सुन्दर काण्ड
श्लोक शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाण शान्ति प्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेधं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरूं माया मनुष्यं हरिं
वन्दे%हं करूणाकरं रघुवरं भूपाल चूड़ामणिम्।।1।।
व्याख्या : इस श्लोक में प्रतीकों का सहारा लेकर परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। वह परमात्मा शान्त स्वरूप, सनातन, प्रमाणों से परे निष्पाप अर्थात् चिन्ता रहित, मोक्ष स्वरूप शान्ति प्रदान करने वाला है। वह परमात्मा ब्रह्म अर्थात् बुद्धि, शम्भु अर्थात् स्वयं साधक द्वारा जानने योग्य और शेष जी अर्थात् अनन्त होता है। यही वेदान्त का सार है कि परमात्मा सर्वव्यापक हैं। वे आत्म स्वरूप समस्त जगत के ईश्वर हैं और स्वरों के माध्यम से जीव को ज्ञान का प्रकाश करते रहते हैं। माया के प्रभाव के कारण ही मनुष्य के रूप में दिखायी देते हैं। मैं ऐसे करूणा की खान, आत्मस्वरूप, भावरूपी राजाओं के शिरोमणि परमात्मा की वन्दना करता हूँ।
श्लोक नान्या स्पृहा रघुपते हृदये%स्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्ति प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादि दोषरहित कु डिग्री मानसं च।।2।।
व्याख्या : हे परमपिता! मैं सत्य कहता हूँ कि आप समस्त जगत के अन्तरात्मा हैं। मेरे हृदय में अब दूसरी कोई इच्छा नहीं है। इसलिए हे परमपिता! मुझे आपकी निर्भरा भक्ति अर्थात् ऐसी भक्ति जिससे मेरा आप पर पूर्ण विश्वास हो जाए, दीजिए। मुझे काम आदि दोषों से रहित कर दीजिए।
श्लोक अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकल गुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रिय भक्तं वात जातं नमामि।।3।।
व्याख्या : अतुल्य बल के घर, सोने के पर्वत के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य और द्वैत रूपी दानव का नाश करने के लिए अग्नि के समान, ज्ञान के भावों में सबसे आगे रहने वाले, समस्त गुणों के निधान, बुद्धि के भाव रूपी वानरों के अधिष्ठाता अर्थात् बुद्धि के भावों में प्रधान भाव, प्राण से उत्पन्न व आत्मा रूपी राम के प्रिय अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान आपको नमस्कार।
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
व्याख्या : धीर बुद्धि रूपी जामवंत के वचन (अर्थात् प्रेरणा) अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को बहुत अच्छे लगे। तब अनन्य बुद्धि का भाव उत्साह में भर गया और अन्य बुद्धि के भावों से बोला कि हे भाइयों! तुम सहजता रूपी फलों का सेवन करके कष्ट सहकर भी तब तक मेरी इन्तजार करो।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
व्याख्या : जब तक मैं सुरता रूपी सीता को देखकर आऊँ, तब तक आप सब यहाँ इन्तजार करना। जब मैं सुरता रूपी सीता की खोज कर लूँगा तो मुझे विशेष प्रसन्नता होगी। ऐसा कहकर सब भावों को प्रणाम करके अर्थात् प्रेरणा देकर अनन्य बुद्धि का भाव हृदय में आत्मा रूपी राम का स्मरण करते हुए चला। वास्तव में ध्यान की अवस्था में अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा का चिन्तन करता हुआ भावों के सागर को पार करने के लिए चल पड़ता है। जब अनन्य बुद्धि का भाव, भाव रूपी भवसागर को पार करने लगता है, तो नाना प्रकार की बाधाएँ आती हैं। आगे की चौपाइयों में उन्हीं अनुभूतियों का वर्णन किया गया है।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
व्याख्या : भाव रूपी सागर के तट पर परमात्मा की लग्न रूपी सुन्दर पर्वत होता है, जिस पर अनन्य बुद्धि का भाव खेल-खेल में चढ़ जाता है। परमात्मा की लग्न रूपी पर्वत पर जब अनन्य बुद्धि का भाव चढ़ जाता है, तो आत्म चिन्तन गहरा हो उठता है, उसी को बार-बार आत्मा रूपी राम को याद करना बताया गया है। उस अवस्था में अनन्य बुद्धि का भाव जो कि प्राण से पैदा होता है, जोर-जोर से उछलने लगता है। अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव प्रबल वेगवान हो जाता है।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
व्याख्या : जिस भी भाव रूपी पर्वत पर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के पैर पड़ जाते हैं, वो तुरन्त पाताल में चला जाता है अर्थात् जिस भी भाव पर अनन्य बुद्धि का प्रभाव पड़ता है, वो भाव शान्त हो जाता है।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
व्याख्या : भावों के भवसागर ने जब यह विचार किया कि अनन्य बुद्धि का भाव तो परमात्मा का दूत है, तो मैनाक पर्वत अर्थात् मैं नहीं रूपी पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तुम इन्हें (अनन्य बुद्धि) विश्राम दो। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि का भाव, भाव रूपी सागर को पार करने लगता है, तो भावों के सागर में ऐसा विचार आने लगता है कि मैं नहीं हूँ और जब मैं नहीं हूँ का भाव प्रबल हो जाता है, तो अनन्य बुद्धि के भाव की परमात्मा में लीनता की राह आसान हो जाती है। उसी भाव अवस्था को समझाने के लिए मैनाक (अर्थात् मैं नहीं यानी अहंकारहीन अवस्था) पर्वत का प्रतीक लिया गया है।
दो0 हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने मैं नहीं हूँ की अहंकारहीन अवस्था का स्पर्श करके प्रणाम किया अर्थात् आत्मसात् कर लिया और कहा कि बिना सुरता की खोज करके और बिना परमात्मा में लीन हुए मुझ अनन्य भाव को विश्राम कहाँ है?
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
व्याख्या : प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि के भाव को जब देव भावों ने जाता देखा तो अनन्य भाव के बल व बुद्धि की परीक्षा लेने की इच्छा हुई। अर्थात् देव भाव देखना चाहते हैं कि अनन्य बुद्धि का भाव सांसारिक विषयों से कितना निस्पृह है। इसलिए वासनाओं रूपी सर्पों की माता जिसका नाम सुरसा था अर्थात् स्वरों के माध्यम से ही वासनाएँ पैदा होती हैं, इसलिए वासनाओं की माता सुरसा यानी स्वरों की व्यवस्था को कहा गया है। जब अनन्य भाव सुरता की खोज में तल्लीन होकर आगे बढ़ता है, तो देव भाव स्वरों के माध्यम से वासनाएँ पैदा करके अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की परीक्षा लेते हैं। इसलिए स्वरों के माध्यम से वासना के भाव पैदा होकर बोलने लगते हैं। उसी को सुरसा का बोलना बोलकर लिखा है।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
व्याख्या : वासना रूपी सर्पों की सुरसा रूपी माता बोली कि आज देव भावों ने मुझे भोजन प्रदान किया है। ऐसा सुनकर अनन्य बुद्धिरूपी हनुमान बोला कि पहले मैं आत्मा रूपी राम का कार्य करके आ जाऊँ अर्थात् सुरता की खोज लगा लूँ और फिर आत्मा रूपी राम को सुरता की खबर दे दूँ।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
व्याख्या : मैं अनन्य बुद्धि का भाव तब आकर तुम्हारे मुख में बैठ जाऊँगा। मैं सत्य कह रहा हूँ। इसलिए हे वासना रूपी सर्पों की माता! मुझे अब तू जाने दे। वास्तव में साधना के पथ पर नाना भोग प्रकट होते हैं परन्तु साधक की बुद्धि जब अनन्य स्तर की हो जाती है, तो उसका मन भोग वासनाओं में नहीं ललचाता है। उस अवस्था में तो वो परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है। यहाँ पर अनन्य बुद्धि का भाव भी यही कह रहा है कि पहले मैं परमात्मा को प्राप्त कर लूँ। जब मैं सहज अवस्था को प्राप्त कर लूँगा तो स्वयं चला आऊँगा और मुख में बैठ जाऊँगा अर्थात् सहज अवस्था प्राप्त करके ही मैं सहज भोगों का सेवन करूँगा। जब अनन्य बुद्धि के भाव ने देखा कि किसी भी प्रकार वासना रूपी सर्पों की माता जाने नहीं दे रही है अर्थात् आसक्ति नहीं छूट पा रही है, तो अनन्य भाव ने कहा कि फिर मुझे तुम खा लो अर्थात् अनन्य भाव ने जब देखा कि भोग वासनाओं की आसक्ति पीछा नहीं छोड़ रही है, तो अनन्य भाव ने वासनाओं को स्वीकार कर लिया। वास्तव में यह अनुभव सिद्ध बात है कि जब तक वासनाओं को दबाया जाता है, तब तक वे ज्यादा जोर से पकड़ी रहती हैं। परन्तु जब सहज होकर वासनाओं को स्वीकार कर लो, तो वे स्वत: पकड़ ढीली कर देती हैं।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवन सुत बत्तिस भयऊ।।
व्याख्या : ध्यान की अवस्था में समझ आता है कि जब वासना रूपी सर्पों की माता सुरसा ने योजन भर अर्थात् चार कोस में मुँह फैलाया अर्थात् जब स्वरों के माध्यम से वासना का जब मन, बुद्धि, चित व अहंकार में विस्तार हुआ तो अनन्य बुद्धि का भाव आठ कोस में फैल गया अर्थात् आठ प्रकृति में अनन्य बुद्धि का भाव फैल गया। तब वासना रूपी सुरसा ने सोलह योजन अर्थात् सौलह प्रकृतियों में विस्तार किया तो अनन्य बुद्धि का भाव बत्तीस योजन अर्थात् पच्चीस प्रकृति व सात तन्मात्राओं तक विस्तृत हो गया।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
व्याख्या : जैसे-जैसे वासना रूपी सुरसा ने अपना मुँह बढ़ाया अर्थात् जैसे-जैसे स्वरों के माध्यम से वासना के भावों का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे अनन्य बुद्धि के भाव ने अपना दुगुना विस्तार कर लिया अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव तीव्रता से बढ़ा। जब स्वरों के माध्यम से सत योजन अर्थात् सौ भावों में वासना का विस्तार हुआ तो अनन्य बुद्धि का भाव अति सूक्ष्म हो गया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सि डिग्री नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान सुरसा अर्थात् सूक्ष्म होकर स्वरों में प्रवेश करके वासना की आसक्ति का बन्धन तोड़कर वासना रूपी सुरसा से सीस झुका कर बिदा माँगी अर्थात् विनम्रतापूर्वक आसक्ति का त्याग कर दिया। तब वासना रूपी सुरसा बोली कि हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! मुझे देव भावों ने जिस उद्देश्य से भेजा था, वो मैंने तुम्हारी अनन्य बुद्धि के बल को देखकर जान लिया।
दो0 राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।
व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम आत्मा रूपी राम के सब कार्य करोगे क्योंकि तुम बल व बुद्धि के निधान हो। ऐसी प्रेरणा करके वासना रूपी सुरसा चली गयी और अनन्य बुद्धि का भाव हर्षित होकर आगे चल दिया।
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
व्याख्या : भावों के भव सागर में नाना प्रकार के आसुरी भाव होते हैं। उन्हीं भावों में वासना रूपी आसुरी भाव ऐसी होती है जो भाव पैदा करके उड़ते हुए सात्विक भावों को भी वासना की लालसा में खींच लेती है। वह वासना रूपी राक्षसी उड़ती हुई सात्विक इच्छाओं को माया के भावों रूपी जल में परछाई मात्र देख कर पकड़ लेती है। अर्थात् वासना रूपी राक्षसी तुरन्त वासना का जाल फैला देती है।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगन चर खाई।।
सोइ छल हनुमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
व्याख्या : वासना का भाव सात्विक भावों की छाया मात्र को पकड़कर वासना के जाल में फँसा लेता है, जिससे वह भाव उर्ध्वगामी नहीं हो पाता है। इस प्रकार वासना रूपी राक्षसी भावों के भवसागर में रहती हुई उर्ध्वगामी होने वाले भावों को पकड़कर खाती रहती है। जो छल अन्य भावों के साथ करती थी, वही छल वासना रूपी राक्षसी ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के साथ कर दिया, तो अनन्य बुद्धि का भाव तुरन्त वासना के कपट को जान लिया।
ताहि मारि मारूतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि के भाव ने वासना रूपी राक्षसी को मार दिया और भाव रूपी भव सागर को पार कर गया। भाव रूपी भव सागर को पार करने के बाद अनन्य बुद्धि के भाव ने परम रम्यता रूपी वन की शोभा को देखा, जहाँ पर नाना प्रकार के भोग रूपी भ्रमर सुख रूपी मधु के लोभ में गुँजायमान कर रहे थे। वास्तव में जब साधक भावों के भव सागर को पार कर जाता है, तो भव सागर पार करने पर सुख भोग रूपी नाना सिद्धियों के सुन्दर बगीचे आ जाते हैं। तहाँ पर भोग रूपी भ्रमर मँडराते रहते हैं। अगर साधक सावधान नहीं होता है तो इस पड़ाव पर फँस सकता है।
नाना त डिग्री फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागे।।
व्याख्या : भाव रूपी भव सागर के पार नाना प्रकार की सुख भोग की इच्छाएँ व नाना फलों की आसक्ति होती है, जो नाना प्रकार के सुख भोग रूपी पक्षी व मृग के रूप में मन को आकर्षित करने लगते हैं। सुख लालसाओं के सामने एक विशाल अज्ञान रूपी पर्वत होता है, जिसे देखकर अनन्य बुद्धि का भाव भय त्याग कर चढ़ गया अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव ने अज्ञान रूपी पर्वत को भी दबा लिया।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर बोले कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! इसमें अनन्य बुद्धि का कोई बड़प्पन नहीं है क्योंकि परमात्मा में लीनता की अवस्था आ जाने पर तो काल को भी खाया जा सकता है। अनन्य भाव रूपी हनुमान ने जब अज्ञान रूपी पर्वत को वश में कर लिया अर्थात् पर्वत पर चढ़ गया, तो वहाँ से वासना रूपी लंका दिखायी पड़ी। अर्थात् अज्ञान को पार कर जाने पर ही वासनाओं का मर्म समझ में आ पाता है। उस वासना रूपी लंका के दुर्ग का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
व्याख्या : वासना रूपी लंका के चारों ओर भाव रूपी भव सागर होता है और उसमें वासना की ऊँची-ऊँची लहरे उठती रहती हैं। वासनाओं की लालसा रूपी सोने का कोट ही वासना नगरी में प्रकाश करता रहता है अर्थात् वासनाएँ ही वासनाओं को बल प्रदान करती रहती हैं।
छ0 कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चा डिग्री पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अति बल सेन बरनत नहीं बनै।।
व्याख्या : इस छन्द में वासना रूपी लंका का वर्णन किया गया है। ध्यान में ही वासनाओं का असली स्वरूप समझ में आ पाता है। वासनाओं के भाव स्वर्ण के कोट की तरह मनि कृत अर्थात् मन के द्वारा तैयार किए होते हैं, जो लालसा की दृष्टि से सुंदरता के घर होते हैं। अर्थात् मन में वासना होने पर लालसा के भाव सुन्दर ही लगते हैं। प्रमस्तिष्क रूपी वासना के कोश में चौराहों, हाटों, बाजारों, व गलियों से वासना नगर सुन्दर सजा होता है अर्थात् बहुत सी सूक्ष्म-सूक्ष्म नाड़ियों में वासनाओं के नाना भाव पैदा होकर वासना रूपी लंका की शोभा बढ़ाते हैं। उस वासना रूपी लंका की हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह, पैदल और रथों रूपी वृतियों को कौन गिन सकता है। बहुत से प्रकार के आसुरी भावों की वहाँ सेना होती है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
छ0 बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं।
व्याख्या : वासना रूपी लंका में सुख भोग रूपी वन व बागों के बगीचे लगे होते हैं तथा आसक्ति रूपी कुएँ, बाउडी व तालाब शोभा पाते रहते हैं। नर अर्थात् धड़कन, नाग, प्राण वायु, गन्धर्व प्राण वायु स्वरों के माध्यम से मन को मोहित करती रहती हैं। वासना के भाव पर्वत के समान विशालकाय होते हैं तथा प्रमस्तिष्क की कोशिकाओं में प्रबल होकर गर्जना करने लगते हैं। भाव रूपी मल्ल वासना की लालसा रूपी अखाड़ों में आपस में बहुत प्रकार से भिड़ते हैं और ललकारते हैं। अर्थात् वासना के भावों में आपस में बहुत द्वन्द्व होता है।
छ0 करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसी रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।
व्याख्या : वासना के भाव रूपी योद्धा बहुत प्रकार से उपाय करके वासना रूपी लंका नगरी की चारों तरफ से रक्षा करते हैं। आसुरी भाव अज्ञान रूपी भैंसों का मनुष्य अर्थात् मन की इच्छाओं, इन्द्रियों, इन्द्रिय सुख भोग की इच्छाओं, आलस्य व प्रमाद रूपी गधों, व अहंकार रूपी बकरों का भक्षण करते रहते हैं। इसलिए तुलसीदास ने आसुरी भावों के रहस्य को समझ कर कुछ प्रतीकों का सहारा लेकर यह कथा लिखी है। वास्तविक साधना तब पूर्ण होगी जब ये आसुरी भाव आत्मा की प्रेरणा रूपी बाण से मारे जायेंगे और तीनों गुणों में सहजता आकर परम गति की अवस्था आ जायेगी।
दो0 पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।
व्याख्या : वासना रूपी नगर के आसुरी भाव रूपी रखवारों को देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने विचार किया कि अति सूक्ष्म रूप धारण करके अज्ञान रूपी रात्रि में ही वासना रूपी नगर में प्रवेश करना चाहिये।
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान मच्छर के समान सूक्ष्म रूप धारण किया अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव ने चंचल व वाचाल बनकर वासना रूपी लंका में प्रवेश किया। अनन्य बुद्धि का भाव तो परमात्मा में एक भाव से लीन रहता है, तो ऐसी अवस्था में वासनाओं के मर्म को नहीं जान सकता है, इसलिए मच्छर के समान भिन्न-भिन्न करने का रूप धारण किया, जिससे वासनाओं में प्रवेश करना आसान हो गया। इस प्रकार परमात्मा का स्मरण करते हुए अनन्य बुद्धि का भाव वासना रूपी लंका में प्रवेश करने लगा। प्रमस्तिष्क के कोश में बहुत सी सात्विक इच्छाएँ होती हैं, जो वासनाओं व आसुरी भावों से आच्छादित रहती हैं। लंकिनी निशाचरी भी उसी सात्विक इच्छा का प्रतीक है जो वासना के भावों से आच्छादित है। जब लंकिनी रूपी निशाचरी भाव ने अनन्य बुद्धि के भाव को देखा तो उसे पहचान गयी और बोली कि तुम मेरा निरादर करके कहाँ जा रहे हो?
