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Lyrics

रामायण - उत्तर काण्ड

Ramayan
ॐ परमात्मने नम: ॐ गुरु देवाय: नम: ।। उत्तर काण्ड।। श्लोक -- केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिन्हं शोभाढ़य पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्ननम्। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीडयं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारुढ़रामम्।।1।। व्याख्या : इस श्लोक में आत्मा के उस परम स्वरूप का वर्णन किया गया, जब आत्मा परम शान्त अवस्था में सुरता व लखन भाव सहित विराजित होती है। उस समय आत्मा निर्विकार होती है इसलिए उसकी उपमा मोर के कण्ठ की आभा से की है। क्योंकि मोर सर्पों को खाने वाला होता है और परम शान्त आत्मा भी वासना रूपी सर्पों को खा जाती है। इसलिए मोर के कण्ठ की उपमा देकर कहा गया है। उस अवस्था स्वरों की गति परम सहज होती है जिससे विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश करने वाले भाव स्वरों में विलास करते रहते हैं। जिससे विशुद्ध प्रकाश की झलक मिलती रहती है। आत्मा की वह परम अवस्था शोभा से पूर्ण व वैराग्य रूपी पीले वस्त्रों को धारण करने वाली, दिव्य दृष्टि रूपी कमल नयन वाली, व सदैव सहज प्रसन्न मुद्रा वाली होती है। उस अवस्था में आत्मा प्राणों के माध्यम से शिव संकल्प रूपी धनुष और सद्प्रेरणा रूपी बाणों को धारण किए रहती है अर्थात् प्राण के माध्यम से भावों पर संयम बना रहता है। उस अवस्था में लखन भाव सहित बुद्धि के भाव रूपी वानर आत्मा की प्रेरणा का अनुसरण करने को तत्पर रहते हैं। वे सुरता रूपी सीता के स्वामी, जो कि सात्विक इच्छा रूपी पुष्पक विमान पर आरुढ़ हैं। उनको मैं नमस्कार करता हूँ। श्लोक कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेश वन्दितौ। जानकीकर सरोज लालितौ चिन्तकस्य मनभृंगसंगिनौ।।21।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी के स्वामी आत्मा रूपी राम के चरण कमल सुन्दर व कोमल हैं तथा विश्वास रूपी शिव और बुद्धि रूपी ब्रह्मा द्वारा सेवित हैं। वे चरण कमल सुरता रूपी सीता के कर कमलों द्वारा दुलराए हुए हैं और चिंतन करने वालों के मन रूपी भ्रमर के नित्य संगी हैं। श्लोक कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिम भीष्टसिद्धिदम। कारुणीककलककञ्जलोचनं नौमि शंकरमनगंमोचनम्।।3।। व्याख्या : जब कुण्डलिनि शक्ति में इन्द्रियाँ समा जाती हैं तो इन्द्रियाँ सहज व सुन्दर हो जाती हैं। जिस साधक की कुण्डलिनि शक्तिवश में हो जाती है, उसे अभीष्ट सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है तथा उसके करुणामय व कमल के समान दिव्य नेत्र खुल जाते हैं और शंकाओं का निवारण होकर काम वासना का नाश हो जाता है। दो0 रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग। जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग।।1।। व्याख्या : इस दोहे में जब ध्यान उतर के देह भावों में बरतने वाला होता है। उस समय की भाव अवस्था को बताया गया। उस समय शरीर रूपी अयोध्या के नर नारी अर्थात् नर और नाड़ियों की क्या गति हो जाती है? उसी को बताते हुए कहा गया है कि देह रूपी अयोध्या के नर-नाड़ी आत्मा रूपी राम के आगमन की बाट निहारते हैं और सब नर-नाड़ियाँ आत्मा के वियोग से कृश हो गयी हैं। देह रूपी अयोध्या के भाव रूपी लोग बहुत आतुर हैं तथा आत्मा के वियोग से दु:खी भी हैं। अब तो केवल ज्ञान रूपी सूर्य ही आत्मा और देह के बीच में बचा हुआ है। अर्थात् ज्ञान रूपी सूर्य के कारण आत्मा रूपी राम अभी देह भाव में नहीं बरत पा रहे हैं। परन्तु देह भावों की आतुरता व लीनता से आत्मा का देह रूपी अयोध्या में आगमन होने का समय हो आया है। सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर। प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर।। व्याख्या : इतने में ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गये। नगर भी चारों ओर से रमणीक हो गया। मानो ये सब-के-सब चिह्न प्रभु के (शुभ) आगमन को जना रहे हैं। दो0 कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ। आयउ प्रभु श्री अनुजजुत कहन चहत अब कोई।।2।। व्याख्या : ध्यान में जब आत्मा चेतना शरीर में प्रवेश करने वाली होती है तो सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्यादि माताएँ आनन्द से भर जाती हैं। शरीर की समस्त नाड़ियाँ ही बस इस अपेक्षा में रहती हैं कि बस कोई भाव आकर कहने वाला ही है कि आत्मा रूपी राम देह भाव में आ गए हैं। दो0 भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार।।3।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव के दाहिने अंग व दाहिनि आँख फड़कने लगे। जो सगुन इस बात का संदेश दे रहे थे कि आत्मा रूपी राम से शीघ्र ही मिलन होगा। रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।। कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव विचार करने लगा कि केवल एक ज्ञान रूपी सूर्य ही आत्मा से मिलने में बाधक बचा है। यह जानकर भावरत भरत भाव को बहुत दु:ख हुआ। भाव रत भरत भाव सोचने लगा कि किस कारण से आत्मा रूपी राम देह भाव में नहीं आए। कहीं मुझ भाव रत भाव को कुटिल (विषयी) जानकर तो नहीं भुला दिया। अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।। कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।। व्याख्या : अहो! लखन भाव ही बड़ा भाग्यशाली है जो सदैव आत्मा रूपी राम के चरण कमलों में अनुराग रखता है। मुझ भाव रत भरत भाव को आत्मा ने कपटी व कुटिल जाना है अर्थात् विषयी भोगों में रत जान लिया, इसलिए मुझे अपने साथ नहीं लिया। जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।। जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।। व्याख्या : बात भी सही है क्योंकि अगर आत्मा मुझ भाव रत भरत भाव की करणी पर ध्यान दें, तो सौ करोड़ कल्पों (कल्पना) तक मेरा छुटकार नहीं हो सकता। परन्तु मुझे आशा है कि आत्मा रूपी राम अपने भक्तों के अवगुणों पर ध्यान नहीं देते हैं। क्योंकि वे कोमल स्वभाव वाले व दीनों के बन्धु होते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि आत्मा तो भावों के समर्पण को देखकर ही भावों को अपना लेती है। भावों की पुरानी वृतियों पर ध्यान नहीं देती है। मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।। बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव कहता है कि अब मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास हो गया है कि शुभ शकुन हो रहे हैं, इसलिए आत्मा रूपी राम से अवश्य मिलन होगा। अगर अवधी के बीत जाने पर भी प्राण रहेंगे तो मुझ भाव रत भरत के समान कौन अधम होगा? अर्थात् प्रचण्ड ध्यान में उदित ज्ञान रूपी सूर्य का प्रभाव कम जाने पर आत्मा रूपी राम जरूर देह रूपी अयोध्या में आयेंगे। अगर तब भी आत्मा से मिलन नहीं हुआ तो मुझ भाव रत भरत का जन्म धिक्कार है। दो0 राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत।।(क)।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के विरह सागर में भाव रत भरत का मन मगन हो रहा था। उसी समय विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के रूप में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आ गया मानो सागर में जहाज आ गया हो। दो0 बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात।।(ख)।। व्याख्या : उस समय भाव रत भरत भाव वैराग्य वृति रूपी कुशासन पर बैठा हुआ था और कृस गात अर्थात् पूर्ण निर्मलता की अवस्था थी। भाव रत भरत भाव आत्म चिंतन करने में मगन था और नेत्रों से प्रेम रूपी जल बह रहा था। देखत हनुमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ। मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव की ऐसी दशा को देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भाव बहुत प्रसन्न हुआ और उसके अंग-अंग पुलकित हो उठे तथा नेत्रों से प्रेम रूपी जल बरसने लग गया। अनन्य भाव ने मन में बहुत सुख का अनुभव किया। तब अमृत के समान मधुर वाणी बोला। जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।। रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।। व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम के विरह का रात-दिन सोच करते हो और रात-दिन उनके गुणों का गान करते हो। वो ही जीवात्मा के तिलक परमात्मा सज्जन लोगों को सुख देने वाले व मन के भावों के त्राता आत्मा रूपी राम सकुशल आए हैं। रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।। सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।। व्याख्या : भाव द्वन्द्व रूपी युद्ध क्षेत्र में काम रूपी रावण को जीतने वाले तथा जिनके सुयश का बखान दैवीय भाव करते हैं। वे परमात्मा रूपी राम लखन भाव व सुरता सहित आ रहे हैं। अनन्य बुद्धि की इन बातों को सुनते ही भाव रत भरत भाव के दु:ख मिट गए। मानों प्यासे को अमृत पान करने को मिल गया हो। को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।। मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।। व्याख्या : तब भाव रत भरत भाव ने कहा कि तुम कौन हो? और कहाँ से आए हो? तुमने मुझे परम प्रिय वचन सुनाए हैं। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने कहा कि हे कृपानिधान! मैं प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान हूँ। दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।। मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवत जल पुलकित गाता।। व्याख्या : मैं तो दीनों के बंधु आत्मा रूपी राम का दास हूँ। यह सुनते ही भाव रत भरत भाव अनन्य बुद्धि के भाव से आदर पूर्वक उठकर मिला। मिलते समय दोनों का प्रेम हृदय में नहीं समा रहा था और आँखों से प्रेम रूपी जल बह रहा था और पुलकावलि छा रही थी। कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।। बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।। व्याख्या : हे अनन्य भाव रूपी वानर! तुम्हारे दर्शन से सब दु:ख मिट गए हैं। मुझे बहुत दिनों में कोई आत्मा रूपी राम का प्रेमी मिला है। फिर बार-बार भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम की कुशलक्षेम पूछने लगा तथा कहने लगा कि हे भाई! इस शुभ समाचार सुनाने के बदले तुमको मैं क्या दूँ? एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।। नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।। व्याख्या : इस संदेश के बराबर जगत में दूसरा कोई संदेश नहीं हो सकता है। मैंने यह मन में विचारकर देख लिया है। अर्थात् भाव रत भरत भाव कहना चाहता है कि आत्मा से मिलने का समय आ गया है। इससे पवित्र और कोई संदेश नहीं हो सकता है। हे तात! मैं (भाव रत भरत भाव) तुम (अनन्य बुद्धि) से उऋण नहीं हो सकता। अब आप मुझे आत्मा रूपी राम के चरित के बारे में सुनाओ। तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।। कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।। व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने भाव रत भरत भाव के प्रति समर्पण दिखाते हुए आत्मा रूपी राम के गुणों की गाथा का वर्णन किया। तब भाव रत भरत ने पूछा कि हे बुद्धि के भाव रूपी वानर! यह बताइये कि क्या कभी इन्द्रियों के स्वामी कृपालु परमात्मा मुझ भाव रत भरत भाव की याद करते हैं? वास्तव में भाव रत भाव जानना चाहता है कि मेरी (भरत) लीनता का क्या आत्मा को आभास होता है? छ0 निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन करयो। सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि परयो।। रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो। काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सद्गुन सिंधु सो।। व्याख्या : भाव रत भरत के यह वचन सुनकर कि क्या परमात्मा कभी मेरी भाव रतता को देखकर मुझ भाव रत भरत भाव को याद करते हैं। अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान अति विनम्रता के साथ भाव रत भरत के सामने समर्पित हो गया। जिस भाव रत भरत के गुणों का परमात्मा स्वयं बखान करते हैं वो क्यों नहीं इतने विनीत और परम पवित्र सद्गुणों के समुद्र होंगे? अर्थात् परमात्मा में लीनता का भाव तो सद्गुणों का समुद्र होगा ही होगा। दो0 राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात। पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात।।2(क)।। व्याख्या : हे तात्! तुम तो आत्मा रूपी राम को प्राणों के समान प्रिय हो। ये मेरे सत्य वचन हैं। यह सुनकर भाव रत भरत भाव बार-बार अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान से मिलने लगा। सो0 भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं। कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि।।2(ख)।। व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान भाव रत भरत के प्रति समर्पण दिखाते हुए तुरन्त आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी राम के पास चला गया। तब कुशलक्षेम बतायी। तब आत्मा रूपी राम सात्विक इच्छा रूपी पुष्पक विमान पर हर्षित होते हुए चढ़े। हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।। पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव हर्षित होता हुआ सुष्मना नाड़ी के प्रदेश रूपी कोशलपुर में गया और विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गु डिग्री को आत्मा रूपी राम के देह रूपी नगर में आने की खबर दी। उसके बाद आत्मा रूपी राम के सकुशल देह भाव रूपी अयोध्या में आने की बात नाड़ियों रूपी माताओं को मन के अंदर (मन अ अंदर उ मंदिर) बतायी। सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं।। समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के देह भाव में बरतने की बात सुनकर सब नाड़ियाँ रूपी माताएँ प्रसन्न होकर दौड़ने लगी अर्थात् नाड़ियों में प्रसन्नता का संचार हो गया। तब भाव रत भरत भाव ने आत्मा रूपी राम की कशुल क्षेम समझाकर बतायी। जब आत्मा के देह भाव में आने की बात शरीर के भावों को पता लगी तो समस्त नर-नाड़ियों में हर्ष का संचार हो उठा और समस्त देह के भाव प्रसन्न हो उठे। दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।। भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधुरगामिनी।। व्याख्या : ध्यान में जब आत्म चेतना पुन: देह रूपी अयोध्या में आती है तो समस्त भावों एवं नाड़ियों में मंगल के भाव संचरित होने लगते हैं। उन्हीं भावों को दही, दूर्बा, रोली व फल-फूलों के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में निर्मल नाड़ियाँ सात्विक इच्छाओं के भावों को लेकर संचरित होने लगती हैं। उस अवस्था में नाड़ियों की गति हाथी चालवाली हो जाती है। उसी को गाते हुए सिंधुरगामिनी (हाथी की चाल) बताया गया है। जे जैसहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं।। एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।। व्याख्या : जब देह रूपी नगर के भाव रूपी लोगों को आत्मा रूपी राम के आगमन का आभास होता है तो सब भाव जैसे-तैसे आत्मा से मिलने के लिए उतावले हो उठते हैं। वे देह के बाल व वृद्ध भावों को अर्थात् चंचल व जड़ भावों को साथ लेकर नहीं आते हैं। उस अवस्था में एक भाव दूसरे भाव से पूछने लगते हैं कि क्या आपने आत्मा रूपी राम को देखा है। जब ध्यान में चेतना उर्ध्वगामी हो जाती है तो शरीर एकदम शून्य हो जाता है परन्तु जब ध्यान उतरने लगता है तो राम (ऊर्जा) का संचार शरीर में होने लग जाता है जिससे देह के भावों में आत्मा से मिलने की उमंग उठ आती है। अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।। बहइ सुहावन त्रिविध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।। व्याख्या : जब देह रूपी नगर में ऊर्जा (राम) का संचार हुआ तो समस्त देह रूपी अयोध्या शोभा (निर्मलता) की खान बन गयी। उस अवस्था में तीनों गुणों की गति निर्मल हो गयी अर्थात् गुणों की गुणों में बरतने की अवस्था आ गयी। सरयू नदी अर्थात् नाड़ियों में निर्मल भाव रूपी जल बहने लगा। दो0 हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत। चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत।।3(क)।। व्याख्या : उस अवस्था में ज्ञान के भाव, शत्रुघ्न रूपी कामादि शत्रुओं का नाश करने वाले भाव शरीर के स्वरों में समूह के समूह संचरित होने लगे। तब भाव रत भरत भाव अत्यन्त प्रेम का अनुभव करता हुआ आत्मा रूपी राम की अगवानी के लिए चला। दो0 बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान। देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान।।3(ख)।। व्याख्या : बहुत से भाव चक्र रूपी अटारियों पर चढ़कर मस्तिष्क रूपी आकाश में सात्विक इच्छा रूपी विमान को देखते हैं। उस अवस्था में स्वरों की गति बहुत मधुर हो जाती है तथा सुमंगल के भाव गान करने लगते हैं। दो0 राका ससि रघुपतिपुर सिंधु देखि हरषान। बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान।।3(ग)।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम पूर्ण चन्द्रमा के समान हैं तथा अयोध्या रूपी शरीर समुद्र के समान है जो पूर्ण चन्द्रमा को देखकर बढ़ रहा है और शरीर की नाड़ियाँ उस समुद्र की तरंगों के समान हैं। इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।। सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रूचिर यह देसा।। व्याख्या : इधर को सूर्य कमल आत्मा रूपी राम बुद्धि के भावों को देह रूपी मनोहर नगर को दिखाते हैं और कहते हैं कि हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव, दृढ़ बुद्धि अंगद व वैराग्य रूपी विभीषण! यह पवित्र निर्मल शरीर रूपी नगर बहुत रूचिकर (सुन्दर) है। जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।। अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोऊ कोऊ।। व्याख्या : हालाँकि सबने बैकुण्ठ होने की बात बतायी है और वेद व पुराण भी बताते हैं कि बिना कुण्ठा (बिना अ कुण्ठा उ बैकुण्ठ) के समान सुखद कोई अवस्था नहीं होती है। फिर भी देह रूपी अयोध्या मुझे (आत्मा) बहुत प्रिय होती है। इस रहस्य को कोई-कोई ही जान पाते हैं। बिना कुण्ठा की एक अवस्था मन की होती है और बिन कुण्ठा की एक अवस्था शरीर की होती है। इसलिए जब शरीर सहज होकर निर्मल हो जाता है और कुण्ठा मिट जाती है तो वह परम सुखद अवस्था होती है। इसलिए शरीर की बिन कुण्ठा की अवस्था के आनन्द को कोई-कोई साधक ही जान पाते हैं। जन्मभूमि मम पूरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।। जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।। व्याख्या : यह पवित्र देह रूपी भूमि जो मुझ आत्मा को जन्म का आभास कराने वाली होती है, परम सुहावनी होती है। उत्तर दिशा में पवित्र नाड़ी रूपी सरयू नदी बहती है अर्थात् पवित्र ईड़ा नाड़ी बायीं दिशा में बहती है। उस नाड़ी रूपी नदी के निर्मल जल में स्नान करने से अर्थात् ईड़ा नाड़ी के विकार मिट जाने से बिना प्रयास के ही नर की धड़कन आत्मोन्मुखी हो जाती है। ईड़ा नाड़ी में तामसिक भावों का संचार होता है और जब तामसिक भाव निर्मल हो जाते हैं तो नर की धड़कन स्वत: आत्मोन्मुखी हो जाती है। अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।। हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो रामबखानी।। व्याख्या : मुझ आत्मा को देह रूपी नगरी के भाव रूपी लोग बहुत प्रिय होते हैं। यह देह रूपी नगर मुझ आत्मा का घर है जो सुख की राशि होता है। आत्मा रूपी राम की बातें सुनकर सब बुद्धि के भाव रूपी वानर हर्षित हो गए। देह रूपी अयोध्या धन्य है, जिसका महत्व स्वयं आत्मा रूपी राम ने बताया है। दो0 आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान। नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान।।4(क)।। व्याख्या : देह रूपी अयोध्या के भाव रूपी लोगों को आता देखकर कृपालु आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा की और सात्विक इच्छा रूपी पुष्पक विमान देह रूपी नगर के निकट उतर गया अर्थात ध्यान की चेतना भृकुटि के निकट पहुँच गयी। दो0 उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु। प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु।।4(ख)।। व्याख्या : सात्विक इच्छा रूपी पुष्पक विमान से उतर कर आत्मा रूपी राम ने इच्छा रूपी पुष्पक से कहा कि तुम इच्छाओं के मूल कुबेर के पास चले जाओ। आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।। बामदेव बसिष्ट मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।। व्याख्या : भाव रत भरत के साथ देह रूपी नगर के सब लोग आए, जो आत्मा (ऊर्जा) के वियोग के कारण कृश (निर्बल) हो रहे थे। जब आत्मा रूपी राम ने ज्ञान के बामदेव, विशिष्ट भाव रूपी वशिष्ठ व मन के मूल भावों को देखा तो शिवसंकल्प रूपी धनुष व प्रेरणा रूपी बाणों को देह रूपी पृथ्वी पर रख दिया। धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।। भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने दौड़कर गु डिग्री के चरण पकड़ लिए अर्थात् आत्मा की ऊर्जा (राम) ज्ञान रूपी गु डिग्री भाव के प्रति समर्पित हो गया। उस अवस्था में लखन भाव रूपी लक्ष्मण व आत्मा दोनों का शरीर पुलकित हो उठा। तब मिलकर मन के मुख्य भाव रूपी मुनि ने आत्मा की कुशलक्षेम पूछी। तो आत्मा रूपी राम बोले कि आपकी दया में ही हमारी कुशलता है। सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।। गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।। व्याख्या : फिर सब द्विज अर्थात् देह के दिव्य वृति के भावों को नमन किया। आत्मा रूपी राम धारणा को धारण करने में धुरन्धर होते हैं। फिर भाव रत भरत भाव ने आत्मा रूपी राम के चरण पकड़ लिए अर्थात् भाव रतता का भाव आत्मा के सामने समर्पित हो गया। आत्मा को तो सभी स्वर, मन के भाव व विश्वास के भाव नमन करते हैं। परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।। स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।। व्याख्या : भाव रत भरत भाव उठाए नहीं उठ रहा था, तब आत्मा रूपी राम ने जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम के श्याम शरीर के रोम खड़े हो गए अर्थात् आत्मा से प्रेम की तरंगें निकलने लगी। नये कमल रूपी नेत्रों में प्रेम रूपी जल बढ़ने लग गया। छ0 राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी। अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी।। प्रभु मिलत अनुजहि सो मो पहिं जाति नहिं उपमा कही। जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही।। व्याख्या : कमल रूपी नेत्रों से प्रेम रूपी जल बहने लगा और सुन्दर अर्थात् निर्मल शरीर में पुलकावलि छाने लग गयी। इस प्रकार बहुत प्रेम से भाव रत भरत भाव को हृदय से लगाकर तीनों गुणों के स्वामी आत्मा रूपी राम मिले। आत्मा रूपी राम व भाव रत भरत भाव के मिलने की उस दशा का वर्णन मुझसे नहीं कहा जा पा रहा है। वो मिलन तो ऐसे था मानो प्रेम और श्रृंगार रस शरीर धारण करके मिल रहे हों। छ0 बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई।। अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूढ़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम भाव रत भरत भाव से कुशल पूछते हैं परन्तु भाव रत भरत भाव कुछ बोल नहीं पा रहा है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! उस अवस्था में प्राप्त सुख तो मन से परे होता है। अत: उसको तो वही जान पाता है, जो उसे प्राप्त करता है। हे सुष्मना नाड़ी के स्वामी आत्मा रूपी राम! आपने आर्त जानकर दर्शन दिया यही अब कुशल है। हे कृपा के समुद्र! आपने तो मुझ भाव रत भरत को डूबने से हाथ पकड़कर बचा लिया है। दो0 पुनि प्रभु हरषि शत्रुघ्न भेंटे हृदयँ लगाइ। लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाई।।5।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम हर्षित होकर विकार रूपी शत्रुनाशक शत्रुघ्न भाव से गले मिले। फिर लखन भाव व भाव रत भरत भाव परम प्रेम के साथ मिले। भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।। सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।। व्याख्या : फिर कामादि विकारों का दमन करने वाला शत्रुघ्न भाव व लखन भाव आपस में मिले और कठिन विरह से उत्पन्न दु:खों का निवारण किया। फिर भाव रत भरत भाव ने सुरता रूपी सीता को शीश झुकाया अर्थात् सुरता के सामने समर्पण किया और शत्रुघ्न भाव सहित परम सुख का अनुभव किया। प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।। प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को देखकर देह रूपी नगर के सब भाव रूपी लोग हर्षित हो उठे और आत्मा के वियोग से पैदा सब विपदा का नाश हो गया। सभी देह के भाव प्रेम से आतुर होकर आत्मा रूपी राम को देखने लगे। तब आत्मा रूपी राम ने खेल किया अर्थात अपना प्रभाव दिखाया। अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथा जोग मिले सबहि कृपाला।। कृपा दृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम अनेकों रूपों में प्रकट हो गए। वास्तव में जब ध्यान में आत्मा (ऊर्जा) पुन: जब देह में आती है तो एक ऊर्जा (राम) ही भावों की वृति व रूचि के अनुसार एक साथ सब भावों में व्याप्त हो जाती है। उस ऊर्जा (राम) का भावों के अनुसार बरतना ही नाना रूपों में राम (ऊर्जा) का प्रकट होना बताया गया है। तब आत्मा रूपी राम ने सब भावों को कृपा की दृष्टि से देखा और देह रूपी नगर के सब नर-नाड़ियों को शोक से मुक्त कर दिया अर्थात् नर-नाड़ियों में ऊर्जा का दिव्य संचार होने लगा। छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।। एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगे चले सील गुन धामा।। व्याख्या : इस प्रकार क्षण मात्र में आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) सबसे मिल लिए। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! इस राम (ऊर्जा) के मिलने के मर्म को कोई नहीं जान पाया। इस प्रकार सब भावों को सहज करके शील व गुणों के घर आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) आगे चले। अर्थात् ध्यान की चेतना भृकुटि से नीचे उतरने लगी। कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।। व्याख्या : जब ध्यान चेतना भृकुटि से नीचे देह रूपी अयोध्या में आने लगती है तो सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या, रजो नाड़ी रूपी कैकयी व तमो नाड़ी रूपी सुमित्रा अर्थात् सुष्मना, पिंगला व ईड़ा नाड़ियों में हलचल मच गयी और आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) को देख कर जैसे गाय बछड़े के लिए दौड़ती है, वैसे दौड़ पड़ी। छ0 जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रूख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं।। अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बिपति बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे।। व्याख्या : जैसे परवश होकर गाय बछड़े को छोड़कर जंगल में चरने के लिए जाती है और दिन बीत जाने पर स्तनों से दूध बहाती हुई हुँकार मारती बछड़े के लिए दौड़ी आती है। उसी प्रकार आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) से मिलने के लिए सभी नाड़ियाँ रूपी माताएँ प्रेम से दौड़ी आयी और नाना प्रकार से मधुर वाणी बोली अर्थात् नाड़ियों के भावों में निर्मलता व मधुरता आ गयी। अब आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) से मिलकर वियोग से उत्पन्न सब विपत्ति मिट गयी और परम सहजता (परम सुख) की अवस्था आ गयी। दो0 भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि।।6(क)।। व्याख्या : ईड़ा नाड़ी रूपी सुमित्रा माता अपने पुत्र लखन भाव की आत्मा रूपी राम के प्रति अनुराग देखकर उससे मिलि । पिंगला नाड़ी में रजोवृति का संचार होता है और रजोवृति सदैव आत्मोन्मुखी होने में संकोच करती ही है। अत: उसी को कैकयी का राम से मिलने में संकोच बताया गया है। दो0 लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ। कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ।।6(ख)।। व्याख्या : फिर लखन भाव सब नाड़ियों रूपी माताओं से मिला और आशीर्वाद रूपी बल पाकर बहुत हर्षित हुआ। लखन भाव बार-बार रजोवृति रूपी कैकयी से मिला परन्तु मन का क्षोभ नहीं जा रहा था। सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।। देहीं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।। व्याख्या : फिर सुरता रूपी सीता सब श्वास का संचार करने वाली नाड़ियों रूपी माताओं से मिली और सबके प्रति समर्पण करके बहुत हर्षित हुई। अर्थात् विशुद्ध प्राण (जानकी) अब नाड़ियों के माध्यम से श्वास में परिवर्तित हो गया। तब सब नाड़ियों रूपी सासुओं ने आशीर्वाद देकर अर्थात् बल प्रदान करके सुरता रूपी सीता की कुशल पूछी। और आत्मा रूपी राम के साथ अखण्ड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।। कनक थार आरती उतारहिं। बार-बार प्रभु गात निहारहिं।। व्याख्या : सब भाव व नाड़ियाँ आत्मा रूपी राम के मुख कमल को देखने लगते हैं अर्थात् समस्त भावों व नाड़ियों की गति आत्मोन्मुखी हो गयी और मंगल की अवस्था जानकर आँखों द्वारा प्रेम रूपी जल को रोक लिया। उस अवस्था में सब नाड़ियाँ रूपी माताएँ सोने के थाल लेकर अर्थात् माया के विकारों को समेट कर आरती उतारती है अर्थात् दु:खों से मुक्त होती है और बार-बार आत्मा रूपी राम का मुख देखती हैं अर्थात् आत्मोन्मुखी होती हैं। नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।। कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।। व्याख्या : उस अवस्था में नाड़ियाँ नाना प्रकार से विकारों का त्याग करने लग जाती हैं अर्थात् नाड़ियाँ सहज व निर्मल हो जाती हैं जिससे हृदय में परमानंद की अवस्था आ जाती है। सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या बार-बार आत्मा रूपी राम को देखती हैं और चितवत अर्थात् स्थिर हो जाती हैं। हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।। अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता बार-बार हृदय में विचार करने लगी कि वासना रूपी लंका के अधिष्ठाता काम रूपी रावण को कैसे मारा होगा। आत्मा व लखन भाव रूपी दोनों भाव तो बहुत कोमल व निर्मल होते हैं और आसुरी भाव रूपी राक्षस तो बहुत बलवान होते हैं। दो0 लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु। परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु।।7।। व्याख्या : लखन भाव रूपी लक्ष्मण व सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम को नाड़ियों रूपी सब माताएँ देखने लगती हैं और मन परमानन्द में मगन हो जाता है तथा अंग-अंग में पुलकावलि छा जाती है। लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।। हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।। व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण, सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव, निसंग बुद्धि रूपी नल-नील, धीर बुद्धि रूपी जामवंत, दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आदि शुभकारी भावों ने मन में प्रवेश करके देह में बरतना शु डिग्री कर दिया। भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।। देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती।। व्याख्या : सभी भाव आदरपूर्वक भाव रत भरत भाव के स्नेह, शील, व्रत व नियम का वर्णन करने लगते हैं। देह रूपी नगर के भाव रूपी लोगों की ऐसी सुखद अवस्था की सभी बुद्धि के भाव सराहना करने लगते हैं। पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।। गुर बसिष्ठ कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने सब बुद्धि के भाव रूपी सखाओं को बुलाया और मन की एकाग्रता में लीन होना सिखाया। विशिष्ट ज्ञान रूपी गु डिग्री बसिष्ठ ही हमारे (जीवात्मा) कुल में पूज्यनीय हैं और इनके ज्ञान की प्रेरणा से ही आसुरी भावों को भाव द्वन्द्व में मारा जाना सम्भव हुआ है। ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।। मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।। व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गु डिग्री भाव से कहा कि हे गुरूदेव! ये बुद्धि के भाव रूपी वानर सब मेरे सखा अर्थात् सहयोगी हैं। ये भाव द्वन्द्व रूपी संग्राम में जहाज के समान साबित हुए हैं। मेरे लिए इन्होंने जन्म को लगा दिया अर्थात् ये सब विषयों को छोड़कर आत्मोन्मुखी हो गए हैं। इसलिए ये सब भाव मुझे भाव रत भरत भाव से भी ज्यादा प्रिय हैं। सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर सब बुद्धि के भाव रूपी वानर प्रेम में मगन हो गए और क्षण-क्षण में नए सुख का अनुभव करने लगे। दो0 कौसल्या के चरननन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ। आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ।।8(क)।। व्याख्या : फिर बुद्दि के भाव रूपी वानरों ने सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या माता को सीस झुकाया अर्थात् बुद्धि के भाव सुष्मना नाड़ी में सहज होकर संचरित होने लगे। तब सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या ने बल प्रदान किया और कहा कि तुम मुझे आत्मा (ऊर्जा) के समान ही प्रिय हो। दो0 सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद।।8(ख)।। व्याख्या : उस अवस्था में नाड़ियों से सुमन उ सु अ मन अर्थात् अच्छे निर्मल सात्विक भावों की वर्षा होने लग जाती है और सुख के मूल भाव पैदा होने लगते हैं। उस अवस्था में नाड़ियों व नर (धड़कन) के माध्यम से भावों का संचार होने लग जाता है। कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।। बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। व्याख्या : उस अवस्था में कंचन थाल अर्थात् माया के भाव विचित्र यानि चित्र विहिन हो जाते हैं। अर्थात् माया के भाव सहज होकर शान्त हो जाते हैं और गुण गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है। बंदनवार अर्थात् जो बंधन वाले इच्छा के भाव थे, वे सब मंगल का कारण बन गए। बीथी सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।। नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।। व्याख्या : नाड़ियों रूपी गलियाँ सुमंगल भावना से भर गयी और मन मस्त होकर हाथी की चाल से चारों गुण अवस्था में चलने लगा। उस अवस्था में नाना प्रकार से सुमंगल की भावना सज गयी और शरीर रूपी नगर में प्रसन्नता के बाजे बजने लग गए। जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहीं असीस हरष उर भरहीं।। कंचन थार आरती नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना।। व्याख्या : जहाँ-तहाँ पर नाड़ियाँ विकारों का त्याग करने लगी और हर्षित होकर शुभ भावों को बल प्रदान करने लगी। माया के भावों (कंचन थाल) से आरती करने लगी अर्थात् माया के भावों से उत्पन्न दु:खों का हरण करने लगी और नाड़ियों रूपी युवतियाँ सज कर शुभ भावों का संचार करने लगी। करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।। पुर शोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।। व्याख्या : उस अवस्था में मंगल भावों का संचार करने वाली सुमंगला नाड़ियाँ आत्मा रूपी राम की आरती करने लगती हैं क्योंकि आत्मा रूपी राम तो कमलवन अर्थात् दिव्यता को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं। शरीर रूपी नगर की उस शोभा का अनुभव (अर्थात् वर्णन तो) तो साधक स्वयं (वेद), शेष (वाणी द्वारा बोलते-बोलते जो शेष बचता है) व सरस्वती (अर्थात् स्वरों की गति में लीन होकर अनुभव होता है) करते हैं। तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।। व्याख्या : वे भी ध्यान की इस अवस्था के अनुभव को देखकर ठगे से रह जाते हैं अर्थात् पूरी तरह समझ नहीं पाते हैं। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! उस परम धड़कन (नर) के गुणों को कोई कैसे कह सकता है। दो0 नारि कुमुदिनी अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस।।9(क)।। व्याख्या : नाड़ियाँ कुमुदिनी है, देह रूपी अयोध्या सरोवर है और आत्मा रूपी राम विरह के सूर्य हैं (इस विरह रूपी सूर्य के ताप से कुमुदिनी मुरझा गयी थी)। अब विरह रूपी सूर्य के अस्त होने पर निर्मल आत्मा रूपी चन्द्रमा को देखकर वे कुमुदिनियाँ (नाड़ियाँ पुन: संचरित हो उठी)। पुन: खिल उठी। अर्थात् आत्मा (ऊर्जा) के पुन: शरीर में आने पर नाड़ियाँ पुन: संचरित हो उठी। दो0 होहिं सगुन सुभ बिबिध बाजहिं गान निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।।9(ख)।। व्याख्या : उस अवस्था में शुभ गुणों का संचार हो उठता है और शरीर रूपी नगर में सहजता रूपी नाना बाजे बज उठते हैं। इस प्रकार देह रूपी नर-नाड़ियों को सद्गुणों से प्रबल करके आत्मा रूपी राम सहज होकर देह भावों रूपी भवन में चले। प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।। ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने जाना कि रजोवृति रूपी कैकयी को बहुत संकोच हो रहा है तो हे श्रद्धा रूपी पार्वती! सबसे पहले आत्मा रूपी राम रजोवृति रूपी कैकयी के भवन में गए अर्थात् आत्म ऊर्जा सबसे पहले रजोवृति भावों में बरतने लगी। फिर रजोवृति रूपी कैकयी को सहज करके और सुखी करके आत्मा रूपी राम निज भवन अर्थात् स्वयं की स्वरूपावस्था में अवस्थित हुए। कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।। गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।। व्याख्या : जब कृपा के समुद्र आत्मा रूपी राम मंदिर अर्थात् मन के अन्दर गए तो देह रूपी नगर के नर-नाड़ी सुखी हो गए। अर्थात् जब मन और आत्मा एक हो गए तो देह के भाव व नर-नाड़ियाँ भी सहज हो गए। तब मन के विशिष्ट ज्ञान रूपी गु डिग्री वशिष्ठ ने द्विज अर्थात् दिव्य भावों को बुला लिया और कहा कि अब परम सहज अवस्था आ गयी है। सहज अवस्था को ही सुघड़ी व शुभ दिन बताया गया है। सब द्विज देहु हरषि अनुशासन। रामचन्द्र बैठहिं सिंघासन।। मुनि बसिष्ठ के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।। व्याख्या : हे दिव्यता के भाव रूपी द्विजों! तुम सब मिलकर प्रेरणा कीजिए जिससे आत्मा रूपी राम सब भावों के अधिष्ठाता हो जाएँ। विशिष्ट ज्ञान रूपी गु डिग्री बशिष्ठ के ये वचन सुनकर सब विशुद्ध ज्ञान के प्रकाशवाले भावों को बहुत अच्छे लगे। अर्थात् विशुद्ध ज्ञान के प्रकाशवाले भाव भी आत्मा को भावों का संचालक बनाना चाहने लगे। कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।। अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै।। व्याख्या : विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश करने वाले भाव मधुर वचन कहने लगे कि आत्मा का भावों का अधिष्ठाता बनने पर ही परम विश्राम की अवस्था आ पायेगी। इसलिए हे मन के विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ जी! अब देर मत कीजिए और आत्मा रूपी राम को तिलक कर दीजिए अर्थात् भावों का अधिष्ठाता बना दीजिए। दो0 तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10(क)।। व्याख्या : तब मन के विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव ने सुमंत्रणा रूपी सुमंत भाव से कहा और वह सुनते ही हर्षित होकर चला और वृति रूपी रथ व मन के भाव रूपी हाथी व घोड़ों को सजाया। दो0 जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10(ख)।। व्याख्या : फिर मंगल भावना पैदा करके तरंगों रूपी धावन (दूतों) को जहाँ-तहाँ भेजा और फिर हर्ष के साथ आकर पुन: सुमंत्रणा रूपी सुमंत भाव ने विशिष्ट ज्ञान रूपी मन के वशिष्ठ भाव के चरणों में सीस झुकाया अर्थात् समर्पण कर दिया। ।। नवाह्न पारायण, आठवाँ विश्राम।। अवधपुरी अति रूचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।। राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।। व्याख्या : जब ध्यान की सिद्धि के बाद आत्म ऊर्जा देह रूपी अयोध्या में उतरकर आती है तो देह रूपी नगरी बहुत ही रूचिकर अर्थात् सहज हो जाती है और दैवीय भावों की मन में वर्षा होने लगती है। तब आत्मा रूपी राम ने सेवा के भावों को बुलाकर कहा कि सबसे पहले मेरे बुद्धि के भाव रूपी सखाओं को स्नान करवाओ अर्थात् सेवा के भावों से कहा कि बुद्धि के भावों को निर्मल करवाओ। कहीं ये तर्क में उलझकर देह में आसक्त नहीं हो जाएँ। सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।। पुनि करूनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा पाकर सेवक भाव जहाँ तहाँ दौड़े और सबसे पहले सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव आदि भावों को तुरन्त नहाए अर्थात् निर्मल किए। फिर करुणा के समुद्र आत्मा रूपी राम ने भाव रत भरत भाव को बुलाया और स्वयं के हाथों से जटाओं को सुलझाया अर्थात् आत्मा ने स्वयं भाव रत भरत भाव की अन्तर्द्वन्द्व की उलझनों को सुलझा कर सहज कर दिया। अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।। भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने तीनों भाव रूपी भाइयों को नहलाया अर्थात् निर्मल करके सहज किया। भाव रत भरत भाव, कामादि शत्रु नाशक शत्रुघ्न भाव व लखन भाव को निर्मल करना ही नहलाना बताया गया है। आत्मा रूपी राम का सहज स्वभाव भक्त वत्सल भाव वाला होता है। इसलिए भाव रत भरत भाव के भाग्य अर्थात् भाव रत भरत भाव की प्रकृति और आत्मा की कोमलता का वर्णन करोड़ों शेष भी नहीं कर सकते हैं। पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।। कर मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने स्वंय की जटाओं को सुलझाया अर्थात् आत्मा स्वयं सहज अवस्था में स्थिर हो गयी और विशिष्ट ज्ञान की प्रेरणा से निर्मलता की अवस्था को प्राप्त किया। आत्मा रूपी राम ने निर्मल होकर सद्भावों रूपी भूषणों को धारण किया। उस अवस्था में आत्मा की शोभा को देखकर सैकड़ों काम देव भी लजा गए अर्थात् उस परम निर्मल अवस्था में सैकड़ों प्रकार की काम इच्छाएँ शांत हो गयी। दो0 सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ। दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ।।11(क)।। व्याख्या : नाड़ियों रूपी सासुओं ने सुरता रूपी जानकी को तुरन्त स्नान कराया अर्थात् नाड़ियों में संचरित श्वासों ने प्राण से उत्पन्न सुरता रूपी सीता को श्वास के भावों में तुरन्त सहज कर लिया और दिव्य इच्छाओं रूपी वस्त्र व आभूषण पहनाकर अंग-अंग को सजा दिया। दो0 राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानी। देखि मातु सब हरषी जन्म सुफल निज जानि।।11(ख)।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की बायीं दिशा में गुणों की खान सुरता रूपी सीता सुशोभित होने लगी अर्थात् सुरता बायें अंगों में व्याप्त होने लगी। तब समस्त नाड़ियों रूपी माताएँ आत्मा के बायें सुरता को सुशोभित देखकर हर्षित हो उठी और अपना जन्म धन्य मानने लगी अर्थात् परम सहजता का अनुभव करने लगी। दो0 सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद। चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद।।11(ग)।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि भाव कहता है कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! उस अवस्था में मन के भावों के समूहों में बुद्धि रूपी ब्रह्मा व विश्वास रूपी शिव के भाव मस्तिष्क में विशुद्ध मान वाले होकर सुख की इस मूल अवस्था को देखने के लिए स्वरों के माध्यम से आ गए अर्थात् प्रकट हो गए। वास्तव में जब आत्मा व सुरता सहज होकर स्थिर हो जाते हैं तो उस अवस्था में विशुद्ध बुद्धि व विश्वास के भाव प्रकट होकर परमात्मा की इस सुख की मूल अवस्था को स्वरों के माध्यम से देखने लगते हैं। प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।। रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की उस परम सहज अवस्था को देखकर विशिष्ट ज्ञान रूपी मन के भाव में अनुराग पैदा हो गया और विशिष्ट ज्ञान के भाव ने तुरन्त दिव्य सिंहासन मँगाया अर्थात् विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ट ने आत्मा को दिव्य स्थिरता प्रदान करने की कोशिश की। आत्मा का उस समय का तेज सूर्य के समान था, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब आत्मा रूपी राम द्विज अर्थात् सहज विशुद्ध भावों को सिर नवाकर बैठे। अर्थात् आत्मा सहज अवस्था में स्थिर हो गयी। जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।। बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता सहित निर्मल आत्मा रूपी राम को देखकर मन के भावों का समूह हर्षित हो उठा। तब सहजता के भाव रूपी द्विजों ने अपने मन के अन्दर आत्मानन्द का अनुभव किया और मस्तिष्क में स्वरों के माध्यम से जय-जयकार होने लगी। भावों द्वारा मन के अन्त:करण में परमात्मा का अनुभव करना ही वेद मंत्रों का उच्चारण कहलाता है। प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।। सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार-बार आरती उतारी।। व्याख्या : ज्ञान के विशिष्ट भाव रूपी गु डिग्री बशिष्ठ ने सबसे पहले आत्मा रूपी राम का तिलक किया अर्थात् आत्मा को भावों का अधिष्ठाता स्वीकार किया। फिर समस्त विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों ने विशिष्ट ज्ञान के भाव का अनुसरण करके आत्मा रूपी राम को भावों का अधिष्ठाता (राजा) स्वीकार किया। आत्मा रूपी राम को देखकर सब नाड़ियाँ रूपी माताएँ हर्षित हो उठी और बार-बार आरती उतारने लगी अर्थात् सहजता का संचार करने लगी। बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।। सिंघासन पर त्रिभुअन साईं। देखि सुरन्ह दुंदुभी बजाईं।। व्याख्या : उस अवस्था में विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों में त्याग की भावना प्रबल हो गयी। जिससे जो याचना करने वाले भाव थे, उन सबकी नहीं माँगने की वृति हो गयी। वास्तव में साधना के दौरान साधक के मन में नाना सुख भोग माँगने के भाव पैदा होते रहते हैं परन्तु जब आत्मा सुरता के साथ परमात्मा में लीन हो जाती है तो विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश हो उठता है और कुछ भी चाह मन में नहीं बचती है। उसी अवस्था को ""जाचक सकल अजाचक कीन्हे"" बोलकर लिखा गया है। तीनों गुणों को वश में करने वाले (त्रिभुअन साईं) आत्मा जब सुरता के साथ परमात्मा में लीन हो जाते हैं अर्थात् परमपद के सिंहासन पर बैठ जाते हैं, तो दैवीय भाव नगाड़ा बजाने लगते हैं अर्थात् दैवीय वृति अति प्रबल हो उठती है। छ0 नभ दुंदुभी बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपसरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं।। भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते।। व्याख्या : ध्यान की चेतना जब पुन: निर्मल होकर शरीर में आती है तो मस्तिष्क रूपी आकाश में नगाड़े बजने लगते हैं और गंधर्व व किन्नर प्राण वायु में उमंग छा जाती है, जिससे साधक के हृदय में परमात्मा की स्तुति के भाव पैदा होने लग जाते हैं। सात्विक इच्छा रूपी अप्सराएँ नाचने लगती हैं और स्वरों में परमानन्द का संचार होने लग जाता है तथा मन के भावों में भी आनन्द छा जाता है। उस अवस्था में भाव रत भरत आदि भाव रूपी भाई, वैराग्य व दृढ़ बुद्दि आदि के भाव अनन्य बुद्धि आदि समेत सभी भाव आत्मा व सुरता की रक्षा के लिए छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए सुशोभित हैं अर्थात् यम, नियम, संयम, आसन, प्राणायाम आदि के द्वारा आत्मा व सुरता की रक्षा करते हैं। छ0 श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई।। मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे।। व्याख्या : उस अवस्था में सुरता रूपी सीता सहित आत्मा रूपी राम सहज भाव रूपी आभूषणों सहित बहुत से कामदेवों के समान शोभा पाते हैं। नव भावों रूपी जल से युक्त मेघ के समान भावों की सहजता दैवीय भावों को भी अपनी तरफ मोहित करने लगती हैं। मन व बुद्धि के भावों रूपी निर्मल भाव अंग-अंग पर सजे हुए हैं। उस अवस्था में दृष्टि कमल के समान दिव्य होकर विशाल हो जाती है और सहजता के भाव रूपी भुजाएँ प्रबल हो जाती हैं। इस परम अवस्था का जो अनुभव करते हैं, वे साधक धन्य हो जाते हैं। दो0 वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस। बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस।।12(क)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! भावों की उस निर्मल अवस्था के सुख का वर्णन नहीं हो सकता है। उस अवस्था को तो सरस्वती अर्थात् स्वरों के माध्यम से सुरता (श्रुति) द्वारा शेष के रूप में अनुभव किया जा सकता है। उसके रस का अनुभव महा ऐश्वर्य की अवस्था में हो पाता है। महा ऐश्वर्य ही महेश का प्रतीक होता हैं। दो0 भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम। बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम।।12(ख)।। व्याख्या : उस अवस्था में भाव परमात्मा की स्तुति करके स्वरों के माध्यम से सहज हो जाते हैं। तब वन्दना के भावों के माध्यम से परमात्मा का अनुभव होने लगता है। उसी को वेदों द्वारा (अर्थात् अनुभव का अवतरण) भाटों का रूप धारण करके आना बताया गया है। दो0 प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान। लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान।।12(ग)।। व्याख्या : परमात्मा तो सब कुछ जानने वाले होते हैं, इसलिए कृपा के निधान परमात्मा ने अनुभव (वेद) के भावों का बहुत आदर किया अर्थात् अनुभव की प्रेरणा की। वेद वास्तव में अन्त:करण का अनुभव मात्र ही होता है। वेद कोई शरीर धारी व्यक्ति नहीं होते हैं। उस परम अनुभव (वेद) की अवस्था को कोई बाहरी भाव या व्यक्ति नहीं समझ पाते हैं परन्तु परमात्मा की प्रेरणा से परमात्मा के गुणों का बखान करने की अवस्था आ जाती है। उसी गुणों के बखान करने की अवस्था को वेदों द्वारा स्तुति करना बताया गया है। छ0 जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुजबल हने।। अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।। व्याख्या : हे परमपिता! आप निर्गुण व सगुण स्वरूप, अनुपम वे भावों के राजा हैं। आप भाव रूपी भुजाओं के बल से दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाले काम रूपी रावण व अन्य प्रबल आसुरी भावों का नाश करने वाले हैं। आपका नर की धड़कन के माध्यम से अवतरण होता है और आपका अवतरण संसार के दु:खों को दूर करने वाला होता है। हे प्राण के माध्यम से पालनकर्ता दयालु! आपकी जय हो। आपको और आपकी सुरता रूपी शक्ति सहित आपको नमस्कार। छ0 तव विषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।। जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिध दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।। व्याख्या : हे माया का हरण करने वाले प्रभु! आपकी विषम माया के वश में पड़कर अर्थात् असहज भावों के वश में होकर स्वरों की गति, नाग प्राण की गति व नर की धड़कन की गति असहज हो जाती है जिसके कारण भावों का चक्र शु डिग्री हो जाता है, जिससे जीव रात-दिन काल, कर्म व गुणों के चक्रव्यूह में फँस जाता है। हे प्रभु! जब आप करुणा करके देख लेते हो अर्थात् अनुकूल हो जाते हो तो त्रिविध अर्थात् सत, रज व तम गुणों से उत्पन्न दु:ख दूर हो जाते हैं। हे प्रभु! आप भावों से उत्पन्न दु:खों को दूर करने में सदैव दक्ष हैं। अत: हे परमात्मा! हम आपको नमस्कार करते हैं। छ0 जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।। बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जो होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।। व्याख्या : जिन्होंने ज्ञान के मिथ्या अभिमान में भरकर आपकी भावों को हरने वाली भक्ति का आदर नहीं किया, उनको हमने दैवीय वृति वाली दुर्लभ अवस्था को प्राप्त करने के बाद भी पथभ्रष्ट अर्थात् भावों के भव जाल में पड़ते देखा है। परन्तु जो आपका (परमात्मा) पूर्ण विश्वास करके समस्त आशाओं का त्याग करके आपके भरोसे रहते हैं, वे आपका नाम जपकर के ही बिना परिश्रम के ही भावों के भव सागर से पार हो जाते हैं। छ0 जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वन्द्व मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।। व्याख्या : जिन चरण कमलों की पूजा विश्वास व बुद्धि के भावों का समर्पण करके करने से कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जाती है और आपके चरण कमलों के नाखूनों से मन के भावों में वंदना करने की क्षमता आ जाती है और तीनों गुणों में सहजता की अवस्था आकर आनन्द की सुरसरी पैदा हो जाती है। ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल अर्थात् यम, नियम, संयम व प्राणायाम आदि से आपके युक्त होकर आपके चरन कमल वैराग्य रूपी वन में फिरते हुए नाना कष्टों को सहे हैं। हम उन्हीं चरण कमलों को जिन्होंने भाव द्वन्द्व का निवारण किया है, नमन करते हैं। छ0 अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।। फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।। व्याख्या : हे प्रभु! आप मन आदि के मूल हैं परन्तु अव्यक्त हैं। आपसे ही चार अवस्था पैदा होती हैं अर्थात् जागृति, स्वपन, सुषुप्ति व निद्रा भी आपकी ही चार अवस्थाएँ हैं। ऐसा सभी वेद पुराण कहते हैं। षट् विकार रूपी उस संसार वृक्ष के अनेक पत्ते हैं। उस संसार वृक्ष की बेल में मधु व कटु प्रकार के फल लगते हैं। वह संसार रूपी वृक्ष के रूप में आप नित्य फलते व फूलते रहते हैं। अत: हे संसार वृक्ष के रूप में प्रकट परमात्मा! हम आपको नमस्कार करते हैं। छ0 जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन पर ध्यावहीं। ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।। करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।। व्याख्या : हे प्रभु! आपको अजन्मा, अद्वैत, अनुभवगम्य व मन से परे ब्रह्म जो बताते हैं, वे बताते रहें परन्तु हमको तो आपकी गुण युक्त अवस्था का गुण-गान करना ही अच्छा लगता है। हे करुणा के धाम प्रभो! हे सद्गुणों के धाम! हम तो यह वरदान चाहते हैं कि हम मन, वचन व कर्म से विकारों का त्याग करके आपके चरणों में अनुराग करें। दो0 सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार। अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।। व्याख्या : वेदों ने सबके देखते यह उदार विनती की अर्थात् समस्त भावों के सामने हृदय में अनुभव घटित हुआ और अनुभव हृदयंगम होकर ब्रह्म में लीनता बढ़ गयी। दो0 बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर। बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि कहते हैं कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! सुनो, जब अनुभव हृदयंगम हो जाता है तब साधक के स्वयं के अन्दर विश्वास प्रकट हो जाता है। विश्वास के प्रकट होने को ही विश्वास रूपी शंकर का आना बताया गया है। उस अवस्था में विश्वास का भाव तर्क आदि का त्याग करके पुलकित होकर गदगद वाणी से परमात्मा की प्रार्थना करने लगता है। उसी अवस्था को शंकर जी द्वारा प्रार्थना करना बताया गया है। छ0 जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं।। अवधेस सुरेश रमेश विभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।। व्याख्या : हे रोम-रोम में रमण करने वाले राम! आपकी जय हो। हे भावों के ताप का नाश करने वाले प्रभो! आपकी जय हो। आप भावों के आवागमन से मेरी रक्षा कीजिए। हे देह रूपी अयोध्या के स्वामी! हे स्वरों के ईश्वर! हे रोम-रोम में रमण करने वाले! हे सर्वव्यापक प्रभो! मैं आपकी शरण चाहता हूँ। मेरी रक्षा कीजिए। छ0 दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रूजा।। रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।। व्याख्या : आप दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाले काम रूपी रावण का बीस भावों रूपी भुजाओं सहित नाश करने वाले हैं। जिससे देह रूपी पृथ्वी के सब कष्टों का निवारण हो जाता है। हे प्रभु! आपकी प्रेरणा बाण रूपी ज्ञान अग्नि में आसुरी भाव रूपी राक्षस पतंगों के समान भस्म हो गए। छ0 महि मंडल मंडन चारु तरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।। मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।। व्याख्या : हे प्रभो! आप देह रूपी पृथ्वी के बहुत सुन्दर आभूषण हैं और विषयों से निसंग रहकर इच्छा रूपी धनुष व प्रेरणा रूपी बाणों को धारण करने वाले हैं। आप प्रभों! मद, मोह व ममता रूपी रात्रि के अंधकार समूह का नाश करने के लिए ज्ञान रूपी सूर्य की तेजोमय किरणें हैं। मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावरँ भूलि परे।। व्याख्या : कामदेव रूपी भील ने मनुष्य रूपी हिरणों के हृदय में कुभोग रूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दया है। हे पाप के ताप का हरण करने वाले प्रभु! उसे (काम) मारकर विषय रूपी वन में भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिए। बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।। व्याख्या : लोग बहुत से रोगों और वियोगों से मारे हुए हैं। ये सब आपके चरणों के निरादर के फल हैं अर्थात् आपसे प्रतिकूल होने के कारण रोग और वियोगों का दु:ख व्याप्त है। जो लोग आपके चरण कमलों में प्रेम नहीं रखते हैं, वे अथाह भावों के भवसागर में उलझे हुए पड़े हैं। अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।। अवलंब भवतं कथा जिन्ह के। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह के।। व्याख्या : जिन्हें आपके चरण कमलों में प्रेम नहीं होता है, वे सदा अत्यन्त दीन, मलीन व दु:खी रहते हैं और जो भावों का अन्त (भवत) करके केवल आपको ही आधार मानते हैं, उनको संत यानि संशय रहित अवस्था और परमात्मा (अनन्त) सदैव अच्छे लगने लग जाते हैं। नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह के सम बैभव वा बिपदा।। एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।। व्याख्या : जिनके हृदय में राग, लोभ, मान व मद नहीं होता है और जिनके लिए वैभव व विपदा समान होती है अर्थात् जो वैभव व विपत्ति के समय विचलित नहीं होते हैं। ऐसे साधक प्रसन्न रहते हैं। मुनि जन आपका पूर्ण विश्वास कर लेने पर योग का भी त्याग कर देते हैं। करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।। सम मानि निरादर आदरहीं। सब संत सुखी बिचरंति मही।। व्याख्या : वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदय से आपके चरण कमलों की सेवा करते रहते हैं अर्थात् सदैव निर्मल भावों से परमात्मोन्मुखी वृति रखते हैं। ऐसे सब संत निरादर व आदर को समान मानकर पृथ्वी पर सुखी होकर विचरते रहते हैं। मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।। व्याख्या : हे मुनियों के मन रूपी कमल के भ्रमर! हे महान रणधीर व अजेय परमात्मा! मैं आपको भजता हूँ। हे माया के भावों का हरण करने वाले हरि! मैं (विश्वास) आपका नाम जपता हूँ और नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरण रूपी रोग की महान औषध व अभिमान के शत्रु हैं। गुनसील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।। रघुनंद निकंदय द्वन्द्वघनं। महिपाल बिलोकय दीनजनं।। व्याख्या : आप गुण, शील व कृपा के परम स्थान हैं। इसलिए सुरता के मन में रमण करने वाले प्रभु! मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे जीव के आनन्द! आप जन्म-मरण, सुख-दु:ख, राग-द्वेषादि के द्वन्द्वों को दूर कर दीजिए। हे शरीर रूपी पृथ्वी के पालनकर्ता प्रभु! इस दीन की तरफ भी कृपा दृष्टि डालिए। दो0 बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग। पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।। व्याख्या : हे प्रभु! मैं (विश्वास रूपी शंकर) बार-बार आप से यही वरदान माँगता हूँ कि आपके चरण कमलों की भक्ति दीजिए और सदा सत्संग की प्राप्ति हो। दो0 बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास। तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।14(ख)।। व्याख्या : परमात्मा के गुणों का बखान करके श्रद्धा रूपी पार्वती के विश्वास रूपी स्वामी शंकर तब प्रसन्न होते हुए कैवल्य के उल्लास में अवस्थित हो गए अर्थात् विश्वास का भाव कैवल्य की अवस्था में प्रसन्नता के साथ पहुँच गया। तब आत्मा रूपी राम ने सब प्रकार से बुद्धि के भाव रूपी वानरों को सुखप्रद निवास प्रदान किया अर्थात् सब प्रकार से बुद्धि के भावों को सहज कर दिया। सहजता ही सुखप्रद अवस्था होती है। सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिविध ताप भव भय दावनी।। महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! यह आत्म अनुभूति की कथा पवित्र होती है, जो दैहिक, दैविक व भौतिक तापों का नाश करने वाली है तथा भावों से उत्पन्न भय का दमन करने वाली है। आत्मा रूपी राम के भावों का अधिष्ठाता बनने की अनुभव कथा को सुनने से नर (धड़कन) से वैराग्य व ज्ञान की अवस्था पैदा हो जाती है। अर्थात् आत्म अनुभूति की कथा को सुनने से वैराग्य व ज्ञान पैदा हो जाता है। जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।। सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।। व्याख्या : जो लोग कामना लेकर आत्म अनुभूति की कथा को सुनते हैं, उन्हें बहुत प्रकार से सुख की सम्पदा की प्राप्ति होने लग जाती है। जो देवताओं को भी दुर्लभ सुख होते हैं, उन्हें वे भोग कर अंतकाल में परमात्मा में लीनता की अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।। खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।। व्याख्या : जो इस अनुभूति की कथा को विमुक्त, वैरागी व विषयी लोग सुनेंगे, उनको भक्ति की गति प्राप्त होगी और नयी सम्पत्ति मिलेगी। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! मैंने परमात्मा की कथा का वर्णन किया है। यह कथा स्वमति में विलास करने वाली और भावों के भय का नाश करने वाली है। बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।। नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।। व्याख्या : यह अनुभूति कथा भक्ति, विवेक व वैराग्य को दृढ़ करने वाली है तथा मोह रूपी नदी को पार करने के लिए सुंदर नाव की तरह है। ध्यान की उस अवस्था के सिद्ध हो जाने पर देह रूपी अयोध्या में नित्य नए मंगल होने लगते हैं और सभी प्रकार के भावों में सहजता आ जाती है। नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।। मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।। व्याख्या : उस अवस्था में आत्मा रूपी राम के चरणों में नित्य नई प्रीत पैदा होने लगती है अर्थात् सदैव आत्मोन्मुखी अवस्था बनी रहती है। उस अवस्था में बुद्धि रूपी ब्रह्मा व विश्वास रूपी शिव भी आत्मोन्मुखी होकर समर्पित रहते हैं। उस समय साधक की माँगने वाली इच्छाएँ नाना प्रकार से पूर्ण होने लगती हैं और द्विजों अर्थात् दिव्यता के भावों में दान की वृति प्रबल हो जाती है। अर्थात् साधक की एक तरफ को इच्छाएँ पूर्ण होने लगती हैं तो दूसरी तरफ दान की वृति भी प्रबल हो उठती है। दो0 ब्रह्म नंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति।।15।। व्याख्या : उस अवस्था में बुद्धि के भावों में ब्रह्मानंद की अवस्था आ जाती है और परमात्मा के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है। जिससे ज्ञान की अवस्था में षट विकार सहज में ही मिट जाते हैं और पता भी नहीं चल पाता है। बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं।। तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।। व्याख्या : ध्यान की परम अवस्था की प्राप्ति के बाद बुद्धि के भाव आसक्ति रूपी घरों को भूल जाते हैं, जैसे संतजनों का मन परद्रोह को भूल जाता है। तब आत्मा रूपी राम ने सब बुद्धि के भावरूपी सखाओं को बुलाया तो सब भावों नेआदरपूर्वक आकर सीस झुकाया अर्थात् समर्पण के भाव के साथ सब आए। परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।। तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने सभी बुद्धि के भाव रूपी सखाओं को प्रेमपूर्वक अपने निकट बैठाया और भक्तों को सुख देने वाले मधुर वचन बोले अर्थात् मधुर प्रेरणा की। तुमलोगों ने मेरी बहुत सेवा की है। मैं तुम्हारे मुख पर कैसे बड़ाई करूँ? ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। ममहित लागि भवन सुख त्यागे।। अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।। व्याख्या : इसलिए तुम बुद्धि के भाव मुझे सबसे ज्यादा प्रिय लगते हो क्योंकि तुमने मुझ आत्मा के लिए घर आदि के भावों के सुख का त्याग कर दिया है। इसलिए लखन भाव, भाव रत भाव, शत्रुघन भाव, राज सम्पदा व सुरता रूपी सीता, देह रुपी घर व भाव रूपी परिवार। सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहुउँ मोर यह बाना।। सबके प्रिय सेवक यह नीति। मोरे अधिक दास पर प्रीती।। व्याख्या : ये सब मुझे प्रिय हैं परन्तु तुम्हारे (बुद्धि के भावों) समान प्रिय नहीं हैं। मैं झूठ नहीं कह रहा हूँ क्योंकि झूठ कहना मेरा स्वभाव नहीं है। यह नीति है कि सबको सेवक प्रिय होते हैं परन्तु मेरी प्रीत तो दास (अर्थात् जिसने आशाओं का दमन कर लिया हो) पर होती है। दो0 अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम।।16।। व्याख्या : वास्तव में सब समय ध्यान की एक रस अवस्था नहीं बनी रह पाती है। कुछ समय के बाद आत्मा भावों को अपने से दूर करने की प्रेरणा करने लग जाती है। उसी अनुभव अवस्था का इस दोहे में वर्णन किया गया है। आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे बुद्धि के भाव रूपी सखाओं! तुम सब मुझ आत्मा को भजते हुए अर्थात् आत्मोन्मुखी वृति रखते हुए अपने-अपने घर जाओ यानि अपनी सहज अवस्था में लौट जाओ। तुम मुझ आत्मा को सदा सर्वत्र जाने वाला व सबका कल्याण करने वाला जानकर प्रेम करते रहना। सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।। एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के प्रेरणा रूपी वचनों को सुनकर सब बुद्धि के भाव मगन हो गए और अपनी सुध भूल गए कि हम कौन हैं व कहाँ से आए हैं? वास्तव में ध्यान में भावों की ऐसी दशा तब आती हैं, जब ध्यान धीरे-धीरे उतरने लगता है और भाव आत्मा से विलग होने लगते हैं। परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।। प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने बुद्धि के भावों के परम प्रेम को देखा तो नाना प्रकार से ज्ञान व विवेक की बातें बतायी। बुद्धि के भाव आत्मा के सामने कुछ बोल नहीं पाते हैं और केवल आत्मा में लीनता बनाए रखना चाहते हैं। उसी को बार-बार चरण कमलों को देखना बोलकर लिखा गया है। तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।। सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।। व्याख्या : जब बुद्धि के भाव आत्मा से विलग नहीं होना चाहते हैं तब आत्मा नाना प्रकार की इच्छाओं की वासनाओं की प्रेरणा कर देती है, जो नाना प्रकार की होती है और उन इच्छाओं का अनुपम स्वरूप होता है। उसी अवस्था को आत्मा रूपी राम द्वारा नाना प्रकार के अनुपम वस्त्र मँगाना बोलकर लिखा गया है। सबसे पहले इच्छाओं की प्रेरणा सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को की। वो इच्छा रूपी वस्त्र भाव रत रूपी भरत भाव ने स्वयं पैदा की अर्थात् सद्बुद्धि के भाव को भोगों के प्रति त्याग की इच्छा रखते हुए भोग भोगने की इच्छा की प्रेरणा कर दी। प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।। अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की प्रेरणा से लखन भाव ने वैराग्य रूपी विभीषण को भोग इच्छा रूपी वस्त्र पहनाए जो आत्मा रूपी राम को बहुत अच्छे लगे। परन्तु दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव स्थिर बना रहा इसलिए आत्मा रूपी राम ने उसके प्रेम को देखकर उसे किसी भोग इच्छा की प्रेरणा नहीं की। दो0 जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ। हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ।।17(क)।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने धीर बुद्धि रूपी जामवंत व निसंग बुद्धि रूपी नल-नील आदि बुद्धि के भावों को भोग इच्छा रूपी वस्त्र पहनाए अर्थात् भोग इच्छाओं की प्रेरणा की। तब सब आत्मोन्मुखी वृति रखते हुए आत्म चिंतन करते हुए चल दिए। दो0 तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि।।(ख)।। व्याख्या : तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद का भाव हाथ जोड़कर आँखों में जल भरकर प्रेम रस में डूबे हुए विनयपूर्वक वचन बोला। सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।। मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछे घाली।। व्याख्या : हे सर्वज्ञ! कृपा व सुख के समुद्र! आप दीनों पर दया करने वाले व दु:खी जनों के बंधु हैं। मुझ दृढ़ बुद्धि के भाव को मरते समय बल रूपी बाली आपकी शरण में छोड़ गए थे अर्थात् बल रुपी बाली ने मुझ दृढ़ बुद्धि को सदैव आत्मोन्मुखी रहने की प्रेरणा की थी। वास्तव में दृढ़ बुद्धि का भाव आत्मा में ही लीन रहना चाहता है। इसलिए वो बार-बार प्रार्थना करता है। असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।। मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।। व्याख्या : हे प्रभु! आप असरणों को शरण देने वाले हैं, अत: इस बात को याद करके मुझ दृढ़ बुद्धि के भाव को मत त्याग करिये। मेरे लिए तो प्रभु! आप ही गुरु माता व पिता हैं। अत: आपको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? तुम्हहि बिचारी कहहु नर नाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।। बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।। व्याख्या : हे धड़कन के स्वामी! आप ही विचार करके कहिए कि आप (आत्मा) को छोड़ कर मेरा भावों के भवन में क्या काम है? मैं बालक स्वरूप दृढ़ बुद्धि का भाव तो ज्ञान व बुद्धि के बल से हीन हूँ। अत: मुझ दृढ़ बुद्धि के भाव को तो दीन जानकर आपकी शरण में ही रखिए। नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।। अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।। व्याख्या : मैं दृढ़ बुद्धि का भाव आसक्ति के भावों से दूर रहूँगा और आपके चरण कमलों में लीन होकर भाव रूपी भव सागर को पार कर जाऊँगा। ऐसा कह कर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर पड़ा अर्थात् पूरी तरह आत्मा के प्रति समर्पित हो गया और कहने लगा कि हे नाथ! अब मुझे गृह अर्थात् आसक्ति के भावों में बरतने की प्रेरणा मत करना। दो0 अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव। प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव।।18(क)।। व्याख्या : दृढ़ बुद्दि रूपी अंगद के विनयपूर्वक वचनों को सुनकर करुणा की सीमा आत्मा रूपी राम ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया अर्थात् आत्मा ने प्रेरणा करके आत्मा में ही लीन कर लिया। उस अवस्था में आत्म तत्व द्रवित हो उठता है। उसी को आत्मा रूपी राम के आँखों में प्रेम रूपी जल का भर आना बताया गया है। दो0 निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ। बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ।।18(ख)।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने अपने गले की मणियों की माला व वस्त्र दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को पहनाए अर्थात् आत्मा ने सीधी प्रेरणा करके दृढ़ बुद्धि के भाव को सहज भोग रूपी वस्त्र व मन के भाव रूपी मणियाँ प्रदान की और नाना प्रकार से प्रेरणा करके दृढ़ बुद्धि के भाव को विदा किया अर्थात् आत्मा से विलग किया। भरत अनुज सौमित समेता। पठवन चले भगतकृत चेता।। अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम की ओरा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा से भाव रत भरत भाव, लखन भाव व शत्रुघन भाव दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद को पहुँचाने चले अर्थात् लखन भाव व भाव रत भाव सहित कामादि नाशक शत्रुघन भाव ने दृढ़ बुद्धि के भाव को आत्मा की प्रेरणा से भोग इच्छा भावों रूपी भवन में ले जाने में सहायता की। दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद के हृदय में आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम कम नहीं था। इसलिए वह बार-बार आत्मोन्मुखी हो रहा था। बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।। राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।। व्याख्या : दृढ़ बुद्धि का भाव बार-बार प्राण के माध्यम से आत्मा रूपी राम के पास रहना चाहता है। वे आत्मा रूपी राम के बोलने, चलने व हँसकर मिलने की रीति को याद कर करके सोचने लगते हैं। अर्थात् दृढ़ बुद्धि का भाव आत्मा के स्वरूप को याद कर-करके चिंतन करने लगता है। प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।। अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के रूख को देखकर दृढ़ बुद्धि के भाव रूपी अंगद ने नाना प्रकार से विनती की और आत्मोन्मुखी वृति करके चला। बुद्धि के भाव रूपी वानरों को आदरपूर्वक पहुँचा कर अर्थात् बुद्धि के भावों को सहज अवस्था में पहुँचाकर भाव रत भरत भाव आत्मा रूपी राम के पास आए। तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।। दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।। व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के चरण पकड़कर विनती की कि दस दिन यानि दस प्राणों के माध्यम से आत्मा से जुड़कर मैं पुन: तुम्हारे (सद्बुद्धि) पास आ जाऊँगा। इन चौपाइयों में गहरा मर्म छुपा है। अनन्य बुद्धि का भाव दसों प्राणों के भावों में परमात्मा के प्रति अनन्य वृति को दृढ़ करना चाहता है। जब दसों प्राणों में अनन्य वृति हो जायेगी तो फिर सद्बुद्धि के साथ रहकर सहजता की अवस्था प्राप्त की जा सकती है। उसी को दस दिन सेवा करने के बाद सुग्रीव के पास जाना बताया गया है। पुन्य पुंज तुम्ह पवन कुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।। अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।। व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने कहा कि हे पवन कुमार! तुम पुण्य के समूह हो। अत: जाकर कृपा के घर परमात्मा की सेवा करो। ऐसा कहकर बुद्धि के भाव रूपी वानर चल दिए। तब दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव ने कहा कि हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! सुनो। दो0 कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहिं कहुउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि।।19(क)।। व्याख्या : दृढ़ बुद्धि के भाव ने कहा कि तुम आत्मा रूपी राम को मेरा दण्डवत प्रणाम कहना अर्थात् प्राण के माध्यम से मुझ दृढ़ बुद्धि को जोड़े रखना और बार-बार मुझ दृढ़ बुद्धि के भाव की आत्मा रूपी राम को याद दिलाते रहना। मैं तुम्हें हाथ जोड़ता हूँ। दो0 अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत। तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत।।19(ख)।। व्याख्या : ऐसा कहकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद चल दिया और अनन्य भाव आत्मोन्मुखी होकर परमात्मा में लीन हो गया। अनन्य भाव रूपी हनुमान ने दृढ़ बुद्धि के भाव की प्रीति को परमात्मा को बताया तो परमात्मा प्रेम भाव में मगन हो गए। दो0 कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसमहु चाहि। चित खगेस रामकर समुझि परइ कहु काहि।।19(ग)। व्याख्या : परमात्मा का चित वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल होता है। तब बताइये कोई कैसे परमात्मा को समझ सकता है? पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।। जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी कृपालु राम ने निषेध भाव रूपी निषाद को बुला लिया और इच्छाओं रूपी आभूषण व वस्त्र प्रदान किए और प्रेरणा की कि तुम अपने भाव रूपी भवन में जाओ और मुझ आत्मा का चिंतन करते रहना तथा मन, वचन व कर्म से वासनाओं के निषेध की धारणा का अनुसरण करते रहना। ध्यान में एक अवस्था ऐसी आती है जिसमें सब भाव आत्मा में लीन हो जाते हैं। परन्तु वह लीनता की अवस्था सदा नहीं बनी रहती है और जब ध्यान उतरने लगता है तो भाव भी धीरे-धीरे एक-एक करके आत्मा से विलग होने लगते हैं। उसी भाव अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।। बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे सखा! तुम मुझे भाव रत भरत भाव के समान प्रिय हो। इसलिए तुम (निषेध वृति भाव) सदा शरीर रूपी नगर में आते जाते रहना। ऐसे वचन सुनकर निषेध भाव रूपी निषाद को बहुत सुख मिला और आँखों में जल भरकर आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर पड़ा अर्थात् पूर्ण समर्पण की अवस्था आ गयी। चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।। रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को हृदय में रखकर अर्थात् आत्मोन्मुखी वृति करके निषेध भाव रूपी निषाद अपनी सहज अवस्था में आ गया और आत्मा रूपी राम के स्वभाव के बारे में निषेध वृति के भावों को बताया। आत्मा रूपी राम के निर्मल चरित को देखकर देह रूपी अयोध्या के भाव रूपी नर-नारी यही कहते हैं कि आत्मा रूपी राम धन्य हैं। राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।। बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम त्रिलोक अर्थात् सत, रज व तम तीनों गुणों को वश में करके भावों का अधिष्ठाता बन जाता है, तो गुणों की गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है जिससे सब भावों का शोक मिट जाता है। उस अवस्था मेंे भावों में सहजता आ जाती है जिससे भावों का आपसी बैर मिट जाता है। आत्मा के प्रताप से सब भावों में सहज समता की अवस्था आ जाती है। दो0 बरनाश्रम निज-निज धरम निरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।।20।। व्याख्या : ध्यान जब सिद्ध होकर उतरने लगता है तो भाव सहज होकर अपने-अपने धर्म का पालन करने लगते हैं अर्थात् गुण सहज होकर गुणों में बरतने लगते हैं। उस अवस्था में साधक को अनुभूति का रास्ता दिखायी पड़ने लग जाता है। उससे परम सुख की अवस्था आ जाती है और भाव रूपी लोगों के भय व शोक मिट जाते हैं। दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।। सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। व्याख्या : आत्मोन्मुखी अवस्था में दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट किसी को भी नहीं सताता है और नर (धड़कन) की गति भी सहज होकर प्रेम के भाव पैदा करने लग जाती है। उस अवस्था में भाव स्वधर्म अर्थात् सहजता की वृति का अनुसरण करने लगते हैं। चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरी रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।। राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।। व्याख्या : धारणा से धर्म बनता है और धारणा के सत, रज, तम व गुणातीत चार चरण होते हैं। ध्यान की सिद्धि के बाद धारणा के चारों चरण सहज हो जाते हैं, जिससे सपने में भी चिंता नहीं सताती है। नर और नाड़ी की धड़कन से परमात्मा की भक्ति के भाव पैदा होने लगते हैं जिससे सभी भाव सहज में मुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।। नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।। व्याख्या : उस अवस्था में किसी की भी अल्पकाल में मृत्यु नहीं होती है। वास्तविकता में यह होता है कि जब जीव असहज होता है तो उसके अंदर भावों का द्वन्द्व चलता रहता है जिससे भाव आपस में मरते रहते हैं। परन्तु सहजता की अवस्था आ जाने पर भावों का द्वन्द्व मिट जाता है और कोई भी भाव अकाल नहीं मरता है जिसके कारण शरीर में तेज बढ़ जाता है और शरीर निरोगी हो जाता है। किसी भी प्रकार की दरिद्रता व हीनता की भावना नहीं होती है और कोई भी अबुध व लक्षणहीन नहीं होता है। सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।। व्याख्या : सभी भाव दंभ रहित व अपनी-अपनी सहजता की धारणा में रत रहने वाले हो जाते हैं और नर-नाड़ी की धड़कन सहज होकर सद्गुणों को पैदा करने वाली हो जाती है। सब गुणों के मर्म को जानने वाले विद्वान व ज्ञानी होते हैं और सब सहज में कर्म बंधन से मुक्त, कपट रहित व चतुर होते हैं। दो0 राम राम नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं। काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।21।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! आत्मा के भावों का अधिष्ठाता हो जाने पर समस्त चराचर के भावों को जगत में कोई दु:ख नहीं व्याप्त है। उस अवस्था में काल और कर्म के अनुसार गुण बरतने लगते हैं। भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।। भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।। व्याख्या : देह रूपी भूमि के सात चक्र रूपी सागरों की मेखला (करधनी) होती है जिन सबका आत्मा रूपी राम एक ही राजा होता है। उस शरीर रूपी भूमि के रोम-रोम में भावों का भवन होता है। यह तो आत्म ऊर्जा की प्रभुता होती है, कोई बड़ी बात नहीं है। सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।। सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।। व्याख्या : अत: परमात्मा की असीम महिमा को समझ लेने पर कि वे शरीर रूपी पृथ्वी के सात चक्रों रूपी भव सागर के एकमात्र सम्राट हैं का वर्णन करना परमात्मा की हीनता होगी। अर्थात् परमात्मा की महिमा तो अवर्णनीय और असीम है। अत: हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! जो परमात्मा की महिमा को जान लेते हैं, उनको परमात्मा की लीला से अनुराग हो जाता है। सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।। राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।। व्याख्या : क्योंकि इन्द्रियों का दमन करने वाले मुनि जन भी यही कहते हैं कि परमात्मा की महिमा की लीला का अनुभव करना ही होता है। इसलिए आत्मा रूपी राम के राज की सम्पदा का वर्णन शेष जी व सरस्वती जी भी नहीं कर सकती हैं। सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।। एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।। व्याख्या : उस अवस्था में परहित करने वाले उदार भाव पैदा होने लग जाते हैं तथा नर-नाड़ी की धड़कन विशुद्ध प्रकाश करने वाली हो जाती है। सभी भाव नाड़ी की धड़कन का अनुसरण करने वाले होकर मन, वचन व कर्म से परमात्मोन्मुखी होकर कल्याणकारी हो जाते हैं। दो0 दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज। जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचन्द्र कें राज।।22।। व्याख्या : जब साधक की परमात्मोन्मुखी अवस्था में स्थिरता आ जाती है तो दण्ड केवल संन्यासियों के हाथ में रह जाता है अर्थात् दण्ड की वृति ही मिट जाती है और भेद केवल नृत्य करने वाले नर्तकों के सुर-ताल के भेद के रूप में रह जाता है अर्थात् पूर्ण निर्मलता आ जाती है। जीतना शब्द केवल मन को जीतने के लिए उपयोग में लाया जाता है। अर्थात् साधक दण्ड, भेद आदि भावों को निर्मल होकर त्याग देता है। फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन।। खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।। व्याख्या : उस परम अवस्था में सहजता रूपी वृक्षों का वन फलने-फूलने लगता है और हाथी व सिंह रूपी विरोधी भाव भी सहज होकर एक संग रहने लगते हैं। वासना और लालसा रूपी पक्षी व पशु बैर का त्याग करके सहज हो जाते हैं और परस्पर प्रेम बढ़ने लगता है। कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।। सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा।। व्याख्या : उस अवस्था में नाना प्रकार की सहज इच्छा रूपी पक्षी व पशुओं के समूह निर्भय होकर देह रूपी वन में चरते हैं और आनंद के साथ रहते हैं। उस अवस्था में शीतल व सुगन्धित प्राण वायु चलने लगती है अर्थात् प्राण की गति सहज व निर्मल हो जाती है तथा मन रूपी भ्रमर आनन्द रूपी मकरंद का पान करने लगता है। लता बिटप मागे मधु चवहीं। मन भावतो धेनु पय स्रवहीं।। ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।। व्याख्या : उस अवस्था में सहज में इच्छाओं की पूर्ति होने लग जाती है। उसी को बेलों और वृक्षों द्वारा माँगने पर मकरंद टपकाना बोलकर लिखा है। उस समय मन की सब मनोकामना पूर्ण हो जाती है और इन्द्रियाँ संतुष्टि रूपी दूध देने लगती हैं अर्थात् इन्द्रियों की तृप्ति की अवस्था आ जाती है जिससे देह रूपी पृथ्वी सदैव शीतल बनी रहती है। इस प्रकार सत, रज व तम तीनों प्रकार के गुण सहज होकर कृत जुग अर्थात् कर्म बन्धन से मुक्ति की अवस्था ला देते हैं जिससे गुणातीत अवस्था का आभास होने लगता है। उसी को त्रेता युग (सत, रज, तम) में सतयुग का अनुभव होना बताया गया है। प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।। सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।। व्याख्या : उस अवस्था में कोशिकाओं से नाना प्रकार के सद्गुण पैदा होने लगते हैं जिससे साधक को समझ में आ जाता है कि एक परमात्मा ही सब जगत का मालिक होता है। उस अवस्था में समस्त नाड़ियों रूपी सरिताएँ सहज होकर बहने लगती है, जिससे नाड़ियों से निकलने वाला रसायन (हार्मोन) अमल, शीतल व सुखकारी हो जाता है। सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।। सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।। व्याख्या : भावों रूपी सागर संयमित रहने लगता है अर्थात् उस अवस्था में भावों की सहज अवस्था बनी रहती है। भाव रूपी भवसागर सहजता रूपी रत्नों को तट पर डाल देता है, जिसे नर (धड़कन) ग्रहण कर लेता है अर्थात भाव सहज रहने पर धड़कन भी सहज बनी रहती है जिससे समस्त कोश व कोशिकाएँ खिल जाते हैं। कोश-कोशिकाओं का खिलना ही कमलों से तालाबों का परिपूर्ण होना बताया गया है। उस अवस्था में दस प्राण रूपी दसों दिशाएँ प्रसन्नता से भर जाती हैं। दो0 बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज।।23।। व्याख्या : साधक की परमात्मोन्मुखी अवस्था होने पर शरीर रूपी पृथ्वी वासनाओं की तप्त से शीतल हो जाती है तथा चन्द्र व सूर्य स्वर उतने ही चलते हैं, जितनी शरीर के लिए आवश्यकता होती है। उस अवस्था में साधक की सभी क्रियाएँ सहज हो जाती हैं और सहज में मनोकामनाएँ पूर्ण होने लग जाती हैं। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर माँगने पर बादलों द्वारा जल देना बताया गया है। कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।। श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।। व्याख्या : जब साधक की परम सहज अव्सथा आ जाती है तो साधक की आत्मा नाना स्तर (कोटि) के भावों को वश में करके दिव्यता के भावों की वृद्धि करने लगती है। उसी को अनेकों अश्वमेध यज्ञ करके द्विजों (दिव्य भावों) को दान देना कहा गया है। उस अवस्था में आत्मा तो परमात्मा की सुरता में मगन हो जाती है अर्थात् परमात्मा में सुरता को लगाए रखने में अभ्यस्त साधक गुणातीत अवस्था को प्राप्त करके भोगों को अनासक्त भाव से भोगता हुआ तृप्त हो जाता है। पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।। जानति कृपा सिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।। व्याख्या : उस अवस्था में सुरता सदैव परमात्मोन्मुखी रहती है जिससे सहजता रूपी शोभा, सुशीलता व विनय भाव बढ़ जाते हैं। सुरता कृपा के समुद्र परमात्मा की प्रभुता को जानकर सदैव परमात्मा के चरण कमलों में लीन रहने लगती है। जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।। निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।। व्याख्या : हालाँकि अनेक रिद्धि-सिद्धि रूपी सेवक-सेविकाएँ उस अवस्था में साधक को प्राप्त होती हैं परन्तु सुरता तो परमात्मा में लीन होकर केवल सहजता में ही बरतने लगती है और परमात्मा की प्रेरणा का अनुसरण करने लगती है। अर्थात् साधक को उस अवस्था में रिद्धि-सिद्धियों का प्रयोग करने की इच्छा ही नहीं होती है। जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।। कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।। व्याख्या : जिस प्रकार से कृपा के समुद्र परमात्मा सुख मानते हैं सुरता उसी प्रकार सेवारत रहने लगती है। देह रूपी घर में सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्यादि सासुएँ होती हैं, उन सबकी सुरता रूपी सीता सहज होकर सेवा करती हैं अर्थात् नाड़ियों को भी परमात्मोन्मुखी बनाए रखने में सुरता सहयोग करती है। उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।। व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! रोम-रोम में रमण करने वाली सुरता रूपी सीता बुद्धि रूपी ब्रह्मा आदि द्वारा वंदित अर्थात् वन्दना योग्य होती है। वही जगदंबा अर्थात् जगत की माता सुरता संशय का अंत करके अज्ञान का निवारण करने वाली होती है। संत तम निंदिता अर्थात् संशयों का अंत कर (संत) तम यानि अज्ञान का निवारण करने वाली शक्ति जगत को पैदा करने वाली सुरता रूपी सीता हैं। सुरता से ही भाव पैदा होते हैं और भावों से ही जगत का आभास होता है। इसलिए सुरता को जगत की माता कहा गया है। दो0 जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ। राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ।।24।। व्याख्या : ध्यान सिद्ध हो जाने पर सुरता रूपी सीता जिनकी कृपा दृष्टि भाव रूपी देवता चाहते हैं परन्तु सुरता अब भावों की तरफ देखती ही नहीं है। क्योंकि सुरता का तो परमात्मा के चरणों में अनुराग पैदा हो जाने के कारण वह भावों में रमण करने के स्वभाव को छोड़कर परमात्मा में ही लीन रहने लगती है। सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।। प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।। व्याख्या : साधक की उस समय सम अवस्था आ जाती है और चित की अवस्था रूपी भाई सदैव आत्मा के अनुकूल रहने लगते हैं। दिनों-दिन आत्मा रूपी राम के चरणों में भाव रत भरत, लखन भाव व शत्रुघन भाव की प्रीति बढ़ने लगती है। ये सब भाव रूपी भाई आत्मा की प्रेरणा की बाट निहारते रहते हैं कि कब हमें प्रेरणा मिले। उस अवस्था में सब भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा रूपी कमल को देखते रहते हैं। राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।। हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम भी भाव रूपी भाइयों से प्रेम करते हैं और नाना प्रकार की सद्प्रेरणा करके नीति सिखाते हैं अर्थात् साधक को उस अवस्था में नाना नीतियों का अनुभव होने लगता है। देह रूपी नगर के भाव रूपी लोग उस अवस्था में प्रसन्न रहने लगते हैं और सब दुर्लभ भोगों को स्वरों के माध्यम से भोगने लगते हैं। अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्री रघुबीर चरन रति चहहीं।। दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।। व्याख्या : रात-दिन साधक की भावना क्रिया (विधि) को अनुकूल करने का प्रयास करती रहती है जिससे आत्मा रूपी राम के चरणों में अनुराग बना रहे और यह सुखद अवस्था बनी रहे। सुरता रूपी सीता ने दो सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया अर्थात् सुरता से लव यानि परमात्मा में लौ लगी रहने का भाव और कुश अर्थात् निर्मल अहंकार का भाव रूपी पुत्र पैदा हुए अर्थात् सुरता से लौ व निर्मल अहंकार के भाव पैदा हो गए। जिनकी अनुभूति को वेदों व पुराणों में गाया गया है। दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।। दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।। व्याख्या : लौ व निर्मल अहंकार रूपी लव-कुश रूपी पुत्र विनय के गुणों के घर और आत्मा के प्रतिबिम्ब के समान ही थे, जो बहुत सुंदर थे। भाव रत भरत भाव, लखन भाव व शत्रुघन भाव, इन सबसे दो-दो भाव रूपी पुत्र पैदा हुए जो गुणी व शीलवान थे। दो0 ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार। सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार।।25।। व्याख्या : जो परमात्मा ज्ञान, वाणी, इन्द्रियों से परे, अजन्मा, माया, मन व गुणों से परे होता है, वही सतचित आनन्द का घर परमात्मा ध्यान सिद्धि के बाद नर की धड़कन के माध्यम से निर्मल (उदार) भावों के रूप में साधक के हृदय में लीला करने लगता है। प्रात:काल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।। बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।। व्याख्या : ध्यान की सिद्धि के बाद जब साधक सहज हो जाता है तो वह बार-बार परमात्मा को याद करके नव स्फूर्ति से भर जाता है। उसी को सरयु में प्रात:काल स्नान करना बोलकर लिखा गया है। जब साधक में नव स्फूर्ति आ जाती है तो निर्मलता भी आ जाती है जिससे सज्जनता के दिव्य भाव पैदा हो जाते हैं। उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान द्वारा नई-नई अनुभूति की बातें साधक को समझने में आने लगती हैं। उसी को गु डिग्री वशिष्ठ द्वारा वेद-पुराणों की कथा सुनाना बोलकर लिखा गया है। हालाँकि आत्मा रूपी राम के लिए वो अनुभूति कोई नई नहीं होती है। अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।। भरत शत्रुघ्न दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।। व्याख्या : अनुज भाइयों के साथ आत्मा रूपी राम भाव रूपी भोजन करते हैं जिसे देखकर नाड़ियों रूपी माताएँ सुख से भर जाती हैं। भाव रत भरत भाव व कामादि नाशक शत्रुघ्न भाव अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के साथ उपवन अर्थात् वैराग्य भाव के साथ आत्मा के निकट जाते हैं । बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।। सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।। व्याख्या : आत्मा के गुणों को बैठकर समझने व ग्रहण करने का प्रयास करते हैं और अनन्य बुद्धि का भाव अपनी बुद्धि के अनुसार समझाने का प्रयास करता है। आत्मा के निर्मल चरित का वर्णन सुनकर भाव रत भरत व शत्रुघ्न भाव को बहुत सुख मिलता है। इसलिए विनय करके बार-बार समझने का प्रयास करते हैं। सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।। नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।। व्याख्या : उस अवस्था में सब भाव रूपी लोगों के घर-घर में पुराणों और आत्मा रूपी राम के चरित का नाना प्रकार से वर्णन होने लगता है। उस अवस्था में नर व नाड़ी की धड़कन भी आत्मोन्मुखी भाव पैदा करके ज्ञान रूपी दिन का प्रकाश कर देती है जिससे अज्ञान रूपी रात्रि कब मिट गयी, पता ही नहीं चलता। अर्थात् सहज में ही ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। दो0 अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप रामबिराज।।26।। व्याख्या : ध्यान सिद्धि की अवस्था में देह रूपी अयोध्या के निर्मल भाव रूपी लोगों के सुख व सम्पदा का वर्णन हजारों शेष भी नहीं कर सकते हैं। यह अवस्था तब आती है जब धड़कन में परमात्मा का अवतरण हो जाता है। नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।। दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।। व्याख्या : मन के नारद आदि व सनक आदि भाव आत्मा रूपी राम के दर्शन के लिए नित्य देह रूपी अयोध्या में आने लगते हैं और देह रूपी नगर की सहजता को देखकर वैराग्य को भी भूल जाते हैं। अर्थात् उस अवस्था में मन का नारद व सनक आदि भाव देह में रमण करने लगते हैं। जातरूप मनि रचित अटारीं। नानारंग रुचिर गच ढारीं।। पुर चहुँ पास ओट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग-रंग बर।। व्याख्या : उस अवस्था में मन की नाना सहज इच्छाओं की अटारियाँ सज जाती हैं, जो नाना भोग रूपी रंगों की ढली हुई फर्शें हैं। देह रूपी नगर के चारों तरफ सुंदर सहज इच्छाओं रूपी परकोटा होता है, जिसमें नाना भोग रूपी कँगूरे दिखायी पड़ते हैं। नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।। महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।। व्याख्या : नौ नाड़ियों रूपी गृहों से निकलने वाले निर्मल भावों की सेना बनकर मानों अमरावती को घेर लिया हो। देह रूपी पृथ्वी पर नाना प्रकार के सुखद भोगों की गच बनायी जाती है जिसे देखकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है। अर्थात् उस अवस्था में परम सहज भोगों की प्राप्ति हो जाती है। धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।। बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।। व्याख्या : सात्विक इच्छाओं के मूल मस्तिष्क रूपी आकाश को चूमने लगता है अर्थात् सात्विक इच्छाएँ बहुत प्रबल हो उठती हैं। वे सात्विक इच्छाएँ मानों सूर्य व चन्द्रमा की चमक को भी फीकी कर दे रही हैं। मन के भावों के बहुत से झरोखे शोभा पाने लगते हैं और प्रत्येक भाव के कोश में ज्ञान रूपी मणि का प्रकाश होने लगता है। छ0 मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।। सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे।। व्याख्या : भावों के कोश रूपी घरों में ज्ञान रूपी मणि के दीपक शोभा देने लगते हैं और सद्भाव रूपी मूँगों की देहलियाँ चमकने लगती हैं। ज्ञान रूपी मणि खम्भे की तरह स्थिर होकर माया के मन के भावों को संयमित कर सुंदर बना देती है। इस प्रकार देह रूपी सुंदर महल सुंदर मन के दरवाजे सहित शोभा पाने लगता है। उस अवस्था में देह रूपी महल के प्रत्येक इन्द्रियों द्वार पर दृढ़ता रूपी हीरे के किवाड़ लगे हुए हैं अर्थात् विकारों का प्रभाव शरीर पर नहीं पड़े ऐसी व्यवस्था पैदा हो जाती है। दो0 चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ।।27।। व्याख्या : प्रत्येक भाव रूपी कोश में परमात्मा के चरित की सुन्दर चित्रशाला बनी है अर्थात् प्रत्येक कोश में परमात्मा का स्वरूप अंकित हो गया है। उस परम पवित्र परमात्मा के चरित को देखकर मुनियों का मन भी चुर जाता है अर्थात् मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है। सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।। लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बसंत की नाई।। व्याख्या : उस अवस्था में सभी कोशों से सुमन अर्थात् मन के अच्छे भाव निकलने लगते हैं। उसी को सुमन वाटिका को यतन करके लगाना बताया गया है। उस अवस्था में भावना रूपी लता बहुत प्रकार (दया, करुणा, मैत्री आदि-आदि) की होती है जो सदा सद्भावना रूपी बसंत की तरह फूलती व फलती रहती है। गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।। नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।। व्याख्या : मधुर वृति के भावों रूपी भ्रमर गुंजार करके मन का हरण करने लगते हैं तथा तीनों गुणों की सहजता रूपी वायु चलने लगती है। बहुत से भोग रूपी पक्षियों को बाल भाव अर्थात् सहज निर्मल भावों ने पाल रखा है जो बोलने में व उड़ने में अच्छे लगते हैं। मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अतिपावत।। जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।। व्याख्या : मोर, हंस, सारस व पारावत भाव रूपी भवनों पर बहुत शोभा पाते हैं। इस चौपाई में बहुत गहरा साधना का मर्म छुपा हुआ है। वास्तव में जब साधक की ध्यान की अवस्था सिद्ध हो जाती है तो श्वास की गति मोर के श्वास के समान हो जाती है। कभी श्वास हकार सकार मय होकर हंस गति वाली हो जाती है। तो कभी श्वास के साथ रस का स्राव शुरु हो जाता है। उसी को सारस की संज्ञा दी गयी है। कभी श्वास पारावत अर्थात् प्रकृति से परे होकर परमात्मामय हो जाती है। ये श्वास की चारों गति भावों पर बहुत शोभा पाने लगती है। श्वास की चाहे जो गति हो परन्तु साधक को निज स्वरूप का आभास कराती रहती है। इसलिए साधक के अन्दर भावों की उमंग छा जाती है और सहजता के आनन्द में भाव झूम उठते हैं। सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।। राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रुचिर बजारु।। व्याख्या : भाव रूपी बालक वृति रूपी तोता-मैना को पढ़ाते हैं कि आत्मोन्मुखी हो जाओ। भृकुटि रूपी राज द्वारा सब प्रकार से सुन्दर हो जाता है और नाड़ियों व चक्रों रूपी गलियाँ व चौराहे सुन्दर भावों से सज जाते हैं। छ0 बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए।। बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे।। व्याख्या : नाड़ियों व चक्रों रूपी गलियों व चौराहों पर भाव रूपी सुन्दर बाजार की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योंकि वहाँ तो बिना मोल के ही भावना रूपी वस्तुएँ मिल जाती हैं। जिस भाव रूपी बाजार का अधिष्ठाता आत्मा रूपी राम हो, उसकी सद् सम्पदा का कैसे वर्णन किया जा सकता है। उस अवस्था में तो बजाज अर्थात् वासना के भावों का व्यापार करने वाले, सराफ अर्थात् माया के भावों का लेन-देन करने वाले, बनिक अर्थात् अवसर अनुसार क्रिया (व्यापार) करने वाले भाव ऐसे बैठे होते हैं मानो कुबेर स्वयं बैठा हो। उस अवस्था में बाल, वृद्ध सब भाव व नर-नाड़ी की धड़कन सद्गुण पैदा करने वाली व सच्चरित हो जाती है, जिससे सबको सुख मिलने लगता है। दो0 उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।