प्रथम सोपान
बालकाण्ड
श्लोक
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्द सामपि।
मंगलानां च कर्तारौ वन्दे बाणी विनायकौ।।1।।
व्याख्या : अक्षरों, अर्थसमूहों, छन्द आदि में रस पैदा करने वाली व मंगल को करने वाली विनय का घर ऐसी विनीत वाणी की वन्दना करता हूँ।
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रुपिणौ।
याभ्यां बिना ना पश्यन्ति सिद्धा स्वान्त: स्थमीश्वरम्।।2।।
व्याख्या : श्रद्धा व विश्वास रूपी भवानी-शंकर की मैं वन्दना करता हूँ। अर्थात् श्रद्धा का भाव ही भवानी (भाव लाने वाली) है और विश्वास ही शंकर है (शंका नाश्यति शंकर) क्योंकि शंका का नाश हो जाने पर विश्वास की ही अवस्था रहती है। इसलिए तुलसीदास कहते हैं कि बिना श्रद्धा (भाव) और विश्वास (शंका रहित) के कोई भी सिद्धजन अपने अन्त:करण में स्थित परमात्मा को नहीं देख सकता है। यहाँ पर शु डिग्री में ही स्पष्ट कर देते हैं कि रामायण (अर्थात् राम अ अयन राम का घर) अन्त:करण की विषय वस्तु है। जिसको समझने के लिए श्रद्धा रूपी भवानी और विश्वास रूपी शंकर की कृपा जरूरी है।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरूं शंकररूपिणम्।
यमा श्रितो हि वक्रो%पि चन्द्र: सर्वत्र वन्धते।।3।।
व्याख्या : मैं नित्य अनुभव में आने वाले शंकर रूपी गुरु अर्थात् शंका का नाश करने वाले अन्त: गुरु की वन्दना करता हूँ। जिससे यम का आश्रय अर्थात् सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व अचौर्य का पालन करने पर वासनाएँ भी शीतल हो जाती हैं, जिससे साधक सर्वत्र वन्दनीय हो जाता है।
सीताराम गुणग्राम पुण्यारण्य विहारिणौ।
वन्दे विशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वर कपीश्वरौ।।4।।
व्याख्या : सीता को जानकी कहा गया है इसलिए सीता जान अर्थात् प्राण से पैदा होने वाली श्वास हैं और राम ऊर्जा हैं। इसलिए तुलसीदास प्राण (सीता) और ऊर्जा (राम) के गुण समूहों रूपी पुण्य वन में विचरण करने वाले विशुद्ध वैज्ञानिक आधार पर कवीश्वर अर्थात् कवितत्व और कपीश्वरौ अर्थात् बुद्धित्व की वन्दना करते हैं। प्राण ऊर्जा से ही वाणी अर्थात् कवित्व पैदा होती है और प्राण में कंपन से ही बुद्धि की भाव पैदा होते हैं। इसलिए ऊर्जा को कविश्वरों व कपिश्वर कहा गया है।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेश हारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतो%हं राम वल्लभाम्।।5।।
व्याख्या : प्राण शक्ति ही सृष्टि को पैदा, धारण व संहार करने वाली होती है, क्योंकि प्राण से ही भाव पैदा होते हैं और भावों से ही सृष्टि का सृजन, पालन व संहार होता है। भावों से ही समस्त क्लेशों का नाश होता है, इसलिए भावों को पैदा करने वाली प्राण शक्ति (जानकी/सीता) ही समस्त कल्याणों को करनेवाली होती है। वह प्राण शक्ति ही आत्मा रूपी राम की वल्लभाम अर्थात् पत्नी है। वल्लभाम् का तात्पर्य होता है लता से इसलिए पत्नी को वल्लभाम् कहा जाता है क्योंकि पति रूपी वृक्ष पर लता रूपी (वल्लभाम्) पत्नी लिपटी रहती है। इसलिए आत्मा रूपी पति की लता (वल्लभाम्) प्राण की शक्ति रूपी सीता हैं। अत: तुलसीदास आत्मा की प्राण शक्ति को नमन करते हैं।
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा।
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रम:।।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्योधेस्तितीर्षावतां।
वन्दे%हं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।
व्याख्या : प्राणशक्ति से भाव पैदा होते हैं और भावों का जाल ही माया होती है, इसलिए प्राण शक्ति (जानकी) से पैदा माया के वश में होकर ब्रह्मादि देवता समस्त संसार को रस्सी में सर्प जैसा मिथ्या आभासित कर रहे हैं। भावों से ही भावों का भ्रम पैदा होता है, जैसे वृक्ष एक होते हुए भी उसमें अनेक पत्ते होते हैं। उसी प्रकार प्राण शक्ति रूपी वृक्ष में भाव रूपी अनेक पत्ते होते हैं, जो अथाह भव सागर (भावों का सागर) बनाते हैं। अत: तामसिक आदि भावों का कारण व भावों से परे आत्मा रूपी राम की प्राण शक्ति जो भावों का हरण करने वाली है की वन्दना करते हैं।
नानापुराण निगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतो%पि।
स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा -
भाषा निबन्ध मतिमञ्जुलमातनोति।।7।।
व्याख्या : जो नाना पुराण व शास्त्रों का मत है तथा जो रामायण में अन्यत्र भी कहा गया है, उसी परमात्मा की कथा को तुलसी दास स्वयं के अन्त:करण के सुख के लिए अति सरल व सरस भाषा में लिखते हैं। अर्थात् तुलसी दास अपने अन्त:करण की अनुभूति को ही प्रतीकों का सहारा लेकर लिखते हैं।
सो0 जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।1।।
व्याख्या : जिस परमात्मा के स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं और साधक इस शरीर में व्यापक गुणों का स्वामी हो जाता है। वे ही बुद्धि की राशि व शुभ गुणों के भण्डार परमात्मा मुझ पर सदैव कृपा करें।
सो0 मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ कलि मल दहन।।2।।
व्याख्या : जिसकी कृपा से गूँगा बोलने वाला हो जाता है और लंगड़ा पहाड़ पर चढ़ जाता है, वे ही दयालु व कलियुग अर्थात् देहबुद्धि के विकारों का नाश करने वाले प्रभु! मुझ पर द्रवित हुजिए।
सो0 नील सरोरूह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम सदा छीर सागर सयन।।3।।
व्याख्या : यहाँ पर कुण्डलिनि शक्ति को प्रतीकों के माध्यम से समझाया गया है। यहाँ इसलिए कहते हैं कि ये कुण्डलिनी शक्ति नीले रंग वाली है और जब जागृत होने लगती है तो श्याम वर्ण हो जाती है और जब जागृत हो जाती है तो लाल वर्ण की दिखाई देती है अर्थात् आभासित होती है। इसलिए हे नाभी पर शयन करने वाली कुण्डलिनि शक्ति! आप मेरे हृदय में अपना घर कर लीजिए। अर्थात् जब कुण्डलिनि शक्ति उदर से उठकर सहस्रसार में पहुँचती है तो साधक परमात्मा से सदैव उसी अवस्था में रहने की प्रार्थना करता है। सहस्रसार को ही साधना में हृदय माना जाता है क्योंकि भावों की उत्पत्ति वहीं से होती है। ज्यों-ज्यों भाव सहस्रसार से नीचे के चक्रों में आते जाते हैं त्यों-त्यों भावों का स्वरूप बदलता-बदलता सांसारिक होता चला जाता है और उदर में अर्थात् मणिपूरक चक्र में आते-आते वासनाओं का जाल बुन जाता है, जिससे सुख रूपी जल खारा हो जाता है, उसी को क्षीर सागर के प्रतीक के रूप में बताया जाता है।
सो0 कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन।।4।।
व्याख्या : रामायण में योग की क्रिया का रहस्य छिपा हुआ है, इसलिए कुण्डलिनि शक्ति का वर्णन करने के लिए लिखा गया है कि शरीर में कुण्डलिनि शक्ति कुंद अर्थात् कुण्डली मार कर रहती है, जो इंदु समान अर्थात् इन्द्रियों के विस्तार का मूल होती है। कुण्डलिनि शक्ति से ही मन का स्वरूप बनता है और मन के विस्तार से ही इन्द्रियों का जन्म होता है। ये कुण्डलिनि शक्ति से संचरित प्राण जीव के हृदय में रमण करता रहता है। ये शक्ति करूणा का घर होती है। शक्ति का दीन पर स्नेह होता है अर्थात् जीव जब काम, क्रोध, मद, मोह व मत्सरादि के भावों से मुक्त हो जाता है, तब परम शक्ति का जीव पर स्नेह बरसने लगता है। हे परम शक्ति! आप कामादि मद का नाश करने वाली हैं। अत: मुझ पर कृपा कीजिए।
सो0 बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिन्धु नर रूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।।5।।
व्याख्या : मैं गुरु के चरण कमलों की वन्दना करता हूँ जो मनुष्य के रूप में सांसारिक माया के क्लेशों का हरण करने वाले एवं कृपा के समुद्र हैं तथा जिनके वचन माया-मोह के अन्धकार को दूर करने के लिए सूर्य की किरणों जैसे हैं। गुरु के चरण-कमलों की वन्दना से तात्पर्य गुरु की सत्ता का वन्दन करने से है।
चौ0 बन्दऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरूचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रूज परिवारू।।
व्याख्या : मैं गुरु के चरण कमलों के पराग की वन्दना करता हूँ, जो रूचिकर, सुगन्धित, सरस व अनुराग पैदा करने वाली है। वह चरण रज चारों पदार्थों का (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) अमृतमय चूर्ण है, जो भावों से पैदा होने वाले समस्त रोगों का निवारण करने वाली है। गुरु पद का तात्पर्य गुरु शक्ति की सत्ता से होता है।
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
व्याख्या : अच्छे (शुभ) कार्य करने की वृत्ति ही स्वयं (शंभु) के तन की विमल विभूति होती है, जो मंगल व आनन्द की जननी होती है। अर्थात् शुभ कार्य करने की वृत्ति से ही आनन्द व सुख की प्राप्ति होती है। गुरु के चरण कमलों में अनुराग पैदा होने पर शुभ कार्यों की वृत्ति पैदा होती है और वह वृत्ति ही स्वयं के शरीर की निर्मल विभूति होती है, जो मंगल व आनन्द को पैदा करने वाली होती है। वह शुभ वृत्ति ही साधक के मन रूपी दर्पण को निर्मल करती है तथा उसी शुभ वृत्ति को आज्ञा चक्र में धारण करने पर सत, रज व तम के तीनों गुण वश में आ जाते हैं।
श्री गुरु पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
व्याख्या : साधना पथ में अन्त: स्थित गुरु के चरण भृकुटि में माने जाते हैं क्योंकि अन्त: स्थित गुरु शक्ति सहस्रसार में आसन लगाकर बैठी होती है और चरण भृकुटि में होते हैं। इसलिए गुरु के चरणों के नाखूनों की ज्योति का स्मरण करने मात्र से ही हृदय में दिव्य दृष्टि पैदा हो जाती है। वह ज्योति मोह के दलों के अन्धकार का नाश करने वाली प्रकाश स्वरूप होती है। वह साधक बड़ा भाग्यशाली होता है, जिसके हृदय में वह ज्योति आ जाती है। अर्थात् अन्त: स्थित गुरु के चरणों में प्रीत हो जाना ही भाग्य उदय का आधार हो जाती है। गुरु चरण से तात्पर्य गुरु शक्ति की सत्ता से होता है जो भ्रकुटि और सहस्रसार में निवास करती है।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
सूझहिं रामचरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
व्याख्या : गुरु शक्ति की कृपा होने पर हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं, जिससे भावों से पैदा होने वाले दु:खों की रात्रि का नाश हो जाता है। उस अवस्था में साधक को राम के चरित्र का अर्थात् परमात्मा का अनुभव होने लग जाता है और परमात्मा के चरित का प्रकटीकरण हो जाता है।
दो0 जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।1।।
व्याख्या : उस अवस्था में साधक की अवस्था आँखों में सिद्ध अंजन डालने जैसी हो जाती है जिससे साधक अपने शरीर की कोशिकाओं (सेल) में नाना प्रकार का खेल देखने लगता है और उसका शरीर प्रसन्नता का आधार बन जाता है। अर्थात् उस समय साधक को अपनी प्रत्येक कोशिका का रहस्य पता चल जाता है और वह नाना प्रकार की अनुभूति करने लग जाता है।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।
तेहीं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ रामचरित भव मोचन।।
व्याख्या : गुरु के चरणों की मधुर अंजन जो आँखों के लिए अमृत के समान है और समस्त दृष्टि के दोषों को दूर करने वाली है, उसी चरण रज से निर्मल विवेक से देखकर मैं राम के चरित्र अर्थात् परमाात्म तत्व का वर्णन करता हूँ, जो भावों के भवसागर को मिटाने वाला है।
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।।
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी।।
व्याख्या : मैं सबसे पहले महीसुर अर्थात् शरीर में चलने वाले चन्द्र व सूर्य स्वर की वन्दना करता हूँ। शरीर को ही पृथ्वी की संज्ञा दी जाती है, इसलिए महीसुर का तात्पर्य स्वरों से ही है। क्योंकि साधना की शुरूआत भी स्वर ज्ञान से ही प्रारम्भ होती है। जब साधक स्वरों के प्रति जागरूक हो जाता है, तब उसे भावों का मर्म समझ में आ जाता है, तो मोह से पैदा होने वाले भ्रम का नाश हो जाता है। मोह का भ्रम मिट जाने पर सद्भाव पैदा होने लग जाते हैं। उसी को सुजन समाज अर्थात् अच्छे भावों की अवस्था कहा जाता है। अच्छे भावों की अवस्था समस्त सद्गुणों की खान होती है, इसलिए प्रेम सहित शुभ वाणी द्वारा मैं उनकी वन्दना करता हूँ।
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा।।
व्याख्या : साधना में जो लगे रहते हैं उनका चरित्र कपास के शुभ चरित्र जैसा होता है। साधक विषयों से निरस होकर गुण गुणों में बरतने की अवस्था को प्राप्त करता है। इसलिए जो साधक आत्मा को विकारों से बचाने के लिए दु:ख सहता है, वो संसार में वन्दनीय हो जाता है और यश प्राप्त करता है। पर छिद्र से मतलब आत्मा के विकारों के आवरण से है क्योंकि आत्मा को ही पर कहा जाता है। अत: विषय रूपी विकारों से आत्मा को बचाना ही साधना का मूल रास्ता होता है।
मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथ राजू।।
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
व्याख्या : संशय नाश्यति सन्त: अर्थात् संशयों का नाश होना ही सन्त की अवस्था होती है। इसलिए संशयहीन अवस्था ही प्रसन्नता व मंगल को देने वाली होती है और जो सांसारिक युद्ध क्षेत्र में तीन गुणों से पार करा कर गुणों पर राज करा देती है। अर्थात् साधक संशय मिट जाने पर सत, रज व तम के तीन रथों से पार हो जाता है, इसलिए तीन गुणों से परे हो जाना ही असली तीर्थ होता है और वो ही अवस्था सांसारिक युद्ध क्षेत्र में जीव को विजयी बनाकर जीव को गुणों पर राज करा देती है। संशयहीन अवस्था होने पर आत्मा भय हीन (भक्ति) हो जाती है और भय मिट जाने पर शरीर में आनन्द की सुरसरि चलने लगती है। इसे ही आनन्द का रस पान करना और ब्रह्म के रूप में प्रचारित किया जाता है।
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।।
व्याख्या : विषय वासनाओं से युक्त क्रियाओं का निषेध करने अर्थात् बचने से देह बुद्धि के विकारों का नाश होता है और सूर्य स्वर प्रबल होकर साधक को कर्मठ बनाता है। कर्मठ का मतलब है साधना में दृढ़ता से लग जाना। अपान का प्रान में हवन ही असली कर्म होता है, इसे ही वास्तविक यज्ञ कहा गया है। जब साधक यज्ञकर्म अर्थात् पान-अपान के हवन में लग जाता है, तब वह सांसारिक क्रियाओं से बचने लग जाता है, जिससे वह कलिमल (देहबुद्धि) के भावों से मुक्त हो जाता है। उस अवस्था में माया का हरण हो जाता है, उसे ही हरि हर की अवस्था कहा जाता है। माया के हरण की अवस्था उस समय वाणी में भी आ जाती है। अत: ऐसी वाणी सुनने में भी प्रसन्नता व मंगल को देने वाली हो जाती है।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथ राज समाज सुकरमा।।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।।
व्याख्या : उस अवस्था में साधक का स्वयं का विश्वास ही धर्म बन जाता है अर्थात् उसकी धारणा दृढ़ हो जाती है और साधक तीनों गुणों को (सत, रज, तम) वश में करके शुभ कर्मों में लग जाता है। यजन (पान में अपान का हवन) की अवस्था सब को सब समय सुलभ हो सकती है। अत: जो श्रद्धापूर्वक यजन करते हैं, उनके समस्त क्लेशों का नाश हो जाता है।
अकथ अलौकिक तीरथ राऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।
व्याख्या : तीन गुणों (सत, रज, तम) को जीत लेने की अवस्था अकथनीय व अलौकिक होती है, जो साधक को प्रकट रूप से फल प्रदान करती है अर्थात् मोक्ष की अवस्था आ जाती है। तीन गुणों की उलझन ही बन्धन होता है और तीन गुणों को वश में कर लेना ही मोक्ष होता है।
दो0 सुनि समझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।
व्याख्या : जो लोग तीन गुणों को जीतने के लिए यजन की विधि को सुनकर अच्छी तरह समझ लेते हैं और प्रसन्नतापूर्वक मन को निर्मल कर लेते हैं, तो उनके हृदय में अनुराग पैदा हो जाता है। ऐसे साधक धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फलों को प्राप्त कर लेते हैं और अमरता को प्राप्त कर लेते हैं और प्रकृति को अपने में लय कर लेते हैं। प्रकृति को लय कर लेना ही प्रयाग होता है, जहाँ तीनों गुण वश में हो जाते हैं। इसलिए प्रयाग ही तीर्थराज (तीनों गुणों का वश में हो जाना) भी कहलाता है।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।
सुनि आचरज करै जनि कोई। सत संगति महिमा नहिं गोई।।
व्याख्या : तीन गुणों के वश में होते ही मन निर्मल हो जाता है, जिसका परिणाम तुरन्त देखा जा सकता है। उस अवस्था में तामसिक व राजसिक गुण सात्विक हो जाते हैं, उसे ही कौआ का कोयल और बतख का हंस बनना कहा जाता है। साधना के इस रहस्य को सुनकर जो आश्चर्य करते हैं। उन्होंने सतसंग की महिमा को नहीं जाना है। अर्थात् वे लोग साधना पद्धति से अनभिज्ञ हैं।
बालमीक नारद घट जोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।
व्याख्या : बाल्मिकी, नारद और अगस्त्य ऋषि ने भी अपने अपने अनुभवों को अपनी-अपनी भाषा में कहा है। जल, थल, व नभ में रहने वाले जितने भी संसार में जड़ व चेतन जीव हैं।
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
व्याख्या : संसार में सबने अपनी बुद्दि के अनुसार क्रिया करके सम्पति व यश को प्राप्त किया है। जिसने जैसा प्रयास किया है, उसने वैसा ही पाया है। इसलिए सत्संग (सत्य के संग अर्थात् आत्मचिंतन) के प्रभाव को जानना चाहिये। लोक व वेद में इसे जानने का कोई उपाय नहीं है। अर्थात् स्वयं को ही साधना पथ पर चलकर यजन की क्रिया करके तीर्थराज के प्रभाव को जानना होगा। तभी कल्याण सम्भव है।
बिनु सत संग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
सत संगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।।
व्याख्या : बिना सत्संग के विवेक नहीं होता है और बिना परमात्मा की कृपा के वह उपलब्ध नहीं होता है। गुणों के जाल से मुक्त होने पर ही विवेक जागृत होता है और यह बिना किए सम्भव नहीं है। इसलिए राम अर्थात् परमात्मा के द्वारा कृपा (अर्थात् करके प्राप्त करना ही कृपा होती है) करने पर ही सम्भव है। सत्संग की अवस्था ही सब सिद्धियों को प्राप्त करने का साधन व मूल होती है।
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनिमनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
व्याख्या : सत्संग की अवस्था को प्राप्त करने पर तो मूर्ख भी सुधर जाते हैं और विषयों के रस प्राप्त करने की जगह विषय रस से परे हो जाते हैं और विषयों से निसंग हो जाते हैं। पारस का तात्पर्य है विषयों में रस प्राप्त करने की भावना और परस का मतलब है रस से परे होना। पारस कोई पत्थर नहीं है, जिसे स्पर्श कराकर लोहा सोना बनाया जा सके। ये साधना के रहस्य को समझाने का प्रतीक है। जब साधक सत्संग की अवस्था में प्रवेश कर जाता है तो विधिवश अर्थात् क्रिया करते हुए कुसंगत में अगर पड़ भी जाए तो भी वह अपने गुणों को गुणों में ही बरतने देता है और विषयों में रहते हुए भी अपने मन की मणि को प्रकाशित रखता है। विषयों की तुलना सर्प से की जाती है, इसलिए यहाँ विषयों को फनि बोलकर लिखा गया है।
बिधि हरिहर कवि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी।
सो मो सन कहि जात न कैसे। साक बनिक मनि गुन गन जैसे।।
व्याख्या : साधक की माया का हरण हो जाने पर जो अवस्था होती है। उसका वर्णन कवि और विद्वान अपनी वाणी से नहीं कर पाते हैं। उस अवस्था का मैं कैसे वर्णन कर सकता हूँ? जैसे सब्जी बेचने वाला व्यापारी मणि के गुणों का वर्णन नहीं कर सकता है। अर्थात् ये तो निज अनुभव करने का विषय है और इसे क्रिया करके ही प्राप्त किया जा सकता है।
दो0 बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।।
व्याख्या : मैं संशय रहित आत्म तत्व की बन्दना करता हूँ, जिसका कोई शत्रु नहीं होता है। वह तो अंजलि के फूलों जैसी होती है, जो हाथों को भी सुगन्धित कर देती है।
दो0 संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
बाल बिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु।।3(ख)।।
व्याख्या : संशय रहित निर्मल चित जगत का उपकार करने वाला होता है, जिसका प्रेम का सुभाव होता है। इसलिए हे परमात्मा! मुझ बालक की प्रार्थना सुनकर अपने चरणों में अनुराग पैदा कर दो।
बहुरि बंदि खल गन सति भाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें।।
व्याख्या : यहाँ पर गुणों की अवस्था का वर्णन किया गया है कि बहुत से भाव बन्धन को देने वाले और बहुत से गुण भाव मूर्खता वाले और कुछ गुण भाव सात्विकता वाले होते हैं, जो बिना कार्य के दाहिने (सूर्य स्वर) और बाएँ (चन्द्र) स्वर से पैदा होते रहते हैं। ये सब गुण भाव आत्मा (पर) के लिए हानि व लाभ वाले होते हैं अर्थात् गुणों के भावों से ही आत्मा का बन्धन व मोक्ष होता है। ये गुण भाव खुशी और क्लेश पैदा करते रहते हैं।
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहस बाहु से।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। परहित घृत जिन्ह के मन माखी।।
व्याख्या : ये गुण भाव माया का हरण करे वाले भी होते हैं और ये भाव जीव की शान्ति को भंग करने के लिए राहू के समान होते हैं। ये गुणभाव आत्मा को बन्धन में डालने के लिए सहस्रबाहु के समान होते हैं अर्थात् एक भाव से दूसरा भाव और दूसरे से तीसरा भाव पैदा होकर हजारों भावों को पैदा कर देते हैं, जिससे आत्मा पर माया का आवरण छा जाता है। आत्मा पर तो केवल आवरण आता है। आत्मा कभी दूषित नहीं होती है, इसलिए जो लोग आत्मा का दोष मानते हैं, उनका मन तो आत्मा रूपी घी में मक्खी की तरह होता है।
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अब अवगुन धन धनी धनेसा।।
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।।
व्याख्या : तामसिक भाव व क्रोध के भाव भैंसे की तरह होते हैं, जो अवगुणों की खान और इच्छाओं को पैदा करने वाले होते हैं। ये भाव सभी भावों को प्रभावित करने वाले होते हैं और शरीर में कुंभकरन की तरह सुप्त अवस्था में रहते हैं। अर्थात् क्रोध, मद, काम व लोभादि के भाव शरीर में कुंभकरण की तरह सोए रहते हैं, जो अवसर पाकर तुरन्त जाग उठते हैं।
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं।
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।।
व्याख्या : ये तामसिक भाव आत्मा के बन्धन के लिए ही पैदा होते हैं और आत्म तत्व को वैसे ही क्षति पहुँचाते हैं जैसे ओलावृष्टि से फसल को नुकसान होता है। इसलिए काम क्रोध आदि मूढ़ भावों की वन्दना करता हूँ, जो नाना प्रकार से आत्म तत्व पर विकारों का आवरण करते रहते हैं।
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना।
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही।।
व्याख्या : मैं पुन: पृथुराज अर्थात् मन की बन्दना करता हूँ। पृथु शरीर होता है और शरीर पर मन का राज होता है, इसलिए मन को पृथुराज कहा गया है। पृथुराज अर्थात् मन ही आत्मा के पापों का दश इन्द्रियों सहित श्रवण करता है। मन से ही पर अघ अर्थात् आत्मा के आवरण बढ़ते हैं। पुन: सक्र अर्थात् मन की क्रिया सहित मन की विनय करता हूँ, जो हमेशा आसुरी भावों का हित करने वाला होता है। मन में अगर आसुरी भाव ज्यादा होते हैं, तो तामसिक भाव बहुत तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए सक्र अर्थात् सक्रिय मन आसुरी वृति को ही बलवान करता रहता है।
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा।।
व्याख्या : सक्र अर्थात् सक्रिय मन को हमेशा कठोर बचन ही प्रिय होते हैं और आसुरी मन नाना प्रकार से आत्मा में ही दोष देखता रहता है। मन कभी स्वयं के दोषों को नहीं देखता है बल्कि धोखा देकर आत्मा में ही दोषों को देखता है।
दो0 उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।
व्याख्या : मूढ़ भावों की अवस्था यह होती है कि वे उदासीन, शत्रु व मित्र किसी की भी भलाई देखकर जलने लगते हैं। इसलिए साधक को चाहिए कि ऐसे भावों के रहस्य को जान कर प्रेम पूर्वक विनती करनी चाहिए। प्रेमपूर्वक विनती करने की भावना से आसुरी भाव कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए सभी साधना पंथों में प्रार्थना पर बहुत बल दिया जाता है।
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।।
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा।।
व्याख्या : मैंने अपनी तरफ से प्रार्थना कर दी है कि आसुरी भावों में भूल कर भी नहीं उलझूँ। क्योंकि कोयल द्वारा कौआ के बच्चे को प्रेमपूर्वक पालने पर भी बड़ा होकर कौआ कभी शाकाहारी नहीं हो सकता है। अत: साधक को भी आसुरी भावों से बचते रहने का प्रयास करना चाहिये क्योंकि आसुरी भाव कभी भी जीव का कल्याण नहीं कर सकते।
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुख प्रद उभय बीच कछु बरना।।
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं।।
व्याख्या : मैं संत और दुष्ट दोनों की वन्दना करता हूँ। ये दोनों दु:ख का कारण कैसे बनते हैं, उसे बताता हूँ। संत अर्थात् संशय रहित अवस्था के मिट जाने पर प्राण शक्ति को आसुरी भाव हरण कर लेते हैं और प्राण शक्ति आसुरी भावों में फँस जाती है तथा आसुरी भाव अगर प्राण में आकर मिल जाते हैं तो प्राण शक्ति में चिन्ता के भाव पैदा कर देते हैं। इस प्रकार दोनों प्रकार से दु:ख का कारण पैदा हो जाता है। यहाँ साधना की सूक्ष्मता का वर्णन किया गया है।
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।।
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।।
व्याख्या : सात्विक भाव और आसुरी भाव दोनों एक प्राण से ही पैदा होते हैं जैसे कमल और जोंक पानी में ही पैदा होते हैं परन्तु दोनों के गुण अलग-अलग होते हैं। सात्विक भाव अमृत के समान और आसुरी भाव शराब के समान होते हैं। हालाँकि दोनों को पैदा करने वाला प्राण रूपी समुद्र एक ही होता है।
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती।।
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।।
व्याख्या : अच्छा और बुरा ये सब स्वयं की करतूत का फल होता है। संसार में अच्छा करने से यश और बुरा करने से अपयश की प्राप्ति होती है। जो सात्विक भाव होते हैं, वे तो अमृत के समान होते हैं और अमृतमय सात्विक भाव ही पैदा करते हैं, जिससे साधक को आनन्द की सुरसरि उठती रहती है तथा जो आसुरी भाव होते हैं, वे विष की तरह होते हैं जो शारीरिक विकार (कलिमल) पैदा कर अग्नि की तरह जीव को जलाते रहते हैं।
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
व्याख्या : गुण और अवगुणों को सब कोई जानते हैं परन्तु जो जिस भाव में रमण करता है, उसको वही भाव अच्छा लगने लग जाता है।
दो0 भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु।।5।।
व्याख्या : अच्छे भावों से अच्छाई पैदा होती है और बुरे आसुरी भावों से बुराई ही पैदा होती है। इसलिए अमृत रूपी सात्विक भावों से अमरत्व अर्थात् बन्धनमुक्त अवस्था की प्राप्ति होती है और विषय विष से जीव बन्धन में पड़ जाता है।
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।।
व्याख्या : अवगुण युक्त मूढ़ भाव चिन्ता पैदा करते हैं, परन्तु साधक लोग दैवीय गुणों को ग्रहण करते रहते हैं। ये दोनों प्रकार के दैवीय व आसुरी भावों का अपार भव सागर होता है। इसलिए यहाँ पर भावों के कुछ गुण व दोषों का वर्णन किया गया है क्योंकि भावों को पहचाने बिना ग्रहण व त्याग नहीं किया जा सकता है।
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष वेद बिलगाए।।
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।।
व्याख्या : अच्छे और बुरे अर्थात् दैवीय सम्पद और आसुरी भाव सब क्रिया (विधि) से पैदा होते हैं। गुण व दोषों का अलगाव तो अच्छी तरह जानकर (वेद) किया जाता है। वेद का मतलब होता है, अनुभूति द्वारा किसी विषय वस्तु को जान लेना। सब वेद, इतिहास व पुराण यही कहते हैं कि क्रिया (विधि) के सब क्लाप गुण व अवगुणों से युक्त होते हैं।
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती।।
दानव देव ऊंच अ डिग्री नीचू। अमिअ सुजीवनु माहु डिग्री मीचू।।
व्याख्या : दुख, सुख, पाप, पुण्य दिन, रात, साधु, दुष्ट, अच्छी जाति, बुरी जाति, दानव, देव, ऊँच, नीच, जीवन के लिए अमृत व जहर।
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।।
कासी मग सुरसरि कर्मनासा। म डिग्री मारव महिदेव गवासा।।
व्याख्या : माया, ब्रह्म, जीव, परमात्मा, लक्षण और अलक्षण, भिखारी, राजा, काशी, मगध, गंगा, क्रमनासा, मरुस्थल, मालवा ये सब महिदेव अर्थात् शरीर के भाव हैं।
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।
व्याख्या : स्वर्ग, नरक, अनुराग व वैराग्य सबके गुण दोषों का विभाग शास्त्रों व पुराणों ने किया है। अर्थात् ये सब भावों के प्रतीक हैं, जिनको नाना प्रतीकों का सहारा लेकर शास्त्रों व पुराणों में समझाया गया है।
दो0 जड़ चेतन गुणदोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।6।।
व्याख्या : इस संसार को जड़-चेतन सहित परमात्मा ने गुण व दोषों से युक्त किया है। इसलिए संत जन अर्थात् जिस साधक के संशयों का अन्त हो गया है, वो हंस अर्थात् ह कार व सकार की क्रिया द्वारा भावों के भव सागर में से दूध रूपी सद्गुणों को ग्रहण करते रहते हैं और माया रूपी पानी को विकार मानकर त्याग देते हैं। यहाँ पर साधना का सूत्र है। जब साधक की श्वास हंस अर्थात् हकार व सकार के साथ लय हो जाती है, तो माया रूपी भावों का पानी स्वत: अलग हो जाता है। इसी साधना पद्धति को हठ योग भी कहा जाता है।
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।।
काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं।।
व्याख्या : जब हकार सकार की श्वास विधि से विवेक पैदा हो जाता है, तब मन दोषों का त्याग करके सद्गुणों को ग्रहण करने लग जाता है। काल के स्वभाव से कर्म जबरदस्ती हो जाता है। इसलिए अच्छे लोग भी प्रकृति के प्रभाव में आकर अच्छाई से भटक जाते हैं।
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।।
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।।
व्याख्या : जो साधक माया का हरण करके सद्गुणों में बरतने लग जाते हैं, उन्हें दुखों का समूह भी विमल यश देने लगता है। मूढ़ भी सुसंगत प्राप्त करके अच्छा ही करने लग जाता है, परन्तु उसके मन की मलिनता नहीं मिट पाती है।
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।।
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
व्याख्या : जो अच्छा भेष धारण करके जगत को ठगते हैं, वे लोग भी भेष की महिमा के कारण संसार में पूजनीय होते हैं परन्तु अन्तकाल में उनकी पोल खुल जाती है। जैसे कालनेमि, रावण व राहू की पोल खुल गयी थी।
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।।
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।।
व्याख्या : जो सच्चे साधक होते हैं, वे चाहे जैसे कुभेष धारण कर लें, उनका संसार में सम्मान होता ही है। जैसे जामवंत और हनुमान का होता है। जामवंत का गूढ़ रहस्य स्थिरप्रज्ञ साधक के प्रतीक से है और हनुमान अहंकार के मान का हनन करने की अवस्था का प्रतीक है, इसलिए जो स्थिरप्रज्ञ व अहंकार का हनन करने वाला होता है, उसका तो सदैव सम्मान होता ही है। सुसंगत से लाभ और कुसंगत से हानि होती है, इसे वेद, पुराण व संसार सभी जानते हैं।
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा।।
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं।।
व्याख्या : जैसे धूल पवन की संगत में आने पर आकाश में चढ़ जाती है और जल के साथ मिल जाने पर कीचड़ बन जाती है। वैसे ही साधु के घर का तोता राम-राम सुमिरण करता है और दुष्ट के घर का तोता गाली देता है। ये सब संग-कुसंग का ही प्रभाव होता है।
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।।
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता।।
व्याख्या : धुआँ कुसंगति में पड़कर कालिख बन जाती है और सुसंगत में पड़ने पर वही धुआँ स्याही बनकर पुराण लिखने के काम आती है। वैसे ही पानी अग्नि के सम्पर्क में आकर भाप बनकर नष्ट हो जाता है और वही फिर बादल बनकर वर्षा करके जीवन देने वाला बन जाता है।
दो0 ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।।7।।क।।
व्याख्या : ग्रह, औषधि, जल, पवन व बस्त्र कुयोग व सुयोग के अनुसार अपना प्रभाव डालते हैं। इसलिए लक्षणों वाले अच्छे लोग कुबस्तु व सुवस्तु के मर्म को जान लेते हैं। अर्थात् कोई वस्तु अच्छी-बुरी नहीं होती है बल्कि उसकी संगत पर व उसके उपयोग पर निर्भर करता है।
दो0 सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।।7।।ख।।
व्याख्या : महीने में एक कृष्ण पक्ष और एक शुक्ल पक्ष का पखवाड़ा होता है। इन दोनों का नाम क्रिया (विधि) के आधार पर पड़ गया है क्योंकि एक उजियाली और एक अन्धकार वाली रात देता है। इनमें एक को चन्द्रमा को बढ़ाने वाला और दूसरे को चन्द्रमा को घटानेवाला जानकर संसार में यश और अपयश दिया जाता है।
दो0 जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।7ग।।
व्याख्या : इसलिए मैं समस्त जड़ व चेतन जीवों को आत्मामय (प्राणमय) जानकर सबके चरणों में दोनों हाथ जोड़कर बन्दना करता हूँ।
दो0 देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
बंदउँ किन्नर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।। 7घ।।
व्याख्या : मैं समस्त देव, दानव, नर, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर व निशाचरों की बन्दना करता हूँ। ये सब मुझ पर कृपा करें। यहाँ साधक सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्व को जानकर सभी के प्रति नमन करता है। सबमें आत्मा तो एक ही है और जो भेद दिखायी दे रहा है, वो तो भावों का है।
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
व्याख्या : संसार में जितने भी चौरासी लाख योनि के जल, थल व नभ में रहनेवाले जीव हैं, उन सबको सीयराममय (अर्थात् सबमें एक ही प्राण शक्ति व आत्मतत्व को जानकर) जानकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। चौरासी लाख योनि का मतलब चौरासी प्रकार के प्राण के मर्म को जान लेने से होता है। लक्ष्य चौरासी यानी प्राण के चौरासी प्रकारों को जानने से है।
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।।
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं।।
व्याख्या : मुझे परमात्मा का दास मानकर सभी कपट छोड़कर मुझपर कृपा कीजिए। मुझे मेरी स्वयं की बुद्धि का भरोसा नहीं है, इसलिए सबसे मैं प्रार्थना कर रहा हूँ।
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।।
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।।
व्याख्या : मैं रघुपति (अर्थात आत्मा क्योंकि रघु जीव होता है और जब जीव माया से मुक्त हो जाता है तो वह मालिक हो जाता है। उसी अवस्था को परमात्मा या रघुपति के नाम से समझाया जाता है) के गुणों के चरित्र को कहना चाहता हूँ परन्तु मेरी बुद्धि तो थोड़ी है और परमात्मा के चरित्र अगाध हैं। मुझे परमात्मा के एक अंग के भी चरित्र नहीं सूझ रहे हैं, क्योंकि मेरा मन व बुद्धि तो भिखारी जैसा है परन्तु चाहत राजा के समान है।
मति अति नीच ऊँचि रूचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइन छाछी।।
छमिहहिं सज्जन मोरि ढ़िठाई । सुनिहहिं बाल बचन मन लाई।।
व्याख्या : मेरी बुद्धि तो नीची है परन्तु मेरी चाहत बहुत बड़ी है। मैं अमृत चाहता हूँ परन्तु संसार में मुझे छाछ भी नहीं मिल रही है। इसलिए सज्जन लोग मेरी मूर्खता को क्षमा करेंगे और मेरे वचनों को बालक के समान मानकर सुनेंगे।
जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अ डिग्री माता।।
हँसहहिं कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषन धारी।।
व्याख्या : जैसे जब बालक तोतरा बोलता है, तो माता-पिता उसकी बात सुनकर प्रसन्न होते हैं। परन्तु जो दुष्ट लोग होते हैं, वे भाषागत् दोषों का विचारकर हँसते हैं। ऐसे लोग दूसरों की बुराई रूपी भूषण ही धारण किए रहते हैं।
निज कबित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।
व्याख्या : स्वयं की कविता चाहे सरस हो या रस रहित हो किसको अच्छी नहीं लगती है अर्थात् स्वयं की कविता सबको अच्छी लगती है परन्तु जो दूसरों की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं, वैसे लोग संसार में बहुत ज्यादा नहीं होते हैं।
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई।।
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।
व्याख्या : संसार में ज्यादातर लोग तालाब और नदी की तरह होते हैं, जो स्वयं के बाढ़ से ही बढ़ते हैं परन्तु समुद्र के समान धैर्यवान सज्जन कम ही होते हैं, जो पूरा चन्द्रमा देखकर बढ़ने लगते हैं।
दो0 भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास।।8।।
व्याख्या : मेरा भाग्य छोटा है और मेरी इच्छा बड़ी है परन्तु मुझे एक परमात्मा का विश्वास है। इसलिए सज्जन लोग तो मेरी कथा से सुखी होंगे और मूर्ख लोग हँसी उड़ायेंगे।
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा ।।
हंसहिं बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही।।
व्याख्या : मूर्खों के हँसने से मेरा हित ही होगा क्योंकि कौआ तो हमेशा कोयल को कठोर कण्ठ ही कहते हैं। हंस पर बगुले और चातक पर मेढ़क तो सदा ही हँसते रहते हैं, उसी प्रकार विमल वाणी पर मलिन मूढ़ हँसते हैं।
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू।।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसे नहिं खोरी।।
व्याख्या : जिनका कविता में रस भी नहीं है और न ही राम के चरणों में प्रीत ही है और उनके लिए तो हास्य रस ही सुख देने वाला होता है। मेरी भाषा भी भद्दी है और बुद्धि भी भोली है। इसलिए मेरी कविता तो हँसने योग्य ही हैं। अत: हँसने वालों का खोट नहीं है।
प्रभु पर प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी।।
हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की।।
व्याख्या : जिनकी परमात्मा के चरणों में प्रीत नहीं है और न ही उन्हें समझ हैं, उन्हें तो यह कथा सुनने पर फीकी ही लगेगी। परन्तु जिनकी माया का हरण हो गया है और बुद्धि भी कुतर्कों से मुक्त हो गयी है, उन्हें यह परमात्मा की कथा मधुर लगेगी।
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।।
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब विद्या हीनू।।
व्याख्या : जिन्होंने राम की भक्ति को हृदय में धारण कर लिया है। वे लोग इस कथा को सुनकर प्रशंसा करेंगे। मैं न तो कवि हूँ और न ही बोलने में चतुर हूँ तथा मैं तो सब प्रकार की कलाओं और विद्या से भी हीन हूँ।
आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना ।।
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा।।
व्याख्या : अक्षरों के अर्थ, अलंकार व छंद प्रबन्ध के अनेक नियम होते हैं तथा भावों के रस के भी नाना प्रकार होते हैं। कविता के बहुत से गुण और दोष होते हैं।
कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें।।
व्याख्या : मुझमें कविता का एक भी गुण नहीं है। यह मैं कोरे कागज पर लिखकर सत्य कहता हूँ।
दो0 भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह के बिमल बिबेक।।9।।