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रूधिर बमत धरनी ढनमनी।।
व्याख्या : अरे सठ! तुम मेरा मर्म नहीं जानते हो। मेरा तो भोजन चोर भाव ही होते हैं अर्थात् जो भाव छुपके-छुपके प्रवेश करते हैं, वे ही लंकिनी रूपी निशाचरी के भोजन होते हैं अर्थात् उन्हीं भावों से उसे बल मिलता है। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने प्रेरणा रूपी एक मुष्टिका का प्रहार किया, जिससे लंकिनी रूपी राक्षसी वासना रूपी उल्टी करती हुई पृथ्वी पर गिर गयी अर्थात् वासनाओं का प्रभाव मिट गया।
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
व्याख्या : फिर लंकिनी अपने आप को सँभालकर उठी और अनन्य भाव रूपी हनुमान के प्रति समर्पण करती हुई बोली कि जब बुद्धि रूपी ब्रह्मा ने काम रूपी रावण को वर दिया था, तब चलते हुए मुझे बताया था कि --
बिकल होसि तैं कपि के मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
व्याख्या : जब तुम बुद्धि रूपी वानर की प्रेरणा रूपी मार से व्याकुल हो जाओ तो जान लेना कि आसुरी भावों का पतन होगा। हे तात! मेरा बहुत पुण्य अर्थात् सुकृत्य है कि मैंने आत्मा में लीन अनन्य बुद्धि रूपी दूत को देख लिया है।
दो0 तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सत संग।।4।।
व्याख्या : जब लंकिनी रूपी सात्विक इच्छा आसुरी भावों के प्रभाव से मुक्त हुई तो समझ में आया कि सुख भोग (स्वर्ग) और अपवर्ग यानी सुख-दु:ख से परे की अवस्था का सुख एक तरफ को रख दिया जाए और दूसरी तरफ क्षण मात्र के सत्संग अर्थात् सहज अवस्था को रखा जाए, तो सब सुख मिलकर भी सहजता (सत्संग) के बराबर सुखदायक नहीं होते हैं।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
व्याख्या : तब लंकिनी रूपी भाव ने अनन्य बुद्धि रूपी भाव से कहा कि वासना रूपी नगर (लंका) में प्रवेश करके सब कार्य कीजिए परन्तु हृदय में सदैव परमात्मा का स्मरण रखना वरना वासनाओं का प्रभाव पड़ जायेगा। अगर निरन्तर परमात्मा का स्मरण करोगे तो वासना रूपी जहर भी अमृत के समान हो जायेगा तथा आसुरी भाव रूपी शत्रु भी मैत्रीपूर्ण व्यवहार करेंगे। निरन्तर परमात्मा का स्मरण करते रहने से गोपद अर्थात् भाव रूपी समुद्र इन्द्रयों में सिमट जायेगा और वासना की अग्नि शीतल पड़ जायेगी।
गरूड़ सुमे डिग्री रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
व्याख्या : जिस पर परमात्मा की कृपा हो जाती है, उसके लिए अहंकार रूपी गरूड़ व सद्गुणी दृढ़ता रूपी सुमेर पर्वत धूल के समान हो जाता है अर्थात् अहंकार की कठोरता निर्मलता में बदल जाती है। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने बहुत सूक्ष्म रूप धारण किया और परमात्मा का स्मरण करते हुए वासना रूपी लंका में प्रवेश किया।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि के भाव ने प्रमस्तिष्क के छोटे-छोटे कोशों में प्रवेश किया और सुरता रूपी सीता को खोजने का प्रयास किया। तब वह काम रूपी रावण के कोश में प्रवेश किया। काम रूपी रावण का कोश बहुत विचित्र होता है। अत: उसका किसी भी प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता है।
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने काम रूपी रावण को अज्ञान रूपी निद्रा में देखा परन्तु प्रमस्तिष्क रूपी कोश में कहीं पर भी सुरता रूपी सीता दिखाई नहीं दी। फिर एक सुन्दर उपकोश दिखायी दिया, जिसमें माया के हरण के लक्षण दिखायी दिए। वास्तव में प्रमस्तिष्क कोश में नाना प्रकार के सात्विक व आसुरी भाव रहते हैं। सात्विक भाव ही हरि मंदिर के प्रतीक के रूप में बताए गए हैं।
दो0 रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ।।5।।
व्याख्या : उस माया के हरण के कोश की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसमें संतोष, वैराग्य व त्याग आदि के आत्मा रूपी राम के हथियार शोभा पाते रहते हैं। उस कोश में नव तुलसिका अर्थात् परम पवित्रता के भावों के समूह होते हैं, जिन्हें देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को बहुत हर्ष हुआ।
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान मन में विचार करने लगा कि वासना रूपी लंका में तो आसुरी भाव रूपी राक्षस निवास करते हैं। अत: यहाँ पर कोई सात्विक भाव रूपी सज्जन व्यक्ति कैसे रह सकता है? अनन्य बुद्धि के ऐसे चिंतन को देखकर वैराग्य रूपी विभीषण का भाव जाग उठा।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण ने आत्मा रूपी राम का चिन्तन किया तो वैराग्य भाव में सज्जनता के लक्षण देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को बहुत प्रसन्नता हुई। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने निश्चय किया कि मैं इनसे हठ करके भी जानकारी करूँगा क्योंकि सज्जन भावों के सम्पर्क में आने पर कोई हानि नहीं होती है।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने विप्र रूप धारण करके बोला तो (हनुमान सब समय विप्र रूप धारण करके ही मिलते हैं। राम से भी विप्र रूप धारण करके ही मिले। इसका रहस्य यह कि अनन्य बुद्धि का भाव जब तर्क आदि से मुक्त हो जाता है, तो वह विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वाला हो जाता है। उसी विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश की अवस्था को ही विप्र के प्रतीक द्वारा समझाया गया है।) वैराग्य रूपी विभीषण का भाव उठकर अनन्य बुद्धि के पास आ गए अर्थात् वैराग्य का भाव अनन्य बुद्धि के भाव की तरफ आकर्षित हो गया। तब अनन्य बुद्धि के भाव से प्रेम की तरंग के माध्यम से जुड़कर कुशलक्षेम पूछी और कहा कि विशुद्ध प्रकाशवान! अपने बारे में बताइये।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़ भागी।।
व्याख्या : क्या तुम परमात्मा के दास हो? क्योंकि तुम्हें देखकर मेरे हृदय में बहुत प्रेम पैदा हो रहा है। क्या तुम आत्मोन्मुखी भावों में अनुराग रखने वाले हो? जो मुझे भाग्यशाली बनाने के लिए आए हो, अर्थात् मेरा कल्याण करने के लिए आए हो।
दो0 तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने अपना परिचय देते हुए आत्मा रूपी राम की कथा बतायी अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव ने आत्मा के स्वरूप को समझाया। आत्म स्वरूप के गुणों का वर्णन सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान और वैराग्य रूपी विभीषण दोनों पुलकित हो उठे।
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
व्याख्या : हे प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! मेरा वासना रूपी लंका में रहना ऐसे होता है, जैसे दाँतों के बीच में जीभ्या होती है। हे तात्! मुझे अनाथ अर्थात् अनासक्त जानकर क्या कभी आत्मसूर्य रूपी परमात्मा मुझ पर कृपा करेंगे।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण बोला कि जब शरीर में तामसिक गुण बढ़ जाते हैं, तो तन परमात्मा की प्राप्ति का साधन नहीं बन पाता है क्योंकि तामसिक अवस्था रहने पर परमात्मा के चरण कमलों में प्रेम पैदा नहीं हो पाता है। हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि बिना परमात्मा की कृपा के संत जनों का मिलना सम्भव नहीं हो पाता है।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
व्याख्या : जब परमात्मा की कृपा हुई है तब ही तो तुमने हठ करके मुझे दर्शन दिया है अर्थात् आत्मा की प्रेरणा होने पर ही अनन्य बुद्धि का भाव पैदा होकर अन्य वैराग्य आदि के भावों को आत्मोन्मुखी होने को प्रेरित करता है। तब अनन्य बुद्धि का भाव बोला कि है वैराग्य रूपी विभीषण! परमात्मा की यह रीति है कि वे सदा सेवक पर प्रेम करते हैं।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताही न मिलै अहारा।।
व्याख्या : मैं चंचल बुद्धि रूपी वानर होकर सब प्रकार की क्रियाओं से हीन हूँ अर्थात् चंचल बुद्धि होने पर कोई क्रिया की साधना नहीं हो पाती है। जो प्रात: अर्थात् साधना के प्रारम्भ में चंचल बुद्धि का सहारा लेता है, उसे दिन भर साधना रूपी भोजना नहीं मिल पाता है अर्थात् जो बुद्धि के बल पर साधना की शुरूआत करता है, उसे सफलता नहीं मिल पाती है।
दो0 अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी मित्र! मैं चंचल बुद्धि रूपी अधम वानर हूँ परन्तु फिर भी परमात्मा ने मुझ पर कृपा की है अर्थात् मैं चंचल बुद्धि अब परमात्मा की कृपा से अनन्य बुद्धि हो गया हूँ। ऐसा कह कर परमात्मा के गुणों का स्मरण करके अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के दोनों नेत्रों में प्रेम रूपी जल भर आया।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
व्याख्या : ऐसे परमात्मा को जानकर भी जो भुला देते हैं, वे ही लोग संसार में दु:खी होते रहते हैं। इस प्रकार परमात्मा के गुणों का वर्णन करते हुए परम शान्ति का अनुभव किया।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
व्याख्या : फिर वैराग्य रूपी विभीषण ने सब बात बतायी। जिस प्रकार प्राण से उत्पन्न सुरता रूपी सीता प्रमस्तिष्क के अशोक वाटिका रूपी कोश में रहती हैं। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने कहा कि हे भाई! मैं सुरता रूपी सीता जो सब भावों को पैदा करने वाली हैं, को देखना चाहता हूँ।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
व्याख्या : तब वैराग्य रूपी विभीषण ने सुरता रूपी सीता को देखने की सब युक्ति बतायी अर्थात् किस प्रकार सुरता का आभास हो, सब वैराग्य के भाव ने समझाया। वैराग्य का भाव ही सुरता को देखने की युक्ति बता सकता है क्योंकि जब तक वैराग्य नहीं होता है, तब तक सुरता का आभास भी नहीं हो पाता है। तब वैराग्य रूपी भाव की प्रेरणा पाकर अनन्य बुद्धि का भाव सुरता को खोजने के लिए चल दिया। ""करि सोई रूप"" अर्थात् वही अति सूक्ष्म रूप धारण करके ही प्राण से उत्पन्न पवनपुत्र रूपी अनन्य बुद्धि का भाव अशोक वाटिका रूपी कोश के लिए चला, जहाँ पर सुरता रूपी सीता थी।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता को देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने मन ही मन प्रणाम किया अर्थात् प्राण की तरंग के माध्यम से सुरता का आभास किया। सुरता रूपी सीता को बैठे-बैठे ही अज्ञान रूपी रात्रि के चार पहर बीत जाते हैं अर्थात् सुरता वासनाओं से निर्लेप रहती है। परन्तु वासना रूपी लंका में रहने से दिनों दिन सुरता दुर्बल होने लग जाती है। उस समय ऐसा आभास होता है जैसे जटाओं में से एक लट हो। यह अवस्था ध्यान में अच्छी तरह समझ में आती है। सुरता आत्मा रूपी राम के चिंतन में रत होती है इसलिए आत्मोन्मुखी बनी रहती है। परन्तु निरन्तर वासनाओं से घिरे रहने के कारण दुर्बल हो जाती है। उसी को सीता का दुर्बल होना बोलकर लिखा गया है।
दो0 निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
व्याख्या : इस दोहे में साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में जब ध्यान में अन्तर्दृष्टि साधक स्वयं के पैरों में लगा लेता है और सुरता परमात्मा के चरणों में होती है तो सुरता में व्याकुलता की अनुभूति होती है। अर्थात् प्राण में व्याकुलता आ जाती है जिससे सुरता भी परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल हो जाती है। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। स्वयं साधक आँखें बन्द करके अन्तर्दृष्टि को अपने पैरों में लगाकर परमात्मा में अपने चिंतन को लीन करने का प्रयास करें, तो यह अनुभूति घटित हो जाती है। जब सुरता में व्याकुलता आ जाती है तो प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि स्वत: व्याकुल हो जायेगी। उसी को पवनसुत का अत्यन्त दु:खी होना बोला गया है।
त डिग्री पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान त डिग्री पल्लव अर्थात् प्राण से उत्पन्न तरंग में छुपा होकर मन में विचार करने लगा कि क्या करूँ? उसी समय काम रूपी रावण अशोक वाटिका रूपी कोश में आया और उसके साथ वासना रूपी अनेक नारियाँ थीं।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दाम भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता को काम रूपी रावण ने बहुत प्रकार से समझाया अर्थात् काम के भाव ने सुरता को साम, दाम, भय व भेद पैदा करके काम के प्रभाव में लाने का बहुत प्रयास किया। काम का भाव बोला कि हे सुमुखि अर्थात् सात्विक भावों वाली सुरता! मंदोदरी आदि अर्थात् मन के अन्दर की सब वृतियाँ रूपी रानियाँ।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
व्याख्या : मन के अन्दर की वृतियों (मन्दोदरी) को सब वृतियों सहित तुम्हारी अनुचरी (दासी) कर दूँगा। परन्तु तुम एक बार मुझ काम की तरफ देख लो। तब सुरता रूपी सीता ने संयम रूपी तृण की ओट करके आत्मा रूपी राम का स्मरण अर्थात् चिंतन करते हुए कहा कि --
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
व्याख्या : हे दस इन्द्रियों रूपी मुखों को धारण करने वाले काम! क्या काम रूपी जुगनू के प्रकाश से ज्ञान रूपी कमल खिल सकता है? फिर सुरता कहती है कि हे काम रूपी रावण! तू मन में समझ ले कि तुझे आत्मा रूपी राम के प्रेरणा रूपी बाण की क्षमता का पता नहीं है।
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
व्याख्या : सुरता कहती है कि हे मुर्ख काम रूपी रावण तू मुझे असावधानी के कारण हर लाया है। हे काम रूपी अधम, व निर्लज्ज भाव! तुझे आत्मा की शक्ति का आभास नहीं है। अर्थात् सुरता बेहोशी की अवस्था में ही काम के चंगुल में आ पाती है परन्तु सुरता के जाग्रत हो जाने पर काम का भाव सुरता को आत्मा रूपी राम से दूर नहीं कर सकता है। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है।
दो0 आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परूष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने अपने आपको जुगनू के समान और आत्मा रूपी राम को सूर्य के समान सुनकर काम का भाव क्षुब्ध हो उठा। जब काम का भाव क्षुब्ध हो उठता है तो उसी को वासना रूपी तलवार निकालकर कठोर वचन कहना बताया गया है।
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तब सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी सीता! तुमने मुझ काम भाव का निरादर किया है। इसलिए मैं (काम भाव) तेरा (सुरता) सिर कृपाण से काट डालूँगा अर्थात् प्राण से सुरता को अलग कर दूँगा। वास्तव में काम के भाव में ऐसी क्षमता होती है कि वो भावों का चक्र चलाकर प्राण को वासना से युक्त करके प्राण को श्वास में बदल देता है। कृपाण का मतलब भी यही है कि कृ अ पान अर्थात् प्राण का वासनामय कर देना। या फिर हे सुमुखि (सात्विक सुरता)! तुम मुझ काम का अनुसरण (सपदि उ स अ पदि) करो। मेरा (काम) अनुसरण नहीं करने से तुम्हें क्षति होगी।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी स्वामी की दम व संयम रूपी सुंदर भुजाएँ हैं, जो हाथी की सूँड़ के समान बलशाली हैं। अत: हे काम रूपी रावण! या तो तुम्हारी यह कठोर वासना रूपी तलवार गले में होगी या फिर दम, संयम रूपी आत्मा रूपी स्वामी की भुजाएँ मेरे गले में होंगी। यह मेरा प्रण है अर्थात् मेरे प्राण की यही गति है।
चंद्रहास ह डिग्री मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता कहती हैं कि हे चन्द्रहास! आत्मा रूपी राम के विरह रूपी अग्नि से उत्पन्न जलन को तू दूर कर दे। चन्द्रहास का प्रतीक चन्द्र नाड़ी के लिए प्रयोग किया गया है। वास्तव में जब साधना में आत्मा के विरह की अनल प्रबल हो उठती है तो सूर्य नाड़ी ज्ञान की ज्वाला पैदा करके अनल की प्रबलता को और बढ़ा देती है। तब सुरता रुपी सीता चन्द्र नाड़ी से कहती है कि तू इस विरह अनल को शान्त कर दे। हे चन्द्र नाड़ी! तू तो शीतल, तीव्र और संयम की धारा बहाती है। अत: अब तू मेरे विरह के दु:ख को दूर कर दे।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता के वचनों को सुनकर काम रूपी रावण पुन: सुरता रूपी सीता को मारने दौड़ा। तब मयतनया अर्थात् मन के अन्दर से उत्पन्न मन्दोदरी ने नीति का बखान करके काम के भाव को समझाया। तब काम रूपी रावण ने सब आसुरी वृतियों को प्रेरित कर समझाया कि तुम सब सुरता रूपी सीता को नाना प्रकार से वासनाओं का भय दिखाओ।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
व्याख्या : अगर एक महीने में सुरता मुझ काम के प्रभाव में नहीं आयी तो मैं कृअ पान अर्थात् प्राण के वश में करके सुरता को मार दूँगा।
दो0 भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
व्याख्या : तब काम का भाव आसुरी वृतियों के समूह को सुरता के पास छोड़कर अपने भावों में रमण करने चला। काम का अपने भावों में रमण करना ही भवन जाने का प्रतीक है। उधर को आसुरी भाव नाना प्रकार से सुरता रूपी सीता को भय दिखाने लगते हैं।
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
व्याख्या : उन आसुरी वृतियों में तीनों गुणों में बरतने वाली एक आसुरी वृति होती है, जिसे त्रिजटा के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। त्रिजटा रूपी वृति पर सात्विकता का प्रभाव ज्यादा होता है। इसलिए उसे आत्मा रूपी राम के चरणों में अनुराग रखने वाली बताया गया है। त्रिजटा रूपी वृति ने सब वृतियों को प्रेरणा करते हुए समझाया कि तुम अपना कल्याण चाहती हो तो सुरता की सेवा करो अर्थात् सुरता में लीन हो जाओ।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरुढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
व्याख्या : त्रिजटा रूपी वृति कहती है कि सपने में अर्थात् दिव्य दृष्टि से देखने पर आभास हुआ है कि बुद्धि रूपी वानर ने वासना रूपी लंका को जला दिया है और सब आसुरी भावों रूपी सेना को मार गिराया है। काम रूपी रावण नंगा होकर अर्थात् काम के भाव के विकार प्रकट होकर अज्ञान रूपी गधे पर सवार हो गए हैं। काम रूपी रावण के दस इन्द्रियों रूपी सिर मुंढे हुए हैं अर्थात् इन्द्रियाँ भी काम से विमुख होने लग गयी हैं और बीसों भुजाओं रूपी वृतियाँ काम से कट गयी हैं।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
व्याख्या : इस प्रकार काम दक्षिण दिशा में जा रहा है और वासना रूपी लंका का राज वैराग्य रूपी विभीषण को मिल गया है अर्थात् काम का नाश हो रहा है और वैराग्य का भाव प्रबल हो रहा है। बुद्धि रूपी वानर के प्रभाव से वासना रूपी नगर में आत्मा रूपी राम की दोहाई फिर गयी। तब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके सुरता रूपी सीता को बुला भेजा।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
व्याख्या : त्रिजटा रूपी तीन गुणों से युक्त राक्षसी बोली कि यह सपना कुछ दिनों में ही सत्य सिद्ध होगा। यह मैं निश्चय के साथ कहती हूँ। त्रिजटा रूपी राक्षसी के वचनों को सुनकर सभी आसुरी वृतियाँ डर गयी और सब सुरता रूपी सीता के शरण में आ गयी।
दो0 जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
व्याख्या : जब आसुरी वृतियाँ सुरता रूपी सीता के प्रति समर्पित हो जाती हैं तो वे स्वत: शान्त होने लग जाती हैं। उसी को आसुरी वृति रूपी राक्षसियों का इधर-उधर को जाना बोलकर लिखा गया है। जब आसुरी वृतियाँ शान्त हो गयी तो सुरता रूपी सीता मन में विचार करने लगी कि अगर महीने भर में आत्मा रूपी राम से मिलन नहीं हुआ तो काम रूपी राक्षस मुझे मार देगा।
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता फिर त्रिजटा रूपी आसुरी वृति से बोली कि हे माता! तुम ही विपत्ति में मेरा साथ देने वाली हो अर्थात् त्रिजटा यानी तीन गुणों में बरतने वाली आसुरी वृति ही सुरता को साथ दे पाती है। अब आप ऐसा उपाय कीजिए जिससे मैं इस देह का त्याग कर दूँ अर्थात् देहाभास से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि अब आत्मा का विरह सहा नहीं जा रहा है।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
व्याख्या : हे माता! आसुरी वृति व लालसा रूपी लकड़ियाँ लाकर चिता बना दो और ज्ञान रूपी अग्नि लाकर जला दो। मेरी आत्मा के प्रति सहज प्रेम को सिद्ध कर दो। काम रूपी रावण की शूल के समान कष्ट देने वाली वाणी कौन सुने?
