।। लंका काण्ड।।
श्लोक -- रामं कामारिसेव्यं भव भयहरणं कालमत्तेभ सिंहं
योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।।1।।
व्याख्या : काम के शत्रु द्वारा सेवित, भावों से उत्पन्न भय का हरण करने वाले, काल रूपी हाथियों के लिए सिंह के समान, योग द्वारा इन्द्रियों को जीतने पर ज्ञान द्वारा समझ में आनेवाले, गुणों के समुद्र, अजेय, गुणों से निर्लिप्त, निर्विकार, माया से परे, स्वरों के स्वामी, जड़ भावों को निरन्तर मारने वाले, ब्रह्मवृन्द अर्थात् ब्रह्म (भाव) के समूह के एकमात्र देव, कमल के समान नेत्रवाले, देह रूपी पृथ्वी के एकमात्र देवता परमात्मा की मैं वन्दना करता हूँ।
श्लोक -- शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दुलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं
नौमीडयं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्।।2।।
व्याख्या : शंख और चन्द्रमा की सी कान्तिवाले, व्याघ्रचर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले अर्थात् निर्भयता के भाव रूपी वस्त्रों को धारण करने वाले, काल रूपी वासना सर्पों को भूषणों के रूप में धारण करने वाले, गंगा व चन्द्रमा अर्थात् गंगा नाड़ी व चन्द्र स्वर को प्रिय, काशीपति अर्थात् तीन गुणों को वश में करने वाले, देह भावों के विकारों का नाश करने वाले, कल्याणकारी, श्रद्धा रूपी पार्वती के पति, गुणों के समुद्र, काम विकारों का नाश करने वाले व शंकाओं को मिटाने वाले हे शंकर! मैं आपकी वन्दना करता हूँ।
श्लोक -- यो ददाति सतां शम्भु: कैवल्यमपि दुर्लभम्।
खलानां दण्डकृधो%सौ शंकर: शं तनोतु मे।।3।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर जो सतपुरुषों को दुर्लभ कैवल्य पद दे देते हैं और दुष्ट वृति वालों को दण्ड देने वाले हैं, वे कल्याणकारी शंकाहीन विश्वास के भाव मेरे कल्याण का विस्तार करें। अर्थात् शंकाओं का नाश करके हे विश्वास रूपी शंकर! मेरे कल्याण का विस्तार करो।
दो0 लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड।।
व्याख्या : लव, निमेष, परमाणु, युग, वर्ष और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिसका धनुष है, हे मन! तू उस परमपिता परमेश्वर को क्यों नहीं भजता?
सो0 सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु।।
व्याख्या : भाव रूपी भव सागर के वचन सुनकर आत्मा रूपी राम मंत्रणा के भाव रूपी सचिवों से बोले कि अब विलम्ब किस कारण से हो रहा है? अब पुल तैयार कीजिए, जिससे बुद्धि के भावों रूपी सेना भाव रूपी सागर को पार कर सके।
सो0 सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भवसागर तरहिं।।
व्याख्या : तब धीर बुद्धि का भाव रूपी जामवंत हाथ जोड़कर बोला कि हे आत्मसूर्य रूपी ध्वजा! आपका नाम ही तो सबसे बड़ा सेतु है, जिस पर चढ़ कर मनुष्य भाव रूपी भव सागर को पार कर जाते हैं।
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवन कुमारा।।
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।।
व्याख्या : फिर यह छोटा सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी? धीर बुद्धि रूपी जामवंत कहना चाहता है कि परमात्मा के नाम जपने से तो संसार में फँसा हुआ मनुष्य भी भावों के भव सागर को पार कर जाता है। फिर ध्यान द्वारा निर्मल अवस्था को प्राप्त साधक के लिए तो यह भाव रूपी भव सागर बहुत छोटा होता है। अत: उसे पार करने में कितनी देर लगेगी? ऐसी बात सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बोला कि परमात्मा के प्रताप (जो कि बड़वानल समुद्र की आग के समान होता है) ने इस भाव रूपी भव सागर को पहले सोख लिया था अर्थात् ध्यान में कई बार परमात्मा की कृपा से भाव रूपी भव सागर सूख जाता है।
तव रिपु नारि रूदन जलधारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा।।
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी।।
व्याख्या : परन्तु पुन: आत्म विमुख नाड़ियों के स्राव से यह भाव रूपी भव सागर पुन: भर गया और इसी कारण इसका जल वासना युक्त अर्थात् खारा हो गया है। वास्तव में साधना में कई बार भाव रूपी भव सागर सूख जाता है परन्तु पुन: विषय भोगों के कारण भावों की उत्पत्ति हो जाती है और पुन: भावों का भव सागर भर जाता है। अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की यह युक्ति सुनकर बुद्धि के सभी भाव आत्मोन्मुखी होकर हर्षित हो उठे।
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई।।
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।।
व्याख्या : तब धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने नल व नील बुद्धि के भावों को बुलाकर सारी बात बता दी और कहा कि आत्मा रूपी राम को मन में रख करके भाव रूपी भव सागर पर सद्गुणों रूपी सेतु बनाओ, कुछ परिश्रम नहीं होगा अर्थात आसानी से सेतु तैयार हो जायेगा।
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी।।
राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू।।
व्याख्या : धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने बुद्धि के भावों रूपी वानरों के समूहों को बुलाया और कहा कि तुम सब मेरी प्रार्थना सुनो और आत्मा रूपी राम के चरणों को हृदय में रखकर अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर भालू व वानर रूपी भावों तुम खेल करो अर्थात् निर्लिप्त होकर सहज हो जाओ।
धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।।
सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा।।
व्याख्या : हे विशाल बुद्धि के भावों रूपी वानरों! तुम दौड़ जाओ अर्थात् आत्मोन्मुखी हो उठो और सद्गुणों रूपी वृक्षों व दृढ़ता रूपी पर्वतों को ले आओ अर्थात् सद्गुणों के भावों में दृढ़ता ले आओ। धीर बुद्धि की प्रेरणा पाकर बुद्धि के भालू व वानर रूपी भाव अति उत्साह के साथ चले और आत्मा रूपी राम के दिव्य प्रताप का चिंतन करने लगे।
दो0 अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ।।1।।
व्याख्या : जब बुद्धि के भाव उत्साह के साथ आत्मोन्मुखी हो उठते हैं, तो बहुत गहराई से सद्गुणों रूपी वृक्षों और दृढ़ता रूपी पर्वतों को उठाने लगते हैं अर्थात् बुद्धि के भावों में सद्गुणों की दृढ़ता आने लग जाती है और वह सद्गुणों की दृढ़ता भाव रूपी भव सागर पर नल-नील रूपी बुद्धि के भावों द्वारा सेतु निर्माण का कार्य करने लगती है। अर्थात् उस अवस्था में साधक भावों के भव सागर में नहीं उलझता है।
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।
देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना।।
व्याख्या : जब बुद्धि के भाव दृढ़ता रूपी विशाल पर्वत को लाकर नल-नील रूपी निसंग बुद्धि के भावों को लाकर देते हैं, तो निसंग बुद्धि रूपी नल-नील गेंद की तरह लेते हैं। तब भावों के भवसागर पर सुन्दर सद्गुण रूपी सेतु की रचना को देखकर आत्मा रूपी राम हँसकर बोले अर्थात् सद्गुणों के सेतु की रचना होती देखकर आत्मा प्रसन्न हो जाती है। उसी को आत्मा रूपी राम का हँसकर बोलना बताया गया है।
परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी।।
करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना।।
व्याख्या : जब सद्गुण दृढ़ होने लग जाते हैं, तो आत्मा अन्दर से प्रसन्न हो उठती है और वह अवस्था परम रम्य लगने लग जाती है। उस परम रम्य अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब आत्मा में संकल्प उठने लग जाता है कि अब मैं स्वयं की सहज अवस्था में स्थिर हो जाऊँ। जब सहज स्वरूप में स्थित होने की कल्पना हृदय में उठने लगती है। उसी अवस्था को शंभू स्थापना बोलकर लिखा गया है। शिव लिंग की स्थापना का तात्पर्य लोक कल्याण की भावना में लीन होने से होता है।
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए।।
लिंग थापि बिधिवत करिपूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने नाना दूत भेजे अर्थात् सद्बुद्धि के भाव से भी लोक-कल्याण की भावना को बल मिलने लगता है और उससे मन की एकाग्रता बढ़ने लगती है। मन की एकाग्रता बढ़ने को ही मुनिवरों को बुलाना बताया गया है। जब ध्यान में ऐसी अवस्था आ जाती है तो आत्मा लोक-कल्याण में लीन हो जाती है। उसी को लिंग स्थापना करके विधिवत पूजा करना बताया गया। उस अवस्था में साधक को लोक-कल्याण के समान और कुछ भी प्रिय नहीं लगता है। अत: उसी को शिव के प्रतीक के माध्यम से कहा है कि शिव (कल्याणकारी भावना) के समान मुझ आत्मा को और कुछ भी प्रिय नहीं होता है।
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में साधक को समझ में आता है कि कल्याण की भावना से द्रोह करने वाला स्वपन मे भी आत्मस्वरूप को नहीं जान पाता है। जो शंका रहित अवस्था से विमुख होता है अर्थात् जो संशय में रहता है, वह चिन्तायुक्त नरक में रहने वाला अल्पबुद्धि वाला होता है।
दो0 संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास।।2।।
व्याख्या : जो शंका रहित होता है परन्तु आत्मा से द्रोह करने वाला होता है और जो कल्याण की भावना से द्रोह करने वाला होता है परन्तु मुझ आत्मा का चिंतन करने वाला होता है, ऐसे दोनों प्रकार के जीव ही कल्पना करके घोर चिन्ता रूपी नरक में निवास करते हैं। इस दोहे में आध्यात्म का पूरा विज्ञान समाया हुआ है। वास्तव में जो संशय रहित है, परन्तु आत्मद्रोही है और जो आत्मप्रिय है परन्तु लोक-कल्याण की भावना से रहित है, तो इन दोनों अवस्थाओं में ही चिन्ता पैदा होना स्वाभाविक होता है। अत: निज स्वरूप में अगर स्थित होना है, तो कल्याणकारी भावना से युक्त होकर आत्मोन्मुखी होना होगा।
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।
जो गंगा जलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।।
व्याख्या : जो लोग स्वरों के माध्यम से आत्मा में लीन हो जाते हैं, वे देह भाव से मुक्त होकर आत्म भाव में अवस्थित हो जाते हैं और जो सुष्मना नाड़ी रूपी गंगा से निकलने वाले रसायन रूपी जल को चढ़ाते हैं अर्थात् ध्यान द्वारा जो अमृतपान करते हैं, वे तो सायुज्ज मुक्ति अर्थात् परमात्मा में लीनता की परम अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं।
होइहि अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
ममकृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भव सागर तरिही।।
व्याख्या : जो कपट व छल का त्याग करके आत्मा में लीनता की अवस्था को प्राप्त करते हैं, वे निष्काम हो जाते हैं और शंका रहित अवस्था को प्राप्त करके वे भय हीन (भक्ति) हो जाते हैं। जो आत्मा से उत्पन्न सद्गुणों का अनुसरण करते हैं, वे बिना परिश्रम के ही भाव रूपी भव सागर को पार कर जाते हैं।
राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए।।
गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचन अर्थात् प्रेरणा सबको अच्छी लगी और मन के भाव सहज हो गए। मन के भावों का सहज हो जाना ही निज-निज आश्रम में आना बताया गया है। विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा की यह परम्परा होती है कि वो सदैव प्राणों के माध्यम से ही प्रेम पैदा करते हैं।
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर।।
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई।।
व्याख्या : निसंग बुद्धि रूपी नल-नील ने सद्गुण रूपी सेतु बाँध दिया, जिससे आत्मा रूपी राम का यश जगत में फैल गया। जो वासना रूपी पत्थर स्वयं इच्छा रूपी जल में डूब जाते हैं, वे ही आत्मा की प्रेरणा पाकर स्वयं भी तैर गये और दूसरों को पार कराने के लिए जहाज बन गए।
महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी।।
व्याख्या : यह न तो भाव रूपी भव सागर, न वासना रूपी पत्थरों और नहीं बुद्धि के भाव रूपी वानरों की महिमा की करामत है।
दो0 श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।।3।।
व्याख्या : परमात्मा के प्रताप से ही भाव रूपी भव सागर पर वासना रूपी पत्थर सद्गुण बनकर तैरने लगते हैं। अत: ऐसे एक परमात्मा को छोड़कर जो दूसरे किसी स्वामी का भजन करते हैं, वे मन्द बुद्धि ही होते हैं।
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।।
चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई।।
व्याख्या : सद्गुणों से बँधे हुए सुदृढ़ सेतु को देखकर आत्मा रूपी राम को बहुत अच्छा लगा अर्थात् आत्मा सद्गुणों की दृढ़ता देखकर प्रसन्न हो जाती है। सद्गुणों रूपी सेतु जब बन जाता है, तो बुद्धि के भावों रूपी सेना उस पर चलने लगती है। उस अवस्था में बुद्धि के भावों में विशेष उत्साह छा जाता है। उसे ही वानरों रूपी योद्धाओं का गर्जना बोलकर बताया गया है।
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई।।
देखन कहुँ प्रभु करूना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा।।
व्याख्या : सद्गुणों रूपी सेतु पर चढ़कर आत्मा रूपी राम भाव रूपी समुद्र की विशालता को देखने लगे। उस अवस्था में भाव रूपी भव सागर में रहने वाली जलचर रूपी इच्छाएँ आत्मा रूपी राम को देखकर प्रकट हो गयी। अर्थात् छुपी हुई इच्छाओं का मर्म भी उस अवस्था में समझ में आने लग जाता है।
मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला।।
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समझ में आने लगता है कि भाव रूपी भवसागर में नाना प्रकार के वासना रूपी मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ व सर्प होते हैं। जिनका विस्तार सत योजन अर्थात् भावों की सौ वृतियों तक होता है। कुछ इच्छा व वासना ऐसे भी थे जो उनको भी खा जाएँ अर्थात् वासनाओं में भी वासना की आसक्ति के भाव छुपे रहते हैं। जिन्हें देखकर डर को भी डर लग जाता है।
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।।
तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम को देखकर इच्छा रूपी जलचर स्थिर हो गए अर्थात् सहज हो गए। उसी सहज अवस्था को हर्षित व सुखी होना बोलकर लिखा है। उनकी ओर से भाव रूपी जल भी दिखायी नहीं पड़ता है अर्थात् उस अवस्था में भाव शान्त होने लगते हैं। उसी भावों की शान्त होने की अवस्था को ही भावों के जल का नहीं दिखना बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में भाव व भावों की इच्छाएँ आत्मोन्मुखी हो उठते हैं। उसी को मग्न होना बोलकर लिखा है।
चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर बुद्धि रूपी वानरों का दल भाव रूपी भव सागर को पार करने लगा। बुद्धि के भावों की विपुलता का वर्णन कौन कर सकता है।
दो0 सेतु बंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
अपर जल चरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में समझ में आने लगता है कि सद्गुण रूपी सेतु पर बुद्धि के भाव रूपी वानरों की भीड़ लग जाती है, तो कुछ-कुछ बुद्धि के भाव आकाश में उड़ने लगते हैं अर्थात् मस्तिष्क में उर्ध्वगामी होने लग जाते हैं। उस अवस्था में बुद्धि के भाव इच्छा व वासना रूपी जलचरों पर चढ़-चढ़कर भाव रूपी भव सागर को पार करने लगते हैं। अर्थात् उस अवस्था में बुद्धि के भाव वासनाओं में लिप्त नहीं होते हैं।
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।
सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा।।
व्याख्या : बुद्धि के भावों के ऐसे खेल को देखकर आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण हँसते हुए चले अर्थात् प्रसन्न होकर चले। इस प्रकार बुद्धि के भावों रूपी सेना सहित आत्मा रूपी राम भाव रूपी भव सागर को पार कर गए। बुद्धि के भावों की सेना का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।।
खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए।।
व्याख्या : इस प्रकार ध्यान में आत्म चेतना बुद्धि के भावों सहित भाव रूपी भवसागर को पार कर गयी। तब आत्मा रूपी राम ने सभी बुद्धि के भावों रूपी वानरों को प्रेरणा की कि तुम जाकर वासना रूपी आसुरी भावों को खाओ। ऐसी प्रेरणा पाकर बुद्धि के भाव रूपी रीछ व वानर इधर-उधर को दौड़ने लगे।
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी।।
खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में सब इच्छा रूपी वृक्षों पर फल लग जाते हैं अर्थात् साधक की मनोकामना पूर्ण होने की अवस्था आ जाती है। साधक के मन में उस समय जो भी भल-मन्द इच्छाएँ आती हैं, वे सब पूर्ण होने लग जाती हैं। परन्तु साधक के बुद्धि के भाव उन इच्छाओं के फल में आसक्त नहीं होते हैं और सहज योग की अवस्था आ जाती है, जिसमें साधक भोग भी भोग लेता है परन्तु अनासक्त बना रहता है। उसी अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर भोग रूपी फलों को खाकर इच्छा रूपी वृक्षों को हिलाना बोला गया है। उस अवस्था में वासनाओं को जीतने की दृढ़ता बलवान हो उठती है। उसी को वासना रूपी लंका की तरफ दृढ़ता रूपी पर्वतों के शिखरों को फेंकना बोलकर लिखा है।
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।।
दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में बुद्धि के भाव जहाँं कहीं किसी भी कोश में आसुरी भावों को पा जाते हैं तो बुद्धि के भाव आसुरी भावों को घेर कर बहुत नाच नचाने लगते हैं अर्थात् आसुरी भावों को वश में कर लेते हैं। वे बुद्धि के भाव आसुरी भावों के दस इन्द्रियों से नाक व कानों को काटकर अर्थात् बुद्धि के भाव आसुरी भावों को शब्द व गन्ध के प्रभाव से मुक्त करके आत्मोन्मुखी करके ही छोड़ते हैं।
जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता।।
सुनत श्रवन बारिधि बधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना।।
व्याख्या : जो आसुरी भाव गन्ध (नाक) व शब्द (कान) के प्रभाव से मुक्त हो गए, उन्होंने सारी बात काम रूपी रावण को बतायी। तब दस इन्द्रियों रूपी दस शीशों को धारण करने वाला काम रूपी रावण भाव रूपी भावसागर का बंधना सुनकर व्याकुल हो उठा। अर्थात् भावों को वश में हुआ जानकर काम का भाव व्याकुल हो गया।
दो0 बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।।5।।
व्याख्या : काम रूपी रावण व्याकुल होता हुआ पूछता है कि क्या सचमुच बन निधि, नीर निधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीश को बाँध दिया है अर्थात् क्या सचमुच में वैराग्य के भाव, रस भोग के भाव, मोह के भाव, भावों से उत्पन्न भाव, मद-मत्सर के भाव, अपने-पराए के भाव, भय के भाव, उत्तेजना के भाव, शान्ति सहयोग के भाव व भाव धारा को बाँध दिया है।
निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी।।
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो।।
व्याख्या : उस अवस्था में काम का भाव स्वयं की व्याकुलता को समझ जाता है परन्तु भय को भुलाकर हँसता हुआ घर को चला जाता है अर्थात् व्याकुलता को भुलाकर अपनी सहज काम की अवस्था में आ जाता है। उस अवस्था में मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि भाव मन्दोदरी आत्मा रूपी राम के आगमन को समझ जाती है अर्थात् आत्मा की प्रबलता का आभास करने लग जाती है और भाव रूपी भव सागर को बाँधने का मर्म समझ जाती है।
कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी।।
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में काम के मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि रूपी मंदोदरी काम के भाव को समझाने का प्रयास करती है। उसी अवस्था को यहाँ लिखा गया है कि मन के अंदर की आसुरी बुद्धि काम के भाव को पकड़ कर अपने भवन में अर्थात् काम की सहज अवस्था में ले गयी और काम के मन को हरने वाली वाणी बोली कि हे काम रूपी नाथ! आप क्रोध का त्याग करके मेरी बात सुनिए। वास्तव में ध्यान की अवस्था में ही समझ में आता है कि मन के अंदर की मंदोदरी रूपी आसुरी बुद्धि सब प्रकार से काम को बचाना चाहती है। इसलिए काम के भाव को आत्मा के बल के बारे में सचेत करती है।
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।।
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।।
व्याख्या : मंदोदरी भाव बोली कि हे नाथ! बैर उसी से करना चाहिए जिसे बुद्धि के बल से जीता जा सकता हो। तुम में अर्थात् काम में और आत्मा रूपी राम में कैसा अन्तर है, जैसे जुगनू और सूर्य में होता है।
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे।।
जेहिं बलि बांधि सहसभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा।।
व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम ने प्रबल होकर राग व द्वैष रूपी मधु-कैटभ को मार दिया और दिति सुत अर्थात द्वैत भाव से उत्पन्न सब भावों को मार दिया और जिस आत्मा रूपी राम ने बल रूपी बलि को बांधकर अर्थात् वश में करके सहस्र बाहू यानी हजारों भावों को मार दिया अर्थात् वश में कर लिया, वही आत्मा रूपी राम शरीर रूपी पृथ्वी के विकारों का हरण करने के लिए अवतरित हुए हैं।
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा।।
व्याख्या : हे काम रूपी स्वामी! आप उस आत्मा रूपी राम से विरोध मत कीजिए, जिसके हाथ में जीव के काल व कर्म की गति होती है।
दो0 रामहि सौंपि जानकी नाइ कमल पद माथ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ।।6।।
व्याख्या : इसलिए आत्मा रूपी राम से प्रतिकूलता छोड़कर आत्मा के प्रति समर्पण करते हुए सुरता रूपी सीता को लौटा दीजिए और पुत्र को राज देकर अर्थात् सहज भोगों की कामना करके वैराग्य रूपी वन में जाकर परमात्मा का भजन करो। वास्तव में मन के अंदर का आसुरी बुद्धि भाव काम रूपी रावण को रूपान्तरित होने की प्रेरणा करता है। जिससे काम बचा भी रहे और आत्म तत्व से विरोध भी नहीं हो।
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।।
चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते।।
व्याख्या : हे नाथ! आत्मा रूपी राम तो दीनों पर दया करने वाले हैं अर्थात् जो मद-मत्सरादि भावों से रहित हैं, उन पर दया करने वाले हैं। सम्मुख जाने पर तो बाघ भी नहीं खाता अर्थात् शरणागत होने पर तो बाघ भी नहीं खाता है। आपको जो-जो करना था, वो सब आपने कर लिया है अर्थात् जो भोग भोगने थे वे सब आपने भोग लिए और सुर व असुर भावों को भी आपने समस्त चराचर सहित जीत लिया है।
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेपन जाइहि नृप कानन।।
तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता।।
व्याख्या : हे दस इन्द्रियों रूपी मुख वाले काम! जिनके संशय मिट गए हैं, ऐसे (संत) लोग ऐसा कहते हैं कि चौथेपन में अर्थात् गुणातीत अवस्था में राजा को वैराग्य रूपी वन में चले जाना चाहिए और जो समस्त सृष्टि का कर्ता, भर्ता व हर्ता है, उस परमात्मा का भजन करना चाहिए।
सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी।।
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी।।
व्याख्या : वे परमात्मा प्राण में अनुराग रखने वाले होते हैं, अत: हे नाथ! आप ममता आदि सब विकारों का त्याग करके परमात्मा को भजो। जिस परमात्मा को प्राप्त करने के लिए मुनि जन प्रयास करते हैं और राजा लोग भी राज्य का त्याग करके जिसका भजन करते हैं।
सोइ कोसलाधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया।।
जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन।।
व्याख्या : वही परमात्मा कोशलाधीश अर्थात् सुष्मना नाड़ी के स्वामी, तुम काम पर दया करने के लिए आए हैं। अर्थात् वही आत्म चेतना सुष्मना नाड़ी के माध्यम से काम के विकारों को मिटाने के लिए आयी है। अत: हे स्वामी! अगर आप मेरी बात मानते हो तो आपका तीनों गुण रूपी लोकों में सुयश होगा और तीनों गुणों में सहजता रूपी पवित्रता छा जायेगी।
दो0 अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात।
नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात।।7।।
व्याख्या : मन के अन्दर वाली आसुरी बुद्धि रूपी मंदोदरी ने आँखों में जल भर कर कम्पित होते हुए काम रूपी रावण के पैर पकड़ लिए अर्थात् काम के प्रति समर्पित होते हुए कहा कि परमात्मा का भजन करो, जिससे सहजता आ जायेगी और मुझ आसुरी बुद्धि का सुहाग अचल हो जायेगा अर्थात् काम सहज होकर निरन्तर भोग भोगता रहेगा।
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।।
सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने मैं भाव से उत्पन्न मन के अंदर वाली आसुरी बुद्धि रूपी मंदोदरी को उठाया और मूर्ख काम का भाव अपनी प्रभुता का बखान करने लगा। हे प्रिया! तुम व्यर्थ में ही भय मान रही हो। संसार में मुझ काम भाव के समान कौन बलवान है?
बरून कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला।।
देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें।।
व्याख्या : वरुण अर्थात् जलतत्व, कुबेर अर्थात् संग्रह का भाव, पवन अर्थात् प्राण, यम व काल सबको तो मैंने समस्त दिग्पालों सहित जीत लिया है। दैवीय भाव, दानव व नर (धड़कन) आदि सब तो मुझ काम के वश में है। फिर तुमको किस कारण से भय पैदा हो गया है।
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई।।
मंदोदरी हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना।।
व्याख्या : नाना प्रकार से काम के भाव ने मन अंदरी आसुरी बुद्धि रूप मंदोदरी को समझाया और स्वयं आसुरी भावों की सभा में जाकर बैठ गया। तब मंदोदरी रूपी आसुरी बुद्धि के भाव ने जान लिया कि काल के वश में होने के कारण अभिमान पैदा हुआ है।
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेहिं बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा।।
कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार-बार प्रभु पूछहु काहा।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने आसुरी भावों के बीच में आकर पूछा कि शत्रु से किस प्रकार निपटा जाए। तब आसुरी मंत्रणा के भाव बोले कि हे आसुरी भावों के राजा! आप बार-बार क्या पूछते हो?
कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा।।
व्याख्या : कहिए तो ऐसा कौन-सा भय है, जिसका विचार किया जाए? नर (धड़कन) व बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानर तो हम आसुरी भावों के भोजन हैं। वास्तव में नर की धड़कन व बुद्धि का आहार करके ही आसुरी भाव प्रबल होते हैं।
दो0 सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।
नीति बिरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि।।8।।
व्याख्या : सब आसुरी मंत्रणा के भावों की बातें सुनकर प्रहस्त रूपी सात्विक आसुरी भाव हाथ जोड़कर बोला कि इन आसुरी मंत्रणा के भावों की बुद्धि तो बहुत थोड़ी है, इसलिए नीति के विरुद्ध मत कीजिए। प्रहस्त का तात्पर्य प्र अ हस्त अर्थात् प्रकृति को वश में करने वाला या प्रकृति के मर्म को जानने वाला से होता है।
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।।
बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा।।
व्याख्या : हे नाथ! ये सब आसुरी मंत्रणा के भाव मुँह देखी बात करते हैं अर्थात् जिस भाव की जैसी प्रबलता होती है, उसी के अनुसार बोलते हैं। अत: ऐसी बातों से पार नहीं पड़ेगी। भाव रूपी समुद्र को लाँघकर एक बुद्धि का भाव रूपी वानर आया था। जिसका मन ही मन आज भी ये सब आसुरी भाव स्मरण करते हैं। अर्थात् उस बुद्धि के भाव का प्रभाव अभी मिटा नहीं है।
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू।।
सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा।।
व्याख्या : उस समय तो किसी भी आसुरी भाव को भूख नहीं लगी। क्यों नहीं वासना रूपी नगर को जलाते समय तुमने उस बुद्धि के भाव रूपी वानर को खाया? हे नाथ! इन आसुरी मंत्रणा के भावों ने ऐसा मत सुनाया है जो सुनने में तो अच्छा लगता है, परन्तु परिणाम में दु:ख देने वाला है।
जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समते सुबेला।।
सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई।।
व्याख्या : जिन्होंने भाव रूपी भव सागर पर सद्गुण रूपी सेतु बाँधा है और बुद्धि के भावों रूपी सेना को लेकर भाव रूपी भव सागर को पार कर लिया है। उन्हीं मनुष्यों को हम आसुरी भावों रूपी राक्षस खायेंगे। यह कहना गाल फुलाना है अर्थात् अतिशयोक्ति है।
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर।।
प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं।।
व्याख्या : हे तात! मेरे वचनों को आदरपूर्वक सुनो। मुझे मन में कायर मत समझ लीजियेगा। जो लोग प्रिय वचन कहते और सुनते हैं, ऐसे लोग संसार में समूह के समूह में होते हैं।
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।।
व्याख्या : परम हितकारी वचन सुनने में बहुत कठोर होते हैं और परमहितकारी कठोर वचनों को सुनने व कहने वाले लोग भी बहुत थोड़े होते हैं। अत: हे तात! नीति के अनुसार दूत भेजिए और फिर सुरता रूपी सीता को लौटाकर आत्मा रूपी राम से सन्धि कर लीजिए।
दो0 नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि।
नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि।।9।।
व्याख्या : अगर सुरता रूपी नारी (नाड़ी) को पाकर आत्मा रूपी राम वापिस लौट जाएँ तो झगड़ा मत बढ़ाइये। नहीं तो यदि नहीं फिरे तो सम्मुख युद्ध में उनसे मार काट कीजिए अर्थात् सुरता रूपी सीता को लेकर अगर आत्मा रूपी राम अपनी सहज अवस्था में पहुँच जाएँ, तो विरोध मिट ही जायेगा अन्यथा भावों के द्वन्द्व में मार-काट करना।
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।
सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।।
व्याख्या : हे तात्! अगर मेरी इस बात को मानोगे तो दोनों प्रकार से आपका जगत में सुयश होगा अर्थात् आत्मा की अनुकूलता होने पर सुयश ही सुयश होगा। तब काम रूपी रावण ने क्रोधित होते हुए मोह रूपी पुत्र से कहा कि अरे सठ! तेरे को यह बुद्धि किसने सिखाई है?
अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयउ घमोई।।
सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।।
व्याख्या : अभी से हृदय में संशय पैदा हो रहा है। हे मोह रूपी पुत्र! तू बाँस की जड़ में घमोई हुआ है अर्थात् मेरे अनुकूल नहीं है। काम रूपी पिता के कठोर वचन सुनकर मोह रूपी पुत्र प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घर को चला गया।
हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।।
संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।।
व्याख्या : परम हितकारी वचन हे काम रूपी रावण! तुझे वैसे ही अच्छे नहीं लग रहे हैं, जैसे मृत्यु के वश में हुए रोगी को दवा अच्छी नहीं लगती है। तब काम रूपी रावण ने संध्या का समय जाना (संध्या का समय ऐसा होता है जिसमें मन मध्य में सोचता है कि ये कर लूँ या वो कर लूँ) तो दस इन्द्रिय रूपी सिरों के बीस भुजा रूपी भावों को निरखता हुआ घर को चला।
लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।।
बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।।
व्याख्या : वासना रूपी लंका नगरी के शिखर पर एक सुन्दर महल था अर्थात् प्रमस्तिष्क कोश में एक उच्च शिखर रूपी कोशिका होती है। वह बहुत विचित्र होती है, जहाँ पर आसुरी भावों का अखाड़ा जमता है। उसी प्रमस्तिष्क की उस विचित्र कोशिका में ही काम रूपी रावण का भाव बैठ जाता है और किन्नर रूपी प्राण वायु काम रूपी रावण का गुण-गान करने लगती है अर्थात् किन्नर प्राण वायु काम को बल प्रदान करने लगती है।
बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।।
व्याख्या : ताल, मृदंग व वीणा बजने लगते हैं अर्थात् किन्नर प्राण वायु से कोशिकाओं में कम्पन होने लगता है जिससे नाना प्रकार की इच्छाओं रूपी अप्सराएँ नाच करने लगती हैं। अर्थात् काम की नई-नई इच्छाएँ पैदा होने लगती हैं।
दो0 सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास।।10।।
व्याख्या : काम रूपी रावण का भाव सुनासीर अर्थात् इन्द्र भाव से उत्पन्न भोगों की निरन्तर कामना करता हुआ भोग इच्छाओं में विलास करता रहता है। हालाँकि आत्मा रूपी प्रबल शत्रु सिर पर होने पर भी उसे कोई भय नहीं होता है। अर्थात् काम का भाव आत्मा की प्रतिकूलता का विचार नहीं करता है।
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।
सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र विसेषी।।
व्याख्या : प्रमस्तिष्क में ही सुबेल अर्थात् सद्गुणों में दृढ़ता रूपी एक कोश होता है जिसे सुबेल पर्वत के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। ध्यान की अवस्था में आत्म चेतना बुद्धि के भावों सहित भाव रूपी भव सागर को पार करके सुबेल रूपी पर्वत पर उतर गयी अर्थात् सद्गुणों की दृढ़ता आत्म चेतना व बुद्धि के भावों को मिल गयी। उस सुबेल रूपी पर्वत का एक उज्जवल शिखर देखकर अर्थात् परम सात्विक सुबेल कोश की एक कोशिका देखकर परम रम्य लगा और विशेष शुभकारी लगी।
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए।।
ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहिं आसन आसीन कृपाला।।
व्याख्या : उस रम्य व शुभकारी कोशिका से सुमन अर्थात् मन के अच्छे भाव पैदा हो रहे थे, जो लखन भाव स्वयं लख-लख कर ग्रहण कर रहा था। उन अच्छे मन के भाव रूपी फूलों पर इच्छा रूपी मृगछाला बिछा दी और तब आत्मा रूपी राम स्वयं उस पर बैठे। अर्थात् सुबेल कोश में निर्मल व सात्विक भावों पर इच्छा रूपी मृगछाला बिछाकर आत्म चेतना स्थिर हो गयी।
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा।।
दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समझ में आने लगता है कि आत्मा की प्रेरणा से सद्बुद्धि के भावों में उत्साह छा जाता है और विपरीत (बाम) भाव भी अनुकूल हो जाते हैं और प्राण की सब दिशाओं में अर्थात् सब प्राणों में विषयों के प्रति निसंगता की अवस्था आ जाती है। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम दोनों हाथों से प्रेरणा रूपी बाणों को सुधारने लगते हैं अर्थात् सद्प्रेरणा की अवस्था आ जाती है और वैराग्य रूपी विभीषण का भाव मंत्रणा करने लगता है।
बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना।।
प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद और अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बहुत भाग्यशाली हैं, जो आत्मा रूपी राम के चरणों को नाना प्रकार से दबा रहे हैं अर्थात् पूरी तरह आत्मोन्मुखी हो गए हैं। उस अवस्था में लक्षणों को लखने वाला भाव आत्मा रूपी राम के आगे वीरासन में आ जाता है अर्थात् लखन भाव दृढ़ होकर देखने लगता है कि कोई आसुरी भाव आकर विकार नहीं पैदा कर दे। इसलिए लक्ष्मण रूपी भाव को वीरासन में बैठा बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में कटि निषंग अर्थात् विषयों से अनासक्ति पैदा हो जाती है और सद्प्रेरणा रूपी बाण प्रबल हो उठते हैं।
दो0 एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।11(क)।।
व्याख्या : इस प्रकार जब गुणों के धाम आत्मा रूपी राम स्थिर हो जाते हैं, तो ध्यान की इस अवस्था में लीन साधक धन्य हो जाता है। अर्थात् ध्यान की इस अवस्था को प्राप्त साधक धन्य हो जाता है।
दो0 पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।11(ख)।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने पूर्व दिशा में उदित हुए चन्द्रमा को देखा अर्थात् आत्मा को अब विषयों के शान्त होने पर उदित होने वाली शीतलता का आभास हुआ। उसी को चन्द्रमा के उदय होने के प्रतीक के बारे में लिखा गया है। विषयों के प्रति शीतलता का भाव ध्यान की उस अवस्था में सिंह के समान निडर हो जाता है। इसलिए निशंक व सिंह के समान निडर बोलकर लिखा है। अर्थात् विषयों की शीतलता रूपी चन्द्रमा का भाव ध्यान में प्रबल होकर निडर व निशंक हो जाता है।
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।।
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी।।
व्याख्या : पूर्व दिशा रूपी स्वर की नाड़ी रूपी गुफा में रहने वाला शीतलता रूपी चन्द्रमा तेज प्रताप व बल की राशि होता है। उस अवस्था में चन्द्र स्वर नाग प्राण से उत्पन्न अंधकार रूपी घड़े को फोड़कर मस्तिष्क रूपी आकाश में सिंह के समान निडर होकर विचरने लगता है अर्थात् चन्द्र स्वर उर्ध्वगामी हो जाता है, जिससे तमो गुण रूपी अंधकार का नाश हो जाता है और शीतलता रूपी चन्द्रमा सिंह के समान निडर हो जाता है।
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा।।
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई।।
व्याख्या : मस्तिष्क रूपी आकाश में बिखरे हुए ज्ञान रूपी भावों के तारे अज्ञान रूपी रात्रि का श्रृंगार बढ़ाने लगते हैं अर्थात् ज्ञान के भाव धीरे-धीरे अज्ञान के भावों को मिटाने लगते हैं। तब आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे बुद्धि के भावों! तुम अपनी-अपनी मति के अनुसार बताइये कि शीतलता रूपी चन्द्रमा में कालापन (विषयों की कालिख) क्यों है? अर्थात् आत्मा रूपी राम बुद्धि के भावों से जानना चाहते हैं कि विषयों के प्रति अनासक्ति आ जाने पर भी विषयों के प्रति अति सूक्ष्म आकर्षण क्यों बना रहता है?
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई।।
मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई।।
व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का भाव कहता है कि शीतलता रूपी चन्द्रमा में पृथ्वी रूपी धारणा की अर्थात् विषयों के प्रति धारणा की परछाई ही दिखायी दे रही है। कुछ बुद्धि के भाव कहते हैं कि शीतलता रूपी चन्द्रमा को कुभोग रूपी राहू ने मारा था। वही चोट अर्थात् आसक्ति का निशान दिखायी दे रहा है।
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा।।
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं।।
व्याख्या : कोई बुद्धि का भाव कहता है कि जब क्रिया (विधि) द्वारा भोगों की आसक्ति बढ़ गयी थी, तो शीतलता का मूल चला गया था अर्थात् विषयों की तप्त से शीतलता का मूल मिट गया था। यह परछायी उसी का छिद्र है। उसी छिद्र से मस्तिष्क रूपी आकाश की परछाई दिखाई पड़ रही है।
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।।
बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम कहते हैं कि विषय रूपी विष शीतलता रूपी चन्द्रमा का बंधु होता है अर्थात् बन्धन देने वाला होता है। इसलिए वह बन्धन देने वाला विषय रूपी विष ही शीतलता रूपी चन्द्रमा के हृदय में दिखाई दे रहा है। जब शीतलता रूपी चन्द्रमा की किरणें विषयों के विष से युक्त हो जाती हैं, तो फिर यह विरही नर-नारियों को जलाने लगता है अर्थात् विषयों से अनासक्त नर-नाड़ी की धड़कन को विचलित करके विषय भोग के भाव पैदा करके विषयी जलन पैदा करने लग जाता है।
दो0 कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास।
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।।12(क)।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भाव बोला कि हे प्रभु! शीतलता रूपी चन्द्रमा तुम्हारा प्रिय दास है, इसलिए जो शीतलता में श्यामता दिखाई पड़ रही है वो आपकी छवि ही है अर्थात् शीतलता में जो परछाई दीख रही है वो आत्मा की परछाई ही है। वास्तव में बुद्धि के भाव की जैसी वृति होती है, वह वैसा ही सोचा है। इसलिए अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आत्मा से अनन्यता के साथ लीन होने के कारण सब जगह आत्मा का ही आभास करता है।
।। नवाह्नपारायण, सातवाँ विश्राम।।
दो0 पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान।
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपानिधान।।12(ख)।।)
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के वचन सुनकर आत्मा रूपी राम हँसे अर्थात् अनन्यता का भाव देखकर आत्म चेतना प्रसन्न हो गयी। तब दक्षिण दिशा में देखकर अर्थात् विषयों का स्मरण कर (दक्षिण दिशा वासना का प्रतीक होती है, इसलिए दक्षिण दिशा की तरफ देखने की बात कही गयी है) आत्मा रूपी राम बोले।
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा।।
मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी विभीषण! देखो दक्षिण दिशा की तरफ विषय रूपी बादल कैसा घुमड़ रहा है और वासना रूपी बिजली चमक रही है। विषय भोग के मधुर-मधुर बादल हलके-हलके स्वर से गरज रहे हैं। ऐसा लगता है, कहीं विषय भोगों रूपी ओलों की बरसात होने वाली है।
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला।।
लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा।।
व्याख्या : तब वैराग्य रूपी विभीषण बोला कि हे कृपालु! न तो यह विषय रूपी बादलों की माला है और न ही वासना रूपी बिजली चमक रही है। यह तो प्रमस्तिष्क के वासना कोश में काम रूपी रावण स्थिर होकर आसुरी भावों के अखाड़ा को देख रहा है।
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अतिकारी।।
मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने विषयों रूपी विशाल काला छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलों की अत्यन्त काली घटा है। मन के अन्दर वाली आसुरी बुद्धि रूपी मंदोदरी के कानों के कर्णफूल बिजली की चमक जैसे लग रहे हैं। अर्थात् मन के अन्दर की आसुरी प्रेरणा बिजली का सा प्रकाश कर रही है।
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा।।
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना।।
व्याख्या : हे स्वरों के राजा! जो आसुरी भावों की ताल व मृदंग बज रही है अर्थात् आसुरी भावों के आपसी सामंजस्य की ध्वनि ही गर्जना के रूप में सुनायी पड़ रही है। तब आत्मा रूपी राम ने काम रूपी रावण का अभिमान समझ लिया और प्रेरणा रूपी बाण का संधान कर लिया।
दो0 छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।
सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम के प्रेरणा रूपी बाण ने एक बार में ही काम रूपी रावण का छत्र, मुकुट व मंदोदरी का कर्णफूल काट दिया अर्थात् आत्मा की प्रेरणा से काम का आकर्षण कम गया। यह घटना इतनी तीव्रता से घटित होती है कि अन्य भाव इस मर्म को जान ही नहीं पाते हैं।
दो0 अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।
रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।।
व्याख्या : ऐसा खेल करके आत्म प्रेरणा पुन: आत्मा में ही निसंग (अनासक्त) होकर लीन हो गयी। ऐसी घटना से काम रूपी रावण की आसुरी भावों की सभा शंकित हो उठती है अर्थात् विषयों के रस में भंग पड़ जाने पर काम के आसुरी भावों में खलबली मच जाती है।
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।।
सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आसुरी भावों को समझ आने लगता है कि न तो शरीर रूपी पृथ्वी में कोई कम्पन ही हुआ और न प्राण वायु की कोई विशेष गति ही हुई। न प्रेरणा रूपी अस्त्र-शस्त्र ही आँखों को दिखाई पड़ा। इसलिए सब आसुरी भाव हृदय में विचारने लगते हैं कि ये तो भयंकर अपशकुन हुए हैं अर्थात् आसुरी भावों के लिए हितकर नहीं हुआ है।
दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।।
सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही।।
व्याख्या : जब काम रूपी रावण ने देखा कि आसुरी भावों की सभा भयभीत हो गयी है, तो हँसते हुए युक्ति बनाकर बोला कि सिरों के कटने पर भी निरन्तर शुभ हुआ है, तो फिर मुकुट गिरने पर अपशकुन कैसे हो सकता है? काम रूपी रावण आसुरी भावों को समझाने का प्रयास करता है कि जब सिर कटने पर अर्थात् इन्द्रियों के दमन करने पर भी आसुरी भावों के लिए शुभ हुआ है, तो केवल वासना रुपी मुकुटों के गिरने से क्या हानि होगी?
सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई।।
मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने सब आसुरी भावों से कहा कि तुम सब अपने-अपने घरों में जाकर शयन करो अर्थात् अपने-अपने कोशों में सहज हो जाओ। तब सभी आसुरी भाव अपने-अपने कोशों में सहज हो गए। परन्तु लालसा रूपी कर्णफूलों के कटकर गिर जाने से मन के अन्दर वाली आसुरी बुद्धि रूपी मन्दोदरी के हृदय में विशेष चिंता हो गयी। अर्थात् मंदोदरी रूपी आसुरी बुद्धि को लालसा रूपी कर्णफूल कट जाने पर आसुरी भावों के पतन का आभास हो गया।
सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी।।
कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू।।
व्याख्या : इसलिए नयनों में जल भर कर दोनों हाथ जोड़कर अर्थात् पूर्ण समर्पण के साथ काम रूपी रावण से बोली कि हे प्राणप्रिय! मेरी प्रार्थना सुनिए और आत्मा रूपी राम से विरोध मत कीजिए। केवल मनुज अर्थात् मन अ अनुज यानी आत्मा को मन से सूक्ष्म मान कर हठ मत कीजिए। यहां मंदोदरी का भाव काम भाव को आत्मा के पराक्रम के बारे में बताना चाहती है। उसी को आगे प्रतीकों के माध्यम से विस्तारपूर्वक लिखा गया है।
दो0 बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
लोक कल्पना बेदकर अंग अंग प्रति जासु।।14।।
व्याख्या : मन्दोदरी रूपी आसुरी बुद्धि का भाव आत्मा रूपी राम की महिमा का बखान करते हुए कहती हैं कि यह समस्त संसार ही आत्मामय है। हे स्वामी! मेरे वचनों पर विश्वास कीजिए। कल्पना करके अनुभव (वेद) द्वारा परमात्मा के अंगों को ही नाना लोकों का नाम दिया गया है।
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।।
भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला।।
व्याख्या : परमात्मा के पैरों को ही पाताल लोक कहा गया है और सीस को ब्रह्म लोक बताया गया है। ब्रह्म लोक के अलावा अन्य लोक परमात्मा के भिन्न-भिन्न अंगों पर स्थित हैं। भयंकर काल अर्थात् समय की गति परमात्मा के भौंहों का चलना होता है। सूर्य नेत्र हैं और बादलों का समूह बाल हैं।
जासु घ्रान अस्विनी कुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा।।
श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत श्वास निगम निज बानी।।
व्याख्या : जिसकी नाक ही देव-बैध अश्विनी व कुमार है। इस चौपाई में गहरा रहस्य छुपा हुआ है। अश्विनी और कुमार को देवताओं का वैद्य बताया गया है। वास्तव में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर की गति से भावों को नियंत्रित किया जा सकता है और भाव ही शरीर में रसायन पैदा करके रोग पैदा करते हैं और रोग का निवारण भी करते हैं। इसलिए नाक को अश्विनी व कुमार बताया गया है। आँखों की पलक ही रात व दिन हैं। कान ही दस दिशाएँ हैं, जिनका वेदों ने वर्णन किया है। कानों को दस दिशा बताने का गहरा रहस्य है। वास्तव में जीव को प्राण से सुनाई देता है और प्राणों को समझाने के लिए दस भागों में बाँटा गया है। इसलिए दस प्राणों के कारण ही कानों को दस दिशाओं का प्रतीक बताया गया है। वायु जिसकी श्वास है और वेद जिसकी बाणी है अर्थात् भावों का अनुभव में आना ही वेद बनता है।
अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।।
आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा।।
व्याख्या : लोभ जिनका होठ है और यमराज भयानक दाँत हैं। हँसी ही माया है तथा भाव रूपी भुजाएँ ही दिग्पाल हैं। अग्नि मुख है, बरुण जीभ है। उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा (क्रिया) है।
रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा।।
उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना।।
व्याख्या : परमात्मा के रोम-रोम ही अठारह प्रकार की वनस्पतियाँ हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसों का जाल है, समुद्र पेट है और नरक (चिंता) जिनकी नीचे की इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार परमात्मा जगतमय हैं, इससे ज्यादा क्या कल्पना की जाए?
दो0 अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित महान।
मनजु बास सचराचर रूप राम भगवान।।15(क)।।
व्याख्या : परमात्मा का अहंकार कल्याणकारी (शिव) होता है और बुद्धि ब्रह्मा स्वरूप होती है तथा मन चन्द्रमा की तरह शीतल होता है और चित विशाल होता है। वह परमात्मा मन के अति सूक्ष्म भाग में समस्त चराचर जगत सहित बसा हुआ होता है। वही राम का रूप परमात्मा प्रकृति को धारण करने वाला होता है।
दो0 अस बिचारी सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।
प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।।15(ख)।।
व्याख्या : ऐसा विचार कर हे प्राणों के स्वामी! आप आत्मा रूपी राम से विरोध छोड़ दो अर्थात् आत्मा के प्रतिकूल कार्य मत करो। आप आत्मा रूपी राम के प्रति समपर्ण कर दो, जिससे मेरा अहिवात अर्थात् अहि अ वात उ वासना भोगों की क्षमता बनी रह सके। आत्मा के अनुकूल रहने पर सहज भोगों की अवस्था बनी रह पाती है।
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।।
नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।।
व्याख्या : काम रूपी रावण मंदोदरी रूपी आसुरी बुद्धि की बात सुनकर हँसा और कहा कि मोह की महिमा बलवान होती है अर्थात् मोह के कारण ही भय पैदा होता है। सभी लोग सत्य कहते हैं कि नारी के स्वभाव में सदैव आठ अवगुण होते हैं। अर्थात् नाड़ी की धड़कन से आठ प्रकार के अवगुण पैदा होते हैं।
साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।।
रिपु कर रूप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा।।
व्याख्या : नाड़ी की धड़कन की गति के अनुसार साहस, झूठ, चंचलता, माया (छल), भय, अविवेक, अपवित्रता और निर्दयता के भाव पैदा होते रहते हैं। इसलिए हे मन के अन्दर वाली मंदोदरी! तूने आत्मा रूपी शत्रु की सकल महिमा का बखान करके मुझ काम को बड़ा भारी भय सुनाया है अर्थात् मुझ काम को भयभीत करने का काम किया है।
सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें।।
जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई।।
व्याख्या : हे प्रिय! यह समस्त चराचर जगत तो सहज स्वभाव से ही मुझ काम के वश में है। अब तेरी कृपा से मुझे समझ में आ गया है। मैं तो तेरी चतुराई समझ गया हूँ कि तू इस बहाने से मुझ काम की प्रभुता का बखान करना चाहती है।
तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि।।
मंदोदरी मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मति भ्रम भयऊ।।
व्याख्या : हे मृग नयनी अर्थात् इच्छाओं को दृष्टि देने वाली! तेरे बातें बहुत गूढ़ रहस्यवाली हैं, जो समझने में सुख देने वाली और सुनने में भय को दूर करने वाली हैं। तब मन अंदरी मंदोदरी रूपी बुद्धि के भाव ने मन में निश्चय कर लिया कि काल के वश में हो जाने के कारण काम रूपी स्वामी को ऐसा भ्रम पैदा हो गया है।
दो0 एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध।
सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध।।16(क)।।
व्याख्या : इस प्रकार विनोद करते हुए काम रूपी रावण के लिए सुबह हो गया अर्थात् काम के भाव में स्फूर्ति आ गयी और तब वह निशंक और सहज निडरता के साथ आसुरी भावों की सभाँ में मद में अंधा होकर गया।
सो0 फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मुरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।।16(ख)।।
व्याख्या : यद्यपि बादल अमृत के समान जल बरसाते हैं, तब भी बेंत फलता-फूलता नहीं है। इसी प्रकार मूर्ख के हृदय में भी ज्ञान पैदा नहीं होता है, भले ही ब्रह्मा के समान गु डिग्री क्यों न मिल जाए।
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।
कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सि डिग्री नाई।।
व्याख्या : इधर को आत्मा रूपी राम ज्ञान रूपी प्रात:काल में उठे अर्थात् नव स्फूर्ति पैदा हुई तो मंत्रणा के भावों को बुलाकर पूछा कि जल्दी बताइये क्या उपाय किया जाए? तब धीर बुद्धि रूपी जामवंत का भाव समर्पण करते हुए बोला।
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।।
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।।
व्याख्या : हे सर्वग्य व सबके हृदय में निवास करने वाले प्रभु! आप तो बल, तेज, धारणा व गुणों की राशि हो। फिर भी मैं मेरी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ कि काम रूपी रावण के पास बल रूपी बालि के पुत्र दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को दूत के रूप में भेजिए।
नीक मंत्र सबके मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।।
बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।
व्याख्या : धीर बुद्दि रूपी जामवंत के भाव की मंत्रणा सभी भावों को अच्छी लगी। तब आत्मा रूपी राम ने दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद से कहा कि हे बुद्धि, बल व गुणों के धाम! तुम मेरे कार्य के लिए वासना रूपी लंका में जाओ। अंगद को ही दूत के रूप में भेजने में रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में बुद्धि में दृढ़ता आने पर ही वह वासनाओं में नहीं फँस पाता है, बुद्धि की दृढ़ता के अभाव में बुद्धि भी वासना में फँस सकती है। इसलिए दृढ़ बुद्धि के भाव को ही वासना रूपी लंका का मर्म जानने के लिए दूत के रूप में भेजते हैं।
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।।
काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि तुमको तो मैं चतुर समझता हूँ, इसलिए बहुत समझाकर क्या कहूँ? हे तात! जिस तरह से हमारा कल्याण हो अर्थात् आत्मा बलवान हो, ऐसी बातें काम रूपी रावण से करना।
सो0 प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।
सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।17(क)।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा को सिर पर धारण करते हुए पूर्ण समर्पण के भाव के साथ दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद उठा। हे प्रभु! आप जिस पर कृपा कर देते हैं, वो गुणों का सागर हो जाता है।
सो0 स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।
व्याख्या : हे प्रभु! आपकी (आत्मा) प्रेरणा से ही सब कार्य स्वयं हो जाता है परन्तु आपने मुझ दृढ़ बुद्धि के भाव को आदर दिया है। ऐसा विचारकर पुलकित होता हुआ दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का हृदय हर्ष से भर गया।
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।
प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के चरणों की वन्दना करके और सबको सिर झुका कर अर्थात् पूर्ण समर्पण का भाव दिखाकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद हृदय में परमात्मा की प्रभुता को धारण करके चला। परमात्मा के प्रताप से दृढ़ बुद्धि का भाव सहज में निशंक हो गया। भावों के युद्ध में बल से पैदा दृढ़ बुद्धि का भाव सहज में ही योद्धा के समान होता है।
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भेटा।।
बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।।
व्याख्या : वासना रूपी लंका में प्रवेश करते ही काम रूपी रावण के मोह रूपी पुत्र से भेंट हो गयी, जो आसुरी भोगों में खेल रहा था। बात ही बातों में दृढ़ बुद्धि के भाव और मोह रूपी काम के पुत्र में झगड़ा बढ़ गया। दोनों भाव अतुलनीय बलवान थे और फिर दोनों भावों की युवावस्था थी।
तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।।
निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के मोह रूपी पुत्र ने दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद पर लात का प्रहार किया अर्थात् दृढ़ बुद्धि को मोह के जाल में फँसाने का प्रयास किया तो दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने उसका पैर पकड़कर अर्थात् मर्म जानकर भाव रूपी भूमि पर पटक मारा अर्थात् मोह के मर्म को जान कर निष्प्रभावी कर दिया। मोह के भाव को निष्प्रभावी हुआ देखकर आसुरी भावों के समूह दृढ़ बुद्धि रूपी योद्धा को देखकर डर के मारे जहाँ तहाँ बिना पुकारे भाग चले।
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।।
भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भाव आपस में एक दूसरे से मर्म की बात नहीं बताते हैं और मोह रूपी पुत्र का मरण जानकर चुप रह जाते हैं. इस प्रकार वासना रूपी लंका में कोलाहल मच गया कि वासना रुपी लंका को जलाने वाला बुद्धि रूपी वानर आ गया है।
अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।।
बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
व्याख्या : सभी आसुरी भाव अत्यन्त भयभीत होकर विचार करने लगे कि पता नहीं अब विधाता क्या करेंगे? आसुरी भाव दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को बिना पूछे ही रास्ता दिखाने लगते हैं और जो भी आसुरी भाव दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को देखता है, तो वह सूख जाता है अर्थात् दृढ़ बुद्धि के प्रभाव से आसुरी भाव निष्प्रभावी हो जाता है।
दो0 गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।।18।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम का स्मरण करके दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव काम रूपी रावण के आसुरी भावों के दरबार में गया, तो सिंह के समान ऐंठता हुआ इधर-उधर को देखने लगा।
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।
सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।।
व्याख्या : तुरन्त ही दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने एक आसुरी भाव को भेजा, जिसने काम रूपी रावण को दृढ़ बुद्धि के भाव के आगमन के बारे में बताया। यह सुनते ही काम रूपी रावण हँसते हुए बोला कि लेकर आवो। देखें तो वह कौन-सा बुद्धि रूपी वानर है?