व्याख्या : मेरी भाषा सब गुणों से रहित है परन्तु इसमें परमात्मा का वर्णन रूपी विश्व विदित एक गुण है। इसलिए जो सुमति वाले हैं, वे निर्मल विवेक करके इसे सुनेंगे।
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।।
मंगल भवन अमंगलहारी । उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।
व्याख्या : इस कथा में परमात्मा के उदार नाम का वर्णन है, जो अति पवित्र है और पुराण व वेदों का सार है। जो मंगल का घर व अमंगल का नाश करने वाला है। और जिस नाम को पार्वती सहित शंकरजी जपते हैं। पुरारी का अर्थ है पुर का अरि अर्थात् देह का दुश्मन अर्थात् जो साधक देह भाव से ऊपर उठ जाता है, वो पुरारी हो जाता है। उमा श्रद्धा का भाव है। अत: परमात्मा के पवित्र नाम का जप पुरारी (साधक) उमा अर्थात् श्रद्धा सहित करता रहता है।
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।।
बिधु बदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना वर नारी।।
व्याख्या : कोई भी अच्छे कवि द्वारा लिखि कविता बिना राम नाम के उसी प्रकार शोभा नहीं देती है, जैसे चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख वाली नारी सब प्रकार से सजी हो परन्तु बिना कपड़ों के वह शोभा नहीं देती है।
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।।
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुन ग्राही।।
व्याख्या : सब गुणों से रहित कुकवि द्वारा रचित कविता में अगर परमात्मा का नाम होता है, तो सभी विद्वान उसे आदरपूर्वक सुनते व कहते हैं और संत जन भ्रमर की तरह रस का पान करते हैं।
जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं।।
सोइ भरोस मोरेंमन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा।।
व्याख्या : हालाँकि मेरी कविता में कविता का एक भी रस नहीं है, परन्तु इसमें परमात्मा के नाम का प्रताप प्रकट है। उसी से मेरे मन को कविता लिखने का भरोसा हुआ है क्योंकि सुसंगत पाकर किसे बड़प्पन नहीं मिला है।
धूमउ तजइ सहज करूआई। अग डिग्री प्रसंग सुगंध बसाई।।
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी।।
व्याख्या : धुआँ भी धूप के साथ होने पर अपना कड़वापन छोड़ देती है और सुगन्धित हो जाती है। इसलिए भद्दी भाषा में वर्णन होने पर भी परमात्मा की कथा के कारण ये संसार में मंगल करने वाली है।
छ0 मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।।
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।
व्याख्या : रघु अर्थात् जीव और नाथ का मतलब स्वामी अर्थात् जीव के स्वामी परमात्मा की कथा मंगल को करने वाली और देह बुद्धि के विकारों को दूर करने वाली होती है। मेरी कविता रूपी नदी टेढ़ी होते हुए भी परमात्मा रूपी सागर में मिलने वाली पवित्र गंगा के समान है। परमात्मा के यश का वर्णन करने से सज्जन लोगों को अच्छी लगने वाली है। जैसे श्मशान की राख साधक के शरीर पर लगा लेने से परमात्मा के स्मरण के कारण वह पवित्र हो जाती है। वैसे ही मेरी कविता परमात्मा को स्मरण कराने वाली होने के कारण पवित्र हो गयी है।
दो0 प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।
दा डिग्री बिचा डिग्री कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग।।10क।।
व्याख्या : राम के नाम के संग होने से मेरी कथा सबको प्रिय लगने वाली है क्योंकि चन्दन की लकड़ी मलय गिरि के सम्पर्क में आने पर सुगन्धित हो जाती है, तब कोई भी चन्दन में लकड़ी के गुण नहीं देखता है। अत: उसी प्रकार मेरी कविता परमात्मा के नाम के संग से पवित्र है।
दो0 स्याम सुरभि पथ बिसद अति गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।।10ख।।
व्याख्या : जैसे काली गाय के दूध को लोग गुणवान जानकर पीते हैं। उसी प्रकार गाँव की भाषा में लिखी हुई मेरी कविता के सियराम रूपी यश को लोग सुनेंगे व गावेंगे। अर्थात् लोग दूध ग्रहण करते हुए जैसे काली गाय के रंग का विचार नहीं करते हैं। वैसे ही परमात्मा के यशगान करते हुए मेरी गाँव की भाषा का विचार नहीं करेंगे।
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।
नृप किरीट तरूनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।।
व्याख्या : जैसे मणि, मानिक और मोती सर्प, पर्वत व हाथी के सिर पर उतनी शोभा नहीं देते हैं। जैसे राजा के मुकुट और सुन्दर युवती के शरीर पर शोभा देते हैं अर्थात् राजा के मुकुट और युवती के सुन्दर शरीर पर ये ज्यादा शोभा देते हैं।
तैसहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।।
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।।
व्याख्या : वैसे ही विद्वान कहते हैं कि सुकवि की कविता पैदा कहीं होती है और दूसरी कहीं किसी जगह पर प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है। भक्ति के बल से भावों की क्रिया अलग हो जाती है और उस समय परमात्मा का स्मरण करने मात्र से सुरति लग जाती है। उसी को सारदा का दौड़े आना कहा जाता है।
राम चरित बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।
कबि कोबिद असि हृदय बिचारी। गावहिं हरि जस कलिमल हारी।।
व्याख्या : जब सुरति परमात्मा में लग जाती है तो बिना परमात्मा के चरित्र का बखान किए बिना श्रम जाता नहीं है अर्थात् शान्ति नहीं मिल पाती है। इसलिए कवि व पण्डित जन हृदय में ऐसा विचार करके देह विकारों का हरण करने वाले परमात्मा के यशोगुणों का बखान करते हैं।
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।।
हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।।
व्याख्या : संसार के लोगों का बखान करने पर तो वाणी सिर धुन कर पश्चाताप करने लगती है। एक बार परमात्मा के चरणों में अगर सुरता लग जाए तो साधक की वाणी परमात्मा के यशोगान किये बिना रह नहीं पाती है और उस अवस्था में उसे सांसारिक बातें व्यर्थ की लगने लगती हैं। सज्जन लोग कहते हैं कि जिस साधक की सुरता परमात्मा के चरणों में लग जाती है, उसका हृदय समुद्र के समान और बुद्धि सीप के समान हो जाती है तथा सुरति (सारदा) स्वाति नक्षत्र की तरह हो जाती है।
जौ बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।
व्याख्या : उस अवस्था में अगर श्रेष्ठ विचारों रूपी वर्षा होती है, तो कविता के सुन्दर मोती पैदा होते हैं।
दो0 जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।
व्याख्या : जब युक्ति लगा कर परमात्मा के चरित्र रूपी धागे में इन मोतियों को पिरोया जाता है और जब सज्जन लोग इसे पहनते हैं, तो अनुराग रूपी शोभा हृदय में पैदा हो जाती है।
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलिमल भाँड़े।।
व्याख्या : जो लोग कलियुग में पैदा हुए हों अर्थात् देहबुद्धि में रमण करने वाले हों और जिनके कर्म बगुले की तरह धोखा देना हो और हंस का भेष धारण किये हों तथा वेद मार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलने वाले व कपटी तथा कलियुग के भांड़े हों।
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।।
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी।।
व्याख्या : जो परमात्मा के भक्त बनकर लगों को ठगने वाले व काम, क्रोध व धन के गुलाम होते हैं, और जो धींग मारने वाले व धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले व कपट के धंधों में लगे हुए हैं। ऐसे पाखण्डियों में सबसे पहले मेरी गिनती होती है।
जौं अपने अवगुण सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहीं लहऊँ।।
ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।।
व्याख्या : अगर मैं अपने अवगुणों का वर्णन करने लगूँगा, तो कथा बहुत बढ़ जायेगी फिर भी अन्त नहीं होगा। इसलिए मैंने संक्षेप में ही मेरे अवगुण बताये हैं। समझदार लोग इसी से समझ जायेंगे।
समुझि बिबिध बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।।
व्याख्या : सब प्रकार से मेरी प्रार्थना सुनकर कोई मेरी कथा को दोष नहीं देगा। इतने पर भी अगर कोई कथा पर शंका करेगा, तो वह मुझसे भी अधिक बुद्धिहीन होगा।
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ।।
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।।
व्याख्या : मैं न तो कवि ही हूँ और न ही चतुर हूँ। मैं तो मेरी बुद्धि के अनुसार परमात्मा राम के गुण गा रहा हूँ। कहाँ तो परमात्मा के अपार चरित हैं और कहाँ संसार में लगी हुई मेरी बुद्धि है।
जेहिं मारूत गिरि मे डिग्री उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।।
समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई।।
व्याख्या : जो हवा मे डिग्री पर्वत को भी उड़ा देती है, उसके लिए रूई को उड़ाना कोई बात ही नहीं होती। इसी प्रकार परमात्मा राम की अनन्त प्रभुता को समझकर मैं डरे हुए मन से ही कथा कह रहा हूँ।
दो0 सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।
व्याख्या : सारद अर्थात् सुरता द्वारा जो शेष बचता है और साधक की अवस्था जिस क्रिया (विधि) द्वारा महा ऐश्वर्य (महेश) की हो जाती है और जिसे वेद, शास्त्र व पुराणों ने भी ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं कहकर निरंतर गुण-गान किया है। अर्थात् परमात्मा की सत्ता का पूरी तरह वर्णन करना असम्भव है।
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।।
व्याख्या : सभी लोग परमपिता की प्रभुता को जानते हैं परन्तु जिसने भी परमात्मा की अनन्त सत्ता को जाना है, वो कहे बिना नहीं रह पाया है। अर्थात् परमात्मा की सत्ता का वर्णन करना असम्भव कार्य है फिर भी साधक जन परमात्मा के गुणों का बखान किए बिना नहीं रह पाते हैं। वेदों ने भी इसलिए नेति नेति कहा है और भजन के प्रभाव से नाना प्रकार से परमात्मा के गुणों का वर्णन किया है।
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।।
व्याख्या : परमपिता परमेश्वर तो एक, अखण्ड, नाम व रूप से परे, अजन्मा व सत्चित आनन्द के घर हैं। समस्त विश्व के रूप में ही परमात्मा व्यापक हैं और नाना शरीर धारण करके विश्व के रूप में ही नाना चरित करते रहते हैं। अर्थात् समस्त प्राणी ही परमात्मा के चरित का भाग हैं।
सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी।।
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करूना करिकीन्ह न कोहू।।
व्याख्या : वो परमात्मा भक्तों के हित करने के लिए परम कृपाल हैं और प्राण शक्ति में अनुराग के रूप में रहते हैं। जिन साधकों पर परमात्मा की ममता और कृपा होती है, उन पर करूणा करके कभी क्रोध नहीं करते हैं।
गइ बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू।।
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी।।
व्याख्या : परमात्मा सरल व बलवान हैं, जो हमेशा गरीबों का पालन करते हैं अर्थात् जो लोग काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह व मत्सरादि के भावों से रहित होते हैं, उनको परमात्मा सदैव सम्मान दिलाते हैं। इसलिए विद्वान लोग परमात्मा को माया का हरण (हरि) करने वाला जानकर, यश का गुणगान करके अपनी वाणी को पवित्र व सुफल बनाते हैं।
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा।।
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।
व्याख्या : इसलिए मैं भी परमात्मा की कृपा के बल पर ही परमात्मा की गुण गाथा को परमात्मा के चरणों में ही सीस झुकाकर कहता हूँ। मुनियों ने परमात्मा की पहले जो कीर्ति का बखान किया है, उसी रास्ते पर चलने में मुझे सुगमता रहेगी।
दो0 अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।13।।
व्याख्या : विशाल नदी पर अगर राजा पुल बनवा देता है, तो छोटी-छोटी चिंटियाँ भी बिना परिश्रम के ही नदी को पार कर जाती हैं, वैसे ही मुनियों के बताए रास्ते पर चलने से मुझे परमात्मा के विशाल गुण सागर को पार करना आसान हो जायेगा।
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।।
व्याख्या : इस प्रकार मैं मेरे मन को बल दिखाकर परमात्मा की अपार कथा को कहने जा रहा हूँ। व्यास आदि कवियों ने भी परमात्मा के सुयश को आदरपूर्वक गाया है।
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।।
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुनग्रामा।।
व्याख्या : मैं उन सभी विद्वान कवियों के चरण कमलों में नमन करता हूँ। वो मेरे समस्त मनोरथों को पूर्ण करेगें। मैं कलियुग के कवियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने परमात्मा के गुणों का गान किया है। कलि के कवियों से वास्तविक मतलब तो यह है कि जिन कवियों ने कलि अर्थात् परमात्मा को देहधारी मानकर सगुण यशों का गान किया है।
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।।
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगे। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें।।
व्याख्या : जो देशी भाषा के कवि हुए हैं और जिन्होंने परमात्मा के चरित का बखान किया है तथा जो कवि हुए हैं और जो आगे होंगे, उन सभी को कपट छोड़कर मैं प्रणाम करता हूँ।
होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।।
जो प्रबंध बुध नहीं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।।
व्याख्या : सभी मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे वरदान दीजिए कि मेरी कविता साधु समाज में सम्मान को प्राप्त हो। क्योंकि जिस कविता का विद्वान सम्मान नहीं करते हैं, उस कविता को लिखने में कवि व्यर्थ का परिश्रम करते हैं।
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
राम सुकीरित भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अंदेसा।।
व्याख्या : कीर्ति, कविता व सम्पत्ति वही अच्छी होती है, जो गंगा के समान दूसरों का हित करने वाली होती है। मुझे यही दुविधा है कि परमात्मा का यश तो कीर्तिवान है परन्तु मेरी भाषा भद्दी है।
तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।
व्याख्या : परन्तु आपकी कृपा से ही यह सब मुझे सुलभ है क्योंकि रेशम की सिलाई तो टाट पर भी अच्छी लगती है।
दो0 सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14क।।
व्याख्या : सरल कविता में परमात्मा के विमल यश का सज्जन लोग आदर करते हैं और दुश्मन भी सहज में ही बैर-भाव को भुलाकर गुणगान करते हैं।
दो0 सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि - पुनि करउँ निहोर।।14ख।।
व्याख्या : परमात्मा के चरित का वर्णन बिना निर्मल बुद्धि के नहीं हो सकता है और मुझमें बुद्धि का बहुत कम बल है। अत: मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मैं परमात्मा के यश का वर्णन कर सकूँ।
दो0 कबि कोबिद रघबुर चरित मानस मंजु मराल।
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल।।14ग।।
व्याख्या : कवि और पण्डित जन परमात्मा के चरित रूपी मानसरोवर के सुन्दर हंस हैं। इसलिए मुझ बालक की प्रार्थना को सुनकर व रूचि को देखकर मुझ पर कृपा कीजिए।
सो0 बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14घ।।
व्याख्या : मैं उन मुनि के चरण कमलों की वन्दना करता हूँ जिन्होंने रामायण का निर्माण किया। जिसके अक्षर सुन्दर, कोमल, दोष रहित व कुछ दोष युक्त हैं।
सो0 बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेर बरनत रघुबर बिसद जसु।।14ङ।।
व्याख्या : मैं चारों वेदों की वन्दना करता हूँ, जो भावों के भव सागर से पार कराने वाले हैं और जिन्हें परमात्मा के यश का गान करने में सपने में भी दु:ख नहीं होता है।
सो0 बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारूनी।।14च।।
व्याख्या : मैं उस विधि (क्रिया) की भी वन्दना करता हूँ जिससे भावों का सागर पैदा होता है और उसी भावों के मंथन से संत अर्थात् संशयों का अन्त होता है और अमृत के समान भक्ति रस निकलता है। ससि का मतलब है विषय वासनाओं का शीतल हो जाना। अत: उसे ही कवि ससि धेनु (शीतल इच्छाएँ) कहते हैं। भावों से ही काम, क्रोध, मोह व लोभादि रूपी विष पैदा होता है और भावों से ही भावों रूपी मद (बारूनी) पैदा होता है।
दो0 बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14छ।।
व्याख्या : मैं विशुद्ध प्रकाश वाले विद्वान व बुधजनों की सत्ता की वन्दना करता हूँ कि प्रसन्न होकर मेरे सुन्दर मनोरथ (परमात्मा के चरित लिखने की इच्छा) को पूरा करें।
पुनि बंदउँ सारद सुर सरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अविबेका।।
व्याख्या : मैं पुन: सारद अर्थात सुरता को नमन करता हूँ जो स्वर रूपी नदी से पैदा होती है। ये दोनों चन्द्र व सूर्य स्वर पवित्र होने पर मन का हरण (मनोहर) करने वाले हो जाते हैं। इन स्वरों का शुद्धिकरण (मज्जन) हो जाने पर ये चिन्ताओं (पाप) का हरण कर लेते हैं अर्थात् चिन्ताओं से मुक्त कर देते हैं। कहने और सुनने में एक ही बात है कि स्वरों के शुद्धिकरण से अविवेक दूर हो जाता है।
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीन बंधु दिन दानी।।
सेवक स्वामि सखा सिय पी के । हित निरूपधि सब विधि तुलसी के।।
व्याख्या : विश्वास एवं श्रद्धा रूपी मेरे गुरु, पिता व माता को दीनों का बंधु व महादानी (ज्ञान का दान करनेवाले) जानकर मैं प्रणाम करता हूँ। श्रद्धा एवं विश्वास प्राण शक्ति रूपी सीता के सेवक, स्वामी एवं सखा होते हैं। अर्थात् श्रद्धा व विश्वास के भाव प्राण से ही पैदा होते हैं तथा प्राण की गति भी श्रद्धा व विश्वास के भावों पर निर्भर करती है। इसलिए श्रद्धा व विश्वास के प्राण प्राण की शक्ति रूपी सीता के स्वामी व सखा होते हैं। साधक सब प्रकार से उनसे भलाई की अपेक्षा करते हैं।
कलि बिलोकि जग हितहर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।।
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।।
व्याख्या : साधक जब साधना में गहराई से उतर जाता है, तब वह कलि अर्थात् शरीर को देख कर (समझ कर) जगत की माया को हरने के लिए गिरिजा अर्थात् शरीर के चक्रों (पर्वतों) से पैदा होने वाली प्राण शक्ति को समझकर साबर मंत्रों के समूह की सृजना करता है। इन्हें बीज मंत्र भी कहा जाता है, जिसके उच्चारण से प्राण की गति अनुकूल होकर जीव को सुख व शान्ति देने लगती है। इन साबर मंत्रों का कोई अर्थ नहीं होता है क्योंकि इनकी ध्वनि ही प्रभाव डालने वाली होती है। अत: ये साबर मंत्र महाऐश्वर्य को प्राप्त साधक के प्रताप से प्रभावी होते हैं। इन मंत्रों का आधार विश्वास (शंकर) ही होता है। इसलिए शंकर (विश्वास) द्वारा सावर मंत्रों की सृजना की बात कही है।
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।।
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनऊँ रामचरित चित चाऊ।।
व्याख्या : अत: हे उमेस! (अर्थात् मेरे (उरअईश) हृदय में निवास करने वाले) आप मेरे अनुकूल होकर मेरी कथा को प्रसन्नता व मंगल का मूल कर दीजिए। शिवा और शिव का तात्पर्य कुण्डलिनि शक्ति से ही है। अत: साधक जब शिव और शिवा का विस्तार करके एक कर लेता है, तब उसे परमात्मा के चरित का अपने चित में आभास होने लग जाता है। उसी अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है कि शिव और शिवा का प्रसार करके मैं चित की चेतना के अनुसार राम के चरित का वर्णन करता हूँ। शव धारहिं सो शिव कहाई, अर्थात् शरीर को धारण करने वाली शक्ति के कारण परमात्मा का नाम शिव है और कुण्डलिनि शक्ति द्वारा शरीर का व्यवहार होता है, इसलिए वह शिवा है। इसलिए ये जगत शिव और शिवा शक्ति का खेल है।
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।।
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।।
व्याख्या : मेरी कविता परमात्मा की कृपा से शोभित होगी क्योंकि चन्द्र स्वर से उत्पन्न भाव (ससि समाज) मन में मिलकर मन भी सुष्मना (सुराती) में प्रवेश कर जायेगा। इस कथा को जो अच्छी तरह समझकर प्रेम सहित कहते और सुनते हैं।
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलिमल रहित सुमंगल भागी।।
व्याख्या : उनका परमात्मा के चरणों में अनुराग पैदा हो जायेगा और वे देह विकारों (कलिमल) से मुक्त होकर सुमंगल प्राप्त कर लेंगे।
दो0 सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौ हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।15।।
व्याख्या : जो सपने में भी अगर शिव और पार्वती अर्थात् विश्वास और श्रद्धा मेरे मन में है, तो मेरी भाषा में लिखी हुई वाणी सिद्ध हो।
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।।
व्याख्या : साधक का शरीर ही अवधपुरी होता है क्योंकि इसकी निश्चित अवधि होती है। इसलिए यह अवध कहलाता है और दूसरा कारण है इस शरीर में कभी नहीं मरने वाला आत्मा रहता है इसलिए भी यह अबध्य अर्थात् नहीं मरने वाला अवध कहलाता है। देहबुद्धि से विचार करने पर तो शरीर की निश्चित अवधि है, इसलिए यह अवध है और आध्यात्मिक दृष्टि से देखने पर इस शरीर में अबध्य आत्मा रहती है, इसलिए यह अवध है। यह अवधपुरी अर्थात् शरीर बहुत पवित्र होता है, जिसमें स्वरों के माध्यम से विकारों का नाश किया जा सकता है, उसे ही सरजू सरि कहा गया है। इस शरीर में अर्थात् पुर में बहुत से नर-नारियाँ हैं अर्थात् नड़ और नाड़ी का इस शरीर में जाल है, जिन सभी नर-नारियों में प्राण शक्ति का संचार होता है और प्राण आत्मा से ही पैदा है, इसलिए इसे ही परमात्मा की नर-नारियों पर कृपा कहा गया है।
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।।
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची।।
व्याख्या : सिय निंदक अर्थात् जिनकी प्राणशक्ति (कुण्डलिनि) सुप्त अवस्था में रहती है। उनकी शान्ति को चिन्ता रूपी पाप नाश कर देता है और सुख-दु:ख का आभास होता रहता है। इसलिए मैं कौशलपूर्वक पूर्व दिशा में उदित (अर्थात् सुष्मना नाड़ी में बहने वाली प्राण) प्राण शक्ति की वन्दना करता हूँ, जिसकी कीर्ति समस्त संसार में फैली रहती है।
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।।
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।।
व्याख्या : प्राण शक्ति के पूर्व दिशा में उदित होने पर अर्थात् प्राण जब साधना द्वारा उर्ध्वगामी होकर सुष्मना में प्रवाहित हो जाता है, तब जीवात्मा (रघुपति) चन्द्रमा की तरह उदित हो उठता है अर्थात् जीवात्मा विकारों की जलन से चन्द्रमा की सी शीतलता प्राप्त कर लेता है। वह अवस्था सुखद होती है और मूढ़ता रूपी कमल पर तुसारूपात जैसी होती है अर्थात् सद्गुणों का उदय और विकारों का नाश हो जाता है। उस अवस्था में दसरथ अर्थात् दसों इन्द्रियों सहित ये शरीर और सत, रज व तम रूपी तीनों रानियों सहित साधक सुकृत करने वाला व सुमंगल की मूर्ति बन जाता है। अर्थात् गुण गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है।
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी।।
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता।।
व्याख्या : मैं कर्म, मन व वाणी से परमात्मा को प्रणाम करता हूँ कि आप मुझे अपना पुत्र या सेवक मानकर मुझ पर कृपा कीजिए। इस शरीर (अवधि) की महिमा अपरम्पार है और परमात्मा ही इसके माता-पिता हैं। भावों के द्वारा शरीर की रचना करके क्रिया कर्ता जीवात्मा (विधाता) बड़ा हो जाता है।
सो0 बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीन दयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।16।।
व्याख्या : मैं शरीर के राजा चित की वन्दना करता हूँ, जिसके सत्य व प्रेम रूपी पैर हैं। वह चित जब शरीर को छोड़ता है, तो तिनके के समान शरीर का त्याग कर देता है।
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।।
व्याख्या : मैं परिजनों सहित बिदेह की वन्दना करता हूँ। विदेह का तात्पर्य यह है कि साधक जब देहबुद्दि से मुक्त होकर गुणों को गुणों में बरतने देता है, तब वह अवस्था विदेह की होती है। उस अवस्था में साधक के समस्त भाव (परिजन) परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं और परमात्मा के चरणों में गूढ़ प्रेम बना रहता है। जब साधक गुणों को गुणों में बरतने देता है, तब वह भजन करता दिखता नहीं है परन्तु उसकी भावना सदैव परमात्मा में लीन रहती है। उसे ही राम के चरणों में गूढ़ स्नेह बताया जाता है। विदेह स्तर के साधक के लिए योग व भोग बराबर होते हैं परन्तु साधक जब अपने अन्त:करण में स्थित परमात्मा को देख लेता है, तो उसकी विदेह अवस्था प्रकट हो जाती है।
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।।
व्याख्या : मैं सबसे पहले भरत (अर्थात् जो परमात्मा के भावों में रत है, वही भाव रत भरत है) के चरणों की वन्दना करता हूँ, जिसके नियम और व्रत का वर्णन नहीं किया जा सकता है। भरत भाव सदैव परमात्मा के चरण कमलों में मन लगाकर रहता है, जो भ्रमर की तरह चरण कमलों को नहीं छोड़ता है।
बंदउँ लछिमन पद जल जाता। सीतल सुभगभगत सुखदाता।।
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका।।
व्याख्या : मैं लक्ष्मण (अर्थात् वह भाव जो लक्षणों को पहचानने की क्षमता से युक्त होता है। भाव लखहिं सो लखन कहाई अर्थात् जो सूक्ष्मता से भावों की गति को पहचान लेता है, वही भाव लक्ष्मण कहलाता है।) के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो भक्तों को शीतलता व सुख देने वाला है। यह विज्ञान परक सत्य है कि जब साधक को भावों के लक्षण पता चल जाते हैं, तो वह तुरन्त भावों के जाल से मुक्त हो जाता है और उसके मन को शान्ति मिल जाती है, उसे ही शीतलता देने वाला कहा जाता है। लक्ष्मण अर्थात् भावों के लक्षणों को जानकर ही परमात्मा के यश का वर्णन किया जा सकता है। इसलिए लक्ष्मण परमात्मा के यश रूपी पताका का दण्ड कहा जाता है।
सेष सहस्रसीस जग कारण। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपा सिंधु सौमित्र गुनाकर।।
व्याख्या : भावों से भाव फिर भावों से हजारों भाव पैदा होते रहते हैं। परन्तु सभी भाव लक्षणों पर टिके रहते हैं और भावों से ही सृष्टि का सृजन, पालन व संहार होता है। भावों में जो शेष बचता है, वो लक्षण ही होते हैं। इसलिए इस पृथ्वी को शेष नाग पर धारण करने वाला लक्ष्मण को बताया गया है। जब लक्षण परमात्मा की भक्ति से युक्त हो जाते हैं, तो शरीर में व्याप्त भय के भाव दूर हो जाते हैं। उसे ही भूमि भय अर्थात् देह का भय टारने वाले लक्षणों का अवतरण कहा जाता है। इसलिए सौमित्र व गुनाकर सदा मेरे अनुकूल रहो। सौमित्र का तात्पर्य है सौ भावों में मैत्रीपूर्ण भाव रखना। जीव की सौ वृत्तियों से सौभाव पैदा होते हैं। लक्षणों को लखने (जानने) का भाव सभी सौ भावों में समान रमन करता है, इसलिए लक्ष्मण को सौमित्र कहा जाता है। सौ भावों के साथ लक्षणों के मिल जाने पर गुणों की सत, रज व तम रूपी तीन धारा बनती हैं। इसलिए लक्ष्मण को गुणों को आकार देने वाला गुनाकर भी कहा जाता है।
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।।
महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।।
व्याख्या : रिपुसूदन (अर्थात् शत्रुओं का दमन करने वाला भाव) सदैव भरत अर्थात् परमात्मा के भावों में रत रहने वाले भाव का ही अनुसरण करता है। उस अवस्था में ही काम, क्रोध, मद, लोभ व मत्सरादि रूपी शत्रुओं का दमन सम्भव हो पाता है। इसलिए रिपुसूदन को वीर और सुशीलता वाला कहा जाता है क्योंकि जिस भाव से काम व क्रोधादि भावों का दमन होता है, वहाँ तो शीलता अपने आप आ जाती है। महावीर हनुमान की वन्दना करता हूँ, जिसके यश का स्वयं आत्मा रूपी राम बखान करते हैं। हनुमान का तात्पर्य है, जो भाव अहंकार के मान का हनन कर देता है, वही भाव हनुमान कहलाता है। अहंकार से ही द्वैत भाव पैदा होता है और जब अहंकार मिट जाता है तो अद्वैत अवस्था आ जाती है, जिससे अनन्य मति अर्थात् दूसरा और कोई नहीं की स्थिति आ जाती है। अहंकार का हनन करने वाला भाव महा बलवान होता है, इसलिए उसे महावीर भी कहा जाता है।
सो0 प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
व्याख्या : मैं पवन कुमार को प्रणाम करता हूँ, जो मूढ़तारूपी वन को जलाने के लिए ज्ञान रूपी अग्नि है। यहाँ हनुमान को पवन कुमार भी कहा गया है। इसका बहुत गहरा योगिक रहस्य है। अहंकार हनन करने का भाव प्राण शक्ति से ही पैदा होता है। इसलिए प्राण को देशी भाषा में पवन भी कहा जाता है और उसी कारण हनुमान को पवनपुत्र व पवन कुमार कहा जाता है। प्राण से ही समस्त भाव पैदा होते हैं परन्तु प्राण की शुद्धता के आधार पर भावों की वृति निर्भर करती है। पवन कुमार शुद्ध प्राण से उत्पन्न ज्ञान रूपी भाव होता है, जिसके कारण आत्मा रूपी राम उसके हृदय रूपी घर में सदैव धनुष बाण धारण करके रहते हैं। धनुष प्रतीक है इच्छाओं का और बाण प्रतीक है इच्छाओं की तरंग से। अत: परम ज्ञान की अवस्था में इच्छाएँ और इच्छाओं की तरंग साधक के हाथ में होती हैं। उसी को धनुष-बाण के प्रतीक के रूप में बताया गया है।
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।
बंदउँ सबके चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।।
व्याख्या : रीछ, भालू व बन्दर सभी बुद्धि के विभिन्न भावों के प्रतीक हैं। क्योंकि बुद्धि के नाना भाव होते हैं। जैसे चंचल बुद्धि, स्थिर बुद्धि, अनन्य बुद्धि, सद्बुद्धि, देहबुद्धि, सात्विक बुद्धि, राजसिक बुद्धि, तामसिक बुद्धि आदि-आदि। इसलिए वानर, भालू व राक्षसों के विभिन्न प्रतीकों का सहारा लेकर बुद्धि के भावों का वर्णन किया गया है। वानर चंचल सात्विक बुद्धि के प्रतीक हैं और रीछ स्थिर बुद्धि के प्रतीक हैं तथा निशाचर तामसिक बुद्धि के प्रतीक हैं। इसलिए मैं वानरपति, भालूओं, निशाचरों व अंगदादि बुद्धि के भावों की वन्दना करता हूँ, जो इस अधम शरीर में परमात्मा राम को प्राप्त कर लेते हैं। अर्थात् सभी भाव एक ही ऊर्जा (राम) से पैदा होते हैं।
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते।।
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।।
व्याख्या : जो परमात्मा के उपासक हैं, उन सबको पक्षी, मृग, सुर, असुर व नर सहित प्रनाम करता हूँ, जो बिना काम के राम के दास हैं। कामहीन अवस्था ही परमात्मा के दास की अवस्था होती है।
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जो मुनिबर बिग्यान बिसारद।।
प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा।।
व्याख्या : शुक, सनक आदि भक्त, मुनि नारद, मुनियों व विज्ञान के ज्ञाता सबको मैं सीस झुका कर प्रणाम करता हूँ। आप सब मुझे अपना दास मान कर कृपा कीजिए।
जनक सुता जग जननी जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।
व्याख्या : जगत की जननी जानकी अर्थात् समस्त जगत जानकी (प्राण शक्ति) से उत्पन्न है। वह जानकी जनक सुता हैं अर्थात प्राण शक्ति चित से पैदा होती है। चित में स्थिर होने पर साधक देहबुद्धि से परे विदेह हो जाता है। इसलिए चित रूपी जनक विदेह भी कहलाते हैं। अत: मैं प्राण शक्ति के पद कमलों में नमन करता हूँ, जिसकी कृपा से निर्मल मति की प्राप्ति होती है।
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक।।
राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।
व्याख्या : पुन: मैं मन, वचन, कर्म से परमात्मा के चरण कमलों की वन्दना करता हूँ जिनके कमल जैसे नयन हैं और धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और जो भक्तों की विपदा को दूर करने वाले व सुख देने वाले हैं। धनुष-बाण धारण करने का तात्पर्य है कि परमात्मा समस्त इच्छाओं के मूल हैं और उन्हीं से बाण रूपी तरंगें उठती रहती हैं। कमल नयन का तात्पर्य यह है कि उनकी दृष्टि दिव्य है। वे बिना नाम व रूप के होते हुए भी अद्भुत छटा वाले हैं। चरण-कमल का तात्पर्य परमात्मा की सत्ता से है।
दो0 गिरा अर्थ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।
व्याख्या : सीता अर्थात् प्राणशक्ति और राम अर्थात् आत्मतत्व ये दोनों जैसे वाणी और उसका अर्थ और जल और जल की लहर की तरह अभिन्न हैं। अर्थात् कहने के लिए सीता और राम अलग-अलग आभासित होते हैं वरना ये हैं अभिन्न। इसलिए मैं प्राणशक्ति (सीता) और आत्मा (राम) के चरणों की वन्दना करता हूँ, जिन्हें गरीब (अर्थात् काम, क्रोध, मदादि भावों से रहति) अति प्रिय लगते हैं। गर्व रहीत ही गरीब होता है।
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।।
व्याख्या : मैं परमात्मा के प्रतीक स्वरूप राम नाम की वन्दना करता हूँ, जो चिन्ताओं को जलाने के लिए अग्नि के समान व यश देने के लिए सूर्य के समान तथा शीतलता देने के लिए चन्द्रमा के समान है। राम के नाम का जपने की विधि से माया का हरण हो जाता है और साधक माया को हरने वाला हो जाता है। नाम के जप से ही परम ज्ञान की अनुभूति (वेद) हो जाती है। इसलिए नाम ही वेद का प्राण है। क्योंकि प्राण की निर्मलता से ही वेदों की अनुभूति होती है। राम का नाम गुणों से परे, अनुपम व गुणों का घर होता है।
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
व्याख्या : राम के नाम के महामंत्र का जो भी साधक जप करता है वह महाऐश्वर्य (महेश्वर) की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। भृकुटि पर नाम जपने से मुक्ति अवश्यम्भावी हो जाती है। अत: यही काशी में मुक्ति के उपदेश का रहस्य है। भृकुटि ही काशी नगरी है, जो सत, रज व तम रूपी तीन गुणों के त्रिशूल पर टिकी हुई है। भृकुटि में ही चन्द्र, सूर्य व सुष्मन स्वर एक होते हैं, इसलिए भी यह त्रिशूल पर बतायी गयी है। राम के नाम के जप से साधक गुणों को वश में कर लेता है और वह गुणों का राजा हो जाता है। इसलिए राम के नाम के प्रभाव की पूजा प्रथम होती है।
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी।।
व्याख्या : आदि कवि बाल्मीकि ने नाम के प्रताप को जान लिया और नाम को श्वास के साथ उलटकर जप करके परम शुद्ध हो गया। उलटा नाम का मतलब मरा-मरा नहीं है। राम के नाम के जप का वास्तविक रहस्य यह है कि राम के नाम को उलटती हुई श्वास के साथ लयबद्ध करना चाहिये। जब श्वास नाभी से उठती हो तो रा के साथ लयबद्ध करें और छोड़ते हुए म के साथ लयबद्ध करें। ऐसा करने से साधक थोड़े समय में ही वासनाओं से मुक्त होकर परमशुद्ध हो जाता है। उसी को उलटा नाम जपना कहा जाता है। इस प्रकार नाम जपने से कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जाती है। अत: उसी अवस्था को श्रद्धा (भवानी) सहित शिव द्वारा राम नाम के जप की अवस्था कही जाती है। कुण्डली जागृत हो जाने पर शिव व शिवा का मेल हो जाता है और उस समय रा के साथ नाभी से श्वास उठता है और म के साथ निकल जाता है। वह अवस्था राममय होती है।
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।।
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।
व्याख्या : नाम के प्रभाव से माया के हरण की अवस्था हृदय में आ जाती है, जिससे हृदय में अपार हर्ष पैदा हो जाता है और तीनों गुण आभूषण हो जाते हैं अर्थात् गुण गुणों में बरतने लगते हैं। नाम के प्रभाव से शिवत्व (परमात्मा) की अच्छी तरह जानकारी हो जाती है, जिससे विषय वासनाओं रूपी जहर अमृत रूपी फल देने लगता है अर्थात् वासनाओं की तृष्णा शान्त होकर शान्ति देने वाली हो जाती है।
दो0 बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।।19।।
व्याख्या : परमात्मा की भक्ति वर्षा ऋतु की तरह होती है और साधक घास की तरह होता है। वर्षा से अकारण ही घास बढ़ता रहता है, वैसे ही परमात्मा की भक्ति से भक्त का कल्याण होता रहता है। परमात्मा का नाम ""राम"" श्रावण व भादो मास की तरह होता है अर्थात् राम नाम का जप करने से परमात्मा की भक्ति रूपी वर्षा अपने-आप हो जाती है।
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।।
व्याख्या : राम नाम के रा और म दोनों अक्षर मन का हरण करनेवाले हैं अर्थात् जब रा के साथ श्वास उठता है और म के साथ छूटता है, तो उस अवस्था के प्रति जागृत हो जाने पर मन अपने आप शान्त हो जाता है। उसे ही मन के हरण (मनोहर) की अवस्था कहा जाता है। इसलिए जो साधक रा व म को अपने हृदय की आँखों से देखता है, तो मन का हरण हो जाता है। राम का नाम सुमिरण करने में आसान है तथा सबको सुख देने वाला है। राम के नाम का स्मरण करने से संसार में भी लाभ होता है अर्थात् चिन्ताओं से मुक्ति मिल जाती है और परलोक अर्थात् आत्मा (पर) के लोक की प्राप्ति होती है। परलोक का तात्पर्य आत्मा के लोक से ही होता है, जहाँ परम शान्ति की अवस्था रहती है।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।।
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज संघाती।।
व्याख्या : राम का नाम कहने, सुनने व सुमिरन करने में बहुत अच्छा लगता है। इसलिए साधक को राम का नाम आत्मा व लक्षण के भावों के समान ही प्रिय होता है। राम के नाम का वर्णन करने से प्रेम प्रकट हो जाता है और साधक ब्रह्म के साथ मिलकर ब्रह्म के समान ही हो जाता है।
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।।
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन।।
व्याख्या : यहाँ साधना का बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। परमात्मा नर अर्थात् हृदय स्थित धड़कन को घर बनाकर रहते हैं, इसलिए वे नारायण (नरअअयन) हैं। नर की धड़कन से शरीर में हार्मोन बनते रहते हैं और हार्मोनों से ही भाव पैदा होते हैं। इसलिए सरिस (अर्थात् रस युक्त) सुभ्राता (अच्छे भाव) कहा गया है। भावों से ही जगत का अस्तित्व आभासित होता है, इसलिए भावों को ही जग पालक कहा जाता है। परन्तु परमात्मा की भक्ति के विशेष भाव पैदा हो जाते हैं, तो वे साधक का कल्याण कर देते हैं। अत: वे विशेष भाव जन त्राता कहलाते हैं। भक्ति के विशेष भाव पैदा हो जाने पर तीनों गुण (सत, रज व तम) सुतिय अर्थात् शुभ फल वाले हो जाते हैं, जो जगत के कल्याण के लिए निर्मल ज्ञान का पोषण करने वाले हो जाते हैं।
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।।
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरिहलधर से।।
व्याख्या : वे सभी शुभ भाव अमृत के समान स्वाद वाले हो जाते हैं और साधक को सुमार्ग (सुगति) पर ले जाते हैं। उस अवस्था में साधक की इन्द्रियाँ सिमट जाती हैं और वह कश्चप की तरह शरीर को धारण किए रहता है। अर्थात् साधक देहबुद्धि से मुक्त होकर गुणों को गुणों में बरतने देता है। उस अवस्था में साधक का मन भ्रमर की तरह परमात्मा रूपी कमल में लग जाता है। और जीव की बुद्धि यश देने वाली होकर माया के भावों का हरण कर लेती है और साधक शरीर को सहज होकर धारण कर लेता है।
दो0 एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।
व्याख्या : परमात्मा के राम नाम के दोनों वर्णों में एक रा अक्षर क्षत्र की तरह है, तो दूसरा म मुकुटमणि के समान है।
समुझत सरिस नाम अरुनामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।।
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।।
व्याख्या : नाम और नामी के रहस्य को समझने से रस पैदा होता है क्योंकि नाम व नामी का प्रेम परमात्मा का ही अनुसरण करता है। नाम व रूप दोनों परमात्मा का ही अनुसरण करता है। नाम व रूप दोनों परमात्मा की उपाधि मात्र हैं। परमात्मा तो अकथनीय व अनादि हैं, इसलिए अच्छी तरह समझकर साधना करनी चाहिये।
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू।।