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
व्याख्या : सुरता के वचन सुनकर त्रिजटा रूपी वृति ने सुरता रूपी सीता के सामने समर्पण करते हुए समझाया और बहुत प्रकार से परमात्मा के यश व बल का वर्णन किया। त्रिजटा रूपी वृति बोली कि अज्ञान रूपी रात्रि में ज्ञान रूपी अग्नि नहीं मिल सकती है। ऐसा कहकर त्रिजटा रूपी वृति अपनी सहज अवस्था में चली गयी।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता कहने लगी कि क्रिया (विधि) की प्रतिकूलता के कारण ज्ञान रूपी अग्नि नहीं मिल पा रही है और बिना ज्ञान रूपी अग्नि के कष्टों का निवारण नहीं हो सकता है। मस्तिष्क रूपी आकाश में ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट है परन्तु देह रूपी पृथ्वी पर ज्ञान का अंश रूपी तारा भी नहीं आ रहा है।
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
व्याख्या : चन्द्रमा भी अग्निमय है अर्थात् चन्द्र स्वर भी ज्ञान रूपी अग्नि पैदा करने वाला होता है परन्तु मुझे हतोभागी जानकर अर्थात् वासनाओं से रहित जानकर ज्ञान रूपी अग्नि नहीं बरसाता है। अत: हे अशोक वृक्ष! (अर्थात् शोक रहित कोश) तुम मेरी प्रार्थना सुनो और मेरे सब दु:खों को दूर कर दो। वास्तव में प्रमस्तिष्क में एक सूक्ष्म कोश ऐसा होता है जो हमेशा शोक रहित भावों को पैदा करता रहता है और शोक के भावों को अवशोषित करता रहता है। उसे ही अशोक वृक्ष के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
व्याख्या : हे अशोक वृक्ष (कोश)! तेरे नए-नए पत्ते ज्ञान रूपी अग्नि के समान हैं अर्थात् अशोक कोश के नए-नए कोशिका रूपी पत्ते ज्ञान की अग्नि पैदा करने वाले हैं। अत: हे अशोक कोश रूपी वृक्ष! तुम ज्ञान रूपी अग्नि पैदा करके मेरे कष्टों का निवारण कर दो। इस प्रकार सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम के विरह में परम व्याकुल देखकर वह क्षण अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के लिए युग के समान बीता।
सो0 कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने हृदय में विचार करके आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी मुद्रिका को सुरता रूपी सीता के लिए डाल दिया अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव ने आत्मा की प्रेरणा को सुरता तक पहुँचा दिया। वह प्रेरणा रूपी मुद्रिका ऐसे लग रही थी मानो अशोक कोश से ज्ञान रूपी अग्नि ही गिरी हो। तब सुरता रूपी सीता ने प्रेरणा रूपी मुद्रका को हर्षित होते हुए उठाया अर्थात् ग्रहण किया।
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम द्वारा प्रेरित सुन्दर व मन को हर लेने वाली मुद्रिका को सुरता रूपी सीता ने देखा तो वह आश्चर्यचकित हो गयी तथा हृदय में हर्ष छा गया तथा विषाद अर्थात् विष अ आद उ विषयों का अंत हो गया, जिससे सुरता के हृदय में अकुलाहट हो गयी। वास्तव में जब ध्यान में सुरता विषयों का त्याग करने लगती है तो व्याकुलता पैदा हो जाती है, जिसे ध्यान में अच्छी तरह अनुभव किया जा सकता है।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता तब मन में विचार करने लगी कि ऐसी प्रेरणा रूपी मुद्रिका तो माया के भावों से पैदा हो नहीं सकती है और आत्मा तो अजय है, इसलिए उसे कोई जीत नहीं सकता है। इस प्रकार के नाना विचार सीता के मन में चल रहे थे कि अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान मधुर वाणी में बोला। वास्तव में जब सुरता में परमात्मा का चिंतन चलता है, तभी अनन्य बुद्धि का भाव सुरता के सामने प्रकट होता है। उसी भाव अवस्था को समझाने के लिए नाना प्रतीकों का सहारा लिया गया है।
रामचन्द्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि का भाव आत्मा रूपी राम के गुणों का वर्णन करने लगा। जिसे सुनने से सुरता की व्याकलुता मिट गयी और कान लगाकर मन से सुनने लगी। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि प्रेरणा करके आत्मा के गुणों का वर्णन करने लगती है तो सुरता को स्वत: शान्ति मिलना शु डिग्री हो जाती है और तब सुरता आत्मा के गुणों को सुनते-सुनते आत्मोन्मुखी होने के सुख का अनुभव करने लगती है। अनन्य बुद्धि के भाव ने शु डिग्री से सब बात बतायी अर्थात् कैसे आत्मा व सुरता एक होते हैं? फिर कैसे अलग हो जाते हैं? फिर कैसे बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी होते हैं? आदि-आदि बातों को प्रेरणा करके समझाया।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिर बैठिं मन बिसमय भयऊ।।
व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता ने कहा कि जिसने कानों में अमृतमय संदेश दिया है, वो प्रकट क्यों नहीं हो रहा है? तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान प्रकट होकर सुरता रूपी सीता के पास चले गए। तब अनन्य बुद्धि के भाव को देखकर सुरता रूपी सीता को बहुत आश्चर्य हुआ।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करूनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बोला कि हे माता! (सुरता से ही अच्छे-बुरे भाव पैदा होते हैं, इसलिए सुरता रूपी सीता को जगत जननी कहा जाता है) मैं आत्मा रूपी राम का प्रेरणा रूपी दूत हूँ। उसे करूणा के निधान आत्मा रूपी राम की सपथ है अर्थात् सअपथ यानी मैं सहज (सत्य) में ही आत्मोन्मुखी हूँ। अनन्य बुद्धि का भाव सहज में ही आत्मा का अनुसरण कर्ता होता है। यह प्रेरणा रूपी मुद्रिका मैं ही लाया हूँ, जो आत्मा रूपी राम ने पथ-प्रदर्शक के रूप मे आप को दी है। अर्थात् आत्म प्रेरणा के रूप में यह मुद्रिका भेजी है। पाठकों को मुद्रिका का रहस्य बता देता हूँ। जब प्राण से उत्पन्न सुरता काम के प्रभाव में आ जाती है तो पुन: काम के प्रभाव से मुक्त होने के लिए प्राण को निर्मल करके मुद्रा लगा करके धीरे-धीरे उर्ध्वगामी करना पड़ता है। तभी जाकर काम का प्रभाव कम हो पाता है और सुरता आत्मोन्मुखी हो पाती है। इसलिए मुद्रिका का प्रतीक लिया गया है।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें।।
व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता ने पूछा कि धड़कन (नर) और बुद्धि के भावों का मिलन कैसे हुआ? तब हनुमान (अनन्य बुद्धि) ने सारी बात बतायी जैसे संग हुआ था। इस चौपाई में बहुत गहरा साधना सम्बन्धी प्रश्न किया गया है। वास्तव में नर अर्थात् धड़कन से उत्पन्न प्राण से ही सुरता पैदा होती है और धड़कन के प्राण से ही बुद्धि के भाव पैदा होते हैं। परन्तु धड़कन से मिलन होने पर लीनता की अवस्था आ जाती है। उस अवस्था में द्वैत भाव बच ही नहीं पाता है। अत: सुरता रूपी सीता यही जानना चाहती है कि जब नर (धड़कन) के संग मिलन हो गया तो पुन: द्वैत भाव क्यों बचा है? और अगर संग हुआ है तो वो कैसे हुआ? तब अनन्य बुद्धि का भाव समझाता है कि भोग बल रूपी बालि को मारने पर सात्विक बुद्धि रूपी सुग्रीव बुद्धि के भावों का अधिष्ठाता बन जाता है और उससे आत्मा रूपी राम का संग भी हो जाता है और बुद्धि के भावों का आभास भी बना रहता है।
दो0 कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी वानर के प्रेमपूर्वक वचन सुनकर सुरता रूपी सीता के मन में विश्वास हो गया कि यह मन, वचन, कर्म से आत्मा रूपी राम का दास है।
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जल जाना।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि के भाव को आत्मोन्मुखी जानकर सुरता का विश्वास दृढ़ हो गया और नेत्रों में जल भर आया तथा शरीर पुलकित हो उठा। उस अवस्था में सुरता को डूबते हुए विरह के समुद्र में अनन्य बुद्धि रूपी जहाज मिल गया।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! मैं तुम्हारी बलिहारी हूँ। तुम अब लखन भाव सहित अज्ञान रूपी खर के शत्रु व सुख स्वरूप आत्मा रूपी राम का कुशल मंगल कहिए। आत्मा रूपी राम तो निर्मल चित स्वरूप होते हैं परन्तु किस कारण से इतने निष्ठुर हो गए हैं? बताइये।
सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदुगाता।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो सहज में ही सेवकों को सुख देने वाले होते हैं। हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! क्या वे कभी मेरी याद करते हैं? मेरे नेत्र कब आत्मा रूपी राम के श्यामल कोमल अंगों को देखकर शीतल होंगे?
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता उस अवस्था में कुछ बोल नहीं पा रही थी और आँखों में जल भर आया था। हे प्रभु! आपने मुझे बिल्कुल भुला दिया। तब सुरता रूपी सीता को विरह में अति व्याकुल देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान मधुर वाणी में बोला--
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम के दूना।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी माता! आत्मा रूपी राम लखन भाव सहित कुशल मंगल है परन्तु आपके विरह में दु:खी हैं। हे सुरता रूपी माता! तुम हृदय में ग्लानी मत करो क्योंकि आत्मा रूपी राम का प्रेम तुम पर तुमसे भी दूना है। वास्तव में जब सुरता परमात्मा में लगती है तो परम शक्ति की ऊर्जा दो गुने वेग से खींची चली आती है। उसी को सुरता से दोगुना प्रेम होना बताया गया है।
दो0 रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी माता! अब धैर्य धारण करके आत्मा रूपी राम के संदेश को सुनिए अर्थात् आत्मा की प्रेरणा को सुनिए। ऐसा कहकर अनन्य बुद्धि का भाव गद-गद हो गया और आँखों में जल भर आया।
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि भानू।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कहने लगे कि आत्मा रूपी राम ने कहा है कि हे सुरता रूपी सीता! तुम्हारे वियोग से सब कुछ प्रतिकूल हो गया है। नव त डिग्री अर्थात् इच्छाओं रूपी नए-नए पत्ते मुझे अग्नि के समान लगते हैं और काल रात्रि अर्थात् समय अज्ञानमय लगता (काल अ निसा उ समयअअज्ञान) है और चन्द्र व सूर्य स्वर दोनों से उत्पन्न भाव अज्ञानमय लगते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि चन्द्र व सूर्य स्वरों से अज्ञानमय (कालनिसा) भाव पैदा होने लगते हैं।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
व्याख्या : कुबलय अर्थात् कु बल यानी वासनाओं के बल से वैराग्य रूपी वन काँटों की तरह लगता है। भाव रूपी मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो भाव सुरता के आत्मोन्मुखी होने पर कल्याणकारी लगते थे, वे सुरता के वियोग से कष्ट देने वाले लगने लग गए हैं। तीनों गुणों से युक्त श्वास वासना रूपी सर्पों के कारण जहरीला हो गयी है अर्थात् श्वास के माध्यम से भी वासनाओं की तप्त सताने लगी है।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहैं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अ डिग्री तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे सुरता रूपी सीता! यह विरह का दु:ख किसी से कहने से कम नहीं होता है और कहें भी तो किससे कहें? क्योंकि कोई दूसरा विरह के इस मर्म को जानता ही नहीं है। परमात्मा (तत्व प्रेम) के प्रति तेरा अर्थात् सुरता और मेरा अर्थात् आत्मा का तो एक ही प्रेम होता है। इसलिए सुरता और आत्मा का मन एक ही जानना चाहिये।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहीं तेही।।
व्याख्या : वो मेरा (आत्मा) मन तो सदा सुरता में लगा रहता है। इसलिए प्रेम के रस को इतने में ही समझ लो। आत्मा रूपी राम के इस संदेश को सुनकर सुरता प्रेम में मग्न हो गयी और तन की सुध नहीं रही।
कह कपि हृदयँ धीर ध डिग्री माता। सुमि डिग्री राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपित प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान का भाव बोला कि हे सुरता रूपी माता! तुम हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले आत्मा रूपी राम का चिंतन करो। हृदय में आत्मा की अपार शक्ति का स्मरण करो और मेरे वचनों को सुनकर भय का त्याग कर दो।
दो0 निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर ध डिग्री जरे निसाचर जानु।।15।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी माता! आसुरी भावों के समूह पतंगों के समान होते हैं और आत्मा रूपी राम के प्रेरणा रूपी बाण अग्नि के समान होते हैं। अत: आसुरी भावों को जला हुआ जानकर हृदय में धैर्य धारण करो।
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी माता! अगर आत्मा रूपी राम को आपका पता होता तो वे विलम्ब नहीं करते। अर्थात् आत्मा की चेतना को अगर यह पता होता कि सुरता प्रमस्तिष्क कोश में है तो वे आने में देर नहीं करते। हे भावों को पैदा करने वाली जननी! आत्मसूर्य की प्रेरणा रूपी बाणों के उदय हो जाने पर आसुरी भावों रूपी अज्ञान के भाव कैसे बच सकते हैं?
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी माता! मैं अभी तुमको ले जा सकता हूँ परन्तु मुझे अभी आत्मा की प्रेरणा नहीं है अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव सुरता को आत्मोन्मुखी करके ले जा सकता है परन्तु बिना वासनाओं को जीते सुरता को ले जाने से कोई फायदा नहीं होता है। बिना वासना रूपी लंका को जीते अगर सुरता अनन्य बुद्धि के साथ आत्मा के पास चली भी जाए, तो वापस वासनाओं में फँसने का भय बना ही रह जाता है। इसलिए अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान कहते हैं कि हे माता! कुछ दिन धैर्य धारण करो, क्योंकि बुद्धि के भाव रूपी वानरों के साथ आत्मा रूपी राम आयेंगे।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
व्याख्या : हे माता! आत्मा रूपी राम आसुरी भाव रूपी राक्षसों को मार कर तुम्हें ले जायेंगे। जिससे तीनों लोगों में अर्थात् तीनों गुणों के भावों में नारद आदि मन के भाव आपके व आत्मा के सुयश का बखान करेंगे। तब सुरता रूपी सीता बोली कि हे वत्स! सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर क्या तुम्हारे समान ही हैं? ये आसुरी भाव तो बड़े बलवान हैं।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता बोली की मुझे हृदय में बहुत संशय हो रहा है। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने अपना निज स्वरूप प्रकट किया। जो स्वर्ण के समान कांतिवान और भावों के अनुसार आकार धारण करने वाला था तथा भावों के भाव युद्ध में भयंकर व बलवान था।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता के मन में भरोसा आ गया कि बुद्धि के भाव रूपी वानर आसुरी भाव रूपी राक्षसों को जीत सकते हैं। तब प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि के भाव ने पुन: लघु रूप धारण कर लिया।
दो0 सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाई परम लघु ब्याल।।16।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बोला कि हे माता! साखा मृग अर्थात् चंचल बुद्धि के भाव बलवान व ज्यादा विशाल नहीं होते हैं। परन्तु परमात्मा की प्रेरणा होने पर ये भाव बलवान हो जाते हैं। जैसे परमात्मा की प्रेरणा हो जाने पर तो वासना रूपी सर्प ज्ञान के अहंकार रूपी गरूड़ को भी खा सकता है।
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की भक्ति, प्रताप व तेज बल से युक्त बातें सुनकर सुरता रूपी सीता के मन को संतोष हो गया। तब अनन्य बुद्धि के भाव को आत्मा रूपी राम का प्रिय जानकर बलवान व शीलवान होने का वरदान दिया अर्थात् प्रेरणा की।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
व्याख्या : हे वत्स! तुम अजर अर्थात् सदैव बलयुक्त बने रहो, अमर अर्थात् सदैव चैतन्य रहो और समस्त गुणों के समुद्र हो जाओ। आत्मा रूपी राम तुम पर बहुत कृपा करें अर्थात् सदैव सद्प्रेरणा मिलती रहे। आत्मा रूपी राम द्वारा सदैव सद्प्रेरणा करने की बात सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान निश्चल प्रेम में मग्न हो गया।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
व्याख्या : तब बार-बार अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान सुरता रूपी माता के चरणों में शीश झुकाने लगा अर्थात समर्पण का भाव बढ़ने लगा तो हाथ जोड़कर अनन्य बुद्धि का भाव बोला कि हे सुरता रूपी माता! अब मैं कृत-कृत्य हो गया हूँ अर्थात् कर्म बन्धन के भाव से मुक्त हो गया हूँ क्योंकि आपकी प्रेरणा रूपी वरदान अमोघ होता है। अर्थात् सुरता की सद्प्रेरणा से सब सम्भव हो जाता है।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
व्याख्या : जब आसुरी भावों की संगति में अनन्य बुद्धि का भाव आ जाता है तो वासनाओं को जानने की भूख बढ़ जाती है। उसी भाव अवस्था को प्रतीकों के माध्यम से अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को भूख लगना बोलकर बताया गया है। इसलिए सुन्दर वासना रूपी वृक्षों पर आसक्ति रूपी फलों को देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान सुरता रूपी माता से कहता है कि हे माता! सुन्दर आसक्ति रूपी फलों को देखकर मुझे बहुत लालसा रूपी भूख लगी है। तब सुरता रूपी माता बोली कि हे वत्स! इन आसक्ति रूपी फलों की बहुत सारे आसुरी भाव रूपी राक्षस रक्षा करते हैं।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी माता! मुझे उन आसुरी भाव रूपी राक्षसों का भय नहीं है, अगर तुम मन में सुख मानो तो अर्थात् अगर सुरता का आशीर्वाद रूपी बल मिलता रहे तो आसुरी भावों का कोई डर नहीं होता है।
दो0 देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकी जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के बुद्धि बल व निपुणता के बल को देखकर सुरता रूपी सीता ने प्रेरणा की कि जाओ और हृदय में परमात्मा का चिंतन करते हुए भोग रूपी मधुर फलों का सेवन करो। वास्तव में साधक की साधना जब परिपक्व हो जाती है, तो उसका चिंतन परमात्मा में लग जाता है, जिससे विषयों की आसक्ति नहीं सताती है। उस अवस्था में सहजता के साथ भोगों का भोग किया जा सकता है। परन्तु साधक को हमेशा सावधान रहना चाहिये। इसलिए यहाँ पर सुरता अनन्य भाव से सदैव परमात्मा का चिंतन करते रहने की बात कहती है।
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि का भाव सुरता रूपी सीता को सीस झुकाकर चला और आसक्ति रूपी फलों को खाकर वासना रूपी वृक्षों को उखाड़ने लगा। उस प्रमस्तिष्क कोश में बहुत से आसुरी भाव वासना की आसक्ति की रक्षा के लिए थे। जिनमें से कुछ आसुरी भावों को अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने मार दिया और कुछ आसुरी भाव काम रूपी रावण के पास चले गए।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अ डिग्री बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
व्याख्या : आसुरी भावों ने काम रूपी रावण से कहा कि हे नाथ! एक बुद्धि रूपी वानर अशोक वाटिका में घुस आया है। जिसने आसक्ति रूपी फलों को खाकर वासना रूपी पेड़ उखाड़ दिए हैं और वासनाओं के रक्षक आसुरी भावों का दमन कर दिया है।
सुनि रावन पठए भटनाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने फिर बहुत से आसुरी भाव रूपी योद्धाओं को भेजा, जिन्हें देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने जोर से गर्जना की। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने सब आसुरी भावों का संहार कर दिया और जो बच गए वे पुन: काम रूपी रावण के पास जाकर पुकारे।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
व्याख्या : जब काम रूपी रावण ने देखा कि सभी आसुरी भाव मारे जा रहे हैं तो अक्षय कुमार रूपी आसुरी भाव को भेजा। वास्तव में कुछ आसुरी भाव ऐसे होते हैं जिनका क्षय ही नहीं होता है। उसी क्षय नहीं होने वाले भाव को ही अक्षय कुमार कहा गया है। अक्षय आसुरी भाव साथ में बहुत से आसुरी भाव लेकर चला। अक्षय रूपी आसुरी भाव को देखकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने वासना रूपी वृक्ष उखाड़ लिया और अक्षय रूपी आसुरी भाव को मार कर महा ध्वनि की अर्थात् जोर से गर्जना की।
दो0 कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरी।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।
व्याख्या : कुछ आसुरी भावों को अनन्य बुद्धि के भाव ने मार दिया और कुछ का दमन कर दिया तथा कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया अर्थात् सहज कर दिया। कुछ बचे हुए आसुरी भाव पुन: भागकर काम रूपी रावण के पास जाकर पुकारने लगे कि हे नाथ! अनन्य बुद्धि रूपी वानर बहुत ही बलवान है।
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाथ बलवाना।।
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ करि आही।।
व्याख्या : अक्षय रूपी आसुरी पुत्र का मरना सुनकर काम का भाव बहुत क्रोधित हो गया और आसुरी अहंकार रूपी मेघनाद को भेजा तथा कहा कि बुद्धि रूपी वानर को मारना मत। हम देखना चाहते हैं कि वह बुद्धि रूपी वानर कहाँ से आया है।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अ डिग्री धावा।।
व्याख्या : आसुरी अहंकार इन्द्रियों व चित को अपने वश में कर लेता है इसलिए मेघनाद रूपी आसुरी अहंकार को इन्द्रजीत भी कहा जाता है। इन्द्रियों को जीत लेने वाला आसुरी अहंकार बहुत बलवान योद्धा होता है जो अक्षय रूपी आसुरी भाव के निधन की बात सुनकर बहुत क्षुब्ध हो उठता है। अत: अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने जब देखा कि भयंकर आसुरी भाव रूपी योद्धा आ रहा है तो भयंकर गर्जना की और आसुरी अहंकार को मारने के लिए दौड़ पड़ा।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने वासना रूपी वृक्ष उखाड़ा और आसुरी अहंकार को बिरथ अर्थात् वृति रहित कर दिया। आसुरी अहंकार के साथ बहुत से आसुरी भाव रूपी योद्धा थे, जिन्हें अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान पकड़-पकड़ कर स्वयं के अंगों से मसलने लगा। अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव ने सब आसुरी भावों को दबाना शु डिग्री कर दिया।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।।
मुठिका मारि चढ़ा त डिग्री जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
व्याख्या : सब आसुरी भावों का दमन करके आसुरी अहंकार रूपी मेघनाद से अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान लड़ने लगा। उस समय दोनों भाव हाथियों के समान लग रहे थे। तब अनन्य बुद्धि का भाव प्रेरणा रूपी घूँसा मारकर वासना रूपी पेड़ पर चढ़ गया अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव उर्ध्वगामी हो गया। जिससे आसुरी अहंकार के भाव को क्षण भर के लिए मुर्छा आ गयी। अर्थात् आसुरी अहंकार का भाव क्षण भर के लिए स्वयं को भूल गया।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।
व्याख्या : फिर उठकर आसुरी अहंकार रूपी मेघनाद ने बहुत सी माया की अर्थात नाना प्रकार के भावों में आसुरी अहंकार ने प्रभाव डालने का प्रयास किया। परन्तु प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि का भाव जीतने में नहीं आ पाया। अहंकार का भाव नाना प्रकार के रूप धारण कर लेता है। उसी को नाना प्रकार की माया करना बताया गया है।
दो0 ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।
व्याख्या : तब आसुरी अहंकार रूपी मेघनाद ने ब्रह्म अस्त्र अर्थात् सात्विक अहंकार का रूप धारण किया तब अनन्य बुद्धि के भाव ने मन में विचार किया कि अगर सात्विक अहंकार को नहीं मानूँगा तो मर्यादा मिट जायेगी। वास्तव में तामसिक व राजसिक अहंकार से बाहर आना तो आसान होता है परन्तु सात्विक अहंकार की सीमा को पार करना बहुत मुश्किल काम होता है। इसलिए तो कबीर दास ने भी कहा कि ""मोटी माया सब तजैं झीनी तजि न जाय"" अर्थात् तामसिक व राजसिक अहंकार का त्याग तो सम्भव है परन्तु सात्विक अहंकार से उत्पन्न भावों का त्याग सम्भव नहीं है। दया, करूणा, मैत्री, धैर्य आदि के भाव ही सात्विक अहंकार के भाव होते हैं जिनका त्याग करना कठिन होता है। इन्हीं भावों के जाल में अनन्य बुद्धि का भाव फँस गया।