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।।
अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।।
व्याख्या : काम रूपी रावण की प्रेरणा पाकर बहुत से आसुरी भाव दौड़े और बुद्धि के भावों में हाथी के समान दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को बुला ले चलै। दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने काम रूपी रावण को ऐसे देखा जैसे प्राणों से युक्त कोई काजल का पहाड़ हो।
भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।।
मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण की भाव रूपी भुजाएँ वृक्षों के समान और इन्द्रियों रूपी सिर पर्वतों के शिखरों के समान होते हैं। काम के भाव की वृतियाँ रोम-रोम में बेलों के समान हैं। काम रूपी रावण के मुख, नासिका, नयन और कान मानो पर्वतों की कंदरा व गुफाओं जैसे हों।
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा।।
उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी।।
व्याख्या : बल से उत्पन्न दृढ़ बुद्धि रुपी अंगद का भाव आसुरी भावों की सभा में गया परन्तु तनिक भी नहीं झिझका। दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद के भाव को देखकर सभी आसुरी भाव उठ खड़े हुए अर्थात् आसुरी भावों में खलबली मच गयी। यह देखकर काम रूपी रावण को बहुत क्रोध हो आया अर्थात् काम का भाव क्षुब्ध हो गया।
दो0 जथा मत्त गज जूथ महुँ गज पंचानन चलि जाइ।
राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ।।19।।
व्याख्या : जैसे मतवाले हाथियों के झुण्ड में सिंह निशंकर होकर चला जाता है वैसे ही आत्मा के प्रताप के प्रभाव से दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव आसुरी भावों की सभा में निशंकर होकर बैठ गया।
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।
मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि हे बुद्धि रूपी वानर! तू कौन है? तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव बोला कि मैं आत्मा रूपी राम का दूत हूँ। मेरे पिता बल रूपी बालि के साथ आपकी मित्रता थी, इसलिए तुम्हारी भलाई के लिए ही मैं आया हूँ। वास्तव में बल व इन्द्रियों में आपसी मित्रता रहती है और दोनों बल व इन्द्रियों की मित्रता से ही काम रूपी रावण बलवान होता है। परन्तु जब बल रूपी बालि साधना द्वारा निस्तेज हो जाता है, तो काम का भाव भीतर से खोखला हो जाता है।
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।।
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! तुम्हारा उत्तम कुल है। तुम ऋषि पुलस्त्य के पौत्र हो। अर्थात् काम का भाव भी मन की सहज अवस्था में धीरे-धीरे क्षोभ पैदा होने पर पैदा होता है। इसलिए काम रूपी रावण को पुलस्त्य ऋषि रूपी सहज मन का पौत्र बताया गया है। तुमने विश्वासरूपी शिव और बुद्धि रूपी ब्रह्मा की बहुत प्रकार से पूजा की है। अर्थात् बहुत प्रकार से विश्वास व बुद्धि के भावों में रमण किया है। तुमने विश्वास व बुद्धि के बल से ही सब कार्य किए हैं और समस्त लोकपालों अर्थात् चक्रों को वश में कर लिया है।
नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।।
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।।
व्याख्या : अब तुम धड़कन के अभिमान या मोह के वश में होकर जगत को पैदा करने वाली सुरता रूपी जगत की माता सीता का हरण कर लाए हो। अब मैं तुम्हें अच्छी बात बताता हूँ, जिसे सुनो। तुम्हारे सब अपराधों को आत्मा रूपी राम क्षमा कर देंगे।
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।।
सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में काम भाव को आत्मोन्मुखी होने की युक्ति बताई गयी है। इसलिए कहा गया है कि हे काम रूपी रावण! तुम दस इन्द्रियों को वश में करो अर्थात् दस इन्द्रियों को तिनके के समान वश में करो और कण्ठ पर कुल्हाड़ी रखो अर्थात् वाणी को मौन करो और समस्त आसुरी भावों सहित निज नाड़ी अर्थात् नाड़ी की धड़कन में लीन होकर श्रद्धापूर्वक सुरता रूपी सीता को आगे करके समस्त प्रकार के भय का त्याग करके आत्मोन्मुखी हो जाओ।
दो0 प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।।20।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम (जो कि प्राण के द्वारा सब भावों का पालन करते हैं) के सामने त्राहिमाम-त्राहिमाम करो, जिससे तुम्हारी आर्त पुकार सुनकर तुन्हें निर्भय कर देंगे।
रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।
कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नाते मानिऐ मिताई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि हे बुद्धि रूपी वानर! तू संभाल कर बोल। तू मुझ काम को नहीं जानता है कि मैं दैवीय भावों का शत्रु हूँ। तुम तुम्हारे पिता का नाम तो बताओ कि वो कैसे मेरे मित्र थे? अर्थात् काम का भाव अंगद रूपी बुद्धि भाव से जानना चाहता है कि तुमको पैदा करने वाला भाव मुझ काम का कैसे मित्र था?
अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा।।
अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।।
व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव बोला कि मैं बल रूपी बालि से पैदा हुआ दृढ़ बुद्धि का भाव हूँ। बल रूपी बालि से कभी तुम्हारी भेंट हुई थी? तब अंगद भाव के वचन सुनकर काम का भाव संकोच कर गया और बोला कि हाँ मैं जान गया कि बल रूपी एक वानर था अर्थात् इन्द्रियों का भोग करने वाला चंचल बल था।
अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।।
गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापसदूत कहायहु।।
व्याख्या : अरे अंगद! तू उसी बल रूपी बालि का पुत्र है क्या? अर्थात् तू चंचल बल से उत्पन्न दृढ़ बुद्धि का भाव है क्या? तू पैदा होने से पहले ही क्यों नहीं मर गया? तू व्यर्थ में आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लखन का दूत कहलाता है। अरे कुलनाशक! तू तो अपने कुल रूपी बाँस के लिए अग्नि रूप ही पैदा हुआ है। क्योंकि दृढ़ बुद्धि से चंचल बल मर जाता है, इसलिए अंगद के भाव को कुल रूपी बाँस के लिए अग्नि बताया गया है।
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई।।
दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।।
व्याख्या : अरे अंगद रूपी भाव! अब बल रूपी बालि की कुशल क्षेम बताओ। तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव हँसकर बोला कि दस दिनों में ही तुम बल रूपी बालि के पास पहुँच जाओगे। तब तुम तुम्हारे मित्र की कुशलता को हृदय में समझ लेना। अर्थात् जिस प्रकार भोगोन्मुखी इन्द्रियों का बल आत्मा के प्रभाव से सहज होकर शान्त हो गया वैसे ही अब दस प्राणों के निर्मल हो जाने पर तुम भी शान्त हो जाओगे। तब उस अवस्था में तुम्हें बल रूपी बालि की सहजता हृदय में समझ आयेगी।
राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।।
सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्री रघुबीर हृदय नहिं जाकें।।
व्याख्या : तब तुमको बल रूपी बालि वह सब समझायेगा कि आत्मा के प्रतिकूल चलने पर क्या गति होती है? अरे मूर्ख! भेद तो उस भाव के हृदय में होता है, जिसके हृदय में परमात्मा का आभास नहीं होता हो।
दो0 हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।21।।
व्याख्या : हम बुद्धि के भाव तो सत्य में ही कुल नाशक होते हैं अर्थात् बुद्धि के भाव जिन भावों से पैदा होते हैं, उन्हीं भावों का बुद्धि के द्वारा नाश करते रहते हैं। परन्तु काम वासना के भाव एक दूसरे भाव की वृद्धि करते रहते हैं। इसलिए हे काम रूपी रावण! तुम सत्य ही कुल का पालन करने वाले हो। परन्तु ऐसे विकारी भावों की वृद्धि करने की बात तो अंधे व बहरे लोग भी नहीं कहते हैं। अर्थात् दृष्टि हीन होने पर अर्थात् दृष्टि को वश में कर लेने पर और शब्द से प्रभावित नहीं होने पर काम वासना की वृद्धि की बात नहीं बनती है। परन्तु हे काम रूपी रावण! तुम तो दस इन्द्रियों व दस कानों से युक्त हो इसलिए तुम तो आसुरी भावों की पालना की बात कहोगे ही कहोगे। दस इन्द्रियों व दस कानों से तात्पर्य दस प्राणों से उत्पन्न भावों से देखने व सुनने से होता है।
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।
तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।।
व्याख्या : विश्वास, बुद्दि, स्वर व मन के भावों का समूह जिस आत्मा में रमण करना चाहता है, तो मैंने उस आत्मा रूपी राम का प्रेरणा रूपी दूत होकर कुल को डूबो दिया। ऐसी आसुरी बुद्धि होने पर भी हे काम रूपी रावण! तुम्हारा हृदय फट नहीं जाता?
सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।।
खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद की कठोर वाणी सुनकर काम रूपी रावण क्षुब्ध होता हुआ बोला कि मैं तेरे कठोर वचन इसलिए सह रहा हूँ कि मैं नीति व धर्म को जानता हूँ। अर्थात् मैं धारणा की नीति को जानता हूँ।
कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी।।
देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद बोला कि तुम्हारी धारणा को तो मैंने भी जाना है कि तुम प्रकृति के तीनों गुणों को पैदा करने वाली नाड़ी का हरण कर लिए हो। प्रेरणा रूपी दूत की रक्षा की वृति को तो मैंने मेरी आँखों से देख लिया है। अरे ऐसी धारणा की वृति होते हुए भी तुम डूब कर नहीं मर रहे हो।
कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।।
धर्म सीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी।।
व्याख्या : जब गन्ध व शब्द से हीन वासना रूपी सूर्पणखा को देखा तो भी धारणा का विचार करके ही तुमने क्षमा कर दिया। तुम्हारी धारणा तो समस्त जगत में जागृत है। आज हमने भी दर्शन कर लिया। अत: हम बड़े भाग्यशाली हैं अर्थात् काम की धारणा को समझ लिया इसलिए दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद अपने-आपको भाग्यशाली कहता है।
दो0 जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।22(क)।।
व्याख्या : अरे बुद्धि रूपी वानर भाव तू ज्यादा बक-बक मत कर और मुझ काम के भाव रूपी भुजाओं का बल देख। ये सब लोकपाल अर्थात् चक्रों से उत्पन्न विपुल बल है तथा शीतलता रूपी चन्द्रमा को ग्रसने के लिए वासना रूपी राहू है।
दो0 पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।22(ख)।।
व्याख्या : फिर तूने तो सुना ही होगा कि अर्थात् बुद्धि के भाव को समझ में आ गया होगा कि मेरी भाव रूपी भुजाओं के कमल रूपी समूह पर बसकर विश्वास रूपी शिव व कैलास रूपी हंस ने शोभा को प्राप्त किया। इस दोहे में बहुत गहरा साधना रहस्य छुपा हुआ है। काम का भाव बताता है कि मस्तिष्क की कोशिकाओं के कमल रूपी भावों पर विश्वासरूपी शिव व कैवल्य के उल्लास (कैलाश) का भाव हंस की तरह अर्थात् ह कार व सकारमय होकर स्थिर हो गया। अर्थात् काम के भावों की गति हंसाकार हो गयी, जिससे विश्वास व कैवल्य का भाव भी काम के प्रभाव में आ गया।
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।
तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।।
व्याख्या : हे दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव! तुम्हारी भावों रूपी सेना में मुझ काम रूपी रावण से लड़ने वाला योद्धा कौन है, बता? तेरे प्रेरक आत्मा रूपी राम तो सुरता रूपी सीता के विरह के कारण बलहीन हो गए हैं और लखन भाव आत्मा का बल कम जाने के कारण दु:खी व मलीन हो गया है।
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।।
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारुढ़ा।।
व्याख्या : तुम और सद्बुद्धु रूपी सुग्रीव तो नदी के तट के वृक्ष हो अर्थात् बुद्धि के भाव तो भाव रूपी नदी की धार के ऊपर निर्भर हो। मुझ काम का छोटा भाई वैराग्य रूपी विभीषण तो बहुत डरपोक है अर्थात् वैराग्य का भाव तो वासनाओं से बहुत डरता है। धीर बुद्धि रूपी जामवंत का भाव तो बहुत बूढ़ा हो गया है अर्थात् धीर बुद्धि का भाव स्थिर हो जाने पर वह भावों के द्वन्द्व में नहीं पड़ता है। इसलिए जामवंत रूपी धीर बुद्धि का भाव तो युद्ध करेगा नहीं।
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।।
आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा। सुनत बचन कह बालि कुमारा।।
व्याख्या : नल, नील रूपी बुद्धि के भाव शिल्प कर्म के जानकार हैं, अत: वे भावों के द्वन्द्व में पड़ते नहीं है। हाँ एक अनन्य बुद्धि रूपी वानर जरूर बलशाली है, जिसने आकर वासना रूपी लंका को जला दिया था। काम रूपी रावण की बातें सुनकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद बोला।
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा।।
रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।।
व्याख्या : हे आसुरी भावों के स्वामी! तुम सत्य कहो क्या सचमुच अनन्य बुद्धि रूपी वानर ने वासना रूपी नगर को जला दिया। काम रूपी रावण की वासना रूपी लंका को सूक्ष्म बुद्धि रूपी वानर कैसे जला दिया? इस बात को सुनकर कौन सत्य मानेगा?
जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।।
चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! जो तुमने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा है, वो तो सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का एक छोटा-सा धावक है। जो बहुत चलता है, वो वीर नहीं हो जाता है। उसे तो हम बुद्धि के भावों ने केवल खबर लेने के लिए भेजा था अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव तो केवल काम के भावों के बारे में जानने के लिए भेजा गया था।
दो0 सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।
फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।।23(क)।।
व्याख्या : क्या उसने सचमुच बिना प्रभु की आज्ञा के वासना रूपी नगर जला दिया? इसलिए वह पुन: लौटकर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के पास नहीं गया और कहीं छुप गया है।
दो0 सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।
कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।23(ख)।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! तुमने सत्य कहा है इसलिए मुझे तुम पर क्रोध नहीं आ रहा है। क्योंकि हमारी बुद्धि के भावों रूपी सेना में कोई भी बुद्धि का भाव ऐसा नहीं है, जो तुम्हारे साथ लड़ने में शोभा पायेगा।
दो0 प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।
जौं मृगपति बध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।23(ग)।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! ऐसी नीति बतायी गयी है कि प्रेम और विरोध बराबर वालों से ही करना चाहिए। अगर सिंह मेढ़कों को मारेगा, तो कोई शाबासी थोड़ी देगा।
दो0 जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।23(घ)।।
व्याख्या : हालांकि तुम्हें मारने में आत्मा रूपी राम की लघुता ही है और बड़ा दोष भी है। परन्तु हे काम रूपी रावण! क्षत्रिय जाति अर्थात् तीनों गुणों का क्षय करने वाली अवस्था का क्रोध बहुत कठिन होता है।
दो0 बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस।
प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस।।23(ङ)।।
व्याख्या : वक्रोक्ति रूपी धनुष से वचन रूपी बाण चलाकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने काम रूपी शत्रु का हृदय जला दिया। काम रूपी रावण प्रति उत्तर रूपी सँड़सियों से मानो उन बाणों को निकालने का प्रयास कर रहा हो।
दो0 हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।
जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।23(च)।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण हँसकर बोला कि बुद्धि रूपी वानर का एक विशेष लक्षण होता है कि जो भी भाव उसको पालता है, वह उसकी नाना प्रकार से रक्षा करता है।
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।
नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।।
व्याख्या : बुद्धि रूपी वानर का भाव धन्य है, जो अपने स्वामी को रिझाने के लिए जहाँ-तहाँ नाचता रहता है अर्थात् जहाँ-तहाँ बुद्धि का भाव तर्क देता रहता है। वह बुद्धि का भाव तर्क रूपी नाच दिखाकर भाव रूपी लोगों को प्रसन्न करके अपने स्वामी का हित साधता रहता है।
अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती।।
मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना।।
व्याख्या : हे दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव! तुम्हारी जाति स्वामिभक्त होती है, इसलिए ही अपने स्वामी का तुम ऐसे गुण-गान कर रहे हो। मैं तो गुणों को ग्रहण करने वाला हूँ इसलिए तुम्हारी कटु वाणी पर ध्यान नहीं दे रहा हूँ।
कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।।
बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा।।
व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद बोला कि तुम्हारी सच्ची गुण ग्राहकता तो मुझे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने बतायी है कि उसने अशोक वाटिका को उजाड़कर, तुम्हारे पुत्र को मार दिया और फिर वासना रूपी लंका को जला दिया, फिर भी तुमने उसकी कोई क्षति नहीं की।
सोई बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।।
व्याख्या : तुम्हारा ऐसा सुन्दर स्वभाव है, यही विचार कर हे काम रूपी रावण! मैंने धृष्टता की है। अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने जो कहा था, उसे मैंने प्रत्यक्ष आकर देख लिया है कि तुम्हें न लाज है, न क्रोध है और न ही तुम्हें कोई चिढ़ ही होती है। इन चौपाइयों में काम के भाव के लक्षणों को बताया गया है।
जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा।।
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समझ परा कछु मोही।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण बोला कि अरे दृढ़ बुद्धि रूपी वानर! तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू अपने बल रूपी बालि पिता को खा गया। ऐसा कहकर काम रूपी रावण हँसा। तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद बोला कि पिता को खाकर अब तुमको भी खा जाता अर्थात् काम को भी वश में कर लेता परन्तु मुझे अभी तुम्हारा मर्म समझ में आया है।
बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी।।
कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।।
व्याख्या : बल रूपी बालि के निर्मल यश का पात्र जानकर मैं तुझ अभिमानी काम का बध नहीं कर रहा हूँ। अर्थात् निर्मल बल से उत्पन्न जानकर हे अभिमानी काम भाव! मैं तूझे नहीं मार रहा हूँ। अरे काम रूपी रावण! तू ये तो बता कि संसार में कितने काम रूपी रावण होते हैं। मैंने जितने काम रूपी रावण के बारे में कानों से सुना है, वो सुन।
बलिहि जितन एक गयउ पाताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।।
खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।।
व्याख्या : एक काम रूपी रावण बल रूपी बलि को जीतने पाताल लोक में गया अर्थात् काम का भाव बल को वश में करने के लिए अधो इन्द्रियों में रमण करने लगा परन्तु वहाँ भाव रूपी बालकों ने मन रूपी घुड़साल में काम भाव को बाँध लिया और भाव रूपी बालक खेलते हुए काम रूपी रावण को मारते रहते थे। तब बल रूपी बलि को दया आ गयी और काम भाव को छोड़ दिया।
एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।।
कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।।
व्याख्या : एक काम रूपी रावण वह था, जिससे सहस्र बाहू रूपी हजारों भावों ने विशेष प्रकार का जीव समझकर पकड़ लिया और खेल खेल में भाव रूपी भवन में लेकर आ गए। अर्थात् एक काम का भाव ऐसा होता है जो हजारों भावों में फँस जाता है। जब बहुत से भाव एक साथ काम को घेर लेते हैं, तो वह असहाय हो जाता है। उसी अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर काम रूपी रावण को भाव रूपी घर में ले आना बताया गया है। तब भाव सहज हुए तो मन की सहज अवस्था आयी तो मन की सहज अवस्था रूपी पुलस्त्य मुनि ने जाकर उसे छुड़ाया। अर्थात् जब हजारों भावों का द्वन्द्व शान्त हुआ और मन की सहज अवस्था आयी, तब जाकर काम का भाव मुक्त हो पाया।
दो0 एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख।
इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।24।।
व्याख्या : एक काम रूपी रावण के बारे में तो कहने में मुझे बहुत संकोच हो रहा है कि वह बल रूपी बालि की काँख में रहा था अर्थात् एक काम का भावतो बल के पूरा अधीन था। इन काम रूपी रावणों में हे दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाले रावण! तुम सत्य बताओ, कौन से रावण हो?
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।।
जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।।
व्याख्या : अरे दृढ़ बुद्धि रूपी मूर्ख वानर! मैं वही काम रूपी रावण हूँ जिसकी भाव रूपी भुजाओं की लीला का यश कैवल्य रूपी पर्वत (कैलाश) जानता है। मेरी शूरता को तो श्रद्धा रूपी पार्वती के पति विश्वास रूपी शंकर भी जानते हैं, जिन्हें मैंने इन्द्रियों रूपी सिरों के फूल चढ़ाकर पूजा था। इन चौपाइयों में साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में जब इन्द्रियों का दमन कर लिया जाता है, तो माया के हरण की अवस्था में दृढ़ता आ जाती है। उसी को हर गिरि (अर्थात् माया के हरण की दृढ़ अवस्था) की प्रसन्नता बताया गया है। जब माया का हरण हो जाता है, तो श्रद्धा का स्वामी विश्वास भी प्रसन्न हो जाते हैं। उसी को श्रद्धा रूपी पार्वती के पति विश्वास रूपी शंकर का प्रसन्न होना बताया गया है।
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।।
भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।।
व्याख्या : इन्द्रियों रूपी सिरों को स्वयं के हाथों से उतारकर मैंने अनेक बार त्रिगुणों के शत्रु विस्वास रूपी शंकर को पूजा है। अर्थात् मैंने अनेक बार इन्द्रियों का दमन करके तीन गुणों को वश में करने की अवस्था को प्राप्त किया है। इसलिए मेरी भाव रूपी भुजाओं के बल को प्राण रूपी दिग्पाल जानते हैं। इसलिए आज भी प्राण रूपी दिग्पालों के हृदय में मेरा भय है।
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई।।
जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।।
व्याख्या : इसलिए प्राण रूपी दिशाओं के हाथी अपने हृदय में मेरी कठोरता को जानते हैं। मैं जब-जब भी उनसे जोर करे लड़ा तो उनके भयानक दाँत मेरी छाती में निशान भी नहीं कर सके। उल्टे वे मुझ काम से भिड़ते ही मूली की तरह टूट गए। अर्थात् प्राण रूपी हाथियों की सहजता रूपी दाँत मुझ काम का कुछ नहीं बिगाड़ सके। उल्टे मुझ काम से भिड़ने पर असहज हो गए।
जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।।
सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।।
व्याख्या : जिसके चलने से शरीर रूपी पृथ्वी ऐसे हिलती है, जैसे मतवाले हाथी के चढ़ने से छोटी नाव हिलती है। मैं वही जगत् प्रसिद्ध काम रूपी प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करने वाले! तूने क्या कभी मेरे बारे में कानों से नहीं सुना। अर्थात् क्या कभी शब्द के द्वारा मेरा (काम) आभास नहीं हुआ।
दो0 तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान।
रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।25।।
व्याख्या : मुझ उसी काम रूपी रावण को तू छोटा कहता है और आत्मा रूपी राम का बखान करता है। अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बुद्धि रूपी बन्दर! मैंने तेरा ज्ञान जान लिया है।
सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।।
सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।।
व्याख्या : काम रूपी रावण की बातें सुनकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद क्रोधपूर्वक बोला कि अरे नीच अभिमानी काम रूपी रावण! तू सोच समझकर बोल। सहस्रबाहू रूपी हजारों भावों रूपी भुजाओं के वन को जलाने के लिए जिनका प्रेरणा रूपी फरसा अग्नि के समान था।
जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।।
तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।।
व्याख्या : जिनके फरसा रूपी प्रेरणा सागर में अनेकों बार बहुत से भाव रूपी राजा डूब गए। उन्हीं परशुराम रूपी साधक का गर्व जिन्हें अर्थात् आत्मा रूपी राम को देखकर भाग गया, वो नर की धड़कन केवल धड़कन क्यों है? अरे दस इन्द्रियों रूपी सिरों वाले काम रूपी रावण! तू समझ।
राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।
पसु सुरधेनु कल्पतरु रुखा। अन्न दान अरु रस पियूषा।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में प्रचलित ज्ञान की मिथ्या अवधारणा को तोड़ा गया है। इसलिए कहा गया है कि क्या राम भी कोई मनुष्य है क्या? अर्थात् तुलसी जिस राम की बात करते हैं, वो कोई शरीरधारी मनुष्य नहीं है। जिस कामदेव की बात करते हैं, वो कोई धनुष धारण करने वाला कामदेव नहीं है। जिस कामधेनु की बात कही गयी है, वो कोई पशु (गाय) नहीं है। कल्पतरु तो वृक्ष नहीं है। अन्न का कोई दान नहीं होता और अमृत कोई रस नहीं होता है। इन चौपाइयों में स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि राम, कामदेव, कामधेनु, गंगा आदि केवल प्रतीक के रूप में प्रयोग किए गए हैं। ये कल्पना को प्रकट करने के प्रतीक है। वो परमात्मा तो साधक के हृदय में ही अवतरित होता है।
बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।।
सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।
व्याख्या : गरुड़ क्या पक्षी है? सैकड़ों मुखों वाला क्या कोई सर्प है? अरे काम रूपी रावण! क्या चिन्तमणि कोई पत्थर है? अरे मूर्ख! क्या बैकुण्ठ भी कोई लोक होता है? वो तो परमात्मा की भक्ति से उत्पन्न कुण्ठारहति (बिनु अ कुण्ठा उ बैकुण्ठा) अवस्था का नाम होता है।
दो0 सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि।
कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।26।।
व्याख्या : जो आसुरी भावों की सेना सहित तुझ काम के मद का मर्दन करके वासना रूपी वन को उजाड़ कर नगर को जला गया। वो अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कैसे बन्दर हो सकता है? जो तेरे मोह रूपी पुत्र को भी मार गया। इन चौपाइयों से स्पष्ट हो जाता है कि अनुभूति को लिखने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया गया है।
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।।
जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रूद्र सक राखि न तोही।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! तू चतुराई छोड़कर आत्मा रूपी राम का भजन कर। वरना तू अगर आत्मा के प्रतिकूल चलेगा, तो बुद्धि व विश्वास के भाव भी तेरी रक्षा नहीं कर पायेंगे।
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।।
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।।
व्याख्या : अरे मूर्ख काम रूपी रावण! तू व्यर्थ में गाल मत बजा। वरना आत्मा रूपी राम के प्रतिकूल होने पर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे इन्द्रियों रूपी सिरों के समूह आत्मा रूपी राम के प्रेरणा बाण लगते ही बुद्धि रूपी वानरों के सामने आ पड़ेंगे।
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलिहहिं भालु कीस चौगाना।।
जबहिं समर कोपिहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहुसायक।।
व्याख्या : और बुद्धि के भाव रूपी रीछ व वानर गेंद के समान तेरे सिरों से चौगान खलेंगे अर्थात् सत, रज, तम व गुणातीत अवस्था में रमण करेंगे। जब भाव रूपी युद्ध में आत्मा रूपी राम क्रोध करेंगे तब बहुत से भयानक प्रेरणा रूपी बाण छूटेंगे। अर्थात् आसुरी भावों के लिए आत्मा की प्रेरणा बहुत भयानक होगी।
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारी भजु राम उदारा।।
सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।।
व्याख्या : तब क्या तुम्हारी ऐसी बकवास चलेगी? इसलिए ऐसा विचार करके तू आत्मा रूपी राम का भजन कर। दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव के वचनों को सुनकर काम रूपी रावण जल उठा अर्थात् काम में क्षोभ पैदा हो गया, जैसे जलती हुई अग्नि में मानों घी पड़ गया हो।
दो0 कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि।।27।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि आलस्य रूपी कुम्भकरण मेरा भाई है और अहंकार रूपी मेघनाद चित रूपी इन्द्र का प्रसिद्ध शत्रु मेरा पुत्र है। और मुझ काम का पराक्रम को तूने सुना नहीं कि मैंने समस्त जड़-चेतन चराचर जगत को जीत लिया है।
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।।
नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा।।
व्याख्या : अरे बुद्धि रूपी वानरों को जोड़कर भाव रूपी सिन्धु को बाँध लिया, यही तो आत्मा रूपी राम की प्रभुता है। परन्तु भाव रूपी समुद्र को तो अनेक भाव रूपी पक्षी भी लाँघ जाते हैं। पर इसी से वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते हैं। अरे मूर्ख बुद्धि रूपी बन्दर! सुन -।
मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा।।
बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा।।
व्याख्या : मेरी भाव रूपी भुजाओं का सागर बल रूपी जल से पूर्ण है, जिसमें बहुत से ज्ञान-वैराग्य रूपी शूरवीर भाव, देव भाव, व धड़कन से उत्पन्न भाव डूब गए। तू बता, कौन-सा ऐसा शूरवीर भाव है, जो मेरे बीस भुजाओं रूपी भाव रूपी समुद्र का पार पा जायेगा।
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा।।
जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा।।
व्याख्या : मैं काम रूपी रावण प्राण रूपी दिग्पालों से जल भरवाता हूँ अर्थात् दस प्राण रूपी दिग्पाल भाव रूपी जल भरते हैं। और तू मुझे एक आत्म भाव रूपी राजा का सुयश सुनाता है। जिसका तू बार-बार बखान करता है और अगर वह भावों के द्वन्द्व रूपी युद्ध में बड़ा योद्धा है।
तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा।।
हर गिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू।।
व्याख्या : तो फिर वह बार-बार दूत क्यों भेजता है? अरे विपरीत वृति रूपी शत्रु भाव के साथ सन्धि करने में लाज नहीं आती। पहले तू कैवल्य ज्ञान की दृढ़ता का मंथन करने वाली मेरी भुजाओं को देख। फिर तू तेरे स्वामी की सराहना करना।
दो0 सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।
व्याख्या : अरे बुद्धि रूपी वानर! काम रूपी रावण के बराबर शूरवीर कौन है? जिसने स्वयं अपने सिर काटकर अर्थात् इन्द्रियों का दमन करके वासना रूपी अग्नि में झोंक दिया था। इस घटना के गौरीस उ गौ अ अरि अर्थात् इन्द्रियों के दुश्मन विश्वास रूपी शंकर साक्षी हैं। वास्तव में जब इन्द्रियों को जोर जबरदस्ती करके दमन किया जाता है, तो दम्भ का विकार पैदा हो जाता है। काम का भाव भी बहुत बार इन्द्रियों का दमन करके उन्हें वश में करता है और पुन: वे इन्द्रियाँ भोगों की ओर आकर्षित हो उठती हैं। इसी को प्रतीकों का सहारा लेकर बार-बार काम रूपी रावण के सिर वापिस लग जाना बोलकर लिखा है।
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।।
नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची।।
व्याख्या : जब मैंने वासना रूपी अग्नि में मेरे इन्द्रियों रूपी सिरों को जलता हुआ देखा तो मेरे कपाल में क्रिया के प्रभाव का मर्म समझ में आया कि मेरा मरण अर्थात् काम का अंत धड़कन (नर) के द्वारा होगा, तो क्रिया के इस प्रभाव को झूठा जानकर मैं हँसा। इन चौपाइयों में बहुत गहरा साधना रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में जब इन्द्रियों का हवन वासना रूपी अग्नि में होता है, तो काम के भाव को समझ में आ जाता है कि ध्यान की क्रिया द्वारा नर की धड़कन में मन को लीन करने से काम का मरण हो जायेगा। परन्तु काम का भाव दम्भ के कारण ध्यान की क्रिया के इस प्रभाव को नकारना चाहता है। उसी अनुभूति को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा है।
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें।।
आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाजपति त्यागें।।
व्याख्या : क्रिया (विधि) के उस प्रभाव को समझ करके भी मेरे मन में भय नहीं है, क्योंकि यह तो बुद्धि रूपी बूढ़े भाव ने समझा दिया होगा। अर्थात् काम रूपी रावण ध्यान की क्रिया द्वारा धड़कन में लीन होने के प्रभाव को बुद्धि की युक्ति जानकर नकार देता है। अरे दृढ़ बुद्धि रूपी मूर्ख अंगद भाव! तू बार-बार अन्य वीर भाव का गुणगान करता है। तूने लज्जा और मर्यादा छोड़ दी है।
कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं।।
लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ।।
व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद बोला कि अरे काम रूपी रावण! तेरे समान जगत में लज्जावान कोई नहीं है। क्योंकि लज्जा करना तो तेरा सहज स्वभाव होता है। तू तो स्वयं के मुख से स्वयं के गुणों का भी बखान नहीं करता। इन चौपाइयों में दृढ़ बुद्धि का भाव काम के मर्म को जान लेता है। इसलिए व्यंग्यात्मक भाषा में कहता है।
सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही।।
सो भुजबल राखेहु उर घाली। जीतेहु सहस बाहु बलि बाली।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में भी दृढ़ बुद्धि का भाव गहरा व्यंग्य करता हुआ पुन: काम रूपी रावण से कहता है कि तुझे इन्द्रियों रूपी सिर और कैवल्य रूपी कैलाश पर्वत की ही बात याद है, जिसे तूने बीसों बार कहा है। तुम्हारा वह भाव रूपी भुजाओं का बल तुम्हारे हृदय में ही छुपा हुआ है। इसलिए सहस्रबाहू रूपी हजारों भावोनों ने, त्याग रूपी बलि ने और बल रूपी बालि ने तुम्हें जीत लिया था। इन चौपाइयों में स्पष्ट कर दिया है कि एक बार इन्द्रियों को वश में कर लेने से और कैवल्य की अवस्था में दृढ़ता आ जाने से ही काम रूपी रावण अजेय नहीं हो जाता है।
सुनु मति मंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा।।
इन्द्र जालि कहुँ कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा।।
व्याख्या : अरे मतिमंद काम रूपी रावण! सुन, अब बस कर। ध्यान की ऐसी अवस्था में बुद्धि का भाव और दृढ़ हो जाता है और वह काम रूपी रावण को चेतावनी देने लगता है। इसलिए कहता है कि सिर काटने से क्या कोई शूरवीर हो जाता है? अर्थात् इन्द्रियों का दमन करने से क्या कोई शूरता आ जाती है? इन्द्र जाल रचने वाले को कोई वीर नहीं कहता अर्थात् इन्द्रियों के भावों में रमण करने वाला वीर नहीं हो सकता है। यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट लेता है अर्थात् इन्द्रिय भावों में रमण करने वाला भाव स्वयं ही इन्द्रियों के भावों द्वारा अपने आपको काट लेता है अर्थात् फँसा लेता है।
दो0 जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।
ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।29।।
व्याख्या : अरे मतिमंद काम रूपी रावण! तू समझ। पतंगें मोह के वश में आग में जलकर मर जाते हैं और अज्ञान रूपी गधे बन्धन रूपी भार को ढोते रहते हैं। परन्तु इससे वे शूरवीर नहीं कहलाते हैं।
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।।
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ।।
व्याख्या : अरे मूर्ख काम रूपी रावण! तू व्यर्थ में बात को मत बढ़ा और मेरे वचनों को अभिमान का त्याग करके सुन। अरे दस इन्द्रियों रूपी मुखों वाले! मैं दूत बनकर नहीं आया हूँ। मुझे तो आत्मा रूपी राम ने ऐसा विचार करके भेजा है कि ।
बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला।।
मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे।।
व्याख्या : बार-बार आत्मा रूपी राम ने कहा है कि सिंह द्वारा स्यार का वध करने पर यश नहीं मिलता है अर्थात् आत्मा द्वारा काम का दमन करने से यश नहीं मिलता है। मन में आत्मा रूपी प्रभु की बात को समझकरके ही हे मूर्ख काम रूपी रावण! मैंने तेरे कठोर अग्यता रूपी वचन सुने हैं।
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा।।
जानेउ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी।।
व्याख्या : नहीं तो मैं तेरे इन्द्रियों रूपी मुखों को तोड़कर जबरदस्ती सुरता रूपी सीता को ले जाता। अरे दैव भावों के शत्रु! तेरा बल तो मैं जानता हूँ कि तूने सूने में परायी स्त्री का हरण किया है। अर्थात् छद्मता से सुरता का हरण किया है।
तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता।।
जौं न राम अपमानहिं डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ।।
व्याख्या : तूझे तो आसुरी भावों का स्वामी होने का बहुत गर्व है और मैं दृढ़ बुद्धि का भाव तो आत्मा का प्रेरणा रूपी दूत हूँ। इसलिए मैं तो आत्मा का अपमान होने से डरता हूँ, वरना तुझे देखकर तो ऐसा खेल खेलता कि --।
दो0 तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ।
तव जुबतिन्ह समेत सठ जनक सुतहि लै जाउँ।।30।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण तुझे पटक कर अर्थात् वश में करके और तेरे वासना रूपी गांव (इन्द्रियों के पुर) को चौपट करके आसुरी इच्छा रूपी युवतियों सहित सुरता रूपी सीता को ले जाता। अर्थात् अंगद भाव कहना चाहता है कि काम का दमन करके सुरता को ले जाया जा सकता है परन्तु दमन करने से आत्मा की सहज अवस्था में विकार पैदा हो सकते हैं। इसलिए दृढ़ बुद्धि का भाव जोर करके काम का दमन नहीं करना चाहता।
जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।।
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।।
व्याख्या : अगर जोर करके काम भाव का दमन करूँ, तो इसमें कोई बड़ाई की बात नहीं है। मरे हुए को मारने में कुछ भी बहादुरी नहीं होती है। वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यंत मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा।
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी।।
तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी।।
व्याख्या : जो सदा रोग ग्रस्त हो, निरंतर क्रोध करने वाला हो, जो विष्णु से विमुख अर्थात् प्रकृति के अणु-अणु के विरोधी हो, सुरता के प्रतिकूल हो और संत जनों का विरोधी हो, जो शरीर का पोषण करने वाला अर्थात् देह बुद्धि में रमण करने वाला हो और दूसरों की निंदा करने वाला तथा चिंता रूपी पाप की खान हो, ऐसे ये चौदह प्रकार के प्राणी जीवित भी मरे समान ही होते हैं।
अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही।।
सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा।।
व्याख्या : ऐसा विचार करके हे काम रूपी मूर्ख रावण! मैं दृढ़ बुद्धि का भाव तुझे नहीं मार रहा हूँ। इसलिए अब तू मुझे क्रोध मत दिला। दृढ़ बुद्धि के भाव की बातें सुनकर क्रोधित होकर काम रूपी रावण इन्द्रियों को दबाता हुआ बोला। अर्थात् दृढ़ बुद्धि के वचन सुनकर काम का भाव क्षुब्ध हो उठा। काम के क्षुब्ध हो जाने पर इन्द्रियाँ असहाय सी हो जाती हैं। अत: उसी अवस्था को समझाने के लिए ""दसि मीजत हाथा"" बोलकर लिखा है।
रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी।।
कटु जल्पसि जड़कपि बल जाकें। बल प्रताप बुद्धि तेज न ताकें।।
व्याख्या : अरे दृढ़ बुद्धि रूपी अधम वानर! अब तू मरना चाहता है, इसलिए छोटे मुख से बड़ी-बड़ी बातें करता है। अरे मूर्ख बुद्धि रूपी वानर! तू जिस आत्मा रूपी राम के बल पर इतना बक-बक कर रहा है, उसमें तो प्रताप, बुद्धि व बल का तेज ही नहीं होता है क्योंकि वह तो निर्लिप्त होती है। अत: काम रूपी रावण दृढ़ बुद्धि के भाव को बताना चाहता है कि आत्मा की तो कोई बुद्धि व तेज नहीं होता है।
दो0 अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।
सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।।
व्याख्या : इस दोहे में बहुत गहरा रहस्य़ छुपा हुआ है। वास्तव में काम का भाव उसी को दृढ़ बुद्धि के भाव को बताता है कि आत्मा तो गुणों से रहित व मान रहित होती है, इसलिए तो चित रूपी पिता ने आत्मा रूपी पुत्र को वैराग्य रूपी वनवास दे दिया है। इसलिए अब तो आत्मा रूपी राम सुरता के विरह में दु:खी हैं और फिर मुझ काम का भय भी सता रहा है।
दो0 जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।
खाहिं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।
व्याख्या : जिनके बल का तुझे गर्व है, ऐसे तो मन के सूक्ष्म भाव (मन अ अनुज उ मनुज अर्थात् मन के छोटे भाव) तो बहुत होते हैं। जिन्हें आसुरी भाव रात-दिन खाते रहते हैं। अत: हे मूर्ख बुद्धि रूपी अंगद! अब तो तू जिद्द छोड़कर समझने का प्रयास कर।
जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।।
हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।।
व्याख्या : जैसे ही काम रूपी रावण ने आत्मा रूपी राम की निंदा की वैसे ही दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद क्रोधित हो उठा। क्योंकि हरि माया का हरण करने वाले व माया के हरण की अवस्था हर की निंदा सुनने पर गोघात अर्थात् गो अ घात यानी इन्द्रियाँ दूषित हो जाती हैं। वास्तव में यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि काम की बात को मान लेने पर इन्द्रियाँ वासनाओं में फँस जाती हैं। परन्तु इन्द्रियों को वासना से बचाना है तो माया के हरण व माया को हरने वाली अवस्था का श्रद्धापूर्वक अनुसरण करना चाहिये।
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी।।
डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारूत ग्रसे।।
व्याख्या : काम रूपी रावण की बातें सुनकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव उत्तेजित हो उठा और उस अवस्था में कटकटा कर दोनों दृढ़ता रूपी भुजाएँ शरीर रूपी भूमि पर दे मारी। जिससे शरीर रूपी पृथ्वी हिल गयी और आसुरी भावों रूपी सभासद गिर पड़े और भय रूपी पवन से ग्रस्त होकर भागने लगे। वास्तव में ध्यान की अवस्था में जब काम के भाव के साथ दृढ़ बुद्धि के भाव का वार्तालाप होता है, तो शरीर में कम्प (झटका) लगने लग जाता है। उसी को पृथ्वी का डगमगाना बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में आसुरी भाव प्राण की गति से ग्रस्त होकर भय के वश में होकर भागने लगते हैं।
गिरत सँभारि उठा दस कंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।।
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।।
व्याख्या : उस अवस्था में काम का भाव भी गिर जाता है, परन्तु वह अपने आपको संभालता हुआ पुन: उठ जाता है, परन्तु पृथ्वी पर उसके सुन्दर मुकुट गिर जाते हैं। अर्थात् दृढ़ बुद्धि के साथ द्वन्द्व होने से काम की कुछ वृतियाँ बदल जाती हैं। उसी को कुछ मुकुटों का गिरना बोलकर लिखा है। परन्तु काम का भाव पुन: काम वृतियों को जागृत करने का प्रयास करता है और कुछ काम की वृतियाँ दृढ़ बुद्धि के प्रभाव में आ जाती हैं और वे वृतियाँ आत्मोन्मुखी हो जाती हैं। उसी अनुभूति को अंगद द्वारा कुछ मुकुटों को आत्मा रूपी राम के पास भेज देना या फेंक देना बोलकर लिखा है।
आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे।।
की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।।
व्याख्या : वृति रूपी मुकुटों को आता हुआ देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर दौड़ पड़े क्योंकि काम की वृति रूपी मुकुट ऐसे लग रहे थे, जैसे दिन में ही उल्का पिण्ड गिर रहे हों। उस समय बुद्धि के भाव रूपी वानरों को ऐसा लग रहा था कि क्या काम रूपी रावण ने कठोर वृतियों रूपी वज्र का प्रहार किया है, जो हम पर वार करने के लिए आ रहे हैं।
कह प्रभु हँसि जनि हृदय डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू।।
ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम हँसकर बोले कि डरो मत। ये न उल्का है, न वज्र है और न ही केतु व राहू ही है। ये तो काम रूपी रावण के वृति रूपी मुकुट हैं, जो दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद की प्रेरणा से चले आ रहे हैं।
दो0 तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की बात सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने उछल कर काम की वृति रूपी मुकुटों को पकड़ लिया और आत्मा रूपी राम के पास लाकर रख दिया। तब बुद्धि के रीछ व वानर रूपी भाव उत्सुकतापूर्वक खेल देखने लगे अर्थात् काम की वृतियों को समझने लगे। जिनका प्रकाश सूर्य के प्रकाश के समान था।
दो0 उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।
धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ।।32(ख)।।
व्याख्या : जब दृढ़ बुद्धि के प्रभाव से काम की वृतियाँ आत्मोन्मुखी होने लग जाती हैं, तो काम रूपी रावण क्रोधित हो उठता है और कहता है कि इस दृढ़ बुद्धि रूपी वानर को पकड़ो अर्थात् वश में कर लो, तो यह सुनकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद मुस्कराने लगता है।
एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।।
मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि सभी आसुरी योद्धाओं तुम इस प्रकार अर्थात् वश में करके सभी बुद्धि रूपी रीछ व वानरों को जहाँ-जहाँ अर्थात् जिस कोश में भी मिलें, खा जाइए। इस प्रकार इस शरीर रूपी भूमि को बुद्धि के भावों से रहित कर दीजिए और आत्मा व लखन रूपी दोनों भाव रूपी भाइयों को जीवित ही वश में कर लो।
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा।।
मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती।।
व्याख्या : फिर दृढ़ बुद्धि रूपी यौवन भरा भाव बोला कि हे काम रूपी रावण! तुझे गाल बजाते हुए लज्जा नहीं आती है। तू गला काटकर आत्महत्या कर ले। अरे आसुरी कुल का कुलघाती। तुझे मेरा बल देखकर भी लाज नहीं आती। दृढ़ बुद्धि का भाव काम भाव को समझाने का प्रयास करता है कि मुझ दृढ़ बुद्धि की दृढ़ता देखकर तुझे लाज क्यों नहीं आती।
रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी।।
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा।।
व्याख्या : अरे सत, रज व तम तीन गुणों को चोर कर वश में करने वाले कुमार्गगामी। तू मूर्ख, मल की राशि अर्थात् विकारों से युक्त, मन्द बुद्धि व कामी है। तू तीनों गुणों से उत्पन्न विकारों से युक्त (सन्निपात) होने के कारण ही ऐसे वासनायुक्त वचन बोल रहा है। अरे मूर्ख काम! अब तू काल के वश में होकर मन की सीमा को भी लाँघ रहा है।
याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें।।
रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।।
व्याख्या : अरे काम रूपी रावण! तू तेरे दम्भ का फल आगे पायेगा, जब बुद्धि रूपी भालू व वानरों की चपेट में आयेगा। अरे आत्मा रूपी राम मन का सूक्ष्म स्वरूप है, ऐसा बोलते ही तेरी जीभ नहीं गल जाती। अर्थात् आत्मा कोई मन का भाव नहीं होती है बल्कि आत्मा तो सत्ता है।
गिरिहहि रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं।।
व्याख्या : जब शरीर रूपी पृथ्वी पर भावों का युद्ध होगा, तब तेरी जीभ जरूर इन्द्रियों रूपी सिरों के साथ गिरेगी। इस चौपाई में स्पष्ट कर दिया है कि जब काम का आत्मा व बुद्धि के भावों के साथ युद्ध होगा, तो इन्द्रियों सहित वाणी भी मौन हो जायेगी।
सो0 सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।
बीसहुँ लोचन अंध दिग तव जन्म कुजाति जड़।।33(क)।।
व्याख्या : साधना में यथार्थ में क्या होता है कि साधक को कभी आत्मा भाव के रूप में लगती है, तो कभी नर की धड़कन के रूप में समझ आने लगती है, तो कभी आत्मा सर्वव्यापक तत्व के रूप में आभासित होती है। कभी आत्मा प्राण के रूप में लगती है। इसलिए दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव काम से कहता है कि अरे मूर्ख काम! तू आत्मा को केवल नर (धड़कन) मत मान क्योंकि जिस आत्मा ने एक ही प्रेरणा रूपी बाण से बल रूपी बालि को मार दिया, वह कैसे केवल धड़कन (नर) हो सकती है। अरे कुमार्गी! तू तो दस इन्द्रियों रूपी सिरों पर सत-असत रूपी बीस आँखों वाला अंधा है। अत: तेरा जन्म ही धिक्कारने योग्य है।
सो0 तव सोनित कीं प्यास तृषित राम सायक निकर।
तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।33(ख)।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के प्रेरणा रूपी बाण तेरे रक्त के प्यासे हैं, इसलिए मैं तुझे उसी प्यास को बुझाने के लिए छोड़ रहा हूँ। अरे अधम काम रूपी रावण! तू फालतू बकवास करता है।
मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।।
असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद कहता है कि मैं तो तेरे दस इन्द्रियों रूपी सिरों को तोड़ने के लायक (सक्षम) हूँ अर्थात् दृढ़ बुद्धि का भाव आसुरी भाव रूपी दाँतों को तोड़ने में सक्षम होता है परन्तु दृढ़ बुद्धि का भाव बिना आत्मा की प्रेरणा के कुछ नहीं करता है। इसलिए यहाँ लिखा गया है कि आत्मा रूपी राम की आज्ञा नहीं है। ज्यादा क्रोध आने पर मैं (दृढ़ बुद्धि) तेरे दस सिरों अर्थात् दस इन्द्रियों का दमन कर सकता हूँ और वासना रूपी लंका को समता के भाव रूपी समुद्र में डूबो सकता हूँ।
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।।
मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।।
व्याख्या : तुम्हारी वासना रूपी लंका तो गूलर के फल के समान है, जिसमें तुम आसुरी भाव रूपी जन्तु बसते हो। मैं तो बुद्धि रूपी वानर हूँ, इसलिए वासना रूपी फल को खाने में देर नहीं लगाऊँ, परन्तु आत्मा रूपी राम की अभी मुझे प्रेरणा नहीं हुई है।
जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।।
बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद की युक्ति सुनकर काम रूपी रावण मुस्कराया और कहा कि अरे मूर्ख! तूने ऐसी झूठ बोलना कहाँ सीखा है? बल रूपी बालि तो कभी ऐसी बातें नहीं बोलता था परन्तु तुम आत्मा व लखन भावों के सम्पर्क में आने के कारण इतना बोलने लगा है। इन चौपाइयों से स्पष्ट हो जाता है कि साधना में काम के भाव को भी दृढ़ बुद्धि का प्रभाव समझ में आने लग जाता है।
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।।
समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।।
व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद बोला कि अरे बीस भावों रूपी भुजाओं वाले! सचमुच में मैं लबार हूँ अगर मैंने तेरी दस इन्द्रियों रूपी दस जीभों को नहीं उखाड़ा। तब आत्मा के प्रताप को याद करके दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव और दृढ़ हो उठा और प्राण रूपी पद को आसुरी भावों के बीच में स्थिर कर दिया। उसी को ""पन करि पद रोपा"" बोलकर लिखा है।
जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।। सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि का भाव बोला कि हे मूर्ख काम रूपी रावण! अगर कोई भी आसुरी भाव मेरे प्राण रूपी पद को हिला देगा अर्थात् मेरी दृढ़ता को हटा देगा, तो आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता को छोड़कर वापिस लौट जायेंगे। इस चौपाई में बहुत गहरा रहस्य है क्योंकि जब आसुरी भाव दृढ़ बुद्धि के भाव को हिला देंगे, तो स्वत: ही आत्मा सुरता से नहीं मिल सकेगी। इसलिए दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ऐसा प्रण अर्थात् प्राण में स्थिरता लाता है। तब काम रूपी रावण आसुरी भावों से बोला कि हे सुभटों अर्थात् योद्धाओं! तुम दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का पाँव पकड़ो और शरीर रूपी पृथ्वी पर गिरा दो अर्थात् दृढ़ बुद्धि को वश में करके देह बुद्धि से युक्त कर दो।
इन्द्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।।
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सि डिग्री नाई।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में चित रूपी इन्द्र को जीतने वाले अहंकार रूपी मेघनाद आदि आसुरी योद्धा इधर-उधर से उठे और नाना प्रकार से दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव पर झपटे परन्तु बुद्धि की दृढ़ता को टस से मस नहीं कर सके। अर्थात् आसुरी भावों का दृढ़ बुद्धि पर कोई असर नहीं हुआ।
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।।
पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।।
व्याख्या : पुन:-पुन: आसुरी भाव दृढ़ बुद्धि के भाव पर झपटने का प्रयास करते हैं, परन्तु बुद्धि की दृढ़ता एकदम नहीं हिलती है। जैसे हृदय में कपट रखने वाला कुयोगी कभी भी अपने हृदय में से मोह रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ पाता है, वैसे ही आसुरी भाव दृढ़ बुद्धि के भाव को नहीं हिला पाते हैं।
दो0 कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।
झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।।34(क)।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद जैसे स्तर (कोटि) के अनेकों आसुरी भाव हर्षपूर्वक दृढ़ बुद्धि को वश में करने को उठे, परन्तु कोई भी बुद्धि की दृढ़ता को नहीं हिला सके, तो सब आसुरी भाव शर्म के मारे सिर झुकाकर बैठ गए।
दो0 भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग।।34(ख)।।
व्याख्या : जब आसुरी भावों ने देखा कि बुद्धि की दृढ़ता नहीं हिल पा रही है, तो सभी आसुरी भावों का मद भाग गया अर्थात् मद को आघात लगा। जैसे नाना प्रकार के विघ्न-बाधा आने पर भी संत का मन नीति का त्याग नहीं करता है।
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।
गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद की दृढ़ता के आगे जब सब आसुरी भाव हार गए, तो दृढ़ बुद्धि रूपी वानर के ललकारने पर काम का भाव स्वयं उठा। जब काम रूपी रावण दृढ़ बुद्धि के सामने झुकने लगा अर्थात् पैर पकड़ने लगा तो दृढ़ बुद्धि का भाव हिल गया अर्थात् काम का प्रभाव पड़ता देख बोला कि अरे काम रूपी रावण! मेरे सामने झुकने से कुछ नहीं होगा अर्थात् मेरी यानी दृढ़ बुद्धि की शरण में आने से कुछ नहीं होगा।
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।।
भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।।
व्याख्या : अरे मूर्ख काम रूपी रावण! तू जाकर आत्मा रूपी राम के चरण क्यों नहीं पकड़ता अर्थात् क्यों नहीं तू आत्मोन्मुखी हो जाता? ऐसा सुनकर लज्जित होकर काम रूपी रावण सकुचाता हुआ वापिस अपने आसन पर लौट गया अर्थात् सजह काम की अवस्था आ गयी। उस अवस्था में काम की वासनाओं का तेज मिट जाता है और काम इच्छाएँ भी शांत हो जाती है। उसे ही ""श्री सब गई"" बोलकर लिखा है। तब अचानक ऐसा आभास होता है, जैसे घोर वासनाओं की तप्त शीतल हो गयी हो। उसी को मध्य दिवस में चन्द्रमा का आ जाना बताया गया है।
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।।
जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।।
व्याख्या : काम का भाव आकर सिंहासन पर बैठ गया। मानो समस्त सम्पत्ति को खो दिया हो। वास्तव में जब दृढ़ बुद्धि के भाव के साथ काम के भाव का द्वन्द्व चलता है, तो काम के भाव को क्षणिक वैराग्य आ जाता है। काम के भाव के लिए वैराग्य ही निराशा या हताशा होता है। अत: उसी भाव अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। वास्तव में जगत की आत्मा के प्रतिकूल होने वाला भाव कैसे शांति को प्राप्त कर सकता है?