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।।
व्याख्या : नाम और नामी में कौन बड़ा और कौन छोटा है, यह कहना ही अपराध है। इसलिए साधकगण सुनकर व समझकर नाम व नामी के भेद को समझ लेते हैं। नाम के अधीन रूप को देखते हैं, क्योंकि बिना नाम के रूप का ज्ञान होता ही नहीं है।
रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।।
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।।
व्याख्या : परमात्मा तो रूप से परे हैं, इसलिए बिना नाम के परमात्मा के विशेष रूप का ज्ञान नहीं हो पाता है। जो लोग बिना रूप की कल्पना किए परमात्मा के राम नाम का सुमिरन करते हैं, तो उनके हृदय में विशेष स्नेह पैदा हो जाता है।
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।
व्याख्या : नाम व रूप दोनों की अकथनीय कहानी है। नाम व रूप के रहस्य को समझना सुखद होता है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। निराकार और साकार के बीच में नाम साक्षी का काम करता है। नाम दोनों (नाम व रूप) की भाषा का अच्छी तरह ज्ञान कराने वाला होता है।
दो0 राम नाम मनिदीप ध डिग्री जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।
व्याख्या : इसलिए अगर साधक को अपने बाहर व भीतर प्रकाश चाहिये, तो राम के नाम रूपी मणि को जीभ्या के द्वार पर रख कर निरन्तर जप करना चाहिये।
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।
ब्रह्म सुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।।
व्याख्या : योगी लोग राम के नाम को जीभ्या पर रखकर जप करके माया के प्रपंचों से मुक्त हो जाते हैं और वे अनुपम ब्रह्म सुख का अनुभव कर लेते हैं। वह ब्रह्म सुख अकथनीय व अनाम होता है, जिसका कोई रूप और नाम नहीं बताया जा सकता है।
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।।
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।
व्याख्या : जो लोग परमात्मा की गूढ़ गति को जानना चाहते हैं, तो जीभ्या पर राम के नाम का जप कर जान सकते हैं। जो साधक लय लगाकर राम के नाम का जप करते हैं, वे सिद्ध होकर अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त कर लेते हैं।
जपहिं नाम जनु आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।।
व्याख्या : जो कोई संकट में पड़ने पर राम के नाम का जप करता है, तो उसे कुसंकटों से मुक्ति मिल जाती है और वह सुखी हो जाता है। परमात्मा के संसार में चार प्रकार के (अर्था-अर्थी, आरत, ज्ञानी और जिज्ञासु) भक्त होते हैं, जिन चारों का ही पाप रहित उदार यश संसार में रहता है।
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।
व्याख्या : चारों प्रकार के भक्तों का नाम ही आधार होता है। परन्तु ज्ञानी भक्त परमात्मा को सबसे ज्यादा प्रिय होता है। चारों युग और चारों वेदों में नाम का ही प्रभाव होता है परन्तु विशेषकर कलियुग में नाम के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं होता है। कलियुग का तात्पर्य यह कि जब जीव देहबुद्धि में रमण करने वाला होता है, तो नाम के जप से ही धीरे-धीरे वह देहबुद्धि के जाल से बाहर आ पाता है। उस अवस्था में वह योग, प्राणायाम व ध्यानादि की क्रिया नहीं कर पाता है।
दो0 सकल कामना हीन जो राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहूँ किए मन मीन।।22।।
व्याख्या : समस्त कामनाओं से रहित होकर जो परमात्मा की भक्ति में रस लेते हैं, उनके हृदय में नाम के जप से प्रेमरूपी अमृत जल पैदा हो जाता है और उनका मन मछली की तरह अमृत रस में लीन हो जाता है।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।
मोरें मत बड़ नाम दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।।
व्याख्या : निर्गुण व सगुण दोनों ही ब्रह्म के रूप हैं, क्योंकि ब्रह्म तो अकथनीय, अगाध, अनादि व अनुपम सत्ता हैं। मेरे मत में तो नाम सगुण व निर्गुण दोनों से बड़ा होता है क्योंकि नाम के जप से चारों युगों पर साधक विजय प्राप्त कर लेता है। चार युग चार गुणों की अवस्था का नाम ही होता है। तम-कलि, रज-द्वापर, सत-त्रेता और गुणातीत-सतयुग का प्रतीक होता है। नाम के जप के प्रभाव से साधक चारों युगों को पार करके ब्रह्म में स्थित हो जाता है। उस अवस्था को ही चारों युगों को वश में करना कहा जाता है।
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रूचि मन की।
एकु दारूगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।।
व्याख्या : समझदार सज्जन मुझ दास की बात को समझेंगे। अत: मैं मेरे मन की प्रेम की अनुभूति को बताता हूँ। ब्रह्म को लकड़ी की तरह उपमा द्वारा समझना चाहिये जैसे लकड़ी में अग्नि प्रकट हो जाती है, वैसे ही विवेक होने पर ब्रह्म हृदय में प्रकट हो जाता है।
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।।
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनन्द रासी।।
व्याख्या : नाम से अगम ब्रह्म और ब्रह्म का विवेक सुगम हो जाता है। इसलिए ब्रह्म राम से राम का नाम बड़ा है। सब जगह तो एक अविनाशी ब्रह्म ही व्यापक हैं, जो सत्य स्वरूप, चेतन व आनन्द की राशि होता है।
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।
व्याख्या : ऐसे प्रभु समस्त जीवों, दीन-दुखियों के हृदय में निर्विकार एवं अखण्ड रूप से निवास करते हैं। वही अखण्ड परमात्मा नाम जप से वैसे ही प्रकट हो जाते हैं जैसे रत्न के नाम से उसका मूल्य पता चल जाता है।
दो0 निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नाम बड़ राम ते निज बिचार अनुसार।।23।।
व्याख्या : इस प्रकार निर्गुण ब्रह्म से नाम का प्रभाव ज्यादा होता है। अत: मैं मेरे हृदय में विचार कर कहता हूँ कि परमात्मा से बड़ा परमात्मा का राम रूपी नाम बड़ा होता है।
राम भगत हित नर तनुधारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।।
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।।
व्याख्या : भक्त के हित के लिए परमात्मा हृदय स्थित नर (धड़कन) द्वारा शरीर को धारण करते हैं। इस प्रकार साधना में लगे हुए लोग संकटों को पार करके परमसुख को प्राप्त कर लेते हैं। प्रेमपूर्वक राम के नाम का जप करने से अचानक भक्त के हृदय में प्रसन्नता छा जाती है और उसका मंगल हो जाता है।
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।।
व्याख्या : परमात्मा राम एक ही हैं, जो भक्तों को तीन गुणों से पार करा देते हैं और उनका नाम मूढ़ और कुबुद्धि के स्तर के लोगों को भी सुधार देता है। जब साधक परमात्मा के नाम का रसास्वादन करने लग जाता है, तब वह ऋषि कहलाता है। अत: यहाँ ऋषि हित से तात्पर्य साधक की रसास्वादन की अवस्था से ही है। सुकेतु यक्ष का नाम है। यक्ष से तात्पर्य इच्छाओं के जन्मदाता से होता है। जब इच्छाएँ आसुरी वृत्ति वाली हो जाती हैं, तो वे तेजी से माया का जाल बढ़ा देती हैं और पुन: इच्छाओं से इच्छाएँ पैदा होने की प्रक्रिया शु डिग्री हो जाती है। यहाँ ताड़का आसुरी इच्छा का ही प्रतीक है। ताड़का का तात्पर्य है ऐसी इच्छा जो किसी वस्तु को ताड़ कर अर्थात् देखकर पैदा हो जाती है। ताड़का का पुत्र सुबाहु होता है। सुबाहु का तात्पर्य जैसी इच्छा वैसा ही भाव से होता है। अत: यहाँ तात्पर्य है कि साधक के हित के लिए राम अर्थात् परमात्मा ने ताड़का रूपी आसुरी इच्छा व इच्छा के पुत्र सुबाहु को सैन्य समेत अर्थात् समस्त भावों सहित नष्ट कर दिया अर्थात् साधक को आसुरी इच्छाओं के जाल से बचा लिया।
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।।
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।।
व्याख्या : राम का नाम साधक को समस्त दोषों, दु:खों व निराशाओं से वैसे ही मुक्त कर देता है, जैसे सूर्य रात्रि के अन्धकार का कर देता है। आत्म तत्व अपने आप भावों के धनुष को तोड़ देता है और भावों से पैदा होने वाले भय को परमात्मा का नाम दूर कर देता है।
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।
व्याख्या : दंडक बनकर अर्थात् कर्मों के अनुसार फल देकर परमात्मा ने यह सुन्दर व्यवस्था बनायी है। परमात्मा का नाम साधकों के मन को पवित्र कर देता है। आत्म भाव में स्थित होने पर आसुरी भावों के समूहों का नाश हो जाता है और परमात्मा का नाम देहबुद्धि (कलि कलुष) के विकारों का नाश कर देता है।
दो0 सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।
व्याख्या : सबरी (सबरी से तात्पर्य शवर भाव से होता है अर्थात् जब संतोष का भाव आ जाता है), जटायु (जटायु का तात्पर्य परमात्मा में सुदृढ़ लगन लग जाने के भाव से है। जब साधक की लगन परमात्मा में स्थिर हो जाती है तो परमगति प्राप्त हो जाती है) आदि को परमात्मा की कृपा से अच्छी गति प्राप्त हो गयी। इस प्रकार परमात्मा के नाम के जप के प्रभाव से बहुत से मूढ़ लोगों का उद्धार हो गया है। नाम की गुण गाथा वेदों में भी गायी गयी है।
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।।
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।।
व्याख्या : सुकंठ का तात्पर्य सत्य मधुरवाणी से है तथा विभीषण से तात्पर्य विनय से भूषित साधक से है। अत: जो साधक मधुर सत्य भाषी व विनय के गुणों से भूषित होता है, उसे परमात्मा अपनी शरण में रख लेते हैं। यह सब कोई जानते हैं। नाम के जप से बहुत से गरीब अर्थात् काम, क्रोध, मदादि से रहित गर्वहीन लोगों का उद्धार हो गया है। संसार में और वेदों में इसका महत्व बताया गया है।
राम बालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।।
नामु लेत भव सिन्धु सुखाहीं। करहु बिचा डिग्री सुजन मन माहीं।।
व्याख्या : भालू से तात्पर्य स्थिर बुद्धि के भाव से है और कपि का तात्पर्य चंचल बुद्धि के नाना भावों से है। अत: जब आत्मा रूपी राम में बुद्धि के सभी भावों का लय हो जाता है, तब आत्मा संसार रूपी समुद्र से पार हो जाती है। तब सद्गुण रूपी सेतु तैयार हो पाता है। परमात्मा के नाम का जप करने से भावों का भव सागर सूख जाता है। अत: हे सज्जनों! नाम के जप के प्रभाव का अपने मन में विचार करो।
राम सकुल रन रावन मारा। सीय सहित निज पुर पग धारा।।
राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।।
व्याख्या : काम का भाव ही रावन का प्रतीक होता है। अत: जब आत्म तत्व में बानर व भालू रूपी चंचल व स्थिर बुद्धि के सब भाव लीन हो जाते हैं, तो साधक के मन के काम, क्रोध, मद, लोभ व मत्सरादि के समस्त भाव शान्त हो जाते हैं। साधक की इस अवस्था को ही आत्मा रूपी राम द्वारा काम रूपी रावण का कुल सहित मारा जाना कहा जाता है। जब काम रूपी रावण मर जाता है, तो प्राणशक्ति आत्मा रूपी राम के साथ निज धाम अर्थात परमशान्त अवस्था में रहने लगती है। उसे ही सीता सहित आत्मारूपी राम का स्वयं के धाम में रहना बताया गया है। उस अवस्था में अवधी रूपी शरीर का आत्मा रूपी राम राजा हो जाता है और ये शरीर रूपी अवध राजधानी कहलाता है। इसी रहस्य को देवता और मुनियों ने अपनी-अपनी वाणी में बताया है। राम व काम का मूल एक ही ऊर्जा होती है। जो भावों के अनुसार काम व राम का रूप धारण करती है।
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती । बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।।
फिरत सनेहँ मगन सुख अपने। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।
व्याख्या : अत: जो साधक परमात्मा के राम नाम का प्रेमपूर्वक जप करते हैं, वे बिना परिश्रम के ही प्रबल मोह की सेना को जीत लेते हैं और मोह को जीतकर वे अपने आत्मसुख में मगन होकर विचरते रहते हैं। नाम जप की कृपा से सपने में भी चिन्ता नहीं सताती है।
दो0 ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।
व्याख्या : परमात्मा राम से बड़ा नाम होता है, जो वरदान देने की साधक में क्षमता पैदा कर देता है। इसलिए परमात्मा की करोड़ों विशेषताओं में से महाऐश्वर्य को प्राप्त साधक नाम की महिमा को अपने हृदय में जान लेता है।
।। मास पारायण, पहला विश्राम।।
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्म सुख भोगी।।
व्याख्या : नाम के जप के प्रभाव से साधक स्वयं अविनाशी पद को प्राप्त कर लेता है और अमंगल भेष भी मंगल को करने वाला बन जाता है। शुक व सनक आदि सिद्धों व मुनियों ने भी नाम के प्रभाव से ब्रह्म सुख को प्राप्त किया है।
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हर प्रिय आपू।।
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।
व्याख्या : नारद मुनि ने नाम की महिमा को जान लिया था इसलिए वे जगत की माया के हरण करने वालों के प्रिय हो गए और स्वयं भी माया का हरण करने वाले होकर अपने आत्मा को प्रिय हो गए। नाम के जपने के कारण परमात्मा कृपा कर देते हैं। उसी नाम के कारण प्रहलाद भक्तों में शिरोमणि बन गए।
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।।
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।।
व्याख्या : ध्रुव ने हृदय में ग्लानि होने पर परमात्मा का नाम जपा था, जिससे उन्हें अचल व अनूपम पद की प्राप्ति हो गयी। हनुमान ने पवित्र परमात्मा का नाम जप करके परमात्मा राम को अपने वश में कर लिया अर्थात् आत्मा को जानकर माया को जीत लिया। इस चौपाई का वास्तविक योगिक अर्थ यह है कि प्राण (पवन) से उत्पन्न समस्त भावों (सुत) को परमात्मा के पवित्र नाम के साथ जोड़ने पर साधक माया को जीतकर आत्म तत्व को अपने वश में कर लेता है अर्थात् निर्मल कर लेना है और आत्मा का निर्मल होना ही परमात्मा की प्राप्ति कहलाती है।
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
व्याख्या : परमात्मा का नाम जपने से साधक नीच वासनाओं (पतित वासना ही अजामिल का प्रतीक हैं, गज भोगी मन की अवस्था है और गणिका का तात्पर्य पथ भ्रष्ट इन्द्रियों से है) भोगी मन व पथ भ्रष्ट इन्द्रियों से आसानी से मुक्त हो जाता है। इसलिए नाम के महत्व का कहाँ तक वर्णन करूँ। परमात्मा के नाम के महत्व का वर्णन तो स्वयं परमात्मा भी नहीं कर सकते हैं।
दो0 नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदास।।26।।
व्याख्या : राम का नाम कल्पत डिग्री की तरह होता है, जिसमें कलियुग का कल्याण निवास करता है। कलि का तात्पर्य देहबुद्धि से होता है और नाम जपने से साधक देहबुद्धि से मुक्ति पाकर आत्म बुद्धिवाला हो जाता है, इसलिए नाम को कलियुग में कल्याण करने वाला बताया गया है। तुलसीदास भी नाम के जपने से पवित्र हो गए।
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।।
बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम सनेहू।।
व्याख्या : चारों युग, तीन कालों और तीन लोकों में नाम का जप करके जीव दु:खों से मुक्त हो जाता है। वेदों, पुराणों और संत जनों का यही मत है कि सभी अच्छे कार्यों का फल यही होता है कि परमात्मा से प्रेम हो जाए।
ध्यान प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।।
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जल मन मीना।।
व्याख्या : सतयुग में ध्यान और त्रेता में यज्ञ व द्वापर में पूजन द्वारा भगवान प्रसन्न होते हैं। सतयुग से तात्पर्य साधक की गुणातीत अवस्था से है, जिसमें वह परमात्मा में सुरता लगा कर मगन रहता है और त्रेता का तात्पर्य सतोगुणी अवस्था से है, इस अवस्था में साधक यज्ञ क्रिया अर्थात् पान में अपान का हवन करके परमात्मा की याद में मगन रहता है। श्वास-प्रश्वास का हवन ही वास्तविक यज्ञ होता है। रजोगुणी साधक फलकी इच्छा से कर्मकाण्ड करता है। अत: वह स्तुति और मंत्रों के उच्चारण से ही संतुष्टि का अनुभव करता है। परन्तु तामसिक अवस्था वाले साधक की मन रूपी मछली समुद्र रूपी विकारों में ही लीन रहती है। अत: वह तो केवल नाम के जप के बल से ही तामसिक अवस्था से बाहर आ सकता है।
नाम कामत डिग्री काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।।
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता।।
व्याख्या : परमात्मा का नाम काम रूपी वृक्ष के लिए काल की तरह होता है, इसलिए नाम के सुमिरन से संसार के समस्त जाल कट जाते हैं। राम का नाम देहबुद्धि की अवस्था में इच्छित फल देने वाला होता है। राम के नाम से परलोक में भलाई होती है और इस लोक में माता-पिता की तरह रक्षक होता है।
नहिं कलि करम न भगतिं बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।।
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।
व्याख्या : तामसिक अवस्था में न तो कोई साधना का कर्म ही बनता है और न भक्ति का विवेक ही पैदा होता है। अत: केवल राम का नाम ही एकमात्र आधार होता है। तामसिकता का नियम ही कपट करना होता है परन्तु नाम के जप से सुमति पैदा हो जाती है, जिससे अहंकार के हनन की क्षमता पैदा हो जाती है। उसे ही समर्थ हनुमान कहा जाता है।
दो0 राम नाम नरकेसरी कनक कसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।
व्याख्या : राम के नाम का जप करने पर साधक नरकेसरी अर्थात् हृदय स्थित नर (धड़कन) को अपे वश में कर लेता है। जबकि तामसिक अवस्था में धड़कन (नर) से कनक (माया) का रस निकलता रहता है। इसलिए जो साधक नाम का जप करते हैं, उनके स्वरों (चन्द्र व सूर्य स्वरों) से दैवीय वृति के भाव पैदा होते रहते हैं, जिससे साधक में प्रहअआहल्लाद अर्थात प्रसन्नता के भाव पैदा होते रहते हैं। प्रकृति में आहल्लाद की अनुभूति ही प्रहलाद कहलाती है। नाम के निरन्तर जप करने से साधक में दैवीय भाव ज्यादा मात्रा में पैदा हो जाते हैं, जिससे वह प्रकृति में आनन्द की अनुभूति करने लग जाता है और कंचन-कामिनी के भावों से निवृत होता चला जाता है।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा।।
व्याख्या : भाव से, बुरे भाव से, क्रोध से व आलस्य से जैसे भी नाम का जप करने पर दसों दिशाओं में मंगल होता है। इस शरीर में दस प्राण माने जाते हैं और प्राणों को ही दस दिशा कहा जाता है। अत: नाम के जप से दस प्राणों में मंगल भावना पैदा होने लग जाती है। इसलिए राम के नाम की महिमा को जानकर राम का नाम सुमिरन करके मैं यहाँ परमात्मा के चरणों में सिर झुकाकर राम नाम की गुण गाथा को बताता हूँ।
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपा अघाती।।
राम सुस्वामी कुसेवकु मोसो। निजि दिसि देखि दयानीधि पोसो।।
व्याख्या : मुझे सब प्रकार से परमात्मा सुधारेंगे क्योंकि उनकी कृपा तो कभी कृपा करते हुए अघाती नहीं है। परमात्मा राम जैसा स्वामी और मेरा जैसा कुसेवक कौन है? परन्तु फिर भी परमात्मा ने अपनी मर्यादाओं को देखकर ही मुझ पर कृपा की है।
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीति। बिनय सुनत पहिचानत प्रीति।।
गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर।।
व्याख्या : लोक और वेद की यही रीति है कि विनय सुनकर ही प्रीत की पहचान करते हैं। गरीब-अमीर, गँवार, नगर निवासी, पण्डित, मूर्ख, बदनाम व यशस्वी।
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।।
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।।
व्याख्या : अच्छे कवि व बुरे कवि सभी नर-नारी अपने राजा की अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करते हैं। साधु, सज्जन व सुशील राजा जो कि ईश्वर का अंश होता है।
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी।।
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसल राऊ।।
व्याख्या : सबकी वाणी सुनकर और भक्ति व विनय की चाल को पहचान कर सबका यथोचित सम्मान करते हैं। यह स्वभाव तो संसार के राजाओं का होता है। कोशलनाथ अर्थात कुशलता के स्वामी परमात्मा तो सब प्राकृत राजाओं के शिरोमणि होते हैं।
रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिन मति मोतें।।
व्याख्या : परमात्मा तो विशुद्ध प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं। परन्तु संसार में मेरा जैसा मंद बुद्धि और मन का मलिन कौन होगा।
दो0 सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु।
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ।।28 (क)।।
व्याख्या : कृपालु परमात्मा दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि को भी रखते हैं। अगर वह सेवक साधना रूपी पत्थरों को भोग रूपी समुद्र में नाव बना ले और कपि रूपी चंचल बुद्धि और भालु रूपी स्थिर बुद्धि को सुमति रूपी अपना मंत्री बना ले।
दो0 हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।।28ख।।
व्याख्या : मुझे सब लोग परमात्मा का सेवक कहते हैं और मैं भी सेवक कहलाता हूँ परन्तु मुझमें तो सेवक के गुण नहीं हैं। इसलिए परमात्मा फिर भी इस उपहास को सहते हैं क्योंकि मेरे स्वामी प्राणशक्ति के स्वामी परमात्मा हैं।
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।।
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुदि राम कीन्हि नहिं सपने।।
व्याख्या : यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है तथा मेरे पापों को सुनकर तो नरक ने भी नाक सिकोड़ ली अर्थात् नरक में भी जगह नहीं है। मेरे दोषों को देखकर मैं ही डर रहा हूँ और सहम रहा हूँ, परन्तु परमात्मा तो सपनें में भी मेरे दोषों पर ध्यान नहीं देते हैं।
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।
कहत नसाई होइ हियं नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।।
व्याख्या : परमात्मा ने तो सुचित से अन्त:स्थल की भावना को देखकर मेरी भक्ति और बुद्धि की सराहना ही की है। मैं चाहे कहने में कुछ भी कहूँ परन्तु हृदय पवित्र होना चाहिये क्योंकि परमात्मा तो साधक के हृदय की पवित्रता को देखकर ही प्रसन्न होते हैं।
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सम बार हिए की।।
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली।।
व्याख्या : परमात्मा कभी भी की हुई भूल का ध्यान नहीं रखते हैं बल्कि वे तो हृदय की भावना का ही ख्याल करते हैं। जिस अपराध की वजह से बाली का वध किया था, वही अपराध सुग्रीव ने किया। बाली का तात्पर्य इन्द्रियों के भोग बल से है क्योंकि साधक जब इन्द्रियों को दमन करके वश में कर लेता है, तब वह अवस्था ही बाली के वध की होती है। सुकंठ का तात्पर्य मधुरवाणी से है। साधक मधुरवाणी बोलता-बोलता पुन: भोगों में फँस जाता है, तो वही अवस्था सुग्रीव के प्रतीक के माध्यम से समझाई गयी है। भोगों में फँसने का अपराध तो समान हुआ परन्तु सुकंठ की भावना भिन्न होने के कारण अपराध क्षम्य हो जाता है।
सोइ करतूति बिभीषण केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।।
तें भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।
व्याख्या : वही करतूत विभीषण किया है परन्तु परमात्मा ने सपने में भी विभीषण की करतूत का विचार नहीं किया। जैसे सुकंठ अर्थात् मधुरवाणी भोगों में फँस जाती है, वैसे ही विनय का भूषण वाणी भी भोगों में फँस जाती है परन्तु जब परमात्मा की शरण का भाव पैदा हो जाता है, तो भोगों के विकारों का परमात्मा विचार नहीं करते हैं। उस अवस्था में ये सुकंठ व विभीषण रूपी वाणी के भाव भावरत रूपी भरत के भाव के साथ समानता के स्तर पर मिल जाते हैं। भरत का भावरतता का प्रतीक है, जो भोगों की आसक्ति का त्याग करके शरीर का भरण-पोषण करता है और परमात्मा में सदैव रत रहता है। भावों की यह अवस्था राजसभा अर्थात् राजयोग की साधना स्थिति में जीवात्मा को समझ में आती है। भृकुटि में ध्यान की अवस्था ही राजसभा की अवस्था होती है।
दो0 प्रभु त डिग्री तर कपि डार पर ते किए आपु समान।
तुलसी कहुँ न राम से साहिब सील निधान।।29 (क)।।
व्याख्या : परमात्मा रूपी वृक्ष और बुद्धि रूपी शाखाएँ होती हैं। अत: जब बुद्धिरूपी शाखाएँ वृक्ष रूपी परमात्मा में लीन हो जाती हैं, तो सब परमात्मामय हो जाता है। अत: तुलसीदास कहते हैं कि परमात्मा जैसे शील निधान और कोई नहीं हैं।
दो0 राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।
जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।।
व्याख्या : राम अर्थात् आत्मा की निर्मलता कल्याणकारी होती है और उससे सबका ही कल्याण होता है। तुलसीदास कहते हैं कि अगर यह बात सही है, तो फिर मैं भी अच्छा ही हूँ।
दो0 एहि बिधि निज गुन दोष, कहि सबहि बहुरि सि डिग्री नाइ।
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।।29(ग)।।
व्याख्या : इस प्रकार मैंने मेरे गुण व दोषों को सबको सीस झुकाकर कह दिया है। अब मैं परमात्मा के विशुद्ध यश का वर्णन करता हूँ, जो देह विकारों का नाश करने वाला है।
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनि बरहि सुनाई।।
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुख मानी।।
व्याख्या : जो परमात्म तत्व की कथा याज्ञवलक्य ने अनुभव की और जिसे भरद्वाज मुनि को सुनाया था, उसी संवाद को यहाँ कहने जा रहा हूँ। अत: हे सज्जनों! सुख मान कर सभी सुनिए।
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।।
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा।।
व्याख्या : शंभु अर्थात् साधक स्वयं परमात्मा के चरित की अनुभूति करता है और अनुभूति करके उसे श्रद्धा भाव से धारण करता है। उसे ही उमा को सुनाना कहा जाता है क्योंकि उरअमा अर्थात् हृदय में धारण कर लेना ही उमा का प्रतीक है। जब हृदय में धारणा दृढ़ हो जाती है, तब ही शिव अर्थात् कल्याणकारी अवस्था आती है और तब ही कागभुसुंड अर्थात् अहंकार की अति परम अवस्था आती है। कागभुसुंड के पिता का नाम शास्त्रों में चण्ड बताया गया है और चण्ड के सात पत्नियाँ बतायी गयी हैं। वास्तविकता में ये अहंकार की सात प्रधान वृतियाँ ही होती हैं। जब ज्ञान की अनुभूति व धारणा हो जाती है तब ज्ञान अहंकार एकरस होकर शान्त हो जाता है। ज्ञान अहंकार का संतुष्ट हो जाना ही कागभुसुंड की अवस्था होती है। इसलिए कागभुसुंड रूपी ज्ञान का भाव ही राम की भक्ति का अधिकारी होता है।
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।
ते श्रोता वकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।।
व्याख्या : उसी परमज्ञान के अहंकार की अनुभूति को याज्ञवल्क्य ऋषि ने प्राप्त किया और उसी अनुभूति को भरद्वाज ऋषि को सुनाया। वे दोनों श्रोता और वक्ता समान शीलता वाले हैं और सब कुछ जानने वाले व परमात्मा की लीलाओं को समझने वाले हैं।
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना।।
औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।
व्याख्या : स्वयं को जान लेने पर तीनों कालों का ज्ञान हो जाता है और सब कुछ हथेली पर रखे आँवले की तरह हो जाता है। बहुत से और हरि भक्तों ने भी परम ज्ञान को नाना प्रकार से समझा और कहा है।
दो0 मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।30(क)।।
व्याख्या : मैंने भी परमात्मा की यश की कथा को मेरे गुरु के सानिध्य में सूकर खेत (अर्थात् विषय वासनाओं में फँसी हुई अवस्था) में सुनी है, जो मेरे अबोधपन के कारण मुझे पूरी तरह समझ में नहीं आयी थी क्योंकि उस समय में भोगों में अचेत अर्थात् बेहोश होकर भोगों में फँसा हुआ था।
दो0 श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)।।
व्याख्या : मैं उस परम रहस्य वाली परमात्मा की कथा को समझता भी कैसे क्योंकि श्रोता और वक्ता तो दोनों ज्ञान के समुद्र थे और मैं देहबुद्धि के विकारों से ग्रसित मूर्ख था। साधक के हृदय में ही श्रोता और वक्ता रहते हैं, जो निरन्तर आपस में बातें करते रहते हैं। वे दोनों ज्ञान के समुद्र होते हैं परन्तु जब तक साधक निर्मल होकर साधना में परिपक्व नहीं होता है, तो उनकी बातों को समझ नहीं पाता है।
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।।
भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई ।।
व्याख्या : हालाँकि मेरे गुरुदेव ने मुझे बार-बार समझाया परन्तु मुझे तो मेरी बुद्धि के अनुसार कुछ ही समझ में पड़ी थी। मैं मेरे मन के बोध के अनुसार उसी को मेरी भाषा में लेखनी बद्ध कर रहा हूँ।
जस कहु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।।
निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।।
व्याख्या : जैसा मेरा बुद्धि और विवेक का बल है, मैं उसी के अनुसार परमात्मा की प्रेरणा से ही उस कथा को कहने जा रहा हूँ जो स्वंय के संदेह, मोह व भ्रम का नाश करने वाली है और भावों की सरिता को पार कराने वाली है।
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। राम कथा कलि कलुष बिभंजनि।।
राम कथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।।
व्याख्या : परमात्मा की कथा विद्वानों को विश्राम देने वाली व समस्त साधकों के मन को संतुष्ट करने वाली तथा देहबुद्धि के विकारों का नाश करने वाली है। राम की कथा कलियुग रूपी सर्पों के लिए अर्थात देहबुद्धि से उत्पन्न वासनाओं के लिए मयूर के समान है और विवेक रूपी अग्नि को जलाने के लिए लकड़ी के समान है।
राम कथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजन भ्रम भेक भुअंगिनी।।
व्याख्या : परमात्मा की कथा कलियुग में कामधेनु गाय की तरह है अर्थात् साधक की सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है। सज्जन लोगों के लिए यह संजीवनी जड़ी की तरह है। यह राम कथा धरती पर अमृत की नदी के समान है और वासनारूपी सर्पों के भय को दूर करने वाली है।
असुर सेन सम नरक निकंदनि। साधु बिबुध कुलहित गिरि नंदिनी।।
संत समाज पयोदि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।।
व्याख्या : आसुरी भावों की चिन्ता रूपी सेना का नाश करनेवाली और साधना में लगे हुए लोगों का हित करने के लिए दुर्गा के समान हैं। यह कथा संत समाज के लिए क्षीरसागर में लक्ष्मी के समान है अर्थात्त भावों के समुद्र में भावों के लक्षणों को समझने में सहायक है। यह कथा विश्व के समस्त भार को सहने के लिए पृथ्वी के समान है अर्थात् इसमें ज्ञान को धारण करने की युक्ति बतायी गयी है, इसलिए यह धरती के समान है।
जम गन मुँह मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसीदास हित हियँ हुलसी सी।।
व्याख्या : यह कथा यम के दूतों के मुँह पर कालिख लगाने के लिए यमुना के समान है और जीवन मुक्त होने के लिए काशी के समान है। यह कथा परमात्मा को तुलसी के समान प्रिय है और तुलसीदास का यह माता हुलसी के समान हित करने वाली है।
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।
सद्गुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।
व्याख्या : शिव को यह नर्मदा के समान प्रिय है तथा समस्त सिद्धियों, सुख व सम्पति को देने वाली है। सद्गुणों को पैदा करने के लिए देवमाता अदिति के समान है तथा परमात्मा की भक्ति के प्रति प्रेम की सीमा है।
दो0 राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारू।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारू।।31।।
व्याख्या : परमात्मा के चरित की कथा मंदाकिनी के समान और निर्मल चित ही चित्रकूट है तथा साधक का नि:स्वार्थ प्रेम ही सीता और राम का वन में विचरना है।
रामचरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।।
जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
व्याख्या : परमात्मा के चरित सुन्दर चिन्तामणि हैं तथा संत जनों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुन्दर श्रृंगार है तथा परमात्मा के चरित का गुणगान जगत का कल्याण करने वाला और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम को देने वाला है।
सद्गुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।।
जननी जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के।।
व्याख्या : यह कथा ज्ञान व वैराग्य के लिए सद्गुरु है और संसार के रोगों का नाश करने के लिए विद्वान वैद्य के समान है। यह कथा सीता (प्राणशक्ति) और राम (आत्म तत्व) के प्रति प्रेम पैदा करने वाली है तथा समस्त व्रत व धर्म के नियमों का पालन कराने वाली है।
समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।।
सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।।
व्याख्या : यह कथा चिन्ताओं से उत्पन्न दु:खों का नाश करनेवाली तथा लोक व परलोक को सुधारने वाली है। सद्विचार रूपी राजा के लिए मंत्री और योद्धा के समान है तथा लोभ रूपी समुद्र को सुखाने के लिए अगस्त्य ऋषि के समान है।
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के।।
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के।।
व्याख्या : साधक के मन रूपी वन में देहबुद्धि से उत्पन्न काम व क्रोध रूपी हाथियों को मारने के लिए यह कथा सिंह के समान है। यह कथा पुरारि पुरअअरि अर्थात् जो साधक देह (पुर) बुद्धि का शत्रु है यानी जो देहबुद्धि से ऊपर उठ गया है, उस साधक के लिए यह कथा परमपूज्य अतिथि की तरह है और अज्ञान रूपी दरिद्रता की अग्नि बुझाने के लिए कामनापूर्ण करे वाले बादलों की तरह है।
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भालके।।
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।।
व्याख्या : यह कथा विषय रूपी सर्पों के लिए मंत्र रूपी महामणि के समान है अर्थात् विषयों के अंधकार में ज्ञान रूपी प्रकाश करने वाली है तथा मंद प्रारब्ध को मिटाने वाली है। यह कथा मोह रूपी अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य के समान और सेवक रूपी धान को पालने के लिए मेघ के समान है।
अभिमत दानि देवत डिग्री बर से। सेवत सुलभ सुखद हरिहर से।।
सुकबि सरद नभ मन उड़गन से। राम भगत जन जीवन धन से।।
व्याख्या : मनोकामना पूर्ण करने के लिए यह कल्पवृक्ष के समान है और इसका अनुसरण करना आसान व सुखद है तथा यह आत्मा (हर) से माया का आवरण दूर करने वाली (हरि) है। यह कवियों के शरद ऋतु रूपी मन के आकाश को सुशोभित करने के लिए तारों के समान है तथा परमात्मा के भक्तों के लिए तो यह जीवन की सम्पत्ति ही है।
सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरूपधि साधु लोग से।।
सेवक मन मानस मराल से। पावन गंग तरंग माल से।।
व्याख्या : समस्त पुण्यों के फल के भोग के समान व जगत का कल्याण करने में साधुओं के समान है। यह कथा भक्तों के मन रूपी सरोवर के हंस के समान है तथा पवित्र करने में गंगा में उठने वाली तरंग मालाओं के समान है।
दो0 कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।32(क)।।
व्याख्या : परमात्मा की यह अनुभूति कथा कुमार्ग, कुतर्क, कुटिलता व देह विकारों से उत्पन्न कपट, दम्भ व पाखण्ड को जलाने के लिए वैसे ही है जैसे ईंधन के लिए प्रचण्ड अग्नि होती है।
दो0 राम चरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।
व्याख्या : परमात्मा के चरित चन्द्रमा के समान सबको सुख देने वाले होते हैं परन्तु कुमुदिनी और चकोर रूपी चित वाले साधकों के लिए यह चरित विशेष कल्याण करनेवाला है।
कीन्हि प्रश्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।।
सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथा प्रबंध बिचित्र बनाई।।
व्याख्या : जिस प्रकार भवानी ने प्रश्न किए अर्थात् साधक के हृदय में साधना के समय जैसे श्रद्धा (भवानी) के भाव आते हैं, वैसे-वैसे ही विश्वास रूपी शंकर शंकाओं का समाधान करते रहते हैं। इसलिए तो शंका नाश्यति शंकर कहा जाता है। उसी परम अनुभूति को सबके कल्याण के लिए मैं यहाँ गा कर और सुन्दर प्रबंध में कविता बनाकर कह रहा हूँ। इससे स्पष्ट है कि रामायण की रचना तुलसीदास ने अपनी निज अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए ही की है।
जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई।।
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।।
व्याख्या : जिन्होंने यह कथा नहीं सुनी है, वे आश्चर्य न करें। जो ज्ञानी लोग इस अलौकिक (अर्थात् संसार से परे) को सुने, वे भी आश्चर्य नहीं करें। क्योंकि यह तो आत्म अनुभूति की कथा है।
राम कथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।।
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।।
व्याख्या : आत्म अनुभूति की कोई सीमा नहीं होती है, जिनके मन में ऐसा विश्वास होता है, वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं करते हैं। क्योंकि आत्म अनुभूति नाना प्रकार से सम्भव है, इसलिए रामायन अर्थात् आत्म अनुभूति का विषय सत्य के स्तर के समान अपार होता है। जैसे परमशक्ति के सत्य को पूरी तरह नहीं जाना जा सकता है। वैसे ही आत्मा की अनुभूति भी अपार होती है। इसलिए इसे सत (सत्य) कोटि (स्तर) कहा गया है।
कलप भेद हरि चरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।
करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सादर रति मानी।।
व्याख्या : कल्पना के भेद के अनुसार हरि चरित अर्थात् माया के हरण की अवस्था भिन्न-भिन्न होती है। इसलिए नाना मुनियों ने आत्म अनुभूति को नाना प्रकार से बताया है। इसलिए ऐसा विचार करके संशय न करें और आदरपूर्वक रूचि लगाकर सुनें।
दो0 राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल बिचार।।33।।
व्याख्या : आत्म तत्व अनंत हैं और अनंत ही परमात्मा के गुणों का विस्तार है। अत: जिनके निर्मल विचार हैं, वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं करेंगे।
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी।।
व्याख्या : इस प्रकार सब संशयों को दूर करके और गुरु के चरणों की धूल को सिर पर रखकर और सबको हाथ जोड़कर आत्म अनुभूति की कथा करता हूँ, जिससे कोई भूल नहीं हो।
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।।
संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।।
व्याख्या : अब मैं परमशिव को सिर नवाकर परमात्मा के गुणों की कथा वर्णन करता हूँ। संवत सोलह सौ इकतीस में मैं यह परमात्मा के चरणों को सिर पर रखकर (अर्थात् ध्यान की अवस्था में) कथा का वर्णन करता हूँ। अर्थात् परमात्मा की सत्ता (पद) के सामने समर्पण करके आत्म अनुभूति की कथा का वर्णन करता हूँ।
नौमी भौमबार मधुमासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा।।
जेहि दिन राम जन्म श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।।
व्याख्या : चैत्र मास के नवमी मंगलवार के दिन शरीर में ध्यान करते समय यह आत्म अनुभूति हुई। वेद बताते हैं कि जिस दिन आत्मा का साक्षात्कार (जन्म) होता है। उस समय समस्त गुण (सत, रज व तम) समझ में आ जाते हैं।
असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।।
जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।
व्याख्या : उस अवस्था में प्राण वायु से उत्पन्न समस्त भाव आत्मा में रमण करने लग जाते हैं। उसी को असुर, नाग, खग, नर, मुनि व देव कहा गया है। जो सज्जन राम के जन्म अर्थात् आत्मा की अनुभूति करते हैं। वे नाना प्रकार से परमात्मा के गुणों का गान करने लगते हैं।
दो0 मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर श्याम सरीर।।34।।
व्याख्या : आत्म ज्ञान की अवस्था में सज्जन लोगों के देवीय भावों के समूह पवित्र स्वरों से गमनागमन करने लगते हैं। इसे ही पवित्र सरयू का पानी कहा गया है। उस अवस्था में साधक हृदय में परमात्मा का ध्यान धरकर राम नाम का जप करते रहते हैं। जिससे सुन्दर सूक्ष्म शरीर का आभास होता रहता है।
