का क्या होगा? यही उनके शोक का कारण होता है। छ0 अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हों कहा।। सुर सिद्ध तापस जोगि जन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।। व्याख्या : शोक रूपी समुद्र में डुबकी लगाकर भाव रूपी नर-नारियाँ बहुत ब्याकुल हो उठे। वे सब रोषपूर्वक ध्यान की विपरीत क्रिया (बाम विधि) को दोष देने लगते हैं। ध्यान की उस अवस्था में स्वरों (सुर) सिद्धता के भावों, तपस्या के भावों, योग के भावों व मन की एकाग्रता के भाव सब विदेह हो जाते हैं अर्थात् किसी भी भाव को देह का आभास नहीं रह पाता है। तुलसीदास अपने अनुभव को लिखते हुए कहते हैं कि ध्यान की उस परम अवस्था से उत्पन्न प्रेम की नदी को कोई भी भाव पार करने में समर्थ नहीं हो पाता है। अर्थात् सभी भाव उस अवस्था में परमात्मा में लीन होने लगते हैं। सो0 किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ मुनि भावों को नाना उपदेश करने लगते हैं तथा विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव प्राण रूपी जनक को भी समझाते हुए कहते हैं कि हे राजन! आप धैर्य धारण कीजिए। जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।। तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।। व्याख्या : जिस प्राण रूपी जनक के ज्ञान रूपी सूर्य से भावों से उत्पन्न अज्ञान रूपी रात्रि का नाश हो जाता है तथा जिनके वचन मन के एकाग्रह रूपी कमल को खिला देते हैं। ऐसे विशुद्ध प्राण रूपी जनक के पास क्या मोह और ममता के भाव आ सकते हैं? यह तो आत्मा व सुरता के प्रति प्राण रूपी जनक का निश्छल प्रेम है, जिससे वे प्रेम मग्न हो रहे हैं। बिषइ साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।। राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।। व्याख्या : अनुभव (वेद) में आता है कि संसार में तीन प्रकार के जीव होते हैं। विषयी अर्थात् विषयों की लालसा रखने वाले, साधक अर्थात् साधना में लगे हुए और सिद्ध ज्ञानी तीन प्रकार के जीव वेदों ने बताये हैं। परन्तु जिनके हृदय में आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम होता है, उनका सज्जन जीवों की सभा में बड़ा सम्मान होता है। सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।। मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।। व्याख्या : बिना आत्मा के प्रेम के ज्ञान शोभा नहीं देता है, जैसे बिना कर्णधार के जहाज होता है। विशिष्ट ज्ञान रूपी मुनि ने प्राण रूपी जनक को नाना प्रकार से समझाया और फिर समस्त भाव रूपी लोग आत्मा रूपी घाट पर प्रेम रूपी जल में स्नान करने लगे। अर्थात् आत्मा के प्रति सब भावों में प्रेम जागृत हो गया। सकल सोक संकुल नर नारी। सो बास डिग्री बीतेउ बिनु बारी।। पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।। व्याख्या : इन चौपाइयों में बहुत गहरा मर्म छुपा हुआ है। समस्त भाव रूपी नर-नारियों को शोक व्याप रहा है। शोक व्यापने का कारण यही है कि भावों को लगता है कि पता नहीं भोग प्राप्त होंगे या भोगों का सदा के लिए त्याग हो जायेगा। यह सूक्ष्म अनुभूति ध्यान की गहराई में ही समझ आ पाती है। इसी भाव द्वन्द्व में बिना जल के ही अर्थात् बिना प्रेम के ही ज्ञान रूपी दिन निकल गया। उस अवस्था में भोग रूपी इच्छा के भावों ने भी भोजन नहीं किया अर्थात् भोग लालसा के भाव भी बिना कुछ खाये रह गए। वास्तव में ध्यान में कई बार ऐसी अवस्था आती है, जिसमें भाव स्थिर से हो जाते हैं और अनिर्णय की अवस्था आ जाती है। फिर ऐसी अवस्था प्रिय और कुटुम्बि भावों की तो कौन कहे? अर्थात् वे सब भाव बिना खाये ही रह जाते हैं अर्थात् अनिर्णय की अवस्था बनी रहती है। दो0 दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।। व्याख्या : ध्यान की उस स्थिर अवस्था में प्राण रूपी जनक का समाज और अवधी रूपी देह भावों का समाज प्रात: स्नान करने लगा अर्थात् दोनों (देह भावों और प्राण के भावों) भावों में नवस्फूर्ति आने लगी। तब नवस्फूर्ति रूपी स्नान करके दोनों भाव समाज दृढ़ता रूपी बड़ के वृक्ष के नीचे बैठे। उस अवस्था में उनके मन मलीन अर्थात् वासना के आवरण व वासना रूपी भावों का शरीर क्षीण हो गया था। अर्थात् ध्यान में दृढ़ता व स्थिरता आ जाने से मन की मलीनता व वासना रूपी शरीर क्षीण हो गए। जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।। हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग पगु परमारथु सोधा।। व्याख्या : जो भाव देह के स्वरों के माध्यम से दस इन्द्रियों व शरीर रूप नगर में रहने वाले व प्राण के माध्यम से मन रूपी नगर में रहने वाले होते हैं। वे सब हंस बंस अर्थात् हकार व सकार की श्वास की गति से ज्ञान (गुरु) व प्राण (जनक) के माध्यम से समझ में आते हैं। ज्ञान (गुरु) व प्राण (जनक) के माध्यम से जगत के परम अर्थ का रहस्य समझ में आता है। लगे कहन उपदेस अनेका । सहित धरम नय बिरति बिबेका।। कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाईं सब सभा सुबानीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में उपदेशात्मक भाव पैदा होने लग जाते हैं। उसी अनुभव को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। उस समय धारण, नीति, वैराग्य व विवेक के नाना उपदेशात्मक भाव पैदा होने लगे। जब उपदेशात्मक भाव प्रबल हो उठते हैं तो कोशिकाओं में जागृति आ जाती है और कोशिकाओं से भी नाना पुराने उपदेशात्मक भाव पैदा होने लग जाते हैं। उसी को कौशिक पुत्र विश्वामित्र के प्रतीक के रूप में नाना कथाओं का वर्णन करना बताया गया है। तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।। मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम ने कोशिकाओं से उत्पन्न विश्वामित्र रूपी भाव से कहा कि सब भाव जल के बिना ही रहे हैं अर्थात् अनिर्णय की अवस्था में हैं। प्रत्येक भाव का जब चिंतन चलता है तो एक विशेष हार्मोन निकलता है परन्तु जब भाव स्थिर हो जाता है तो उस अनिर्णय की अवस्था में रस का स्राव नहीं होता है। उसे ही बिना जल के रहना बताया गया है। तब विश्वामित्र रूपी भाव ने कहा कि आत्मा रूपी राम सही कह रहे हैं। आज भी ज्ञान रूपी दिवस अढ़ाई पहर बीत गया है अर्थात् अभी भी अनिर्णय की अवस्था बनी हुई है। रिषि रूख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।। कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।। व्याख्या : ध्यान में भावों से उत्पन्न रस (हार्मोन) के स्राव का रूख देखकर तुरीया अवस्था के प्राण रूपी राजा जनक ने कहा कि यहाँ अन्न का ग्रहण करना उचित नहीं होगा अर्थात् किसी प्रकार की कामना करना उचित नहीं होगा। प्राण रूपी जनक की कही बात सभी को बहुत अच्छी लगी। फिर प्रेरणा रूपी आज्ञा पाकर सभी भाव प्रेम रूपी जल में स्नान करने चले गए। दो0 तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लइ आए बनचर बिपुल भरि-भरि काँवरि भार। 278।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सहज इच्छा रूपी वैराग्य वन में रहने वाले वनवासी निरासक्ति रूपी अनेक फल, फूल, पत्ते आदि बहँगियों और बोझों में भर-भर कर ले आए। अर्थात् नाना प्रकार की सात्विक इच्छाएँ प्रकट होकर सहज वैराग्य रूपी वन में दृढ़ हो गयी। कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।। सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की कृपा से सब कोष रूपी पर्वत सब मनोकामना पूर्ण करने वाले हो गए। जिन्हें देखने से ही विषयों की आसक्ति दूर होने लग गयी। विषाद का मतलब विषयों की आसक्ति के अंत से ही होता है। जब विषयों की आसक्ति मिट जाती है तो स्वरों और नाड़ियों में आनन्द की धारा उमड़ पड़ती है। जिससे देह भूमि उमंग से भर जाती है। बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।। तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में इच्छाएँ सहज में पूर्ण होकर मनोनुकूल हो जाती हैं। उस समय खग, मृग व भ्रमर रूपी इच्छाओं के भाव अनुकूल हो जाते हैं। जिससे वैराग्य रूपी वन में और अधिक उत्साह छाने लग जाता है तथा तीनों गुणों की सहज अवस्था आ जाती है। उसी त्रिगुणी सहज अवस्था को ही प्रतीक रूप में त्रिबिधि सुखद हवा का चलना बोला गया गै। जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।। तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मन का हरण हो जाता है, अत: उस मन के हरण की अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। ऐसा लगने लग जाता है मानो देह रूपी नगर प्राण रुपी जनक का आतिथ्य सत्कार कर रहा हो। तब सब भाव रूपी लोग सहजता रूपी जल में स्नान करके और आत्मा रूपी राम व प्राण रूपी जनक की प्रेरणा लेकर। देखि देखि तरूबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।। दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।। व्याख्या : अपनी रूचि के अनुसार सहज इच्छाओं पर अनुराग करने लगे और जहां-तहाँ रूचि अनुसार देह भाव सहज इच्छाओं में रमण करने लगे। पवित्र, सुंदर व अमृत के समान सहज भोगों रूपी नाना फल होते हैं। दो0 सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।। व्याख्या : सभी भाव सादर कहने लगे कि ये सहज भोग रूपी फलों को भर-भर कर आत्मा रूपी राम के विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने भेजा है। अर्थात् सहज भोगों के फल विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रेरणा से ही प्रकट हुए हैं। इस प्रकार विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रेरणा से सहज होकर पितर, सुर व अतिथियों की पूजा करके देह भाव व प्राण भाव सहज भोगों रूपी फलों का आहार करने लगे। एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुरनारी।। दुहु समाज असि रूचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।। व्याख्या : इस प्रकार चार दिन बीत गए अर्थात् सत, रज, तम व गुणातीत अवस्था पार हो गयी यानी मर्म समझ में आ गया। उस परम अवस्था में आत्मा रूपी राम को देखकर भाव रूपी नर-नारी बहुत सुखी हुए। दोनों ही भाव समाजों (देह भाव व प्राण भाव समाज) की यह रूचि हो रही है कि बिना आत्मा व सुरता रूपी सीता के लौटेंगे नहीं। सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।। परिहरि लखन राम बैदेही। जेहि घ डिग्री भाव बाम बिधि तेही।। व्याख्या : उस परम ध्यान की अवस्था में भावों को लगने लगता है कि आत्मा व सुरता के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन में निवास करना करोड़ों अमरपुर अर्थात् देवलोक में निवास करने के बराबर है। इसलिए जो भाव लखन भाव, आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को छोड़कर देह नगरी रूपी घर में हैं, उनके लिए ध्यान की क्रिया (बिधि) उल्टी साबित हुई है। दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।। मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।। व्याख्या : जब सात्विक भाव (देव) सब अनुकूल हो जाते हैं, तब जाकर ही वैराग्य रूपी वन में आत्मा रूपी राम के पास रहा जा सकता है। मंदाकिनी रूपी पवित्र नाड़ी रूपी नदी में तीनों कालों में मज्जन करने पर आत्मा रूपी राम के दर्शन मंगल को करने वाले हो जाते हैं। अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।। सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के कामदनाथ रूपी पर्वत पर घूमना अर्थात् मनोकामना पूर्ण करने वाले चित्रकोष रूपी पर्वत पर घूमना और अमृत के समान सहज भोगों रूपी कंद, मूल व फलों का खाना। चौदह वर्ष सुख पूर्वक पल के समान बीत जायेंगे, जाते हुए जान ही नहीं पड़ेंगे। अर्थात् दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार की चौदह अवस्थाएँ सहजता से ही पार हो जायेगी, अगर हम आत्मा रूपी राम में लीन हो जाएँ। दो0 एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।। व्याख्या : भाव रूपी लोग आपस में कहने लगते हैं कि आत्मा में लीनता की प्रकृति बनना बहुत कठिन कार्य है। दोनों भाव रूपी समाजों (देह भाव व प्राण भाव समाज) में सहजता आने पर ही आत्मा रूपी राम के चरणों में अनुराग पैदा हो पाता है। अर्थात् भावों में जब सहजता आ जाती है तभी आत्मानुराग पैदा हो पाता है और आत्मा के प्रति अनुराग होने पर ही परमात्मा में लीनता की अवस्था आ पाती है और परमात्मा में लीनता की अवस्था ही परम सुख की अवस्था होती है। एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।। सीय मातु तेहि समय पठाई। दासीं देखि सुअवस डिग्री आईं।। व्याख्या : इस प्रकार परमात्मा में लीन होने की मनोकामना सभी भाव करते हैं। प्रेममय भावों के आपसी वचनों को सुनने से मन का हरण हो जाता है। मन के हरण का तात्पर्य भावों का शांत हो जाने से है। ध्यान की उस अवस्था में सुरता रूपी सीता की दिव्य दृष्टि रूपी माता ने अवसर देखकर दासी रूपी समर्पण की इच्छा को भेजा। अर्थात् दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना के मन में पूर्ण समर्पण का भाव पैदा हो गया। सावकास सुनि सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।। कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।। व्याख्या : जब ध्यान में समझ में आने लगता है कि भावों के शांत होने से सुरता रूपी सीता की नाड़ियों रूपी सासुएँ निर्मल होकर शांत हो जाती हैं, तो उसी को नाड़ियों रूपी सासुओं का फुर्सत में रहना बताया गया है। उस अवस्था में प्राण रूपी जनक की दिव्य दृष्टि रूपी रानियाँ भी नाड़ियों (सुष्मना, इड़ा, पिंगला) में भाव के रूप में प्रवेश करने लगती है। उसी को जनक के रनिवास का सीता की सासुओं से मिलने के प्रतीकों के माध्यम लिखा गया है। उस अवस्था में सुष्मना रूपी कौशल्या ने सब दिव्यता रूपी जनक के रनिवास को सादर आसन दिया और सम्मान किया। सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।। पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।। व्याख्या : दोनों भाव समाजों (देह भाव व प्राण भाव) के शील व स्नेह को देखकर कठोर वृति के भाव भी द्रवित होने लग गए। उस अवस्था में शरीर में पुलकावली छा जाती है और आँखों में प्रेम रूपी आँसू आने लग जाते हैं। उस ध्यान की अवस्था में दिव्यता के भाव शरीर रूपी भूमि के मर्म को जानने लगती हैं और चिंतन में शरीर का रहस्य समझ में आने लग जाता है। उसी अनुभूति को नाखूनों से जमीन को कुरेदना बोलकर लिखा है। सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति। जनु करूना बहु बेष बिसूरति।। सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सब भाव आत्मा व सुरता में लीन होकर आत्मवत् ही हो जाते हैं। उस समय ऐसा लगने लगता है जैसे करूणा के भाव ने नाना रूप धारण कर लिए हों। दिव्य दृष्टि रूपी सुरता की माता को उस अवस्था में लगने लगता है कि ध्यान की क्रिया का प्रभाव बहुत टेढ़ा है, जो दूध के फेने के समान कोमल सुरता को बज्र की टाँकी अर्थात् दृढ़ वैराग्य रूपी टाँकी से फोड़ना चाहती है। दो0 सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।। व्याख्या : दिव्य दृष्ट का भाव कहता है कि अमृत की बातें तो केवल सुनने में आती हैं परन्तु विषय रूपी जहर तो प्रत्यक्ष देखने में आ जाता है। जहाँ तहाँ काम, क्रोध, मद व लोभ रूपी कौए, उल्लू और बगुले ही दिखायी देते हैं। परन्तु हकार सकार रूपी हंस तो एक मान सरोवर अर्थात् मन की एकाग्रता में ही दिखायी पड़ता है। सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।। जो सृजि पालउ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।। व्याख्या : दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना की बातें सुनकर सुमित्रा रूपी ईड़ा नाड़ी रूपी रानी ससोच अर्थात अच्छी तरह सोचकर बोली कि ध्यानकर्ता (बिधाता) की ध्यान क्रिया बहुत विपरीत व विचित्र होती है जो पहले तो अपने भावों से सृष्टि का सृजन करती है, फिर पालन करती है और फिर नष्ट कर देती है। ध्यानकर्ता साधक की बुद्धि तो बालकों के खेल के समान भोली होती है। वास्तव में ध्यान की गहन अवस्था में ही समझ आता है कि जीव स्वयं अपने भावों से सृष्टि का सृजन, पालन व संहार करता रहता है। यह घटना प्रत्येक जीव के साथ घटित होती रहती है। परन्तु ध्यान में ही यह हृदयंगम हो पाती है। कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।। कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।। व्याख्या : तब सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या बोली कि किसी का भी दोष नहीं होता है। कर्म के वश में ही जीव को सुख-दु:ख, व हानि-लाभ होता है। कर्म कर्ता (बिधाता) के कर्म की गति कठिन होती है और कर्म की विधि (क्रिया) के अनुसार ही शुभ व अशुभ फल की प्राप्ति होती है। ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।। देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।। व्याख्या : इस रजाइ अर्थात् ईश्वर की व्यवस्था यानी स्वरों की गति ही सर्वोपरि होती है। क्योंकि स्वरों के माध्यम से ही भावों की उत्पत्ति, पालन व संहार की अवस्था बनती है। इसलिए हे देवी! भावों के मोह में पड़कर व्यर्थ में मत सोचिए क्योंकि क्रिया की प्रतिक्रिया का सिद्धान्त अकाट्य है। भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।। सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपित रानी।। व्याख्या : भूपति अर्थात् भावों का स्वामी यानी चित के मरने व जीने की बात का विचार करने पर तो हे सखी! हमारे हित की ही हानि होती है। सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या की बात सुनकर दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना बोली कि आपकी बात सत्य व सुन्दर है। क्योंकि आप तो चित रूपी राजा की नाड़ी रूपी रानी हो। दो0 लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।। व्याख्या : लखन, आत्मा व सुरता अगर दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जायेंगे तो इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं होगा। परन्तु गहराई से सोचकर सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या ने कहा कि मुझे तो भाव रत रूपी भरत भाव की चिन्ता है। ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।। राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।। व्याख्या : इस प्रसाद अर्थात् स्वरों की निर्मलता से चित की अवस्था रूपी चारों पुत्र व वृति रूपी चारों बहुएँ गंगा की तरह निर्मल हैं। अर्थात् स्वरों के निर्मल हो जाने से चित की अवस्थाएँ व वृतियाँ निर्मल हो जाती हैं। सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या कहती हैं कि मैंने कभी आत्मा रूपी राम की सपथ नहीं की अर्थात् मैं कभी आत्मा में लीन नहीं हुई परन्तु अब सहज अवस्था के कारण मैं आत्मा रूपी राम की सपथ (अर्थात् स अ पथ यानी आत्मा से जुड़ जाना या लीन हो जाना) करती हूँ। हे दिव्य दृष्टि रूपी सखी! मैं यह सहजता के भाव के साथ ही करती हूँ। भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।। कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपना, भक्ति, भरोसे व अच्छे पने का वर्णन करने में तो सरस्वती की बुद्धि भी हिचकिचाती है। सीप से कहीं समुद्र थोड़े ही उलीचे जा सकते हैं। अर्थात् भाव रत भरत भाव का प्रभाव इतना गहरा होता है कि उसका वर्णन बुद्धि द्वारा नहीं किया जा सकता है। जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार-बार मोहि कहेउ महीपा।। कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखि अहिं समयँ सुभाएँ।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या कहती हैं कि मैंने भाव-रत भरत भाव को सदा कुलदीपक अर्थात् भावों का पथ-प्रदर्शक माना है। चित रूपी राजा ने भी मुझे बार-बार यही प्रेरणा की है कि भाव-रत भरत भाव कुलदीपक (भावों का पथ-प्रदर्शक) होता है। कसौटी होने पर ही सोने की पहचान होती है और रत्न की पहचान जौहरी को होती है। पुरुष की पहचान समय पर आवश्यकता पड़ने पर होती है। समय पड़ने पर पुरुष के चरित्र का पता चलता है। अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।। व्याख्या : परन्तु आज मेरा (सुष्मना) यह कहना भी अनुचित है क्योंकि शोक व प्रेम की अवस्था में सयानापन अर्थात् चतुराई कम जाती हैं। यहाँ पर आत्मा के प्रति आकर्षण तो प्रेम को पैदा कर रहा है परन्तु विषयी सुखों के त्याग की बात बिषाद पैदा कर रही है। यह भाव द्वन्द्व ध्यान की अवस्था में ही अच्छी तरह समझ में आता है। सुष्मना नाड़ी से निर्मल गंगा के समान बाणी को सुनकर समस्त नाड़ियाँ रूपी रानियाँ प्रेम में व्याकुल हो उठी। दो0 कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या बोली कि हे मन के मंथन से उत्पन्न दिव्य दृष्टि रूपी देवी! आप धैर्य धारण करके सुनिए। आप तो विवेक के समुद्र प्राण रूपी जनक की बल्लभि हैं अर्थात् आप तो प्राण रूपी जनक पर लता की तरह आश्रित हैं। अत: आपको कौन उपदेश दे सकता है। रानि राय सन अवस डिग्री पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गवनहि बन। जौं यह मत मानै महीप मन।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या दिव्यदृष्टि रूपी सुनयना रानी से कहती है कि आपको अगर मौका मिले तो प्राण रूपी जनक को समझाकर कहना कि लखन भाव को अवधी रूपी शरीर में लौटाने की बात कहें और भाव-रत भरत भाव को वैराग्य रूपी वन में भेज दें। यह बात अगर प्राण रूपी जनक राजा को अच्छी लगे तो कर लें। इन चौपाइयों में गहरा साधना का रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में दिव्यता की दृष्टि होने पर ही समझ में आ पाता है कि भाव रत अर्थात् भावों की वैराग्य में लीनता रहने पर ही परमात्मा की प्राप्ति सम्भव हो सकती है। और जब देह भावों के लक्षणों की जानकारी रहती है तो विकारों से बचा जा सकता है। अत: लखन भाव को देह रूपी अवध लौटाने की बात कही गयी है, जिससे देह भावों को जानकर (लखकर) विकारों से बचा जा सके। यह सब प्राण के माध्यम से ही सम्भव हो पाता है, इसलिए प्राण रूपी जनक से ही यह कहने के लिये ही बात कही है। तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी।। गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या बोली कि अच्छी तरह से विचार कर ऐसा प्रयास करो, जिससे भाव-रत भरत भाव आत्मा रूपी राम के साथ दृढ़ वैराग्य रूपी वन में रह सके। मुझे भाव-रत भरत भाव की बहुत चिन्ता हो रही है क्योंकि भावरत भरत के मन में आत्मा के प्रति गूढ़ प्रेम होता है। इसलिए बिना आत्मा के भाव रत भरत भाव अच्छा नहीं रह पायेगा। लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या का सरल स्वभाव देखकर व सरल वाणी को सुनकर भी नाड़ियों रूपी रानियाँ करूणा के रस में मग्न हो गयी अर्थात् समस्त नाड़ियों में करूणा का रस प्रवाहित होने लगा। ध्यान की उस अवस्था में आकाश मण्डल से सुमन अर्थात् अच्छे निर्मल भावों की वर्षा होने लग जाती है और ध्वनि सुनाई पड़ने लग जाती है। उस अवस्था को प्राप्त करके सिद्ध व योगी शिथिल अर्थात् शान्त हो जाते हैं। सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनी बीती। राम मातु सुनि उठि सप्रीती।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समस्त नाड़ियाँ निस्तब्ध (स्थिर) हो जाती हैं। तब धैर्य धारण करके ईड़ा नाड़ी रूपी सुमित्रा बोली कि हे देवियों! दो घड़ी रात बीत गयी है अर्थात् रजो व तमों गुणों का अज्ञान रूपी अंधकार मिट गया है। यह सुनकर सतो गुणों को प्रवाहित करने वाली सुष्मना नाड़ी प्रेमपूर्वक उठी अर्थात् सुष्मना नाड़ी प्रबल हो उठी। दो0 बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेश सहाय।।284।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी उर्ध्वगामी हो उठती है। इसलिए कहती है कि तुमलोग पृथ्वी पर अर्थात् शरीर रूपी भूमि पर पैर रखो अर्थात् देहाभास करो। हमारी तो अब ईश्वर अर्थात् ई उ स्वर उ ईश्वर यानी आत्मा और सुरता में लीनता की गति है और फिर प्राण रूपी जनक ही हमारी इसमें सहायता कर सकते हैं। लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।। देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के प्रेम को देखकर व विनय को सुनकर दिव्य-दृष्टि रूपी प्राण रूपी जनक की पत्नी ने सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के पैर पकड़ लिए अर्थात् दिव्य-दृष्टि ने सुष्मना नाड़ी के सामने समर्पण कर दिया। उस समय दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना को समझ में आ गया कि सुष्मना नाड़ी विनय का घर ही होगी क्योंकि वह चित की मूल नाड़ी (घरिनि) है और आत्मा को आभासित कराने वाली है। अर्थात् सुष्मना नाड़ी के माध्यम से ही आत्मा प्रकट हो पाती है। प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिरतिनु धरहीं।। सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।। व्याख्या : आत्मा तो सब भावों का आदर करती है। जैसे अग्नि धुआँ को और पर्वत तिनकों को धारण करते हैं, वैसे आत्मा सभी प्रकार के भावों को निर्लिप्त होकर धारण करती है। मन, वचन, कर्म से आत्मोन्मुखी होने पर विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती सहायक होते हैं। रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सो है।। राम जाउ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।। व्याख्या : रउरे शब्द का साधना में बहुत बड़ा महत्व है। वास्तव में जब र रंकार की ध्वनि सुनाई पड़ने लग जाती है तब आत्मा में लीनता बढ़ने लग जाती है और र रंकार शब्द से र उ रे की तरंगें उठने लग जाती हैं जिससे आत्मा से एकरूपता बढ़ने लग जाती है। इसलिए दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना कहती हैं कि रउरे अर्थात् निर्मल आत्मा को अंगीकार करने वाला संसार में कौन सा भाव है? दीपक क्या कभी सूर्य की सहायता कर सकता है? आत्मा रूपी राम स्वरों के माध्यम से दृढ़ वैराग्य रूपी वन में जाकर परमात्मा में लीन होकर पुन: अवधी रूपी शरीर में लौटकर अचल अर्थात् निर्लिप्त, निर्विकार होकर राज करेंगे। अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपने अपने थल।। यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के भाव रूपी देवता, नाग प्राण वायु व नर (धड़कन) ही बाहुबल होते हैं जो सहज होने पर सुखपूर्वक अपने स्थान पर रहते हैं। यह सब अनुभूति विवेक रूपी याज्ञवलक्य को हुई है। अत: हे देवी! यह अनुभव-कथा झूठी नहीं हो सकती है। दो0 अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।। व्याख्या : ऐसा कह कर दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना ने सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के प्रेम पूर्वक पैर पकड़ लिए अर्थात् प्रेमपूर्वक समर्पण कर दिया और सुरता रूपी सीता के लिए प्रार्थना करके अर्थात् सुरता के संग उर्ध्वगामी होने के लिए सुष्मना नाड़ी से प्रार्थना करके सुरता को संग लेकर दिव्यदृष्टि उर्ध्वगामी हो गयी। प्रिय परिजनहि मिलि बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।। तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।। व्याख्या : दिव्यदृष्टि रूपी सुनयना के साथ उर्ध्वगामी होकर सुरता रूपी सीता प्राण समाज के भावों से भावों की योग्यता अनुसार मिली। जब प्राण के भावों ने सुरता को तपस्विनी के भेष में देखा अर्थात् सुरता को आत्मा में लीन देखा तो भावों के विषयों का अन्त (विषाद) हो गया अर्थात् विषयों की आसक्ति मिट गयी। जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।। लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुनि पावन पेम प्रान की।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक आत्मा रूपी राम के विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु की आज्ञा लेकर सुरता रूपी सीता को देखने के लिए डेरे के लिए चले अर्थात् प्राण सुरता की तरफ आकर्षित होकर चले। सुरता रूपी सीता को प्राण रूपी जनक ने छाती से लगा लिया अर्थात् प्राण और सुरता एक हो गए। यह पवित्र प्रान के निश्छल प्रेम की अवस्था ध्यान में ही समझ आ पाती है। उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।। सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब सुरता और निर्मल प्राण का मिलन होता है तो हृदय में अनुराग उमड़ पड़ता है। ऐसा लगने लगता है जैसे प्राण की अवस्था प्रयाग की हो गयी हो अर्थात् परम पवित्रता की अवस्था आ गयी हो। उस अवस्था में सुरता का भी स्नेह रूपी बट वृक्ष बढ़ने लगता है जिस पर आत्मा रूपी बालक सुशोभित हो रहा होता है। चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक का ज्ञान रूपी चिरंजीवी मुनि अर्थात् मन का भाव आत्मा रूपी बालक का सहारा लेकर डूबता-डूबता बच गया। इस अवस्था में प्राण रूपी जनक की बुद्धि मोह में मग्न नहीं होती है। यह तो सुरता और राम के प्रेम की सीमा की महिमा होती है। दो0 सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारी। धरनि सुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्राण रूपी पिता व दिव्यता रूपी माता के प्रेम में सुरता रूपी सीता स्वयं को सँभाल नहीं पाई इसलिए व्याकुल हो गयी। परन्तु धारणा की शक्ति रूपी पुत्री सुरता ने समय व सुधर्म का विचार करके धैर्य धारण किया। तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।। पुत्र पबित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।। व्याख्या : जब प्राण रूपी जनक ने सुरता रूपी सीता को तापस भेष अर्थात विकार रहति आत्मा में लीन देखा तो विशेष प्रेम व संतोष पैदा हो गया। प्राण रूपी जनक कहने लगे कि हे सुरता रूपी पुत्री! तुमने देह भाव रूपी कुल और प्राण भाव रूपी कुल को पवित्र कर दिया है। उस पवित्रता के सुयश व निर्मलता को सभी भाव कहेंगे। वास्तव में जब सुरता निर्मल होकर आत्मा में लीन हो जाती है, तो देह के भाव और प्राण के भाव निर्मल हो जाते हैं। उसी को दोनों कुलों का पवित्र होना बताया गया है। जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।। गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।। व्याख्या : हे सुरता रूपी पुत्री! तुम्हारी कीर्ति ने सुरसरि अर्थात् आनन्द रूपी गंगा की कीर्ति को भी जीत लिया है। क्योंकि आनन्द रूपी गंगा तो केवल एक कोष में बहती है परन्तु सुरता तो निर्मल होकर समस्त कोषों (ब्रह्माण्ड) में समा जाती है। सुरसरि रूपी गंगा ने तो केवल तीन नाड़ियों के संगम रूपी प्रयाग, ईड़ा व पिंगला नाड़ियों को तथा नाड़ियों से उत्पन्न भाव रूपी भावसागर को ही निर्मल किया है परन्तु सुरता जब परमात्मा में लग जाती है तो समस्त कोष व कोशिकाएँ पवित्र (निर्मल) हो जाते हैं। पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।। पुनि पितु मातु लीन्हि उरलाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक तो सहज प्रेम के वश में होकर सुरता रूपी सीता की कीर्ति का बखान कर रहे थे परन्तु सुरता तो मानो संकोच में समा गयी हो। फिर प्राण रूपी जनक व दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना ने सुरता को अपने हृदय से लगा लिया और सुरता को कल्याणकारी शिक्षा व आशीर्वाद दिया अर्थात् सुरता को परमात्मा में लीन होने की प्रेरणा की। कहति न सीय सकुच मन माहीं। इहाँ बसब रजनी भल नाहीं।। लखि रूख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुरता रूपी सीता मन में संकोच करने लगी परन्तु कुछ कह नहीं पा रही है। सुरता को लगने लगता है कि यहाँ मोह रूपी रात्रि में रहना ठीक नहीं है। तब दिव्य दृष्टि रूपी रानी ने सुरता के रूख को देखकर प्राण रूपी राजा से सुरता के शील व स्वभाव का वर्णन करते हुए कहा। दो0 बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानी।।287।। व्याख्या : तब बार-बार प्राण रूपी जनक व दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना ने सुरता से मिलकर सम्मानपूर्वक विदा किया अर्थात् प्राण और दिव्य दृष्टि अब ध्यान में सुरता से विलग हो गए। तब दिव्य दृष्टि रूपी रानी ने समय पाकर भाव रत भरत भाव की दशा का प्राण रूपी राजा को वर्णन किया अर्थात् भाव रत भरत भाव की दशा का आभास कराया। सुनि भूपाल भरत व्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।। मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।। व्याख्या : तब प्राण रूपी राजा जनक भाव रत भरत भाव के व्यवहार के यश को सुनकर निर्मल भावों की सुगंध से भर गये अर्थात् प्राण में भावों की निर्मलता की सुगंध समा गयी और चन्द्रमा के समान वासनाएँ शान्त हो गयी जिससे वासनाओं को शान्त (शीतल) करने वाला अमृत तुल्य रसायन का स्राव होने लगा। वास्तव में जब भाव आत्मा में लीन हो जाते हैं तो अमृतु तुल्य मधुर रस का स्राव होने लग जाता है जिससे वासनाएँ चन्द्रमा के समान शीतल होने लग जाती हैं। उस अवस्था में शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों में प्रेम जल बह उठता है। उस ध्यान की अवस्था में मन प्रसन्न होकर भाव रत भाव के सुयश का वर्णन करने लगता है। सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।। धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक बोले कि हे दिव्य दृष्टा! भाव-रत भरत भाव की कथा अर्थात् भाव-रत भरत भाव का चिंतन तो भाव रूपी बन्धनों का नाश करने वाला है। धारणा, राजनीति और ब्रह्म के चिंतन में मेरी बुद्धि के अनुसार गति होती है। अर्थात् धारणा, भावों की नीति और ब्रह्म के चिंतन में बुद्धि के अनुसार ही प्राण के संचरण की गति बनती है। सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।। बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।। व्याख्या : वो धारणा, राजनीति व ब्रह्म का चिंतन करने वाली मेरी बुद्धि भाव-रत भरत भाव तक नहीं पहुँच पाती है। उसकी छाया को भी नहीं पहुँच पाती है। किसी भी क्रिया गनपति अर्थात् गुणों को सिद्ध करने, वासनाओं को वश में करने (अहि अ पति अर्थात् वासनाओं को वश में करना) विश्वास रूपी शिव, सरस्वती अर्थात् स्वरों में लीन होने पर भी कोई भी कवि, विद्वान व बुधजन। भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।। समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रूचि निदर सुधाहू।। व्याख्या : कोई भी भाव-रत भरत भाव के यश, कीर्ति, करतूती, धर्म, शील, गुण व विमल विभूति का वर्णन नहीं कर सकता है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि जब भी कोई भाव भाव रत भरत का वर्णन करने का प्रयास करेगा तो वह भाव रत होकर अर्थात् भरत भाव में लीन होकर अपना अस्तित्व ही भूल जायेगा, तब कैसे वर्णन कर पायेगा। अत: भाव रत भरत भाव को तो समझना व सुनना सबको सुखद लगता है। भाव रत भरत भाव का सुख आनन्द रूपी गंगा से भी पवित्र व मधुरता में अमृत का भी तिरस्कार करने वाला होता है। दो0 निरवधि गुन निरूपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमे डिग्री कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव असीम गुण सम्पन्न और उपमा रहित भाव हैं, इसिलए भाव रत भरत भाव के समान तो भाव रत भाव ही होता है। सुमे डिग्री पर्वत को क्या कभी सेर के समान कह सकते हैं? अत: भाव-रत भरत भाव की उपमा देने में कवियों की बुद्धि भी संकोच कर जाती है। अगम सबहि बरनत बर बरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।। भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।। व्याख्या : भाव-रत भरत की करणी का वर्णन करना अगम्य होता है जैसे जल के बिना कोई मछली को पालने का प्रयास करे वैसे ही भाव-रत भरत भाव की करणी का वर्णन करना दुर्गम कार्य है। दिव्य दृष्टि रूपी रानी ने भाव-रत भरत की असीम महिमा को सुनकर जान लिया अर्थात् समझ लिया कि भाव रत अवस्था का वर्णन तो स्वयं आत्मा रूपी राम भी नहीं कर सकते हैं। बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रूचि लखि कह राऊ।। बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सबके मन माहीं।। व्याख्या : दिव्य दृष्टि रूपी रानी के मन की बात जानकर प्राण रूपी जनक भाव-रत भरत के प्रभाव का वर्णन करते हुए बोले कि लखन भाव देह रूपी अयोध्या को लौट जाए और भाव रत भरत भाव वैराग्य रूपी बन में चले जाए, इसी में सबका भला है। अर्थात् ध्यान में अनुभव में आता है कि लखन भाव अगर देह भावों के लक्षणों को लखता रहे और भाव आत्मा में लीन रहे तो सबका कल्याण हो जायेगा। क्योंकि देह के भावों को लखने (जानने) से देह विकार नहीं सतायेंगे और आत्मा में भाव लीनता (रतता) रहेगी तो परमात्मा की अवस्था प्राप्त हो जायेगी। देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।। भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।। व्याख्या : हे दिव्यता रूपी देवी! आत्मा रूपी राम व भाव-रत भरत भाव का प्रेम व विश्वास तर्क से परे होता है। क्योंकि भाव रत भरत भाव तो प्रेम और ममता की सीमा होता है और आत्मा रूपी राम समता की सीमा होता है। परमार्थ स्वार्थ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।। साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू।। व्याख्या : क्योंकि भाव रत भरत भाव तो सपने में भी परमार्थ, स्वार्थ व सुख का चिंतन नहीं करता है। भाव रत भरत का तो आत्मा के चरणों में प्रेम ही साधन व सिद्धि होता है। प्राण रूपी जनक बोले कि मुझे तो भरत एकमात्र यही सिद्धान्त जान पड़ता है। दो0 भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।। व्याख्या : प्राण रूपी राजा ने बिलख कर अर्थात् विशुद्ध प्रकार से लख कर यानी जानकर कहा कि भाव रत भरत भाव भूलकर भी आत्मा की प्रेरणा का उल्लंघन नहीं करता है। अत: प्रेम के वश में पड़कर सोच नहीं करना चाहिए। राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।। राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम व भाव रत भरत भाव के प्रेम का गुणगान करते-करते प्राण रूपी जनक व दिव्य दृष्टि रूपी रानी के लिए अज्ञान रूपी रात्रि पलक झपकते ही निकल गयी। अर्थात् जब आत्मा व भाव रतता की अवस्था का गुणगान किया जाता है तो अज्ञान का तत्क्षण ही निवारण हो जाता है। उसी अवस्था को पलक झपकते ही रात बीत जाना बोला गया है। जब अज्ञान का निवारण हो जाता है तो देह भावों व प्राण के भावों में नव स्फूर्ति आ जाती है, उसे ही प्रात: दोनों भाव समाजों (राज समाज) का जागना बताया गया है। जब सात्विक भाव स्फूर्ति आ जाती है तो मंगल की भावना प्रबल हो उठती है, उसी को देवताओं की पूजा करना बताया गया है। गे नहाई गुर पहिं रघुराई। बंदि चरन बोले रूख पाई।। नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।। व्याख्या : मंगल भावों रूपी जल में स्नान करके आत्मा रूपी राम विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के पास गए और चरण वन्दना करके बोले अर्थात् जब मंगल भावना पैदा हो जाती है तो आत्मा भावों के रूख के अनुसार नव स्फूर्ति का अनुभव करने लगती है। उसी को राम का स्नान करना कहा गया है। जब नव स्फूर्ति की अवस्था आ जाती है तो आत्मा विशिष्ट ज्ञान के भाव की प्रेरणा के अनुसार रूख धारण कर लेती है, जिससे सहजता बनी रहे। तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे नाथ! भाव रत भरत, भाव रूपी प्रजा और नाड़ियों रूपी माताएँ सब वैराग्य रूपी वन से व्याकुल हो रहे हैं। सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।। उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।। व्याख्या : हे नाथ! भाव समाज सहित प्राण रूपी राजा जनक को भी क्लेश में बहुत दिन बीत गए हैं। अत: अब आप (विशिष्ट ज्ञान) वही प्रेरणा कीजिए जिससे सब भावों का कल्याण हो सके। रौरें हाथा शब्द का साधना में बहुत गहरा रहस्य है। र रंकार बजता चला जाता है। अत: साधना में रं शब्द ध्वनि ही सब भावों का कल्याण करने वाली होती है। जब रं शब्द में स्थिरता आ जाती है तो सब भावों की कल्याणकारी अवस्था आ जाती है। अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।। तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।। व्याख्या : ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम संकोच करने लगे और विशिष्ट ज्ञान रूपी मन का भाव आत्मा के शील व स्वभाव को देखकर पुलकित हो उठा। तब मन का विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव बोला कि हे आत्मा रूपी राम! समस्त सुखों का सामान बिना तुम्हारे दोनों भाव समाजों (देह भाव व प्राण के भाव) को नरक के समान होता है अर्थात् बिना आत्मोन्मुखी हुए चिन्ता की अवस्था होती है। दो0 प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम।।210।। व्याख्या : इस दोहे में साधना का गहरा रहस्य उद्घाटित किया गया है। प्राण से प्राण पैदा होता है और जीव अर्थात् भाव से भाव पैदा होता है और भाव प्राण से पैदा होते हैं। इसलिए आत्मा से सुख पैदा होता है और सुख से आत्मा सुखी रहती है। इसलिए जिन्हें आत्मा को छोड़कर अन्य चीज सुहाती है, उनकी बिधि विपरीत अर्थात् क्रिया विपरीत होती है, जो माया में फँसाने वाली होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राण से भाव और भावों से प्राण पैदा होते हैं। भावों से ही सुख आदि का अनुभव होता है और भावों से ही आत्मा को सुख मिलता है। प्राण ही आत्मा व आत्मा ही प्राण होते हैं। सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।। जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानु। जहँ नहिं राम पेम परधानू।। व्याख्या : वह सुख तो कर्म और धारणा में जल जाता है जिसमें आत्मा रूपी राम के चरणों में प्रेम नहीं होता है। जिसमें आत्मा रूपी भाव के प्रति प्रेम नहीं होता है वो योग तो कुयोग (अर्थात् वासनाओं का योग) और वो ज्ञान अज्ञान होता है। अर्थात् बिना आत्मोन्मुखी भावों का चिन्तन अगर चलता है, तो वह चिन्तन वासनाओं को बढ़ाने वाला व अज्ञान को बढ़ाने वाला होता है। तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।। राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।। व्याख्या : जो आत्म बिमुखी हैं वे सब दु:खी होते हैं और जो सुखी होते हैं, वे सब आत्मोन्मुखी होकर ही होते हैं। हे आत्मा रूपी राम! तुम प्रत्येक जीव के हृदय की जानने वाले हो। आपकी आज्ञा अर्थात् आत्मा की प्रेरणा को सभी भाव मानते हैं। आपको (आत्मा रूपी राम) सब की स्थिति अच्छी तरह मालूम होती है। आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनि राऊ।। करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! आप आश्रम में पधारिए अर्थात् सहज अवस्था में अवस्थित रहिए। ऐसा कहकर विशिष्ट ज्ञान रूपी मन का भाव प्रेम में शिथिल हो गया। तब प्राण के माध्यम से आत्मा रूपी राम सहज अवस्था में लौट गए। तब विशिष्ट ज्ञान से उत्पन्न विशेष रस (हार्मोन) प्राण रूपी जनक के पास आए अर्थात् विशेष रस प्राण में मिल गया। राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।। महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ ने आत्मा रूपी राम के शील व स्वभाव के गुणों को प्राण रूपी जनक को सुनाए और कहा कि हे प्राण रूपी राजन! अब वही कीजिए जिससे सब भावों का कल्याण हो। दो0 ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल। तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।। व्याख्या : हे प्राण रूपी राजन! तुम ज्ञान का घर, सुजान, पवित्र व धैर्यपूर्वक धारणा को धारण करने वाले व नर (धड़कन) के पालनहार हो। तुम्हारे बिना इस असमंजस की अवस्था को कौन दूर कर सकता है? अर्थात् प्राण की निर्मलता से ही भाव असमंजसता की अवस्था से बाहर आ सकते हैं। सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।। सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी मन भाव की बात को सुनकर प्राण रूपी जनक अनुराग से भर गए अर्थात् प्राण तत्व में अनुराग पैदा हो गया। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया अर्थात् परम अनुराग की अवस्था आ जाने से दृढ़ वैराग्य की अवस्था आ गयी। ध्यान की उस अवस्था में परम अनुराग पैदा होने से प्राण में शिथिलता आ गयी। वास्तव में ध्यान में जब सब भाव शान्त होने लग जाते हैं तो प्राण की गति शिथिल होती चली जाती है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। जब प्राण में शिथिलता आ जाती है तो वापस ध्यान से बाहर आने की इच्छा नहीं होती है। अत: उसी अवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है कि प्राण रूपी जनक कहते हैं कि इस अवस्था में आकर अच्छा नहीं किया है। रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।। हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।। व्याख्या : चित रूपी दसरथ ने तो आत्मा रूपी राम को वैराग्य रूपी वन में भेजकर स्वयं ने प्रेम का परिचय देते हुए अपने आपको मूल अवस्था में लीन कर लिया। परन्तु अब हम (अर्थात् विशिष्ट ज्ञान भाव व प्राण रूपी जनक) तो इन्हें (आत्मा को) वैराग्य से भी दृढ़ वैराग्य में भेजकर प्रसन्न होकर अपने विवेक की बड़ाई करते हुए लौट जायेंगे। तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।। समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।। व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था को देखकर तापस भाव, मन की एकाग्रता के भाव, महिसुर अर्थात् शरीर के स्वर सब प्रेम में विशेष व्याकुल हो उठे। तब समय को देखकर प्राण रूपी राजा ने धैर्य धारण किया और सभी भाव समाज भाव रत भरत के पास चले अर्थात् प्राण अब सब भावों को लेकर भाव रत भरत भाव के पास गए। भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।। तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।। व्याख्या : जब ध्यान में प्राण भाव रत भरत भाव की तरफ बढ़ा तो भाव रत भरत भाव भी प्राण की तरफ आकर्षित हो गया। उसी को भरत द्वारा आगे बढ़कर प्राण रूपी जनक की अगुवाई करना बताया गया है। अवसर के अनुसार सबको अच्छे आसन दिए अर्थात् निर्मल भाव रत अवस्था आ गयी। तब प्राण रूपी जनक जो तुरीयातीत अवस्था में थे ने भाव रत भरत भाव से कहा कि हे तात! तुम्हें तो आत्मा रूपी राम का स्वभाव पता ही है। दो0 राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु। संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयुस देहु।।292।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो सत्यव्रत अर्थात् परम सहजता का पालन करने वाले व धराणा में रत रहने वाले हैं तथा सब भावों के शील व स्नेह को रखने वाले हैं। आत्मा जो दु:खों का आभास करती है वो तो भावों के संकोच के कारण करती है अर्थात् भावों के अनुसार सुख-दु:ख का आत्मा आभास करती है। इसलिए जो आज्ञा हो वही आत्मा रूपी राम से कहा जाए प्राण रूपी जनक भाव रत भरत भाव से कहते हैं कि अब जो तुम कहो अर्थात् भाव रतता जैसी होगी वैसे ही आत्मा रूख धारण करेगी। सुनि तन पुलकि नयन भरि भारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।। प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक की बातें सुनकर भाव रत भरत भाव का शरीर पुलकित हो उठा और आँखों में आँसू भर कर धैर्य धारण करते हुए बोला कि आप (प्राण) तो आत्मा रूपी राम के प्रिय हैं तथा चित रूपी पिता के समान पूज्य हैं। यहाँ पर स्पष्ट कर दिया गया है कि निर्मल प्राण आत्मा को प्रिय होता है और चित के समान ही प्राण का महत्व होता है। कुलगुरु अर्थात् भावों को प्रेरणा करने वाले गुरु रूपी भाव के समान कल्याणकारी तो चित व चित की नाड़ियाँ भी नहीं होते हैं। उसी को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से ""माय न बापू"" बोलकर लिखा गया है। कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।। सिसु सेवकु आयुस अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।। व्याख्या : कोशिकाओं से उत्पन्न मन के मंत्रणा रूपी भावों का समाज उपस्थित है और आप (प्राण) भी ज्ञान के भावों के समुद्र के रूप में यहाँ उपस्थित हैं। अत: मुझे (भाव रत भवा) अपना बच्चा और सेवक जानकर मुझे शिक्षाप्रद प्रेरणा कीजिए। एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मिलन मैं बोलब बाउर।। छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।। व्याख्या : इस भाव समाज की थाह पाना अर्थात् समझना तो राउर यानी र रंकार ध्वनि के माध्यम से ही सम्भव है। ऐसे अवसर पर मौन रहना मलिनता होगा और बोलना पागलपन होगा अर्थात न तो इस अवस्था को मौन रहकर ही समझा जा सकता है और न ही बोलकर ही समझाया जा सकता है। मैं छोटे मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ इसलिए हे तात! आप क्रिया की विपरीतता को देखकर मुझे क्षमा करना। आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवा धरमु कठिन जगु जाना।। स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बै डिग्री अंध प्रेमहि न प्रबोधू।। व्याख्या : वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और सारा जगत भी जानता है कि सेवा को धारण करना बहुत कठिन कार्य है। क्योंकि स्वामी के प्रति धर्म का पालन करने में और स्वार्थ में विरोध होता है। क्योंकि बैर तो अंधा होता है और प्रेम को ज्ञान नहीं होता है। दो0 राखि राम रूख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब के संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।। व्याख्या : इसलिए आप (प्राण) मुझे (भाव रत भाव) पराधीन अर्थात पर अ अधीन यानी आत्मा के अधीन जानकर ही आत्मा रूपी राम के रूख व सहजता के व्रत को देखकर जो सब भावों को अच्छा लगे व सबका कल्याण करने वाला हो। अत: आप (प्राण) सबके प्रेम को पहचान कर वही कीजिए। भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।। सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के वचनों को सुनकर और भाव-रत भरत भाव के स्वभाव को देखकर प्राण रूपी राजा भाव समाज सहित भरत भाव की सराहना करने लगा। भाव-रत भरत भाव के वचन सुगम-अगम, सुन्दर, कोमल व कठोर हैं। उनमें अक्षर बहुत थोड़े हैं, परन्तु अर्थ बहुत गम्भीर है। वास्तव में ऊपर से देखने पर तो भाव रत भरत भाव सरल व सुगम लगता है परन्तु भाव रतता का परिणाम बहुत गहरा होता है। ज्यों मुखु मुकुर मुक डिग्री निज पानी। गहि न जाइ अस अद्भुत बानी।। भूप भरतु मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।। व्याख्या : जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण में दिखायी देता है और दर्पण हाथ में होता है फिर भी प्रतिबिम्ब पकड़ में नहीं आता है। उसी प्रकार भाव रत भरत भाव की वाणी पकड़ में नहीं आ पाती है। तब प्राण रूपी राजा जनक, भाव रत भरत भाव व विशिष्ट ज्ञान रूपी मन का भाव व सभी भाव समाज सहित आत्मा रूपी राम के पास गए अर्थात् आत्मोन्मुखी हो गए। वे आत्मा रूपी राम विशुद्ध प्रकाश से भाव रूपी कुमुदों को खिलाने के लिए चन्द्रमा के समान होते हैं। सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।। देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।। व्याख्या : यह अवस्था देखकर सभी भाव रूपी लोग व्याकुल हो उठे मानो वर्षा के प्रथम जल से मछलियाँ व्याकुल हो गयी हों। भाव रूपी देवों ने सबसे पहले विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की दशा देखी। उसके बाद प्राण रूपी विदेह जनक की विशेष प्रेम की दशा को देखा। राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।। सब कोउ राम पेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा।। व्याख्या : और तब भाव रूपी देवों ने भाव रत भरत भाव को आत्मोन्मुखी अवस्था में देखा तो स्वार्थ में रत देव भाव हृदय में हार गए। क्योंकि उनको तो ध्यान की उस अवस्था में सब आत्मा रूपी राम के प्रेम में सरोबार दिखायी दिए। इसलिए देव भाव भी अलेख अर्थात् भाव हीन अवस्था में आकर स्तब्ध रह गए। जिस अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु। रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।। व्याख्या : देव भावों के राजा इन्द्र अर्थात भोग भावों के अधिष्ठाता इन्द्र भाव बोला कि आत्मा रूपी राम तो प्रेम के वश में संकोच कर जाते हैं। इसलिए सब भाव रूपी देव मिलकर पंच भूतों में माया रचो वरना सब कार्य बिगड़ जायेगा अर्थात् सदा के लिए भोगों का वियोग हो जायेगा। सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देवसरनागत पाही।। फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में देव भावों ने सरस्वती की स्तुति की अर्थात् देव भाव स्वरों के माध्यम से प्रवाहित होने का प्रयास करने लगे। तब देव भावों ने कहा कि हे देबि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिए। अर्थात् भोग के भावों की रक्षा करो। आप (सरस्वती) माया रचकर अर्थात् स्वरों की गति को बदलकर भाव रत भरत भाव की बुद्धि को फेर दीजिए और माया का छल करके भोगों के कुल को बचा लीजिए। वास्तव में ध्यान में जब दृढ़ वैराग्य की अवस्था आने लगती है तो भोगों के भाव व्याकुल हो उठते हैं। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।। मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।। व्याख्या : भोग भाव रूपी देवों की विनय सुनकर और देव भावों को स्वार्थी जड़ जानकर बुद्धिमति देवी सरस्वती बोली कि तुम लोग मुझसे भाव रत भरत भाव की बुद्धि को फेरने के लिए बोल रहे हो अर्थात् भाव रत भरत भाव को विषयोन्मुखी करने को बोल रहे हो। तुम लोगों को हजारों आँखें होने पर भी सुमे डिग्री दिखायी नहीं दे रहा है। बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।। सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।। व्याख्या : ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजी की बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धि को, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो (भुलावे में डाल दो)! अरे! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्य को चुरा सकती है?।।3।। भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।। अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव आत्मा व सुरता में लीन है। इसलिए जहाँ पर आत्म सूर्य रूपी प्रकाश होता है वहाँ क्या अंधकार रह सकता है। ऐसा कहकर सरस्वती विधि लोक अर्थात् ध्यान क्रिया में समा गयी। उस अवस्था भोग भाव रूपी देव ऐसे व्याकुल हो उठे जैसे रात्रि में चकवा व्याकुल हो जाता है। दो0 सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु। रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।। व्याख्या : विषयी स्वार्थ में रत देव भावों ने विषयी मलीनता के कारण बुरी सलाह करके बुरा षडयंत्र रचा। प्रबल माया जाल रच करके भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया। वास्तव में ध्यान में अचानक भोग के भाव पैदा होकर उच्चाटन पैदा कर देते हैं जिससे ध्यान हिल जाता है और साधक को ध्यान से बाहर आने की इच्छा पैदा होने लग जाती है। करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।। गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।। व्याख्या : कुचाल करके भोग भावों का अधिष्ठाता इन्द्र रूपी भाव सोचने लगा कि काम का बनना व बिगड़ना सब भाव रत भरत के हाथ में है। अर्थात् जैसी भावों की रतता (लीनता) रहेगी वैसा ही होगा। इधर प्राण रूपी जनक आत्मा रूपी राम के पास गए तो आत्म सूर्य रूपी राम ने सब भावों का सम्मान किया। समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।। जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।। व्याख्या : तब आत्मा व आत्मा के भावों को प्रेरणा देने वाले विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव ने समय, समाज व धारणा के अनुकूल बातें कही। पहले तो भाव-रत भरत भाव और प्राण रूपी जनक के संवाद को बताया और फिर भाव रत भरत ने जो सुन्दर बातें कही वो बताई। तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।। सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।। व्याख्या : हे तात आत्मा रूपी राम! तुम जैसा कहो वैसा ही सब करें अर्थात् सब भाव आत्मा की प्रेरणा के अनुसार करें। मेरा तो (विशिष्ट ज्ञान) यही मत है। तब आत्मा रूपी राम विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की बात सुनकर पान-अपान को स्थिर करते हुए सहज, सरल व मधुर वाणी बोले। बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँत भदेसू।। राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।। व्याख्या : आपके अर्थात् विशिष्ट ज्ञान और प्राण रूपी जनक के रहते मेरा कहना अनुचित है। जो भी राउर अर्थात् र रंकार की अवस्था में जो भी प्रेरणा होगी वो सभी को सपथ अर्थात् स अ पथ यानी अनुसरणीय होगी। दो0 राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उत डिग्री देत।।296।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की सपथ (स अ पथ) अर्थात् सहपथ पर चलने की बात सुनकर विशिष्ट ज्ञान और प्राण रूपी जनक सकुचा गए। अर्थात् आत्मा से सहपथ होने पर प्राण और विशिष्ट ज्ञान स्वत: शांत हो जाते हैं। उसी को संकोच करना बताया गया है। जब प्राण और विशिष्ट ज्ञान ही शांत हो जाते हैं तो दूसरे सभी भाव भी शांत होने लग जाते हैं। अत: उसी को समस्त भाव रूपी सभासदों का संकोच करना बताया गया है। उस अवस्था में सभी भाव भाव रत भरत पर निर्भर हो जाते हैं। अत: उसी अनुभूति को भरत के मुख की तरफ देखकर उत्तर देते नहीं बनना बोलकर लिखा गया है। सभा सकुच बस भरत निहारी। राम बंधु धरि धीरजु भारी।। कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में भाव रत भरत भाव ने भाव रूपी सभा को संकोच के वश में देखा अर्थात् शांत देखा तो आत्मा के प्रेम में बँधे हुए भाव-रत भरत भाव ने धैर्य धारण करके और कुसमय अर्थात् वासनाओं के प्रभाव का विचार करके निश्छल प्रेम को सम्भाला। जैसे बढ़ते हुए विंध्याचल पर्वत को अगस्त्य ऋषि ने रोका था। इस चौपाई में बहुत गहरा साधना का मर्म छुपा हुआ है। वास्तविकता यह है कि जब शरीर में वासना बढ़ने लगती है तो अति सूक्ष्म बिन्दु से उसका चिंतन शु डिग्री होता है और धीरे-धीरे फिर वो वासना पर्वताकार धारण कर लेती है। अत: जब साधक घटज निवारा अर्थात् कुंभक द्वारा प्राण को वश में करने लग जाता है तो बिन्दु मात्र से शु डिग्री होने वाली वासना रूक जाती है। जब तक अग्यानि भविष्य का लोप नहीं होता है तभी तक वासना बिन्दु मात्र से अपना आकार बढ़ाना शु डिग्री करती है। अत: यहाँ भाव-रत भरत भाव निश्छल प्रेम में दृढ़ होकर देह भाव को विस्मरित करके वासना के प्रभाव को रोक देते हैं। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। सोक कनक लोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।। भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।। व्याख्या : इन चौपाइयों में भी गम्भीर साधना रहस्य़ छुपा हुआ है। जब जीव की भौतकिवादी दृष्टि (कनक लोचन) हो जाती है तो बुद्धि खोटी होकर दु:ख पैदा कर देती है और गुणों की सहजता का हरण कर लेती है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर हिरण्याक्ष द्वारा शरीर रूपी पृथ्वी का हरण करना बताया गया है। परन्तु भाव रत भरत भाव का विवेक बहुत विशाल होता है जो बराह अर्थात् दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि के बारह रास्तों को बन्द करके तुरन्त हिरण्याक्ष अर्थात् भौतिकवादी बुद्धि का अंत करके शरीर रूपी पृथ्वी को वासनाओं से बचा लेता है। करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।। छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।। व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में भाव-रत भरत भाव प्राण के माध्यम से (प्रणाम) सब भावों से जुड़कर बोला कि आत्मा रूपी राम, प्राण रूपी राजा और विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और साधना भाव रूपी साधुजनों मेरी यह विनती है कि आज मेरी अनुचित बात को क्षमा कर देना। मैं मेरे कोमल मुख से कठोर बात कह रहा हूँ। वास्तव में वासनाओं के त्याग की बात करना ही संसार में कठोर बात मानी जाती है। उसी को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।। बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।। व्याख्या : इन चौपाइयों में विशेष मर्म बताया गया है। जब हृदय में परमात्मा का स्मरण चलता है तो सरस्वती अर्थात् स्वरों के माध्यम से सद्गुणी चिंतन (मानस) में आती है और फिर बोलने में आती है। वह वाणी निर्मल, विवेक, धारणा व नीति से पूर्ण होती है। वह सद्गुणों वाली बुद्धि भावरत भरत भाव को भारती अर्थात् आत्मा में लगाने वाली सुन्दर हंसिनी की तरह होता है। अर्थात् हकार सकार के माध्यम से भावों को आत्मा में रत (लीन) कराने वाली होती है। दो0 निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।। व्याख्या : ध्यान में तब भावरूपी भरत भाव ने विवेक की आँखों से सभी भाव समाज को प्रेम में शिथिल देखकर आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता में प्राण के माध्यम से लीनता बढ़ाकर बोला। प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी।। सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनत पाल सर्बग्य सुजानू।। व्याख्या : हे प्रभु अर्थात् आत्मा रूपी राम! आप ही माता-पिता, सुहृदय, गुरु व स्वामी हैं तथा आप परम पूज्यनीय, परम हितकारी व अन्तर्यामी हैं। आप परम सरल स्वामी हैं व शील के घर हैं। आप प्रनतपाल अर्थात् प्राण के माध्यम से सब कुछ जानने वाले सुजान अर्थात् अच्छी प्रकार जानने वाले हैं। समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।। स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं। मोहि समान मैं साईं दोहाई।। व्याख्या : समर्थ, शरणागत का हित करने वाले, गुणों का आदर करने वाले व चिन्ता रूपी पाप को दूर करने वाले, इन्द्रियों को वश में करने वाले गोसाँई अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी तो आप के समान आप ही है। मेरे समान भावों में रत रहने वाला तो मैं ही हूँ। प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।। जग भल पोच ऊँच अ डिग्री नीचू। अमिअ अमर पद माहु डिग्री मीचू।। व्याख्या : मैं तो मोह के वश में पड़कर चित रूपी पिता की प्रेरणा का उल्लंघन करके समस्त भाव समाज सहित यहाँ आया हूँ। संसार में अच्छा, बुरा, ऊँच-नीच, अमृत और अमरपद, विष और मृत्यु आदि। राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।। सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।। व्याख्या : किसी को भी ऐसा न देखा और न सुना जो आत्मा रूपी राम की प्रेरणा को टाल दे। इसलिए मैंने सब प्रकार से ढीठता की है परन्तु आपने तो उस ढिठाई को ही सेवा और प्रेम मान लिया। दो0 कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चा डिग्री चहु ओर।।298।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया, जिससे मेरे दूषण (दोष) भी भूषण (गुण) के समान हो गए और चारों और मेरा (भाव रत भरत) सुयश छा गया। इस दोहे में आत्मा के प्रभाव का वर्णन किया गया है। जब कोई भी वृति का भाव आत्मा में लीन हो जाता है तो वह शुभकारी होकर सुयश को प्राप्त कर लेता है। राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।। कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई समस्त जगत को पता है और वेद-शास्त्रों ने भी गाया है। इसलिए अगर कोई क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच , शील रहित, नास्तिक और निशंक है। तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।। देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।। व्याख्या : उनको भी आपने (आत्मा) शरण में आया हुआ देखकर एक बार में ही अपना लिया। अर्थात् जो भी भाव आत्मोन्मुखी हो जाता है आत्मा उसे अपना लेती है और प्राण के माध्यम से वह भाव सुकृत्य अर्थात् सात्विक कर्म करने वाला हो जाता है। आप कभी भी भावों के दोषों का विचार नहीं करते हैं और उनकी फरियाद को सुनकर साधु समाज में उन भावों का वर्णन होने लग जाता है। को साहिब सेवकहि नेवाजी। आप समाज साज सब साजी।। निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपने।। व्याख्या : ऐसा स्वामी कौन है अर्थात् आत्मा रूपी राम के समान स्वामी कौन है जो सेवक के लिए सारा सामान सज देता है अर्थात् सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण कर देता है। आत्मा सपने में भी अपने कर्तापन का आभास नहीं करती है यह सोचकर कि सेवक को हृदय में संकोच होगा। सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहुउँ पन रोपी।। पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मैं भुजा उठाकर और प्राण को स्थिर करके कहता हूँ कि ऐसा स्वामी आपके (आत्मा) सिवा कोई नहीं है। बंदर आदि पशु नाचते और तोते पाठ में प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोते की पाठ में प्रवीणता और पशु की नाचने में कुशलता पढ़ाने वाले और नचाने वाले के अधीन होती है। अत: उसी प्रकार भावों की गति आत्मा की प्रेरणा पर निर्भर करती है। यहाँ आत्मा के प्रति समर्पण के भाव को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। दो0 यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बर जोर।।299।। व्याख्या : इस प्रकार भावों को सम्मान देकर और सुधारकर अर्थात् निर्मल करके साधना के भावों का शिरोमणि बना दिया। हे कृपालु आत्मा! आपके अलावा कौन अपनी विरदावली का हठपूर्वक पालन करेगा? अर्थात् बिना आत्मा के प्रेरणा के साधना के भावों में निर्मलता कौन पैदा करेगा? सोक सनेहँ बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।। सबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।। व्याख्या : मैं भाव रत भरत भाव शोक से, प्रेम से या बाल स्वभाव से आत्मा की प्रेरणा को बाएँ करके अर्थात् नहीं मानकर चला गया हूँ अर्थात लीन हो गया हूँ। तब भी आपने सब प्रकार से अच्छा ही माना है अर्थात मुझ भाव रत भरत भाव को अपना लिया है। देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।। बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मैंने आत्मा रूपी स्वामी के मंगल के मूल चरणों को देखा और मैंने सब प्रकार से अनुकूल व सहज पाया। इस बड़े समाज अर्थात् निर्मलता रूपी भाव समाज में मेरा बड़ा भाग्य है कि मेरी बड़ी भूल होने पर भी आत्मा रूपी स्वामी ने सदैव मुझ पर अनुराग ही किया है। कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।। राखा मोर दुलार गोसाईं। अपने सील सुभायँ भलाई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहते हैं कि हे आत्मा रूपी कृपा के समुद्र! आपने सब प्रकार से मुझ पर कृपा की है। आपने (इन्द्रियों के स्वामी) सब प्रकार से मुझ पर दुलार रखा है। ये सब आपके शील व स्वभाव के कारण ही हुआ है। अर्थात् आत्मा सहज में ही भाव-रत भरत भाव पर दुलार रखती है। क्योंकि जैसी भावों की लीनता रहती है वैसे ही शील व स्वभाव के कारण आत्मा रूख कर लेती है। नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।। अबिनय बिनय जथा रूचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी स्वामी! मैंने (भाव रत भरत भाव ने) आपकी और भाव रूपी समाज के संकोच को छोड़कर ढिठाई की है। मेरी जैसी भी विनय और अविनय की रूचि हुई मैंने वैसा ही किया है। अत: मेरे अपराधों को नाथ (आत्मा) क्षमा कर देना। दो0 सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।। व्याख्या : जब ध्यान में भाव-रत भरत भाव आत्म लीन होने लगता है तो पूरी तरह समर्पण का भाव आने लग जाता है। उसी भाव अवस्था का वर्णन करते हुए भाव-रत भरत भाव कहता है कि हे सुहृदय आत्मा। आप तो अच्छी तरह सब कुछ जानने वाले हैं। अत: बहुत कुछ कहना धृष्टता होगी। अब तो आप मेरे हृदय में प्रेरणा कीजिए जो मैं अनुसरण कर सुपथ अर्थात् सत पथ पर चल सकूँ यानी सहज हो सकूँ। प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।। सो करि कहउँ हिए अपने की। रूचि जागत सोवत सपने की।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी प्रभु! मुझे आपके चरण कमलों की रज, जो सत्य (सहज) सुकृत अर्थात् सुकृत्यों की प्रेरणा करने वाली व सुख की सीमा होती है, उसकी दुहाई करके अर्थात् उसके मर्म को जानकर मेरे हृदय की बात कहता हूँ, जो सोते, जागते व सपने में मेरी रूचि में रहती है। दुहाई का तात्पर्य दुहना अर्थात मर्म को जान लेने से होता है। सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वार्थ छल फल चारि बिहाई।। अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।। व्याख्या : स्वार्थ, छल, धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारफलों को छोड़कर सहज प्रेम के साथ ही स्वामी की सेवा करना चाहिये। आत्मा रूपी स्वामी की प्रेरणा के अनुसरण करने के समान कोई सेवा नहीं होती है। वही प्रेरणा रूपी प्रसाद साधक रूपी सेवक को मिल जाए। भाव-रत भरत भाव कहना चाहता है कि मेरा आत्मा में लीन होने की सेवा का सहजता रूपी प्रसाद मुझे मिल जाए। अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।। प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।। व्याख्या : ऐसा कहकर भाव रत भरत भाव प्रेम के वश में पड़कर विवश हो गया, जिससे शरीर पुलकित हो उठा और आँखों में प्रेम के आँसू आ गए। ऐसा कहकर भाव-रत भरत भाव व्याकुल होकर आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर पड़ा अर्थात् आत्मा के प्रतिपूर्ण समर्पण का भाव आ गया। उस समय के सहज प्रेम की अवस्था का वर्णन नहीं किया सकता है। कृपा सिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।। भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में कृपा के समुद्र आत्मा रूपी राम ने भाव रत भरत भाव को प्राण की तरंग (पानी) के माध्यम से सम्मान देकर अपने पास बैठा लिया अर्थात् अपने लीन करके स्थिरिता प्रदान कर दी। ध्यान की उस अवस्था में भाव-रत भरत भाव की विनयता व स्वभाव को देखकर सभी भाव सभा आत्मा रूपी राम सहित शिथिल हो गयी। छ0 रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी। मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी।। भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम, साधु समाज, मन की एकाग्रता के भाव, और प्राण रूपी जनक भाव रत भरत की बातें सुनकर प्रेम में शिथिल हो गए और मन ही मन भाव रत भरत भाव की भाव रतता (भायप) की सराहना करने लगे और भक्ति की महिमा का बखान करने लगे। ध्यान की उस अवस्था में विद्वता के भाव भी भाव रत भरत भाव की प्रशंसा करने लगे और देव भाव मन की मलीनता को छोड़कर सुमन अर्थात् अच्छे मन के भावों की वर्षा करने लगे। ध्यान की उस अवस्था में सभी भाव व्याकुल हो उठे और ऐसे सकुचा गए जैसे रात्रि के आगमन से कमल मुरझा जाता है। विषय भोग वासना के भावों के लिए आत्मा में लीन हो जाना रात्रि के समान होता है क्योंकि आत्मलीनता से विषयी कमल मुरझा जाते हैं। सो0 देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत।।