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।।
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आत्मा की भृकुटि की गति से ही जगत का आभास व जगत का नाश होता है। आत्मा की शक्ति तिनको को बज्र और बज्र को तिनका कर सकती है। अत: उस आत्मा रूपी राम का दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद दूत कैसे अपना प्रण छोड़ सकता है।
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।।
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।।
व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी वानर ने नाना प्रकार की नीति बताकर काम के भाव को समझाना चाहा परन्तु काल की निकटता आ जाने के कारण माना नहीं। दृढ़ बुद्धि के भाव ने काम रूपी शत्रु के मद का मर्दन किया और आत्मा रूपी राम के सुयश का गुणगान करते हुए बल रूपी बालि से उत्पन्न दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव चल दिया।
हतौं न खेत खेलाई खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।।
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! तुझे भावों के द्वन्द्व युद्ध में खेला खेलाकर नहीं मारूँ, तब तक अभी से बड़ाई क्या करूँ? दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने आसुरी भावों की सभा में आने से पहले ही काम के मोह रूपी पुत्र को मार दिया था। अत: यह समाचार सुनकर काम रूपी रावण बहुत दु:खी हुआ।
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।
व्याख्या : सभी आसुरी भाव दृढ़ बुद्धि के प्रण को देखकर अर्थात् दृढ़ बुद्धि की स्थिरता को देखकर भयभीत हो गए।
दो0 रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।
पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज।।35(क)।।
व्याख्या : काम रूपी शत्रु के बल का मर्दन करके हर्षित होते हुए आत्मा रूपी राम के, बल रूपी बालि के पुत्र अंगद ने चरण पकड़ लिए। वास्तव में जब भावों के द्वन्द्व में दृढ़ बुद्धि का भाव काम को प्रभावित कर देता है, तो आत्मा के प्रति समर्पण व प्रेम बढ़ जाता है। उसी भाव अवस्था को लिखते हुए कहा गया है कि अंगद रूपी भाव का शरीर पुलकित था तथा आँखों में प्रेम का जल भर आया था और पूर्ण समर्पण की अवस्था आ गयी अर्थात् चरण पकड़ लिए।
दो0 साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।
मंदोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ।।35(ख)।।
व्याख्या : संध्या होने पर अर्थात् तीव्र वैराग्य और काम के बीच की संधि अवस्था आने पर काम का भाव व्याकुल होता हुआ घर को लौट जाता है अर्थात् आसुरी भावों के भाव रूपी भवन में लौट आता है। तब मन के अंदर वाली आसुरी बुद्धि रूपी मंदोदरी काम रूपी रावण को नाना प्रकार से समझाने लगती है।
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।।
रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।।
व्याख्या : हे काम रूपी स्वामी! तुम कुबुद्धि अर्थात् वासना की बुद्धि का त्याग करके समझो। क्योंकि तुम और आत्मा रूपी राम के बीच संघर्ष उचित नहीं है। जब आत्मा रूपी राम के छोटे भाई लखन भाव अर्थात् लक्षणों को लखने वाले भाव की क्षमता को तुम पार नहीं कर सके। ये तुम्हारा कैसा पुरुषार्थ है? अर्थात् तुम लखन भाव की लखने की शक्ति से बच नहीं पाए तो तुम्हारा क्या पुरुषार्थ है? वास्तव में आसुरी भाव तब तक ही बलशाली रहता है, जब तक उसके लक्षण पहचानने में नहीं आते हैं परन्तु लखन अर्थात् लक्षण जानने में आते ही वह शिथिल हो जाता है। इसलिए राम के छोटे भाई द्वारा खींची गई रेखा को काम रूपी रावण लाँघ नहीं पाता है।
प्रिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।।
कौतुक सिंधु नाघि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।।
व्याख्या : हे प्रिय! क्या तुम उस आत्मा रूपी राम को युद्ध में जीत पावोगे? जिसके प्रेरणा रूपी दूत के ऐसे काम हैं। वह खेल ही खेल में भाव रूपी समुद्र को लाँघ कर तुम्हारी वासना रूपी लंका में वासनाओं का हरण करने (के अ हरी अर्थात् वासनाओं का हरण) के लिए निशंक होकर आ गया।
रखवारे हते बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।।
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्व तुम्हारा।।
व्याख्या : जिस बुद्धि रूपी वानर ने वासना भोग रूपी बाग को उजाड़ दिया और आसुरी भावों रूपी रखवालों को मार दिया तथा काम के अक्षय भाव को भी तुम्हारे सामने ही मार दिया। उसने समस्त वासना रूपी लंका को जलाकर राख कर दिया। उस समय तुम्हारा बल का गर्व कहाँ गया था?
अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहुँ।।
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु।।
व्याख्या : हे स्वामी! अब आप व्यर्थ में शेखी मत मारिये और मेरी कही हुई बात का हृदय में विचार कीजिए। हे स्वामी! आत्मा रूपी राम को केवल नर की धड़कन मत मानिए। वे तो चराचर जगत के नाथ और अतुल्य बलवाले हैं। इस चौपाई में आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट किया गया है कि आत्म तत्व केवल नर की धड़कन मात्र नहीं होता है। बल्कि आत्मा में ही समस्त जगत समाहित होता है।
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।।
जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।।
व्याख्या : आत्मा की प्रेरणा रूपी बाण का प्रताप मारीच रूपी आसुरी भाव जानता था परन्तु आपने तो उसका कहना भी नहीं माना। प्राण रूपी जनक की सभा में असंख्य भाव रूपी राजा थे और तुम भी अतुल बलवाले वहाँ पर थे।
भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।।
सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।।
व्याख्या : उस प्राण रूपी जनक की भाव रूपी सभा में अज्ञानता रूपी धनुष को तोड़कर सुरता रूपी सीता का जिस आत्मा ने वरण किया था, तब क्यों नहीं भावों के युद्ध में उसे जीता था। चित रूपी इन्द्र के मोह रूपी पुत्र ने आत्मा के बल को कम करके आँका था, जिसके कारण वह जीवित तो बचा लिया परन्तु आँख फोड़ दी गयी।
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिसेषी।।
व्याख्या : सूर्पणखा रूपी आसुरी इच्छा की गति को तो तुमने देखा ही है, फिर भी तुम्हारे हृदय में कोई लज्जा भाव नहीं है।
दो0 बधि बिराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध।
बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध।।36।।
व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम ने विरोध भाव रूपी विराध को, अज्ञान रूपी खर को, दोषण रूपी दूषन को व वासना के बंधन रूपी कबंध को मार दिया और एक ही प्रेरणा रूपी बाण से बल रूपी बालि को मार दिया। हे दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाले! ऐसे आत्मा रूपी राम के मर्म को जानो।
जेहि जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।।
कारूनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू।।
व्याख्या : जिन्होंने बातों ही बातों में भावों के भवसागर को बँधा दिया अर्थात् भावों को वश में कर लिया और बुद्धि के भावों के दल के साथ सुबेला अर्थात् सु अवस्था में पहुँच गए हैं। भाव रूपी भव सागर को यहाँ जलनाथ का प्रतीक दिया गया है। जिसका गम्भीर रहस्य है। वास्तव में भावों से ही रस पैदा होता है इसलिए भावों के भवसागर को रस (जल) का स्वामी बताया गया है। भावों से रस निकलता है और फिर इससे भाव पैदा होने लगते हैं। इस प्रकार भावों का भवसागर बन जाता है। उन्हीं करूणामय ज्ञान के प्रकाश स्वरूप आत्मा रूपी राम ने तुम्हारे हित के लिए ही बुद्धि की प्रेरणा रूपी दूत को भेजा है।
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरुथ महुँ मृगपति जथा।।
अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके।।
व्याख्या : आसुरी भावों की सभा के बीच में ही उस प्रेरणा रूपी दूत ने तुम्हारे बल को वैसे ही मथ डाला जैसे हाथियों के झुण्ड में आकर सिंह झुण्ड को छिन्न-भिन्न कर डालता है। जिस आत्मा रूपी राम के दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद और अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान अनुसरण कर्ता हैं और जो युद्ध में महायोद्धा हैं।
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू।।
अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा।।
व्याख्या : हे स्वामी! आप उनको बार-बार नर (धड़कन) कहते हैं। आप व्यर्थ में ही मान, ममता और मद का बोझा ढो रहे हैं। हे प्रियतम! आप आत्मा के प्रतिकूल हो गए और काल के वश में होने के कारण आपको समझ में नहीं आ रहा है।
काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा।।
निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं।।
व्याख्या : काल के दंड ने किसे पकड़कर नहीं मारा? काल धारणा के बल व बुद्धि के विचार को हर लेता है। हे स्वामी! जिसके निकट काल आता है, उसकी बुद्धि तुम्हारी तरह ही भ्रमित हो जाती है।
दो0 दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।
व्याख्या : दोनों मोह रूपी पुत्र मर गए और वासना रूपी नगर जल गया। हे प्रियतम! अब तो पूर्ति कर दीजिए अर्थात् अब तो संतुष्ट होकर आत्मा रूपी राम का भजन करके निर्मल यश को प्राप्त कर लीजिए। इस दोहे में स्पष्ट बताया गया है कि जब मोह रूपी पुत्र मर गए और वासना रूपी नगर जल गया तो, अब तो पूर्ण काम की अवस्था में आ जाओ अर्थात् संतोष को धारण करके परमात्मा का भजन करना चाहिये।
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।।
बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली।।
व्याख्या : मंदोदरी रूपी आसुरी बुद्धि के बाणों के समान वचनों को सुनकर प्रात:काल होते ही अर्थात् पुन: नव स्फूर्ति में भर कर काम रूपी रावण आसुरी भावों की सभा में गया। वह आसुरी भावों की सभा में ऐंठता हुआ सिंहासन पर बैठा और अभिमान से भर गया तथा सब भय को भूल गया। वास्तव में काम के भाव में जब स्फूर्ति आ जाती है, तो वह पिछली विरक्ति को भूल जाता है और नव आसुरी भावों में फूला नहीं समाता है।
इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सि डिग्री नावा।।
अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी।।
व्याख्या : इधर को आत्मा रूपी राम ने बुद्धि के अंगदादि भावों को बुलाया तो सब बुद्धि के भाव समर्पण (सिर नवाकर) के साथ आए। सभी को आत्मा रूपी राम ने अपने निकट बैठाया और अज्ञान के शत्रु आत्मा रूपी राम हँस कर बोले।
बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही।।
रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका।।
व्याख्या : हे बल से उत्पन्न दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद! मुझे बहुत कौतुहल हो रहा है। हे तात! तुम सत्य बताओ। काम रूपी रावण आसुरी भावों का तिलक है। जिसकी भाव रूपी भुजाओं का बल जगत भर में प्रसिद्ध है।
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए।।
सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी।।
व्याख्या : तुमने उसके चार मुकुटों को फेंका था अर्थात् चार आसुरी वृतियों को आत्मोन्मुखी कर दिया था, वो कैसे सम्भव हुआ? हे सर्वज्ञ, प्राण के रूप में सर्वत्र व्यापक, सुख देने वाले प्रभु! वे वृति नहीं भावों के चार गुण होते हैं।
साम दान अ डिग्री दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।।
नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए।।
व्याख्या : हे नाथ! साम, दान, दण्ड और विभेद के भाव नर की धड़कन में निवास करते हैं। ऐसा अनुभवी लोग कहते हैं। नीति ही धारणा के चरण होते हैं, अत: ऐसा जानकर ये चारों भाव आपके पास आ गए हैं अर्थात् नर की धड़कन की ये वृतियाँ अब आत्मोन्मुखी हो गयी हैं।
दो0 धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।
तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस।।38(क)।।
व्याख्या : हे प्रभु! काम रूपी रावण धारणा हीन है अर्थात् काम के भाव की कोई निश्चित धारणा नहीं होती है। इसलिए वह काल के वश में होकर अर्थात् समय के वश में होकर आत्मा के प्रतिकूल कार्य करता रहता है। इसलिए ये साम, दान, दण्ड व विभेद की नीतियाँ धारणा के अभाव में काम रूपी रावण को छोड़कर आपके पास आए हैं।
दो0 परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।
समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालि कुमार।।38(ख)।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद की चतुराई पूर्ण बातें सुनकर आत्मा रूपी राम हँसे अर्थात् दृढ़ बुद्धि के कौशल को जानकर आत्म तत्व प्रसन्न हो गया। तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने वासना रूपी नगर अर्थात् वासना के कोश की सब बातें विस्तारपूर्वक बतायी।
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।।
लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा।।
व्याख्या : जब काम रूपी शत्रु के बारे में सब जानकारी मिल गयी तो आत्मा रूपी राम ने सब मंत्रणा के भावों को निकट बुलाया और कहा कि वासना रूपी लंका के चार मजबूत द्वार हैं अर्थात् वासना कोश चार मजबूत वृतियों (अहंकार, मोह, लोभ व मत्सर) से घिरा हुआ है। अत: विचार करके बताइये कैसे पार हुआ जाए।
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन।।
करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा।।
व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव, धीर बुद्धि रूपी जामवंत व वैराग्य भाव रूपी विभीषण ने हृदय में आत्मा रूपी सूर्य का स्मरण करके अर्थात् पूरी तरह आत्मोन्मुखी होकर दृढ़ मंत्रणा की और बुद्धि रूपी वानरों की चार सेनाएँ बनायी। अर्थात् आसुरी वृतियों के अनुसार बुद्धि के भावों को चार सेनाओं में बाँट लिया। पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि यह भावों का द्वन्द्व ध्यान की अति सूक्ष्म अवस्था में स्पष्ट रूप से समझ आ पाता है।
जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे।।
प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए।।
व्याख्या : और आसुरी वृतियों के अनुसार यथा योग्य बुद्धि के भावों के सेनापति कर दिए और समस्त बुद्धि के भावों को बुला लिया अर्थात् ध्यान में सब बुद्धि के भाव एक साथ प्रकट हो गए। तब आत्मा के प्रताप को सबको समझाकर बता दिया। जिसे सुनकर अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर बुद्धि के भाव रूपी वानर सिंहनाद करके दौड़े अर्थात् अति प्रबल हो उठे।
हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि शिखर बीर सब धावहिं।।
गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा।।
व्याख्या : सब बुद्धि के भाव हर्षित होकर आत्मा के प्रति समर्पण करने लगे। समर्पण करने को ही राम के चरण कमल पकड़ना बोलकर लिखा गया है। तब बुद्धि के भाव वासना रूपी पर्वतों के लालसा रूपी शिखरों को ले लेकर दौड़े। उस अवस्था में बुद्धि के भाव बहुत प्रबल हो उठते हैं। उसी को गर्जना-तर्जना करना कहा गया है। सब बुद्धि के भाव आत्मा रूपी राम की जय बोलने लगते हैं।
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका।।
घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहिं भेरी।।
व्याख्या : वासना रूपी लंका को परम सुदृढ़ किला जानते हुए भी अर्थात् वासनाओं को परम अजेय जानते हुए भी बुद्धि के भाव आत्म बल के प्रताप से निशंक होकर चले। बुद्धि के भावों ने चारों तरफ से घटाटोप करके वासना रूपी लंका को घेर लिया और मुख से डंके व भेरी बजाने लगे अर्थात् वाणी से ही डंके और भेरी बजाने लगे। ध्यान में समझ में आता है कि बुद्धि के भाव उपदेष्टा बनकर ही कई बार वासनाओं को परास्त कर देते हैं। उपदेष्टा की अवस्था को ही मुख से डंके व भेरी बजाना कहा गया है।
दो0 जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव।
गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव।।39।।
व्याख्या : अति उत्साही वेगवान बुद्धि के भाव रूपी वानर जोर-जोर से आत्मा रूपी राम की जय, लखन रूपी लक्ष्मण की जय, सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव की जय करने लगे।
लंका भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी।।
देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई।।
व्याख्या : उस अवस्था में वासना रूपी लंका में भयंकर हलचल मच गयी। जिसकी खबर काम रूपी रावण को मिली तो बोला कि बुद्धि के भाव रूपी वानरों की धृष्टता को देखो। ऐसा कहकर हँसा और आसुरी भावों की सेना को बुलाया।
आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे।।
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा।।
व्याख्या : तब आसुरी भाव काल की प्रेरणा से चले आए। तब काम रूपी रावण बोला कि मेरे आसुरी भाव भोग वासना के भूखे हैं। ऐसा कहकर काम रूपी रावण जोर से अट्टहास करके हँसा और बोला कि बिधि ने अर्थात् ध्यान की क्रिया ने घर बैठे ही मेरे आसुरी भावों को बुद्धि रूपी वानरों के रूप में भोजन दे दिया है। यहाँ बहुत गहरा मर्म छुपा हुआ है। वास्तव में आसुरी भाव भी बुद्धि के भावों का अहार करके ही जीवित रह पाते हैं। ध्यान के अभ्यास से आसुरी भावों को बुद्धि के भावों रूपी अहार मिलना बन्द हो जाता है। इसलिए ही तो काम रूपी रावण कहता है कि मेरे आसुरी भाव बहुत दिनों से भूखे हैं।
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू।।
उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण आसुरी भावों को प्रोत्साहित करता हुआ बोला कि हे आसुरी योद्धाओं! तुम चारों दिशाओं में जाओ और चारों वृतियों में प्रबल हो जाओ और बुद्धि के भावों को खा जाओ। विश्वास रूपी शंकर बोले अर्थात् विश्वास में दृढ़ता आ जाती है कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! काम रूपी रावण को ऐसा अभिमान होता है, जैसे टिटिहरी पक्षी पैर ऊपर की ओर करके सोता है, मानो आकाश को थाम लेगा।
चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी।।
तोमर मुद्गर परसु प्रचंडा। सूल कृपान परिघ गिरि खंडा।।
व्याख्या : तब आसुरी भाव काम रूपी रावण की प्रेरणा पाकर चले। वे आसुरी भाव हाथों में भिंडिपाल अर्थात् संग्रह के भाव को बढ़ाने वाले, साँगी अर्थात् संग आसक्ति भाव, तोमर अर्थात् ईर्ष्या भाव, मुद्गर अर्थात् चापलूसी भाव, प्रचण्ड फरसे अर्थात् प्रचण्ड भोग लालसा, शूल अर्थात् कष्ट भाव, कृपाण अर्थात् करके पाने का भाव, परिघ अर्थात् प्रकृति से घिरा हुआ भाव और अज्ञान रूपी पहाड़ों के टुकड़े ले लेकर चले।
जिमि अरुनोपल निकट निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी।।
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा।।
व्याख्या : जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी अर्थात् मूर्ख लालसाहारी भाव भोगों की पत्थर रूपी कल्पना को देखकर भी भोग लालसा के लालच में दौड़ पड़ते हैं और ज्ञान रूपी चोंच टूटने से भी नहीं डरते हैं, वैसे ही आसुरी भाव भोग लालसा में दौड़े। इन चौपाइयों में बहुत गहरा मर्म छुपा है। वास्तव में आसुरी भाव तो कल्पना के भोगों में भी ललचा जाते हैं। उस कल्पना भोग का परिणाम क्या होगा? इसका भी वे ख्याल नहीं करते हैं।
दो0 नानायुध सर चाप धर जातुधान बलबीर।
कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर।।40।।
व्याख्या : अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र व धनुष बाण धारण करके अनेकों स्तर के आसुरी भाव वासना रूपी लंका के कंगूरों पर चढ़ गए अर्थात् आसुरी भाव वासना की रक्षा के लिए नाना अस्त्रों-शस्त्रों सहित वासना की वृतियों पर आरूढ़ हो गए।
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मे डिग्री के सृंगनि जनु घन बैसे।।
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ।।
व्याख्या : वासना रूपी लंका की वृतियों पर आसुरी भाव कैसे शोभा पाते हैं, जैसे अज्ञान रूपी पर्वतों पर भ्रम रूपी बादल मँडरा रहे हों। उस अवस्था में भाव द्वन्द्व के ढोल, नगाड़े आदि बजने लगते हैं अर्थात् भावों में आपस में उत्साह बढ़ने लगता है। उससे भाव रूपी योद्धाओं के मन में उत्साह छा जाता है।
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा।।
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा।।
व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में अनहद नाद की नाना आवाजें आने लगती हैं। उसी को भेरी और नफीरी का बजना बताया गया है। अनहद नाद की आवाज से कायर भावों के हृदय फट जाते हैं। उन आसुरी भावों को तब ध्यान की अवस्था में बुद्धि रूपी विशाल योद्धा दिखायी पड़ने लगते हैं अर्थात् आसुरी भावों को अब बुद्धि की प्रबलता समझ में आने लगती है।
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा।।
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं।।
व्याख्या : आसुरी भावों ने देखा कि बुद्धि के भाव रूपी रीछ व वानर दौड़ते हैं तो ऊँची-नीची, विकट घाटियों को कुछ नहीं गिनते। अर्थात् छोटे-मोटे भोग लालसा के भावों को कुछ नहीं गिनते हैं। नाना स्तर के भाव रूपी योद्धा कटकटाते हैं और गर्जते हैं। दाँतों से ओंठ काटते और खूब डपटते हैं अर्थात् बुद्धि के भाव खूब संयम बरतते हैं और आसुरी भावों पर डपटते भी खूब हैं।
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई।।
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं।।
व्याख्या : एक तरफ को काम रूपी रावण की दोहाई और दूसरी तरफ आत्मा रूपी राम की दोहाई करते हैं। अब जय, जय की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी अर्थात् एक दूसरों को जय करने का भाव आते ही आसुरी भावों और बुद्धि के भावों में युद्ध छिड़ गया। तब आसुरी भाव ढेर के ढेर अज्ञान रूपी पर्वतों के लालसा रूपी शिखरों को फेंकते हैं, तो दूसरी तरफ से बुद्धि रूपी वानर उन लालसा रूपी भावों को पकड़ लेते हैं और निरालालसा करके पुन: आसुरी भावों पर फेंकते हैं।
छ0 धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं।।
अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।
कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए।।
व्याख्या : बुद्धि रूपी वानर और रीछ भाव कुधर अर्थात् बुरी वासनाओं को पकड़-पकड़ कर वासना रूपी लंका पर डालते हैं और आसुरी भावों के चरण पकड़ कर अर्थात् आसुरी भावों के मूल को पकड़ कर भाव भूमि पर पटकते हैं और भाग जाते हैं तथा ललकारने लगते हैं। बहुत से चंचल व उत्साही बुद्धि के भाव रूपी वानर और भालू फूर्ति के साथ लंका रूपी नगर पर चढ़ गए। बुद्धि के भाव वासना रूपी गढ़ पर चढ़कर आत्मा रूपी राम के गुणों का बखान करने लगते हैं।
दो0 एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।
ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ।।41।।
व्याख्या : वे बुद्धि रूपी रीछ-भालू आसुरी भावों को पकड़ कर दौड़ चले अर्थात् आसुरी भावों को वश में करके ऊपर आप (बुद्धि के भाव) और नीचे आसुरी भावों को लेकर गिर पड़ते हैं अर्थात् आसुरी भावों को वश में कर लेते हैं।
राम प्रताप प्रबल कपि जूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरुथा।।
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर।।
व्याख्या : आत्मा के बल के प्रताप से बुद्धि के भावों का समूह प्रबल हो उठा इसलिए आसुरी भावों के समूह का नाश करने लगे। फिर वासना रूपी लंका के किले पर बुद्धि के भाव रूपी वानर चढ़ गए और आत्मा के प्रताप व प्रकाश स्वरूप की जय-जय करने लगे।
चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई।।
हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी।।
व्याख्या : ऐसी अवस्था में बुद्धि के भावों की प्रबलता देखकर आसुरी भावों के झुण्ड वैसे ही भाग चले जैसे हवाओं के चलने से बादलों का समूह छिन्न-भिन्न हो जाता है। वासना रूपी लंका में हाहाकार मच गया और नये-नये आसुरी भाव व नारियाँ रोने लगी अर्थात् नये भाव व आसुरी नाड़ियों में विलाप होने लगा।
सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी।।
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना।।
व्याख्या : जब आसुरी भाव बुद्धि के भावों से व्याकुल हो उठते हैं, तो काम का भाव क्षुब्ध हो उठता है। उसी अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है कि सभी आसुरी भाव मिलकर काम रूपी रावण को गाली देने लगते हैं कि मूर्ख काम ने भोग भोगते हुए अपनी मृत्यु को बुला लिया है। जब आसुरी भावों को विचलित होता सुना तो सभी आसुरी भावों रूपी योद्धाओं को लौटाकर काम का भाव बोला।
जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना।।
सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना।।
व्याख्या : जो मैंने किसी भी आसुरी भाव को भावों के द्वन्द्व से भागते हुए सुना तो मैं विषय रूपी कृपान (वासना रूपी प्राण) से मार दूँगा। तुमने मेरे (काम) बल पर सब भोगों का भोग किया और अब भाव द्वन्द्व में प्राण प्रिय लग रहे हैं।
उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने।।
सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के उग्र वचन (उकसानी मूलक) सुनकर सभी आसुरी भाव भयभीत हो गए और लज्जित होकर सभी आसुरी भाव क्रोध करते हुए चले।
दो0 बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।
ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि।।42।।
व्याख्या : बहुत प्रकार के वृति रूपी हथियारों को लेकर आसुरी भाव ललकार-ललकार कर लड़ने लगे। उन आसुरी भावों ने परिघों अर्थात प्रकृति की आसुरी वृतियों और त्रिशूलों अर्थात् तीन गुणों रूपी आसुरी वृतियों को मार-मार कर बुद्धि के रीछ व वानर रूपी भावों को व्याकुल कर दिया।
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।
कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता।।
व्याख्या : आसुरी भावों से भयभीत होकर बुद्धि के भाव रूपी वानर भागने लगे। विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! हालांकि आगे चलकर इस भाव द्वन्द्व में बुद्धि के भावों की ही जीत होगी। वास्तव में ध्यान की अवस्था में भावों के द्वन्द्व को देखकर साधक को दृढ़ विश्वास हो जाता है कि बुद्धि की जीत होगी। जिससे श्रद्धा का भाव अटूट बना रहता है। उसी भाव अवस्था को समझाने के लिए विश्वास रूपी शंकर व श्रद्धा रूपी पार्वती के प्रतीकों का सहारा लिया गया है। उस भाव द्वन्द्व की अवस्था में बुद्धि के भाव दृढ़ बुद्धि व अनन्य बुद्धि का सहारा चाहने लगते हैं। इसलिए आपस में कहते हैं कि दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद कहाँ है? अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कहाँ है? नल, नील व द्विविद रूपी निसंग बुद्धि के भाव कहाँ हैं?
निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना।।
मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई।।
व्याख्या : जब अनन्य बुद्धि के भाव ने जब यह जाना कि बुद्धि के भावों की सेना व्याकुल हो रही है, तब वह वासना रूपी लंका के पश्चिम द्वार पर लड़ रहा था। पश्चिम द्वार क्रोध के भावों का प्रतीक होता है। क्रोध के भावों को अहंकार से बल मिलता रहता है। इसलिए पश्चिम द्वार पर अहंकार रूपी मेघनाद आसुरी भावों की तरफ से लड़ रहा था। इसलिए क्रोध रूपी दरवाजा अहंकार रूपी मेघनाद के कारण टूट नहीं पा रहा था।
पवन तनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा।।
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के मन में बहुत क्रोध पैदा हो गया और वह जोर से गर्जना करते हुए काल के समान गरजा और कूद कर वासना रूपी लंका के गढ़ पर चढ़ गया और अज्ञान रूपी पर्वत को लेकर अहंकार रूपी मेघनाद की तरफ दौड़ा।
भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता।।
दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि के भाव ने अहंकार रूपी मेघनाद के वृति रूपी रथ को तोड़ दिया और अहंकार रूपी मेघनाद की छाती में लात मारी अर्थात् अहंकार को आघात पहुँचाया। तब दूसरी वृति रूपी सारथी ने अहंकार रूपी मेघनाद को व्याकुल जाना तो राजसिक वृति रूपी रथ में बैठाकर तुरन्त घर ले आया। यहाँ पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि अहंकार के वृति रूपी अनेक रथ व सारथी होते हैं। जब अहंकार का भाव क्रोध के साथ होता है, तो तामसिक वृति रूपी रथ पर आरूढ़ होता है। इसलिए अनन्य बुद्धि के भाव ने जब अहंकार की तामसिक वृति का मर्दन कर दिया तो तुरन्त राजसिक वृति रूपी सारथी ने अहंकार रूपी मेघनाद को राजसिक रथ में बैठाकर घर वापिस ले आया।
दो0 अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।
रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल।।43।।
व्याख्या : जब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को पता चला अर्थात् आभासित हुआ कि अनन्य बुद्धि रूपी अकेला हनुमान ही वासना रूपी लंका में गया है, तो बल रूपी बालि से उत्पन्न दृढ़ बुद्धि का भाव दौड़कर खेल ही खेल में वासना रूपी गढ़ में चढ़ गया।
जुद्ध बिरूद्ध क्रुद्ध दौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।।
रावन भवन चढ़े दौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व में बुद्धि के भाव रूपी दोनों वानर (अनन्य बुद्धि व दृढ़ बुद्धि) क्रोधित हो गए और हृदय में आत्मा रूपी राम के प्रताप का स्मरण करके काम रूपी रावण के भवन (अर्थात् काम के भाव कोश) पर चढ़ गए। वे उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी के अधिष्ठाता आत्मा रूपी राम की दोहाई करने लगे। अर्थात् दृढ़ बुद्धि व अनन्य बुद्धि आत्मोन्मुखी होकर काम के भाव कोश में प्रवेश कर गए।
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा।।
नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती।।
व्याख्या : तब बुद्धि के दोनों भावों ने वासना रूपी इच्छाओं के कलश सहित काम रूपी रावण का भवन गिरा दिया अर्थात् काम के भाव कोश में प्रवेश करके वासना की इच्छाओं को गिरा दिया। यह देखखर काम रूपी रावण भयभीत हो गया अर्थात् काम का भाव व्याकुल हो उठा। तब वासना कोश की नाड़ियाँ भी व्याकुल हो उठती हैं, उसी को नारियों द्वारा छाती पीटना बताया गया है। वे कहने लगी कि अबकी बार तो वासना नगर में उत्पात मचाने के लिए दो वानर अर्थात् बुद्धि के दो भाव आ गए हैं।
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।
पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानर बुद्धि का खेला करके काम रूपी रावण की नारियों को डराने लगे अर्थात् बुद्धि के भावों के प्रभाव से काम कोश की नाड़ियाँ व्याकुल होकर धड़कने लगी। वे बुद्धि के भाव आत्मा की शीतलता के यश का बखान करने लगे। अर्थात् आसुरी भावों को समझाने लगे कि आत्मोन्मुखी होने पर चन्द्रमा की सी शीतलता आ जाती है। फिर लालसा रूपी सोने के खम्भों को पकड़कर बुद्धि के भाव उत्पात करने लगे।
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।।
काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फलु लेहू।।
व्याख्या : फिर वे बुद्धि के भाव गरज करके आसुरी भावों के सेना के बीच में कूद पड़े और आसुरी भावों का अपनी प्रबल आत्मोन्मुखी वृति रूपी भुजाओं से मर्दन करने लगे। किसी को लात से और किसी को थप्पड़ से मारने लगते हैं। तुम आत्मा रूपी राम को नहीं भजते हो, इसी का यह फल है। ऐसा वे आसुरी भावों से कहने लगते हैं।
दो0 एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिंदधि कुंड।।44।।
व्याख्या : वे अनन्य बुद्धि व दृढ़ बुद्धि के भाव एक-एक आसुरी भाव का मर्दन करके और आसक्ति रूपी सिर को तोड़कर काम रूपी रावण के सामने फेंकने लगे, जो दही के कुण्डे के समान फूटने लगे। अर्थात् काम के सामने ही आसुरी भाव शीतल होने लगे।
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।।
कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा।।
व्याख्या : जिन-जिन बड़े आसुरी भावों रूपी सेनापतियों को पाते हैं, तो उनके पैर पकड़कर आत्मा रूपी राम के पास फेंक देते हैं अर्थात् जो बड़े-बड़े आसुरी भाव होते हैं, उनको पाने पर उनके मूल सहित पकड़ उनको आत्मोन्मुखी कर देते हैं और वैराग्य रूपी विभीषण जब उन आसुरी भावों की वृतियों का परिचय देते हैं, तो आत्मा रूपी राम उन्हें निज पद दे देते हैं अर्थात् उन आसुरी भावों को आत्मा में लीन कर लेते हैं।
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।।
उमा राम मृदुचित करूनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर।।
व्याख्या : वे मन से उत्पन्न आसुरी भाव जो कि ज्ञान रूपी भावों का भक्षण करने वाले होते हैं, वे भी वही गति प्राप्त करते हैं, जो योगी लोग चाहते हैं। अर्थात् आत्मोन्मुखी होने पर सब भावों की एक ही गति हो जाती है। साधक के हृदय में यह अवस्था दृढ़ता से समझ में आ जाती है। इसलिए प्रतीकों का सहारा लेकर कहा गया है। विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धारूपी पार्वती! आत्मा का स्वभाव कोमल व करूणामय होता है। इसलिए कहते हैं कि बैर भाव से ही सही वे आसुरी भाव आत्मोन्मुखी तो हुए हैं। अत: जो आत्मोन्मुखी हो जायेगा, वह परमपद पायेगा।
देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी।।
अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी।।
व्याख्या : आत्मोन्मुखी हुआ जानकर आत्मा रूपी राम आसुरी भावों को परम गति देते हैं। हे भावों को पैदा करने वाली श्रद्धा रूपी पार्वती! बताओ ऐसा कृपाल कौन होगा? इसलिए परमात्मा के ऐसे स्वरूप को जानकर भी जो लोग भ्रम का त्याग कर परमात्मा को नहीं भजते हैं, वे मनुष्य मंदबुद्धि व परम दुर्भाग्य वाले होते हैं।
अंगद अ डिग्री हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा।।
लंका दौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसे।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद और अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान वासना रूपी किले में घुस गए हैं। ये दोनों बुद्धि के भाव रूपी वानर ऐसे शोभा पा रहे हैं, जैसे भाव रूपी समुद्र को ये दृढ़ता रूपी पर्वत मन के अन्दर मथ रहे हों।
दो0 भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।
कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।
व्याख्या : दोनों बुद्धि के भावों रूपी वानरों ने भाव रूपी भुजाओं के बल से आसुरी भावों रूपी शत्रु दल को कुचलकर व मसलकर ज्ञान रूपी दिन का अंत हुआ जानकर श्रम रहित होकर आत्मा रूपी राम के पास आ गए। वास्तव में बुद्धि के भाव जब निरन्तर आसुरी भावों से युद्ध करते हैं तो उन पर आसुरी भावों का प्रभाव होने लग जाता है। उसी को दिवस का अंत होना बोलकर लिखा है। परन्तु जब ये बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं, तो पुन: स्फूर्ति से भर जाते हैं। उसी को विगत् श्रम होना बताया गया है।
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।।
राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे।।
व्याख्या : दोनों बुद्धि के भावों रूपी वानरों ने आत्मा रूपी राम के चरणों में सीस झुकाया अर्थात् आत्मा के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम के दोनों बुद्धि के भाव रूपी योद्धा बहुत अच्छे लगे। तब आत्मा रूपी राम कृपा दृष्टि से देखे अर्थात् आत्मा द्रवित हो उठी, जिससे सब आसुरी विकारों का प्रभाव मिट गया और परम सुख का अनुभव किया।
गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना।।
जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई।।
व्याख्या : दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद और अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को गया हुआ जानकर सभी बुद्धि के भावों रूपी भालू व वानर लौट आए। तब आसुरी भावों ने प्रदोष काल का बल पाकर बुद्धि के भावों का धावा किया। वास्तव में जब ज्ञान रूपी दिवस अस्त होने लगता है, तो अज्ञान रूपी प्रदोष काल की शुरुआत होने लगती है, जिससे आसुरी भावों को बल मिलने लगता है। उसी भावों की अवस्था को यहाँ सूक्ष्म प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।।
दौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।।
व्याख्या : आसुरी भावों की सेना को आता हुआ देखकर बुद्धि के भावों की सेना लौट पड़ी अर्थात् आसुरी भावों से पुन: बुद्धि के भाव भीड़ गए। दोनों दल अर्थात् बुद्धि के भावों का दल और आसुरी भावों का दल बहुत बलवान हैं। दोनों दलों के भाव रूपी योद्धा ललकार-ललकार करके भिड़ते हैं और कोई हार नहीं मानता है।
महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे।।
सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा।।
व्याख्या : आसुरी भाव सब काले अर्थात् वासनायुक्त होते हैं, तो नाना प्रकार की दुर्वासना रूपी वर्ण वाले व बड़े आसक्ति रूपी मुख वाले होते हैं। दोनों दलों के भाव रूपी योद्धा समान बल वाले होते हैं। इसलिए क्रोध कर-करके वीरता दिखाते हैं।
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारूत के प्रेरे।।
अनिप अकंपन अ डिग्री अतिकाया। बिचलत सेन कीन्ह इन्ह माया।।
व्याख्या : दोनों दलों के योद्धा आपस में लड़ते हुए ऐसे लगते हैं जैसे वर्षा के बादल हवाओं के बल पर लड़ रहे हों। ध्यान की अवस्था में समझ आता है कि आसुरी भाव व दैवीय भाव प्राण की प्रेरणा से ही लड़ते हैं। प्राणों से ही आसुरी भावों को बल मिलता है और प्राणों से ही दैवीय भावों को बल मिलता है। यह बहुत ही सूक्ष्म अनुभूति का विषय है, जो गु डिग्री की कृपा से किसी बिरले साधक को ही समझ आ पाती है। भाव द्वन्द्व की अवस्था में जो आसुरी भाव प्राण की गति से अकम्पित रहते हैं, वे अपने दल को विचलित हुआ देखकर नाना प्रकार की माया करने लगते हैं।
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रूधिरोपल छारा।।
व्याख्या : उस अवस्था में क्षण मात्र में अज्ञान के भावों का अंधकार छा जाता है और वासना की आसक्ति रूपी वर्षा होना शु डिग्री हो जाती है।
दो0 देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
व्याख्या : वास्तव में जब वासनाओं की वर्षा होने लग जाती है तो साधक के दसों प्राण अज्ञान के भावों से भर जाते हैं। उसी अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा है कि बुद्धि के भावों के समूह ने जब दसों प्राण रूपी दिशाओं को अज्ञानता के अंधकार से युक्त देखा, तो खलबली मच गयी। उस अज्ञान के अंधकार की अवस्था में बुद्धि के भाव एक दूसरे को नहीं देख पाते हैं अर्थात् सभी बुद्धि के भाव अज्ञान से आच्छादित हो जाते हैं और व्याकुल हो जाते हैं। उसी को पुकारना बोलकर लिखा गया है।
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।।
समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए।।
व्याख्या : वासनाओं के अज्ञान के अंधकार के सब मर्म को आत्मा रूपी राम ने जान लिया तो दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को अपने पास बुलाया अर्थात् दृढ़ता व अनन्यता के भावों को प्रेरणा की और प्रेरणा शक्ति द्वारा वासनाओं के अज्ञान के प्रभाव को समझाया। जिससे प्रेरित होकर बुद्धि के भाव क्रोधित होकर आसुरी भावों की तरफ दौड़े।
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।।
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।।
व्याख्या : फिर हँसकर आत्मा रूपी राम ने संयम रूपी धनुष को चढ़ाया और ज्ञान रूपी अग्नि बाण चलाया, जिससे अज्ञान रूपी अंधकार मिट गया और ज्ञान का प्रकाश हो गया। ज्ञान के उदित हो जाने पर अज्ञान का भ्रम मिट जाता है। इसमें संशय नहीं होता है।
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा।।
हनुमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।
व्याख्या : तब बुद्धि के भालू व वानर रूपी भाव ज्ञान का प्रकाश पाकर भय व श्रम से रहित होकर दौड़े अर्थात् बुद्धि के भावों में ज्ञान के प्रकाश से नवस्फूर्ति आ गयी। तब उस अवस्था में दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव और अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भाव द्वन्द्व रूपी युद्ध में जोर से गरजे अर्थात् प्रबल हो उठे। तब उनकी प्रबलता को देखकर आसुरी भाव भागने लगे अर्थात् आसुरी भाव कमजोर होने लग गए।
भागत भट पटकहिं धरि धनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी।।
गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं।।
व्याख्या : भागते हुए आसुरी भावों को बुद्धि के भाव पकड़कर पृथ्वी पर दे मारते हैं अर्थात् आसुरी भावों का दमन कर देते हैं। बुद्धि के भाव अद्भुत करणी करने लगते हैं अर्थात् बहुत प्रभावशाली होने लग गए। बुद्धि के भाव आसुरी भावों को मूल सहित पकड़कर भाव रूपी भव सागर में डालने लगते हैं, जिससे वासना रूपी मगर, सर्प और मच्छ उन्हें पकड़कर खा डालते हैं। अर्थात् आसुरी भाव जड़मूल से नष्ट होने लग जाते हैं।
दो0 कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।
गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ।।47।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की उस अवस्था में कुछ आसुरी भाव मारे जाते हैं, तो कुछ घायल हो जाते हैं और कुछ वासना रूपी गढ़ पर चढ़ जाते हैं। दूसरी तरफ बुद्धि के भाव आसुरी भावों को विचलित कर गरजने लगते हैं।
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।।
राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगत श्रम बानर तबही।।
व्याख्या : पुन: अज्ञान रूपी रात्रि का आगमन जानकर बुद्धि के भावों की चारों सेनाएँ (सत, रज, तम व गुणातीत बुद्धि के भाव) वापस वहाँ आ गयी, जहाँ पर सुष्मना नाड़ी के आत्मा रूपी राम थे अर्थात् सभी बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा के पास आ गए। तब आत्मा रूपी राम ने कृपा करके सबको देखा तो सभी श्रम रहित हो गए अर्थात् सभी बुद्धि के भाव सहज हो गए।
उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे।।
आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा।।
व्याख्या : उधर को काम रूपी रावण ने सब आसुरी मंत्रणा के भावों को बुलाया अर्थात् आसुरी भावों में मंत्रणा का दौर चलने लगा। तब काम रूपी रावण ने जो आसुरी भाव मारे गए, उनके बारे में सब आसुरी भावों को बताया। आधी आसुरी भावों की सेना का बुद्धि के भावों ने संहार कर दिया है। अत: अब जल्दी बताइये क्या उपाय किया जाए?
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर।।
बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन।।
व्याख्या : माल्यवंत भाव मन की सहज अवस्था में भोग भोगने की मंत्रणा करने का भाव होता है। मन की सहज अवस्था से ही काम का भाव पैदा होता है। इसलिए ही माल्यवंत के भाव को काम रूपी रावण के माता-पिता का मंत्री बताया गया है। वह भाव द्वन्द्व की अवस्था को देखकर पवित्र नीति बोला अर्थात् सहज सलाह दी कि हे काम रूपी रावण! तुम मेरी शिक्षा सुनो --।
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी।।
बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो।।
व्याख्या : तुम जब से सुरता रूपी सीता का हरण करके लाए हो, तब से आसुरी भावों के लिए अपशकुन हो रहे हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। वेदों व पुराणों ने भी जिस सुरता के यश का वर्णन किया है अर्थात् वेदों व पुराणों में भी सुरता के प्रभाव को बताया गया है। आत्मा के प्रतिकूल होने पर कोई भी सुख प्राप्त नहीं कर पाता है। यहाँ माल्यवंत का भाव काम रूपी रावण को सहज होने की सलाह देता है।
दो0 हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।
जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।48(क)।।
व्याख्या : हिरन्याक्ष अर्थात् माया के मूल को उसके माया के भाव रूपी हिरण्यकशिपु भाई सहित जिस आत्मा ने मद व कटुता रूपी मधु-कैटभ के भावों को मार दिया, वही आत्मा रूपी राम का अवतरण हुआ है। वही आत्मा प्रबल होकर अवतरित हुई है।
।। मासपारायण, पच्चीसवाँ विश्राम ।।
दो0 कालरूप खल बन दहन गुनागार बोध।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।48(ख)।।
व्याख्या : आत्मा दुष्टता के भावों रूपी वन को जलाने के लिए कालस्वरूप है तथा गुणों का बोध करानेवाली है। जिस आत्मा को विश्वास रूपी शिव और बुद्धि रूपी ब्रह्मा अपने अनुकूल रखने का प्रयास करते हैं। उस आत्मा से फिर कैसा विरोध?