दरस परस मज्जन अ डिग्री पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना ।।
नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारदा बिमल मति।।
व्याख्या : दरस अर्थात् दस इन्द्रियों का रस जब परस अर्थात् आत्मा के आनन्द का रस का पान व मज्जन करने से पवित्र हो जाता है, तो समस्त चिन्ताओं (पाप) का नाश हो जाता है। ऐसा सभी वेद व पुराण कहते हैं। यह अनुभूति गहरे ध्यान की अवस्था में होती है, जब सुष्मना नाड़ी में प्राण चलता रहता है। सुष्मना नाड़ी ही पवित्र भावों की नदी है, जिसकी महिमा अपरम्पार है। जिसका वर्णन पूरी तरह निर्मल बुद्धि होने पर भी नहीं किया जा सकता है।
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।।
चारि कानि जग जीव अपारा। अवध तजें तनु नहिं संसारा।।
व्याख्या : उस अवस्था में समझ में आ जाता है कि यह शरीर आत्मा रूपी राम का पवित्र घर है। ये समस्त लोकों में जाना जाता है। संसार में चार प्रकार के (अंडज, पिंजड, जरायुज व उद्भिज) जीव होते हैं परन्तु अवध अर्थात आत्मा द्वारा त्याग करते ही संसार में शरीर नहीं रह पाता है।
सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।।
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।।
व्याख्या : यह पुरी अर्थात् पवित्र शरीर सब प्रकार से मनोहर होता है तथा समस्त सिद्धियों को देने वाला व मंगल की खान होता है। अब मैं अनुभूति में आने वाली परमात्मा की निर्मल कथा का आरम्भ करता हूँ, जो सुनने पर काम, मद व दम्भ का नाश करने वाली है।
राम चरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।।
मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई।।
व्याख्या : इस आत्म अनुभूति की कथा का नाम राम चरित मानस है, क्योंकि मैंने मेरे मानस में इस आत्म अनुभूति को समझा है। इस कथा को सुनते ही कानों को विश्राम मिल जायेगा तथा मन की विषय वासनाएँ ज्ञान रूपी अग्नि में जल जायेंगे। अत: वे लोग सुखी हो जायेंगे, जो इस मानस रूपी सरोवर पर आयेंगे।
राम चरित मानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।।
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।।
व्याख्या : यह आत्म अनुभूति की कथा स्वयं (शंभू) साधक ने पवित्रता के साथ रची है। इसलिए ये रामचरित मानस की कथा मुनियों के मन को अच्छी लगने वाली है। यह सत, रज, तम गुणों से पैदा होने वाले दोषों का नाश करने वाली तथा दु:ख व दरिद्रता को दूर करने वाली है। यह कथा देहबुद्धि की कुचालों और विकारों का नाश करने वाली है।
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।।
तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।।
व्याख्या : इस कथा की अपने मानस में रचना करके शिव ने रख रखा था और उसी को सुसमय आने पर पार्वती को सुनाया ता। यहाँ वास्तविक रहस्य यह है कि जब साधक साधना द्वारा महाऐश्वर्य की अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब उसे अपने मानस में परमात्मा के नाना चरितों की अनुभूति होती है और उसी अनुभूति को अपनी श्रद्धा (शिवा) के द्वारा अभिव्यक्त करता है। इसी अवस्था को ""शिवा सन भाषा"" कहा जाता है। इसलिए मैंने प्रसन्नतापूर्वक हृदय में विचार कर इस कथा का नाम रामचरित मानस रखा है।
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।
व्याख्या : उसी रामचरित मानस की सुखद कथा को कहता हूँ इसलिए हे सज्जनों! आप आदरपूर्वक मन लगाकर सुनि।
दो0 जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।
व्याख्या : जिस प्रकार आत्म अनुभूति की कथा मानस में आयी और जगत में जैसे प्रचार हुआ। उस सबको श्रद्धा (उमा) और विश्वास (शिव) से कहता हूँ।
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरित मानस कबि तुलसी।।
करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।।
व्याख्या : शंभू प्रसाद अर्थात् स्वयं परमात्मा की कृपा से हृदय में सुबुद्धि पैदा हो गयी और तुलसीदास द्वारा रामचरित मानस की रचना हो गयी। तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार इसे मनोहर बना दिया। अत: जो सज्जन और निर्मल चितवाले हैं, वे इसे सुनकर अच्छी तरह धारण कर लेंगे।
सुमित भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।।
बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।।
व्याख्या : सुबुद्धि रूपी धरती और हृदय रूपी गहराई है तथा वेद-पुराण रूपी समुद्र है तथा साधना में लगे हुए साधक मेघ के समान हैं, जिनसे परमात्मा का यश रूपी जल बरस रहा है , जो मधुर, मनोहर व मंगल करने वाला है।
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।।
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतल ताई।।
व्याख्या : परमात्मा की लीला का गुणों सहित वर्णन करने से पवित्रता बढ़ती है, जो मल रूपी विकारों को दूर कर देती है। परमात्मा की प्रेम भक्ति जिसका वर्णन करना सम्भव नहीं है, वहीं मधुरता व साधक को परम शीतलता देने वाली है।
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।।
मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।।
व्याख्या : परमात्मा के गुण रूपी जल से सुकृत्य रूपी धान का हित होता है। वह सुकृत्य रूपी धान ही परमात्मा के भक्तों का जीवन होता है। जब परमात्मा की भक्ति के प्रेम रूपी जल को सद्बुद्धि रूपी भूमि मिल जाती है, तो वह कानों के माध्यम से साधक के हृदय में जमा होकर सुहावना हो जाता है।
भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रूचि चा डिग्री चिराना।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में मन की भावना अच्छी होकर परमात्मा के चरणों में स्थिर हो जाती है, जिससे साधक को सुख देने वाली शान्ति मिल जाती है और परमात्मा की भक्ति में सुन्दर रूचि लग जाती है।
दो0 सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।
व्याख्या : इस कथा के सुंदर संवाद को बुद्धि के अनुसार विचार करके रचा है। अत: इस पवित्र कथा रूपी सरोवर के धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी घाट हैं। अर्थात् इस कथा के श्रवण व अनुसरण से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।।
रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।।
व्याख्या : इस पवित्र कथा के सात खण्ड ही सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जिन्हें ज्ञान रूपी आँखों से मन ने देखकर माना है। परमात्मा की महिमा गुणों से परे व असीम है। इसलिए मैं यहाँ उसी अगाध समुद्र रूपी कथा का वर्णन कर रहा हूँ।
राम सीय जस सलिल सुधा सम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।।
पुरइनि सघन चा डिग्री चौपाई। जुगति मंजु मनि सीप सुहाई।।
व्याख्या : परमात्मा की कथा रूपी अथाह समुद्र में राम (आत्मा) व सीता (प्राणशक्ति) रूपी अमृत के समान जल है और उपमा विशाल समुद्र के सुन्दर तट हैं। सुन्दर चौपाइयाँ ही सघन कमलिनी हैं और कहने की सुन्दर युक्ति ही सीप के समान है।
छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।।
अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।।
व्याख्या : छंद, सोरठा और सुन्दर दोहे ही बहुत से रंगों वाले कमलों का परिवार है। सुभाव अर्थात अच्छे भावों का अनूपम अर्थ ही अच्छा महसूस (सुभासा) कराने वाला है और वही सद्गुण रूपी फूलों का पराग व मकरंद की सुगंध है।
सुकृत पुंज मंजुल अलिमाला। ग्यान बिराग बिचार मराला।।
धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।।
व्याख्या : सुकृत्यों (पुण्यों) का समूह ही भ्रमरों की माला है और ज्ञान व वैराग्य के विचार रूपी हंस हैं और जो पुण्य समूह रूपी भ्रमर ध्वनि कर रहे हैं। वही कविता के गुण हैं, जो नाना प्रकार से साधक के मन को आकर्षित करते हैं।
अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।।
नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चा डिग्री तड़ागा।।
व्याख्या : परमात्मा की इस कथा में ज्ञान व विज्ञान का विचार करके पुरुषार्थ के चारों (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) सोपानों के बारे में कहूँगा। परमात्मा की कथा रूपी सुन्दर सरोवर में भक्ति के नौ रस, जप, तप, योग व वैराग्य रूपी जल के प्राणी हैं।
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।।
संत सभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।।
व्याख्या : परमात्मा के नाम का गुणगान करना ही अच्छी साधना रूपी जल के पक्षी हैं। संतों की सभा ही सुन्दर वाटिका है और मन में श्रद्धा की भावना ही बसंत ऋतु के समान है।
भगति निरूपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।।
सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरिपद रति रस बेद बखाना।।
व्याख्या : परमात्मा के गुणगान रूपी इस कथा में भक्ति का वर्णन ही नाना प्रकार के वृक्ष हैं और क्षमा, दया व दम के भाव ही नाना प्रकार की बेल हैं। सम, यम व नियम रूपी फूल हैं और जिनमें ज्ञान रूपी फल लगे हुए हैं। परमात्मा के चरणों में अनुराग ही फलों का रस है, जिसका वेदों ने वर्णन किया है।
औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबदन बिहंगा।।
व्याख्या : परमात्मा की कथा के और भी बहुत से प्रसंग हैं, वे तोता, कोयल व नाना प्रकार के पक्षी हैं।
दो0 पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारू।।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारू।।37।।
व्याख्या : परमात्मा की भक्ति के उत्साह (पुलक) रूपी वाटिका व बाग में सुख रूपी पक्षी विहार करते हैं और साधक रूपी माली प्रेम रूपी जल से लग्न लगाकर सिंचाई करता है।
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।
सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।।
व्याख्या : जो इस रामचरित मानस को समझकर गाते हैं, वे ही साधक लोग इस पवित्र सरोवर के रखवाले हैं। जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, वे इस मानस सरोवर के अधिकारी हैं अर्थात् वे लोग आत्म अनुभूति के रहस्य को समझ सकते हैं।
अति खल जे बिषई बग कागा। एहि सर निकट न जाहिं अभागा।।
संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।।
व्याख्या : जो लोग बहुत ही मूर्ख है, वे बगुला और कौआ की तरह हैं, वे दुर्भाग्यशाली लोग इस पवित्र सरोवर के निकट नहीं जाते हैं क्योंकि इस मानस सरोवर में घोंघे, मेढ़क और सेवार के समान विषय रस की नाना कथाएँ नहीं हैं।
तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।।
आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।।
व्याख्या : इसी कारण ऐसे लोग (जिनका परमात्मा की कथा में रूचि नहीं होती है) निराश होकर इस रामचरित सरोवर के निकट आते हैं। ऐसे लोग कामवासना में फँसे हुए कौए और बगुले हैं। परमात्मा की कथा रूपी सरोवर के निकट ऐसे लोग बहुत कठिनाई से आ पाते हैं। वो भी बिना परमात्मा की कृपा के नहीं आ पाते हैं।
कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।।
गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।।
बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।
व्याख्या : इस पवित्र सरोवर पर आना कठिन होता है, क्योंकि कुसंगता के कारण और विषय वासना रूपी मार्ग के सर्पों के कारण जीव इस रास्ते पर जाने से घबरा जाता है और विषयी लोगों के वचन ही सरोवर के रास्ते के सिंह, बंदर और सर्प होते हैं। गृहस्थ जीवन के नाना प्रकार के जंजाल सरोवर के रास्ते के दुर्गम बड़े पर्वत होते हैं। भयंकर मोह और मद रूपी वन होता है, जिसमें कुतर्क रूपी भयंकर नदियाँ बहती हैं।
दो0 जो श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।
व्याख्या : जिन लोगों को श्रद्धा का सहारा नहीं है और संत जनों का साथ नहीं मिलता है तथा जिन्हें परमात्मा प्रिय भी नहीं लगते हैं। उनके लिए यह रामचरित मानस समझ से बाहर है।
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई ।।
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।।
व्याख्या : इतनी दुर्गमता को पार करके अगर कोई कष्ट उठाकर मानस सरोवर पर पहुँच भी जाता है, तो उसे वहाँ जाकर नींद आ जाती है, जिससे अज्ञानता रूपी पर्दा उसके हृदय पर लग जाता है, इसलिए वह अभागा कथा रूपी मान सरोवर में पानी नहीं पी पाता है।
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।।
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।।
व्याख्या : वह आलस्य आदि विकारों के कारण परमात्मा की कथा रूपी मानस सरोवर में पान नहीं कर पाता है और अभिमान सहित वापिस लौटकर आ जाता है। ऐसे लोगों से अगर कोई कथा के बारे में पूछता है, तो उल्टा मानस रूपी सरोवर की निंदा ही करते हैं।
सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।।
सोइ सादर सर मज्जन करई। महाघोर त्रयताप न जरई।।
व्याख्या : परन्तु जिस पर परमात्मा की कृपा हो जाती है, उसे कोई बिघ्न-बाधा नहीं आती है और वह आदरपूर्वक रामचरित मानस रूपी सरोवर में स्नान करके तीनों तापों (दैहिक, दैवीक, भौतिक) के कष्टों से मुक्त हो जाता है।
तें नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ।।
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।।
व्याख्या : जिनकी परमात्मा के चरणों में भावना लगी रहती है, वे लोग कभी भी इस मानस सरोवर को नहीं छोड़ते हैं। अगर किसी को मानस रूपी सरोवर में नहाना है, तो मन को लगाकर सत्संग कीजिए।
अस मानस मान चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।।
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।।
व्याख्या : जो मनुष्य मन लगाकर सत्संग करते हैं, वे ही मानस सरोवर के रस को चख पाते हैं और उनकी बुद्ध में निर्मल कवित्व की क्षमता आ जाती है, जिससे हृदय में आनन्द का उत्साह छा जाता है और प्रेम व प्रमोद का प्रवाह उमड़ने लगता है।
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।।
सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।।
व्याख्या : उस आत्म अनुभूति की अवस्था में कविता रूपी सुन्दर नदी बह उठती है, जिसमें परमात्मा के निर्मल यश रूपी जल भरा रहता है। उस नदी का नाम सरयू है, (अर्थात सुष्मना नाड़ी में जब प्राण का संचार हो उठता है, तब आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति कविता बनकर फूट पड़ती है) जो सब मंगलों का मूल होती है। उस नदी के लोक और बेदमत दो सुन्दर किनारे होते हैं।
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन त डिग्री मूल निकंदिनि।।
व्याख्या : सरयू नदी पवित्र होती है, जो सुमानस अर्थात् आत्म अनुभूति की अभिव्यक्ति करने वाली होती है तथा देहबुद्धि के विकारों के मूल को जड़ से नष्ट करने वाली होती है। साधक जब साधना द्वारा सुष्मना नाड़ी में अपने प्राण का प्रवाह स्थिर कर लेता है, तब यह सुमानस (आत्म अनुभूति) की अवस्था घटित होती है।
दो0 श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।
व्याख्या : इस शरीर रूपी समाज में तीन स्वरों वाले (अर्थात् ईड़ा, पिंगला और सुष्मना) श्रोता अर्थात् भाव होते हैं तथा उन भाव रूपी नदी के ज्ञान व अज्ञान रूपी दो किनारे होते हैं अर्थात् ईड़ा, पिंगल व सुष्मना नाड़ियों से शरीर में भाव पैदा होते हैं, जो ज्ञान व अज्ञान के दो भागों में बँट जाते हैं। जब साधक के संशय का अंत हो जाता है, तब वह संतसभा (अर्थात् संशय रहित भावों की अवस्था) अनुपम जीवात्मा (अवध) की अनुभूति कराने वाली व समस्त मंगलों का मूल होती है।
राम भगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।।
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।।
व्याख्या : परमात्मा की भक्ति से शरीर में आनन्द की सुरसरि होने लग जाती है और विशेष आनन्दरस बरसने लग जाता है और सुष्मना स्वर के माध्यम से यह अवस्था प्राप्त होती है। उस अवस्था में सानुज अर्थात् आत्मा लक्षणों सहित भावों के समर को जीत कर सुयश प्राप्त कर लेती है, जिससे महानद सोन का मिलना कहा जाता है अर्थात परम आनन्द की अवस्था आ जाती है। क्योंकि ईड़ा-पिंगला व सुष्मना के तीनों स्वर एक होकर महानद बन जाते हैं।
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।।
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरूप सिंधु समुहानी।।
व्याख्या : उस महानद के बीच में भक्ति रूपी धारा देव ध्वनि (अर्थात् सात्विक भाव पैदा करती हुई) करती हुई बहती है, जिसमें ज्ञान व वैराग्य रूपी जल शोभा देता रहता है। ये नदी तीनों प्रकार के तापों का नाश करने वाली त्रिधारा का संगम है, जो परमात्मारूपी समुद्र में समाने के लिए बहती चली जाती है।
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।।
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।।
व्याख्या : यह पावन नदी आत्म अनुभूति का मूल होती है, जिसकी अनुभूति को सुनते ही सज्जन लोग अपने मन को पवित्र कर लेते हैं। बीच-बीच में नाना प्रकार की कथाएँ अर्थात् आत्मा अनुभूति की अभिव्यक्ति के प्रतीक नदी के दोनों तरफ लगे हुए बाग व बगीचों के समान हैं।
उमा महेस बिबाह बाराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।।
रघुबर जनम अनंद बधाई। भँवर तरंग मनोहरताई।।
व्याख्या : पार्वती और शिव के विवाह के बाराती महानद रूपी नदी के जल में नाना प्रकार के जलचर के समान हैं। पार्वती कातात्पर्य श्रद्धा से है और शिव का तात्पर्य विश्वास से है। अत: साधना की परिपक्वता से जब श्रद्धा और विश्वास के भाव आपस में एक हो जाते हैं, उसे ही शिव-पार्वती के विवाह के प्रतीक के रूप में बताया गया है। श्रद्धा और विश्वास जब एक हो जाते हैं, तब सभी प्रकार के भाव बारातियों की तरह साथ हो जाते हैं। उस अवस्था में आत्मा की अनुभूति होने लग जाती है, उसी को प्रतीकों के माध्यम से राम के जन्म का आनन्द बताया गया है और आत्मानुभूति से जो सुख मिलता है, वही भावों में उड़ने वाली आनंद की तरंगें है, जो मन का हरण करके आत्मानन्द में लगा देती हैं।
दो0 बाल चरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग।।40।।
व्याख्या : आत्म तत्व के धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी जो चरित्र हैं, वे नाना रंगों के कमलों के समान हैं और नाना प्रकार के भाव राजा, रानी व परिवारजन हैं तथा सुकृत्य करने के भाव ही भ्रमर और जल के पक्षीगण हैं। आत्मानुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए नाना प्रतीकों की जरूरत पड़ती है, इसलिए विभिन्न प्रतीकों का सहारा लेकर कथा को लिखा जाता है।
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।।
नदी नाव पटु प्रश्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।।
व्याख्या : सीय स्वयंबर का तात्पर्य है श्वास (प्राण) से उत्पन्न भावों की प्रक्रिया को स्वयं वरन करना अर्थात् समझना। ये सब भाव स्वर रूपी नदियों से निकलते हैं और स्वरों के अनुसार ही भावों की भावना (छबि) बनती है। साधक द्वारा विवेकपूर्वक अपने-आप से प्रश्न पूछना ही नाव के समान है और विवेक पूर्वक अन्त:स्थल में प्रश्नों के उत्तर को समझ लेना ही केवट का प्रतीक है. साधक को ध्यान अवस्था में अपने आप प्रश्न उठते रहते हैं और परमात्मा की प्रेरणा से उन प्रश्नों का समाधान भी मिलता रहता है। उसी अनुभूति को व्यक्त करने के लिए नदी, नाव व केवट के प्रतीकों का सहारा लिया गया है।
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।।
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।।
व्याख्या : आत्म अनुभूति की कथा को सुनकर आपस में जो वार्तालाप होता है, वही नदी के किनारे चलने वाले पथिकों का प्रतीक है। परशुराम का क्रोध इस नदी की घोर धारा का प्रतीक है और आत्मारूपी राम की शान्त वाणी ही सुबुद्धि रूपी नदी का घाट है। भृगुनाथ का प्रतीक गम्भीर रहस्यवाला है। भग का तात्पर्य प्रकृति से होता है और भृगु का मतलब है जो प्रकृति में रमण करने वाला हो। अत: भृगुनाथ का मतलब हुआ जो प्रकृति अर्थात साधक जब भावों की वृति के अनुसार आचरण करता रहता है और अपने आपको परमात्मा का बड़ा साधक मानने का भ्रम पालकर चलता रहता है। साधक को जब आत्मज्ञान होने वाला होता है, तो उसे उसकी वृतियाँ रोकने का प्रयास करती रहती हैं और साधक के अन्त:स्थल में विशेष द्वन्द्व चलता रहता है। कई बार तो साधना पथ पर आगे बढ़ने से उसे भ्रम हो जाता है। इसी भावद्वन्द्व की अवस्था को समझाने के लिए नाना प्रतीकों का सहारा लिया गया है।
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।।
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।।
व्याख्या : अपने अनुजों के सहित राम के विवाह का उत्सव शुभ उमंग व सुख देने वाला है। आत्मा रूपी राम के भरत (अर्थात् भरिता का भाव जिसमें त्याग व संतोष दोनों सम्मिलित होते हैं और परमात्मा में भाव रत की अवस्था बनी रहती है, उसे ही भरत के प्रतीक के रूप में बताया गया है।) लक्ष्मण (अर्थात् भावों के लक्षणों को समझने वाला) व शत्रुघ्न (अर्थात् काम क्रोध रूपी भावों का दमन करने वाला) रूपी तीन भाई कहे गए हैं। वास्तविकता में ये चार भाई चित की चार अवस्थाओं के प्रतीक हैं और इनकी अभिन्नता एकता, सहयोगिता, प्रेम व भाईपना समस्त भावों का चित में समाने की अनुभूति के प्रतीक हैं। अत: जो लोग इस आत्मकथा को कहते और सुनते हैं, वे कथा रूपी नदी के जल में प्रसन्न मन से स्नान करते हैं।
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।।
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।
व्याख्या : राम का राजतिलक अर्थात् चित में समस्त भावों का समा जाना ही मंगल का सामान है और समस्त भावों का जुड़ना ही त्यौहार का योग है। वासना रूपी भोग इच्छा ही केकई रूपी जल की काई है, जिसके कारण जीवात्मा को दु:ख होता है।
दो0 समन अमित उतपात सब भरत चरित जपजाग।
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग।।41।।
व्याख्या : भरत चरित अर्थात् त्याग और संतोष के आचरण से समस्त विषय-वासनाओं के उत्पात शान्त हो जाते हैं। देहबुद्धि के विकार वाले मूढ़ वचन ही जल के कीचड़ के बगुले और कौए हैं।
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।।
हिम हिम सैल सुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।।
व्याख्या : परमात्मा की अनुभूति रूपी सरिता का यश ही छ: ऋतुओं का प्रतीक है, जो समय को अनुकूल और पवित्र करने वाली हैं। शिव और पार्वती (अर्थात् विश्वास और श्रद्धा का मिलन) का विवाह ही हेमंत ऋतु का प्रतीक है और आत्मा की अनुभूति का आरम्भ ही सुख देने वाली शिशिर ऋतु का प्रतीक है।
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू।।
ग्रीषम दुसह राम बन गवनू। पंथ कथा खर आतप पवनू।।
व्याख्या : राम के विवाह (अर्थात् चित निरोध की अवस्था) का वर्णन ही प्रसन्नता व मंगल को देने वाली बसन्त ऋतु है। राम का वन गमन अर्थात् विषय वासनाओं से युक्त शरीर भाव को छोड़कर आत्मरत होना ही साधक के लिए गर्मी के ऋतु के समान लगता है। क्योंकि प्रारम्भ में वासनाओं को छोड़ना बहुत कष्ट देता है परन्तु वह अवस्था बाद में सुखद व कल्याणकारी हो जाती है। साधना के पथ में आनेवाली बाधाएँ ही गर्म हवा (लू) के समान हैं।
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।।
राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई।।
व्याख्या : काम, क्रोध व मदादि रूपी आसुरी भाव ही वर्षा ऋतु के प्रतीक हैं तथा दैवीय भाव रूपी धान मंगल करनेवाला है। राम राज (अर्थात् चितनिरोध की अवस्था) सुख और विनय को बढ़ाने का प्रतीक है, जिससे सुख की प्राप्ति होती है, वही शरद ऋतु की अवस्था है।
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।।
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।
व्याख्या : जब श्वास अति निर्मल होकर सिर में मणि की तरह स्थिर होती है तो उस अवस्था की अनुभूति के गुणों का वर्णन साधक के लिए अनुपम मार्ग होता है क्योंकि उस समय उत्पन्न होने वाले गुण भाव निर्मल होते हैं। त्याग व संतोष (भरत) के भाव साधक को शान्ति देने वाले होते हैं, जो सदैव एकरस रहते हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। संतोष और त्याग के भाव हर अवस्था में जीवात्मा को शान्ति देने वाले होते हैं। अत: भरत के स्वभाव को सदा एकरस बोला गया है।
दो0 अवलोकनि बोलनिमिलनि प्रीति परसपर हास।
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।
व्याख्या : चारों भाइयों का देखना, बोलना मिलना, एक दूसरे से प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपना जल की मधुरता और सुगन्ध का प्रतीक है। चित की अवस्था के चार भाव जब एक होते हैं, तो चित की धड़कन से निकलने वाले हार्मोन मधुर अर्थात सात्विक होते हैं और सात्विक हार्मोनों से सद्गुणी भाव पैदा होते हैं। ये सद्गुणी भाव ही हार्मोन रूपी जल की सुगन्ध होते हैं।
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।।
अद्भुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी।।
व्याख्या : साधक का आर्त भाव व दीनता इस जल का हल्कापन है। यह हार्मोन रूपी जल अद्भुत है तथा सुनने में बहुत गुणकारी है तथा आशा रूपी तृष्णा से मन में पैदा होने वाले विकारों को मिटा देने वाला है। कहने का तात्पर्य है कि साधक द्वारा निष्काम भाव से साधना करना ही उत्तम पथ है तथा कुछ भी चाह करना ही हल्कापन है।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी।।
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।।
व्याख्या : चित निरोध से उत्पन्न हार्मोन रूपी जल परमात्मा के प्रति प्रेम को बढ़ाता है और देह विकारों से पैदा होने वाली समस्त ग्लानी को दूर करता है। यह हार्मोन रूपी जल भावों से उत्पन्न दु:खों को दूर करता है और संतोष के भाव पैदा करता है तथा दरिद्रता व चिन्ताओं को दूर करता है।
काम क्रोध मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन।।
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।।
व्याख्या : चित निरोध से उत्पन्न हार्मोन रूपी जल काम, क्रोध, मद व मोह के भावों का नाश करता है तथा निर्मल विवेक और वैराग्य को बढ़ाता है। इसलिए जो लोग आदरपूर्वक चित निरोध के जल का पान करते हैं, उनके हृदय के समस्त पापों (चिन्ताओं) के कष्ट मिट जाते हैं।
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।।
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरहहिं मृग जिमि जीव दुखारी।।
व्याख्या : जो लोग इस पवित्र जल (अर्थात् चित निरोध के हार्मोन्स) से अपने भावों को पवित्र नहीं करते हैं, वे तो देह विकारों में फँसकर भयभीत रहते हैं। जैसे हिरण सूर्य की किरणों को जल समझकर जल की आशा में दु:खी होकर दौड़ता रहता है। वैसे ही विषय वासनाओं में लगा जीव संतोष रूपी जल के लिए दौड़ता रहता है और जल नहीं मिलने पर दु:खी रहता है।
दो0 मति अनुहारि सुबारी गुन गन गनि मन अन्हवाइ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।।
व्याख्या : साधक कवि अपनी बुद्दि के अनुसार चित निरोध से उत्पन्न पवित्र जल में अपने मन को स्नान करा करके और श्रद्धा व विश्वास के भावों को स्मरण करके आत्मानुभूति की कथा का वर्णन करता है।
दो0 अब रघुपति पद पंकरूह हियँ धरि पाइ प्रसाद।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।
व्याख्या : अब मैं परमात्मा के चरण कमलों को हृदय में धारण करके और परमात्मा की कृपा की प्रेरणा से दोनों मुनियों के मिलने के सुंदर संवाद का वर्णन करता हूँ।
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।।
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।।
व्याख्या : भरद्वाज मुनि तीर्थराज प्रयाग में निवास करते हैं, जिन्हें राम के चरणों में बहुत अनुराग है। भरद्वाज का तात्पर्य विवेक के प्रतीक से है। जब साधक का ध्यान प्रयाग अर्थात् ईड़ा, पिंगला व सुष्मना के मिलन स्थान भृकुटि में रहता है, तब विवेक का भाव प्रकट होता है, जो ज्ञान का प्रकाश करता है। अत: विवेक रूपी भरद्वाज मुनि को त्रिवेणी संगम प्रयाग में रहनेवाला बताया गया है। जब त्रिकुटि पर ध्यान रहता है, तब साधक परम तपस्वी, सम व दम का पालन करने वाला और सहज में दयालु भाव वाला होता है। उस अवस्था में वह परमार्थ अर्थात् परमात्मा के परम अर्थ को जानने वाला होता है।
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।
व्याख्या : जब साधना द्वारा आत्मा रूपी चेतन सूर्य विषय वासनाओं का त्याग करके मकर तार को पकड़कर उर्ध्वगामी हो जाता है, तब प्राणशक्ति के साथ सत, रज व तम के सब भाव भृकुटि (त्रिवेणी) पर आ जाते हैं और प्राण सुष्मना नाड़ी में स्थिर होकर मकर तार की तरह उर्ध्वगामी होता चला जाता है। उस अवस्था में देव, दनुज, किन्नर आदि प्राण चित की धड़कन (नर) द्वारा त्रिवेणी संगम अर्थात् भृकुटि में पहुँच कर निर्मल हो जाते हैं। अर्थात् जब ध्यान भृकुटि पर स्थिर हो जाता है तब प्राण से उत्पन्न भाव निर्मल हो जाते हैं, उस अवस्था को ही त्रिवेणी में मज्जन पान करना कहा जाता है।
पूजहिं माधव पद जल जाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।।
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।।
व्याख्या : भृकुटि में ध्यान की अवस्था में परमात्मा के चरण कमलों की पूजा करके और अक्षय वट अर्थात् परम अवस्था का अनुभव करने से सब अंगों में हर्ष छा जाता है। इस प्रकार विवेक रूपी भरद्वाज की अवस्था बहुत पवित्र होती है। इसे ही भरद्वाज का पावन आश्रम कहा गया है। वह विवेक की अवस्था मन के समस्त भावों को अच्छी लगनेवाली होती है।
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा।।
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।
व्याख्या : वहाँ अर्थात् भृकुटि में ध्यान अवस्था में मन के समस्त भाव और भावों से उत्पन्न रसों (ऋषि) का मिलन होता है और उसी पवित्र संगम के जल (अर्थात् मन के निर्मल भाव और निर्मल भावों से उत्पन्न रस) में स्नान करने से पवित्रता आती है। अत: साधक लोग नित्य प्रात: उत्साह के साथ ध्यान लगाकर पवित्र संगम में स्नान करते हैं और माया के हरण की गुण अवस्था का मन में ही चिन्तन करते हैं। अर्थात् उस समय माया का जाल समझ में आ जाता है और परमात्मा के गुणों का वर्णन करने का मन में उत्साह छा जाता है। वह अवस्था बहुत सुखद होती है।
दो0 ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्व बिभाग।
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।
व्याख्या : भृकुटि के ध्यान की अवस्था में नाना प्रकार से ब्रह्म के निरूपण की समझ आने लगती है और तत्वों के विभागों की समझ भी बढ़ने लगती है। इसलिए उस अवस्था में साधक नाना प्रकार से ज्ञान और वैराग्य से युक्त परमात्मा की भक्ति का गुण-गान करने लगता है।
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।।
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा।।
व्याख्या : इस प्रकार साधक ध्यान रूपी स्नान करते हैं और पुन: सहज होकर अपने कार्य में लग जाते हैं। इसी ध्यानावस्था की अनुभूति को त्रिवेणी में माघ महीने के स्नान के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब-जब साधक ध्यान लगाकर परमात्मा से संयुक्त होता है, तब तब उसे परमानन्द की प्राप्ति होती है तथा मन के भावों का समूह त्रिवेणी में स्नानकर निर्मल होकर अपनी सहज अवस्था में लौट जाता है। उसी को प्रति संवत माघ के महीने में प्रयाग में स्नान कर मुनियों (मन के भाव समूह) का अपने-अपने आश्रम में चले जाना कहकर लिखा गया है।
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।।
जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी।।
व्याख्या : एकदिन साधक का ध्यान गहराई से लग गया और मकरतार (प्राण का सूक्ष्म होकर मकरतार की तरह लयबद्ध होकर स्थिर हो जाना) ध्यान अवस्था में स्नान कर लिया। उस अवस्था में स्नान करके मन के अन्य भाव तो लौटकर अपनी सहज अवस्था में लौट गए। परन्तु विवेक रूपी भाव ने यज्ञअवलकल अर्थात् यजन को वस्त्र की तरह धारण करने की अवस्था जिसमें पान में अपान का हवन होता रहता है और पान-अपान के हवन से प्राण लयबद्ध होकर मकर तार के समान सूक्ष्म होकर चेतना को उर्ध्वगामी कर देता है, जिससे मन में परम विवेक पैदा हो जाता है। उसी परम विवेक के भाव को विवेक रूपी भरद्वाज मुनि ने पद टेकी (अर्थात् पान अपान के हवन की स्थिर अवस्था) करके रोकना कहा गया है।
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।।
करि पूजा मुनि सुजसु बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।।
व्याख्या : ध्यान की गम्भीर अवस्था में नाना प्रकार के भावों में परस्पर वार्तालाप होने लगता है। अत: उस अवस्था का वर्णन करना बहुत कठिन कार्य है परन्तु परमात्मा की प्रेरणा से साधक प्रतीकों का सहारा लेकर अपनी अनुभूति को नाना प्रकार से अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। अत: यहाँ तुलसीदास अपने ध्यान में विवेक व परम विवेक रूपी भावों के संवाद को भरद्वाज और याज्ञवलक्य मुनियों के प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किए हैं। विवेक रूपी भाव ने परम विवेक रूपी भाव के सादर चरण धोए अर्थात् पूरी तरह समर्पण किया और पवित्र आसन पर बैठाया अर्थात् परम विवेक से परमात्मा के गुणों की महिमा को जानने की इच्छा प्रकट करी। पूरी तरह परम विवेक रूपी याज्ञावलक्य ऋषि के सुयश का वर्णन करके विवेक रूपी भरद्वाज मुनि विनयपूर्वक बोले। उस ध्यानावस्था में साधक के अन्त:स्थल में भाव आपस में बातें करने लग जाते हैं और प्रश्न-उत्तर का दौर शु डिग्री हो जाता है। यह उत्तर-प्रश्न का दौर कभी-कभी घण्टों चल जाता है। साधक के हृदय में परमात्मा के रहस्य को जानने की लालसा उठती रहती है और परम विवेक उसको अन्त: स्थल में ही नाना प्रकार से समझाने का प्रयास करता रहता है। ये भाव संवाद ही याज्ञवलक्य और भरद्वाज मुनि का पवित्र संवाद है।
नाथ एक संसय बड़ मोरें। करगत बेद तत्व सबु तोरें।।
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा।।
व्याख्या : विवेक रूपी भरद्वाज मुनि कहते हैं कि हे नाथ! मेरे मन में बड़ा संशय है और आपको (परम विवेक) तो समस्त वेद तत्व हाथ की हथेली पर रखा हुआ है। इसलिए मुझे कहने में बहुत संकोच और भय हो रहा है परन्तु अगर नहीं कहूँ तो अच्छा नहीं होगा। प्रारम्भ में यह अवस्था प्रत्येक साधक की रहती है कि उसे लगता है कि वह परमात्मा के बारे में सब कुछ जानता है परन्तु ज्यों-ज्यों वह साधना पथ पर अग्रसर होता रहता है, उसके अन्दर जिज्ञासा और गहरी होती चली जाती है परन्तु उसको उसका पाण्डित्य जिज्ञासा प्रकट करने में संकोच पैदा कराता रहता है। उसी भाव अवस्था की अभिव्यक्ति यहाँ की गयी है।
दो0 संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।
व्याख्या : हे प्रभु! सभी संत, वेद, पुराण और मुनिजन ऐसा कहते हैं कि अपने अन्त: स्थित परम गुरु से छुपाने पर निर्मल विवेक पैदा नहीं हो पाता है।
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।।
राम नाम करि अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।।
व्याख्या : ऐसा विचार कर मैं मेरे स्वयं के मोह को प्रकट कर रहा हूँ कि हे प्रभु! आप कृपा करके मेरे अज्ञान को दूर कर दो। राम के नाम का प्रभाव अमित होता है, ऐसा संत, पुराण व उपनिषदों ने बताया है।
सतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।।
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।।
व्याख्या : निरन्तर नाम के जप से साधक स्वयं अविनाशी पद को प्राप्त कर लेता है क्योंकि शिव भगवान (परम कल्याणकारी परमात्मा) ज्ञान और गुण की राशि होते हैं। संसार में चार प्रकार के जीवों (अण्डज, पिण्डज, जरायुज व उद्भिज) में जो भी काशी (अर्थात् सत, रज व तम गुणों रूपी त्रिशूल पर आधारित भृकुटि के ध्यान की अवस्था) में मरते हैं अर्थात् सत, रज व तम गुणों से गुणातीत होकर शरीर का त्याग करते हैं, वे परमपद को प्राप्त कर लेते हैं।
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।।
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।।
व्याख्या : अत: हे परमविवेक रूपी मुनि! आप परमात्मा राम की महिमा का कल्याणकारी (शिव) उपदेश कीजिए। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि राम कौन हैं? हे कृपानिधि! आप मुझे समझाकर कहिए।
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा।।
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा।।
व्याख्या : एक राम अवधि रूपी शरीर के राजा अर्थात् परमात्मा के कुमार (रूप) हैं जिनेक कारण समस्त संसार का आभास हो रहा है। वह परमात्मा शक्ति प्राणशक्ति से अलग होने पर अपार दु:ख का आभास करती है और उससे क्रोधित होकर कामवासना रूपी रावण को भावों के युद्ध में मार देती है। प्राणशक्ति से विरह होने पर अर्थात् प्राण शक्ति जब विषय वासनाओं से युक्त हो जाती है, तो जीवात्मा कष्टों में पड़ जाती है, उसे ही नारी विरह में राम (जीवात्मा) का दु:ख माना जाता है। जीवात्मा के दुखित हो जाने से उसे ग्लानि हो जाती है और ग्लानि से ही वह पुन: वासनाओं से मुक्त होने का प्रयास करती है, उसे ही क्रोधित होकर रावण को युद्ध में मारना कहा जाता है।
दो0 प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि ।।46।।
व्याख्या : हे परमविवेकी प्रभु! वही राम है, जिसे त्रिपुरारि सदा जपते हैं। आप तो सत्य के घर व सब कुछ जानने वाले हैं। अत: विवेक का विचार कर मुझसे कहिये। त्रिपुरारि का तात्पर्य ऐसे साधक से है जो सत, रज व तम के तीनों गुणों को इस शरी़र (पुर) में जीत लेता है।
जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।।
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।।
व्याख्या : हे प्रभु! विस्तारपूर्वक मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरे संशय का नाश हो जाए। साधक को ध्यान की अवस्था में नाना प्रकार के संशय उठते रहते हैं और उनका समाधान भी ध्यान में ही मिलता रहता है। अत: उस अवस्था में साधक का परम विवेक का भाव स्वयं ही स्वयं पर मुस्कुराते हुए विवेक के भाव को समझाता है कि आप तो सब कुछ जानते हो। उसी भावावस्था को याज्ञवल्क्य और भरद्वाज के संवाद के रूप में दिखाया गया है।
राम भगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी ।।
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रश्न मनहुँ अति मूढ़ा।।
व्याख्या : परम विवेकी रूपी याज्ञवल्क्य बोले कि आप (विवेक) तो मन, वचन व कर्म से परमात्मा के भक्त हैं। मैं आपकी चतुराई को समझ गया हूँ कि आप परमात्मा के गूढ़ रहस्य को जानना चाहते हो, इसलिए ही ऐसे प्रश्न कर रहे हो, जैसे कोई मूर्ख कर रहा हो।
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाइ।।
महामोहु महिषेसु बिसाला। राम कथा कालिका कराला।।
व्याख्या : अत: अब आप मन लगाकर राम की कथा को सुनिए, जो महा मोह रूपी विशाल भैंसे के लिए विकराल काली के समान है। अर्थात् राम कथा के सुनने से व मनन करने से महामोह रूपी अज्ञान का नाश हो जाता है।
