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रामायण - किष्किन्धा काण्ड

Ramayan
किष्किन्धा काण्ड ॐ श्री गुरुवे: नम: श्लोक कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि न:।।1।। व्याख्या : इस श्लोक में कुण्डलिनि शक्ति के प्रभाव का प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। कुण्डलिनि शक्ति कुन्द अर्थात् कुण्डलाकार में होती है, जो बहुत सुन्दर व अति बलवान होती है। कुण्डलिनि शक्ति को कमल के प्रतीक के माध्यम से भी समझाया जाता है इसलिए नीलकमल की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि कुण्डलिनि शक्ति विज्ञान का घर होती है अर्थात् जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जाती है तो विशुद्ध ज्ञान का अनुभव हो जाता है। यह शक्ति सर्वव्यापक होती है इसलिए इसे विभौ भी कहा जाता है। यह शक्ति शोभा का आधार व वर देने वाली होती है अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति की जागृति हो जाने पर मनोवांछित वर की प्राप्ति हो जाती है। इसे श्रुतिनुतौ अर्थात् सुरता के रूप में व्याप्त बताया गया है। इस शक्ति से ही गो यानी इन्द्रियों का समूह पैदा होता है और इसकी जागृति होने पर ही विशुद्ध प्रकाश (विप्र) का समूह यानी पुँज पैदा होता है, इसलिए गोविप्रवृन्दप्रियौ बोला गया है। कुण्डलिनि शक्ति की ऊर्जा से ही भाव से उत्पन्न माया व मानस यानी चेतना पैदा होती है, इसलिए इसे माया व मानस रूपिणि भी कहा गया है। यह शक्ति आत्मा का वरण करके सात्विक धारणा को धारण करके कल्याणकारी होती है। इसलिए जो साधक सुरता की खोज में लगे रहते हैं उन्हें कुण्डलिनि शक्ति भक्ति प्रदान कर देती है। श्लोक ब्रह्माम्भोधि समुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा। संसारामयभेषजं सुखकरं श्री जानकी जीवनं धन्यास्ते कृतिन: पिबन्ति सतत श्री राम नामामृतम।।2।। व्याख्या : यह कुण्डलिनि शक्ति बुद्धि आदि के भावों के समुदाय को पैदा करने वाली होती है तथा देह विकारों का नाश करने वाली होती है। यह शक्ति मछली के मुखाकार वाली सुन्दर व सदा सुशोभित होने वाली है। यह संसार और आत्मा रूपी राम के लिए औषधि स्वरूप व सबको सुख देने वाली होती है। जानकी जीवनं अर्थात् यह शक्ति (जान) ही जीवन बनकर प्रकट होती है। इसलिए वे साधक धन्य हो जाते हैं जो निरन्तर आत्म चिन्तन से निकलने वाले अमृत का पान करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कुण्डलिनि शक्ति तो संसार के भावों को भी शक्ति प्रदान करती है और आत्मा को मुक्त होने के लिए भी शक्ति प्रदान करती है। अत: वे साधक धन्य हैं जो कुण्डलिनि शक्ति से उत्पन्न ऊर्जा को आत्म चिन्तन में लगाकर अमृतपान करते हैं। सो0 मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर। जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।।1।। व्याख्या : इस सोरठे में कहा गया है कि जिस कुण्डलिनि शक्ति में संभु और भवानी अर्थात् जिस शक्ति से स्वयं के स्वरूप का आभास होता है और जिस शक्ति की ऊर्जा से भाव आते हैं, वही शक्ति जन्म-मरण का आधार होती है और ज्ञान की खान भी होती है तथा उसी से चिन्ता रूपी पाप पैदा होता है, तो फिर ऐसी शक्ति का सेवन क्यों नहीं करना चाहिये। सो0 जरत सकल सुर बृदं बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।।2।। व्याख्या : विषय रूपी जहर का सेवन करने से समस्त भाव व स्वर जलने लगते हैं तो फिर हे मूर्ख मन! तू शंकाओं का निवारण करके क्यों नहीं विषयों से दूर होता? आगे चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया।। तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में आत्म चेतना फिर आगे बढ़ी तो ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया अर्थात् वह कोश आ गया जहाँ रिष अ मूक अर्थात् क्रोध शान्त हो जाता है। उस कोश में मंत्रणा के भावों सहित सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का भाव रहता है, जो सुलक्षणों को ग्रहण करने वाला होता है। अत: सुग्रीव रूपी सद्बुद्धि के भाव ने जब अतुलनीय बल वाले आत्मा रूपी राम को आते देखा तो -- अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।। धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव भाव भयभीत होता हुआ अहंकार का हनन करने वाले अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान से बोला कि आत्मा व लखन रूपी दो पुरुष जो बल के घर हैं, आ रहे हैं। इसलिए हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके अर्थात पूरी तरह ब्रह्ममय बुद्धि करके जाओ और मुझे इशारा अर्थात् प्रेरणा करके समझाना कि ये कौन हैं? पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।। बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाहि पूछत अस भयऊ।। व्याख्या : अगर ये बल के भाव रूपी बाली द्वारा भेजे गए मन के विकार (मन मैला) हों तो मुझे बताना, मैं तुरन्त यह कोश छोड़ दूँगा। वास्तव में यह होता है कि इन्द्रियों पर या तो भोग बल का कब्ज रहता है या फिर सद्बुद्धि के भावों का वश होता है। जब इन्द्रियाँ भोग बलरूपी बाली के अधीन हो जाती हैं तो सद्बुद्धि का भाव ऋस्यमूक कोश पर आ जाता है जहाँ पर भोग का बल निष्तेज हो जाता है। ऋष्यमूक पर्वत के लिए मतंग ऋषि का शाप होता है अर्थात् मत कर मत कर के भाव से ऋष्यमूक कोश विषयों के रस से हीन हो जाता है। जब विषयों में रस नहीं रहता है तो सद्बुद्धि के भाव व अनन्य बुद्धि के भाव परमात्मा में लीन हो जाते हैं। इसलिए सुग्रीव व हनुमान को ऋष्यमूक पर्वत पर तपस्यारत बताया गया है। विषय रस के अभाव में भोग का बल नहीं चलता है इसलिए बाली रूपी भोग बल ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जा पाता है। ऐसी अवस्था में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भाव विशुद्ध प्रकाशमय (विप्र) होकर आत्म चेतना की तरफ अग्रसर होता है। उसी को हनुमान का विप्र रूप धारण करके जाना बताया गया है। जब अनन्य बुद्धि विशुद्ध प्रकाशमय होती है तो परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की अवस्था रहती है। उसी को शीश झुकाना बोला गया है। को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।। कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।। व्याख्या : श्याम व गौर शरीर धारण करने वाले आप कौन हैं? किस कारण से आप तीनों गुणों का क्षय करके वैराग्य रूपी वन में घूम रहे हो? यह वैराग्य रूपी भूमि तो बहुत कठोर है और आप तो निर्मलता रूपी पैरों पर चलते हो। अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव जानना चाहता है कि श्याम स्वरूप आत्मा व गौरवर्ण रूपी लखन भाव किस कारण से वैराग्य रूपी वन में विचरते हैं? मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।। की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।। व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कहता है कि तुम्हारे अंग मधुर व सुन्दर हैं तथा मन का हरण करने वाले हैं। फिर तुम क्यों वैराग्य रूपी वन में दु:सह धूप व वायु को सह रहे हो? तुम क्या तीनों गुणों रूपी कोई देव भाव हो या फिर नर की धड़कन या नर की धड़कन के घर हो? नर का मतलब धड़कन से होता है और नारायण यानी नर अ अयन अर्थात् नर की धड़कन का घर से होता है। दो0 जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।। व्याख्या : अथवा आप जगत के कारण या भावों के भवसागर को पार उतारने वाले या देह रूपी धरती को भावों के भार से मुक्त कराने वाले हो, या फिर भावों को पैदा करने वाले भुवनपति हो? या फिर मन के अन्दर अवतरित होने वाले हो? कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए।। नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को समझाया कि हम सुष्मना नाड़ी के माध्यम से चित रूपी दसरथ की प्रेरणा से आए हैं और चित की प्रेरणा से ही वैराग्य रूपी वन में घूम रहे हैं। हमारा नाम आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण है। हमारे साथ सुरता रूपी कोमल नारी थी। इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।। आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।। व्याख्या : उस सुरता रूपी कोमल नारी को आसुरी भावों ने हर लिया है। अत: हे विशुद्ध प्रकाशमय! हम उसी सुरता को खोज रहे हैं। हमने तो अपनी विशेषताएँ बता दी हैं। अब हे विशुद्ध प्रकाश! अपना परिचय दीजिए। वास्तव में ध्यान की अवस्था में ही समझ में आ पाता है कि आत्मा के साथ बुद्धि के भाव कैसे वार्तालाप करते हैं? प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।। पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रूचिर बेष कै रचना।। व्याख्या : जब अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा की चेतना के सम्पर्क में आता है तो वह आत्मस्वरूप को पहचान लेता है और तत्क्षण आत्मा के सामने समर्पण कर देता है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! उस अवस्था के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था में सारा शरीर पुलकित हो उठता है और वाणी मौन हो जाती है। उस अवस्था की सुन्दर रचना तो देखते ही बनती है अर्थात् अनुभव से ही समझा जा सकता है। पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चिन्ही।। मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।। व्याख्या : फिर अनन्य बुद्धि के भाव ने आत्म स्तुति की और स्वयं के स्वामी आत्मा रूपी राम को पहचान कर हृदय हर्षित हो उठा। तब अनन्य भावने कहा कि हे नाथ! मैंने तो मेरी वृति के अनुसार पूछा अर्थात् मैंने तो मेरी बुद्धि के अनुसार तुमको जाना परन्तु आप कैसे धड़कन के रूप में पूछते हो अर्थात् आप तो विशुद्ध चेतना हो फिर धड़कन से उत्पन्न भावों की तरह क्यों पूछते हो? तव माया बस फिरउँ भुलाना। ताते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।। व्याख्या : मैं तो आपकी माया के वश में पड़कर भ्रम में पड़ा हुआ घूमता हूँ, इसलिए मैंने आप आत्मस्वरूप स्वामी को नहीं जाना। दो0 एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान। पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।। व्याख्या : जब अनन्य बुद्धि के भाव में आत्मा के प्रति समर्पण का भाव आ जाता है तो स्वयं की अवस्था समझ में आने लग जाती है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर हनुमान भाव के मुख से कहा गया है कि मैं (अनन्य बुद्धि) तो मोह के वश में होकर कुटिलता व अज्ञता के प्रभाव में आ गया था परन्तु हे आत्मा रूपी राम! आपने मुझे क्यों छोड़ दिया था? जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।। नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।। व्याख्या : हे नाथ! हालाँकि मुझ बुद्धि भाव में अनेक अवगुण होते हैं परन्तु मुझ सेवक को आप भूलकर भी मत छोड़ना। हे प्रभु! जीव आपकी माया से ही मोहित होता है और जब आपकी कृपा होती है, तब ही वह माया से मुक्त हो पाता है। ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।। सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। व्याख्या : उसपर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई। (शपथ) करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामी के और पुत्र माता के भरोसे निश्चिन्त रहता है। प्रभु को सेवक का पालन-पोषण करते ही बनता है (करना ही पड़ता है)।। 2।। अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।। तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।। व्याख्या : ऐसा कहकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान व्याकुल होकर आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर पड़े, जिससे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान का सहज स्वरूप प्रकट हो गया और हृदय में प्रेम छा गया। तब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके अपने हृदय से लगा लिया अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव को आत्मा ने अपनी ओर आकर्षित कर लिया। उस अवस्था में आत्मा अपने स्वंय के रस में अनन्य बुद्धि के भाव को भिगो लेती है। उसे ही अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल करना बताया गया है। सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।। समदरसी मोहि कहसब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ।। व्याख्या : तब आत्म चेतना प्रेरणा करती है कि हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम हृदय में ग्लानि मत करो। तुम मुझ आत्मा को लखन भाव से भी दोगुना प्रिय हो। वास्तव में लक्षणों को लखने वाला लखन भावसे अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा को ज्यादा प्रिय होता है क्योंकि अनन्य अर्थात् एक परमात्मा के अलावा कोई नहीं की बुद्धि ही परमात्मा में लीन कराने वाली होती है। आत्मा रूपी राम अपनी विशेषता बताते हुए कहते हैं कि मुझ आत्मा को सब लोग समदर्शी कहते हैं परन्तु अनन्य गति रूपी सेवक मुझे सबसे प्रिय होता है। दो0 सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बुद्धि रूपी हनुमान को समझाते हुए कहते हैं कि जिसकी बुद्धि अनन्य स्वरूप वाली होकर दृढ़ हो जाती है अर्थात् जब साधक दृढ़ता से मान लेता है कि एक परमात्मा के सिवाय और कोई अन्य है ही नहीं तो वह हनुमंत अर्थात् मन के अहंकार का हरण करने वाला हो जाता है और वही अवस्था हनुमान की होती है। उस अनन्य बुद्धि की अवस्था में साधक स्वयं को परमात्मा का सेवक मानकर समस्त सचराचर जगत को परमात्मा का स्वरूप मानकर स्वामी के रूप में सेवा करने लग जाता है। देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।। नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।। व्याख्या : निर्मल प्राण से उत्पन्न बुद्धि रूपी हनुमान ने आत्मा रूपी स्वामी को जब अपने अनुकूल देखा तो हृदय की सब त्रास मिट गयी और हर्ष छा गया। तब बुद्धि रूपी हनुमान ने कहा कि हे स्वामी! ऋष्यमूक पर्वत रूपी कोश पर बुद्धि रूपी बन्दरों के स्वामी सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव रहते हैं, जो सदैव आपके (आत्मा) दास हैं। तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।। सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।। व्याख्या : आप सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के साथ मित्रता कीजिए और उसे विषयों से हीन जानकर अभय पद दे दीजिए। वही सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का भाव ही सुरता रूपी सीता की खोज लगवायेगा और जहाँ-तहाँ नाना प्रकार के बुद्धि के भाव रूपी करोड़ों बन्दरों को भेजकर सुरता की खोज करायेगा। वास्तव में जब सुरता कामवासना के भावों के प्रभाव में आ जाती है तो सद्बुद्धि के भाव ही काम के कारण व निवारण का रास्ता खोज सकते हैं। अत: उसी अनुभूति को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।। जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।। व्याख्या : इस प्रकार सब बात बताकर अनन्य बुद्धि के भाव ने आत्मा रूपी राम व लखन भाव को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव आत्म पथ-प्रदर्शक बन गया। जब अनन्य बुद्धि के साथ सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने आत्मा रूपी राम को देखा तो अपने जन्म को अत्यन्त धन्य समझा अर्थात् सद्बुद्धि के भाव को विशेष प्रसन्नता हुई। सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भेंटेउ अनुज सहित रघुनाथा। कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।। व्याख्या : सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का भाव आदरपूर्वक सीसझुकाकर आत्मा रूपी राम व लखन भाव से मिला अर्थात् समर्पण के भाव से मिला। तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव मन में विचार करने लगा कि किस विधि (क्रिया) से आत्मा रूपी राम मुझ पर प्रीत करेंगे? दो0 तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ। पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ।।4।। व्याख्या : जब ध्यान में ऐसी अवस्था आ जाती है तो अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा व सद्बुद्धि के बीच सेतु का काम करता है, उसी को हनुमान द्वारा दोनों तरफ की कथा बताना बोलकर लिखा है। जब ध्यान में अनन्य बुद्धि आत्मा व सद्बुद्धि के भावों को मिलाती है, तो ध्यान की एकाग्रता से प्राण से ज्योति प्रकट हो जाती है। उसी ज्योति प्रकट होने की अनुभूति को अग्नि को साक्षी रखकर प्रेम को दृढ़ करना बताया गया है। कुछ साधना पंथों में उसीको ज्योति का दर्शन करना बताया गया है। कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा। लछिमन राम चरित सब भाषा।। कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सद्बुद्धि और आत्मा की प्रीत दृढ़ हो गयी और कुछ भी अन्तर नहीं रहा। तब लखन भाव ने आत्मा रूपी राम के चरित्र का वर्णन किया अर्थात् लखन भाव ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को आत्मा का चरित समझाया। तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव आँखों में जल भर कर बोले कि हे नाथ! सुरता रूपी सीता जरूर मिल जायेगी। यहाँ पर सीता के लिए मिथिलेसकुमारी शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका रहस्य यह है कि सुरता मन के मंथन से ही निर्मल होकर मिलेगी। मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।। गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।। व्याख्या : सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव बोले कि मैं एक बार मंत्रणा के भावों के साथ ऋष्यमूक कोश पर बैठा हुआ विचार मंथन कर रहा था। तब मैंने आकाश मार्ग में देखा कि काम के भावों के वश में होकर सुरता विलाप करती हुई जा रही है। वास्तव में जब सुरता कामवासना में फँसती है तो सद्बुद्धि के भाव उसे फँसता हुआ देख पाते हैं। परन्तु बिना आत्म चेतना के आधार के कुछ नहीं कर पाते हैं। राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।। मागा राम तुरत तेहीं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता राम-राम पुकार रही थी अर्थात् सुरता आत्म चिन्तन में लीन थी इसलिए सद्बुद्धि के वानर रूपी भावों को देखकर प्रेरणा रूपी वस्त्र गिरा दिया था। तब आत्मा रूपी राम ने सुरता के प्रेरणा रूपी वस्त्र को माँगा तो सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने तुरन्त दे दिया। उस प्रेरणा रूपी वस्त्र को हृदय से लगाकर आत्मा रूपी राम ने बहुत सोच किया अर्थात् सुरता से मिलने का बहुत प्रकार से चिंतन करने लगा। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।। सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।। व्याख्या : सद्बुद्धु रूपी सुग्रीव का भाव बोला कि हे आत्मा रूपी राम! सुनो - तुम सब चिन्ता छोड़कर मन में धैर्य धारण करो। मैं (सद्बुद्धि) सब प्रकार से आपकी सहायता करूँगा, जिससे प्राणशक्ति (जानकी) से उत्पन्न सुरता रूपी सीता मिल सके। दो0 सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव। कारन कवन बसहु बनमोहि कहहु सुग्रीव।।5।। व्याख्या : सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव सखा की बातें सुनकर आत्मा रूपी राम बहुत हर्षित हुए और सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव भाव से पूछा कि तुम किस कारण से वैराग्य रूपी वन में ऋष्यमूक कोश पर क्यों रहते हो? नाथ बालि अ डिग्री मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।। मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम वास्तव में जानना चाहते हैं कि सद्बुद्धि का भाव इन्द्रियों के सुख भोगों का त्याग करके वैराग्य के भाव में क्यों रत है? तब वैराग्य में रत रहने का कारण बताते हुए सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव कहते हैं कि हे प्रभु! मैं अर्थात् सद्बुद्धि का भाव और बालि अर्थात् सुख भोग का बल दोनों हम भाई हैं और हमारे बीच में गहरी प्रीति थी, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। परन्तु मय अर्थात् अहंकार के पुत्र मोह जो माया को पैदा करने वाला था, वो इन्द्रियों रूपी ग्राम में आ गया अर्थात् अहंकार से उत्पन्न मोह का भाव इन्द्रियों के सुख भोग में ललचा कर आ गया। अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।। धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु संग लागा।। व्याख्या : मोह रूपी आसक्ति का भाव आधी रात को अर्थात् अज्ञान की अवस्था में इन्द्रियों के शरीर रूपी नगर के द्वार पर आ गया तो सुख भोग का बल रूपी बालि भाव मोहासक्ति के प्रभाव को सह नहीं सका और सुख भोग का बल भाव मोह की आसक्ति में पड़कर उसके पीछे भागने लगा। तब मैं सद्बुद्धि का भाव सुख भोग बल को मोहासक्ति से बचाने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ा चला गया। वास्तव में जब सुख भोग का बल आसक्ति रूपी दानव के पीछे जाने लगता है तो सद्बुद्धि का भाव उसे बचाने का प्रयास करता है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर सुग्रीव का बालि के संग जाना बताया गया है। गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।। परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहीं आवौं तब जानेसु मारा।। व्याख्या : सुख भोगों की आसक्ति का मोह भाव बहुत सूक्ष्म होता है और कभी-कभी वही विराट रूप धारण कर लेता है। जब आसक्ति के मोह का भाव सूक्ष्म होता है तो उसे खोजना बहुत मुश्किल होता है। वह जड़ता के कोश में किसी सूक्ष्म कोशिका में जाकर छुप जाता है। उसी को पर्वत की गुफा में जाकर छुप जाना बताया गया है। तब भोग का बल भाव सद्बुद्धि के भाव से बोला कि तुम मेरा एक पखवाड़े तक यहाँ इन्तजार करना। अगर मैं तब तक नहीं आऊँ तो मुझे मरा समझना अर्थात् भोग का बल भाव बोला कि अगर मैं वापस सहज अवस्था में नहीं लौट पाऊँ तो मुझे आसक्ति के जाल में फँसा हुआ समझना। मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रूधिर धार तहँ भारी।। बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।। व्याख्या : हे अज्ञान के शत्रु! मैं सद्बुद्धि का भाव वहाँ एक महीने तक इन्तजार किया। वास्तव में जब भोग बल विकारों में फँसता है तो सद्बुद्धि का भाव उसे वापस सहज अवस्था में लाने केलिए बहुत दिनों तक प्रयास करता है। उसी को सुग्रीव द्वारा एक महीने इन्तजार करना बताया गया है। जब मोहासक्ति व बल भाव में संघर्ष होता है तो विशेष हार्मोन निकलने लग जाता है। उसी को रूधिर के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब विशेष हार्मोन की धारा को देखा तो सद्बुद्धि के भाव ने विचार किया कि मोहासक्ति रूपी दानव ने बल भाव रूपी बाली को मार दिया है अर्थात् अपने वश में कर लिया है और अब मोहासक्ति का भाव मुझ सद्बुद्धि के भाव को मारेगा अर्थात् वश में करेगा, ऐसा सोचकर मैंने नियम संयम रूपी शिला लगा दी और वहाँ से चला आया। मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।। बाली ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।। व्याख्या : जब मंत्रणा के भावों ने देह रूपी नगर को सूना देखा तो मुझ सद्बुद्धि के भाव को जबरदस्ती राजा बना दिया। परन्तु कुछ समय पश्चात भोग बल रूपी बाली मोहासक्ति रूपी भाव को मारकर वापस देह रूपी नगर में आ गया और मुझे देखकर उसके मन में बहुत विरोध पैदा हो गया। वास्तव में जब भोग बल मोह की आसक्ति का संग कर लेता है तो उसका सद्बुद्धि के भाव के साथ में सहज में ही विरोध हो जाता है। रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।। ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।। व्याख्या : उस अवस्था में भोग बल रूपी बाली ने मुझ सद्बुद्धि के भाव को शत्रु की तरह मारा और सब कुछ हरण करके इन्द्रियों व नाड़ी पर कब्जा कर लिया। वास्तव में जो भाव हावी होता है, उसका ही इन्द्रियों व नाड़ी की धड़कन पर आधिपत्य हो जाता है। यहाँ पर उसी अनुभूति को लिखा गया है कि भोग बल रूपी बालि ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को परास्त करके देह रुपी नगर पर कब्जा कर लिया। इसलिए सद्बुद्धि का भाव कहता है कि हे आत्मा रूपी राम! उसी भोग बल रूपी बाली के भय से मैं समस्त कोश रूपी लोकों में फिरता रहा। इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।। सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! इस ऋष्यमूक कोश रूपी पर्वत पर भोग बल रूपी बाली आ नहीं पाता है। फिर भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। यहाँ पाठकों को मतंग ऋषि के श्राप की कथा का रहस्य बता देता हूँ। ध्यान की अवस्था में समझ में आता है कि ऋष्यमूक कोश ऐसा कोश है, जिसमें वासनाओं और भोगों को नकारने के भाव प्रबल होते हैं। उस कोश में पहुँचते ही मत कर, मत कर की भावना प्रबल हो जाती है। ""मतकर मतकर सोई ऋषि मतंगा"" मतकर का भाव ही मतंग ऋषि का प्रतीक होता है। जब मतकर के भावों के सामने भोगों का बल जाता है तो निस्तेज हो जाता है। उसी अनुभूति को बाली का ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जाना और मतंग ऋषि के श्राप के रूप में बताया गया है। सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव की बातें सुनकर आत्मा रूपी राम दु:खी हो गये और भोगों के बल को जीतने के लिए भाव रूपी भुजाएँ फड़क उठीं। दो0 सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रह्म रूद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।। व्याख्या : हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव! सुनो - मैं आत्मा भोग बल रूपी बाली को एक ही प्रेरणा रूपी बाण से मार दूँगा। वह अगर बुद्धि और विश्वास के भावों की शरण में जायेगा तो भी बच नहीं पायेगा। वास्तव में जब आत्मा प्रेरणा करती है तो भोग बल का भाव बुद्धि के तर्कों का सहारा लेकर और मिथ्या विश्वास की धारणा बनाकर बचने का प्रयास करता है। परन्तु वह बच नहीं पाता है। जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।। निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मे डिग्री समाना।। व्याख्या : जो अपने मित्र के दु:ख को देखकर दु:खी नहीं होते हैं, ऐसे लोगों को देखने से ही पाप लगता है। मित्र के धूल के कण के समान दु:ख को भी पर्वत के समान और खुद के पर्वत के समान दु:ख को भी धूल के कण के समान समझना चाहिये। जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा।। व्याख्या : जिनके स्वभाव में ऐसी बुद्धि नहीं होती है वे क्यों जबरदस्ती किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का तो कार्य है कि अपने मित्र को कुपथ से हटाकर सुपथ पर चलाए और उसके गुणों को प्रकट करके उसके दोषों को छिपावे। देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।। बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।। व्याख्या : देने-लेने में मन में शंका न रखें। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करतें रहें। विपत्ति के समय में तो सदा सौगुना स्नेह करें। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं। आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।। जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई।। व्याख्या : जो सामने तो मधुर-मधुर बातें बनाकर बोलते हैं और पीछे से कुटिलता करके धोखा देने की सोचते हैं और जिनका चित साँप की गति वाला होता है अर्थात् विकारयुक्त चित्तवाला होता है तो ऐसे कुमित्र का त्याग करने में ही भलाई होती है। सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।। सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।। व्याख्या : मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, बदचलन स्त्री और कपटी मित्र ये चारों भयंकर कष्ट देने वाले होते हैं। इसलिए हे सद्बुद्धि रूपी मित्र! तुम मेरे बल पर चिन्ता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा। वास्तव में ध्यान में आत्मा प्रेरणा करके सद्बुद्धि के भावों को बल प्रदान करने लगती है। उसी अनुभूति को इन चौपाइयों में लिखा गया है। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।। दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव बोला कि हे आत्मा रूपी राम! सुनो - भोग बल रूपी बाली बहुत बलवान व भावों के युद्ध में धैर्य रखने वाला है। ऐसा कहकर सद्बुद्धि के भाव ने अस्थि ताल अर्थात् देह स्थित सप्त चक्रों को दिखाया, जिन्हें आत्मा रूपी राम ने सहजता से ही गिरा दिया अर्थात् चक्रों को जागृत कर आत्मोन्मुखी कर लिया। वास्तव में शरीर के प्रत्येक चक्र पर भावों का द्वन्द्व चलता रहता है। उसे ही प्रतीकात्मक भाषा में दुंदुभि राक्षस कहा गया है। परन्तु जब आत्म चेतना दृढ़ वैराग्य में स्थिर होकर परमात्मा में लीन होने के लिए सुरता का सहारा खोजती है, तो वह सहज में सातों चक्रों पर चल रहे द्वन्द्व रूपी दुंदुभि राक्षस की जड़ता रूपी तालों को गिरा देती है। उसी को एक बाण में सातों तालों के वृक्षों को ढहा देना बोलकर लिखा है। देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।। बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।। व्याख्या : तब आत्म प्रेरणा की अमित (अपार) शक्ति को देखकर सद्बुद्धि के भाव का विश्वास दृढ़ हो गया! आत्म प्रेरणा से बाली रूपी भोग बल मारा जायेगा और आत्मा के प्रति प्रेम बढ़ गया। इस प्रकार बार-बार सद्बुद्धि का भाव आत्मा रूपी राम को शीश झुकाने लगा। सद्बुद्धि का भाव आत्मा को पहचान कर हर्षित होने लगा। उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।। सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।। व्याख्या : जब सद्बुद्धि के भाव में आत्मा के प्रति समर्पण का भाव आ जाता है तो उस अवस्था में ज्ञान की अनुभूति होने लग जाती है। तब सद्बुद्धि का भाव बोला कि हे नाथ! आपकी कृपा से मेरे मन के विकार मिट गए। इसलिए अब मैं सुख-सम्पदा व परिवार की बड़ाई के भावों का त्याग करके सदैव आपकी सेवा करूँगा। ए सब राम भगति के बाधक। कहहिं संत तव पद अवराधक।। सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। मायाकृत परमार्थ नाहीं।। व्याख्या : क्योंकि ये सब परिवार की बड़ाई व सुख-सम्पदा के भाव परमात्मा की भक्ति में बाधा देने वाले होते हैं। ऐसा परमात्मा के अराधक संत कहते हैं। शत्रु-मित्र का भाव व संसार में सुख-दु:ख का आभास माया के भावों के कारण ही होता है। परमार्थ की अवस्था में इनका कोई अस्तित्व नहीं होता है। बालि परमहित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।। सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।। व्याख्या : जब ज्ञान होने लगता है तब विरोध कम हो जाता है और समता का भाव प्रबल हो उठता है। अत: सद्बुद्धि के भाव को अब लगने लगता है कि भोग बल रूपी बाली तो मेरा परम हितैषी है, जिसके कारण विषयों के दु:ख का समन करने वाले आत्मा रूपी राम मिल गए। ज्ञान की अनुभूति होने पर सपने में भी किसी भाव से अगर द्वन्द्व हो जाता है तो जागने पर संकोच होने लगता है कि मैंने क्यों सपने में लड़ाई की। अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती।। सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।। व्याख्या : अब सद्बुद्धि का भाव बोला कि हे प्रभु! अब ऐसी कृपा कीजिए, जिससे मैं सब कुछ छोड़कर रात-दिन परमात्मा के भजन में लग जाऊँ। इस प्रकार सद्बुद्धि के भाव की वैराग्यपूर्ण बातें सुनकर इच्छाओं रूपी धनुष-बाण को धारण करने वाले आत्मा रूपी राम बोले। जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।। नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।। व्याख्या : हे सखा! जो तुमने कहा है, वो सब सत्य है। मेरे वचन मिथ्या नहीं होते हैं। सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि जी कहते हैं कि हे ज्ञान के अहंकार रूपी गरूड़! सबको आत्मा रूपी राम ऐसे नचाते हैं जैसे मदारी बंदर को नचाता है। अर्थात् सब कुछ आत्मा की प्रेरणा से ही होता है। लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।। तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को साथ लेकर हाथ में संयम रूपी बाण और धनुष लेकर चले। तब आत्मा ने सद्बुद्धि को प्रेरणा की कि तुम भोग बल रूपी बाली को चुनौती दो। आत्म प्रेरणा पाकर सद्बुद्धि का भाव भोग बल के भाव के निकट जाकर जोर से गरजा। सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।। सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।। व्याख्या : सद्बुद्धि के भाव की चुनौती को सुनकर भोग बल का भाव क्षुब्ध होकर दौड़ा तो भोग बल की तारा रूपी नारी ने भोग बल को समझाने का प्रयास किया कि सद्बुद्धि का भाव तो आत्मा व लखन भाव रूपी भाईयों से मिला है अर्थात् सद्बुद्धि के भाव को आत्मा की प्रेरणा का बल मिल गया है। कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।। व्याख्या : वे दोनों भाव आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण भाव हैं, जो सुष्मना प्रदेश से आए हैं। वे भावों के युद्ध में काल को भी जीत सकते हैं। दो0 कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ। जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।। व्याख्या : भोग बल रूपी बाली बोला कि हे डरपोक प्रिय! आत्मा तो समदर्शी होती है। अत: मैं अगर आत्म प्रेरणा से मारा भी जाऊँगा तो मैं तो आत्मा में ही लीन होकर सनाथ हो जाऊँगा। वासना को नारी के प्रतीक के माध्यम से समझाया जाता है। इसलिए बाली की पत्नी का नाम तारा बताया गया है। वासना का स्वभाव भयभीत होने वाला होता है और उसमें ज्ञान का भाव बहुत कम होता है इसलिए तारा प्रतीक बताया गया है। जैसे तारा का अल्प प्रकाश होता है वैसे ही वासना में ज्ञान का प्रकाश अल्प होता है। तारा अज्ञान रूपी अंधियारी रात्रि में ही ज्यादा चमकता है इसलिए तारा का भाव सद्बुद्धि रूपी उजियाली के पास भोग बल के भाव को जाने से रोकती है। अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।। भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।। व्याख्या : वासना रूपी तारा को समझाता हुआ महाअभिमानी भोग बल का भाव सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के भाव को तिनके के समान समझकर चला। फिर दोनों भाव भोग बल का भाव और सद्बुद्धि का भाव आपस में भीड़ गए और भोग बल रूपी बाली के भाव ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव पर आसक्ति रूपी मुठिका का प्रहार करके जोर से गर्जना की। तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।। मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होई मोर यह काला।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि का भाव व्याकुल होकर भाग आया क्योंकि आसक्ति रूपी मुठिका का प्रहार बज्र के समान लगा। तब आकर सद्बुद्धि के भाव ने आत्मा रूपी राम से कहा कि हे कृपालु आत्मा रूपी राम। मैंने तुमसे कहा था कि भोग बल रूपी बाली का भाव केवल बन्धन ही नहीं है, यह तो मेरे लिए काल के समान है। एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहीं मारेउँ सोऊ।। कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव! तुम दोनों भाव रूपी भाई एक जैसे लगते हो, इसलिए मैंने भ्रमवश नहीं मारा। ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा रूपी तरंग से सद्बुद्धि का स्पर्श किया तो तुरन्त आसक्ति की चोट का दर्द मिट गया और सद्बुद्धि में दृढ़ता आ गयी। उसी को बज्र के समान शरीर हो जाना बताया गया है। मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।। पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने सद्बुद्धि के गले में सुमन अर्थात् अच्छे निर्मल भावों की माला डाल दी अर्थात् प्रेरणा कर दी और प्रेरणा का बल देकर भोग बल रूपी बाली से लड़ने के लिए भेज दिया। फिर दोनों भाव रूपी भाईयों में नाना प्रकार से द्वन्द्व चला और आत्मा रूपी राम दृष्टा बनकर दृढ़ता रूपी पेड़ की ओट लेकर देखते रहे। भोग बल की यह विशेषता होती है कि जो भी भाव उसके सामने पड़ता है, उसका आधा बल उसमें आ जाता है। इसलिए आत्मा रूपी राम भी भोग-बल के सामने नहीं पड़कर पेड़ की ओट लेकर द्वन्द्व को देखते हैं। दो0 बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि। मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।। व्याख्या : जब सद्बुद्धि का भाव बहुत प्रकार से छल बल करके भी भोग बल से हृदय में हार गया और भयभीत हो गया, तो तब आत्मा रूपी राम ने सद्संकल्प रूपी बाण खींचकर भोग बल रूपी बाली के हृदय में मारा। परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।। स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।। व्याख्या : सद् संकल्प रूपी बाण के लगते ही भोग बल का भाव व्याकुल होकर देह रूपी भूमि पर गिर गया और जब संभलकर उठ बैठा तो आत्मा रूपी राम को सामने देखा। आत्मा का वर्ण श्याम लग रहा था और मस्तिष्क पर दृढ़ता व धैर्य रूपी जटाओं का जूट बना हुआ लग रहा था। नेत्र द्विय लाल वर्ण के लग रहे थे और संयम रूपी धनुष को चढ़ाए हुए थे। पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।। हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।। व्याख्या : तब भोग बल के भाव ने बार-बार आत्मा रूपी राम के चरणों में बार-बार ध्यान लगाया और परमात्मा को पहचानकर अपना जन्म सफल मान लिया। उस अवस्था में भोग बल रूपी भाव के हृदय में आत्मा के प्रति प्रेम पैदा हो गया परन्तु आत्मा रूपी राम की तरफ देखकर कठोर वचन बोला। धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं।। मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा।। व्याख्या : हे इन्द्रियों के स्वामी! तुम तो धारणा के कारण अवतरित हुए हो फिर मुझ भोग बल को ब्याध की तरह मारा है। मैं भोग बल तो आपका शत्रु हो गया और सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव आपका प्रिय हो गया। आप मुझे बताइये आपने किस कारण से मुझे मारा है। क्योंकि आपने तो आपकी धारणा के अनुसार मुझे शत्रु मान लिया है। जबकि आपका स्वभाव तो समदर्शी का होता है। अत: किस कारण से मुझे मारा है? अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।। व्याख्या : इन चौपाइयों में गहरा आध्यात्मिक मर्म छुपा हुआ है। अनुज बधू का तात्पर्य है सद्बुद्धि (सुग्रीव) से उत्पन्न सहज इच्छा, भगिनी का तात्पर्य भग अ नी अर्थात् प्रकृति यानी वृति अनुसार पैदा होने वाली इच्छा और सुत नारी का तात्पर्य मोह से उत्पन्न इच्छा से है। अत: आत्मा रूपी राम कहते हैं कि सद्बुद्धि, वृति व मोह से पैदा होने वाली इच्छाएँ कन्या सम अर्थात् सहज होती हैं। परन्तु इन इच्छाओं के भोग में जब आसक्ति रूपी कुदृष्टि पैदा हो जाती है तो भोग बल के भाव को मारने का कोई दोष नहीं लगता है। अर्थात् सहज होकर इच्छाओं में रमण करने का कोई दोष नहीं होता है परन्तु भोग की आसक्ति होने पर ही विकार पैदा होते हैं। मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।। मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।। व्याख्या : हे मूढ़! तुझे अपने भोग बल का बहुत अभिमान हो गया था, इसलिए तारा रूपी स्त्री की शिक्षा पर भी ध्यान नहीं दिया। सद्बुद्धि को मुझ आत्मा का बल प्राप्त है, यह जानकर भी तू उसे मारना चाहता था। दो0 सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि। प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।। व्याख्या : तब भोग बल रूपी बाली बोला कि हे आत्मा रूपी स्वामी! आपके समक्ष मेरी चतुराई नहीं चली परन्तु मैं विकारयुक्त (पापी) होने पर भी अन्तकाल में आपकी गति को ही प्राप्त कर रहा हूँ। सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।। अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपा निधाना।। व्याख्या : भोग बल रूपी बाली की समर्पण युक्त वाणी को सुनकर आत्मा रूपी राम द्रवित होकर भोग बल रूपी बाली के सिर का स्पर्श करने लगे और कहा कि तुम प्राणों को स्थिर करके शरीर में रह सकते हो अर्थात् विकारों से मुक्त होकर भोगों में सहज रमन कर सकते हो। तब भोग बल रूपी बाली ने कहा कि हे कृपानिधान! सुनिए -- जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।। जासु नाम बलसंकर कासी। देत सबहि समगति अबिनासी।। व्याख्या : भोग बल रूपी बाली बोला कि जन्म-जन्म मुनि लोग प्रयास करते रहते हैं परन्तु फिर भी अन्तकाल में राम कहने में नहीं आता है। जिस परमात्मा के नाम के बल पर भृकुटि रूपी काशी में शंकाओं का निस्तारण हो जाता है और सबको अर्थात् सब साधकों को जो राम का नाम भृकुटि रूपी काशी में जपते हैं, उनको अविनाशी परमात्मा की गति प्राप्त हो जाती है अर्थात् परमात्मा को पाने का रास्ता मिल जाता है। मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।। व्याख्या : वह परम अवस्था मेरी आँखों और इन्द्रियों के सामने आ गयी है। क्या ऐसी अवस्था पुन: मिल सकती है? अर्थात् परमात्मा के साक्षात्कार की अवस्था आ जाने पर और क्या चाहिये? भोग बल का भाव ऐसा विचार कर मन में परमात्मा के बारे में सोचने लगा। उसी भाव अवस्था को आगे के छन्दों में लिखा गया है। छ0 सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।। मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही। अस कवन सठ हठि काटि सुरत डिग्री बारि करिहि बबूरही।। व्याख्या : जिस परमात्मा के बारे में वेदों ने ""नेति नेति"" करके बताया है, आज वही परमात्मा मेरी आँखों के सामने है। जिस परमात्मा को मुनि लोग कभी-कभी ध्यान में प्राण को वश में करके व इन्द्रियों को विषयों के रस से हटाकर प्राप्त कर लेते हैं, वही परमात्मा आज मुझ भोग बल के भाव से शरीर को रखने के लिए बोल रहे हैं, इसका मुझे बहुत गर्व है। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो कल्पत डिग्री को काटकर बबूल का पेड़ लगायेगा? छ0 अब नाथ करि करूना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ।। यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ।। व्याख्या : अत: हे प्रभु! अब आप करूणा करके मुझे देखिए और जो वर माँगू वो वर दीजिए। मैं जिस भी योनि में जन्म लूँ बस सदैव परमात्मा के चरणों में अनुराग बना रहे। अर्थात् भोग बल का भाव कहना चाहता है कि मैं जिस भी भोग में बरतूँ बस मेरा अनुराग परमात्मा के चरणों में रहना चाहिये। तब भोग बल रूपी बाली ने अपने पुत्र अंगद अर्थात् दृढ़ता रूपी बुद्धि के भाव को आत्मा रूपी राम को सौंपते हुए कहा कि यह विनय और बल में मेरे समान ही है। अत: इसे सदैव आपकी शरण में रखना अर्थात् सदैव आत्मोन्मुखी बनाए रखना वरना भोगों की आसक्ति में पड़कर यह मेरे समान भटक सकता है। दो0 राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग।।10।। व्याख्या : इस प्रकार परमात्मा के चरणों में दृढ़ प्रेम करके भोग बल रूपी बाली ने अपना शरीर त्याग दिया, जैसे सर्प अपने गले की फूलों की माला का त्याग कर देता है और कुछ भी आभास नहीं करता है। वैसे ही बाली भाव ने निरासक्त होकर तन का त्याग कर दिया। राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।। नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने बाली रूपी भोग बल के भाव को अपनी गति प्रदान की अर्थात् सहज अवस्था प्रदान कर दी। तब देह रूपी नगर के भोग भाव रूपी लोग व्याकुल हो उठे। भोगबल की वासना रूपी तारा विलाप करने लगी और भोग की सब इच्छाओं का त्याग हो गया, जिससे शरीर का भी आभास नहीं रहा। उसी को ""न देह सँभारा"" बोलकर लिखा गया है। तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।। छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। व्याख्या : तारा रूपी नारी को व्याकुल देखकर आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके ज्ञान प्रदान कर दिया और माया का हरण कर लिया। जब ज्ञान हो जाता है तब समझ में आता है कि यह नश्वर शरीर तो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश के पाँच तत्वों से बना हुआ है। प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।। उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।। व्याख्या : यह स्थूल शरीर तो मरने के बाद भी प्रगट रूप से सामने पड़ा रहता है। इसलिए यह शरीर तो नश्वर है परन्तु जीव नित्य होता है। अत: हे तारा! तुम किसलिए रो रही हो। ऐसी प्रेरणा पाकर तारा रूपी वासना नारी को ज्ञान की अनुभूति हो गयी, जिससे उसमें समर्पण का भाव आ गया और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया अर्थात् वासना का त्याग करके परम सहजता की अवस्था प्राप्त कर ली। उमा दा डिग्री जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।। तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा।। व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धारूपी पार्वती! सबको आत्मा रूपी राम कठपुतली की तरह नचाते हैं। तब आत्मा रूपी राम ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को प्रेरणा की जिससे भोग बल रुपी बाली के विधिवत सब मृतक कर्म किए अर्थात् सद्बुद्धि के भाव ने वो सब उपाय किए, जिससे भोगबल का भाव सहज होकर परम शान्त रहे। उसी को विधिवत सब मृतक कर्म करना बताया गया है। राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।। रघुपति चरन नाइ करि माथा। चल सकल प्रेरित रघुनाथा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को समझाते हुए कहा कि तुम जाकर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को देह रूपी नगर का राजा बना दो। तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर सब भावों को लेकर लखन भाव चला। दो0 लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।। व्याख्या : तब लखन भाव ने देह रूपी नगर के विशुद्ध प्रकाश वाले भावों के समाज को बुलाया और सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को राजा बनाया और दृढ़ता रुपी अंगद (जो निष्काम अवस्था में गदगद रहता है, वही अंगद भाव है) को युवराज बनाया। उमा राम सम हित जग माहीं। गु डिग्री पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।। सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।। व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा के समान कल्याण करने वाला संसार में कोई नहीं होता है। गुरू, माता,पिता, बंधु और स्वामी भी परमात्मा के समान कल्याणकारी नहीं होते हैं। देवताओं, मनुष्यों व मुनियों की यही परम्परा है कि वे सब स्वार्थ के कारण ही प्रेम करते हैं। बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।। सोइ सुग्रीव कीन्ही कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।। व्याख्या : जो सद्बुद्धि का भाव भोग बल रूपी बाली से रात-दिन डरकर व्याकुल रहता था और जिसका तन घावों से ग्रसित था तथा चिन्ता में छाती जलती रहती थी। उसी सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को बुद्धि के भावों का राजा बना दिया। क्योंकि आत्मा रूपी राम का स्वभाव बहुत कृपालु होता है। जानत हूँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।। पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।। व्याख्या : ऐसे कृपालु परमात्मा को जानकर भी जो लोग त्याग देते हैं, वे क्यों नहीं विपत्ति के जाल में पड़ेंगे? पुन: सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को आत्मा रूपी राम ने बुला लिया और बहुत प्रकार से नृप नीति अर्थात् नर की धड़कन से उत्पन्न भावों का बुद्धि के भावों पर जो प्रभाव होता है, उसे नाना प्रकार से समझाया। कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाऊँ दस चारि बरीसा।। गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे माया के भावों को हरने वाला सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव! मैं आत्मा तो देह रूपी नगर की दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार के भावों में नहीं रमण करता हूँ। इसलिए वासना रूपी गर्मी मिट गयी है और तृप्ति रूपी वर्षा ऋतु आ गयी है। इसलिए मैं इसी तृप्ति की अवस्था में दृढ़ता रूपी पर्वत पर रहूँगा। अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदयँ धरेहु मम काजू।। जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।। व्याख्या : हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव! तुम दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव सहित इन्द्रियों के नगर पर राज करो। परन्तु हृदय में सदैव मुझ आत्मा का चिन्तन करते रहना और सुरता की खोज में लगे रहना। जब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव भाव इन्द्रियों में बरतने लग गया, तो आत्मा रूपी राम दृढ़ता रूपी पर्वत (कोश) पर सहजता में दृढ़ हो गए। दो0 प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रूचिर बनाइ। राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।। व्याख्या : पहले से देव भावों ने ऋष्यमूक कोश की नाड़ियों व कोशिकाओं को रूचिकर बना रखा था। ताकि आत्मा रूपी राम यहाँ आकर कुछ दिन निवास कर सके अर्थात् आत्मा को आकर्षित करने के लिए देव भावों ने पहले से ही ऋष्यमूक पर्वत रूपी कोश को निर्मलता के भावों से रूचिकर बना रखा था। सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुजंत मधुप निकर मधु लोभा।। कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए।। व्याख्या : निर्मल वैराग्य रूपी वन में सुमति के सुन्दर फूल शोभा बढ़ा रहे थे तथा अमृत रस के लोभ में दैवीय भावों रूपी भँवरें गुंजार कर रहे थे। कंद मूल रूपी सहज इच्छाएँ फलित हो रही थी। जब से आत्मा रूपी राम ऋष्यमूक पर्वत रूपी कोश में पहुँचे थे, तब से इच्छाओं की सहजता और बढ़ गयी थी। देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।। मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।। व्याख्या : उस मन को हरने वाले ऋष्यमूक कोश को देखकर लखन भाव सहित स्वरों को नियंत्रित करने वाले आत्मा रूपी राम वहाँ रहने लगे अर्थात् आत्म चेतना ऋष्यमूक कोश में स्थिर हो गयी। जब चेतना ऋष्यमूक कोश में लग जाती है तो दैवीय भाव भ्रमर, पक्षियों व मृग का रूप धारण करके आनन्द लेने लगते हैं और सिद्ध भाव व मन की एकाग्रता के भाव आत्मा की सेवा में लग जाते हैं। मंगलरूप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते।। फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।। व्याख्या : जब से आत्म चेतना ऋष्यमूक कोश में प्रवेश की तब से वैराग्य रूपी वन मंगलमय हो गया। स्थिरता रूपी सुन्दर शिला पर दोनों आत्मा व लखन भाव रूपी भाई सुखपूर्वक बैठ गए। अर्थात् ध्यान सुखपूर्वक ऋष्यमूक कोश में स्थिर हो गया और आत्म चेतना लखन भाव सहित वहाँ स्थिर हो गयी। कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।। बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब आत्म चेतना व लखन भाव दृढ़ता रूपी शिला पर ऋष्यमूक कोश पर स्थिर हो जाते हैं, तो नाना अनुभूतियाँ होने लगती हैं। उस अवस्था में आत्म चेतना नाना प्रकार से लखन भाव को अनुभूतियों को समझाने की प्रेरणा करती है। उसी को नाना कथाओं का कहना बोलकर लिखा गया है। उस समय भक्ति, वैराग्य, ज्ञान व धड़कन की मर्म समझ में आ जाती है और विवेक पैदा हो जाता है। उस अवस्था में अमृत रूपी वर्षा के बादल छा जाते हैं और आनन्द के भावों की गर्जना सुहावनी लगने लगती है। दो0 लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि। गृही बिरती रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे लखन भाव! देखो सुख भोग रूपी बादलों को देखकर आनन्द रूपी मयूरों का झुण्ड नाच कर रहा है। जैसे वैराग्यवान गृहस्थ परमात्मा के भक्त को देखकर प्रसन्न होता है। घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।। दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।। व्याख्या : मस्तिष्क रूपी आकाश में अहंकार के बादल गरज रहे हैं और बिना सुरता के मेरा मन भयभीत हो रहा है। कुण्डलिनी शक्ति चमक कर मस्तिष्क रूपी आकाश में वैसे ही स्थिर नहीं रह पाती है, जैसे मूर्ख के साथ प्रेम स्थिर नहीं रह पाता है। बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।। बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें।। व्याख्या : सुख भोग रूपी बादल देह रूपी भूमि के निकट आकर बरसने लगते हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान नम्र हो जाते हैं। सुख भोग रूपी वर्षा की बूँदों को दृढ़ता व संयम रूपी पर्वत ऐसे सहते हैं जैसे मूर्ख के वचनों को सन्त सह लेता है। अर्थात् संयम की दृढ़ता रहने पर साधक को सुख भोग विचलित नहीं कर पाते हैं। छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।। भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।। व्याख्या : सुख भोग रूपी वर्षा के जल से छोटी-छोटी कोशिकाओं रूपी नदियाँ उफन कर चलने लगी जैसे थोड़े से धन से ही मूर्ख इतराने लग जाता है। सहज सुख भोग रूपी जल कोशिकाओं के सम्पर्क में आते ही गंदा जल हो जाता है, जैसे जीव पैदा होकर माया में लिपट जाता है। समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सद्गुन सज्जन पहिं आवा।। सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई।। व्याख्या : धीरे-धीरे एकत्र होकर सुख रूपी जल भरने लगता है जैसे सज्जन व्यक्ति के पास धीरे-धीरे सद्गुण जमने लगते हैं। नदियों का पानी अर्थात् सुख भोग रूपी जल कोशिकाओं के माध्यम से चित रूपी समुद्र की ओर जाता है, जैसे जीव माया का हरण हो जाने पर अचल हो जाता है वैसे ही सुख भोग चित में समाकर अचल हो जाते हैं। इसी को प्रारब्ध के संस्कार कहा जाता है। वास्तव में साधना में ही ध्यान के माध्यम से ही सुख भोगों की प्रक्रिया व प्रारब्ध का जाल समझ में आ पाता है। दो0 हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखण्ड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।। व्याख्या : जब कोश व कोशिकाओं रूपी भूमि सुख भोग की लालसा रूपी घास से हरी-भरी हो जाती है, तो फिर साधना का रास्ता दिखना बन्द हो जाता है। जैसे पाखण्ड करने पर सद्ग्रंथों से दूरी हो जाती है। दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।। नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।। व्याख्या : वास्तव में ध्यान में भावों के विरोधाभास का नाना प्रकार से अनुभव होने लगता है। उसी अनुभूति को नाना प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। ध्यान में एक अवस्था ऐसी आती है जिसमें भाव आपस में जोर-जोर से बातें करने लगते हैं परन्तु बाहर आवाज नहीं आती है। उन्हीं भावों को मेढ़क की संज्ञा दी गयी है कि चारों तरफ को मेढ़क वृति के भावों की आवाज आने लगती है और तब ऐसा लगने लगता है मानों ब्रह्मचारियों का समुदाय वेदों का पाठ कर रहा हो। उस अवस्था में अनुभूति रूपी नए पत्ते खिलने लगते हैं और ऐसा लगने लगता है मानों साधक के मन में विवेक पैदा हो गया हो। अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।। खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।। व्याख्या : मदार और जवासा रूपी वासनाओं के पत्ते झड़ गए जैसे अच्छे राजा के आने पर दुष्टों का प्रभाव कम जाता है। उस अवस्था में ज्ञान रूपी राजा के प्रभाव के कारण दुष्टता की धूल भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध होने पर धारणा से दूरी बढ़ जाती है। ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।। निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।। व्याख्या : वासनाओं के शीतल हो जाने पर जो अनुभूति होती है, उसी को चन्द्रमा का प्रतीक लेकर लिखा गया है कि चन्द्रमा सम शीतल भाव शरीर रूपी पृथ्वी पर ऐसे सुशोभित होते हैं, जैसे परोपकारी पुरुष के पास सम्पत्ति शोभा देती है। अज्ञान रूपी रात्रि में वासना रूपी जुगनु ऐसे लगते हैं, जैसे अहंकारियों का समाज मिला हो। महाबृष्टि चलि फूटि किआरी। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारी।। कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।। व्याख्या : सुख भोग रूपी अति वृष्टि होने पर संयम रूपी क्यारियाँ फूट जाती हैं। जैसे संयम हटने पर शरीर की नाड़ियाँ बिगड़ जाती हैं। ऐसी अवस्था में चतुर साधक रूपी किसान ज्ञान रूपी खेती की निराई करते हैं जैसे विद्वान लोग मोह, मद व मान आदि के भावों का त्याग कर देते हैं। देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।। ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।। व्याख्या : देखने पर इच्छा रूपी चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं देते हैं जैसे देह बुद्धि होने पर धारणा दूर हो जाती है। साधना द्वारा जब दृढ़ता रूपी भूमि तैयार हो जाती है, तो विषय आसक्ति रूपी घास उग नहीं पाता है, जैसे परमात्मा के भक्त के हृदय में काम के भाव पैदा नहीं हो पाते हैं। बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।। जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।। व्याख्या : नाना प्रकार के भाव रूपी जंतुओं से शरीर रूपी पृथ्वी वैसे ही शोभा पाती है जैसे सुराज्य आने पर प्रजा की वृद्धि होती है। ज्ञान पैदा हो जाने पर इन्द्रियों रूपी पथिक थक कर खड़े हो जाते हैं, वैसे ही भाव रूपी पथिक जगह-जगह थक कर खड़े हो जाते हैं अर्थात् ज्ञान के पैदा हो जाने से भाव शान्त होने लग जाते हैं। दो0 कबहुँ प्रबल बह मारूत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।। व्याख्या : ध्यान में समझ में आने लगता है कि प्राण वायु कभी तीव्र हो उठती है, तो सुख भोग रूपी बादल छँटने लग जाते हैं, जैसे कुपुत्र के पैदा होने पर कुल के सद्आचरणों का नाश हो जाता है। दो0 कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।। व्याख्या : वास्तव में कभी ज्ञान रूपी दिन निकल आता है तो कभी अज्ञान रूपी अंधकार छा जाता है। भावों की अवस्था तो वैसी ही होती है जैसे सुसंगत से ज्ञान की वृद्धि होती है और कुसंग से ज्ञान की हानि होती है। बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।। फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।। व्याख्या : साधना की परिपक्वता बढ़ने पर सुख भोग रूपी वर्षा ऋतु भी चली जाती है और शान्ति रूपी शरद्ऋतु का आगमन हो जाता है। आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे लखन भाव! यह परम शान्ति रूपी शरद ऋतु बहुत सुहावनी लगती है। अब ज्ञान रूपी कांस शरीर रूपी भूमि पर छा गयी है और ऐसा आभास होने लगा है मानो सुख भोग रूपी वर्षा ऋतु को बुढ़ापा आ गया हो। उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।। सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।। व्याख्या : अब अगस्त्य तारा उदय होकर अर्थात् अग अ अस्त यानी भविष्य का लोप होने से सुख भोग की लालसा रूपी जल सूख गया जैसे लोभ के बढ़ने से संतोष का भाव सूख जाता है। अब कोशिकाओं रूपी नदियों में निर्मल भाव रूपी जल बहने लगा है जैसे संत के हृदय से मद व मोह आदि के भाव मिटने पर निर्मलता आ जाती है। रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।। जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।। व्याख्या : धीरे-धीरे कोश व कोशिकाओं रूपी तालाब व नदियों का सुख भोग रूपी जलसूखने लगता है, जैसे ज्ञानी लोग धीरे-धीरे ममता का त्याग करने लगते हैं। शान्ति रूपी शरद ऋतु का आगमन देखकर संतोष रूपी सुहावने खंजन पक्षी आ गए जैसे समय आने पर पुण्यों का फल प्रकट हो जाता है। पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।। जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।। व्याख्या : न तो आसक्ति रूपी कीचड़ है और न लालसा रूपी धूल है इसलिए देह रूपी भूमि ऐसे शोभा पाने लगती है जैसे नीति निपुण राजा के राज्य में सहजता होती है। सुख भोग रूपी जल सूख जाने से इच्छा रूपी मछलियाँ व्याकुल हो जाती हैं जैसे मूर्ख कुटुम्बि धन के अभाव में दु:खी हो जाता है। बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।। कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।। व्याख्या : बिना वासनाओं रूपी बादलों के मस्तिष्क रूपी आकाश ऐसे निर्मल हो जाता है जैसे परमात्मा का भक्त आशाओं का त्याग करने पर हो जाता है। उस अवस्था में समझ में आने लगता है कि कहीं-कहीं सुख भोग रूपी वर्षा थोड़ी-थोड़ी होती रहती है, जैसे किसी-किसी को ही परमात्मा की भक्ति मिलती है। दो0 चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरि भगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि।।16।। व्याख्या : ध्यान में ज्यो-ज्यों परिपक्वता आती जाती है वैसे-वैसे देह के विकार शरीर की आसक्ति को छोड़ना शु डिग्री कर देते हैं। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है कि तपस्वी, व्यापारी व भिखारी रूपी भाव देह रूपी नगर को छोड़कर ऐसे चलने लगते हैं जैसे परमात्मा की भक्ति मिल जाने पर चारों प्रकार के आश्रमी व्यर्थ के परिश्रम का त्याग कर देते हैं। सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।। फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा।। व्याख्या : जैसे मछली गहरे पानी में सुखी हो जाती है, वैसे ही परमात्मा की शरण की अनुभूति होने पर जीव को कोई कष्ट नहीं होता है। जब निर्मल भावों के तालाब में निर्मलता रूपी कमल खिल जाता है तो ऐसा लगता है मानो निर्गुण ब्रह्म ने ही सगुण रूप धारण कर लिया हो। गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।। चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।। व्याख्या : भोग रूपी भ्रमर अनुपम शब्द करते हुए गुंजार करने लगते हैं और सुंदर इच्छाओं रूपी पक्षियों के नाना शब्द होने लगते हैं। ज्ञान की चेतना रूपी चक्रवाक का मन अज्ञान रूपी रात्रि को देखकर वैसे ही दु:खी होने लगता है जैसे किसी दुष्ट व्यक्ति को परायी सम्पत्ति देखकर होता है। चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहहू न संकर द्रोही।। सरदातप नसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।। व्याख्या : लग्न रूपी चातक पक्षी रट लगाये हैं क्यंकि उसे परमात्मा रूपी जल की बहुत प्यास लगी हुई है। जैसे शंकर द्रोही अर्थात् विश्वास का विरोधी सुख के लिए खोजता रहता है। बिना विश्वास किए शंका नहीं मिट पाती है और बिना शंका मिटे सुख-शान्ति नहीं मिल पाती है। इसलिए विश्वास के भाव का विरोधी होने पर सुख नहीं मिल पाता है। शरद ऋतु रूपी इच्छाओं के ताप को चन्द्रमा रूपी शीतलता का भाव दूर कर देता है, जैसे संत के दर्शन पातकों को दूर कर देते हैं। देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई।। मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।। व्याख्या : इच्छा रूपी चकोरों के समुदाय चन्द्रमा रूपी शीतलता को देखकर ऐसे देख रहे होते हैं, जैसे परमात्मा के भक्त परमात्मा को प्राप्त कर टकटकी लगाकर देख रहे हों। चन्द्रमा रूपी वासनाओं की शीतलता से आसक्ति रूपी मच्छरों का वैसे ही नाश हो गया जैसे द्विज अर्थात् निर्मल चित में क्षोभ पैदा करने से सहजता के भावों का नाश हो जाता है। दो0 भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सद्गुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।। व्याख्या : भोग वासना रूपी वर्षा के कारण जो आसक्ति रूपी जीव पैदा हो गए थे, वे शान्ति व संतोष रूपी शरद ऋतु देखकर वैसे ही नष्ट हो गए, जैसे सत्गु डिग्री मिल जाने पर भ्रम व संशयों के समुदाय नष्ट हो जाते हैं। बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।। एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीति निमिष महुँ आनौं।। व्याख्या : भोगवासना रूपी वर्षा ऋतु के जाने के बाद शान्ति स्वरूप शरद ऋतु आ गयी परन्तु हे लखन भाव! अभी तक सुरता रूपी सीता की खबर नहीं मिली है। एक बार कैसे भी सुरता की खबर मिल जाए, तो काल को भी जीत कर क्षणमात्र में सुरता को ले आऊँगा। कतहुँ रहउ जौं जीवित होई। तात जतन करि आनउँ सोई।। सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।। व्याख्या : अगर सुरता रूपी सीता कहीं पर भी जीवित होगी, तो मैं युक्ति द्वारा उसे ले आऊँगा। हे लखन भाव! सुदबुद्धि रूपी सुग्रीव ने भी मेरी सुध छोड़ दी है अर्थात् सद्बुद्धि के भाव ने भी इन्द्रियों के राज को प्राप्त करके मुझ आत्मा को भुला दिया है। जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।। जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा की सपनेहुँ कोहा।। व्याख्या : जिस प्रेरणा रूपी बाण से मैंने भोग बल रूपी बाली को मारा है, उसी प्रेरणा द्वारा मूढ़ सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव की देह बुद्धि (काली) को मारूँगा। जिसकी कृपा से मद व मोह के भाव मिट जाते हैं, वो आत्मा रूपी राम क्या सपने में भी क्रोध कर सकते हैं? जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।। लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।। व्याख्या : आत्मा के इस चरित्र को वे ज्ञानी व मुनि लोग ही जान पाते हैं जो आत्म चिन्तन में अनुरक्त होते हैं। लखन भाव ने जब आत्मा रूपी राम को क्रोध करते देखा तो प्रेरणा रूपी धनुष बाण लेकर तैयार हो गया। दो0 तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव। भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को प्रेरणा की कि हे तात्! तुम सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को वासनाओं का भय दिखाकर ले आवो। वास्तव में जब वासना के लक्षणों का ज्ञान होता है तो तुरन्त वासना त्याग करने की अवस्था आ जाती है। अत: आत्मा रूपी राम यही प्रेरणा करते हैं कि सद्बुद्धि के भाव को वासनाओं के लक्षणों का आभास कराकर भय दिखाकर वासनाओं से हटाकर ले आवो। इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।। निकट जाइ चरनन्हि सि डिग्री नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।। व्याख्या : इधर को प्राण की तरंगों से अनन्य बुद्धि हनुमान ने प्रेरणा प्राप्त करके विचार किया कि सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने आत्मा रूपी राम के कार्य को भुला दिया है। इसलिए अनन्य बुद्धि के भाव ने सद्बुद्धि के भाव को साम, दाम, दण्ड व भेद की चारों नीतियों द्वारा समझाया। सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।। अब मारूतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को बहुत डर लगा कि विषयों की आसक्ति ने मेरे ज्ञान का हरण कर लिया था। इसलिए हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम बुद्धि रूपी सबी वानरों के समूहों को सुरता की खोज के लिए इधर-उधर सब जगह भेजो। कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरे कर ता कर बध होई।। तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।। व्याख्या : सब बुद्धि रूपी वानरों से कह दो कि अगर पाख महुँ अर्थात् सद्गुणों से युक्त होकर सुरता की खोज लगा कर नहीं आए तो सब बुद्धि रूपी वानर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव द्वारा मारे जायेंगे। वास्तव में ध्यान की अवस्था में समझ में आता है कि बुद्धि के अनेक भाव होते हैं और अगर बुद्धि के भाव सद्बुद्धि के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे आपसी भाव द्वन्द्व में शेष हो जाते हैं और सद्बुद्धि का भाव ही प्रबलता से बचा रह पाता है। तब ऐसी अवस्था को देखकर अनन्य बुद्धि के भाव ने सभी बुद्धि के भाव रूपी दूतों को बुलाया और सबको समान गुरूत्व देकर समझाया। भय अ डिग्री प्रीति नीति देखराई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।। एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।। व्याख्या : वासनाओं का भय और आत्म प्रेम की नीति दिखाकर सभी बुद्धि रूपी वानर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के सामने समर्पण करते हुए चले। उस समय लखन भाव भी इन्द्रियों के पुर में आ गया अर्थात् लखन भाव पैदा हो गया। लखन भाव के क्रोध को देखकर बुद्धि रूपी वानर इधर-उधर को भागने लगे। वास्तव में जब लखन भाव वासनाओं के लक्षणों को लखने (जानने) लगता है, तो बुद्धि के भावों में हलचल मच जाती है। उसे ही वानरों का इधर-उधर दौड़ना कहा गया है। दो0 धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार। ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालि कुमार।।