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरूछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी बाण अनन्य बुद्धि को मारा तो अनन्य बुद्धि का भाव आसुरी भावों का संहार करते हुए गिर गया। तब तामसिक अहंकार रूपी मेघनाद ने अनन्य बुद्धि के भाव को मूर्छित देखा तो विषय वासना रूपी नाग पास में बाँध कर ले गया। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि का भाव दया, करूणा, मैत्री, धैर्य, भ्रातत्व आदि सात्विक भावों में फँस जाता है, तो उसे परमात्मा विस्मरित हो जाता है। उसी को मूर्छा आना बताया गया है। जब परमात्मा से लौ टूट जाती है तो विषय वासना रूपी नागपाश में जीव फँस जाता है। उसी को नागपाश में बाँधकर ले जाना बताया गया है।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जिस परमात्मा का नाम जप कर ज्ञानी लोग भावों के बन्धन को काट लेते हैं, उसी परमात्मा का अनन्य बुद्धि रूपी दूत क्या विषयों के बन्धन में बँध सकता है? वह तो परमात्मा का कार्य करने के लिए ही स्वयं को बँधवाया था। वास्तव में काम व काम के सहयोगी भावों के मर्म को जाने बिना परमात्मा में पूर्ण लीनता लाना सम्भव नहीं हो पाता है। अत: इसी कारण से अनन्य बुद्धि के भाव ने आसुरी भावों के मर्म को जानने के लिए ही विषयों के बन्धन को स्वीकार किया है।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी वानर का बँधा हुआ सुनकर सभी आसुरी भाव दौड़कर आए। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने काम रूपी रावण की आसुरी भावों वाली सभा को देखा। जिसकी प्रभुता (प्रभाव) का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोचन सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुं गरुड़ असंका।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने काम रूपी रावण की सभा में देखा कि सब देव भाव व दिग्पाल रूपी वृति भाव विनयी होकर हाथ जोड़कर खड़े हैं अर्थात् सभी दैवीय भाव वृतियों के भाव काम रूपी रावण के सामने असहाय होकर खड़े हैं। काम रूपी रावण की भौंह की चाल से ही सब भयभीत हो उठते हैं। उस काम रूपी रावण के ऐसे प्रताप को देखकर भी अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को भय नहीं लगा और वह ऐसे खड़ा रहा मानों वासना रूपी सर्पों के बीच में ज्ञान रूपी गरुड़ निशंक होकर खड़ा हो।
दो0 कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुन उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को देखकर काम रूपी रावण वासनायुक्त (दुर्वचन) वचन बोलकर हँसा। परन्तु अक्षय रूपी आसुरी भाव के मरने की याद करके उसके हृदय में विषाद पैदा हो गया। अर्थात् काम के भाव को लगा कि जब अक्षय अर्थात् कभी क्षय न होने वाला आसुरी भाव भी मारा गया तो यह तो कोई अति बलवान भाव है। ऐसा सोचकर काम भाव विषादयुक्त हो गया।
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि के बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
व्याख्या : अरे बुद्धि रूपी वानर! तू कौन है? और किसके बल पर तूने वासना रूपी वन को उजाड़ा है? क्या तूने कभी मेरा नाम और यश नहीं सुना? अरे शठ! मैं तुमे अभी भी निशंक देख रहा हूँ।
मारे निसिचर केहि अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुनु रावन ब्रह्माण्ड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया।।
व्याख्या : तूने किस अपराध के कारण आसुरी भावों का वध किया है? अरे शठ! क्या तुझे प्राणों का भय नहीं है? तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बोला कि हे काम रूपी रावण! जिसके बल से इस समस्त ब्रह्माण्ड की रचना हुई है।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
व्याख्या : जिसके बल से भाव का उद्गम व क्षरण होता है तथा जिसके बल से स्वर चलते हैं तथा जिसके बल से दस इन्द्रियों का पालन, सृजन व संहार होता है जिसके बल से हजारों भाव अंडकोश, पर्वत व वन अर्थात् सूक्ष्म भाव, विशाल भाव व सब प्रकार के मिश्रित भाव पैदा होते हैं।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता।।
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
व्याख्या : जो स्वरों के माध्यम से नाना शरीर धारण करता है और तुम्हारे जैसे सठ भावों को प्रेरणा करता है। जिसने अज्ञानता रूपी कठोर धनुष को तोड़कर तुम सहित नर (धड़कन) से उत्पन्न भावों के मद को दूर कर दिया।
खर दूषन त्रिसिरा अ डिग्री बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
व्याख्या : जिसने अज्ञान, द्वेष (दूषण) त्रिगुणी भाव धारा और भोग बल रूपी बाली सहित सभी बलवानों को मार दिया।
दो0 जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।
व्याख्या : जिसके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर को जीत लिया है अर्थात् जिसके बल से समस्त भाव काम के अधीन हो गए हैं, मैं उन्हीं आत्मा रूपी राम का दूत हूँ, जिनकी प्रिय सुरता रूपी नारी का तुम हरण करके ले आए हो।
जानउँ मैं तुम्हारी प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बोला कि हे काम रूपी रावण! मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूँ। तुमने सहस्रवाहु अर्थात् हजारों भावों के साथ लड़ाई करके और भोग बल रूपी बालि के साथ युद्ध करके यश प्राप्त किया है अर्थात् इनसे युद्ध करके उलझ गया है। अनन्य बुद्धि के मार्मिक वचनों को काम रूपी रावण ने हँसकर टाल दिए।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब के देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
व्याख्या : मुझे वासना रूपी उपवन को देखकर भूख लगी थी और बुद्धि के स्वभाव वश मैंने वासना रूपी पेड़ तोड़े थे। सबके शरीरों में परम प्रिय परमात्मा होते हैं। परन्तु मुझे आसुरी भावों ने अकारण मारा था।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे।।
मोहि न कुछ बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
व्याख्या : जिन आसुरी भावों ने मुझे मारा, उनको ही मैंने मारा था। इस पर तुम्हारे पुत्र आसुरी अहंकार ने मुझे बाँध लिया। मुझे तामसिक अहंकार के बंधन में पड़ने में कोई शर्म नहीं है क्योंकि मैं तो मेरे स्वामी अर्थात् आत्मा के कार्य को करना चाहता हूँ।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि का भाव बोला कि हे काम रूपी रावण! मैं तुमसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि तुम मेरी प्रेरणा को अहंकार का त्याग करके सुनो। तुम आसुरी भावों के कुल का विचार करके देखो और भ्रम का त्याग करके भक्तों के भय को दूर करने वाले परमात्मा का भजन करो।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
व्याख्या : जिसके डर से भयंकर काल भी डर जाता है जबकि काल दैवीय व आसुरी सभी भावों को खाने वाला है। इसलिए उस परमात्मा से कभी भी बैर मत कीजिए और मेरे कहने से सुरता रूपी जगत जननी को वापस कर दीजिए।
दो0 प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारी।।22।।
व्याख्या : परमात्मा प्राणों के माध्यम से सबका पालन करने वाले, करूणा के समुद्र और अज्ञान के शत्रु हैं। अत: वे शरण में जाने पर तुम्हारे सब अपराधों को भूलाकर रक्षा कर लेंगे।
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू।।
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
व्याख्या : तुम आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को हृदय में धारण करके अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर वासना रूपी लंका पर अचल राज करो अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर भोग भोगने का कोई दोष नहीं है। तुम पुलस्त्य ऋषि के निर्मल यश रूपी चन्द्रमा में कलंक मत बनो अर्थात् सहज भोगों के रस में असहजता रूपी कलंक मत बनो।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी।।
व्याख्या : बिना राम के नाम के अर्थात् बिना आत्म चिंतन के वाणी शोभा नहीं देती है। तुम मद व मोह का त्याग करके विचार कर देख लो। सब गहनों से सजी हुई स्त्री बिना वस्त्रों के शोभा नहीं पाती है। अर्थात् वासना सब भोग रूपी गहनों से सजी होने पर भी बिना सहजता रूपी वस्त्रों के शोभा नहीं पाती है।
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं।।
व्याख्या : जो परमात्मा के विमुख होता है उसको सम्पत्ति व यश का मिलना नहीं मिलने के बराबर है अर्थात् जो आत्म विरोधी व असहज होता है, उसको सम्पति व यश बड़ाई मिलना व्यर्थ का होता है। जैसे बिना मूल की नदियाँ वर्षा ऋतु जाते ही सूख जाती हैं, वैसे ही आत्मा से विमुख व्यक्ति का धन व यश चला जाता है।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
व्याख्या : हे दस इन्द्रियों रूपी कण्ठ वाले काम रूपी रावण! मैं प्राण को स्थिर करके कहता हूँ कि आत्मा रूपी राम के विरोधी को कोई नहीं बचा सकता है। आत्मा रूपी राम से द्रोह करने वाले हे काम रूपी रावण! तुमको विश्वास रूपी शंकर, अणु-अणु में व्यापक विशुद्ध प्राण रूपी विष्णु व बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी तुझे नहीं बचा पायेंगे।
दो0 मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
व्याख्या : अज्ञान रूपी अहंकार जिसका मोह ही मूल होता है और जो बहुत कष्ट देने वाला है, उसका त्याग करके तुम आत्मा रूपी राम का भजन करो, जो कृपा के समुद्र व प्रकृति को वश में करने वाले (भगअवान) हैं।
जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
व्याख्या : हालांकि अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने काम को कल्याण की बात कही थी, जो भक्ति, विवेक व वैराग्य से युक्त थी। परन्तु अभिमानी काम रूपी रावण उपहास करता हुआ बोला कि हमें बुद्धि रूपी वानर बड़ा गु डिग्री और ज्ञानी मिला है।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण क्षुब्ध होता हुआ बोला कि हे मूर्ख! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है, इसलिए तू मुझे शिक्षा दे रहा है। तब अनन्य बुद्धि के भाव ने कहा कि उल्टा होगा अर्थात् काम का नाश होगा। तुम्हें मति भ्रम हुआ है मैंने जान लिया है। वास्तव में भावों का द्वन्द्व जब चलता है तो एक दूसरे भाव को ललकारने लगते हैं और दूसरे भाव का अन्त निकट जानने लगते हैं।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की बातें सुनकर काम रूपी रावण बहुत क्षुब्ध हो उठा और कहने लगा कि इस मूर्ख बुद्धि रूपी वानर को तुरन्त मार दो। ऐसा सुनकर आसुरी भाव अनन्य बुद्धि के भाव को मारने के लिए दौड़े। उसी समय मंत्रणा के भावों सहित वैराग्य रूपी विभीषण आ गया अर्थात् वैराग्य का भाव पैदा हो गया।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण ने काम रूपी रावण को सीस झुकाते हुए कहा कि बुद्धि रूपी दूत को मारना नीति के विरुद्ध है। हे गोसाँई अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने वाले! बुद्धि रूपी वानर को कुछ और दण्ड दीजिए। यह बात सभी आसुरी भावों को अच्छी लगी। वास्तव में बुद्धि के भाव को मारना ठीक नहीं होता है क्योंकि बुद्धि के भावों से ही काम को भी बल मिलता है। अत: नीति अनुसार बुद्धि के भाव को कामोन्मुखी करना अच्छा रहेगा। इसलिए यह बात सभी आसुरी भावों को अच्छी लगी।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
व्याख्या : यह सुनते ही दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाला काम रूपी रावण बोला कि बुद्धि रूपी वानर को अंग-भंग करके भेज दो अर्थात् वासनाओं में फँसाकर भेज दो।
दो0 कपि के ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।
व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि बुद्धि रूपी वानर की आसक्ति रूपी पूँछ पर ममता होती है। इसलिए भोग रूपी तेल व वासना रूपी वस्त्र बाँधकर लालसा रूपी आग लगा दीजिए।
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
व्याख्या : जब आसक्ति रूपी पूँछ वासना रूपी लंका में रह जायेगी तो आसक्ति हीन अर्थात् पूँछहीन बुद्धि रूपी वानर पुन: आसक्ति की तरफ आकर्षित होकर अपने आत्मा रूपी स्वामी को भी लेकर आ जायेगा। जिनकी ये इतनी बड़ाई कर रहा है। तब मैं उनकी प्रभुता को स्वयं देखूँगा। इन चौपाइयों में साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में काम का भाव बुद्धि के माध्यम से आत्मा को अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है। क्योंकि सुरता तो प्रमस्तिष्क कोश रूपी लंका में पहले से ही बन्दी है और आत्मा भी अगर आ जाए और बन्दी बन जाए तो फिर काम का अचल राज हो जाए।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
व्याख्या : काम रूपी रावण भाव की बातों को सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान का भाव मुस्कुराने लगा कि शारद अर्थात् स्वर अनुकूल होते जा रहे हैं। अर्थात् काम का भाव अगर आसक्ति रूपी पूँछ को जला देगा तो स्वत: ही काम का प्रभाव समाप्त हो जायेगा और स्वर (शारद) स्वत: ही अनुकूल हो जायेगा। काम भाव की आज्ञा पाकर अर्थात् काम के भाव की भावना के अनुसार सभी आसुरी भाव आसक्ति को जलाने अर्थात् आसक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि के भाव के सम्पर्क में जब काम व आसुरी भाव आते हैं तो सभी में आसक्ति बढ़ाने की भावना प्रबल हो उठती है। यहाँ उसी मर्म को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
व्याख्या : वासना रूपी लंका नगरी का भोग रूपी घी व तेल नहीं बचा अर्थात् भोग की लालसा व आसक्ति प्रबल हो उठी। वास्तव में जब भोग की लालसा प्रबल हो उठती है तो आसक्ति तीव्रता से बढ़ने लग जाती है और बुद्धि का भी वैसे ही विस्तार होने लग जाता है। उसी को अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान द्वारा पूँछ को बढ़ाना बताया गया है। भोग लालसा की प्रबलता के खेल को देखकर वासना रूपी लंका के सब आसुरी भाव आ गए और अनन्य बुद्धि के भाव को लात मारकर हँसी करने लगे।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता।।
व्याख्या : उस अवस्था में भोग लालसा रूपी ढोल बजने लगे और सभी आसुरी भाव ताली बजाने लगे अर्थात् उत्साहित होने लगे। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को वासना रूपी लंका में घुमाकर आसक्ति रूपी पूँछ में लालसा रूपी आग लगा दी। जब अनन्य बुद्धि के भाव ने लालसा रूपी आग को जलते हुए देखा तो तुरन्त सूक्ष्म रूप धारण कर लिया। अर्थात् लालसा की आग को जलता देखकर आत्मा रूपी राम का स्मरण करके वासनाओं से सजग हो गया।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं।।
व्याख्या : जब वासना की लालसा रूपी पूँछ में आग लग जाती है तो अनन्य बुद्धि का भाव माया रूपी महल के ऊपर चढ़ जाता है अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव माया से परे हो जाता है। उस अवस्था में वासना रूपी नगरी की नारियाँ भयभीत हो उठती हैं। अर्थात् जब अनन्य बुद्धि का भाव वासनाओं का त्याग करता है तो साधक को दिल में कुछ भय सा लगने लगता है कि सभी सुख-भोग छूट जायेंगे। उसी भय के कारण शरीर की नाड़ियाँ भी कम्पित हो उठती है। उसी भाव अवस्था को यहाँ लिखा गया है।
दो0 हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग आकास।।25।।
व्याख्या : जब अनन्य बुद्धि की लौ परमात्मा से लग जाती है तो माया का हरण करने वाली प्राण वायु से उत्पन्न उनचास सात्विक वृतियाँ प्रबल हो उठती हैं और उनचास सद्वृतियों के प्रबल होने पर अनन्य भाव में उत्साह छा जाता है और आसुरी भावों को जलाने के लिए गर्जना करने लगता है। उसी को अट्टहास करके बुद्धि रूपी वानर का आकाश की तरफ बढ़ना बताया गया है।
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि का भाव विशाल होता है और उसमें माया को हरने की जब परम शक्ति आ जाती है तो वह एक मन के अन्दर से दूसरे मन के अन्दर प्रवेश करने लग जाता है। पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि प्रत्येक भाव का अपना मन होता है। अत: जब उनचास सद्वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं तो अनन्य बुद्धि का भाव प्रत्येक भाव के मन के अंदर प्रवेश करके वासनाओं को जलाने लग जाता है, जिससे वासना रूपी नगर जलकर बिहाल हो जाता है अर्थात् भोग व लालसा के भाव जलने लग जाते हैं। उस अवस्था में सद्वृतियों के प्रभाव से ज्ञान अग्नि की लपटें उठने लग जाती हैं।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भाव अपने जन्मदाता भावों को पुकारने लगते हैं कि अब हमें कौन बचायेगा? हमने तो पहले ही कहा था कि यह केवल बुद्धि रूपी वानर नहीं है बल्कि कोई विशेष प्राण का स्वर (सुर) है।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
व्याख्या : साधु के अपमान का फल यह है कि नगर अनाथ की तरह जलने लगता है। वास्तव में जब सात्विक भाव का उल्लंघन किया जाता है तो वासना रूपी लंका वासनाओं की आग में जलने लगती है। यह जलने की घटना क्षणमात्र में घटित होती है। उसी को क्षण मात्र में लंका का जला देना बताया गया है। परन्तु वैराग्य रूपी विभीषण का घर नहीं जलता है। वास्तव में जब वासना रूपी लंका जलती है तो वैराग्य का भाव तो और प्रबल हो उठता है। अत: विभीषण रूपी वैराग्य भाव का घर कैसे जल सकता है? उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर विभीषण का घर नहीं जलना बोलकर लिखा है।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जिस परमात्मा की प्रेरणा से अनन्य बुद्धि का भाव पैदा होता है, वो अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान वासना रूपी अग्नि में नहीं जल सकता है। अनन्य बुद्धि के भाव ने वासना रूपी लंका को उलट-पुलट करके सब जला दिया अर्थात् वासना व लालसा के प्रत्येक भाव को जला दिया और पुन: भावों के भाव रूपी समुद्र में कूद पड़ा। इन चौपाइयों में बहुत गहरा भाव विज्ञान बताया गया है। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि के भाव के द्वारा वासनाएँ जलने लग जाती हैं, तो आसक्ति का प्रभाव अनन्य बुद्धि पर पड़ने की सम्भावना रहती है। परन्तु जब अनन्य बुद्धि वासनाओं के भावों से निकल कर अन्य भावों में लग जाती है तो वासना की अग्नि बुझ जाती है। इसलिए तो कहा जाता है कि अगर काम का भाव सताए तो तुरन्त एकान्त छोड़कर समूह में आ जाना चाहिये। उससे काम की अग्नि शान्त हो जाती है।
दो0 पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनक सुता के आगे ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने आसक्ति रूपी पूँछ की वासना रूपी अग्नि को बुझाकर लघु रुप धारण करके अर्थात् निर्मलता धारण करके पुन: समर्पण करता हुआ सुरता रूपी सीता के सामने खड़ा हो गया। अर्थात् अनन्य बुद्धि रूपी भाव निर्मल होकर सुरता रूपी सीता के सामने खड़ा हो गया।
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि का भाव बोला कि हे सुरता रूपी माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिए जैसे आत्मा रूपी राम ने मुद्रिका रूपी पहचान दी है। तब सुरता रूपी सीता ने चूड़ामणि उतार कर दे दी। जिसे प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने हर्षपूर्वक ले लिया। चूड़ामणि का बहुत गहरा प्रतीक है। चूड़ामणि बालों को बाँधने के काम आती है। अत: सुरता रूपी सीता कहना चाहती हैं कि वासना रूपी बालों को बाँधकर ही आत्मा रूपी राम मुझे वापस प्राप्त कर सकते हैं।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
व्याख्या : हे तात! तुम मेरे प्रणाम कहना अर्थात् मुझे प्राण के द्वारा आत्मा से जोड़ना और कहना कि हे प्रभु! सब प्रकार से कार्य पूर्ण हो गया है अर्थात् सब प्रकार से काम रूपी रावण का मर्म जान लिया है। आप तो दीनों पर दया करने वाले हैं। अत: उस विरद (उपाधि) को याद करके मेरे संकटों को दूर कर दें अर्थात् सुरता को काम के चंगुल से मुक्त करा दें।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथ न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
व्याख्या : हे तात! तुम इन्द्रसुत जयन्त की कथा को सुनाना अर्थात् इन्द्रिय सुख भोग की बात बताना और फिर आत्मा रूपी राम के प्ररेणा रूपी बाण की महिमा को बताना। अगर एक महीने की अवधि में आत्मा रूपी स्वामी नहीं आए तो फिर मैं सुरता जीवित नहीं मिलूँगी।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! अब कहो मैं किस प्रकार जीवित रहूँ? अब तुम भी जाने की कह रहे हो। तुमको देखकर तो मुझे शीतलता मिली थी। परन्तु पुन: मुझे तो वही ज्ञान-अज्ञान रूपी दिन रात सतायेंगे।
दो0 जनक सुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सि डिग्री नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने प्राण से उत्पन्न सुरता रूपी सीता को समझाकर व नाना प्रकार से धैर्य बँधाकर सुरता के चरणों में सीस झुकाकर अर्थात् सुरता के प्रति समर्पण करते हुए आत्मा रूपी राम के पास गमन किया। अर्थात् अनन्य बुद्धि का भाव आत्मोन्मुखी हो गया।
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
व्याख्या : अनन्य बुद्धि के भाव ने आत्मोन्मुखी होते हुए घोर गर्जना की अर्थात् अनन्य बुद्धि का आत्मोन्मुखी होने के लिए तीव्र वेग हो गया, जिससे आसुरी भावों के पैदा होने की प्रक्रिया बन्द हो गयी। उसी अवस्था को असुरों की नारियों के गर्भ गिर जाना बोलकर लिखा है। तब अनन्य बुद्धि का भाव, भाव रूपी समुद्र को पार करके वापस आ गया और बाकी बुद्धि के भाव रूपी वानरों को प्रसन्न होते हुए सुरता की खोज की खबर सुनाई।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
व्याख्या : सब बुद्धि के भाव अनन्य रूपी हनुमान को देखकर हर्षित हो उठे और सबने अपना नया जन्म प्राप्त हुआ जाना। वास्तव में जब अनन्य बुद्धि का भाव वासना रूपी लंका का मर्म जानकर सुरता की खोज कर लेता है तो पुन: बुद्धि के भावों में नव ऊर्जा का संचार हो जाता है। उसी को बुद्धि रूपी वानरों का दूसरा जन्म पाना बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में अनन्य बुद्धि के भाव का तेज बढ़ जाता है और मुख पर प्रसन्नता झलकने लगती है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा रूपी राम का कार्य सिद्ध हो गया है अर्थात् सुरता की खोज हो गयी है।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
व्याख्या : सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर अनन्य बुद्धि के भाव से मिलकर बहुत सुखी हो गए जैसे तड़पती हुई मछली जल मिलने पर सुखी हो जाती है। तब सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर प्रसन्न होकर आत्मोन्मुखी होकर चले। उस अवस्था में सब भाव अनन्य बुद्धि के अनुभवों को सुनते हुए चलते हैं।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
व्याख्या : तब सभी बुद्धि रूपी वानर भोग रूपी मधुर उपवन में आए और दृढ़ता रूपी अंगद भाव की प्रेरणा अनुसार मधुर भोग रूपी फलों को खाने लगे अर्थात् बुद्धि के भाव भोगों में रमण करने लगे। तब भोगों में जो भाव बाधा देने लगे उन पर बुद्धि रूपी वानरों ने संयम रूपी मुष्टिका का प्रहार करके सबको भगा दिया।
दो0 जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।
व्याख्या : तब भोगों रूपी मधुबन के रखवारे भाव सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के पास पहुँच कर बोले कि दृढ़ बुद्धि रूपी युवराज अंगद ने मधुर भोग रूपी उपवन को उजाड़ दिया है अर्थात् भोगों को जीत लिया है तो सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव बहुत प्रसन्न हुआ कि बुद्धि रूपी वानर आत्मा रूपी राम का कार्य सिद्ध कर आए हैं अर्थात् सुरता की खोज हो गयी है।