राम कथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।।
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।
व्याख्या : परमात्मा की कथा चन्द्रमा की किरणों के समान होती है, जिसका संत रूपी चकोर पान करते रहते हैं। हे विवेक रूपी भरद्वाज! ऐसा ही संशय श्रद्धा रूपी भवानी ने किया था, तब श्रद्धा रूपी भवानी को महाभाव रूपी महादेव ने परमात्मा की कथा को बताया था। महादेव भाव की उस महाभाव अवस्था का प्रतीक है, जिसमें साधक परमात्मा में लीन हो जाता है इसलिए उस समय अगर श्रद्धा के भाव में संशय की लहर उठ जाती है, तो परमात्मा में लीनता का महाभाव (महादेव) उस संशय को दूर कर देता है। उसे ही महादेव द्वारा भवानी को कथा समझाने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
दो0 कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
भयउ समय जे हेतु जेहि सुनु मुनि मिटहि बिषाद।।47।।
व्याख्या : इसलिए अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार श्रद्धा (उमा) और विश्वास (शंभू) के संवाद को कहता हूँ, जिसको जिस भी समय कहने से मन का विषाद मिट जाता है।
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।
संग सती जग जननी भवानी। पूजे रिषि अखिलेश्वर जानी।।
व्याख्या : जब साधक सतोगुणी अवस्था में रहता है। उस अवस्था को साधना की दृष्टि से त्रेतायुग माना जाता है। उस समय शिव अगस्त्य ऋषि के पास गए। शंभू का तात्पर्य साधक का स्वयं के भाव में स्थित होने से है और अगस्त्य ऋषि का तात्पर्य उस भाव से है जिससे अगअअस्त अर्थात् भविष्य का लोप हो जाता है। जब भविष्य का लोप हो जाता है, तब साधक वर्तमान में स्थित होकर सुखी रहता है। साधक तब ही वर्तमान में आरूढ़ हो सकता है, जब उसकी स्वयं की दृष्टि और भावना स्वयं के घट (कुम्भ) अर्थात् शरीर पर लगी रहती है। इसलिए साधक की उसी अवस्था को कुंभज (अर्थात् स्वयं का स्वयं के शरीर पर ध्यान) ऋषि के पास जाना कहा जाता है। उस अवस्था में प्राण शक्ति, जिससे भाव आते हैं अर्थात् भवानी और भावों से ही जगत का आभास होता है, इसलिए उसी को जगत जननी भी कहा जाता है। जब श्रद्धा का भाव एकदम स्थिर होता है, तो उसे सती कहा जाता है। उस समय प्राणशक्ति स्थिर रहती है और प्राण की नाना अवस्थाओं से ही नाना भाव पैदा होते रहते हैं। इसलिए प्रतीकों के रूप में सती, भवानी व जगत-जननी आदि नाम दिए जाते हैं। कुंभज ऋषि ने शंभू के भाव को अखिलेश्वर जानकर पूजा की अर्थात् अगस्त्य के भाव ने स्वयं में स्थित रहने के भाव को अखिलेश्वर जानकर पूजा। साधना पथ पर चलने पर यह प्रत्येक साधक को समझ में आ जाता है कि यह समस्त संसार स्वंय का विस्तारमात्र है।
रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।।
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।।
व्याख्या : मुनि ने राम कथा का वर्णन किया, जिसे सुनकर महेश ने परम सुख की अनुभूति की। महाऐश्वर्य के भाव ने परमात्मा के चरित को सुनकर परमानन्द की अनुभूति की। इसी को शिव और अगस्त्य ऋषि के संवाद के रूप में बताया गया है। ऋषि अगस्त्य ने परमात्मा की भक्ति के रहस्य के बारे में जानना चाहा तो शिव ने परमअधिकारी जानकर बताया। अगअअस्त का भाव भयहीन अवस्था को प्राप्त करने का रहस्य जानना चाहता है, इसलिए स्वयं की अवस्था में अवस्थित (शंभू) भाव माया के हरण की युक्ति बताकर भयहीन अवस्था का वर्णन करता है। भयगत सो भक्ति कहाई। अर्थात् जब भावों का भय मिट जाता है, तब वह अवस्था ही भक्ति की अवस्था कहलाती है।
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा।।
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन संग दच्छकुमारी।।
व्याख्या : इस प्रकार परमात्मा के चरित्र के गुण-गान कहते और सुनते हुए कुछ समय साधक ध्यान की अवस्था में रहा। उसी भावास्था को शिव का कुछ दिन रहना बताया गया है। जब साधक ध्यान से लौटता है, तो उसी ध्यनावस्था को मुनि के पास शिव द्वारा जाने की अनुमति माँगना बताकर लिखा गया है। अब शिवजी दक्षकुमारी अर्थात् सत्बुद्धि के चातुर्य भाव के साथ चले। सात्विक बुद्धि का चातुर्य भाव श्रद्धा का ही एक रूप होता है, इसलिए पार्वती (श्रद्धा) को सती का अवतार ही बताया गया है। जब ध्यान उतरता है, तो मन और विश्वास अलग होने लगते हैं। उसी भावावस्था को विश्वास रूपी शिव का अगस्त्य रूपी मुनि से बिदा लेना बताया गया है।
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।।
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।
व्याख्या : ध्यान की गंभीर अवस्था में आत्म् ज्ञान का माया का हरण करने के लिए रघुबंश अर्थात जीवात्मा में अवतरण होता है, जिससे शरीर के विकारों का नाश हो जाता है। उस अवस्था में जीवात्मा देहभाव का त्याग करके अनासक्त होकर दंडक बन अर्थात सहज अवस्था में विचरण करने लगता है। दंडक का तात्पर्य है न्यायपूर्ण विधि का पालन करना अर्थात् सहज होकर जीवन जीना। उसी को दंडक बनना कहा जाता है। दंडक बनने का मतलब विधि के विधान अर्थात् क्रिया की प्रतिक्रिया को मानकर सहज होकर जीवन जीना ही दण्डक बनना है। देहभाव ही जीवात्मा को जन्म का आभास कराता है, इसलिए देहभाव ही जीवात्मा का पिता है।
दो0 हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु जान सबु कोई ।। 48(क)।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव का भाव हृदय में विचार करने लगता है कि परमात्मा के दर्शन कैसे हों। प्रारम्भ में साधक यह सोचता रहता है कि परमात्मा कोई दिव्य रूप वाले या दिव्य शरीर वाले होंगे। अत: वह हृदय में नाना प्रकार से विचार करने लगता है कि दर्शन किस प्रकार हों। परन्तु जब अन्तरात्मा में अवतरण हो जाता है, तब साधक को समझ में आता है कि परमात्मा का अवतरण तो हृदय में गुप्त रूप से होता है, जिससे सब कुछ जानने में आ जाता है।
सो0 संकर उर अति छोभुु सती न जानहिं मरमु सोइ।
तुलसी दरसन लोभु मन ड डिग्री लोचन लालची।।48(ख)।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर के हृदय में बहुत ग्लानि हो रही है कि श्रद्धा रूपी सती अर्थात् चातुर्यपूर्ण श्रद्धा का भाव परमात्मा के अवतरण के रहस्य को नहीं जानता है। प्रारम्भ में साधक में यह भाव द्वन्द बहुत ही सूक्ष्मता से चलता है और इस अवस्था में चतुराई के कारण श्रद्धा का भाव स्थिर नहीं हो पाता है। इसलिए तुलसीदास कहना चाहते हैं कि मन में परमात्मा के दर्शन का लोभ रहता है और आँखों में दर्शन की लालसा का भय भी बना रहता है। यहाँ भावों का अन्तर्द्वन्द इतना सूक्ष्म होता है कि साधक स्वयं ही ध्यान की गहराई में जाकर इसे समझ सकता है। इसे अभिव्यक्त करना असम्भव है।
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।।
जौं नहिं जाऊँ रहि पछितावा। करत बिचा डिग्री न बनत बनावा।।
व्याख्या : रावण ने मनुष्य के हाथ मरने का वरदान माँगा था और परमात्मा उस वचन को सत्य करना चाहते हैं। वास्तविकता में काम ही रावण का प्रतीक है और काम रूपी रावण बलवान बनता है, जब मन विराट आकार वाला हो जाता है अर्थात् मन में बहुत सी इच्छाएँ प्रबल हो उठती हैं। परन्तु जब साधना द्वारा मन सूक्ष्म हो जाता है अर्थात् मन की इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं, तब काम रूपी रावण मर जाता है इसलिए मनअअनुज (मनुज) अर्थात मन की सूक्ष्मता से काम रूपी रावण मरता है। अत: मन की सूक्ष्मता की विधि को ही काम रूपी रावण मारने की सत्य विधि है। अत: ध्यान की उस अवस्था में साधक को लगता है कि अगर मन की सूक्ष्मता में प्रवेश नहीं किया तो पश्चाताप रह जायेगा। उस समय भोगों की लालसा के कारण साधक मन की सूक्ष्मता में प्रवेश नहीं करना चाहता है।
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेही समय जाइ दससीसा।।
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा।।
व्याख्या : साधक इस प्रकार ध्यान में सोच विचार करने लगता है कि भोगों की लालसा को छोड़ दूँ या पूरी तरह वैराग्य को प्राप्त कर लूँ। उसी समय दशसीसा अर्थात् इन्द्रियों का भाव जागृत हो जाता है। और अधोगामी अपान प्राणवायु में तरंग सी उठाकर भोगों की वासना पैदा कर दी। इसी भावावस्था को मरीच रूपी स्वर्ण मृग के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।।
मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रम देखि नयन जल छाए।।
व्याख्या : इस प्रकार वासना रूपी कपट से विशुद्ध प्राणशक्ति (वैदेही) का वासना रूपी काम ने हरण कर लिया क्योंकि मूढ़ काम रूपी रावण को आत्मारूपी राम के प्रभाव का पता नहीं होता है। वासना रूपी मृग को मार करके जब आत्मा रूपी राम अपने लक्षण रूपी भाई के साथ वापिस आए तो प्राण रूपी वैदेही से रहित आश्रम को देखकर दु:खी हो गए अर्थात् बिना प्राणशक्ति के आधार के जीवात्मा असहज हो गयी।
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई।।
कबहूँ न जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें।।
व्याख्या : यहाँ पर योग का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है, जब जीवात्मा से विशुद्ध प्राणशक्ति दूर हो जाती है, तो हृदय स्थित नर (नड़) की धड़कन व्याकुल हो जाती है और धड़कन से भय आदि के भाव पैदा होकर जीवात्मा को व्याकुल करके असहज कर देते हैं। उसी भाव अवस्था को यहाँ लिखा गया है कि रघुराई अर्थात् जीवात्मा और नर (नड़) दोनों ही व्याकुल हो गए और अब आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लखन विशुद्ध प्राण शक्ति को शरीर रूपी वन में खोजने लगे। जीवात्मा का कभी योग-वियोग नहीं होता है परन्तु प्राणशक्ति के वासनायुक्त हो जाने पर जीवात्मा में वियोग का प्रकट प्रभाव दिखायी पड़ने लग जाता है।
दो0 अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन।।49।।
व्याख्या : परमात्मा का चरित बहुत ही विचित्र होता है, जिसे बहुत ज्ञानी ही जान पाते हैं। परन्तु जो मंद बुद्धि और मोह ग्रस्त हैं, वे तो परमात्मा के बारे में और कुछ ही मानते हैं।
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु विसेषा।।
भरि लोचन छबि सिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी।।
व्याख्या : साधक ध्यान की अवस्था में स्वयं (शंभू) अपने आत्मतत्व को देखता है, तो हृदय में विशेष हर्ष उत्पन्न हो जाता है। उस समय साधक अपने हृदय के नेत्रों से अनन्त क्षमता वाले परमतत्व को हृदय में ही अनुभव करता है परन्तु वासनाओं की लालसा (कुसमय) के कारण परमतत्व में लीन नहीं हो पाता है। उसे ही ""कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी"" बोलकर लिखा गया है।
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।।
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपा निकेता।।
व्याख्या : हे सत्चित आनन्द व जगत को पवित्र करने वाले! आपकी जय हो। ऐसा कहकर विश्वास रूपी शंकर और श्रद्धारूपी सती के भाव ध्यान में आगे चले। इस ध्यानावस्था में बार-बार कृपा के घर स्वयं (शंभू) साधक पुलकित होने लगे। ध्यान की गहराई में साधक के अंग-अंग पुलकित होने लगते हैं और आनन्द की प्राप्ति होने लगती है और वह परमात्मा की कृपा का घर बन जाता है।
सती सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी ।।
संक डिग्री जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा।।
व्याख्या : चातुर्य पूर्ण श्रद्धा रूपी सती ने जब विश्वासरूपी शिव की यह दशा देखी, तो हृदय में विशेष संदेह पैदा हो गया कि संशय हीन विश्वास की अवस्था (शंका नाश्यति शंकर) तो जगत में वन्दनीय होती है और संशयहीन विश्वास ही जगत का ईश्वर होता है तथा समस्त स्वर (चन्द्र, सूर्य व सुष्मना) नर (नड़) व मन के भाव (मुनी) सब विश्वास को सीस झुकाते हैं अर्थात् ये सब विश्वास के भाव के अधीन होते हैं।
तिन्ह नृप सुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा।।
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहित न रोकी।।
व्याख्या : उन्होंने नृप सुत अर्थात् नड़ की धड़कन को ही सत्चित आनन्द व परधामा अर्थात आत्मा का घर कहकर प्रणाम किया और उसी अवस्था में मग्न हो गए और आज भी हृदय में प्रेम को रोक नहीं पा रहे हैं। नड़ की धड़कन में जब ध्यान में मन लीन हो जाता है, तो धड़कन की आवाज ही नाद बनकर साधक के मन को मोहित कर लेती है। उसी अवस्था में श्रद्धारूपी भाव को संशय हो जाता है कि शरीर स्थित नड़ (नर) क्या आत्मा का घर (पर धामा) हो सकता है। उसी भावद्वन्द की उलझन को प्रकट करे के लिए श्रद्धा रूपी सती कहती हैं --
दो0 ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद।।50।।
व्याख्या : जो ब्रह्म सर्वव्यापक, माया रहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित व भेद रहित है वह क्या देह स्थित नर (नड़) है, जिसे वेद भी नहीं जानते हैं। अर्थात् साधक का श्रद्धा भाव कहता है कि नर की धड़कन परमात्मा कैसे हो सकता है।
बिष्णु जो सुर हित नर तनुधारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी।।
व्याख्या : विष्णु अर्थात् जो शक्ति अणु-अणु में व्यापक होती है स्वरों (चन्द्र, सूर्य व सुष्मना) के माध्यम से नर धड़कन के द्वारा इस शरीर को धारण करती है। वह चेतन शक्ति गुणातीत (तीन गुणों से परे त्रिपुरारी) की तरह ही सर्वज्ञ होती है। वह चेतन शक्ति क्या प्राण जननी (नारी) को खोजेंगे। क्योंकि चेतन शक्ति तो प्राणशक्ति की भी स्वामी व स्वरों से परे (असुरारी) होती है। अर्थात् चेतन शक्ति के लिए तो किसी भी सहारे की जरूरत नहीं होती है। चेतन शक्ति का अस्तित्व तो नारी (नाड़ी) के नहीं रहने पर भी बना रहता है।
संभु गिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।।
अस संसय मन भयउ अपारा। होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।।
व्याख्या : शंभू गिरा अर्थात् साधक का स्वयं का अनुभव कभी झूठा नहीं हो सकता है क्योंकि शिवात्मा तो सब कुछ जानने वाला होता है। जब आत्मा पर से माया के मल का प्रभाव हट जाता है, तब वह निर्मल आत्मा ही शिवात्मा होती है, जो सब कुछ जानने की क्षमता से युक्त होती है। इसलिए आत्मा की क्षमता पर मन में संशय होने से हृदय में प्रबोध अर्थात् अनुभव नहीं हो पाता है।
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी ।।
सुनहि सती तब नारी सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।।
व्याख्या : हालाँकि श्रद्धारूपी भवानी ने अपने संशय को प्रकट नहीं किया परन्तु माया को हर लेने वाले विश्वास रूपी शिव तो सब जानने वाले हैं। हे चातुर्यरूपी श्रद्धा। तुम्हारा नारी स्वभाव है फिर भी तुम संशय मत करो अर्थात् परमात्मा की क्षमता पर संशय मत करो।
जासु कथा कुंभज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।
सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।
व्याख्या : जिस परमात्मा शक्ति की कथा को अगस्त्य ऋषि ने गाया है अर्थात् भविष्य का लोप (अगअअस्तउअगस्त्य) करके वर्तमान में आरूढ़ होकर परमात्मा की शक्ति का अनुभव किया जा सकता है और जिससे भयहीन अवस्था का मेरे मन ने अनुभव किया है। भयगत सोइ भगति कहाई। इच्छा बिगत मन हरषाई।। अर्थात् भय के मिट जाने की अवस्था ही भक्ति कहलाती है और उस अवस्था में इच्छाएँ मिट जाती हैं, जिससे मन हर्षित हो उठता है। अत: ऐसे परम शक्ति ही मेरे इष्ट देव हैं, जिन्हें धैर्यवान मन वाले लोग सदा भजते हैं।
छ0 मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं।।
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी।।
व्याख्या : उस ध्यान अवस्था में साधक अपने श्रद्धा के भाव को समझाने का प्रयास करता है। अत: स्वयं समझाते हुए कहता है कि जिस परमशक्ति को मुनि, योगी व सिद्ध जन निरंतर निर्मल मन से भजते हैं और वेद, पुराण व शास्त्र जिसका ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं कहकर गुणगान करते हैं, उसी परमशक्ति का नाम राम है, जो समस्त ब्रह्माण्ड में व्यापक व माया के स्वामी हैं। वह परमशक्ति अपने भक्त के उपकार के लिए साधक के स्वंय के शरीर में ही जीवात्मा को प्रकाश दिखाने के लिए अवतरित होती है।
सो0 लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ।।51।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती के हृदय में समझ नहीं आया, हालाँकि विश्वासरूपी शिव ने बार-बार समझाने की कोशिश करी। जब श्रद्धा रूपी सती ने बात नहीं मानी तो विश्वास रूपी शिव परमात्मा की माया की प्रबलता जान कर हँस कर बोले।
जौं तुम्हरे मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।।
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं।।
व्याख्या : जब श्रद्धा का भाव हिलने लगता है, तब विश्वास का भाव नाना प्रकार से श्रद्धा को स्थिर कराने का प्रयास करता है परन्तु फिर भी अगर श्रद्धा का भाव स्थिर नहीं हो पाता है, तो साधक अपने विश्वास पर दृढ़ होकर रूक जाता है और श्रद्धा के भाव को परीक्षण के लिए प्रेरित करता है। उसी भाव अवस्था को यहाँ कहा गया है कि विश्वास रूपी शंकर श्रद्धा रूपी सती को बोलते हैं कि अगर परमात्मा के स्वरूप पर शंका है, तो जाकर परीक्षण करके देख लीजिए। मैं (अर्थात् विश्वास) तब तक स्थिर होकर तुम्हारा इंतजार करूँगा। साधक का जब दृढ़ विश्वास हो जाता है, तब वह श्रद्धा के हिलने पर भी अपने विश्वास पर दृढ़ बना रहता है। उसी को बट छाँह में बैठना बोलकर लिखा गया है। बट छाँह का तात्पर्य पूर्ण संतोष की अवस्था से होता है और जब विश्वास दृढ़ व स्थिर हो जाता है, तब अपने-आप संतोष की अवस्था आ जाती है।
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी।।
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचा डिग्री करौं का भाई।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी सती। जिससे तुम्हारा मोह का भ्रम मिटे, वो विवेक पूर्वक विचार करके प्रयास करो। उस अवस्था में विश्वास रूपी शिव की आज्ञा पाकर श्रद्धा रूपी सती परमात्मा के परीक्षण के लिए जाती हैं परन्तु श्रद्धा का भाव सोचता है कि अब क्या करूँ? बिना विश्वास के संग के श्रद्धा का भाव किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता है। यहाँ उसी भाव अवस्था का वर्णन किया गया है।
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना।।
मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं।।
व्याख्या : ईधर को विश्वास रूपी शंकर का भाव विचार करता है कि दक्षसुता अर्थात चातुर्य से उत्पन्न श्रद्धा के भाव का कल्याण नहीं होगा क्योंकि जब विश्वास से भी संशय नहीं मिटता है, तो फिर तो किसी भी प्रकार से संशय को दूर नहीं किया जा सकता है। विधि अर्थात् क्रिया के विपरीत होने पर कल्याण सम्भव नहीं हो सकता है। विश्वास करने की क्रिया ही श्रद्धा का कल्याण कर सकती है। अविश्वास की क्रिया तो विपरीत फल को ही देने वाली होती है।
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुख धामा।।
व्याख्या : वही होता है जो राम ने रच रखा है अर्थात् जो विधि का विधान है वही होता है। विधि का मतलब क्रिया से है और विधान क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप फल प्राप्ति का नियम होता है। अत: जो विधाता अर्थात् क्रिया का कर्ता जैसा रचेगा अर्थात् करेगा वैसा ही फल मिलेगा। उसमें तर्क से कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है। ऐसा विचार करके विश्वास रूपी शिव दृढ़ होकर परमात्मा का नाम जपने लगे और श्रद्धा रूपी सती का भाव परमात्मा के परीक्षण का प्रयास करने लगी।
दो0 पुनि पुनि हृदयं बिचा डिग्री करि धरि सीता कर रूप।
आगे होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नर भूप।।52।।
व्याख्या : श्रद्धा का भाव निर्मल प्राण से पैदा होता है परन्तु श्रद्धा का भाव जब तर्क के भाव के साथ पड़कर बार-बार विचार करने लगता है, तो निर्मल प्राण श्वास में बदल जाता है, उसी को यहाँ श्वास रूपी सीता का रूप धरना कहा गया है। श्वास हृदय स्थित नर (नड़) की धड़कन के आगे आगे चलता है। इसका विज्ञान यह है कि नर की धड़कन से तो प्राण ही पैदा होता है परन्तु भावों के सम्पर्क में आते ही प्राण श्वास में बदल जाता है। इसलिए श्रद्धा रूपी सती अब श्वास रूपी सीता का रूप धारण कर ली और नर की धड़कन के आगे चलीं।
लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।।
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा।।
व्याख्या : लक्ष्मण अर्थात् लक्षणों को जानने वाले भाव को श्रद्धारूपी भाव को श्वास रूपी सीता के रूप में देखकर हृदय में विशेष भ्रम पैदा हो गया और आश्चर्य भी हुआ। लक्षणों को जानने का भाव कुछ कह भी नहीं पा रहा है, इसलिए गंभीर हो गया क्योंकि वह भाव (लक्ष्मण) तो परमात्मा के प्रभाव को जानता ही है।
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी।।
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना।।
व्याख्या : सुरस्वामी अर्थात स्वरों के स्वामी (चन्द्र, सूर्य व सुष्मना स्वरों) यानी परमात्मा ने श्रद्धा के कपट भाव को जान लिया क्योंकि वे तो सब कुछ देखनेवाले और सबके घट की जानने वाले होते हैं। साधक स्वयं ही अपनी अन्तरात्मा के बल पर भावों की भावदशा को जान पाता है। परमात्मा के सुमिरण करने से ही अज्ञान का नाश होता है। अत: वही अन्तरात्मा सर्वज्ञ, राम व भगवान होती है।
सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ।।
निजमाया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी।।
व्याख्या : चातुर्य रूपी श्रद्धा का भाव अपने संशय को छुपाना चाहती है। ये सब नारी (नाड़ी) की धड़कन से उठने वाले प्राण के प्रभाव के कारण होता है। नारी की धड़कन से जो प्राण ऊर्जा निकलती है, उसी से माया के भाव पैदा होते हैं और नर (नड़) की धड़कन से जो प्राण ऊर्जा निकलती है, उससे माया का नाश होता है। अत: यहाँ नारी (नाड़ी) के प्रभाव को बताया गया है। उस अवस्था में साधक को समझ आता है कि स्वयं के हृदय में ही माया का प्रभाव है। इसी कारण से श्रद्धा का भाव भ्रम में फँसता है। साधक का अन्तरात्मा रूपी राम तब समझाते हुए मधुर भाषा में कहता है।
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।।
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने प्राण को स्थिर करके अपना परिचय दिया और पूछा कि विश्वास रूपी शंकर कहाँ हैं और आप शरीर रूपी वन में अकेली क्यों घूम रही हैं।
दो0 राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु।।53।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के गूढ़ वचनों को सुनकर श्रद्धा रूपी सती के हृदय में बहुत संकोच हुआ अर्थात् आत्म तत्व की झलक मिलते ही श्रद्धा रूपी सती का भ्रम मिट गया, जिससे संकोच हो आया। जब भ्रम मिट गया तो चातुर्यरूपी श्रद्धा का भाव भयभीत होकर विश्वास रूपी शंकर के पास पहुँचा। क्योंकि जब आत्मा रूपी राम का अनुभव हो जाता है, तो श्रद्धा अपने-आप विश्वास के भाव के पास चली जाती है। उसी भावावस्था को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है।
मैं शंकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।।
जाइ उत डिग्री अब देहऊँ काहा। उर उपजा अति दारून दाहा।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती अपने हृदय में विचार करती हैं कि मैंने शंका रहित विश्वास का कहा नहीं माना और मेरे स्वयं के अज्ञान के कारण आत्मारूपी राम पर संशय कर लिया। अब मैं विश्वास रूपी शंकर को क्या उत्तर दूँगी? इसके कारण श्रद्धा रूपी सती के हृदय में बहुत ग्लानि पैदा हो गयी।
जाना राम सती दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा।।
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगे रामु सहित श्री भ्राता।।
व्याख्या : आत्मारूपी राम ने जब देखा कि श्रद्धारूपी सती को दु:ख हुआ है, तो आत्मा रूपी राम ने अपना कुछ प्रभाव बताया। यह एक वैज्ञानिक कारण है कि जब-जब भी हृदय में ग्लानि होती है, तब-तब अन्तरात्मा अपने प्रभाव को कुछ सीमा तक प्रकट करती है। उसी को व्यास जी ने भी गीता में ""ग्लानिर्भवति भारत"" अर्थात जब हृदय में ग्लानि होती है तभी ""तदात्मानम् सृजाम्यह्म"" अर्थात साधक की आत्मा में ही परमात्मा सृजन करते हैं। अत: यहाँ भी श्रद्धा रूपी सती को ग्लानि हुई तो श्रद्धा रूपी सती ने रास्ते में आश्चर्य चकित करने वाली घटना देखी कि आत्मारूपी राम प्राणशक्ति रूपी श्री के साथ लक्षणों सहित (लक्ष्मण) जा रहे हैं। ध्यान की अवस्था में साधक को आत्मारूपी राम और प्राणशक्ति सहित लक्षणों का आभास हो जाता है। उसी को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है।
फिरि चितवा पाछे प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर बेषा।।
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना।।
व्याख्या : श्रद्धारूपी सती ने फिर अपने चित में परमात्मा को देखा, जहाँ पर लक्षणों व प्राणशक्ति सहित थे। श्रद्धा रूपी सती ने जिधर भी देखा उधर को ही परमात्मा दिखायी दिए, जिनकी सिद्धजन, मुनि व ज्ञानी लोग सेवा कर रहे थे।
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।।
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती ने शिव, विधि, व विष्णु रूपी अनेक भाव देखे, जिनका एक से बढ़कर एक प्रभाव था। शिव का तात्पर्य लोक कल्याण के भावों से होता है और विधि के भावों का तात्पर्य सृजन के भावों से होता है और विष्णु के भावों का तात्पर्य भोग के भावों से होता है। इन्हें ही ब्रह्मा, विष्णु व महेश के प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। ध्यान की अवस्था में सभी भाव परमात्मा की वन्दना करते हैं और सात्विक भावों (देव) के नाना प्रकार दिखाई पड़ते हैं।
दो0 सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहि जेहि बेष अजादि सुर तेहि तेहि जन अनुरूप।।54।।
व्याख्या : ध्यान की अवस्था में साधक को श्रद्धा रूपी सती और क्रिया को कराने वाली बुद्धि रूपी सरस्वती व इन्द्रियों को संचालित करने वाली लक्षणों से युक्त लक्ष्मी रूपी देवी के नाना व अनुपम रूप दिखायी पड़ते हैं। साधक का भाव जैसा-जैसा होता जाता है, तैसे-तैसे स्वरों के माध्यम से शरीर के अनुरूप भावों का सृजन होने लग जाता है। अज ब्रह्म का प्रतीक है और ब्रह्म सृजन का प्रतीक है। अत: भावों का नाना प्रकार से सृजन की क्रिया को साधक ध्यान की गहराई में अच्छी तरह समझ पाता है।
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।।
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा ।।
व्याख्या : साधक ध्यान में रघुपति अर्थात जीवात्मा को सब तरफ देखने लगता है और समस्त भावों को उनकी क्षमता (शक्ति) सहित जानने लगता है। संसार में जितने भी चराचर के जीव हैं, वे सब नाना प्रकार से दिखायी पड़ने लगते हैं। अर्थात् साधक को चारों तरफ एक ही आत्म तत्व का आभास होने लगता है और भावों का भी ज्ञान होने लगता है। श्रद्धा का भाव जब इस प्रकार अनुभव कर लेता है, तब वह आश्चर्य चकित होकर विश्वास का ही सहारा लेता है। अत: उसी भावावस्था के प्रतीकों का सहारा लेकर सती का शिव के पास जाना बोलकर लिखा गया है।
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा।।
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।।
व्याख्या : ध्यान में साधक का श्रद्धा भाव अपनी कल्पना के अनुसार परमात्मा को नाना भावों के अनुसार पूजने लगता है और उसे उस समय केवल आत्मा रूपी राम ही दिखायी पड़ते हैं। चराचर जगत में श्रद्धा का भाव बहुत जीवात्माओं को देखता है परन्तु सभी में श्वास रूपी सीता और आत्मा रूपी राम एक ही दिखायी देते हैं।
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भईं सभीता।।
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं।।
व्याख्या : साधक के श्रद्धा भाव ने सभी जीवात्माओं में आत्मा, लक्षण व श्वास को ही देखा। ये सब देखकर श्रद्धा का भाव भयभीत हो गया क्योंकि श्रद्धा के भाव को तो कल्पना से लगता था कि परमात्मा कोई हाथ, पैर वाली दिव्य शरीर धारण किए हुए कोई शक्ति होगी। परन्तु ध्यान में तो श्रद्धा के भाव को समझ में आता है कि प्रत्येक जीवात्मा में लक्षण व प्राण (श्वास) का संगम होता है। अत: श्रद्धा के भाव के हृदय में कम्पन पैदा हो गया और अपने आपको श्रद्दा का भाव भूल गया। अब ऐसी अवस्था में श्रद्धा का भाव कल्पना करना बन्द कर देता है। उसी को श्रद्धा रूपी सती का नयन बन्द कर रास्ते में बैठना बताया गया है।
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछुु न दीख तहँ दच्छकुमारी।।
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।
व्याख्या : साधक के चातुर्यमयी श्रद्धा भाव ने बहुत प्रकार से परमात्मा को देखने का प्रयास किया परन्तु चातुर्ययुक्त श्रद्धा रूपी सती को कुछ भी दिखायी नहीं पड़ा। इसलिए बार-बार आत्मा रूपी राम को सीस झुकाकर विश्वास रूपी शिव के पास चलीं। यहाँ शिव को गिरीसा कहा गया है क्योंकि जब विश्वास बहुत दृढ़ हो जाता है, तो वह पर्वत की तरह अटल व स्थिर हो जाता है। इसलिए विश्वास रूपी शिव को यहाँ गिरीसा कहा गया है। जब विश्वास अटल हो जाता है, तब श्रद्धा का भाव विश्वास के पास अपने आप आ जाता है।
दो0 गईं समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।55।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती जब विश्वास रूपी शंकर के पास पहुँची तो विश्वास के शंकर रूपी भाव ने हँसकर पूछा कि सत्य बताइये किस प्रकार परमात्मा की परीक्षा ली।
मासा पारायण, दूसरा विश्राम
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।।
कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती के भाव ने परमात्मा के प्रभाव को जानकर भय के कारण विश्वास रूपी शिव से छुपाने का प्रयास किया और कहा कि मैंने कोई परीक्षा नहीं ली और आपकी तरह ही आत्मा रूपी राम को नमस्कार किया। यहाँ श्रद्धा रूपी सती को भय इस बात का था कि अगर मैं परीक्षा की बात कहूँगी तो विश्वासरूपी शिव मेरी अज्ञानता पर नाराज होकर मुझसे दूरी बना लेंगे। क्योंकि विश्वास के भाव को कभी भी संशय युक्त श्रद्धा का भाव अच्छा नहीं लगता है।
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरे मन प्रतीति अति सोई।।
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती का भाव बोला कि जो आपने कहा है वो झूठा नहीं हो सकता है, इसलिए मेरे मन में अब बहुत विश्वास हो गया है। तब विश्वासरूपी शंकर ने ध्यान लगाकर वह सब देखा जो श्रद्धा रूपी सती ने किया था।
बहुरि राममायहि सि डिग्री नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।।
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर ने आत्मा रूपी राम की माया को सीस झुकाया, जिसने प्रेरित करके श्रद्धा रूपी सती से झूठ बुलवा दिया। विश्वास रूप साधक हृदय में विचार करने लगे कि भावों की प्रक्रिया (भावी) बहुत बलवान होती है।
सती कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।।
जौं अब करउँ सती सन प्रीति। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।
व्याख्या : विश्वासरूपी शंकर को बहुत विषाद हुआ कि श्रद्धा रूपी सती ने श्वास रूपी सीता का रूप धारण किया है अर्थात् विशुद्ध प्राण श्वास में परिवर्तित हो गया है। अगर अब मैं श्रद्धा रूपी सती से प्रीत करूँगा तो भय हीन अवस्था मिट जायेगी और अनीति हो जायेगी। विश्वास का भाव विचार करता है कि अगर श्वास का सहारा लिया तो नाना इच्छाएँ पैदा होकर भय पैदा कर देंगी और उससे सहजता मिट जायेगी।
दो0 परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर हृदय में विचार करके संताप महसूस करने लगे कि श्रद्धा रूपी सती परम पवित्र है, परन्तु अब श्रद्दा के साथ प्रेम करने से पाप हो जायेगा (अर्थात् भाव पैदा होकर चिन्ता पैदा हो जायेगी) और श्रद्धा को छोड़ना भी सम्भव नहीं है। क्योंकि बिना श्रद्दा के अनुभव को धारण भी नहीं किया जा सकता है।
तब संकर प्रभु पद सि डिग्री नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।।
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शंकर ने परमात्मा को प्रणाम किया और प्रभु नाम का सुमिरण करते हुए हृदय में ऐसा विचार आया कि इस अवस्था में श्रद्धा रूपी सती से मेरा मिलना सम्भव नहीं है। अत: मन ही मन ऐसा सात्विक संकल्प कर लिया।
अस बिचारि संक डिग्री मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।।
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।।
व्याख्या : ऐसा विचार करके विश्वास रूपी शंकर परमात्मा के नाम का सुमिरण करते हुए परमात्मा के भावों में लीन (भवन) हो गए। उस ध्यानावस्था में मस्तिष्क में सुनाई दिया कि हे महाऐश्वर्यवान साधक! आपने अच्छी भयहीन अवस्था में दृढ़ता हासिल कर ली है। जब विश्वास दृढ़ होकर श्रद्धा के भावों को भी छोड़ देता है, तब की अवस्था को ही भक्ति में दृढ़ होना कहा जाता है।
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। राम भगत समरथ भगवाना।।
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।।
व्याख्या : ऐसा प्रण बिना दृढ़ विश्वास के कौन कर सकता है? परमात्मा का भक्त ही समर्थ होकर भगवान के पद को प्राप्त करता है। भग प्रकृति को कहा जाता है और जो प्रकृति को वश में कर लेता है, वही भगवान कहलाता है। परमात्मा के सच्चे भक्त में प्रकृति को वश में करने का सामर्थ्य आ जाता है। आकाशवाणी को सुनकर श्रद्धा रूपी सती के हृदय में बहुत विचार आने लगे। इसलिए संकोच के साथ विश्वास रूपी शंकर से पूछने लगी।
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्य धाम प्रभु दीन दयाला।।
जदपि सतीं पूछा बहु भाँति। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती।।
व्याख्या : हे कृपालु! आपने कौन सा प्रण किया है? आप तो सत्य के घर और दीनों पर दया करनेवाले हैं। हालाँकि सती ने बहुत प्रकार से पूछा परन्तु त्रिपुर आराती अर्थात् तीन गुणों से परे रहने वाले विश्वास रूपी शंकर ने कुछ नहीं बताया। जब विश्वास दृढ़ हो जाता है, तब वह तर्क से परे हो जाता है, इसलिए उस अवस्था में वह श्रद्धा के तर्कों का कोई जवाब नहीं देता है। उसी भावावस्था को यहाँ लिखा गया है।
दो0 सतीं हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।।57(क)।।
व्याख्या : तब श्रद्धा रूपी विश्वास ने अनुमान किया कि सर्वज्ञ विश्वास रूपी शिव सब कुछ जान गए हैं कि मैंने स्वयं के साथ कपट किया है। ये तो नाड़ी से उत्पन्न जड़ भावों के कारण ऐसा हुआ है। नारी की धड़कन से श्रद्धा आदि के भाव पैदा होते हैं तथा नर की धड़कन से विश्वास के भाव पैदा होते हैं। यह साधना की गहराई में साधक स्वयं अनुभव कर पाता है।
सो0 जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।57(ख)।।
व्याख्या : अटूट प्रीत की रीति तो यह होती है कि दूध के साथ जल मिलकर दूध के भाव ही बिक जाता है परन्तु कपट रूपी रस की खटाई पड़ते ही दूध से पानी अलग हो जाता है। यही अवस्था विश्वास और श्रद्धा के भावों की होती है परन्तु श्रद्धा में तर्क पैदा हो जाने पर वह विश्वास के भाव से अलग हो जाती है।
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी।।
कृपा सिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।।
व्याख्या : अत: श्रद्धा रूपी सती स्वयं की करणी का हृदय में विचार करती हुई बहुत चिन्ता में पड़ गयी और सोचने लगी कि विश्वास रूपी शिव का भाव तो अगाध समुद्र की तरह होता है, इसलिए प्रकट रूप से मेरे दोषों को नहीं कह रहा है।
संकर रूख अवलोकि भवानी । प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर के रूख को देखकर श्रद्धा रूपी भवानी व्याकुल हो गयी और विश्वास रूपी स्वामी द्वारा त्याग किया जानकर हृदय में व्याकुलता हो गयी। परन्तु श्रद्धा भाव ने स्वयं को ही चिन्ता का कारण जानकर कुछ नहीं कहा और श्रद्धा का भाव कुम्हार की आँव की तरह स्वयं ही जलने लगा।
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू।।
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती के भाव को विश्वास रूपी शंकर ने चिन्तित देखा तो नाना प्रकार की सुन्दर कथा कहकर सुनायी। ध्यान में साधक के भाव आपस में वार्तालाप करने लगते हैं। अत: जब श्रद्धा का भाव विचलति होता है, तो विश्वास का भाव नाना प्रकार से श्रद्धा के भाव को धैर्य बँधाता है। इस प्रकार धैर्य बँधाते-बँधाते साधक कीे अवस्था मुक्ति के आनन्द की आ जाती है, उसी को प्रतीकों के माध्यम से कैलाश पर निवास की अवस्था बताया गया है। कैलाश का तात्पर्य है कैवल्य का उल्लास अर्थात् मुक्ति का आनन्द। इसलिए विश्वास रूपी शंकर को कैलाश निवासी बताया गया है। उसी भावावस्था को यहाँ विश्वनाथ का कैलाश पहुँचना बोलकर लिखा है।
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन।।
संकर सहज सरुपु सम्हारा । लागि समाधि अखण्ड अपारा।।
व्याख्या : विश्वास जब पर्वत की तरह दृढ़ हो जाता है, तब वह समस्त भावों से परे हो जाता है। यहाँ तक की श्रद्धा का भाव भी तब साथ नहीं रह पाता है। उसी भावावस्था में विश्वास के भाव का स्थिर हो जाने को ही वृक्ष के नीचे पद्मासन लगाकर बैठना बताया गया है। उस अवस्था में विश्वास रूपी शंकर का भाव अपने सहज स्वरूप के साथ लीनता की अवस्था में आ जाता है, उसे ही अखण्ड समाधी लगना बताया गया है।
दो0 सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।
व्याख्या : श्रद्धा का भाव भी कैवल्य के उल्लास की अवस्था (कैलाश) में रहते हुए भी नाना विचार करने लगता है और इस सूक्ष्म रहस्य को कोई भाव नहीं जान पाता है कि कैवल्य की अवस्था श्रद्धा के भाव को युगों के समान लगती है अर्थात् श्रद्धा का भाव तो गुणातीत अवस्था में व्याकुल हो जाता है, उसे तो गुणों में बरतने में आनन्द मिलता है। अत: उसी भाव दशा के सूक्ष्म रहस्य को यहाँ लिखा है।
नित नव सोच सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पति बचनु मृषा करि जाना।।
व्याख्या : नये-नये विचारों से श्रद्धारूपी सती का हृदय भारी हो गया कि इस दु:ख सागर से कब पार होगा। श्रद्धा का भाव बिना गुणों के रसास्वादन के रह नहीं पाता है। अत: कैवल्य की अवस्था में चातुर्यमयी श्रद्धा का भाव व्याकुल हो जाता है। श्रद्धा के भाव का विश्वास ही स्वामी होता है। श्रद्धा का भाव विचार करता है कि मैंने आत्मारूपी राम का अपमान किया अर्थात् आत्म तत्व पर संशय किया और विश्वास रूपी पति की बात को झूठा माना इसलिए अब विश्वास रूपी शंकर ने मुझे त्याग दिया है। ये भावों की अवस्था ध्यान में ही सूक्ष्मता से समझ आ पाती है।
सो फलु मोहि बिधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।।
अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।।
व्याख्या : ध्यान की गहराई में श्रद्धा का भाव अपने आपसे ही बातें करके अपने आपको समझाने का प्रयास करने लगता है। अत: उसी भावावस्था को लिखते हुए कहा गया है कि विधाता ने विधि अर्थात् क्रिया का फल दिया है और जो उचित है वो ही किया है। अब ऐसी कोई क्रिया (विधि) समझ में नहीं आ रही है, जिससे मैं (श्रद्धा का भाव) पुन: विश्वास रूपी शंकर को प्राप्त कर लूँ। अब विश्वास विमुख मुझे जी कर क्या करना है?