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।।
ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।।
व्याख्या : इसलिए हे काम रूपी रावण! आत्मा रूपी राम से बैर छोड़कर सुरता रूपी सीता को वापस कर दो और परम स्नेही परमात्मा का भजन करो। माल्यवंत रूपी मंत्रणा के भाव के ये वचन काम रूपी रावण को बाण के समान लगे। तब काम का भाव क्षुब्ध होता हुआ बोला कि अरे अभागे। तू मुँह काला करके निकल जा अर्थात् तू काम के आसुरी भावों के प्रतिकूल बोल रहा है, इसलिए तू वासना में लिप्त होकर निकल जा। वासनाओं में लिप्त होन को ही मुँह काला करना बताया है। यहाँ पाठकों को बहुत सूक्ष्मता से समझना चाहिये। जब काम रूपी रावण सुरता में लीन होना चाहता है, तो सभी आसुरी भाव विचलित होने लगते हैं। उस अवस्था में सतोवृति वाले आसुरी भाव काम के भाव को समझाने का प्रयास करते हैं कि तुम्हारे सुरता में लीन होने से तो हम सब आसुरी भाव मारे जायेंगे। अत: उचित तो यह है कि द्वैत भाव रखते हुए परमात्मा का भजन करो, जिससे भोग भी भोग सकेंगे और परमात्मा की कृपा भी मिल सकेगी। यह अवस्था प्रत्येक साधक को साधना के दौरान आती है। उस अवस्था में साधक के कुछ भाव तो सिद्धियों को प्राप्त करके यश व वैभव की चाह करने लगते हैं, तो कुछ भाव सुरता में लीन होकर परमपद को प्राप्त करना चाहते हैं। उस अवस्था के भाव द्वन्द्व को ही प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।।
तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि तुम बूढ़े हो गए हो वरना मैं तुम्हें मार ही देता। इसलिए अब तुम मुझे दिखायी मत दो। वास्तव में कुछ आसुरी भाव लम्बे अभ्यास से भोगों में आसक्त हो जाते हैं, तो उनका दमन करना कठिन हो जाता है। इसलिए माल्यवंत रूपी सहज आसुरी मंत्रणा के भाव का काम रूपी रावण वध नहीं कर पाता है। तब माल्वंत रूपी मंत्रणा के भाव ने मन में अनुमान कर लिया कि काम रूपी रावण अब परमात्मा में लीन होना चाहता है। उसी को आत्मा रूपी राम के हाथों से मरना बोलकर लिखा है।
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा।।
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा।।
व्याख्या : तब सहज आसुरी मंत्रणा का माल्यवंत भाव काम रूपी रावण को वासनाओं से युक्त वचन कहते हुए चला गया। तब उस अवस्था में अहंकार रूपी मेघनाद का भाव क्रोध में भरकर बोला कि नव स्फूर्ति (प्रात:काल) के साथ मेरा खेल देखिए। मैं बहुत करूँगा फिर थोड़े में क्या कहूँ? वास्तव में अहंकार का भाव जब नव स्फूर्ति से भर जाता है, तो वह अति प्रबल हो उठता है।
सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा।।
करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद के वचनों को सुनकर काम रूपी रावण को विश्वास हो गया, इसलिए प्रेम सहित उसे गोदी में बैठा लिया। अर्थात् काम के भाव को अहंकार के भाव पर पूरा भरोसा हो गया कि ये बुद्धि के भावों को भाव द्वन्द्व में जीत लेगा। इस प्रकार विचार करते-करते ज्ञान रूपी सवेरा हो गया तो बुद्धि रूपी वानर चारों दरवाजों (सत, रज, तम व गुणातीत भावों रूपी द्वारों पर) पर जमा हो गए।
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा।।
बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने क्रोधित होकर वासना रूपी लंका गढ़ को घेर लिया। जिससे वासना रूपी नगर में कोलाहल मच गया। तब आसुरी भाव नाना प्रकार के लालसा रूपी हथियारों को लेकर दौड़े और वासना रूपी किले से अज्ञानता रूपी शिखरों को गिराने लगे।
छ0 ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले।
घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले।।
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए।
गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए।।
व्याख्या : आसुरी भावों ने वासना की लालसा रूपी शिखर चलाए और लालसाओं के जाल रूपी गोले चलने लगे। वे वासना की लालसा के जाल वज्र की तरह आघात करने वाले होते हैं और आसुरी भाव ऐसे गर्जने लगते हैं, जैसे प्रलयकाल के बादल गरज रहे हों। अर्थात् उस अवस्था में आसुरी भाव प्रबल होकर प्रलयकारी हो जाते हैं। उन आसुरी भावों रूपी योद्धाओं से बुद्धि के भाव रूपी योद्धा भिड़ जाते हैं। उन आसुरी भावों से बुद्धि के भाव घायल हो जाते हैं। परन्तु हार नहीं मानते हैं। फिर बुद्धि के भाव रूपी वानर प्रेरणा रूपी पर्वतों को उठाकर वासना रूपी गढ़ पर फेंकते हैं, तो आसुरी भाव वहाँ के वहाँ मर जाते हैं।
दो0 मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ।
उतर्यो बीर दुर्ग ते सन्मुख चल्यो बजाइ।।49।।
व्याख्या : जब अहंकार रूपी मेघनाद को सुनायी दिया कि बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने वासना रूपी किले को घेर लिया है, तो वह अहंकार रूपी मेघनाद किले से उतरा और डंका बजाकर सामने चला। अर्थात् बुद्धि के भावों से क्षुब्ध होकर अहंकार का भाव प्रबल होकर चला।
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता।।
कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा।।
व्याख्या : जब अहंकार प्रबल हो उठता है तो वह आत्मा पर आच्छादित होना चाहता है। इसलिए अहंकार रूपी मेघनाद कहता है कि आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण कहाँ पर हैं? प्रेरणा रूपी धनुष चलाने वाले सब भाव रूपी लोगों में बिख्यात आत्मा रूपी राम कहाँ हैं? अनासक्ति रूपी नल-नील, दुविधा रूपी दुविद और सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के भाव कहाँ हैं? दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कहाँ पर हैं?
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही।।
अस कहि कठिन बान संधाने। अति सय क्रोध श्रवन लगि ताने।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण जो काम रूपी भाई का द्रोही है, कहाँ पर है? आज मैं (अहंकार) सब भावों को जबरदस्ती मार दूँगा अर्थात् वश में कर लूँगा। ऐसा कहकर अहंकार रूपी मेघनाद ने भयंकर प्रेरणा रूपी बाणों का संधान किया। बहुत क्रोध करके कानों तक बाणों को खींच कर चलाया अर्थात् शब्द की क्षमता से प्रेरणा रूपी बाण चलाए। वास्तव में अहंकार जब प्रबल हो उठता है, तो सबसे पहले शब्द को (वाणी) प्रभावित करता है। इसलिए कानों तक बाण खींचने के प्रतीक का सहारा लिया गया है।
सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा।।
जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर।।
व्याख्या : अहंकार का भाव क्रोधित होकर प्रेरणा रूपी बाणों के समूहों को छोड़ने लगा। जो उस समय ऐसे लग रहे थे, जैसे बहुत से वासना रूपी सर्प दौड़ रहे हों। उस अवस्था में बुद्धि के भाव रूपी वानर घायल होकर गिरने लग जाते हैं और किसी भी भाव में अहंकार का सामना करने की क्षमता नहीं बचती।
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा।।
सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा।।
व्याख्या : प्रबल अहंकार की अवस्था में बुद्धि के वानर व भालू रूपी भावों की भाव द्वन्द्व करने की इच्छा ही नहीं बच पाती। उस अवस्था में एक भी बुद्धि का भाव ऐसा नहीं बचा, जिसके केवल प्राण ही अवशेष न रहे हों।
दो0 दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर।
सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर।।50।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद ने सब बुद्धि के भावों को दस-दस प्रेरणा रूपी बाण मारे अर्थात् बुद्धि के भावों के दसों प्राणों को प्रभावित कर दिया। जिससे सब बुद्धि के भाव निस्तेज होकर भूमि पर गिर गए। तब अहंकार का भाव प्रचण्ड वेग से प्रबल होकर गरजा।
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला।।
महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने बुद्धि के भावों की सेना को बेहाल देखा तो अनन्य बुद्धि का भावक्रोधित होकर काल के समान दौड़ा और अज्ञान रूपी महापर्वत को उखाड़कर क्रोध के साथ अहंकार रूपी मेघनाद के ऊपर डाल दिया अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव अहंकार पर हावी हो गया।
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई।।
बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना।।
व्याख्या : यहाँ पर पाठकों को अनन्य बुद्धि व अहंकार के संघर्ष को सूक्ष्मता से समझना चाहिये। वास्तव में जब परमात्मा में अनन्य बुद्धि हो जाती है, तो अनन्य बुद्धि से अहंकार का भाव डरने लग जाता है क्योंकि अहंकार को समझ में आ जाता है कि अनन्यता का भाव आते ही अहंकार का द्वैत भाव मिट जायेगा और बिना द्वैत भाव के अहंकार का अस्तित्व रह ही नहीं पायेगा। इसलिए अहंकार रूपी मेघनाद अनन्य बुद्धि के सामने नहीं आकर मस्तिष्क रूपी आकाश में उड़ जाता है।
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा।।
अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे।।
व्याख्या : तब अहंकार का भाव आत्मा के समक्ष गया और नाना प्रकार के वासनायुक्त शब्दों का प्रहार करने लगा। तब वासना-लालसा रूपी सब हथियार चलाए परन्तु आत्मा रूपी राम ने सहज में सबको काट दिया अर्थात् वासना-लालसा का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना।।
जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला।।
व्याख्या : आत्मा के प्रताप को देखकर अहंकार का भाव क्षुब्ध हो उठा और नाना प्रकार की माया की क्रिया करने लगा। जैसे कोई ज्ञान रूपी गरुड़ से खेल करता है और उसे अज्ञान रूपी वासना के छोटे सर्प से डराता है, वैसे ही अहंकार का भाव आत्मा के साथ खिलवाड़ करने लगता है।
दो0 जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट।
ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट।।51।।
व्याख्या : जिस आत्मा की माया के वश में विश्वास रूपी शिव व बुद्धि रूपी ब्रह्मा सहित सब छोटे-बड़े भाव होते हैं, उसी माया पति आत्मा को आसुरी अहंकार का भाव अपने आसुरी बुद्धि के भावों की माया दिखाने लगता है।
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।।
नाना भाँति पिसाच पिसाची। मा डिग्री काटु धुनि बोलहिं नाची।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद का भाव मस्तिष्क रूपी आकाश में चढ़कर वासना रूपी अंगारे बरसाने लगता है। परन्तु आत्मोन्मुखी अवस्था रहने पर वासना रूपी अंगारों को बुझाने के लिए शरीर रूपी पृथ्वी से संतोष रूपी जल की धारा निकलने लगती है। उस अवस्था में अनेकों प्रकार की वासना व लालसा रूपी पिशाचनियाँ मारो-काटो की आवाजें करने लगती हैं।
बिष्टा पूय रूधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा।।
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधियारा। सूझ न आपन हाथ पसारा।।
व्याख्या : उस अवस्था में धन की आसक्ति रूपी बिष्टा, लोभ रूपी पीब, लालच रूपी रक्त, जड़ रूपी बाल, भोग रूपी हाड़ बरसने लगते हैं अर्थात् आसक्ति, लोभ, लालच, जड़ता व भोगासक्ति रूपी भाव पैदा होने लगते हैं। कभी-कभी मूर्खता रूपी पत्थरों की बरसात होने लगती है। इस प्रकार आसुरी भावों की धूल की वर्षा ने चारों तरफ अज्ञान रूपी अंधकार कर दिया। उस अवस्था में भाव अपना स्वरूप भूल जाते हैं। उसी को अपना हाथ भी दिखायी न देना बोलकर लिखा है।
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें।।
कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने।।
व्याख्या : आसुरी अहंकार की आसुरी भाव रूपी माया को देखकर सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर विचार करने लगे कि इसी प्रकार हमलोगों का मरना लिखा है। माया के भावों के इस खेल को देखकर आत्मा रूपी राम मुस्कराए और बुद्धि के भाव रुपी वानरों को भयभीत जाना।
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया।।
कृपा दृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने एक सद्प्रेरणा रूपी बाण से सब आसुरी भावों की माया को काट दिया। जैसे दिन उगने पर रात्रि के अंधकार को हर लेता है। तब आत्मा रूपी राम ने कृपा दृष्टि से समस्त बुद्धि के भावों को देखा, तो सभी बुद्धि के भाव प्रबल हो उठे और भाव द्वन्द के लिए प्रबल होकर उत्साहित हो उठे। जिन्हें भाव द्वन्द से रोकने पर भी नहीं रूकने लगे।
दो0 आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ।।52।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम से प्रेरणा रूपी आज्ञा लेकर दृढ़ बुद्धि आदि के भावों को साथ लेकर लखन भाव क्रोधित होकर हाथों में लक्षणों को लखने वाले बाणों को लेकर अहंकार रूपी मेघनाद से लड़ने को चला।
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला।।
इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए।।
व्याख्या : लक्षणों को लखने वाले लखन भाव के लाल-लाल नयन हैं अर्थात् अति सूक्ष्म दृष्टि से लखन भाव लक्षणों को लख (जान) लेता है। लखन भावके विशाल भाव रूपी भुजाएँ हैं तथा हिमालय के समान शीतल शरीर कुछ लालिमा लिए हुए हैं। इधर को काम रूपी रावण ने आसुरी भावों को भेजा, जो नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों (अर्थात् वासना के जाल) को लेकर दौड़े।
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी।।
भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी।।
व्याख्या : वासना रूपी पर्वतों, अनासक्ति रूपी नखों, दृढ़ता रूपी वृक्षों को धारण करने वाले बुद्धि के भाव रूपी वानर आत्मोन्मुखी होकर दौड़े और अपने समान आसुरी योद्धाओं से भिड़ मरे। दोनों तरफ के भावों में विजयी होने की इच्छा कम नहीं थी।
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहि। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं।।
मा डिग्री मा डिग्री ध डिग्री ध डिग्री ध डिग्री मारु। सीस तोरि गहि भुजा उपारू।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानर लातों व घूसों से मारकर आसुरी भावों को दाँतों से काट लेते हैं और विजयी होकर आसुरी भावों को डाँटते हैं। मारो-मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़ो और पुन: मारो और सिर तोड़कर भाव रूपी भुजाओं को उखाड़ लो।
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रूंड प्रचंडा।।
देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा।।
व्याख्या : ऐसी मारने-काटने की आवाजें नौ खण्डों में गूँजने लगती है। नौ खण्डों का रहस्य यह है कि शरीर में नौ स्थानों पर धड़कन धड़कती है। इसलिए कुछ साधना पंथों में ""नौ नाड़ी नर सिंह बसै"" बोलकर लिखा गया है। ये नौ स्थान सात चक्र और हाथ व पैरों की नाड़ियों का होता है। अत: उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। वास्तव में जब ध्यान में आसुरी भावों व बुद्धि के भावों में युद्ध होने लगता है, तो नौ नाड़ियों पर प्रभाव होने लग जाता है। उस अवस्था के खेल को मस्तिष्क रूपी आकाश से स्वर देखते हैं अर्थात् स्वरों की गति भी प्रभावित हो जाती है। जिससे स्वरों की गति कभी विसम्यकारी तो कभी आनन्ददायक हो जाती है।
दो0 रूधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।
जनु अंगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ।।53।।
व्याख्या : उस अवस्था में रक्त चक्रों रूपी गड्ढ़ो में भर कर जम गया और ऊपर धूल छा गयी। इस दोहे में बहुत वैज्ञानिक रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में भावों का संचार प्राण से होता है और रक्त का निर्माण भी भावों के द्वारा ही होता है। परन्तु जब ध्यान गहरा हो जाता है और सप्त चक्रों व नाड़ियों पर बुद्धि के भाव व आसुरी भावों का द्वन्द चलना शु डिग्री हो जाता है, तो प्राण की गति भी धीमी पड़ जाती है और रक्त का संचार भी धीमा पड़ जाता है। उसी को गड्ढ़ों में रक्त का जमना बताया गया है। उस अवस्था में भाव भी तीव्र गति से मरने लगते हैं। उसी को धूल का जमना बताया गया है। उस समय ऐसा लगने लगता है, मानो अंगारों के ढेर पर राख छा रही है।
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के त डिग्री जैसे।।
लछिमन मेघनाद दौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा।।
व्याख्या : उस अवस्था में घायल भाव रूपी योद्धा ऐसे शोभा देते हैं, जैसे फूले हुए पलाश के पेड़ हों। उस अवस्था में लखन भाव और अहंकार रूपी मेघनाद आपस में क्रोध करके लड़ने लगते हैं।
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती।।
क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता।।
व्याख्या : लखन भाव अर्थात् लक्षणों को लखने वाला भाव व अहंकार का भाव एक दूसरे के जीतने में नहीं आते हैं। अहंकार का भाव तो बहुत छल, बल व अनीति का सहारा लेने लगता है। वास्तव में अहंकार का भाव अपना स्वरूप इतनी तेजी से बदलता है कि लखन भाव लख ही नहीं पाता है। कभी अहंकार तामसिक, तो कभी राजसिक, तो कभी सात्विक हो जाते हैं, जिससे लखन भाव अहंकार के लक्षणों को लख (जान) नहीं पाता है। और यह वैज्ञानिक सत्य है कि बिना लक्षणों को जाने आसुरी भावों को वश में नहीं किया जा सकता है। ऐसी अवस्था देखकर लखन भाव क्रोधित हो गया और अहंकार की वृति व प्रवृति को तोड़ डाला अर्थात् लक्षणों को नहीं पकड़ने पर लखन भाव ने वृतियों को पकड़ लिया।
नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा।।
रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना।।
व्याख्या : जब लखन भाव ने नाना प्रकार से प्रहार करके वृतियों को नष्ट कर दिया, तो अहंकार के भाव को केवल प्राणों का सहारा बच गया। वास्तव में जब अहंकार की वृतियाँ वश में हो जाती हैं, तो अहंकार केवल प्राण में शेष बच जाता है। प्राण में अवशेष जानकर काम रूपी रावण का पुत्र अहंकार रूपी मेघनाद ने मन में सोचा कि अब लखन भाव तो मेरे प्राणों का अंत कर देगा अर्थात् प्राणों को वश में करके अहंकार को पूरी तरह मिटा देगा।
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी।।
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें।।
व्याख्या : वास्तव में जब अहंकार के भाव को लगने लगता है कि वो अब लक्षणों को जान लेने के कारण मरनेवाला है, तो वह अति सात्विक वृतिरहित अहंकार का रूप धारण कर लेता है, जिसे ज्ञान का अहंकार बोलकर समझाया जाता है। जब ज्ञान का अहंकार हो जाता है, तो साधना में भयंकर विघ्न पैदा हो जाता है और साधक अपने आपको सिद्ध, विमुक्त, उदासी व त्यागी मानने का भ्रम पाल लेता है। उस अवस्था में लखन भाव भी लक्षणों को नहीं लख पाता है। उसी को वीरघातिनी शक्ति का लक्ष्मण पर प्रहार माना जाता है। उस अवस्था में साधक को भ्रम रूपी मूर्छा आ जाती है। अर्थात् साधक को परम ज्ञानी होने का भ्रम हो जाता है। जब अहंकार की ज्ञान शक्ति से लखन भाव मूर्छित हो जाता है, तो अहंकार का भाव निडर होकर लखन भाव के पास चला आता है।
दो0 मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
जगदाधर सेष किमि उठै चले खिसिआइ।।54।।
व्याख्या : तब अहंकार के समान सैकड़ों भाव रूपी योद्धा लखन भाव को उठाने लगे परन्तु लखन भाव को उठा नहीं सके। लखन भाव तो सब भाव रूपी जगत का आधार होता है, इसलिए अहंकार की ज्ञान रूपी शक्ति से मूर्छित लखन भाव को उठा भी कौन सकता है? वास्तव में ज्ञान के अहंकार से जब साधक का लखन भाव मूर्छित हो जाता है, तो कोई भाव उसे उठा नहीं सकता है। यह अवस्था प्रत्येक साधक की आती है, परन्तु कोई बिरला साधक ही अनन्य बुद्धि का सहारा लेकर उठ पाता है।
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।।
सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जिसकी क्रोधाग्नि से समस्त भावरूपी भवन और मन, बुद्धि, चित व अहंकार दस इन्द्रियों सहित जल जाते हैं। उनको भाव द्वन्द में कौन जीत सकता है? जिन्हें स्वर, धड़कन व चेतना सेती हैं। अर्थात् जिन पर स्वर, धड़कन व चेतना निर्भर करते हैं, उनको भाव के द्वन्द में कौन जीत सकता है?
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई।।
संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी।
व्याख्या : इस भाव द्वन्द्व के खेल को तो वही जान सकते हैं, जिन पर परमात्मा की कृपा होती है। संध्या होने पर अर्थात् भावों का संधि काल आने पर दोनों तरफ की भाव रूपी सेनाएँ लौट गयी और दोनों पक्ष अपनी अपनी सेना को सम्भालने लगे।
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेश्वर। लछिमन कहाँ बूझ करूनाकर।।
तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना।।
व्याख्या : तब सर्व व्यापक ब्रह्म, अजेय, समस्त शरीर के कोष रूपी ब्रह्माण्डों के स्वामी आत्मा रूपी राम ने पूछा कि लखन भाव रूपी लक्ष्मण कहाँ है? तब तक अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान लखन भाव रूपी लक्ष्मण को ले आया। अहंकार की ज्ञान शक्ति से मूर्छित लखन भाव को देखकर परमात्मा राम को बहुत दु:ख हुआ।
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना।।
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता।।
व्याख्या : तब धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने कहा कि वासना रूपी लंका में सुखेन वैद्य है, इसलिए किसी को उसे लाने के लिए भेजना चाहिए। सुखेन वैद्य के प्रतीक का गहरा मर्म है। वास्तव में प्रमस्तिष्क के कोश में वासना रूपी लंका होती है परन्तु वासनाओं से निसंग एक भाव होता है, जो आसुरी भावों के विकारों को दूर करता रहता है। इसलिए धीर बुद्धि रूपी जामवंत कहते हैं कि सुखेन वैद्य को बुलवाया जाए क्योंकि वही लखन भाव पर से सात्विक अहंकार के प्रभाव को दूर कर सकता है। वासना रूपी लंका में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान अति सूक्ष्म रूप धारण करके गया और सुखेन वैद्य को भाव रूपी भवन सहित ले आया। वास्तव में अनन्य बुद्धि के भाव की इतनी प्रबलता होती है कि वो जिस भाव के सम्पर्क में आता है, उसे आत्मोन्मुखी कर देता है।
दो0 राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन।।55।।
व्याख्या : तब सुखेन भाव रूपी वैद्य ने आत्मा रूपी राम के चरणों में आकर सीस झुकाया अर्थात् समर्पण किया और उसने पर्वत व औषध का नाम बता दिया अर्थात् मूर्छा के लक्षणों को जानकर मूल कारण रूपी पर्वत व औषध का नाम बता दिया और अनन्य बुद्धि के भाव रूपी हनुमान को लाने को कहा।
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी।।
उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को हृदय में रखकर प्रभंजन (प्र अ भंजन) अर्थात् प्रकृति का नाश करने वाला अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान अपने बल का स्मरण करते हुए चला। काम रूपी रावण को जब यह मर्म पता चला तो वह कालनेमि के घर आया अर्थात् समय के अनुसार नियम का बंधनकारी भाव को अनन्य बुद्धि के भाव को रोकने के लिए उत्साहित किया। अनन्य बुद्धि का भाव बहुत प्रबल होता है परन्तु काल के नियमों में अनन्य बुद्धि का भाव बँध सकता है। इसलिए कालनेमि के पास काम रूपी रावण जाता है।
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सि डिग्री धुना।।
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने सारी बातें बतायीं और समय के नियम रूपी कालनेमि भाव ने सुनकर बार-बार अपना सिर धुना और कहा कि हे काम रूपी रावण! तुम्हारे देखते-देखते जिसने वासना रूपी नगर को जला दिया। उसके रास्ते को कौन रोक सकता है? अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव को कौन भ्रमित कर सकता है?
भजि रघुपति क डिग्री हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना।।
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा।।
व्याख्या : कालनेमि रूपी आसुरी भाव काम रूपी रावण से बोला कि आत्मा रूपी राम का भजन करके अपना कल्याण कर लो और व्यर्थ की कल्पनाओं का त्याग कर दो। नीले कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले परमात्मा को अपने हृदय में धारण कर लो। परमात्मा को सभी ने कमल नेत्रों वाला कहा है। इसका रहस्य यह है कि परमात्मा की दृष्टि सदैव निर्मल व दिव्य होती है। इसलिए कमल नयन की संज्ञा दी जाती है। आसुरी भावों में भी आपस में द्वन्द चलता रहता है। उसी भाव द्वन्द को सूक्ष्मता के साथ यहाँ रावण व कालनेमि के संवाद के रूप में लिखा गया है।
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।।
काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! तुम मेरे, तेरे व मैं की मूढ़ता का त्याग करो और मोह रूपी अज्ञान रात्रि से जाग जाओ। जो आत्मा काल रूपी सर्पों का भी भक्षण कर जाती है। उसे क्या कोई भाव द्वन्द में जीत सकता है?
दो0 सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।
राम दूत कर मरौं ब डिग्री यह खल रत मल भार।।56।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के क्रोधपूर्वक वचनों को सुनकर कालनेमि रूपी आसुरी भाव ने मन मे विचार किया कि इस विकारी काम रूपी रावण से तो अच्छा है, मैं आत्मा रूपी राम के दूत के हाथों से मर जाऊँ अर्थात् आत्मोन्मुखी होना ही ज्यादा अच्छा है।
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया।।
मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम।।
व्याख्या : ऐसा विचारकर कालनेमि रूपी आसुरी भाव चला अर्थात् आत्मोन्मुखी होने के रास्ते पर चला। परन्तु यथार्थ में यह होता है कि जब कोई आसुरी भाव आत्मोन्मुखी होने को चलता है, तो उसकी पुरानी वृतियाँ उसे पाखण्ड में फँसाए रखना चाहती है। कालनेमि का भाव उसी अवस्था का प्रतीक है। उस अवस्था में साधक के बाहर का आचरण शुद्ध सात्विक लगने लग जाता है और बुद्धि के अनन्य भाव को भी बाहरी सात्विकता आकर्षित कर लेती है। उसी को सुन्दर बाग व मन्दिर का बनाना बोला गया है। जब अनन्य बुद्धि के भाव हनुमान ने ऐसे शुभ लक्षण देखे तो आकर्षित हो गया कि मन की दृढ़ता से ज्ञान रूपी जल पीकर नव स्फूर्ति को प्राप्त कर लूँगा। साधना में ऐसा कई बार होता है कि साधक की अनन्य बुद्धि भी बाहरी सात्विकता के भ्रम में पड़ जाती है।
राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा।।
जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुनगाथा।।
व्याख्या : कालनेमि रूपी आसुरी साधना का भाव सात्विकता के कपट भेष में होने के कारण अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान मोहित हो गए। इसलिए अनन्य बुद्धि के भाव ने जाकर सीस झुकाया अर्थात् समर्पण दिखाया। तब कालनेमि रूपी आसुरी भाव आत्मा रूपी राम के गुणगान करने लगा।
होत महा रन रावन रामहिं। जितिहहिं राम न संसय या महिं।।
इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई।।
व्याख्या : कालनेमि रूपी आसुरी भाव कहने लगा कि मैं यहाँ बैठे-बैठे देख रहा हूँ कि काम रूपी रावण व आत्मा रूपी राम के बीच में भाव द्वन्द हो रहा है। इसमें आत्मा रूपी राम ही विजयी होंगे, इसमें संशय नहीं है। मैं ये सब ज्ञान की दृष्टि के बल से देख पा रहा हूँ। वास्तव में जो आसुरी भाव आत्मोन्मुखी होने के रास्ते पर चल पड़ते हैं। उन्हें यह आबास होने लग जाता है।
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल।।
सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु।।
व्याख्या : बाहरी सात्विक आचरण को देखकर अनन्य बुद्धि का भाव प्रभावित हो जाता है और उसी बाहरी आचरण से ज्ञान की प्यास को बुझाने के लिए ज्ञान रूपी जल माँगता है। तब कालनेमि रूपी आसुरी भाव ऊपरी-ऊपरी ज्ञान की बातें करने लगता है, तो अनन्य भाव बोलता है कि इस ऊपरी ज्ञान रूपी जल से मेरी प्यास नहीं बूझेगी। तब कालनेमि आसुरी भाव कहता है कि फिर तुम जाओ और ज्ञान रूपी सरोवर में स्नान करके आवो। तब मैं तुम्हें कृपा रूपी दीक्षा दूँगा, जिससे तुम्हें ज्ञान हो जायेगा। वास्तव में यही होता है जब कोई साधक सात्विकता के पाखण्ड में फँस जाता है, तो थोथे ज्ञान की बातें करने लग जाता है।
दो0 सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।
मारी सो धरि दिब्य तनु चली गगन चढ़ि जान।।57।।
व्याख्या : जब बाहरी ज्ञान रूपी सरोवर में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने पैर रखा तो भोग इच्छा रूपी मकरी (मगरी) ने अनन्य बुद्धि का पैर पकड़ लिया। तब अनन्य बुद्धि ने उसे मारा तो वह दिव्य रूप धारण कर आत्म लोक को चली गयी। उसी अवस्था को आकाश में विमान पर चढ़कर जाना बताया गया है।
कपि तव दरस भयउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा।।
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा।।
व्याख्या : हे बुद्धि रूपी वानर! मैं तुम्हारे संस्पर्श से पवित्र हो गयी हूँ। मैं तो मन के विकारों के कारण आसुरी वृति वाली हो गयी थी। वास्तव में कोई भी आसुरी इच्छा या भाव अनन्य बुद्धि के सम्पर्क में आ जाता है तो वह तुरन्त निष्पाप (निर्मल) हो जाता है। अत: यही मगरी रूपी आसुरी भोग इच्छा के साथ हुआ। जब कोई आसुरी भाव या इच्छा निर्मलता को प्राप्त होती है, तो उसमें ज्ञान का प्रादुर्भाव हो जाता है। इसलिए मगरी रूपी आसुरी इच्छा कहती है कि हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! ये कालनेमि रूपी आसुरी भाव घोर राक्षस है अर्थात् भयंकर आसुरी वृतियों वाला है। मेरी बात को सत्य मानिए। ये कोई सात्विक मन का भाव नहीं है।
अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं।।
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू।।
व्याख्या : ऐसा कहकर जब भोग इच्छा सात्विक होकर आत्म लोक को चली गयी तो अनन्य बुद्धि का भाव कालनेमि रूपी आसुरी भाव के पास आया और कहा कि पहले गु डिग्री दक्षिणा ले लो अर्थात् अब मैं तुम्हें वास्तविक ज्ञान का प्रकाश कराता हूँ। उसके बाद तुम हमसे मंत्रणा करना अर्थात् अपना अनुभव बताना।
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा।।
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि के भाव ने लग्न रूपी पूँछ में कालनेमि रूपी आसुरी भाव को लपेट कर पछाड़ दिया अर्थात् आसुरी विकारों से रहित कर दिया। तब कालनेमि के भाव ने अपना निज स्वरूप प्रकट किया और आत्मोन्मुखी होकर प्राणों का त्याग कर दिया। यह सुनकर अनन्य बुद्धि का भाव बहुत हर्षित होकर चला।
देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा।।
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि के भाव ने जब संजीवनी बुटी के कोश (सैल) को देखा तो वह पहचान नहीं पाया कि कौन-सी कोशिका संजीवनी दायक है, तो उसने पूरी सैल (कौश रूपी पर्वत) को ही उखाड़ लिया। सैल रूपी कोश को लेकर जब अनन्य बुद्धि का भाव देह भाव के कोश से गुजरा।
दो0 देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि।।58।।
व्याख्या : तो भाव रत भरत भाव ने जब देखा कि कोई विशाल आसुरी भाव आ रहा है, तो बिना आसक्ति के प्रेरणा रूपी बाण चला दिया। वास्तव में जब परमात्मा में भाव पूरी तरह लीन (रत) हो जाता है, तो वह शब्द व गति को भी लीनता में बाधा समझता है। इसलिए अनासक्ति रूपी प्रेरणा बाण चला दिया, जिससे भाव की लीनता में व्यवधान नहीं पड़े।
परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक।।
सुनि प्रयि बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए।।
व्याख्या : अनासक्ति रूपी बाण के लगने से अनन्य बुद्धि का भाव मूर्छित होकर भाव रूपी भूमि पर पड़ गया और आत्मा रूपी राम का नाम सुमिरन करने लगा। भाव रत रूपी भरत भाव प्रिय वचन सुनकर दौड़कर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के पास आया।
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहीं बहु भाँति जगावा।।
मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि के भाव को मूर्छित अवस्था में देखकर भाव रत भरत भाव व्याकुल होकर हृदय से लगा लिया और नाना प्रकार से बुद्धि के अनन्य भाव को उठाने लगा। अनन्य बुद्धि के भाव की ऐसी दशा देखकर भाव रत भरत भाव दु:खी हो गया और आँखों में आँसू भरकर बोला।
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा।।
जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया।।
व्याख्या : जिस ध्यान की क्रिया ने मुझ भाव रत भरत को आत्मा से अलग किया है। वही क्रिया पुन: मुझे ऐसा भयंकर कष्ट दे रही है। इसलिए अगर मन, वचन व तन से मेरी आत्मा रूपी राम के चरण कमलों में निष्काम प्रीति है।
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला।।
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा।।
व्याख्या : अगर मुझ पर आत्मा रूपी राम अनुकूल हैं, तो बुद्धि रूपी ये वानर थकावट व पीड़ा से मुक्त हो जाए। भाव रत भरत की ऐसी वाणी सुनकर अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा रूपी राम का गुणगान करते हुए उठ बैठ गया। वास्तव में भाव रत अर्थात् भाव की लीनता का भाव भी बहुत प्रबल होता है। भाव की परमात्मा में लीनता ही अनन्य बुद्धि के भाव को नव स्फूर्ति प्रदान कर देती है।
सो0 लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।
प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक।।59।।
व्याख्या : तब भाव रत भरत भाव ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को प्रसन्न होकर गले लगा लिया और आँखों में जल भर लिया। आत्मोन्मुखी होकर उस समय हृदय में प्रेम नहीं समा रहा था।
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।
कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने।।
व्याख्या : भाव रत भरत भाव ने तब अनन्य बुद्धि से आत्मा रूपी राम की लखन भाव व सुरता रूपी सीता सहित कुशलक्षेम पूछी। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने भाव द्वन्द की अवस्था को बताया, जिसे सुनकर भावरत भरत भाव दु:खी हो गए और पश्चाताप करने लगे।
अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ।।
जानि कुअवस डिग्री मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा।।
व्याख्या : हे दैव! मेरा जगत में जन्म क्यों हुआ है? मैं आत्मा रूपी राम के एक भी काम नहीं आया हूँ। वास्तव में भाव रत भरत भाव आत्मा से विलग होने को दु:ख मानता है। इसलिए कुसमय का विचार करके अर्थात् भाव द्वन्द का विचार करके धैर्य धारण करके अनन्य बुद्धि रूपी बलवान भाव से कहा।
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता।।
चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता।।
व्याख्या : हे तात! तुमको जाने में देर हो जायेगी और प्रात: होने से कार्य बिगड़ जायेगा अर्थात् आसुरी भावों में अगर स्फूर्ति रूपी प्रात:काल आ गया तो कार्य बिगड़ जायेगा अर्थात् लखन भाव की मुर्छा नहीं टूट पायेगी। इसलिए तुम मेरे प्रेरणा रूपी बाण पर संजीवनी सैल (कोश) सहित चढ़ जाओ। मैं तुम्हें तुरन्त आत्मा रूपी राम के पास भेज दूँगा।
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना।।
राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी।।
व्याख्या : भाव रत भरत भाव के वचनों को सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को अभिमान हो आया कि मेरे वजन से अर्थात् मुझ अनन्यता के सामने प्रेरणा का भाव कैसे चलेगा? परन्तु फिर आत्मा के प्रभाव का विचार करके भाव रत भरत भाव को हाथ जोड़कर अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा रूपी राम के पास जाने को चल दिया।
दो0 तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।।60(क)।।
व्याख्या : हे नाथ! मैं आपके प्रताप को हृदय में याद करके तुरन्त चला जाऊँगा अर्थात् भाव लीनता की वृति का स्मरण करके मैं अनन्य बुद्धि का भाव तुरन्त चला जाऊँगा। ऐसा कहकर भाव रत भरत भाव के चरणों की वन्दना करके अनन्य बुद्धि का भाव चल दिया।
दो0 भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवन कुमार।।60(ख)।।
व्याख्या : भाव रत भरत भाव की परमात्मा में लीनता, बल, शील व गुणों की मन ही मन सराहना करते हुए अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भाव चला।
उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।
अर्ध राति गई कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ।।
व्याख्या : उधर को आत्मा रूपी राम ने लखन भाव रूपी लक्ष्मण को देखा और मन की भावना के अनुसार वचन बोले कि अज्ञान रूपी आधी रात चली गयी है परन्तु अभी अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान नहीं आया है। आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया अर्थात् लखन भाव को प्रेरणा रूपी बल प्रदान किया, जिससे अहंकार की मूर्छा से लखन भाव बाहर आ जाए।
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।।
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।
व्याख्या : हे लखन भाव रूपी भाई! तुम कभी भी मुझ आत्मा को दु:खी (विकारी) नहीं देख सकते थे। तुम्हारा सदैव निर्मल करने वाला स्वभाव होता था। तुमने मुझ आत्मा के लिए चित व नाड़ी रूपी माता-पिता का भी त्याग कर दिया और वैराग्य रूपी वन में सर्दी, गर्मी व हवा रूपी सब कष्ट सहन किए।
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू।।
व्याख्या : हे लखन भाव रूपी भाई! अब मुझ आत्मा के प्रति वो अनुराग कहाँ है? तुम क्यों नहीं मेरे व्याकुल वचनों को सुनकर अहंकार की मूर्छा से बाहर आ रहे हो? जो मैं यह जानता कि तुम्हारा मुझ आत्मा से वियोग हो जायेगा, तो मैं चित रूपी पिता की प्रेरणा (आज्ञा) को ही नहीं मानता।
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।
व्याख्या : पुत्र, धन, नारी, घर, परिवार तो संसार में बार-बार मिल जाते हैं। अर्थात् जगत के भाव तो बार-बार पैदा हो जाते हैं, परन्तु सहोदर भाव अर्थात् आत्मा का अनुसरण करने वाला भाव संसार के भाव पैदा होने पर पैदा नहीं हो पाता है। अत: ऐसा विचारकर तुम अहंकार की मुर्छा से बाहर आ जाओ।
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।
व्याख्या : जैसे पंख के बिना पक्षी अति असहाय होता है और मणि के बिना सर्प व सूँड़ के बिना हाथी असहाय होता है, हे लखन भाव रूपी भाई! मैं आत्मा भी तुम्हारे बिना वैसे ही असहाय हो जाऊँगा। अगर जड़ दैव भाव मुझे जीवित रखेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि बिना लक्षणों को पहचाने आत्मा विकारों से रहित नहीं रह सकती है। उसी को आत्मा की दीनता कहा गया है।
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।
व्याख्या : मैं (आत्मा) कैसे अवधी रूपी शरीर में जाऊँगा अर्थात् आत्मा बिना लक्षणों को पहचाने कैसे देह भाव में रमण कर पायेगी? सुरता रूपी नाड़ी के लिए लखन भाव रूपी प्रिय भाई को खो दिया। अर्थात् लखन भाव को सुरता के लिए खो दिया। इससे तो भला होता कि सांसारिक भावों का अपयश ही सहन कर लेता क्योंकि सुरता रूपी नाड़ी की हानि लखन भाव (लक्षणों को जानने वाले भाव) की हानि के बराबर नहीं होती है।
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।।
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।।
व्याख्या : हे लखन भाव रूपी वत्स! अहंकार की मूर्छा (अपलोक) ही तुम्हारे शोक (दु:ख) का कारण होगी और फिर उस अहंकार से व्याप्त विकारों का दु:ख आत्मा को सहन करना पड़ेगा। हे तात्! तुम एक ही माता से उत्पन्न हो अर्थात् जिस प्राण तत्व से आत्मा पैदा है, उसी प्राण रूपी माता से तुम पैदा हो। इसलिए प्राण ही तुम्हारा आधार है।
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।।
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।
व्याख्या : प्राण के माध्यम से ही तुम (लखन भाव) मुझ आत्मा से मिले हो। तुम्हारा आत्मलीन होना सब प्रकार से सुखकारी और हितकारी था। परन्तु अब तुम अहंकार की ज्ञान रूपी शक्ति से मूर्छित हो गए हो तो मैं (आत्मा) क्या उत्तर दूँगा? हे लखन भाव रूपी भाई! तुम पुन: आत्मोन्मुखी होकर क्यों नहीं मुझे समझाते हो?
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।
उमा एक अखण्ड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई।।
व्याख्या : इस प्रकार आत्मा रूपी राम बहुत प्रकार से विचार करने लगे और आँखों से जल बहने लगा। वास्तव में जब आत्म मंथन चलता है, तो विशेष रसायन का मुँह में स्राव होने लग जाता है। उसे ही कमल नयनों से जल बहना बोलकर लिखा है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आत्मा तो एक व अखण्ड स्वरूप होती है परन्तु नर की गति अर्थात् धड़कन के अनुसार अपना स्वरूप भक्तों को दिखाती है।
सो0 प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।61।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम का विलाप सुनकर बुद्धि के भावों का समूह दु:खी हो गया। इतने में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आ गया, मानो करूणा के रस में वीर रस आ गया हो। वास्तव में अनन्य बुद्धि के प्रकट होने पर सभी बुद्धि के भावों की प्रबलता बढ़ जाती है। उसी को करूणा के रस में वीर रस का पैदा होना कहा गया है।
हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान हर्षित होकर आत्मा रूपी राम से मिला। आत्मा रूपी राम परम चतुर एवं कृतज्ञ हैं। फिर तुरन्त सुषेन वैद्य रूपी भाव ने उपाय किया और लक्ष्मण तुरन्त हर्षित होकर उठ बैठ गया अर्थात् लखन भाव प्रसन्न होता हुआ अहंकार की मूर्छा से बाहर आ गया। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि का भाव परम ज्ञान रूपी संजीवनी बूटी का सुषेन वैद्य के माध्यम से लखन भाव को अनुपान कराता है, तो लखन भाव अहंकार की ज्ञान शक्ति की मूर्छा से बाहर आ जाता है। उसी अवस्था को लक्ष्मण का जीवित हो उठना बोलकर लिखा है।
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव रूपी भाई को हृदय से लगा लिया। यह देखकर बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानरों के समूह प्रसन्न हो उठे। तब अनन्य बुद्धि का भाव सुषेन बैद्य रूपी भाव को सहज अवस्था में ले गया अर्थात् सात्विक सुख का भाव पुन: वासना रूपी लंका में सहज हो गया।
यह बृतांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ।।
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम व लखन भाव का पुन: मिलन दस इन्द्रियों रूपी दस मुखों को धारण करने वाले काम रूपी रावण ने सुना तो उसे विषाद (विषयों से विरक्ति) हो गया और पश्चाताप करने लगा। तब काम का भाव व्याकुल होकर आलस्य रूपी कुम्भकर्ण के पास आया और नाना प्रकार से उपाय कर प्रमाद (आलस्य) को प्रबल करने का प्रयास किया। वास्तव में जब अहंकार का प्रभाव भी नहीं रह जाता है, तो फिर काम का भाव आलस्य का सहारा लेता है। आलस्य के भाव का ही कुम्भकर्ण प्रतीक है।
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा।।
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई।।
व्याख्या : आलस्य रूपी आसुरी भाव जब प्रबल हुआ तो ऐसा लग रहा था मानो काल ने शरीर धारण कर लिया हो। वास्तव में आलस्य का भाव जब प्रबल होता है तो सब भाव निस्तेज होते चले जाते हैं। इसलिए आलस्य के भाव को कालस्वरूप कहा गया है। तब आलस्य रूपी कुंभकरण ने समझा कि काम रूपी रावण का मुख सूखा हुआ है अर्थात् आलस्य के भाव को काम की व्याकुलता समझ में आ गयी। इसलिए काम रूपी रावण से पूछता है कि किस कारण से दु:खी हो?
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी।।
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संगारे।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने अभिमान के साथ सुरता रूपी सीता के हरण की बात बतायी और कहा कि हे तात! बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने सब आसुरी भावों को मार दिया है। महा महा आसुरी भावों रूपी योद्धा मारे गए हैं।
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।।
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा।।
व्याख्या : बुरी वासनाओं वाले आसुरी भाव (दुर्मुख) और दैवीय व मन के भावों का अहार करने वाली बड़े-बड़े धीर आसुरी भाव, महोदर अर्थात् तृष्णा रूपी बड़े पेट वाले आसुरी भाव आदि भावों के युद्ध में परास्त हो गए हैं।
दो0 सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।।62।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के वचन सुनकर आलस्य रूपी कुम्भकरण बिलखते हुए अर्थात् मर्म को समझते हुए बोला कि अरे मूर्ख काम रूपी भाव! तू जगत का आधार अर्थात् भावों को पैदा करने वाली सुरता रूपी सीता को हर लाया है और अब तू कल्याण चाहता है अर्थात् आसुरी भावों की बढ़ोतरी चाहता है। ये सम्भव नहीं हो सकता है। क्योंकि जब काम के भाव की ऊर्जा सुरता में लग जायेगी, तो बाकी आसुरी भाव तो वैसे ही कमजोर हो जायेंगे।
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा।।
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना।।
व्याख्या : हे आसुरी भावों के नायक! तुमने यह अच्छा नहीं किया है। अब मुझ आलस्य के भाव को जगाने से क्या होगा? हे तात! अभी भी अभिमान का त्याग करके आत्मोन्मुखी हो जाओ। जिससे तुम्हारा कल्याण हो जायेगा।
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनुमान से पायक।।
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! जिनके अनन्य बुद्धि रूपी भाव पायक हैं, वो क्या मन का कोई भाव है? अर्थात् आत्मा कोई मन का भाव (मन अ अनुज) नहीं है। अरे काम रूपी भाई! तूने गलती की है। पहले ही तूने क्यों नहीं मुझसे मंत्रणा की?
कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक।।
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा।।
व्याख्या : अरे काम रूपी रावण! तूने उस परमात्मा से विरोध किया है जिसके विश्वास रूपी शिव, बुद्धि रूपी ब्रह्मा व दैव भाव सभी सेवक हैं। मन के नारद भाव ने मुझे जो ज्ञान दिया, उसे मैं तुम्हें बताता, परन्तु अब तो समय नहीं रहा।
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई।।
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन।।
व्याख्या : अब तो हे भाई! तुम मुझसे अँकवार भर-करके मिललो। अब मैं जाकर अपने नेत्रों को सफल करूँगा। श्यामल अंगों वाले व कमल नयनों वाले आत्मा रूपी राम को जाकर देखूँगा, जो तीनों गुणों से उत्पन्न ताप को मिटाने वाले हैं।
दो0 राम रुप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक।।63।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के गुणों का स्मरण करके आलस्य रूपी कुम्भकर्ण एक क्षण के लिए प्रेम मग्न हो गया। फिर उसने काम रूपी रावण से घमण्ड रूपी मद और अज्ञान रूपी अनेक भैंसे भागे। अर्थात् काम के भाव से मद व अज्ञान का बल माँगा।
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना।।
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा।।
व्याख्या : अज्ञान के भावों व मद (घमण्ड) के भावों का बल पाकर आलस्य रूपी कुम्भकर्ण बज्राघात के समान गरजा। आलस्य रूपी कुम्भकर्ण का भाव दुर्मद अर्थात् आसुरी घमण्ड के भावों के युद्ध में रंग गया और वासना रूपी किले को छोड़ कर बिना आसुरी भावों की सेना के ही चल दिया। अर्थात् प्रमाद रूपी (आलस्य) कुम्भकर्ण अकेला ही चला।
देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ।।
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो।।
व्याख्या : आलस्य रूपी कुम्भकर्ण को देखकर वैराग्य रूपी विभीषण का भाव आगे आया और अपना नाम बताकर अर्थात् वैराग्य का आभास कराकर चरणों में पड़ गया अर्थात् आलस्य के भाव के सामने समर्पण कर दिया। तब आलस्य रूपी कुम्भकर्ण ने वैराग्य रूपी विभीषण को हृदय से लगा लिया और वैराग्य के भाव को आत्मोन्मुखी जानकर बहुत अच्छा लगा।
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा।।
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ।।
व्याख्या : हे तात्! काम रूपी रावण ने मुझे लात मार दी अर्थात् मुझ वैराग्य भाव का तिरस्कार कर दिया, जबकि मैं तो काम के कल्याण की ही मंत्रणा कर रहा था। उसी ग्लानी से मैं आत्मोन्मुखी हो गया और आत्मा ने भी मुझे अपना लिया।
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन।।
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी विभीषण! काम रूपी रावण तो काल (समय) के वश में हो गया है। इसलिए वह परम कल्याणकारी शिक्षा को नहीं मानेगा। हे वैराग्य भाव रूपी विभीषण! तुम धन्य हो जो आत्मोन्मुखी होकर आसुरी कुल के भावों के भूषण बन गए हो।
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी भाई! तुमने आसुरी कुल में नाम उजागर कर लिया है। इसलिए अब सुख के मूल परमात्मा का नाम भजो अर्थात् सदा आत्मा में लीन रहो।
दो0 बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर।।64।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी विभीषण! अब तुम मन, वचन व कर्म से कपट का त्याग करके परमात्मा का भजन करो। अब इस अवस्था में मुझे अपना-पराया कोई नहीं दिखायी दे रहा है क्योंकि अब मैं काल (समय) के वश में हूँ। वास्तव में जब आलस्य का भाव प्रबल होता है, तब उसे किसी भी प्रकार के भावों का भेद दिखायी नहीं देता है। वह तो अपने प्रमाद की शक्ति से सभी भावों को वश में करना शु डिग्री कर देता है।
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन।।
नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा।।
व्याख्या : आलस्य रूपी भाई के वचन सुनकर वैराग्य का भाव तीनों गुणों रूपी लोकों के स्वामी आत्मा रूपी राम के पास आया और कहा कि विशाल देह भाव में प्रबल होता हुआ आलस्य रूपी कुंभकर्ण का भाव भाव द्वन्द्व में आ रहा है। अर्थात् प्रबल आलस्य का भाव देह को प्रभावित करता हुआ आ रहा है।
एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना।।
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर।।
व्याख्या : जब वैराग्य रूपी विभीषण की ये बातें बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने सुनी तो सब बुद्धि के भाव किल-किलाकर दौड़ पड़े और दृढ़ता रूपी वृक्ष और पर्वतों को उखाड़ लिया और कटकटाहट करके आलस्य रूपी कुंभकर्ण पर डालने लगे। अर्थात् बुद्धि के भावों ने दृढ़ता करने का प्रयास किया, जिससे आलस्य का प्रभाव उनपर नहीं पड़े।
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा।।
मुरयो न मनु तनु टरयो न टारयो। जिमि गज अर्क फलनि को मारयो।।
व्याख्या : नाना स्तर के दृढ़ता रूपी पर्वतों व शिखरों का बुद्धि के भाव एक ही बार में उसके (आलस्य) ऊपर प्रहार करते हैं परन्तु आलस्य भाव का मन व तन हिला-डुला भी नहीं जैसे आक के फलों के मारने से हाथी नहीं टलता है। अर्थात् बुद्धि के भावों की दृढ़ता का आलस्य रूपी कुंभकर्ण के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। परयो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो।।
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने दृढ़ प्रेरणा रूपी मुष्टिका का प्रहार किया, जिससे आलस्य रूपी कुंभकर्ण व्याकुल हो गया और सिर धुनने लगा अर्थात् आलस्य का प्रभाव कुछ क्षण के लिए कम गया। फिर उठकर आलस्य के भाव ने अनन्य बुद्धि के भाव को मारा, जिससे अनन्य बुद्धि का भाव भी गिर गया अर्थात् आलस्य के प्रभाव में आ गया।
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहाँ पटकि पटकि भट डारेसि।।
चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई।।
व्याख्या : फिर नल-नील रूपी निसंग बुद्धि के भावों को जमीन पर गिरा दिया और जहँ-तहँ बुद्धि के भाव रूपी वानरों को मारने लगा अर्थात् आलस्य का प्रभाव बुद्धि के भावों पर पड़ने लगा। ऐसी अवस्था में बुद्धि के भावों की सेना परास्त होकर भागने लग जाती है। क्योंकि आलस्य की प्रबलता बढ़ने से कोई भी भाव आलस्य रूपी कुम्भकर्ण के सामने नहीं आ पाता है।
दो0 अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।
काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव।।65।।
व्याख्या : आलस्य रूपी कुंभकर्ण दृढ़ बुद्धि रूपी अंगदादि भावों को मूर्छित करके और सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को काँख में दबाकर अर्थात् सद्बुद्धि के भाव को भी वश में करके असीम बलवान आलस्य रूपी योद्धा चला। वास्तव में आलस्य का भाव जब प्रबल होता है, तो सब भाव उसके वश में हो जाते हैं।
उमा करत रघुपति नरलीला। खेल गरुड़ जिमि अहिगन मीला।।
भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आत्मा रूपी राम तो नर की धड़कन के अनुसार चलते हैं अर्थात् धड़कन की गति के अनुसार आत्मा की गति होती है। इसलिए ये खेल तो वैसे ही होता है, जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ खेल रहा हो। जो आत्म तत्व भृकुटि पर नर की धड़कन से समय (काल) की सीमा को भी लाँघ जाता है। उसके लिए आलस्य रूपी कुंभकर्ण से ऐसी लड़ाई करना क्या शोभा देता है? अर्थात् आत्मा पर आलस्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता है परन्तु आत्मा तो नर की धड़कन के अनुसार चलने के कारण आलस्य का भाव बुद्धि के भावों को मूर्छित कर वश में कर सकता है।
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भव निधि नर तरिहहिं।।
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा।।
व्याख्या : जब जगत के भावों की पवित्रता का यश फैलता है, तो नर की धड़कन से उत्पन्न भाव रूपी भव सागर पार हो जाता है अर्थात् सांसारिक भावों में पवित्रता आने पर नर की धड़कन भावों के भव सागर को पार करा देती है। उस अवस्था में जब नर की धड़कन पवित्र होने लग जाती है, तो अनन्य बुद्धि का भाव पुन: प्रबल हो उठता है। उसी को हनुमान की मूर्छा टूटना बोलकर बताया गया है। जब अनन्य भाव प्रबल हो उठता है, तो वह सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को खोजने लगता है।
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती।।
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना।।
व्याख्या : जब अनन्य भाव प्रबल हो उठता है, तो सद्बुद्धि के भाव को भी बल मिल जाता है। उसी को सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव की मूर्छा टूटना बोलकर बताया है। जब सद्बुद्धि की मूर्छा टूटती है, तो वह आलस्य के चंगुल से मरे हुए के समान खिसक जाता है। तब इन्द्रियों व नासिका को वश में करके सद्बुद्धि का भाव उर्ध्वगामी होकर आकाश में उठने लगता है।
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाँघव उठि पुनि तेहि मारा।।
पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना।।
व्याख्या : तब आलस्य के भाव ने सद्बुद्धि के भाव का पैर पकड़ कर आलस्य की भाव भूमि पर गिरा दिया। परन्तु अति फूर्ति के साथ उठकर सद्बुद्धि के भाव ने पुन: आलस्य रूपी कुंभकर्ण को मारा। फिर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव का भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा की जय-जयकार करता हुआ आत्मा रूपी राम के पास आया। अर्थात् सद्बुद्धि का भाव आलस्य के प्रभाव से मुक्त होकर आत्मा के पास आ गया।
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी।।
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा।।
व्याख्या : जब आलस्य रूपी कुंभकर्ण ने देखा कि नाक अर्थात् गंध व कान यानी शब्द आलस्य के प्रभाव से मुक्त हो गए हैं, तो उसके मन में बहुत ग्लानी पैदा हो गयी। इसलिए आलस्य का भाव क्षुब्ध होकर वापिस लौटा। आलस्य का भाव तो सहज में ही बलवान होता है, अत: उसे देखकर बुद्धि के भावों के दल में त्रास पैदा हो गयी।
दो0 जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह।।66।।
व्याख्या : तब बुद्धि के भाव आत्मा रूपी राम की जय हो, जय हो, जय हो बोलकर कर दौड़े और एक ही साथ दृढ़ता रूपी पर्वतों व वृक्षों को आलस्य रूपी कुंभकर्ण के ऊपर डालने लगे अर्थात् सभी बुद्धि के भाव दृढ़ता के साथ आलस्य के भाव से भिड़ गए।
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा।।
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व के युद्ध में आलस्य का भाव प्रतिकूल होकर ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह नाना स्तर (कोटि) के बुद्धि के भावों का भक्षण करने लगा। जो ऐसा लग रहा था मानो टिड़ी का दल ही किसी गुफा में घूस रहा हो।
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा।।
मुख नासा श्रवनन्हि की बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा।।
व्याख्या : वह नाना स्तर (कोटि) के बुद्धि के भावों को अपने शरीर से मसलने लगा और नाना प्रकार के बुद्धि के भावों को धूल में मिला दिया अर्थात् निस्तेज कर दिया। मुख, नाक व कान के रास्ते से बुद्धि के भाव निकल-निकल कर भागने लगे। अर्थात् शब्द, गंध व रस के माध्यम से बुद्धि के भाव आलस्य के चंगुल से भागने लगे।
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा।।
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व के मद में आलस्य रूपी निशाचर ऐसे चला मानों समस्त भाव जगत ही उसको अर्पण कर दिया हो और वह सब को खा डालेगा। ऐसी अवस्था में बुद्धि के भाव रूपी योद्धा भागने लगे तथा लौटाने पर भी नहीं लौटते अर्थात् बुद्धि के भाव आलस्य के भाव के सामने असहाय हो गए। बुद्धि के भावों को कुछ भी नहीं सूझने लगता है अर्थात् बुद्धि के भाव आलस्य की प्रबलता के सामने असहाय हो गए।
कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी।।
देखी राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई।।
व्याख्या : जब आलस्य रूपी कुंभकर्ण ने बुद्धि के भावों रूपी वानर सेना को तितर-बितर कर दिया, तो आसुरी भावों की सेना दौड़ी चली आयी। यथार्थ में यही होता है जब बुद्धि के भाव कमजोर पड़ जाते हैं, तो आसुरी भाव प्रबल हो उठते हैं। उसी भावअवस्था का यहाँ प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। जब आत्मा रूपी राम ने बुद्धि बल की सेना को व्याकुल देखा और आसुरी भावों की सेना को नाना प्रकार से प्रबल होते देखा तो --।
दो0 सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिव नैन।।67।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव, वैराग्य रूपी विभीषण व लखन भाव रूपी लक्ष्मण! तुम भाव रूपी सेना को सँभालो। इस आलस्य रूपी निशाचर को मैं देखता हूँ।
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा।।
प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम हाथ में प्रेरणा रुपी बाण लेकर तथा कमर में संयम रूपी तरकश बाँधकर आसुरी भावों रूपी शत्रु का दमन करने के लिए चले। सबसे पहले आत्मा रूपी राम ने सद्प्रेरणा रूपी हुँकार भरी तो आसुरी भाव बहरे हो गए। अर्थात् आसुरी भावों को शब्द का बल मिलना बन्द हो गया।
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा।।
व्याख्या : तब सत्य स्वरूप आत्मा रूपी राम ने आसुरी भावों को लक्ष्य करके प्रेरणा रूपी बाण चलाए, जो आसुरी भावों का कालसर्प के समान पीछा करने लगे। जहाँ-तहाँ बहुत से प्रेरणा रूपी बाण चले, जिनसे भयंकर आसुरी भाव रूपी योद्धा मरने लगे।
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा।।
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं।।
व्याख्या : आसुरी भावों के सिर, छाती, पैर व भुजाएँ कटने लगे अर्थात् आसुरी भावों का प्रभाव कमने लगा। कुछ आसुरी भाव तो सत खंड अर्थात् आत्मा में लीन होकर सत्य का ही स्वरूप हो गए। कुछ आसुरी भाव घूम-घूम कर भाव भूमि पर पड़ने लगे और कुछ सँभल कर पुन: लड़ने लगे।
लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं।।
रूंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। ध डिग्री ध डिग्री मा डिग्री मा डिग्री धुनि गावहिं।।
व्याख्या : प्रेरणा रूपी बाण लगते ही आसुरी भाव मेघ के समान गर्जने लगते हैं। बहुत से आसुरी भाव तो प्रेरणा रूपी बाणों को देखकर भागने लगते हैं। प्रेरणा रूपी बाणों से वासना रूपी सिर कट जाने पर भी आसक्ति रूपी धड़ तेजी से दौड़ने लगते हैं और पकड़ो मारो की ध्वनि करने लगते हैं।
दो0 छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच।।68।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी बाणों ने क्षण मात्र में बहुत से आसुरी भावों को काट डाला। फिर वे सब प्रेरणा रूपी बाण वापिस आत्मा में ही लीन हो गए।
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति छन माझ निसाचर धारी।।
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा।।
व्याख्या : तब आलस्य रूपी कुंभकर्ण के भाव ने विचार किया कि क्षण मात्र में आत्मा रूपी राम ने आसुरी सेना को मार गिराया। तो आलस्य का भाव बहुत अधिक क्षुब्ध हो उठा और सिंह के समान गम्भीर गर्जना करने लगा।
कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी।।
आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे।।
व्याख्या : वह आलस्य रूपी कुंभकर्ण क्रोधित होकर शरीर में आसक्ति रूपी पर्वतों को उखाड़ लेता और जहाँ बुद्धि के भाव होते वहाँ डाल देता। तब विशाल प्रमाद रूपी पर्वत आते देखकर प्रेरणा रूपी बाणों से आत्मा रूपी राम ने उन्हें धूल के समान कर दिया।
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक।।
तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं।।
व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने सहज क्रोध करते हुए प्रेरणा रूपी धनुष को चढ़ाया और बहुत से संयम व विरक्ति रूपी बाण चलाए। वे संयम व विरक्ति रूपी बाण आलस्य रूपी कुंभकर्ण के शरीर में प्रवेश करते हैं और निकल जाते हैं। जैसे बिजली कड़क कर बादलों में समा जाती है।
सोनित स्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे।।
विकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए।।
व्याख्या : आलस्य रूपी कुंभकर्ण के शरीर से प्रमाद रूपी रक्त बहता हुआ उसके तामसिक स्वरूप पर ऐसा लग रहा था जैसे काजल के पहाड़ से गेरु का नाला बह रहा हो। उस आलस्य के भाव को व्याकुल देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू उसके निकट दौड़े चले आए। तब बुद्धि के भाव रूपी वानर-भालूओं को निकट देखकर आलस्य का भाव जोर से हँसा। अर्थात् बुद्धि के भावों का उपहास उड़ाया।
दो0 महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस।।69।।
व्याख्या : तब आलस्य का भाव महानाद करते हुए गरजा और नाना प्रकार (कोटि) के वानरों को पकड़कर पटकने लगा तथा काम रूपी रावण की दुहाई देने लगा। अर्थात् क्रोधित होकर आलस्य का भाव पुन: बुद्धि के भावों को वश में करने लगा।
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरुथा।।
चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी।।
व्याख्या : आलस्य के भाव को क्षुब्ध हुआ देखकर बुद्धि के भालू व वानर रूपी भाव ऐसे दौड़ने लगे जैसे भेड़िए को देखकर भेड़ें दौड़ने लगती हैं। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! बुद्धि के भाव भागने लगे और व्याकुल होकर आर्त पुकार करने लगे।
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।।
कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव आपस में कहने लगे कि आलस्य का भाव रूपी राक्षस अकाल के समान है, जो बुद्धि के भावों रूपी वानरों के देश में पड़ना चाहता है। आत्मा ही मेघ के समान है। इसलिए हे आलस्य के शत्रु आत्मा रूपी राम! आप हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना।।
राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली।।
व्याख्या : बुद्धि के भावों की करुण पुकार सुनकर आत्मा रूपी राम सद्प्रेरणा रूपी बाणों को सँवार कर चले। अब आत्मा स्वयं बुद्धि के भावों के आगे चली अर्थात् आत्मा स्वयं प्रकाश करती हुई आसुरी भावों से लड़ने को चली।
खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने।।
लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा।।
व्याख्या : संकल्प रूपी धनुष को चढ़ाकर सत अर्थात् सहजता रूपी बाणों का संधान किया, जो आसुरी भाव के शरीर में जाकर लग गए। आलस्य का भाव सहजता रूपी बाणों के लगने से क्षुब्ध होकर दौड़ा, जिससे ध्यान में शरीर रूपी पृथ्वी हिलने लग गयी।
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी।।
धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी।।
व्याख्या : तब आलस्य रूपी कुम्भकर्ण ने प्रमाद रूपी पर्वत उठा लिया तो आत्मा रूपी राम ने प्रमाद के भाव रूपी भुजा को ही काट डाला। फिर वह बायीं भुजा में अर्थात् प्रतिकूल अवस्था में प्रमाद रूपी पर्वत को लेकर दौड़ा तो आत्मा रूपी राम ने वह बायीं भुजा भी काट दी।
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा।।
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका।।
व्याख्या : आलस्य की भाव रूपी भुजा कट जाने पर वह आसुरी भाव ऐसे लग रहा था जैसे पंखहीन मन के अन्दर मंथन चल रहा हो अर्थात बिना तरंगों के मानों मन का मंथन चल रहा हो। मन के अन्दर चलने वाला मंथन ही मंदराचल पर्वत का प्रतीक होता है। उस अवस्था में आलस्य का भाव क्षुब्ध होकर आत्मा को देखने लगता है और ऐसा लगने लगता है मानो वह तीनों लोकों को ही ग्रस जायेगा अर्थात् ऐसा लगने लगता है मानो वह आत्मा को ही अपने वश में कर लेगा।
दो0 करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि।।70।।
व्याख्या : उस अवस्था में क्षुब्ध होकर अति प्रबल होकर आलस्य का भाव चिंघाड़ता हुआ अपने प्रभाव को बढ़ाता हुआ दौड़ा। उसे देखकर मस्तिष्क रूपी आकाश के सब स्वर व कोश भयभीत होकर हा हा पुकारने लगे अर्थात् स्वर व कोश भय से कम्पित हो उठे।
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।।
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने दैवीय भावों को भयभीत जाना तो संकल्प रूपी बाण को शब्द (श्रवण) का बल दिया और सद्प्रेरणा रूपी बाणों से आलस्य रूपी कुंभकर्ण का मुख भर दिया। तब भी आलस्य का भाव भूमि पर नहीं गिरा अर्थात् आलस्य का भाव शान्त नहीं हुआ।
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा।।
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा।।
व्याख्या : सद्प्रेरणा रूपी बाणों से भरा मुख लेकर भी आलस्य रूपी कुंभकर्ण सामने दौड़ा, मानो जीवित काल ही आ रहा हो। तब आत्मा रूपी राम ने दृढ़ संकल्प करके सद्प्रेरणा का बाण मारा और आलस्य के भाव का सिर धड़ से अलग कर दिया।
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।।
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा।।
व्याख्या : वो आलस्य रूपी कुम्भकर्ण का सिर काम रूपी रावण के आगे जाकर गिरा। जिसे देखकर काम का भाव वैसे ही व्याकुल हो गया जैसे मणि के खो जाने पर सर्प व्याकुल हो जाता है। उस अवस्था में आलस्य रूपी कुंभकर्ण का धड़ दौड़ा चला जा रहा था, जिससे शरीर रूपी पृथ्वी धँसी जाती थी। तब आत्मा रूपी राम ने उस धड़ के दो टुकड़े कर डाले। अर्थात् आलस्य की आदत की आसक्ति को भी काट डाला।
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर।।
तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना।।
व्याख्या : आलस्य रूपी कुंभकर्म का धड़ ऐसे पड़ा जैसे आकाश से पर्वत गिरा हो। उसके धड़ के नीचे बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू दब गए। तब आलस्य के भाव का तेज आत्मा में लीन हो गया। तब सभी देव भावों व मन के भावों ने आश्चर्य माना।
सुर दुंदुभी बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरसहिं।।
करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेहि समय देवरिषि आए।।
व्याख्या : जब आलस्य का भाव आत्मा में लीन हो जाता है, तो स्वरों में नगाड़ों की आवाजें आने लगती हैं और हर्ष छा जाता है। उस अवस्था में मन में अच्छे भाव बरसने लगते हैं। उस अवस्था में देव भाव प्रार्थना करके सहज होने लग जाते हैं। उस अवस्था में मन का नारद भाव भी प्रकट हो जाता है।
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रूचिर बीररस प्रभु मन भाए।।
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।।
व्याख्या : मन के नारद भाव ने मस्तिष्क रूपी आकाश से आत्मा रूपी राम के गुणों का बखान किया, जो आत्मा रूपी राम को रूचिकर व वीर रस युक्त लगे। मन के नारद भाव ने कहा कि जल्दी से काम रूपी रावण का वध करो और मन का नारद भाव चला गया। उसके बाद आत्मा रूपी राम भाव द्वन्द्व की भूमि में आकर सुशोभित हुए।
छ0 संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।
श्रम बिंदु मुख राजीवलोचन अरून तन सोनित कनी।।
भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।
कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की युद्ध भूमि में आत्मा रूपी राम जो अतुल्य बल के स्वामी हैं और कमल के समान लाल नेत्र हैं तथा शरीर पर रक्त के कण हैं। दोनों भाव रूपी भुजाओं से प्रेरणा रूपी बाणों को फेर रहे हैं और बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू चारों ओर हैं। तुलसीदास कहते हैं कि ध्यान में अनुभव आने वाले आत्मा के स्वरूप की शोभा का वर्णन कोई नहीं कर सकता है। शेष बोलकर भी वर्णन सम्भव नहीं है। शेष का मतलब है जो वर्णन करते-करते शेष बच जाए। परन्तु आत्मा के स्वरूप की शोभा का तो कोई शेष नहीं है।
दो0 निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम।।71।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जो आलस्य रूपी राक्षस नीच, अधम व विकारों से युक्त था, उसे भी आत्मा रूपी राम ने अपने में लीन कर लिया। इसलिए वे लोग मूर्ख होते हैं, जो ऐसे परमात्मा का भजन नहीं करते हैं।
दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।।
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा।।
व्याख्या : दिन के व्यतीत हो जाने पर दोनों तरफ की सेनाएँ लौट गयी। भाव द्वन्द्व के युद्ध में योद्धाओं को बहुत परिश्रम करना पड़ा। आत्मा रूपी राम की कृपा से बुद्धि के भाव रूपी वानरों का बल बढ़ गया अर्थात् आत्म बल से बुद्धि के भावों का बल बढ़ गया। जैसे घास को पाकर अग्नि प्रबल हो उठती है।
छीजहिं निसिचर दिनु अ डिग्री राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।।
बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।।
व्याख्या : रात दिन आसुरी भावों का वैसे ही नाश होने लगता है, जैसे निज मुख से पुण्यों का बखान करने पर पुण्यों का नाश हो जाता है। दस इन्द्रियों को सिर के रूप में धारण करने वाला काम रूपी रावण बहुत विलाप करने लगता है और आलस्य रूपी कुंभकर्ण के सीस को बार-बार हृदय से लगाने लगता है।
रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी।।
मेघनाथ तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ।।
व्याख्या : आसुरी भावों की नाड़ियों से उस अवस्था में हार्मोन स्रवित होकर शेष होने लग जाता है। उसी को नारियों का हृदय पीटकर रोना बताया गया है। आलस्य रूपी कुंभकरण के बल व तेज का बखान कर-करके समस्त आसुरी भावों की नाड़ियाँ विलाप करने लगती हैं अर्थात् व्याकुल हो उठती हैं, तब उस अवस्था में अहंकार रूपी मेघनाद का भाव प्रकट होता है और काम रूपी रावण को नाना प्रकार से ढाँढ़स बँधाने लगता है।
देखेहु कालि मोर मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई।
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद बोला कि कल मेरी मन की शक्ति (मनुसाई) को देखना। अब तो मैं मेरी क्या बड़ाई करूँ? मैंने मेरे इष्टदेव अर्थात् चित की मूल अवस्था से बल व वृति को प्राप्त किया है जिसको तो मैंने आपको (काम) भी नहीं बताया है। वास्तव में अहंकार की अनेक वृतियाँ होती हैं, जिन्हें पूरी तरह से समझना बहुत कठिन कार्य होता है।
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना।।
इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा।।
व्याख्या : इस प्रकार कल्पना करते-करते नव स्फूर्ति रूपी सबेरा हो आया और चारों द्वारों (सत, रज, तम व गुणातीत) पर बुद्धि के भाव रूपी वानर आ गए। भाव द्वन्द्व की इस अवस्था में एक तरफ तो बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू थे और दूसरी तरफ अति बलवान आसुरी भावों रूपी योद्धा थे।
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व में दोनों तरफ के भाव रूपी योद्धा अपनी-अपनी जय के लिए लड़ने लगे। उस भाव द्वन्द्व का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
दो0 मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास।।72।।
व्याख्या : तब अहंकार का भाव भावों में मिलकर मस्तिष्क रूपी आकाश में चढ़कर अट्टहास करके गरजा। जिससे बुद्धि के भाव रूपी वानरों में भय फैल गया।
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।।
डारइ परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की उस अवस्था में अहंकार का भाव शक्ति, अर्थात् आसक्ति, दु:ख व इच्छाओं का वार कर करके प्राण के माध्यम से नाना प्रकार के भाव रूपी अस्त्र-शस्त्रों, हथियारों, फरसा, परिघ (प्रकृति का प्रभाव) पाषान अर्थात् जड़ता रूपी भावों, व वासना रूपी बाणों की वर्षा करने लगा।
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई।।
ध डिग्री ध डिग्री मा डिग्री सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद ने दसों दिशाओं अर्थात् दसों प्राणों में अहंकार के बाणों की वर्षा कर दी। जो ऐसा लग रहा था मानों मघा नक्षत्र ने वर्षा की झड़ी लगा दी हो। चारों तरफ को पकड़ो-पकड़ो व मारो-मारो की आवाज सुनायी दे रही थी अर्थात् चारों तरफ अहंकार की ध्वनि सुनायी दे रही थी। परन्तु कौन मार रहा था, वो पता नहीं चल रहा था। वास्तव में जब जीवात्मा पर अहंकार का हमला होता है, तो उसे पता ही नहीं चल पाता है कि कैसे अहंकार मारता है।
गहि गिरि त डिग्री अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिर आवहिं।।
अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर।।
व्याख्या : दृढ़ता रूपी पर्वतों व वृक्षों को लेकर बुद्धि के भाव रूपी वानर मस्तिष्क रूपी आकाश में दौड़ते हैं परन्तु अहंकार का भाव समझ में नहीं आ पाता है, इसलिए दु:खी होकर लौट आते हैं। क्योंकि अहंकार रूपी मेघनाद ने अंहता रूपी बाणों से समस्त नाड़ियों रूपी अवघट, कोश रूपी घाटों, श्वास रूपी राह और गुप्त नाड़ियों रूपी कंदराओं को पाट दिया अर्थात् अंहता के बाणों से पिंजरा बना दिया यानी वश में कर लिया।
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर।।
मारूत सुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला।।
व्याख्या : ऐसी अवस्था में बुद्धि के भाव रूपी वानर जाए तो कहाँ जाएँ? ऐसा सोचकर व्याकुल हो गए। मानो चित (स्वरों का स्वामी उ सुरपति) मन के अन्दर (मंदर) कैद हो गया हो। उस अवस्था में प्राण से उत्पन् अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान, दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, निसंग बुद्धि रूपी नल-नील ये सब बलशाली बुद्धि के भाव व्याकुल हो गए।
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन।।
पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा।।
व्याख्या : फिर अहंकार के भाव ने लखन भाव, सद्बुद्धि के भाव (सुग्रीव) व वैराग्य (विभीषण) के भावों को भी अहंता रूपी बाण मार कर घायल कर दिया। फिर अहंकार का भाव आत्मा के साथ ही द्वन्द्व युद्ध करने लगा और अहंकार द्वारा छोड़े गए अहंता के भाव रूपी बाण सर्प बनकर लगने लगे।
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी।।
नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतन्त्र एक भगवाना।।
व्याख्या : उस अवस्था में अहंता रूपी सर्पों के बन्धन में आत्मा रूपी राम बँध गए अर्थात् आत्मा अहंता के आसुरी भाव से आच्छादित हो गयी। जद्यपि आत्मा का स्वभाव स्ववश, अनन्त व निर्विकारी होता है। परन्तु भावों से आच्छादित होने पर आत्मा भावों के अनुरूप चरित करने लगती है। जबकि आत्मा का वास्तविक स्वरूप स्वतंत्र और प्रकृति को धारण करने वाला होता है।
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की शोभा के लिए ही आत्मा रूपी राम ने अपने आपको अहंता रूपी नाग पाश में बँधा लिया अर्थात् भावों के द्वन्द्व को चलाने के लिए अहंता का होना जरूरी है, वरना आत्मा तो भावातीत होती है। अहंता रूपी नाग पाश को देखकर दैवीय भावों को भय लग आया।
दो0 गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।
सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास।।73।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जिस परमात्मा का नाम जपकर मुनि लोग भावों के बंधन को काट लेते हैं, वो परमात्मा जो कि सर्वव्यापक व विश्व रूप है क्या कभी अहंता के बंधन में बँध सकता है?
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।।
अस बिचारी जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आत्मा का चरित गुणों के अनुसार बनता है, इसलिए तर्क व बुद्धि के बल पर आत्मा के मर्म को नहीं जाना जा सकता है। ऐसा विचारकर जो वैराग्यवान साधक होते हैं, वे तर्क को छोड़कर परमात्मा का भजन करते हैं।
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा।।
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद ने बुद्धि के भावों की सेना को व्याकुल कर दिया और वासनायुक्त वचन कहता हुआ प्रकट हो गया। तब धीर बुद्दि रूपी जामवंत ने कहा कि अरे! मूर्ख! तू खड़ा रह मैं अभी देखता हूँ। यह सुनकर अहंकार का भाव क्षुब्ध हो उठा।
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही।।
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद धीर बुद्धि रूपी जामवंत से बोला कि मैं (अहंकार) तो तुम्हें बूढ़ा (धीर) जानकर छोड़ रहा था। अरे अधम! अब तू ही मुझ अहंकार को ललकारने लगा है। वास्तव में अहंकार का भाव धीर बुद्धि के भाव से नहीं भिड़ना चाहता है। परन्तु धीर बुद्धि का भाव अहंकार को सहज में ही चुनौती देने वाला होता है। इसलिए धीर बुद्धि की चुनौती से क्षुब्ध होकर अहंकार रूपी मेघनाद ने तीन गुणों रूपी त्रिशूल चला दिया। परन्तु धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने वह त्रिशूल पकड़ लिया अर्थात तीनों गुणों के मर्म को धीर बुद्धि के भाव ने समझ लिया। जब गुणों का मर्म समझ में आ जाता है, तो वह गुणों के त्रिशूल छोड़ने वाले अहंकार पर ही भारी पड़ जाता है। उसी को धीर बुद्धि रूपी जामवंत द्वारा वही त्रिशूल लेकर दौड़ना बताया गया है।
मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती।।
पुनि रिसान गहि चरन फिरायो। महि पछारि निज बल देखरायो।।
व्याख्या : उसी त्रिगुण रूपी त्रिशूल को धीर बुद्धि के भाव रूपी जामवंत ने अहंकार रूपी मेघनाद की छाती में मारा, जिससे अहंकार का भाव विचलित होकर पड़ गया। अर्थात् अहंकार का गुणों के माध्यम से मर्म जानने में आ जाने पर धीर बुद्धि का भाव प्रबल हो उठता है और अहंकार विचलित हो उठता है। तब धीर बुद्धि के भाव ने अहंकार के भाव का पैर पकड़ कर अर्थात् अहंकार को मूल से समझकर घुमा दिया और जमीन पर गिरा कर अपना (धीर बुद्धि) बल दिखला दिया।
बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा।।
इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो।।
व्याख्या : परन्तु अहंकार का भाव वृति के कारण मरने में नहीं आ पा रहा था। इसलिए उसका पैर पकड़ कर वासना रूपी लंका में डाल दिया। अर्थात् अहंकार की बुद्धि के भावों से निवृति कर दी। इधर को आत्मा को अहंता के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मन के नारद भाव ने ज्ञान रूपी गरूड़ को भेजा। जो तुरन्त आत्मा रूपी राम के पास आ गया। वास्तव में जब आत्मा अहंता के आसुरी भाव से आच्छादित हो जाती है तो फिर केवल ज्ञान का भाव ही उस अहंता के प्रभाव को मिटा सकता है। उसी को गरुड़ के आने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
दो0 खगपति सब करि खाए माया नाग बरुथ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ।।74(क)।।
व्याख्या : ज्ञान रूपी गरुड़ के भाव ने माया से उत्पन्न अहंता के सब भाव रूपी नागों को खा लिया। जिससे आसुरी भावों की माया का निवारण हो गया और बुद्धि के भाव प्रसन्न हो गए।
दो0 गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।
चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराई।।74(ख)।।)
व्याख्या : तब बुद्धि के भाव प्रबल होकर पर्वत, वृक्ष, पत्थर व नाखूनों को धारण किए दौड़े और आसुरी भावों को व्याकुल करते हुए वासना रूपी लंका के दुर्ग पर चढ़ गए।
मेघनाद कै मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी।।
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा।।
व्याख्या : तब अहंकार के भाव की मूर्छा टूटी तो अपने आपको काम रूपी पिता के सामने देखकर बहुत लज्जा हुई। तब वह तुरन्त भाव द्वन्द्व में अजय होने के लिए दृढ़ता रूपी पर्वत की गुफा में चला गया। अर्थात् अहंकार के भाव ने अपने-आपको अजय करने के लिए दृढ़ता रुपी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर लिया। अर्थात् अहंकार का भाव विशेष कोश में प्रवेश कर गया।
इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा।।
मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन।।
व्याख्या : इधर को वैराग्य रूपी विभीषण ने मंत्रणा की और आत्मा रूपी राम से कहा कि हे अतुलनीय बलशाली व उदार प्रभु! अहंकार का भाव अपान प्राण से बल प्राप्त करके दैवीय भावों को सताता है।
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि।।
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना।।
व्याख्या : हे प्रभु! अगर अहंकार का भाव अपान प्राण में सिद्ध हो जायेगा तो पुन: उसको जीतना असम्भव हो जायेगा। आत्मा रूपी राम ने वैराग्य रूपी विभीषण की बात को बहुत सराहा और दृढ़ बुद्धि रूपी अंगदादि भावों से बोले।
लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई।।
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही।।
व्याख्या : हे बुद्धि के भावों! तुम लखन भाव के साथ जाकर अहंकार के यज्ञ का विध्वंस कर दो और लखन भाव तुम उसके लक्षणों को लख कर भाव द्वन्द्व के युद्ध में मार दो। क्योंकि दैवीय भावों को दु:खी देखकर मुझ आत्मा को बहुत पीड़ा होती है।
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई।।
जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनउ जन।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि तुम अहंकार के आसुरी भाव को बल व बुद्धि के उपाय से मारना अर्थात् उसके लक्षणों को लखकर बुद्धि का सहारा लेकर मारना। क्योंकि लक्षणों को जान लेने से और बुद्धि द्वारा समझ लेने से आसुरी भाव का क्षय शु डिग्री हो जाता है। धीर बुद्धि रूपी जामवंत, सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव व वैराग्य रूपी विभीषण तुम तीनों लखन भाव के साथ रहना।
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन।।
प्रभु प्रताप उर धरि रन धीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा की तो निसंगता के बाणों को सजाकर और आत्मा रूपी राम के प्रताप को हृदय में धारण करके लखन भाव रूपी रणधीर मेघ के समान गम्भीर वाणी बोला।
जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं।।
जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई।।
व्याख्या : जो आज मैं बिना अहंकार का नाश किए आऊँ तो मैं आत्मा का सेवक नहीं कहाऊँ। अगर सात्विक अहंकार बनकर भी वह (अहंकार) बचने की कोशिश करेगा, तो भी मैं उसे मार डालूँगा। मैं आत्मा की शपथ खाकर कहता हूँ। लखन भाव कहना चाहता है कि अहंकार का भाव चाहे सात्विक रूप धारण करके भी मेरी शंका का समाधान करने का प्रयास करेगा, तो भी मैं उसे नहीं छोड़ूँगा। वास्तव में अहंकार का भाव जब सात्विकता में प्रवेश कर जाता है, तो उसे मारना बहुत कठिन हो जाता है।
दो0 रघुपति चरन नाइ सि डिग्री चलेउ तुरंत अनंत।
अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत।।75।।
व्याख्या : तब लखन भाव दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, निसंग बुद्धि रूपी नल-नील, मैं का अन्त रूपी मयंद व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को साथ लेकर आत्मा रूपी राम को सीस झुकाकर चला। अर्थात् पूरी तरह आत्मोन्मुखी होकर अहंकार से भिड़ने चला।
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रूधिर अ डिग्री भैंसा।।
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने देखा अर्थात् समझा कि अहंकार का भाव अज्ञान रूपी भैंसों और आसक्ति रूपी रक्त की अपान वायु में आहूति दे रहा है। तब बुद्धि के भावों ने अपान वायु के यजन का विध्वंस कर दिया। तब भी अहंकार का भाव विचलित नहीं हुआ तो उसकी प्रशंसा करने लगे। इस चौपाई में बहुत बड़ा वैज्ञानिक रहस्य बताया गया है। वास्तव में जब अहंकार का भाव गहराई में छुप जाता है, तो वह पकड़ में नहीं आ पाता है और साधक को भ्रम हो जाता है कि वह तो अहंकार विहीन है। परन्तु प्रशंसा करने पर अहंकार का भाव प्रकट हो जाता है। इसलिए बुद्धि के भाव अहंकार की प्रशंसा करने लगते हैं।
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई।।
लै त्रिसूल धावा कपि भागे। आए जहाँ रामानुज आगे।।
व्याख्या : जब अहंकार का भाव प्रशंसा से भी नहीं हिला तो बुद्धि के भाव उसे लात मारकर और बाल नोचकर दौड़ चले। वास्तव में जब अहंकार का भाव प्राण में सात्विक होकर रमण करता है तो वह प्रशंसा करने पर प्रकट हो जाता है परन्तु जब अहंकार अपान वायु में रमण करता है तो उसकी वृति तामसिक होती है और वह घोर अपमान की अवस्था में ही प्रकट होता है। यहाँ पर वानरों द्वारा लात मारना व बाल नोचना अहंकार के अपमान का ही प्रतीक है। अत: अपमानित होकर अहंकार का भाव तीनों गुणों में व्याप्त हो उठता है। उसी को तीन गुण रूपी त्रिशूल लेकर दौड़ना बताया गया है। जब अहंकार तीनों गुणों में दौड़ पड़ता है, तो उसके लक्षण प्रकट हो जाते हैं। उसी को लखन भाव रूपी लक्ष्मण के अहंकार रूपी मेघनाद का सामने आना बताया गया है।
आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा।।
कोपि मारुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए।।
व्याख्या : उस अवस्था में अत्यंत क्षुब्ध होकर अहंकार का भाव दौड़ा और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। तब क्रोधित होकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान और दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद दौड़े। परन्तु अहंकार के भाव ने तीन गुणों का त्रिशूल छाती में मारकर दोनों को गिरा दिया अर्थात् अनन्य बुद्धि और दृढ़ बुद्धि भी अहंकार के त्रिगुणात्मक प्रभाव में आ गए।
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा।।
उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा।।
व्याख्या : तब आत्मा को लक्ष्य करके अहंकार के भाव ने भयंकर त्रिशूल छोड़ा जिसे लखन भाव ने लखकर दो टुकड़े कर दिए। तब अनन्य बुद्धि व दृढ़ बुद्धि के भावों ने पुन: अहंकार के भाव पर आक्रमण किया परन्तु उसको (अहंकार) चोट लग ही नहीं रही थी। अर्थात् अनन्य बुद्धि व दृढ़ बुद्धि का प्रभाव ही नहीं पड़ रहा था।
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा।।
आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला।।
व्याख्या : अहंकार रूपी मेघनाद मारने पर भी नहीं मरता, यह देखकर बुद्धि के भाव रूपी वीर योद्धा लौट आए। तब अहंकार का भाव चिंघाड़ करता हुआ दौड़ा। तब उसे अति क्षुब्ध हुआ आता देखकर लखन भाव ने भयानक बाण छोड़े।
देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना।।
बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई।।
व्याख्या : बज्र के समान लक्षणों को लखने वाले बाणों को आता देखकर अहंकार का आसुरी भाव अन्तर्ध्यान हो गया अर्थात् अहंकार ने अपने आपको छुपा लिया और नाना प्रकार से स्वरूप बदल कर अहंकार का भाव लड़ाई लड़ने लगा। वह कभी प्रकट हो जाता तो कभी अप्रकट हो जाता। वास्तव में, अहंकार के भाव की यही विशेषता होती है कि वह अपना स्वरूप तुरन्त बदल लेता है।
देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।।
लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा।।
व्याख्या : अहंकार रूपी शत्रु को अजय देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर डर गए। तब लक्षणों को लखने वाला लखन भाव बहुत क्रोधित हो गया। लखन भाव के मन में तब यह विचार दृढ़ हो गया कि इस चिंताकारक (पापी) अहंकार को मैंने बहुत खिलाया है।
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा।।
छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा।।
व्याख्या : तब लखन भाव ने आत्मोन्मुखी होकर लक्षण रूपी बाण का संघान किया, जो अहंकार रूपी मेघनाद की छाती में जाकर लग गया। अर्थात् ठीक तरह से अहंकार के लक्षण समझ में आ गए। मरते हुए अहंकार के भाव ने सब कपट का त्याग कर दिया अर्थात् लक्षण पकड़ में आते ही अहंकार का भाव निष्कपट हो गया।
दो0 रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान।।76।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम कहाँ है? आत्मा के छोटे भाव रूपी भाई लक्ष्मण कहाँ है? ऐसा कहकर अहंकार का भाव प्राणों का त्याग कर दिया। यह देखकर दृढ़बुद्धि व अनन्य बुद्धि हनुमान ने कहा कि तेरी जननी धन्य है।
बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो।।
तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा।।
व्याख्या : जब अहंकार का भाव कपट का त्याग कर देता है, तो बिना परिश्रम के ही अनन्य बुद्धि का भाव उसे उठा लेता है और वासना के द्वार पर उसके शरीर को रख आता है ताकि दोबारा अहंकार की पीड़ा न सताए। अहंकार का मरना सुनकर देव भाव व गन्धर्व प्राण के भाव मस्तिष्क रूपी आकाश में छा गए।
बरषि सुमन दुंदुभी बजावहिं। श्री रघुनाथ बिमलजसु गावहिं।।
जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा।।
व्याख्या : उस अवस्था में मन में अच्छे भावों की वर्षा (सु अ मन) होने लग जाती है और नगाड़े बजने लगते हैं अर्थात् धड़कन की आवाज स्पष्ट आने लगती है। उस अवस्था में दैवीय भाव आत्मा के निर्मल यश का गुणगान करने लगते हैं। हे जगत के आधार हे अनंत! आपकी जयो हो। आप सब देव भावों का उद्धार करने वाले हैं।
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिंधु पहिं आए।।
सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबही।।
व्याख्या : स्तुति करके जब दैवीय भाव चले गए अर्थात् शान्त हो गए, तब लखन भाव आत्मा रूपी राम के पास आए। उधर को काम रूपी रावण ने अहंकार रूपी मेघनाद का मरना जब सुना तो मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। वास्तव में बिना अहंकार के काम का भाव मूर्छित हो जाता है अर्थात् असहाय सा महसूस करने लगता है।
मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी।।
नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा।।
व्याख्या : अहंकार के मरने पर मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि मंदोदरी छाती पीट-पीट कर बहुत विलाप करने लगती है। उस अवस्था में वासना नगरी के सभी भाव व्याकुल होकर सोचने लगे और कहने लगे कि काम रूपी रावण असहाय हो गया है।
दो0 तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि।
नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि।।77।।
व्याख्या : ऐसी अवस्था में काम के हृदय में भी वैराग्य पैदा हो जाता है और उसे यह समस्त जगत नश्वर लगने लग जाता है। इसलिए सभी आसुरी वृतियों रूपी नारियों को समझाते हुए दस इन्द्रियों रूपी दस मुखों को धारण करने वाला काम बोला कि हृदय में विचार कर देखो। यह समस्त संसार ही नश्वर है।
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन।।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने आसुरी वृति रूपी नारियों व आसुरी भावों को उपदेश किया। स्वयं तो वह नीच वृति का है परन्तु उसकी बात शुभ व पवित्र है। क्योंकि संसार में उपदेश देने वाले तो बहुत होते हैं परन्तु जो कथनी का आचरण करते हैं, वे बहुत थोड़े होते हैं।
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्धारा।।
सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जाकर मन डोला।।
व्याख्या : अज्ञान रूपी रात्रि के बीतने पर नव स्फूर्ति रूपी सबेरा हो आया, तो बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने वासना रूपी लंका के चारों दरवाजों को घेर लिया। तब काम रूपी रावण ने आसुरी योद्धाओं को बुलाकर बोला कि भाव द्वन्द्व की अवस्था में जिसका मन डावाँडोल हो।
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई।।
निज भुजबल मैं बय डिग्री बढ़ावा। देहउँ उत डिग्री जो रिपु चढ़ि आवा।।
व्याख्या : वो अभी भी दूर जा सकता है परन्तु भाव द्वन्द्व से भागने पर अच्छा नहीं होगा। मैंने (काम) मेरे स्वयं के बल पर आत्मा रूपी राम से बैर किया है। इसलिए अब जब शत्रु चढ़ आया है, तो जवाब भी मैं ही दूँगा।
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा।।
चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली।।
व्याख्या : ऐसा कहकर काम रूपी रावण ने प्राण वायु के वेग से चलने वाले वृतियों रूपी रथ को सजाया और भाव द्वन्द्व के लिए बाजे बजने लगे। सब आसुरी भावों रूपी वीर ऐसे चले जैसे काजल की आँधी चल रही हो।
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला।।
व्याख्या : उस अवस्था में प्रतिकूल शकून होने लगे परन्तु भाव रूपी भुजाओं के बल के कारण काम रूपी रावण ने उनकी परवाह नहीं की।
छ0 अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते।
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते।।
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने।।
व्याख्या : जब काम का भाव प्रबल हो उठता है, तब काम सगुन-अपशकुन का विचार नहीं करता है। इसलिए बड़े बुजुर्ग लोग भी यही कहते आए हैं कि काम के अंधे को कुछ दिखायी नहीं देता है। यही अवस्था यहाँ काम रूपी रावण की हो रही है कि भाव रूपी हथियार गिर रहे हैं परन्तु क्षुब्ध काम का भाव उनका विचार नहीं करता है। भाव रूपी योद्धा वृति रूपी रथ से गिरते हैं और हाथी-घोड़े अर्थात् मन के भाव चिल्लाते हुए भागने लगते हैं। चालाकी रूपी स्यार, लालच रूपी गिद्ध, वासना रूपी सर्प, अज्ञान रूपी गधे और कुत्ते शब्द करने लगते हैं। तब ऐसे लगते हैं मानो काल के दूत रूपी उल्लू डरावने शब्द बोल रहे हों। अर्थात् ये सभी अपशकून काम के विनाश के संकेत देने लगते हैं। परन्तु काम का भाव क्षुब्ध होने पर इन बातों का विचार ही नहीं करता है।
दो0 ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम।।78।।
व्याख्या : जो भाव आत्मा के प्रतिकूल होकर भूतों से द्रोह करने वाला होता है, उसे सपने में भी सम्पत्ति, शुभ सगुन व मन को शान्ति नहीं मिल सकती है।
चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा।।
बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना।।
व्याख्या : काम के क्षुब्ध होने पर आसुरी भावों की सेना चारों गुण अवस्था (सत, रज, तम व गुणातीत) में चली। उन आसुरी भावों के नाना वृतियाँ रूपी वाहन थे तथा बहुत से वर्ण (रंग) के ध्वज व पताका थे अर्थात नाना प्रकार की इच्छाओं रूपी पताका व ध्वज थे।
चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे।।
बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया।।
व्याख्या : मतवाले होकर मन रूपी हाथियों के बहुत से समूह चले। मानों पवन से प्रेरित होकर वर्षा ऋतु के बादल चल रहे हों। नाना प्रकार के रूप धारण करके आसुरी भाव थे, जो भाव द्वन्द्व में नाना प्रकार की माया करना जानने वाले थे।
अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी।।
चलत कटक दिग सिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं।।
व्याख्या : जब काम का भाव क्षुब्ध होकर चलता है, तो काम के भाव के साथ विचित्र आसुरी भावों की सेना सज जाती है। तब ऐसा लगने लगता है मानो वीर बसन्त ऋतु ने आसुरी भावों की सेना को सजाया हो। जब आसुरी भावों की सेना चलने लगती है, तो साधक के दसों प्राणों में हलचल मच जाती है और भाव रूपी भव सागर (समुद्र) क्षुब्ध हो उठता है।
उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई।।
पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं।।
व्याख्या : आसुरी भावों से उत्पन्न वासना-लालसा रूपी धूल से ज्ञान रूपी सूर्य ढक (छुप) गया और श्वास भारी होन लगी, जिससे शरीर रूपी पृथ्वी व्याकुल हो उठी। उस अवस्था में प्राण के संचार की आवाजें भयंकर हो उठती हैं। तब ऐसा भय सा लगने लगता है, मानो प्रलय काल के बादल गरज रहे हों।
भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारु राग सुभट सुखदाई।।
केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में नाड़ियों में प्राण के संचरण की आवाजें भेरी, नफीरी (तुरही) व शहनाई की तरह मा डिग्री राग पैदा करके आसुरी भावों के योद्धाओं को सुख देने लगती हैं। सभी आसुरी वीर भाव सिंहनाद कर-करके अपने बल व पौरुष का बखान करने लगते हैं।
कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा।।
हौं मारिहउँ भूप दौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि हे उत्तम योद्धाओं! तुम बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानरों के समूहों को मसल डालो और मैं आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी दोनों भाइयों को मार डालूँगा। ऐसा कहकर काम रूपी रावण ने आसुरी भावों की सेना को आगे कर दिया।