28।। व्याख्या : शरीर के बाएँ अंगों में तामसिक भावों का निवास माना जाता है परन्तु साधक जब ध्यान की सिद्धि से परमात्मा में लीन हो जाता है तो सरयू नाड़ी अर्थात् ईड़ा नाड़ी में तामसिक भाव निर्मल होकर संचरित होने लगते हैं और सहजता की अवस्था बनी रहती है। उसी को निर्मल व गहरा जल बहना बताया गया है। उस अवस्था में विकार रूपी कीचड़ का नामोनिशान भी नहीं होता है और वह संयमित अवस्था मन को हरने वाली होती है। दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।। पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।। व्याख्या : ईड़ा नाड़ी से थोड़ा दूर एक सुन्दर घाट होता है अर्थात् भृकुटि के पास का स्थाना जहाँ पर मन रूपी हाथी घोड़े ठट्ट के ठट्ट जल पिया करते हैं। पनिघट अर्थात् प्राण के स्थान परम मनोहर होते हैं, जहाँ पर कठोरता रूपी पुरुष स्नान नहीं करते हैं अर्थात् प्राण में निर्मलता व कोलमता होती है। राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।। तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।। व्याख्या : भृकुटि रूपी राजघाट सबसे सुन्दर होता है। जहाँ पर नर की धड़कन चारों अवस्थाओं में निर्मल रहती है। भृकुटि के आस-पास दैवीय भावों की मन के अन्दर उत्पत्ति होती रहती है और चारों तरफ भावना रूपी सुन्दर उपवन खिल उठता है। कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।। तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।। व्याख्या : भृकुटि के आस-पास बहुत सी सूक्ष्म नाड़ियाँ होती हैं। उन सूक्ष्म नाड़ियों में कुछ-कुछ में ज्ञान, त्याग व वैराग्य के उदासीन भाव संचरित होते रहते हैं। उन नाड़ियों के तट पर पवित्रता रूपी तुलसी उग आती है, जो मन की निर्मल भावना के समूह से उत्पन्न होती है। पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।। देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।। व्याख्या : उस अवस्था में देह रूपी नगर की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। देह का आंतरिक व बाहरी आवरण दोनों ही परम सुन्दर हो जाता है। इस प्रकार देह की सहज अवस्था आते ही चिंता रूपी पाप मिट जाते हैं। देह रूपी नगर में तो ज्ञान-वैराग्य रूपी वन-उपवन, आनन्द रूपी तालाब व बावड़ी शोभा पाने लगते हैं। छ0 बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।। बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।। व्याख्या : आनन्द रस रूपी बावड़ी, तालाब व कुएँ मन को हरने वाले हो जाते हैं और सद्गुणों रूपी निर्मल जल के लिए सुन्दर संयम रुपी सीढ़ियों को देखकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है। उस अवस्था में नाना सुख रूपी कमलों पर भोग रूपी पक्षी कूजने लगते हैं और सात्विक लालसा रूपी भ्रमर गुंजार करने लगते हैं। परम रमणीय उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है मानों दम (इन्द्रियों के दमन की अवस्था) रूपी मयूर मधुरवाणी रूपी कोमल राह चलने वाले इच्छा रूपी पथिकों को बुला रहे हैं। दो0 रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।29।। व्याख्या : जब साधक की आत्मोन्मुखी अवस्था हो जाती है तब क्या शरीर रूपी नगर की शोभा का वर्णन किया जा सकता है। क्योंकि उस अवस्था में तो देह रूपी अयोध्या में अणिमा आदि सिद्धियों की सुख व सम्पदा आ जाती है। जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।। भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।। व्याख्या : उस अवस्था में जहाँ-तहाँ पर नर की धड़कन से आत्मा के गुणों का अनुभव होने लगता है और सभी भावों में आत्मोन्मुखी वृति हो जाती है। उस अवस्था में भाव एक दूसरे भाव से कहने लगते हैं कि आत्मा रूपी राम का भजन करो जो प्राण के माध्यम से सबका पालनहार होता है तथा शील, रूप व गुणों की शोभा का घर होता है। जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।। धृत सर रुचिर चाप तुनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।। व्याख्या : जो परमात्मा कमल रूपी दिव्य दृष्टि से श्याम अंगों वाले के रूप में आभासित होता है और जो भक्तों की पलकों के समान रक्षा करने वाला है तथा जो शिव संकल्प रूपी धनुष व प्रेरणा रूपी बाणों को संयम रूपी तरकश सहित धारण किए हुए हैं और जो संत रूपी कमल वन के लिए सूर्य के समान होता है, उसका भजन करो। काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।। लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।। व्याख्या : वासना रूपी सर्पों का भक्षण करने वाले आत्मा रूपी गरुड़ को भजो क्यों कि नमत अर्थात् आत्मोन्मुखी होते ही निष्काम अवस्था आ जाती है और ममता के विकार मिट जाते हैं। संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।। व्याख्या : संशय, शोक व अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य के समान आत्मा रूपी राम का भजन करो। आत्मा रूपी राम वासना रूपी राक्षसों के कुल को जलाने के लिए ज्ञान रूपी अग्नि के समान हैं। इसलिए भावों के विकारों को मिटाने वाले आत्मा रूपी राम का सुरता रूपी सीता सहित भजन क्यों नहीं करते हो? बहु वासना मसक हिम रासिहि। सदा एक रस अज अबिनासिहि।। मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसीदास के प्रभुहि उदारहि।। व्याख्या : बहुत से वासना रूपी मच्छरों को मारने के लिए आत्मा रूपी राम बर्फ के समान शीतल हैं तथा सदा एक रस, अजन्मा व अविनाशी हैं। परमात्मा मुनियों के मन को संतुष्ट करने वाला व देह विकारों का नाश करने वाला होता है। इस प्रकार तुलसीदास अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं कि परमात्मा बहुत उदार होते हैं। दो0 एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान।।30।। व्याख्या : इस प्रकार ध्यान की सिद्ध अवस्था आ जाने पर देह रूपी नगर के नर-नाड़ी परमात्मोन्मुखी भाव पैदा करने लगते हैं, जिससे परमात्मा सदैव साधक के अनुकूल बने रहते हैं। जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।। व्याख्या : जब साधक की परमात्मोन्मुखी अवस्था आ जाती है और आत्मा के प्रताप का बल बढ़ जाता है तो ज्ञान रूपी सूर्य प्रबलता के साथ उदित हो उठता है। उस अवस्था में ज्ञान रूपी सूर्य का प्रकाश, सत, रज, तम के तीनों लोकों में प्रकाश कर देता है, जिससे कुछ भाव दु:खी हो जाते हैं और बहुत से भाव सुखी हो उठते हैं। जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अविधा निसा नसानी।। अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।। व्याख्या : जिन भाव रूपी लोगों को ज्ञान रूपी सूर्य के उदित होने से दु:ख होता है, उनका मैं वर्णन करता हूँ। सुनो - सबसे पहले तो अविधा के भावों का नाश होता है और चिंता रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छुप जाते हैं अर्थात् चिंता मिटने लग जाती है। उस अवस्था में काम-क्रोध रूपी कौरव संकोच करने लग जाते हैं अर्थात् काम-क्रोध के भाव कमने लग जाते हैं। बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।। मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।। व्याख्या : विभिन्न प्रकार के कर्म, गुण, काल व स्वभाव ये चकोर की तरह होते हैं, जो कभी भी ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने पर सुखी नहीं होते हैं। ज्ञान रूपी सूर्य के उदित हो जाने पर मत्सर, मान, मोह व मद रूपी चोरों की चालाकी कहीं नहीं चल पाती है। धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। एक पंक बिकसे बिधि नाना।। सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।। व्याख्या : ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने पर सद् धारणा रूपी तालाब में ज्ञान व विज्ञान रूपी अनेक कमल खिल उठते हैं। उस अवस्था में सुख, संतोष, वैराग्य व विवेक रूपी चकवे शोक रहित हो जाते हैं। दो0 यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास।।31।। व्याख्या : जिस भी साधक के हृदय में आत्मा के प्रताप से ज्ञान रूपी सूर्य उदित हो जाता है। उसके हृदय में जो पीछे कहे गए हैं अर्थात् ज्ञान, विवेक, वैराग्य, संतोष व सुख के भावों की वृद्धि होने लगती है और पहले कहे गए अर्थात् काम, क्रोध, मद, मत्सर, मान मद व लोभ आदि भावों का नाश होने लगता है। भ्रातन्ह सहित राम एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।। सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।। व्याख्या : जैसा कि मैंने पहले बताया है कि साधक की सदैव एकरस अवस्था नहीं बनी रहती है। इसलिए भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न अनुभूति होती रहती है। इन चौपाइयों में उस समय की अनुभूति का वर्णन किया गया है जब अनन्य बुद्धि के भाव सहित चित की चारों अवस्था सुंदर सहज वैराग्य रूपी उपवन में जाते हैं। उस अवस्था में सब भावों के मूल रूपी वृक्ष निर्मल फूलों से नए पत्तों के साथ खिल रहे होते हैं। अर्थात् निर्मलता व आनन्द के भाव पैदा होने की अवस्था होती है। उस अवस्था में जब आत्मा रूपी राम भावों रूपी भाइयों व अनन्य बुद्धि के साथ अवस्थित होते हैं तो जो अनुभूति होती है, उसे आगे की चौपाइयों में लिखा गया है। जानि समय सनकादिक आए। तेज पँुज गुन सील सुहाए।। ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।। व्याख्या : उस अवस्था में गुण व शील के भावों में जो थोड़ा बहुत संशय बचा होता है, वो भी उभर कर सामने आ जाता है। उसी भाव अवस्था को सनक आदि (संशय की सनक) ऋषियों का आना बोलकर लिखा गया है। गुण व शील के भाव देखने में तो बालक भाव लगते हैं परन्तु होते बहुत गहरे हैं तथा ब्रह्म के आनन्द में लयलीन रहते हैं। रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।। व्याख्या : उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है मानो चारों वेद अर्थात् सत, रज, तम व गुणातीत अवस्था के अनुभव ने शरीर ही धारण कर लिया हो। वेद अनुभव का ही प्रतीक होता है। गुण व शील के भाव रूपी मुनिगण अर्थात् मन के भाव समदृष्टा व भेदों से रहित होते हैं। उन गुण व शील के भावों का एक ही व्यसन (आदत) होता है कि वे परमात्मा के चरित को सुनना पसंद करते हैं। तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।। राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! ये गुण व शील के भाव शरीर में ही संभव होते हैं, जब मन में ज्ञान की अवस्था पैदा हो जाती है। घटसंभव अर्थात् देह रूपी घट में ही गुण शील के भाव सम्भव हो पाते हैं, जब मुनिवर अर्थात् मन के भाव परम ज्ञानमय हो जाते हैं। मन के ज्ञान के भाव बहुत प्रकार से आत्मा रूपी राम के चरित का वर्णन करते हैं। इसलिए ज्ञान जोनि अर्थात् ज्ञान की अवस्था से ही परम ज्ञान की अग्नि पैदा होती है, जैसे अरणी से लड़की जल उठती है। दो0 देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठत कहँ दीन्ह।।32।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने देखा कि गुण व शील रूपी सनकादि मन के भाव आ रहे हैं तो उनके प्रति समर्पण का भाव दिखाते हुए दण्डवत किया अर्थात् गुण व शील के भावों को हृदयंगम किया। फिर उन भावों को हृदयंगम करके स्थिर करने का प्रयास किया। उसी को पीताम्बर बिछाकर बैठने के लिए कहना बताया गया है। कीन्ह दंडवत तीनिउ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।। मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम के भाव रत लखन भाव व शत्रुघ्न भाव रूपी भाइयों ने अनन्य बुद्धि सहित गुण व शील रूपी सनकादि ऋषियों को दंडवत किया अर्थात् हृदयंगम किया। सब भावों को उस अवस्था में बहुत सुख की प्राप्ति हुई। गुण व शील रूपी मन के भावों ने आत्मा रूपी राम की अनुपम शोभा (सहज शोभा) को देखा तो वे आत्मा के स्वरूप में ही लीन हो गए और मन उनको रोक नहीं पाया। स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।। एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।। व्याख्या : वे शील व गुण के भाव आत्मा की सुंदर छटा व दिव्य दृष्टि रूपी कमल नयनों को देखकर तथा मन के अंदर की सुंदरता व भावों के विकारों का नाश करने वाली आत्म अवस्था को देखकर एकटक होकर आत्मोन्मुखी हो गए। उन्होंने देखा कि आत्मा रूपी राम निर्मलता की अवस्था में स्थिर हैं। आत्मा की निर्मलता की अवस्था को ही राम द्वारा हाथ जोड़कर खड़ा रहना बताया गया है। तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा।। कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।। व्याख्या : उन गुण व शील के भाव रूपी सनकादिक ऋषियों की दशा देखकर आत्मा रूपी राम द्रवित हो उठे। उसी को राम के नेत्रों से प्रेमाश्रु रूपी जल का निकलना बताया गया है। तब आत्मा रूपी राम ने गुण व शील के गुणों को हृदयंगम करके परम मनोहर वचन कहे। आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।। बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे मन के भाव रूपी मुनियों! आज मैं धन्य हो गया। क्योंकि गुण व शील के भावों के आ जाने से चिंता रूपी पापों का समूह मिट जाता है। सत्य की सहज अवस्था की प्राप्ति (सत्संग) बहुत बड़े भाग्य से ही प्राप्त होती है। क्योंकि सत्य की सहज (सत्संग) अवस्था आ जाने से स्वत: ही भाव भंग अर्थात् भावों के विकार मिट जाते हैं। दो0 संत संग अपबर्ग कर कामी भवकर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सद्ग्रंथ।।33।। व्याख्या : संत जनों के संग से दु:ख-सुख से मुक्ति की प्राप्ति होती है तथा काम का संग करने से भावों के उलझन की अवस्था आती है। संत जन, कवि, कोविद, वेद, पुराण व सभी सद्ग्रंथ ऐसा ही कहते हैं। सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।। जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर मन की चारों अवस्था वाले भाव (गुण, शील, सदाचार व विनय) पुलकित होकर परमात्मा की स्तुति करने लगे कि -- हे भगवन! हे अनंत! हे अनामय! आपकी जय हो। आप पाप रहित, अनेक, एक और करुणामय हैं। जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।। जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।। व्याख्या : हे गुणों से परे! आपकी जय हो। हे गुणों के सागर प्रभु! आपकी जय हो, जय हो। आप मन के अंदर सुख देने वाले, सुंदर व अति चतुर हैं। हे इन्द्रियों में रमण करने वाले प्रभु! आपकी जय हो। आप अनुपम, अजन्मा अनादि व सहज शोभा की खान हैं। ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।। तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।। व्याख्या : आप ज्ञान के घर, मान देने वाले व अमान हैं। आपके पवित्र यश का वेदों व पुराणों ने बखान किया है। आप तत्व को जानने वाले, कर्म के मर्म को जानने वाले व अज्ञान को मिटाने वाले हैं। आपके संसार में अनेक नाम हैं परन्तु नाम रहित आप निरञ्जन कहलाते हैं। सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।। द्वन्द बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय।। व्याख्या : हे प्रभु! आप सर्व रूप हैं, सब जगह जाने वाले हैं तथा सबके हृदय में घर बनाकर रहते हैं। इसलिए हे प्रभु! आप हमारा परिपालन कीजिए। आप भावों के द्वन्द से उत्पन्न विपत्ति के भावों के फंदे का नाश करने वाले हैं। इसलिए काम व मद का नाश करके आप हमारे हृदय में निवास कीजिए। दो0 परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम।।34।। व्याख्या : हे परमानंद व कृपा के घर! आप मन की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। इसलिए हे आत्मा रूपी राम! आप हमें आपकी अनपायनी प्रेम भक्ति प्रदान कीजिए। देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।। प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।। व्याख्या : हे प्रभु! आप पवित्र भक्ति दीजिए जो सत, रज व तम गुणों के भावों के ताप को मिटाने वाली होती है। हे प्रभु! आप प्राण के द्वारा कामनाओं को पूर्ण करने वाले व पालने वाले हैं। स्वरों के माध्यम से ही कल्पनाएँ पैदा होती है, इसलिए स्वर ही कल्पनाओं के मूल होते हैं। अत: हे प्रभु! अब प्रसन्न होकर पवित्र भक्ति का वरदान दीजिए। भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुखदायक।। मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।। व्याख्या : हे प्रभु! आप भाव रूपी भव सागर को सोखने के लिए अगस्त्य उ (अग अ अस्त मन का भाव उ अर्थात भविष्य के भावों का अस्त करने वाला भाव) ऋषि के समान हैं। आपकी सेवा साधना सुलभ होती है और आप सबको सुख देने वाले हैं। हे दीनबंधु प्रभु! आप मन से उत्पन्न दु:खों का नाश कीजिए और मन में समता की दृष्टि का विस्तार कीजिए। आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।। भूप मौलि मनि मंडल धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।। व्याख्या : आप आशाओं, तृष्णाओं व ईर्ष्यादि भावों का निवारण करने वाले हैं तथा विनय, विवेक व वैराग्य के भावों का विस्तार करने वाले हैं। आप भावों के राजा व मन के भावों की मणि को धारण करने वाले हैं। इसलिए हमें संशयों रूपी नदी को पार करने वाली भक्ति रूपी नाव प्रदान कीजिए। मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।। रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।। व्याख्या : हे प्रभु! आप मुनियों के मन रूपी सरोवर के हंस हैं। आपके चरण कमलों की बुद्धि रूपी ब्रह्मा व विश्वास रूपी शिव सदा वन्दना करते हैं। आप जीवात्मा के केतु और सुरती की रक्षा करने वाले सेतु हैं। अर्थात् आप जीवात्मा और परमात्मा की सुरता के बीच के सेतु हैं। आप काल, कर्म, स्वभाव व गुणों का भक्षण करने वाले हैं। तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।। व्याख्या : आप तारण तरन अर्थात् स्वयं तरे हुए और दूसरों को तारने वाले हैं। आप सब प्रकार के विकारों को दूर करने वाले हैं। तुलसीदास स्वयं अनुभव करके कहता है कि प्रभु तीनों गुणों से उत्पन्न तीनों भाव धारा रूपी भावना के भूषण हैं। दो0 बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ। ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ।।35।। व्याख्या : बार-बार गुण, शील, सदाचार व विनय रूपी सनकादिक मुनि परमात्मा की स्तुति करके और सीस झुकाकर ब्रह्म भावना में लीन हो गए और अपना मनवांछित परम पद प्राप्त कर लिया। सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए।। पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।। व्याख्या : उस अवस्था में गुण, शील, सदाचार व विनय रूपी सनकादिक मन के भाव क्रिया (विधि) के लोक में समा गए अर्थात् आचरण में आ गए। उधर को भाव रत भरत, लखन भाव व शत्रुघ्न भावों रूपी भाइयों ने आत्मा रूपी राम के चरणों में सीस झुकाया अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर समर्पण की अवस्था में आ गए। उस अवस्था में कोई भी भाव कुछ भी नहीं पूछना चाहता है और चितवत होकर अनन्य बुद्धि के भाव की तरफ देखने लगते हैं अर्थात् अनन्यता की अवस्था को देखने लगते हैं। सुनी चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।। अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।। व्याख्या : ये सब भाव आत्मा की प्रेरणा रूपी बाणी को सुनना चाहते हैं, जिससे सब प्रकार के भ्रम मिट जाएँ। अन्तर्यामी आत्मा रूपी राम तो सब कुछ जानने वाले हैं, इसलिए अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान से कहा -- कहो क्या बात है? अर्थात् क्या चाहते हो? बताओ। जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।। नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।। व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने प्राण को जोड़कर अर्थात् पान अपान को जोड़कर कहा कि हे दीन दयाल भगवंत! भाव रत भरत भाव कुछ पूछना चाहता है परन्तु प्रश्न करने में उसे संकोच हो रहा है। तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।। सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।। व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी वानर! तुम तो मेरा स्वभाव जानते हो कि मुझ आत्मा में और भाव रतता (भरत) में कुछ अन्तर नहीं होता है। आत्मा रूपी राम की ये बातें सुनकर भाव रत भरत भाव पूरी तरह आत्मा में लीन हो गया और कहने लगा कि हे नाथ! आप तो प्राण के द्वारा सबका पालन व हरण करने वाले हो। दो0 नाथ न मोहि संदेहु कछु सपनेहुँ सोक न मोह। केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह।।36।। व्याख्या : हे नाथ! मुझे न तो कोई संशय है और न ही सपने में भी शोक व मोह है। हे कृपा और आनन्द के मूल! ये सब आपकी कृपा का ही फल है। करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।। संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहुबिधि बेद पुरानन्ह गाई।। व्याख्या : हे कृपा के समुद्र! मैं फिर भी एक धृष्टता करता हूँ। मैं तो आपका सेवक हूँ और आप सेवकों को सुख देने वाले हैं। हे प्रभु! संतों की महिमा को वेद व पुराणों ने नाना प्रकार से बतायी है। श्रीमुख तुम पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।। सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिच्छन।। व्याख्या : आपने स्वयं संतों की बड़ाई की है और आपका उन पर विशेष प्रेम भी होता है। इसलिए हे प्रभो! मैं आपके मुख से संतों के लक्षणों को सुनना चाहता हूँ। हे प्रभो! आप कृपा के समुद्र हैं और गुण व ज्ञान में प्रवीण हैं। संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।। संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।। व्याख्या : हे प्राण के द्वारा सबका पालन करने वाले! मुझे संत ओैर असंत के भेद को समझाकर कहिए। तब आत्मा रूपी राम बोले (अर्थात् आत्मा ने प्रेरणा करके भाव रत भरत भाव को समझाया) कि हे भाई! संत जनों के अनन्त लक्षण होते हैं, जिनका वेदों व पुराणों ने वर्णन किया है। संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।। काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।। व्याख्या : संत और असंत की करणी चन्दन और कुल्हाड़ी जैसी होती है। कुल्हाड़ी स्वभाव वश चन्दन के पेड़ को काटती है परन्तु स्वभाववश चन्दन का पेड़ कुल्हाड़ी को सुगंधित कर देता है। दो0 ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड। अनल ताहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड।।37।। व्याख्या : इसी सहनशीलता के गुण के कारण चन्दन देवताओं के सिर पर चढ़ता है और जगतप्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ी के मुख को यह दण्ड मिलता है कि उसको आग में जलाकर फिर घन से पीटते हैं। इसी प्रकार संत जगत में अपने त्याग के कारण पूजे जाते हैं और दुष्ट प्रताड़ित होते रहते हैं। बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।। सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।। व्याख्या : संत विषयों में लिप्त नहीं होता है तथा शील व गुणों से सम्पन्न होता है। संत दूसरों के दु:खों को देखकर दु:खी होता है और पराए सुख को देखकर सुखी होता है। संत समता का भाव रखता है तथा उनके कोई शत्रु नहीं होता है तथा वे मद रहित वैराग्य में अवस्थिति होते हैं। संत लोभ, क्रोध, हर्ष और भय का त्याग किए रहता है। कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।। सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।। व्याख्या : संत जन कोमल चित वाले व दीनों पर दया करने वाले होते हैं। वे मन, वचन व कर्म से मेरी निष्कपट भक्ति करते हैं। वे सबको सम्मान देने वाले होते हैं परन्तु स्वयं मान रहित रहते हैं। हे भाव रत भरत! ऐसे लोग मुझे प्राणों के समान प्रिय होते हैं। बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।। सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।। व्याख्या : वे लोग मेरा नाम का जप करते रहते हैं जिससे काम का नाश हो जाता है और शांति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नता छा जाती है। नाम का जप करने से विषयों की आग शीतल हो जाती है तथा मैत्री व सरलता की अवस्था आ जाती है। उस अवस्था में उनकी दिव्य भावों में प्रीति हो जाती है जो सद्धारणा को जन्म देने वाली होती है। ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।। सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहुँ नहिं बोलहिं।। व्याख्या : हे तात्! ऐसे लक्षण जिनके हृदय में बसते हैं, उन्हें सदा सच्चा संत जानना चाहिए। जो सम (मन के निग्रह) दम (इन्द्रियों के निग्रह), नियम व नीति से कभी विचलित नहीं होते और मुख से कभी कठोर वचन नहीं बोलते। दो0 निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज। ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज।।38।। व्याख्या : वे निंदा और स्तुति दोनो में समान रहते हैं तथा मेरे चरण कमलों में ममता रखते हैं, ऐसे लोग मुझे प्राणों के समान प्रिय होते हैं और वे गुणों के मन्दिर व सुख के समूह होते हैं। सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।। तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई।। व्याख्या : अब तुम दुष्ट जनों के लक्षणों के बारे में सुनो। जिनकी किसी को भूल करके भी संगति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि दुष्ट जनों (असंतों) का साथ सदा दु:ख देने वाला होता है जैसे हरहाई गाय दूध देने वाली गाय को भी नष्ट कर देती है। खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।। जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।। व्याख्या : दुष्ट जनों के हृदय में दूसरों के प्रति बहुत जलन होती है। वे लोग सदैव दूसरों की सम्पत्ति को देखकर जलते रहते हैं। वे लोग जहाँ कहीं भी परायी निंदा सुनते हैं, तो ऐसे प्रसन्न हो जाते हैं मानो पड़ा हुआ धन मिल गया हो। काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।। बयरु अकारन सब काहू सो। जो कर हित अनहित ताहू सो।। व्याख्या : दुष्ट लोग काम, क्रोध, मद व लोभ के परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल व विकारों के घर होते हैं। वे बिना कारण के ही सबसे बैर करते हैं। वो हित करने वाले के साथ भी बुराई करते हैं। झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा।। व्याख्या : उनका झूठ ही लेना और झूठ ही देना होता है अर्थात् उनका व्यवहार ही झूठ पर आधारित होता है। वे लोग मोर के समान मधुर बाणी बोलते हैं परन्तु जरूरत पड़ने पर विकार रूपी सर्प को भी खा जाते हैं। दो0 पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद।।39।। व्याख्या : वे दुष्ट लोग पर अर्थात् प्रकृति के विरोधी और परायी स्त्री में रमण करने वाले व पराए धन की लालसा रखने वाले तथा परायी निंदा करने वाले होते हैं। ऐसे दुष्ट लोग पाँवर और पापमय भावों की वृति के अनुसार शरीर धारण करके मनुष्य रूप में राक्षस ही होते हैं। लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न।। काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।। व्याख्या : लोभ ही उनका ओढ़ना व लोभ ही बिछौना होता है अर्थात् वे दुष्ट लोग सदा लोभ से ही घिरे रहते हैं। वे पशुओं की तरह आहार और मैथुन के परायण होते हैं, उन्हें यमपुर अर्थात् सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय का भय नहीं सताता है। अगर वे किसी की बड़ाई सुन लेते हैं तो ऐसी दु:ख भरी साँस लेते हैं, मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो। जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।। स्वार्थ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।। व्याख्या : जब वे किसी को विपत्ति में देखते हैं तो ऐसे खुश हो जाते हैं, मानो जगत में राजा बन गए हो। वे स्वार्थ रत तथा परिवार के विरोधी होते हैं तथा विषयों में लिप्त, कामी, लोभी व बहुत क्रोधी होते हैं। मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।। करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।। व्याख्या : वे लोग माता, पिता, गु डिग्री व विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वालों की बात नहीं मानते हैं। वे आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, दूसरों को भी नष्ट करते रहते हैं। वे मोह में पड़कर दूसरों से द्रोह करते रहते हैं। इनको संत जनों का संग और माया के हरण की कथाएँ अच्छी नहीं लगती हैं। अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।। बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।। व्याख्या : ये अवगुणों के समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी, वेदों के निन्दक, व पराए धन को लूटने वाले होते हैं। वे दूसरों से द्रोह तो करते हैं परन्तु विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वालों से विशेष द्रोह करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है परन्तु ऊपर से सुन्दर भेष धारण किए रहते हैं। दो0 ऐसे अधम मनुज खल कृत जुग त्रेताँ नाहिं। द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं।।40।। व्याख्या : ऐसे दुष्ट वृति के लोग त्रेता व सतयुग में नहीं होते हैं अर्थात् सतोगुण व गुणातीत अवस्था में दुष्ट वृति पैदा नहीं होती है। परन्तु रजोगुणी अवस्था (द्वापर) में कुछ-कुछ दुष्टता की वृति पैदा हो जाती है और तामसिक गुण अवस्था में तो दुष्ट वृति प्रबल हो उठती है। परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।। व्याख्या : परहित अर्थात् पर यानि आत्मा और हित मानी कल्याण यानि आत्मा के कल्याण करने के समान कोई दूसरा धर्म नहीं होता है। हे तात्! समस्त वेदों और पुराणों के निर्णय (सिद्धान्त) को मैंने तुमको बताया है। इसको विद्वान लोग जानते हैं। नर सरीर धरि जो पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।। करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।। व्याख्या : जो मनुष्य का शरीर धारण करके आत्मा को सताते हैं, वे भावों से उत्पन्न नाना कष्टों को सहते हैं। मनुष्य मोह के वश में होकर नाना प्रकार के पाप कर्म करते हैं। ऐसे लोग स्वार्थ में पड़कर आत्म लोक को नष्ट कर लेते हैं। अर्थात् आत्मा को बंधन में डाल देते हैं। कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।। अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।। व्याख्या : हे भाव रत भरत भाई! ऐसे लोगों के लिए मैं आत्मा कालरूप होता हूँ अर्थात् जन्म-मरण वाला होता हूँ। मैं आत्मा ही उनके अच्छे-बुरे कर्मों का फल देने वाला होता हूँ। इसलिए जो परम चतुर होते हैं, वे ऐसा विचार करके संसार को दु:ख का कारण जानकर मुझ परमात्मा का भजन करते हैं। त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।। संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।। व्याख्या : इसलिए शुभ-अशुभ कर्मों का त्याग करके सुर, नर व मुनि गण मुझ परमात्मा का भजन करते हैं। अर्थात् स्वरों, नर (धड़कन) व मन के भाव सहज होकर परमात्मोन्मुखी हो जाते हैं। मैंने संत और दुष्ट जनों के लक्षण बता दिए हैं। अत: वे लोग भाव रूपी भव सागर में नहीं पड़ते हैं, जो इनके लक्षणों के मर्म को जान लेते हैं। दो0 सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखअहिं देखिअ सो अबिबेक।।41।। व्याख्या : हे तात्! माया से उत्पन्न अर्थात् भावों से उत्पन्न गुण व दोष अनेक होते हैं। परन्तु समझदारी तो इसमें है कि दोनों को ही नहीं देखें अर्थात् गुण व दोषों में उलझे ही नहीं। इनमें उलझना ही अविवेक होता है। श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।। करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर अर्थात् आत्मा से प्रेरणा पाकर भाव रूपी तीनों भाई हर्षित हो उठे और हृदय में प्रेम नहीं समा रहा था। वे बार-बार विनय करने लगे अर्थात् आत्मा में लीनता दृढ़ होने लगी। यह अवस्था देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को अपार हर्ष होने लगा। पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।। बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम स्वयं के मन के अंदर समा गए अर्थात् आत्मा निज स्वरूप में लीन हो गयी। इस प्रकार ध्यान की अवस्था सिद्ध हो जाने पर आत्मा के नाना चरित समझ में आने लगते हैं। उस अवस्था में बार-बार मन का नारद भाव प्रकट होकर बार-बार आत्मा रूपी राम के चरित का गुणगान करने लगता है अर्थात् आत्मा के बारे में नाना अनुभूतियाँ होने लगती हैं। नित नव चरित देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।। सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।। व्याख्या : मन का नारद भाव बार-बार आत्म चरित की नयी-नयी अनुभूति करके ब्रह्मलोक अर्थात् बुद्धि के लोक में जाकर बताने लगता है, जिसे सुनकर बुद्धि रूपी ब्रह्म बहुत सुख मानने लगते हैं और बार-बार आत्मा के गुण-गान सुनाने की बात कहते हैं। सनकादिक नारदहिं सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।। सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी।। व्याख्या : गुण व शील रूपी सनकादिक मन के भाव नारद भाव की सराहना करने लगते हैं। हालाँकि गुण व शील के भाव आत्मा में लीन रहते हैं परन्तु आत्मा के गुण गान सुनकर लीनता से बाहर आ जाते हैं। वे गुण शील रूपी सनकादिक मन के भाव आत्मा के गुण गान सुनने के परम अधिकारी होते हैं। दो0 जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान।।42।। व्याख्या : जीवन मुक्त व ब्रह्म में लीन मुनि भी लीनता का त्याग करके परमात्मा के पवित्र चरित की कथा सुनते हैं। अत; जो लोग माया का हरण करने वाले परमात्मा की कथा नहीं सुनते हैं, उनके हृदय वास्तव में पत्थर जैसे होते हैं। एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरवासी सब आए।। बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।। व्याख्या : एक बार आत्मा रूपी राम ने गुरु अर्थात् ज्ञान भाव, द्विज अर्थात् दिव्य भावों व देह के भावों को बुलाया अर्थात् आत्मा ने ज्ञान, दिव्यता व देह के भावों को अपनी ओर आकर्षित किया। जब सारे ज्ञान, दिव्यता व देह के भाव स्थिर हो गए। तब भावों के बंधन को काटने वाले आत्मा रूपी राम बोले अर्थात् तब आत्म प्रेरणा हुई। सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।। नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।। व्याख्या : ऐसी अवस्था में आत्मा समस्त भावों को प्रेरणा करके अपने स्वरूप को समझाने लगती है। उसी भाव अवस्था का यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर वर्णन किया गया है। आत्मा रूपी राम बोले कि हे देह रूपी नगर के भाव रूपी निवासियों सुनो -- मैं ममता के कारण नहीं कह रहा हूँ अर्थात् मैं तो सहज प्रेरणा कर रहा हूँ। इसमें कोई अनीति नहीं है और न ही कोई प्रभुता की बात कहता हूँ इसलिए अगर तुमको अच्छी लगे तो अनुसरण करना। सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।। जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।। व्याख्या : मुझे वही भाव रूपी सेवक प्रिय होता है, जो मेरी प्रेरणा का अनुसरण करता है। इसलिए अगर मैं कोई अनीति अर्थात् असहज बात कहूँ तो तुम भय का त्याग करके मुझे रोक देना। बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।। साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।। व्याख्या : मनुष्य का शरीर बड़े भाग्य से मिलता है तथा यह देवताओं को भी दुर्लभ होता है। इस बात को सभी ग्रंथों ने बताया है। यह मनुष्य का शरीर मोक्ष प्राप्ति का घर व साधन होता है। इसे पाकर भी जिसने परलोक नहीं बना लिया। दो0 सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि इस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ।।43।। व्याख्या : वह पर लोक अर्थात् प्रकृति के वश में पड़कर दु:ख पाता है तथा सिर धुन-धुनकर पश्चाताप करने लगता है। वह ऐसी अवस्था में काल को (समय), कर्म को व ईश्वर को व्यर्थ में ही दोष देने लगता है। एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।। नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।। व्याख्या : इस मनुष्य शरीर को प्राप्त करने का लक्ष्य कोई विषय भोगों को प्राप्त करना नहीं होता है। क्योंकि कितने भी सुख मिलें परन्तु अन्त में तो सुख-दु:ख देने वाले होते हैं। इसलिए जो लोग मनुष्य का शरीर प्राप्त करके विषयों में मन लगाते हैं, वे तो मूर्ख लोग अमृत को छोड़कर जहर को लेते हैं। ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।। आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।। व्याख्या : जो पारस मणि का त्याग करके घुँघची को लेते हैं उन्हें कोई बुद्धिमान नहीं कहता है। ऐसे जीव चारों खानों (अण्डज, स्वेदज, जरायुज व उद्भिज) और चौरासी लाख योनियों में भ्रमित होकर चक्कर काटता रहता है। फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।। कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।। व्याख्या : जीव माया से प्रेरित होकर काल, कर्म, स्वभाव व गुणों से बँधा हुआ चक्कर काटता रहता है। बिना ही कारण के दया करने वाले ईश्वर कभी बिरले को ही मनुष्य का शरीर देते हैं। नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।। व्याख्या : यह मनुष्य के शरीर का नर (धड़कन) भाव रूपी भव सागर में जहाज के समान होता है। इसलिए प्राण को सिद्ध कर लेना अर्थात् सन्मुख कर लेना ही मुझ परमात्मा की कृपा का मूल होता है। सद्गु डिग्री ही भावरूपी भव सागर में नाव को खेने वाले कर्णधार होते हैं। इस प्रकार दुर्लभ साधन मनुष्य तन को प्राप्त करके सुलभता से मिल जाते हैं। दो0 जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाई। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ।।44।। व्याख्या : जो मनुष्य शरीर को प्राप्त करके भी भाव रूपी भवसागर को पार नहीं करते हैं, वे तो मंदबुद्धि वाले आत्म हत्या करने वाले की गति को प्राप्त होते हैं। जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू।। सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।। व्याख्या : जो परलोक और इस लोक में सुख चाहते हो तो मेरे वचनों को सुनकर दृढ़ता से ग्रहण करो। मुझ परमात्मा की भक्ति सुलभ व सुखद रास्ता होती है। वेदों व पुराणों ने भी इसका वर्णन किया है। ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।। करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्तिहीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।। व्याख्या : ज्ञान बहुत दुर्गम होता है और उसकी प्राप्ति में अनेक विघ्न होते हैं। उसका साधन कठिन होता है और मन को भी कोई आधार नहीं मिल पाता है। बहुत कष्ट करके अगर कोई ज्ञान को प्राप्त कर भी लेता है तो भी बिना भक्ति के वो मुझ परमात्मा को प्रिय नहीं होता है। भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।। पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सत संगति संसृति कर अंता।। व्याख्या : भक्ति स्वतंत्र व सब सुखों की खान होती है जिसे बिना सत्संग के जीव प्राप्त नहीं कर पाता है। बिना पुण्य के संतों का मिलन नहीं हो पाता है अर्थात् बिना पुण्य के प्रभाव के संशयों का अंत (सन्त उ संशय अ अन्त) नहीं हो पाता है और सत्संग अर्थात् सहजता में अवस्थित होने पर संसार के संशयों का अंत हो जाता है और पुण्य के प्रभाव से ही सहजता आती है। पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।। सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।। व्याख्या : मन, वचन, कर्म से विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश करने वाले सतगुरु के चरणों की पूजा ही एक मात्र पुण्य का साधन होता है। क्योंकि विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश (विप्र) वाले सतगुरु की सेवा करने पर मन के भाव सहज होकर अनुकूल हो जाते हैं और दिव्य पुण्य को प्राप्त कर लेते हैं, जिससे भ्रम का नाश हो जाता है। दो0 औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।45।। व्याख्या : एक और गुप्त मत बताता हूँ कि विश्वास रूपी शंकर की भक्ति के बिना कोई भी जीव मुझ परमात्मा की भक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता है। वास्तव में बिना दृढ़ विश्वास के शंकाओं का समाधान नहीं हो सकता है और शंका नाश्यति शंकर: अर्थात् शंकाओं का नाश होना ही शंकर की अवस्था होता है। कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।। सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।। व्याख्या : कहो तो भक्ति के मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? भक्ति के लिए योग, यज्ञ, जप, तप व व्रत किसी की भी आवश्यकता नहीं होती। भक्ति के लिए तो केवल इतना आवश्यक है कि सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो तथा जो मिल जाए उसमें सदा संतोष करने की वृति हो। मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।। बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।। व्याख्या : मुझ परमात्मा का दास कहलाकर अगर कोई मनुष्यों से अपेक्षा करे तो बताओ ऐसे लोगों का क्या विश्वास किया जाए? बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ? मैं तो इसी आचरण के वश में होता हूँ। बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।। अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।। व्याख्या : न किसी से बैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिए सभी अवस्था सुखमय रहती है। जो कोई भी फल की इच्छा से कर्म नहीं करता, जिसकी घर में अनासक्ति नहीं होती है, जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो निपुण व विज्ञानवान है। प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।। भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।। व्याख्या : संत (सज्जन) जनों के संग करने में जिनका प्रेम होता है और विषयों के सुख यहाँ तक कि स्वर्ग व मुक्ति को भी जो तिनके के समान मानते हैं, जो भक्ति के पक्ष में हठ करता है परन्तु मूर्खता नहीं करता है और जिसने बुरे तर्कों को दूर कर दिया है। दो0 मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह। ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह।।46।। व्याख्या : जो मुझ परमात्मा के गुणों व नाम में अनुराग रखने वाला है और ममता, मद व मोह से रहित होता है, उस अवस्था के सुख को तो वही जानता है, जो परमानन्द को प्राप्त कर लेता है। सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।। जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे।। व्याख्या : अमृत के समान आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर सभी भाव रूपी भाई व अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कृपा के घर राम के चरणों में गिर गए अर्थात् आत्मोन्मुखी अवस्था और दृढ़ हो गयी। सब भाव कहने लगे अर्थात् सब भावों को समझ में आ गया कि आत्मा ही सब भावों को पैदा करने वाली माता व पिता हैं तथा आत्मा ही ज्ञान रूपी प्रकाश करने वाले गुरु हैं तथा आत्मा ही बन्धु अर्थात् बन्धन के भाव पैदा करने वाली है। हे कृपा निधान! आप हमें प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी।। असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ।। व्याख्या : शरीर, धनु अर्थात् इच्छाओं व घर का कल्याण करने वाले आत्मा रूपी राम ही होते हैं। सब प्रकार से प्राण के माध्यम से आत्मा ही करती है। अत: ऐसी नि:स्वार्थ प्रेरणा आत्मा के बिना दूसरा कोई नहीं कर सकता है। माता व पिता तो स्वार्थ में फँसे रहते हैं। हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।। स्वार्थ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमार्थ नाहीं।। व्याख्या : हे आसुरी भावों के शत्रु! आप तो नि:स्वार्थ भाव से जगत का कल्याण करने वाले होते हैं। हे प्रभु! आप ही आपके सेवक हैं। अर्थात् जगत आपका ही स्वरूप है और आप जगत का कल्याण करने वाले हैं, इसलिए आप ही आपके सेवक हैं। हे प्रभु! संसार में स्वार्थ के कारण ही मैत्री भाव रखने वाले होते हैं। परमार्थ की तो सपने में भी नहीं सोचते हैं। सब के बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने।। निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई।। व्याख्या : सब भावों के वचन प्रेम में सने हुए थे इसलिए आत्मा रूपी राम सुनकर हर्षित हो गए अर्थात् आत्मा की प्रसन्नता की अवस्था आ गयी। तब सब भाव आत्मा की प्रेरणा से अपनी अपनी सहज अवस्था में चले गए और आत्मा रूपी राम का चिंतन करने लगे। दो0 उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप। ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप।।47।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! देह रूपी अवध के भाव रूपी नर-नारी सहज हो गए अर्थात् उस अवस्था में नर-नाड़ी की धड़कन सहज हो गयी। ब्रह्म लीनता व सतचित आनन्द की अवस्था प्रत्येक साधक की आ जाती है अगर आत्मा समस्त भावों की अधिष्ठाता बन जाती है अर्थात् परमात्मोन्मुखी अवस्था में सतचित आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।। अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की सहज अवस्था में परमात्मा में लीनता की अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव पैदा हुआ। आत्मा रूपी राम ने विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव का बहुत आदर किया और पद प्रक्षालन अर्थात् पूरी तरह निर्मल करके विशिष्ट ज्ञान के भाव को हृदयंगम कर लिया। राम सुनहु मुनि कहकर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।। देखि देखि आचरण तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ भाव बोला कि हे आत्मा रूपी राम! मेरी विनती सुनो! तुम्हारे आचरण को देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह होता है। महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना।। उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा।। व्याख्या : आपकी महिमा को तो वेद भी नहीं जानते हैं अर्थात् आपकी महिमा की पूर्ण अनुभूति सम्भव नहीं है। फिर मैं विशिष्ट ज्ञान का भाव आप प्रकृति के स्वामी (भग अ वान उ प्रकृति अ स्वामी) के चरित को कैसे समझ सकता हूँ? पुरोहिती का कर्म बहुत नीच होता है। पुर का तात्पर्य शरीर से होता है और शरीर के कल्याण की बात करना या शरीर के लिए कर्म करना नीच वृति में आता है क्योंकि सच्चा कल्याण तो आत्मा का होता है। बाकी देह कल्याण के कर्म तो बन्धनकारी होते हैं और बन्धनकारी होने के कारण वेद, पुराणों व स्मृतियों के विरुद्ध होते हैं। उसी को वेदों, पुराणों व स्मृतियों द्वारा निंदा करना बोला गया है। जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगे सुत तोही।। परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा।। व्याख्या : जब मैं विशिष्ट ज्ञान का भाव देह कल्याण में रमण नहीं करना चाहता था, तब मुझे बुद्धि रूपी ब्रह्म ने समझाया कि देह कल्याण की भावना से आगे चलकर आत्म कल्याण का लाभ होगा। क्योंकि परमात्मा तो शरीर में ही नर की धड़कन के रूप में रहते हैं। इसलिए अभ्यास के द्वारा आगे चलकर जीवात्मा ही परमात्मा के रूप में भावों की अधिष्ठाता बन कर प्रकाश कर देगी। दो0 तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान। जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन।।48।। व्याख्या : तब मैंने हृदय में विचार किया कि जो योग, यज्ञ, व्रत व दान करने से मिलता है उसको मैं देह कल्याण के साधन के माध्यम से प्राप्त कर लूँगा तो इससे कल्याणधारी धारणा (धर्म) और कोई नहीं है। जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।। ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।। व्याख्या : जप, तप, नियम व योग की साधक की जो स्वयं की धारणा होती है और सुरती द्वारा नाना प्रकार के शुभ कर्म करने की जो प्रेरणा होती है तथा ज्ञान, दया, दम व तीर्थ स्नान आदि शुभ धारणाएँ जहाँ तक सुरता में (चेतना) में आती हैं। आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।। तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर।। व्याख्या : तंत्र, वेद और पुराण इन सबके पढ़ने व सुनने का एक ही फल होता है कि परमात्मा के चरण कमलों में प्रेम पैदा हो जाता है। छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।। प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।। व्याख्या : मैल धोने से क्या मैल छूटता है? अर्थात् विषयों का भोग करने से क्या विषय शान्त होते हैं? क्या जल के मथने से घी निकल सकता है? बिना प्रेम रूपी भक्ति के जल के अन्त:करण का विषय रूपी मल कभी नहीं छूट सकता है। सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।। दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाके पद सरोज रति होई।। व्याख्या : वही सब कुछ जानने वाला, वही तत्वज्ञ, वही विद्वान, वही गुणवान और वही अखण्ड विज्ञानी है, वही दक्ष तथा वही सकल लक्षणों वाला होता है जिसके हृदय में परमात्मा के चरण कमलों में अनुराग पैदा हो जाता है। दो0 नाथ एक बर मागउँ राम कृपा कर देहु। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु।।49।। व्याख्या : हे नाथ! मैं एक वरदान माँगता हूँ, आप कृपा करके मुझे दे दो कि जन्म-जन्म में मेरी प्रीति परमात्मा के चरण कमलों में बनी रहे अर्थात् सदैव परमात्मोन्मुखी अवस्था बनी रहे। अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपा सिंधु के मन अति भाए।। हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।। व्याख्या : ऐसा कहकर विशिष्ट ज्ञान का भाव सहज हो गया। उसी को वशिष्ठ ऋषि का घर आना बोलकर लिखा है। विशिष्ट ज्ञान के भाव की यह सहज अवस्था कृपा के समुद्र परमात्मा को बहुत अच्छी लगी। तब अनन्य बुद्धि हनुमान व भाव रत भरतादि भाव रूपी भाइयों को आत्मा रूपी राम साथ लेकर। पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।। देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।। व्याख्या : जैसा कि मैंने पहले भी पाठकों को बताया है कि ध्यान के सिद्ध हो जाने पर क्षण में आत्मा देह में बरतने लगती है तो क्षण में देह से बाहर बरतने लग जाती है। उसी का वर्णन करते हुए कहा गया है कि पुन: आत्मा रूपी कृपालु राम देह रूपी पुर (नगर) से बाहर आ गए अर्थात् देहाभास का त्याग करके ब्रह्मलीनता की अवस्था में आ गए और मन की वृति रूपी हाथी, घोड़ों व रथों को मँगवाया और भावों की रूचि के अनुसार सबको वृति रूपी रथ, घोड़े व हाथी दे दिए। सभी भाव आत्मा रूपी राम की इस प्रेरणा की सराहना करने लगे। हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।। भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।। व्याख्या : संसार के सभी श्रमों का हरण करने वाले आत्मा रूपी राम संसारिकता से विश्राम लेने के लिए वहाँ गए जहाँ विषयों हीन शीतल अमराई थी अर्थात् विषयहीन अवस्था में आत्म चेतना पहुँच गयी। तब भाव रत भरत भाव ने सब प्रकार की वासना रूपी वस्त्र को त्यागकर दिया अर्थात् आत्मा के सामने समर्पण कर दिया और सारे भाई आत्मोन्मुखी होकर विषयहीन अवस्था में स्थिर हो गए। मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।। हनुमान सम नहिं बड़ भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।। व्याख्या : उस अवस्था में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान मारुत करई अर्थात् अनन्यता की अवस्था प्राण वायु में समा गयी जिससे साधक का शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों में जल भर आता है। अनन्य बुद्धि के समान भाग्यशाली भाव दूसरा कोई नहीं होता है क्योंकि अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा रूपी राम के चरणों में अनुराग रखने वाला होता है। गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार-बार प्रभु निज मुख गाई।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! अनन्य बुद्धि का भाव धन्य होता है क्योंकि स्वयं परमात्मा बार-बार अनन्य बुद्धि के भाव के प्रेम व सेवा का वर्णन करते हैं। दो0 तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन।।