कहि न जाइ कुछ हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी।।
जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती के हृदय की ग्लानी का वर्णन नहीं किया जा सकता है। अब चातुर्यमयी श्रद्धा रूपी सती मनही मन आत्मा रूपी राम का सुमिरण करती हैं। अगर परमात्मा दीनों पर दया करने वाले कहलाते हैं और कष्टों को दूर करने वाले हैं, जैसा कि वेदों ने यश का वर्णन किया है।
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।।
जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू।।
व्याख्या : तो मैं (श्रद्धा) प्रार्थना करती हूँ कि मेरा यह शरीर जल्दी ही छूट जाए अर्थात् चातुरी का भाव बदल जाए, जिससे पुन: विश्वास के भाव के साथ मिलन हो सके। इसलिए श्रद्धा का भाव कहता है कि अगर मेरा विश्वास रूपी शंकर के चरणों में मन, वचन व कर्म से सच्चा प्रेम है, तो मेरा शरीर त्याग का व्रत पूर्ण हो जाए।
दो0 तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
होई मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।59।।
व्याख्या : श्रद्धारूपी सती कहती हैं कि हे सब कुछ देखने वाले परमात्मा! ऐसा उपाय कीजिए जिससे मेरा मरण हो जाए और बिना परिश्रम के ही यह विरह रूपी विपत्ति दूर हो जाए।
एहि बिधि दुखित प्रजेस कुमारी। अकथनीय दारून दुखु भारी।।
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी।।
व्याख्या : यहाँ श्रद्धा रूपी सती को प्रजेसकुमारी कहा गया है क्योंकि दक्षता अर्थात् चतुराई से ही भावों रूपी प्रजा पैदा होती है और चातुरी के भावों से ही श्रद्धा पैदा होती है। इसलिए सती रूपी श्रद्धा को प्रजेसकुमारी भी कहा गया है। इस प्रकार श्रद्धारूपी सती दु:खी होकर असहनीय कष्ट पा रही हैं। अर्थात् श्रद्धा का भाव विश्वास के त्याग करने पर दु:खी हो जाता है। इस प्रकार ध्यान की अवस्था में सत्तासी हजार वर्ष बीत गए (अर्थात् चौरासी प्राण वायु व तीन गुणों का मर्म समझ में आ गया) तब विश्वास रूपी शंकर सहज समाधी से बाहर आए। साधक निरन्तर ध्यान की अवस्था में नहीं रह पाता है और जब ध्यान से बाहर आने लगता है तो क्षण भर में नाना भाव आ जाते हैं और साधक सहज अवस्था से बाहर आकर भावों की अवस्था में आ जाता है। अत: उसी को कहा गया है कि
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे।।
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा।।
व्याख्या : शिव रूपी साधक का विश्वास रूपी भाव राम के नाम का सुमिरण करने लगता है तो श्रद्धा रूपी सती का भाव जान लेता है कि विश्वास रूपी शिव जाग गए हैं अर्थात् भावावस्था में आ गए हैं। अत: विश्वास रूपी शिव के चरणों में नमन किया तो विश्वास रूपी शंकर ने सामने बैठने का आसन दिया अर्थात् दक्षपुत्री श्रद्धा रूपी सती को सावधानी पूर्वक देखा, जिससे विश्वास का भाव विचलित नहीं हो जाए। क्योंकि अगर विश्वास दृढ़ नहीं रहे तो श्रद्धा का भाव इतना प्रबल होता है कि वो विश्वास को ही विचलित कर सकता है। अत: विश्वास रूपी शंकर श्रद्धा रूपी भाव को सामने आसन देते हैं अर्थात् सावधानी बरतते हैं।
लगे कहन हरि कथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला।।
देखा बिधि बिचारी सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर परमात्मा की रसयुक्त कथा को श्रद्धा रूपी सती से कहने लगे। जब विश्वास और श्रद्धा के भाव वार्तालाप करने लगते हैं, तो तुरन्त दक्ष अर्थात् चतुरता भावों का राजा बन जाता है। दक्षता का भाव सब प्रकार से भावों को संचालित करने की क्षमता से युक्त होता है, इसलिए वह स्वत: भाव रूपी प्रजा का नायक बन जाता है।
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा।।
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।
व्याख्या : जब चतुराई रूपी दक्षता का भाव भावों का नायक बनकर भावों को संचालित करने लगता है, तो दक्ष अर्थात् चतुराई के भाव के हृदय में अभिमान पैदा हो जाता है। यह सही भी है कि ऐसा संसार में कोई नहीं पैदा हुआ, जिसे बड़प्पन मिलने पर मद नहीं होता हो।
दो0 दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।60।।
व्याख्या : उस अवस्था में दक्षता भाव मन के सब भावों को प्रभावित करने लग जाता है और भावों के अनुसार स्वरों की गति हो जाती है और स्वरों की गति के अनुसार ही यज्ञ (अर्थात् पान का अपान में हवन) होने लगता है।
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।।
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।।
व्याख्या : उस अवस्था में नाग, किन्नर व गंधर्ब आदि प्राण वायु अपने भावों सहित स्वरों में चलने लगते हैं। उसी अवस्था में सत, रज व तम के गुण अलग हो जाते हैं। जब दक्षता (चतुरता) का भाव प्रबल हो जाता है, तब सत, रज व तम के गुण भावों से अलग हो जाते हैं और भाव स्वरों के माध्यम से चलने लगते हैं। उसी अवस्था को देवों का यानों पर चढ़कर जाना बताया गया है।
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना।।
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती के भाव ने मस्तिष्क रूपी आकाश में भाव रूपी देवों को जाते हुए देखा। श्रद्धा का भाव तुरन्त भावों को देखकर प्रभावित हो जाता है। वही प्रभाव यहाँ पर श्रद्धा रूपी सती पर पड़ा हुआ बताया गया है। भावों से उत्पन्न इच्छाएँ नाना प्रकार से गान करने लगती हैं। अत: उसी को सुर सुंदरी का गान बोलकर लिखा गया है। इच्छाओं (सुर सुंदरी) के गान को सुनकर अर्थात् इच्छाओं के प्रभाव से मन को वश में रखने वाले मुनियों का भी ध्यान टूट जाता है।
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कहु हरषानी।।
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती ने भावों के बारे में विश्वास रूपी शिव से पूछा तो शिव ने बताया कि दक्षता (चतुराई) के कारण भावों का यजन (अर्थात पान में अपान का हवन) हो रहा है। श्रद्धा रूपी सती दक्ष रूपी पिता के द्वारा यजन करने की बात सुनकर हर्षित हो गयी। श्रद्धा का भाव हमेशा चतुराई के भावों से प्रभावित हो जाता है, अत: दक्ष (चातुर्य) को ही श्रद्धा रूपी सती का पिता बताया गया है। अब श्रद्धा रूपी सती मन में विचार करती है कि अगर विश्वास रूपी शिव मुझे आज्ञा दें तो कुछ दिन इसी बहाने से अपने दक्षता रूपी पिता के घर जाकर रहूँ। श्रद्धा के भाव में दुविधा बनी है। इसलिए कभी वह विश्वास के भाव के साथ तो कभी चतुराई (दक्ष) के भाव के साथ हो लेती हैं।
पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी।।
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती के हृदय में विश्वास रूपी पति के त्याग का बहुत दु:ख था, परन्तु स्वयं के अपराध का विचार करके कुछ नहीं कहा। श्रद्धा रूपी सती ने मन को हरने वाली मधुर वाणी बोली, जो भय, संकोच और प्रेम रूपी रस में सनी हुई थी।
दो0 पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।61।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती ने कहा कि हे स्वामी (विश्वास)! मेरे पिताजी के घर में परम उत्सव हो रहा है। अत: आपकी आज्ञा हो तो मैं उस उत्सव को देखने के लिए चली जाउँ। दक्षता से जो भाव पैदा होते हैं, वे श्रद्धा के भाव के लिए उत्सव के समान होते हैं क्योंकि विश्वास की अवस्था में मन में कोई भाव आते ही नहीं हैं। परन्तु चातुर्य (दक्ष) से नाना प्रकार के भाव पैदा होते हैं, जिससे श्रद्धा का भाव भी आकर्षित हो जाता है। उसी अवस्था को यहाँ दक्ष के घर पर यज्ञ के उत्सव के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।।
दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउँ बिसराई ।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव बोले कि यह भाव रूपी उत्सव में जाने का विचार तो अच्छा है, परन्तु तुम्हें निमंत्रण नहीं भेजा है, इसलिये यह अनुचित है। विश्वास के भाव और दक्षता के भाव आपस में एक दूसरे के विरोधी होते हैं। इसलिए श्रद्धा का भाव जब विश्वास के साथ रहता है, तो दक्षता रूपी भाव श्रद्धा के भाव से भी दूरी कर लेता है। इसलिए चतुराई रूपी दक्ष ने अपनी दूसरी बुद्धि, इच्छा, प्रीति, वासना व कामनादि रूपी पुत्रियों को तो बुलाया परन्तु विश्वास के प्रभाव में रहने के कारण श्रद्धा रूपी सती को नहीं बुलाया। इसी भावावस्था को शिव (विश्वास) से बैर होने के कारण सती (श्रद्धा) को नहीं बुलाना कह कर बताया गया है।
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि ते अजहुँ करहिं अपमाना।।
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।।
व्याख्या : जब साधक ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। उस समय विश्वास का भाव दृढ़ हो जाता है और तर्क आदि की चतुराई को एकदम नकार देता है। अत: उसी अवस्था को ब्रह्मसभा बोलकर लिखा है, जिसमें दक्षता रूपी भाव असहाय हो जाता है, उसे ही दक्ष का अपमान कहा जाता है। जब ब्रह्म में दृढ़ विश्वास हो जाता है, तब कभी भी विश्वास तर्क आदि की चतुराई में नहीं फँसता है। अत: उसी को आज भी दक्ष का शिव से बैर बोलकर लिखा है। विश्वास रूपी शिव श्रद्धा रूपी भवानी को समझाते हैं कि अगर तुम बिना दक्ष के बुलाए जावोगी तो तुम्हारा शील, प्रेम व लज्जा नहीं बचेगी। क्योंकि चतुराई रूपी दक्ष का भाव कभी भी श्रद्धा के भाव से प्रीत नहीं कर पाता है क्योंकि श्रद्धा हमेशा विश्वास को बल देती है और विश्वास से दक्षता का विरोध होता है।
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न संदेहा।।
तदपि विरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।।
व्याख्या : हालाँकि ऐसी नीति है कि मित्र, गुरु, स्वामी और पिता के घर बिना बुलाए भी जाया जा सकता है। परन्तु अगर वहाँ पर विरोध हो तो जाने में कल्याण नहीं होता है।
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।।
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर ने श्रद्धा रूपी सती को नाना प्रकार से समझाया परन्तु भावों के प्रभाव के कारण हृदय में समझ नहीं आया। विश्वास रूपी शिव ने कहा कि अगर तुम (श्रद्धा) बिना बुलाए जावोगी, तो अच्छा नहीं होगा, ऐसा मुझे लग रहा है।
दो0 कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।
व्याख्या : विश्वास का भाव समस्त संशयों का हरण कर लेता है, इसलिए विश्वास रूपी शिव को हर भी कहा जाता है। विश्वास रूपी शिव ने चातुर्यमयी श्रद्धा के भाव को बहुत रोकने की कोशिश करी परन्तु वह नहीं मानी। तब विश्वास रूपी शिव ने श्रद्धा रूपी सती के साथ अपने मुख्य गण रक्षक के रूप में भेज दिए और श्रद्धा रूपी सती को विदा कर दिया। भृंगी, नन्दी, हूहाउ आदि शिव के प्रमुख गण माने गए हैं। भृंगी परमात्मा की भक्ति का रसपान करनेवाला भाव है तथा नन्दी परमात्मा की भक्ति का रस बहानेवाला भाव है और हूहाउ का भाव परमात्मा की भक्ति के उल्लास का भाव होता है। ये सभी भाव परमात्मा के प्रति विश्वास को दृढ़ करते हैं, इसलिए इन सब भावों को विश्वास रूपी शिव का गण कहा जाता है। विश्वास रूपी शिव ने इन गणों को श्रद्धा रूपी सती के साथ भेज दिया ताकि श्रद्धा का भाव दक्षता के भावों के प्रभाव में नहीं आ सके अर्थात् श्रद्धा के भाव की माया के भावों से रक्षा हो सके।
पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।।
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।।
व्याख्या : जब श्रद्धा रूपी सती का भाव दक्षता रूपी पिता के घर गयी तो दक्षता (चतुराई) के भय से किसी ने श्रद्धा के भाव का सम्मान नहीं किया। केवल बुद्धि रूपी माता आदरपूर्वक मिलीं। श्रद्धा रूपी सती की इच्छा, वासना, कामना, प्रीति, ईर्ष्या, दूति, चुगलि आदि बहने व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए मिली।
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।।
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।।
व्याख्या : चतुराई रूपी दक्ष के भाव ने श्रद्धा रूपी सती से कुशलक्षेम नहीं पूछा और उल्टा श्रद्धा के भाव को देखकर जल उठा। चतुरता का भाव हमेशा श्रद्धा के भाव का विरोधी होता है। तब उस अवस्था में श्रद्धा के भाव ने चतुराई के यज्ञ को देखा अर्थात् चतुराई से पैदा होने वाले भावों के संगम को देखा, तो पाया कि वहाँ विश्वास रूपी शिव का कोई स्थान नहीं था अर्थात् विश्वास के भाव नहीं थे।
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।।
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महापरितापा।।
व्याख्या : तब श्रद्धा के भाव को विश्वास रूपी भाव का कहा हुआ याद आ गया और विश्वास के भाव का अपमान समझकर सती (श्रद्धा) को इतना कष्ट हुआ कि जो पहले वाले कष्ट से भी ज्यादा था। श्रद्धा का भाव जब विश्वास से विलग होता है, तो कष्ट होता है परन्तु जब श्रद्धा का भाव चतुराई के भावों में विश्वास का स्थान नहीं देखता है, तो उस अवस्था में भयंकर कष्ट होता है।
जद्यपि जग दारून दुख नाना । सब ते कठिन जाति अवमाना।।
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननी कीन्ह प्रबोधा।।
व्याख्या : हालाँकि संसार में अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं परन्तु अपनी जाति अर्थात् अपने बराबर वालों में अपमान हो, सबसे बड़ा कष्ट होता है। इसलिए श्रद्धा रूपी सती ने ऐसा विचार कर बहुत क्रोध किया यद्यपि बुद्धि रूपी माता ने बहुत प्रकार से समझाने का प्रयास किया।
दो0 सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोली बचन सक्रोध।।63।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती विश्वास रूपी शिव का अपमान सहन नहीं कर सकी इसलिए हृदय में कुछ भी समझ नहीं आया। फिर वह सबको डाँटकर हठ करके क्रोधपूर्वक वचन बोलीं। श्रद्धा का भाव विश्वास के बिना नहीं रह पाता है, इसलिए सभी भावों को श्रद्धा का भाव नकार देता है। उसी अवस्था को सभी को डाँट देना कहकर बताया गया है।
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।।
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ।।
व्याख्या : हे सभी सभासदों अर्थात समस्त चतुराई के भावों के समूहों! तुम सुनो जिसने भी विश्वास रूपी शंकर की निन्दा की है, वे सब तुरन्त फल पायेंगे और दक्षता रूपी पिता को भी पश्चाताप करना पड़ेगा।
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा।।
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई।।
व्याख्या : संत, विश्वास रूपी शिव व परमात्मा की निंदा जहाँ भी सुनाई पड़े, वहाँ ऐसी मर्यादा होती है कि या तो कहने वाले की जीभ काट डालो या फिर कान बंद करके वहाँ से दूर चले जाओ। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि इनकी निन्दा सुनने से अविश्वास के भाव प्रबल होंगे और अविश्वास के भाव ही कष्ट का कारण बनते हैं और अविश्वास से ही श्रद्धा कमजोर होती है।
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सबके हितकारी।।
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।।
व्याख्या : जगत की आत्मा, महाऐश्वर्य वाले, देहबुद्धि के शत्रु, जगत के पिता व सबका हित करने वाले परमपिता की दक्ष रूपी पिता निंदा करते हैं अर्थात् चतुरता की अवस्था में परमात्मा के प्रति अविश्वास पैदा होता है और चतुरता (दक्षता) से शरीर का आभास होता है। इसलिए दक्ष रूपी चतुराई के शुक्राणुओं से ही देह आभास सम्भव होता है।
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू । उर धरि चन्द्रमौलि बृषकेतू।।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकार।।
व्याख्या : ऐसी अवस्था में श्रद्धा का भाव प्रबल हो उठता है और श्रद्धा की प्रबलता से शरीर का भाव मिट जाता है। उसी को श्रद्धा रूपी सती द्वारा चन्द्रमौलि अर्थात् भृकुटि में चन्द्र बिन्दु पर श्रद्धा के भाव का केन्द्रित हो जाने की अवस्था कहा जाता है। उस अवस्था में श्रद्धा का भाव चतुराई के समस्त भावों से अलग हो जाता है और श्रद्धा प्रबल होकर साधक को विदेह बना देती है, जिससे समस्त चतुराई के भावों में हाहाकार मच जाता है। उसी को योग अग्नि में शरीर को जला देना कह कर बताया गया है।
दो0 सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस।।64।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी सती का मरण सुनकर विश्वास रूपी शिव के गण नन्दी (भक्ति रस) भृंगी (भक्ति रस पान का भाव) हूहाहू (आह्लाद का भाव) आदि चतुराई रूपी भावों का नाश करने लगे। जब भक्ति का रस प्रवाह शु डिग्री हो जाता है, तब पान-अपान की गति बदल जाती है और प्राण शक्ति प्रबल होकर उर्ध्वगामी हो जाती है। उससे पान-अपान का हवन (यजन) भंग हो जाता है। उसी को यज्ञ के विध्वंस के प्रतीक के रूप में बताया गया है। जब प्राण प्रबल होकर सारे भाव भक्तिमय होने लगते हैं, तब भृगु अर्थात् प्रकृति का भाव माया के भावों (दक्षता) की रक्षा करना चाहता है। उसी को भृगु के यज्ञ रक्षा करने के प्रयास के रूप में बताया गया है। भृ अ गु अर्थात् जिससे भावों का प्रवाह बढ़ता है और भावों का गुरुत्व बढ़ने पर ही माया का प्रवाह तेज हो पाता है।
समाचार सब संकर पाए। बीर भद्रु करि कोप पठाए।।
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।।
व्याख्या : जब विश्वास रूपी भाव ने ये सब जाना तो क्रोध करके अर्थात् दृढ़ता लाकर वीरभद्र रूपी गण को भेजा। वीरभद्र का तात्पर्य है, जो गण भय के भावों को द्रवित कर दे अर्थात् भय के भावों के प्रभाव को समाप्त कर दे। जब साधक के विश्वास को लगता है कि प्रकृति के भाव साधना में व्यवधान कर सकते हैं, तो वह विश्वास के भाव को दृढ़ कर लेता है। उसी भावावस्था के गुण को वीरभद्र कहा जाता है। वीरभद्र का भाव भावों के यज्ञ का नाश कर देता है और समस्त भावों को क्रिया के अनुसार फल देता है।
भै जग बिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।।
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी ।।
व्याख्या : दक्ष रूपी चतुराई के भाव की वही गति हुई, जो विश्वास रूपी शिव के विरोधी की होती है। यह समस्त संसार जानता है। इसको सभी जानते हैं, इसलिए मैंने संक्षेप में बताया है।
सतीं मरत हरि सन ब डिग्री मागा। जनम-जनम सिव पद अनुरागा।।
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।।
व्याख्या : दक्षता से उत्पन्न श्रद्धा रूपी सती ने मरते हुए परमात्मा से वरदान माँगा कि मेरा प्रत्येक जन्म में विश्वास रूपी शिव के चरणों में अनुराग बना रहे। अर्थात् चतुराई से उत्पन्न श्रद्धा जब मरती है, तो उसे विश्वास के साथ रहने की ही इच्छा रहती है। इसलिए यहाँ लिखा गया है कि जन्म-जन्म अर्थात् प्रत्येक अवस्था मेंे श्रद्धा का भाव विश्वास के साथ ही रहना चाहता है। इसी कारण से दक्षता रूपी चतुराई के भाव को छोड़कर श्रद्धा का हिमगिरि अर्थात् वासनाओं से रहित शीतलता की अवस्था में जाकर श्रद्धा का भाव रूपान्तरित हो गया। चतुरता से उत्पन्न श्रद्धा विषय वासना को जागृत करके जीव को तर्क में फँसा देती है परन्तु जब ग्लानि होने लग जाती है तो चतुराई रूपी श्रद्धा का भाव रूपान्तरित होकर परमात्मा के प्रति प्रेम पैदा कर देता है। उस अवस्था में श्रद्धा को विश्वास का आधार मिल जाता है। उसी भावावस्था को आगे शिव-पार्वती के विवाह के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपत्ति तहँ छाईं।।
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे।।
व्याख्या : जब श्रद्धा का भाव सैल अर्थात् कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है, तो साधक के प्रत्येक भाव में परमात्मा के प्रति समर्पण का भाव आ जाता है, जिससे साधक को सम्पत्ति व समस्त सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। उस अवस्था में मन के सब भाव सात्विक (सुआश्रम) हो जाते हैं, जिन्हें शरीर में उचित स्थान पर वास मिला जाता है।
दो0 सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।65।।
व्याख्या : मन में उस अवस्था में अच्छे भाव पैदा होकर अच्छे भावों की नाना प्रकार की बेल सी बन जाती हैं अर्थात् सात्विक भावों का प्रकटीकरण हो जाता है। कोशिकाओं में सात्विक भावों की मणियों जैसी माला बनकर सुंदर तरीके से प्रकट होने लगती हैं अर्थात् सात्विक भावों द्वारा मन सुशोभित होने लग जाता है।
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।
सहज बय डिग्री सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।।
व्याख्या : सभी नाड़ी रूपी सरिताओं (ईड़ा, पिंगला व सुष्मना) मे ंपवित्र भावों रूपी जल का प्रवाह होने लग जाता है, जिससे समस्त इच्छाओं रूपी पक्षी, मृग व भ्रमर सुखी रहने लग जाते हैं अर्थात् वासनाओं की अनल नहीं जलाती है। समस्त भाव उस अवस्था में सहज में ही विरोधाभास का त्याग कर देते हैं। उस अवस्था में शरीर रूपी पर्वत पर सभी अनुराग करने लगते हैं।
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु राम भगति के पाएँ।।
नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।।
व्याख्या : श्रद्धा के भाव का सैल (कोशिकाओं) में आने पर ऐसा लगने लगता है कि साधक को परमात्मा की भक्ति की प्राप्ति हो गयी हो। उस अवस्था में नित्य नए-नए मंगल होने लगते हैं, जिसका वर्णन ब्रह्मा आदि गाते हैं अर्थात् जो उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं, वे इस आनन्द अवस्था का गुण-गान करते हैं।
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए।।
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।।
व्याख्या : उस अवस्था में मन का नारद रूपी भाव पैदा होता है। नारद का मतलब मन के उस भाव से है जो परमात्मा के गुणगान में दृढ़तापूर्वक लगा हुआ रहता है। ना रद अर्थात् जो कभी परमात्मा के पथ पर चलते हुए रूक नहीं सकता है। नारद रूपी भाव श्रद्धा के भाव को देखकर खेल-खेल में ही शरीर रूपी पर्वत पर प्रगट हो जाता है। उस अवस्था में कोशिकाओं को धारण करने वाले नर (नड़) ने नारद रूपी भाव का बड़ा आदर किया और समर्पण करते हुए आसन दिया। उसी को ""पद पखारि बर आसनु दीन्हा"" बोलकर लिखा है।
नारि सहित मुनि पदु सि डिग्री नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा।।
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना।।
व्याख्या : नर (नड़) ने नाड़ी सहित नारद रूपी भाव को सीस झुकाया और नारद रूपी भाव के चरणों के जल से समस्त घर को पवित्र किया। प्रत्येक भाव का एक विशेष हार्मोन निकलता है। अत: नारद रूपी भाव से निकलने वाला हार्मोन परमात्मा की भक्ति को दृढ़ करने वाला होता है। अत: उसी को मुनि के चरणों के जल से नर व नारी रूपी घर को पवित्र करना बताया गया है। उस अवस्था को नर (नड़) अपना सौभाग्य मानता है और नर से उत्पन्न श्रद्धा को अपनी पुत्री मानकर नारद रूपी भाव के चरणों में डाल दिया अर्थात् श्रद्धा सहित नारद रूपी भाव के चरणों में समर्पण कर दिया।
दो0 त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।
व्याख्या : तब नर रूप भाव बोला कि हे नारद रूपी मन के भाव! आप तो तीनों कालों को जानने वाले व सर्वत्र गमन करने वाले हैं। अत: आप मेरी श्रद्धा रूपी पुत्री के गुण व दोषों का हृदय में विचार करके बताइये।
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।।
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी।।
व्याख्या : तब नारद रूप मन के भाव ने हँसते हुए बहुत ही गूढ़ रहस्य को मधुर वाणी में बताया कि तुम्हारी श्रद्धा रूपी पुत्री समस्त गुणों की खान है। यह सुंदर, सहज, सुशील व समझदार हैं। अत: इसका नाम उमा अर्थात उ और म यानी परमात्मा से एकरूप कराने वाली व उ अ मा यानी उर माझ अर्थात् हृदय में निवास करने वाली, अम्बिका अर्थात् परमात्मा और जीव एक हैं का आभास कराने वाली, भवानी अर्थात् भावों को पैदा करने वाली भव अ आनि (भवानी) होगा।
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी।।
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता।।
व्याख्या : ये श्रद्धारूपी पुत्री सब गुणों से सम्पन्न है तथा सदैव परमात्मा को प्यारी होगी। इसको कभी वासनारूपी हवा चलायमान नहीं करेगी तथा इससे इसके माता-पिता (अर्थात नर-नाड़ी) को यश की प्राप्ति होगी। अर्थात् श्रद्धा के भाव के प्रबल होने पर शरीर के नर व नारी की गति सहज हो जाती है। इसी को माता-पिता का यश प्राप्त करना बताया गया है क्योंकि नर-नारी की गति सहज होने पर परमात्मा की प्राप्ति सम्भव हो जाती है।
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कुछ दुर्लभ नाहीं।।
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा।।
व्याख्या : ये श्रद्धा रूपी पुत्री जगत में पूजनीय होगी तथा इसकी सेवा करने पर अर्थात् श्रद्धा के अनुसार परमात्म पथ पर चलने पर संसार में कुछ भी प्राप्त करना दुर्लभ नहीं रह जाता है। इसका नाम सुमिरन करके अर्थात् साधक श्रद्धान्वित होकर तीन गुणों (सत, रज, तम) रूपी तलवार की धार पर चढ़कर पार हो जाता है। इसे ही त्रिय अर्थात् तीन गुणों को पार करके परमात्मा को प्राप्त कर लेना कहा गया है।
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइचारी।।
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।
व्याख्या : नारद रूपी भाव बोला कि तुम्हारी श्रद्धा रूपी पुत्री समस्त सुलक्षणों वाली है परन्तु दो-चार अवगुण हैं, उनको बता देता हूँ। गुणों से परे, मान से परे, माता-पिता से रहित अर्थात् अजन्मा, उदासीन व समस्त संशयों को दूर करने वाला।
दो0 जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।।67।।
व्याख्या : योग में आरूढ़, निष्काम अर्थात वासनाओं से रहित, नग्न मन वाला अर्थात् निष्कपट व अमंगल भेष (अर्थात् चाह से परे) धारण करने वाला पति मिलने का योग है।
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।।
नारदहूँ यह भेदु न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना।।
व्याख्या : नारद रूपी मन के भाव की बात को श्रद्धा रूपी पार्वती ने सत्य मान लिया। मुनि की बात सुनकर राजा व रानी अर्थात् नर व नाड़ी को तो दु:ख हुआ परन्तु श्रद्धा रूपी भाव हर्षित हो उठा। मन के नारद रूपी भाव भी इस रहस्य को नहीं समझ पाया क्योंकि श्रद्धा और विश्वास की तो एक ही गति होती है परन्तु नारद रूपी भाव अलग-अलग समझ रहा था। ध्यान की अवस्था में भावों का बहुत सूक्ष्म वार्तालाप होता है, जिसे गहरे ध्यान में ही समझा जा सकता है।
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।।
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा।।
व्याख्या : करूणा, मैत्री, दया आदि रूपी सखियाँ सहित श्रद्धा रूपी पार्वती, नर व नाड़ी सहित शरीर में पुलकावलि छा गयी और आँखों में जल छा गया। नारद रूपी मन का कथन कभी मिथ्या नहीं हो सकता है, इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती ने यह बात अपने हृदय में धारण कर ली।
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू।।
जानि कुअवस डिग्री प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाईं।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती के मन में विश्वास रूपी शिव के चरणों में प्रेम पैदा हो गया परन्तु मिलना कठिन जानकर मन में संदेह हो गया। अत: उचित समय नहीं जानकर विश्वास रूपी शिव के प्रति अपने प्रेम को छुपा लिया और उत्साह के साथ करूणा, मैत्री, व दया रूपी सखियों की गोदी में बैठ गयी। जब श्रद्धा के भाव को विश्वास का पूरी तरह आधार नहीं मिलता है, तब तक वह मैत्री व करूणा के भावों के साथ ही धीरे-धीरे बलवती होती रहती है। इसी को पार्वती की सखियों के रूप में लिखा गया है।
झूठी न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी।।
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।
व्याख्या : नर व नाड़ी रूपी राजा-रानी व करूणा व मैत्री रूपी चतुर सखियाँ सोचने लगी कि मन के नारद रूपी भाव की वाणी मिथ्या नहीं हो सकती है। अत: नर रूपी राजा ने धैर्य धारण करके बोला कि हे मुनिवर (नारद रूपी भाव)! क्या उपाय करें। जब श्रद्धा का भाव प्रबल होकर परमात्मा की भक्ति के पथ पर चलने लगता है, तो नर व नाड़ी के अन्य सांसारिक भाव सांसारिक सुखों के भोग के लिए भक्ति पथ पर चलना नहीं चाहते हैं। उसी अवस्था में नड़ (नर) की धड़कन में कम्पन होता है, उसी को नर रूपी राजा की चिन्ता बताया गया है।
दो0 कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।68।।
व्याख्या : मन के नारद रूपी भाव ने कहा कि हे हिमवंत! (हिमवंत का तात्पर्य बर्फ के समान शीतलता से है), नर (नड़) जब स्थिर होता है, तो उसमें वासनाओं की जलन नहीं होती है। अत: नर की वासना रहित अवस्था बर्फ के समान शीतल कह कर बतायी गयी है। दूसरा हिमवंत कहने का कारण यह है कि ब्रह्म बीज अर्थात् वीर्य नड़ (नर) में ही निवास करता है, जो नाड़ी से उष्णता प्राप्त करके स्खलित होता है वरना ब्रह्म बीज (वीर्य) एकदम बर्फ के समान ठण्डा रहता है, इसलिए नर को हिमवंत के प्रतीक द्वारा समझाया गया है। जो क्रिया घटित होती है अर्थात् क्रिया करने का जो भाव आता है, उसको देव, दनुज, नर, नाग व मुनि कोई नहीं मिटा सकते हैं। देव, दनुज, नर व नाग ये सब प्राण वायु के प्रकार होते हैं। अत: यहाँ कहा गया है कि जो भाव उठते हैं, उसी के अनुसार क्रिया घटित होती है। उसे कोई भी प्राण वायु अटका नहीं सकती है।
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जो दैउ सहाई।।
जस ब डिग्री मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं।।
व्याख्या : तब नारद रूपी मन का भाव कहता है कि मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ, जिसको करने से अनुकूलता आ जायेगी। मैंने जिस प्रकार का वर श्रद्धा रूपी पार्वती के लिए बताया है, वो निश्चित मिलेगा। श्रद्धा की परणिति जरूर विश्वास में होती है, इसी को प्रतीकों के माध्यम से उमा को शिव का मिलना बताया गया है।
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने।।
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सुब कोई।।
व्याख्या : जो जो वर के मैंने दोष बतायें हैं, वे सब विश्वास रूपी शिव के हैं। मान-अपमान से परे, निर्मल मन, अजन्मा, निष्काम आदि गुण सांसारिक दृष्टि वालों के लिए दोषयुक्त लगते हैं परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि वालों के लिए ये लक्षण गुण युक्त लगते हैं। उसी भाव अवस्था को यहाँ लिखा गया है। इसलिए कहते हैं कि अगर श्रद्धा रूपी पुत्री का विवाह अर्थात् समर्पण शंका रहित विश्वास (शंकर) के साथ होता है, तो दोषमय दिखने वाले (मान-अपनाम से परे, अजन्मा, निष्कामता) ये भाव गुणमय हो जायेंगे अर्थात् संशय मिट जाने पर ये गुण जीवात्मा के आभूषण बन जायेंगे।
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं।।
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं।।
व्याख्या : अहि का प्रतीक वासनाओं का होता है। अत: जो हरि अर्थात् माया का हरण कर लेता है, वो अगर वासनाओं का भोग करता है, तो भी विद्वान लोग उसे दोष नहीं देते हैं। जैसे सूर्य और अग्नि सब रसों का पान करते हैं परन्तु फिर भी कोई उन्हें दोष नहीं देता है। अर्थात् सहज होकर भोगों को भोगने का कोई दोष नहीं लगता है।
सुभ अ डिग्री असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।।
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं।।
व्याख्या : गंगा में शुद्ध और अशुद्ध दोनों प्रकार का पानी बहता है परन्तु गंगा को कोई भी अपवित्र नहीं कहता है। इसलिए जो गोसाईं अर्थात् इन्द्रियों को वश में रखता है, ऐसे समर्थ साधक को भोगों का कोई दोष वैसे ही नहीं लगता है जैसे सूर्य, अग्नि व गंगा को नहीं लगता है। अर्थात् वासनाओं में अगर लिप्त नहीं हो तो भोगों का कोई दोष नहीं लगता है।
दो0 जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान।।69।।
व्याख्या : अत: जो मूर्ख लोग विवेक का अभिमान करके ऐसे लोगों की निंदा करते हैं, तो वे लोग जीव क्या ईश्वर के समान हो सकता है कि कल्पना कर करके चिन्ता रूपी नरक में पड़ते रहते हैं। ज्ञान के अभिमान में ज्ञानी लोगों को हमेशा यह संशय बना रहता है कि जीव कैसे ईश्वर के समान हो सकता है? उसी संशय को दूर करते हुए आगे लिखते हैं --
सुरसरि जल कृत बारूनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।।
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंत डिग्री तैसें।।
व्याख्या : गंगा के जल से शराब बनती है, परन्तु संत लोग उसका कभी सेवन नहीं करते हैं परन्तु जब शराब गंगा के पानी में मिल जाती है, तो वह पुन: पवित्र हो जाती है। अत: इसी प्रकार जीव जब वासनाओं में लिप्त रहता है, तो वह शराब की तरह अपवित्र रहता है परन्तु जब भक्ति के पथ पर चल कर वासनाओं से मुक्त हो जाता है, तो वह ईश्वर के अस्तित्व में लीन होकर पुन: पवित्र हो जाता है। अत: जैसे शराब और गंगा के जल में अन्तर होता है, वैसा ही ईश्वर और ईश्वर के अंश जीव में सम्बन्ध होता है।
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना।।
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।।
व्याख्या : साधक स्वयं जब विषय वासनाओं का त्याग करके सहज हो जाता है, तो वह भग अ वान अर्थात् प्रकृति को वश में करने में समर्थ हो जाता है। अत: इस विश्वास के साथ श्रद्धा रूपी पुत्री का विवाह अर्थात मिलन हो जाने पर सब क्रियाएँ कल्याणकारी हो जाती हैं। जो सहज होने की कठिन साधना को कर लेता है, तो वह साधक महाऐश्वर्य वाला हो जाता है और साधना के सब क्लेश मिट जाते हैं और वह साधक आशुतोष अर्थात् क्षण-क्षण में संतोष की अवस्था में प्रवेश कर जाता है।
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं।।