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
व्याख्या : अगर सुरता रूपी सीता की खोज नहीं होती तो क्या बुद्धि के भाव मधुर भोगों रूपी बाग को उजाड़ सकते हैं? अर्थात् बिना सुरता की खोज के भोगों के बन्धन को नहीं तोड़ा जा सकता है। सद्बुद्धि सुग्रीव का भाव ऐसा मन में विचार कर ही रहा था कि सब बुद्धि के भाव रूपी वानरों का समाज आ गया।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
व्याख्या : सब बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को आकर सीस झुकाया और सद्बुद्धि का भाव सभी बुद्धि के भावों से प्रेम पूर्वक मिला। तब सद्बुद्धि के भाव ने सब बुद्धि के भावों की कुशलक्षेम पूछी तो बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने जवाब दिया कि आपके चरणों को देखकर सब कुशल हैं अर्थात् आपसे मिलकर सब बुद्धि के भाव कुशल हैं। आत्मा रूपी राम की प्रेरणा से सुरता रूपी सीता की खोज का विशेष कार्य हो गया है।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।।
व्याख्या : हे नाथ! अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने सुरता रूपी सीता की खोज करके सब बुद्धि के भाव रूपी वानरों के प्राण बचा लिए हैं। सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव यह बात सुनकर अनन्य बुद्धि के भाव से फिर मिले और सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों के लेकर आत्मा रूपी राम के पास लेकर चले अर्थात् सभी बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी हो उठे।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने जब बुद्धि के भाव रूपी वानरों को आते हुए देखा तो उनके मन में विशेष हर्ष हुआ। आत्मा रूपी राम और लखन भाव रूपी लखन दोनों भाई स्थिरता रूपी निर्मल शिला पर बैठे थे। तब सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर चरणों में शीश झुकाए अर्थात् आत्मा के प्रति पूर्ण समर्पण कर दिए।
दो0 प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करूना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।
व्याख्या : करूणा के राशि आत्मा रूपी राम सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों से प्रेम सहित मिले और सब भावों की कुशलक्षेम पूछी। तब बुद्धि के भावों रूपी वानरों ने कहा कि आपके चरण कमलों को देखने से हम सब अब कुशल हैं।
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
व्याख्या : तब बुद्धि के धैर्य भाव रूपी जामवंत बोले कि हे नाथ! जिस पर आप कृपा कर देते हैं, वही भाव शुभ व कुशल हो जाता है। आत्मा की अनुकूलता होने पर स्वर, धड़कन व मन के भाव भी उस भाव पर प्रसन्न हो जाते हैं।
सोई बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
व्याख्या : वही भाव विजयी विनयी व गुणों का सागर हो जाता है और उसका सुयश सत, रज व तम के गुणों में छा जाता है। आपकी प्रेरणा से ही सब कार्य हो गया है और उसी के कारण हमारा जन्म सफल हो गया है।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवन तनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
व्याख्या : हे नाथ! प्राण से उत्पन्न अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने जो कार्य किया है, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब अनन्य बुद्धि की सब करणी को धीर बुद्धि रूपी जामवंत ने आत्मा रूपी राम को सुनाए।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
व्याख्या : धीर बुद्धि रूपी जामवंत के वचन आत्मा रूपी राम को बहुत अच्छे लगे और प्रसन्न होकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को हृदय से लगा लिया। तब पूछा कि हे तात! प्राण से उत्पन्न शक्ति अर्थात् जानकी कैसे हैं? वह अपने स्वंय के प्राणों की रक्षा कैसे करती हैं? इस चौपाई में बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में प्राण से ही जानकी (शक्ति) पैदा होती है और जान ही जान की रक्षा भी करती है।
दो0 नाम पाह डिग्री दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।
व्याख्या : इस दोहे में साधना पद्धति के गहरे रहस्य को समझाया गया है कि ध्यान कैसे लगता है? और कैसे प्राणशक्ति की रक्षा होती है? वास्तव में साधक जब परमात्मा का नाम जप करते हुए ध्यान में मग्न हो जाता है और स्वयं की दृष्टि को शरीर पर लगाने पर शरीर रूपी यंत्र से प्राण कैसे बाहर जा सकते हैं? अर्थात् स्वयं की दृष्टि को नख से शिख तक लगाकर परमात्मा का नाम जप करते हुए ध्यान करने पर प्राणशक्ति अक्षुण होकर स्थिर हो जाती है।
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनक कुमारी।।
व्याख्या : हे नाथ! चलते हुए मुझे चूड़ामणि दी है अर्थात् वासना रूपी बालों को बाँधने की प्रेरणा की है। तब आत्मा रूपी राम ने चूड़ामणि अर्थात् सुरता की प्रेरणा को हृदय से लगा लिया, यानी हृदयंगम कर लिया। हे नाथ! दोनों नेत्रों में आँसू भरकर प्राणशक्ति से उत्पन्न सुरता ने कुछ वचन कहे हैं।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारित हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी।।
व्याख्या : सुरता रूपी माता ने कहा है कि लखन भाव सहित आत्मा रूपी स्वामी के चरणों में समर्पण करते हुए कहना कि आप तो प्राणों से उत्पन्न दीनता का हरण करने वाले हैं अर्थात् विकारों को दूर करने वाले हैं। मैं (सुरता) तो मन, वचन व कर्म से आत्मोन्मुखी थी फिर किस विकार (अपराध) के कारण आपने (आत्मा ने) मुझ सुरता का त्याग कर दिया।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा।।
व्याख्या : हाँ, मेरा एक अपराध जरूर मानती हूँ कि आप (आत्मा) से दूर होने पर भी मैंने (सुरता) अपने प्राणों को नहीं छोड़ा। हे नाथ! उसमें मेरा दोष नहीं है बल्कि नेत्रों (दृष्टि) का दोष है कि नेत्र हठ करके भी प्राणों को नहीं निकलने दे रहे हैं। इन चौपाइयों में नेत्रों का हठ करना गहरा रहस्य है। वास्तव में जब सुरता आत्मा से विलग हो जाती है तो दृष्टि में जो दृश्य आते रहते हैं। सुरता उन्हीं दृश्यों में रमण करने लगती है जिससे सुरता मरती नहीं है। उसी को बहुत ही सूक्ष्म प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।।
व्याख्या : विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास हवा है। इस प्रकार अग्नि, रूई व हवा का संयोग होने से यह शरीर क्षणमात्र में जल सकता है परन्तु आँखों से अपने हित के लिए आँसू रूपी जल बहने से यह शरीर विरह की आग में जलता नहीं है। अर्थात् भोगों की लालसा रूपी जल के बहने के कारण यह शरीर आत्मा के वियोग की अग्नि में नहीं जल पाता है।
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीन दयाला।।
व्याख्या : इस प्रकार हे आत्मा रूपी राम! सुरता रूपी सीता की विपत्ति बहुत बड़ी है। जिसका वर्णन नहीं करना ही अच्छा है अर्थात् वर्णन करने से विरह अग्नि की जलन और बढ़ जायेगी।
दो0 निमिष निमिष करूनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
व्याख्या : हे करूणा के समुद्र आत्मा रूपी राम! सुरता रूपी सीता के लिए आपके विरह के क्षण भी कल्पों के समान बीत रहे हैं। इसलिए हे प्रभु! आप जल्दी चलिए और आसुरी भावों के दलों को जीतकर जल्दी सुरता रूपी सीता को ले आइए।
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति की ताही।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता के विरह के दु:ख की बात सुनकर आत्मा रूपी राम के कमल के समान नेत्रों में जल भर आया अर्थात् आत्म तत्व द्रवित हो उठा। तब आत्मा रूपी राम बोले कि जिसकी मन, वचन व कर्म से मेरी गति हो अर्थात् जो आत्मोन्मुखी होता है, उसको क्या सपने में भी विपत्ति आ सकती है?
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने कहा कि हे प्रभु! विपत्ति तब-तब ही होती है जब-जब जीव आत्मोन्मुखी नहीं होता है। हे प्रभु! आसुरी भावों की बात ही कितनी है? आप शत्रु को जीतकर सुरता रूपी सीता को ले आवेंगे। अर्थात आसुरी भावों का दमन करने से सुरता का मिलन हो जायेगा।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! तुम्हारे समान उपकार करने वाला कोई भी स्वर, नर (धड़कन) व मन का भाव नहीं होता है। अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव के समान आत्मा का उपकार करने वाला कोई नहीं होता है। मैं तुम्हारा प्रति उपकार क्या कर सकता हूँ? अर्थात् मैं आत्मा तुम्हें क्या प्रेरणा कर सकता हूँ? क्योंकि मन तो मेरे सामने आ ही नहीं सकता है अर्थात् जब आत्मा का आभास होता है तो मन का अस्तित्व मिट जाता है। या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जब अनन्य बुद्धि का भाव प्रबल होता है तो मन मिट जाता है।
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
व्याख्या : हे अनन्य बुद्धि रूपी वत्स! मैं (आत्मा) तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकता। स्वरों को शान्ति प्रदान करने वाले आत्मा रूपी राम ऐसा कहकर बार-बार अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को देखने लगते हैं। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम के नेत्र जल से भरे हुए और शरीर अत्यन्त पुलकित हो जाता है अर्थात् आत्म तत्व गद्गद होकर द्रवित हो उठता है।
दो0 सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान के अंग-अंग पुलकित हो उठे और प्रेम से व्याकुल होकर आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर पड़ा अर्थात् पूर्ण रूप से आत्मा के प्रति समर्पण कर दिया।
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि के सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम बार-बार अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को उठाना चाहते हैं, अर्थात् अपने में लीन करना चाहते हैं परन्तु प्रेम की मग्नता के कारण उठाने में नहीं आ रहे हैं। तब आत्मा रूपी राम ने अनन्य बुद्धि रूपी वानर के सिर पर हाथ रखा अर्थात् आत्मा ने अनन्य भाव को आशीर्वाद दिया। इस दशा का स्मरण करके गौरीसा अर्थात् गो अ अरि यानी इन्द्रिय भावों का शत्रु रूपी भाव (शंकर) मग्न हो गया।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
व्याख्या : फिर विश्वास रूपी शंकर ने मन को सावधान करके आत्म अनुभूति की बहुत सुंदर कथाएँ कही। तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान को उठाकर आत्मा रूपी राम ने अपने हृदय से लगा लिया और हाथ पकड़कर अपने निकट बैठा लिया।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान से पूछा कि हे अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान! काम रूपी रावण द्वारा रक्षित वासना रूपी लंका को तुमने किस प्रकार जलाया? तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने आत्मा रूपी राम को प्रसन्न जानकर अभिमान रहित बोला।
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी स्वामी! साखामृग अर्थात् बुद्धि के भावों रूपी वानरों का एक भाव से दूसरे भाव में प्रवेश करना कोई बड़ी बात नहीं है। बुद्धि का भाव तो एक भाव से दूसरे भाव पर जाता ही है। मैंने जो भाव रूपी समुद्र को पार करके वासना रूपी लंका नगरी को जलाया और आसुरी भावों को मार कर भोग रूपी बाग को जलाया।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
व्याख्या : वो सब तो आपकी प्रेरणा के प्रताप से ही सम्भव हुआ है। उसमें मेरा (अनन्य भाव का) कोई बड़प्पन नहीं है।
दो0 ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल।।33।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! उनके लिए कुछ भी दुर्गम नहीं होता जिन पर तुम (आत्मा) अनुकूल होते हो अर्थात् आत्मा अनुकूल होने पर संसार में सब कुछ सुगम हो जाता है। आपके (आत्मा) प्रभाव से तो रूई भी बड़वानल को जला सकती है अर्थात् आत्मा अनुकूल होने पर तो असम्भव भी संभव हो जाता है।
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
व्याख्या : तब अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने कहा कि हे नाथ! आप मुझे निश्चल सुखदायनी भक्ति दीजिए। अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान की बातें सुनकर आत्मा रूपी राम ने "ऐसा ही हो"" का वरदान दिया।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर बोलते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जो आत्मा रूपी राम के स्वभाव को जानते हैं, वे परमात्मा के भजन के अलावा कुछ नहीं चाहते हैं। यह संवाद जिसके हृदय में आ जाता है अर्थात् यह अनुभूति जिस साधक को हो जाती है, वो परमात्मा की भक्ति को प्राप्त कर लेता है।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुख कंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर बुद्धि के भाव रूपी वानर आत्मा रूपी राम की जय बोलने लगे कि हे कृपाल! हे सुख के मूल! आपकी जय हो, जय हो। तब आत्मा रूपी राम ने सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव को बुलाया और कहा कि अब सुरता रूपी सीता को लाने के लिए चलने की तैयारी करो।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
व्याख्या : अब विलम्ब किस कारण से किया जाए? अब तो सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों को चलने की आज्ञा दीजिए। यह बुद्धि के भावों व आत्मा के खेल को देखकर साधक के स्वरों में हर्ष का संचार होने लग जाता है।
दो0 कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।
व्याख्या : सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने तब बुद्धि के भावों रूपी वानरों को बुलाया अर्थात् प्रेरणा की तो बुद्धि के नाना भावों के समूह के समूह आ गए।
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
व्याख्या : उस अवस्था में सभी बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी हो उठते हैं। उसी को सभी वानरों द्वारा राम के चरणों में सीस झुकाना बताया गया है। बुद्धि के धीरता भाव रूपी भालू गर्जना करने लगते हैं। तब आत्मा रूपी राम ने बुद्धि के भावों रूपी सेना को देखा और कृपा दृष्टि से समस्त भाव रूपी सेना को देखा।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की कृपा का बल पाकर अर्थात् आत्म प्रेरणा पाकर बुद्धि के भावों रूपी वानरों के समूह मानो बड़े पर्वतों की तरह हो गए। तब हर्षित होते हुए आत्मा रूपी राम ने वासना रूपी लंका को जीतने के लिए प्रस्थान किया। उस समय शुभ शकुन होने लगे।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेही। फरकि बाम अंग जनु कहि देहीं।।
व्याख्या : जब मंगलमय करणी के लिए प्रस्थान किया जाता है अर्थात् जब मन में मंगल भावना होती है तो शुभ शकुन होने की नीति ही है अर्थात् शुभ शकुन होते ही हैं। जब सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम के आने का आभास हुआ तो बाएँ अंगों ने फड़कना शु डिग्री कर दिया। वास्तव में जब मंगल की भावना प्रबल होने लगती है तो अंगों में फड़कन शु डिग्री हो जाती है।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालू अपारा।।
व्याख्या : जो जो शकुन सुरता रूपी सीता के लिए होने लगे वही काम रूपी रावण के लिए अपशकुन हो गए। अर्थात् जब भाव परमात्मोन्मुखी होने लगते हैं तो काम रूपी रावण कमजोर होने लग जाता है। ध्यान की उस अवस्था में बुद्धि के भावों रूपी वानरों का दल चला, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। बुद्धि के नाना भाव रूपी बन्दर-भालू गर्जना करने लगते हैं।
नख आयुध, गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालू कपिं करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
व्याख्या : बुद्धि के भावों रूपी वानर इच्छारूपी नखों, वृक्षों व पर्वतों को शस्त्रों के रूप में धारण किए हुए ध्यान में मस्तिष्क रूपी आकाश में चले जा रहे हैं। उस अवस्था में धीर व चंचल बुद्धि रूपी भालू व वानर दृढ़ता रूपी सिंह गर्जना करने लगते हैं। भावों की उस अवस्था से शरीर रूपी पृथ्वी में कम्पन होने लगता है और मन रूपी हाथी चिंघाड़ने लगता है अर्थात् मन रूपी हाथी वश में होने लग जाता है।
छ0 चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में साधक के मन रूपी हाथी चिंघाड़ने लगते हैं अर्थात् विभिन्न प्रकार के मन वश में आने लग जाते हैं। पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि मन की उत्पत्ति प्राण से होती है और शरीर में मुख्यत: दस प्राण माने गए हैं और इन प्राणों के अनुसार ही दस दिशाओं को बताया गया है। प्राण के अनुसार मन भी दस प्रकार के होते हैं। अत: ध्यान की इस गहन अवस्था में दसों प्रकार के मन रूपी हाथी चिंघाड़ने लगते हैं। उस अवस्था में साधक के शरीर में अपने-आप झटके से लगने लगते हैं। उसी को शरीर रूपी पृथ्वी का हिलना बोला गया है। उस अवस्था में दबे हुए भाव भी उभरने लगते हैं। अत: उसी को भाव रूपी भव सागर में खलबली मचना बताया गया है। उस अवस्था में मन में हर्ष छा जाता है और गंधर्व, नाग, कंकर आदि प्राणों के चिंता के भाव मिट जाते हैं और स्वरों की गति सुखद होकर मन के भावों को भी शान्त कर देती है। उस अवस्था में बुद्धि के भाव रूपी वानर कटकटाने लगते हैं और नाना प्रकार से दौड़ने लगते हैं। वे सब बुद्धि के भाव उस अवस्था में आत्मोन्मुखी होकर आत्मा के गुणों का बखान करने लगते हैं।
छ0 सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रूचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।
व्याख्या : इस छंद में साधना का गहरा मर्म बताया गया है। ध्यान की गहन अवस्था में जब बुद्धि के भाव आत्मोन्मुखी होकर आत्मा के साथ वासना रूपी लंका को जीतने के लए चलते हैं, तो अहिपति अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति के प्राण बार-बार मोहित (भ्रमित) होने लग जाते हैं। क्योंकि कुण्डलिनि शक्ति के प्राण कभी तो वासना के भोगों का मोह करने लगते हैं, तो कभी परमात्मा में लीन होने का मोह करने लगते हैं। उसी अवस्था को अहिपति (शेष नाग) का भ्रमित होना बोलकर लिखा गया है। तब कुण्डलिनि शक्ति के प्राण (अहिपति) दसन अर्थात् दस इन्द्रियों को पकड़कर रखना चाहते हैं। अत: उस समय की कठोरता का (जटिलता) वर्णन कैसे किया जा सकता है। आत्मा रूपी राम के सुहावने प्रस्थान को देखकर उस समय ऐसा लगने लगता है मानो कुण्डलिनि शक्ति के प्राण रूपी शेषनाग दस इन्द्रियों रूपी कश्छप की पीठ पर पवित्रता की गाथा लिखने जा रहे हों।
दो0 एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
व्याख्या : इस प्रकार आत्मा रूपी राम समस्त बुद्धि के भाव रूपी वानरों सहित भाव रूपी समुद्र के तट पर पहुँच गए। वहाँ पहुँचने पर बुद्धि के भाव रूपी वानर जहाँ-तहाँ वासना रूपी फलों का भक्षण करने लगे अर्थात् वासना के भावों को जीतने लगे।
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब तें जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
व्याख्या : उधर को वासना रूपी लंका में अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान द्वारा आग लगा देने के बाद से आसुरी भाव शंकित होकर रहने लगे। सब भाव आपस में अपने-अपने कोषों में बातें करने लगे कि आसुरी भावो का अब बचना सम्भव नहीं है।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम के अनन्य बुद्धि रूपी दूत के बल का ही वर्णन नहीं किया जा सकता है तो फिर आत्म तत्व की क्षमता का वर्णन कैसे सम्भव है? अत: आत्मा रूपी राम ही अगर प्रकट हो गए तो आसुरी भावों की कैसे रक्षा होगी? आसुरी दूतों से वासना रूपी लंका की खबर पाकर मन के अन्दर अर्थात् मन्दोदरी का भाव ज्यादा व्याकुल हो गया।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू।।
व्याख्या : मन के अन्दर बुद्धि का एक ऐसा भाव रहता है जो हमेशा काम के भाव को अक्षुण्ण रखना चाहता है। मन के अंदर का आसुरी बुद्धि भाव ही मन्दोदरी का प्रतीक है। अत: मन के अंदर की आसुरी बुद्धि का भाव काम रूपी पति के प्रति समर्पण करते हुए बोली कि हे प्रियतम! माया को हरने वाले आत्मा रूपी राम से विरोध मत करो। मेरा कहा हुआ हितकारी जानकर हृदय में धारण करो। अर्थात् मन के अन्दर की आसुरी बुद्धि बोलना चाहती है कि आत्मा को प्रतिकूल मत करो क्योंकि आत्मा प्रतिकूल हो जाने पर कोई बचानेवाला नहीं होगा।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के अनन्य बुद्धि रूपी दूत की करणी को समझिए, जिसके कारण आसुरी भावों की उत्पत्ति ही रूक गयी। अत: आत्मा रूपी राम की सुरता रूपी नाड़ी को मंत्रणा के भावों को बुलाकर वापस आत्मा रूपी राम के पास भेज दीजिए, अगर आप अपनी भलाई चाहते हो।
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
व्याख्या : हे काम रूपी नाथ! तुम्हारे आसुरी भावों के कमल रूपी कुल के लिए सुरता रूपी सीता शीत रात्रि के समान आयी है। अत: हे नाथ! बिना सुरता रूपी सीता को वापस किए तुम्हारा अर्थात् आसुरी भावों का कल्याण विश्वास रूपी शंकर व बुद्धि रूपी ब्रह्मा भी नहीं कर सकते हैं।
दो0 राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लागि जतनु करहु तजि टेक।।36।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के प्रेरणा रूपी बाण आसुरी भाव रूपी मेढ़कों के लिए सर्पों के समान हैं। अत: जब तक प्रेरणा रूपी सर्प आसुरी भाव रूपी मेढ़कों को नहीं ग्रसते तब तक कुछ उपाय कर लीजिए।
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
समय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
व्याख्या : काम रूपी रावण मन के अन्दर के आसुरी बुद्धि रूपी मन्दोदरी की बात सुनकर उल्टा अभिमान करते हुए हँसने लगा। उल्टा मन्दोदरी रूपी आसुरी बुद्धि के भाव को भी कहने लगा कि मंगल के अवसर पर तुम डर रही हो। वास्तव में काम का भाव सोचता है कि बुद्धि के भाव तो आसुरी भावों के लिए भोजन का काम करते हैं। अत: यह तो आसुरी भावों के लिए मंगल करने वाला अवसर है। इसलिए आगे की चौपाइयों में कहता है कि --
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
व्याख्या : हे मन्दोदरी! अगर बुद्दि के भावों रूपी वानरों की सेना आयेगी तो बेचारे आसुरी भाव बुद्धि के भावों का भक्षण करके जीवित रहेंगे। जिसके (काम के) भय से सब लोक भयभीत होते हैं, उसी की नारी (नाड़ी) बुद्धि के भाव रूपी वानरों की सेना देखकर भयभीत हो रही है। यह बड़ी हँसी की बात है।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
व्याख्या : काम का भाव मन के अन्दर (मन्दोदरी) वाली बुद्धि के भाव की बात पर हँस देता है परन्तु उसे पूरी तरह नकारता नहीं है। उसी भाव अवस्था को मन्दोदरी अर्थात् मन के अन्दर के भाव को उर लगागर यानी हृदय में मानकर आसुरी भावों की सभा में चला। काम भाव की इस अवस्था को देखकर मन के अन्दर वाली बुद्धि भाव को चिन्ता हो जाती है कि अब काम रूपी स्वामी की विधि यानी क्रिया उल्टी हो गयी है। अर्थात् काम के भाव का अनन्य बुद्धि के भावों के सम्पर्क में आने पर काम का अन्त होना स्वभाविक हो गया।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बुझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम का बुद्दि के भावों रूपी वानर सेना सहित भाव रूपी भवसागर के तट पर आगमन सुनकर काम रूपी रावण आसुरी भावों की सभा में विचार करने बैठा अर्थात् आसुरी भावों मे द्वन्द्व शु डिग्री हो गया। काम रूपी रावण आसुरी मंत्रणा वाले भावों से कहने लगा कि उचित सलाह दीजिए। तब सब आसुरी भाव हँसे और बोले कि मस्त रहिये अर्थात् चिन्ता रहित रहिये।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं।।
व्याख्या : जब स्वरों की गति को वश में करके दैवीय और आसुरी भावों को जीता था, तब भी कोई श्रम नहीं हुआ तो फिर अब नर (धड़कन) व बुद्धि के भावों को जीतने में क्या समस्या है?