301।। व्याख्या : देह भाव समाज और प्राण भाव समाज दोनों समाजों के भावों को दु:खी देखकर और नर-नाडियों को दु:खी देखकर इन्द्रियों का भोग भाव रूपी इन्द्र मलिनता को मारकर मंगल की चाह करने लगता है। इस सोरठे में ध्यान में आत्मलीनता दृढ़ होने के परिणाम को बताया गया है कि ध्यान में परिपक्वता आ जाने पर इन्द्रियों का भोग भाव रूपी इन्द्र विषयी मलीनता को छोड़कर मंगल की कामना करने लगता है। कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।। काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती।। व्याख्या : इन्द्रियों का मूल (स्वरों का मूल ही सुर राजू होता है) कपट और कुचाल की सीमा होता है। इसलिए पर अकाज अर्थात् पर यानी प्रकृति अकाज यानी वासना अर्थात् प्रकृति में वासनाओं की पूर्ति करना ही इन्द्र (इन्द्रयों के मूल) का अपना प्रिय कार्य होता है। अर्थात् जीव को विषय वासनाओं में फँसाना ही इन्द्र (इन्द्रियों के मूल) का मूल प्रिय कार्य होता है। इन्द्र भाव कौए के समान पवित्रता (सहजता) का विरोधी होता है। वह छली और मलीन होता है तथा किसी पर भी विश्वास करने वाला नहीं होता है। प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब के सिर मेला।। सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे।। व्याख्या : इसलिए इन्द्रियों के भोग भाव रूपी इन्द्र ने पहले तो कुबुद्धि अर्थात् वासना की बुद्धि पैदा कर कपट पैदा कर दिया और फिर वह कपट अर्थात वासनाओं की आसक्ति का भाव सब भावों के सिर पर डाल दिया अर्थात् सब भावों में वासनाओं के प्रति आसक्ति पैदा कर दी। आसक्ति के भाव स्वरों के माध्यम से सब भावों को प्रभावित कर दिए। परन्तु आत्मा रूपी राम के प्रति भावों का कुछ प्रेम तो बच ही गया। वास्तव में ध्यान में कई बार अचानक वासनाओं के भाव पैदा करके ध्यान को हिला देते हैं परन्तु आत्मा के प्रति प्रेम बच ही जाता है। उसी भाव अवस्था का यहाँ सूक्ष्म प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रूचि छन सदन सोहाहीं।। दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।। व्याख्या : जब स्वरों के माध्यम से माया के भाव पैदा हो जाते हैं तो भय और उच्चाट के भाव पैदा होकर मन को हिला देते हैं। जिससे क्षण में वैराग्य की अवस्था और क्षण में आसक्ति के भाव पैदा होने लगते हैं। मन की दुविधा की गति हो जाने से भाव रूपी प्रजा दु:खी हो उठती है अर्थात् भाव अशांत हो जाते हैं जैसे नदियों और समुद्र के संगम स्थान पर जल में उथल-पुथल होती है। वैसे ही भावों में उथल-पुथल होने लगती है। दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।। लखि हियँ हँसि कह कृपा निधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू।। व्याख्या : जब दो चित की अवस्था आ जाती है अर्थात् मन की दुविधा की अवस्था आ जाने पर कभी भी संतोष नहीं मिल पाता है क्योंकि एक चित अपने मरम को दूसरे चित से नहीं कहता है। इस मन की दुविधा की अवस्था को आत्मा रूपी राम दृष्टा बनकर देख पाते हैं और दुविधा की इस अवस्था को देखकर आत्मा को हँसी आने लगती है। उसी अवस्था के अनुभव का वर्णन करते हुए यहाँ लिखा गया है कि आत्मा रूपी राम मन की दुविधा की अवस्था को देखकर हँसते हैं और कहते हैं कि कुत्ता, इन्द्रिय भोग रूपी इन्द्र भाव व युवक की अवस्था भी ऐसी भी दुविधा वाली होती है। दो0 भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागि देवमाया सबहि जथा जोगु जनु पाइ।।302।। व्याख्या : जब चित में दो चित अर्थात् दो मन की अवस्था आ जाती है तो भाव रत भरत भाव, प्राण, मन की एकाग्रता के भाव, मंत्रणा छोड़कर अन्य सभी भावों को रूचि और वृति के अनुसार प्रभावित करने लग जाती है। कृपा सिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।। सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री।। व्याख्या : कृपा सिंधु आत्मा रूपी राम ने भाव रूपी लोगों को अपने प्रेम में व सुरपति अर्थात् स्वरों के मूल इन्द्रिय भोग रूपी इन्द्र भाव के माया के छल से छला हुआ दु:खी देखा। ध्यान की उस अवस्था में भाव रूपी सभा, प्राण रूपी जनक, विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ, महिसुर अर्थात् शरीर रूपी पृथ्वी के स्वर व मंत्रणा के भावों की बुद्धि को तो भाव-रत भरत की बुद्धि ने कील दिया अर्थात् ये सब तो भाव रतता का अनुसरण करने लगे। रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।। भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।। व्याख्या : सभी भाव आत्मा में लीन थे। अत: उसी अवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है कि सभी भाव आत्मा को चित्रवत देखने लगे अर्थात् आत्मलीनता में दृढ़ता आ गयी। उस अवस्था में सभी भाव आपस में सकुचाते हुए से वचन बोलते हैं। भाव-रत भरत भाव की प्रीति, नम्रता व विनय की बड़ाई सुनने में सुख देने वाली है परन्तु बोलने में अर्थात वर्णन करने में कठिन होती है। अर्थात भाव रत अवस्था का यथार्थ वर्णन नहीं किया जा सकता है। जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।। महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी।। व्याख्या : जिस भाव रत भरत भाव की भयहीन (भय अ गत उ भक्ति) अवस्था के लवलेश को देखकर मन के भाव व प्राण के भाव प्रेम में मग्न हो गए, उस भाव-रत भरत भाव की महिमा का साधक तुलसीदास कैसे वर्णन करे? उस भयहीन अवस्था को देखकर तो कवि के हृदय में सुबुद्धि हिलोरें मारने लगती है। आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।। कहि न सकति गुन रूचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अनुभूति की महिमा को बड़ी जानकर सुबुद्धि कविकुल की मर्यादा को रखते हुए सकुचा गयी अर्थात् उस अनुभूति का वर्णन नहीं कर सकी। हालाँकि उस अवस्था के गुणों के रसास्वादन की रूचि तो बहुत होती है परन्तु वर्णन नहीं हो पाता है। क्योंकि ध्यान की उस अवस्था में साधक की बुद्धि बालक के समान निर्मल हो जाती है। अत: उस अवस्था में वर्णन करने की क्षमता बुद्धि में बचती ही नहीं है। दो0 भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोर कुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।। व्याख्या : यहाँ इस दोहे में प्रतीकों का सहारा लेकर बुद्धि की अवस्था का बहुत सुन्दर वर्णन करते हुए कहा गया है कि भाव-रत भरत का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा के समान है और साधक की सुबुद्धि चकोरी है, जो साधक के हृदयरूपी निर्मल आकाश में उस निर्मल चन्द्रमा को उदित होता हुआ देख-देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती रह जाती है। तब ऐसी अवस्था में भाव-रत भरत के यश का वर्णन कौन कर सकता है? भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।। कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव का स्वभाव वेदों को भी जानने में नहीं आता है अर्थात् भाव-रत भरत भाव की पूर्ण अनुभूति भी सम्भव नहीं होती है। फिर कोई कवि कैसे चंचल बुद्धि से उसका वर्णन कर सकता है। भाव रत भरत भाव के गुणों को कहने व सुनने से कौन है, जो आत्मा व सुरता में लीन नहीं होगा? अर्थात् भाव रत भरत भाव का अनुसरण करने पर आत्म लीनता की स्थिति आ जाती है। सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को।। देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव का अनुसरण करने पर आत्मा के प्रति प्रेम नहीं पैदा हो तो उसके समान विपरीत कौन होगा? आत्मा रूपी राम सभी भावों की अन्तर्मन की बात को अच्छी तरह जानकर और सब भावों की दशा को देखकर। धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।। देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।। व्याख्या : धारणा को धारण करने वाले, धैर्यवान, नीति में चतुर, सहज, स्नेह, शील व सुख के सागर, नीति व प्रीति का पालन करने वाले आत्मा रूपी राम देश, समय व भाव रूपी समाज को देखकर। बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।। तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ऐसी वाणी बोले मानो वाणी के सर्वस्व ही थे अर्थात् आत्मा की अन्त:प्रेरणा हुई जो वाणी का भी मूल थी। वह अन्त:प्रेरणा हितकारी थी और सुनने में चन्द्रमा के समान शीतलता प्रदान करने वाली थी। आत्मा रूपी राम ने कहा कि हे तात भाव-रत भरत! तुम धारणा को धारण करने की धुरी हो और लोक व वेद के मर्म को जानकर प्रेम में पारंगत हो। दो0 करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।। व्याख्या : हे तात! मन, वचन व कर्म से तुम्हारे समान निर्मल तो तुम्ही हो। विशिष्ट ज्ञान के भावों के समाज में और कुसमय अर्थात् वासनाओं के विपरीत समय में लघु बंधु अर्थात सूक्ष्म बंधन के गुणों को कैसे कहा जा सकता है। यहाँ आत्मा प्रेरणा करके भाव-रत भरत भाव को समझाती है कि तुम तो सब प्रकार से निर्मल हो गए हो परन्तु बहुत सूक्ष्म बंधन के भाव बचे हुए हैं अर्थात् झीनी माया बची हुई है। उसका इस परम ध्यान की अवस्था में कैसे वर्णन किया जा सकता है। बिना वासना के बन्धन का वर्णन हो ही नहीं सकता है और परम ध्यान की अवस्था तो वासनाओं के लिए कुसमय होती ही है। अत: कुसमय में कैसे लघु बन्धन (झीनी) के गुणों का वर्णन हो। जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।। समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की।। व्याख्या : हे भाव-रत भरत! तुम भावों के पार होने की कुल की रीति को, सहजता की अवस्था को व चित की करणी व प्रीति को, समय को, भाव रूपी समाज की लाज अर्थात मर्यादा को विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु जन भावों को, उदासीन, हितकारी, अनहितकारी व मन के भावों को जानने वाले हो। तुम्हहिं बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।। मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।। व्याख्या : हे भाव-रत भरत भाव! तुमको तो सभी भावों के कर्म की गति पता ही है और तुम मेरे (आत्मा) हित में धारणा करने वाले हो। मुझको (आत्मा) सब प्रकार से तुम्हारा भरोसा है। परन्तु फिर भी समय व अवसर के अनुसार कुछ कहता हूँ अर्थात् समय व अवसर के अनुसार स्वत: आत्मा की प्रेरणा होने लग जाती है। तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरकुल कृपाँ सँभारी।। नत डिग्री प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।। व्याख्या : हे भाव-रत भरत भाव! चित रूपी पिता के बिना हमारी बात को तो ज्ञान रूपी गुरुकुल ने ही सम्भाल रखी है। वरना भाव रूपी प्रजा व वृति रूप कुटुम्बियों सहित परिवार व हम सब बर्बाद हो जाते अर्थात् वासनाओं में फँस जाते। जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।। तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।। व्याख्या : अगर बिना समय आए सूर्य का अस्त हो जाए तो कहिये जगत में किसको दु:ख नहीं होगा। हे तात! वैसा ही उत्पात ध्यान की क्रिया ने किया है अर्थात ध्यान की क्रिया से वासना भोग के भावों में उथल-पुथल मच गयी है। परन्तु मन की एकाग्रता भाव रूपी मुनि व प्राण के भाव रूपी मिथिलेश ने सब को बचा लिया। अर्थात् हमको वासनाओं के बंधन से बचा लिया। दो0 राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।। व्याख्या : राज्य का कार्य, लज्जा, पति धर्म, पृथ्वी, धन, घर इन सभी का पालन (रक्षण) गुरु कृपा से होने पर ही परिणाम अच्छा होता है। अर्थात् गुरु के प्रति शरणागत भाव रखने पर ही सब कार्यों का परिणाम शुभ होता है। सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।। मातु पिता गुर स्वामी निदेसू। सकल धरम धरनी धर सेसू।। व्याख्या : गुरु तत्व की कृपा ही भाव रूपी समाज सहित घर में और वन में अर्थात् भोग और वैराग्य में तुम्हारा और हमारा रक्षक होती है। माता-पिता, गुरु व स्वामी की आज्ञा का पालन ही धारणा को धारण करने में शेषजी के समान होती है। अर्थात् तभी सहजता की धारणा बन पाती है। सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।। साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।। व्याख्या : अत: हे भाव रत भरत भाव! तुम वही करो और मुझसे भी वही करवाओ और तुम आत्मसूर्य रूपी कुल के रक्षक बनो। साधक के लिए यह एक ही (ध्यान रत अवस्था) समस्त सिद्धियों को देने वाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है। इन चौपाइयों में तो स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर भाव आत्मोन्मुखी होकर सहज हो जाएँ तो वह एक अवस्था ही साधक को समस्त सिद्धियाँ, कीर्ति व सद्गति को देने वाली होकर तीनों गुणों की त्रिवेणी बन जाती है। सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवा डिग्री सुखारी।। बाँटी बिपति सबहि मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।। व्याख्या : अत: ऐसा विचार कर संकट सहकर भाव रूपी प्रजा व वृति रूपी परिवार को सुखी करो। वास्तव में ध्यान की अवस्था में जब भाव आत्मा में लीन हो जाते हैं तो जब ध्यान टूटने वाला होता है तो भाव रत भरत भाव आत्मा में ही लीन रहना चाहता है परन्तु आत्मा अन्य भावों की रूचि को देखकर भाव रत भरत भाव को अन्य भावों की रूचि को रखने की प्रेरणा करती है। उसी भाव अनुभूति को यहाँ आत्मा रूपी राम द्वारा भाव रत भरत भाव को अलग होने की प्रेरणा के प्रतीकों के रूप में समझाया गया है। इसलिए आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे भाई मेरी विपत्ति सभी ने बाँट ली है, अर्थात् वासना का आवरण भावों के निर्मल हो जाने से हट गया है, उसी को विपत्ति का बाँटना बोलकर लिखा गया है। क्योंकि आत्मा के लिए भावों की वासना के प्रति आसक्ति ही विपत्ति होती है। हे भाव रत भरत परन्तु तुमको तो देह रूपी अवध में रहते हुए वासना रूपी विपत्ति से बचे रहने में बहुत कठिनाई है। जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।। होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए। ओड़अहिं हाथ असनिहु के घाए।। व्याख्या : तुमको अर्थात भाव रत भरत भाव को कोमल जानकर भी कुसमय को देखकर अर्थात् वासनाओं के प्रभाव को देखकर कठोर वाणी कह रहा हूँ। इसमें मेरा दोष नहीं है। क्योंकि कुठायँ अर्थात् वासनाओं की आसक्ति होने पर अच्छे निर्मल भाव ही सहायता करते हैं जैसे वज्र का आघात होने पर हाथ से ही उसे रोका जाता है। उसी प्रकार भावों में आसक्ति की विपत्ति आ जाने पर भावों से ही उसे टाला जा सकता है। दो0 सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोई।।306।। व्याख्या : सेवक हाथ, पैर व नेत्रों के समान व स्वामी मुख के समान होना चाहिये। ऐसी प्रीति की रीती को सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं। सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी।। सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी वाणी, जो प्रेम रूपी समुद्र से निकले हुए अमृत में सनी हुई थी, को सुनकर भाव रूपी सभा शिथिल हो गयी। उस अवस्था में समस्त भाव रूपी समाज ही शिथिल हो गया और प्रेम रूपी समाधी लग गयी। अर्थात भाव सहज प्रेम का अनुभव करते हुए शांत हो गए। ऐसी अवस्था आ जाने पर स्वरों की गति भी थम सी जाती है। उसी को सरस्वती का चुप साधना बोलकर लिखा गया है। भरतहिं भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।। मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत भरत भाव को बहुत संतोष हुआ क्योंकि उस अवस्था में आत्मा रूपी स्वामी तो अनुकूल होता है और आसक्ति रूप दु:खों के दोष दूर हो जाते हैं। इसलिए भाव-रत भरत भाव का मुख प्रसन्न हो गया और विषयों का अंत हो गया (विष अ आद उ बिषाद यानी विषयों का अंत)। वह अवस्था तो भाव रत भरत भाव के लिए ऐसी थी जैसे गूँगे को वाणी मिल गयी हो। कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरूह जोरी।। नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।। व्याख्या : फिर भाव रत भरत भाव प्राण के माध्यम से प्रेमपूर्वक आत्मा रूपी राम से जुड़ गया और बोला कि हे नाथ! मुझे आपके सान्निध्य का सुख मिल गया है और मैंने जगत में जन्म का लाभ भी पा लिया है। अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।। सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पा डिग्री पावौं जेहि सेई।। व्याख्या : अत: हे कृपालु! अब आप वही प्रेरणा कीजिए जिसे मैं सीस पर धारण कर आदरपूर्वक करूँ। मुझे ऐसा कोई आधार प्रदान कीजिए जिसके सहारे से मैं अवधी रूपी शरीर का पार पा सकूँ। अर्थात् देह में बरतते हुए भी देह की आसक्ति में नहीं फँसू। दो0 देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।। व्याख्या : हे देव! गुरु की प्रेरणा के अनुसार आपके अभिषेक अर्थात आत्मा के अभिषेक के लिए तीनों नाड़ियों (सुष्मना, ईड़ा व पिंगला को ही तीरथ अर्थात् ती अ रथ यानी तीनों नाड़ियों रूपी रथ कहा गया है।) से निकलने वाले रसायन रूपी जल को लाया हूँ। वास्तव में ध्यान में समझ में आने लगता है कि प्रत्येक नाड़ी में भावों के अनुसार रसायन बहने लगता है और जब ध्यान की अवस्था में तीनों नाड़ियों में बहने वाले सत, रज, तम के भाव निर्मल हो जाते हैं तो नाड़ियों का संगम हो जाता है और उस संगमावस्था में जो रसायन पैदा होता है वही तीर्थों का जल कहलाता है। अत: इस दोहे में भाव रूपी भरत आत्मा से यही पूछते हैं कि इस तीर्थों के जल का अब क्या करें? एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।। कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव बोला कि मेरे मन में एक बड़ी इच्छा है जो भय व संकोच के कारण कहने में नहीं आ पा रही है। तब आत्मा रूपी राम ने कहने को कहा तो भाव रत भरत भाव आत्म प्रेरणा पाकर प्रेममय बाणी में बोला। चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।। प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ तो आवौं देखी।। व्याख्या : वास्तविकता में यह होता है कि भाव रत भरत भाव आत्मा में लीन होने पर भी चित्रकोष की नाना विभूतियों के मर्म को जानना चाहता है। भाव रत भरत भाव के मन में बहुत सूक्ष्मता से सिद्धियों की झीनी माया छुपी होती है। इसी कारण भाव रत भरत भाव को कहने में संकोच हो रहा है। आत्म प्रेरणा पाकर भरत भाव बोला कि मैं चित्रकोष की पवित्रता व तीनों गुणों के मर्म व वैराग्य रूपी वन को देखना चाहता हूँ। मैं (भाव रत भरत) इच्छा रूपी पक्षियों, मृगों, नाड़ियों रूपी नदियों, कोष रूपी तालाबों व जड़ता रूपी पर्वतों को देखना चाहता हूँ। विशेषकर उन कोश-कोशिकाओं को देखना चाहता हूँ जो आपके (आत्मा) स्पर्श से निर्मल हो गए हैं अर्था जिन पर आत्मा का प्रभाव स्पष्ट रूप से हो गया है। अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगत भय कानन चरहू।। मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि अवश्य ही तुम अत्रि ऋषि की आज्ञा का अनुसरण करके निर्भय होकर वैराग्य रूपी वन में विचरण करो। यहाँ अत्रि ऋषि का बहुत गहरा मर्म है। जब भाव एकदम निर्मल हो जाते हैं तो भावों से निकलने वाला हार्मोन इत्र की तरह सुगन्धित हो जाता है जो समस्त भावों को आनन्द देने लगता है। उसी इत्र सम हार्मोन से ही वासना व इच्छाओं का भय मिट जाता है। तभी जाकर वैराग्य रूपी वन में निर्भयता के साथ विचरण करना सम्भव हो पाता है। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। आत्मा रूपी राम कहते हैं कि अत्रि मुनि अर्थात् मन की एकाग्रता से उत्पन्न रस को प्राप्त करने से ही वैराग्य रूपी वन मंगल करने वाला बन जाता है। वही पवित्र व परम सुहावनी अवस्था होती है। रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।। सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सि डिग्री नावा।। व्याख्या : हे भाव रत भरत भाव! ऋषि नायक अर्थात् रसायनों के नायक इत्र रूपी अत्रि ऋषि जैसी प्रेरणा करें, उसी के अनुसार तीर्थों के जल को स्थापित कर देना अर्थात् उन्हीं कोश व कोशिकाओं में तीनों नाड़ियों के रस को स्थापित कर देना। आत्मा रूपी राम के वचन सुनकर भाव रत भरत भाव ने बहुत सुख पाया और प्रसन्न होते हुए इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि को सीस झुकाया अर्थात् समर्पण किया। दो0 भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वार्थी सराहि कुल बरषत सुरत डिग्री फूल।।308।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव और आत्मा रूपी राम के बीच होने वाले मंगल के मूल संवाद को सुनकर स्वर स्व अर्थ में बरतते हुए सराहना करने लगे और स्वरों के मूल कल्पना के भावों में आनन्द रूपी फूलों की वर्षा होने लगी अर्थात् अब आनन्द की उमंग उठने लग गयी। धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं।। मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव धन्य है। इन्द्रियों के स्वामी आत्मा रूपी राम की जय हो। ऐसा कहकर भाव रूपी देवता बलपूर्वक हर्षित होने लगे अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में हर्ष की अवस्था बलपूर्वक आ जाती है। उस भाव अवस्था में प्राण के भावों व प्राण रूपी जनक भी भाव रत भरत के वचनों को सुनकर उत्साह में भर जाते हैं। भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।। सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक भाव रत भरत व आत्मा रूपी राम के गुण समूहों की उत्साहपूर्वक प्रशंसा करने लगते हैं। सेवक और स्वामी दोनों का सुन्दर स्वभाव है अर्थात् परम निर्मलता की अवस्था है। इनके नियम व प्रेम पवित्रता को भी पवित्र करने वाले हैं। मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।। सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।। व्याख्या : सभी भाव अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करते हुए अनुराग से भर गए। भाव रत भरत भाव व आत्मा रूपी राम के संवाद को सुन-सुनकर देह भाव समाज व प्राण भाव समाज के हृदय में हर्ष छा गया और विषयों की आसक्ति मिट गयी। राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधी रानी।। एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुष्मना रूपी कौशल्या ने सुख-दु:खों को एक समान जानकर आत्मा रूपी राम के गुणों का वर्णन करते हुए नाड़ियों रूपी रानियों को धैर्य बँधाया। उस अवस्था में कुछ भाव आत्मा की बड़ाई करने लगते हैं तो कुछ भाव भाव रत भरत के अच्छेपन की सराहना करने लगते हैं। दो0 अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।। व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में तब इत्र रूपी अत्रि ऋषि ने भाव रत भरत से कहा कि चित्रकोष रूपी पर्वत के पास सुकूप अर्थात अच्छे निर्मल भावों का कोश है। अत: उसी कोश में तीरथ यानी तीन गुण व तीनों नाड़ियों से निकलने वाले रस रूपी जल को रख दीजिए। वह कोश परम पवित्र व अमृत के समान अनुपम है। भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।। व्याख्या : इत्र रस रूप अत्रि ऋषि की प्रेरणा पाकर भाव रत भरत भाव ने तीर्थों के जल के पात्र रवाना कर दिए अर्थात् तीनों नाड़ियों और गुणों से निकलने वाले रस को अनुपम कोश में भेज दिया और फिर शत्रुघन भाव, इत्र रस रूप अत्रि ऋषि व साधना के भावों सहित आप स्वयं उस अगाध अनुपम कूप के लिए चल दिए। पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में वह पवित्र जल उस पवित्र कूप में समा गया। तब प्रसन्न होकर इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि ने कहा कि हे तात! यह कूप स्थल अनादि सिद्ध स्थल है। यह काल क्रम से लोप हो गया था इसलिए किसी को मालूम नहीं है। वास्तव में यह कोश सिद्ध स्थल होता है इसलिए जब ध्यान की विधि द्वारा उस कोश में पहुँचा जाता है तो स्वत: साधक की सिद्ध अवस्था आ जाती है। यही सिद्ध अवस्था का कोश होता अनादि काल से ही है परन्तु विषयों के प्रभाव के कारण जीव इसे भूल जाता है। तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव रत भरत भाव के अनुगामी भावों ने जब वह सिद्ध कोश रूपी स्थान देखा तो उस समय सुजल (शुभ रसायन) के लिए विशेष कुआँ बन गया अर्थात वह सुजल सिद्ध कोश में समा गया। ध्यान की इस क्रिया के द्वारा इस प्रकार समस्त भावों का ही उपकार हो गया जो धारणा करने में अगम्य थी वह धारण अब सुगम हो गयी। भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जलजोगा।। प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।। व्याख्या : अब इस कूप को भाव-रत भरत कूप कहेंगे। यह स्थल परम पवित्र व तीर्थों के जल का संगम स्थल हो गया है। जो जीव प्रेम व नियम से इस जल में स्नान करेंगे, वे मन, वचन, कर्म से निर्मल हो जायेंगे। अर्थात् ध्यान में इस कोश का रसास्वादन करने पर पर सहज अवस्था आ जायेगी। दो0 कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।। व्याख्या : सिद्ध कोश रूपी कूप की महिमा का गुणगान करते हुए सभी भाव आत्मा रूपी राम के पास गए। तब इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि ने सिद्ध कोश रूपी तीर्थ के पुन्य प्रभाव का वर्णन आत्मा रूपी राम को सुनाया। कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भो डिग्री निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।। व्याख्या : तब ध्यान की उस परम अवस्था में धारणा के प्रेम के इतिहास का वर्णन करते हुए अज्ञान रूपी रात्रि सुख पूर्वक बीत गयी और ज्ञान रूपी सवेरा हो गया। तब भाव-रत भरत व कामादि नाशक शत्रुघ्न भाव रूपी भाईयों ने नित्य क्रिया करके अर्थात सहज होकर आत्मा रूपी राम, इत्र रस रूपी ऋषि व विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की आज्ञा ली अर्थात् प्रेरणा प्राप्त की। सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।। व्याख्या : समस्त भाव रूपी समाज सहित सहज होकर निष्काम भाव से आत्मा रूपी राम के वैराग्य रूपी वन में भ्रमण करने को चले। उस कोमल सहज अवस्था में सभी भाव बिना इच्छा के ही चले जा रहे थे, इसलिए मन का विस्तार सकुचा गया और भाव भूमि निर्मल हो गयी। कुस कंटक काँकरी कुराई। कटुक कठोर कुबस्तु दुराई।। महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।। व्याख्या : ध्यान की उस सुखद अवस्था में इच्छा व वासना रूपी कुश, काँटे, कंकड़, दरारें आदि कड़वी व कठोर जड़ता मिट गयी और भावों की भूमि निर्मल होकर मधुर मार्ग तैयार कर दी अर्थात् जड़ता मिट गयी और सहजता पैदा हो गयी। उस अवस्था में तीनों गुणों की त्रिविध बहने वाली वायु सुखद हो गयी अर्थात् गुणों की निर्मलता की अवस्था आ गयी। सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।। व्याख्या : ध्यान में जब गुणों की सहज अवस्था आ जाती है तब सुमन अर्थात् मन में स्वरों के माध्यम से अच्छे निर्मल भावों की वर्षा होने लग जाती है। उसी अवस्था को सु अ मन उ अच्छे मन के भावों की वर्षा होना बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में इच्छा रूपी मृगों को देखकर भाव रूपी पक्षी भी निर्मलता रूपी वाणी बोलने लगते हैं और सभी भाव आत्मा रूपी राम को प्रिय जानकर सेवा करने लगते हैं अर्थात् सभी भाव आत्मा में लीन होने लगते हैं। दो0 सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रानप्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।। व्याख्या : सहज होकर आलस्य से भी आत्मा रूपी राम का नाम लेने से अर्थात आत्मा में लीन होने से समस्त सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। तब भाव रत भरत भाव जो कि आत्मा रूपी राम को प्राणों से भी प्यारा होता है, उसके लिए सिद्धियों की प्राप्ति हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अर्थात् भाव रत अवस्था में सिद्धियों की प्राप्ति कोई बड़ी बात नहीं होती है। एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग त डिग्री तृन गिरि बन बागा।। व्याख्या : इस प्रकार ध्यान की अवस्था में भाव रत भरत भाव वैराग्य रूपी वन में भ्रमण करने लगता है। भाव- रत भरत भाव के प्रेम के नियम को देखकर मन की एकाग्रता के भाव भी सकुचाने लगते हैं अर्थात् मन सूक्ष्म होने लगता है। ध्यान की उस अवस्था में पवित्र रस रूपी जलाशय अर्थात पवित्र हार्मोन का नाड़ियों, कोश व कोशिकाओं से स्राव होने लगता है। उस अवस्था में भाव भूमि के नाना भाव, इच्छा, वासना, भोग भावना, जड़ता, वैराग्यता व आनन्द रूपी वन व बगीचे। चा डिग्री बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।। व्याख्या : सभी को विशेष रूप से सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भाव रत भरत भाव पूछते हैं और भाव रत भरत भाव का प्रश्न सुनकर इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि प्रसन्न होकर सबके नाम, गुण और पुण्य के प्रभाव को बताते हैं। अर्थात् ध्यान में इत्र के समान रस के स्राव होने पर उस रस के प्रभाव से सब भावों के गुण धर्म समझ में आ जाते हैं और गुणों के प्रभाव का मर्म भी समझ में आ जाता है। कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।। कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।। व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में भाव-रत भरत भाव कहीं तो आनन्द रूपी जल में स्नान करता है। कहीं प्राण के माध्यम से आत्मा से जुड़ जाते हैं तो कहीं सुन्दर स्थानों को देखकर मन को विश्राम देते हैं। कहीं पर इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और सुरता, आत्मा व लखन भावों का स्मरण करने लगते हैं। देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।। फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के प्रेम व आत्मा में लीनता को देखकर प्रसन्न होकर वैराग्य रूपी वन के भाव आशीर्वाद देने लगते हैं। इस प्रकार वैराग्य रूपी वन को देखते हुए अढ़ाई पहर दिन निकल गया अर्थात् दृढ़ ज्ञान की अनुभूति हो गयी। तब भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम के पास आ गए अर्थात् आत्मा में लीनता बढ़ गयी। दो0 देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव ने पाँच दिनों में अर्थात् पंच भूतों के शरीर में समस्त कोश-कोशिकाओं के तीनों गुणों के मर्म को समझ लिया। इस प्रकार माया के हरण करने वाले (हरि) और माया का हरण हो जाने की अवस्था (हर) का वर्णन करते-करते ज्ञान रूपी दिन ढल गया और संध्या का समय हो गया। सब समय ज्ञान की एक अवस्था नहीं रह पाती है। अत: ज्ञान की घटती-बढ़ती अवस्था को ही सुबह, शाम, दिन व रात के प्रतीकों का सहारा लेकर ही लिखा गया है। भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।। व्याख्या : सुबह स्नान करके अर्थात् ध्यान में पुन: नव स्फूर्ति आने पर पुन: समस्त भाव रूपी समाज, प्राण रूपी जनक, देह के स्वर (भूमि अ सुर उ देह के स्वर) व भाव रत भरत भाव इकट्ठे हो गए। ऐसी सुखद व निर्मल भाव अवस्था को जानकर आत्मा रूपी राम मन में संकोच करते हैं। गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामी सँकोची।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु, भाव रत भरत व प्राण रूपी जनक भावों की भाव रूपी सभा को देखा तो संकोच करते हुए पुन: देह (पृथ्वी) रूपी पृथ्वी की तरफ देखने लगे। वास्तव में ध्यान में जब भावों की निर्मलता आ जाती है तो आत्मा संकोच करने लगती है अर्थात् परमात्मा में स्थिर होने लगती है जिससे भावों का विस्तार रूक जाता है। उसी को संकोच करना बताया गया है। परन्तु फिर भी देह का आभास बीच-बीच में उठता रहता है। उसी को आत्मा का पुन: देह रूपी पृथ्वी को देखना बोलकर लिखा गया है। आत्मा की ऐसी शीलता को देखकर सभी भाव सोचने लगते हैं कि आत्मा रूपी स्वामी के समान दूसरा कोई संकोच करने वाला नहीं होता है। भरत सुजान राम रूख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखी नाथ सकल रूचि मोरी।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव ने आत्मा रूपी राम का रूख देखा और प्रेमपूर्वक उठकर व विशेष धैर्य धारण करते हुए आत्मा के प्रति पूर्ण समर्पण करते हुए कहने लगा कि हे नाथ! आपने मेरी सब रूचि को रखा है। मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।। अब गोसाईं मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव बोले कि हे नाथ! आपने मेरे लिए बहुत कष्ट सहे हैं और सभी भावों को भी कष्ट हुआ है। वास्तव में भाव की लीनता के अनुसार ही आत्मा को सुख-दु:ख का आभास होता है। इसलिए ही भाव रत भरत भाव यही कहते हैं कि आपने मेरे कारण बहुत दु:ख पाए हैं। हे इन्द्रियों को वश में करने वाले! अब मुझे प्रेरणा कीजिए जिससे मैं अवधी रूपी शरीर में बरतता हुआ भी आत्मा में लीन रह सकूँ। दो0 जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।। व्याख्या : हे नाथ! मुझे ऐसी प्रेरणा कीजिए कि मैं अवधी रूपी शरीर में चौदह वर्ष अर्थात् दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार में बरतता हुआ भी पुन: आत्मा के दर्शन कर सकूँ अर्थात् पुन: आत्मोन्मुखी हो सकूँ ऐसी प्रेरणा कीजिए। पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं।। राउर बदि भल भव दु:ख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।। व्याख्या : हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्ध से सभी भाव रूपी प्रजा व वृति रूपी कुटुम्बि पवित्रता व रस (आनन्द) से युक्त हैं। आत्मा के लिए भावों के दु:ख में जलना भी अच्छा होता है और आत्मा के बिना मोक्ष का पद भी व्यर्थ होता है। अर्थात् सांसारिक सुख-दु:ख व मोक्ष आदि का आत्मा के बिना कोई सार नहीं होता है। स्वामि सुजानु जानि सबही की। रूचि लालसा रहनि जन जी की।। प्रनतुपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।। व्याख्या : इन चौपाइयों में आत्मा की विशेषताओं का वर्णन किया गया है कि हे आत्मा रूपी स्वामी! आप सब भावों के अंदर की बात को अच्छी तरह जानने वाले हैं और भाव रतता के अनुसार भावों की रूचि को रखने वाले हैं। आप सभी भावों को प्राण के माध्यम से पालते हो और प्राण के साथ दोनों दिशाओं में उनका निर्वाह करते हो। अर्थात् संसार व परमात्मा में दोनों तरफ को भावों की रूचि के अनुसार भावों की रक्षा करते हो। अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचा डिग्री न सोचु खरो सो।। आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि मुझे इस प्रकार आत्मा पर बहुत बड़ा भरोसा है तथा विचार करने पर तिनके के बराबर भी सोच नहीं रह जाता है। भाव रत भाव कहता है कि मेरी दीनता अर्थात् समर्पण व आत्मा की कृपा ने मिलकर मुझे इस धारणा में दृढ़ कर दिया है। यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।। भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव कहता है कि मेरे इस दोष को दूर करके अर्थात् दृढ़ता को दूर करके संकोच को छोड़कर मुझे प्रेरणा दीजिए अर्थात् ऐसी प्रेरणा करो जिससे मैं अब देह भावों में सहजतापूर्वक बरत सकूँ। देह भावों में जब तक भाव बरत नहीं सकते जब तक आत्मा में लीनता