व्याख्या : अत: तुम्हारी श्रद्धा रूपी पुत्री अगर तप करे, तो भावों के प्रभाव को मिटाकर त्रिगुणों से पार होकर विश्वास रूपी शिव से मिलन हो सकता है। हालाँकि संसार में अनेक भाव रूपी वर होते हैं परन्तु श्रद्धा रूपी भाव का विश्वास रूपी शिव के अलावा दूसरा कोई वर नहीं है।
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपा सिंधु सेवक मन रंजन।।
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।
व्याख्या : विश्वास (शिव) का भाव ही वर देने वाला होता है और प्राण से उत्पन्न भावों के संशय को मिटाने वाला होता है। विश्वास का भाव ही परमात्मा का सेवक व मन को संतुष्ट करने वाला होता है। इसलिए बिना विश्वासपूर्वक साधनाके इच्छित फल की प्राप्ति नहीं हो सकती है। चाहे कोई करोड़ों यज्ञ व जप क्यों नहीं कर ले।
दो0 अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।
व्याख्या : ऐसा कहकर मन के नारद रूपी भाव ने श्रद्धा रूपी पार्वती को आशीर्वाद दिया अर्थात् बल प्रदान किया और नर (नड़) रूपी राजा से कहा कि अब कल्याण होगा। अत: आप संशय मत कीजिए। जब श्रद्धा का भाव विश्वास के भाव से प्रीत करने लग जाता है, तब साधक का कल्याण सुनिश्चित होता है। उसी को प्रतिकात्मक भाषा में यहाँ लिखा गया है।
कहि अस ब्रह्म भवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।।
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।।
व्याख्या : ऐसा कहकर मन का नारद रूपी भाव ब्रह्म की भावना में लीन हो गया। अब ध्यान में साधक को आगे जो अनुभव होते हैं, उन्हें सुनिए। नर रूपी राजा को एकान्त में देखकर नारी रूपी रानी ने कहा कि मुझे नारद रूपी भाव की बात समझ में नहीं आयी है। जब श्रद्धा का भाव विश्वास के भाव के प्रति प्रेम करने लग जाता है, तब नर-नारी की धड़कन भी धीरे-धीरे शान्त होती चली जाती है क्योंकि तब अन्य भावों का प्रवाह कम जाता है। उसी अवस्था को राजा-रानी (नर-नारी) का एकान्त कहा गया है।
जौं घ डिग्री ब डिग्री कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा।।
न तो कन्या ब डिग्री रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी।।
व्याख्या : नारी रूपी रानी बोली कि अगर घर-परिवार कुल व दूल्हा अनुपम व मेरी श्रद्धा रूपी पुत्री के अनुकूल होगा, तो ही मैं अपनी पुत्री का विवाह करूँगी वरना मेरी पुत्री भले ही कुँवारी रह जाए। क्योंकि मेरी श्रद्धा रूपी पुत्री मेरे प्राणों को बहुत प्यारी है।
जौं न मिलिहिं ब डिग्री गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू।।
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।।
व्याख्या : अगर श्रद्धा रूपी भाव के योग्य वर नहीं मिला तो लोग सहज में ही नर (नड़) को जड़ कहेंगे। अत: विचार करके श्रद्धा रूपी पुत्री का विवाह कीजिए, जिससे हृदय में चिन्ता नहीं हो। अगर श्रद्धा का भाव वासनाओं में लग जाए तो वह बाद में चिन्ता पैदा करके हृदय में जलन पैदा कर देता है परन्तु अगर श्रद्धा का भाव दृढ़ विश्वास के साथ परमात्मा की भक्ति में लग जाए तो साधक का कल्याण कर देता है। अत: यहाँ उसी भावावस्था को प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है।
अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।।
ब डिग्री पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं।।
व्याख्या : ऐसा करके नारी रूपी रानी नर रूपी राजा के चरणों में शीश झुकाकर गिर पड़ी। तब नर रूपी राजा प्रेम सहित बोला कि चाहे चन्द्रमा से अग्नि पैदा होना सम्भव हो जाए, परन्तु नारद रूपी मन के भाव के वचन झूठे नहीं हो सकते हैं।
दो0 प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्री भगवान।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान।।71।।
व्याख्या : तब नर रूपी राजा ने कहा कि तुम सब चिन्ताओं को छोड़ दो और परमात्मा को याद करो क्योंकि जिसने श्रद्धा रूपी पार्वती को पैदा किया है, वही शक्ति कल्याण करेगी।
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू।।
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू।।
व्याख्या : अगर तुम्हें श्रद्धा रूपी पुत्री पर स्नेह है, तो जाकर ऐसी सीख दीजिए कि वह तप करे, जिससे विश्वास रूपी शिव मिल सके। वरना और किसी दूसरे उपाय से चिन्ता नहीं मिटेगी।
नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू।।
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संक डिग्री अकलंका।।
व्याख्या : मन के नारद रूपी भाव के वचन रहस्य युक्त व सकारण हैं, क्योंकि बृषकेतू (अर्थात परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास वृष यानी वासनाओं का दुश्मन होता है) सब प्रकार से सुन्दर व सब गुणों की खान हैं। अत: ऐसा विचार करके तुम निशंक हो जाओ, क्योंकि शंकर अर्थात शंका रहित अवस्था सब प्रकार से निष्कलंक होती है। परमात्मा के प्रति पूर्ण विश्वास हो जाने पर शंकाएँ मिट जाती हैं और वासनाएँ शान्त हो जाती है। अत: वह अवस्था निष्कलंक अर्थात निर्लिप्तता की होती है।
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं।।
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी।।
व्याख्या : नर रूपी पति के वचन सुनकर नारी रूपी रानी तुरन्त श्रद्धा रूपी पुत्री के पास गयी और श्रद्धा के भाव को देखकर नयनों में जल भर आया और श्रद्धा के भाव को तुरन्त गोद में बिठा लिया।
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई।।
जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी।।
व्याख्या : बार-बार नारी रूपी रानी ने श्रद्धा रूपी पुत्री को अपने हृदय से लगाया और कण्ठ गदगद हो गया, जिससे कुछ कहने में नहीं आ पा रहा था। तब नारी रूपी माता बोली कि श्रद्धा की भावना सब जगत की माता होती है। क्योंकि जैसे जिसकी श्रद्धा की भावना (भवानी) होगी, उसको संसार वैसा ही दिखायी देगा। इसलिए श्रद्धा रूपी भवानी को जगत की माता के प्रतीक के रूप में बताया गया है।
दो0 सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि।।72।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पुत्री का भाव नारी रूपी माता को बोली कि मुझे ऐसा स्वपन आया है, जिसमें एक सुंदर, गौरवर्ण विद्वान ब्राह्मण ऐसा उपदेश दे रहा था। भाव मंथन की अवस्था में श्रद्धा के भाव को भी आभास होने लगता है कि उचित मार्ग क्या है? उसी भाव अवस्था का यहाँ स्वपन के प्रतीक के रूप में वर्णन किया गया है।
करहि जाइ तपु सैलकुमारी । नारद कहा सो सत्य बिचारी।।
मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।।
व्याख्या : हे माता! स्वपन में कहा कि तुम जाकर तप करो और नारद रूपी मन के भाव ने भी ऐसा ही सत्य विचार करके कहा है। नर-नारी रूपी पिता-माता को भी यह मत अच्छा लगा क्योंकि तप हमेशा सुख को देने वाला व दु:ख के दोषों का नाश करने वाला होता है।
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता।।
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा ।।
व्याख्या : मन व इन्द्रियों का एकीकरण तप कहलाता है और तप के बल से ही इन्द्रियों का विस्तार होता है, इसलिए तप के बल से जीव प्रपंचों को करता है। बिधाता अर्थात् विधि यानी क्रिया को करने वाला विधाता होता है। परमात्मा के तप के बल से ही समस्त सृष्टि का सृजन हो रहा है। और तप के बल से ही परमात्मा की शक्ति अणु-अणु में व्याप्त होकर जगत का पालन करती है। तप के बल से ही साधक स्वयं में लीन होकर सृष्टि के निर्माण का संहार कर लेता है अर्थात् तप के बल पर संसार से मुक्त हो जाता है। तप के बल से ही कुण्डलिनि शक्ति शरीर रूपी पृथ्वी को धारण करती है। जो व्यष्टि में होता है, वही समष्टि में भी होता है। अत: जैसे कुण्डलिनि शक्ति (शरीर की प्राण ऊर्जा) शरीर को धारण करती है, वैसे ही ब्रह्माण्ड की प्राण ऊर्जा समस्त ब्रह्माण्ड को धारण की हुई रहती है। उसी को शेषनाग द्वारा पृथ्वी का धारण करना बताया गया है।
तप आधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी।।
सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिह हँकारी।।
व्याख्या : समस्त भावों की उत्पत्ति भी तप अर्थात् प्राणऊर्जा से ही होती है। अत: हे श्रद्धा रूपी भवानी! तुम हृदय में ऐसा समझकर तप करो। यह सुनकर प्राण को उत्पन्न करने वाली नारी (नाड़ी) रूपी माता आश्चर्यचकित हो गयी और नर रूपी राजा को बुलाकर श्रद्धा रूपी भाव द्वारा देखा गया स्वप्न सुनाया।
मातु पितहि बहु बिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई।।
प्रिय परिवार पिता अ डिग्री माता। भए बिकल मुख आव न बाता।।
व्याख्या : इस प्रकार श्रद्धा रूपी पार्वती नर-नारी रूपी पिता-माता को बहुत प्रकार से समझाकर हर्षित होकर तप करने के लिए चली गयी। श्रद्धा रूपी भवानी के तप हेतु चले जाने पर सब परिवार व माता-पिता व्याकुल हो गए और कुछ कहने में नहीं आ पा रहा था। जब ध्यान की गहरी अवस्था में श्रद्धा का भाव परमात्मा में लीन होने लगता है, तो बाकी भाव यानी करूणा, मैत्री, व दया आदि भाव तथा शरीर के नर-नारी ध्यान से बाहर आने के लिए छट-पट करने लगते हैं। उसी समय के अनुभव को सूक्ष्मता से व्यक्त करने के लिए प्रतीकों का सहारा लेकर बताया गया है।
दो0 बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ।।73।।
व्याख्या : उस समय की ध्यान अवस्था में वेदसिरा मुनि का आगमन होता है अर्थात् मन में वेदों का आरम्भ होने लगता है। उस समय साधक सृष्टि के रहस्यों को जानना शु डिग्री कर देता है। अत: उसी भाव अवस्था को वेदसिरा मुनि के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस समय वेदों का ज्ञान अवतरित होने लग जाता है, जिससे श्रद्धा के महत्व का पता चल जाता है, जिससे नर-नारी व अन्य भाव भी श्रद्धा के भाव की महिमा को समझने लग जाते हैं।
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।।
अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।।
व्याख्या : ध्यान की गहराई में श्रद्धा का भाव परमात्मा के चरणों को हृदय में धारण करके वन में जाकर तप करने लगी। श्रद्धा के भाव ने जो अति कोमल होता है ने, देह भाव से मुक्त होकर परमात्मा के भाव से जुड़कर विश्वासरूपी पति के चरणों का स्मरण करके समस्त भोगों का त्याग कर दिया। जब ध्यान में श्रद्धा का भाव प्रबल होकर परमात्मा से जुड़ जाता है, तो उसी भावावस्था को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गँवाए।।
व्याख्या : उस अवस्था में नित्य परमात्मा के चरणों में अनुराग पैदा होने लगता है और देह भाव मिटने लग जाता है तथा परमात्मा के तप में मन लगने लग जाता है। साधक जब तप में लीन हो जाता है, तब वह विषय वासनाओं से मुक्त होता चला जाता है और उसका श्रद्धा भाव परमात्मा में लग जाता है। उस अवस्था में वह सहज होकर भोगों को भोगता है परन्तु भोगों में आसक्त नहीं होता है। फिर धीरे-धीरे भोगों से भी उसको विरक्ति होने लग जाती है। उस अवस्था में साधक का श्रद्धा भाव विषय वासनाओं की कामना से मुक्त होने लग जाता है। उसी अवस्था को यहाँ ""संवत सहस मूल फल खाए"" बोलकर लिखा है। यहाँ साधक की कठिन साधना पद्धति को भी बताया गया है कि जब श्रद्धा का भाव प्रबल होकर परमात्मा में लग जाता है तो साधक शरीर के पोषण पर भी ज्यादा ध्यान नहीं देता है और कंदमूल खाकर और साग-पात खाकर ध्यान व तप का अभ्यास करता है। बाहर से देखने पर ये सब क्रियाएँ लगती तो शरीर की ही हैं परन्तु वास्तविकता में देखा जाए, तो ये तप की क्रियाएँ श्रद्धा के द्वारा ही होती हैं। इसलिए यहाँ श्रद्धा रूपी पार्वती की तपस्या बताकर ही लिखा गया है।
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।।
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई।।
व्याख्या : साधक का श्रद्धा रूपी भाव कुछ दिन फिर पानी के साथ बतासा लेकर और कुछ दिन कठोर उपवास करके साधना करती है। फिर धीरे-धीरे साधना को और कठोर करती हुई श्रद्धा रूपी पार्वती ने पृथ्वी पर पड़े हुए सूखे पत्तों को खाकर कई संवत साधना करी।
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना।।
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा ।।
व्याख्या : फिर श्रद्धा के भाव के बल पर साधक सूखे पत्तों का भी त्याग कर देता है। तब श्रद्धा रूपी उमा का नाम अपर्णा अर्थात अब उससे परे और कोई नहीं है। अपर्णा श्रद्धा की पराकाष्ठा की अवस्था का प्रतीक है। जब श्रद्धा का भाव विषयों के जाल से मुक्त होकर अति सूक्ष्म (क्षीण) हो जाता है तब उस अवस्था में आकाशवाणी होती है।
दो0 भयउ मनोरथ सुफल तब सुनु गिरिराज कुमारि।
परिह डिग्री दुसह कलेस सब अब मिलहहिं त्रिपुरारि।।74।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में आकाशवाणी होती है कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती। तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण हो गए हैं और अब सब कष्टों को छोड़ों क्योंकि अब तुम्हें त्रिपुरारि मिल जायेंगे अर्थात् तुम्हें विश्वास रूपी शिव मिल जायेंगे, जिससे तुम्हें सत, रज व तम के गुणों का कष्ट नहीं व्यापेगा। अर्थात् उस अवस्था में गुण ही गुणों में बरतने लग जायेंगे।
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी।।
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी भवानी! बहुत से धीर मुनि व ज्ञानी हुए हैं परन्तु ऐसा कठोर तप किसी ने नहीं किया है। अत: अब हृदय में ब्रह्म के वर की वाणी को सत्य निरन्तर व पवित्र जानकर धारण करो। तप के प्रभाव से साधक की वाणी वर देने वाली हो जाती है। अत: उस वाणी को श्रद्धापूर्वक ही हृदय में धारण किया जा सकता है। जब तक हृदय में परमात्मा के प्रति श्रद्धा रहती है, तब तक वाणी भी सत्य व पवित्र रहती है।
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं।।
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जब तुम्हें नर रूपी पिता बुलाने आएँ तो तुम हठ छोड़कर घर चली जाना। साधक का श्रद्धा भाव जब ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, तो ध्यान फिर धीरे-धीरे उतरने लगता है, तो उस अवस्था में भावों का आधार नाड़ी (नारी) नहीं रहकर शरीर स्थित नर (नड़) हो जाता है। अत: यहाँ नर रूपी पिता के साथ ही श्रद्धा भाव को जाने के लिए कहा है। ध्यान में मुख का स्वाद बदलता रहता है और सात प्रकार के रसायनों का स्वाद मुख में आ जाता है। उसी को सप्त ऋषि अर्थात् सात रस कहा गया है। उस समय वाणी की सिद्धि जानना चाहिये। अर्थात् जब ध्यान में सात रसों का अनुभव हो जाए, तब साधक की वाणी की सिद्धि की अवस्था आती है।
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी।।
उमा चरित सुंदर मैं गावा । सुनहु संभु कर चरित सुहावा।।
व्याख्या : आकाशवाणी की विधि (क्रिया) सुनकर श्रद्धा रूपी पार्वती बहुत हर्षित हुई। आकाशवाणी के रहस्य को जानना साधक के लिए बहुत बड़ी बात होती है और बिना श्रद्धा के बल के वह सम्भव नहीं हो सकती है। अब मैंने श्रद्धा के भाव की विशेषताओं का वर्णन कर दिया है। अब विश्वास रूपी शिव की विशेषताओं को सुनिए।
जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा।।
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा।।
व्याख्या : जब चातुर्य युक्त श्रद्धा मिट जाती है, तो विश्वासरूपी शिव को तीव्र वैराग्य हो जाता है। क्योंकि चतुराई का भाव ही विश्वास को सांसारिकता की तरफ खींचता है और जब चतुराई मिट जाती है, तो विश्वास का भाव दृढ़ता से परमात्मा के जप में लग जाता है और जहाँ-तहाँ परमात्मा के गुण-गान में लग जाता है। अर्थात् पूरी तरह परमात्मामय भाव में डूब जाता है।
दो0 चिदानंद सुख धाम सिव बिगत मोह मद काम।
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।75।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव मोह, मद व काम का त्याग करके सत्चितानन्द व सुख का घर हो जाता है और हृदयँ में परमात्मा का नाम धारण करके शरीर रूपी पृथ्वी पर विचरण करने लगता है। उस अवस्था में सब जगह शान्ति मिलने लग जाती है।
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।।
जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुखित सुजाना।।
व्याख्या : उस अवस्था में विश्वास रूपी शिव का भाव मन के भावों को नाना प्रकार के उपदेश करने लगता है, तो कभी परमात्मा के गुणों का बखान करने लगता है। हालाँकि वह अवस्था एकदम निष्काम अवस्था होती है, तब भी साधक का विश्वास रूपी भाव प्रकृति को वश में करने वाला होता है। परन्तु विश्वास रूपी भाव श्रद्धा रूपी भक्त के बिना दु:खी रहता है। यहाँ इसी अवस्था को शिव व पार्वती के विरह के रूप में बताया गया है।
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती।।
नेमु प्रेमु संकर कर देखा । अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा।।
व्याख्या : इस प्रकार विश्वास की अवस्था में बहुत समय निकल जाता है और नित्य नया-नया परमात्मा के चरणों में प्रेम बढ़ता रहता है। संशय हीन अवस्था वाले विश्वास की अवस्था के नियम व प्रेम से हृदय में अविचल भक्ति की रेखा पड़ जाती है।
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला।।
बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रत को निरबाहा।।
व्याख्या : शंकाहीन विश्वास की अवस्था में कृपालु परमात्मा प्रकट हो जाते हैं, जिनका रूप, शील व तेज बहुत विशाल होता है। कृपालु परमात्मा शंकर अर्थात् शंकाहीन विश्वास की बहुत प्रकार से सराहना करते हैं और कहते हैं कि तुम बिना और कौन निष्काम प्रेम का निर्वाह कर सकता है। जब परमात्मा के अस्तित्व पर पूर्ण विश्वास हो जाता है, तब साधक की विषय वासनाएँ मिट जाती हैं और विषय-वासना मिटते ही हृदय में निश्छल प्रेम पैदा हो जाता है। उसी अवस्था को यहाँ लिखा गया है।
बहु बिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।।
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।
व्याख्या : उस अवस्था में परमात्मा विश्वास रूप शिव को समझाते हैं और सात्विक श्रद्धा रूपी पार्वती के जन्म् को बताते हैं। पार्वती का तात्पर्य पार अ वती अर्थात प्रकृति से पार परमात्मा के प्रति सच्ची श्रद्धा की अवस्था से है। प्रकृति से परे वाली श्रद्धा का भाव बहुत ही पवित्र होता है, जिसको परमात्मा ने विश्वास रूपी शिव को विस्तारपूर्वक बताया।
दो0 अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु।।76।।
व्याख्या : परमात्मा विश्वास रूपी शिव से कहते हैं कि अगर तुम्हारा मुझ पर सच्चा प्रेम है, तो तुम जाकर प्रकृति से परे श्रद्धा रूपी पार्वती से विवाह करो। यह वर मुझे दे दो। साधक का विश्वास जब प्रबल हो जाता है, तब परमात्मा स्वयं ही साधक का योगक्षेम करने लग जाते हैं और साधक के हृदय में नाना प्रकार से प्रेरणा करने लग जाते हैं। उसी भावावस्था को यहाँ लिखा गया है।
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।।
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हालाँकि यह उचित नहीं परन्तु स्वामी के वचनों का पालन करना ही होगा। विश्वास रूपी शिव का कहने का मतलब है कि श्रद्धा का भाव विश्वास को हिला सकता है परन्तु जब परमात्मा प्रेरणा कर रहे हैं तो श्रद्धा रूपी पार्वती के साथ विवाह करना उचित ही होगा। श्रद्धा के नाना रूप होते हैं। विषयों की प्राप्ति से भी श्रद्धा पैदा हो जाती है। परन्तु विश्वास का भाव तो शुद्ध प्रेम पर आधारित होकर परमात्मा का स्मरण करना चाहता है। इसलिए यहाँ उचित नहीं हैं, बोलकर लिखा है। विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे प्रभु! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा अर्थात् आपकी प्रेरणानुसार श्रद्धा रूपी पार्वती से विवाह करूँगा। परमात्मा की प्रेरणा को मानकर ही साधना पथ पर आगे बढ़ना ही विश्वास के भाव का परम धर्म होता है।
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।।
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। आग्या सिर पर नाथ तुम्हारी।।
व्याख्या : माता-पिता, गुरु व परमात्मा की वाणी को बिना ही विचार करके शुभ जानना चाहिये। हे प्रभु! आप तो सब प्रकार से परम हित करने वाले हैं, अत: आपकी आज्ञा को मैं सिर पर धारण करता हूँ अर्थात् परमात्मा की प्रेरणा के अनुसार चलने को तैयार हूँ।
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।।
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।।
व्याख्या : शंकाहीन विश्वास के भाव से परमात्मा संतुष्ट हो जाते हैं और परमात्मा के संतोष की अवस्था से भक्ति, विवेक व धर्म पैदा होता है। परमात्मा तब कहते हैं कि हे शंकाओं का हरण करने वाले विश्वास रूपी शंकर! तुम्हारा पन (अर्थात् विश्वास की विशुद्ध अवस्था) रह गया है। अब मैं जो प्रेरणा करता हूँ, उसे हृदय में रखो।
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी।।
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए।।
व्याख्या : ऐसी प्रेरणा करके परमात्मा अन्तर्ध्यान हो गए। तब विश्वास रूपी शंकर ने उसी अवस्था को अपने हृदय में धारण कर लिया। ध्यान की अवस्था में परमात्मा की प्रेरणा की झलक मिलती रहती है। कभी-कभी भावना के अनुरूप स्वरूप भी झलक आता है। अत: उसी अनुभूति को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा है। उसी समय सप्त ऋषि अर्थात् सात रसों की अनुभूति होती है। ये सात रसायन सात वृतियों को पैदा करते हैं। जो सप्त रस शरीर में अनुभूत होते हैं, वे ही सप्त रस ब्रह्माण्ड में भी व्याप्त हैं। ब्रह्माण्ड में व्याप्त सप्त रसों को ही सप्तऋषि का प्रतीक माना गया है। सप्त रस पैदा होकर विश्वासरूपी शिव से कहते हैं। क्योंकि वृतियाँ ही विश्वास को प्रभावित कर सकती हैं। अत: उसी भाव को सप्त ऋषियों का शिव के पास जाना कहा गया है।
दो0 पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहू संदेहु।।77।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि तुम (सप्त रसों की वृतियाँ) पार्वती के पास जाकर प्रेम की परीक्षा लो और उन्हें प्रेरित करके और संशय को दूर करके घर भेज दो।
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी ।।
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।।
व्याख्या : सप्त रस रूपी ऋषियों ने श्रद्धा के भाव को तपस्या की मूर्ति के रूप में देखा अर्थात् विशुद्ध प्रेममय श्रद्धा के भाव को देखा। तब सप्त रसों रूपी मुनियों ने कहा कि हे कोशिकाओं में पैदा होने वाली श्रद्धा! तुम किस कारण से इतना कठोर तप कर रही हो।
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू।।
कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।।
व्याख्या : तुम किसकी आराधना कर रही हो और क्या चाहती हो। हमें साधना के कारण का सत्य रहस्य बताइये। तब श्रद्धा रूपी पार्वती मन में संकोच करते हुए बोली कि आप लोग मेरी मूर्खता पर हँसेंगे।
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।।
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना।।
व्याख्या : मेरे मन ने हठ कर ली है, अब ये कुछ भी सुनना नहीं चाहता है और जल पर दीवार बनाना चाहता है। मैंने नारद रूपी मन के भाव की कही हुई बात को सत्य मान लिया है। इसलिए मैं बिना पंखों के उड़ना चाहती हूँ।
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।
व्याख्या : हे मुनियो! आप मेरी मूर्खता देखिए, कि मैं विश्वास रूपी शिव को मेरे पति के रूप में चाहती हूँ। जहाँ विश्वास होता है वहाँ श्रद्धा का अस्तित्व नहीं बच पाता है और बिना श्रद्धा के विश्वास नहीं हो पाता है। यहाँ उसी भाव अवस्था को लिखा गया है।
दो0 सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह।।78।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती के वचन सुनकर सप्त ऋषि रूपी रस के भाव हँसे अर्थात् प्रसन्न हुए कि यह तुम्हारी शरीर नर (नड़) रूपी राजा से उत्पन्न है, इसलिए ऐसी दृढ़ता सम्भव है। जब शरीर में नर की धड़कन प्रधान होती है, तब पैदा होने वाली श्रद्धा परमात्मा से अनुराग करने वाली होती है और जब नारी की धड़कन प्रधान होती है, तब पैदा होने वाली श्रद्धा माया से युक्त होती है। इसलिए यहाँ गिरि (नर) संभव देह कहा गया है। मन के नारद रूपी भाव का उपदेश सुनकर किसी का घर नहीं बसता है अर्थात् माया का बन्धन नहीं रहता है। घर बसने का तात्पर्य संसार की आसक्ति से होता है।
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा जाई।।
चित्रकेतु कर घ डिग्री उन घाला। कनक कसिपु कर पुनि अस हाला।।
व्याख्या : मन के नारद रूपी भाव ने दक्ष अर्थात् चतुरता के भाव से उत्पन्न भाव रूपी पुत्रों को उपदेश देकर वैराग्यवान बना दिया अर्थात् सांसारिकता से मुक्त कर दिया। चित्रकेतु अर्थात् दृष्टि से उत्पन्न भावों को भी नारद ने वैरागी बना दिया और यही हाल हिरण्य कशिपु अर्थात् हिरण्यानल से उत्पन्न भाव यानी नाभी मण्डल से उत्पन्न भावों का भी हुआ। मन का नारद रूपी भाव समस्त भावों को परमात्मा की तरफ प्रेरित करने का काम करता है, इसलिए प्रतीकात्मक दृष्टि से नारद को संसार विरोधी बताया जाता है।
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी।।
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा।।
व्याख्या : अत: नारद रूपी भाव की शिक्षा जो भी नर-नारी मानते हैं, वे वैरागी हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य है कि जो नारद रूपी भाव के अनुसार चलता है, तो वह भवन अर्थात् भावों की प्रक्रिया से मुक्त होकर भिक अ अरि अर्थात् इच्छाओं का दुश्मन यानी परम वैराग्यवान हो जाता है। जिससे मन के कपट का भाव समझ में आ जाता है और शरीर में सुलक्षण पैदा होने के चिन्ह दिखायी पड़ने लग जाते हैं। मन का नारद रूपी भाव सदैव दूसरे भावों को भी अपनी तरह सांसारिक इच्छाओं से मुक्त कराकर परमात्मा में लगाना चाहता है।
तेहि के बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।।
निर्गुण निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली।।
व्याख्या : उसी नारद रूपी भाव के वचनों का विश्वास करके तुम सहज उदासीन पति को प्राप्त करना चाहती हो, जो गुणों से निर्लिप्त, मान-अपमान से परे, कुबेष अर्थात् अच्छे-बुरे से परे, कपाली अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र में ध्यानमगन, अकुल अर्थात वासनाओं से रहित, अगेह अर्थात अनासक्त, दिगम्बर (जो दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण किए हो) ब्याली अर्थात् वासना रूपी सर्पों को वश में किए हुए है।
कहहु कवन सुखु अस ब डिग्री पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ।।
पंच कहें सिवँ सती बिवाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! ऐसे पति को पाकर तुम्हें कौन-सा सुख मिलेगा? अर्थात् पूर्ण वैराग्यवान होने पर तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम तो नारद रूपी ठग के बहकावें में आ गयी हो। सप्त रसों की वृति जीवात्मा के भावों को सांसारिक सुखों में लगाने की होती है, इसलिए यहाँ सप्त ऋषि के प्रतीकों के माध्यम से श्रद्धा के भाव को संसारोन्मुखी कराने के प्रयास को बताया गया है। पंचभूतों के शरीर का अनुभव है कि विश्वास रूपी शिव के साथ दक्षता (चतुरता) से उत्पन्न सती रूपी श्रद्धा ने विवाह किया था, जिसको पुन: विश्वास रूपी शिव ने मरवा दिया अर्थात् चतुराई पूर्ण श्रद्धा के भाव का विश्वास रूपी शिव के साथ मेल नहीं बैठा।
दो0 अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं।।79।।
व्याख्या : चतुरतापूर्ण श्रद्धा के मिट जाने पर अब विश्वास रूपी शिव आराम से सुखपूर्वक सोते हैं और भीख माँगकर संसार में खाते हैं। क्योंकि जो सहज में एकान्तवासी हो जाते हैं, उन्हें नारी से उत्पन्न भाव नहीं सुहाते हैं। अर्थात् जब सहज वैराग्य हो जाता है, तो माया के भाव अच्छे नहीं लगते हैं। उसी को सहज एकान्त वासी को नारी का नहीं सुहाना बोलकर बताया गया है।
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ ब डिग्री नीक बिचारा।।
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।।
व्याख्या : सप्तऋषि रूपी रसों के भावों ने पुन: श्रद्धा रूपी भाव से कहा कि आज भी हमारा कहना मानिए और हम तुम्हें अच्छा वर बता देते हैं। वृतियों के भावों का रस श्रद्धा के भाव को संसार की तरफ आकर्षित करने का प्रयास करता है। अत: उसी भावावस्था को यहाँ लिखा गया है। ऐसा सुंदर, सुशील, सुखद व पवित्र वर बताते हैं, जिसका वेद भी यश गाते हैं।
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्री पति पुर बैकुंठ निवासी।।
अस ब डिग्री तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी।।
व्याख्या : सप्त ऋषि रूपी भाव श्रद्धा रूपी पार्वतीको संसारोन्मुखी करने के लिए कहते हैं कि वह वर दोषों से रहित व सकल गुणों की खान है तथा श्रीपति अर्थात् प्राणों का स्वामी और कुण्ठा रहित है। यहाँ श्रद्धा के भाव को सप्त रस रूपी ऋषि प्रेरित करना चाहते हैं कि सांसारिक सुखों का भोग करो क्योंकि पूर्ण वैराग्यवान होने से क्या लाभ है? बिना दोषों के भोग भोगने से कोई नुकसान नहीं है। दोष रहित भोगों को भोगने पर भी बिना कुण्ठा अर्थात् बिना चिंता के रहा जा सकता है। अत: हम तुम्हें ऐसा वर मिलवा देंगे। तब प्रकृति से परे वाला श्रद्धा रूपी पार्वती का भाव हँसकर बोली कि --
सत्य कहेहु गिरिभव तनुएहा। हठ न छूट छूटै ब डिग्री देहा।।
कनकउ पुनि पषान ते होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।।
व्याख्या : पार्वती रूपी श्रद्धा के भाव ने तब कहा कि आप सही कह रहे हो कि नर रूपी पर्वत से ही मैं पैदा हुई हूँ। अत: शरीर भले ही छूट जाए परन्तु मेरी हठ नहीं जायेगी। जैसे सोना पत्थर से ही पैदा होता है परन्तु सोने को जलाने पर भी वह सोना ही बना रहता है। श्रद्धा का भाव नर की धड़कन से पैदा होता जरूर है परन्तु बाद में श्रद्धा का भाव ही श्रद्धा को प्रबल करता रहता है। अत: जब एक बार श्रद्धा का भाव प्रकृति के भावों को पार कर जाता है, तो फिर वह पुन: सांसारिक सुखों में नहीं लग पाता है। उसी भावावस्था को यहाँ सूक्ष्मता से लिखा गया है।
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।
गुर के बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती बोली कि मैं मन के नारद रूपी भाव के वचनों का त्याग नहीं कर सकती हूँ। चाहे मेरा घर बसै या फिर उजड़ जाए अर्थात् मुझे परमात्मा की प्राप्ति हो या न हो परन्तु अब मैं परमात्मा से प्रेम किए बिना नहीं रह सकती हूँ। जिनको गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं होता है, उन्हें सपने में भी सिद्धियों के सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
दो0 महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।80।।
व्याख्या : विश्वास का भाव ही महाभाव होता है, इसलिए विश्वास रूपी शिव को देवों का देव महादेव कहा जाता है। महादेव अर्थात् विश्वास का भाव भावों के गुणों से रहित होता है। उसी को अवगुण अर्थात् गुणों से रहित कहा गया है और विष्णु अर्थात् अणु-अणु में विषय भोग का रस का भाव सब गुणों की खान होता है। इसलिए विष्णु को सकल सुखों के भोक्ता के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं कि जिसका जिसमें मन लग जाए, उसको उसी से काम होता है। अर्थात् कोई भोगों का भोग करना चाहता है तो उसकी मनोवृति भोगों में ही लगेगी और कोई वैराग्य चाहता है, तो उसे विषयों से वैराग्य ही अच्छा लगेगा।
जौं तुम्ह मिल तेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारी धरि सीसा।।
अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा।।
व्याख्या : पार्वती रूपी श्रद्धा कहती हैं कि हे मुनियों! अगर तुम पहले मिलते तो मैं तुम्हारी बात मान लेती अर्थात् पहले मिलने पर वृति भोगवादी हो सकती थी। परन्तु अब तो मैं मेरा जन्म विश्वासरूपी शिव के लिए हार चुकी हूँ। अत: अब गुण-दोषों का कौन विचार करे। अर्थात् पूर्ण वैराग्य होने पर गुणों का बन्धन भी छूट जाता है।
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।।
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।।
व्याख्या : अगर तुम्हारे हृदय में विशेष हठ है और वर खोजे बिना नहीं रह पा रहे हो तो, ऐसे कौतुकि लोगों के मन में आलस्य नहीं होता है। संसार में बहुत से वर व कन्या हैं। यहाँ श्रद्धा का भाव सप्त रसों की वृतियों की तरफ ईशारा कर रहा है कि क्योंकि रस की वृतियाँ भावों का सम्बन्ध स्थापित किए बिना नहीं रह पाती हैं। इसलिए श्रद्धा का भाव कहता है कि और भी बहुत से भाव हैं।
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरुँ संभु न त रहउँ कुआरी।।
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं कि मेरी तो करोड़ों जन्मों से विश्वास रूपी शिव से लग्न लगी हुई है। अत: मैं या तो कुँवारी रहूँगी या फिर विश्वास रूपी शिव का ही वरण करूँगी। मैं मन के नारद रूपी भाव के उपदेश को नहीं छोड़ूँगी। अत: आप से मैं सौ बार कहती हूँ कि मैं विश्वास रूपी शिव का ही वरण करूँगी।
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।।
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती कहने लगी कि हे रस रूपी ऋषियों! मैं आपके चरणों में पड़ती हूँ। आप अपनी अवस्था में लौट जाइये काफी देर हो गयी है। तब रस रूपी ऋषि श्रद्धा रूपी पार्वती का अटल प्रेम देखकर बोले कि हे भावों को लाने वाली भवानी, हे जगत की माता! आपकी जय हो, जय हो।
दो0 तुम्ह माया भगवान शिव सकल जगत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।