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई।।
व्याख्या : जब बुद्धि के भाव रूपी वानरों को यह पता चला कि आसुरी सेना आगे बढ़ रही है तो सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर आत्मोन्मुखी होकर दौड़ पड़े।
ठ0 धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।
मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते।।
नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।
जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं।।
व्याख्या : विशाल व कराल बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू दौड़े जो आसुरी भावों को काल के समान लग रहे थे। बुद्धि के भाव उस अवस्था में ऐसे लग रहे थे, मानो पर्वत ही पंख लगाकर उड़ रहे हों। वे बुद्धि के भाव अनेक वर्णों के थे। नख, दाँत, पर्वत, और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान हैं और किसी से नहीं डरते हैं। वे काम रूपी हाथी को जीतने के लिए आत्मा रूपी सिंह की जय-जयकार करके आत्मा के सुयश का गुणगान करने लगते हैं।
दो0 दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।
भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि।।79।।
व्याख्या : जब भावों में द्वन्द्व शु डिग्री हो जाता है, तो दोनों पक्षों के (दैवीय पक्ष व आसुरी पक्ष) भाव अपने विपरीत भाव से भिड़ जाते हैं। दैवीय पक्ष के भाव आत्मा के गुणों का बखान करते हैं, तो दूसरी तरफ आसुरी भाव काम का गुणगान करते हैं। इस प्रकार दोनों तरफ के भाव रूपी योद्धा युद्ध में भिड़ जाते हैं।
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।।
अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।।
व्याख्या : काम रूपी रावण तो वृति रूपी रथ पर आरूढ़ है और आत्मा रूपी राम वृतिहीन है। ऐसा देखकर वैराग्य रूपी विभीषण अधीर हो उठा कि वृतिहीन आत्मा कैसे वृति युक्त काम को जीत पायेगी। आत्मा के प्रति अत्यधिक स्नेह होने के कारण वैराग्य के भाव को संशय हो गया था। इसलिए संशय के वश में होकर वैराग्य रूपी विभीषण आत्मा रूपी राम के चरणों की वन्दना करके प्रेमपूर्वक बोला--।
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।।
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।।
व्याख्या : हे नाथ! आप वृतियों से रहित हैं और आपके अन्दर न तो दैहिक इच्छा है और न ही कोई पद प्राप्त करने की ही इच्छा है। अर्थात् आत्मा तो निरइच्छा है, तब काम रूपी रावण को भाव द्वन्द्व के युद्ध में कैसे जीत पाओगे। वैराग्य रूपी विभीषण की बात सुनकर आत्मा रूपी राम बोले कि हे सखा। जिस भाव अवस्था से विजय प्राप्त होती है, वो वृति रूपी रथ दूसरा ही होता है।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।
व्याख्या : काम को जीतने के लिए तो शौर्य व धैर्य रूपी पहिए वाला रथ चाहिए। जिसमें सत्य रूपी ध्वजा व शील रूपी पताका लगी होनी चाहिए। उस रथ में विवेक, दम (इन्द्रियों के दमन) व परोपकारी रूपी घोड़े होने चाहिए, जिनके क्षमा, कृपा व समता की लगाम होनी चाहिए।
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।।
व्याख्या : परमात्मा का भजन रूपी उस रथ का सारथी हो। वैराग्य रूपी ढाल व संतोष रूपी तलवार हो। दान रूपी फरसा व बुद्धि रूपी प्रचण्ड शक्ति हो और विशुद्ध विज्ञान रूपी कठोर धनुष हो।
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।।
व्याख्या : अमल अर्थात् वासनाओं से रहित निर्मल व अचल (दृढ़) मन ही तरकश के समान होता है, जिसमें संयम, यम, नियम रूपी नाना प्रकार के बाण होते हैं। विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित गुरु के चरणों की पूजा ही अभेद कवच होता है। हे वैराग्य भाव रूपी विभीषण! इस प्रकार के रथ के बिना काम को जीतने का दूसरा कोई उपाय नहीं है।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी सखा! ऐसी धारणा वाला वृति रूपी रथ जिसके पास होता है, उसे संसार में जीतने के लिए कोई शत्रु ही नहीं है।
दो0 महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मति धीर।।80(क)।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी सखा! जिसके पास ऐसी वृति रूपी रथ होता है, वो साधक वीर संसार रूपी महान अजय शत्रु को भी जीत सकता है।
दो0 सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
एहि मिस मिहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज।।80(ख)।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर वैराग्य रूपी विभीषण आत्मा के सामने पूरी तरह समर्पित हो गए। वैराग्य का भाव सोचने लगा कि इस बहाने से मुझको आत्मा ने प्रेरणादायक उपदेश दिया है।
दो0 उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन।।80(ग)।।
व्याख्या : भावों के द्वन्द्व की अवस्था में एक तरफ काम रूपी रावण ललकारने लगता है, तो एक तरफ दृढ़ बुद्धि व अनन्य बुद्धि रूपी अंगद हनुमान ललकारने लगते हैं। इस प्रकार आसुरी भाव काम की दुहाई और बुद्धि के भाव आत्मा की दुहाई दे देकर आपस में लड़ते हैं।
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।।
हमहू उमा रहे तेहिं संगा। देखत राम चरित रन रंगा।।
व्याख्या : उस अवस्था के भाव द्वन्द्व को अर्थात् आत्मा व काम के द्वन्द्व को देखने (समझने) के लिए स्वर, बुद्धि आदि के भाव, सिद्ध भाव व मन के नाना भाव उर्ध्वगामी होकर मस्तिष्क रूपी आकाश में चढ़ गए। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! उस अवस्था में मैं (विश्वास) भी बुद्धि आदि के भावों के साथ मस्तिष्क रूपी आकाश में था। वहाँ से आत्मा के भाव द्वन्द्व की कला को सब देखने लगे।
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते।।
एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं।।
व्याख्या : दोनों (आत्मा व काम) तरफ के भाव रूपी योद्धा युद्ध के रस में मतवाले हो रहे होते हैं और बुद्धि के भाव रूपी वानरों को आत्मा रूपी राम का प्रेरणा रूपी बल प्राप्त हो रहा है। एक भाव अपनी विपरीत वृति वाले भाव से भिड़ जा रहा है और एक दूसरे को मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं।
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं।।
उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं।।
व्याख्या : वे आपस में मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ते हैं तथा सिरों को तोड़कर अर्थात् मूल वृतियों को तोड़कर उन्हीं से दूसरे भावों को मारने लगते हैं। कुछ भाव पेट फाड़ कर अर्थात् मर्म को जानकर भाव रूपी भुजाओं को उखाड़ देते हैं और कुछ भाव पैर पकड़कर अर्थात् भाव के मूल को पकड़कर पृथ्वी पर पटक देते हैं।
निसिचर भट महि गाड़हिं भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू।।
बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी भालू आसुरी भावों को भाव भूमि में गाड़ देते हैं और ऊपर से सद्वृति रूपी बालू डाल देते हैं। भाव द्वन्द्व के युद्ध में क्रोधित बुद्धि के भाव रूपी वानर ऐसे लगते हैं, जैसे बहुत से काल क्रोधित हो रहे हैं।
छ0 क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं।
मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।।
मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।
चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।।
व्याख्या : क्रोध से भरे हुए आसुरी भावों के काल के समान बुद्धि के भाव रक्त रूपी रसायन के बहने से शोभा को प्राप्त होने लगते हैं। वे बुद्धि के भाव रूपी वीर आसुरी भावों की सेना के योद्धाओं को मसलते हैं और गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते और दाँतों से काटते तथा लातों से पीस डालते हैं। बुद्धि के भाव रूपी वानर भालू छल-बल करने लगते हैं, जिससे आसुरी भावों का नाश हो जाए।
छ0 धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।।
ध डिग्री मा डिग्री काटु पछा डिग्री घोर गिरा गगन महि भरि रही।
जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।।
व्याख्या : वे बुद्धि के भाव रूपी वानर भाव द्वन्द्व की अवस्था में आसुरी भावों को पकड़कर उनके गालों को फाड़ देते हैं और पेट को चीर देते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गले में डाल देते हैं। अर्थात् बुद्धि के भाव आसुरी भावों के मोहादि भावों को मिटा देते हैं और छुपी हुई आसुरी इच्छाओं को भी पकड़कर बाहर कर देते हैं। उसी को गले में अँतड़ियाँ डालना बताया गया है। ये बुद्धि के भाव ऐसे लगते हैं जैसे प्रह्लादपति अर्थात् प्रकृति के आह्लाद (आनन्द) के स्वामी मानों नाना बुद्धि के भावों के माध्यम से शरीर धारण कर भाव द्वन्द्व के रणक्षेत्र में खेल रहे हों। पकड़ों मारो और काटो व पछाड़ों की ध्वनि पूरे मस्तिष्क रूपी आकाश में गूँजने लगी। आत्मा रूपी राम की जय हो। जो वास्तव में तृण से बज्र और बज्र से तृण कर देते हैं। अर्थात् आत्मा की प्रेरणा से ही बुद्धि के भाव आसुरी भावों से लड़ पाते हैं।
दो0 निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप।।81।।
व्याख्या : आसुरी भावों की सेना को विचलित होते देखकर काम रूपी रावण ने भाव रूपी बीस भुजाओं में दस प्राण रूपी धनुष लेकर आसुरी वृतियों रूपी रथ में चढ़कर दस इन्द्रियों रूपी मुखों वाला काम रूपी रावण आसुरी भावों को लौटो-लौटो बोलकर चला।
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।।
गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा।।
व्याख्या : क्षुब्ध होकर काम रूपी रावण दौड़ा तो सामने दृढ़ बुद्धि व अनन्य बुद्धि रूपी दोनों बन्दर लड़ने को आ गए। उन्होंने (बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने) दृढ़ता रूपी वृक्ष व पत्थरों का पहाड़ उठाकर एक साथ ही काम रूपी रावण के ऊपर डाले।
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू।।
चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी।।
व्याख्या : दृढ़ता रूपी पर्वत उसके बज्रतुल्य शरीर पर लग कर खण्ड-खण्ड होकर टूट जाते है। परन्तु क्रोधित हुआ काम रूपी रावण वृति रूपी रथ को रोककर अचल खड़ा रहा। अर्थात् काम का भाव बुद्धि के भावों से तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
इत उत झपटि दपिट कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा।।
चले पराइ भालु कपि आना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण अति क्षुब्ध होकर इधर-उधर को झपट कर बुद्धि के भाव रूपी वानर योद्धाओं को मसलने लगा। काम के भाव की प्रबलता को देखकर बुद्धि के भाव दृढ़ बुद्धि व अनन्य बुद्धि के भावों से बचाओ-बचाओ कहने लगे।
पाहि पाहि रघुबीर गोसाईं। यह खल खाई काल की नाईं।।
तेहिं देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। यह काम रूपी रावण हमको (बुद्धि के भावों को) काल की तरह खा जा रहा है। जब काम के भाव ने देखा कि सभी बुद्धि के भाव विचलित होकर भाग जा रहे हैं, तो उसने दसों धनुषों पर बाणों का संधान किया अर्थात् दसों प्राणों पर काम की प्रेरणा का प्रभाव डाल दिया।
छ0 संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।
रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं।।
भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।
रघुबीर करूना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने प्राण रूपी धनुष पर वासना रूपी बाणों को छोड़ा, जो सर्प की तरह उड़ते हुए जा लगते थे। दसों प्राणों रूपी दसों दिशाओं में काम की वासना रूपी बाण भर रहे हैं, अत: बुद्धि के भाव रूपी वानर कहाँ भाग सकते हैं? ऐसी अवस्था में बुद्धि के भावों में कोलाहल मच गया और बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू आर्त पुकार करने लगे कि हे आत्मा रूपी राम! हे करूणा के समुद्र! हे शरणागतों के रक्षक! हमारी रक्षा कीजिए अर्थात् हमें काम की वासना से बचाइये।
दो0 निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ।।82।।
व्याख्या : अपनी सेना को व्याकुल देखकर अनासक्ति रूपी धनुष हाथ मेंे लेकर कमर बाँधकर लखन भाव क्रोधित होता हुआ, आत्मोन्मुखी होकर काम रूपी रावण से लड़ने को चला।
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू।।
खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती।।
व्याख्या : लखन भाव रूपी लक्ष्मण ने कहा कि अरे मूर्ख! बुद्धि के भावों रूपी वानर-भालूओं को क्या मारता है? तू इधर देख तेरा काल हूँ। वास्तव में लखन भाव काम के लक्षणों को लख लेता है, इसलिए उसे काल के प्रतीक की संज्ञा दी गयी है। क्योंकि काम को जान लेना ही काम का काल बन जाता है। तब काम रूपी रावण बोला! अरे अहंकार रूपी पुत्र का बध करने वाले मैं तुझे ही खोज रहा था। आज तुझे मारकर छाती ठण्डी करूँगा।
अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा।।
कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने प्रचण्ड वासना रूपी बाण छोड़े परन्तु लखन भाव ने उन्हें लखकर (जानकर) सत खंड अर्थात् सहज कर दिए। वास्तव में जब वासनाओं का जाल समझ में आ जाता है तो वे शान्त हो जाती है। उसी शांत होने को सत खंड अर्थात् सहजता का खण्ड होना बोलकर लिखा है। तब काम रूपी रावण ने नाना प्रकार (कोटी) के वासना युक्त हथियार चलाए परन्तु लखन भाव ने सबको लख कर तिल के समान कर दिया अर्थात् निष्प्रभावी कर दिया।
पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा।।
सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला।।
व्याख्या : फिर लखन भाव ने काम के हृदय में सात्विकता रूपी बाण मारा, जिससे काम का भाव मूर्छित होकर भाव भूमि पर गिर पड़ा। अर्थात् सात्विकता के बाण से काम का भाव घायल हो गया। परन्तु काम पर सात्विकता का प्रभाव थोड़ा ही रहता है। अत: उसी को मूर्छा हठने पर अति प्रबल होकर उठना बोलकर लिखा है। काम का भाव भी बहुत से रूप बदल लेता है। कभी वह सात्विकता का बाना धारण कर लेता है। इसलिए काम के भाव ने लखन भाव पर सात्विकता रूपी शक्ति का प्रहार किया अर्थात् काम ने सात्विकता का रूप धारण कर लिया, जिससे लखन भाव काम के लक्षणों को नहीं लख सके।
पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं।।
उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी।।
व्याख्या : फिर सौ बाण उसकी छाती में मारे। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटने पर वह प्रबल होकर उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माजी ने उसे दी थी।
छ0 सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।
परयो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही।।
ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।
तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहीं त्रिभुअन धनी।।
व्याख्या : वह सात्विकता रूपी शक्ति लखन भाव के हृदय में लग गयी अर्थात् लखन भाव को काम की सात्विकता पर भरोसा हो गया। तब लखन भाव को मूर्छित देखकर अर्थात् सात्विकता के भ्रम में पड़ा देखकर काम रूपी रावण लखन भाव को उठाने लगा अर्थात् लखन भाव को अपने वश में करने का प्रयास करने लगा। परन्तु जिस लखन भाव के सिर पर समस्त ब्रह्माण्ड धूल के कण के समान होता है अर्थात जो लखन भाव समस्त ब्रह्माण्ड के भावों को लखने की क्षमता रखता है, उसे काम रूपी रावण कैसे वश में कर सकता है? मूर्ख काम रूपी रावण यह नहीं जानता है कि तीनों गुणों के भावों को लखने की क्षमता लखन भाव में होती है।
दो0 देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर।
आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर।।83।।
व्याख्या : लखन भाव को मूर्छित पड़ा देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कठोर वचन बोलता हुआ दौड़ा। अनन्य भाव के आते ही काम रूपी रावण ने जोर से मुष्टिका प्रहार किया अर्थात् अनन्यता के भाव को भी वश में करने के लिए काम के भाव ने वासना रूपी मुष्टिका का प्रहार किया।
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा।।
मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भूमि पर गिरा नहीं और घुटने टेक कर ही रह गया। अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव पर वासना के प्रहार का असर नहीं हुआ। तब अनन्य बुद्धि का भाव बहुत क्रोध करते हुए उठा और परमात्मोन्मुखी रूपी मुष्टिका का प्रहार किया, जिससे काम रूपी रावण ऐसे गिर पड़ा जैसे बज्र की मार से पर्वत गिर पड़ा हो। अर्थात् काम का भाव क्षणिक ही सही परमात्मोन्मुखी मुष्टिका से प्रभावित हो गया।
मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा।।
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही।।
व्याख्या : परमात्मोन्मुखी मुष्टिका का प्रभाव मिट जाने पर काम रूपी रावण का भाव जागा और अनन्य बुद्धि के बल की सराहना करने लगा। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बोला कि मेरे पौरुष (बल) पर धिक्कार है जो तू जीवित बच गया अर्थात् मुझे धिक्कार है कि तू पुन: काम भावना में आ गया।
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो।।
कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता।।
व्याख्या : ऐसा कहकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान लखन भाव को आत्मोन्मुखी करके आत्मा रूपी राम के पास ले आया। यह देखकर काम रूपी रावण को बहुत आश्चर्य हुआ। तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव से कहा कि हे भाई! तुम हृदय में समझो तुम काल के भी भक्षक अर्थात् समय के अनुसार गुणों को लखने वाले हो और स्वरों को निर्मल कर सुख देने वाले हो।
सुनत बचन उठ बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला।।
पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के इन वचनों को सुनकर लखन भाव उठकर बैठ गए और सात्विकता रूपी शक्ति मस्तिष्क रूपी आकाश में चली गयी अर्थात् दिखावे की सात्विकता का मर्म समझ में आ गया। फिर लखन भाव हाथ में कठोर संयम रूपी धनुष-बाण लेकर दौड़े और काम रूपी रावण के सामने आ गए।
छ0 आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो।
गिर्यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो।।
सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो।
रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो।।
व्याख्या : लखन भाव ने जल्दी से काम की वृति रूपी रथ को तोड़कर सारथी को मार गिराया। तब सात्विकता के बाणों से घायल हुआ काम रूपी रावण धरती पर गिर पड़ा। परन्तु दूसरी काम की वृति रूपी सारथी काम रूपी रावण को उठाकर तुरन्त वासना रूपी लंका में ले गया अर्थात् काम की दूसरी वृति ने काम को वासना रूपी लंका में पहुँचा दिया। तब आत्मा की प्रेरणा के प्रताप का पुंज लखन भाव आत्मा रूपी राम के चरणों में जाकर सीस नवाया।
दो0 उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य।।84।।
व्याख्या : उधर को काम रूपी रावण सात्विकता की मूर्छा से जागकर अपान वायु (यज्ञ) को प्रबल करने लगा। वह अज्ञानी काम का भाव आत्मा के प्रतिकूल होकर हठ करके विजय प्राप्त करना चाहता है।
इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।।
नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा।।
व्याख्या : इधर को विभीषण ने अर्थात् वैराग्य के भाव ने जाना कि काम का भाव अपान वायु को प्रबल कर रहा है अर्थात् यज्ञ कर रहा है, तो सारी बात तुरन्त आत्मा रूपी राम को बता दी कि अगर काम ने अपान वायु को सिद्ध (वश) कर लिया तो यह दुष्ट काम का भाव जीतने में नहीं आ सकेगा।
पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर।।
प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण बोला कि हे नाथ! जल्दी बुद्धि के भाव रूपी वानरों को भेजिए जिससे काम के यज्ञ (अपान वायु की प्रबलता में इन्द्रियों का हवन) का विध्वंस कर सके। वैराग्य के भाव की बातें सुनकर नव स्फूर्ति का संचार हो गया। उसी को प्रात:काल होने पर बुद्धि के भाव रूपी बन्दरों को भेजना बोला गया है। तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आदि भाव सब दौड़ पड़े।
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका।।
जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा।।
व्याख्या : खेल ही खेल में बुद्धि के भाव रूपी वानर वासना रूपी लंका पर चढ़ गए। जहाँ पर काम आसुरी भावों के भवन में निशंक होकर बैठा था। अर्थात् काम का भाव आसुरी अवस्था में निशंक होकर बैठा था। जब बुद्धि के भावों ने देखा कि काम का भाव इन्द्रियों का अपान वायु में हवन कर रहा है, तो बुद्धि के भाव क्रोधित हो उठे।
रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा।।
अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव कहने लगे कि अरे निर्लज्ज काम! तू भाव द्वन्द्व से भागकर यहाँ आकर बगुले की तरह ध्यान लगा रहा है अर्थात् इन्द्रियों को वासना में फँसा रहा है। ऐसा कहकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद ने काम रूपी रावण को जोर से लात मारी अर्थात् दृढ़ बुद्धि ने काम को जोर से सत प्रेरणा की। परन्तु काम के भाव ने देखा ही नहीं क्योंकि उसका तो मन वासना भोग में लगा हुआ था।
छ0 नहीं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं।
धरि केस नारि निकारि बाहेर ते अतिदीन पुकारहीं।।
तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।
एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई।।
व्याख्या : जब काम का भाव सद्प्रेरणा की ओर नहीं देखा तो बुद्धि के भाव क्रोधित होकर गहि दसन अर्थात् दसों इन्द्रियों को वश में करके प्रेरणा रूपी लात मारने लगे। तब बुद्धि के भावों ने नाड़ियों (नारियों) को वश में कर लिया और काम की भावना से बाहर करने लगे तो नाड़ियाँ दीन होकर पुकारने लगी अर्थात् नाड़ियों के संचरण में निर्मलता आने लगी। तब काम रूपी रावण बुद्धि के भावों के काल के समान उठा और बुद्धि के भावों को मूल (पैर) से पकड़-पकड़ कर पटकने लगा। इस बीच में बुद्धि के भावों ने अपान में इन्द्रियों के हवन की प्रक्रिया को भंग कर दिया। जिसे देखकर काम का भाव मन ही मन हार गया।
दो0 जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।
चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन कै आस।।85।।
व्याख्या : यज्ञ का विध्वंस करके बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी राम के पास आ गए। तब काम का भाव अति क्षुब्ध होकर जीवन की आशा छोड़कर आत्मा से द्वन्द्व करने के लिए चला।
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर।।
भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के चलने पर अनेक अशुभ संकेत होने लगे अर्थात नाना वासनाओं के संकेत होने लगे और वासना भोगों को भोगने के लिए लालच रूपी गीद्ध के भाव उड़कर मस्तिष्क में बैठने लगे। काम का भाव उस समय काल के वश में होकर किसी भी बात को नहीं मान रहा था। काम के भाव ने आत्मा से युद्ध करने का डंका बजाने को कहा।
चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा।।
प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें। सलभ अनल कहँ जैसें।।
व्याख्या : काम के क्षुब्ध होने पर अपार तामसिक आसुरी भावों की सेना चल पड़ी। जिसमें नाना प्रकार के आसुरी भाव, वृतियाँ व उपवृतियाँ रूपी हाथी, रथ, पैदल व घुड़सवार थे। आत्मा रूपी राम के सामने ये सब आसुरी भाव ऐसे दौड़े मानों पतंगों के समूह अग्नि की तरफ दौड़ते हैं।
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही।।
अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही।।
व्याख्या : इधर को दैवीय भावों ने आत्मा रूपी राम की स्तुति की कि हे नाथ! काम रूपी रावण ने हमें बहुत कष्ट दिया है। इसलिए अब काम के भाव को प्रबल मत होने दीजिए। काम की प्रबलता से सुरता रूपी सीता बहुत दु:खी होती हैं।
देव बचन सुनि प्रभु मुसुकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना।।
जटा जूट दृढ़ बाँधें माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे।।
व्याख्या : दैवीय भावों के वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम मुस्कराए और उठकर प्रेरणा रूपी बाणों को सुधारा तथा मस्तिष्क में संयम-नियम रूपी जटा जूट को बाँधा। उस अवस्था में सुमन अर्थात् मन के अच्छे भाव बीच-बीच में बहुत शोभा पा रहे थे। युद्ध भूमि में क्या कोई सिर में फूल लगाएगा? इसलिए सुमन का मतलब अच्छे मन के भावों से ही है। क्योंकि जब दैवीय भाव प्रार्थनामय अवस्था में आ जाते हैं, तो आत्मा भावों की निर्मलता देखकर प्रसन्न हो उठती है और उस अवस्था में बीच-बीच में मन के अच्छे सात्विक भाव शोभा पाने लगते हैं।
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा।।
कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा।।
व्याख्या : उस समय आत्मा का स्वरूप लाल-लाल नेत्रों वाला (अर्थात् दिव्य दृष्टिवाला) और मेघ के समान श्याम शरीर वाला था, जो सभी लोकों अर्थात् भाव चक्रों के भावों को विश्राम देने वाला था। तब आत्मा रूपी राम ने कमर में दृढ़ता रूपी फेंटा बाँध लिया और निसंगता रूपी तरकश बाँधकर हाथ में कठोर शिव संकल्प रूपी धनुष को धारण कर लिया।
छ0 सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।
भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो।।
कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।
ब्रह्माण्ड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे।।
व्याख्या : शिव संकल्प रूपी धनुष हाथ में लेकर आत्मा रूपी राम ने निसंगता रूपी तरकश बाँध लिया। उनकी भाव संकल्पना रूपी भुजाएँ पुष्ट हैं और उनकी छाती मन का हरण करनेवाली है और धरासुर अर्थात् देह के स्वर स्थिर होकर आत्मोन्मुखी हैं। तुलसीदास अपने ध्यान के अनुभव का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब आत्मा शिव संकल्प से युक्त होकर सद्प्रेरणा रूपी बाणों को फेरने लगती है, तो देह रूपी ब्रह्माण्ड के प्राण रूपी हाथी, कच्छप, शेष, पृथ्वी, भाव रूपी समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे। अर्थात् जब आत्मा शिवसंकल्प करके सद्प्रेरणा रूपी बाणों को तैयार करती है, तो प्राण की गति में हलचल मच जाती है। उसे ही हाथी, कच्छप, समुद्र व पर्वत आदि के प्रतीक के रूप में बताया गया है।
दो0 सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।
जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार।।86।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की शोभा को देखकर अर्थात् आत्मा को शिव संकल्प से युक्त देखकर स्वरों में प्रसन्नता छा जाती है और मन में अच्छे भावों की वर्षा होने लग जाती है। उस अवस्था में सब भाव आत्मा की जय हो, जय हो, जय हो कहने लगते हैं तथा कहते हैं कि हे करूणा के समुद्र प्रभु! आप शोभा, बल, व गुणों के घर हैं।
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी।।
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा।।
व्याख्या : इसी बीच में आसुरी भावों की सेना आपस में टकराती हुई आई। उस आसुरी सेना को देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर प्रलय काल के बादलों के समूह के समान सामने चले गए।
बहु कृपान तरवारि चमकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनी दमकहिं।।
गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा।।
व्याख्या : उस भाव द्वन्द्व की अवस्था में बहुत सी कृपाण व तलवारें चमकने लगती हैं अर्थात् इच्छा रूपी कृपाण व तलवारें चमकने लगती हैं। जैसे मानों दसों प्राण रूपी दिशाओं में बिजली चमक रही हो। उस अवस्था में मन के भाव रूपी हाथी, मन की वृति रूपी रथ व मन के घोड़े रूपी भावों की चिंघाड़ ऐसी लगती है, मानों बादलों में भयंकर गर्जना हो रही हो। ध्यान की सूक्ष्म अवस्था में ही यह अवस्था अच्छी तरह समझी जा सकती है।
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए।।
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानर मस्तिष्क रूपी आकाश में ऐसे छा गए मानों इन्द्रधनुष छा गया हो। उस अवस्था में भावों की धूल ऐसे उड़ रही थी, मानो जल की धारा हो और प्रेरणा रूपी बाण बूँद बनकर बरस रहे हों। वास्तव में ध्यान की अवस्था में जब भाव द्वन्द चलता है, तो बुद्धि के भाव मस्तिष्क में पहुँचकर उर्ध्वगामी हो जाते हैं और उनका समूह धूल के कणों के समान लगने लगता है।
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा।।
रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई।।
व्याख्या : दोनों तरफ से ही दृढ़ता रूपी पर्वतों का प्रहार करने लगते हैं, मानों बार-बार बज्रपात हो रहा हो। तब आत्मा रूपी राम ने क्रोधित होकर सद्प्रेरणा रूपी बाणों की झड़ी लगा दी, जिससे आसुरी भावों के समूह घायल हो गए।
लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं।।
स्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी।।
व्याख्या : सद्प्रेरणा रूपी बाण लगते ही आसुरी भाव रूपी वीर चित्कार कर उठते हैं और चक्कर खाकर पृथ्वी पर जहाँ-तहाँ गिर पड़ते हैं। उस अवस्था में आसुरी कोशिकाओं (सैल) से विशेष रसायन स्रवित होने लगता है, मानों पर्वतों से विशेष जल का झरना बह रहा हो। इस प्रकार रक्त वासनाओं का झरना कायर भावों को भयभीत करता हुआ चलता है।
छ0 कादर भयंकर रूधिर सरिता चली परम अपावनी।
दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी।।
जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने।।
व्याख्या : भय पैदा करने वाली वासना रूपी रक्त की धाराएँ जो परम अपवित्र थी, अब बह चली अर्थात् अब विकार मिटने लग गए। दोनों दल उसके किनारे हैं अर्थात् दैवीय भाव व आसुरी भाव विकार रूपी धारा के दो किनारे हैं। वृति रूपी रथ ही रेत है और भाव चक्र रूपी पहिए ही उस धारा के भँवर है। मन के भाव रूपी हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेक भाव रूपी सवारियाँ हैं जिनकी गिनती कौन करे, उस धारा के जीव-जन्तु के समान हैं। प्रेरणा रूपी बाण, संकल्प रूपी शक्ति, तामसिकता रूपी सर्प हैं, धनुष तरंगे हैं और ढाल संयम रूपी कछुए हैं।
दो0 बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन।।87।।
व्याख्या : भाव रूपी वीर ऐसे पड़ रहे हैं मानो नदी के किनारे के वृक्ष गिर कर बह रहे हों। इस भाव द्वन्द्व की अवस्था को देखकर वासनायुक्त कायर भाव डरते हैं और दैवीय भावों को शान्ति मिलने लगती है।
मज्जहिं भूत पिसाच बेताला। प्रथम महा झोटिंग कराला।।
काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की उस अवस्था में भूत, पिशाच व बेताल रूपी भाव विकार मिटने लगते हैं। जो पहले ये भयानक आसुरी वृति वाले थे, अब भाव द्वन्द्व की धारा में स्नान करके पवित्र होने लगते हैं। कर्कशता रूपी कौआ और लालच रूपी चील भाव रूपी भुजाओं को लेकर उड़ने लगते हैं और वे एक दूसरे से छीनने लगते हैं। अर्थात् उस अवस्था में एक भाव दूसरे भावों के विकारों को दूर करने लगता है।
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई।।
कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे।।
व्याख्या : उस अवस्था में कोई एक भाव कहता है कि ऐसी भाव अवस्था में भी अर्थात् सद्प्रेरणा की अवस्था में भी तुम्हारी वासना रूपी दरिद्रता नहीं मिटती। भाव रूपी योद्धा उस धारा के तट पर घायल अवस्था में पड़े हैं, मानों जहाँ तहाँ अर्धजल में पड़े हों। अर्थात् कुछ भाव हैं जो अभी घायल हैं पूरी तरह विकारों से मुक्त नहीं हुए हैं। यह भाव द्वन्द्व की अवस्था में चलता रहता है।
खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए।।
बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं।।
व्याख्या : भाव द्वन्द में घायल भाव रूपी वीरों को लालच रूपी गिद्ध ऐसे खींचते हैं, मानो मछुवारे चित लगाकर बंसी द्वारा मछलियों को पकड़ रहे हों। बहुत से वासना रूपी पक्षी बहते हुए योद्धाओं (भावों) पर बैठे जा रहे हैं, मानो वे नाव क्रीड़ा कर रहे हों। अर्थात् वासनाओं की आसक्ति आसुरी भावों के साथ बहने लगती है।
जोगनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिचास बधू नभ नचहिं।।
भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं।।
व्याख्या : योगिनियाँ अर्थात् तामसिक इच्छाएँ खप्पर भर-भर करके खून जमा करने लगी अर्थात् भाव द्वन्द्व की अवस्था में तामसिक इच्छाएँ शान्त होने लग गयी। उसी को खप्पर भरकर रखना बोला गया है। भूत-पिचाश रूपी तामसिक इच्छाएँ भी मस्तिष्क रूपी आकाश में नाचने लगती हैं। अर्थात् भाव द्वन्द्व से छुपी हुई इच्छाएँ भी प्रकट होने लग गयी। चामुण्ड अर्थात् चारों गुणों में बरतने वाली इच्छाएँ (वास्तव में बहुत सूक्ष्मता से समझने पर समझ आता है कि कुछ इच्छाएँ चार मुखों (चा अ मुण्ड उ चार मुख) वाली होती है अर्थात् चार गुण अवस्था (सत, रज, तम व गुणातीत) में बरतती रहती हैं। वे भी अब भाव द्वन्द्व की अवस्था में प्रकट हो जाती हैं अर्थात् समझ में आ जाती हैं। ऐसी चार मुखों (चामुण्डा) वाली इच्छाएँ अब भाव रूपी योद्धाओं के कपाल की करताल बजाने लगती हैं।
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं।।
कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं।।
व्याख्या : लालच रूपी गीदड़ों के समूह कट कटाते हैं और भाव रूपी मुर्दों को खाकर पेट भर जाने पर एक दूसरे को डाँटते हैं। नाना प्रकार की इच्छाएँ बिना आसक्ति के डोलने लगती हैं। इसी को बिना सिर के धड़ों का डोलना बताया गया है। इच्छा रूपी सिर पृथ्वी पर पड़े जय-जय बोल रहे हैं अर्थात् इच्छाएँ आसक्ति से कट जाने पर जय-जय बोलने लगती हैं। अर्थात् सहज होकर शान्त होने लग जाती हैं।
छ0 बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।
खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं।।
बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए।
संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए।।
व्याख्या : जो इच्छा रूपी मुख आसक्ति रूपी धड़ से अलग हो जाते हैं, वे तो जय-जय बोलने लगते हैं अर्थात् सहज हो जाते हैं और आसक्ति रूपी धड़ बिना इच्छाओं रूपी सिर के ही दौड़ते रहते हैं। भोग भाव रूपी पक्षी अनासक्ति रूपी खोपड़ियों में उलझ कर परस्पर लड़ मरते हैं। उत्तम भाव आसुरी भावों को गिरा रहे हैं। आत्मा की प्रेरणा के बल से दर्पित हुए बुद्धि के भाव रूपी वानर आसुरी भावों को मसल डाल रहे हैं। जो आसुरी भाव रूपी योद्धाओं को आत्मा की सद्प्रेरणा रूपी बाण लग गया, वे भाव द्वन्द्व के मैदान में सो रहे हैं अर्थात् आसुरी वृतियों को छोड़कर शान्त हो गए हैं।
दो0 रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार।
मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार।।88।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने मन में विचार किया कि आसुरी भावों का तो संहार हो गया है और मैं (काम) अकेला बच गया हूँ। परन्तु बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू तो बहुत से हैं, अत: मुझे (काम) कुछ माया करनी चाहिये अर्थात् भ्रम पैदा करने वाले भाव पैदा करने चाहिये।
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा।।
सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा।।
व्याख्या : जब दैवीय भावों ने देखा कि आत्मा रूपी राम तो पैदल हैं अर्थात् पूरी तरह अनासक्त व वृतिहीन हैं, तो दैवीय भावों के हृदय में क्षोभ पैदा हो गया। दैवीय भावों में क्षोभ पैदा होने पर चित रूपी इन्द्र ने तुरन्त वृति रूपी रथ भेज दिया अर्थात् दैवीय भावों में क्षोभ पैदा होने से चित से वृतियाँ उठने लग गयी। मातलि अर्थात् बहुत सूक्ष्म तरीके से वो वृति रूपी रथ आत्मा रूपी राम के पास आ गया। उसी को हर्षपूर्वक मातलि सारथी द्वारा इन्द्र का रथ ले आना बताया गया है।
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा।।
चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी।।
व्याख्या : वे दैवीय वृतियों रूपी रथ दिव्य व अनुपम व प्रकाश का पुंज था। जिस पर आत्मा रूपी राम प्रसन्नता के साथ आरूढ़ हो गए अर्थात् आत्मा दैवीय वृतियों पर आरूढ़ हो गयी। वे वृतियाँ बहुत चंचल व मन को हरने वाली थी। वे दैवीय वृतियों रूपी घोड़े मन की गति से चलने वाले थे।
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी।।
सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम को दैवीय वृतियों रूपी रथ पर आरुढ़ देखा तो बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानर प्रबल होकर दौड़ पड़े। उस अवस्था में काम रूपी रावण बुद्धि के भावों की मार को सह नहीं पा रहा था, इसलिए माया का विस्तार किया अर्थात् काम के नाना भाव पैदा करके भ्रम पैदा करने का प्रयास किया।
सो माया रघुबीरहिं बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची।।
देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी।।
व्याख्या : काम रूपी रावण की उस माया को आत्मा रूपी राम समझ गए परन्तु वो लखन भाव व बुद्धि के भावों को सच लगी। अर्थात् उस काम की अवस्था को केवल आत्मा ही समझ पाती है। जब माया से उत्पन्न आसुरी भावों की सेना को बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने देखा तो भ्रमित हो गए और आत्मा व लखन भाव को भी आसुरी सेना में देखने लगे अर्थात् भ्रम वश बुद्धि के भावों को आत्मा व लखन भाव भी आसुरी भावों में लिप्त दीखे।
छ0 बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे।।
निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी।
माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी।।
व्याख्या : बहुत सारे आत्मा रूपी राम व लखन भावों को देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू डर गए। लखन भाव सहित वे बुद्धि के भाव चित्र लिखे से खड़े होकर देखने लगे। अर्थात् लखन भाव व बुद्धि के भाव काम की माया के रहस्य को नहीं समझ पा रहे थे। अपनी सेना को अर्थात् बुद्धि के भावों को विचलित देखकर आत्मा रूपी राम ने संयम रूपी बाण को सहजतापूर्वक चढ़ाया और क्षण भर में समस्त माया का हरण कर लिया, जिससे बुद्धि की भाव रूपी सेना हर्षित हो उठी।
दो0 बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर।
द्वन्द्वजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर।।89।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर-भालूओं को देखकर बोले कि तुम सब वीर थक गए हो। अत: अब मेरे भाव द्वन्द्व के युद्ध को देखो।
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।।
तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा।।
व्याख्या : ऐसा कहकर विशुद्ध प्रकाशमय अवस्था में अवस्थित होकर आत्मा रूपी राम ने दैवीय वृति रूपी रथ को चलाया। तब काम रूपी रावण के हृदय में क्रोध छा गया और तब वह गरजता व ललकारता हुआ सामने आ गया। अब पाठकों को सावधानी पूर्वक पढ़ना चाहिए क्योंकि अब सीधा आत्मा व काम का भाव द्वन्द्व वर्णन किया जायेगा।
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं।।
रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि अरे तपस्वी! सुनो, मैं ऐसा भाव रूपी योद्धा नहीं हूँ, जिनको तुमने भाव द्वन्द्व के युद्ध में जीता है। मेरा नाम काम रूपी रावण है और मेरे प्रभाव को समस्त संसार जानता है। समस्त चक्रोंरूपी लोक मेरे अधीन हैं अर्थात् समस्त चक्र काम के प्रभाव में होते हैं।
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा।।
निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु।।
व्याख्या : तुमने राग-द्वेष रूपी खर-दूषण को और विरोध रूपी विराध भाव को मारा है तथा भोग बल रूपी बालि को व्याध की तरह मारा है। तुमने बहुत से आसुरी भाव रूपी योद्धाओं को मारा है। तुमने आलस्य रूपी कुंभकर्ण व अहंकार रूपी मेघनाद को भी मारा है।
आजु बय डिग्री सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाही।।
आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले।।
व्याख्या : हे भावों के अधिष्ठाता आत्मा रूपी राम! अगर तुम भाव द्वन्द्व से भागे नहीं तो मैं (काम) आज सारा बदला ले लूँगा। आज मैं तुमको काल के हवाले कर दूँगा, क्योंकि तुम आज कठोर काम (रावण) के पाले में पड़ गए हो।
सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना।।
सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के दुर्वासना युक्त वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम ने काम को काल के वश में जाना अर्थात् समय सापेक्ष से प्रभावित जाना। इसलिए हँसकर बोले कि तुम्हारी प्रभुता अर्थात् तुम्हारा प्रभाव सत्य है। परन्तु अब व्यर्थ की बकवास मत करो और अपनी वीरता (मनुसाई) दिखाओ अर्थात् मन को वश में करके दिखाओ।
छ0 जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।
संसार महँ पुरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा।।
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं।।
व्याख्या : व्यर्थ की बकवास करने से यश का नाश हो जाता है। क्षमा करना, मैंने ऐसी नीति सुनी है कि संसार में तीन प्रकार के भाव रूपी पुरुष होते हैं, जैसे पाटल (गुलाब) आम और कटहल के समान। एक पाटल (गुलाब) केवल फूल देते हैं, एक आम फूल और फल दोनों देते हैं तथा एक कटहल केवल फल ही देता है। इसी प्रकार एक भाव रूपी पुरुष केवल कहते हैं, करते नहीं हैं, दूसरे कहते और करते हैं तथा तीसरे केवल करते हैं, पर वाणी से नहीं कहते हैं।
दो0 राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान।।90।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की बातें सुनकर काम रूपी रावण हँसा और बोला कि अब मुझे ज्ञान सिखा रहे हो। मुझ काम से बैर करते हुए, तब नहीं डरे और अब प्राण प्रिय लग रहे हैं।
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर।।
नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अ डिग्री बिदिसि गगन महि छाए।।
व्याख्या : दुर्वासना रूपी वचन कहने से काम का भाव क्रोधित हो उठा और बज्र के समान बाण छोड़ने लगा अर्थात् काम के भावों का प्रहार करने लगा। अनेकों प्रकार के काम के भावों रूपी बाण दौड़े और प्राण व उप प्राण रूपी दिशा-विदिशाओं में, मस्तिष्क रूपी आकाश व शरीर रूपी पृथ्वी में, सब जगह छा गए।
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा।।
छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने ज्ञान रूपी अग्नि बाण छोड़ा जिससे क्षणमात्र में सब काम के भाव रूपी असुर मर गए। तब काम के भाव ने क्षुब्ध होकर तीक्ष्ण काम इच्छा रूपी शक्ति छोड़ी परन्तु आत्मा रूपी राम ने सद्प्रेरणा रूपी बाण द्वारा वापिस भेज दिया।
कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै।।
निफल होहिं रावन सर कैसे। खल के सकल मनोरथ जैसे।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने नाना स्तर के चक्रों पर त्रिगुण रूपी त्रिशूल चलाया अर्थात् सत, रज व तम गुणों का प्रभाव फैलाया परन्तु आत्मा रूपी राम ने सहज में तीन गुणों (त्रिशूल) के प्रभाव को काट दिया। काम भाव के वासना रूपी बाण कैसे निष्प्रभावी हो गए, जैस दुष्ट वृति वाले के मनोरथ अर्थात् मनोकामना निष्फल हो जाती हैं।
तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि।।
राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने आत्मा रूपी राम के सारथी (अर्थात् सात्विक वृति रूपी सारथी) को सत अर्थात् सात्विकता रूपी बाण मारा। जिससे सारथी आत्मोन्मुखी होकर गिर पड़ा। सत बाण का प्रतीक दिखावे की सात्विकता से है क्योंकि काम का भाव कई बार दिखावे की सात्विकता दिखा कर भी साधक को धोखा दे देता है। तब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा रूपी कृपा करके सात्विक वृति रूपी सारथी को उठाया अर्थात सहारा दिया। तब आत्मा रूपी राम को बहुत क्रोध आ गया। अर्थात् सात्विकता का दिखावा देखकर आत्म चेतना क्षुब्ध हो उठी।
छ0 भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे।
कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे।।
मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।
चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे।।
व्याख्या : जब काम की प्रबलता को देखकर आत्मा क्षुब्ध हो उठी, तो आत्म प्रेरणा रूपी बाण कसमसाने लगे अर्थात् प्रेरणा की तरंगें उठने लगी। उस समय वासनाओं को दण्ड देने की प्रेरणा की तरंगों से मन के सब भाव प्राणवायु ने ग्रसित कर लिए। तब मन के अंदर की मंदोदरी रूपी आसुरी बुद्धि काँप उठी और देह के अंदर स्थित भाव रूपी भवसागर कम्पित हो उठा। ऐसी अवस्था में दस प्राण रूपी हाथी चिंघाड़ उठे और भावों के द्वन्द्व की यह अवस्था देखकर स्वर हँसने लगे अर्थात् स्वरों की गति सहज होने लगी।
दो0 तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।
राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल।।91।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने संयम रूपी धनुष को चढ़ाकर शब्द रूपी भयानक बाण छोड़े। वे आत्मा की तरंगों से निकले प्रेरणा रूपी बाण सर्प के समान लहलहाते हुए चले।
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।
रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम के सद्प्रेरणा रूपी बाण ऐसे चले मानों पंख वाले सर्प उड़ रहे हों। सबसे पहले तो काम के वृति रूपी सारथी को मार दिया और फिर काम के मन रूपी घोड़े को मार गिराया। फिर काम की वृति रूपी रथ को तोड़कर वासना रूपी पताका को गिरा दिया। तब क्षुब्ध होकर काम रूपी रावण का भाव गरजा परन्तु अन्दर से उसका बल थक गया था। अर्थात् अन्दर से काम का भाव कमजोर हो गया था।
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना।।
बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण क्षुब्ध होकर तुरन्त दूसरी काम वृति रूपी रथ पर चढ़ गया और नाना प्रकार के वासना व लालसा रूपी अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करने लगा। परन्तु काम के भाव के सब प्रयास वैसे ही विफल हो जा रहे थे, जैसे परद्रोह मन में रखने वाले की मनोकामना निष्फल हो जाती है।
तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा।।
तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने दस प्राणों में दस वासना रूपी त्रिशूल चलाए अर्थात् दसों प्राणों में सत, रज व तमो गुणों से युक्त वासना पैदा कर दी, जिससे सद्वृति रूपी यम, नियम, संयम व दम रूपी चारों घोड़े मर गए। तब आत्मा रूपी राम ने यम, नियम, संयम, व दम रूपी घोड़ों को उठाया अर्थात् पुन: प्रबल किया और शिव संकल्प करके प्रेरणा रूपी बाण छोड़े।
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।।
दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रूधिर पनारे।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के कमल रूपी सिरों के वन में आत्मा रूपी राम के सद्प्रेरणा रूपी बाण भ्रमर के समान चले। आत्मा रूपी राम ने दसों इन्द्रियों रूपी सिरों में दस सद्प्रेरणा रूपी बाण (क्षमा, मैत्री, धैर्य, करूणा, दया, परहित, प्रेम, सौहार्द्र, सहिष्णुता व सहयोग) मारे। जिनके लगते ही आसक्ति रूपी खून की धारा बहने लग गयी।
स्रवत रूधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना।।
तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे।।
व्याख्या : आसक्ति रूपी रक्त के बहने पर भी बलवान काम रूपी रावण दौड़ा। फिर आत्मा रूपी राम ने संकल्प रूपी धनुष पर प्रेरणा रूपी बाण का संधान किया और तीस प्रेरणा रूपी बाण भाव रूपी बीस भुजाओं सहित दस इन्द्रियों रूपी सिरों में मारे।
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने।।
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए।।
व्याख्या : भाव रूपी बीस भुजाओं और दस इन्द्रियों रूपी सिरों को काटते ही नए उग आए। इस प्रकार आत्मा रूपी राम ने बहुत बार काटे परन्तु पुन: उग आए। वास्तव में काम के भाव की यही विशेषता होती है कि वह पुन:-पुन: भावों व इन्द्रियों के माध्यम से नयेपन को प्राप्त करता रहता है।
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा।।
रहे छाइ नभ सिर अ डिग्री बाहू। मानहुँ अमित केतु अ डिग्री राहू।।
व्याख्या : बार-बार आत्मा रूपी राम सद्प्रेरणा रूपी बाणों से भाव रूपी बीस भुजाओं और इन्द्रियों रूपी दस सिरों को काटते हैं। क्योंकि आत्मा रूपी राम बहुत कौतुकी हैं अर्थात् भावों के अनुसार खेलने वाले हैं। उस अवस्था में मस्तिष्क रूपी आकाश में भाव रूपी भुजाएँ और इन्द्रियों रूपी सिर छा गए, मानो वासना रूपी केतु और राहू छा गए हों।
छ0 जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्रवत सोनित धावहीं।
रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं।।
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।
जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में ऐसा लगता है मानों वासना व लालसा रूपी राहु व केतु आसक्ति रूपी रूधिर बहाते हुए मस्तिष्क रूपी आकाश में दौड़ रहे हैं। वे वासना व लालसा रूपी राहू केतु आत्मा रूपी राम के सद्प्रेरणा रूपी बाणों के कारण भोग रूपी भूमि पर नहीं गिर पा रहे हैं। वे वासना व लालसा रूपी कटे हुए सिर आकाश में ऐसे सुशोभित होने लगते हैं, मानों क्रोधित होकर ज्ञान रूपी सूर्य की किरणों ने राहू व केतु रूपी वासना-लालसा को पिरो दिया हो।
दो0 जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार।।92।।
व्याख्या : जैसे-जैसे आत्मा रूपी राम काम रूपी रावण के इन्द्रिय रूपी सिरों को काटते हैं वे वैसे-वैसे अपार होते चले जाते हैं। अर्थात् इन्द्रियों का दमन करने से काम और तीव्रता से बढ़ता चला जाता है। जैसे विषयों का सेवन करने से काम दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दमन करने व सेवन करने से दोनों ही अवस्थाओं में काम बढ़ता चला जाता है।
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी।।
गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी।।
व्याख्या : इन्द्रियों रूपी सिरों की प्रबलता बढ़ती देखकर काम रूपी रावण मरना भूलकर उल्टा क्षुब्ध हो उठा। तब वह अभिमानी काम गरजना करने लगा और दसों धनुषों अर्थात् दसों प्राण वायु में दौड़ने लगा।
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो।।
दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की अवस्था में काम रूपी रावण क्रोधित हो उठा अर्थात् काम का भाव क्षुब्ध हो उठा, तो वासना रूपी बाणों की वर्षा करके आत्मा रूपी राम की सद्वृतियों रूपी रथ को आच्छादित कर दिया अर्थात् काम की वासना ने सद्वृतियों को आच्छादित कर दिया। कुछ क्षण के लिए तो सद्वृतियों रूपी रथ लुप्त हो गया, जैसे कुहरे में ढँककर सूर्य छुप जाता है।
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा।।
सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिसि गगन महि पाटे।।
व्याख्या : सद्वृतियों रूपी रथ को आत्मा सहित वासना से आच्छादित देखकर दैवीय भावों में हाहाकार मच गया। तब आत्मा रूपी राम ने क्रोध संकल्प रूपी धनुष हाथ में लिया और काम रूपी रावण के इन्द्रिय भाव रूपी सिरों को काटकर प्राण व उपप्राण रूपी दिशा-विदिशाओं में मस्तिष्क रूपी आकाश व देह रूपी पृथ्वी को पाट दिया अर्थात् सर्वत्र वासनाओं के प्रभाव को रोक दिया।
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।
कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा।।
व्याख्या : इन्द्रिय भाव रूपी कटे हुए सिर मस्तिष्क रूपी आकाश में दौड़ने लगते हैं और जीत लो, जीत लो की ध्वनि पैदा करके भय पैदा करने लगते हैं। वे आसुरी भाव कहने लगते हैं कि लखन भाव व सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव कहाँ हैं? आत्मा रूपी राम कहाँ पर है?