में दृढ़ता बनी रहती है। अत: भाव-रत भरत भाव आत्मा से यही विनती करता है कि मेरे दृढ़ता के दोष को दूर कीजिए वरना देह भावों में बरतना सम्भव नहीं होगा। भाव रत भरत की दूध व पानी को अलग करने वाली हंसनी जैसी मति की गति को देखकर सभी भाव रूपी समाज सराहना करने लगे। वास्तव में जब ध्यान उतरने लगता है तब जो भावों में अलाप होता है, उसी भाव अवस्था का यहाँ सूक्ष्म प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। दो0 दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देसकाल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम भाव रत भरत भाव के निश्छल (सहज) वचनों को सुनकर देश व काल के अनुसार आनन्द देने वाले वचन बोले। तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।। माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।। व्याख्या : इन चौपाइयों में बहुत गहरा साधना का रहस्य़ छुपा हुआ है। आत्मा रूपी राम समझाने के लिए कहते हैं कि हे तात! आत्मा (मेरी), भाव रतता, (तुम्हारी), भाव रूपी प्रजा (परिजन), घर व वन अर्थात् आसक्ति और वैराग्य सब की चिन्ता विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और प्राण रूपी राजा जनक को होती है। इसलिए जब तक हमारे सिर पर पर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु व विशुद्ध प्राण रूपी जनक राजा हैं, तब तक हमें सपने में भी दु:ख नहीं हो सकता है। अर्थात् जब तक विशिष्ट ज्ञान व निर्मल प्राण बने रहते हैं, तब तक आत्मा व भाव रतता व अन्य भावों को कोई कष्ट हो ही नहीं सकता है। मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।। पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।। व्याख्या : मेरा (आत्मा) और और तुम्हारा (भाव रतता) तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, व परमार्थ की धारणा इसी में सम्भव है कि हम दोनों भाई चित रूपी पिता की प्रेरणा का अनुसरण करें। उसी से लोक व वेद दोनों में चित रूपी राजा की भलाई होगी। गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।। अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।। व्याख्या : हे तात! गुरु, माता, पिता व स्वामी की आज्ञा का पालन करने पर कुमार्ग पर चलने पर भी पैर गड्ढ़े में नहीं पड़ता है। अत: ऐसा विचारकर तुम सहज होकर देह रूपी अवध में जाकर चौदह वर्ष (अर्थात् दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार) की अवधी का पालन करो। अर्थात् अन्त: गुरु व चित की प्रेरणा के अनुसार देह भावों में बरतो। देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरूभारू।। तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।। व्याख्या : हे तात्! देश, कोश, भाव रूपी प्राण व परिवार की जिम्मेदारी तो गुरु के चरणों की रज पर है अर्थात् गुरु चरण रज ही देश व काल के अनुसार भावों को पैदा करती है। इसलिए हे भाव-रत भरत भाव! तुम नाड़ियों रूपी माताओं, मन की एकाग्रता के भाव व मंत्रणा के भावों की प्रेरणा के अनुसार ही भाव भूमि रूपी पृथ्वी, भाव रूपी प्रजा व राजधानी का पालन करना। दो0 मुखिआ मुखु सो चाहिए खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकलअँग तुलसी सहित बिबेक।।315।। व्याख्या : मुखिया मुख के समान चाहिए, जो खाने-पीने में तो एक होता है, परन्तु विवेकपूर्ण समस्त अंगों का पालन-पोषण करता है। राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माँह मनोरथ गोई।। बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु आधार मन तोषु न साँती।। व्याख्या : राज धर्म का सब सार इतना ही होता है जैसे मन के अन्दर मन की वृतियाँ छुपी रहती हैं। अर्थात् भाव की प्रधानता का सार इतना ही होता है कि भाव रतता के अनुसार ही प्रधान्यता को प्राप्त करता है। इस प्रकार आत्मा रूपी राम ने भाव रत रूपी भरत भाव को नाना प्रकार से समझाया परन्तु बिना किसी अवलम्बन के भाव रत भरत भाव को शान्ति व संतोष नहीं मिला। भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू।। प्रभु करि कृपा पाँवरी दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्ही।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के शील व विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु व मंत्रणा के भाव समाज को देखकर आत्मा रूपी राम संकोच व प्रेम के वश में पड़कर विवश हो गए। तब आत्मा रूपी राम ने कृपा करके पाँवरी अर्थात् प्राण की तरंगे छोड़ी जिन्हें भाव-रत भरत भाव ने प्रेरणा स्वरूप सिर पर आदरपूर्वक धारण कर लिया। चरनपीठ करूनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।। संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के।। व्याख्या : आत्मा रूपी करूणानिधान के प्राणों की तरंग मानों भाव रूपी प्रजा की रक्षा के लिए पहरेदार के समान है। वे तरंगे मानो भाव-रत भरत भाव के प्रेम रूपी रतन को रखने के लिए डिब्बे के समान हैं और जीव के कल्याण के लिए मानो राम नाम के दो अक्षर हैं। इन चौपाइयों में बहुत गहरी अनुभूति छुपी हुई है। वास्तव में आत्मा से उठने वाली तरंगें ही भावों को पैदा करती हैं और वे तरंगे ही रकार मकार की गति धारण करके राम शब्द की वाणी बनते हैं। उन्हीं तरंगों से भाव पैदा होकर पुन: भाव पैदा करते रहते हैं। इस प्रकार भावों से भाव बनकर भव सागर बन जाता है। कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के।। भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें।। व्याख्या : भाव रूपी कुल की रक्षा करने के लिए प्राण की तरंगें रूपी चरण पादुकाएँ किवाड़ों के समान होती हैं और कुशलतापूर्वक कर्म करने के लिए हाथों के समान होती हैं। सेवा की धारणा के लिए विशुद्ध दृष्टि के समान होती है। इसलिए भाव रत रूपी भरत भाव प्राण की तरंगों रूपी चरण पादुकाओं का आधार पाकर बहुत प्रसन्न हो गए, मानो सुरता व आत्मा ही मिल गए हों। दो0 मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअसव डिग्री पाइ।।316।। व्याख्या : ध्यान की एक रस अवस्था सदा नहीं रह पाती है। अत: इस दोहे में ध्यान उतरते समय भावों की दशा का वर्णन किया गया है। इस दोहे में बताया गया है कि जब भाव रत भाव आत्मा की प्रेरणा से देहभाव में बरतने के लिए चलने लगता है तो जो अनुभूति होती है। उसी को यहाँ लिखा गया है। भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम से विदा माँगते हैं तो आत्मा रूपी राम भाव रत भरत भाव को हृदय से लगा लेती है। परन्तु अलग होने की प्रेरणा से अमरपति अर्थात् इन्द्रियों के भोग रूपी इन्द्र भाव सभी भावों में उच्चाटन पैदा कर देता है और सभी भाव उस अवस्था में अपनी सहज अवस्था में लौटना चाहने लगते हैं। कुछ भोग भाव वासना व भोगों में लौट जाना चाहते हैं। उसी वासना व भोग की चाह को कुटिल व कुअवसर के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।। नत डिग्री लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में उच्चाट की कुचाल भी सब भावों के लिए हितकारी हो गयी। क्योंकि अवधी रूपी शरीर के भोगों की आशा ही भावों के लिए उस समय संजीवनी के समान हो गयी। वरना भोगों की आशा अगर नहीं होती तो सब भाव लखन भाव, सुरता व आत्मा के वियोग में घबरा कर मर ही जाते हैं। रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद मोहारी।। भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा ने ही सब उलझनें मिटा दी। जो गुणों और भावों की सेना लुटने आयी थी वह रक्षक बन गयी अर्थात् जो भाव ध्यान में लीन होने के लिए आए थे अर्थात् वही भावों की सेना भोग आदि की प्रेरणा करके भावों की रक्षक बन गयी। ऐसी अवस्था में आत्मा रूपी राम भाव- रत भरत भाई से भुजा करके मिलने लगते हैं तो उस अवस्था के आत्म प्रेम के रस का वर्णन नहीं किया जा सकता है। तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।। बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में तन व मन में अनुराग पैदा हो जाता है और धैर्य को धारण करने वाली आत्मा भी धैर्य का त्याग कर देती है जिससे कमल रूपी नेत्रों में पानी आ जाता है। जिसे देखकर भावरुपी देवता भी दु:खी हो जाते हैं। भाव रूपी देवताओं के दु:खी होने का कारण यह है कि प्रेम व अनुराग को देखकर तो वे आत्मा से वियोग नहीं चाहते हैं परन्तु भोग भावों के कारण वियोग लेना चाहते हैं। यह दुविधा ही देव रूपी भावों के दु:ख का कारण होती है। मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।। जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।। व्याख्या : मन की एकाग्रता के भाव, विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु, धैर्यवान प्राण रूपी जनक जिन्होंने अपने मनों को ज्ञान रूपी अग्नि में सोने के समान कसा हुआ था। जिनको विधि (क्रिया) द्वारा निर्लेप अवस्था प्राप्त हो चुकी थी और वे जागतिक व्यवहार में जल में कमल के पत्तों के समान निर्लेप थे। दो0 तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार। भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।। व्याख्या : वे भाव भी आत्मा व भाव-रत भरत भाव की अनुपम व अपार प्रीति को देखकर वैराग्य के भावों सहित मन, वचन व कर्म से मग्न हो गए। जहाँ जनक गुर गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।। बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्राण रूपी जनक और विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की बुद्धि की गति भी कुण्ठित हो जाती है। उस दिव्य अवस्था के प्रेम को प्राकृत (लौकिक) कहने में बड़ा दोष है। आत्मा रूपी राम और भाव-रत भरत भाव के वियोग का वर्णन करने पर लोग कवि को कठोर हृदय समझेंगे। अर्थात् आत्मा व भाव रतता के वियोग का वर्णन करना वास्तव में बहुत कठिन कार्य है। उस अवस्था को तो अनुभव किया जा सकता है। सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।। भेंटि भरतु रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदबनु हरषि हियँ लाए।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था का वह संकोच रस अकथनीय होता है। साधक की वाणी उस समय की अवस्था को देखकर सकुचा जाती है। तब आत्मा रूपी राम ने भाव रत भरत भाव से मिलकर उसको समझाया। फिर हर्षित होकर कामादि भावों का दमन करने वाले शत्रुघन भाव को हृदय से लगा लिया। सेवक सचिव भरत रूख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।। सुनि दारून दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा।। व्याख्या : तब सेवक भाव व मंत्रणा के भाव भाव-रत भरत भाव का रूख देखकर अपनी सहज अवस्था में आ गए। तब वियोग की अवस्था आती देखकर देह भाव व प्राण भाव समाजों को बहुत दु:ख हुआ। तब दोनों भाव-समाज चलने की तैयारी करने लगे अर्थात् देह भाव व प्राण भाव आत्मा से विलग होने की तैयारी करने लगे। प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।। मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।। व्याख्या : इन चौपाइयों में ध्यान की उस अवस्था का वर्णन किया गया है जिसमें भाव-रत भरत भाव व शत्रुघन भाव चित्रकोश से देह नगर में आने लगते हैं। उसी अवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है कि दोनों भाइयों ने आत्मा रूपी राम के चरण कमलों में सीस झुकाकर आत्मा की प्रेरणा के अनुसार प्रस्थान किया। मन के एकाग्रता के भाव, तपस्वी व वैराग्य रूपी वन के भावों को बार-बार सम्मान दिया और उनकी विनती की। दो0 लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि। चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।। व्याख्या : फिर लखन भाव से प्राण के माध्यम से मिलकर व सुरता रूपी सीता के चरणों की धूल को सिर पर धारण करके अर्थात् सुरता में अपनी उर्ध्वगामी वृति लगाकर आशीर्वाद जो सब मंगल का मूल था, सुनकर प्रेम सहित चले। सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।। देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।। व्याख्या : तब लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम ने प्राण रूपी जनक को सीस झुकाया और बहुत प्रकार से विनय और बड़ाई की अर्थात् पूर्ण रूप से समर्पण करते हुए कहा कि हे देव! आपने बहुत दया की है और हमारे लिए बहुत दु:ख भी सहे हैं कि आप समस्त भाव समाज सहित वैराग्य रूपी वन में आए हैं। पुर पगु धारअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।। मुनि महिदेव साधु सनमाने। विदा किए हरि हर सम जाने।। व्याख्या : अब आप आशीर्वाद देकर देह रूपी नगर को पधारिए। तब प्राण रूपी जनक ने धैर्य धारण किया और प्रस्थान कर दिया। तब मन की एकाग्रता के भावों, देह भावों व साधना के भावोंे को भी सम्मान देकर माया के हरण करने वाले व माया हरण की अवस्था वाले जानकर विदा किया। सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।। कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।। व्याख्या : तब लखन भाव व आत्मा रूपी राम दोनों दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना के पास गए और चरणों की वन्दना करके अर्थात् सहज समर्पण करके आशीर्वाद अर्थात बल प्राप्त किया। फिर कोशिकाओं से उत्पन्न विश्व मैत्री रूपी विश्वामित्र भाव, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरण वाले कुटुम्बि, नगरवासी और सुमंत्रणा रूपी भावों। जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।। नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।। व्याख्या : सबको लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम ने यथायोग्य सम्मान देकर विदा किया। आत्मा रूपी राम ने छोटे, मध्यम व बड़े सभी श्रेणी के भावों को सम्मान देकर लौटाया। अर्थात् चित्रकोश में आने वाले सत, रज व तम गुणों के सब भावों को लौटा दिया। दो0 भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि। बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने रजोवृति रूपी भाव रत भरत भाव की माता कैकयी की चरण वन्दना करके निश्छल प्रेम के साथ मिल भेंटकर उनके सारे संकोच और सोच को मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया। परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।। करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम से पवित्र प्रेम करने वाली सुरता रूपी सीता कुटुम्बियों, दिव्यता रूपी माता व प्राण रूपी पिता से मिलकर, आत्मा रूपी राम के साथ लौट आयी। फिर प्राण के माध्यम से सब नाड़ियों रूपी सासुओं से मिली। उस अवस्था के प्रेम का वर्णन करने के लिए साधक कवि के हृदय में उत्साह नहीं होता है। सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई।। रघुपति पटु पालकी मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता दिव्यता रूपी माता व प्राण रूपी पिता तथा नाड़ियों रूपी सासुओं का आशीर्वाद अर्थात् बल पाकर दोनों ओर की प्रीति में समा गयी। फिर आत्म रूपी राम ने प्रेरणा रूपी पालकियाँ मँगवायी और प्रेरित करके नाड़ियों रूपी माताओं को चढ़ा दिया। बार बार हिलि मिलि दुहु भाईं। सम सनेहँ जननीं पहुँचाईं।। साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।। व्याख्या : दोनों भाईयों अर्थात् आत्मा व लखन भाव ने बार-बार मिलकर नाड़ियों रूपी माताओं को पहुँचाया। तब भाव रत भरत भाव और प्राण रूपी जनक ने इच्छाओं रूपी हाथियों और मन रूपी घोड़ों व भाव रूपी नाना वाहनों को सजाकर प्रस्थान किया। अर्थात् अब ध्यान में भाव रत भाव और प्राण के भाव-आत्मा से विलग होकर देह नगर के लिए प्रस्थान किए। हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।। बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें।। व्याख्या : जब ध्यान उतरने लगता है और देह भाव व प्राण के भाव देहाभास करने लगते हैं तो भी उन सब भावों की लगन सुरता, आत्मा व लखन भाव में लगी रहती है। उस अवस्था में मन के भाव रूपी घोड़े व इच्छाओं रूपी हाथी भी हृदय में हार मानकर देहाभास करने लगते हैं। निरन्तर आत्मा में लीन नहीं रह पाना ही हृदय में हार मानना बताया गया है। ध्यान की ऐसी अवस्था में सब भाव परबस अर्थात् प्रकृति के वश में होकर मन को मारकर चले जा रहे होते हैं। वास्तव में ध्यान की अवस्था में भावों का मन तो आत्मा में लीन रहना चाहता है परन्तु भावों की प्रकृति उन्हें जबरदस्ती ध्यान से बाहर लाकर देहाभास कराने लगती है। उसी अवस्था को ""परबस मन मारें"" बोलकर लिखा गया है। दो0 गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत। फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।320।