50।। व्याख्या : उस अवस्था में मन का नारद भाव उल्लासित होता हुआ प्रकट हो जाता है और आत्मा रूपी राम के नए-नए यशोगान करने लगता है। उस अवस्था में जो-जो अनुभूति होती है उसी को स्तुति के भाव के रूप में आगे की चौपाइयों में लिखा गया है। मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।। नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।। व्याख्या : कृपापूर्वक देख लेने से चिंताओं का नाश करने वाले हे कमल नयन! आप मेरी तरफ देखिए अर्थात् मुझ पर कृपा दृष्टि कीजिए। आप नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले हैं और काम रूपी रावण के शत्रु हैं। आप हृदय कमल का रस पीने वाले भ्रमर हैं। जातुधान बरुथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।। भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।। व्याख्या : आप आसुरी भावों रूपी राक्षसी सेना के बल को तोड़ने वाले हैं। मुनि जन और सज्जनों को आनन्द देने वाले व चिंता रूपी पाप का नाश करने वाले हैं। भूसुर अर्थात् देह रूपी पृथ्वी के स्वरों को शीतलता देने वाले मेघ के समान हैं और अनासक्त भावों को शरण में लेकर दीन जनों को आश्रय देने वाले हैं। भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।। रावनारि सुखरूप भूप बर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।। व्याख्या : हे भाव रूपी भुजाओं के बल से देह रूपी भूमि के भार (कष्ट) को मिटाने वाले! हे अज्ञान रूप खर व द्वेष व विरोध आदि के भावों का नाश करने वाले! हे काम रूपी रावण के शत्रुओं के सुख रूप प्रभु! हे दस इन्द्रियों रूपी कुल के चन्द्रमा स्वरूप प्रभु! आपकी जय हो। सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।। कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।। व्याख्या : हे प्रभु! आपका सुन्दर यश पुराणों, वेदों में और तंत्रादि शास्त्रों में प्रकट है। भाव रूपी देवता, मुनि व संतों के समुदाय उसे गाते हैं। आप करुणामयी हैं और झूठे मद का नाश करने वाले हैं। आप सब प्रकार से शरीर रूपी कोशलपुर के आभूषण हैं। कलिमल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।। व्याख्या : आपका नाम कलिमल अर्थात् देहबुद्धि के विकारों को मिटाने वाला व ममता का हरण करने वाला है। तुलसीदास कहते हैं कि प्राण के माध्यम से मेरी रक्षा कीजिए। दो0 प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम। सोभा सिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम।।51।। व्याख्या : प्रेमपूर्वक मन का नारद भाव आत्मा रूपी राम के गुणों का बखान करके परमात्मा में लीन होता हुआ अपनी सहज अवस्था में चला गया। अर्थात् जिस ध्यान की क्रिया से नारद भाव पैदा हुआ उसी में समा गया। अर्थात् दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मन का नारद भाव बुद्धि (ब्रह्म) में समा गया। गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।। राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने (विश्वास रूपी शंकर ने) यह आत्म अनुभूति की विशाल कथा मेरी बुद्धि के अनुसार पूरी कह डाली। आत्मा रूपी रामका चरित सत कोटि अर्थात् सत्य के स्तर का होता है जिसका वर्णन सुरता (श्रुति) व शारदा अर्थात् स्वरों की अनुभूति द्वारा भी पूरी तरह से नहीं किया जा सकता है। राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।। जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम की सीमा अनंत होती है तथा उसके अनन्त ही गुण होते हैं। आत्मा के जन्म, कर्म व नाम भी अनन्त होते हैं। जल की बूँदों में भले ही धूल के कणों को गिना जा सकता है परन्तु आत्मा के चरित का वर्णन नहीं किया जा सकता है। बिमल कथा हरिपद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।। उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।। व्याख्या : यह आत्म अनुभूति की निर्मल कथा माया के हरण की अवस्था (हरि पद) के पद को देने वाली है तथा इसको सुनने से अनपायनी भक्ति की प्राप्ति हो जाती है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने (विश्वास रूपी शंकर ने) वो सब कथा कही है जो निर्मल अहंकार रूपी काक भुसुंडि ने ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ को बतायी है। कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।। सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने आत्मा रूपी राम के कुछ गुणों का वर्णन किया है। अब तुम बताओ और क्या कहूँ? आत्मा रूपी राम की मंगलकारी कथा को सुनकर श्रद्धा रूपी पार्वती हर्षित हो उठी और विनय करती हुई बहुत मधुरवाणी बोली। धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।। व्याख्या : हे पुरारी अर्थात् पुर यानि देह के दुश्मन अर्थात् देहबुद्धि के दुश्मन! मैं धन्य हो गयी। मैंने भावों के भय को दूर करने वाले आत्मा रूपी राम के गुणों की कथा सुन ली है। दो0 तुम्हारी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह। जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह।।52(क)।। व्याख्या : हे कृपायतन! अब मैं (श्रद्धा का भाव) आपकी कृपा से कृत-कृत्य हो गयी हूँ। अब मैं सतचित आनन्द स्वरूप आत्मा के प्रताप को जान गई हूँ। दो0 नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर। श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर।52(ख)।। व्याख्या : हे नाथ! आपका मुख रूपी चन्द्रमा आत्मा रूपी राम की कथा रूपी अमृत बरसाता है। इसलिए आत्म अनुभूति की कथा को सुनने से मेरा मन नहीं भर रहा है। राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस विसेष जाना तिन्ह नाहीं।। जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ।। व्याख्या : जो आत्मा की अनुभूति कथा को सुनने से तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने कथा के विशेष रस को नहीं जाना है। जो जीवन मुक्त महामुनि होते हैं, वे भी निरन्तर माया को हरने वाले परमात्मा के गुण-गानों को निरंतर सुनते हैं। भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।। बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।। व्याख्या : जो लोग भाव रूपी भवसागर को पार करना चाहते हैं, उनके लिए आत्मा रूपी राम की अनुभूति कथा दृढ़ नाव की तरह होती है। क्योंकि आत्मा की अनुभूति की कथा तो विषयी लोगों को भी सुख व मन को आनन्द देने वाली होती है। श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।। ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।। व्याख्या : जगत में कान वाला ऐसा कौन है, जिसे आत्मा रूपी राम की कथा अच्छी नहीं लगती हो। वे जीव तो मूर्ख व आत्मघाती होते हैं, जिनको परमात्मा की कथा अच्छी नहीं लगती है। हरि चरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।। तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।। व्याख्या : हे नाथ! आपने आत्म अनुभूति (मानस) का जो वर्णन किया है, उसे सुनकर मैंने अपार सुख प्राप्त किया है। आपने जो यह सुंदर अनुभूति बतायी है, ये सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि ने ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी से कही थी। दो0 बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह। बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह।।53।। व्याख्या : वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान व परमात्मा के चरणों में दृढ़ प्रेम होते हुए भी सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि को परमात्मा की भक्ति कैसे प्राप्त हुई अर्थात् ज्ञान, वैराग्य व विज्ञानवान अवस्था में दृढ़ भक्ति आने पर भी अहंकार की अवस्था कैसे बच रहती है। इसमें मुझे संदेह हो रहा है। नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म व्रतधारी।। धर्मसील कोटिक महँ कोई। विषय बिमुख बिराग रत होई।। व्याख्या : हे त्रिपुरारि! हजारों पुरुषों में कोई एक परमात्मा की धारणा को धारण करने वाला होता है और धारणा वाले करोड़ों लोगों में कोई एक विषयों से विमुख और वैराग्यवान होता है। कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ज्ञान सकृत कोउ लहई।। ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।। व्याख्या : करोड़ों विरक्तों में कोई एक परमात्मा में सुरता लगाकर सम्यक ज्ञान को प्राप्त करता है और करोड़ों सम्यक ज्ञानवानों में कोई एक जीवन मुक्त अवस्था को संसार में प्राप्त करता है। तिन्ह सहस्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।। धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्म पर प्रानी।। व्याख्या : उन हजारों जीवन मुक्त प्राणियों में कोई एक ब्रह्म में लीन विज्ञानवान होता है, जो सब सुखों की खान होता है। धारणावान, विरक्त, ज्ञानी, जीवनमुक्त और ब्रह्म लीन। सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।। सो हरि भगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।। व्याख्या : इन सबमें वह प्राणी सबसे दुर्लभ है जो मद व माया से रहित होकर परमात्मा की भक्ति में लीन होता है। इसलिए हे विश्व के नाथ! ये बताइये अहंकार रूपी कागभुसुण्डि को यह दुर्लभ भक्ति कैसे मिल गयी। दो0 राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर। नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक शरीर।।54।। व्याख्या : हे नाथ! बताइये रामपरायण अर्थात् आत्मा में लीन, ज्ञान में लीन, गुणों के घर व धीर बुद्धि वाले को कैसे सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि की अवस्था की प्राप्ति हो गयी। अर्थात् भक्ति में लीन होने पर और ज्ञानवान होने पर भी अहंकार का आभास कैसे बच गया। यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।। तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी।। व्याख्या : यह आत्म अनुभूति पवित्र होती है। हे कृपाल! फिर बताइये अहंकार रूपी कागभुसुण्डि को इसकी कैसे प्राप्ति हो गयी। हे काम के शत्रु! आपको यह कैसे अनुभव हुआ? मुझे सब समझाकर कहिए, क्योंकि मुझे बहुत उत्सुकता हो रही है। गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी।। तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।। व्याख्या : ज्ञान का अहंकार तो गुणों की राशि होता है और ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ परमात्मा के निकट रहता है अर्थात् ज्ञान का भाव तो परमात्मा के नजदीक रहता है फिर ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ भाव क्यों सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि के पास गया। और मन के भाव रूपी मुनियों को छोड़कर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि से क्यों आत्म अनुभूति की बात सुनी? कहहु कवन बिधि भा संवादा। दोउ हरि भगत काग उरगादा।। गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।। व्याख्या : हे नाथ! सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि और ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ इन दोनों परमात्मा के भक्तों की बातचीत कैसे हुई? श्रद्धा रूपी पार्वती की सरल वाणी को सुनगर विश्वास रूपी शिव सुख का अनुभव करते हुए आदरपूर्वक बोले। धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।। सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।। व्याख्या : हे सत्य स्वरूप श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम धन्य हो और तुम्हारी बुद्धि पवित्र है। जिसके कारण आत्मा रूपी राम के चरणों में तुम्हारी प्रीति कम नहीं है। अब तुम परम पवित्र आत्म अनुभूति के इतिहास को सुनो -- जिसे सुनने से सब प्रकार के भ्रम का नाश हो जायेगा। उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।। व्याख्या : उस आत्मा की अनुभूति के परम पवित्र इतिहास को सुनने से परमात्मा के चरणों में विश्वास पैदा हो जायेगा तथा सुनने वाले प्राणी बिना परिश्रम के ही भाव रूपी भव सागर को पार कर जायेंगे। दो0 ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ। सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ।।55।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ ने भी सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि के पास ऐसे ही सब प्रश्न किए थे। अत: हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम मन लगाकर सुनो-मैं वो सब आदरपूर्वक कहता हूँ। मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।। प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा।। व्याख्या : हे सुमुखी! सुलोचनी अर्थात् दिव्य दृष्टि वाली! तुम वो सब प्रसंग सुनो - जिस प्रकार मैंने भावों का नाश करने वाली आत्म अनुभूति की कथा सुनी है। पहले तुम (श्रद्धा) सत्य स्वरूप सती दक्ष (चतुराई) भाव के यहाँ अवतरित हुई। अर्थात् श्रद्धा का भाव चतुराई से पैदा हुआ। तब श्रद्धा का स्वरूप सत्य (सती) का था। दच्छ जग्य तव भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।। मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा।। व्याख्या : जब दक्ष के यज्ञ में अर्थात् चतुराई के भाव रूपी यज्ञ में सत्य में विक्षोभ पैदा हो गया तो सत्य (सती) का भाव मिट गया अर्थात् सत्य (सती) भाव विक्षुब्ध होकर मिट गया। तब मुझ विश्वास रूपी शिव के अनुचरों ने चतुराई के यज्ञ को भंग कर दिया। वो सब प्रसंग तो तुम्ह सब जानती हो। तब अति सोच भयउ मन मोरे। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।। सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कोतुक देखत फिरउँ बेरागा।। व्याख्या : तब मुझ विश्वास के भाव के मन में विशेष चिंता हो गयी और तुम्हारे (सत्य स्वरूप श्रद्धा) वियोग से मैं (विश्वास) दु:खी हो गया। तब मैं विरक्त भाव से सुन्दर वन, पर्वत, नदी और तालाबों का दृश्य देखता फिरता था। अर्थात् विश्वास का भाव श्रद्धा के अभाव में नाना तर्क रूपी वन, पर्वत, नदी व तालाबों का दृश्य देखता फिरता था। गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुंदर भूरी।। तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।। व्याख्या : इन चौपाइयों में सात्विक अहंकार के निवास स्थान को बताया गया है कि मस्तिष्क के सुमेर पर्वत यानि ब्रह्म रन्ध्र कोश से थोड़ा उत्तर दिशा में नील कोशिकाओं का एक सुन्दर समूह (पर्वत की तरह दिखने में) होता है। उसी नील कोशिकाओं रूपी पर्वत पर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि का निवास होता है। उन नील कोशिकाओं रूपी पर्वत पर कनकमय अर्थात् सुन्दर सहज रुपी इच्छाओं के शिखर होते हैं, जो विश्वास रूपी शिव के मन को भी बहुत अच्छे लगते हैं। तिन्ह पर एक-एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।। सैलोपरि सरि सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।। व्याख्या : नील-कोशिकाओं पर चार प्रकार की दृढ़ इच्छा रूपी वृक्ष होते हैं। अर्थात् वहाँ से चार प्रकार की इच्छाएँ पैदा होती हैं। बट वृक्ष से परमात्मा के प्रति दृढ़ भक्ति की इच्छाएँ, पीपल के वृक्ष से परमात्मा के प्रति ध्यान की इच्छा पाकर के वृक्ष से जप करने की इच्छा और आम के वृक्ष से सात्विक भोगों की इच्छा पैदा होती हैं। ये चार वृक्ष इन चार प्रकार की इच्छाओं के प्रतीक ही हैं। उस नील कोशिकाओं रूपी पर्वत पर एक सुंदर तालाब होता है अर्थात् वहाँ से एक विशेष रसायन का स्राव होता है जिससे मन की सीढ़ियाँ बनती हैं, जो मन को भी मोहित कर लेती हैं। दो0 सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग। कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग।।56।। व्याख्या : नील-कोशिकाओं से स्रवित होने वाले रसायन से सुन्दर तालाब बना हुआ है जिसका जल शीतल, निर्मल व मीठा है तथा उसमें बहुत सी कोशिका रूपी कमल खिले हुए होते हैं। वहाँ पर श्वास हंसाकार चलती है और भ्रमरों की मधुर गुंजार सुनायी पड़ती है। श्वास का हकार सकार मय चलना ही हंसों का बोलना बताया गया है। तेहि गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।। माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।। व्याख्या : उस सुंदर नील-कोशिकाओं रूपी पर्वत पर सात्विक अहंकार रूपी पक्षी निवास करता है। जिसका नाश कल्पांत अर्थात् कल्पानाओं का अन्त होने पर भी सात्विक अहंकार का अंत नहीं होता है अर्थात् अहंकार यानि अहम भासति अहंकारं अर्थात् ""मैं"" का आभास बना ही रहता है। माया से उत्पन्न गुण व दोष अनेक होते हैं, जैसे मोह, काम आदि अविवेक। रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।। तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।। व्याख्या : मोह, कामादि का प्रभाव समस्त जगत में छा रहा है परन्तु उस नील-कोशिका रूपी पर्वत के निकट इन सांसारिक भावों का प्रभाव नहीं व्याप्त है। वहाँ रहकर सात्विक अहंकार जिस प्रकार परमात्मोन्मुखी रहता है, वो सब कथा को हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम अनुराग सहित सुनो --। पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।। आँब छाँह कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि पीपल के नीचे परमात्मा का ध्यान करता है अर्थात् नील-कोशिकाओं में से ध्यान की इच्छा पैदा होकर सात्विक अहंकार को परमात्मा के ध्यान में मगन कर देती है। पाकर के वृक्ष के नीचे जप यज्ञ करता है अर्थात् जप की सहज वृति को पाकर हकार सकार मय जप में लीन रहता है। आम के वृक्ष की छाया में मानसिक पूजा करता है अर्थात् मन की चेतना को परमात्मा में लगाकर लीन रहता है। इस प्रकार परमात्मा की पूजा के अलावा सात्विक अहंकार का दूसरा कोई काम नहीं होता है। बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।। राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।। व्याख्या : बरगद के वृक्ष के नीचे सात्विक अहंकार का भाव परमात्मा की कथाओं का वर्णन करता है अर्थात् सात्विक अहंकार के भाव में परमात्मा के गुणगान करने की दृढ़ गहरी इच्छा पैदा हो जाती है, जिसे वहाँ रहने वाले (नील कोशिकाओं पर रहने वाले भाव) पक्षियों रूपी भाव सुनते रहते हैं। परमात्मा के चरित तो नाना प्रकार के होते हैं, जिनका सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि आदरपूर्वक गान करते हैं। सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।। जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।। व्याख्या : सब निर्मल बुद्धि वाले हंस (हकार सकार से उत्पन्न भाव ही निर्मल बुद्धि वाले हंस कहलाते हैं) परमात्मा की पवित्र कथा को उस सरोवर में रहकर सुनते रहते हैं। जब मैंने (विश्वास रूपी शंकर) जाकर यह खेल देखा तो मेरे हृदय में विशेष आनन्द पैदा हो गया। दो0 तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास। सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास।।57।। व्याख्या : तब मैंने (विश्वास के भाव ने) हकार सकारमय होकर वहाँ निवास किया और आदरपूर्वक परमात्मा के गुणों को सुना। फिर उसके बाद मैंने कैलाश पर अर्थात् पुन: कैवल्य के उल्लास की अवस्था को प्राप्त कर लिया। गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।। अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने सब इतिहास तुमको बता दिया है जिस समय मैं सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि के पास गया था। अब तुम उस कथा को सुनो -- जिस कारण से ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि के पास गया था। जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।। इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जब आत्मा रूपी राम ने भाव द्वन्द्व किया तो उस अवस्था के चरित को देखकर मुझे अभी भी लज्जा होती है। चित रूपी इन्द्र को वश में कर लेने वाले तामसिक अहंकार से जब आत्मा रूपी राम बँध गए अर्थात् तामसिक अहंकार से जब आच्छादित हो गए तो मन के नारद भाव ने तामसिक अहंकार से मुक्त कराने के लिए ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ को भेजा। बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।। प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।। व्याख्या : जब तामसिक अहंकार के बंधन को काटकर ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ भाव चला गया तो उसके हृदय में बहुत विषाद अर्थात् मोह का भ्रम पैदा हो गया। आत्मा रूपी राम पर तामसिक अहंकार के प्रभाव का ज्ञान अहंकार नाना प्रकार से विचार करने लगा। ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।। सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार का गरुड़ रूपी भाव विचार करने लगा कि आत्मा व्यापक, विकाररहित, वाणी का मूल, माया व मोह से परे ब्रह्म स्वरूप होती है और आत्मा से ही जगत का अवतरण होता है। परन्तु तामसिक अहंकार द्वारा आच्छादित होने पर मैंने (ज्ञान अहंकार) आत्मा का कोई प्रभाव नहीं देखा। दो0 भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम। खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम।।58।। व्याख्या : जिस परमात्मा का नाम जपकर जीव भावों के बंधन से छूट जाते हैं। उन्हीं को तामसिक अहंकार रूपी आसुरी भाव ने आच्छादित कर दिया। नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।। खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ भाव ने नाना प्रकार से अपने मन को समझाने का प्रयास किया परन्तु ज्ञान हो नहीं पा रहा था क्योंकि भ्रम छा गया था। भ्रमवश मन में तर्क का बल बढ़ गया और तुम्हारी तरह ही मोह के वश में हो गया। ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।। सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ भाव व्याकुल होकर मन के नारद भाव के पास गया और अपने मन के संशय को बताया। मन के नारद भाव को यह सुनकर बहुत दया आयी और बोला कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! आत्मा रूपी राम की माया बहुत प्रबल होती है। जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआईं बिमोह मन करई।। जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।। व्याख्या : जो ज्ञानियों के चित को भी हर लेती है और जबरदस्ती मन में बड़ा भारी मोह पैदा कर देती है। जिस माया ने मन के नारद भाव को भी कई बार नचाया है, हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! वो माया ही आपको व्यापी है। महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।। चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।। व्याख्या : तुम्हारे हृदय में विशाल मोह पैदा हो गया है, जो मेरे समझाने से जल्दी से नहीं जायेगा। इसलिए हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! तुम चतुरानन अर्थात् तम, रज, सत गुणों को छोड़कर गुणातीत रूपी चतुरानन के पास जाओ अर्थात् गुणातीत अवस्था में बरतो और वहाँ जाकर अर्थात् गुणातीत अवस्था में पहुँचकर प्रेरणा के अनुसार करो। तब जाकर ही ज्ञान के अहंकार का भ्रम मिट सकता है। दो0 अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान। हरिमाया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान।।59।। व्याख्या : ऐसा कहकर मन का नारद भाव परमात्मा के गुणों का बखान करते हुए चला गया। मन का नारद भाव बार-बार परमात्मा की माया का वर्णन करते हुए चला। तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।। सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा।। व्याख्या : तब ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ भाव गुणातीत अवस्था रूप ब्रह्मा के पास गया और अपना संशय बताया। गुणातीत बुद्धि रूपी ब्रह्मा ने ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ की बातें सुनकर आत्मा रूपी राम को सिर झुकाया अर्थात् आत्मा के प्रभाव को नमन किया और आत्मा के प्रताप को समझकर बहुत प्रेम छा गया। मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।। हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।। व्याख्या : बुद्धि रूपी विधाता मन में विचार करने लगे कि कवि, कोविद व ज्ञानी सभी माया के वश में होते हैं। पाठकों को मैं यहाँ विधाता के प्रतीक के रहस्य को बता देना चाहता हूँ। वास्तव में विधि अर्थात् क्रिया करने वाला विधाता होता है। बुद्धि से क्रिया (विधि) बनती है इसलिए बुद्धि के भाव को ही विधाता (ब्रह्मा) के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। बुद्धि रूपी विधाता विचार करने लगे कि परमात्मा की माया का असीम प्रभाव होता है, जिसने मुझे (बुद्धि के भाव रूपी ब्रह्मा) भी कई बार नचाया है। अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा।। तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।। व्याख्या : परमात्मा जगतमय हैं और यह जगत मुझ बुद्धि के भावों के अनुसार दिखाई देता है। इसलिए मोह के भाव का पैदा हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तब बुद्धि रूपी ब्रह्मा बोले कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! परमात्मा की प्रभुता को विश्वास रूपी शिव जानते हैं। बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पुछहु जनि काहू।। तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।। व्याख्या : इसलिए ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! तुम विश्वास रूपी शंकर के पास जाओ और विश्वास के भाव के अलावा किसी से कुछ मत पूछो क्योंकि दृढ़ विश्वास का भाव ही मोह को मिटा पाता है। इसलिए तुम्हारा भ्रम विश्वास रूपी शिव से ही मिट पायेगा। बुद्धि रूपी ब्रह्मा की बात सुनकर ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ विश्वास रूपी शिव के पास जाने के लिए चल दिया। दो0 परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास। जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास।।60।। व्याख्या : तब बड़ी आतुरता के साथ ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ मुझ विश्वास रूपी शंकर के पास आया। उस समय मैं भोग इच्छा रूपी कुबेर के पास जा रहा था अर्थात् विश्वास का भाव भोगों की इच्छाओं में रमण करने जा रहा था और तुम श्रद्धा रूपी पार्वती कैवल्य के उल्लास अर्थात् कैलाश पर थी। तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।। सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ ने मुझे (विश्वास के भाव को) नमन किया और अपने मन के संदेह को सुनाया। तब उसकी विनयपूर्वक वाणी सुनकर मैंने प्रेम सहित उससे कहा --। मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।। तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! तुम मुझे रास्ते में मिले हो अर्थात् मैं विश्वास का भाव स्वयं स्थिर नहीं हूँ। ऐसी हालात में तुम्हें कैसे समझा सकता हूँ। तुम्हारे संशयों का नाश तो तब होगा जब तुम बहुत समय तक सत्संग करोगे। सुनिअ तहाँ हरिकथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।। जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।। व्याख्या : तुम वहाँ परमात्मा की कथाओं को सुनो, जिन्हें मुनियों ने नाना प्रकार से गाया है। जिन कथाओं के प्रारम्भ में, मध्य में व अन्त में आत्मा रूपी राम ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं। अर्थात् सब प्रकार से आत्मा की अनुभूति ही उन कथाओं का आधार है। नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई।। जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।। व्याख्या : जहाँ पर नित्य परमात्मा की कथाएँ होती हैं, वहाँ मैं तुम्हें भेजता हूँ, तुम चले जाओ। जिस आत्म अनुभूति की कथा को सुनते ही समस्त संशयों का नाश हो जायेगा और परमात्मा के चरणों में बहुत प्रेम पैदा हो जायेगा। दो0 बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग।।61।। व्याख्या : बिना सत्संग और परमात्मा की कथाओं के बिना मोह नहीं मिटता है तथा बिना मोह के मिटे परमात्मा के चरणों में अनुराग दृढ़ नहीं हो पाता है। मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।। उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।। व्याख्या : और बिना अनुराग के योग, तप, ज्ञान व वैराग्य से भी परमात्मा नहीं मिलते हैं। इसलिए ब्रह्मरन्ध्र की उत्तर दिशा में नील कोशिकाओं रूपी पर्वत है, वहाँ पर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि निर्मलता पूर्वक रहते हैं। राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।। राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।। व्याख्या : वह सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि भाव परमात्मा की भक्ति में प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणों का धाम है और बहुत काल का है। वो निरन्तर आत्मा रूपी राम की अनुभूति कथा को कहते रहते हैं और निरन्तर बहुत से भाव रूपी पक्षी सुनते रहते हैं। जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।। मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सि डिग्री नाई।। व्याख्या : वहाँ (नील कोशिकाओं) जाकर परमात्मा की गुणमय कथाओं को सुनो, जिससे तुम्हारा मोह से उत्पन्न दु:ख दूर हो जायेगा। जब मैंने उसे ज्ञान अहंकार को सब कुछ समझाकर कहा तो वह मुझे नमन करते हुए हर्षित होकर चला गया। ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।। होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खोवै चह कृपानिधाना।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने उसे इसलिए नहीं समझाया था कि मैं परमात्मा की कृपा से उसका मर्म जान गया था। उसने ज्ञान का अहंकार किया होगा, जिसको परमात्मा नष्ट करना चाहते हैं। वास्तव में ज्ञान मोह का नाश करने वाला होता है परन्तु ज्ञान का अहंकार हो जाए तो ज्ञान मोह का संशय भी पैदा कर देता है। कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।। प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।। व्याख्या : फिर कुछ इस कारण से भी मैंने (विश्वास) उसको (ज्ञान अहंकार) मेरे पास नहीं रखा क्योंकि अहंकार का भाव ही अहंकार की भाषा समझ सकता है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा की माया बहुत प्रबल होती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले। दो0 ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान। ताहि मोह माया नर पाँवर करहिं गुमान।।62(क)।। व्याख्या : जो ज्ञानियों में सिरोमणि होकर तीनों प्रकार के गुणों से उत्पन्न भावों को भी ज्ञान द्वारा वश में कर लेता है, उसको भी परमात्मा की माया मोहित कर देती है। फिर साधारण पाँवर जीवों की तो क्या बिसात है? व्यर्थ में ही मूर्ख लोग घमण्ड करते रहते हैं। ।। मास पारायण, अट्ठाईसवाँ विश्राम।। दो0 सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन। अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान।।62(ख)।। व्याख्या : विश्वास रूपी शिव व बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी परमात्मा की माया से मोहित हो जाते हैं। फिर पाँवर जीवों की तो बिसात ही क्या है? इसलिए ऐसा विचार करके मुनि जन परमात्मा का भजन करते रहते हैं। गयउ गरुड़ जहाँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।। देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।। व्याख्या : तब ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ वहाँ गया जहाँ नील कोशिकाओं रूपी पर्वत पर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि निवास करता है। सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि की मति कुण्ठा रहित होती है और हृदय में परमात्मा की अखण्ड भक्ति होती है। नील कोशिकाओं रूपी पर्वत को देखकर ज्ञान अहंकार का मन प्रसन्न हो गया और माया व मोह की चिंताओं का नाश हो गया। करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना।। बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।। व्याख्या : सात्विक भावों के रसायन रूपी तालाब में स्नान करके परमात्मा के गुण गान करने की दृढ़ इच्छा रूपी बरगद के नीचे जाने से ज्ञान अहंकार का हृदय हर्षित हो उठा। वहाँ पर बहुत धीर अनुभवी भाव रूपी पक्षी आत्मा रूपी राम का चरित सुनने के लिए आए। कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।। आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि जब आत्मा रूपी राम की कथा प्रारम्भ करने वाला था, उसी समय ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ वहाँ पहुँच गया। सभी भाव रूपी पक्षियों के राजा ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ को आया देखकर सात्विक अहंकार का भाव सभी भावों के सहित बहुत प्रसन्न हुआ। अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा।। करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ को बहुत सम्मान दिया और स्वागत करके बैठने को सुआसन अर्थात् सात्विकता रूपी आसन दिया। फिर अनुराग सहित ज्ञान अहंकार की पूजा करके अर्थात् ज्ञान अहंकार को संतुष्ट करकेसात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि बहुत मधुर वाणी बोले। दो0 नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज। आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज।।63(क)।। व्याख्या : हे नाथ! आपके दर्शन करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। अब आप आज्ञा दीजिए, मैं वही करूँगा। हे नाथ! आप किस कार्य से यहाँ पधारे हैं। अर्थात् सात्विक अहंकार का भाव ज्ञान अहंकार से पूछना चाहता है कि किस कारण से आप इस पवित्र नील कोशिकाओं रूपी पर्वत पर आए हो। क्योंकि ज्ञान के अहंकार का भाव सात्विकता के पास सामान्यत: नहीं जाता है। दो0 सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस। जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस।।63(ख)।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ बोला कि हे कागभुसुण्डि! आप तो कृतार्थ रूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं विश्वास रूपी शिव ने की है। अर्थात् सात्विक अहंकार का भाव तो सदैव कृतार्थ रूप ही रहता है। विश्वास का भाव भी सात्विक अहंकार की बड़ाई करता है। सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।। देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।। व्याख्या : हे तात्! मैं जिस कारण से आया था, वो सब कार्य तो आपके यहाँ आते ही पूर्ण हो गया। अर्थात् ज्ञान अहंकार की चिंता तो सात्विक अहंकार के पास जाने मात्र से ही मिट जाती है। तुम्हारे परम पवित्र आश्रम को देखकर मेरे नाना संशय व भ्रम मिट गए हैं। वास्तव में ज्ञान के अहंकार के कारण ही जीव को नाना संशय व भ्रम पैदा होते हैं। परन्तु सात्विक अहंकार के पास में आने से ज्ञान के अहंकार में निर्मलता आ जाती है और निर्मलता आते ही संशय व भ्रम मिट जाते हैं। अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।। सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।। व्याख्या : हे तात्! अब मुझे पवित्र आत्मा रूपी राम की कथा को सुनाओ, जो सुख दने वाली व दु:खों के समूहों को मिटाने वाली होती है। हे तात्! मैं बार-बार तुमसे प्रार्थना करता हूँ। जब ज्ञान अहंकार का भाव सात्विक अहंकार के सम्पर्क में आता है तो ज्ञान अहंकार का भाव निर्मल होकर विनयी हो जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।। भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ की सरल, प्रेममयी, सुखदायक व पवित्र विनयी वाणी को सुनकर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि को परम उल्लास हो आया और तब वह परमात्मा के गुणों की कथा को कहने लगा। प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।। पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।। व्याख्या : हे भावों को पैदा करनेवाली श्रद्धा रूपी भवानी! सबसे पहले बहुत अनुराग सहित आत्मा के चरित के प्रतीकों को समझाकर कहा। फिर मन के नारद भाव को जो मोह हुआ उसका वर्णन किया। फिर काम रूपी रावण का कैसे अवतरण होता है, उसको बताया। प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।। व्याख्या : फिर आत्मा के अवतरण की कथा को बताया और बालवत आत्मा के चरित का वर्णन किया। दो0 बालचरति कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह। रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह।।64।। व्याख्या : बालवत आत्मा अर्थात् निर्मल आत्मा के चरित का मन में उत्साह के साथ नाना प्रकार से वर्णन किया। फिर ऋषि आगमन अर्थात् भावों से उत्पन्न रसायनों (हार्मोन्स) का वर्णन करके आत्मा व सुरता के मिलन की कथा कही। बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।। पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम के राज्याभिषेक अर्थात् भावों के आत्मोन्मुखी होने की कथा कही और फिर चित रूपी राजा के वचन के कारण आत्मा के अभिषेक में जो बाधा हुई उसका वर्णन किया। फिर देह रूपी अयोध्या के भाव रूपी लोगों के विरह व विषाद की बात कही और फिर आत्मा व लखन भाव के बीच के संवाद का वर्णन किया। बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।। बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।। व्याख्या : फिर वैराग्य रूपी वन में जाना और कैवल्य रूपी केवट के अनुराग का वर्णन किया। फिर आनन्द रूपी सुरसरि को पार करके तीन गुणों के संगम रूपी प्रयाग का वर्णन किया। फिर आत्मा रूपी राम की बाल समान अवस्था के मिलने का वर्णन किया। फिर ध्यान अवस्था में चित्रकोष रूपी चित्रकूट की अनुभूति का वर्णन किया। सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।। करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।। व्याख्या : फिर सुमंत्रणा रूपी सचिव का वापस देह रूपी नगर में आना और चित रूपी दसरथ के (स्थूल भाव) मरने का वर्णन किया। फिर भाव रत भरत भाव के आगमन व प्रेम का बहुत प्रकार से वर्णन किया। फिर देह रूपी नगर के भाव रूपी लोगों द्वारा चित के स्थूल भाव रूपी दसरथ की अंतिम क्रियाओं का वर्णन किया। फिर भाव रत भरत भाव का आत्मा रूपी राम के पास जाने की अनुभूति का वर्णन किया। पुनि रघुपति बहुबिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।। भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी।। व्याख्या : फिर भाव रत भरत भाव को आत्मा रूपी राम की नाना प्रकार से प्रेरणा करने का वर्णन किया और भाव रत भरत भाव का आत्मोन्मुखी होकर वापस देह रूपी अयोध्या में लौटने का वर्णन किया। फिर भाव रत भरत भाव की अवस्था और चित रूपी इन्द्र की करणी का वर्णन किया। फिर आत्मा रूपी राम व इत्र कोश रूपी अत्रि ऋषि की भेंट का वर्णन किया। अर्थात् इत्र कोश में ध्यान लगने की अनुभूति का वर्णन किया। दो0 कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग। बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग।।65।। व्याख्या : फिर विरोध रूपी विराध भाव को मारने की कथा का वर्णन किया और सरभंग रसायन रूपी सरभंग मुनि द्वारा देह भाव के त्याग की कथा का वर्णन करके सुतीक्ष्ण के प्रेम का वर्णन किया और फिर आत्मा रूपी राम की अगस्त्य अर्थात् भविष्य के लोप के भाव के साथ भेंट का वर्णन किया। कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।। पुनि प्रभु पंचवटी कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।। व्याख्या : फिर दण्डक वन अर्थात् इन्द्रियों के दमन से उत्पन्न पवित्रता की अनुभूति का वर्णन किया और दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध जटायु से मैत्री भाव की अनुभूति को बताया। फिर पंचवटी रूपी कोश में ध्यान लगने पर पंच भूतों की अनुभूति का वर्णन किया और मन के सब भावों की त्रास को दूर करने की अनुभूति का वर्णन किया। पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरुपा।। खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।। व्याख्या : फिर लखन भाव को की गयी प्रेरणा का वर्णन किया और सूर्पनखा रूपी आसुरी भोग इच्छा को कैसे कुरुप किया, उसका वर्णन किया। फिर अज्ञान रूपी खर व द्वेष रूपी दूषण भाव को मारने की अनुभूति का वर्णन किया। फिर काम रूपी रावण द्वारा सब मर्म जान लेने की अनुभूति का वर्णन किया। दसकंधर मारीच बतकही। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।। पुनि माया सीता कर हरना। श्री रघुबीर बिरह कछु बरना।। व्याख्या : फिर दसइन्द्रियों रूपी दस सिरों को धारण करने वाले काम रूपी रावण व आसुरी इच्छा रूपी मारीच के बीच के संवाद का वर्णन किया कि किस प्रकार काम और आसुरी इच्छाओं के बीच बातचीत होती है। फिर माया से उत्पन्न सुरता रूपी सीता के हरण की बात कही और फिर आत्मा रूपी राम के विरह का वर्णन किया। पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।। बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेही बिधि गए सरोबर तीरा।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम ने जिस प्रकार दिव्य दृष्टि रूपी जटायु को अपने में लीन कर लिया और फिर कबंध अर्थात् वासनाओं के बंधन रूपी कबंध का जैसे बध किया और शबर (संतोष) रूपी शबरी को जो गति दी, उसका वर्णन किया। फिर बहुत प्रकार से आत्मा के विरह का वर्णन किया और जिस प्रकार पंपा सरोवर पर गए उसका वर्णन किया। पंपा सरोवर बुद्धि के भावों से उत्पन्न हार्मोन्स का प्रतीक है। दो0 प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग। पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग।।66(क)।। व्याख्या : फिर मन के नारद भाव व आत्मा रूपी राम के संवाद का वर्णन किया और प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की आत्मा रूपी राम से भेंट का वर्णन किया। फिर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव से मैत्री भाव होने का और भोग बल रूपी बालि के मारने की अनुभूति का वर्णन किया। दो0 कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास। बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास।।66(ख)।। व्याख्या : फिर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को बुद्धि के भावों का राजा बनाने की अनुभूति का वर्णन किया और दृढ़ होकर पर्वत पर वर्षाकाल अर्थात् वासना रूपी वर्षा से निर्लिप्त होकर रहने की अनुभूति का वर्णन किया। फिर आत्मा रूपी राम के संयम रूपी क्रोध से बुद्धि रूपी वानरों को डराने की अनुभूति का वर्णन किया। जेहि विधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।। बिबर प्रवेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।। व्याख्या : फिर जिस प्रकार सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने बुद्धि के भावों को सुरता रूपी सीता की खोज में दसों दिशाओं अर्थात् दसों प्राणों में भेजा और फिर कैसे बुद्धि रुपी वानर भँवर गूफा अर्थात् भावों की गूफा में प्रवेश किए और फिर कैसे सम्पाती अर्थात् समता की दिव्य दृष्टि की अनुभूति हुई। इन सब बातों का वर्णन किया गया है। सुनि सब कथा समीर कुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।। लंका कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा।। व्याख्या : फिर प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान सब बातों को सुनकर भाव रूपी भव सागर को लाँघ गया, उस अनुभूति का वर्णन किया। फिर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने जैसे वासना रूपी लंका में प्रेवश किया और सुरता रूपी सीता को जैसे धैर्य बँधाया, उस अनुभूति का वर्णन किया। बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।। आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही की कुसल सुनाई।। व्याख्या : फिर वासना रूपी वन को उजाड़कर काम रूपी रावण को समझाने व पुन: भाव रूपी भव सागर को लाँघने की अनुभूति को बताया। फिर सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों का आत्मा रूपी राम के पास आना और सुरता रूपी सीता की कुशल सुनाने की अनुभूति का वर्णन किया। सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।। मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।। व्याख्या : फिर बुद्धि के भावों रूपी सेना सहित आत्मा रूपी राम जैसे भाव रूपी भव सागर के तट पर उतरे और वैराग्य रूपी विभीषण का भाव आकर जैसे मिला तथा भाव रूपी सागर को वश में करने की अनुभूति का वर्णन किया। दो0 सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार। गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार।।67(क)।। व्याख्या : फिर सद्गुण रुपी सेतु बाँधकर जैसे बुद्धि के भावों रूपी सेना भाव रूपी भव सागर को पार की, उस अनुभूति का वर्णन किया। फिर जिस प्रकार दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद भाव वासना रूपी लंका में दूत बनकर गया, उसका वर्णन किया। दो0 निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार। कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार।।67(ख)।। व्याख्या : फिर आसुरी भावों और बुद्धि के भावों के बीच होने वाली लड़ाई की अनुभूति का वर्णन किया। फिर आलस्य रूपी कुंभकर्ण व तामसिक अहंकार रूपी मेघनाद के बल व नाश की अनुभूति का वर्णन किया। निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।। रावन बध मंदोदरी सोका। राज बिभीषन देव असोका।। व्याख्या : फिर आसुरी भावों की सेना का नाना प्रकार से मरण की अनुभूति का वर्णन किया। फिर आत्मा रूपी राम व काम रूपी रावण की लड़ाई का वर्णन किया। फिर काम रूपी रावण के मरने व मन के अन्दरी वाली आसुरी बुद्दि रूपी मन्दोदरी के शोक की अनुभूति का वर्णन किया। फिर वैराग्य रूपी विभीषण को दु:खों से मुक्त भोग वासना रूपी लंका का राजा बनाने की अनुभूति का वर्णन किया। सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी।। पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के मिलने की अनुभूति का वर्णन किया। फिर देव भावों द्वारा जो स्तुतियाँ की उनका वर्णन किया। फिर इच्छा रूपी पुष्पक विमान पर चढ़कर बुद्धि के भावों सहित देह रूपी अयोध्या में आत्मा रूपी राम के आने की अनुभूति का वर्णन किया। जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए।। कहेसि बहोरि राम अभिषेका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।। व्याख्या : फिर जिस प्रकार आत्मा रूपी राम देह रूपी अयोध्या में वापस आए, उस सब अनुभूति का सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि ने विस्तार से वर्णन किया। फिर आत्मा रूपी राम के राजतिलक अर्थात् भावों का अधिष्ठाता होने की अनुभूति का वर्णन किया और फिर नाना प्रकार से नर (धड़कन) के प्रभाव का वर्णन किया। कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।। सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि ने समस्त ध्यान में होने वाली आत्मा की अनुभूति की कथा को बताया। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जो मैंने तुमको बतायी थी। आत्मा रूपी राम की कथा सुनकर अर्थात् आत्म अनुभूति की कथा सुनकर ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ ने परम उल्लास के साथ कहा। सो0 गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक।।68(क)।। व्याख्या : आत्म अनुभूति की कथा को सुनकर मेरे समस्त संशय मिट गए हैं। हे अहंकार में शिरोमणि सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! मेरा अब आपकी प्रेरणा (कृपा) से परमात्मा के चरणों में प्रेम हो गया है। सो0 मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि। चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन।।68(ख)।। व्याख्या : भाव द्वन्द्व के युद्ध में आत्मा रूपी राम को तामसिक अहंकार से उत्पन्न वासनाओं से आच्छादित देखकर मुझे मोह हो गया था कि सतचित आनन्द स्वरूप परमात्मा किस कारण से तामसिक अहंकार से उत्पन्न वासनाओं से व्याकुल हो गया। देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।। सोई भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।। व्याख्या : नर की धड़कन के अनुसार आत्मा के चरित को प्रभावित देखकर मुझे बहुत संशय हो गया था। परन्तु उस संशय के कारण अब मेरा कल्याण हो गया कि परमात्मा ने कृपा करके मुझे ज्ञान करा दिया। जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई।। जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही।। व्याख्या : जो धूप से अत्यन्त व्याकुल होता है, वही छाया के सुख को जान पाता है। इसलिए मुझे अगर मोह (भ्रम) नहीं होता तो हे तात! तुम मुझे किस प्रकार मिलते? सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।। निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा।। व्याख्या : अगर मुझे भ्रम नहीं होता तो मैं कैसे माया का हरण करने वाली आत्म अनुभूति की विचित्र कथा को कैसे सुनता? वेद, शास्त्र और पुराणों का यही मत है, सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं कि इसमें संदेह नहीं है । संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।। राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ।। व्याख्या : निर्मल संत तब ही मिलते हैं, जब परमात्मा कृपा करके चित में अवतरित हो जाते हैं। परमात्मा की कृपा से आपका (सात्विक अहंकार का) दर्शन हुआ है और आपकी कृपा (प्रेरणा) से ही मेरे संशय मिटे हैं। दो0 सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग। पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग।।69(क) व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ की विनय और अनुराग से सनी हुई वाणी को सुनकर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि भाव पुलकित हो उठा और आँखों में प्रेम जल भर आया तथा बहुत प्रसन्न हुआ। वास्तव में जब ज्ञान के अहंकार का भाव विनयी व अनुरागयुक्त हो जाता है तो सात्विक अहंकार स्वत: प्रसन्न व पुलकित हो उठता है। दो0 श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास। पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास।।69(ख)।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! सु बुद्धि, सुशील, पवित्र कथा के प्रेमी व परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित श्रोता को पाकर सज्जन लोग अति गोपनीय रहस्य को भी प्रकट कर देते हैं। बोलेउ काकभुसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।। सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि ने फिर कहा -- ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ (ज्ञान का अहंकार मस्तिष्क में ही रहता है इसलिए उसे नभग अर्थात् मस्तिष्क निवासी कहा गया है) पर उसका प्रेम कम नहीं था -- हे नाथ! तुम सब प्रकार से मेरे लिए पूज्यनीय हो और परमात्मा की कृपा प्राप्त करने के पात्र हो अर्थात् अधिकारी हो। तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया।। पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।। व्याख्या : आपको न तो संशय है और न मोह व माया ही है। हे नाथ आपने तो मुझ पर दया की है। परमात्मा ने मुझे बड़ाई देने के लिए तुमको मोह के भ्रम के बहाने से मेरे पास भेजा है। तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।। नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।। व्याख्या : हे भाव रूपी पक्षियों के स्वामी! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाईं (इन्द्रियों के स्वामी)! यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मन का नारद भाव, विश्वास रूपी शिव, बुद्धि रूपी ब्रह्मा व गुणशील रूपी सनकादि जो आत्म तत्व के मर्मज्ञ और उसका उपदेश करने वाले मन के श्रेष्ठ भाव हैं। मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।। तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।। व्याख्या : मोह ने किस किस को अंधा नहीं किया और जगत में ऐसा कौन है, जिसे काम के भाव ने नचाया नहीं हो। तृष्णा ने किसको मतवाला (बावला) नहीं बनाया? क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया? दो0 ग्यानी तापस सुर कबि कोबिद गुन आगार। केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।।70(क)।। व्याख्या : इस संसार में ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान व गुणों का धाम है, जिसकी लोभ ने मिट्टी पलीद न की हो। दो0 श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि।।70(ख)।। व्याख्या : लक्ष्मी (धन) के मद ने किसको टेढ़ा व प्रभुता ने किसको बहरा नहीं कर दिया? संसार में ऐसा कौन है जिसे सुन्दर नयनों वाली सुन्दर स्त्री के नयनों के बाण न लगे हों? गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।। जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा।। व्याख्या : गुणों (सत, रज, तम) का किया हुआ सन्निपात किसको नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान व मद ने अछूता छोड़ा हो। यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया? ममता ने किसके यश का नाश नहीं किया? मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।। चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।। व्याख्या : मत्सर ने किसको कलंक नहीं लगाया? किसको दु:खों की हवा ने विचलति नहीं किया? चिंतारूपी साँपिन ने किसे नहीं खा लिया? जगत में ऐसा कौन है जिसे माया न व्यापी हो? कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।। सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी।। व्याख्या : मनोरथ रूपी कीड़ा है और शरीर रूपी लकड़ी है। अत: संसार में ऐसा कौन धीर पुरुष है जिसके लकड़ी रूपी शरीर में मनोरथ रूपी कीड़ा नहीं लगा हो? पुत्र, धन व लोक प्रतिष्ठा की तीन इच्छाओं ने किसकी बुद्धि को मलीन नहीं कर दिया? यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।। सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं।। व्याख्या : यह सब माया का बड़ा परिवार है, जो बहुत बलवान व अपार है, जिसका वर्णन कौन कर सकता है? विस्वास रूपी शिव व सहज बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी जिससे डर जाते हैं अर्थात् प्रभावित हो जाते हैं फिर साधारण जीवों (भावों) की तो क्या बात है? दो0 ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड। सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।।71(क)।। व्याख्या : माया के भावों की प्रचण्ड सेना संसार में छायी हुई है, जिसके काम आदि भाव सेनापति हैं और दम्भ, कपट व पाखण्ड योद्धा हैं। दो0 सो दासी रघुबीर के समुझे मिथ्या सोपि। छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि।।71(ख)।। व्याख्या : वह माया परमात्मा की दासी है। हालाँकि समझ लेने पर वह मिथ्या ही है परन्तु बिना परमात्मा की कृपा के उससे छुटकारा नहीं मिल पाता है। हे नाथ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ। जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।। सोइ प्रभु भ् डिग्री बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।। व्याख्या : जो माया समस्त जगत को नाच नचाती है और जिसके मर्म को कोई नहीं जान पाता है। वही माया परमात्मा की भृकुटि के इशारे से अपने भाव रूपी समाज सहित नटी की तरह नाचती है। सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा।। ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम वही सतचित आनन्द स्वरूप हैं, जो अजन्मा, विज्ञान रूप, व बल के धाम हैं। आत्मा रूपी राम सर्वव्यापक व सर्वरूप, अखण्ड, अनन्त, अखिल व अमोघ शक्ति वाले भगवंत अर्थात् प्रकृति को वश में करने वाले हैं। अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवध अजीता।। निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।। व्याख्या : वह (आत्मा) निर्गुण, महान, वाणी व इन्द्रियों से परे, सब कुछ देखने वाला, निर्दोष, अजेय, ममता रहित, निराकार, निर्मोही, नित्य, निरंजन व सुख की राशि है। प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।। इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।। व्याख्या : परमात्मा प्रकृति से परे व सबके हृदय में निवास करने वाले हैं। वे निरइच्छा ब्रह्म, दोष रहित व अविनाशी होते हैं। इसलिए आत्मा रूपी राम में मोह का कारण नहीं है। क्या अंधाकर समूह कभी सूर्य के सामने जा सकता है? दो0 भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।72(क)।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम नर (धड़कन) के रूप में शरीर को धारण करने वाले हैं और भक्त की भावना के अनुसार भगवान अर्थात् भग अ प्रकृति अ वान उ वाला यानि भक्त की भावना के अनुसार प्रकृति के माध्यम से आभासित होने वाले भगवान हैं। आत्मा ही नर की धड़कन के माध्यम से पवित्र चरित करती रहती है। दो0 जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोई। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोई।।72(ख)।। व्याख्या : जैसे कोई नृत्यु करने वाला नट अनेक भेष धारण करके नृत्य करता है और जैसा भेष होता है, उसी के अनुसार भाव दिखलाता है, परन्तु स्वयं उनमें से कोई नहीं होता है। उसी प्रकार परमात्मा नर की धड़कन के माध्यम से भावों के अनुसार नाना चरित दिखाता रहता है। असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।। जे मति मलिन बिषय बस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! परमात्मा की लीला ऐसी होती है कि वो आसुरी भावों को मोह में डालने वाली होती है और भक्त जनों को सुख देने वाली होती है। इसलिए जिनकी बुद्धि मलिन और काम विषयों में लिप्त होती है, वे ही लोग परमात्मा में माया का आरोपण करते हैं। नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।। जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।। व्याख्या : जब जिसको नेत्रों का दोष होता है, तब वो चन्द्रमा को पीले रंग का कहने लगता है। हे भाव रूपी पक्षियों के स्वामी! जब किसी को दिशा भ्रम हो जाता है, तब वह सूर्य को पश्चिम में उदय हुआ कहता है। नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।। बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।। व्याख्या : नौका पर चढ़ा हुआ व्यक्ति जगत को चलता हुआ देखता है और अज्ञान के मोहवश स्वयं को अचल जानता है। चक्कर खाता हुआ बालक घर आदि को घूमता देखने लगता है। इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को झूठा कहते हैं। इसी प्रकार माया जीव में व्याप्त होती है परन्तु मोहवश लोग परमात्मा में आरोपण कर देते हैं। हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।। मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! परमात्मा के बारे में भी मोह की कल्पना ऐसी ही है। परमात्मा में तो सपने में भी अज्ञान नहीं हो सकता है। किन्तु जो जीव माया के वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदय पर अज्ञान रूपी अनेकों परदे लगे हैं। ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।। व्याख्या : वे मूर्ख लोग हठ वश परमात्मा में मोह का संशय करते हैं और स्वयं के अज्ञान का आत्मा रूपी राम पर आरोपण करने लगते हैं। दो0 काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुख रूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप।।73(क)।। व्याख्या : जो काम क्रोध, मद व लोभ में रत हैं और दुख रूप घर में आसक्त हैं, वे अज्ञान रूपी कुएँ में पड़े हुए मूर्ख लोग कैसे परमात्मा को जान सकते हैं? दो0 निर्गुण रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होई।।73(ख)।। व्याख्या : निर्गुण रूप सहजता से समझ में आ जाने वाला होता है परन्तु परमात्मा के सगुण स्वरूप को कोई नहीं जानता। इस दोहे में बहुत ही गम्भीर रहस्य लिखा गया है। परमात्मा को निर्गुण रूप में समझना आसान होता है परन्तु परमात्मा के सगुण चरित को समझना बहुत कठिन कार्य है। क्योंकि गुणों में परमात्मा को देखा नहीं जा सकता है और गुणों का आभास देह व इन्द्रियों से ही सम्भव है। जबकि परमात्मा तो गोतीत हैं। इसलिए परमात्मा के सुगम-अगम सगुण चरितों को समझने के प्रयास में मुनियों को भ्रम हो जाता है। सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।। जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! परमात्मा की प्रभुता को सुनिए। मेरी बुद्धि के अनुसार मैं वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो! जिस प्रकार मुझे मोह (अज्ञान) हुआ, वो सब कथा भी सुनाता हूँ। राम कृपा भाजन तुम्ह त्राता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।। ताते नहिं कछु तुम्हहि दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।। व्याख्या : हे तात! आप परमात्मा की कृपा के पात्र हैं। परमात्मा के गुण-गान में प्रेम ही मुझे सुख देने वाला है। इसलिए मैं तुम से कुछ भी नहीं छुपाऊँगा और परम रहस्य जो मन का हरण करने वाले हैं, उनका बखान करूँगा। सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।। संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।। व्याख्या : हे तात्! आप आत्मा रूपी राम के सहज स्वभाव को सुनिए - वे भक्त के अभिमान को नहीं रहने देते हैं। क्योंकि अभिमान ही संशयों का मूल, कष्टों को पैदा करने वाला व समस्त शोकों को पैदा करने वाला होता है। ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी।। जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं।। व्याख्या : इसलिए परमात्मा अपने भक्त को अभिमान से दूर कर लेते हैं। क्योंकि जो परमात्मोन्मुखी साधक होता है, उस पर परमात्मा की बहुत ममता होती है। हे गोसाईं! जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाता है, तो माता कठोर हृदय करके उसको चिरा डालती है। उसी प्रकार परमात्मा कठोर हृदय करके भक्त को अभिमान से दूर कर देते हैं। दो0 जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर। ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर।।74(क)।। व्याख्या : हालाँकि प्रथम में तो बालक अधीर होकर रोता है परन्तु रोग के नाश के लिए माता बच्चे की पीड़ा पर ध्यान नहीं देती है। दो0 तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि। तुलसीदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि।।74(ख)।। व्याख्या : इसी प्रकार परमात्मा अपने भक्त के कल्याण के लिए उसके अभिमान का हरण कर लेते हैं। इसलिए तुलसीदास भी अनुभव करके कहते हैं कि ऐसे परमात्मा को अज्ञान छोड़कर क्यों नहीं भजना चाहिए अर्थात् हर हालात में दयालु परमात्मा को भजना चाहिए यानि शरण में रहना चाहिए। राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।। जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं।। व्याख्या : परमात्मा की कृपा और मेरी मूर्खता के बारे में बताता हूँ। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! मन लगाकर सुनो --। जब-जब परमात्मा मन के सूक्ष्म रूप में शरीर धारण करते हैं अर्थात् जो आत्म् ऊर्जा होती है, वो मन के भावों के अनुसार शरीर धारण करती है। तब परमात्मा की शक्ति (ऊर्जा) भक्त अर्थात् साधक की भावना के अनुसार नाना लीला करने लगती है। तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।। जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।। व्याख्या : तब-तब मैं सात्विक अहंकार का भाव देह रूपी अयोध्या में जाता हूँ और आत्मा रूपी राम के बाल चरित को देखकर हर्षित होता हूँ। मैं जन्म के उत्सव को जाकर देखता हूँ अर्थात् आत्मिक ऊर्जा जब मन के भावों के अनुसार शरीर धारण करती है, तो सात्विक अहंकार का भाव आत्मिक ऊर्जा के चरितों व शरीर धारण करने की क्रिया का आनन्द लेता है। उस अवस्था में सात्विक अहंकार पाँच इन्द्रियों में लुभाया रहता है अर्थात् पाँच इन्द्रियों के माध्यम से सात्विक अहंकार आत्मा रूपी राम के बाल चरित का आनन्द लेता रहता है। इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।। निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उर गारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का बाल स्वरूप अर्थात् बालवत आत्म ऊर्जा सात्विक अहंकार का इष्टदेव होती है। उस बाल्य अवस्था की आत्म ऊर्जा करोड़ों कामदेव के समान शोभा वाली होती है। उस अवस्था में साधक का सात्विक अहंकार अपने स्वंय के शरीर में ही आत्मा रूपी राम को देखकर अपने दिव्य लोकों को संतुष्ट करता है। लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बाल चरित बहु रंगा।। व्याख्या : उस अवस्था में सात्विक अहंकार आत्मा रूपी राम के साथ शरीर का आभास करता हुआ आत्मिक ऊर्जा के नाना चरितों को देखने लगता है अर्थात् सात्विक अहंकार आत्मिक ऊर्जा के प्रभाव को आभासित करने लगता है। दो0 लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ। जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75(क)।। व्याख्या : बाल्य अवस्था में आत्मिक ऊर्जा जहाँ-जहाँ रमण करती है, वहीं-वहीं सात्विक अहंकार का भाव भी रमण करने लगता है और आत्मिक ऊर्जा से उत्पन्न भावों को ग्रहण करने लगता है। उसी को जूठन उठाकर खाना बताया गया है। दो0 एक बार अतिसय सब चरति किए रघुबीर। सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75(ख)।। व्याख्या : एक बार आत्मा रूपी राम ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किए। परमात्मा की उस लीला को याद करके सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि का शरीर पुलकित हो उठा। पाठकों को यहाँ अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। वास्तव में जब आत्मिक ऊर्जा मन के सूक्ष्म भावों के अनुसार शरीर धारण करती है तो सात्विक अहंकार का भाव आत्मा का अनुसरण करता रहता है। परन्तु धीरे-धीरे जब आत्मिक ऊर्जा से उत्पन्न भाव और संसार के भाव मिल जाते हैं तो भावों की अवस्था के अनुसार ही सात्विक अहंकार भी राजसिक या तामसिक अहंकार का रूप धारण करता चला जाता है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। कहइ भुसुंड सुनहु खगनायक। राम चरित सेवक सुखदायक।। नृप मंदरि सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि कहते हैं कि हे भाव रूपी पक्षियों के स्वामी ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! सुनो -- आत्मा के चरित सुख देने वाले होते हैं. नृप मंदिर अर्थात् नर की धड़कन मन के अन्दर (मन्दिर) सब प्रकार से सुंदर भाव पैदा करती रहती है जो माया (कनक) के नाना प्रकार के भावों से मन का चिंतन कराती रहती है। बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।। बाल बिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।। व्याख्या : भावों की उस सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता है जहाँ आत्मा रूपी राम भाव रत भरत, लखन रूपी लक्ष्मण व कामादिनाशक शत्रुघ्न रूपी भाईयों के साथ सहजता का चरित करते हैं। बाल विनोद अर्थात् परम सहजता का चरित करते हैं और हृदय रूपी आँगन में सहज होकर विचरण करते हुए नाड़ियों रूपी माताओं को सुख देते हैं। अर्थात् उस अवस्था में नाड़ियाँ भी सहज होकर आनन्द की भाव अवस्था में रहती हैं। मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।। नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।। व्याख्या : इन चौपाइयों में आत्मा के स्वरूप का प्रतीकों का सहारा लेकर वर्णन किया गया है। आत्मा का आभास मरकत मणि के समान कोमल व श्याम वर्ण जैसा होता है और अंग-अंग में बहुत से कामदेवों की शोभा का आभास होता है अर्थात् आत्मा की ऊर्जा से उत्पन्न भावों में काम के भाव शोभा पाने लगते हैं। नये कमल के समान आत्मा रूपी राम के चरण लगने लगते हैं। परमात्मा को कमल के प्रतीकों के माध्यम से ही ज्यादातर कवियों ने समझाया है। प्रत्येक साधना पंथों में भी चक्रों की जागृति को कमल खिलने के प्रतीकों के माध्यम से ही बताया गया है। इसलिए यहाँ भी आत्मा के चरणों को कमल का ही प्रतीक दिया गया है। पैरों के नाखूनों से निकलने वाली ज्योति चन्द्रमा की कान्ति को हरने वाली है और अंगुलियाँ सुन्दर हैं। ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी।। चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा का बहुत ही सुखद स्वरूप आभासित होने लगता है। उसी का प्रतीकों के माध्यम से वर्णन करते हुए कहा गया है कि तलवे में बज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल के चार सुन्दर चिन्ह हैं और चरणों में मधुर ध्वनि करने वाले नुपूर हैं, मणियों, रत्नों से जड़ी हुई सोने की बनी हुई सुन्दर करधनी का शब्द सुहावना लग रहा है अर्थात् उस अवस्था में नाना मधुर ध्वनियाँ सुनने में आने लगती हैं। दो0 रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर। उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर।।76।। व्याख्या : नाभी सुन्दर व गम्भीर है तथा पेट पर तीन गुणों की सहज (सुंदर) रेखा है तथा हृदय स्थल पर बाल भाव रूपी आभूषण सुशोभित हैं। वास्तव में परम ध्यान की अवस्था में मणिपूरक (नाभीमण्डल) चक्र बहुत गम्भीर व सहज हो जाता है मणिपूरक चक्र से उठने वाले भाव (सत, रज व तम) सहज हो जाते हैं और उस अवस्था में हृदय में भी सहज भाव सुशोभित होने लगते हैं। अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।। कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।। व्याख्या : लाल-लाल हाथों की हथेलियाँ, नख व अँगुलियाँ मन को हरने वाले हैं। भाव रूपी विशाल भुजाएँ सुन्दर आभूषण हैं। कंधे बाल सिंह के समान और शंख के समान गर्दन है। सुन्दर ठुड्डी है और मुख तो छबि की सीमा है। अर्थात् आत्मा का दिव्य व मनमोहक स्वरूप होता है। आत्मा सहज निर्भय होती है इसलिए सिंह के बच्चे का प्रतीक लिया गया है। कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे।। ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।। व्याख्या : तोतले बचन हैं अर्थात् आत्मा तो प्रेरणा की भाषा ही बोलती है, इसलिए तोतले वचन कहे गए हैं। लाल-लाल होठ हैं अर्थात् दिव्य स्वरूप है। दो-दो अर्थात् कर्मेन्द्रि और ज्ञानेन्द्री रूपी दस निर्मल व उज्ज्वल इन्द्रियाँ हैं। सुन्दर गाल व मनोहर नाक है और सब सुखों को देने वाली चन्द्रमा के समान मुस्कान है अर्थात् सहज अवस्था का आनन्द है। नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।। बिकट भ्रृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।। व्याख्या : नील कमल के समान नेत्र अर्थात् नील कोशिकाओं के जागृत हो जाने पर भावों से उत्पन्न कष्टों का निवारण हो जाता है जिससे भृकुटि पर तीनों गुणों (सत, रज व तम) के ऐक्य (त्रि अ एक उ तिलक) की अवस्था आ जाती है जिससे गो यानि इन्द्रिया रोचन अर्थात् सहज हो जाती हैं। उस अवस्था में भृकुटि विशाल हो जाती है अर्थात् दिव्य भावों की अवस्था आ जाती है और सम्यक श्रवण की अवस्था आ जाती है। उस अवस्था में आसक्ति रूपी बाल संकुचित हो जाते हैं अर्थात् आसक्ति सहजता में बदलकर शोभा देने लगती है। पीत झीनी झगुली तब सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।। रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी।। व्याख्या : पीली और महीन झँगुली अर्थात् वैराग्य व सहजता रूपी झँगुली आत्मा रूपी राम के शरीर पर शोभा दे रही है और आत्मा की प्ररेणा रूपी किलकारी और चितवन मुझ सात्विक अहंकार को बहुत प्रिय लगती है। रूप की राशि आत्मा रूपी राम चित रूपी राजा अर्थात् धड़कन के आँगन में निज प्रतिबिम्ब को देखकर नाचते हैं अर्थात आत्मा नर की धड़कन (नृप) के अनुसार अपनी सहजता में बरतती है। मोहि सन करहिं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।। किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम मुझ सात्विक अहंकार के साथ नाना प्रकार की लीला करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते हुए मुझे लज्जा आती है। जब आत्मा रूपी राम मुझे प्रेरणा रूपी किलकारी मार कर पकड़ने को दौड़ते हैं, तो मैं सात्विक अहंकार दूर भाग जाता हूँ। तब वे मुझे सुख भोग रूपी पूप दिखाते हैं। दो0 आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं। जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं।।77(क)।। व्याख्या : मेरे (सात्विक अहंकार) निकट आने पर आत्मा रूपी राम हँसने लगते हैं और दूर भागने पर रोने लगते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करने पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिर कर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं। अर्थात् जब मैं सात्विक अहंकार आत्मा में लीन होना चाहता हूँ तो आत्मा मुझसे दूरी बना लेती है परन्तु मुझ पर दृष्टि बनी रहती है। दो0 प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह। कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह।।77(ख)।। व्याख्या : राम की बच्चों जैसी सहज लीला देखकर मुझ सात्विक अहंकार के भाव को मोह (अज्ञान) हो गया कि सतचित आनन्द स्वरूप परमात्मा ये कौन-सा चरित्र कर रहे हैं? एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।। सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! इतना मन में विचार आते ही आत्मा रूपी राम से प्रेरित माया मुझे व्याप गयी। परन्तु वो माया मुझे दु:ख देने वाली नहीं थी और न ही अन्य जीवों की तरह मुझे संशय के जाल में फँसाने वाली थी। नाथ इहाँ कुछ कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना।। ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।। व्याख्या : हे नाथ! यहाँ कुछ कारण है। हे ज्ञान अहंकार रूपी परमात्मा के वाहन! तुम सावधान होकर सुनो अर्थात् सूक्षमता से समझने का प्रयास करो। सुरता (सीता) को वरण करने वाला ही एक अखण्ड ज्ञान की अवस्था में स्थित होता है। परन्तु माया के वश में हो जाने पर चराचर का जीव हो जाता है। जौं सब के रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।। माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुन खानी।। व्याख्या : अगर सबके हृदय में ज्ञान की एकरस अवस्था बनी रहे तो ईश्वर और जीव में भेद कैसा? माया के वश में होकर ही जीव अभिमानी हो जाता है। जबकि गुणों की खान (सत, रज व तम) माया ईश्वर के वश में होती है। परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।। मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।। व्याख्या : परवश अर्थात् प्रकृति के वश में होने पर आत्मिक ऊर्जा जीव कहलाती है और निज स्वरूप (स्वबस) में लीन हेने पर वही भगवान हो जाती है। इस प्रकार एक ही आत्मिक ऊर्जा से अनेक जीव पैदा हो जाते हैं परन्तु निज स्वरूप में लीन परमात्मा एक ही होते हैं। यहाँ श्रीकंता बताया गया है जिसका मर्म यह है कि सुरता (श्री) को निज स्वरूप में लीन करने वाला परमात्मा एक ही होता है। हालाँकि जीव व परमात्मा में माया ही मिथ्या भेद पैदा कर देती है परन्तु परमात्मा की कृपा के बिना करोड़ों प्रयास करने से भी वह मिथ्या भेद नहीं मिट पाता है। दो0 रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान। ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।।78(क)।। व्याख्या : जो परमात्मा के भजन के बिना निर्वाण प्राप्त करना चाहते हैं, वे ज्ञानवान होने पर भी बिना सींग व पूँछ के जानवर ही हैं। दो0 राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ। सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।78(ख)।। व्याख्या : सभी तारागणों के साथ सोलह कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने भी पर्वत हैं, उन सब में दावाग्नि लगा दी जाए, तो भी सूर्य के उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती है। उसी प्रकार बिना आत्मा रूपी सूर्य के उदय हुए अज्ञान रूपी रात्रि नहीं जा सकती है। ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।। हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! बिना परमात्मा के भजन के जीवों का क्लेश नहीं मिटता है। क्योंकि परमात्मा के भक्तों को अविद्या नहीं व्यापती है। परमात्मा की प्रेरणा से उनको विद्या व्यापती है अर्थात् परमात्मा की प्रेरणा से परमात्मा के भक्तों को विद्या (सहज ज्ञान) की प्राप्ति होती है। ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर।। भ्रम तें चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।। व्याख्या : इसलिए ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! विद्या की (सहज ज्ञान) प्राप्ति हो जाने के कारण परमात्मा के भक्त का पतन नहीं होता है और भेद भक्ति बढ़ती है। जब आत्मा रूपी राम ने मुझे अज्ञान रूपी भ्रम से आश्चर्यचकित देखा, तो वे हँसे। वह विशेष चरित सुनिए। तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।। जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।। व्याख्या : परमात्मा के उस खेल के मर्म को भाव रूपी भाइयों और नाड़ियों रूपी माताओं ने भी नहीं जाना। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरण तल वाले बालरूप श्रीराम जी घुटने और हाथों के बल मुझे पकड़ने को दौड़े। अर्थात् आत्मा रूपी राम ने सात्विक अहंकार को पकड़ने (वश में) का प्रयास किया। तब मैं भागि चलेउँ उरगारी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।। जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।। व्याख्या : हे वासना रूपी सर्पों के शत्रु ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! मैं सात्विक अहंकार जब आत्मा से दूर भागने लगा तो आत्मा रूपी राम ने मुझे पकड़ने के लिए प्रेरणा भाव रूपी भुजाओं को फैलाया। मैं सात्विक अहंकार जहाँ-जहाँ मस्तिष्क रूपी आकाश में उड़ा वहाँ-वहाँ मैंने आत्मा की प्रेरणा रूपी भुजा को मेरे पास आते हुए देखा। दो0 ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात। जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात।।79(क)।। व्याख्या : मैं सात्विक अहंकार सहज बुद्धि के लोक तक (ब्रह्मलोक) गया तो मेरे पीछे मैंने प्रेरणा रूपी भाव भुजाओं को केवल दो अंगुल की दूरी पर देखा अर्थात् केवल द्वैत भाव का आभास देखा वरना आत्मा की प्रेरणा और मुझ सात्विक अहंकार में कोई दूरी नहीं थी। द्वैत भाव को दो अंगुल की दूरी होना बोलकर लिखा है। दो0 सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि। गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि।।79(ख)।। व्याख्या : सप्ताबरन अर्थात् मस्तिष्क के सातों कोषों को भेद कर जहाँ-जहाँ मैं (सात्विक अहंकार) गया वहाँ सब जगह मैंने परमात्मा की प्रेरणा रूपी भाव भुजा को देखा और मैं ब्याकुल हो गया। मस्तिष्क में सात कोश प्रमुख होते हैं और इन सातों कोशों का सात चक्रों से गहरा सम्बन्ध होता है। उसी को सप्ताबरन बोलकर लिखा गया है। मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।। मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउ मुख माहीं।। व्याख्या : जब मैं सात्विक अहंकार का भाव त्रसित (भयभीत) हो गया तो मैंने आँख बन्द कर ली अर्थात् मैं सात्विक अहंकार हार थक कर स्थिर हो गया तो चितवत होकर चितप्रदेश में आ गया। तब मुझे देखकर आत्मा रूपी राम मुस्कराए और उनके हँसते ही मैं तुरन्त उनके मुख में चला गया अर्थात् मुझे चितवत देखकर आत्मा रूपी राम प्रसन्न हो गए और उनके प्रसन्न होते ही मैं आत्मा में लीन हो गया। आत्मा में लीन होने को ही मुख में समा जाना बोलकर लिखा है। उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।। अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! आत्मा रूपी राम के पेट में मैंने बहुत से ब्रह्माण्ड देखें। जब सात्विक अहंकार आत्मा में लीन हो जाता है, तब उसे जो अनुभूति होती है, उसी को यहाँ कागभुसुण्डि की अनुभूति के प्रतीकों के रूप में लिखा गया है। सात्विक अहंकार का भाव कहता है कि उन ब्रह्माण्डों में अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक से एक बढ़कर थी। कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।। अगनित लोकपाल जमकाला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।। व्याख्या : सात्विक अहंकार के आत्मलीन होने पर जो अनुभूति होती है उसी को इन चौपाइयों में विस्तारपूर्वक बताते हुए कहा है कि उस अवस्था में करोड़ों ब्रह्मा अर्थात् नाना स्तर के बुद्धि के भाव व विश्वास रूपी शंकर के भावों को अनुभव होता है। अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत सूक्ष्म-सूक्ष्म चक्र (लोकपाल) यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि। सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।। सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।। व्याख्या : उस अवस्था में असंख्य समुद्र, नदी तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, नर किन्नर और चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे। दो0 जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ। सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ।।80(क)।। व्याख्या : जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता था अर्थात् कल्पना से बाहर, वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। दो0 एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक। एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक।।80(ख)।। व्याख्या : मैं सात्विक अहंकार का भाव एक-एक ब्रह्माण्ड अर्थात् एक-एक कोश में वर्षों के समान रहा अर्थात् ऐसा लगा जैसे सैकड़ों वर्षों का अनुभव कर लिया हो। इस प्रकार से प्रत्येक कोशों व उप कोशों में नाना अनुभव करता हुआ घूमता रहा। दो0 लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।। नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।। व्याख्या : प्रत्येक लोक के अर्थात् प्रत्येक कोश के अनुसार विधि (क्रिया) को कराने वाली भाव प्रक्रिया (विधाता) भिन्न थी। प्रत्येक कोश में भिन्न-भिन्न विष्णु (अर्थात् अणु-अणु में व्यापक होने की भावना), विश्वास (शिव) मन के भाव (मनु), प्राणों की गति (दिसित्राता), धड़कन की गति (नर) गंधर्व प्राण की गति, भूत (भूत तत्व), बेताल (भावों की ताल में भिन्नता), किन्नर प्राण की गति, आसुरी भाव, पशु भाव, पक्षी भाव व वासना (सर्प) के भाव थे। अर्थात् ये भिन्न-भिन्न कोश में भिन्न-भिन्न थे। देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।। महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।। व्याख्या : उन भिन्न-भिन्न कोशों में नाना जाति के देव व दैत्य भाव थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी ही दूसरी प्रकार की थी। अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।। अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।। व्याख्या : प्रत्येक अण्डकोश में मैंने मेरा (सात्विक अहंकार) रूप देखा और नाना प्रकार की अनेकों वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक कोश में भिन्न ही देह रूपी अवध, भिन्न सरयू और भिन्न ही नर नाड़ी थे। दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।। प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बाल बिनोद अपारा।। व्याख्या : हे तात! प्रत्येक कोश में दस इन्द्रियों रूपी दसरथ का आभास था तथा सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या का भी आभास हो रहा था। प्रत्येक कोश में भाव रत रूपी भरतादिक भाई थे अर्थात् प्रत्येक अण्डकोश में नाना भाव नाना रूपों में थे। प्रत्येक अण्डकोश में परन्तु आत्मिक ऊर्जा का अवतरण हो रहा था अर्थात् वह परम ऊर्जा सभी कोशों में व्याप्त हो रही थी। वह आत्मिक ऊर्जा प्रत्येक अण्डकोश में ही बाल लीला कर रही थी। दो0 भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन।।81(क)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अति विचित्र देखा। इस प्रकार मैं सात्विक अहंकार का भाव अनगिनत भावों के भवन में घूमता रहा परन्तु एक आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) के अलावा और कोई दूसरा नहीं देखा। अर्थात् एक ही ऊर्जा (राम) सब अण्डकोशों में व्याप्त थी परन्तु प्रत्येक कोश से भिन्न-भिन्न भाव पैदा हो रहे थे। दो0 सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर।।81(ख)।। व्याख्या : सर्वत्र वही आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) का शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु राम (ऊर्जा) को मोह रूपी पवन की प्रेरणा से मैं भुवन-भुवन में देखता फिरता था। अर्थात् एक ही आत्मिक ऊर्जा को सर्वत्र भिन्न-भिन्न रूपों में मोह के भ्रम वश देखता फिरता रहा। भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।। फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।। व्याख्या : अनेक अण्डकोशों में भटकते हुए मानों सैकड़ों कल्पनाएँ (सौ कल्प) बीत गयी हों। फिर मैं सात्विक अहंकार फिरता-फिरता अपने आश्रम में आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया। ये सब अनुभूतियाँ साधक को ध्यान की क्षण भर की अवस्था में हो जाती हैं। निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।। देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।। व्याख्या : फिर देह रूपी अयोध्या में आत्मा रूपी राम के जन्म की बात सुनकर आया अर्थात् जब आत्मिक ऊर्जा देह में बरतने लगी तो सात्विक अहंकार का भाव भी देह भाव में बरतने लगा। आत्मा रूपी राम के प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं सात्विक अहंकार का भाव दौड़ पड़ा। फिर मैंने देह रूपी अयोध्या में जाकर आत्मा रूपी राम के जन्मोत्सव को देखा। जो मैंने पहले ही बता दिया है। राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।। तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के पेट में मैंने बहुत से जगत देखे। जिन्हें देखकर ही समझा जा सकता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। राम उदर का बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में राम ऊर्जा का प्रतीक है। इसलिए साधारण बोलचाल की भाषा में भी शरीर में राम का होना या नहीं होना बोला जाता है। जैसे कुछ लोगों को कहते सुना होगा कि आज तो मेरे हाथ-पैरों में राम नहीं है इत्यादि-इत्यादि। वास्तव में राम ऊर्जा के बल का ही प्रतीक है। इसलिए ऊर्जा से उत्पन्न भावों से नाना जगतों का आभास होता है। जैसे भाव होंगे वैसी दृष्टि होगी और जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि होगी। अत: एक आत्मिक ऊर्जा (राम) में ही नाना जगत दिखायी देने लगते हैं। क्योंकि एक ऊर्जा से ही नाना प्रकार के भाव पैदा हो जाते हैं। फिर वहाँ मैंने आत्मा रूपी राम को पुन: देखा। भाव ऊर्जा से पैदा होता है और भाव के अन्दर भी पुन: वही ऊर्जा होती है। इसी को आत्मा रूपी राम का पुन: देखना बोलकर लिखा है। तब समझ में आ गया कि आत्मा रूपी राम (ऊर्जा) माया के स्वामी हैं अर्थात् भावों को उत्पन्न करने वाले हैं और कृपालु हैं। करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापति मति मोरी।। उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।। व्याख्या : मैं सात्विक अहंकार का भाव बार-बार विचार करने लगा क्योंकि मेरी बुद्धि तो मोह (अज्ञान) रूपी कीचड़ से व्याप्त थी। यह सब अनुभव मैंने दो घड़ी के ध्यान में ही कर लिया। मन में विशेष मोह (अज्ञान) होने से मैं सात्विक अहंकार का भाव भ्रमित होकर थक गया। दो0 देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर। बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर।।82(क)।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम मुझ सात्विक अहंकार के भाव को व्याकुल देख कर हँसे तो हँसते ही मैं उनके मुख से बाहर आ गया अर्थात् ध्यान में लीनता टूट गयी। दो0 सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम। कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम।।82(ख)।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम मेरे (सात्विक अहंकार) साथ वैसा ही लड़कपन करने लगे। मैं अपने आपको नाना प्रकार से समझाने लगा परन्तु मेरे मन को शांति नहीं मिली। अर्थात् सात्विक अहंकार के भाव में पुन: द्वैत का आभास होने लग गया। देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।। धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के चरित और प्रभुता को समझते ही मैं सात्विक अहंकार का भाव देह भाव को भूल गया। मैं हे भक्तों को तारने वाले! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए पुकार कर देह रूपी पृथ्वी पर गिर पड़ा अर्थात् देह आभास को विस्मरित कर गिर पड़ा। प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।। कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने मुझ सात्विक अहंकार के भाव को प्रेम में व्याकुल देखा तो फिर अपनी माया अर्थात् भाव प्रक्रिया को रोका और मेरे सिर पर आत्मा रूपी राम ने अपना कमल रूपी हाथ फेरा और मेरे समस्त दु:खों का हरण कर लिया अर्थात् प्रेम में व्याकुल देखकर आत्मिक ऊर्जा की भाव प्रक्रिया बदल गयी और आत्मिक ऊर्जा व सात्विक अहंकार सहज अवस्था में आ गए। जिससे भ्रम से उत्पन्न दु:खों का नाश हो गया। कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।। प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के स्पर्श ने मुझे मोह (अज्ञान) से मुक्त कर दिया। क्योंकि आत्मा तो साधक के लिए सुख देने वाली व कृपा करने वाली होती है। आत्मा रूपी राम की पहले वाली प्रभुता का विचारकर (याद कर-करके) मेरे (सात्विक अहंकार) मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ। भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।। सजल नयन पुलकित करजोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी।। व्याख्या : परमात्मा की भक्त वत्सलता को देखकर मेरे हृदय में विशेष प्रेम पैदा हो गया। तब मैंने आँखों में जल भरकर पुलकित होकर हाथ जोड़कर बहुत प्रकार से परमात्मा से विनती की। अर्थात् सात्विक अहंकार के भाव में पूर्ण समर्पण की भावना पैदा हो गयी। दो0 सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास। बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमा निवास।।83(क)।। व्याख्या : मेरी (सात्विक अहंकार) प्रेममय बाणी सुनकर और मुझे अपना दास व दीन जानकर रोम-रोम में निवास करने वाले परमात्मा सुखदायक मधुर व गम्भीर वाणी बोले अर्थात् परमात्मा ने सुखद प्रेरणा की। दो0 काकभुसुण्डि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि। अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि।।83(ख)।। व्याख्या : हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! तू मुझ परमात्मा को अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखों की खान मोक्ष। ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।। आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।। व्याख्या : ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान और वे अनेकों गुण जो जगत में मुनियों के लिए भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं परमात्मा आज तुमको दूँगा, इसमें संदेह नहीं है। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले। सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेउँ।। प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कहीं।। व्याख्या : परमात्मा के वचनों को सुनकर अर्थात् परमात्मा की प्रेरणा पाकर मेरे अन्दर अनुराग और गहरा हो गया। तब मैं सात्विक अहंकार मन में विचार करने लगा कि परमात्मा ने सब सुखों को देने की बात तो कही है परन्तु अपनी निज भक्ति देने की बात नहीं कहीं। भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।। भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।। व्याख्या : भक्ति के बिना सब सुख ऐसे होते हैं, जैसे बिना नमक के व्यंजन तैयार हों। बिना परमात्मा के भजन के सुख किस काम के हैं? ऐसा विचार कर हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! मैं सात्विक अहंकार बोला -- जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू।। मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।। व्याख्या : हे परमात्मा! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो मेरे मन की भावना अनुसार मुझे वर दीजिए। आप उदार और हृदय के अन्दर की जानने वाले हैं। दो0 अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव। जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव।।84(क)।। व्याख्या : आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य, निष्काम) भक्ति जिसका अनुभव सुरता (श्रुति) व प्राण (पुरान) के द्वारा होता है। जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और आप परमात्मा की कृपा से जिसे कोई बिरला ही पाता है। दो0 भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुखधाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।84(ख)।। व्याख्या : हे भक्त की कल्पना के मूल (कल्पतरू)! हे प्राण के माध्यम से कल्याण करने वाले! हे कृपा के समुद्र! हे सुख के धाम प्रभु! मुझे दया करके वही निज भक्ति प्रदान कीजिए। एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।। सुनु बायस तै सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।। व्याख्या : तब परमात्मा ने ऐसा ही हो कहा और परम सुख देने वाली वाणी बोले कि हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि ! तुम सहज में ही चतुर हो। इसलिए क्यों नहीं ऐसा वरदान माँगोगे? सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तेहि सम बड़भागी।। जो मुनि कोटि जतन नहीं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।। व्याख्या : तुमने सब सुखों की खान भक्ति माँगी है। तुम्हारे समान भाग्यशाली संसार में दूसरा कोई नहीं है जो मुनि लोग जप व योग की आग में अपने शरीर को जलाते हैं, वे भी ऐसी परम भक्ति को करोड़ों प्रयास करने पर भी नहीं पाते हैं। रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।। सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।। व्याख्या : मैं परमात्मा तुझ सात्विक अहंकार की चतुराई को देखकर रीझ (प्रसन्न) गया हूँ। तुमने मेरी परम भक्ति को माँगा है। हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! अब मेरी कृपा से तेरे हृदय में सब सद्गुणों का निवास होगा। भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।। जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।। व्याख्या : भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग और मेरे चरति का रहस्य तू सहज में ही जान जायेगा और मेरी कृपा से तुझे साधना का कष्ट भी नहीं होगा। दो0 माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि। जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि।।85(क)।। व्याख्या : अब तुझे माया से उत्पन्न मोह (अज्ञान) का भ्रम नहीं होगा। तू अब मुझ परमात्मा को अनादि अजन्मा, अगुण (प्रकृति के गुणों से रहित) और गुणों की खान एक ब्रह्म जानना। दो0 मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग। कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग।।85(ख)।। व्याख्या : हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! मुझे निरन्तर मेरे भक्त प्रिय होते हैं। इसलिए ऐसा जानकर मन, वचन व कर्म से मेरे चरणों में अटल प्रेम करना। अर्थात् सदैव परमात्मोन्मुखी वृति रखना। अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।। निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।। व्याख्या : इन चौपाइयों में साधक की परम आत्मा साधक के सात्विक अहंकार को समझाते हुए निर्मल वाणी में कहती है कि हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! तुम मेरा सिद्धान्त सुनो, जिसे वेदों आदि ने भी बताया है। मेरे सिद्धान्त को सुनकर धारण करो अर्थात् धारणा करो और सबको छोड़कर मेरा भजन करो। मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिध प्रकारा।। सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।। व्याख्या : मेरी माया से संसार का आभास होता है और संसार के समस्त चराचर के जीव मेरे ही पैदा किए हुए हैं और सभी मुझे प्रिय हैं। परन्तु सबसे अधिक मुझ परमात्मा को मनुष्य प्रिय हैं। तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।। तिन्ह महँ प्रिय बिरल पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।। व्याख्या : उन मनुष्यों में भी द्विज अर्थात् दिव्य ज्ञान वाले प्रिय हैं। दिव्य ज्ञान का मतलब जिन्हें आत्म ज्ञान हो। दिव्य ज्ञान वालों में भी मुझे वे प्रिय हैं, जो सुरता (श्रुति) को धारण करने वाले अर्थात् सुरता को वश में करके मुझ परमात्मा में लगाए रखते हैं। उनमें भी जो अपने अनुभव (वेद) के अनुसार धारणा का अनुसरण करने वाले मुझे प्रिय होते हैं। उनमें भी विरल प्रिय होते हैं (अर्थात् जो संसार से विरल यानि निसंग रहने वाले) और विरलों में भी ज्ञानी मुझे प्रिय होते हैं। ज्ञानियों में भी मुझे विज्ञानी अर्थात् विशुद्ध ज्ञान वाले प्रिय होते हैं। तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।। पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।। व्याख्या : विशुद्ध ज्ञान वालों में भी मुझे निज दास प्रिय होते हैं। निज दास का मतलब स्वबस वृति से होता है। स्वबस वृति वाला साधक एक परमात्मा के अलावा और किसी से कुछ भी अपेक्षा नहीं रखता है। मैं पुन: तुमसे सत्य कहता हूँ कि मुझ परमत्मा को सेवक (साधक) के समान प्रिय कोई नहीं होता। भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।। भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।। व्याख्या : भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वो भी मुझे अन्य जीवों के समान ही प्रिय होता है। भक्तिवान अगर कोई नीच प्राणी होता है तो वो भी मुझे प्राणों के समान प्रिय होता है। यह मेरा वचन है। दो0 सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग। श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग।।86।। व्याख्या : हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! तुम सावधानीपूर्वक सुनो -- वेदों व पुराणों ने ऐसी नीति बतायी है कि पवित्र, सुशील व सुबुद्धि वाला सेवक किसको प्रिय नहीं लगेगा? एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।। कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।। व्याख्या : एक बाप के बहुत से पुत्र होते हैं जो गुणों, शील व आचरण में अलग-अलग होते हैं। कोई उनमें से विद्वान होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनवान, कोई शूरवीर और कोई दानी होता है। कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।। कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।। व्याख्या : कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। सब पर पिता का समान प्रेम होता है। परन्तु कोई मन, वचन व कर्म से पिता का आज्ञाकारी होती है और सपने में भी पिता की आज्ञा के अनुसरण की धारणा के अलावा कोई दूसरी धारणा नहीं होती है। सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।। एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।। व्याख्या : आज्ञाकारी पुत्र पिता को प्राणों के समान प्रिय होता है, चाहे वो सब प्रकार से मूर्ख ही क्यों न हो। इसी प्रकार समस्त चराचर के जीव, तिर्यक (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य व असुरों सहित जितने भी चेतन व जड़ जीव हैं। अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।। तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया।। व्याख्या : यह समस्त विश्व मुझ परमात्मा का ही पैदा किया हुआ है और सब पर मेरी बराबर कृपा होती है। परन्तु इनमें से जो मद और माया को छोड़कर मन, वचन और शरीर से मुझ परमात्मा का भजन करते हैं। दो0 पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ। सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ।।87(क)।। व्याख्या : वह पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी हो अथवा चराचर का कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभाव से मुझे भजता है, वो मुझ परमात्मा को परम प्रिय होता है। सो0 सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब।।87(ख)।। व्याख्या : इस दोहे में परमात्मा सात्विक अहंकार के भाव को समझाते हुए कहते हैं कि हे सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि! मैं सत्य कह रहा हूँ कि निर्मल सेवक (साधक) मुझे प्राणों के समान प्रयि होता है। इसलिए तुम सब आशा-अपेक्षाओं को छोड़कर मुझ परमात्मा का भजन करो। कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।। प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ।। व्याख्या : तुझे कभी काल नहीं व्यापेगा। तुम निरन्तर मेरा स्मरण व भजन करते रहना। इस चौपाई में साधना का गहरा रहस्य खोला गया है। जब सात्विक अहंकार निर्मल होकर परमात्मा में लीन रहता है तो चेतना परमात्मोन्मुखी हो जाती है जिससे शरीर का आभास मिट जाता है। मृत्यु तो शरीर की होती है। चेतना कभी मरती नहीं है। इसलिए कभी काल नहीं व्यापने की बात कही गयी है। परमात्मा के अमृत तुल्य वचनों को सुनकर मैं सात्विक अहंकार तृप्त नहीं हो रहा था। उस अवस्था में मेरा (सात्विक अहंकार का) भाव शरीर पुलकित हो रहा था और मन हर्षित हो रहा था। सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।। प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना।। व्याख्या : उस परम अनुभूति के सुख को तो मन और कान जानते हैं, इसलिए जिभ्या द्वारा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। परमात्मा की उस परम शोभा को तो दिव्य भाव दृष्टि ही जानती है, इसलिए वाणी द्वारा कहने के शब्द नहीं होते हैं। बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।। सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।। व्याख्या : बहुत प्रकार से मुझे समझाकर परमात्मा पुन: बालकों जैसे खेल करने लगे। फिर आँखों में आँसू भरकर मुँह को कुछ रूखा-सा बनाकर आत्मा रूपी राम ने पुन: सुष्मना नाड़ी रूपी माता की तरफ देखा अर्थात् आत्म चेतना पुन: सुष्मना नाड़ी रूपी माता को बता दिया कि सहज भोग रूपी भूख लगी है। अर्थात् आत्म चेतना देह भावों में बरतना चाहती है। देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई।। गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी रूपी माता भी आत्म चेतना के रूख को देखकर तुरंत दौड़ पड़ी अर्थात् सुष्मना नाड़ी का प्रवाह शु डिग्री हो गया। मधुर वाणी बोलकर आत्मा रूपी राम को छाती से लगा लिया अर्थात् आत्म चेतना को सुष्मना नाड़ी में समा लिया। जब आत्म चेतना सुष्मना नाड़ीं में प्रवाहित होने लगती है तो एक विशेष सात्विक हार्मोन निकलना शु डिग्री हो जाता है। उसी को दुग्ध पान कराने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में परमात्मा की ललित लीलाएँ अनुभव में समझ आने लगती हैं। उन्हीं को परमात्मा की लीलाओं का गान करना बताया गया है। सो0 जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद। अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन।।