दो0 सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।
व्याख्या : इस दोहे में सांसारिक नीति की बात कही गयी है कि सचिव, वैद्य और गु डिग्री अगर ये तीनों भय के कारण प्रिय बोलते हैं, तो राज्य, धर्म व शरीर का जल्दी ही नाश हो जाता है।
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाई सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
व्याख्या : वही विनाश काले विपरीत बुद्धि काम रूपी रावण के लिए सहायक बनकर ठकुरसुहाती बातें करने लगी। जब आसुरी भावों में इस प्रकार का द्वन्द्व चलता है तो कुछ आसुरी भावों में वैराग्यवृति प्रबल हो उठती है। उसी को वैराग्य रूपी विभीषण भाव का आना और काम रूपी रावण को सीस झुकाना बोलकर लिखा गया है।
पुनि सि डिग्री नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता।।
व्याख्या : फिर वैराग्य रूपी विभीषण का भाव सीस झुकाकर सहज अवस्था (निज आसन) में आ गया और काम रूपी रावण की आज्ञा पाकर बोला कि हे भ्राता! अगर आप मेरे से पूछते हो तो मैं तो मेरी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे कल्याण की बात कहूँगा।
जौ आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं।।
व्याख्या : जो आप अपना कल्याण, सुयश, सुमति, शुभ गति व नाना प्रकार के सुख चाहते हो तो इन्द्रियों को वश में करने वाले (गो अ साईं उ इन्द्रियों का स्वामी) स्वामी! पर नारी अर्थात् सुरता रूपी नाड़ी को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग कर दो।
चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
व्याख्या : भावों के चौदह कोष होते हैं परन्तु नर की धड़कन ही चौदह भाव कोषों का एक स्वामी होती है अर्थात् एक ही धड़कन से आसुरी व दैवीय भाव पैदा होते हैं। भूतों से द्रोह करने पर अर्थात् प्रतिकूलता का व्यवहार करके वह धड़कन भी नहीं बच पाती है। इसलिए गुणी लोग जो नर की धड़कन के मर्म को जानने वाले होते हैं, वे कहते हैं कि थोड़ा भी लोभ ठीक नहीं होता है।
दो0 काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।
व्याख्या : हे नाथ! काम, क्रोध, मद व लोभ ये सब भाव चिन्ता रूपी नरक के रास्ते होते हैं, इसलिए इन सबको छोड़कर उस परमात्मा का भजन करो जिसका भजन संत लोग करते हैं।
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
व्याख्या : हे तात्! आत्मा रूपी राम केवल नर (धड़कन) के स्वामी नहीं हैं, वे तो भावों को संचरित करने वाले स्वरों के भी स्वामी हैं अर्थात् आत्म शक्ति केवल नर की धड़कन नहीं हैं बल्कि स्वरों के माध्यम से अखिल ब्रह्माण्ड को जोड़ने वाली शक्ति है। वह आत्मा रूपी राम तो कालों के भी काल हैं। वह आत्मा रूपी राम ही ब्रह्म, अनामय, अजन्मा व भगवान कहलाता है। वह आत्म शक्ति तो सर्वव्यापक, अजेय, अनादि व अनन्त है।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
व्याख्या : वह परमशक्ति तो इन्द्रियों (गो), साधना में लगे हुए (द्विज), इच्छाओं व दैवीय भावों की कल्याण करने वाली है। वह परमशक्ति कृपा की समुद्र होती है जो मानस (चेतना) के अनुसार शरीर धारण करती है। वह साधना मे लगे रहने वाले भक्त जनों को संतुष्ट करने वाली व दुष्ट भावों का नाश करने वाली होती है। हे भ्राता! वह परम शक्ति अनुभूति (वेद) की धारणा (धर्म) की रक्षा करने वाली होती है।
ताहि बय डिग्री तजि नाइअ माथा। प्रनतारित भंजन रघुनाथा।।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
व्याख्या : इसलिए हे नाथ! आत्मा रूपी राम से बैर मत करो और आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर दो। अर्थात् आत्मा के प्रतिकूल मत होवो बल्कि आत्मा के अनुकूल होकर सहज हो जावो क्योंकि प्राणों से जुड़कर आत्मा ही सब कष्टों को दूर करने वाली होती है। अत: हे नाथ! मैं वैराग्य का भूषण विभीषण आप से कहता हूँ कि सुरता रूपी सीता को लौटा दो और बिना कारण के ही प्रेम करने वाले आत्मा रूपी राम का भजन कीजिए।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
व्याख्या : शरण में आने पर समस्त संसार के साथ द्रोह करने वाले को भी परमात्मा नहीं त्यागते हैं। जिस परमात्मा का नाम दैहिक, दैवीक व भौतिक तापों का नाश करने वाला होता है, वही परमात्मा हृदय में प्रकट होता है। हे काम रूपी रावण इस बात को समझिए।
दो0 बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसला धीस।।39 (क)।।
व्याख्या : हे दस इन्द्रियों को सिर पर धारण करने वाले काम रूपी रावण! मैं वैराग्य का भूषण विभीषण आपके चरणों में बार-बार पड़ता हूँ कि आप मान, मद व मोह का त्याग करके आत्मा रूपी राम का भजन कीजिए।
दो0 मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कहीं पाइ सुअवस डिग्री तात।।39 (ख)।।
व्याख्या : मुझे यह बात मन के पुलस्त्य भाव ने अपने प्रेरणा रूपी शिष्य के माध्यम से बतायी है, जो अवसर मिलते ही मैंने आपको बता दी है।
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
व्याख्या : मन की मंत्रणा का माल्यवंत रूपी भाव बहुत समझदार होता है। अत: उसने वैराग्य रूपी विभीषण की बात सुनकर बहुत सुख माना और काम रूपी रावण से कहा कि हे तात्! वैराग्य रूपी विभीषण नीति के गुणों का भूषण है, अत: यह जो कहता है, उसे हृदय में धारण करो अर्थात् उसका अनुसरण करो।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवतं गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
व्याख्या : अरे ये दोनों मूर्ख भाव आत्मा रूपी दुश्मन की प्रशंसा कर रहे हैं। यहाँ कोई भाव है जो इन्हें यहाँ से हटा दे। यह सुनकर मंत्रणा का माल्यवंत रूपी भाव घर चला गया अर्थात् शान्त हो गया। मंत्रणा का एक भाव ऐसा होता है जो माला की तरह निरन्तर मंत्रणा के भाव उठाता रहता है, अगर एक बार मंत्रणा का भाव शु डिग्री हो जाए। उसी भाव को माल्यवंत के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब मंत्रणा का माल्यवंत भाव शान्त हो जाता है तो भी वैराग्य का भूषण भाव रूपी विभीषण काम रूपी रावण को विनयपूर्वक समझाने की कोशिश करता है।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
व्याख्या : वैराग्य का भूषण भाव रूपी विभीषण कहता है कि सुमति व कुमति सबके हृदय में होती है। सभी वेद व पुराण भी ऐसा ही कहते हैं। जहाँ पर सुमति होती है वहाँ पर नाना प्रकार की सम्पत्ति होती है और जहाँ कुमति होती है वहाँ पर नाना प्रकार की विपत्तियाँ आ जाती हैं।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
व्याख्या : तुम्हारे हृदय में अब विपरीत कुबुद्धि बस गयी है, जिसके कारण हित की बात अहितकारी लग रही हैं और शत्रुता के भावों को मित्रता के भाव मान रहे हो। सुरता रूपी सीता आसुरी भावों के कुल के लिए काल की रात्रि के समान है, फिर भी तुम्हारी सुरता रूपी सीता पर बहुत प्रीत है।
दो0 तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
व्याख्या : हे तात्! मैं आपके चरणों में पड़कर यह माँगता हूँ कि आप मेरी बात को मान लीजिए। आप सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम को दे दो, जिससे तुम्हारा बुरा नहीं होगा।
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई।।
व्याख्या : वैराग्य के भूषण रूपी विभीषण ने पुराणों, अनुभूति (वेदों) व विद्वानों के सम्मत वाली वाणी कह कर नीति का वर्णन किया। परन्तु वैराग्य रूपी विभीषण की बात सुनकर काम रूपी रावण क्रोधित हो उठा और बोला कि हे मूर्ख! तेरी मृत्यु निकट आ चुकी है। वास्तव में जब काम का भाव अपने विपरीत नीति की बात सुनता है तो वह क्षुब्ध हो उठता है। उसी को रावण का क्रोध करना बताया गया है।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं।।
व्याख्या : हे सठ! तू सदा मेरे बल पर ही जीता है और तू मेरे शत्रु का पक्ष ले रहा है। रे मूर्ख! तू कहता क्यों नहीं कि जगत में ऐसा कौन-सा भाव है, जिसे मैंने (काम) अपने बल से जीता नहीं है।
मम पुर बस तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
व्याख्या : अरे सठ! तू मेरे वासना रूपी नगर में रहकर आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण पर प्रीत रखता है। तो फिर तू जाकर उनसे मिलकर उन्हें यह नीति बता। ऐसा कह कर काम रूपी रावण ने वैराग्य रूपी विभीषण पर चरण प्रहार किया परन्तु विभीषण का भाव तो बार-बार चरणों को पकड़ता रहा। वास्तव में काम का भाव जब क्षुब्ध हो जाता है तो उसे वैराग्य का भाव एकदम अच्छा नहीं लगता है और वह वैराग्य के भाव का दमन करने लगता है। उसी अवस्था को रावण द्वारा विभीषण को लात मारने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! संत वृति के भाव का यही बड़प्पन होता है कि वो बुरे भावों का भी अच्छा ही करना चाहता है। इसलिए काम रूपी रावण द्वारा मारने पर भी वैराग्य रूपी विभीषण का भाव यही कहता है कि तुम पिता के समान हो, इसलिए मारने की कोई बुराई नहीं है। परन्तु तुम्हारा कल्याण तो आत्मोन्मुखी होने पर ही होगा।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
व्याख्या : तब वैराग्य रूपी विभीषण का भाव वैराग्य को बढ़ावा देने वाले मंत्रणा के भावों को साथ लेकर उर्ध्वगामी हो चला और सब आसुरी भावों को सुनाते हुए कहा कि --
दो0 राम सत्य संकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।
व्याख्या : हे काम रूपी स्वामी! आत्मा तो सत्य संकल्प स्वरूप होती है। तेरी आसुरी भावों की सभा तो काल के वश में हो गयी है। अब मैं तो आत्मा रूपी राम की शरण में जा रहा हूँ, इसलिए मुझे दोष मत दीजिएगा।
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयुहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
व्याख्या : ऐसा कहकर जब वैराग्य के भूषण रूपी विभीषण भाव काम रूपी रावण की आसुरी भावों की सभा को छोड़कर चला तो सभी आसुरी भाव आयुहीन हो गए। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! साधु भाव की अवग्या (अवहेलना) करने पर कल्याण का नाश हो जाता है अर्थात् उस अवस्था में कल्याण सम्भव नहीं हो सकता है।
रावन जबहिं बिभीषण त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
व्याख्या : जब काम रूपी रावण ने वैराग्य रूपी विभीषण के भाव का त्याग किया, उसी समय काम रूपी रावण का भाव अभागा अर्थात् अ अ भागा यानी असहज हो गया। उधर को वैराग्य रूपी विभीषण मन में नाना मनोरथ करता हुआ आत्मा रूपी राम के पास चला।
देखिहउँ जाइ चरन जल जाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण मन में सोचता हुआ जा रहा है कि जाकर आत्मा रूपी राम के चरणों को देखूँगा जो लाल कमल के समान कोमल व सेवकों को सुख देने वाले हैं। जिन चरणों का स्पर्श करने से वासना रूपी अहिल्या का उद्धार हो गया और जो दंडक वन को पवित्र करने वाले हैं। इन चौपाइयों में बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में ध्यान में जब कोश खिलने लगते हैं तो उसी अनुभूति को कमल का खिलना बोलकर लिखा जाता है। जब कोश खिलने लग जाता है तो गौतम (अर्थात् गो अ उत्तम यानी इन्द्रियाँ पवित्र होकर) ऋषि की नारी वासना रूपी अहिल्या पवित्र हो जाती है। उस अवस्था में इन्द्रियों का दमन नहीं करना पड़ता है। अत: उसी को दण्डक वन को पवित्र करने वाला बोला गया है।
जे पद जनक सुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहो भाग्य मैं देखिहउँ तेई।।
व्याख्या : जिन चरण कमलों को सुरता रूपी सीता ने अपने हृदय में धारण किया है और जो कपटी मृग को पकड़ने के लिए दौड़े थे तथा जो चरण कमल हर अर्थात् माया के हरण हो जाने की अवस्था में हृदय में रहते हैं। आज मेरा सौभाग्य है कि मैं उन्हीं चरण कमलों को देखूँगा।
दो0 जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरत रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
व्याख्या : जिन चरण कमलों में भाव रत भरत भाव का मन लगा हुआ है, आज मैं वैराग्य का भाव उन्हीं चरण कमलों को आँखों से देखूँगा।
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषणु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
व्याख्या : इस प्रकार ध्यान की अवस्था में वैराग्य रूपी विभीषण का भाव प्रेमपूर्वक विचार करता हुआ भाव रूपी समुद्र को पार करके आत्मा रूपी राम की बुद्धि रूपी सेना के पास आ गया। जब बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने वैराग्य रूपी विभीषण को आते हुए देखा तो काम रूपी रावण का विशेष दूत समझा।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण के भाव को रोककर बुद्धि रूपी वानर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के पास आए और सारी बात बतायी। ध्यान में ये सब वार्तालाप बहुत ही तीव्रता से होता है जिसे गु डिग्री की कृपा से कोई बिरला साधक ही समझ पाता है। तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव भाव ने आत्मा रूपी राम से कहा कि काम रूपी रावण (दस इन्द्रियों रूपी दस मुखों वाला) का भाई वैराग्य रूपी विभीषण मिलने के लिए आया है।
कह प्रभु सखा बूझिए काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। काम रूप केहि कारन आया।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कहा कि हे मित्र! इसमें तुम्हारी क्या राय है? तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव बोला कि हे धड़कन (नर) के भी स्वामी। आसुरी भावों की माया को जाना नहीं जा सकता है। पता नहीं किस इच्छा के रूप में वे आ जाएँ।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
व्याख्या : हो सकता है कि वो सठ आसुरी वैराग्य रूपी विभीषण हमारा भेद लेने के लिए आया हो। अत: मेरी तो यह राय है कि उसे बाँधकर रखा जाए। तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे सद्बुद्धि रूपी मित्र! तुमने नीति का तो विचार सही किया है, परन्तु मेरा (आत्मा) तो स्वभाव ही शरण में आने वाले को निर्भय करना है।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की बातें सुनकर अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान बहुत हर्षित हुआ कि आत्मा रूपी राम कैसे शरमागत वत्सल स्वभाव वाले हैं।
दो0 सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावरँ पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
व्याख्या : जो लोग अपने अनहित का विचार करके शरण में आए हुए को त्याग देते हैं, ऐसे नर पापी अर्थात् चिन्तायुक्त होते हैं, जिनको देखने पर ही हानि होती है। इस दोहे में बहुत ही गहरा साधना का रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में नर (धड़कन) आने वाले भावों को ग्रहण करता रहता है परन्तु जब नर की धड़कन असहज हो जाती है तो चिन्ता के भाव पैदा होकर आने वाले भावों को भी चिन्तायुक्त करने लग जाते हैं। अत: ऐसी असहज नर की धड़कन पापमय व हानिकारक होती है।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
व्याख्या : जिस भाव को विशुद्ध प्रकाश के भावों का वध करने का दोष लगा होता है, वो भाव भी मुझ आत्मा में लीन हो सकता है। मैं उसका भी त्याग नहीं करता हूँ। क्योंकि कोई भी भाव जब आत्मोन्मुखी होता है तो उसके सब विकार मिट जाते हैं और वह चिन्तामुक्त (पाप) हो जाता है।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सन्मुख आव कि सोई।।
व्याख्या : जो चिन्तायुक्त भाव होता है उसका तो सहज स्वभाव यह होता है कि वो आत्मोन्मुखी नहीं होता है। इसलिए जो भाव दुष्ट हृदय वाला होता है, वो कभी भी मेरे अर्थात् आत्मा के सामने नहीं आ सकता है।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
व्याख्या : मुझे तो निर्मल मन वाले भाव ही प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि छल-छिद्र व कपट मुझ आत्मा को अच्छा नहीं लगता है। अगर दस इन्द्रियों रूपी दस सीस वाले रावण ने भेद लेने के लिए भी वैराग्य के भाव को भेजा है तो भी कोई भय व हानि की बात नहीं है।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं।।
व्याख्या : हे सद्बुद्धि रूपी सखा! संसार में जितने भी आसुरी भाव हैं, उनको लखन भाव एक क्षण में मार सकता है। वास्तव में आसुरी भावों की पहचान ही उनकी मृत्यु का साधन होता है और लखन भाव सब भावों के लक्षणों को क्षण मात्र में जान लेता है, इसलिए एक क्षण में सब असुरों को लक्ष्मण द्वारा मारने की बात कही गयी है। आत्मा रूपी राम कहते हैं कि अगर वैराग्य रूपी विभीषण का भाव आसुरी भावों के भय से मेरी शरण में आया है तो फिर मैं उसे प्राणों की तरह रखूँगा अर्थात् प्राण में लीन कर लूँगा।
दो0 उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत।।44।।
व्याख्या : इसलिए दोनों प्रकार से ही उसे ले आओ। तबसभी बुद्धि के भाव रूपी वानर जय कृपाल बोलकर दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद और अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान समेत वैराग्य रूपी विभीषण को लाने के लिए चले।
सादर तेहि आगे करि बानर। चले जहाँ रघुपति करूनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
व्याख्या : सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने वैराग्य रूपी विभीषण के भाव को सादर आगे करके आत्मा रूपी राम के पास चले। वैराग्य रूपी विभीषण ने नयनों को सुख देने वाले आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी दोनों भाइयों को देखा।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारून लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