19।। व्याख्या : लखन भाव ने वासनाओं के लक्षणों को जानकर इच्छा रूपी धनुष पर संयम रूपी प्रत्यंचा चढ़ाकर कहा कि मैं समस्त वासना रूपी नगर को जला दूँगा। तब इन्द्रिय वासना रूपी नगर को व्याकुल देखकर भोग बल रूपी बाली से उत्पन्न दृढ़ संयम रूपी अंगद का भाव आया। चरन नाइ सि डिग्री बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।। क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।। व्याख्या : तब दृढ़ संयम रूपी अंगद भाव ने लखन भावके सामने समर्पण करते हुए विनती की तो लखन भावने अभय कर दिया। लखन भाव को क्रोधित हुआ सुनकर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने व्याकुल होते हुए कहा। सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बनिती समुझाउ कुमारा।। तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।। व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम तारा रूपी इन्द्रिय बुद्धि को साथ लेकर जाओ और लखन भाव को समझाकर प्रार्थना करो। तब अनन्य बुद्धि का भाव तारा रूपी इन्द्रिय बुद्धि भाव को लेकर लखन भाव के सामने गया और आत्मा के सुयश का बखान करके समर्पण का भाव दिखाया। करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।। तब कपीस चरनन्हि सि डिग्री नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।। व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान लखन भाव को विनती करके इन्द्रिय वासना रूपी नगर में ले आए और चरण धोकर अर्थात् सहजता में दृढ़ता लाकर पलँग (यानी पल अ अँग अर्थात् जिस जगह से इन्द्रिय अंगों का आभास होता है) पर बैठाया। तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने चरणों में सीस झुकाया अर्थात् समर्पण किया और तब लखन भाव ने सद्बुद्धि के भाव को गले से लगा लिया। नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।। सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहुबिधि समुझावा।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि का भाव बोला कि हे नाथ! विषयों के मद के बराबर दूसरा कोई मद नहीं होता है। विषयों का मद तो मन को वश में रखने वाले मुनियों के मन में भी क्षण भर में मोह पैदा कर देता है। सद्बुद्धि के भाव की ऐसी विनयी वाणी को सुनकर लखन भाव को बहुत अच्छा लगा। तब लखन भाव ने सद्बुद्धि के भाव को बहुत प्रकार से समझाया। पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।। व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने तब सारी बात लखन भाव को बतायी कि किस प्रकार बुद्धि के भावों रूपी वानर सुरता रूपी सीता की खोज में गए हैं। दो0 हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ। रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का भाव दृढ़ता रूपी अंगद आदि बुद्धि के भावों को साथ लेकर लखन भाव के साथ आत्मा रूपी राम के पास आए। कभी भावों का आत्मा के पास आना, कभी इन्द्रियों में रमण करना, कभी सुरता की खोज करना आदि-आदि क्रियाएँ इतनी तेजी से होती हैं, जिनको ध्यान की अवस्था में ही ध्यान से ही समझा जा सकता है। नाइ चरन सि डिग्री कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।। अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।। व्याख्या : सद्बुद्धि का भाव समर्पण करते हुए बोला कि हे नाथ! विषयों में रमण करना मेरा दोष नहीं है। क्योंकि आपकी माया की प्रबलता के कारण ही विषयों में जीव उलझता है। जब आप प्रेरणा करते हैं, तभी जाकर जीव विषयों से बाहर आ पाता है। बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पाँवर पसु कपि अति कामी।। नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी स्वामी! सब स्वर, नर की धड़कन व मन की एकाग्रता सब विषयों के अधीन होते हैं। फिर मुझ चंचल बुद्धि रूपी वानर की क्या बात है? मेरा तो स्वभाव ही काम का है। नारी के नयनों रूपी बाण उस जीव को नहीं लगता है, जो क्रोध व अज्ञान रूपी रात्रि में भी जागा हुआ रहता है। लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।। यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।। व्याख्या : जो जीव लोभ की पाश में नहीं बँधता है, वो तो निर्मल आत्मा स्वरूप परमात्मा का ही रूप होता है। यह परम निर्मलता की अवस्था साधन के द्वारा नहीं आ पाती है। इसे तो कोई-कोई बिरला जीव ही आप परमात्मा की कृपा से प्राप्त करता है। तब रघुपति बोले मुसुकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।। अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम मुस्कराकर बोले अर्थात् सहज रूप से प्रेरणा की कि हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव! तुम मुझे भाव रत भरत भाव के समान प्रिय हो। इसलिए अब ऐसा उपाय कीजिए जिससे सुरता रूपी सीता की खबर मिल सके। दो0 एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ। नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरूथ।।21।। व्याख्या : जब ध्यान में इस प्रकार का चिन्तन चलता है तो बुद्धि के नाना भावों के समूह के समूह आत्मोन्मुखी होकर आत्मा के पास आ जाते हैं। उसी अनुभूति को अनेक रंगों के वानर समूह सब दिशाओं में दिखायी देना बोलकर लिखा गया है। बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरूख जो करन चह लेखा।। आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।। व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने बुद्धि रूपी वानरों की जो सेना देखी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि जो वर्णन करने का प्रयास करता है, वो मूर्ख ही होगा। वास्तव में बुद्धि के इतने भाव होते हैं जिनका वर्णन करना सम्भव ही नहीं होता है। सब बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी राम के सामने समर्पित हो गए और आत्मा रूपी राम को देखकर धन्य हो गए। अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।। यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।। व्याख्या : इन चौपाइयों में बहुत गहरा साधना का रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में आत्म तत्व में ऐसी क्षमता होती है कि वो सबमें एक साथ समान रूप से आभासित हो सकता है। अत: बुद्धि रूपी वानरों के भाव जब आत्मोन्मुखी होकर आत्मा के सामने आए तो सभी भावों में एक आत्मा आभासित हो उठी। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा है कि बुद्धि की भाव रूपी सेना में एक भी भाव रूपी वानर ऐसा नहीं था, जिसकी आत्मा रूपी राम ने कुशलक्षेम नहीं पूछी हो। इसमें आत्मा रूपी राम की कोई बड़ाई नहीं है क्योंकि आत्म तत्व तो विश्व के रूप में सर्वव्यापक होता है। ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।। राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।। व्याख्या : सभी बुद्धि रूपी वानर भाव आज्ञा अर्थात् प्रेरणा पाकर जहाँ-तहाँ खड़े हो गए। तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने सबको समझाकर कहा कि यह आत्मा रूपी राम का कार्य है और मेरा अनुरोध है कि सभी बुद्धि रूपी वानरों के समूह चारों तरफ को जाओ। जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।। अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।। व्याख्या : चारों दिशाओं में जाकर प्राण रूपी जनक से उत्पन्न सुरता रूपी सीता को खोजो और एक महीने में सुरता रूपी सीता की खोज करके वापस आ जाना। जो एक मास के भीतर बिना सुरता की खोज किए लौटकर आयेगा, वो मुझ सद्बुद्धि के द्वारा मारा जायेगा। इन चौपाइयों में बहुत भाव विज्ञान छुपा हुआ है। वास्तव में किसी भी प्रकार के भावों का एक महीना या चालीस दिन का समय होता है, उस दौरान या तो वे बहुत बलवान बन जाते हैं और या फिर विरोधी भावों से पराजित होकर शान्त हो जाते हैं। इसलिए सद्बुद्धि का भाव कहता है कि अगर तुम महीने भर में सुरता की खोज नहीं कर सके तो तुम जान लेना तुम्हारा मरण निश्चित है। इसलिए साधना पंथों में एक महीने का, दो महीने का या तीन महीने का निरन्तर अभ्यास बताते हैं ताकि साधना के भाव प्रबल होकर साधक को परमात्मा से जोड़ सकें। दो0 बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत। तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।। व्याख्या : सद्बुद्धि के वचन सुनकर समस्त बुद्धि के भावों रूपी वानर जहाँ-तहाँ के लिए तुरन्त चल दिए। तब सद्बुद्धि के भाव ने दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान, प्रेरक बुद्धि रूपी नल भाव को बुलाया। सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।। सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेहु सब काहू।। व्याख्या : हे प्रेरक बुद्धि रूपी नील, दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान व धीर बुद्धि रूपी जामवंत! सुनो - तुम सब भाव मिलकर दक्षिण दिशा में जाओ और सबसे सुरता रूपी सीता के बारे में पूछो। प्रमस्तिष्क को दक्षिण दिशा माना जाता है, जहाँ पर नाना प्रकार की वासनाएँ रहती हैं। इसलिए सद्बुद्धि का भाव कहता है कि तुम सब भाव प्रमस्तिष्क में प्रवेश करो और वहाँ पर सुरता को खोजने का प्रयास करो। प्रमस्तिष्क में तामसिक, राजसिक व सात्विक सभी प्रकार की इच्छाएँ व वासनाएँ होती हैं। प्रमस्तिष्क में जब सुरता चली जाती है तो वहाँ से सुरता को खोजना बहुत मुश्किल हो जाता है। प्रमस्तिष्क कोश में तो अनन्य, प्रेरणा, दृढ़ व धीर बुद्धि के भाव ही प्रभावी हो सकते हैं। इसलिए इन सबको दक्षिण दिशा में जाने की बात कही गयी है। मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।। भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।। व्याख्या : बुद्धि रूपी वानर भावों तुम मन, वचन, कर्म से उपाय करो और आत्मा रूपी राम के कार्य को सुधारो अर्थात् सुरता की खोज करो। सूर्य को पीठ से और आग को सामने से सेवन करना चाहिये परन्तु स्वामी की सेवा तो निष्कपट होकर सर्व भावों से करनी चाहिये। तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।। देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।। व्याख्या : माया का त्याग करके परलोक का सेवन करना चाहिये अर्थात् माया का त्याग करके ही आत्म चिंतन करना चाहिये। तभी जाकर भावों से उत्पन्न समस्त कष्ट मिट सकते हैं। शरीर धारण करने का एक ही फल होता है कि काम का परित्याग करके परमात्मा का भजन करना चाहिये। सोइ गुनग्य सोई बड़भागी। जो रघुबीर चरन अनुरागी।। आयसु मागि चरन सि डिग्री नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।। व्याख्या : वही गुनज्ञ व बड़ा भाग्यशाली होता है जो परमात्मा के चरणों में अनुराग रखने वाला होता है। तब सब बुद्धि के भावों रूपी वानरों ने समर्पित होते हुए आत्मा की प्रेरणा माँगी और सब बुद्धि के भाव परमात्मा का स्मरण करते हुए प्रसन्न होते हुए चले। पाछें पवन तनय सि डिग्री नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।। परसा सीस सरोरूह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।। व्याख्या : सबसे बाद में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने सीस नवाया। आत्मा रूपी राम ने यह जानकर की अनन्य बुद्धि का भाव कार्य सिद्ध कर सकता है। अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को अपने निकट बुलाया। तब अनन्य बुद्धि के भाव के सिर पर आत्मा रूपी राम ने हाथ फेरा अर्थात् प्रेरणा की और हाथ की अंगूठी उतार कर दी। मुद्रिका के प्रतीक का रहस्य साधना की पद्धति से है। जब प्राण (मारूत) बहुत ही सूक्ष्म हो जाता है और परमात्मा के प्रति अनन्यता का भाव आ जाता है, तब प्राण मुद्रा लगान से धीरे-धीरे उर्ध्वगामी होने लगता है। अत: आत्मा रूपी राम मुद्रिका देकर अनन्य भाव को समझाने का प्रयास करते हैं कि अगर वासनाओं के चक्र में फँस जाओ तो प्राण की मुद्रा लगाकर पार हो जाना और सुरता को भी मुद्रा का सहारा देना। जिससे सुरता पुन: आत्मोन्मुखी होकर सचेत हो जाए। बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।। हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।। व्याख्या : हे अनन्य भाव रूपी हनुमान! तुम बहुत प्रकार से सुरता रूपी सीता को समझाना और तुम मेरा (आत्मा) बल और विरह कहकर शीघ्र लौटकर आ जाना। अनन्यता का भाव केवल सुरता को सचेत कर सकता है परन्तु सुरता को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता तो केवल आत्मा की ही होती है। अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने तब अपना जन्म सफल कर माना और हृदय में परमात्मा का स्मरण करते हुए चला। जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।। व्याख्या : हालाँकि आत्मा रूपी राम सब कुछ जानते हैं परन्तु फिर भी वे दैवीय भावों के त्राता राजनीति अर्थात् परम रहस्य की नीति की रक्षा करते हैं। दो0 चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह। राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर बुद्धि के भाव रूपी वानर वैराग्य रूपी वन, नाड़ियों रूपी नदियों, कोश रूपी तालाब, कोशिकाओं रूपी पर्वत व गुप्त नाड़ियों रूपी कन्दराओं में सुरता रूपी सीता को खोजते हुए आत्मा रूपी राम के कार्य में लीन होते हुए चले। जब आत्म चिन्तन में बुद्धि के भाव लीन हो जाते हैं, तो बुद्धि के भावों का तन के प्रति प्रेम भी कम जाता है। कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।। बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिं।। व्याख्या : जब नाड़ियों, कोशों व कोशिकाओं में भ्रमण करते हुए किसी आसुरी भाव से भेंट हो जाती है, तो सभी भाव प्रेरणा रूपी चपत मार कर उसके प्राण हर लेते हैं। बुद्धि के भाव बहुत प्रकार से वैराग्य रूपी वन में सुरता रूपी सीता की खोज करते हैं तथा जब कोई मन की एकाग्रता का भाव मिल जाता है तो सभी बुद्धि के भाव उसे घेर लेते हैं। लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।। मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।। व्याख्या : जब बुद्धि के भाव नाना आसुरी भावों के सम्पर्क में आते हैं तो विषय सुख भोगों की प्यास लग आती है और उस वैराग्य रूपी घने जंगल में विषय रस रूपी जल मिल नहीं पाता है। अत: अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने विचार किया कि ये बुद्धि के भाव विषय रस रूपी जल के बिना मरना चाहते हैं। चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबर एक कौतुक पेखा।। चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहु तक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।। व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने दृढ़ता रूपी पर्वत के शिखर पर चढ़कर देखा अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव ने स्थिर होकर देखा कि एक नाड़ी रूपी गुफा में एक आश्चर्य दिखायी दिया अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव को समझ में आया कि प्रमस्तिष्क से पहले एक अति सूक्ष्म नाड़ी होती है, जिसमें से चक्रवाक, बगुले और हंस रूपी पक्षी निकलते हैं और घूसते हैं। अर्थात् उस सूक्ष्म नाड़ी से परमात्मा के प्रति लग्न रूपी चकवा पक्षी, पाखण्ड व दिखावा रूपी बगुला पक्षी और ह कार सकार रूपी हंस के भाव घूसते और निकलते हैं। गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।। आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।। व्याख्या : उस अवस्था को देखकर अनन्य बुद्धि का भाव दृढ़ता रूपी पर्वत से उतर कर आया और सब बुद्धि के भाव रूपी वानरों को ले जाकर दिखाया। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को आगे करके सब भाव नाड़ी रूपी गुफा में घुस गए। वास्तव में ध्यान में समझ में आता है कि एक ऐसी सूक्ष्म नाड़ी होती है, जिसमें प्रवेश करके भक्ति की अवस्था प्राप्त की जा सकती है। उस सूक्ष्म नाड़ी में परमात्मा की साधना के साथ कभी-कभी सांसारिक भाव भी उठते रहते हैं। उन्हीं को बगुले व हंस के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। दो0 दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज। मंदिर एक रूचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।। व्याख्या : जब भक्ति रूपी सूक्ष्म नाड़ी में अनन्य बुद्धि, दृढ़ बुद्धि, धीर बुद्धि व प्रेरक बुद्धि आदि के भाव प्रवेश करते हैं, तो वे अन्दर जाकर सद्गुण रूपी तपवन देखने लगते हैं, जिसमें करूणा, दया, मैत्री व सहयोग रूपी कमल खिले होते हैं। वहाँ पर भक्ति रूपी नारी तप के समूह के प्रकाश के रूप में बैठी दिखायी पड़ती है। दूरि ते ताहि सबन्हि सि डिग्री नावा। पूछें निज वृतांत सुनावा।। तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।। व्याख्या : सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने दूर से सीस नवाया अर्थात् दूर से ही समर्पण कर दिया और पूछने पर अपनी सारी बात बता दी। तब भक्ति रूपी नारी ने कहा कि तुम सब भक्ति रूपी जलपान करो और सद्गुण रूपी सुंदर व सरस फलों का सेवन करो। मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।। तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।। व्याख्या : सब बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने भक्ति रूपी जल में स्नान किया और सद्गुण रूपी मधुर फल खाकर सब भक्ति रूपी नारी के पास चले आए। तब भक्ति रूपी नारी ने अपनी सब कथा सुनाई और कहा कि अब मैं वहाँ जाऊँगी जहाँ पर आत्मा रूपी राम हैं। वास्तव में जब भक्ति के भाव के साथ अनन्य बुद्धि का मिलन हो जाता है, तो भक्ति भी द्वैत भाव को छोड़कर अद्वैत हो जाती है। अद्वैत हो जाना ही भक्ति रूपी नारी का आत्मा रूपी राम के पास जाना कहा गया है। मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।। नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु के तीरा।। व्याख्या : तब भक्ति रूपी नारी ने कहा कि तुम सब आँख बन्द करके गुफा से बाहर चले जाओ। आँख बन्द करने का तात्पय पूर्ण विश्वास करने से होता है। तुम्हें सुरता रूपी सीता अवश्य मिलेगी, पश्चाताप मत करो। तर्क के द्वारा भक्ति की सीमा को पार नहीं किया जा सकता है। अगर भक्ति की सीमा को पार करना है तो पूर्ण विश्वास करना ही होगा। उसे ही आँख बन्द करके जाना बताया गया है। जब पूर्ण विश्वास हो जाता है तो पश्चाताप स्वत: बन्द हो जाता है और सुरता में लग्न लग जाती है। पूर्ण विश्वास (आँख बन्द) हो जाता है तो साधक भक्ति की सीमा को पार करके भावों के भव सागर के तीर पर पहुँच जाता है। अर्थात् भक्ति के बल से भावों का भवसागर स्पष्ट हो जाता है और साधक की साधना आगे बढ़ने लग जाती है। सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।। नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगित प्रभु दीन्ही।। व्याख्या : भक्ति रूपी नारी तो अद्वैत होकर आत्मा रूपी राम के पास चली गयी और आत्मा रूपी राम के चरण कमलों में सीस नवाया अर्थात् आत्मा में भक्ति का भाव लीन हो गया। भक्ति रूपी नारी ने नाना प्रकार से प्रार्थना की, तब आत्मा रूपी राम ने अनपायनी अर्थात् अचल भक्ति प्रदान कर दी। दो0 बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस। उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।। व्याख्या : तब भक्ति रूपी नारी आत्मा रूपी प्रेरणा पाकर बदरीवन अर्थात् सहज निष्काम अवस्था में अवस्थित होकर आत्मा रूपी राम के चरणों का हृदय में चिंतन करने लगी। जिन चरणों की बुद्धि व विश्वास के भाव भी वन्दना करते हैं। इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।। सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।। व्याख्या : इधर को भाव रूपी भवसागर के तट पर बुद्धि के भाव रूपी वानर विचार करने लगते हैं कि अवधि बीतने में आ रही है और कार्य कुछ नहीं हुआ। अर्थात् सुरता का अभी पता नहीं लग पा रहा है। सब बुद्धि के भाव आपस में मिलकर बातें करने लगते हैं कि बिना सुरता रूपी सीता को खोजकर क्या करेंगे? कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।। इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।। व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि के भाव रूपी अंगद ने कहा कि हमारी तो दोनों तरफ से मृत्यु आ गयी है। इधर सुरता रूपी सीता की खोज नहीं मिल रही है और उधर बिना खोज किए फिरने पर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव मार देंगे। वास्तव में बुद्धि के भावों का आपसी मंथन ध्यान की अवस्था में अच्छी तरह से समझ आ पाता है। पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।। पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।। व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव कहता है कि मुझे तो भोग बल रूपी पिता के मरते ही सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव मार देते परन्तु आत्मा रूपी राम ने मेरी रक्षा कर ली। इसमें सद्बुद्धि के भाव का कोई अहसान नहीं है। बार-बार दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव सब बुद्धि के भावों से कहता है कि अब मरना निश्चित है, इसमें संशय नहीं है। अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।। छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस बचन कहत सब भए।। व्याख्या : बुद्धि के अन्य भाव दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद के वचन सुनते हैं, परन्तु कुछ बोल नहीं पाते हैं। इस प्रकार का विचार मंथन जब चलता है तो सब बुद्धि के भाव गहन सोच में मग्न हो जाते हैं। फिर सब ऐसा वचन कहने लगते हैं। हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना। नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना।। अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।। व्याख्या : हे युवराज! हम बिना सुरता की खोज लगाए वापस जायेंगे ही नहीं अर्थात् दृढ़ बुद्धि के भाव के प्रभाव से सभी बुद्धि के भावों में भी सुरता की खोज लगाने की दृढ़ता आ गयी। ऐसा कहकर सब बुद्धि के भाव भावरूपी भवसागर के तट पर दृढ़ता करके बैठ गए। उसी को कुश बिछाकर बैठना बताया गया है। वास्तव में जब बुद्धि के विभिन्न भावों में मंथन चलता है तो जो भाव ज्यादा प्रबल होता है, तो बाकी भाव भी उसका अनुसरण करने लगते हैं। जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेश बिसेषी।। तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु।। व्याख्या : जब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव को धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने दु:खी देखा तो धीर बुद्धि का भाव विशेष उपदेश करने लगा कि हे तात। आत्मा रूपी राम केवल नर (धड़कन) नहीं हैं। वे तो निर्गुण ब्रह्म, अजेय व अजन्मा हैं। हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी।। व्याख्या : हम सब बुद्धि के भाव बड़े भाग्यशाली हैं कि हम निरन्तर गुणों में बरतते हुए ब्रह्म में अनुराग रखते हैं। दो0 निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।। व्याख्या : इस दोहे में बहुत गम्भीर रहस्य पर से पर्दा उठाया गया है। इस दोहे में धीर बुद्धि रूपी जामवंत का भाव समझ लेता है कि परमात्मा का अवतरण साधक की इच्छा के अनुसार स्वरों (सुर) द्वारा शरीर (महि) व इन्द्रियों (गो) में ज्ञान (द्विज) के रूप में होता है। इसलिए जो साधक गुणों में बरतने की इच्छा करते हैं, वे मोक्ष की इच्छा का भी त्याग करके परमात्मा में लीन रहते हैं। एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती।। बाहेर होई देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।। व्याख्या : इस प्रकार बुद्धि के भावों के आपसी विचार मंथन से समता की दिव्य दृष्टि का भाव पैदा हो जाता है। उसी को प्रतीकों का सहरा लेकर गुफा से सम्पाती का बाहर आना बोलकर लिखा गया है। जब समता की दिव्य दृष्टि रूपी सम्पाती का भाव बुद्धि के भावों रूपी बहुत से वानरों को देखता है तो मन में कहता है कि आज तो परमात्मा ने बहुत सारा भोजन भेज दिया है। वास्तव में बुद्धि के भाव जब परमात्मोन्मुखी होते हैं, तो उन्हीं के बल से समता की दिव्यदृष्टि पैदा होती है। अत: बुद्धि के भावों को सम्पाती अपना भोजन बताता है। आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।। कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।। व्याख्या : समता रूपी दिव्य दृष्टि का सम्पाती भाव कहता है कि आज मैं सब बुद्धि के भाव रूपी वानरों का भक्षण करूँगा क्योंकि बिना बुद्धि के भावों के अहार के बहुत दिनों से मैं भूखा मर रहा था। कभी भी ऐसा भर पेट अहार नहीं मिला परन्तु ध्यान की क्रिया (विधि) ने आज एक बार में ही इतना अहार दे दिया अर्थात् दिव्यता की दृष्टि को इतना बल प्रदान कर दिया। डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।। कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।। व्याख्या : दिव्य दृष्टि रूपी सम्पाती की बातें सुनकर बुद्धि के भावों रूपी सब वानर डर गए और कहने लगे कि अब हमारा मरण निश्चित है। तब दिव्य दृष्टि रूपी सम्पाती को देखकर सब बुद्धि रूपी वानर उठ खड़े हुए अर्थात् बुद्धि के भावों पर दिव्य दृष्टि का प्रभाव पड़ने लगा। तब धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने मन में विशेष विचार किया। कह अंगद बिचारी मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।। राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।। व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव मन में विचार कर बोला कि धन्य है जटायू जिसके समान कोई नहीं है। जिसने आत्मा रूपी राम के कार्य के लिए तन त्याग दिया अर्थात् दिव्य दृष्टि का जटायु रूपी भाव धन्य है, जिसने आत्मा रूपी राम में लीन होने के लिए देहाभास का त्याग कर दिया और वह भाग्यशाली दिव्य दृष्टि रूपी जटायु परमात्मोन्मुखी होकर परमात्मा में ही लीन हो गया। सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी।। तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।। व्याख्या : बुद्धि के भावों की हर्ष व शोक से युक्त वाणी को सुनकर समता की दिव्य दृष्टि रूपी सम्पाती का भाव बुद्धि रूपी वानरों के निकट आया तो बुद्धि रूपी वानर डर गए। वास्तव में ध्यान में ही समझ में आता है कि दिव्य दृष्टि ज्योहिं निकट आने लगती है त्योहिं बुद्धि के भावों में खलबली मच जाती है। तब समता रूपी सम्पाति ने बुद्धि के भावों को अभय करके दिव्य दृष्टि रूपी जटायू की कथा पूछी। तब बुद्धि के भावों ने सब कथा सुनायी। सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी।। व्याख्या : समता की दिव्य दृष्टि रूपी सम्पाती ने दिव्य दृष्टि रूपी सम्पाती की करणी सुनकर आत्मा रूपी राम की महिमा का बहुत प्रकार से वर्णन किया। दो0 मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि। बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि।।