88(क)।। व्याख्या : जिस परम सुख को प्राप्त करने के लिए विश्वास रूपी शिव ने देह भावों का दमन किया। उसी सुख में अब देह रूपी नगर के भाव रूपी नर नारी निरंतर मगन रहने लगते हैं। अर्थात् साधक शु डिग्री में देह के सुख भोगों का त्याग इसलिए करता है कि उसे परमात्मा की प्राप्ति होगी। परन्तु जब परमात्मा की कृपा से परम ज्ञान हो जाता है तो देह के सुख भोगों की सहज अवस्था आ जाती है और साधक के नर-नाड़ी आनन्द में मगन हो जाते हैं जिससे नर-नाड़ी की धड़कन से उत्पन्न भाव भी सहज सुख का अनुभव करने लगते हैं। सो0 सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ। ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्म सुखहि सज्जन सुमति।।88(ख)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! उस परम सुख का जो साधक थोड़ा सा सपने में भी एक बार सुख ले लेता है, उस सुबुद्धि वाले सज्जन पुरुष के लिए ब्रह्म सुख भी कुछ नहीं होता हैं। मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।। रामप्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।। व्याख्या : मैं कुछ समय तक अर्थात् सात्विक अहंकार का भाव कुछ समय तक देह रूपी अयोध्या में रहा और आत्मा रूपी राम के आनन्ददायक बालचरितों को देखा अर्थात् सुखदायक निर्मल आत्मिक ऊर्जा के प्रभाव को देखा। परमात्मा की कृपा से मैंने भक्ति का वरदान पा लिया। फिर मैं परमात्मा के चरणों में वन्दना करके मेरी सहज अवस्था में आ गया। सात्विक अहंकार का सहज हो जाना ही निज आश्रम आना बोलकर लिखा है। तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।। यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिनि मोहि नचावा।। व्याख्या : जब से मुझे परमात्मा ने अपना लिया तब से मुझे माया नहीं व्यापी। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी। ये सब गुप्त रहस्य मैंने बता दिए हैं, जिस प्रकार परमात्मा की माया ने मुझ सात्विक अहंकार को नचाया था।। निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा।। राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि बोला कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! मैं मेरा अनुभव बताता हूँ कि बिना परमात्मा के भजन के जीवन के क्लेश नहीं मिटते हैं। बिना परमात्मा की कृपा के परमात्मा की प्रभुता को नहीं जाना जा सकता है। जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।। प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।। व्याख्या : बिना परमात्मा की प्रभुता को जाने विश्वास नहीं हो पाता है और बिना विश्वास के परमात्मा के प्रति प्रेम नहीं हो पाता है। बिना प्रेम के भक्ति में दृढ़ता नहीं आ पाती है जैसे जल की चिकनाई ठहरती नहीं है। सो0 बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु। गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89(क)।। व्याख्या : बिना गु डिग्री के क्या ज्ञान हो सकता है? ज्ञान बिना वैराग्य के नहीं हो पाता है। वेद व पुराण सभी बताते हैं कि परमात्मा की भक्ति के बिना किसी को सुख नहीं मिल सकता है। दो0 कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।। व्याख्या : बिना सहज संतोष के हे तात्! क्या कोई शान्ति प्राप्त कर सकता है? करोड़ों उपाय करने से भी क्या बिना जल के नाव चल सकती है? बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।। राम भजनु बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।। व्याख्या : बिना संतोष के काम नष्ट नहीं होता है और बिना काम के मिटे सपने में भी सुख नहीं मिल पाता है। बिना परमात्मा के भजन के काम का नाश नहीं हो पाता है जैसे बिना पृथ्वी के वृक्षारोपण नहीं हो सकता है। बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।। श्रद्धा बिनु धर्म नहीं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।। व्याख्या : बिना विज्ञान के क्या समता आ सकती है? क्या कोई आकाश के बिना अवकाश (विश्राम) पा सकता है? बिना श्रद्धा के धर्म अर्थात् धारणा नहीं बनती है। जैसे बिना पृथ्वी तत्व के गंध का आभास नहीं हो सकता है। बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा।। सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाईं।। व्याख्या : बिना तप के क्या तेज का विस्तार हो सकता है? क्या बिना जल तत्व के संसार में रस हो सकता है? क्या विद्वान जनों की सेवा किए बिना शील मिल सकता है? जैसे बिना अग्नि (तेज) के रूप नहीं मिलता। निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होई बिहीन समीरा।। कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।। व्याख्या : निज सुख अर्थात् आत्मानन्द के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? क्या बिना वायु तत्व के स्पर्श का आभास हो सकता है? क्या बिना विश्वास के कोई सिद्धि मिल सकती है? बिना परमात्मा के भजन के भावों के भय का नाश नहीं हो पाता है। दो0 बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।90(क)।। व्याख्या : बिना विश्वास के भक्ति नहीं हो सकती है और बिना भक्ति के परमात्मा द्रवित नहीं होते हैं। बिना परमात्मा की कृपा के जीव सपने में भी शान्ति नहीं पा सकता है। सो0 अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।90(ख)।। व्याख्या : अत: हे मतिधीर! ऐसा विचार कर सब कुतर्कों, व संशयों का त्याग कर दो और सुंदर व सुखदायक करुणाकर परमात्मा का भजन करो। निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।। कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! मैंने मेरी बुद्धि के अनुसार परमात्मा की महिमा के प्रताप का बखान कर दिया है। मैंने इसमें कोई बात युक्ति से बढ़ाकर नहीं कही है। यह सब मेरा स्वयं का अनुभव किया हुआ है। महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।। निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।। व्याख्या : परमात्मा के नाम व रूप की गुण गाथाएँ तो अनन्त व अपार होती हैं। सभी मुनिजन अपनी बुद्धि के अनुसार परमात्मा के गुणों का बखान करते हैं। परमात्मा का पूर्ण मर्म तो वेद, शेष व शिव (विश्वास) भी नहीं जानते हैं। तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।। तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा।। व्याख्या : आप से लेकर मच्छर तक सभी छोटे-बड़े जीव आकाश में उड़ते हैं परन्तु आकाश का अंत नहीं पाते हैं। उसी प्रकार परमात्मा की महिमा अगाध होती है, जिसका कोई कभी थाह नहीं जान सकता है। रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।। सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम का सुभग अर्थात् अच्छी निर्मल प्रकृति वाला शरीर है। वे अनन्त करोड़ों दुर्गाओं के समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्रों (चितों) के समान उनका ऐश्वर्य है। अरबों आकाशों के समान उनमें अनन्त अवकाश (विश्राम स्थान) हैं। दो0 मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास। ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास।।91(क)।। व्याख्या : अरबों पवन के समान उनमें महान बल है और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश है। करोड़ों चन्द्रमाओं की सी शीतलता है और समस्त भावों से उत्पन्न भय का नाश करने वाले हैं। दो0 काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत। धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत।।91(ख)।। व्याख्या : अरबों कालों के समान परमात्मा अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त है। वे परमात्मा अरबों धूमकेतुओं के समान अत्यन्त प्रबल हैं। प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।। तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।। व्याख्या : अरबों पातालों के समान परमात्मा अथाह हैं। मन के रूप में (स अ मन उ समन) करोड़ों वासनाओं के समान हैं। अनन्त कोटि तीर्थों के समान वे पवित्र करने वाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पाप समूह का नाश करने वाला है। हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।। कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।। व्याख्या : करोड़ों हिमालयों के समान परमात्मा दृढ़ व अचल हैं और करोड़ों समुद्रों के समान गम्भीर हैं। करोड़ों कामधेनुओं के समान हैं अर्थात् सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।। बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रूद्र कोटि सत सम संहर्ता।। व्याख्या : परमात्मा में अनन्त कोटि सरस्वतियों के समान चतुरता है। अरबों ब्रह्माओं के समान सृष्टि रचना की निपुणता है। वे परमात्मा करोड़ों विष्णुओं के समान जगत का पालन करने वाले हैं और अरबों रुद्रों के समान संहार करने वाले हैं। धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।। भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।। व्याख्या : वे परमात्मा अरबों कुबेरों के समान धनवान हैं और करोड़ों मायाओं के समान जगत के कारण हैं। वे बोझ उठाने में अरबों शेषों के समान हैं। परमात्मा तो सीमा रहति और उपमा रहित हैं। छ0 निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै।। एहि भाँति निज निज मति बिलास, मुनीस हरिहि बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं।। व्याख्या : परमात्मा तो उपमा रहित होते हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। परमात्मा के समान तो परमात्मा ही होते हैं, ऐसा वेद (अनुभव) कहते हैं अर्थात् साधक को अनुभव में समझ में आ जाता है कि परमात्मा के समान तो केवल परमात्मा ही होते हैं। जैसे अरबों जुगनुओं के समान कहने से सूर्य की प्रशंसा नहीं होती बल्कि लघुता ही होती है। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धि के विकास के अनुसार मुनि जन परमात्मा का वर्णन करते रहते हैं। परमात्मा तो भक्तों के भावों को ग्रहण करने वाले व अति कृपालु होते हैं। वे तो भावों के अनुसार प्रेम को सुनकर सुख मानते हैं अर्थात् भावों के अनुसार ही परमात्मा प्रसन्न व द्रवित होते हैं। दो0 रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ। संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोई।।92(क)।। व्याख्या : परमात्मा तो अपार गुणों के समुद्र होते हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? इसलिए सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि कहते हैं कि मैंने तो संत जनों से जो सुना था, वही आपको सुनाया है। सात्विक अहंकार का भाव कहना चाहता है कि मैंने तो संशयों का अंत कर जो अनुभव किया है, वही आपको (ज्ञान अहंकार) सुनाया है। सो0 भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन।।92(ख)।। व्याख्या : सुख के भण्डार, करुणा के धाम परमात्मा तो भावों के वश में होते हैं अर्थात् भावों के अनुसार परमात्मा प्रतिक्रिया-क्रिया करते हैं। इसलिए ममता, मद व मान का त्याग करके सुरता में रमण करने वाले परमात्मा का भजन करना चाहिए। सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।। नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि के वचन ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ को बहुत प्रिय लगे, इसलिए हर्षित होकर पंख फैलाए अर्थात् प्राण को विस्तारित किया। उस अवस्था में मन में बहुत हर्ष था और आँखों में प्रेम रूपी जल था। ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ को तब परमात्मा के प्रताप की महिमा हृदय में समझ आ गयी। पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।। पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।। व्याख्या : ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ अपने पिछले मोह (अज्ञान) का विचार करके पश्चाताप करने लगा कि मैंने भ्रमवश अनादि ब्रह्म (ऊर्जा) को मनुष्य मान लिया था। वह बार-बार सात्विक अहंकार रूपी काग भुसुण्डि के चरणों में सीस झुकाने लगा अर्थात् सात्विक अहंकार के सामने ज्ञान अहंकार के भाव ने समर्पण कर दिया और सात्विक अहंकार को परमात्मा तुल्य मानकर प्रेम बढ़ा लिया। गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।। संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।। व्याख्या : अगर कोई ब्रह्मा व शंकर के समान भी हो तो बिना गु डिग्री के भाव रूपी भव सागर को पार नहीं कर सकता है। अर्थात् चाहे बुद्धि रूपी ब्रह्मा और विश्वास रूपी शंकर हो परन्तु बिना आत्म प्रकाश के भाव रूपी भव सागर पार नहीं हो पाता है। हे तात! संशय रूपी सर्प ने मुझ ज्ञान अहंकार को डस लिया था, जिससे बहुत सी कुतर्क रूपी विषैली लहरें उठने लगी थी। तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।। तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।। व्याख्या : आपके स्वरूप अर्थात् सात्विक अहंकार के रूप में परमात्मा ने गारुड़ी बनकर संशय रूपी सर्प के जहर से मुझे बचा लिया। आपकी कृपा अर्थात् सात्विक अहंकार की अनुकूलता से ही मेरे ज्ञान अहंकार का मोह (अज्ञान) मिटा है। जिससे मैंने आत्मा रूपी राम के अनुपम रहस्य को जान लिया। दो0 ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि। बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि।।93(क)।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि की नाना प्रकार से प्रशंसा करके और सीस झुकाकर अर्थात् समर्पण करके ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ बहुत विनय व प्रेमपूर्वक वचन बोला। दो0 प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि। कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि।।93(ख)।। व्याख्या : हे प्रभो! मैं (ज्ञान अहंकार का भाव) अपनी अज्ञानता के कारण आपसे पूछना चाहता हूँ, इसलिए मुझे अपना दास समझकर हे कृपा के समुद्र! आदरपूर्वक मेरे प्रश्न का उत्तर कहिए। वास्तव में जब ज्ञान अहंकार के भाव को परमात्मा की सत्ता समझ में आने लग जाती है तो वह सात्विक अहंकार के सामने नत मस्तक होकर परमात्मा के बारे में और जानना चाहने लगता है। उस अवस्था में ज्ञान के अहंकार का भाव अनुभूति की प्रक्रिया को जानने के लिए उत्सुक हो उठता है। आगे की चौपाइयों में उसी संवाद का प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।। ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा।। व्याख्या : हे सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि तुम तो सब कुछ जानने वाले, तत्व के ज्ञाता, अज्ञान रूपी अंधकार से परे, उत्तम बुद्धि से युक्त, सुशील, सरल आचरण वाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान के धाम हैं तथा परमात्मा के प्रिय दास (भक्त) हैं। अर्थात् परमात्मा की शरण में रहने वाले हैं। कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई।। राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी।। व्याख्या : फिर किस कारण से आपने सात्विक अहंकार रूपी शरीर प्राप्त किया है? हे तात! मुझे सब समझाकर कहिए। आत्मा रूपी राम के चरित बहुत सुंदर सरोवर की तरह हैं। आपने आत्म अनुभूति को कहाँ व कैसे प्राप्त किया? नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं।। मुधा बचन नहिं ईश्वर कहई। सोउ मोरे मन संसय अहई।। व्याख्या : हे नाथ! मैंने विश्वास रूपी शिव से सुना है कि भावों की महाप्रलय की अवस्था में भी तुम्हारा नाश नहीं होता है अर्थात् भाव मिट जाने पर भी सात्विक अहंकार का आभास बना रहता है। विश्वास रूपी शिव झूठ नहीं कहते हैं। इसलिए अब मेरे (ज्ञान अहंकार) मन में संशय हो रहा है। अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।। अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।। व्याख्या : हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चराचर के जीव तथा यह सारा जगत काल का कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डों का नाश करने वाला काल सदा बड़ा अनिवार्य हैं अर्थात् सभी को व्याप्त है। वास्तव में नाग प्राण वायु से उत्पन्न भाव व नर की धड़कन से उत्पन्न सभी भाव काल के अधीन होते हैं परन्तु सात्विक अहंकार का भाव सदा बना रहता है। सो0 तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल।।94(क)।। व्याख्या : परन्तु तुमको (सात्विक अहंकार) यह कठिन काल कभी नहीं व्यापता है, इसका क्या कारण है? हे कृपालु! मुझे कहिए कि यह आपके ज्ञान का प्रभाव है या योग का बल है? दो0 प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग। कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग।।94(ख)।। व्याख्या : हे प्रभु! आपके आश्रम में आते ही अर्थात् आपके निकट आते ही मेरा (ज्ञान अहंकार का) अज्ञान से उत्पन्न भ्रम मिट गया है। इसका क्या कारण है? हे नाथ! अनुराग पूर्वक मुझसे कहिए। गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।। धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ की वाणी सुनकर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि बहुत प्रसन्न हुए और परम अनुरागपूर्वक बोले कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी आप की बुद्धि धन्य है, धन्य है। तुम्हारा प्रश्न भी मुझे बहुत प्रिय लगा है। सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।। सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई।। व्याख्या : आपके प्रेमयुक्त प्रश्न को सुनकर मुझे मेरे बहुत जन्मों की याद आ गयी है। वास्तव में सात्विक अहंकार का भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा में ही लीन रहता है परन्तु जब प्रेम के भाव पैदा हो आते हैं तो सात्विक अहंकार को अपने पिछले आभासों की स्मृति हो आती है। उसी को बहुत जन्मों की याद आना बताया गया है। हे तात! तुम आदरपूर्वक सुनो -- अब मैं मेरे निज अनुभव की कथा को कहता हूँ। जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।। सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा।। व्याख्या : जप, तप, यज्ञ, सम, दम, व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग व विज्ञान इन सबके पालन करने पर परमात्मा के चरणों में प्रेम पैदा होता है। बिना परमात्मा के चरणों में प्रेम हुए कोई कल्याण प्राप्त नहीं कर सकता। एहिं तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।। जेहि तें कछु निज स्वार्थ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।। व्याख्या : इस शरीर से अर्थात् सात्विक अहंकार की अवस्था में ही मैंने परमात्मा की भक्ति प्राप्त की है। इसलिए इस सात्विक अहंकार की अवस्था पर मेरी ममता अधिक है। क्योंकि ये तो जगत का नियम है कि जिससे स्वार्थ पूरा होता है उस पर सभी ममता रखते हैं।। सो0 पन्नगारी असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं। अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित।।95(क)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! वेद ऐसी नीति कहते हैं अर्थात् अनुभव में ऐसा आता है और सज्जन लोग भी ऐसा ही कहते हैं कि जिससे अपना परमहित सिद्ध होता हो तो अति नीच प्राणी से भी प्रेम करना चाहिए। सो0 पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रूचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।।95(ख)।। व्याख्या : रेशम कीड़ें से होता है और उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसलिए उस परम अपवित्र कीड़ें को भी सभी लोग प्राणों के समान पालते हैं। स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।। सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।। व्याख्या : जीव के लिए तो सच्चा स्वार्थ यही होता है कि उसका मन, तन व कर्म से परमात्मा के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर पवित्र व अच्छी प्रकृति (सुभग) वाला होता है जिसको पाकर परमात्मा का भजन हो। राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।। राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।। व्याख्या : परमात्मा से विमुख जीव अगर ब्रह्मा के समान भी देह प्राप्त कर लेता है, तो भी कवि व विद्वान उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं। इसी सात्विक अहंकार की अवस्था में मुझे परमात्मा की भक्ति प्राप्ति हुई है। इसलिए यह शरीर (अवस्था) मुझे परम प्रिय लगता है। तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।। प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।। व्याख्या : मेरा मरण मेरी इच्छा पर है, फिर भी मैं यह शरीर (सात्विक अहंकार की अवस्था) नहीं छोड़ता हूँ। क्योंकि मेरा ऐसा अनुभव (वेद) है कि बिना शरीर के (सात्विक अहंकार की अवस्था के) परमात्मा का भजन नहीं हो पाता है। प्रारम्भ में तो अज्ञान रूपी मोह ने मुझ सात्विक अहंकार को बहुत भ्रमित किया। जिससे मैं परमात्मा से विमुख होकर कभी सुख से नहीं सोया। नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।। कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि बोला कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़! अनेकों जन्मों में मैंने अनेकों प्रकार के योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि कर्म किए अर्थात् अनेकों कर्मों में सात्विक कर्तापन का मुझे (सात्विक अहंकार का) आभास हुआ। देखेउँ करि सब करम गोसाईं। सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं।। सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।। व्याख्या : हे गोसाईं (अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने वाले ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी)! मैंने सब कर्म किए परन्तु अब की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। मुझ सात्विक अहंकार को बहुत से जन्मों की याद है क्योंकि विश्वास रूपी शिव की कृपा से मेरी बुद्धि मोह में नहीं पड़ी। दो0 प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस। सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस।।96(क)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! अब मैं (सात्विक अहंकार) प्रथम जन्म के चरित कहता हूँ। जिन्हें सुनकर परमात्मा के चरणों में प्रेम पैदा होता है और सब क्लेश मिट जाते हैं। इस दोहे में सात्विक अहंकार का भाव अपनी प्रथम सात्विक अवस्था का वर्णन करने की बात करता है, जिससे साधक के मन में परमात्मा के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है। दो0 पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मलमूल। नर अरु नारि अधर्मरत सकल निगम प्रतिकूल।।96(ख)।। व्याख्या : हे प्रभो! पूर्व के एक कल्प में अर्थात् पहले की मन की कल्पना में कलियुग अर्थात् भावों की तामसिक अवस्था मूल रूप में थी। इसलिए तामसिक भावों के कारण शरीर के नर और नाड़ी अधर्मरत अर्थात् प्रतिकूल होकर सहजता के विपरीत चलने लगे थे। इस दोहे में साधक की उस मूल अवस्था का वर्णन किया गया है, जिसमें देहभाव (कलियुग) प्रबल होता है और तामसिक भावों से नर-नाड़ीं की धड़कन असहज होकर चलती है। तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।। सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।। व्याख्या : उसी देहभाव (कलियुग) की अवस्था में सात्विक अहंकार का भाव सुष्मना नाड़ी (कोशलपुर) में प्रवेश किया अर्थात् साधक का ध्यान प्रथम बार सुष्मना नाड़ी में लगा और उस अवस्था में मैं सात्विक अहंकार का भाव द्रवित हो गया। शीघ्र द्रवित शूद्र अर्थात शीघ्रता से द्रवित हो गया। उसी अवस्था को शूद्र के रूप में जन्म लेना बताया गया है। मैं सात्विक अहंकार का भाव उस प्रथम अवस्था में मन, वचन, कर्म से विश्वास रूपी शिव का भक्त था अर्थात् मेरे मन में एक परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास था। इसलिए मैं सात्विक अहंकार का भाव अन्य देव भावों की निंदा करता था। धन मद मन्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।। जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।। व्याख्या : प्रथम में जब साधक परमात्मा के पथ पर चलना शु डिग्री करता है तो उसके अन्दर धन का मद व वाचालता रहती है। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर कहा गया है कि मैं सात्विक अहंकार का भाव धन के मद में मतवाला था और बहुत वाचाल था। मेरी बुद्धि उग्र थी और हृदय में बहुत दम्भ था। हालाँकि मैं परमात्मा की राजधानी सुष्मना नाड़ी रूपी कोशलपुरी में रहता था परन्तु फिर भी मुझे परमात्मा की महिमा का पता नहीं था। वास्तव में सुष्मना नाड़ी ही आध्यात्म में परमात्मा की राजधानी माना जाता है। सुष्मना नाड़ी को ही प्रतीकात्मक रूप से कोशलपुर कहा गया है। प्रारम्भ में सुष्मना नाड़ीं में ध्यान लगने पर भी साधक को परमात्मा की महिमा का पता नहीं चल पाता है। उसी को यहाँ लिखा गया है। अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।। कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।। व्याख्या : परन्तु अब मैंने (सात्विक अहंकार के भाव ने) देह रूपी अयोध्या के प्रभाव को जाना है। जिसके प्रभाव का वर्णन वेदों, शास्त्रों व पुराणों ने भी गाया है कि किसी भी जन्म में अर्थात् किसी भी अवस्था में जो कोई भी भाव अयोध्या रूपी देह नगरी में अर्थात् जब सुष्मना नाड़ी रूपी कोशलपुर में कोई भी भाव बस जायेगा अर्थात् सुष्मना में पहुँच जायेगा तो वह भाव स्वत: परमात्मोन्मुखी हो जायेगा। अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।। सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी (कोशलपुर) में ध्यान पहुँचने पर जीव देह रूपी अयोध्या में आत्मा रूपी राम के प्रभाव को जान पाता है। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम संयम व शिव संकल्प रूपी धनुष बाण लेकर हृदय में बसने लगता है। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! देह बुद्धि (कलियुग) की अवस्था बहुत कठिन होती है। उस अवस्था में देह के नर-नाड़ीं चिन्ता रूपी पाप पैदा करने लगते हैं। दो0 कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ। दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहुपंथ।।97(क)।। व्याख्या : कलिमल में ग्रसित होने पर अर्थात् देह बुद्धि के विकारों में लिप्त होने पर सद् अनुभूति मिट जाती है और दम्भ में भरकर कल्पना कर करके बहुत से पंथ प्रकट हो जाते हैं अर्थात् दम्भी बनकर साधक कल्पना से नए पंथों को पैदा कर देता है। दो0 भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म।।97(ख)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! आप तो ज्ञान के भण्डार व परमात्मा को जानने वाले हैं। अत: मैं तुम्हें तामसिक विकारों (कलिधर्म) की धारणा को बताता हूँ जिसके मोह व लोभ में पड़ जाने पर जीव के शुभ कर्म ग्रसित हो जाते हैं। बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।। द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।। व्याख्या : जैसे व्यष्टि में चार गुणों की अवस्था (तम, रज, सत व गुणातीत) होती है वैसे ही समष्टि में चार गुणों की अवस्था ही चार युगों के रूप में बतायी जाती है। इन चौपाइयों में समष्टि की चार युगों की अवस्थाओं में से तामसिक (कलि) अवस्था के गुण धर्मों का यहाँ वर्णन किया गया है। वास्तव में जब तामसिक गुण की प्रधानता रहती है तब वह कलियुग कहलाता है और जब राजसिक गुण की प्रबलता आ जाती है, तब वह द्वापर युग कहलाता है और जब सात्विक गुणों का आधिपत्य हो जाता है, तो वह अवस्था त्रेता युग की अवस्था कहलाती है और जब गुणातीत अवस्था आ जाती है तो वह सतयुग की अवस्था कहलाती है। इन चौपाइयों में समष्टि के कलियुग अर्थात् तामसिक अवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है कि तामसिक (कलियुग) अवस्था में कोई वर्ण की धारणा को नहीं मानता है और न ही चारों आश्रम की अवस्था का ही पालन करता है। तामसिक अवस्था में सुरता के प्रतिकूल अर्थात् अन्तर्रात्मा के प्रतिकूल ही कार्य होता है। नर-नाड़ी की धड़कन भी सुरता को विचलित करने वाली ही होती है। दिव्य ज्ञान वाले सुरता को बेचनेवाले अर्थात् सुरता के विपरीत कर्म करने वाले होते हैं और राजा प्रजा को खाने वाले अर्थात् तामसिक भाव सात्विक व राजसिक भावों को दबा डालने वाले होते हैं और कोई भी अनुभव के अनुशासन को नहीं मानने वाले होते हैं। मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।। मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।। व्याख्या : उस तामसिक अवस्था में जो जिसको अच्छा लगता है, वो ही उसका मार्ग हो जाता है। तामसिक (कलियुग) अवस्था में जो ज्यादा फेंकता (गाल बजाता है) वही विद्वान माना जाता है जो झूठे दम्भ में रत रहता है, उसे ही कलि (तामसिक) की अवस्था में लोग संत कहते हैं। सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।। जो कह झूठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।। व्याख्या : तामसिक अवस्था (कलियुग) में जो दूसरों के धन को हरने वाला होता है, उसे ही लोग सयाना (चतुर) कहते हैं और जो पाखण्ड का दम्भ करते हैं, उसे ही बड़ा आचार्य माना जाता है। जो झूठ और मसखरी (हँसी-मजाक) करना जानता है, उसे ही तामसिक अवस्था में लोग गुणवान बोलने लगते हैं। निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।। जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।। व्याख्या : जो सहज आचरण और अनुभव (वेद) पथ को छोड़ देता है, वही तामसिक अवस्था में ज्ञानी और वैरागी कहलाता है जिसके पाखण्ड रूपी नख और लालसा रूपी विशाल जटाएँ होती हैं, वही तामसिक अवस्था में बड़ा तपस्वी कहलाता है। दो0 असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलियुग माहिं।।98(क)।। व्याख्या : जो दुराचार रूपी अशुभ भेष और अमंगल रूपी भूषण धारण करके कुवासना रूपी भक्ष्य-अभक्ष्य सबको खा लेते हैं, वे ही तामसिक अवस्था में बड़े योगी, सिद्ध व पूज्यनीय होते हैं। सो0 जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ।।98(ख)।। व्याख्या : तामसिक अवस्था (कलियुग) में जिनके आचरण दूसरों का अपकार करने वाले होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठे) हैं, वे ही तामसिक अवस्था में (कलियुग में) बड़े वक्ता माने जाते हैं। नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं।। सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! तामसिक अवस्था में जीव नाड़ी की धड़कन के वश में होकर व्याकुल हो जाता है और नाड़ी के भावों के अनुसार बन्दर की तरह नाचने लगता है। शूद्र अर्थात् शीघ्र प्रभावित होने वाले भाव रूपी लोग दिव्य ज्ञान वाले भावों को उपदेश देने लगते हैं अर्थात् शीघ्र द्रवित होने वाले भाव प्रबल हो उठते हैं और तामसिक भावों की माला डालकर वासनाओं रूपी दान को ग्रहण करने लगते हैं। अर्थात् तामसिक अवस्था के भाव कुवासनाओं में फँसते चले जाते हैं। सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।। गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।। व्याख्या : सब पुरुष काम, लोभ व क्रोध में रत हो जाते हैं अर्थात तामसिक अवस्था में नर (धड़कन) काम, लोभ व क्रोध के भाव पैदा करने लगती है और देव भाव, विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भाव, सुरता व संत भावों के विरोधी भाव पैदा होने लगते हैं। देह स्थित नाड़ी (नारी) गुणों के मन्दिर, सुंदर व सहज नर रूपी पति को त्याग करके अर्थात् नर (धड़कन) से स्वतंत्र होकर पर पुरुष अर्थात् प्रकृति के भावों के अधीन होकर धड़कने लगती है। सौभागिनी बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।। गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।। व्याख्या : तामसिक अवस्था में अर्थात् कलियुग में सौभागिनी अर्थात् सात्विक इच्छाएँ आभूषणों से रहित होती हैं अर्थात् सात्विक इच्छाएँ निरस होती हैं और तामसिक इच्छाओं के नाना श्रृंगार अर्थात् नाना प्रकार से लालसाओं का बल होता है। गु डिग्री और शिष्य बहरे और अंधे की तरह होते हैं अर्थात् अन्त:गुरु यानि तामसिक अवस्था में अंतरात्मा को सुनाई नहीं देता और जीव रूपी शिष्य को दिखायी नहीं देता। हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।। मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।। व्याख्या : जो गु डिग्री शिष्य का धन तो हर लेते हैं परन्तु दु:खों को नहीं हरते हैं, वे ऐसे गु डिग्री घोर चिन्ता रूपी नरक में पड़ते हैं। माता-पिता भी बालकों को बुलाकर पेट भरने के धर्म की शिक्षा देते हैं। दो0 ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात। कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात।।99(क)।। व्याख्या : समष्टि की तामसिक अवस्था (कलियुग) में स्त्री-पुरुष ब्रह्म ज्ञान के अभाव में भोगों के अलावा या तामसिकता के अलावा दूसरी कोई बात ही नहीं करते हैं और कौड़ी के लोभ में पड़कर विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले गु डिग्री के साथ भी धोखा कर देते हैं। अर्थात् लोभ में पड़कर अन्त:करण स्थित गु डिग्री से अपघात करते रहते हैं। दो0 बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि। जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।।99(ख)।। व्याख्या : शीघ्र द्रवित होने वाले अर्थात् शीघ्र तामसिकता के प्रभाव में आने वाले भाव रूपी लोग दिव्य ज्ञान वाले भाव रूपी लोगों से विवाद करते रहते हैं कि हम क्या तुमसे कम हैं? जो ब्रह्म को जानते हैं, वे ही दिव्य प्रकाश वाले होते हैं, ऐसा कहकर आँख दिखाते हैं। पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।। तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर।। व्याख्या : तामसिक अवस्था में जीव को ब्रह्म ज्ञान का भ्रम भी हो जाता है। उसी भाव दशा को प्रतीकों का सहारा लेकर इन चौपाइयों में लिखा गया है। तामसिक (कलियुग) अवस्था में पर त्रिय अर्थात् प्रकृति के तीनों गुण (सत, रज व तम) जीव का बंधन बन जाते हैं और कपट की चतुरता बढ़ जाती है तथा मोह, द्रोह व ममता का जाल बन जाता है। उस अवस्था में ज्ञान का भ्रम होकर जीव अपने-आपको परमात्मा से अभेद मानने लग जाता है। मैंने तामसिकता (कलयुग) के इस प्रभाव को अनुभव किया है। आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सतमारग प्रतिपालहिं।। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।। व्याख्या : ऐसे लोग स्वयं तो डूबते ही हैं, दूसरों को भी जो सात्विक मार्ग पर चलने वाले होते हैं, उनको भी भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। उस अवस्था में कल्पना कर-करके चिन्ता रूपी नरक पैदा होता रहता है। उस चिंता रूपी नरक में तामसिकता के प्रभाव से सुरता दूषित होकर पड़ जाती है अर्थात् सुरता तामसिक भावों के जाल में पड़ जाती है। जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।। नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी।। व्याख्या : तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो अधम वर्ण के हैं, स्त्री के मरने पर या घर की सम्पत्ति के नष्ट होने पर सिर मुड़वा कर संन्यासी हो जाते हैं। इन चौपाइयों में समष्टि की तामसिक अवस्था के प्रभाव को बताया गया है। ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हात नसावहिं।। बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।। व्याख्या : वे तामसिकता (कलियुग) के प्रभाव से उत्पन्न भ्रम में पड़कर अपने आपको विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञानियों से पूजवाते हैं अर्थात् गुणीजनों का अपमान करते हैं। इस प्रकार सांसारिक व्यवहार व आत्मिक व्यवहार दोनों को नष्ट कर लेते हैं। वे तामसिक (कलियुगी) प्रभाव वाले अपने आपको निरक्षर, लोलुप, कामी, दुराचारी, मूर्ख व वासनाओं से ग्रसित (वृषली स्वामी) होते हुए भी विशुद्ध प्रकाश वाला ही कहते हैं। सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।। सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।। व्याख्या : तामसिक वृति वाले शीघ्र द्रवित होकर अर्थात् शीघ्र भावों से प्रभावित होकर नाना प्रकार के जप, तप व व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन पर बैठकर पुराण आदि का वर्णन करते हैं। उस अवस्था में कल्पना के अनुसार लोग आचरण करने लगते हैं। अर्थात् तामसिकता की अवस्था में नर की धड़कन कल्पना के भावों से प्रभावित होकर चलने लगती है जिससे असहज भाव पैदा होने लगते हैं। अत: उस असहज अवस्था (अनीति) का वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 भए बरन संकर कलि भिन्न सेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग।।100(क)।। व्याख्या : तामसिकता के (कलियुग) प्रभाव से भाव वर्णशंकर अर्थात् असहज वृति वाले होकर विपरीत पथों पर चलने वाले हो जाते हैं। जिससे चिन्ता (पाप) पैदा हो जाती है और फलस्वरूप भय, शोक व वियोग के दु:ख सताने लगते हैं। दो0 श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।100(ख)।। व्याख्या : तामसिकता (कलियुग) की अवस्था में नर की धड़कन से परमात्मोन्मुखी भक्ति व वैराग्य के भाव पैदा नहीं होते हैं और सुरता भी परमात्मोन्मुखी नहीं रहती है। इसलिए नर की धड़कन सहज न होकर कल्पनाओं के प्रभाव में आकर मोह के पथ पर अर्थात् मोह के भाव पैदा करने लग जाती है। छ0 बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।। तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कहीं।। व्याख्या : तामसिक (कलियुग में) अवस्था में साधक बहुत धन कमाने की इच्छा रखने लगता है और विषयों द्वारा उसकी बुद्धि का हरण हो जाता है , जिससे वैराग्य की वृति नहीं रह पाती है। तपस्वी बनकर तामसिकता के प्रभाव में आने पर धनवान बन जाते हैं और गृहस्थ लोक दरिद्र हो जाते हैं। अर्थात् साधक सुख-शान्ति के अभाव में गृहस्थ जीवन में दरिद्र हो जाते हैं परन्तु तपस्या का पाखण्ड करके धन खूब कमा लेते हैं। इस प्रकार तामसकिता (कलियुग) के प्रभाव के खेल का वर्णन नहीं किया जा सकता है। छ0 कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती।। सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।। व्याख्या : तामसिकता का प्रभाव बढ़ने पर शरीर स्थित सहज नाड़ी की गति बदल जाती है और नाड़ी असहज होकर धड़कने लग जाती है। उसी को सहज (कुलवती और सती) नारी को घर से बाहर निकालना और दासी (असहज नाड़ी) को घर (देह रूपी घर) में लाना बोलकर लिखा गया है। भाव रूपी पुत्र तब तक ही सहज रहते हैं अर्थात् नर-नाड़ी रूपी माता-पिता के अनुकुल रहते हैं, जब तक किसी वासना रूपी इच्छा के सम्पर्क में नहीं आते हैं। उसी को पुत्र का माता-पिता के तब तक अनुकूल रहना बताया गया है जब तक स्त्री के सम्पर्क में नहीं आता है। छ0 ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें।। नृप पाप परायन धर्म नहीं। कर दंड बिडंब प्रजा नितहीं।। व्याख्या : ससुरारि अर्थात् स्वरों की असहज गति तब से (जब वासना रूपी स्त्री से सम्पर्क हो जाता है) प्रिय लगने लगती है और सहज भाव रूपी कुटुम्ब शत्रु रूप लगने लग जाता है। नृप अर्थात् नर की धड़कन पाप परायन अर्थात् चिंता पैदा करने वाली हो जाती है और इस प्रकार भाव रूपी प्रजा को चिंता रूपी दण्ड मिलने लग जाता है। छ0 धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।। नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।। व्याख्या : इच्छावान (धनवंत) भाव मलीन (वासनायुक्त) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं और दिव्य ज्ञान के भावों का चिन्ह केवल त्रिगुणात्मक आभास मात्र रह जाता है और तपस्वी का चिन्ह बस नंगे बदन रहना हो जाता है। कोई भी तामसिक अवस्था में वेदों व पुराणों की बातों को नहीं मानते हैं अर्थात् तामसिकता की प्रबलता होने पर जीव अन्त:करण के अनुभव को नहीं मानता है। तामसिक अवस्था (कलियुग) में वेद विरुद्ध अर्थात् अनुभव के प्रतिकूल आचरण करने वाले ही भगवान के भक्त व संत कहलाते हैं। अर्थात् तमोगुण के जाल में फँसने पर साधक को विपरीत असहज अवस्था ही सही लगने लगती है। छ0 कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक बात न कोपि गुनी।। कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।। व्याख्या : तामसिक (कलियुग) अवस्था में कवियों के तो झुण्ड हो गए परन्तु उदार दुनिया में सुनायी नहीं पड़ता। अर्थात् वाचाल वक्ता तो बहुत हो जाते हैं परन्तु कथनी के आचरण वाले नहीं सुनायी पड़ते। दूसरों में दोष निकालने वाले भी बहुत हो जाते हैं परन्तु गुणों का आदर करने वाले नहीं होते। तामसिक (कलियुग) अवस्था में बार-बार अकाल पड़ने लगते हैं। व्यष्टि की तामसिक अवस्था में बार-बार वासनाओं की तृष्णा का अकाल पड़ने लगता है और बिना अन्न अर्थात् ऊर्जा के अभाव में सद्भाव रूपी लोग मरने लगते हैं। दो0 सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मांड।।101(क)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! तामसकि (कलियुग) अवस्था में हठ, कपट, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह और काम आदि और मद के भाव मस्तिष्क रूपी ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जाते हैं। दो0 तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान।।101(ख)।। व्याख्या : तामसिक अवस्था में तामसिक धारणा के अनुसार ही जप, तप, व्रत, यज्ञ व दान होने लगते हैं। जिससे दैवीय भावों का रस रूपी जल देह रूपी पृथ्वी पर नहीं बरसता है। जिससे मनोरथ रूपी अन्न उग नहीं पाता है। अर्थात् जीव की मनोकामना पूर्ण नहीं होती, जिससे काम, क्रोध आदि के भाव और ज्यादा कुण्ठित होकर विकृत होते चले जाते हैं। छ0 अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।। सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।। व्याख्या : स्त्रियों के बालही उनके आभूषण होते हैं और उन्हें काम वासना की बहुत भूख लगती है। वे धनहीन व बहुत ममता के कारण दु:खी रहती हैं। वे मूर्ख बिना धर्म के आचरण के सुख चाहती हैं। बुद्धि थोड़ी और कठोर होती है और उनमें कोमलता नहीं होती है। छ0 नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।। व्याख्या : तामसिकता (कलियुग) के प्रभाव वाला मनुष्य नाना रोगों से पीड़ित हो जाता है और उसको भोगों का सुख भी नहीं मिल पाता है। वह अभिमान के कारण अकारण ही विरोध करने लगता है। दस-पाँच वर्ष का जीवन होता है परन्तु वह तामसिक वृति वाला मनुष्य दम्भ ऐसा भरता है मानों प्रलयकाल में भी उसका अंत (नाश) नहीं होगा। छ0 कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा।। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।। व्याख्या : तामसिकता के (कलियुग) प्रभाव से मनुष्य का हाल बेहाल हो जाता है। तामसकि प्रभाव वाला मनुष्य कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। उसे मन में संतोष व शान्ति नहीं होती है। तामसकि अवस्था में माँगने की (चाह की) वृति प्रबल हो जाती है इसलिए जाति-कुजाति सभी माँगने वाले हो जाते हैं। छ0 इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।। सब लोग बियोग बिसोक हए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।। व्याख्या : तमो गुण के प्रभाव से ईर्ष्या, कड़ुवे वचन और लालच भरपुर हो जाते हैं तथा समता का भाव मिट जाता है। उस अवस्था में सब लोग वियोग और शोक से भरे पड़े होते हैं। तामसिक प्रभाव वाला मनुष्य बर्णाश्रम धर्म का भी पालन नहीं करता है। छ0 दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।। तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।। व्याख्या : तमोगुण की प्रबलता होने पर इन्द्रियों के दमन, दान, दया व समझदारी की भावना नहीं रह पाती है। मूर्खता और दूसरों को ठगने की वृति प्रबल हो उठती है। उस तामसिक अवस्था में सभी स्त्री-पुरुष शरीर के पोषण में ही लग जाते हैं। जो परायी निंदा करने वाले होते हैं, वे ही जगत में फैल जाते हैं। दो0 सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार।।102(क)।। व्याख्या : हे वासना रूपी सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए -- तामसिक गुण अवस्था चिन्ता रूपी पाप व अवगुणों का घर होती है। परन्तु तामसिक (कलियुग) अवस्था का एक गुण है कि उसमें बिना ही प्रयास से भावों के भव बन्धन से छुटकारा मिल जाता है। दो0 कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।।102(ख)।। व्याख्या : सत्युग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ व योग से होती है अर्थात् गुणातीत अवस्था, सतोगुणी अवस्था व रजोगुणी अवस्था में साधक को जो गति पूजा (मन के निर्मल भावों द्वारा परमात्मा के प्रति समर्पण का भाव) यज्ञ (अपान का पान में हवन करना) व योग (भावना द्वारा परमात्मा से जुड़ना) से होती है, वही गति तमोगुणी अवस्था में परमात्मा का नाम लेकर प्राप्त कर सकता है। कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। व्याख्या : गुणातीत अवस्था वाले जीव सब योगी व विज्ञानी होते हैं जो परमात्मा के ध्यान में लीन होकर भाव रूपी भव सागर को पार कर जाते हैं। सतोगुणी अवस्था (त्रेता युग) में जीव नाना प्रकार के यज्ञ अर्थात् प्राणायाम की क्रिया करता है और परमात्मा के प्रति समर्पण की भावना रखकर भाव रूपी भवसागर को पार कर जाता है। द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।। व्याख्या : द्वापर अर्थात रजोगुणी अवस्था में परमात्मा की पूजा करके अर्थात भावों के अनुसार भावना करके जीव भाव रूपी भव सागर को पार कर सकता है। दूसरा कोई उपाय नहीं होता है। तामसकि गुण अवस्था (कलियुग) में केवल परमात्मा के गुणगान करके ही जीव भाव रूपी भव सागर की थाह पा सकता है। कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक आधार राम गुन गाना।। सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।। व्याख्या : तमोगुणी अवस्था में साधक न तो योग कर सकता है और न ही यजन अर्थात् पान में अपान का हवन ही कर सकता है और न ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है। उस अवस्था में तो आत्मा रूपी राम के गुणगान करना ही एकमात्र उपाय होता है। इसलिए सब का भरोसा छोड़कर जो एक परमात्मा को भजते हैं और प्रेम सहित परमात्मा के गुणों का गान करते हैं। सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।। व्याख्या : वे लोग ही नि:संदेह भाव रूपी भव सागर को पार कर पाते हैं। तामसिक गुण (कलियुग) अवस्था में नाम का प्रताप प्रकट होता है। तामसकि गुण अवस्था का एक पुण्य प्रभाव और होता है। उस अवस्था में मानसिक पाप नहीं होते हैं परन्तु मानसिक पुण्य (सुख) मिल जाते हैं। दो0 कलिजुग सम जुग आन नहीं जौं नर कर बिस्बास। गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास।।103(क)।। व्याख्या : तामसकि गुण अवस्था (कलियुग) के समान दूसरी कोई गुण अवस्था (युग) नहीं होती है। क्योंकि अगर मनुष्य विश्वास कर ले तो बिना ही प्रयास के परमात्मा के गुणों का गान करके भाव रूपी भव सागर को पार कर सकता है। दो0 प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।।103(ख)।। व्याख्या : धर्म के अर्थात् धारणा के चार चरण तमोगुणी (कलियुग) रजोगुणी (द्वापर) सतोगुणी (त्रेता) व गुणातीत (सत्युग) जगत में प्रसिद्ध हैं। तमोगुणी अर्थात् कलियुग में केवल तमोगुण का प्रभाव रहता है। अत: जैसे-तैसे भी तमोगुण का त्याग (दान) कर देने पर कल्याण ही होता है। नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। व्याख्या : सब जीवों के हृदय में नित्य गुणों से प्रेरित धारणा होती रहती है। शुद्ध सात्विक, समता व विज्ञान की अवस्था सत्युग अर्थात् गुणातीत अवस्था का प्रभाव होता है, जिसमें मन प्रसन्न रहता है। सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।। व्याख्या : जब सतो गुण बहुत होता है और रजोगुण थोड़ा होता है और जीव की कर्मों में रूचि रहती है तथा सब प्रकार का सुख रहता है, तो त्रेता युग की अवस्था होती है। जब रजोगुण बहुत और सतोगुण थोड़ा और कुछ तमोगुण रहता है तो वह द्वापर की अवस्था होती है जिसमें मानस (चेतना) में हर्ष व भय के भाव बने रहते हैं। तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। व्याख्या : जब तमोगुण बहुत और रजोगुण थोड़ा होता है तो वह कलियुग की अवस्था कहलाती है, जिसमें चारों ओर विरोधाभास होता है। इसलिए विद्वान लोग इन युग धर्मों के मर्म को मन में ही जानकर असहजता (अधर्म) का त्याग करके सहज धर्म का पालन करते हैं अर्थात् गुणों को गुणों में बरतने देते हैं। काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।। व्याख्या : इसलिए जिसकी परमात्मा के चरणों अत्यन्त प्रीति होती है उसे काल धर्म (गुण धर्म) नहीं व्यापता है। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! नट के द्वारा किया गया माया का जाल बहुत विकट होता है परन्तु वह नट के जंभूरे को नहीं व्यापता है। उसी प्रकार गुणों से उत्पन्न माया जाल परमात्मा के सेवकों को नहीं व्यापता है। दो0 हरिमाया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं। भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं।।104(क)।। व्याख्या : परमात्मा की माया से उत्पन्न गुण व दोष बिना परमात्मा के भजन के नहीं मिटते हैं। अत: ऐसा विचार करके सब काम का त्याग करके परमात्मा का भजन करना चाहिये। दो0 तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस।।