छ0 कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।
संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले।।
सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिली।
करि रूधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर इन्द्रिय भाव रूपी सिरों के समूह दौड़े, तो यह देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर दौड़ चले। तब आत्मा रूपी राम ने शिव संकल्प रूपी धनुष लेकर सद्प्रेरणा रूपी बाणों से उन इन्द्रिय भाव रूपी सिरों को बेध डाला अर्थात् इन्द्रिय भाव को मिटा दिया। तब इन्द्रिय भाव रूपी सिरों की माला को लेकर कालिकाएँ (अर्थात् कालातीत अवस्था के भाव) चलीं। उस अवस्था में ऐसा लग रहा था मानों आसक्ति रूपी रक्त में स्नान करके भाव द्वन्द्व के वट वृक्ष को पूजने के लिए चलीं हों। अर्थात् कालातीत भाव पैदा होकर वासनाओं के मूल को समझने के लिए चले।
दो0 पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड।।93।।
व्याख्या : तब दस इन्द्रियों रूपी मुखों वाले काम रूपी रावण ने क्षुब्ध होकर प्रचण्ड वासना की शक्ति का प्रहार किया। जो वैराग्य रूपी विभीषण की तरफ काल के दण्ड के समान चली।
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा।।
तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला।।
व्याख्या : उस प्रचण्ड वासना रूपी शक्ति को आता देखकर आत्मा रूपी राम ने तुरन्त वैराग्य रूपी विभीषण के भाव को पीछे धकेल दिया और वासना रूपी शक्ति को स्वयं आत्मा ने सह लिया। क्योंकि आत्मा का तो यह लक्षण होता है कि वह प्राण के माध्यम से भावों को तारती है और प्राणों के माध्यम से ही भावों को ग्रहण करती है।
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई।।
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्द होइ धायो।।
व्याख्या : वासना रूपी शक्ति के लगने से आत्मा रूपी राम को थोड़ी मुर्छा आ गयी अर्थात् आत्मा पर वासना थोड़ी आच्छादित हो गयी। आत्मा के इस खेल को देखकर दैवीय भाव व्याकुल हो उठे। जब वैराग्य रूपी विभीषण के भाव ने देखा कि आत्मा पर वासना का प्रभाव हो गया है, जिससे आत्मा रूपी राम थक गए हैं, तो वह (वैराग्य) तुरन्त गदा लेकर अर्थात् मन में दृढ़ता लाकर क्रोधित होकर दौड़ पड़ा।
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे।।
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण बोला कि अरे कुभाग्य अर्थात प्रकृति के प्रतिकूल (कुअ भाग)। मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि! तू स्वर, धड़कन (नर), मन के भाव, नाग प्राण वायु सबके प्रतिकूल रहने वाला है। तूने दृढ़ विश्वास रूपी शिव को इन्द्रियों रूपी सिर चढ़ाए हैं। इसलिए एक के बदले अनेक स्तर के सिर पाए हैं। विश्वास रूपी शंकर को सिर चढ़ाने का तात्पर्य यह है कि जब काम का भाव विश्वास कर लेता है और भोगों को ही सत्य मान लेता है, तो भोगों के प्रति विश्वास भाव पर इन्द्रियों रूपी सिरों को चढ़ाना कहा जाता है। जब एक इन्द्री का भोगों पर विश्वास हो जाता है, तो दूसरी इन्द्री स्वत: खींची चली आती है। एक इन्द्री से दूसरी इन्द्री प्रबल होने लग जाती है। उसी को एक-एक सिर के नाना (कोटि) प्रकार के सिर उग आना बताया गया है।
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो।।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा।।
व्याख्या : उसी दृढ़ विश्वास के कारण हे मूर्ख काम! तू अब तक बचा हुआ है। परन्तु अब काल तेरे सिर पर नाच रहा है। आत्मा के प्रतिकूल होकर अरे मूर्ख काम! तू समता के पद (सम्पदा उ सम अ पदा) को प्राप्त करना चाहता है। ऐसा कह कर वैराग्य रूपी विभीषण ने काम के हृदय में दृढ़ता रूपी गदा मारी अर्थात् दृढ़ वैराग्य की प्रेरणा की।
छ0 उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि परयो।
दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भरयो।।
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै।।
व्याख्या : जब काम रूपी रावण के हृदय के बीच में वैराग्य भाव की दृढ़ता रूपी गदा का प्रहार हुआ, तो काम का भाव भूमि पर गिर गया अर्थात् काम व्याकुल होकर क्षणभर के लिए वैराग्य के प्रभाव में आ गया। उस अवस्था में दस इन्द्रियों रूपी मुखों से आसक्ति रूपी रक्त बहने लगा। परन्तु क्षण भर में ही काम का भाव पुन: संभलकर क्षुब्ध होकर दौड़ा अर्थात् पुन: काम का भाव प्रबल हो उठा। अब उस अवस्था में काम का भाव व वैराग्य का भाव द्वन्द्व में मल्ल की तरह लड़ने लगे। परन्तु आत्मा की प्रेरणा के बल से वैराग्य का भाव काम के भाव की कुछ भी परवाह नहीं कर रहा था।
दो0 उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितन कि काउ।
सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ।।94।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जो वैराग्य का भाव काम के भाव की तरफ देख भी नहीं पाता था, वही वैराग्य का भाव आत्मा की प्रेरणा के बल से काल के समान लड़ने लगा है।
देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी।।
रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता।।
व्याख्या : जब वैराग्य के भाव को बहुत थका हुआ देखा तो अनन्य बुद्धि का भाव दृढ़ता रूपी पर्वत को लेकर दौड़ा और काम के वृति रूपी रथ, सारथी व मन रूपी घोड़ों को मार दिया तथा हृदय के बीच में लात मार दी अर्थात् काम के हृदय में परमात्मा से अनन्यता का संदेश दे दिया।
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता।।
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी।।
व्याख्या : काम का भाव उस अवस्था में खड़ा रह गया और उसके अंग काँपने लगे। तब वैैराग्य का भाव आत्मा के पास गया अर्थात् वैराग्य का भाव आत्मोन्मुखी हो गया। फिर काम के भाव ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को ललकार करके मारा। तब अनन्य बुद्धि का भाव लग्न रूपी पूँछ फैलाकर मस्तिष्क रूपी आकाश में चले गए।
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना।।
लरत अकास जुगल सम जोधा। एकहि एकु हनत करि क्रोधा।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की लग्न रूपी पूँछ पकड़ ली और अनन्य बुद्धि के साथ मस्तिष्क रूपी आकाश में उड़ चला। फिर अनन्यता का भाव और काम का भाव भिड़ गए। मस्तिष्क रूपी आकाश में दोनों भाव रूपी योद्धा लड़ने लगे और क्रोध कर करके एक दूसरे को मारने लगे।
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जलगिरि सुमे डिग्री जनु लरहीं।।
बुधि बल निसिचर परइ न पारयो। तब मारूत सुत प्रभु संभारयो।।
व्याख्या : दोनों भाव मस्तिष्क रूपी आकाश में छल-बल करते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानों कज्जलगिरि और सुमे डिग्री पर्वत लड़ रहे हों अर्थात् वासना रूपी कज्जलगिरि और सात्विकता रूपी सुमे डिग्री लड़ रहे हों। जब बुद्धि के बल पर काम का भाव गिराए न गिरा तब अनन्य बुद्धि के भाव ने आत्मा रूपी राम का स्मरण किया अर्थात् जब बुद्धि के बल का काम पर असर नहीं हुआ तो अनन्य बुद्धि का भाव आत्मोन्मुखी हो गया। वास्तव में जब काम बहुत ज्यादा सताए और किसी भी प्रकार बुद्धि की युक्ति नहीं चले तो परमात्मा का स्मरण शु डिग्री कर देना चाहिए। उससे काम का भाव शान्त होने लग जाता है।
छ0 संभारि श्री रघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो।
महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगत कहुँ जय जय भन्यो।।
हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले।
रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले।।
व्याख्या : परमात्मा का स्मरण करके अनन्य बुद्धि के भाव ने काम के भाव को मारा। भूमि पर गिरकर काम का भाव पुन; लड़ने लगा। ऐसी अवस्था में भाव रूपी देवता दोनों भावों की ही जय-जयकार करने लगते हैं। जब अनन्य बुद्धि के भाव को संकट में देखा तो बुद्धि के अन्य भाव क्रोधित होकर दौड़े। परन्तु क्षुब्ध काम रूपी रावण ने बुद्धि के भाव रूपी योद्धाओं को मसल डाला अर्थात् बुद्धि के तर्क आदि काम के सामने निष्प्रभावी हो गए।
दो0 तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।
कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड।।95।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर बुद्धि के भावों का झुण्ड दौड़ा। जब काम के भाव ने बुद्धि के भावों को प्रबल देखा तो वह नाना पाखण्ड प्रकट कर दिया अर्थात् बुद्धि के भावों को भ्रमित करने के लिए दिखावे का प्रदर्शन करने लगा।
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका।।
रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते।।
व्याख्या : काम के भाव की यह एक विशेषता होती है कि वह क्षण में प्रकट व क्षण में अप्रकट हो जाता है। अत: बुद्धि के भावों की प्रबलता को देखकर क्षण भर के लिए काम रूपी रावण अन्तर्ध्यान हो गया। फिर वह काम का भाव नाना रूपों में प्रकट हो गया। आत्मा रूपी राम की सेना में जितने बुद्धि के भाव रूपी वानर थे, काम के रूप भी उतने ही प्रकट हो गए। अर्थात् बुद्धि के अनुरूप ही दसों इन्द्रियों में काम के भाव प्रकट हो गए।
देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अ डिग्री कीसा।।
भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा।।
व्याख्या : जब बुद्धि के भावों ने नाना प्रकार के काम के भावों को इन्द्रियों में देखा, तो बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू जहाँ-तहाँ भागने लगे।
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन।।
डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई।।
व्याख्या : दसों प्राण रूपी दिशाओं में नाना स्तर (कोटि) के काम भाव दौड़ने लगते हैं और भय पैदा करने वाली घोर कठोर गरजना करने लगते हैं। जिससे सब दैवीय भाव व स्वर डर कर चाल बदल देते हैं और कहने लगते हैं कि अब काम को जीतने की आशा मत रखो।
सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर।।
रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी।।
व्याख्या : एक काम के भाव ने समस्त स्वरों को वश में कर लिया था। अत: अब तो बहुत सारे स्तर के काम भाव पैदा हो गए हैं, इसलिए अब कोशिकाओं व कोश रूपी गुफाओं का ही सहारा लो। उस अवस्था में बुद्धि रूपी ब्रह्मा, विश्वास रूपी शंकर व मन के ज्ञान के भाव ही बच पाए थे, जो आत्मा की महिमा को कुछ हद तक जानते थे।
छ0 जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।
चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे।।
हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे।
मर्दहि दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे।।
व्याख्या : जो भाव आत्मा के प्रताप (प्रभाव) को जानते थे, वे सब काम के भाव के सामने निर्भय खड़े रहे। बाकी बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालु विचलित होकर आत्मोन्मुखी होकर चल दिए। परन्तु अनन्य बुद्धि, दृढ़ बुद्धि, निसंग बुद्धि रूपी वानर भाव प्रबलता के साथ भाव द्वन्द्व में काम के भाव से लड़ते रहे और कपट की भूमि से अंकुरित काम के भावों को वे मसलते रहे।
दो0 सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।
सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस।।96।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने स्वरों व बुद्धि के भावों को व्याकुल देखा तो शिव संकल्प रूपी धनुष से प्रेरणा रूपी बाण चलाकर एक ही प्रेरणा बाण से सब काम के भावों को मार दिया।
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी।।
रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने क्षण मात्र में सब माया का नाश कर दिया। जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार का नाश हो जाता है। तब देव भावों ने काम को एक रूप में देखा तो हर्षित हो उठे और सुमन अर्थात् मन के अच्छे भाव बरस कर आत्मा को आच्छादित करने लगे। अच्छे मन के भावों की वर्षा को ही सुमन वृष्टि के प्रतीक के माध्यम से लिखा गया है।
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे।।
प्रभु बल पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने भाव रूपी प्रेरणा करके बुद्धि के भावों को लौटाया। तब बुद्धि के भाव एक दूसरे भाव को पुकारकर लौट आए। आत्मा रूपी राम की प्रेरणा का बल पाकर बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू तुरन्त रण भूमि में आ गए।
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें।।
सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल।।
व्याख्या : जब दैवीय भावों को आत्मोन्मुखी होता देखा तो काम के भाव को समझ में आ गया कि मैं (काम) इन भावों के लिए आत्मा से एक रूप हो गया हूँ। अरे मूर्खों! तुम (दैवीय) तो सदैव मेरी मार खा कर रहते हो अर्थात तुम (दैवीय) तो सदा मुझ काम से प्रभावित रहते हो। ऐसा कह कर वह क्रोध करता हुआ अर्थात् काम का भाव क्षुब्ध होता हुआ मस्तिष्क रूपी आकाश में दौड़ पड़ा।
हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे।।
देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो।।
व्याख्या : काम के भाव को क्षुब्ध हुआ देखकर दैवीय भाव व्याकुल होकर भागने लगे। तब काम रूपी रावण ने कहा कि अरे मूर्खों! तुम मेरे आगे कहाँ भाग कर जाओगे? तब दैवीय भावों को अति व्याकुल देखकर बुद्धि का दृढ़ भाव दौड़ा अर्थात् बुद्धि का दृढ़ भाव प्रबल हो उठा और काम रूपी रावण का पैर पकड़कर अर्थात् काम के मूल को पहचानकर भूमि पर गिरा दिया। वास्तव में जब काम के कारण का पता चल जाता है, तो तुरन्त काम की प्रबलता कम जाती है। उसी को भूमि पर गिराना बोलकर लिखा है।
छ0 गहि भूमि पार्यो लात मारयो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।
संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो।।
करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।
किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई।।
व्याख्या : काम के भाव को भूमि पर पटकर लात मार कर अर्थात् काम के भाव का तिरस्कार करके दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद आत्मा रूपी राम के पास गया अर्थात् आत्मोन्मुखी वृति में दृढ़ हो गया। तब काम का भाव संभल कर उठा और घोर गर्जना करने लगा अर्थात् अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा। काम का भाव क्षुब्ध होकर दसों प्राणों को प्रभावित करता हुआ वासना रूपी बाण बरसाने लगा। इस प्रकार काम के भाव ने सब बुद्धि के भाव रूपी योद्धाओं को घायल कर दिया। जिससे काम के भाव को अपने बल को देखकर हर्ष होने लगा।
दो0 तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप।।97।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने शिव संकल्प रूपी धनुष से प्रेरणा रूपी बाण चलाकर काम के भाव के इन्द्रियों रूपी सिरों व भाव रूपी भुजाओं को काट दिया। परन्तु इन्द्रिय रूपी सिर व भाव रूपी भुजाएँ तो ऐसे बढ़ने लगे जैसे तीर्थ पर पाप बढ़ने लगता है। अर्थात् काम का दमन करने पर क्षुभित होकर काम के भाव व इन्द्रियाँ बढ़ने लग जाती हैं।
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी।।
मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा।।
व्याख्या : काम रूपी शत्रु के इन्द्रियों रूपी सिरों व भाव रूपी भुजाओं को बढ़ता देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानरों को बहुत गुस्सा आया। बुद्धि के भावों को लगने लगा कि इन्द्रियों रूपी सिरों और भाव रूपी भुजाओं के कट जाने पर भी मूढ़ काम का भाव नहीं मर रहा है। इसलिए बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू क्रोध करके दौड़े।
बालितनय मारूति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला।।
बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि त डिग्री गहि कपिन्ह सो मारा।।
व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान, निसंग बुद्धि रूपी नल व नील, सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव व द्वैत बुद्धि रूपी दुविद बलवाले बुद्धि के भाव दृढ़ता रूपी वृक्षों और पर्वतों का काम के भाव पर प्रहार करने लगते हैं परन्तु काम का भाव उतनी ही दृढ़ता से बुद्धि के भावों पर प्रहार करने लगता है।
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी।।
तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ।।
व्याख्या : कोई बुद्धि रूपी वानर भाव ज्ञान की जिज्ञासा रूपी नखों से काम रूपी रावण के शरीर को फाड़कर व काम का तिरस्कार करके भाग जाता है। तब निसंग बुद्धि रूपी नल-नील का भाव काम के भाव के सिर पर चढ़ गए और ज्ञान की जिज्ञासा रूपी नखों से काम के कपाल को फाड़ दिया अर्थात् निसंग बुद्धि के भाव ने प्रबल होकर काम की गति को जानने का प्रयास किया।
रूधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी।।
गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं।।
व्याख्या : आसक्ति रूपी रूधिर को बहता देखकर काम के भाव को बहुत विषाद अर्थात् विषयों के सुख के अन्त का दु:ख हुआ और काम के भाव ने काम के भाव रूपी भुजाओं को फैलाकर निसंग बुद्धि रूपी नल-नील को पकड़ना चाहा, परन्तु पकड़ नहीं पाया क्योंकि निसंग बुद्धि के भाव तो अनासक्त होकर ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं। मानों कमल के वन में भ्रमर ऊपर-ऊपर उड़ रहे हों। वास्तव में निसंग बुद्धि के भाव आसक्ति में नहीं पड़ते हैं।
कोपि कूदि दौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी।।
पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे।।
व्याख्या : तब क्रोधित होकर काम के भाव ने निसंग बुद्धि रूपी नल-नील को पकड़ लिया अर्थात् निसंग बुद्धि पर काम के भाव का प्रभाव हो गया। परन्तु भूमि पर पटकते समय निसंग बुद्धि के भाव काम की भावों रूपी भुजाओं को मरोड़कर भाग गए। अर्थात् निसंग बुद्धि के भाव काम के प्रभाव से मुक्त हो गए। तब काम के भाव ने क्षुब्ध होकर दस प्राण रूपी धनुषों को हाथ में लिया अर्थात् काम के भावों का दसों प्राणों में प्रभाव हो गया। दस प्राणों में काम के भाव रूपी बाण चलने लगे।
हनुमदादि मुरूछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर।।
मुरूछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा।।
व्याख्या : अनन्य भाव रूपी हनुमान आदि बुद्धि के भावों को मूर्छित कर संध्या काल पाकर काम का भाव बहुत प्रसन्न हुआ। फिर धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने बुद्धि के सब भावों को मूर्छित देखा अर्थात् काम के प्रभाव में देखा, तो भाव द्वन्द्व में धैर्य रखने वाला धीर बुद्धि का भाव दौड़ा।
संग भालु भूधर त डिग्री धारी। मारन लगे पचारि पचारी।।
भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना।।
व्याख्या : धीर बुद्धि रूपी जामवंत के साथ जो धीर बुद्धि रूपी अन्य भालू थे, वे दृढ़ता रूपी पर्वतों व वृक्षों को लेकर काम के भाव को ललकार-ललकारके मारने लगे। तब काम का भाव अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा और धीर बुद्धि के भाव रूपी अनेक योद्धाओं को पृथ्वी पर पटकने लगा अर्थात् देह बुद्धि में बरतने को बाध्य करने लगा।
देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता।।
व्याख्या : धीर बुद्धि के अधिष्ठाता भाव रूपी जामवंत ने जब स्वयं के दल का नाश होते देखा तो क्रोधित होकर काम के भाव के हृदय में लात मारी अर्थात् काम का तिरस्कार कर दिया।
छ0 उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।
गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा।।
मुरूछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो।
निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतन करत भयो।।
व्याख्या : धीर बुद्धि रूपी जामवंत की दृढ़ता रूपी लात खाकर काम का भाव व्याकुल हो गया और काम की वृति रूपी रथ से गिर पड़ा। अर्थात् काम अपनी वृति को भूल गया। उसने अर्थात् काम के भाव ने भाव रूपी बीसों भुजाओं में धीर बुद्धि रूपी बीसों भालूओं को पकड़ रखा था अर्थात् काम ने धीर बुद्धि के भावों को जकड़ लिया था, जो ऐसे लग रहे थे मानों कमलों में बीस भ्रमर फँसे हों। तबकाम के भाव को मूर्छित जानकर धीर बुद्धि रूपी जामवंत का भाव आत्मोन्मुखी हो गया। तब अज्ञान रूपी रात्रि का आगमन जानकर काम के वृति रूपी सारथी काम को जागृत करने का उपाय करता रहा।
दो0 मुरूछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास।
निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास।।98।।
व्याख्या : जब बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानरों पर से काम के प्रभाव का असर मिट गया, तो सब आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी राम के पास आए। उधर सब आसुरी भावों ने भयभीत होकर काम रूपी रावण को चारों तरफ से घेर लिया।
।। मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम ।।
तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई।।
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी।।
व्याख्या : तीन गुणों में रमण करने वाली आसुरी वृति रूपी त्रिजटा उस अज्ञान रूपी रात्रि में सुरता रूपी सीता के पास गयी और सारी भाव द्वन्द की बातें बतायी। काम रूपी रावण के इन्द्रियों रूपी सिरों और भाव रूपी भुजाओं के बढ़ने की बात सुनकर सुरता रूपी सीता के हृदय में भय पैदा हो गया।
मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता।।
होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता।।
व्याख्या : काम की प्रबलता की बात सुनकर सुरता का भाव मलीन व चिन्तायुक्त हो गया। तब सुरता रूपी सीता त्रिजटा रूपी आसुरी बुद्धि से बोली कि हे माता! समस्त भावों को दु:ख देने वाला यह काम रूपी दुष्ट कैसे मरेगा?
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई।।
मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही।।
व्याख्या : आत्मी रूपी राम के सद्प्रेरणा रूपी बाणों से इन्द्रियों रूपी सिर कटने पर भी यह काम नहीं मर पा रहा है और क्रिया के विपरीत कार्य कर रहा है। मेरे (सुरता) दुर्भाग्य से ही वो काम जी रहा है अर्थात सुरता के असहज होने से ही काम जी रहा है। क्योंकि मेरी असहजता के कारण ही मैं (सुरता) आत्मा से विमुख होकर बिछुड़ गयी हूँ।
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा।।
जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए।।
व्याख्या : जिन भावों की माया ने झूठा स्वर्ण मृग बनाया, वे ही भाव अभी भी मुझ सुरता पर रूठे हैं अर्थात् अभी भी उन माया के भावों का प्रभाव है। उस झूठी माया की क्रिया (विधि) के कारण मुझ सुरता को असहनीय कष्ट हुए हैं। उसी माया के वश में होकर मैंने लखन भाव के प्रतिकूल वचन कहे थे।
रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी।।
ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना।।
व्याख्या : आत्मा से विमुखता विषयी बाणों के समान होती है, जो तक-तक कर मारते हैं। मुझ सुरता को ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में जो जीवित रखा हुआ है, वही क्रिया (विधि) काम को जीवित रखे हुए हैं।
बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की।।
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी।।
व्याख्या : इस प्रकार नाना तरह से सुरता रूपी सीता ग्लानी करने लगी और बार-बार आत्मोन्मुखी होने का प्रयास करने लगी। तब तीन गुणों में बरतने वाली त्रिजटा रूपी आसुरी बुद्धि बोली कि हे राजकुमारी! काम का भाव हृदय में सद्प्रेरणा रूपी बाण लगने से ही मर जायेगा।
प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही।।
व्याख्या : इस चौपाई में बहुत गहरा मर्म छुपा हुआ है। वास्तव में सुरता ही जगत का मूल होती है और काम के भाव में भी सुरता ही होती है। जब सुरता कामनामय होती है, तो काम प्रबल हो जाता है और जब सुरता आत्मामय होती है, तो आत्मा प्रबल हो जाती है। इसलिए सुरता का रूपान्तरण करके ही साधक काम पर विजय प्राप्त कर सकता है। सुरता को अवरूद्ध नहीं किया जा सकता है। इसलिए त्रिजटा रूपी वृति का भाव समझाता है कि काम के हृदय में सुरता का निवास है। अत: सद्प्रेरणा रूपी बाण से काम को मारने पर सुरता भी मर जायेगी और सुरता के अभाव में जगत का आभास भी मिट जायेगा।
छ0 एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है।।
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा।।
व्याख्या : त्रिजटा का भाव बोली कि काम के हृदय में जानकी अर्थात् प्राण की शक्ति निवास करती है और प्राण की शक्ति (जानकी) में मुझ आत्मा का निवास होता है और आत्मा के उदर में समस्त भुवन अर्थात् सब भावों का निवास होता है। अत: सीधा काम को मारने पर सबका नाश हो जायेगा। तब सुरता रूपी सीता के हृदय में हर्ष व विषाद की अवस्था को देखकर त्रिजटा के भाव ने कहा कि हे सुंदरी! अब काम रूपी रावण मरेगा, वो विधि (क्रिया) मैं बताती हूँ। तुम सब संशयों को छोड़ दो।
दो0 काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।
तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान।।99।।
व्याख्या : इस दोहे में त्रिजटा रूपी आसुरी बुद्धि का भाव सुरता के रूपान्तरण की क्रिया बता रहा है कि जब बार-बार इन्द्रियों रूपी सिरों को काटा जायेगा, तो काम का भाव व्याकुल हो जायेगा अर्थात् बार-बार इन्द्रियों को वश में करने पर काम का भाव व्याकुल हो जायेगा और उसका ध्यान विषयों से हट जायेगा अर्थात् काम की सुरता विषयों से हट जायेगी। तब आत्मा रूपी राम काम के हृदय में सद्प्रेरणा रूपी बाण मारकर उसे मार देंगे अर्थात् काम को वश में कर लेंगे।
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई।।
राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही।।
व्याख्या : ऐसा कह कर तीनों गुणों में रमण करने वाली त्रिजटा रूपी आसुरी बुद्धि के भाव ने सुरता रूपी सीता को बहुत प्रकार से समझाया और पुन: वह अपने भाव रूपी भवन में चली गयी। तब आत्मा रूपी राम का चिंतन करके सुरता रूपी सीता विरह व्यथा में तड़पने लगी।
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती।।
करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता अज्ञान रूपी रात्रि और ज्ञान की शीतलता रूपी चन्द्रमा की बहुत निंदा करने लगती है और कहने लगी कि अज्ञान रूपी रात्रि युग के समान बड़ी हो गयी है, जो बीतती ही नहीं है। इस प्रकार मन में बहुत ग्लानि करती हुई सुरता रूपी सीता आत्मा के विरह में बहुत दु:खी हो गयी।
जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अ डिग्री बाहू।।
सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा।।
व्याख्या : जब सुरता के हृदय में बहुत ग्लानि हो आती है, तो बाएँ अंग और आँख फड़कने लग जाते हैं। तब सुरता रूपी सीता ने शुभ शकुन जानकर हृदय में धैर्य धारण किया कि अब मुझे कृपालु परमात्मा मिलेंगे। वास्तव में साधक की सुरता जब परमात्मा के विरह में व्याकुल हो उठती है, तो साधक के बाएँ अंग फड़कने लग जाते हैं, जो सिद्धि लाभ के शुभ संकेत होते हैं।
इहाँ अर्धनिसि रावन जागा। निज सारथि सन खीझन लागा।।
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही।।
व्याख्या : उधर को अज्ञान रूपी अर्द्ध रात्रि में काम रूपी रावण जागा और वृति रूपी सारथी पर क्षुब्ध होने लगा कि अरे मूर्ख! तू मुझे भाव द्वन्द्व के बीच में से कैसे ले आया? अरे मंदबुद्धि! तूझे धिक्कार है, धिक्कार है।
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भो डिग्री भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा।।
सुनि आगवनु दसानन केरा। कपिदल खरभर भयउ घनेरा।।
व्याख्या : तब वृति रूपी सारथी ने काम के मूल को (पैर) पकड़कर काम के भाव को समझाया। तब काम रूपी रावण को नव स्फूर्ति रूपी सवेरा हुआ, तो वह पुन: वृति रूपी रथ पर चढ़ कर दौड़ा। काम को पुन: नवस्फूर्ति के साथ आया हुआ सुनकर बुद्धि के भावों में बहुत खलबली मच गयी। अर्थात् बुद्धि के भाव अस्थिर हो उठे।
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाई भट भारी।।
व्याख्या : वे बुद्धि के भाव दृढ़ता रूपी पर्वतों व वृक्षों को उखाड़ कर कटकटाहट करके दौड़े। अर्थात् बुद्धि के भावों ने जहाँ-तहाँ दृढ़ता दिखाने का प्रयास किया।
छ0 धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा।
अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा।।
बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो।
चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारी तनु ब्याकुल कियो।।
व्याख्या : जब दृढ़ता रूपी पर्वतों को हाथ में लेकर बुद्धि के भाव रूपी वानर दौड़े और क्रोधित होते हुए आसुरी भावों पर प्रहार किया तो आसुरी भाव भागने लगे। फिर बुद्धि के भावों ने आसुरी भावों को विचलित करके काम रूपी रावण को घेर लिया। फिर चारों तरफ से प्रहार करके, आसक्ति रूपी चमड़े को फाड़ करके काम के भाव को व्याकुल कर दिया।
दो0 देखि महाभट मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार।
अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार।।100।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानरों को अति प्रबल देखकर काम रूपी रावण ने विचार किया और अन्तर्धान होकर काम की नाना प्रकार की माया का विस्तार कर दिया।
छ0 जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड।
बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच।।
व्याख्या : जब काम के भाव ने नाना प्रकार के माया के पाखण्ड को किया तो बहुत से प्रचण्ड वासना के भाव पैदा हो गए। बेताल, भूत व पिशाच रूपी आसुरी भाव हाथों में आसुरी संकल्प रूपी धनुष-बाण लेकर प्रकट हो गए।
छ0 जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल।।
करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान।।
व्याख्या : आसुरी इच्छाओं रूपी योगिनियाँ आसक्ति रूपी बालों को पकड़कर व दूसरे हाथ में भोग लालसा रूपी खोपड़ियाँ लेकर आसक्ति रूपी रक्त का पान करने लगती हैं और उत्साह में भरकर नाच-गान करने लगी।
छ0 ध डिग्री मा डिग्री बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर।।
मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान।।
व्याख्या : वे आसक्ति से युक्त आसुरी इच्छाओं रूपी योगिनियाँ पकड़ो-मारो की आवाजें करने लगी और यह आवाज चारों तरफ छा गयी अर्थात् सब प्राणों में छा गयी। वे मुख फाड़कर बुद्धि के भावों को खाने को दौड़ने लगी। ऐसा देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर भागने लगे।
छ0 जहँ जाहिं मर्कट भागी। तहँ बरत देखहिं आगि।।
भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु।।
व्याख्या : जहाँ-जहाँ भी बुद्धि के भाव भागते हैं, वहाँ सब जगह वासना रूपी आग जलती हुई पाते हैं। इस अवस्था को देखकर बुद्धि के भालू व वानर रूपी भाव व्याकुल हो उठे। तब काम का भाव भोगों की तप्त रूपी बालू की बरसात करने लगा।
छ0 जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस।।
लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी वानरों को थका कर काम रूपी रावण जोर से गरजा। तब लखन भाव सहित सद्बुद्धि आदि के सभी भाव काम के प्रभाव से अचेत हो गए।
छ0 हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ।।
एहि बिधि सकल बल तोरी। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी श्रेष्ठ योद्धा आत्मा रूपी राम को पुकारते हैं और हाथ मलते हैं अर्थात् असहाय से हो गए। इस प्रकार काम के भाव ने समस्त भावों के बल को तोड़कर नाना प्रकार का छल किया।
छ0 प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान।
तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाई।।
व्याख्या : तब काम के भाव ने माया का भ्रम पैदा करके अनन्य बुद्धि रूपी नाना हनुमान पैदा कर दिए। अर्थात् दिखावे के लिए अनन्य बुद्धि के भाव का भ्रम पैदा कर दिए। जिन भावों ने आत्मा रूपी राम को समूह बनाकर घेर लिया। वास्तव में जब काम प्रबल होता है, तो वह अनन्यता का भ्रम पैदा कर देता है और भोगों को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करने लगता है। ऐसी अवस्था में ही साधक के भटकने की सम्भावना रहती है। ऐसी अवस्था में साधक परमात्मा से एकरूपता की थोथी बातें करने लग जाता है और अपने आपको ही परमात्मा मानकर भोगों में लिप्त हो जाता है। यह भ्रम इतनी सूक्ष्मता के साथ पैदा होता है कि बिना समर्थ गु डिग्री की कृपा के उसे पहचानना ही मुश्किल हो जाता है।
मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ।।
दहँ दिस लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज।।
व्याख्या : वे भ्रमवश पैदा हुए अनन्यता के भाव आत्मा को आच्छादित करके आसक्ति रूपी पूँछ उठाकर कटकटाने लगते हैं। वे भ्रमवश पैदा हुए अनन्यता रूपी लंगूर दसों प्राणों में (दसों दिशाओं) बढ़ गए और उनके बीच में आत्मा रूपी राम होते हैं अर्थात् दिखावे के भाव सब तरफ से आत्मा को आच्छादित कर लेते हैं।
छ0 तेहि मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही।।
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।
रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी।।
व्याख्या : उन दिखावटी अनन्यता के भावों के बीच में आत्मा रूपी राम श्याम बर्ण वाले शरीर सहित ऐसे शोभा पाने लगते हैं मानो तुंग तमाल अर्थात् अर्थात प्रचण्ड तामसिक गुणों की अवस्था में इन्द्रियों की इच्छा रूपी बाड़ बन गयी हो। अर्थात् प्रचण्ड तमोगुणी अवस्था में जैसे इन्द्रियों की इच्छाएँ सुशोभित होती हैं, वैसे ही दिखावटी अनन्यता की अवस्था में आत्मा आच्छादित होकर सुशोभित होती है। आत्मा को अनन्यता के दिखावटी भावों से आच्छादित देखकर दैवीय भाव हर्ष व विषाद में पड़कर आत्मा की जय-जयकार करने लगे। तब आत्मा ने प्रबल होकर एक ही दृढ़ता रूपी बाण से सब भ्रम के भावों का नाश कर दिया।
छ0 माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे।
सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे।।
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।
सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं।।
व्याख्या : माया के भ्रम के मिट जाने पर बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू दृढ़ता रूपी पर्वत व वृक्ष लेकर फिर लड़ने को लौट आए। तब आत्मा रूपी राम ने सद्प्रेरणा व संयम रूपी अनेक बाण छोड़कर काम के भाव के इन्द्रियों रूपी सिरों व भाव रूपी भुजाओं को काट दिया। आत्मा रूपी राम व काम रूपी रावण के भावद्वन्द्व का वर्णन करोड़ों कल्पना करके गाने पर भी सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि भी पूरी तरह नहीं गा सकते। अर्थात् आत्मा व काम के द्वन्द्व को पूरी तरह समझ पाना असंभव है।
दो0 ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।
जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास।।101(क)।।
व्याख्या : उसी आत्मा व काम के द्वन्द्व के अनुभव को कुछ हद तक तुलसीदास ने ध्यान में बुद्धि को स्थिर (जड़ अ मति) करके बताया है। उस अनुभव को तो साधक स्वयं की क्षमता के अनुसार ही प्राप्त कर सकता है। जैसे मक्खी स्वयं की क्षमता के अनुसार ही आकाश में उड़ पाती है।
दो0 काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस।।101(ख)।।)
व्याख्या : बहुत बार इन्द्रिय रूपी सिरों व भाव रूपी भुजाओं को काटने पर भी काम रूपी रावण नहीं मर पा रहा है। आत्मा रूपी राम तो द्वन्द्व क्रीड़ा कर रहे हैं परन्तु स्वर, सिद्ध व मन के भावों को व्याकुल देख आत्मा रूपी राम को बहुत क्लेश हुआ।
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा।।
व्याख्या : बार-बार इन्द्रिय रूपी सिरों को काटने पर अर्थात बार-बार इन्द्रियों को काम से हठाने पर वे उतनी ही प्रबलता से बढ़ने लगी जैसे ज्यादा लाभ होने पर लोभ अधिक बढ़ता जाता है। इस प्रकार काम रूपी शत्रु बहुत प्रयास करने पर भी मरने में नहीं आया। तब आत्मा रूपी राम ने वैराग्य रूपी विभीषन की तरफ देखा अर्थात् वैराग्य भाव की सहायती माँगी, ताकि काम का भाव मर सके।
उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा।।
सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जिसकी इच्छा से काल भी मर जाता है अर्थात् जिस आत्मा की प्रेरणा से काल भी मर जाता है। वह वैराग्य के भाव की प्रेम परीक्षा के लिए वैराग्य भाव की सहायता चाहता है। तब वैराग्य का भाव बोला कि हे सर्वज्ञ व समस्त चराचर के स्वामी! तुम प्राण के माध्यम से सबका पालन करने वाले व स्वरों व मन के भावों को सुख देने वाले हो।
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें।।
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरिषि गहे कर बान कराला।।
व्याख्या : हे नाथ! काम रूपी रावण के नाभी में अमृत रस बसता है जिसके बल से काम रूपी रावण जीवित रहता है। नाभिकुण्ड का बहुत गहरा रहस्य है। इसलिए सभी साधना पंथों में नाभिकुण्ड अर्थात् मणिपूरक चक्र का बहुत महत्व बताया गया है। नाभि मण्डल से काम का भाव अहार के रस को ग्रहण करके इन्द्रियों को बलवान करता है। इसलिए बिना नाभिमण्डल को जागृत किए करोड़ों प्रयास करने पर भी इन्द्रियाँ निस्तेज नहीं हो सकती हैं। अत: साधक को चाहिये कि वो नाभिमण्डल से मिलने वाले रस को इन्द्रियों को नहीं मिलने दे। तब जाकर ही काम का भाव मारा जा सकता है। नाभि मण्डल से तीन नाड़ियाँ निकलकर एक तो प्रमस्तिष्क में खुलती है, जो वासना रूपी लंका का निर्माण करती है और काम को बलवान करती है। यह नाड़ी तमो नाड़ी होती है जिसका दूसरा नाम यमुना नाड़ी भी होता है। दूसरी नाड़ी अगस्त्य कोष में खुलती है, जो रजो नाड़ी के नाम से जानी जाती है और तीसरी नाड़ी ब्रह्मरन्ध्र में खुलती है, जो सुष्मना के नाम से जानी जाती है। जब अहार से उत्पन्न रस का प्रवाह तमो नाड़ी में ज्यादा हो जाता है, तो काम का भाव प्रबल हो जाता है और उसके दस इन्द्रियोंरूपी सिर बार-बार उग आते हैं। परन्तु जब आहार का रस रजो नाड़ी में ज्यादा प्रवाहित होता है, तो धीरे-धीरे वैराग्य वृति प्रबल होने लगती है और अग अ अस्त अर्थात् भविष्य की चिंताओं का लोप होने लग जाता है। उसी को अगस्त्य कोष कहा जाता है जो भाव रूपी भव सागर को सोख लेता है। तीसरी नाड़ी सुष्मना नाड़ी होती है जिसमें आहार के रस का प्रवाह ज्यादा होने पर आत्मा का बल बढ़ जाता है। अत: वैराग्य का भाव यही मर्म बताता है कि तमो नाड़ी में प्रवाहित होने वाले रस को सूखा डालिए, तो काम रूपी रावण स्वत: मर जायेगा। तब वैराग्य रूपी विभीषण की बातें सुनकर आत्मा रूपी राम ने प्रसन्न होकर संयम रूपी विकराल बाण हाथ में लिये।
असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहुस्वाना।।
बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू।।
व्याख्या : संयम रूपी बाणों को हाथ में लेने पर काम रूपी रावण के लिए नाना अशुभ होने लगा। वासना व लालसा रूपी गधे, सियार व कुत्ते रोने लगे। काम रूपी रावण को अशुभता का संकेत देने के लिए भोग रूपी पक्षी बोलने लगे और जहाँ तहाँ विकृत वासना रूपी केतू आकाश में प्रकट हो गए।
दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा।।
मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी।।
व्याख्या : संयम रूपी बाणों से दस प्राण रूपी दसों दिशाओं में जलन होने लगी और बिना कारण ही ज्ञान रूपी सूर्य काम पर राग (क्रोध) करने लगा। उस अवस्था में मन के अंदर की बुद्धि रूपी मंदोदरी कम्पित हो उठी। तीन गुणों से युक्त प्रकृति (प्रतिमा) द्रवित होकर जल बहाने लगी। अर्थात् त्रिगुणात्मक प्रकृति भी द्रवित हो उठी।
छ0 प्रतिमा रूदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।
बरषहिं बलाहक रूधिर कच रज असुभ अति सक को कही।।
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए।।
व्याख्या : त्रिगुणात्मक प्रकृति द्रवित हो गयी और मस्तिष्क रूपी आकाश में वासनाओं का वज्रपात सा होने लगा। जिससे शरीर रूपी पृथ्वी हिल गयी। वास्तव में जब ध्यान में भाव द्वन्द्व चरम पर पहुँच जाता है, तो शरीर में कम्पन होने लग जाता है। उसी अवस्था को धरती का हिलना बोला गया है। मस्तिष्क रूपी आकाश से आसक्ति रूपी रक्त, कुभोग रूपी बाल व वासना रूपी धूल की वर्षा होने लगी। इस प्रकार भाव द्वन्द्व की उस अवस्था में इतनी असहजता (अमंगल) बढ़ गयी कि उसका वर्णन कौन कर सकता है। मस्तिष्क रूपी आकाश में भावों का अत्यन्त उत्पात देखकर भाव रूपी देवता व्याकुल होकर जय जय बोलने लगे। तब दैवीय भावों को ब्याकुल जानकर आत्मा रूपी राम ने शिव संकल्प रूपी धनुष पर सद्प्रेरणा से युक्त संयम रूपी बाण का संधान किया।
दो0 खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस।।102।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने दृढ़ता के साथ संकल्प रूपी धनुष को खींचकर काम की प्रकृति को भेदने के लिए एक साथ संयमादि इकतीस बाण छोड़े। आत्मा रूपी राम के वे सद्प्रेरणा रूपी बाण काल सर्प के समान चले।
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा।।
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रूडं महि नाचा।।
व्याख्या : संयम रूपी बाण ने नाभिकुण्ड को सूखा डाला अर्थात् मणिपूरक चक्र पर संयम से नाभिकुण्ड की वासनाएँ सूख गयी। दूसरे तीस बाण दस इन्द्रियों रूपी सिरों और बीस भाव (एक एक इन्द्रिय के सकारात्मक व नकारात्मक भाव होते हैं, इसलिए बीस भाव रूपी भुजाएँ बतायी गयी है) रूपी भुजाओं में जाकर लग गए।
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभुकृत दुइ खंडा।।
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी।।
व्याख्या : काम रूपी रावण का धड़ तीव्र गति से दौड़ने लगता है, जिससे शरीर रूपी पृथ्वी धँसने लगी अर्थात् शरीर व्याकुल हो उठा। तब आत्मा रूपी राम ने काम के भाव के दो टुकड़े कर दिये। तब काम का भाव जोर से गर्जना किया कि आत्मा रूपी राम कहाँ हैं? मैं उसे भाव द्वन्द्व में पछाड़ूँगा।
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर।।
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के गिरने से शरीर रूपी पृथ्वी हिल गयी तथा भाव रूपी भव सागर क्षुभित हो उठा तथा नाड़ियों, प्राणों व चक्रों में हलचल मच गयी। अर्थात् सब पर प्रभाव पड़ गया। काम रूपी रावण के दोनों टुकड़े (सात्विक काम व तामसिक काम) बुद्धि के भावों को दबाते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े।
मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा।।
प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभी बजाई।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के दस इन्द्रियों रूपी सिरों और बीस भाव रूपी भुजाओं को मन के अंदरी वाली बुद्धि के सामने रखकर आत्मा के सद्प्रेरणा रूपी बाण पुन: आत्मा में ही समा गए। यह देखकर सब दैवीय भाव प्रसन्न होकर नगाड़े बजाने लगे।
तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन।।
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मांडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा।।
व्याख्या : काम के भाव का तेज आत्मा में समा गया अर्थात् काम बल आत्मबल में रूपान्तरित हो गया। यह देखकर साधक का विश्वास भाव रूपी शंकर और सत, रज, तम व गुणातीत रूपी गुण अवस्था में सहजता आ गयी। प्रसन्नता छा गयी। आत्मा रूपी राम की जय हो, जय हो, आत्मा के सद्प्रेरणा रूपी भाव भुजाओं की जय हो की ध्वनि से समस्त मस्तिष्क रूपी ब्राह्माण्ड गूँज उठा।
बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुमन अर्थात् मन में अच्छे भावों की वर्षा होने लग जाती है और मन के भावों के समूह (मुनि वृंदा) परमात्मोन्मुखी हो जाते हैं। उस अवस्था में सभी भाव परमात्मा की जय-जयकार करने लगते हैं। हे मुकुन्द! आप की जय हो। उस अवस्था में भावों में परमात्मा की स्तुति करने की अवस्था आ जाती है। उसी अनुभूति को आगे के छन्द में लिखा गया है।
छ0 जय कृपा कंद मुकुंद द्वन्द्व हरन सरन सुखप्रद प्रभो।
खल दल बिदारन परम कारन कारूनीक सदा बिभो।।
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही।।
व्याख्या : दैवीय भाव व मन के भाव प्रसन्न होकर स्तुति करने लगते हैं कि हे कृपा के मूल! हे मोक्षदाता मुकुन्द। हे द्वन्द्वों को हरने वाले (राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मरण, मान-अपमान आदि के द्वन्द्व को हरने वाले)! हे शरणागतों को सुख देने वाले प्रभो! हे दुष्ट भावों का विदारन करने वाले! हे कारणों के भी परम कारण! हे सदा करूणा करने वाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। उस अवस्था में स्वरों के माध्यम से अच्छे मन के भावों की वर्षा होने लगती है और साधक को नगाड़ों की आवाज आने लगती है। उसी को देवताओं द्वारा हर्षित होकर फूल बरसाना और नगाड़ा बजाना बोलकर लिखा है। भाव द्वन्द्व रूपी रणभूमि में आत्मा रूपी राम के अंगों ने बहुत से काम देवों की शोभा प्राप्त की है अर्थात् आत्मा पूर्ण काम की अवस्था में अवस्थित हो गयी है।
छ0 सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं।।
भुजदंड सर को दंड फेरत रूधिर कन तन अति बने।
जनु रायमुनी तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व में जब आत्मा विजयी हो जाती है तो वह कैसे शोभा पाती है। उसी अनुभूति को इस छन्द में लिखा गया है। सिर पर जटाओं का मुकुट है अर्थात् समस्त भावों का मूल आत्मा में आकर समा गया है और बीच-बीच में आत्मा के सद्प्रेरणा रूपी फूल शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह सहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं। आत्मा रूपी राम अपनी भाव रूपी भुजाओं से शिव संकल्प रूपी धनुष व सद्प्रेरणा रूपी बाणों को फिरा रहे हैं। आत्मा रूपी राम के शरीर पर निरासक्ति रूपी रक्त के कण बहुत सुंदर लग रहे हैं। मानो तमाल के वृक्ष पर बहुत सी ललमुनियाँ चिड़ियां अपने महान सुख में मग्न हुई निश्छल बैठी हों। अर्थात आसक्ति रूपी रक्त के कण भी निरासक्ति के भाव में आत्मा में लीन होने लग गए हैं।
दो0 कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद।।103।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कृपा दृष्टि की वर्षा करके समस्त दैवीय भावों के समूह को निर्भय कर दिया। जिससे बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू हर्षित हो उठे और कहने लगे कि हे सुख के धाम! हे मोक्षदाता परमात्मा! आपकी जय हो।
पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी।।
जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं।।
व्याख्या : काम रूपी रावण के इन्द्रिय रूपी सिर को देखकर मन के अन्दरी आसुरी बुद्धि का भाव मूर्छित हो गया और पृथ्वी पर गिर पड़ा अर्थात् मन के अंदरी वाली आसुरी बुद्धि अब आसुरिता छोड़कर सहज हो गयी। आसुरी वृतियाँ मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि को रोता देखकर दौड़ी और उठाकर काम रूपी रावण के पास ले गयी।
पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा।।
उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण की गति को देखकर मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि विलाप करने लगी अर्थात् मन के अन्दर वाली आसुरी बुद्धि को ग्लानि होन लगी जिससे आसक्ति रूपी बाल खुल गए और देह बुद्धि की सुध-बुध नहीं रही। उस अवस्था में मन के अन्दरी रूपी आसुरी बुद्धि को नाना प्रकार से ग्लानि होने लगी और वह काम के प्रताप का बखान कर-करके रोने लगी। वास्तव में जब किसी भाव का रूपान्तरण होता है, तो पहले उसे ग्लानि होती है। ग्लानि होने के बाद ही वह भाव सहज हो पाता है। मन्दोदरी के भाव को भी यहाँ उसी प्रकार ग्लानि हो रही है। ज्यों ज्यों ग्लानि होती है, त्यों-त्यों भाव आत्मोन्मुखी होता चला जाता है।
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।।
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।।
व्याख्या : हे नाथ! आपके बल से सदैव शरीर रूपी पृथ्वी हिलती थी अर्थात् काम के प्रभाव से शरीर सदा प्रभावित रहता था और तुम्हारे समान अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य का भी तेज नहीं था। शेषनाग और कच्छप भी तुम्हारे भार को नहीं सह सकते थे अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति व तप रूपी कच्छप भी काम के आगे विचलित हो जाते थे। वही काम निस्तेज हो गया तो आज शरीर राख से भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है।
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहूँ न धीरा।।
भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं।।
व्याख्या : वरुण अर्थात् जल तत्व, कुबेर अर्थात् संग्रह भाव, सुरेश अर्थात् चित रूपी इन्द्र व समीर तत्व कोई भी भाव द्वन्द्व में तुम्हारे सामने नहीं टिक पाता था। आपने (काम) भाव रूपी भुजाओं के बल से काल व यम (सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह) आदि के भावों को जीत लिया था। वही आप आज अनाथ की तरह अर्थात् निस्तेज होकर पड़े हो।
जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई।।
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।।
व्याख्या : समस्त भाव जगत में आपकी प्रभुता (बड़प्पन) थी। आपके द्वारा उत्पन्न मोह आदि पुत्रों व कुटुम्बियों के बल का भी वर्णन नहीं किया जा सकता है। परन्तु आत्मा के प्रतिकूल होने के कारण तुम्हारी यह दशा हुई है, जिसके कारण आसुरी कुल में कोई नहीं बचा है।
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा।।
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।।
व्याख्या : हे काम रूपी नाथ! सब क्रियाओं का प्रपंच (घटना) तो तुम्हारे हाथ में ही था। सभी प्राण रूपी दिशाएँ नित्य आपको शीश झुकाते थे अर्थात् प्राण भी वश में थे। अब तुम्हारे इन्द्रियों रूपी सिरों और भाव रूपी भुजाओं को यम-नियम रूपी सियार खायेंगें। आत्मा से प्रतिकूल होने वाले के लिए यह अनुचित भी नहीं है अर्थात ऐसा ही होना चाहिये।
काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।।
व्याख्या : परन्तु काल के वश में होने के कारण आपने मेरा (मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि) कहना नहीं माना और समस्त भाव रूपी जगत के स्वामी आत्मा को तुमने केवल मन का एक सूक्ष्म भाव मात्र जाना था।
छ0 जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं।।
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं।।
व्याख्या : द्वैत रूपी वन को जलाने के लिए अग्निस्वरूप साक्षात् आत्मा को तुमने मात्र मन का एक भाव जाना था। विश्वास रूपी शिव व बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी जिनको नमन करते हैं, उन करूणामय परमात्मा को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। तुम्हारी वृति सदैव ही दूसरों से द्रोह करने की थी तथा सदैव चिन्ता पैदा करने वाली रही है। इतना होने पर भी तुमको आत्मा रूपी राम ने अपने में लीन कर लिया है। मैं उस निर्विकार माया रहित परमात्मा को नमस्कार करती हूँ।
दो0 अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान।।104।।
व्याख्या : हे नाथ! आत्मा रूपी राम के बराबर कृपा समुद्र और कोई नहीं होता अर्थात् आत्मा के समान कृपा करने वाला कोई नहीं होता। जो गति योगियों को भी दुर्लभ होती है, वही गति तुमको प्रकृति को वश में करने वाले परमात्मा (भगअ वान उ प्रकृति को वश में करने वाला) ने दी है।
मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना।।
अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमार्थबादी।।
व्याख्या : मंदोदरी रूपी मन के अन्दरी आसुरी बुद्धि के वचनों को सुनकर सभी दैव भाव, मन के भाव व सिद्ध भावों को बहुत अच्छा लगा। बुद्धि रूपी ब्रह्मा, महाऐश्वर्य रूपी महेश, मन का नारद भाव, व सनकादि भाव वाले जितने भी मन के भाव परमार्थवादी थे।
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी।।
रूदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी।।
व्याख्या : उन सब भावों ने परमात्मा को दृष्टि भरकर देखा अर्थात् सब भाव आत्मोन्मुखी हो गए। सब भाव प्रेम में मग्न होकर सुखी हो गए। जब आसुरी वृतियों वाली नाड़ियों को रोता देखा अर्थात् द्रवित होता देखा तो वैराग्य रूपी विभीषण का भाव भारी दु:ख के साथ वहाँ गया। अर्थात् वैराग्य का भाव ग्लानि के साथ वहाँ गया। वैराग्य रूपी विभीषण को ग्लानि का कारण यह था कि कहीं दोबारा आसुरी वृतियाँ हावी न हो जाएँ।
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयुस दीन्हा।।
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो।।
व्याख्या : काम रूपी भाई की दशा को देखकर वैराग्य रूपी विभीषण को बहुत ग्लानि हुई। तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को प्रेरणा की। तब लखन भाव ने वैराग्य के भाव को नाना प्रकार से समझाया। तब जाकर वैराग्य का भाव पुन: आत्मोन्मुखी हुआ।
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका।।
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कृपा दृष्टि से वैराग्य के भाव को देखा और प्रेरणा की कि सब प्रकार की आसुरी वृतियों को दूर करके क्रिया द्वारा मुक्त हो जाओ अर्थात् आत्मोन्मुखी हो जाओ। तब परमात्मा की प्रेरणा के अनुसार विभीषण रूपी वैराग्य भाव ने देश व काल के अनुसार क्रिया की।
दो0 मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।
भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि।।105।।
व्याख्या : आसुरी भावों की जब ग्लानि चरम पर पहुँच जाती है, तो वे काम के भाव को तीन गुणों सहित तिलांजलि (अर्थात त्याग) दे देते हैं। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है कि मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि आदि भावों ने काम के भाव को तिलांजलि दे दी और आत्मोन्मुखी होती हुई सहज हो गयी। अर्थात् मन के अन्दर की आसुरी वृतियाँ काम का त्याग करके आत्मोन्मुखी हो गयी।
आइ बिभीषण पुनि सि डिग्री नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो।।
तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारूति नय सीला।।
व्याख्या : तब फिर वैराग्य रूपी विभीषण के भाव ने आत्मा रूपी राम को सीस नवाया अर्थात् काम के भाव को तिलांजलि देकर वैराग्य का भाव पूर्णत: आत्मोन्मुखी हो गया। तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को बुलाया और कहा कि हे लखन भाव! तुम सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव, दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद व निसंग बुद्धि रूपी नल, नील, धीर बुद्धि रूपी जामवंत व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान सहित सब भाव।
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा।।
पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ।।
व्याख्या : तुम सब भाव वैराग्य रूपी विभीषण के साथ जाओ और भोग नगरी रूपी लंका का अधिष्ठाता बना दो। मैं तो चित रूपी पिता की प्रेरणा के कारण भाव रूपी नगर में नहीं जा सकता हूँ। इसलिए अपने ही समान बुद्धि के भाव रूपी वानरों व लखन भाव को भेजता हूँ।
तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना।।
सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर बुद्धि के भाव रूपी वानर तुरन्त चले और वैराग्य भाव को राजतिलक की सब तैयारियाँ करके अधिष्ठाता बना दिया और फिर तिलक करके स्तुति की।
जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए।।
तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे।।
व्याख्या : तब सभी भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा के प्रति समर्पित हो गए और वैराग्य के भाव सहित आत्मा रूपी राम के पास आए। तब आत्मा रूपी राम ने भी बुद्धि के भाव रूपी वानरों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया और सबको अनुकूल वचन कहकर सहज कर दिया।
छ0 किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।
पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो।।
मोहि सरित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं।
संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने अमृत के समान मधुर वाणी में कहा कि तुम्हारे बल पर ही काम रूपी शत्रु मर पाया है और तुम्हारे बल से ही वैराग्य रूपी विभीषण को भोग नगरी रूपी लंका का राज मिला है। शरीर रूपी नगर में तुम्हारा यश अब सदैव नित्य नया बना रहेगा। इसलिए जो लोग मेरे सहित अर्थात् आत्मा सहित बुद्धि के भावों की शुभ कीर्ति को प्रेम पूर्वक गायेंगे, वे लोग बिना परिश्रम के ही भाव रूपी अथाह भवसागर को पार कर जायेंगे।
दो0 प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।
बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज।।106।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनने से बुद्धि के भाव नहीं अघाते हैं अर्थात् तृप्त नहीं होते हैं। इसलिए बार-बार उनमें समर्पण का भाव उमगने लगता है और वे बार-बार आत्म तत्व के चरण कमलों को पकड़ते हैं। अर्थात् बार-बार लीन होते हैं।
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना।।
समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु।।
व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को बुलाया और प्रमस्तिष्क कोश में स्थित भोग नगरी रूपी लंका में जाने को कहा और कहा कि सुरता रूपी सीता को, काम को विजय कर लिया गया है के समाचार को सुनाओ और फिर सकुशल सुरता को लै आओ।
तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए।।
बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि का भाव प्रमस्तिष्क रूपी कोश में आया। तो यह सुनकर आसुरी भाव व इच्छाएँ दौड़ने लगे। उन्होंने बहुत प्रकार से अनन्य बुद्धि की पूजा की अर्थात् अनन्य बुद्धि को मान्यता प्रदान की। वास्तव में जब काम रूपान्तरित होकर आत्मा में लीन हो जाता है, तो सभी भोग इच्छाएँ व भोग वासना के भाव भी सहज हो जाते हैं और सहज होने पर वे अनन्य बुद्धि का आदर करने लगते हैं तथा सुरता रूपी सीता को दिखा देते हैं अर्थात उस अवस्था में सहजता से ही सुरता का परिचय हो जाता है।
दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकीं चीन्हा।।
कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता।।
व्याख्या : दूर से अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने प्रणाम किया तो जानकी अर्थात् प्राण से उत्पन्न सुरता पहचान गयी कि ये तो आत्मा रूपी राम का दूत है। तब सुरता रूपी सीता ने पूछा कि हे तात! कृपा के घर आत्मा कैसे हैं? क्या वे बुद्धि के भावों व लखन भाव सहित कुशल हैं?