व्याख्या : फिर शोभा के धाम आत्मा रूपी राम की छवि को देखकर वैराग्य रूपी विभीषण का भाव एकटक देखता रह गया। आत्मा रूपी राम की विशाल भुजाएँ हैं और कमल के समान नेत्र हैं तथा श्याम अंग वाले तथा शरमागत के भय का नाश करने वाले हैं। इन चौपाइयों में उस अवस्था का वर्णन किया गया है जिसे वैराग्य का भाव आत्म साक्षात्कार की अवस्था में अनुभव करता है।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में भी आत्म तत्व की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा गया है कि आत्मा रूपी राम के कंधे सिंह के समान व विशाल वक्ष:स्थल होता है, जो अत्यन्त शोभा दे रहा है। आत्मा रूपी राम का मुख असंख्य कामदेवों के मन को हरने वाला है। आत्मा रूपी राम के स्वरूप को देखकर वैराग्य रूपी विभीषण के नयनों में जल भर आया तथा अंग-अंग पुलकित हो उठे। तब मन में धैर्य धारण करके मधुर वाणी में कहा।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
व्याख्या : जब वैराग्य का भाव आत्मा के सामने आता है तो कहता है कि हे नाथ! मैं तो दस इन्द्रियों रूपी दस मुखों को धारण करने वाला काम रूपी रावण का भाई हूँ। हे स्वरों को शान्ति प्रदान करने वाले! मेरा (वैराग्य) जन्म तो आसुरी भावों के वंश में हुआ है। वैराग्य के भाव का आभास ही आसुरी भावों के कारण ही होता है। इसलिए वैराग्य का जन्म असुर कुल में बताया गया है। आसुरी भावों के कुल में रहने के कारण तामसिक शरीर में सहज में ही चिन्ता प्रिय लगने लगती है अर्थात् सहज में तामसिकता के कारण चिन्ताएँ पैदा होने लग जाती हैं। जैसे उल्लू को अज्ञान रूपी अंधेरा ही सहज प्रिय होता है।
दो0 श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।
व्याख्या : हे भावों के भय को दूर करने वाले प्रभु! मैं तो आपका सुयश सुनकर आया हूँ अर्थात् अनन्य बुद्धि के भाव से प्रेरणा पाकर आपकी शरण में आया हूँ। इसलिए हे दु:खों को दूर करने वाले व सुख देने वाले प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
व्याख्या : ऐसा कहते हुए वैराग्य रूपी विभीषण का भाव दण्डवत करने लगा अर्थात् समर्पण करने लगा तो आत्मा रूपी राम हर्ष के साथ तुरन्त उठे और समर्पण की वाणी सुनकर आत्मा रूपी राम को बहुत अच्छा लगा। इसलिए आत्मा रूपी राम ने अपनी विशाल भुजाओं में वैराग्य के भाव को लेकर हृदय से लगा लिया अर्थात् वैराग्य के भाव को अपने में लीन कर लिया।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण के भाव को लखन भाव (अर्थात् लक्षणों को जान लेने वाले भाव) के पास बैठाकर आत्मा रूपी राम ने भय को दूर करने वाले वचन कहे। हे लंका रूपी नगरी के निवासी परिवार सहित कुशल कहिए क्योंकि आपका (अर्थात् वैराग्य का) निवास बहुत कठोर जगह पर है।
खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
व्याख्या : हे वैराग्य भाव रूपी विभीषण! तुम दिन रात आसुरी भावों के बीच में रहते हो, फिर तुम तुम्हारी धारणा (धर्म) की रक्षा कैसे करते हो? मैं (आत्मा) तुम्हारी सब रीत (आदत) को जानता हूँ। तुम नीति के पालन में बहुत निपुण हो इसलिए तुम्हें अनीति अच्छी नहीं लगती है।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! भले ही चिन्ता रूपी नरक का वास मिल जाए परन्तु ऐसी क्रिया नहीं होना चाहिये जिससे दुष्ट जनों का संग मिले। अब आपके चरण कमलों को देखते ही कुशलता आ गयी है क्योंकि तुमने अपना भक्त जानकर कृपा जो कर दी है।
दो0 तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।
व्याख्या : तब तक जीव की कुशल नहीं और सपने में भी शान्ति नहीं मिलती जब तक कि वह काम की आसक्ति जो कि दु:ख का मूल होती है, का त्याग करके परमात्मा का भजन नहीं करता।
तब लागि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
व्याख्या : तब तक ही जीव के हृदय में लोभ, मोह, मत्सर व मद आदि आसुरी भाव रहते हैं, जब तक कि संयम नियम रूपी धनुष बाण लेकर आत्मा रूपी राम नहीं रहते।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
व्याख्या : ममता रूपी अँधेरी रात होती है, जिसमें राग-द्वेष रूपी उल्लू सुख प्राप्त करते रहते हैं। परन्तु वह ममता रूपी रात्रि जीव के हृदय में तब तक ही रहती है, जब तक आत्मा रूपी सूर्य का उदय नहीं हो जाता है।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! अब आपके चरण कमलों को देखकर मैं कुशल हूँ और मेरे भावों का भय मिट गया है। हे कृपालु! तुम जिस पर अनुकूल हो जाते हो, उसे तीनों प्रकार के भावों (सत, रज व तम) के दैहिक, दैविक व भौतिक कष्ट नहीं सताते हैं।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
व्याख्या : मैं आसुरी भावों में रहने वाला अति अधम प्रकार का वैराग्य भाव हूँ और मैंने कोई शुभआचरण भी नहीं किया है। परन्तु जिस आत्मा रूपी राम का स्वरूप मन को एकाग्रह करने वाले मुनि भी नहीं जान पाते हैं। उन्हीं आत्मा रूपी राम ने मुझे हृदय से लगा लिया है अर्थात् लीन कर लिया है।
दो0 अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज।।47।।
व्याख्या : हे कृपा व सुख के पुंज आत्मा रूपी राम! मैं अत्यन्त सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने अपनी आँखों से विश्वास रूपी शिव व बुद्धि रूपी ब्रह्मा द्वारा सेवित आपके चरण कमलों को देखा है।
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी सखा! मैं तुम्हें मेरा स्वभाव बताता हूँ जिसे काकभुसुण्डि (परम सात्विक अहंकार) विश्वास रूपी शिवजी व श्रद्धा रूपी पार्वतीजी भी जानते हैं। जो जीव समस्त चराचर से द्रोह करने वाला होता है, अगर वो भी भयभीत होकर मेरी शरण में जाता है अर्थात् आत्मोन्मुखी हो जाता है।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।।
व्याख्या : जो मद, मोह, कपट व नाना प्रकार के छल का त्याग कर देता है, तो उसे मैं साधु के समान कर देता हूँ। जो माता-पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर व प्रिय परिवार।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
व्याख्या : इन सबकी ममता को समेट करके मुझ परमात्मा के चरणों में जो मन की डोरी बाँध लेता है और समदृष्टि वाला होकर कोई इच्छा नहीं रखता तथा जिसके मन में हर्ष व शोक का कोई भय नहीं होता है।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरहुँ देह नहिं आन निहोरें।।
व्याख्या : ऐसे सज्जन मेरे हृदय में ऐसे निवास करते हैं, जैसे लोभी के हृदय में धन निवास करता है। हे वैराग्य रूपी विभीषण भाव! तुम जैसे संत भाव ही मुझे प्रिय होते हैं। मैं कोई शरीर धारण करके प्रकट नहीं होता हूँ अर्थात् मैं तो भावों के द्वारा अनुभव में आने वाला हूँ।
दो0 सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।
व्याख्या : जो सद्गुणों के उपासक हैं और निरन्तर लोक-कल्याण में लगे रहकर प्रेम की दृढ़ नीति का पालन करते हैं और विशुद्ध साधकों (द्विज) के चरणों में प्रेम रखने वाले हैं, वे जीव मुझे प्राणों के समान प्रिय होते हैं।
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
व्याख्या : हे वासना रूपी लंका के स्वामी वैराग्य रूपी विभीषण! तुम्हारे अन्दर सब गुण हैं, इसलिए तुम मुझे बहुत ज्यादा प्रिय हो। आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर बुद्धि के भाव रूपी वानरों के समूह आत्मा रूपी राम की जय-जयकार करने लगे।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी वाणी को सुनकर अघाते नहीं हैं। वह बार-बार आत्मा रूपी राम के चरण कमलों में गिरने लगा अर्थात् पूर्ण समर्पण का भाव आ गया और हृदय में अपार प्रेम समा नहीं पा रहा था।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण का भाव जब आत्मा का साक्षात्कार करता है तो बिल्कुल निर्मल हो जाता है और किसी भी प्रकार की वासना नहीं बच पाती है। उसी अनुभूति को लिखते हुए कहा गया है कि हे सचराचर के स्वामी आत्मा रूपी राम! आप तो प्राणों के माध्यम से सब के हृदय की बात को जानने वाले हो। मेरे (वैराग्य) हृदय में पहले कुछ वासना थी परन्तु आपके चरणों में प्रेम की धारा में सब बह गयी अर्थात् आपके प्रति समर्पण कर देने से सब वासना मिट गयी।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
व्याख्या : अत: हे कृपाल प्रभु! अब आप आपके चरणों की पवित्र भक्ति को दीजिए, जो सदा विश्वास रूपी शिव को प्रिय होती है। तब आत्मा रूपी राम ने एवमस्तु अर्थात् "ऐसा ही हो"" कहा और तुरन्त भाव रूपी समुद्र का पानी मँगवाया अर्थात् भावों के रसायन को प्रकट किया। वास्तव में ध्यान की उस परम अवस्था में भावों से एक विशेष रस स्रवित होने लगता है। उसी को प्रतीकात्मक दृष्टि से समुद्र का जल मँगवाना बताया गया है।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी विभीषण! हालाँकि तुम्हारी कोई इच्छा नहीं है परन्तु मेरे दर्शन तो चिन्ता रूपी पापों को दूर करने वाले होते हैं। ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम ने वैराग्य रूपी विभीषण का तिलक किया अर्थात् वैराग्य भाव को तीनों गुणों के भावों में स्थापित कर दिया। ऐसी ध्यान की अवस्था आने पर सुमन अर्थात् सु अ मन यानी अच्छे भावों की वर्षा होने लग जाती है। उसी अवस्था को पुष्प वृष्टि होना कहा जाता है।
दो0 रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड।।49 (क)।।
व्याख्या : इस दोहे में साधना की क्रिया का मर्म छुपा हुआ है। वास्तव में काम रूपी रावण का क्रोध ही प्रचण्ड अग्नि के समान होता है और जीव का स्वयं का श्वास ही उस प्रचण्ड अग्नि को फैलाने में हवा का कार्य करता है। परन्तु जब आत्मा अनुकूल हो जाती है तो उस प्रचण्ड अग्नि से बचा लेती है और अखण्ड शान्ति का राज मिल जाता है। उस अवस्था में जब आत्म तत्व अनुकूल होता है तो वैराग्य रूपी विभीषण भाव काम रूपी अग्नि में जलने से बच जाता है और अखण्ड राज मिल जाता है।
दो0 जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।।49 (ख)।।
व्याख्या : जो सम्पत्ति विश्वास रूपी शिव ने दस इन्द्रियों रूपी सिरों को देने पर काम रूपी रावण को दी थी, वही सम्पदा अर्थात् भोग का राज आत्मा रूपी राम ने वैराग्य रूपी विभीषण भाव को दे दिया। वास्तव में भोग मिटते नहीं हैं परन्तु भोगों का दृष्टिकोण बदल जाता है, जो भोग इन्द्रिय भावों में बरतने पर काम रूपी रावण भोगता था, वही भोग साधना परिपक्व होने पर साधक वैराग्य भाव रखते हुए सहज होकर भोगने लगता है। उसी सूक्ष्म रहस्य को यहाँ बताया गया है।
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जनजानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
व्याख्या : ऐसे परमकृपालु परमात्मा को छोड़कर जो अन्य किसी का भजन करते हैं, वे बिना पूँछ के पशु के समान होते हैं। वैराग्य रूपी विभीषण को आत्मा रूपी राम ने अपना जानकर अपना लिया। आत्मा रूपी राम का ऐसा स्वभाव बुद्धि के भावों रूपी वानरों को बहुत अच्छा लगा।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
व्याख्या : फिर सब कुछ जानने वाले, सबके हृदय में निवास करने वाले, सब रूपों में व्यापक, सबसे उदासीन रहने वाले, कारणवश मन का रूप धारण करने वाले, आसुरी भावों के नाशक आत्मा रूपी राम नीति का पालन करने वाले वचन बोले।
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
व्याख्या : हे सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव व वैराग्य रूपी विभीषण! इस भाव रूपी गम्भीर भव सागर को कैसे पार किया जाए। यह भाव रूपी सागर राग, द्वेष रूपी मगरमच्छ, वासना रूपी सर्पों व चंचल इच्छाओं रूपी मछलियों से भरा हुआ है, जिसे पार करना अत्यन्त कठिन है।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
व्याख्या : तब वैराग्य रूपी विभीषण का भाव बोला कि हे आत्मा रूपी राम! यद्यपि तुम्हारी प्रेरणा रूपी एक बाण ही समस्त भाव रूपी भवसागर को सुखा सकता है परन्तु नीति ऐसी है कि भाव रूपी भवसागर से जाकर प्रार्थना की जाए। वास्तव में प्रार्थना व स्तुति की प्रक्रिया से भी भाव रूपी भवसागर को पार किया जा सकता है। अत: वैराग्य रूपी विभीषण स्तुति करने की सलाह देता है।
दो0 प्रभु तुम्हार कुल गुर जलधि कहिहि उपाय बिचारी।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।
व्याख्या : भाव रूपी सागर तो आपके कुल के पूर्वज हैं अर्थात् भावों की उत्पत्ति तो आत्मा से उत्पन्न (धड़कन से निकलने प्राण) प्राण से ही होती है। अत: वे विचारकर उपाय बता देंगे अर्थात् प्रार्थना करने से भाव स्वत: शान्त हो जायेंगे। इस प्रकार बिना परिश्रम किए ही बुद्धि के नाना भावों रूपी भालू व वानरों सहित भावों के भवसागर को पार कर जाओगे।
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
व्याख्या : हे वैराग्य रूपी सखा! तुमने अच्छी सलाह दी है। अब मैं वही करता हूँ जो भाव रूपी देवता सहायता करेंगे। यह सलाह लखन भाव को अच्छी नहीं लगी और आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर बहुत दु:ख पाया।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
व्याख्या : हे नाथ! दैव भावों का क्या विश्वास किया जाए। आप तो मन में दृढ़ता लाइये और भावों के भव सागर को सुखा डालिए। मन की कायरता से ही दैव भावों का विश्वास पैदा होता है और आलस्य के वश में होने पर ही दैव भावों का भरोसा बढ़ता है।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
व्याख्या : लखन भाव की बात सुनकर आत्मा रूपी राम हँसकर बोले की ऐसा ही करूँगा, तुम मन में धैर्य धारण करो। ऐसा कहकर आत्मा रूपी राम लखन भाव को समझाकर भाव रूपी समुद्र के पास गए।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सि डिग्री नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
व्याख्या : सबसे पहले आत्मा रूपी राम ने भाव रूपी भव सागर को सिर झुकाकर प्रणाम किया और दृढ़ता रूपी आसन लगाकर बैठ गए। इस चौपाई में ध्यान की क्रिया का मर्म लिखा हुआ है। वास्तव में अगर भावों के भव सागर को समझना है तो सबसे पहले जो भी भाव आ रहे हों, उन्हें स्वीकार करते हुए चले जाएँ। भावों को स्वीकार करते चले जाने पर भावों का भव सागर शान्त होना शु डिग्री हो जाता है। उसी को आत्मा रूपी राम का सागर को सीस झुकाना बोला गया है। जब वैराग्य रूपी विभीषण का भाव आत्मोन्मुखी हुआ तो काम रूपी रावण के कुछ आसुरी भाव उसके पीछे-पीछे आ गए।
दो0 सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।
व्याख्या : उन आसुरी भावों ने कपट रूपी बुद्धि के भावों के रूप में आत्मा रूपी राम व वैराग्य रूपी विभीषण के वार्तालाप व मिलन को देखा तो अपने हृदय में आत्मा रूपी राम के शरणागतों पर प्रेम के गुणों की सराहना करने लगे। अर्थात् आसुरी भावों के हृदय में भी आत्मा रूपी राम के प्रति आकर्षण पैदा हो गया।
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भाव आत्मा रूपी राम के गुणों का बखान करने लगे जिससे कपट मिट गया और अपना आसुरी स्वरूप प्रकट हो गया। तब बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने देखा कि ये तो काम रूपी रावण के दूत हैं अर्थात् ये तो आसुरी वृति वाले भाव हैं तो बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने उन्हें बांध लिया अर्थात् बुद्धि के भावों ने आसुरी वृति को पकड़ लिया और सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के पास लेकर आए।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
व्याख्या : तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव ने कहा कि हे बुद्धि के भावों रूपी वानरों! इन आसुरी भावों को आसक्ति रूपी अंगों को काटकर वापस भेज दो। तब सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव की प्रेरणा रूपी वाणी सुनकर बुद्धि के भाव रुपी वानर दौड़े और आसुरी भावों को बाँधकर बुद्धि रूपी सेना के चारों तरफ घुमाने लगे।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
व्याख्या : तब बुद्धि के भाव नाना प्रकार से आसुरी भावों को मारने लगे और बहुत पुकारने पर भी नहीं छोड़े। तब आसुरी भावों ने कहा कि अगर हमारे आसक्ति रूपी नाक-कानों को काटोगे तो आत्मा रूपी राम की दुहाई है। अर्थात् हम आसुरी भावों की आसक्ति मिट गयी तो हम आत्मा में लीन हो जायेंगे।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
व्याख्या : लखन भाव ने आसुरी भावों की बातें सुनकर अपने निकट बुलाया और द्रवित होकर हँसते हुए उनको तुरन्त छुड़वा दिया। लखन भाव ने तब कहा कि तुम काम रूपी रावण को जाकर मेरी यह प्रेरणा रूपी चिट्ठी देना और कहना कि हे आसुरी कुल के घातक! तुम लखन भाव की इस चिट्ठी को बाँचो।
दो0 कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार।।52।।
व्याख्या : फिर उस मूर्ख से जबानी यह मेरा उदार अर्थात् प्रेरणा भरा संदेश कहना कि सुरता रूपी सीता को लौटा कर आत्मा रूपी राम से मिलो वरना काल आया हुआ जानो।
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत रामु जसु लंका आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
व्याख्या : फिर आसुरी भावों ने तुरन्त लखन भाव को शीश झुकाया और आत्मा रूपी राम के गुणों का बखान करते हुए चले। आत्मा रूपी राम के यश का वर्णन करते-करते वासना रूपी लंका में पहुँच गए और काम रूपी रावण को जाकर शीश नवाया।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
व्याख्या : तब दस इन्द्रियों रूपी मुखों वाले काम रूपी रावण ने हँसकर पूछा कि सुक रूपी भाव तुम्हारी कुशलता क्यों नहीं कहता? फिर वैराग्य रूपी विभीषन की बात बता, जिसकी मृत्यु निकट आ गयी है।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
व्याख्या : जिस मूर्ख वैराग्य रूपी विभीषण ने राज करते हुए भी वासना रूपी लंका का त्याग कर दिया। वह अभागा जौ के साथ घुन बनेगा अर्थात् बुद्धि रूपी वानरों व आत्मा रूपी राम के साथ वह भी मारा जायेगा। फिर बुद्धि के भाव रूपी भालूओं व वानरों की बात बता, जिन्हें कठिन काल यहाँ खींचकर ले आया है।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
व्याख्या : परन्तु भाव रूपी भव सागर बेचारे बुद्धि के भाव रूपी वानर-भालूओं का रखवारा बन गया है, वरना अब तक तो आसुरी भाव उनका आहार कर जाते। फिर तुम आत्मा रूपी राम और लखन भाव की बात बताओ, जिनके हृदय में मेरा बहुत डर बैठ हुआ है।