27।। व्याख्या : तब समता रूपी सम्पाती बुद्धि के भावों से बोला कि मुझे भाव रूपी भव सागर के किनारे ले चलो, जिससे मैं तिलांजलि दे सकूँ अर्थात् तीनों गुणों का ही पूर्ण रूप से त्याग कर दूँ। तब मैं तुम लोगों की प्रेरणा (वचन) से सहायता करूँगा, जिससे तुम जिस सुरता रूपी सीता को खोज रहे हो, पा जावोगे। मैं पाठकों को जटायु और सम्पाती के रहस्य को और स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। वास्तव में गिद्ध दिव्य दृष्टि का प्रतीक होता है। वैसे तो दिव्य दृष्टि अनेक प्रकार की होती है परन्तु ज्ञान की दिव्य दृष्टि और समता की दिव्य दृष्टि ही मुख्य होती है। जब साधक को दिव्य दृष्टि का आभास होने लगता है, तो उसके अन्दर आत्मा रूपी सूर्य को भी वश में कर लेने की चाह प्रबल हो उठती है। उसी को जटायु व सम्पाती का सूर्य के पास पहुँचने का प्रयास करना बताया गया है। परन्तु आत्मा रूपी सूर्य का तेज दिव्य दृष्टि के भाव भी नहीं झेल पाते हैं और जटायु रूपी दिव्यता का भाव वापस आ जाता है परन्तु समता रूपी सम्पाती आगे बढ़ने का प्रयास करता है, तो आत्मा रूपी सूर्य समता रूपी सम्पाती के पंख जला देता है। जिससे समता का भाव शान्त हो जाता है। परन्तु जब समता का भाव बुद्धि के भावों के सम्पर्क में आता है तो पुन: उत्साहित हो उठता है। उसी को सम्पाती के पुन: पंख उग आना बोलकर लिखा है। अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।। हम द्वौ बंधु प्रथम तरूनाई। गगन गए रबि निकट उड़ाई।। व्याख्या : समता रूपी सम्पाती ने अपने छोटे भाई ज्ञान की दिव्य दृष्टि रूपी जटायु की सब क्रियाएं करके सब बुद्धि के भावों को अपनी कथा बतायी कि युवा अवस्था में हम दोनों भाई आकाश मण्डल में उड़कर आत्मा रूपी सूर्य के निकट पहुँच गए। तेज न सहि एक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा।। जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा।। व्याख्या : ज्ञान का दिव्य दृष्टि रूपी जटायु जब आत्म सूर्य के तेज को सह नहीं सका तो वापस लौट आया परन्तु मैं (समता रूपी दिव्य दृष्टि) अभिमानी आत्म सूर्य के निकट चलता ही गया। आत्म सूर्य के तेज से मेरे अहंकार रूपी पंख जल गए और मैं व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा अर्थात् पुन: देहभाव में आ गया। मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखि करि मोही।। बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा। देह जनित अभिमान छड़ावा।। व्याख्या : तब चन्द्रमा के समान मन के शीतल भाव को मुझ पर दया आ गयी, तो मुझे नाना प्रकार से प्रेरणा करके ज्ञान समझाया और देहाभास के अभिमान से मुझे छुड़ाया। त्रेताँ बह्य मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।। तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।। व्याख्या : तब मुझसे कहा था कि सतोगुण की प्रबलता होने पर आत्मा का मन में अवतरण होगा अर्थात् आत्ममय चिंतन होगा, तब सुरता का काम रूपी राक्षस हरण कर लेंगे, तो सुरता की खोज करने के लिए बुद्धि रूपी वानर आयेंगे, तब उनसे भेंट होने पर निर्मलता आ जायेगी। जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।। मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।। व्याख्या : और तेरे पंख उग आयेंगे, चिन्ता मत करना अर्थात् अनन्य आदि बुद्धि के भावों से मिलन होने पर पुन: समता की दिव्य दृष्टि में स्फूर्ति आयेगी। जब नव स्फूर्ति आ जाए तब बुद्धि रूपी वानरों को सुरता रूपी सीता को दिखा देना। आज मन के शीतलता रूपी चन्द्रमा भाव की बात सत्य हो गयी है। मेरी प्रेरणा का अनुसरण करके अब तुम (बुद्धि के भाव) आत्मा रूपी राम के कार्य को सिद्ध करो अर्थात् सुरता रूपी सीता की खोज करो। गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका।। तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई।। व्याख्या : त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। त्रिकूट पर्वत का बहुत गहरा रहस्य है। कुण्डलिनि शक्ति गर्दन से थोड़ा ऊपर तक तो एक ही होती है परन्तु गर्दन पर आकर ईड़ा-पिंगला व सुष्मना तीन नाड़ियों में विभक्त हो जाती है। तीनों नाड़ियों के छँटने के स्थान को ही त्रिकूट पर्वत का प्रतीक कहा गया है। त्रिकूट पर तीन उप नाड़ियाँ निकलती हैं, जिनमें से एक स्मृति नाड़ी प्रमस्तिष्क में खुलती है, दूसरी नाड़ी प्रमस्तिष्क कोश के पास ही अगस्त्य कोश में खुलती है और तीसरी नाड़ी पंचवटी कोश में खुलती है। वैसे तो नाड़ियों के भीतर अनन्त सूक्ष्म नाड़ियाँ भी होती हैं परन्तु मुख्यत: ये ही होती हैं। त्रिकूट से विभक्त होकर इड़ा, पिंगला व सुष्मना नाड़ियाँ पुन: भृकुटि पर आकर मिल जाती हैं और फिर अनेक सूक्ष्म नाड़ियों में विभक्त होकर नाना कोशों में पहुँच जाती हैं। प्रमस्तिष्क कोश ही लंका नगरी का प्रतीक है और प्रमस्तिष्क में ही काम के भाव पैदा होकर निशंक रहते हैं। प्रमस्तिष्क कोश के उपवन में अर्थात् वैराग्य का उपकोश होता है, उसमें सुरता रूपी सीता रहती है, जो नाना प्रकार का सोच करती रहती है। जीव का प्रमस्तिष्क ही लंका होता है और प्रमस्तिष्क में वैराग्य के उपकोश होते हैं, वे ही अशोक वाटिका का प्रतीक हैं। दो0 मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार। बूढ़ भयउँ न त करेतउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।। व्याख्या : तब समता रूपी सम्पाती के भाव ने कहा कि मेरी दिव्य दृष्टि अपार है इसलिए मैं सुरता रूपी सीता को देख पा रहा हूँ। तुम अर्थात् बुद्धि के भाव नहीं देख सकते हो। मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ अर्थात् समता की दृष्टि दृढ़ हो गयी है जिसके कारण मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता हूँ। वास्तव में जब समता की अवस्था परिपक्व हो जाती है तो उसके लिए आसुरी और सात्विक सभी भाव समान हो जाते हैं और समता का भाव मात्र दृष्टा बनकर रह जाता है। उसी भाव अवस्था को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। जो नाघइ सत जोजन सागर। करि सो राम काज मति आगर।। मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।। व्याख्या : जो भी बुद्धि का भाव सत योजन अर्थात् शत वृतियों से उत्पन्न भाव रूपी भवसागर को पार करेगा, वही आत्मा रूपी राम का कार्य सिद्ध करेगा। मुझ समता रूपी सम्पाती को देखकर मन में धैर्य धारण करो कि आत्मा की प्रेरणा से मेरा शरीर कैसा हो गया है? पापिउ जाकर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।। तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।। व्याख्या : जिस आत्मा का चिंतन करने से चिन्ताग्रस्त जीव भी भावों के भव सागर को पार कर जाता है, तो तुम बुद्धि रूपी वानरों के भाव तो आत्मा की प्रेरणा से चलने वाले हैं, अत: कायरपन छोड़कर हृदय में आत्मा रूपी को राम धारण करो और सुरता को खोजने का कुछ उपाय करो। अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह के मन अति बिसमय भयऊ।। निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।। व्याख्या : ऐसा कहकर हे ज्ञान के अहंकार रूपी गरुड़ जी! जब समता रूपी दिव्य दृष्टि का भाव चला गया, तो बुद्धि के भावों के मन में बहुत आश्चर्य हुआ। तब सभी बुद्धि के भाव अपना-अपना बल बखान करने लगे परन्तु भावों के भव सागर को पार करने में सबको संशय हो रहा था। जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।। जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरून रहेउँ बल भारी।। व्याख्या : धीर बुद्धि रूपी जामवंत बोले कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, इसलिए पहले जैसा बल लेश भी नहीं रहा है। वास्तव में ज्यों-ज्यों बुद्धि की धीरता बढ़ने लग जाती है त्यों-त्यों उसकी चंचलता कम होने लग जाती है और चंचलता का कम जाना ही बल का कम हो जाना बताया गया है। जब बुद्धि का भाव चंचल होता है, तो जब खरारी यानी खर अ अरि यानी अज्ञान के दुश्मन तीनों गुणों को जीतने वाला मेरे अन्दर विशेष बल था। दो0 बलि बांधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ। उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ।।29।। व्याख्या : जब भोग बल रूपी बलि को वश में करने के लिए परमात्मा ने अपना विस्तार किया था, उस समय के शरीर की अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब मैंने (धीर बुद्धि) दौड़कर दो घड़ी के भीतर सात परिक्रमा कर ली थी अर्थात् सात वृतियों को दौड़कर जान लिया था। साधना की शुरूआत में जब बुद्धि चंचल रहती है, तो साधना के रहस्यों को बहुत तीव्रता से जान लेती है परन्तु ज्यों-ज्यों धीर होती चली जाती है। और वैराग्य दृढ़ होता चला जाता है, तो चंचलता का बल कम जाता है। अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।। जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक।। व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि का अंगद रूपी भाव बोला कि मैं भाव रूपी भव सागर को पार तो कर सकता हूँ परन्तु लौटने में मुझे कुछ संशय है। अंगद के संशय का बहुत गहरा रहस्य है। अंगद भोग बल रूपी बालि का पुत्र बताया गया है अर्थात् भोग बल के भाव से दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद पैदा होता है। अत: अंगद रूपी भाव अपनी दृढ़ता के बल पर भाव रूपी समुद्र को पार तो कर सकता है परन्तु वासना रूपी लंका में भोगों में फँसने का उसे डर है। इसलिए लौटने में वह संशय प्रकाश करता है। तब धीर बुद्धि रूपी जामवंत बोले कि हे दृढ़ बुद्धि भाव रूपी अंगद! तुम सब कुछ करने में सक्षम हो परन्तु तुम तो हम सबके नायक हो (अर्थात् दृढ़ बुद्धि के भाव से ही बुद्धि के अन्य भावों को बल मिलता है) इसलिए तुमको हम कैसे वासना रूपी लंका में भेज सकते हैं? कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।। पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।। व्याख्या : तब धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को प्रेरित करते हुए कहा कि हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम चुप क्यों बैठे हो? प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि का बल प्राण के समान ही होता है। वास्तव में अनन्य अर्थात् परमात्मा के सिवाय और कोई नहीं का भाव बहुत बलवान होता है। अनन्य भाव ही भाव रूपी भव सागर को पार कर सकता है क्योंकि अनन्य भाव बुद्धि, विवेक व विज्ञान का घर होता है। कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।। राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।। व्याख्या : कौन सा कार्य ऐसा कठिन है, जिसे तुम (अनन्य) नहीं कर सकते हो? तुम्हारा अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव का अवतरण तो परमात्मा के कार्य के लिए ही होता है। ऐसा सुनते ही अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान उत्साहित होकर पर्वताकार अर्थात् प्रबल हो उठा। वास्तव में अनन्य बुद्धि का भाव सदैव परमात्मा में लीन रहता है परन्तु जब अन्य भाव उसे प्रेरित कर देते हैं, तो वह देह भावों में बरतना शु डिग्री कर देता है। कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा।। सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा।। व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान का वर्ण स्वर्ण के समान तथा शरीर पर तेज होता है, मानों अपर अर्थात् प्रकृति से परे दृढ़ता का राजा हो। अर्थात् अनन्य भाव ऐसा लगता है मानो पारलौकिक भावों का राजा हो। जब अनन्य भाव प्रेरित हो उठता है, तो वह बार-बार गर्जना करने लगता है और भाव रूपी भावों के भवसागर के सांसारिक जल को सोख लेना चाहता है। इसलिए अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कहता है कि मैं इस सांसारिक भावों के सागर को पार कर जाऊँगा। सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।। जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।। व्याख्या : मैं काम को उसके सहायक भावों सहित मार दूँगा और त्रिकूट पर्वत को ही उठा ले आऊँगा। हे धीर बुद्धि रूपी जामवंत! मुझे उचित शिक्षा दीजिए कि मैं क्या करूँ? एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।। तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।। व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम तो बस इतना करो सुरता रूपी सीता को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। तब आत्मा रूपी राम स्वयं निज बल से और खेल-खेल में बुद्धि रूपी वानरों की सेना को साथ लेकर, सुरता रूपी सीता को ले आयेंगे। धीर बुद्धि रूपी जामवंत अनन्य बुद्धि के भाव से केवल सुरता की खोज करने की बात कहते हैं ताकि आत्मा रूपी राम स्वयं सुरता को ला सकें। छ0 कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं। त्रेलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।। जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई। रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।। व्याख्या : तब बुद्धि के भाव रूपी वानरों की सेना को साथ लेकर आसुरी भावों का संहार करके आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता को लायेंगे। तब मन के नारदादि भाव व देव भाव तीनों लोकों को (तीनों गुणों) को पवित्र करने वाले आत्मा रूपी राम के सुयश का बखान करेंगे। जो इस परम पवित्र यश को सुनेंगे, गायेंगे व समझेंगे वे मनुष्य परम पद प्राप्त कर लेंगे। इसी अनुभूति को परमात्मा के चरण कमलों का भ्रमर बनकर तुलसीदास ने गाया है। दो0 भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।30(क)।। व्याख्या : आत्मा की अनुभूति की कथा भाव रूपी रोगों की अचूक दवा होती है। अत: जो नर-नारी इस अनुभूति को सुनेंगे, उनकी सब मनोकामनाएँ त्रिशिरा अर्थात् तीनों गुणों को वश में करने वाले परमात्मा पूर्ण करेंगे। सो0 नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक। सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30ख।। व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम का श्याम वर्ण है तथा करोड़ों काम के भावों से भी अधिक शोभा होती है तथा जिनका नाम पाप रूपी चिन्ता के भावों को मारने के लिए ब्याध के समान होता है, उन आत्मा रूपी राम के गुण समूहों को अवश्य सुनना व समझना चाहिये। ।।इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थ: सोपान: समाप्त:।।
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