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा।।
अबिचल राज बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो।।
व्याख्या : हे माता! कुशलता के स्वामी, सब प्रकार से कुशल हैं और भाव द्वन्द्व के युद्ध में दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाले काम रूपी रावण को जीत लिया है। जिससे वैराग्य के भाव ने सहज भोगों का अविचल राज प्राप्त कर लिया है। अनन्य बुद्धि रूपी वानर के यह वचन सुनकर सुरता रूपी सीता के हृदय में हर्ष छा गया।
छ0 अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।
का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा।।
सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।
रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं।।
व्याख्या : बहुत हर्ष हो रहा था और मन और तन में पुलकावली छा रही थी। तब सुरता रूपी सीता आँखों में जल भरकर बार-बार बोली कि हे अनन्य रूपी वानर! तीनों लोकों में ऐसा क्या है, जो मैं तुमको दूँ? इस बाणी के समान और कुछ नहीं है। तब अनन्य बुद्धि का भाव बोला कि हे माता! आज मैंने अखिल जगत का राज पा लिया है। क्योंकि मैं भाव द्वन्द्व के युद्ध में शत्रु को जीतकर आत्मा रूपी राम व लखन भाव को देख रहा हूँ। अर्थात् भाव द्वन्द्व में जीत कर परमात्मा से एकरूपता हो गयी है, इसलिए इस अखिल जगत में मैंने सब कुछ पा लिया है।
दो0 सुनु सुत सद्गुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत।।107।।
व्याख्या : हे वत्स! सुनो, तुम्हारे हृदय में सदैव सद्गुणों का निवास हो तथा आत्मा रूपी राम लखन भाव सहित तुम्हारे अनुकूल रहें।
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता।।
तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई।।
व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता बोली कि हे तात! तुम्ह वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रों से आत्मा रूपी राम के मधुर अंगों को देख सकूँ अर्थात् आत्मा में लीन हो सकूँ। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आत्मा रूपी राम के पास गया और सुरता रूपी सीता की कुशलक्षेम सुनायी अर्थात् सहजता की अवस्था के बारे में बताया।
सुनि संदेसु भानुकुल भूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन।।
मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु।।
व्याख्या : आनन्य बुद्धि के संदेश को सुनकर आत्मा रूपी सूर्य के भूषण राम बोले के हे दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, वैराग्य रूपी विभीषण! तुम सब अनन्य बुद्धि के साथ जावो और सुरता रूपी सीता को आदरपूर्वक ले आओ।
तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता।।
बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो।।
व्याख्या : तुरन्त वैराग्य, दृढ़ बुद्धि व अनन्य बुद्धि के भाव सुरता रूपी सीता के पास पहुँचे। निर्मल आसुरी वृतियाँ सुरता की सेवा कर रही थी। फिर वैराग्य रूपी विभीषण ने तुरन्त उन्हें बताया तब उन्होंने नाना प्रकार से सुरता रूपी सीता को स्नान कराया अर्थात् वैराग्य के भाव ने आसुरी वृतियों को निर्मल करके सुरता रूपी सीता को अच्छी तरह से निर्मल करवाया।
बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रूचिर साजि पुनि ल्याए।।
ता पर हरिष चढ़ि बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही।।
व्याख्या : तब बहुत प्रकार से निर्मलता रूपी भूषण पहराए और फिर सुन्दर पालकी सजाकर ले आए अर्थात् सुन्दर वृतियों रूपी पालकी सजा दी गयी। उन आत्मोन्मुखी सद्वृति वाली पालकी पर सुरता रूपी सीता हर्षित होकर आत्मा रूपी परम स्नेही व सुख के धाम राम को स्मरण करते हुए चढ़ गयी अर्थात् आत्मोन्मुखी हो गयी।
बेतपानि रच्छक चहु पासा। चले सकल मन परम हुलासा।।
देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए।।
व्याख्या : बेतपानि अर्थात प्राण की तरंगे चारों ओर रक्षकों की भाँति चली। इस प्रकार बुद्धि व वैराग्य के भाव सब प्रसन्न होकर चले। सुरता रूपी सीता को देखने के लिए सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू आए। तब प्राण की तरंगें रूपी रक्षक उन्हें रोकने लगे।
कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु।।
देखहुँ कपि जननी की नाई। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कहा कि मेरा कहना मानो और सुरता रूपी सीता को पैदल ही आने दो अर्थात् बिना वृतियों के सहज होकर ही आने दो। जिसे बुद्धि के भाव रूपी वानर भी समझ सकें कि सुरता ही उनकी जननी है। इन्द्रियों को वश में करने वाले आत्मा रूपी राम ने यह हँसकर कहा।
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे।।
सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी बातें सुनकर बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू हर्षित हो उठे और मस्तिष्क रूपी आकाश से स्वरों के माध्यम से अच्छे भावों की वर्षा होने लगी। सुरता रूपी सीता जिसे पहले ज्ञान रूपी अग्नि में रखा था, उसी अन्त:करण को साक्षी रखकर प्रकट करना चाहते हैं।
दो0 तेहि कारन करूनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।
सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद।।108।।
व्याख्या : उसी कारण से आत्मा रूपी राम ने कुछ दुर्वासना रूपी वचन कहे अर्थात् देखना चाहा कि सुरता कहीं वासना के भावों से दोबारा प्रभावित न हो जाए। जिन्हें सुनकर सभी आसुरी वृतियाँ विषाद करने लगी अर्थात् विषयों का अंत करने लगी।
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता।।
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा को सिर पर धारण करके सुरता रूपी सीता मन, वचन व कर्म से निर्मल वाणी बोली कि हे लखन भाव! तुम तो धारणा को धारण कराने वाले हो, अत: जल्दी ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट कर दीजिए। अर्थात् सुरता का भाव लखन भाव से कहता है कि तुम तो लक्षणों को लख (जान) सकते हो, इसलिए ज्ञान रूपी अग्नि पैदा करके मुझ सुरता के लक्षणों को जान लो।
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम नीति सानी।।
लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता की विरह, विवेक, धारणा व नीतिमय बातें सुनकर लखन भाव आँखों में आँसू भरकर खड़ा रहा। लखन भाव भी आत्मा के सामने कुछ नहीं कह पा रहा था।
देखि राम रूख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए।।
पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं कछु भय तेही।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के रूख को देखकर लखन भाव दौड़ा और भावों में ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट कर दी। भावों की ज्ञान रूपी अग्नि को प्रबल देखकर सुरता रूपी सीता को हृदय में हर्ष हो रहा था और किसी प्रकार का भय नहीं था।
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं।।
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता बोली कि हे ज्ञान रूपी अग्नि! अगर मैं मेरे मन, कर्म व वचन से आत्मोन्मुखी हूँ तो तुम तो सब की गति जानती हो, तुम मेरे लिए श्रीखण्ड के समान शीतल हो जाओ। वास्तव में ज्ञान की अग्नि वासनाओं के अभाव में परम शीतलता देने वाली होती है और वासनाओं को जलाने के लिए दाहक होती है। अत: यहाँ वासनाहीन अवस्था की शीतलता की बात कही गयी है।
छ0 श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली।।
प्रतिबिंब अ डिग्री लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे।।
व्याख्या : मन को मथने वाली (मैथिली) सुरता रूपी सीता ने श्रीखंड के समान ज्ञान रूपी अग्नि में आत्मा रूपी राम को याद करते हुए प्रवेश किया। सुरता की वृति आत्मा में लगी हुई थी तथा विश्वास के भाव द्वारा वंदित थी तथा बहुत निर्मलता थी। ज्ञान रूपी अग्नि में प्रवेश करने से दृष्टि व लौकिक वासना के भाव भी जलकर भष्म हो गए। परमात्मा के इस मर्म को कोई नहीं जान पाया और मस्तिष्क रूपी आकाश से स्वरों के माध्यम से सद्भावों की वर्षा होने लगी और सिद्ध भाव व मन के भाव स्थिर हो गए।
दो0 धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो।।
सो राम बाम बिभाग राजति रूचिर अति सोभा भली।
नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली।।
व्याख्या : तब ज्ञान रूपी अग्नि ने प्राणों को पकड़कर सहज सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम में लीन कर दिया, जैसे इन्द्रियाँ मानो उदर रूपी क्षीर सागर से लाकर आत्मा रूपी राम में लीन हो गयी हों। अत: उस अवस्था में सुरता आत्मा रूपी राम के बाएँ भाग में अति सहज होकर शोभा पाने लगती है। मानो नये खिले हुए कमलों के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो रही हो। यहाँ पर आत्मा में सुरता के लीन होने की दिव्य अवस्था का प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया है।
दो0 बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान।
गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ी बिमान।।109(क)।।
व्याख्या : उस अवस्था में सुमन बरसने लगते हैं अर्थात् अच्छे भावों (सु अ मन उ अच्छे भाव) की वर्षा होने लग जाती है और साधक को मस्तिष्क में नगाड़ों की आवाज आने लग जाती है। उस समय गावहिं किन्नर अर्थात् किन्नर प्राण वायु में संगीत की ध्वनि प्रस्फूटित हो पड़ती है। जिसे कुछ साधना पंथों में शहनाई का बजना बताया गया है। उस समय सुर बधू अर्थात् सात्विक इच्छाएँ सहज होकर नाचने लगती हैं।
दो0 जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार।
देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार।।109(ख)।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम और सुरता रूपी सीता के मिलन की शोभा अत्यन्त अपार होती है। जिसे देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर हर्ष से भर जाते हैं।
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सि डिग्री नाई।।
आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर चित रूपी इन्द्र का वृति रूपी सारथी चला अर्थात् वृतियाँ सहज होकर शान्त हो गयी। फिर स्वार्थी दैवीय भाव पैदा हुए जो परमार्थ के से वचन कहने लगे।
दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया।।
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारग गामी।।
व्याख्या : दैवीय भाव बोले कि हे प्रभु! आप दीनों के बंधु हैं और आपने दैवीय भावों पर बहुत दया की है। यह काम रूपी रावण समस्त भावों से द्रोह करने वाला था, इसलिए ये स्वयं के पापों के कारण ही कुमार्ग पर चला गया है।
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी।।
अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करूनामय।।
व्याख्या : उस अवस्था में दैवीय भावों को परमात्मा का स्वरूप अनुभव में आने लग जाता है। अत: यहाँ उसी अनुभूति को लिखा गया है कि हे प्रभु! आप तो समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, एक रस, सहज उदासी, अखण्ड, गुण रहित, अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति और करूणामय हैं।
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी।।
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो।।
व्याख्या : आपने ही मत्स्य, कच्छप, वाराह, नर हरी, वामन और परशुराम के शरीर धारण किए हैं। इस चौपाई में बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में एक ही चेतन ऊर्जा संसार में नाना रूप धारण करती है। एक परमात्मा की ऊर्जा से ही मत्स्य अर्थात् मन की चंचल अवस्था बन जाती है। उसी ऊर्जा से कच्छप अर्थात् कच्छप की तरह इन्द्रियों को वश में करने की अवस्था आ जाती है। उसी परम ऊर्जा से वाराह अर्थात संसार में जाने की दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि रूपी बारह राह बन जाती हैं। उसी शक्ति से बामन अर्थात् मन से परे की अवस्था आ जाती है और उसी शक्ति से कठोर साधना रूपी परशुराम का भाव आ जाता है। इस प्रकार एक आत्म शक्ति ही इस शरीर में नाना रूप धारण कर लेती है। इसलिए जब-जब दैवीय भाव कष्ट पाते हैं, तब-तब आत्मा की शक्ति ही उन दु:खों को दूर करती है।
यह खल मलीन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही।।
अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरे मन बिसमय आवा।।
व्याख्या : काम, लोभ, मद व क्रोध में रत मलिनता का मूढ़ भाव सदैव दैवीय भावों से द्रोह करने वाला होता है। परन्तु यह भाव भी आत्मा में लीन हो जाता है, इसे देखकर हमें बहुत आश्चर्य होता है। दैवीय भावों को यह देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि आसुरी भाव भी आत्मा की ऊर्जा से ही बल पाते हैं और आत्मा की ऊर्जा से ही शान्त होकर आत्मा में ही लीन हो जाते हैं।
हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी।।
भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे।।
व्याख्या : हे प्रभु! हम दैवीय भाव आपकी भक्ति के परम अधिकारी हैं परन्तु स्वार्थ मेंे पड़कर आपकी भक्ति को छोड़ देने के कारण भावों के निरन्तर प्रवाह में पड़ गए हैं। अत: प्रभु अब हम आपकी शरण में आए हैं।
दो0 करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।
अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि।।110।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में दैवीय भावों व सिद्ध भावों में स्तुति की उमंग उठने लग जाती है और शरणागत का भाव आ जाता है। उस अवस्था में भाव बहुत विनीत और प्रार्थनामय हो जाते हैं। उसी भाव दशा का वर्णन करते हुए इस दोहे में कहा गया है कि दैवीय व सिद्ध भाव हाथ जोड़कर प्रेम से पुलकित होकर परमात्मा की बहुत प्रकार से स्तुति करने लगते हैं। उसी स्तुति को आगे के छन्द में लिखा गया है।
छ0 जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे।।
भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो।।
व्याख्या : हे परमात्मा राम! आपकी जय हो। आप सुख के धाम हैं और माया को हरने वाले हैं। आप संयम रूपी बाण व संकल्प रूपी धनुष धारण करने वाले हैं। आप भाव रूपी हाथी को विदीर्ण करने के लिए सिंह के समान हैं। आप गुणों के सागर, चतुर व सर्वव्यापक हैं।
छ0 तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी।।
जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा।।
व्याख्या : आपके शरीर की अनेकों काम के समान छबि है। इसलिए सिद्ध जन, मुनि जन व कवि आपका गुणगान करते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने काम रूपी सर्प को ज्ञान रूपी गरुड़ की तरह क्रोध करके पकड़ लिया।
छ0 जन रंजन भंजन सोक भयं। गत क्रोध सदा प्रभु बोधमयं।।
अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप सेवकों को आनन्द देने वाले व दु:खों के भय को दूर करने वाले हैं। आप क्रोध से परे व सदा अनुभव में आने वाले हैं। आपका अवतरण अपार गुणों वाला, उदार, शरीर रूपी पृथ्वी के विकारों को मिटाने वाला व ज्ञान के समूह के रूप में होता है।
दछ0 अज ब्यापक मेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा।।
रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप अजन्मा, सर्वव्यापक, एक, अनादि व सदैव हैं। हे करूणाकर परमात्मा। हम हर्ष के साथ आपको नमस्कार करते हैं। हे आत्मा रूपी सूर्य के भूषण व दोष आदि का नाश करने वाले! आपने वैराग्य रूपी विभीषण को राजा कर दिया अर्थात् भावों का अधिष्ठाता बना दिया।
छ0 गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं।।
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप गुणों व ज्ञान के घर हैं। हे मान रहित प्रभु! आप तो अजन्मा हैं। हे व्यापक व माया से रहित प्रभु! मैं आपको दैव नमस्कार करता हूँ। आपके भाव रूपी भुजाओं का बल व प्रताप प्रचंड है। दुष्ट भावों के समूह का नाश करने में आप कुशल हैं।
बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं।।
भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं।।
व्याख्या : आप बिना कारण के ही दीनों का कल्याण करने वाले हो। हे शोभा के घर प्रभो! मैं आपको सुरता सहित नमस्कार करता हूँ। आप भावों से पार कराने वाले व प्रकृति से परे हैं। आप मन से उत्पन्न होने वाले कठिन दोषों को दूर करने वाले हैं।
छ0 सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जल जारुन लोचन भूप बरं।।
सुख मंदिर सुंदर श्री रमनं। मद मार मुधा ममता समनं।।
व्याख्या : आप नियम संयम रूपी धनुष-बाणों को धारण करके मन का हरन करने वाले व तीन गुणों को धारण करने वाले हैं। कमल के समान रक्त वर्ण आपके नेत्र हैं अर्थात् आपकी दृष्टि दिव्य है। आप सुख के मंदिर व सुरता रूपी सीता के स्वामी हैं। आप अहंकार, काम व झूठी ममता का नाश करने वाले हैं।
अनवध अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो।।
इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा।।
व्याख्या : आप दोष रहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियों के विषय नहीं हैं। आप सर्वदा सब रूप होकर भी कभी इन्द्रियाँ नहीं बने। यह अनुभव की बात है, कोई दंतकथा (कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से अलग है और अलग नहीं भी है, वैसे ही आप संसार से भिन्न व अभिन्न दोनों हैं।
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए।।
धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे।।
व्याख्या : हे सर्वव्यापक प्रभु! ये बुद्धि के भाव रूपी वानर कृतार्थ हो गए हैं, जो आपके स्वरूप को आदरपूर्वक देख रहे हैं। इन दैवीय भावों का जन्म धिक्कार है, जो आप परमात्मा से बिमुख होकर संसार के विषयों में पड़े हैं।
अब दीन दयाल दया करिए। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ।।
जेहि ते बिपरीत क्रिया करिए। दुख सो सुख मानि सुखी चरिए।।
व्याख्या : हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! आप करुणा करिए और मेरी विभेदकारी बुद्धि को दूर कर दीजिए। क्योंकि उसी विभेदकारी बुद्धि से ही मैं विपरीत क्रिया करता हूँ और दु:ख को सुख मानकर सुख का भ्रम पालता हूँ।
खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा।।
नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं।।
व्याख्या : आप दुष्ट भावों का नाश करने वाले व देह रूपी पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं। इसलिए आपके चरण कमल विश्वास रूपी शंकर व श्रद्धा रूपी पार्वती द्वारा सेवित हैं। हे भाव रूपी राजाओं के अधिष्ठाता! आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए, जिससे आपके चरणों में मेरा अनन्य प्रेम सदा बना रहे।
दो0 बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
सोभा सिंधु बिलोकत लोचन नहिं अघात।।111।।
व्याख्या : इस प्रकार चारों गुण अवस्था में बरतने वाले बुद्धि रूपी ब्रह्मा ने प्रेम से पुलकित होते हुए स्तुति की और शोभा के समुद्र आत्मा रूपी राम को देखने से उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे। अर्थात् बुद्धि का मूलभाव रूपी ब्रह्मा जी परमात्मा का दर्शन करके तृप्त नहीं हो पा रहे थे।
तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए।।
अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में जब देव भाव स्तुति करने लगते हैं, तो चित का स्थूल भाव प्रकट हो जाता है अर्थात चित के स्थूल भाव का आभास हो आता है। उसी को दसरथ का आना बोलकर लिखा है। चित रूपी दसरथ का भाव आत्मा रूपी राम को देखकर द्रवित हो उठता है। उसी को आँखों में जल छा जाना बताया गया है। तब लखन भाव सहित आत्म चेतना का भाव चित के स्थूल भाव की वन्दना करने लगते हैं। तब चित रूपी पिता ने आशीर्वाद दिया अर्थात् शिव संकल्प को दृढ़ किया।
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ।।
सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कहा कि हे तात्! ये सब आपकी सद्प्रेरणा (पुण्य) का ही परिणाम है कि अजेय काम रूपी रावण को जीत लिया। तब आत्मा रूपी पुत्र की बातें सुनकर चित रूपी पिता का प्रेम बढ़ गया और आँखों में जल आ गया व रोम-रोम हर्ष से खड़े हो गए।
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना।।
ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने पहले प्रेम का अनुमान करके चित रूपी पिता को दृढ़ ज्ञान दिया, जिससे मोक्ष गति नहीं पाकर चित रूपी दसरथ ने भेद भक्ति प्राप्त कर ली अर्थात् आत्मा में लीन नहीं होकर आत्मा से अलग सहज स्थूल के आभास की अवस्था प्राप्त कर ली।
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।।
बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा।।
व्याख्या : जो सगुण उपासना करते हैं अर्थात् स्थूल भाव में बरतते हैं, वे कभी मोक्ष नहीं प्राप्त करते हैं। क्योंकि वे तो परमात्मा की भेद भक्ति प्राप्त करते हैं अर्थात् गुणों में बरतने के कारण द्वेत भाव बना रहता है परन्तु परमात्मा की कृपा का आभास बना रहता है। इस प्रकार चित का स्थूल भाव रूपी दसरथ बार-बार परमात्मा रूपी राम को प्रणाम करके हर्ष के साथ स्वरों का मूल धाम चित में समा गए अर्थात् चित का स्थूल भाव सहज होकर चित में ही समा गया।
दो0 अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।
सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस।।112।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में लखन भाव सहित सुरता रूपी सीता व आत्मा रूपी राम की शोभा (सुखद अवस्था) को देखकर मन में हर्षित होते हुए इन्द्रियों के मूल चित रूपी इन्द्र परमात्मा की स्तुति करने लगे। उसी को इन्द्र द्वारा स्तुति करना बोलकर आगे के छन्द में लिखा गया है।
छ0 जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।।
धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप।।
व्याख्या : हे शोभा के घर प्रभु! आपकी जय हो। आप प्राण के माध्यम से विश्राम देने वाले हैं। आप तीनों गुणों को वश में करने के लिए यम-नियम रूपी बाणों व शिव संकल्प रूपी धनुष को धारण करने वाले हो। आपकी भाव रूपी भुजाओं का बल व प्रताप बहुत प्रबल है।
छ0 जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाच धारि।।
यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ।।
व्याख्या : हे अज्ञान आदि दोषों का नाश करने वाले! आपकी जय हो। आपने आसुरी भाव रूपी सेना का नाश कर दिया। इस काम रूपी दुष्ट असुर को मारकर आपने दैवीय भावों को सनाथ कर दिया है।
छ0 जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार।।
जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल।।
व्याख्या : हे देह रूपी पृथ्वी के विकार रूपी भार का हरण करने वाले प्रभु! आपकी जय हो। आपकी महिमा उदार व अपार है। हे काम रूपी रावण के शत्रु! आप बहुत कृपालु हैं और आपने आसुरी भाव रूपी राक्षसों की सेना का बेहाल कर दिया।
छ0 लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब।।
मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग।।
व्याख्या : काम रूपी रावण को अपने बल का बहुत गर्व था और उसने स्वरों के माध्यम से गंधर्व आदि प्राण को वश में कर लिया। इसलिए बलपूर्वक मन के भाव, सिद्ध भाव, नर अर्थात् धड़कन व नाग प्राण आदि के पीछे पड़ गया अर्थात इन सबको वश में करके काम के प्रभाव में ले आया।
छ0 परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट।।
अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल।।
व्याख्या : वह काम रूपी दुष्ट रावण परद्रोह अर्थात् आत्मा से द्रोह करने वाला था। अत: उसको उसी पाप (चिन्ता) का फल मिल गया। हे दीन दयाल! अब आप मेरी सुनिए। आपके नेत्र कमल के समान विशाल हैं अर्थात आपकी दृष्टि विशाल है।
मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान।।
अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज।।
व्याख्या : चित रूपी इन्द्र बोला कि मुझे बहुत अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है। परन्तु अब आप परमात्मा के चरण कमलों को देखकर मेरा दु:ख समूह को देने वाला अभिमान चला गया। वास्तव में प्रारम्भ में साधक के चित को लगता है कि वही सब कुछ है, परन्तु जब ध्यान द्वारा सुरता व आत्मा का मिलन हो जाता है, तो परमात्मा की दिव्य शक्ति का आभास हो जाता है। तब चित को समझ में आ जाता है कि परमात्मा की शक्ति असीम व अपार है। चित को जब परमात्मा की अपार शक्ति का आभास हो आता है, तब उसका अभिमान चला जाता है और वह सहज हो जाता है।
छ0 कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव।।
मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप।।
व्याख्या : तब चित रूपी इन्द्र भाव कह उठता है कि कोई तो परमात्मा को निर्गुण ब्रह्म के रूप में जानते हैं तो कोई सुरता द्वारा जानने में आने वाला अव्यक्त परमात्मा बताते हैं। परन्तु मुझ चित रूपी इन्द्र को तो वह परमात्मा सुष्मना नाड़ी के राजा के रूप में गुणयुक्त स्वरूप में ही अच्छे लगते हैं।
छ0 बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत।।
मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास।।
व्याख्या : इसलिए हे प्रभु! आप सुरता रूपी सीता, व लखन भाव सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए। मुझे आप आपका दास मानिए और हे रोम रोम में निवास करने वाले! मुझे आपकी भक्ति दीजिए।
छ0 दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।
सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं।।
सुर बृंद रंजन द्वन्द्व भंजन मनुजतनु अतुलित बलं।
ब्रह्मादि संकर सेव्य राम नमामि करुना कोमलं।।
व्याख्या : हे शरण में आने वाले को सुख देने वाले ! हे भय को दूर करने वाले! हे रोम रोम में बसने वाले प्रभु! आपकी भक्ति दीजिए। हे आत्मा रूपी राम! आप सुख के घर हैं। आपको नमस्कार। आपकी शोभा अनेकों कामों के समान है। आप स्वरों के समूह को संतुष्ट करने वाले व मनुष्य के शरीर में भावों के द्वन्द्व को दूर करने वाले अति बलवान हैं। इसलिए बुद्धि व विश्वास आदि के भाव आपकी सेवा करते हैं। हे करुणामय व कोमल प्रभु राम! आपको नमस्कार।
दो0 अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।
काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीन दयाल।।113।।
व्याख्या : हे कृपालु प्रभु! अब मुझ चित (इन्द्र) की तरफ कृपा करके देखिए और प्रेरणा कीजिए कि मैं क्या करूँ? इस प्रकार चित रूपी इन्द्र की बातें सुनकर आत्मा रूपी राम प्रिय वचन बोले।
सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे।।
मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना।।
व्याख्या : हे चित रूपी इन्द्र! तुम हमारे बुद्धि के समस्त भावों को पुन: जीवित कर दो, जिनको आसुरी भावों ने मार दिया है। इन बुद्धि के भावों ने मुझे आत्मा के लिए अपने प्राणों का त्याग किया है। अर्थात् आत्मा रूपी राम आसुरी भावों को मारने के बाद बुद्धि के भावों को पुन: सचेत करने की प्रेरणा करता है। उसी भाव अवस्था को इन्द्र (चित) द्वारा पुन: जीवित करने की बात कही गयी है।
सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी।।
प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बढ़ाई।।
व्याख्या : हे ज्ञान रूपी गरुड़ जी! परमात्मा की यह बाणी बहुत गम्भीर है, जिसे मुनि व ज्ञानी जन ही जान पाते हैं। परमात्मा तो समस्त तीन गुणों से उत्पन्न जगत को मारकर पुन: जीवित कर सकते हैं। परन्तु चित रूपी इन्द्र को सम्मान देने के लिए कहा है।
सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए।।
सुधा बृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।।
व्याख्या : चित रूपी इन्द्र ने ज्ञान रूपी अमृत की वर्षा करके बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालूओं को जीवित कर दिया अर्थात् चित की प्रेरणा से बुद्धि के दैवीय भाव प्रबल हो गए। वे बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानर आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी राम के पास आए। चित की प्रेरणा तो दोनों दलों पर (दैवीय व आसुरी) ही हुई थी, परन्तु बुद्धि के भाव ही जीवित हुए, आसुरी भाव नहीं। यहाँ गम्भीर साधना का रहस्य है। वास्तव में जब सुरता आत्मा में लीन हो जाती है, तो चित से निकलने वाली तरंगों से केवल दैवीय भाव ही पैदा होते हैं और आसुरी भाव शांत हो जाते हैं। यही साधक की साधना का परिणाम होता है।
रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन।।
सुर अंसिक सब कपि अ डिग्री रीछा। जिए सकल रघुपति की ईछा।।
व्याख्या : उस अवस्था में समस्त भाव आत्मोन्मुखी हो जाते हैं, जिससे भावों का आपस में बंधन नहीं रहता है। बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानर तो स्वरों के माध्यम से पैदा होते हैं, इसलिए आत्मा की प्रेरणा से सब जीवित हो गए।
राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।।
खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के समान दीनों का हित करने वाला कौन है? जिन्होंने समस्त आसुरी भावों को मुक्त कर दिया। दुष्ट व विकारों का घर अर्थात जब दुष्ट व विकारी भाव काम रत हो जाते हैं, वो ही रावण की अवस्था होती है। परन्तु आत्मा की कृपा होने पर काम रूपी रावण की भी सद्गति हो जाती है, जो मुनियों को भी दुर्लभ होती है।
दो0 सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रूचिर बिमान।
देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान।।114(क)।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में स्वरों के माध्यम से सुमन अर्थात् अच्छे भावों की वृष्टि होने लगी और स्वर उर्ध्वगामी होकर अपनी सहज रूचि के अनुसार चलने लगे। तब ऐसी अवस्था में परमात्मा के प्रति सहज विश्वास की अवस्था आ जाती है। उसी को सुअवसर जानकर शिव जी का आना बताया गया है।
दो0 परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि।।114(ख)।।
व्याख्या : उस अवस्था में परम विश्वास रूपी शिव का भाव परमात्मा के विशुद्ध प्रेम में गदगद होकर पुलकित हो उठता है और प्रार्थना का भाव हृदय में उमगने लग जाता है तथा नेत्रों में जल भर आता है। उसी अवस्था को शिवजी द्वारा हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक आँखों में जल भरकर गदगद होकर परमात्मा की स्तुति करना बताया है। उसी भाव अवस्था को आगे के छन्द में लिखा गया है।
छ0 मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रूचिर कर सायक।।
मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे परमात्मा! आप मेरी रक्षा कीजिए अर्थात् मेरा दृढ़ विश्वास आप परमात्मा पर बना रहे। आप सुन्दर संकल्प रूपी धनुष व प्रेरणा रूपी बाणों को धारण करके मुझ विश्वास की रक्षा कीजिए। आप मोह रूपी मेघ को उड़ाने के लिए प्रचंड ज्ञान रूपी पवन है। संशय रूपी वन को जलाने के लिए अग्नि के समान हैं और दैवीय वृतियों को आनन्द देने वाले हैं।
छ0 अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर।।
काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन।।
व्याख्या : आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणों के घर और परम सुंदर हैं। आप भ्रम रूपी अंधकार का नाश करने के लिए प्रचण्ड सूर्य हैं। काम, क्रोध व मद रूपी हाथियों के लिए आप सिंह के समान हैं। अत: हे प्रभु! आप मुझ विश्वास रूपी सेवक के मन रूपी वन में निरन्तर निवास कीजिए।
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन।।
भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर।।
व्याख्या : विषय कामनाओं के समूह रूपी कमलवन के लिए आप प्रबल पाला हैं अर्थात् विषयी विकारों का नाश करने में आप सक्षम हैं। आप उदार और मन से परे हैं। भाव रूपी भव सागर को आप मन के अन्दर ही मथ डालने वाले हैं। इसलिए हे प्रभु! इस दुस्तर संसार सागर से पार कर दीजिए।
स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारित मोचन।।
अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर।।
मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन।।
व्याख्या : हे श्याम सुंदर शरी़र! हे कमल नयन! अर्थात दिव्य अंगों वाले व दिव्य दृष्टि वाले प्रभु! हे दीन बन्धु! हे प्राण से उत्पन्न दु:खों का निवारण करने वाले! हे भावों के अधिष्ठाता आत्मा रूपी राम! आप लखन भाव व सुरता रूपी सीता सहित निरन्तर मेरे (मुझ विश्वास के) हृदय में निवास कीजिए। आप मुनियों को आनन्द देने वाले और शरीर रूपी पृथ्वी के भूषण हैं और भय का नाश करने वाले हैं।
दो0 नाथ जबहिं कोसलपुरी होइहि तिलक तुम्हार।
कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार।।115।।
व्याख्या : हे प्रभु! जब आपका देह रूपी अवधपुरी में राजतिलक होगा अर्थात् जब आप देह भाव में बरतेंगे, तब मैं आपके उदार चरित्र को देखने आऊँगा अर्थात आत्मा जब पुन: देह भाव में बरतेगी, तब पुन: विश्वास का भाव प्रकट होकर आत्मा के चरित को देखने के लिए प्रकट होगा।
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषणु आए।।
नाइ चरन सि डिग्री कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँग पानी।।
व्याख्या : जब विश्वास रूपी शिव का भाव विनती करके चला गया, तब वैराग्य रूपी विभीषण का भाव आत्मा रूपी राम के पास आया अर्थात् विश्वास के भाव के सहज हो जाने पर वैराग्य का भाव प्रकट हुआ। वैराग्य के भाव ने आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण करते हुए कहा कि हे शिव संकल्प रूपी धनुष और सद्प्रेरणा रूपी बाणों को धारण करने वाले प्रभु! आप मेरी विनती सुनिए।
सकुल सदल प्रभु रावन मारयो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तारयो।।
दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती।।
व्याख्या : आपने आसुरी भावों सहित काम रूपी रावण का वध किया है। इसलिए आपका पवित्र यश तीनों गुणों में विस्तारित हो गया है। आपने मुझ (वैराग्य) दीन, मलीन, बुद्धिहीन और जातिहीन पर बहुत प्रकार से कृपा की है। वैराग्य के भाव की कोई जाति नहीं होती है और न ही उसमें अहंकार आदि विकार होते हैं। इसलिए उसे दीन व जातिहीन कहा गया है।
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे।।
देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा।।
व्याख्या : वैराग्य का भाव बोला कि हे प्रभु! अब मेरे घर को पवित्र कीजिए अर्थात मुझ वैराग्य को निर्मल कीजिए और उस वैराग्य रस में स्नान करके पवित्र होकर श्रम रहित होइए। फिर वैराग्य के कोशों में जो भाव रूपी सम्पदा है, उसे बुद्धि के भावों को दे दीजिए अर्थात् बुद्धि के भावों में भी वैराग्य के भाव को दृढ़ कर दीजिए।
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ।।
सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला।।
व्याख्या : हे नाथ! आप मुझ वैराग्य के भाव को सब प्रकार से अपना लीजिए। और मुझे वैराग्य भाव को साथ लेकर देह रूपी अवधपुरी चलिए अर्थात मुझ वैराग्य के भाव के साथ देह रूपी अयोध्या में बरतिए। वैराग्य भाव की ऐसी बातें सुनकर परम मधुर दीनों पर दया करने वाले प्रभु के दिव्य दृष्टि रूपी दोनों नयन जल से भर आए।
दो0 तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात।।116(क)।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे वैराग्य रूपी भ्राता! तुम्हारे कोष व घर सब मेरा ही है। यह सत्य बात है। परन्तु भावरत रूपी भरत भाव की दशा याद करके मुझे क्षणभर भी कल्प के समान लग रहा है।
दो0 तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।
देखौं बेगि सो जतनु क डिग्री सखा निहोरउँ तोहि।।116(ख)।।
व्याख्या : वह तप में अवस्थित होकर अति निर्मलता के साथ निरन्तर मुझ आत्मा में भाव रत हो रहा है। अत: हे वैराग्य रूपी सखा! तुम ऐसा उपाय करो जिससे मैं भावरत रूपी भरत भाव को शीघ्रता से देख सकूँ।
दो0 बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर।।116(ग)।।
व्याख्या : अगर अवधी के बीत जाने पर मैं जाऊँगा अर्थात् अगर मैं अवध रूपी शरीर में देर करके जाऊँगा, तो भावरत रूपी भरत भाव जीवित नहीं मिलेगा अर्थात भावरत भाव देह के मोह का भी त्याग कर देगा। इस प्रकार भावरत भाव के प्रेम को याद करके आत्मा रूपी राम पुलकित हो उठे।
दो0 करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।
पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं।।116(घ)।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी विभीषण! तुम कल्पभर राज्य करना परन्तु मन में मेरा (आत्मा) निरंतर स्मरण रखना अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर तुम सहज होकर भोगों के प्रति वैराग्य वृति रखकर खूब राज करो। फिर अंत में मेरे धाम को प्राप्त कर लेना अर्थात् मुझ आत्मा में लीन होकर, उस अवस्था को प्राप्त कर लेना, जिसे संत जन प्राप्त करते हैं।
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के।।
बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर वैराग्य रूपी विभीषण का भाव कृपा के घर परमात्मा के चरणों में गिर पड़ा अर्थात् पूरी तरह परमात्मा के प्रति समर्पण का भाव आ गया। तब उस अवस्था को देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालु हर्षित हो उठे और परमात्मा के निर्मल गुणों का बखान करने लगे।
बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो।।
लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा।।
व्याख्या : फिर वैराग्य का भाव भाव रूपी भवन में गया और मन के भावों के व्यसनों को विशुद्ध मान (बि अ मान) के किया अर्थात् भोगों के भावों में वैराग्य की वृति को प्रबल किया। फिर पुष्पक विमान अर्थात् इच्छा रूपी विमान को आत्मा रूपी राम के सामने रख दिया। अर्थात् वैराग्य के भाव ने सब इच्छाओं को परमात्मा के सामने समर्पित कर दिया। तब सहजता से हँसते हुए परमात्मा बोले।
चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन।।
नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी विभीषण! तुम इच्छा रूपी पुष्पक विमान में चढ़कर मस्तिष्क रूपी आकाश में जाओ और वहाँ से भोग इच्छा रूपी वस्त्रों व आभूषणों अर्थात् भोग इच्छा व वासनाओं की वर्षा कर दो यानी त्याग करदो। परमात्मा की प्रेरणा पाकर वैराग्य का भाव तुरन्त मस्तिष्क रूपी आकाश में गया और सब भोग इच्छा रूपी वस्त्र व आभूषणों की वर्षा कर दी।
जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं।।
हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता।।
व्याख्या : भोग इच्छा रूपी वस्त्रों व आभूषणों की वर्षा होती देखकर बुद्धि के भाव रूपी वानर जो अच्छा लगता उसे ले लेते और मुख में डालकर फेंक देते अर्थात बुद्धि के भाव भी भोग की इच्छाओं में आसक्त नहीं हुए। बुद्धि के भावों की इस निर्लिप्तता को देखकर लखन भाव व सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम हँसे अर्थात् बहुत प्रसन्न हुए। क्योंकि आत्मा रूपी राम तो परम कौतुक करने वाले हैं अर्थात भावों के साथ परम खेल खेलते हैं।
दो0 मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद।।117(क)।।
व्याख्या : जिस परमात्मा की पूर्ण सत्ता को मुनि लोग ध्यान के द्वारा भी समझ नहीं पाते हैं और वेद भी जिसे ""नेति नेति"" कहकर रह जाते हैं। वही कृपा के समुद्र परमात्मा बुद्धि के भावों के साथ अनेक प्रकार का विनोद करते हैं।
दो0 उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम।।117(ख)
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जो परमात्मा योग, जप, दान, तप, नाना यज्ञ, व्रत व नियमों के पालन से उतनी कृपा नहीं करते हैं, जितनी निष्काम प्रेम को देखकर कृपा करते हैं।
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए।।
नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानरों ने भोगेच्छा रूपी वस्त्रों को पाया तो पहनकर वे आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी राम के पास आए। नाना प्रकार के भोगइच्छा रूपी वस्त्रों को देखकर आत्मा रूपी राम बार-बार हँसने लगे।
चितइ सबन्हि पर कीन्हीं दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया।।
तुम्हरें बल मैं रावनु मारयो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सारयो।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने सब बुद्धि के भावों को देखा और करूणा करते हुए मधुर बचन बोले कि मैंने तुम्हारे बल से ही काम रूपी रावण को मारा है और वैराग्य के भाव को भावों का अधिष्ठाता बनाया है।
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू।।
सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे बुद्धि के भावों! तुम सब अपने-अपने घर जाओ अर्थात् अब परम सहज हो जाओ और सब मेरा (आत्मा) स्मरण करते रहना अर्थात सदैव आत्मोन्मुखी बने रहना, जिससे तुम्हें किसी प्रकार से वासनाओं का डर नहीं सतायेगा। ये वचन सुनकर बुद्धि के भाव रूपी वानर प्रेम विह्वल हो गए और हाथ जोड़कर बोले अर्थात् पूर्ण समर्पण के भाव के साथ बोले।
प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरें होत बचन सुनि मोहा।।
दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप जो भी कहते हैं, वो आपको सब सोहाता है परन्तु आपके वचन सुनकर हमें मोह होता है। आपने तो हम बुद्धि के भावों को सनाथ कर दिया अर्थात् अपना लिया। आप तो तीनों गुणों रूपी लोकों के ईश्वर हैं अर्थात तीनों गुण (सत, रज व तम) आपसे ही उत्पन्न हैं।
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं।।
देखि राम रूख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा।।
व्याख्या : हे प्रभु! आपके वचनों को सुनकर हमें लाज आ रही है अर्थात आपके द्वारा दिए गए सम्मान से हम शर्म महसूस कर रहे हैं। क्योंकि मच्छर क्या कभी गरुड़ का हित कर सकते हैं? वैसे ही हम बुद्धि के भाव क्या भला आत्मा का हित कर सकते हैं? आत्मा रूपी राम के निश्छल प्रेममय रूख को देखखर बुद्धि के भाव सहज अवस्था (निज घर) में नहीं जाना चाहते हैं अर्थात् वे आत्मा में ही लीन रहना चाहते हैं।
दो0 प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि।।118(क)।।
व्याख्या : तब आत्मा की प्रेरणा से सब बुद्धि के भाव रूपी वानर व भालू आत्म चिंतन को हृदय में रखते हुए और अनेकों प्रकार से समर्पण दिखाते हुए सहज होकर चले। उस समय हर्ष और विषाद दोनों की अवस्था बनी हुई थी।
दो0 कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।
सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान।।118(ख)।।
व्याख्या : सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव, निसंग बुद्धि रूपी नील, धीर बुद्धि रूपी जामवंत, दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, अनासक्त बुद्धि रूपी नल व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान सहित वैराग्य रूपी विभीषण और जो बलवान बुद्धि के भाव रूपी सेनापति हैं।
दो0 कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि।।118(ग)।।
व्याख्या : ये सब बलवान भाव प्रेम के वश में होने के कारण कुछ नहीं कह पा रहे हैं तथा आँखों में प्रेम रूपी जल भर आया। ये सब भाव आत्मोन्मुखी होकर एकटक आत्मा में ही लीन होने लगते हैं।
अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई।।
मन महुँ बिप्र चरन सिर नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो।।
व्याख्या : बुद्धि के इन प्रबल भावों के अति प्रेम को देखकर आत्मा रूपी राम ने इनको अपने साथ ही इच्छा रूपी पुष्पक विमान पर ही बैठा लिया। अर्थात् आत्मा ने इन बुद्धि के प्रबल भावों को अपने साथ ले लिया। तब आत्मा रूपी राम ने विशुद्ध प्रकाश (विप्र) के भावों को मन ही मन स्वीकार कर लिया और इच्छा रूपी पुष्पक विमान को उत्तर दिशा में चलाया। अर्थात् अब आत्म चेतना ध्यान से धीरे-धीरे देह रूपी अयोध्या में उतरने लगी। अब आगे की चौपाइयों में ध्यान के उतरने के अनुभव का वर्णन किया गया है। ध्यान के उतरने पर मस्तिष्क में व शरीर में क्या-क्या अनुभूतियाँ होती हैं? उसी का वर्णन किया गया है।
चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई।।
सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर।।
व्याख्या : ध्यान के उतरने पर इच्छा रूपी पुष्पक विमान जब चलता है, तो भावों में कोलाहल शु डिग्री हो जाता है। उस अवस्था में सभी भाव जय आत्मा रूपी राम की कहने लगते हैं। उस अवस्था में उच्च मनोभाव अवस्था में सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम विराजित होते हैं।
राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी।।
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो सुमे डिग्री के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो। सात्विक इच्छा रूपी पुष्पक विमान बड़ी शीघ्रता से चला। उस अवस्था में स्वरों के माध्यम से मन के अच्छे भावों की वर्षा होने लगी। पुष्पक विमान इच्छाओं का ही प्रतीक होता है। पुष्पक विमान की शास्त्रों में एक विशेषता बतायी गयी है कि उसमें जितने भी सवारी बैठ जाएँ सदैव एक सीट खाली रहती है। इच्छाओं के साथ भी यही होता है कि चाहे जितनी इच्छापूर्ण हो जाए सदैव एक इच्छा अधूरी रह जाती है। इसलिए पुष्पक विमान इच्छाओं का प्रतीक होता है। बिना इच्छा किए देह भाव में बरता नहीं जा सकता है। इसलिए इच्छा रूपी पुष्पक विमान लेकर ही आत्मा सुरता सहित अयोध्या रूपी देह नगरी में आते हैं।
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी।।
सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा।।
व्याख्या : उस अवस्था में जब आत्म चेतना देह रूपी अयोध्या की तरफ ध्यान से उतर कर आती है, तो तीनों गुणों की सहज अवस्था आ जाती है, जो परम सुखदायक होती है। भाव रूपी भव सागर, नर-नाड़ियों रूपी तालाब व नदियाँ सब निर्मल भाव रूपी जल से भर जाते हैं। चारों तरफ को सुंदर शकुन होने लगते हैं। उस अवस्था में मन प्रसन्न हो जाता है और मस्तिष्क रूपी आकाश निर्मल हो जाता है।
कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इंद्रजीता।।
हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे।।
व्याख्या : उस परम सुखद अवस्था में आत्मा व सुरता के मध्य वार्तालाप शु डिग्री हो जाता है। उसी अनुभव को यहाँ लिखा जा रहा है। आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे सुरता रूपी सीता! देखो भाव द्वन्द्व की अवस्था में लखन भाव ने अहंकार रूपी मेघनाद को यहाँ मारा था। भाव द्वन्द्व के क्षेत्र में ये बड़े-बड़े आसुरी भाव अनन्य बुद्धि व दृढ़ बुद्धि रूपी हनुमान व अंगद के मारे हुए पड़े हैं।
कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई।।
व्याख्या : आलस्य रूपी कुंभकर्ण व काम रूपी रावण को जो कि मन के भावों को दु:ख देने वाले थे, यहाँ भाव द्वन्द्व में मारा था।
दो0 इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम।।119(क)।।
व्याख्या : मैंने यहाँ सद्गुण रूपी सेतु बाँधकर शिव लिंग अर्थात् परम विश्वास की स्थापना की जो कि परम सुख देने वाली है। तब सुरता सहित आत्मा रूपी राम ने अन्त:करण के परम विश्वास को सीस झुकाकर प्रणाम किया।
दो0 जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम।।119(ख)।।
व्याख्या : जहाँ जहाँ पर आत्मा रूपी राम ने ध्यान की अवस्था में विश्राम किया, वो सब विश्राम के स्थल सुरता रूपी सीता को दिखाए।
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा।।
कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना।।
व्याख्या : जैसे-जैसे ध्यान चढ़ता है, वैसे-वैसे ही ध्यान उतरता भी है। अत: अब आत्म चेतना का ध्यान इच्छा रूपी पुष्पक विमान के साथ वहाँ आ गया जहाँ पर परम सुन्दर दंडक वन था अर्थात् जहाँ ध्यान सिद्ध होने पर इन्द्रियों के दमन व संयम की अवस्था आ जाती है। अगस्त्य अर्थात् अग अ अस्त यानी उस कोश में भविष्य का अस्त हो जाता है अर्थात् उस कोश में ध्यान सिद्ध होने पर भविष्य की चिंता नहीं सताती है। उसी को मन के अस्त यानी अगस्त्य ऋषि के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। ध्यान उतरने के समय आत्म चेतना अगस्त्य आदि मन के भावों से मिलने लगी। उसी को राम का ऋषियों के स्थान (आश्रम) पर जाना बताया गया है।
सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा।।
तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा।।
व्याख्या : समस्त मन के भाव रूपी मुनियों व ऋषियों से आशीर्वाद लेकर अर्थात् प्रेरणा लेकर आत्मा रूपी राम (चेतना) चित्रकोश रूपी चित्रकूट पर आ गए। वहाँ पर भी मन के समस्त भावों को संतुष्ट करके इच्छा रूपी पुष्पक विमान अब तेजी से चला। अर्थात् ध्यान अब तेजी से उतरने लगा।
बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई।।
पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम क डिग्री सीता।।
व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने देहभाव के पापों का हरण करने वाली यमुना नाड़ी को दिखाया। फिर पवित्र सुष्मना नाड़ी रूपी गंगा को देखकर आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता को प्रणाम करने को बोला। अर्थात सुष्मना नाड़ी के प्राणों से मिलने को बोला।
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा।।
देखु परम पावनि पुन बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी।।
व्याख्या : फिर ध्यान भृकुटि पर आगया। उसी को तीर्थपति प्रयाग का दिखायी देना कहा गया है। भृकुटि पर ध्यान लगने से ही समस्त चिंताओं का नाश हो जाता है। फिर परम पवित्र त्रिवेनी अर्थात तीनों नाड़ियों (यमुना, गंगा, सरस्वती) के संगम स्थल को ध्यान में आभासित किया, जो समस्त शोकों का हरण करने वाली थी।
पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि।।
व्याख्या : जब ध्यान त्रिवेणी संगम पर उतर आता है तो साधक को देह का आभास हो आता है। उसी को परम पवित्र अयोध्या का दिखायी देना बताया गया है। ध्यान की सिद्धि के बाद देह रूपी अयोध्या तीनों प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) से उत्पन्न भावों के विकारों का नाश करने वाली हो जाती है। अर्थात् ध्यान सिद्ध हो जाने के बाद त्रिताप नहीं सताते हैं।
दो0 सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम।
सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम।।120(क)।।
व्याख्या : ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम ने सुरता सहित देह रूपी अयोध्या का प्राणों के माध्यम से आभास किया अर्थात देहाभास हो आया। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम के नेत्रों में जल भर आया और बार-बार पुलकित होकर आनन्दित होने लगे। अर्थात् प्राणों की तरंगों के माध्यम से देहाभास करके आत्मा रूपी राम हर्ष से भर गए।
दो0 पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह।
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह।।120(ख)।।
व्याख्या : वास्तव में ध्यान सिद्ध होने के बाद जब उतरता है, तो देहाभास, करने के बाद बार-बार भृकुटि पर ध्यान जाने लगता है। इसलिए आत्मा रूपी राम को हर्षित होकर त्रिवेणी पर स्नान करना बताया गया है। तब आत्मा रूपी राम ने बुद्धि के भाव रूपी वानरों सहित विशुद्ध प्रकाश के भावों को बहुत प्रकार का दान दिया अर्थात विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के भावों को नाना प्रकार से दृढ़ता व प्रबलता प्रदान की। जिससे विषयों के विकार पुन: नहीं सतायें।
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई।।
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को प्रेरित कर समझाया कि तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके देह रूपी अयोध्या में जाओ अर्थात् वासनाओं से निर्लिप्त होकर देह भावों में बरतने को जाओ। और तुम जाकर भावरत रूपी भरत को हमारी कुशलक्षेम सुनाना तथा तुम वहाँ के समाचार लेकर आना। अर्थात् देह भावों की क्या अवस्था है? को समझकर आना।।
तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ।।
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान तुरन्त देह रूपी अयोध्या में चला गया और आत्मा रूपी राम परम विवेक रूपी भरद्वाज ऋषि के पास गए। परम विवेक रूपी भरद्वाज ऋषि ने नाना प्रकार से आत्मा रूपी राम का सत्कार किया और फिर आशीर्वाद दिया अर्थात आत्मा की परम चेतना को बल प्रदान किया।
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी।।
इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए।।
व्याख्या : परम विवेक रूपी मन के भाव की वन्दना करके आत्मा रूपी राम पुन: सात्विक इच्छा रूपी पुष्पक विमान पर चढ़कर चले। इधर को निषेध भाव रूपी निषाद ने जब सुना की आत्मा रूपी राम आए हैं, तो निषेधता के भावों को नाव लाओ, नाव लाओ कह कर बुलाया।
सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो।।
तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी।।
व्याख्या : इतने में सहज इच्छा रूपी पुष्पक विमान सुरसरि यानी सुष्मना नाड़ी रूपी गंगा को पार कर इधर को आ गया और आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर सुष्मना नाड़ी रूपी गंगा के तट पर उतर गया। तब सुरता रूपी सीता ने सुष्मना नाड़ी रूपी गंगा को नाना प्रकार से पूजा और बार-बार चरणों में पड़ी अर्थात् सुरता सुष्मना नाड़ी में रमण करने लगी। उसी को बार-बार चरणों में पड़ना बताया गया है।
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा।।
सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल।।
व्याख्या : तब सुष्मना नाड़ी रूपी गंगा ने सुरता रूपी सीता को आशीर्वाद दिया अर्थात् सुष्मना नाड़ी ने सुरता को बल प्रदान किया और कहा कि तुम्हारा सुहाग अर्थात् तुम्हारी वृति सदैव आत्मा रूपी पति में अभंग होकर लगी रहे। निषेध भाव रूपी निषाध आत्मा रूपी राम के आगमन की बात सुनकर प्रेम में व्याकुल होकर दौड़ा आया तथा परम सुख से परिपूर्ण होता हुआ आत्मा रूपी राम के निकट आया।
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहीं तेही।।
प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम को देखकर निषेध भाव रूपी निषाद पृथ्वी पर गिर गया और शरीर की भी सुध नहीं थी अर्थात पूर्ण रूप से समर्पित होकर लीन हो गया। तब परम प्रेम को देखकर आत्मा रूपी राम ने निषाद भाव को उठाकर छाती से लगा लिया।
छ0 लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती।।
अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेव्य जे।
सुखधाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते।।
व्याख्या : रोम-रोम में बसने वाले आत्मा रूपी राम ने उठाकर निषेध भाव रूपी निषाद को हृदय से लगा लिया और परम निकट बैठाकर विनयपूर्वक कुशलक्षेम पूछी। तब निषेध भाव रूपी निषाद बोला कि आपके चरण कमलों को देखकर जो विश्वास रूपी शंकर और बुद्धि रूपी ब्रह्मा जी द्वारा सेवित हैं, मैं अब सकुशल हूँ। हे सुख के धाम व पूर्ण काम परमात्मा! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। नमस्कार करता हूँ। अर्थात् निषेधता का भाव भी सहज होकर परमात्मा में लीन हो गया।
छ0 सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो।
मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो।।
यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा।
कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा।।
व्याख्या : जो निषेधता का निषाद भाव सब प्रकार से अधम वृति का था, उसको भी आत्मा रूपी राम ने भावरत भरत के भाव के समान हृदय से लगा लिया। इसलिए तुलसीदास कहते हैं कि ऐसे परमात्मा को मंदबुद्धि के लोग मोह के कारण भूल जाते हैं। परन्तु काम आदि विकारों का हरण करने वाले व विज्ञान स्वरूप परमात्मा के गुणों को देवता, मुनि व सिद्ध जन प्रसन्न होकर गाते हैं। क्योंकि यह काम रूपी रावण के शत्रु आत्मा रूपी राम का चरित्र अनुराग पैदा करने वाला है।
दो0 समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान।।121(क)।।
व्याख्या : जो सुजान अर्थात् जो अच्छी तरह से जानकर आत्मा रूपी राम की काम रूपी रावण पर विजय की गाथा को सुनते व समझते हैं, उन्हें परमात्मा नित्य विजय, विवेक व नयी नयी विभूतियाँ प्रदान करता है। अर्थात् जो ध्यान में आत्मा की विजय गाथा को नित्य जानने का प्रयास करते हैं, उन्हें नित्य नया विवेक व विभूतियाँ प्राप्त होती रहती हैं।
दो0 यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार।
श्री रघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार।।121(ख)।।
व्याख्या : अरे मेरे मन! तू विचार करके देख। यह कलिकाल अर्थात देहाभास की वृति विकारों का घर है। इसलिए परमात्मा के नाम जप के अलावा इससे मुक्त होने का कोई दूसरा आधार नहीं है। अर्थात् परमात्मा के नाम जप से ही देह विकारों से मुक्त हुआ जा सकता है।
।। मास पारायण, सत्ताईसवाँ विश्राम ।।
।। इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुष विध्वंसने षष्ठ: सोपान: समाप्त:।।