दो0 की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।
व्याख्या : क्या उनसे (आत्मा रूपी राम व लखन भाव से) भेंट हुई या फिर वे मेरा (काम) सुयश सुनकर वापिस लौट गए। अरे शुक भाव! तू शत्रु दल के तेज व बल का वर्णन क्यों नहीं करता अर्थात् क्यों नहीं बताता? तेरा चित तो चकित हो रहा है।
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
व्याख्या : हे काम रूपी नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध का त्याग करके मेरा कहना मानिए। जब आपका छोटा भाई वैराग्य रूपी विभीषण जाकर आत्मा रूपी राम से मिला, तो उन्होंने तुरन्त राजतिलक कर दिया।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे।।
व्याख्या : हमको काम रूपी रावण का दूत सुनकर बुद्धि के भाव रूपी वानरों ने हमें बाँधकर नाना प्रकार के कष्ट दिए। जब वे हमारे आसक्ति रूपी नाक-कान काटने लगे तो आत्मा रूपी राम की शपथ अर्थात् आत्मोन्मुखी होने की बात कहने पर हमको छोड़ा।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
व्याख्या : हे काम रूपी नाथ! आप आत्मा रूपी राम की सेना के बारे में पूछते हैं। उसका वर्णन तो करोड़ों मुखों से भी नहीं किया जा सकता है। आत्मा रूपी राम की सेना में तो नाना प्रकार के बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानर हैं। जिनमें कुछ बुद्धि के भाव विशाल मुख वाले हैं, तो कुछ भाव भय पैदा करने वाले हैं।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
व्याख्या : जिस अनन्य बुद्धि रूपी हनुमान ने वासना रूपी लंका जलाई थी और तुम्हारा अक्षय भाव रूपी पुत्र मारा था, उसका बल तो सभी बुद्धि के भाव रूपी वानरों में सबसे कम है। असंख्य नाम वाले बहुत से कठिन योद्धा भाव हैं तथा उनमें अनेकों हाथियों का बल है।
दो0 द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।
व्याख्या : इस दोहे में प्रतीकों का सहारा लेकर बुद्धि के भावों के नाना प्रकार बताये हैं। द्विबिद रूपी द्वैत बुद्धि, मन्द बुद्धि रूपी मयंद, उड़न्त बुद्धि रूपी नील, अस्थिर बुद्धि रूपी नल, दृढ़ बुद्धि रूपी अंगद, प्रसन्न बुद्धि रूपी गद, विशाल बुद्धि रूपी विकटास्य, शान्त बुद्धि रूपी दधिमुख, भय हारी बुद्धि रूपी केसरी, समझदार बुद्धि रूपी निशठ, मूर्ख बुद्धि रूपी सठ और धैर्य बुद्धि रूपी जाम्बवान् - ये सभी बल की राशि हैं।
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं।।
व्याख्या : ये सब बुद्धि के भाव रूपी वानर सद्बुद्धि रूपी सुग्रीव के समान हैं और इनके समान करोड़ों हैं, जिन्हें कौन गिन सकता है। आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी कृपा का अतुल्यनीय बल पाकर वे त्रिलोकी अर्थात् सत, रज व तमों गुणों के लोकों को तिनके के समान गिनते हैं।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! मैंने ऐसा कानों से सुना है कि अठारह पदम तो केवल बुद्धि के भाव रूपी वानर सेनापति हैं। हे नाथ! बुद्धि रूपी वानरों की सेना में ऐसा एक भी बुद्धि का भाव नहीं है जो तुम (काम) को नहीं जीत सके।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै नहि देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला।।
व्याख्या : सभी बुद्धि के भाव रूपी वानर क्रोध से हाथ मसलते हैं परन्तु आत्मा रूपी राम प्रेरणा नहीं कर रहे हैं। वे बुद्धि के भाव रूपी वानर कह रहे हैं कि हम भाव रूपी सागर को इच्छा रूपी मछलियों व वासना रूपी सर्पों सहित सोख लेंगे या फिर दृढ़ता रूपी विशाल पर्वतों से इसे पाट देंगे।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
व्याख्या : काम रूपी रावण को धूल में मिला देंगे। सब ऐसे ही वचन कह रहे हैं। वे बुद्धि के भाव रूपी वानर निशंक होकर गर्जना व उछलकूद कर रहे हैं। तब ऐसा लगता है मानों वे वासना रूपी लंका को ग्रसना चाहते हैं।
दो0 सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम।।55।।
व्याख्या : बुद्धि के भाव रूपी भालू व वानर सहज में ही शूरवीर हैं और ऊपर से आत्मा रूपी राम की प्रेरणा रूपी हाथ है। हे काम रूपी रावण! वे भावों के युद्ध में करोड़ों कालों को भी जीत सकते हैं।
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के बल व बुद्धि के तेज का वर्णन तो हजारों शेष भी नहीं कर सकते हैं। वे प्रेरणा रूपी एक बाण से ही सैकड़ों भव सागरों को सुखा सकते हैं परन्तु फिर भी आपके वैराग्य रूपी विभीषण भाई से भाव रूपी भव सागर को पार करने का उपाय पूछा है।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत प0ंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी विभीषण के वचन सुनकर आत्मा रूपी राम भाव रूपी भव सागर से रास्ता माँग रहे हैं। उनके मन में बहुत कृपा भरी है। आसुरी दूत के वचन सुनकर काम रूपी रावण बहुत हँसा और बोला कि ऐसी बुद्धि है तभी तो समस्त बुद्धि के भाव रूपी वानरों को सहायक बनाया है।
सहज भी डिग्री कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
व्याख्या : स्वाभाविक ही डरपोक वैराग्य रूपी विभीषण के वचनों का विश्वास करके ही भाव रूपी भव सागर के सामने बाल हठ की है अर्थात् बालकों की बुद्धि का परिचय दिया है। अरे मूर्ख! तुम व्यर्थ में आत्मा रूपी राम की बड़ाई करते हो। मैंने उनकी बुद्धि के बल को जान लिया है।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
व्याख्या : जिनको मंत्रणा देने वाले वैराग्य रूपी विभीषण जैसे भाव हैं, उनको संसार में विजय और विभूति कहाँ है? काम रूपी रावण के वचन सुनकर आसुरी दूत भाव का क्रोध बढ़ गया और समय देखकर लखन भाव द्वारा लिखी गयी पत्रिका को निकाला। वास्तव में जब भावों में अन्तर्द्वन्द्व चलता है तो एक दूसरे की प्रतिक्रिया स्वरूप क्रोध बढ़ने लग जाता है। उसी भाव अनुभूति को यहाँ लिखा गया है।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
व्याख्या : आसुरी दूत भाव शुक बोला कि यह पत्रिका आत्मा रूपी राम के छोटे भाई लखन भाव ने दी है। इसे धैर्य धारण करके बचवा लिजिए। तब काम रूपी रावण ने हँसते हुए बाएँ हाथ में पत्रिका ली और मंत्रणा रूपी सचिव को देकर बचवाने लगा।
दो0 बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
व्याख्या : पत्रिका में लिखा था अर्थात् लखन भाव की प्रेरणा रूपी सलाह थी कि अरे मूर्ख काम रूपी रावण! केवल बातों से ही अपने मन को रिझाकर अपने आसुरी भावों के कुल को नष्ट-भ्रष्ट मत कर। क्योंकि आत्मा रूपी राम से विरोध करने पर तुम्हें ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी नहीं बचा सकते। अर्थात् आत्मा के प्रतिकुल चलने पर तुम्हें सत, रज व तम गुणों द्वारा भी नहीं बचाया जा सकेगा।
दो0 की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
व्याख्या : या तो मान का त्याग करके वैराग्य रूपी विभीषण की तरह आत्मा रूपी राम के चरण कमलों का भ्रमर बन जा अर्थात् या तो आत्मोन्मुखी हो जा या फिर आसुरी भावों के कुल सहित आत्मा रूपी राम के ज्ञान अग्नि रूपी बाणों में तू पतंगा हो जा।
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
व्याख्या : पत्रिका सुनते ही काम रूपी रावण का भाव अन्दर से भयभीत हो गया परन्तु दिखाने के लिए हँसता हुआ सबको सुनाते हुए बोला कि जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की कोशिश करता हो ऐसे ही आत्मा रूपी राम का छोटा भाई लखन भाव वागविलास अर्थात् डींग हाँकता है।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
व्याख्या : तब आसुरी दूत शुक भाव ने कहा कि हे काम रूपी नाथ! ये पत्रिका की सब बातें सत्य हैं। आप अभिमानी प्रकृति को छोड़कर समझने का प्रयास कीजिए। हे नाथ! क्रोध का त्याग करके मेरे वचनों को सुनिए और आत्मा रूपी राम के साथ शत्रुता का त्याग कर दीजिए।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम का बहुत ही कोमल स्वभाव होता है हालांकि आत्मा रूपी राम समस्त लोकों के स्वामी होते हैं। मिलते ही वे तुम (काम) पर कृपा कर देंगे और एक भी अपराध को याद नहीं रखेंगे।
जनक सुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
व्याख्या : आसुरी दूत शुक भाव ने कहा कि हे नाथ! सुरता रूपी सीता को लौटा दीजिए। इतना मेरा कहना मान लो। जब आसुरी दूत शुक भाव ने जैसे ही सुरता रूपी सीता को लौटाने को कहा तो काम रूपी रावण ने तुरन्त लात का प्रहार किया अर्थात् काम का भाव तुरन्त क्षुब्ध हो उठा।
नाइ चरन सि डिग्री चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
व्याख्या : तब आसुरी दूत शुक भाव काम रूपी रावण को सीस झुकाकर वहाँ चाल जहाँ पर कृपा के समुद्र आत्मा रूपी राम थे। अर्थात् आसुरी शुक भाव का रूपान्तरण हो गया और वह आसुरी वृति का त्याग करके आत्मोन्मुखी हो गया। तब शुक भाव प्राण के द्वारा आत्मा रूपी राम से जुड़ गया और आत्मा रूपी राम की कृपा से सहज स्वरूप को प्राप्त कर लिया।
रिषि अगस्ति की साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर श्रद्धा रूपी पार्वती से कहते हैं कि आसुरी शुक भाव मन का बहुत बड़ा ज्ञानी भाव था परन्तु अगस्त्य ऋषि के श्राप से अर्थात् भविष्य के लोप की अवस्था में क्षोभ पैदा होने के कारण वह भाव आसुरी वृति वाला हो गया। वास्तव में यह होता है कि कोई निर्मल ज्ञान वाला भाव भी अगर भविष्य की आशाओं में फँस जाता है तो धीरे-धीरे उसे आसुरी वृतियाँ दबा लेती हैं। परन्तु दोबारा अगर वो भाव आत्मोन्मुखी हो उठता है तो पुन: अपनी सहज गति को प्राप्त कर लेता है। उसी अनुभूति को इन चौपाइयों में लिखा गया है। वह शुक भाव अपनी सहज गति पा कर आत्मा रूपी राम को सीस झुकाकर निज आश्रम को चला गया अर्थाति सहजता में अवस्थित हो गया।
दो0 बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
व्याख्या : वास्तव में प्रार्थना द्वारा भाव रूपी भव सागर को पार किया जा सकता है परन्तु जड़ता का भाव बहुत जिद्दी होता है, उसे पार करना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए जब जड़ता का भाव विनय के भाव के द्वारा तीनों गुणों को वश में कर लेने पर भी नहीं मानता है तो आत्मा रूपी राम क्रोध के साथ बोले कि बिना भय दिखाए जड़ता के भाव को प्रीति नहीं होती है। अर्थात् जड़ता का भाव विनय को नहीं मानकर कठोर साधना की क्रिया को ही मानता है। वास्तव में कुछ ऐसे भाव होते हैं जो सहज साधना की क्रिया से वश में नहीं आते हैं।
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
व्याख्या : हे लखन भाव! नियम-संयम रूपी धनुष बाण लाओ। मैं ज्ञान रूपी अग्नि बाण से भाव रूपी सागर को सोख डालूँगा। सठ के पास विनय करना और कुटिल से प्रेम करना तथा कंजूस के सामने उदारता का संदेश देना।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीच बएँ फल जथा।।
व्याख्या : ममता रत व्यक्ति से ज्ञान की बात कहना, लोभी से वैराग्य की बात करना, क्रोधी से शान्ति का वर्णन करना, व कामी पुरुष से परमात्मा की बात करना वैसे ही व्यर्थ होता है जैसे ऊसर भूमि में बीज बोना व्यर्थ होता है।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
व्याख्या : ऐसा कहकर परमात्मा रूपी राम ने ज्ञान की प्रेरणा रूपी अग्नि बाण का संधान किया। यह मत लखन भाव रूपी लक्ष्मण को बहुत अच्छा लगा। जब आत्मा रूपी राम ने ज्ञान रूपी अग्नि बाण का संधान किया तो भाव रूपी सागर के हृदय में ज्ञान की ज्वाला प्रकट हो गयी।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
व्याख्या : उस अवस्था में राग, द्वेष, मद व लोभादि मगरमच्छ, साँप, मछलियाँ आदि जीव-जन्तु व्याकुल हो उठे। जब भाव रूपी भव सागर ने इन भावों को जलता हुआ देखा तो मन के भावों को एकाग्र करके वासना रूपी थाल लेकर व मान आदि का त्याग करके विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के रूप मे प्रकट हो गया। अर्थात् भाव रूपी भाव सागर आत्मा रूपी राम के वश में आ गया।
दो0 काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
व्याख्या : परम सात्विक अहंकार रूपी काक भुसुण्डि कहते हैं कि हे ज्ञान अहंकार रूपी गरूड़! सुनिए, चाहे करोड़ों उपाय करके सींच लिया जाए, परन्तु केला तो काटने पर ही फलता है। वैसे ही नीच व्यक्ति से कितनी भी प्रार्थना कर ली जाए, वह तो डाँटने पर ही झुकता है।
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
व्याख्या : तब भाव रूपी भव सागर भयभीत होकर आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर गया अर्थात् भावों का भव सागर आत्मा के सामने समर्पण कर दिया और कहने लगा कि हे नाथ! मेरे अवगुणों को क्षमा करना। क्योंकि आकाश, हवा, अग्नि, जल व पृथ्वी इन पाँच तत्वों की सहज करणी ही जड़ता युक्त होती है।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयुस जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भांति रहें सुख लहई।।
व्याख्या : आपकी प्रेरणा से ही माया पैदा होती है और आपकी माया ही समस्त सृष्टि का कारण होती है। ऐसा सभी ग्रंथों ने गाया है। अत: अब आपकी जैसी प्रेरणा होगी, वैसा ही होगा। आपकी प्रेरणा के अनुसार रहने पर ही जीव को सुख मिलता है।
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
व्याख्या : हे प्रभु! आपने मुझ जड़ भाव रूपी भव सागर को शिक्षा देकर अच्छा किया है परन्तु भावों की मर्यादा भी आपकी ही पैदा की हुई है। हे नाथ! ढोल अर्थात् मूर्ख, गँवार, सेवा रत सेवक, पशु और नारी ये सब संयम की मर्यादा में रखने जरूरी है। नारी का तात्पर्य स्त्री से लगा लिया जाता है जो कि अनुचित होता है। नारी का मतलब नाड़ी से ही होता है जो स्त्री-पुरुष दोनों में होती है। वास्तव में जब शरीर की नाड़ी संयम में रहती है तो ही सुखद अवस्था रहती है। नाड़ी असंयमित हो जाने पर नाना चिन्ता व रोग पैदा कर देती है। इसलिए नाड़ी को हमेशा संयम में रखने की बात कही गयी है। शूद्र का मतलब भी किसी जाति विशेष व वर्ण विशेष से नहीं होता है। शूद्र का तात्पर्य सेवक से होता है। अगर परिचारक संयम में रहता है तो वह मालिक के लिए सुखकारक होता है। मूर्ख सेवक होने पर नरक का कारण बन जाता है।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई।।
व्याख्या : मैं आप (आत्मा) की प्रेरणा से सूख जाऊँगा और बुद्धि के भावों रूपी सेना पार उतर भी जायेगी। परन्तु इसमें मेरी मर्यादा नहीं रहेगी। परन्तु वेदों ने बताया है कि आत्म प्रेरणा ही सर्वोपरि होती है। अत: अब आपको जो उचित लगे वही कीजिए। यहाँ पर भाव रूपी भव सागर कहता है कि आप भावों का दमन कर सकते हैं परन्तु उससे भावों की सहजता नहीं बच पायेगी। अत: जो उचित लगे अर्थात् सहज रास्ता हो वो ही कीजिए।
दो0 सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।
व्याख्या : भाव रूपी भव सागर के समर्पणयुक्त वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम मुस्कुराकर बोले कि जिस प्रकार बुद्धि के भाव रूपी वानर-भालूओं की सेना पार हो जाए, ऐसा उपाय कीजिए।
नाथ नल नील कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
व्याख्या : हे नाथ! आपकी बुद्धि रूपी सेना में नल-नील रूपी दोनों भाई हैं जिनको बचपन में ऋषि का आशीर्वाद मिला है कि उनके स्पर्श करने से भारी-भारी आसक्ति रूपी पहाड़ भी आपके प्रताप से भाव रूपी भव सागर के जल में तैर जायेंगे। इन चौपाइयों में गहरा मर्म छुपा हुआ है। वास्तव में बुद्धि के कुछ भाव ऐसे होते हैं जिनमें बरतने पर आसक्ति का मोह नहीं पड़ता है। नल व नील दोनों भाव बुद्धि का उड़न्ता व अस्थिरता के प्रतीक हैं। अगर भोगों में बुद्धि का उड़न्त भाव व अस्थिर भाव रहता है तो आसक्ति नहीं होती है। उसी को वासना रूपी वानरों का जल में नहीं डूबना बोलकर बताया गया है।
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
व्याख्या : फिर मैं (भाव रूपी भव सागर) आपकी (आत्मा की) प्रभुता को हृदय में रखकर मेरे बल के अनुसार सहायता करूँगा। इस प्रकार भाव रूपी भव सागर को बाँधकर अर्थात् सहज अनुकूल करके पार उतरने पर तीनों लोकों अर्थात् तीनों गुणों (सत, रज व तम) द्वारा आपका सुयश गाया जायेगा अर्थात् सहजता आ जायेगी।
एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
व्याख्या : इस ज्ञान रूपी अग्नि बाण से आप मेरे उत्तर तट पर निवास करने वाले चिन्ता के मूढ़ भावों को मार दीजिए। भाव रूपी भव सागर की पीड़ा सुनकर आत्मा रूपी राम ने तुरन्त चिन्ता हर ली अर्थात् ज्ञान की प्रेरणा करके चिन्ता के भावों का नाश कर दिया।
देखि राम बल पौरूष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पायोधि सिधावा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के भारी बल को देखकर भाव रूपी भव सागर सुखी हो गया अर्थात् आत्म प्रेरणा से सब भाव सहज हो गए। तब भाव रूपी भव सागर ने सब भावों का मर्म प्रकट कर दिया और आत्मा रूपी राम के चरणों में सीस झुकाकर चला गया।
छ0 निज भवन गवनेउ सिंधु श्री रघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलिमल हर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
व्याख्या : इस प्रकार भाव रूपी भव सागर निज भवन को चला गया अर्थात् सहज होकर शान्त हो गया। देहबुद्धि के विकारों को हरने वाले इस चरित का वर्णन तुलसीदास साधक ने अपनी बुद्धि के अनुसार किया है। यह चरित सुख पैदा करने वाला, संशयों को मिटाने वाला व विषयों के दु:ख का अंत करने वाला है। अत: अरे मूर्ख मन! अब तो तू समस्त आशाओं-अपेक्षाओं का त्याग करके निरन्तर परमात्मा के गुणों को सुन व गान कर।
दो0 सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जल जान।।60।।
व्याख्या : परमात्मा के गुणों का बखान करना सब मंगलों को करने वाला होता है। इसलिए जो इस चरित को आदरपूर्वक सुनेंगे व गायेंगे, वे बिना जहाज के भाव रूपी भवसागर को पार कर जायेंगे।
।। मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम।।
।। इति मद्रामचरित मानसे सकल कलिकलुष विध्वंसने पञ्चम: सोपान: समाप्त:।।