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और उर्ध्वगामी रूपी गुरु पत्नी अरून्धती के चरणों की वन्दना करके अर्थात् पूर्ण समर्पण करते हुए आत्मा रूपी राम, सुरता रूपी सीता और लखन भाव रूपी लक्ष्मण हर्ष और विषाद (विषाद का तात्पर्य विषयों के अन्त की अवस्था) के साथ प्राण कोश रूपी घर में लौट आए अर्थात् आत्मा सुरता व लखन भाव सहित चित्रकूट रूपी प्राण कोश में स्थिर हो गए। बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।। कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने प्राणकोश में स्थिर होकर निषेध भाव रूपी निषाद को भी सम्मान पूर्वक विदा कर दिया। तब निषेध भाव भी बहुत विरह और विषाद के साथ चला गया। वैराग्य रूपी वन की कोल-किरात रूपी सहज इच्छाओं के भाव भी आत्मा रूपी राम की वन्दना करके लौट गए। जब आत्मा प्राणकोश में स्थिर हो जाती है तो सब इच्छाओं के भाव व निषेध भाव सब आत्मा से विलग हो जाते हैं। उसी भाव अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।। भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।। व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में समझ में आता है कि आत्मा परमात्मा के ध्यान में दृढ़ हो गयी है। ध्यान की दृढ़ता को ही वटवृक्ष की छाया कहा गया है। ध्यान की उस अवस्था में सुरता व लखन भाव भी आत्मा के साथ ध्यान में दृढ़ हो जाते हैं। उस अवस्था में आत्मा, सुरता व लखन भाव को विशुद्ध रूप से जानने में आ जाता है कि भाव रूपी प्रिय परिवार व कुटुम्बियों से विलग अवस्था आ गयी है। बिलखाहीं का मतलब वि अ लखहिं अर्थात् विशुद्ध रूप से किसी मर्म को जान लेना है। आत्मा रूपी राम उस अवस्था में भाव रतता के प्रेम को बोलकर सुरता व लखन भाव को समझाने का प्रयास करते हैं। प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।। तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने प्रेम के वश में होकर भाव रत भरत भाव के प्रेम की मन, वचन व कर्म की प्रीति तथा विश्वास का स्वयं वर्णन किया। उस अवस्था को देखकर चित्र कोष रूपी चित्रकूट के सभी पक्षी, पशु और जल की मछलियाँ, जड़ व चेतन जीव सब उदास हो गए अर्थात उनकी समस्त वासनाएँ मिट गयी जिससे सहज उदासी आ गयी। बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।। व्याख्या : देव भावों ने तब आत्मा रूपी राम की ध्यानस्थ अवस्था को देखा तो सुमन अर्थात् सद्भावों की वर्षा होने लग जाती है और उस अवस्था में प्रत्येक भाव का मर्म समझ में आ जाता है। तब आत्मा रूपी राम सभी देव भावों को परमात्मा की सत्ता का विश्वास करा देती है। जिससे सभी देव भाव प्रसन्न होकर निर्भय होकर लौट जाते हैं। दो0 सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।। व्याख्या : जब आत्मा प्राणकोश में ध्यान में स्थिर हो जाती है तो सुरता व लखन भाव भी स्थिर हो जाते हैं जिससे भक्ति, ज्ञान व वैराग्य पैदा हो जाते हैं और साधक को ऐसे लगने लगता है जैसे मानों ज्ञान, भक्ति व वैराग्य ने शरीर ही धारण कर लिया हो। मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।। व्याख्या : ध्यान में आत्मा तो प्राणकोश में ध्यान मग्न हो जाती है तो दूसरी तरफ भाव रत भरत भाव, मनकी एकाग्रता के भाव, महिसुर अर्थात् देह के स्वर व प्राण रूपी राजा सब आत्म विरह मे देह नगर की तरफ चले जा रहे होते हैं। वे सब भाव आत्मा के गुणों का मनन करते हुए चुपचाप देह नगर रूपी अयोध्या के रास्ते चले जाते हैं। इन चौपाइयों में बहुत ही सूक्ष्म अनुभूति का वर्णन किया गया है। वास्तव में यह अवस्था तब आती है जब आत्मा प्राणकोश में स्थिर होकर परमात्मा में लीन होने के लिए स्थिर होने लगती है और ज्ञान, त्याग व मन के भाव देहाभास करने लगते हैं। जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बास डिग्री बिनु भोजन गयऊ।। उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।। व्याख्या : देह व प्राण के भाव ध्यान में उतरते हुए ईड़ा नाड़ी को पार कर वापस देह नगर रूपी अयोध्या की तरफ बढ़ते हैं। उस अवस्था में देह भावों व प्राण के भावों को वासना रूपी भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसलिए उस ज्ञान रूपी दिन में सब भाव बिना वासना रूपी भोजन के ही रहे। दूसरे दिन देवसरि नाड़ी रूपी गंगा को पार करके श्रृंगबेरपुर रूपी कोश में देह भाव व प्राण के भाव पहुँच गए। जहाँ पर आत्मा के सखा निषेध भाव रूपी निषाद ने सहजता रूपी प्रबन्ध की सब व्यवस्था कर दी। सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।। व्याख्या : फिर सब भावों ने सई रूपी सहजता को पार करके गोमती अर्थात् इन्द्रिय बुद्धि का आभास किया। फिर इन्द्रिय आभास होने के बाद देह रूपी नगर में सब भावों ने प्रवेश किया अर्थात देह बुद्धि से देह का आभास हुआ। प्राण रूपी राजा चार दिन अयोध्या में रहे अर्थात् प्राण रूपी जनक सत, रज, तम व गुणातीत अवस्था को समझाने के लिए देह रूपी अयोध्या में रहे। राज काज एवं सब भाव रूपी साज सामान को सँभालकर। इन चौपाइयों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। वास्तव में जब सब भावों को देहाभास होने लग जाता है तो ध्यान की अवस्था में प्राण भी देह में संचरित होकर सब भावों के मर्म को समझाकर धीरे-धीरे श्वास बनकर रह जाता है। विशुद्ध प्राण की अवस्था देह भावों में बरतने पर थोड़े समय ही रह पाती है। परन्तु मन के भावों में विशुद्ध प्राण का महत्व बना रहता है इसलिए ही तो प्राण रूपी जनक को मिथिला लौट जाना बोलकर लिखा है। सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।। नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।। व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक सुमंत्रणा के भावों, ज्ञान रूपी गुरु भावों व भाव रत भाव को देह नगर रूपी अयोध्या का राज सौंपकर तुरीया अवस्था में चले गए। तब देह रूपी नगर की नर-नाड़ियाँ विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रेरणा के अनुसार सुख पूर्वक अर्थात् सहज होकर आत्मा रूपी राम की देह नगर रूपी राजधानी में रहने लगे। दो0 राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि की आस।।322।। व्याख्या : ध्यान में जब भाव देहाभास करते हैं तो यह अवस्था पूर्णत: भिन्न होती है। क्योंकि अब सभी भावों में आत्मोन्मुखी होने की इच्छा होती है इसलिए उपवास अर्थात् आत्मा का सान्निध्य पाने के लिए नियमों का पालन करने लगते हैं। अर्थात् सत्य ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अस्तेय की अवस्था सहज में ही आ जाती है। जब नियम के पालन में सहजता आ जाती है तो भोग वासनाओं की आसक्ति का त्याग हो जाता है और शरीर में गुण गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है। सचिव सेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे।। पुनि सिख दीन्हि बोलि लघुभाई। सौंपि सकल मातु सेवकाई।। व्याख्या : जब ध्यान में आत्मा, सुरता व लखन भाव प्राणकोश में स्थिर होकर परमात्मा में लीन होते हैं और देह रूपी नगर में भाव रत भरत ने भाव मंत्रणा व सेवक भावों को नाना प्रकार से समझाकर उद्यत किया अर्थात् प्रेरित किया जिससे वे सब भाव अपने-अपने कामों में लग गए। फिर दोबारा शत्रुघन रूपी कामादि नाशक भाव को शिक्षा दी और समस्त नाड़ियों रूपी माताओं की सेवा का कार्य सौंप दिया। भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।। ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।। व्याख्या : तब भाव रत भरत भाव ने भूसुर अर्थात् देह में चलने वाले स्वरों से प्राणों के माध्यम से विनती की और कहा कि आप कोई भी अच्छा-बुरा, ऊँच व नीच कार्य जो भी हो उसके लिए आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा। यहाँ भाव रत भरत भाव स्वरों से प्रार्थना करते हैं कि आप सहज रहना। ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, भल-मन्द आदि का विचार मत कीजिए। क्योंकि अगर स्वर सहज होकर संचरित होंगे तो सब भावों की अवस्था भी सहज बनी रहती है। अत: यहाँ उसी अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।। सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।। व्याख्या : तब भाव रत भरत भाव ने भाव रूपी प्रजा जनों को व वृति रूपी कुटुम्बियों को बुलाया और सबको समझाकर अर्थात् प्रेरित कर सहज अवस्था का आभास कराया। फिर कामादि नाशक शत्रुघन भाव सहित विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के घर गए और दण्डवत करते हुए अर्थात पूर्ण समर्पण करते हुए बोले। आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।। समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सा डिग्री जग होइहि सोई।। व्याख्या : हे विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरुदेव! अगर आपकी प्रेरणा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ अर्थात् भावों को सत्य, ब्रह्मचर्य, अपिरग्रह व अस्तेय में रत (लीन) कर दूँ। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी मन का भाव पुलकित होता हुआ प्रेमपूर्वक बोला कि जो तुम्हें प्रेरणा हो उसी को समझकर कहकर तुम करो। वही संसार में धारणा का सार है। दो0 सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरूपाधि।।323।। व्याख्या : तब भाव रत भरत भाव ने विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु से विशेष प्रेरणा प्राप्त करेक सब गुणों को बुला लिया अर्थात् गुणों के मर्म को जान लिया और सिंहासन अर्थात् भावों की लीनता का आधार आत्मा रूपी राम की चरण पादुकाओं को बना लिया। सिंहासन पर आत्मा रूपी राम की चरण पादुकाओं को रखने का बहुत गहरा रहस्य है। भावों में जब आत्मा के प्रति समर्पण का भाव बना रहता है तो उसी अवस्था को आत्मा रूपी राम की चरण पादुकाओं का सिंहासन पर रखना बोलकर लिखा गया है। दो0 राम मातु गुर पद सि डिग्री नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।। नंदिगाँव करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।। व्याख्या : जब आत्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की अवस्था आ जाती है तो भाव रत भरत भाव विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रेरणा और सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता के आशीर्वाद अर्थात् बल से उर्ध्वगामी होकर प्राण की तरंगों के साथ ताल्लव (ताल्लव ही नन्दीग्राम के प्रतीक के रूप में लिखा गया है) में स्थिर हो जाता है। उस अवस्था में भाव रत भाव ताल्लव में रमण करने लग जाता है जिसे ध्यान की अवस्था में अच्छी तरह समझा जा सकता है। उसी अवस्था को पर्णकुटी बनाकर भरत का नन्दी ग्राम में निवास करना बताया गया है। जटा जूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।। असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।। व्याख्या : जब भाव रत भरत भाव ताल्लव (नन्दी ग्राम) में स्थिर हो जाता है तो सिर पर जटाओं का आभास होने लगता है और मुनिपट अर्थात् मन के भावों पर पर्दा डल जाता है अर्थात् मन एकदम शान्त हो जाता है। जब भाव रत भरत भाव ताल्लव में स्थिर हो जाता है तो ताल्लव में छिद्रों का आभास होने लगता है। उसी को पृथ्वी खोदकर कुश की साँथरी बिछाना कहा गया है। उस अवस्था में वासनाओं की आसक्ति मिट जाती है और वृतियाँ नियम (सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अस्तेय) में लग जाती हैं। इस अवस्था में स्थिर होना बहुत कठिन होता है। परन्तु भाव रत भरत भाव तो रस (आनन्द) की धारणा को सप्रेम करने लगता है। भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।। अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में वासनाओं की आसक्ति व सुख भोग की चाह का मन वचन व कर्म से तिनके के समान त्याग हो जाता है अर्थात् साधक की आसक्ति बचती ही नहीं है। देह रूपी अयोध्या पर उस अवस्था में सहज स्वरों के माध्यम से भाव गुणों को गुणों में बरतने लगते हैं। उस ध्यान की अवस्था में दस इन्द्रियों के सहजता के वैभव को देखकर इच्छाएँ भी लजा जाती हैं। तेहिं परु बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।। व्याख्या : उसी सहज देह रूपी नगर में भाव रत रूपी भरत भाव बिना राग अर्थात बिना आसक्ति के रहता है जैसे चम्पा के बाग में भौंरा रहता है। यह वास्तव में सत्य है कि जो आत्म में अनुराग करने वाले होते हैं वे माया रूपी लक्ष्मी का बमन के समान त्याग कर देते हैं। दो0 राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव तो आत्मा रूपी राम के प्रेम के पात्र हैं। अत: वे माया के त्याग से बड़े नहीं हुए हैं अर्थात् उनके लिए माया का त्याग करना कोई बड़ी बात नहीं है। चातक की टेक से और हंस की क्षीर-नीर विवेक के कारण सराहना होती है। अत: उसी प्रकार भाव रत भरत भाव की आत्मा में रतता (लीनता) के कारण सराहना होती है। देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुख छबि सोई।। नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।। व्याख्या : जब भाव रत भाव ताल्लव (नन्दीग्राम) में स्थिर हो जाता है तो दिनों दिन देहाभास कम होता चला जाता है। उससे वासनाओं का तेज व बल तो कमता चला जाता है परन्तु मुख पर तेज वही बना रहता है। उस अवस्था में नित्य नया आत्मा के प्रति प्रेम बढ़ता चला जाता है और धारणा प्रबल होती चली जाती है तथा मन में किसी भी प्रकार की मलीनता नहीं बचती है। जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।। सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।। व्याख्या : जैसे शरद ऋतु के प्रकाश से जल घटता है किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। उसी प्रकार देहाभास के कमने से वैराग्य रूपी बेंत शोभा पाने लगता है और ज्ञान रूपी कमल विकसति होने लगता है। शम, दम संयम, नियम व उपवास आदि भाव रत भरत भाव के हृदय रूपी आकाश के नक्षत्र होते हैं। अर्थात् शम, दम नियम आदि भाव रत भरत भाव को आत्मोन्मुखी होने में सहायक होते हैं। ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।। राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।। व्याख्या : दृढ़ विश्वास का भाव ही अवधी रूपी शरीर के लिए पूर्णिमा के समान प्रकाश करने वाला होता है। आत्मा में सुरता लगाना स्वरों की सूक्ष्म नाडियों द्वारा सम्भव होता है। आत्मा रूपी राम के प्रति अचल प्रेम ही निर्मल चन्द्रमा के समान शीतलता देने वाला होता है। अचल प्रेम रूपी चन्द्रमा सभी भावों के साथ शोभा पाता है। भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।। बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।। व्याख्या : भाव-रत भरत भावों की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि अर्थात् साधक संकोच करते हैं अर्थात् वर्णन नहीं कर पाते हैं क्योंकि भाव रतता को जानने के लिए वहाँ तक शेष, गणेश व सरस्वती भी नहीं पहुँच पाते हैं। अर्थात् गुणों व स्वरों द्वारा भी उस अवस्था का अनुभव नहीं हो पाता है और उस अवस्था को शेष बोलकर भी नहीं समझाया जा सकता है। दो0 नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।। व्याख्या : भाव-रत भरत भाव नित्य आत्मा की प्रेरणा को ग्रहण करता रहता है जिससे हृदय में आत्मा के प्रति प्रेम नहीं समाता है। ऐसी अवस्था में भाव-रत भरत भाव सदैव आत्मा की प्रेरणा के अनुसार ही राजकाज अर्थात् भावों का संचालन करने लगता है। पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।। लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भाव-रत भरत भाव का तन पुलकित रहता है और हृदय में आत्मा व सुरता के प्रति लगन लगी रहती है। निरन्तर नाम जप की अवस्था रहती है और आँखों से प्रेम जल बहने लगता है। लखन भाव, सुरता व आत्मा रूपी राम वैराग्य रूपी वन में निवास करते हैं और भाव रत भरत भाव देह रूपी नगर में रहते हुए भी देह की आसक्ति नहीं करते हैं। इन चौपाइयों में साधक की उस अनुभूति का वर्णन किया गया है जो आत्मा, सुरता व लखन भावों के प्राण कोश में स्थिर हो जाने पर और भाव रत भरत की देह में बरतने पर होती है। दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू।। सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।। व्याख्या : भाव रूपी लोग दोनों तरफ की अवस्था को समझकर अर्थात् आत्मा की अवस्था और भाव रत भरत की अवस्था को समझकर कहते हैं कि भाव रत भाव सब प्रकार से सराहने योग्य है। क्योंकि भाव-रत भरत भाव के व्रत व नियमों के बारे में सुनकर साधना में लगे हुए लोगों को भी संकोच हो जाता है और व्रत-नियमों की दशा को देखखर तो मन की एकाग्रता की सीमा भी टूट जाती है। परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।। हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव का आचरण परम पवित्र होता है जो मधुर, सुंदर, आनन्द व मंगल को करने वाला होता है। भाव रत भरत का आचरण देहाभास के कठोर क्लेशों का हरण करने वाला होता है। महामोह रूपी रात्रि को नष्ट करने के लिए सूर्य के समान होता है। पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।। जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू।। व्याख्या : पाप समूह रूपी हाथी के लिए सिंह के समान होता है अर्थात् भाव आत्मा में लीन रहने पर चिन्ता रूपी पाप का समूह मिट जाता है। भाव रतता समस्त संतापों के दल का नाश करने वाली होती है। अर्थात् भाव आत्मा में रत रहने पर किसी भी प्रकार के संताप नहीं सताते हैं। छ0 सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को।। दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को।। व्याख्या : आत्मा व सुरता के प्रति अमृतमय प्रेम से परिपूर्ण भाव रत भरत भाव अगर साधक के हृदय में पैदा नहीं हो तो मुनियों के मन को भी अगम्य यम, नियम, संयम, दम व कठोर व्रतों का कौन पालन करा पाता है। केवल सुयश प्राप्त करने के लिए दु:ख, दाह, दरिद्रता, दम्भता व दोषों का कौन हरण करता? भाव रत भरत भाव अगर पैदा नहीं हो तो देह बुद्धि के बंधन को तोड़कर आत्मा का साक्षात्कार कौन कराता? अर्थात् बिना भावों की आत्मा में रतता के आत्म दर्शन सम्भव नहीं हो सकते हैं। सो0 भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।326।। व्याख्या : तुलसीदास अपने अनुभवों को बताते हुए कहते हैं कि भाव रत भाव के चरित्र का नियमपूर्वक आचरण करने से आत्मा व सुरता के चरणों में अवश्य ही प्रेम पैदा हो जायेगा तथा भावों की आसक्ति मिट जायेगी। अर्थात् सांसारिक विषय रस से वैराग्य हो जायेगा। ।। मास पारायण इक्कीसवाँ विश्राम।। ।। इति श्री मद्राम चरि मानसे सकलकलिकलुष विध्वंसने द्वितीय : सोपान: समाप्त।।
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