104(ख)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! उस तामसिक गुण (कलियुग) अवस्था में मैं सात्विक अहंकार का भाव बहुत दिनों तक देह रूपी अयोध्या में रहा। परन्तु दुकाल अर्थात् गुण धर्म में दुविधा होने पर विपत्ति में पड़कर मैंने देह रूपी अयोध्या को छोड़ दिया। अर्थात् देह बुद्धि से बाहर आ गया। गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।। गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! मैं सात्विक अहंकार उज्जैन में गया अर्थात् उर्ध्वगामी होकर देहबुद्धि के कोश से निकलकर स्वयं को आभासित कराने वाले कोश में गया। वास्तव में मस्तिष्क में एक कोश ऐसा होता है जहाँ स्वयं के स्वरूप का बोध होता है। वही उज्जैन कोश होता है जिसमें शंभु रहते हैं अर्थात् स्वयं का आभास होता है। मैं (सात्विक अहंकार) उस समय दीन, मलीन, दरिद्र व दु:खी था। अर्थात तामसिकता के आभास के कारण ज्ञान, श्रद्धा व भक्ति से हीन व दु:खी था। फिर कुछ समय बीत जाने पर अर्थात् तमोगुणी अवस्था से बाहर आ जाने पर कुछ परमात्मा के प्रति भक्ति, ज्ञान व श्रद्धा रूपी सम्पत्ति प्राप्त कर ली और उस अवस्था में मैं स्वयं के स्वरूप को (शंभु) जानने का प्रयास करने लगा। बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।। परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।। व्याख्या : उज्जैनी कोश में विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वाला भाव होता है, जिसे साधारण बोलचाल की भाषा में अन्त:करण की आवाज कहा जाता है। वह विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाला भाव अनुभव (वैदिक) और विश्वास के आधार पर अन्त:करण में परमात्मा की पूजा करता रहता है। उसका दूसरा कोई काम नहीं होता है। वह विशुद्ध प्रकाश वाला भाव परमार्थ के मर्म को जानने वाला होता है तथा स्वयं के स्वरूप की साधना करने वाला होता है परन्तु दम्भ में पड़कर परमात्मा की निंदा नहीं करने वाला होता है। तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।। बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।। व्याख्या : परन्तु मैं सात्विक अहंकार का भाव उसकी (विशुद्ध प्रकाश के भाव की) कपटपूर्वक सेवा करता था अर्थात् विशुद्ध प्रकाश की प्रेरणा को कपटपूर्वक ग्रहण करता था। जबकि विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश का वह दिव्य भाव (द्विज) नीति का घर था। वह मेरी बाहरी नम्रता को देखकर मुझ सात्विक अहंकार को पुत्र की तरह पढ़ाने लगा। पाठकों को सूक्ष्मता से समझ लेना चाहिए कि सात्विक अहंकार का भाव भी बहुत ही सूक्ष्मता से कपट का व्यवहार करता है। उसी अनुभूति को बहुत सूक्ष्म प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।। जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।। व्याख्या : विशुद्ध प्रकाश वाले भाव ने मुझ सात्विक अहंकार को शंभु मंत्र अर्थात् अन्त:करण में स्वयं के स्वरूप को जानने की प्रेरणा की और नाना प्रकार से प्रेरणा करके मुझे समझाया। तब मैं मन के अन्दर स्वयं के स्वरूप को खोजने का प्रयास करने लगा। परन्तु मुझ सात्विक अहंकार के हृदय में बहुत दम्भ था। दो0 मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरिजन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह।।105(क)।। व्याख्या : परन्तु मैं मूर्खता के विकारों से युक्त व नीच वृति (तामसिक) वाला होकर मोह के वश में था। इसलिए परमात्मा के भक्तों और दिव्य ज्ञान के भावों को देखकर हृदय में जल उठता था। इस प्रकार अणु-अणु (विष्णु) से द्रोह करता था। वास्तव में जब साधक स्वयं के स्वरूप को साधने का प्रयास करता है तो मोहवश वह स्वयं को ही सब कुछ मानने का भ्रम पाल लेता है जिससे वह अहंकार वश सबसे द्रोह करने लग जाता है। सो0 गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति के भावई।।105(ख)।। व्याख्या : विशुद्ध प्रकाश रूपी गु डिग्री मुझे नित्य प्रेरणा कर समझाते थे और मेरे आचरण को देखकर बहुत दु:खी थे। परन्तु मुझमें तो उल्टा क्रोध ही पैदा होता था। क्योंकि दम्भ की अवस्था में नीति अच्छी नहीं लगती है। एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।। सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।। व्याख्या : एक बार विशुद्ध प्रकाश रूपी गु डिग्री ने अपने पास बुलवा लिया और बहुत प्रकार से मुझे नीति की शिक्षा दी। पाठकों को यह पढ़कर आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि ध्यान में भावों में बहुत सूक्ष्मता से वार्तालाप होता है। इसलिए विशुद्ध प्रकाश रूपी गु डिग्री भाव सात्विक अहंकार के भाव को नाना प्रकार से समझाता है कि विश्वास रूपी शिव की साधना का फल यह होता है कि परमात्मा के चरणों में अविरल भक्ति पैदा हो जाती है। अर्थात् परमात्मा पर विश्वास दृढ़ हो जाने से अविरल भक्ति पैदा हो जाती है। रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पाँवर कै केतिक बाता।। जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।। व्याख्या : हे तात्! विश्वास रूपी शिव व बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी आत्मा रूपी राम को भजते हैं फिर नीच मनुष्य की तो बात ही क्या है? जिस परमात्मा के चरणों में विश्वास रूपी शिव और बुद्धि रूपी ब्रह्मा अनुराग रखते हों, उन परमात्मा से द्रोह करके सुख चाहने वाले अभागी होते हैं। हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।। अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।। व्याख्या : विशुद्ध प्रकाश रूपी गु डिग्री ने जब यह कहा कि विश्वास रूपी शिव भी परमात्मा के सेवक होते हैं तो हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! मेरे हृदय में जलन हो उठी। अधम वृति (तामसिक) का होने के कारण मैं अहंकार का भाव विधा पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलाने पर सर्प हो जाता है। मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।। अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।। व्याख्या : मैं (अधम वृति का अहंकार) अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति दिन रात विशुद्ध प्रकाश रूपी अन्त:गु डिग्री से द्रोह करने लगा। परन्तु गुरुदेव तो बहुत दयालु थे और उन्हें थोड़ा भी क्रोध नहीं था, इसलिए वे बार-बार मुझे अच्छी तरह समझाते थे। जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।। धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।। व्याख्या : जिससे नीच बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसी को मारकर उसका नाश करता है। हे भाई। आग से उत्पन्न धुआँ मेघ की पदवी पाकर उसी आग को बुझा देता है। रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।। मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।। व्याख्या : धूल रास्ते में निरादर से पड़ी रहती है और रास्ते में चलने वालों के पैरों का प्रहार सहती रहती है। पर जब पवन उसे उड़ाता है अर्थात् ऊँचा उठाता है तो सबसे पहले उसी को भर देती है और फिर राजाओं के नेत्रों और मुकुटों पर पड़ती है। उसी प्रकार नीच वृति के भाव प्राण से मिलकर पहले तो प्राण को ही अशुद्ध कर देते हैं और फिर नृप अर्थात् नर की धड़कन को विचलित करके नीच वृति के भावों को बढ़ावा देने लगते हैं। सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।। कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! इस बात को समझकर विद्वान लोग नीच मनुष्य का संग नहीं करते हैं। कवि और कोविद (विद्वान) ऐसी नीति बताते हैं कि मूर्ख (दुष्ट) से न तो कलह अच्छी होती है और न ही उससे प्रेम करना अच्छा होता है। उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परि हरिअ स्वान की नाईं।। मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।। व्याख्या : हे गोसाईं! दुष्ट से तो सदा उदासीन ही रहना चाहिए। दुष्ट को तो कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिए। मैं (अधम अहंकार) कपटी और कुटिल हृदय था। इसलिए गु डिग्री जी ने मेरे कल्याण की बात कही तो भी मुझे अच्छी नहीं लगी। दो0 एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम।।106(क)।। व्याख्या : साधक को ध्यान की अवस्था में गु डिग्री शक्ति बार-बार परमतत्व के मर्म को समझाने का प्रयास करती है परन्तु अभिमान व भ्रम के कारण साधक समझना नहीं चाहता और अपने विश्वास पर ही अडिग बना रहना चाहता है। ऐसी अवस्था में यह गुरु तत्व का अपमान हो जाता है जिससे परम तत्व नाराज हो जाता है। उसी अनुभूति को इस दोहे में लिखा है कि एक बार मैं (अधम अहंकार) मन के अन्दर (मन्दिर) विश्वास रूपी शिव का जप कर रहा था। उस अवस्था में अन्त:करण में गुरु तत्व प्रकट हुआ परन्तु मैंने गु डिग्री को उठकर प्रणाम नहीं किया अर्थात् गुरूतत्व का अनादर किया। दो0 सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस।।106(ख)।। व्याख्या : दयालु गुरूदेव ने कुछ नहीं कहा और बिल्कुल क्रोध भी नहीं किया। परन्तु गु डिग्री तत्व के अनादर को महेश अर्थात् महाऐश्वर्य का भाव यानि सृष्टि का महतत्व सहन नहीं कर सका। मंदिर माझ भई नभबानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।। जद्यपि तव गुर के नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।। व्याख्या : तब मन के अन्दर (मन्दिर) ही मस्तिष्क रूपी आकाश से आवाज आयी कि अरे हतभाग्य मूर्ख अभिमानी! यद्यपि गु डिग्री तत्व को क्रोध नहीं है क्योंकि गु डिग्री तत्व तो अत्यन्त कृपालु और सम्यक ज्ञान वाला होता है। तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।। जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।। व्याख्या : तो भी हे मूर्ख! मैं तुझको श्राप दूँगा, क्योंकि नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता है। अगर हे मूर्ख! मैं तुझे दण्डित नहीं करूँगा तो श्रुति मार्ग अर्थात् अनुभव का रास्ता भ्रष्ट हो जायेगा। वास्तव में परमात्मा साधक को पहले तो नाना प्रकार से प्रेरणा करके समझाने का प्रयास करते हैं और प्रेरणा को नहीं मानने पर साधक को दण्ड (शिक्षा) देकर रास्ते में लाते हैं। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर यहाँ लिखा गया है। जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।। त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।। व्याख्या : जो मूर्ख गु डिग्री से ईर्ष्या करते हैं, वे कई तरह (कोटि) के चिंता रूपी नरक में पड़ते हैं। फिर वहाँ से निकलकर तिर्यक योनियों अर्थात् तीन गुणों से बंधन में पड़कर पशु, पक्षी आदि में शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मों तक दु:ख पाते रहते हैं। बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।। महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई।। व्याख्या : अरे पापी! तू अजगर की तरह गु डिग्री के सामने बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पाप से ढक गयी है, अत: तू अब सर्प हो जा। और अधम से भी अति अधम इस अधोगति को पाकर तू किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह। सर्प होने का तात्पर्य वासनाओं में फँस जाने से है। जब जीव अभिमान वश अन्त:गु डिग्री की प्रेरणा को नहीं मानता है तो परमशक्ति गु डिग्री तत्व का अनादर देखकर जीव को वासनाओं में धकेल देती है उसी को सर्प हो जाने का श्राप कहा गया है। दो0 हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप।।107(क)।। व्याख्या : परम शिव तत्व के कठोर शाप को सुनकर गु डिग्री तत्व द्रवित हो उठा और मुझ अहंकार को काँपता हुआ देखकर उनके हृदय में बहुत कष्ट हुआ। दो0 करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि।।107(ख)।। व्याख्या : तब शिव तत्व के सामने हाथ जोड़कर अर्थात् समर्पण करके प्रेमपूर्वक गदगद स्वर से मेरी (अहंकार) दुर्दशा देखकर प्रार्थना की। उस अवस्था में परम शिव तत्व और अन्त:गुरु तत्व में संवाद स्थापित हो जाता है और जीवात्मा उस संवाद को सुनने लगती है जिससे जीवात्मा को परम तत्व की कृपा मिलने लग जाती है। उसी भाव दशा को प्रतीकों का सहारा लेकर गु डिग्री द्वारा शिव की विनयपूर्वक प्रार्थना करना बताकर लिखा गया है। यहाँ गु डिग्री तत्व विस्तारपूर्वक परमात्मा तत्व का गुणगान करते हुए स्वरूप का वर्णन करने लगता है। उसी को आगे के छन्द में लिखा गया है। छ0 नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे%हं।। व्याख्या : हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म, अनुभव स्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी परम कल्याणकारी (शिव)! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निज स्वरूप में स्थित, मायिक गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप व मस्तिष्क रूपी आकाश में निवास करने वाले प्रभु! मैं आपको भजता हूँ। निराकार मोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो%हं।। व्याख्या : निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय अर्थात तीनों गुणों से परे, वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैवल्य के उल्लास के स्वामी (कैलाशपति), विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ। तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।। व्याख्या : जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर नदी गंगाजी विराजमान है अर्थात् जिनके मस्तिष्क से आनन्द की गंगा बहती है, जिनेक ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा अर्थात् जिनके ललाट पर चन्द्रमा की सी शीतलता है और गले में सर्प सुशोभित हैं अर्थात् जिसने वासनाओं को वश में किया हुआ है। चलत्कुंडलं भ् डिग्री सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।। मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।। व्याख्या : जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं अर्थात् शब्दों की दिव्य ध्वनि आ रही है और नेत्र विशाल हैं अर्थात् जिनकी दिव्य दृष्टि है। जिनका मुख प्रसन्न है और कण्ठ नीला है तथा दयालु हैं। सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए अर्थात् निर्भयता को धारण करने वाले और मुण्डमाला पहने हैं अर्थात् मन के भावों की माला को धारण किए हुए हैं। उन सबके प्यारे और सबके नाथ कल्याणकारी शिव को मैं भजता हूँ। प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगलम्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटि प्रकाशं।। त्रय: शूल निर्मूलनं शूल पाणिं। भजे%हं भवानीपतिं भावगम्यं।। व्याख्या : प्रचण्ड, श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, सूर्य के स्तर का प्रकाश करने वाले, तीनों प्रकार के दु:खों को निर्मूल करने वाले, तीनो गुणों रूपी त्रिशूल को हाथ में धारण करने वाले अर्थात् तीनों गुणों को वश में करने वाले, भाव अर्थात् प्रेम के भावों द्वारा समझ में आने वाले भावों को पैदा करने वाली शक्ति भवानी के पति कल्याणकारी परमात्मा को मैं भजता हूँ। कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।। चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।। व्याख्या : कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्पनाओं का अंत करने वाले, सदा सज्जनों को आनन्द देने वाले, पुरारी अर्थात् देह (पुर) भावों के शत्रु, सतचितआनन्द स्वरूप, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु प्रभु! आप प्रसन्न हूजिए, प्रसन्न हूजिए। न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवास।। व्याख्या : जब तक श्रद्धा रूपी पार्वती के पति विश्वास रूपी शिव के चरणों को लोग नहीं भजते तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करने वाले प्रभो! प्रसन्न हूजिए। न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो%हम् सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।। जरा जन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।। व्याख्या : मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही जानता हूँ। हे शम्भो (अर्थात् स्वयं में आभासित होने वाले प्रभो)! मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म-मृत्यु के दु:ख समूहों से जलते हुए मुझ दु:खी की दु:ख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। श्लोक रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भवत्या तेषां शम्भु प्रसीदति।।9।। व्याख्या : परमात्मा को शीघ्र द्रवित(रुद्र) करने के लिए यह अष्टक विशुद्ध प्रकाश वाले (विप्र) भाव द्वारा परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए कहा गया है। अत: जो लोग इस स्तुति को पढ़ेंगे, उन पर स्वयं में स्थित (शम्भु) परमात्मा प्रसन्न हो जायेंगे। दो0 सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।। व्याख्या : विशुद्ध प्रकाश वाले भाव (विप्र) की अनुराग से भरी हुई विनती को सुनकर परम कल्याणकारी परमात्मा प्रसन्न हो गए। तब पुन: मन के अन्दर (मन्दिर) मस्तिष्क रूपी आकाश से आकाशवाणी हुई कि हे दिव्य ज्ञान वाले विशुद्ध प्रकाश वाले भाव! तुम वरदान माँगो। दो0 जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहू।।108(ख)।। व्याख्या : तब विशुद्ध प्रकाश वाला विप्र रूपी भाव बोला कि हे प्रभो! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझ दीन पर अगर आपका स्नेह है, तो पहले तो अपने चरणों की भक्ति दीजिए और फिर दूसरा वर दीजिए। दो0 तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंध भगवान।।108(ग)।। व्याख्या : हे प्रभो! आपकी माया में पड़कर यह मूर्ख जीव निरन्तर भूला फिरता है। अत: हे कृपा के समुद्र प्रभो! आप इस जड़ जीव पर क्रोध मत कीजिए। दो0 संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।। व्याख्या : हे शंकाओं का नाश करने वाले दीनदयाल प्रभु! अब आप इस जड़ जीव पर कृपा करिए जिससे यह शाप थोड़े समय में ही कृपा में बदल जाए। अर्थात् शाप से शिक्षा मिलकर मुक्ति हो जाए। एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।। बिप्र गिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।। व्याख्या : हे कृपानिधान! आप वही करिए जिससे इस जीव का परम कल्याण हो जाए। विशुद्ध प्रकाश के भाव (विप्र) की परोपकार में सनी हुए वाणी को सुनकर मस्तिष्क रूपी आकाश में आकाश वाणी हुई कि ऐसा ही होगा। जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा।। तदपि तुम्हारि साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।। व्याख्या : हालाँकि इसने बहुत बड़ा पाप (अपराध) किया है और मैंने भी क्रोधित होकर शाप दिया है। फिर भी तुम्हारी सज्जनता देखकर मैं इस पर विशेष कृपा करूँगा। छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।। मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।। व्याख्या : जो क्षमाशील और पर उपकारी होते हैं, ऐसे दिव्य आचरण वाले मुझे खरारी अर्थात् अज्ञान के शत्रु के समान प्रिय होते हैं। हे दिव्य ज्ञान वाले सज्जन! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा। इसलिए यह हजार जन्म अवश्य पायेगा। जनमत मरत दुसह दुख होई। एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।। कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।। व्याख्या : परन्तु इसे जन्म-मृत्यु के दु:सह दु:ख बिल्कुल भी नहीं व्यापेंगे। इसका ज्ञान किसी भी जन्म में नष्ट नहीं होगा। हे शीघ्र द्रवित (शूद्र) होने वाले सज्जन! मेरा वचन ही इसका प्रमाण है। रघुपति पुरी जन्म तव भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।। पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।। व्याख्या : तब परमात्व तत्व ने मुझ अधम अहंकार (शूद्र) के भाव से कहा कि तुम्हारा देह रूपी अयोध्या में जब जन्म होगा अर्थात् पुन: तुम देह रूपी अयोध्या में बरतोगे तब तुम्हारा मेरी (परमशिव यानि कल्याणकारी भावना) सेवा में मन लगेगा। तब देह रूपी अयोध्या के प्रभाव और मुझ परमात्मा की कृपा से तुम्हारे हृदय में आत्म भक्ति पैदा होगी। सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।। अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेसु संत अनंत समाना।। व्याख्या : हे भाई! अब मेरे सत्य वचनों को सुनो -- दिव्य ज्ञान वाले सज्जनों की सेवा ही परमात्मा को संतुष्ट करने का व्रत है। इसलिए अब कभी विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों का अपमान मत करना और संत जनों को परमात्मा के समान ही समझना। इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।। जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्र द्रोह पाक सो जरई।। व्याख्या : इन्द्र कुलिस अर्थात् वासनाओं से कुल्षित चित और ममता का भाव ही विशाल कष्ट का कारण होता है। समय का दण्ड परमात्मा का विकराल चक्र होता है। जो इनके मारने पर भी नहीं मरता है, वो विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वालों से द्रोह (विरोध) करने पर चिंता रूपी अग्नि में जल जाता है। अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।। व्याख्या : तुम मन में ऐसा विवेक रखना, तुम्हें संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा। मेरा एक और आशीर्वाद है कि तुम्हारी अबाध गति होगी अर्थात तुम जहाँ जाना चाहोगे वहाँ बिना रोक-टोक जा सकोगे। दो0 सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि।।109(क)।। व्याख्या : मस्तिष्क रूपी आकाश से कल्याणकारी (शिव) वाणी सुनकर गु डिग्री देव ने ""ऐसा ही हो"" यह कहकर मुझ अधम अहंकार को बहुत समझाया और वे कल्याणकारी शिवतत्व को सीस झुकाकर घर चले गए अर्थात् गु डिग्री तत्व सहज अवस्था में आ गया। दो0 प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल।।109(ख)।। व्याख्या : समय की प्रेरणा अनुसार जड़ता (गिरि) के बंधन में बँधा हुआ मैं अधम अहंकार वासना रूपी सर्प बन गया और पुन: समय की प्रेरणा के अनुसार मैंने वासना रूपी सर्प का शरीर छोड़ दिया अर्थात् अधम अहंकार का समय के अनुसार रूपान्तरण हो गया। दो0 जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान।।109(ग)।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! उसके बाद मैं (अधम अहंकार रूपान्तरित होकर) जो जो शरीर धारण करता उसको वैसे ही बिना कष्ट के छोड़ देता जैसे पुराने वस्त्रों का त्याग कर लोग नए कपड़े धारण कर लेते हैं। दो0 सिव राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस।।109(घ)।। व्याख्या : कल्याणकारी शिव तत्व ने सुरक्षा (ध्यान अवस्था) में जो वरदान दिया, उसका पालन किया और मैं अधम अहंकार ने रूपान्तरित होते हुए कुछ भी कष्ट नहीं पाया। इस प्रकार मैंने नाना रूपों में शरीर धारण किया परन्तु मुझ अहंकार की ज्ञान चेतना बनी रही। वास्तव में जब कल्याणकारी शिव तत्व की कृपा हो जाती है तो अधम अहंकार राजसिक में रूपान्तरित हो जाता है और पुन: राजसिक से सात्विक अहंकार में रूपान्तरित होकर पुन: निर्मल होकर गुणातीत अवस्था में पहुँच जाता है। यही कागभुसुण्डि के प्रतीक के माध्यम से समझाया गया है। त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।। एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।। व्याख्या : मैंने तिर्यक भावों के अनुसार नर (धड़कन) के द्वारा जो जो भी शरीर धारण किया उन सब अवस्था में मेरी चेतना परमात्मा के भजन में लगी रही। एक कष्ट मुझे भुलाए नहीं भुलाया जा रहा था वो था मेरे गु डिग्री तत्व के कोमल व शील स्वभाव का मेरे द्वारा जो अनादर किया था। चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।। खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।। व्याख्या : मैंने अर्थात् मुझ अधम अहंकार का रूपान्तरण दिव्य ज्ञान अहंकार के रूप में हो गया। उसी को द्विज की देह पाना बोला गया है। पुराण और वेद बताते हैं कि दिव्य ज्ञान की अवस्था (द्विज का शरीर) देव भावों को भी दुर्लभ होता है। मैं दिव्य ज्ञान की अवस्था प्राप्त करके भी बालवत भावों में परमात्मा की ही लीला किया करता था अर्थात् परमात्मा से जुड़े रहने का प्रयास करता था। प्रोढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।। मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।। व्याख्या : सयाना होने पर अर्थात् दिव्य ज्ञान की अवस्था में परिपक्व होने पर मुझे चित रूपी पिता पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और विचार करता परन्तु मुझे अच्छा नहीं लगता था। मेरे मन से सब वासनाएँ भाग गयी और केवल परमात्मा के चरणों में लौ लग गयी। कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।। प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! ऐसा कौन मूर्ख है जो कामधेनु रूपी परमात्मा को छोड़कर वासना रूपी गदही की सेवा करेगा। मैं दिव्य ज्ञान का भाव तो परमात्मा के प्रेम में मस्त था, इसलिए मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। चित रूपी पिता प्रेरणा रूपी शिक्षा देते देते हार गए। वास्तव में जब दिव्य ज्ञान की अवस्था में साधक स्थिर होने लग जाता है तो साधक का चित प्रेरणा कर-करके साधक को सांसारिक सुखों में धकेलना चाहता है। परन्तु परमात्मा से सच्चा प्यार हो जाने पर साधक को कुछ और अच्छा ही नहीं लगता है। भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।। जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। व्याख्या : जब काल के वश में होकर चित रूपी पिता और वृति रूपी माता शान्त हो गए तो मैं दिव्य ज्ञान अहंकार का भाव वैराग्य रूपी वन में परमात्मा के भजन के लिए चला गया। मैंने स्वरों की गति के अनुसार जहाँ-जहाँ मन के भावों में वैराग्य की अवस्था को पाया वहाँ-वहाँ सीस झुकाया अर्थात वैराग्य की अवस्था को आत्मसात किया। बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।। सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! मैं उनसे (मुनियों अर्थात् मन के भावों से परमात्मा का चिंतन करता) परमात्मा के गुणों की गाथा पूछता और हर्षित होकर सुनता। वास्तव में ध्यान की अवस्था में जब मन पूरी तरह शान्त हो जाता है तब भावों का अन्त: आलाप स्पष्ट सुनने में आने लगता है। उसी भाव दशा को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। परमशिव तत्व की कृपा से मेरी अबाध गति हो गयी, इसलिए मैं परमात्मा के गुणानुवादों को सुनता फिरता था। छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।। राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।। व्याख्या : निरन्तर परमात्मा के गुणानुवादों का चिंतन करने से मैं (दिव्य ज्ञान अहंकार का भाव) तीनों गुणों से उत्पन्न इच्छाओं (तृष्णाओं) से मुक्त हो गया। परन्तु मेरे हृदय में एक विशेष लालसा बढ़ गई कि मैं परमात्मा के चरणों का दर्शन कब करूँ। तभी मेरा जन्म सफल होगा। वास्तव में साधना के दौरान साधक की यह अवस्था आती है जिसमें उसे परमात्मा के दर्शन की प्रबल इच्छा होने लगती है। हालांकि उसके मन में कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती है। जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।। निर्गुण मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।। व्याख्या : मैं जिससे भी पूछता वही यह कहता कि परमात्मा तो सब भूत तत्वों में है। परन्तु निर्गुण मत मुझे संतुष्टि नहीं देता था क्योंकि सगुण ब्रह्म में मेरे हृदय में ज्यादा अनुराग था। दो0 गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग।।110(क)।। व्याख्या : गु डिग्री तत्व के प्रेरणादायक वचनों को याद कर-करके परमात्मा के चरणों में मेरा मन लग गया और परमात्मा के गुणगान करते हुए मैं घूमने-फिरने लगा। उस अवस्था में मेरे मन में क्षण-क्षण में परमात्मा के प्रति नया अनुराग पैदा होने लगा था। दो0 मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन।।110(ख)।। व्याख्या : इस दोहे में साधना का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। मेरु शिखर से तात्पर्य निर्मल अहंकार की परम अवस्था से है। जब अहंकार का भाव परम निर्मल हो जाता है तो परमात्मा में लौ लगने का भाव मस्त हो जाता है। उसी भाव को लोमस ऋषि के प्रतीक के रूप में कहा गया है। बट छायाँ का मतलब परशान्ति की अवस्था से होता है। अत: मेरु शिखर अर्थात् परम निर्मल अहंकार की अवस्था से उत्पन्न लोमस भाव को देखकर मैंने सिर नवाया अर्थात् समर्पण कर दिया और दीन वचन कहे अर्थात् निर्मलता के साथ बोला। दो0 सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज।।110(ग)।। व्याख्या : हे भाव रूपी पक्षियों के राजा गरुड़ जी! मेरे कोमल वचनों को सुनकर कृपालु लोमस (परमात्मा की लौ में मस्त) भाव रूपी मुनि आदरपूर्वक पूछने लगे कि हे दिव्यज्ञान रूपी सज्जन (द्विज)! आप किस कार्य से यहाँ आए हैं? दो0 तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान।।110(घ)।। व्याख्या : तब मैंने कहा कि हे कृपा के समुद्र! आप तो सर्वज्ञ व अच्छी तरह जानने वाले हैं। इसलिए मुझे परमात्मा की सगुण आराधना का रास्ता बता दीजिए। तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।। ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी। मोहि परम अधिकारी जानी।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! तब परमात्मा की लौ में मस्त लोमस भाव ने परमात्मा के कुछ गुणों का बखान किया। लोमस मुनि का भाव ब्रह्म ज्ञान में लीन और परम विज्ञानी था और परम अधिकारी अर्थात् पात्र जानकर। लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वैत अगुन हृदयेसा।। अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।। व्याख्या : ब्रह्म का उपदेश करने लगे कि ब्रह्म अजन्मा, अद्वैत, निर्गुण और हृदय का स्वामी होता है। वह अकल अर्थात् बुद्धि से परे, इच्छा रहित, नाम व रूप से परे, अनुभव से जानने में आने वाला, अखण्ड, अनुपम होता है। मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा।। व्याख्या : ब्रह्म (परमात्मा) मन व इन्द्रियों से परे, अमल, अविनाशी विकाररहित, सीमारहति व सुख की राशि है। वेद ऐसा गाते हैं अर्थात् अनुभव में ऐसा आता है कि वही तू है, जल और जल की लहर की तरह तुझमें और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुण मत मम हृदयँ न आवा।। पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।। व्याख्या : नाना प्रकार से मन के लोमस भाव ने मुझे समझाया परन्तु निर्गुण ब्रह्म का मत मेरे हृदय में समझ नहीं आया। फिर मैंने समर्पण करते हुए कहा कि हे मुनि! मुझे सगुण उपासना की विधि बताइये। राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।। व्याख्या : मेरा मन तो राम की भक्ति रूपी जल में मछली हो रहा है। हे चतुर मुनिवर! उस अवस्था में वो कैसे उससे अलग हो सकता है? इसलिए कृपा करके ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मैं मेरी आँखों से परमात्मा को देख सकूँ। भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।। मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।। व्याख्या : जब मैं आँखों से परमात्मा को देख लूँगा तब मैं निर्गुण ब्रह्म के उपदेश को सुनूँगा। वास्तव में यह दशा प्रत्येक साधक की आती है क्योंकि वह पहले परमात्मा को सगुण रुप में देखना चाहता है जिससे उसे विश्वास हो जाए। फिर मुनि ने परमात्मा की अनुपम कथाएँ कहकर सगुण मत का खण्डन करके निर्गुण मत का निरुपण किया। तब मैं निर्गुण मत कर दूरी। सगुन निरुपउँ करि हठ भूरी।। उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।। व्याख्या : तब मैंने निर्गुण मत का खण्डन करके हठपूर्वक सगुण मत का निरूपण किया। मैं मुनि से उत्तर-प्रतिउत्तर करने लगा, जिससे मुनि के शरीर में क्रोध के चिन्ह प्रकट होने लग गए। सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।। अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।। व्याख्या : हे प्रभो! बहुत अपमान करने पर ज्ञानियों के हृदय में भी क्रोध पैदा हो जाता है। ज्यादा रगड़ने पर तो चन्दन की लकड़ी से भी आग पैदा हो जाती है। दो0 बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान। मैं अपने मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान।।111(क)।। व्याख्या : बार-बार मुनि क्रोध सहित ज्ञान का निरुपण करने लगे। तब मैं दिव्य ज्ञान अहंकार का भाव बैठा-बैठा नाना प्रकार से अनुमान करने लगा। दो0 क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़जीव कि ईस समान।।111(ख)।। व्याख्या : बिना द्वैत बुद्धि के क्रोध नहीं हो सकता है और द्वैत बुद्धि बिना अज्ञान के पैदा नहीं हो सकती है। माया के वश में बँधा हुआ जड़ जीवन क्या ईश्वर के समान हो सकता है? कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।। परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।। व्याख्या : जो सबका हित करने वाला होता है, उसको कभी क्या कोई दु:ख हो सकता है? जिसके पास पारस मणि होती है, वो क्या कभी गरीब हो सकता है? पारस मणि के बारे में लोगों में बहुत भ्रांतियाँ फैली हुई है और लोगों में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि पारस ऐसा पत्थर होता है जो लोहे को सोना बना देता है। परन्तु वास्तव में ऐसा कोई पत्थर नहीं होता है। पारस का तात्पर्य साधक की उस अवस्था से होता है जिसमें वह पा अ रस अर्थात् परमात्मा की भक्ति का रस प्राप्त करने लग जाता है। क्योंकि भक्ति का रस पा लेने वाला कभी दरिद्र हो ही नहीं सकता है। दूसरों से द्रोह करने वाला क्या कभी निशंक रह सकता है? कामी पुरुष क्या कभी बिना कलंक के रह सकता है? बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।। काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।। व्याख्या : दिव्य ज्ञान वाले सज्जनों का अनहित करने वाले का क्या वंश रह सकता है? निज स्वरूप को जान लेने के बात क्या कर्म का बंधन रह सकता है? दुष्ट के संग से क्या किसी को सुबुद्धि पैदा हुई है? परस्त्रीगामी क्या शुभ गति पा सकता है? भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक।। राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।। व्याख्या : परमात्मा को जानने वाला क्या कभी भाव रूपी भवसागर में पड़ सकता है? परमात्मा का निंदक क्या कभी सुखी रह सकता है? नीति जाने बिना क्या राज्य रह सकता है? परमात्मा के गुणों का बखान करने पर क्या कोई चिंता रूपी पाप रह सकता है? पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।। लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।। व्याख्या : पवित्र यश क्या बिना पुण्य (शुभ कर्म) के हो सकता है? बिना पापके (अशुभ कर्म के) क्या कोई अपयश प्राप्त कर सकता है? परमात्मा की भक्ति के समान क्या कोई दूसरा लाभ हो सकता है? जिसका वर्णन वेद व पुराण भी करते हैं। हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।। अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।। व्याख्या : हे भाई! जगत में क्या इसके समान दूसरी कोई हानि है कि मनुष्यता का शरीर पाकर भी परमात्मा का भजन न किया जाए? चुगलखोरी के समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! दया के समान क्या कोई दूसरा धर्म है? एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।। पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।। व्याख्या : इस प्रकार मेरे मन में (साधक के मन में) अनगिनत युक्तियाँ आने लगी और आदर के साथ लोमस भाव रूपी मुनि के उपदेश नहीं सुना। जब मैंने सगुण का पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोध युक्त बचन बोले। वास्तव में साधना में साधक की ऐसी अवस्था आती है, जिसमें उसके मन में परमात्मा के बारे में नाना युक्तियाँ आने लगती हैं और उस अवस्था में वह अन्त:करण के भावों को भी नहीं सुनता है। उसी भाव दशा का यहाँ वर्णन किया गया है। मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।। सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।। व्याख्या : अरे मूर्ख! मैं तुम्हें परम शिक्षा दे रहा हूँ फिर भी नहीं मान रहे हो और उत्तर-प्रतिउत्तर कर रहे हो। मेरी सत्य बात पर भी तुम विश्वास नहीं कर रहे हो और कौए की भाँति सभी से डरते हो। सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।। लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।। व्याख्या : अरे मूर्ख! तेरे हृदय में अपने पक्ष का बड़ा भारी हठ है, अत: तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनन्द के साथ मुनि के शाप को सिर पर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आयी। इन चौपाइयों में बहुत गहरा मर्म बताया गया है। वास्तव में दिव्य ज्ञान का अहंकार हो जाने पर साधक अपने पक्ष को लेकर ही परमात्मा के बारे में तर्क करने लगता है। उस अवस्था में दूसरे किसी मत को मानने को वह तैयार ही नहीं होता है। तब परमात्मा की लौ में मस्त लौमस भाव क्रोधित होकर उसे कौए की तरह काँव-काँव करने की ही प्रेरणा करके शांत हो जाता है। उसी भाव दशा को सूक्ष्म प्रतीकों का सहारा लेकर बताया गया है। दिव्य ज्ञान के अहंकार में उस अवस्था में कोई कष्ट नहीं होता है और साधक अपने मत के निरूपण में लगा रहता है। दो0 तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ।।112(क)।। व्याख्या : तब मैं तुरन्त मुनि के चरणों में सीस झुकाकर कौआ बन गया अर्थात् साधक का दिव्य ज्ञान का अहंकार परमात्मा के सगुण पक्ष का निरूपण करने में आरूढ़ हो गया और परमात्मा का स्मरण करते हुए प्रसन्न होकर उड़ चला। दो0 उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।।112(ख)।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जो परमात्मा के चरणों में प्रेम करने वाला और काम, मद व क्रोध से रहित होता है, वो समस्त जगत को परमात्मामय देखता है, इसलिए उसका किसी से विरोध नहीं होता है। सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।। कृपा सिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! इसमें परमात्मा की लौ में मस्त लोमस मुनि का कोई दोष नहीं है क्योंकि उसको तो परमात्मा ने प्रेरणा की थी जिससे लोमस भाव की बुद्धि को भोली करके मेरे प्रेम की परीक्षा ली। मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।। रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।। व्याख्या : मन, वचन व कर्म से मुझ दिव्य ज्ञान के अहंकार भाव को परमात्मा ने अपना भक्त जाना तो पुन: लोमस भाव की मति को फेर दिया और लोमस भाव रूपी ऋषि ने मेरी शीलता और परमात्मा के चरणों में विशेष विश्वास को देखा। अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।। मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।। व्याख्या : तब मुनि ने बहुत दु:ख के साथ बार-बार पछताकर मुझे आदरपूर्वक बुला लिया। उन्होंने अनेक प्रकार से मुझे संतोष दिया और हर्षित होकर राम नाम का मंत्र दिया अर्थात् परमात्मा के राम नाम के जप की प्रेरणा की। बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।। सुंदर सुखद मोहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।। व्याख्या : मुझसे कृपानिधान मुनि ने कहा कि तुम बालक रूप में परमात्मा का ध्यान करो। यह मत मुझे बहुत अच्छा लगा जो पहले ही मैंने तुमको सुनाया है। मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरित मानस तब भाषा।। सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।। व्याख्या : परमात्मा में लौ लगाकर मस्त रहने वाले लोमस मुनि रूपी भाव ने मुझे कुछ दिन अपने पास रखा और मुझे मन में परमात्मा के चरित (राम चरित को मानस यानि मन में समझाया) को समझाया। मुुझे आदरपूर्वक अर्थात् प्रेम से रामचरित मानस को समझाया और उसके बाद लोमस मुनि रूपी भाव ने कहा। रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।। तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।। व्याख्या : यह सुन्दर और गुप्त रामचरित अर्थात् परमात्मा के चरित को मैंने स्वयं साधना में (शंभू) प्राप्त किया है अर्थात् साधना द्वारा स्वयं अनुभव किया है। तुमको परमात्मा का भक्त जानकर मैंने तुमको यह बताया है। राम भगति जिन्ह के उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।। मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।। व्याख्या : जिनके हृदय में परमात्मा की भक्ति न हो, उनसे यह कभी मत कहना। लोमस भाव रूपी मुनि ने मुझे बहुत प्रकार से समझाया। मैंने फिर उनको सप्रेम शीश झुकाया अर्थात् आदरपूर्वक उनकी बात मान ली। निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।। राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।। व्याख्या : तब लोमस भाव रूपी मुनि ने अपने स्वंय के हाथ से मेरा सिर स्पर्श किया और प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया (अर्थात् लोमस भाव ने मुझे परमात्मा में लीन रहने की प्रेरणा की) और कहा कि तुम्हारे हृदय में मेरी कृपा से परमात्मा की अविरल भक्ति निवास करेगी। दो0 सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान।।113(क)।। व्याख्या : तुम सदा परमात्मा के प्रिय हो और कल्याण रूपी गुणों के धाम, मानरहित इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ, इच्छा मृत्यु एवं ज्ञान व वैराग्य के भण्डार होओ। वास्तव में जब परमात्मा में लौ लग जाती है तो साधक की अवस्था शुभ गुणों से युक्त हो जाती है और वह काम रूप इच्छा-मृत्यु व ज्ञान-वैराग्य का भण्डार बन जाता है। दो0 जेहि आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्री भगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिधा जोजन एक प्रजंत।।113(ख)।। व्याख्या : इतना ही नहीं, परमात्मा का स्मरण करते हुए तुम जिस कोश (आश्रम) में निवास करोगे, वहाँ एक योजन अर्थात् चार कोस यानि गुणों की चार अवस्था (सत, रज, तम व गुणातीत) तक माया नहीं व्यापेगी। काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न व्यापिहि काऊ।। राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।। व्याख्या : तुमको काल (समय), कर्म, गुण व स्वभाव से उत्पन्न कुछ भी दु:ख नहीं व्यापेंगे। अनेकों प्रकार के परमात्मा के मर्म जो इतिहास व पुराणों में गुप्त व प्रकट हैं। बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।। जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। व्याख्या : वो सब परमात्मा के मर्मों को बिना परिश्रम के ही तुम जान जाओगे और नित्य परमात्मा के चरणों में तुम्हारा नया प्रेम पैदा होगा। तुम मन में जो इच्छा हो वो करना, परमात्मा की कृपा से तुमको कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। वास्तव में साधक की लौ जब परमात्मा में लग जाती है तो उसकी परम सिद्ध अवस्था आ जाती है। उसी भाव दशा का यहाँ वर्णन किया गया है। सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।। एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।। व्याख्या : हे धीर बुद्धि गरुड़ जी! सुनिए, लोमस भाव रूपी मुनि का आशीर्वाद सुनकर मस्तिष्क रूपी आकाश में आकाशवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही (सत्य) हो। यह मन, वचन व कर्म से मेरा भक्त है। सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।। करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।। व्याख्या : आकाशवाणी सुनकर मुझ दिव्य ज्ञान अहंकार के भाव को बहुत हर्ष हुआ और मैं प्रेम में मगन हो गया तथा मेरे सब संशय मिट गए। तत्पश्चात् मुनि की विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरण कमलों में बार-बार सिर नवाकर। हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।। इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।। व्याख्या : तब मैं हर्ष सहित इस कोश अर्थात् सात्विक अहंकार की अवस्था में आया और परमात्मा की कृपा से दुर्लभ वरदान प्राप्त किया। हे भाव रूपी पक्षियों के ईश्वर! इस कोश (आश्रय) में रहते मेरी कल्पनाओं (कल्प) का अन्त हो गया और मैं दस इन्द्रियों की बीस भाव रूपी भुजाओं से भी मुक्त हो गया। करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।। जब जब अवधपुरी रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।। व्याख्या : मैं यहाँ इस सात्विक कोश (आश्रम) में रहकर सदैव परमात्मा के गुणों का गान करते रहता हूँ। हे गरुड़जी! आप आदरपूर्वक सुनिए -- जब जब भी आत्मा देह भाव में बरतती है और भक्त के कल्याण के लिए परमात्मा की शक्ति मनुष्य के शरीर में अवतरित होती है। तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।। पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।। व्याख्या : मैं तब-तब आत्मा रूपी राम के देह रूपी नगर में जाकर रहता हूँ अर्थात् आत्मा के अवतरण होने पर मैं सात्विक अहंकार का भाव भी देह रूपी नगर में बरतने लगता हूँ। फिर मैं सात्विक अहंकार का भाव निर्मल आत्मा के बालस्वरूप को हृदय में रखकर पुन: सात्विक कोश रूपी आश्रम में आ जाता हूँ। कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।। कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।। व्याख्या : जिस कारण से मैंने सात्विक अहंकार (भुसुण्डि) की अवस्था को प्राप्त किया, वो सब अनुभव रूपी कथा तुमको सुना दी है। हे तात! मैंने तुम्हारे सब प्रश्नों का उत्तर कह दिए हैं। अहा! परमात्मा की भक्ति की बहुत बड़ी महिमा होती है। दो0 ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह।।114(क)।। व्याख्या : मुझे सात्विक अहंकार (कागभुसुण्डि) की अवस्था इसलिए प्रिय है कि इस अवस्था में मुझे परमात्मा के चरणों में प्रेम प्राप्त हुआ है। इसी अवस्था में मैंने स्वयं परमात्मा के दर्शन पाए अर्थात् परमात्मा को अनुभव किया और मेरे सब संशय मिट गए हैं। ।। मास पारायण, उनतीसवाँ विश्राम।। दो0 भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।।114(ख)।। व्याख्या : मैं भक्ति पक्ष पर हठ करके डटा रहा जिससे लोमस भाव रूपी मुनि ने शाप दिया परन्तु फिर मैंने मुनियों को भी दुर्लभ वरदान प्राप्त किया। भजन का यह प्रताप देखिए। जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।। ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।। व्याख्या : जो भक्ति की ऐसी महिमा जानकर भी भक्ति को छोड़ देते हैं, वे केवल ज्ञान के लिए परिश्रम करते हैं, वे मूर्ख लोग घर पर खड़ी कामधेनु को छोड़कर दूध के लिए जंगल में मदार ढूँढ़ते फिरते हैं। सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।। ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरी पार चाहहिं जड़ करनी।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! जो लोग परमात्मा की भक्ति को छोड़कर सुख का दूसरा उपाय खोजते हैं वे मूर्ख और जड़ करनी वाले बिना ही जहाज के समुद्र को पार करना चाहते हैं। सुनि भुसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।। तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि के वचन सुनकर ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ हर्षित होकर मधुर वाणी बोला कि हे प्रभु! आपकी कृपा से मेरे हृदय में संशय, शोक, मोह व भ्रम नहीं रहा है। सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।। एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।। व्याख्या : मैंने (ज्ञान अहंकार ने) आपकी (सात्विक अहंकार) कृपा से परमात्मा के पवित्र गुणों का गान सुना और शान्ति प्राप्त कर ली। हे प्रभो! अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ कि हे कृपासागर! मुझे (ज्ञान अहंकार को) समझाकर कहिए। कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ज्ञान समाना।। सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।। व्याख्या : संत जन, मुनियों व वेद-पुराणों ने कहा है कि ज्ञान के समान दुर्लभ कुछ भी नहीं होता है। हे प्रभो! वही ज्ञान लोमस भाव रूपी मुनि ने आपसे कहा परन्तु आपने भक्ति के समान उस ज्ञान का आदर नहीं किया। ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।। सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोले काग सुजाना।। व्याख्या : हे प्रभु! आप कृपा के घर हैं, इसलिए मुजे ज्ञान व भक्ति के अन्तर को समझाकर कहिए। तब ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ की बातें सुनकर सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि को अच्छा लगा और सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि आदरपूर्वक बोला। भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।। नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।। व्याख्या : भक्ति और ज्ञान में कुछ भी भेद नहीं होता है। दोनों ही भावों से उत्पन्न दु:खों को हर लेते हैं। हे नाथ! परन्तु मुनिजनों ने इनमें कुछ अन्तर बताएँ हैं। हे भाव रूपी पक्षियों में श्रेष्ठ ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़। उसे सावधान होकर सुनिए। ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।। पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।। व्याख्या : हे हरिवाहन! ज्ञान, वैराग्य, योग व विज्ञान -- ये सब पुरुष हैं, पुरुष का प्रताप सब प्रकार से प्रबल होता है। अबला अर्थात माया स्वाभावकि ही निर्बल और जड़ (मूर्ख) होती है। दो0 पुरुष त्यागि सक नारिहि जो विरक्त मतिधीर। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।। व्याख्या : परन्तु जौ वैराग्यवान और धीर बुद्धि पुरुष हैं, वही स्त्री का त्याग कर सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयों के वश में हैं और परमात्मा से विमुख हैं। सो0 सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।। व्याख्या : वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृगनयनी (युवती स्त्री) के चन्द्रमुख को देखकर विवश (उसके अधीन) हो जाते हैं। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! नारी ही अणु-अणु में माया के रूप में प्रकट है। इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।। मोह न नारि नारि के रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।। व्याख्या : यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता हूँ। मैं तो वेदों (अनुभव), पुराणों और संत जनों के मत को ही कहता हूँ। यह विलक्षण रीति है कि एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती है। माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।। पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।। व्याख्या : आप सुनिए -- माया और भक्ति ये दोनों ही स्त्री वर्ग की हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर श्री परमात्मा को भक्ति प्यारी है। माया बेचारी तो निश्चय ही नाचने वाली नटिनीमात्र है। भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।। राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।। व्याख्या : परमात्मा भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं, इसलिए माया डरती रहती है जिसके हृदय में उपमा रहित और उपाधिरहित (विशुद्ध) परमात्मा की भक्ति सदा बिना किसी बाधा के बसती है। तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।। अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहिं भगति सकल सुख खानी।। व्याख्या : उस भक्त को देखकर माया सकुचा जाती है। उस पर माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती है। इसलिए ऐसा विचार करके मुनि व विज्ञानी सब सुखों की खान भक्ति माँगते हैं। दो0 यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ।।116(क)।। व्याख्या : परमात्मा के इस रहस्य को जल्दी कोई नहीं जान पाता। परन्तु परमात्मा की कृपा से जो कोई इस रहस्य को जान जाता है, उसे सपने में भी मोह नहीं हो सकता है। दो0 औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन।।116(ख)।। व्याख्या : हे सुचतुर ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! ज्ञान और भक्ति का और भी भेद सुनिए -- जिसे सुनने में परमात्मा के चरणों में अविच्छिन्न प्रेम हो जाता है। सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।। ईस्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी।। व्याख्या : हे तात्! यह अकथनीय कहानी को सुनिए। यह समझते ही बनती है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। जीवात्मा ईश्वर का अंश है, अत: वह अविनाशी, चेतन, अमल, सहज व सुख की राशि है। सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं।। जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।। व्याख्या : हे गासाईं! जब जीव माया के वश में हो जाता है तो तोता और वानर की तरह अपने आप ही बँध जाता है। इस प्रकार जड़ और चेतन में ग्रंथि पड़ जाती है। जो मिथ्या होने पर भी छूटने में कठिन होती है। तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होई सुखारी।। श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।। व्याख्या : जड़-चेतन की ग्रंथि पड़ने से ही जीव संसारी (जन्म-मरण वाला) हो जाता है। वह बिना ग्रंथि के छूटे सुखी नहीं हो पाता है। वेद व पुराण उस ग्रंथि को खोलने के बहुत से उपाय बताते हैं परन्तु वह ग्रंथि छूटने के बजाय उलझती ही चली जाती है। जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।। अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।। व्याख्या : जीव के हृदय में मोह का विशेष अंधकार होने के कारण ग्रंथि दिखायी ही नहीं पड़ती है। फिर वह कैसे छूट सकती है? जब ईश्वर ऐसा संयोग कर देता है अर्थात जब परमात्मा की कृपा से ज्ञान-वैराग्य का विवेक होकर जीव के हृदय में प्रकाश होने लग जाता है, तब भी कदाचित ही वह ग्रंथि खुल सकती है। सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।। जप तप व्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।। व्याख्या : जड़-चेतन की ग्रंथि खुलने का संयोग कब बनता है, उसी को इन चौपाइयों में बताया गया है कि परमात्मा की कृपा अगर सात्विक श्रद्धा रूपी सुन्दर गौ हृदय में आकर बस जाए अर्थात् सात्विक श्रद्धा से अगर इन्द्रियाँ पवित्र होकर हृदय में यानि चित में समा जाएँ और असंख्य जप, तप, व्रत, यम, नियम व शुभ धारणा का आचरण जो वेदों ने (अनुभव में आए हैं) कहे हैं। तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।। नोइ निबृति पात्र बिस्बासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।। व्याख्या : उन्हीं जप, तप, यम, नियम रूपी घास को जब इन्द्रियों रूपी गाय चरे और आस्तिकता के भाव रूपी बछड़े को पाकर पेन्हावे। निवृति रूप रस्सी को नोई बनाए और विश्वास रूपी पात्र में निर्मल मन रूपी अहीर द्वारा दूध को दूहे। परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।। तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।। व्याख्या : हे भाई! इस प्रकार परम धर्ममय (अर्थात् परमात्मा में निर्मल धारण) दूध दुहकर उसे निष्काम भाव रूपी अग्नि पर भली-भाँति औटावे। फिर क्षमा व संतोष रूपी हवा से उसे ठंडा करे और धैर्य व शम (मन का निग्रह) रूपी जामन देकर उसे जमावे। मुदिताँ मथै बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।। तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।। व्याख्या : तब मुदिता (प्रसन्नता) रूपी कमोरी में तत्वविचार रूपी मथानी से दम (इन्द्रिय दमन) के आधार पर (इन्द्रिय दमन रूपी खंबे को आधार बनाकर) सत्य और सुन्दर वाणी रूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्य रूपी मक्खन निकाल ले। दो0 जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।। व्याख्या : तब योग रूपी अग्नि प्रकट करके उसमें सब शुभ-अशुभ कर्म रूपी ईंधन लगा दें अर्थात् सब कर्मों को योग रूपी अग्नि में भष्म कर दें। जब वैराग्य रूपी मक्खन का ममता रूपी मल जल जाय, तब ज्ञान रूपी बचे हुए घी को निश्चयात्मिका रूपी बुद्धि से ठंढ़ा करे। दो0 तब विज्ञान रूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।। व्याख्या : तब विज्ञान रुपिणी बुद्धि उस ज्ञान रूपी निर्मल घी को लेकर चित रूपी दीपक को भरे और समता की दीवट बनाकर, उस पर उसे दृढ़तापूर्वक जमा कर रखे। दो0 तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।। व्याख्या : जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति -- तीनों अवस्थाएँ और सत, रज व तम के तीनों गुणों रूपी कपास से तुरीयावस्थारूपी रूई को निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे। सो0 एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय। जातहिं जासु तुरीय समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।। व्याख्या : इस प्रकार तेज की राशि विज्ञानमय दीप को जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब विकार रूपी पतंगे जल जायँ। सोहमस्मि इति वृति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।। आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।। व्याख्या : सोह्मस्मि अर्थात् वह ब्रह्मा मैं ही हूँ, यह जो अखण्ड वृति है वही उस ज्ञान दीप की परम प्रचण्ड दीपशिखा अर्थात लौ है। इस प्रकार जब आत्मानुभव के सुख का प्रकाश भीतर फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है। प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।। तब सोइ बुद्धि पाइ उँजियारा। उर गृह बैठि ग्रंथि निरुआरा।। व्याख्या : और तब महान बलवती अविद्या के परिवार मोह आदि का अपार अंधकार मिट जाता है। तब वही विज्ञानरुपिणी बुद्धि आत्मानुभव रूपी प्रकाश को पाकर हृदय रूपी घर में बैठकर उस जड़-चेतन की गाँठ को खोलती है। छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।। छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।। व्याख्या : यदि वह विज्ञानरुपिणी बुद्धि अगर उस ग्रंथि को खोल पाती है तो तब जीव कृतार्थ हो जाता है। परन्तु हे भाव रूपी पक्षियों के ज्ञान अहंकार रूपी राजा गरुड़ जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विघ्न करती है। रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।। कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।। व्याख्या : हे भाई! उस अवस्था में माया बहुत सी रिद्धि-सिद्धियों को भेजती है जो आकर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं और वे रिद्धि-सिद्धियाँ कला, बल और छल करके समीप जाती हैं और आँचल की वायु से उस ज्ञान रूपी दीपक को बुझा देती है। होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।। जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरी सुर करहिं उपाधी।। व्याख्या : यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह रिद्धि-सिद्धियों को अहितकर जानकर उनकी ओर ताकती ही नहीं है। इस प्रकार माया के विघ्नों से अगर बुद्धि को बाधा नहीं हुई, तो फिर देवता विघ्न करते हैं। इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।। आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी।। व्याख्या : इन्द्रियों के द्वार रूपी हृदय रूपी घर के बहुत से झरोखे होते हैं जहाँ पर भाव रूपी देवता अड्डा जमाकर बैठे होते हैं। ज्यों ही वे विषय रूपी हवा को आता देखते हैं, वे हठ करके हृदय रूपी घर के किवाड़ खोल देते हैं। जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप विग्यान बुझाई।। ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।। व्याख्या : जब वह विषय रूपी हवा हृदय रूपी घर में जाती है, तो विज्ञान रूपी दीप को बुझा देती है जिससे जड़-चेतन की ग्रंथि भी नहीं छूटती है और ज्ञान रूपी प्रकाश मिट जाता है। उस अवस्था में विज्ञान रुपिणी बुद्धि भी विषयों की हवा से व्याकुल हो उठती है। इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।। बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।। व्याख्या : इन्द्रियों और उनके भाव रूपी देवताओं को ज्ञान अच्छा नहीं लगता है, क्योंकि उनकी तो विषयी भोगों से सदा प्रीति रहती है। उस अवस्था में विज्ञानरुपिणी बुद्धि भी विषयी हवा से बावली बन जाती है। तब फिर उस ज्ञान दीप को उसी प्रकार कौन जलावे? दो0 तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस।।118(क)।। व्याख्या : ज्ञान दीप के बुझ जाने पर जीव पुन: संसार में जन्म-मरण के दु:ख पाने लगता है। हे गरुड़जी! परमात्मा की माया बहुत कठिन होती है, इसलिए वह सहज में ही तरी नहीं जा सकती है। दो0 कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।।11(ख)।। व्याख्या : ज्ञान कहने में कठिन है, समझने में कठिन है और साधने में कठिन होता है। अगर संयोग वश ज्ञान हो भी जाए तो फिर उसकी रक्षा करने में अनेक विघ्न होते हैं। ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।। जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।। व्याख्या : ज्ञान का पंथ दुधारी तलवार के समान होता है। हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती। जो निर्विघ्न होकर इस पथ को निबाह लेता है, वो कैवल्य के परम पद को प्राप्त कर लेता है। अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।। राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआईं।। व्याख्या : संत, पुराण, वेद व तंत्र आदि शास्त्र सब यह कहते हैं कि कैवल्य रूप परम पद अति दुर्लभ है, किन्तु हे गोसाईं! वही अत्यंत दुर्लभ पद परमात्मा को भजने से बिना इच्छा किए भी जबरदस्ती मिल जाता है। जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।। तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।। व्याख्या : जैसे स्थल के बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रयास कर ले। वैसे ही हे गरुड़जी! मोक्ष का सुख भी परमात्मा की भक्ति के बिना नहीं रह सकता है। अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।। भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अविध्या नासा।। व्याख्या : ऐसा विचार करके परमात्मा के भक्त जो सयाने होते हैं, वे मुक्ति का भी निरादर करके भक्ति की तरफ आकर्षित रहते हैं। भक्ति करने से बिना प्रयास के ही संसार के जन्म-मरण के दु:खों का मूल अविद्या का नाश हो जाता है। भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।। असि हरि भगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।। व्याख्या : जैसे भोजन किया तो जाता है क्षुधा को तृप्त करने के लिए परन्तु जठराग्नि उसे सहज में ही बिना कारण के ही पचा देती है। ऐसे ही परमात्मा की भक्ति सुगम व सुख देने वाली होती है। अत: कौन ऐसा मूर्ख होगा जिसे भक्ति अच्छी नहीं लगेगी? दो0 सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।119(क)।। व्याख्या : हे वासना रूपी सर्पों के शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान मेरे सेव्य (स्वामी) हैं इस भाव के बिना भाव रूपी भव सागर को कोई नहीं तर सकता है। ऐसा सिद्धान्त विचार करके परमात्मा के चरण कमलों का भजन कीजिए। दो0 जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य।।119(ख)।। व्याख्या : जो चेतन को जड़ और जड़ को चेतन कर देते हैं, ऐसे परमात्मा का जो जीव भजन करते हैं, वे धन्य हैं। कहेउँ ग्यान सिद्धान्त बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।। राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।। व्याख्या : मैंने ज्ञान का सिद्धान्त समझा कर कहा है। अब भक्ति रूपी मणि की महिमा को सुनिए। हे गरुड़जी! जिसके अन्त:करण में परमात्मा की भक्ति का सुन्दर चिंतन चलता है। परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।। मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।। व्याख्या : ऐसा साधक जिसके अन्त:करण में परमात्मा का निरन्तर चिन्तन चलता रहता है, वो दिन-रात प्रकाश स्वरूप रहता है। उसको दीपक, बत्ती और घी कुछ भी नहीं चाहिए। मोह रूपी दरिद्रता उसके निकट नहीं आ पाती है और लोभ की वायु उस मणिमय दीप को (चिन्तन की अविरल धारा) नहीं बुझा पाती है। प्रबल अविद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।। खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।। व्याख्या : अन्त:करण के मणिमय दीप के प्रकाश से अविद्या का प्रबल अंधकार भी मिट जाता है और मदादि पतंगों का समुदाय भी हार जाता है। जिसके हृदय में भक्ति बसती है, उसके पास काम, क्रोध और लोभादि दुष्ट नहीं जा पाते हैं। गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।। ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।। व्याख्या : उसके लिए विष अमृत के समान और शत्रु हितकर हो जाता है। उस अन्त:करण में स्थित परमात्मा की चिंतनमणि के बिना कोई सुख नहीं पा सकता है। उसको मानसिक रोग (चिन्ता) भी नहीं सताते हैं, जिनके कारण सब जीव दु:खी हैं। राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।। चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।। व्याख्या : परमात्मा की भक्ति जिसके हृदय में निवास करती है, उसको सपने में भी दु:ख नहीं होता है। वे ही लोग इस संसार में चतुर हैं, जो उस परमात्मा की भक्ति रूपी मणि को अच्छी तरह से रखने का प्रयास करते हैं। सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।। सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भट भेरे।। व्याख्या : यद्यपि परमात्मा की भक्ति रूपी मणि जगत में प्रकट है परन्तु बिना परमात्मा की कृपा के उसे कोई पा नहीं सकता है। उसके पाने के उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे (प्रकृति विरुद्ध) लोग उन्हें ठुकरा देते हैं। पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।। मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।। व्याख्या : वेद-पुराण अर्थात् स्व का अनुभव और दूसरे लोगों के अनुभव पवित्र पर्वत हैं। परमात्मा की रुचिकर नाना प्रकार की कथाएँ उन पर्वतों की सुन्दर खान हैं। संत पुरुष उन खानों के रहस्य को जानने वाले हैं और साधक की सुंदर बुद्धि कुदाल है। हे गरुड़ जी! ज्ञान और वैराग्य उनके दोनों नेत्र हैं। भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।। मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।। व्याख्या : इसलिए जो लोग श्रद्धा के भाव सहित खोजते हैं, उनको परमात्मा की भक्ति रूपी मणि मिल जाती है, जो सब सुखों की खान होती है। हे प्रभो! मेरे मन में (सात्विक अहंकार के अनुसार) ऐसा विश्वास है कि परमात्मा के भक्त परमात्मा से भी बढ़कर होते हैं। राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।। सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।। व्याख्या : परमात्मा अगर समुद्र हैं तो संत जन मेघ के समान होते हैं। परमात्मा चंदन के वृक्ष हैं तो संत पवन के समान है। सब साधनों का फल सुन्दर परमात्मा की भक्ति ही है। उस भक्ति को बिना संत कोई नहीं पाया है। अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।। व्याख्या : ऐसा विचारकर जो भी कोई संतों का संग करता है, हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! उसे परमात्मा की भक्ति सुलभ हो जाती है। दो0 ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।।120(क)।। व्याख्या : ब्रह्म अर्थात् परमात्मा का अनुभव समुद्र के समान हैं, ज्ञान मन के अंदर का मंदराचल पर्वत है और संत देवता हैं, जो उस परमात्मा के अनुभव रूपी समुद्र को मथकर कथा रूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्ति रूपी मधुरता बसी रहती है। दो0 बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि।।120(ख)।। व्याख्या : वैराग्य रूपी ढाल से अपने आपको बचाते हुए ज्ञान रूपी तलवार से मद, लोभ व मोह रूपी शत्रुओं को मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वो परमात्मा की भक्ति ही है। हे गरुड़ जी! इसे विचारकर देखिए। पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।। नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी।। व्याख्या : फिर प्रेम सहित ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ बोला कि हे सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि! अगर मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान कर कहिए। प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।। बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।। व्याख्या : हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दु:ख कौन है, और सबसे बड़ा सुख कौन है? यह भी विचारकर संक्षेप में कहिए। संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।। कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।। व्याख्या : संत और असंत का मर्म (भेद) तो आप जानते हैं, अत: उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि वेदों में (अनुभव में) कौन-सा सबसे महान पुण्य है और सबसे बड़ा पाप कौन-सा है। मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।। तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।। व्याख्या : फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है। तब सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि ने कहा कि हे तात्! अत्यन्त आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप में कहता हूँ। नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।। नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।। व्याख्या : मनुष्य के शरीर के समान दूसरा कोई शरीर नहीं होता है। चर-अचर सभी जीव इसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य का शरीर सुख (स्वर्ग), दु:ख (नरक) व अपवर्ग (सुख-दु:ख से परे) की सीढ़ी होता है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य व भक्ति को देने वाला है। सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।। काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं।। व्याख्या : ऐसे मनुष्य शरीर को धारण करके भी जो लोग परमात्मा का भजन नहीं करते हैं और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे भक्ति रूपी पारसमणि को हाथ से फेंक कर बदले में काँच के टुकड़े (मन्द विषय भोग) ले लेते हैं। नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।। पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।। व्याख्या : जगत में दरिद्रता के समान दु:ख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान कोई सुख नहीं है। दरिद्रता से मतलब काम, क्रोध, मद व लोभादि भावों से युक्त होना और ज्ञान, वैराग्य, सद्बुद्धि व विवेक के गुणों का अभाव होने से होता है। काम-क्रोधादि भावों वाला जीव ही सबसे ज्यादा दु:खी होता है। संत का मिलना सुख देता है क्योंकि संत संशयों का अन्त करके जीव के अन्त:करण को सद्गुणों से भर देता है। सद्गुण ही सुख देने वाले होते हैं। मन, वचन व कर्म से परोपकार करना ही संत का सहज स्वभाव होता है। संत सहहिं दुख परहित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी।। भूर्ज तरु सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।। व्याख्या : संत दूसरों की भलाई के लिए दु:ख सहते हैं और असंत दुष्ट जन दूसरों को दु:ख पहुँचाने के लिए कष्ट सहते हैं। कृपालु संत तो भोजपत्र के पेड़ की तरह होते हैं, जो दूसरों के हित के लिए विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)। सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपत्ति सहि मरई।। खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहिमूषक इव तनु उरगारी।। व्याख्या : किन्तु दुष्ट लोग सन (पटसन) की भाँति दूसरों को बाँधने या बँधवाने के लिए अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे वासनारूपी सर्पों के शत्रु ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! सुनिए -- दुष्ट बिना ही किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं। पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।। दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।। व्याख्या : दुष्ट लोग परायी सम्पदा का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का उदय प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दु:ख के लिए ही होता है। संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।। परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।। व्याख्या : परन्तु संतों का अभ्युदय सदैव सुख देने के लिए ही होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय विश्वभर के लिए सुखदायक होता है। वेदों में (अनुभव) अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं होता है। हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई।। द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।। व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर और ज्ञान प्रकाश रूपी अन्त: गु डिग्री की निंदा करने वाला मनुष्य मेढ़क होता है और वह हजार जन्मों तक वही मेढ़क का शरीर ही पाता है। दिव्य ज्ञान वाले सज्जन का अपमान करने वाला मनुष्य बहुत चिन्ता रूपी नरक भोग कर कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है। सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।। होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु रत।। व्याख्या : जो अभिमानी जीव देव भावों व वेदों (अनुभव) की निन्दा करते हैं, वे घोर चिन्ता रूपी नरक में पड़ते हैं। जो संत जनों की निंदा करते हैं, वे उल्लू का जन्म लेते हैं और जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया होता है। सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।। सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।। व्याख्या : जो सबकी निंदा करने वाले होते हैं, वे चमगादड़ बनकर जन्म लेते हैं। हे तात्! अब मानसिक रोगों के बारे में सुनिए। जिनसे सब लोगों को दु:ख होता है। मोह सकल ब्याधिन्ह करमूला। तिन्ह ते पुनि उपजहि बहुसूला।। काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।। व्याख्या : मोह का भाव ही समस्त रोगों का मूल होता है। फिर मोह से ही समस्त कष्ट पैदा होते हैं। काम वात है, लोभ कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है। प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।। विषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।। व्याख्या : अगर ये तीनों कफ, पित्त व वात रूपी तीनों भाई प्रीति कर लें अर्थात् आपस में मिल जाएँ तो सन्निपात दु:खदाई रोग पैदा हो जाता है। कठिनता से प्राप्त होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल हैं, उनके नाम कौन जानता है अर्थात् वे कष्ट अपार होते हैं। ममता दादु कंडु इरिषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।। पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।। व्याख्या : ममता दाद है, ईर्ष्या खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है। पराए सुखों को देखकर जो जलन होती है वही क्षयी रोग है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है। अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।। तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।। व्याख्या : अहंकार अत्यन्त दु:ख देने वाला गाँठ का रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ अर्थात् नसों के रोग हैं। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि अर्थात् जलोदर रोग है। तीन प्रकार की पुत्र, धन और मान की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं। जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका।। व्याख्या : मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ। दो0 एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहुब्याधि। पीड़हि संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि।।121(क)।। व्याख्या : एक ही रोग के वश होकर लोग मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में मनुष्य शान्ति को कैसे प्राप्त करे? दो0 नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।।121(ख)।। व्याख्या : नियम, धर्म, आचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परन्तु हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते। एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।। मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब के लखि बिरलेन्ह पाए।। व्याख्या : इस प्रकार जगत में सब जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दु:ख से और भी दु:खी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े से मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही। जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।। बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।। व्याख्या : प्राणियों को जलाने वाले ये रोग जान लेने पर क्षीण अवश्य हो जाते हैं परन्तु पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाते हैं। विषयरूपी कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज है? राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा।। सद्गुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।। व्याख्या : परमात्मा की कृपा से इन रोगों का नाश हो जाए अगर ऐसा संयोग हो जाए तो। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर विश्वास हो और पथ्य अर्थात् संयम यह हो कि मन में विषयों की कोई आशा न करे। रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।। एहि बिधि भलेहिं रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।। व्याख्या : परमात्मा की भक्ति ही संजीवनी जड़ी होती है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान है अर्थात् परमात्मा की भक्ति हो और बुद्धि पूर्ण श्रद्धा से भरी हो। इस प्रकार का संयोग हो तो ये रोग भले ही नष्ट हो जाएँ वरना करोड़ों प्रयास करने पर भी ये नहीं मिटते हैं। जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।। सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।। व्याख्या : हे गोसाईं! मन को निरोगी हुआ तब जानना चाहिए, जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयों की आशा रूपी दुर्बलता मिट जाए। बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।। सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।। व्याख्या : इस प्रकार मानसिक रोगों से छुटकारा पाकर जब मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में परमात्मा की भक्ति रहती है। विश्वास रूपी शिव, बुद्धि रूपी ब्रह्मा, लगन रूपी शुकदेव, संयम रूपी सनकादिक व मन का नारद भाव रूपी जितने भी मन के भाव ब्रह्म विचार में निपुण हैं। सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।। श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! इन सबका यही मत है कि परमात्मा के चरणों में प्रेम करना चाहिए। वेद, पुराण व सब ग्रंथ यही कहते हैं कि परमात्मा की भक्ति के बिना सुख नहीं मिलता है। कर्मठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।। फूलहिं नभ बरु बहु बिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।। व्याख्या : कछुए की पीठ पर भले ही बाल उग आएँ, बाँझ स्त्री का पुत्र भले किसी को मार दे, आकाश में भले ही अनेकों प्रकार के फूल खिल उठें, परन्तु परमात्मा से विमुख जीव कभी सुख नहीं प्राप्त कर सकता है। तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।। अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।। व्याख्या : मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाए, भले ही खरगोश के सिर पर सींग निकल आएँ, चाहे अंधकार सूर्य का नाश कर दे, परन्तु परमात्मा से विमुख जीव को सुख नहीं मिल पाता है। हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।। व्याख्या : भले ही बर्फ से अग्नि प्रकट हो जाए, परन्तु परमात्मा से विमुख जीव सुख नहीं पा सकता है। दो0 बारि मथे घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरिभजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।। व्याख्या : भले ही जल के मथने से घी निकल आए और बालू से भले ही तेल निकल आए परन्तु बिना परमात्मा के भजन के भाव रूपी भव सागर पार नहीं हो पाता। यह अकाट्य सिद्धान्त है। दो0 मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहिं भजहिं प्रबीन।।122(ख)।। व्याख्या : परमात्मा मच्छर को ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर बना सकते हैं। अत: सब संशयों को छोड़कर ऐसा विचार करके चतुर लोग परमात्मा का भजन करते हैं। श्लोक विनिश्चितं बदामि ते अन्यथा वचांसि में। हरिं नरा भजन्ति ये%तिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।। व्याख्या : मैं (सात्विक अहंकार) आपसे (ज्ञान अहंकार से) निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ। मेरे वचन अन्यथा अर्थात् मिथ्या नहीं है जो लोग परमात्मा का भजन करते हैं, वे इस कठिन भवसागर को पार कर जाते हैं। कहेउँ नाथ हरिचरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा।। श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।। व्याख्या : हे नाथ! मैंने परमात्मा का अनुपम चरित मेरी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार से तो कहीं संक्षेप में कह दिया है। हे वासना रूपी सर्पों के शत्रु गरुड़ जी! वेदों (अनुभव) का यह सिद्धान्त है कि सब कार्य छोड़कर परमात्मा का भजन करना चाहिए। प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।। तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।। व्याख्या : परमात्मा को छोड़कर और किसका भजन किया जाए, जिनका मुझ जैसे मूर्ख पर भी ममत्व है। हे नाथ! आप विज्ञान रूपी हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझ पर बड़ी कृपा की है। पूँछिहु राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।। सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।। व्याख्या : जो आपने मुझसे शुकदेव (लगन भाव), सनकादि (संयमादि) व विश्वास रूपी शिव को प्रिय लगने वाली अति पवित्र राम कथा पूछी है। संसार में घड़ी भर का अथवा पलभर का एक बार का भी सत्संग दुर्लभ है। देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।। सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।। व्याख्या : हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़जी! अपने हृदय में विचार करके देखो, क्या मैं सात्विक अहंकार परमात्मा के भजन का अधिकारी हूँ? मैं भाव रूपी पक्षियों में सबसे अधम और अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होने पर भी परमात्मा ने मुझे जगत को पवित्र करने वाला प्रसिद्ध कर दिया। दो0 आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन। निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।। व्याख्या : यद्यपि मैं अहंकार का भाव सब प्रकार से हीन हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो परमात्मा ने ""निज जन"" जानकर संत समागम करा दिया। दो0 नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ। चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोई।।123(ख)।। व्याख्या : हे नाथ! मैंने मेरी बुद्धि के अनुसार कहा है, मैंने कुछ भी नहीं छुपा कर रखा है। फिर भी परमात्मा के चरित तो समुद्र के समान होते हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? अर्थात् परमात्मा की अनुभूति तो अनन्त है। सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।। महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।। व्याख्या : परमात्मा के बहुत से गुण-गानों का स्मरण करके सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि बार-बार हर्षित होने लगा। जिस परमात्मा की महिमा को वेदों ने ""नेति नेति"" करके गाया है, जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व अर्थात् सामर्थ्य अतुलनीय है। सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई।। अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ।। व्याख्या : परमात्मा के चरणों की पूजा तो विश्वास रूपी शिव और बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी करते हैं। उनकी मुझ पर कृपा होना उनकी कोमलता है। किसी का ऐसा स्वभाव न सुना और न देखा। अत: हे ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी! परमात्मा के समान किसे गिनूँ अर्थात् समझूँ। साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी।। जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी।। व्याख्या : साधक ही सिद्ध बनकर जब विषयों से मुक्त हो जाता है तो वह संसार से उदासी हो जाता है। तब साधक के हृदय में कवित्व फूट पड़ता है और वह परमज्ञान का विद्वान हो जाता है। तब वह कर्म बन्धन से छूट कर कृत्य-कृत्य हो जाता है अर्थात् उसको कर्म का मर्म समझ में आ जाता है। तब उसके सब संशय मिट जाते हैं और वह सन्यासी हो जाता है। वही साधक योगी, शूर, अच्छा तपस्वी, ज्ञानी, परमात्मा की धारणा में दृढ़, पण्डित (विद्वान) और विशुद्ध ज्ञान वाला विज्ञानी हो जाता है। तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी।। सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।। व्याख्या : ऐसे परम साधक भी बिना परमात्मा के भजन के भवसागर को नहीं पार कर सकते। अत: हे परमात्मा! आपको नमस्कार, आपको नमस्कार, आपको नमस्कार। मुझ जैसा पाप की राशि परमात्मा की शरण में जाकर शुद्ध हो गया। अत: हे अविनाशी! आपको नमस्कार। दो0 जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल।।124(क)।। व्याख्या : जिस परमात्मा का नाम जन्म-मरण रूपी रोग की औषध और तीनों गुणों से उत्पन्न कष्टों को हरने वाला होता है। वे कृपालु परमात्मा! सदैव मुझ पर और आप पर प्रसन्न रहें। दो0 सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह। बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह।।124(ख)।। व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी भुसुण्डि के मंगलमय वचन सुनकर और परमात्मा के चरणों में उनका अतिशय प्रेम देखकर मोह से छूटे हुए ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ जी प्रेम सहित बोले। मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।। राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।। व्याख्या : परमात्मा के भक्ति रस में सनी हुई आपकी (सात्विक अहंकार) वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य अर्थात् कर्मबंधन से मुक्त हो गया। मेरी परमात्मा के चरणों में नयी लग्न लग गयी है और माया से पैदा हुई विपत्तियाँ चली गयी हैं। मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।। मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।। व्याख्या : मोह रूपी समुद्र में डूबते हुए मेरे लिए आप जहाज हुए। हे नाथ! आपने मुझे बहुत प्रकार से सुख दिए। मैं आपका प्रत्युपकार नहीं कर सकता हूँ। इसलिए मैं बार-बार आपके चरणों की वंदना करता हूँ। पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।। संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।। व्याख्या : आप पूर्ण काम हैं और परमात्मा से अनुराग करने वाले हैं। हे तात! आपके समान कोई भाग्यशाली नहीं है। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी -- इन सब की क्रिया (करणी) पराए हित के लिए ही होती है। संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।। निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।। व्याख्या : कवियों ने संत के हृदय को मक्खन के समान बताया है परन्तु वे फिर भी असली बात नहीं कह पाए। क्योंकि मक्खन तो स्वयं के ताप से पिघलता है परन्तु संत तो दूसरों के दु:खों को देखकर द्रवित हो जाते हैं। जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।। जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।। व्याख्या : मेरा जीवन और जन्म सफल हो गया। आपकी कृपा से संब संदेह चला गया। मुझे (ज्ञान अहंकार को) सदा आपका दास ही जानियेगा। विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ बार-बार ऐसा कह रहे हैं। दो0 तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर। गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर।।125(क)।। व्याख्या : तब सात्विक अहंकार रूपी कागभुसुण्डि के चरणों में प्रेम से शीश झुकाकर धीर बुद्धि ज्ञान अहंकार रूपी गरुड़ परमात्मा को हृदय में रखकर बैकुण्ड अर्थात् कुण्ठा रहित अवस्था में चला गया। दो0 गिरिजा संत समागम सम न लाभु कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान।।125(ख)।। व्याख्या : हे श्रद्धारूपी पार्वती! संतों के मिलने के समान दूसरा कोई लाभ नहीं होता है। संत मिलन बिना परमात्मा की कृपा के नहीं होता है, ऐसा वेद व पुराण बताते हैं। कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।। प्रनत कल्पत डिग्री करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।। व्याख्या : मैंने यह परम पवित्र, इतिहास कहा है, जिसे कानों से सुनते ही भावों का बंधन कट जाता है। परमात्मा की शरण में आने वालों का करुणा के समूह व कल्पनाओं के मूल परमात्मा के चरण कमलों में प्रेम हो जाता है। मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।। तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।। व्याख्या : जो कान और मन लगाकर इस कथा को सुनते हैं, उनके मन, वचन व कर्म से उत्पन्न सब चिंता रूपी पाप मिट जाते हैं। तीर्थ यात्रा आदि बहुत से साधन, योग, वैराग्य व ज्ञान में निपुणता। नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।। भूत दया द्विज गुर सेवकाई। विद्या बिनय बिबेक बड़ाई।। व्याख्या : अनेकों प्रकार के कर्म, धारणा, व्रत, दान, संयम, दम, जप, तप, यज्ञ, प्राणियों पर दया, दिव्य ज्ञान वाले गु डिग्री की सेवा, विद्या, विनय और विवेक की बड़ाई। जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।। सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक उपाई।। व्याख्या : जहाँ तक वेदों ने साधन बताए हैं, हे श्रद्धा रूपी भवानी! उन सबका फल परमात्मा की भक्ति ही होता है। परन्तु वेदों में गायी हुई वह परमात्मा की भक्ति परमात्मा की कृपा से किसी किसी एक को ही मिलती है। दो0 मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास।।126।। व्याख्या : परन्तु जो मनुष्य इस कथा को विश्वास करके निरन्तर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम उस मुनियों को दुर्लभ परमात्मा की भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं। सोई सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।। धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जाकर मन राता।। व्याख्या : जिसका मन परमात्मा के चरणों में अनुरक्त होता है, वो ही सर्वज्ञ है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वी का भूषण, विद्वान और दानी है। वही धारणा का अनुसरण करने वाला और वही कुल का अर्थात् जीवात्मा का रक्षक है। नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।। सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।। व्याख्या : जो छल को छोड़कर परमात्मा का भजन करता है, वही नीति निपुण और परम चतुर होता है। उसी ने वेदों के सिद्धान्तों (अनुभव से अनुभव गम्य किया है) को अच्छी तरह जाना है। वही कवि, वही विद्वान और वही रणधीर है। धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।। धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।। व्याख्या : वह देश धन्य है, जहाँ गंगा नदी बहती है अर्थात् वह मस्तिष्क का कोश धन्य है जहाँ से आनन्द रूपी गंगा बहती है। पतिव्रता धर्म का अनुसरण करने वाली नारी धन्य है जो राजा नीति परायण होता है, वो धन्य है। वही दिव्य ज्ञान वाला सज्जन धन्य है, जो अपनी परमात्मा के प्रति धारणा है, उससे नहीं टलता है। सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रतमति सोइ पाकी।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।। व्याख्या : वह धन धन्य है जिसकी प्रथम गति होती है अर्थात्, जो दान देने में खर्च होता है। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें दिव्य ज्ञान वाला होकर अखण्ड भक्ति में लीनता हो जाती है। दो0 सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्री रघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! वही कुल धन्य व जगत में पूजनीय व पवित्र होता है, जिस कुल में परमात्मा की भक्ति करने वाला विनयी पुरुष पैदा होता है। मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।। तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।। व्याख्या : मैंने मेरी बुद्धि के अनुसार यह कथा कही है, हालांकि पहले मैंने इसे गुप्त ही रखा था। परन्तु तुम्हारे (श्रद्धा) मन में प्रेम की अधिकता देखकर मैंने परमात्मा की अनुभूति की कथा सुनायी है। यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।। कहिअ न लोभहि क्रोधिहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।। व्याख्या : यह कथा उनसे नहीं कहनी चाहिए जो सठ अर्थात धूर्त हैं, हठी स्वभाव के हैं और जो परमात्मा की लीला (चरित) को मन लगाकर नहीं सुनते हो। कामी, क्रोधी और लोभी से नहीं करनी चाहिए, जो समस्त जगत के स्वामी का भजन नहीं करते हैं। द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।। राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह के सत संगति अति प्यारी।। व्याख्या : दिव्य ज्ञान वाले सज्जनों से द्रोह करने वाले से तो कभी भी यह कथा नहीं कहनी चाहिए, भले ही वह इन्द्र के समान राजा क्यों न हो। परमात्मा की कथा के तो पात्र वे ही लोग हैं, जिन्हें सत्संग बहुत अच्छा लगता है। गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।। ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्री रघुराई।। व्याख्या : जिनकी गु डिग्री के चरणों में प्रीति है, जो नीति पारायण हैं और दिव्य ज्ञान वाले सज्जनों के सेवक हैं, वे ही इस कथा के अधिकारी हैं। और उसको तो यह कथा बहुत ही सुख देने वाली है जिसे परमात्मा प्राणों के समान प्रिय हैं। दो0 राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान। भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान।।128।। व्याख्या : जो परमात्मा के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्ष का पद चाहता हो, उसे यह कथा कान रूपी दुनों से श्रद्धा सहित पीनी चाहिए। राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।। संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने तुमसे परमात्मा की कथा जो वर्णन किया है, यह कथा देह बुद्धि के विकारों को हरने वाली और मन के विकारों को मिटाने वाली है। यह सांसारिक जन्म-मरण के रोगों के लिए संजीवनी औषध है। वेद और विद्वान पुरुष ऐसा कहते हैं। एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केरपंथाना।। अति हरिकृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।। व्याख्या : इसके सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो परमात्मा की भक्ति को प्राप्त करने के मार्ग हैं। जिस पर परमात्मा की अत्यन्त कृपा होती है, वही इस पथ पर पैर रखता है। मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।। कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।। व्याख्या : जो कपट छोड़कर इस कथा को गाते हैं, वे मनोकामना पूर्ण सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग इस कथा को कहते, सुनते व अनुसरण करते हैं, वे भाव रूपी भवसागर को गाय के खुर के द्वारा बना हुआ गड्ढ़े के समान पार कर जाते हैं। अर्थात् सरलता से भावों के चिंतन से निकल जाते हैं। सुनि सब कथा हृदय अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।। नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।। व्याख्या : यह परमात्मा की कथा सुनकर श्रद्धा रूपी पार्वती को बहुत अच्छी लगी। इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती बोली कि हे नाथ! आपकी कृपा से मेरे सब संशय मिट गए और परमात्मा के चरणों में नया प्रेम पैदा हो गया है। दो0 मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस। उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस।।129।। व्याख्या : हे विश्वास रूपी विश्वनाथ! मैं आपकी कृपा से अब कृतकृत्य अर्थात् कर्म बन्धन से मुक्त हो गयी हूँ। अब मेरे हृदय में परमात्मा की दृढ़ भक्ति पैदा हो गयी है और मेरे सब क्लेश मिट गए हैं। वास्तव में जब विश्वास का भाव परमात्मा को अच्छी तरह समझा देता है तो श्रद्धा का भाव भक्ति में दृढ़ हो जाता है। उसी भाव दशा का यहाँ वर्णन किया गया है। यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा।। भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।। व्याख्या : स्वयं (शंभू) के अन्त:करण में विश्वास व श्रद्धा के भावों के बीच में होने वाला यह संवाद सुख देने वाला और दु:खों का नाश करने वाला है। यह अन्त:करण का संवाद जन्म-मरण का अन्त करने वाला, सन्देहों का नाश करनेवाला, भक्तों को आनन्द देने वाला और संत पुरुषों को प्रिय लगने वाला है। राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह कें कुछ नाहीं।। रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।। व्याख्या : जगत में जितने भी रामोपासक अर्थात परमात्मा की उपासना करने वाले हैं, उनको तो इस आत्मानुभव रूपी राम की कथा के समान कुछ भी प्रिय नहीं है। मैंने परमात्मा की कृपा से यह पवित्र चरित्र मेरी बुद्धि के अनुसार गाया है। एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।। रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।। व्याख्या : इस कलिकाल में अर्थात् देहबुद्धि की अवस्था में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि दूसरा साधन नहीं है। बस परमात्मा का ही स्मरण करना, परमात्मा का ही गुण गान गाना और निरन्तर परमात्मा के गुण समूहों को सुनना चाहिए। जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।। ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।। व्याख्या : पतितों को पवित्र करना जिसका बड़ा बाना (आदत) है, ऐसा कवि, वेद, संत व पुराण गाते हैं। हे मन! उसी परमात्मा को तू कुटिलता छोड़कर भज। परमात्मा के भजन से किसने गति नहीं पाई है? छ0 पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना। गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।। आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे। कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।। व्याख्या : अरे मूर्ख मन! सुन पतितों को भी पावन करनेवाले परमात्मा का नाम भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत से दुष्टों को उन्होंने तार दिया। आमीर, यवन, किरात, खस, स्वपच (चाण्डाल) आदि जो अत्यन्त पाप रूप ही हैं, वे भी केवल एक बार परमात्मा का नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ। छ0 रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं। कलिमल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।। सत पंच चौपाई मनोहर जानि जो नर उर धरै। दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै।। व्याख्या : जो मनुष्य जीवात्मा के भूषण परमात्मा की इस कथा को कहते, सुनते और गाते हैं। वे देहबुद्धि के विकारों (कलिमल) से और मन के विकारों से मुक्त होकर परमात्मा के धाम को प्राप्त कर लेते हैं। अर्थात् उनके देह व मन के विकार मिट जाते हैं और वे परमात्मा स्वरूप हो जाते हैं। जो मनुष्य मन को अच्छी लगने वाली पाँच-सात चौपाइयों को अपने हृदय में धारण कर लेता है, वो पंच अविधाओं के विकारों से मुक्त हो जाता है और परमात्मा उसे अपना लेते हैं। पाँच-सात चौपाइयों को धारण करने का मतलब हृृदय में उतारकर अनुसरण करने से है। छ0 सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो। सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।। जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदास हूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।। व्याख्या : परम सुन्दर, सुजान और कृपानिधान तथा अनाथों से जो प्रेम करते हैं, ऐसे एक परमात्मा ही हैं। परमात्मा के समान निष्काम हित करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला दूसरा कौन? जिस परमपिता की थोड़ी सी कृपा से ही मतिमंद साधक परम विश्राम पा लेता है। अत: परमात्मा राम के समान और दूसरा कोई नहीं है। दो0 मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। असि बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क) व्याख्या : हे परमपिता! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। अत: ऐसा विचारकर मेरे भावों के विषम दु:खों को हर लीजिए अर्थात् मेरे समस्त सांसारिक कष्टों का निवारण कर दीजिए। दो0 कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।। व्याख्या : जैसे कामी पुरुष को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को धन प्रिय लगता है, वैसे ही हे परमपिता! तुम मुझे निरन्तर प्रिय लगिये। श्लोक यत्पूर्वं प्रभुणां कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं श्रीमद्रामपदाब्ज भक्तिमनिशं प्राप्तयै तु रामायणम्। मत्वा तद्रघुनाथनाम निरतं स्वान्तस्तम: शान्तये भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्।।1।। व्याख्या : श्रेष्ठ कवि विश्वास रूपी शंकर ने जिस दुर्गम मानस-रामायण की परमात्मा की भक्ति पाने के लिए रचना की थी, उस मानस-रामायण को परमात्मा के नाम में निरत मानकर अपने अन्त:करण के अंधकार को मिटाने के लिए तुलसीदास ने इस मानस (मन की भावना अनुसार) के रूप में भाषाबद्ध किया। श्लोक पुण्यं पापहरं सदाशिवकरं विज्ञान भक्तिप्रदं मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्। श्रीभद्रामचरितमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवा:।।2।। व्याख्या : यह आत्मा रूपी राम का मानस चरित पुण्य रूप, पापों (चिंताओं) को हरने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया, मोह और विकारों का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानस सरोवर में गोता लगाते हैं, वे संसार रूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते। ।। मास पारायण तीसवाँ विश्राम।। ।। नवाह्न, पारायण, नवाँ विश्राम।। ।। इतिमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुष विध्वंसने सप्तम: सोपान: समाप्त:।।
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