व्याख्या : तब सप्त ऋषि रूप रस बोले कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आप भावों को पैदा करने वाली हैं, इसलिए जगत की माता हैं। क्योंकि भावों के अनुसार ही जगत का आभास होता है, विश्वास रूपी शिव ही प्रकृति को संचालित करने वाले भगवान अर्थात् भगअवान यानी प्रकृति के स्वामी हैं। विश्वास का भाव ही समस्त भावों को दिशा देता है अर्थात् समस्त भाव विश्वास के अनुसार ही अपना प्रभाव दिखाते हैं। ध्यान की अवस्था में यह अच्छी तरह समझ आ जाता है। अत: सप्त रसों रूपी ऋषि श्रद्धा रूपी भाव के चरणों में सीस झुकाकर प्रसन्न होते हुए चले गए। जब रसों की वृति ने देखा कि श्रद्धा का भाव प्रबल है और विश्वास के भाव के प्रति पूरी तरह समर्पित है, तो सप्त रसों की वृतियाँ भी समर्पण कर देती हैं। उसी को चरणों में सीस झुकाना बताया गया है।
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।।
व्याख्या : सप्त रस रूपी ऋषि हिमवन्त अर्थात् परम शीतल नर रूपी राजा के पास गए। जब श्रद्धा का भाव परमात्मा के प्रति अति प्रबल हो जाता है, तब नर की धड़कन एकदम शीतल हो जाती है और माया के भाव पैदा होने बन्द हो जाते हैं। उस समय जो रसायन (सप्त रस) निकलते हैं, वे नर (नड़) के पास जाकर नर की धड़कन को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। यह सूक्ष्म घटना ध्यान की अवस्था में घटती रहती है। उसी को यहाँ नर रूपी राजा को भेजकर श्रद्धा रूपी पार्वती को घर लाने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। अब सप्त ऋषि विश्वास रूपी शिव के पास गए और श्रद्धा रूपी पार्वती की समस्त कथा को बताया।
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।।
मनु थिर कर तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव श्रद्धा रूपी पार्वती के प्रेम की बात को सुनकर मग्न हो गए। अर्थात् विश्वास का भाव और दृढ़ हो गया। उस अवस्था में सप्त रस रूपी ऋषि अपने-अपने स्थानों को लौट गए। तब विश्वास रूपी शिव ने अपना मन स्थिर कर लिया अर्थात् विश्वास दृढ़ हो गया और परमात्मा के ध्यान में लीन हो गया। जब श्रद्धा का निश्छल प्रेम होता है, तो परमात्मा के प्रति स्वत: ही विश्वास का भाव दृढ़ हो जाता है।
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।।
तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भे देव सुख संपति रीते।।
व्याख्या : उस समय तारक असुर पैदा हो गया, जो बहुत बलवान और तेजवान था, जिसने अपने भुजाओं के बल से लोक व लोकपतियों को जीत लिया, जिससे देवगण सुख व सम्पति रहित हो गए। तारक असुर का तात्पर्य है ताअअरक अर्थात् नर की धड़कन के अर्क (रस) से उत्पन्न आसुरी इच्छा का भाव जो बहुत बलवान व तेजवान होता है। समस्त इच्छाएँ नर व नारी की धड़कन से उत्पन्न प्राण ऊर्जा से पैदा होती हैं। इच्छाओं का स्वरूप नर-नारी की धड़कन की गति पर निर्भर करता है। परन्तु ध्यान की अवस्था में धड़कन नर प्रधान हो जाती है, जिससे श्रद्धा का भाव प्रबल हो उठता है। उसी अवस्था में नर की धड़कन से उत्पन्न रसायन (अर्क) से कभी-कभी कोई आसुरी इच्छा पैदा हो जाती है, जो समस्त सात्विक इच्छाओं को भी व्युकल कर देती है और भाव रूपी देवताओं को भी असहाय कर देती है। उसी आसुरी भाव को तारक असुर कहा गया है। वह आसुरी इच्छा शरीर के प्रत्येक भाग में रस (अर्क) के माध्यम से फैल जाती है, जिसे वश में करना बहुत कठिन हो जाता है।
अजर अमर सोजीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।।
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।
व्याख्या : वह तारक रूपी आसुरी भाव अजर-अमर होता है, जिसे जीता नहीं जा सकता है। जब साधक साधना में परिपक्व होने लगता है, तो उसमें अहंकार सूक्ष्म होकर उसे जगत का उद्धार कराने वाला यानी जगत से तारने वाला होने का दम्भ पैदा कर देता है। यह दम्भ ही तारक असुर होता है, जो साधक की वाणी में, व्यवहार में प्रकट होकर देव भावों को व्याकुल कर देता है। इस अवस्था से साधक का बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। साधक अगर सावधान होता है, तो अपनी इस आसुरी व्यथा को ब्रह्मा अर्थात् भावों को पैदा करने वाला ब्रह्म तत्व को बताता है तथा उस क्रिया (विधि) को समझने का प्रयास करता है, जिससे सभी देवता रूपी सात्विक भाव दु:खी होते हैं। ध्यान में समझ में आता है कि ब्रह्म तत्व अर्थात् बीर्य की उष्मा से ही नर-नारी की धड़कन होती है। अत: मूल रूप में देखा जाए तो बीज ब्रह्म ही भावों का मूल होता है, इसलिए ही ब्रह्मा को सृष्टि के सृष्टा के प्रतीक के रूप में बताया गया है। प्रारम्भ की साधना में साधक को समझ में आता है कि श्वास से ही भाव पैदा हो रहे हैं। फिर कुछ दिनों की साधना में समझ आता है कि प्राण ही श्वास का मूल है, इसलिए प्राणों से भाव पैदा होते हैं। पुन: धीरे-धीरे समझ आता है कि नर-नारी की धड़कन से ही प्राण पैदा होते हैं, इसलिए नर-नारी ही भावों के मूल हैं। फिर ज्यों-ज्यों साधना गहरी होती चली जाती है त्यों-त्यों समझ में आने लगता है कि बीज ब्रह्म से ही नर-नारी धड़कते हैं, इसलिए बीज ब्रह्म ही भावों का मूल होता है। यहाँ पर प्रतीकों का सहारा लेकर उसी अनुभूति को लिखा गया है।
दो0 सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।
व्याख्या : ब्रह्मा रूपी भाव ने तब सबको समझकर कहा कि तारक रूपी दम्भी अहंकार के भाव का मरण तब सम्भव है, जब विश्वास रूपी शिव के भाव से विश्वास के समान ही भाव रूपी पुत्र पैदा हो। अर्थात् तारणहार बनने वाले दम्भी अहंकार को काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह व मत्सर रूपी भावों को वश में करनेवाला षड़ानन रूपी शिव का पुत्र ही जीत सकता है, वरना साधक की साधना में दम्भ रूपी तारक असुर विघ्न पैदा कर देता है। साधक ऐसी अवस्था में अपने आपको ज्ञानी मानने लग जाता है और उपदेशक बनकर लोगों को भव तारने का आश्वासन देने लगता है। ये लक्षण जब साधक में आ जाएँ तब जान लेना चाहिये कि उसके अन्दर तारक रूपी असुर पैदा हो गया है। इस तारक (तारक दम्भ) असुर को काम, क्रोध, मद लोभादि भावों को वश में करके ही मारा जा सकता है।
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईश्वर करिहि सहाई।।
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।।
व्याख्या : ब्रह्म बीज रूपी भाव कहते हैं कि मेरा कहना सुनिए और उपाय कीजिए, जिससे ईश्वर सहायता करेंगे तो कार्य हो जायेगा अर्थात तारक असुर मारा जायेगा। ईश्वर का तात्पर्य है ई उ स्वर: ईश्वर: अर्थात् स्वरों के माध्यम से जीव समष्टि की सत्ता से जुड़ा रहता है। उस स्वरों से जुड़ने की व्यवस्था का नाम ही ईश्वर है। इसलिए प्राणायाम द्वारा जब स्वर शुद्धि हो जाती है, तो कामादि के भाव कमजोर हो जाते हैं। उसी को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। जिस चातुर्य रूपी श्रद्धा के भाव ने अपना शरीर दक्ष के यज्ञ में छोड़ दिया था, वही श्रद्धा का भाव नर रूपी हिमाचल राजा के घर में जन्मी है। अर्थात् चातुर्य रूपी श्रद्धा का प्रकृति से परे श्रद्धा रूपी पार्वती के रूप में रूपान्तरण हो गया है। साधना के प्रारम्भ में श्रद्धा का भाव तर्क व चतुराई पर टिका होता है, परन्तु ज्यों-ज्यों साधना गहरी होती चली जाती है, त्यों-त्यों चातुर्य को छोड़कर श्रद्धा विश्वासोन्मुखी होती चली जाती है।
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।।
जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।।
व्याख्या : प्रकृति से पार रूपी पार्वती ने विश्वास रूपी शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया है। परन्तु विश्वास रूपी शिव तो सब कुछ छोड़कर समाधिस्थ हैं अर्थात् दृढ़ता से स्थिर हैं। इसलिए यहाँ हमें असमंजस बना हुआ है कि विश्वास रूपी शिव पार्वती रूपी श्रद्धा के साथ कैसे विवाह करेंगे। फिर भी सभी भाव रूपी देवताओं हमारी एक बात सुनो।
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।।
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।।
व्याख्या : अत: कामरूपी भाव को विश्वास रूपी शिव के पास भेजिए, जिससे वह शंका रहित विश्वास में क्षोभ पैदा कर सके। जब विश्वास रूपी शिव के मन में क्षोभ पैदा हो जायेगा, तब हम अर्थात् देव भाव जाकर जोर करके श्रद्धा रूपी पार्वती के साथ विवाह करा देंगे।
एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई।।
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।
व्याख्या : इस प्रकार भले ही भाव रूपी देवताओं का कल्याण हो सकता है। विश्वास का भाव जब स्थिर हो जाता है, तो अन्य भावों का पोषण बन्द हो जाता है परन्तु विश्वास का भाव अगर श्रद्धा के भाव के साथ मिल जाता है, तो भावों का पोषण होता रहता है। अत: उसी भावावस्था को सूक्ष्मता के साथ यहाँ लिखा गया है. यह मत सभी भाव रूपी देवताओं को अच्छा लगा। इसलिए सब भाव रूपी देवों ने कामदेव की स्तुति करी, जिससे काम का भाव प्रकट हो गया। जिस भाव का चिन्तन किया जाता है, वही भाव तेजी से बढ़ने लग जाता है, अत: उसी को यहाँ स्तुति द्वारा कामदेव का प्रकट होना कहा गया है।
दो0 सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।
व्याख्या : काम रूपी भाव के प्रकट होने पर भावरूपी देवों ने अपनी विपत्ति के बारे में बताया। जिसे सुनकर काम रूपी भाव ने मन में विचार किया कि विश्वास रूपी शिव का विरोध करने पर कुशलता नहीं है। उल्टा परिणाम स्वरूप हानि ही होगा। जब परमात्मा के प्रति विश्वास दृढ़ होता है, तो वहाँ काम रूपी भाव का भी वश नहीं चल सकता है। उल्टा काम का भाव ही अकाम में रूपान्तरित हो जाता है।
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।।
पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहि तेही।।
व्याख्या : काम रूपी भाव बोला कि फिर भी मैं तुम्हारा कार्य करूँगा क्योंकि पर उपकार को परम धर्म कहा गया है, जो लोग परोपकार के लिए अपना शरीर छोड़ते हैं, उनकी निरन्तर संत जन प्रशंसा करते हैं। यहाँ पर हित का मतलब है आत्मा का हित। अत: जो भाव आत्म हित के लिए अपने शरीर को छोड़ते हैं, तो सदा संत जन प्रशंसा करते हैं। आत्मा से एकाकार होना अर्थात् आत्मा के आकार में समा जाना ही उपकार होता है और उसी को वेदों में परम धर्म कहा गया है।
अस कहि चलेउ सबहि सि डिग्री नाई। सुमन धनुष करसहित सहाई।।
चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।
व्याख्या : ऐसा कहकर कामदेव अर्थात् काम का भाव हाथ में पुष्पों का धनुष लेकर व अपने सहायकों को लेकर चला। काम रूपी भाव के लिए भोगों की इच्छा व भोगों से प्राप्त आनन्द की इच्छा ही पुष्प धनुष होता है और भोगों के प्रति लालसा भाव ही वसन्त ऋतु की तरह होता है। चलते हुए काम के भाव ने विचार किया कि विश्वास रूपी शिव से विरोध करने पर मेरा मरना सुनिश्चित है। अर्थात् जब परमात्मा में दृढ़ विश्वास का भाव लीन हो जाता है, तो काम की लहरें उठकर भी अपने-आप शान्त हो जाती हैं। साधना में कई बार ऐसी अवस्था आती है कि काम वासना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और साधक साधना के पथ पर अग्रसर हो जाता है। यहाँ पर इसी भावावस्था को कामदेव का शिव के पास जाना बताया गया है।
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।।
कोपेउ जबहिं बारिचर केतु। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।।
व्याख्या : जब कामदेव रूपी भाव ने अपना विस्तार किया, तो समस्त शरीर (संसार) को अपने वश में कर लिया। जब एक बार काम का भाव पैदा हो जाता है तो भाव से भाव बनकर समस्त शरीर के अंगों को और मन के भावों को प्रभावित कर देता है। बारिचर केतु अर्थात् काम की भावना जल में लहर की तरह उठती रहती हैं। जैसे जल में उठने वाली लहर समस्त जल में चंचलता ला देती हैं, वैसे ही काम का भाव प्राण रूपी जल में चंचलता ला देता है, जिससे मन व तन दोनों प्रभावित हो जाते हैं। ज्योहिं काम के भाव की लहर उठती हैं त्योहिं भावों की मर्यादा टूट जाती है। श्रुति सेतू का भी बहुत गहरा रहस्य है। प्रत्येक भाव एक दूसरे भाव की बात को ध्यान से सुनता रहता है। इसलिए तो एक भाव से दूसरे भाव प्रभावित होते रहते हैं। परन्तु जब काम का भाव प्रबल होता है, तो भावों की आपस में सुनने की प्रक्रिया बन्द हो जाती है और सब भाव काम के भाव की सुनने लग जाते हैं अर्थात् काम के अधीन हो जाते हैं। इसे श्रुति सेतू का टूटना कहा गया है।
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।।
सदाचार जप जोग बिरागा। समय बिबेक कटकु सबु भागा।।
व्याख्या : काम के प्रबल होने की अवस्था में ब्रह्मचर्य, व्रत, संयम, धैर्य, धारणा, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य व विवेक के भावों की सब सेना भाग खड़ी होती है। अर्थात् काम भाव के प्रबल होने पर नियम, संयम, जप-तपादि के भाव निष्प्रभावी हो जाते हैं और जबरदस्ती जीव को कामवासना जकड़ लेती है।
छ0 भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।
सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे।।
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभ डिग्री परा।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु स डिग्री धरा।।
व्याख्या : काम भाव की प्रबल अवस्था में विवेक और विवेक के सहायक नियम, संयम आदि भाव जो शरीर में होते हैं भाग जाते हैं और उस समय नीति, संयम आदि की बातें सद्ग्रंथ रूपी कन्दराओं में छुप जाती हैं अर्थात् केवल नीति शास्त्रोंें तक ही सीमित रह जाती हैं। उस समय सारे शरीर रूपी संसार में खलबली मच जाती है और काम भाव कर्ता बनकर होनी को प्रबल कर देता है। काम रूपी भाव के सामने ऐसा कौन-सा भाव है जो टिक सके। अर्थात् जब काम प्रबल होता है, तो कोई भी सद्भाव नहीं टिक पाता है।
दो0 जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम।।84।।
व्याख्या : जब समष्टि में काम का भाव प्रबल होता है, तो समस्त जीव, चल, अचल स्त्री-पुरुष सहित काम की भावना से व्याकुल होकर मर्यादा को तोड़ देते हैं। जो समष्टि में घटित होता है, वो सब व्यष्टि की संरचना में भी सम्भव होता है। अत: जब जीव के प्राण काम के भाव से प्रभावित हो जाते हैं, तो समस्त शरीर रूपी संसार में काम वासना प्रबल हो उठती है, जिससे जीव व्याकुल हो जाता है।
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं त डिग्री साखा।।
नदी उमगि अंबुदि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाब तलाईं ।।
व्याख्या : जब काम प्रबल होता है, तो सब भावों के हृदय में काम की इच्छा पैदा हो जाती है और बेलों को देखकर पेड़ों की शाखाएँ झूकने लगती हैं अर्थात् काम के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है। तब उस अवस्था में ऐसा लगता है, जैसे नदियाँ (वासना रूपी इच्छा) भोग रूपी समुद्र में मिलने को दौड़ रही हों और तालाब व तलाई आपस में मिलने लगते हैं अर्थात् भोग इच्छा और काम इच्छा एक हो जाते हैं।
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी।।
पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए काम बस समय बिसारी।।
व्याख्या : जहाँ काम की प्रबलता से जड़ वस्तुओं की ऐसी दशा हो जाती है, वहाँ चेतन जीवों की अवस्था को कोई कैसे बता सकता है। पशु, पक्षी व जलचर, थलचर व नभचर सभी काम के अधीन हो जाते हैं। अर्थात् जब शरीर रूपी संसार में काम वासना प्रबल होती है तो पान, अपान व समान प्राणवायु से उत्पन्न सभी भाव काम से व्याकुल हो जाते हैं।
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।।
देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला ।।
व्याख्या : शरीर रूपी संसार के सभी लोक काम से अन्धे हो जाते हैं और वे रात-दिन का भी विचार नहीं करते हैं। काम भाव प्रबल होने पर देव, दनुज, नर, किन्नर, ब्याल, प्रेत, पिशाच, भूत व बेताल रूपी प्राण वायु व्याकुल हो जाती है। प्राण के मुख्यत: दस प्रकार बताए गए हैं। अत: प्राणों के प्रतीक के रूप में ही देव, दनुज, किन्नर आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी।।
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।
व्याख्या : इन की दशा का क्या वर्णन किया जाए, ये तो सदा काम के दास ही होते हैं। अर्थात् आसुरी भाव तो सदैव काम की ही वासना करते हैं, जिनकी उत्पत्ति अपान प्राण वायु से होती है। परन्तु जिन्होंने प्राण का शोधन करके सिद्धत्व को प्राप्त कर लिया, विरक्त हो गए और मन को योग से जोड़ लिया हो, वे भी काम की प्रबलता से काम के वश में होकर योग को छोड़ देते हैं।
छ0 भए कामबस जोगीस तापस पाँवरहन्ह की को कहै।
देखहिं चराचर नारिमय जो ब्रह्ममय देखत रहे।।
अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।
दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं।।
व्याख्या : योग को साधने वाले भी काम के वश में हो जाते हैं, साधारण लोगों की तो क्या बात कहें। काम की प्रबलता में जो लोग संसार को ब्रह्ममय देखते थे, वे नारिमय देखने लगते हैं और नारियाँ संसार को पुरुषमय और पुरुष संसार को नारिमय देखने लगते हैं। दो घड़ी में ही सारा संसार काम के खेल से युक्त हुआ दिखने लगता है।
सो0 धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे।
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ।।85।।
व्याख्या : काम की प्रबलता होने पर किसी भाव के मन में धैर्य नहीं रह पाता है परन्तु जो भाव आत्मा में रमण करते हैं, वे ही परमात्मा की कृपा से काम से बच पाते हैं। अत: जो जीव परमात्मा के ध्यान में लीन रहते हैं, वे ही काम के प्रभाव से बच पाते हैं।
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।।
व्याख्या : दो घड़ी भर में काम का यह खेल समस्त संसार में छा गया अर्थात् समस्त शरीर में काम का प्रभाव हो गया। जब सारा शरीर काम के वश में हो जाता है, तब काम विश्वास रूपी शिव के पास पहुँचता है, तो परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास के भाव को देखकर काम का भाव सशंकित हो उठता है। तब उस समय सारा शरीर थम सा जाता है। उसी को समस्त संसार का स्थिरसा होना बोलकर लिखा है।
भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मत वारे।।
रूद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।।
व्याख्या : ऐसी अवस्था में सब शरीर के भाव सुखी हो गए, जैसे मद का नशा उतर जाने पर नशा करने वाला शान्त हो जाता है। उसी प्रकार विश्वास के भाव के सामने काम का भाव आते ही श्वास की गति स्थिर हो जाती है, जिससे काम की वासना की तप्त शान्त होने लग जाती है। विश्वास रूपी शिव के सामने काम का भाव भयभीत हो जाता है क्योंकि विश्वास का भाव भोगवासनाओं को वश में करके परमात्मा के भाव में लीन रहता है, तो काम का भाव निष्प्रभावी हो जाता है।
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।।
प्रगटेसि तुरत रूचिर रितुराजा। कुसुमित नव त डिग्री राजि बिराजा।।
व्याख्या : जब काम का भाव निष्प्रभावी होने लगता है, तो वह पुन: प्रभावी होने का प्रयास करता है। उसी को मरने की ठान कर उपाय करना बोलकर लिखा है। उस अवस्था में काम का भाव वसन्त ऋतु की तरह आकर्षक बनकर प्रकट होता है और फिर कुमति रूपी भोग वासना वाले फूल खिलाता है।
बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।।
जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।
व्याख्या : उस समय वन, उपवन, बाउड़ी तालाब रूपी रम्यता चारों तरफ छा जाती है और ऐसे लगने लगता है कि जहाँ तहाँ से अनुराग पैदा हो रहा हो। काम का भाव ऐसी मोहक अवस्था पैदा कर देता है, जिससे मरे हुए मनों में भी काम जाग उठता है। मरे हुए मन का तात्पर्य यह है कि जिन्होंने मन को जीत रखा है, उनका मन भी काम के वश में आ जाता है।
छ0 जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुमगता न परै कही।
सीतल सुगंध सुमंद मारूत मदन अनल सखा सही।।
बिकसे सरिन्ह बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा।
कलहंस पिक सुक सरस रवि करि गान नाचहिं अपछरा।।
व्याख्या : काम की प्रबलता से मन के भाव जो मरे हुए होते हैं, वे भी कामुकता से प्रभावित हो जाते हैं। उस अवस्था में शीतल व सुगन्धित प्राण वायु जो धीरे-धीरे चलती है, वो भी काम की सहायक बनकर काम की अग्नि का काम करने लगती है। उस अवस्था में प्राण रूपी सरोवर में काम रूपी कमल खिल जाते हैं, जिन पर भाव रूपी भँवरा मँडराने लगते हैं। फिर कलहंस अर्थात् शरीर में हकार सकार के साथ काम रस रूपी कोयल और तोते बोलने लगते हैं और वासना रूपी अप्सराएँ नाचने लगती हैं।
दो0 सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।
चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदय निकेत।।86।।
व्याख्या : जब विश्वास का भाव परमात्मा के प्रति दृढ़ होता है, तो काम का भाव उसे सब प्रकार से प्रयास करके भी हिला नहीं सकता है। उस अवस्था को ही विश्वास रूपी शिव की अचल समाधि कहा गया है। विश्वास रूपी शिव की अचल समाधि को देखकर काम के भाव में क्षोभ पैदा हो जाता है। उसे ही काम के हृदय में क्रोध करना बताया गया है।
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।
सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।।
व्याख्या : कामवासना रूपी वृक्ष की भोग रूपी शाखा पर काम के भाव ने चढ़कर तीव्र वासना रूपी धनुष का संधान किया और तीव्रता के साथ बाण चला दिया।
छाड़े विषम बिसिख उर लागे। छूटि समाधि संभु तब जागे।।
भयउ ईस मन छोभुु बिसेषी। नयन उघारी सकल दिसि देखी।।
व्याख्या : काम के भाव ने जब वासना रूपी बाण छोड़े तो तीव्र वासना के बाण विश्वास रूपी शिव के हृदय में लग गए अर्थात् वासना की तीव्रता से विश्वास का भाव भी हिल गया। जिससे विश्वास रूपी शिव की परमात्मा के प्रति लीनता भंग हो गयी और हृदय में वासना के कारण क्षोभ पैदा हो गया। तब विश्वास रूपी शिव ने नयन खोलकर चारों तरफ देखा अर्थात् वासना के प्रति सावधान होने का प्रयास किया। उसी को नयन खोलना बताया गया है।
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रेलोका ।।
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।।
व्याख्या : सौरभ का तात्पर्य सौ भावों की वृति से है। जीव के मन की सौ वृतियाँ होती हैं जिनसे सौ भाव पैदा होते रहते हैं। उन्हीं सौ भावों को बोलचाल की भाषा में स्वभाव (सोभाव) कहा जाता है। अत: जब विश्वास रूपी भाव ने काम के कारण को जानना चाहा तो पता चला कि काम के भाव ने तो सौ भावों को ही प्रभावित कर रखा है, जिससे विश्वास रूपी भाव को क्रोध आ गया तो शरीर रूपी संसार के तीनों लोक कम्पित हो उठे अर्थात् समस्त भाव व्याकुल हो उठे। तब विश्वास रूपी शिव ने ज्ञान रूपी तीसरा नयन खोला और समस्त वृतियों को चितवत (चित में लीन) कर लिया। जिससे काम रूपी भाव तुरन्त जलकर भष्म हो गया। जब समस्त वृतियाँ चित में लीन हो जाती हैं, तो काम का भी अन्त हो जाता है।
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।।
समुझि काम सुख सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।
व्याख्या : उस अवस्था (चितवत) में शरीर रूपी संसार में हाहाकार मच जाता है, जिससे सुर भयभीत हो जाते हैं और असुर सुखी हो जाते हैं। यहाँ सुर का तात्पर्य स्वरों से हैं क्योंकि जब ध्यान में साधक चितवत हो जाता है तो प्राण एकदम सूक्ष्म हो जाती है और ऐसा लगने लग जाता है कि स्वर भी शायद बन्द हो गए हों। उस अवस्था में शरीर छूटने का भय भी लगने लग जाता है। उसीको सुरों का भयभीत होना बताया गया है। परन्तु चितवत अवस्था में मकरतार पकड़ में आ जाता है और प्राण की धड़कन बच जाती है, जो चेतनावत रहती है। उस समय जो चेतना रहती है, वो माया से मुक्त हो जाने के कारण सुखी रहती है। उस समय चेतना केवल चित की धड़कन के माध्यम से ही बनी रहती है। चेतना के लिए स्वरों का चलना जरूरी नहीं होता है इसलिए उसी अवस्था को असुरों (अर्थात् स्वरहीन अवस्था) का सुखी होना कहा गया है। उस समय काम के सुख का भोग समझ में आ जाता है और साधना में लगे हुए योगी के रास्ते के कंटक मिट जाते हैं अर्थात् योगी की साधना की बाधाएँ मिट जाती हैं।
छ0 जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरूछित भई।
रोदति बदति बहु भाँति करूना करति संकर पहिं गई।।
अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।
प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही।।
व्याख्या : चितवत हो जाने पर योगी लोग निष्कंटक हो जाते हैं परन्तु काम की वृति रूपी पत्नी मूर्छित हो जाती है। उस समय काम की वृति रूपी पत्नी रोती हुई विश्वास रूपी शंकर के पास जाकर प्रेम पूर्वक विनय करने लगती है अर्थात् वृति चेतना के भाव के रूप में शिव के पास जाती है, तो विश्वास रूपी शिव जो शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं अर्थात् चेतना के भाव के अनुसार विश्वास का भाव तुरन्त संतुष्ट हो जाता है। अत: वृति रूपी काम की पत्नी को देखकर विश्वास रूपी शिव बोले। यह ध्यान की अवस्था का अति सूक्ष्म अनुभव होता है, जिसे पूरी तरह व्यक्त करना तो असम्भव होता है परन्तु समझाने के लिए प्रतीकों का सहारा लेकर यहाँ लिखा गया है।
दो0 अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।
बिनु बपु ब्यापहिं सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु।।87।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव वृति रूपी रति को समझाते हैं कि अब से तुम्हारे काम रूपी पति का नाम अनंग होगा और वह बिना शरीर के ही सबको आभासित होगा। अब तुम तुम्हारे पति से मिलने का प्रसंग सुनो। अर्थात् चित्वत अवस्था को प्राप्त कर लेने पर काम का भाव भस्म हो जाता है परन्तु चेतना में रति रूपी वृति बची रह जाती है, जिससे काम का भाव योगी के समझ में आ जाता है परन्तु अब चितवत अवस्था के बाद वह स्थूल शरीर को प्रभावित नहीं कर पाता है। उसी अवस्था को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा है। चितवत अवस्था साधक की हमेशा नहीं रह पाती है, इसलिए पुन: साधक को काम का आभास हो जाता है परन्तु अब पहले जैसी अवस्था नहीं होती है। अब योगी सहज हो जाता है और काम की वासना इन्द्रियों को प्रभावित नहीं कर पाती है परन्तु योगी की चेतना की वृति में काम भाव जरूर आ जाता है। उसी को प्रतीकात्मक तरीके से यहाँ लिखा गया है।
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।।
कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि जब चितवत अवस्था से पुन: देहभाव का आभास होगा, तब कृष्ण अर्थात् कृषअअन्न यानी आत्मा की सूक्ष्मता के ज्ञान का अवतरण जब होगा, तब शरीर रूपी पृथ्वी के भार का हरण करने की क्षमता आ जायेगी। तब कृषअअन्न अर्थात् परमअआत्मा यानी आत्मा की परम अवस्था का चेतना रूपी पुत्र तेरा पति होगा। यह मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता है। चितवत अवस्था को प्राप्त कर लेने पर आत्मा की परमता का ज्ञान हो जाता है, जिससे शरीर के भार का हरण हो जाता है अर्थात् शरीर के बन्धन कट जाते हैं। उस समय परम आत्मा की चेतना में ही काम का आभास हो सकता है क्योंकि स्थूल इन्द्रियों पर काम का तब कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।।
देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए ।।
व्याख्या : काम की वृति रूपी रति पत्नी विश्वास रूपी शंकर की बात सुनकर चली गयी। अब अपर अर्थात् अअपर यानी आत्मा से परे यानी देह आभास की अनुभूति को बताता हूँ। चितवत अवस्था से बाहर आने पर पुन: देह का आभास होने लगता है। उन भावों की अवस्था को ही यहाँ बताया गया है। देवताओं ने ये सब समाचार पाए अर्थात् सात्विक भावों ने चितवत अवस्था के अनुभवों को देखा, जिससे ब्रह्मादिक अर्थात् सत व रजो गुणी सब भाव बैकुण्ठ बिनअकुण्ठा यानी सब दैवीय भाव कुण्ठा रहति हो गए। साधक ज्यों-ज्यों साधना के पथ पर परिपक्व होता चला जाता है, त्यों-त्यों सहज होता हुआ कुण्ठा रहित हो जाता है। कुण्ठा का मिट जाना ही बैकुण्ठ की अवस्था होती है। उसी को यहाँ सभी भावों का बैकुण्ठ जाना बोलकर बताया गया है।
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपा निकेता।।
पृथक पृथक तिन्ह कीन्ह प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।।
व्याख्या : जब कुण्ठा रहित अवस्था आ जाती है, तो सब भाव विष्णु व ब्रह्मा सहित विश्वास रूपी शिव के पास चले जाते हैं और सभी भाव अपने-अपने तरीके से विश्वास रूपी शिव की स्तुति करते हैं, जिससे चन्द्रमा की सी शीतलता को धारण करने वाले विश्वास रूपी शिव प्रसन्न हो गए। जब वासनाओं से मुक्त होकर विश्वास परमात्मा के चरणों में दृढ़ हो जाता है, तो वह परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है। उसी परम शान्ति को चन्द्रमा की शीतलता का प्रतीक मानकर विश्वास रूपी शिव को चन्द्रमा को धारण करने वाला कहा गया है।
बोले कृपा सिंधु बृषकेतु। कहहु अमर आए केहि हेतू।।
कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतर जामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।
व्याख्या : उस अवस्था में विश्वास रूपी भाव बोले कि हे देवताओं रूपी अमर भाव! किस कारण से मेरे पास आए हो। तब सात्विक भाव रूपी ब्रह्मा बोले की प्रभु! आप तो अन्तर्यामी हैं, फिर भी मैं भय से मुक्त होने के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ। सभी साधक परमात्मा को अऩ्तर्यामी, सर्वव्यापक, सर्वस्व आदि मानते हैं परन्तु फिर भी अपने अन्दर छुपे हुए वासनाओं के भय से मुक्त होने के लिए या फिर वासनाओं की पूर्ति के लिए ही परमात्मा की स्तुति करते रहते हैं। सतोगुणी भावों में यद्यपि वासनाओं की लालसा कम रहती है, फिर भी भय का भाव तो रहता ही है, इसलिए सतोगुणी साधक भी स्तुति व प्रार्थना का सहारा लेते हैं।
दो0 सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।
निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।88।।
व्याख्या : वास्तविकता में श्रद्धा के अभाव में विश्वास का भाव ज्ञान पर आधारित रहता है परन्तु साधक के अन्य भावों को ज्ञान निरस लगता है। इसलिए सभी भाव रूपी देवता चाहते हैं कि श्रद्धा रूपी पार्वती के साथ विश्वास रूपी शिव का विवाह हो। जब विश्वास के भाव को श्रद्धा के भाव का साथ मिल जाता है, तो शरीर रूपी संसार के सभी भाव रूपी देवता उत्साह में भर जाते हैं। उसी भावावस्था को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से शिव के विवाह के उत्सव के रूप में यहाँ लिखा गया है।
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु कहु मदन मदमोचन।।
कामु जारि रति कहुँ ब डिग्री दीन्हा। कृपा सिंधु यह अति भल कीन्हा।।
व्याख्या : सतोगुण रूपी ब्रह्मा बोलते हैं कि हे काम का नाश करने वाले विश्वास रूपी शिव! भाव रूपी देवता आपके विवाह के उत्सव को देख सकें, ऐसा कुछ कहिए। आपने काम के भाव को भस्म करके काम की पत्नी रूपी वृति को वरदान दिया है, वो अच्छा ही किया है।
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ।।
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा ।।
व्याख्या : आपनेे काम के भाव को जलाकर पुन: उस पर कृपा भी कर दी है। हे स्वामी! यह प्रभुत्व वाले भावों का सहज स्वभाव होता है कि वे दण्ड देकर पुन: कृपा भी कर देते हैं। इस चौपाई का यौगिक अर्थ यह है कि जब श्वास निरोध द्वारा प्राण चितवत हो जाते हैं, तो काम रूप भाव भस्म हो जाता है और श्वास का जब पुन: चलना (सासति श्वास का गमना गमन) शु डिग्री हो जाता है तो काम के भाव का पुन: प्रसार हो जाता है। परन्तु अब जो प्रसार होता है, वो इन्द्रिय काम की तरह नहीं होता है बल्कि चेतना में होता है। उसी को यहाँ लिखा है। उस अवस्था में भाव रूपी देवता प्रार्थना करते हैं कि श्रद्धा रूपी पार्वती ने प्रकृति से पार (अपार) तप किया है, अत: आप श्रद्धा रूपी पार्वती को अंगीकार कीजिए।
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी।।
तब देवन्ह दुंदुभी बजाईं । बरषि सुमन जय जय सुर साईं।।
व्याख्या : सतोगुण रूपी ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर विश्वास रूपी शिव बोले कि ऐसा ही होगा अर्थात् श्रद्धारूपी पार्वती के साथ विवाह होगा। ऐसा सुनकर भाव रूपी देवता प्रसन्न हो गए और दुंदभी बजाने लगे अर्थात् भावों में उत्साह छा गया और पुष्प रूपी आनन्द की वर्षा होने लगी और सभी भाव रूपी देवता विश्वास रूपी शिव की जय-जयकार करने लगे।
अवस डिग्री जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए।।
प्रथम गए जहँ रहीं भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी।।
व्याख्या : ऐसी ध्यान की अवस्था में पुन: सप्त रस रूपी ऋषि आए और तुरन्त उनको सतोगुण रूपी ब्रह्मा ने नर (नड़) रूपी राजा के घर में भेजा। रसों की उत्पत्ति नर की धड़कन से होती है इसलिए तुरन्त नर रूपी राजा के पास सप्त ऋषि रूपी रसों को भेजने की बात कही गयी है। प्रथम में सप्त ऋषि अर्थात् सात रस श्रद्धा के भाव के पास जाते हैं और कपटपूर्वक मीठे वचन बोलते हैं। श्रद्धा रूपी पार्वती के सामने छलपूर्वक वचन बोलने का तात्पर्य यह है कि नर की धड़कन से ही रस पैदा होते हैं, जिन्हें हार्मोन कहते हैं और भावों के अनुसार नर की धड़कन की गति बनती है और श्रद्धा ही भावों को लाने वाली होती है। इसलिए सात रस रूपी ऋषि श्रद्धा के भाव के पास छलपूर्वक बोलते हैं, ताकि नर की धड़कन कहीं स्थिर नहीं हो जाए वरना रस (हार्मोन) का निकलना बंद हो जायेगा। इसलिए श्रद्धा रूपी भवानी से कहते हैं कि --
दो0 कहा हमार न सुनेहु तब नारद के उपदेस।
अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस।।89।।
व्याख्या : हे श्रद्धारूपी भवानी! आपने हमारा कहना नहीं माना और मन के नारद रूपी भाव के अनुसार कठोर तप किया है। परन्तु अब तुम्हारा प्रण झूठा हो गया है क्योंकि विश्वास रूपी शिव ने काम भाव को भस्म कर दिया है। अर्थात् जब काम भाव ही नहीं रहा तो, अब श्रद्धा रूपी भाव के साथ विश्वास रूपी शिव का कैसे विवाह होगा।
।। मास परायण, तीसरा विश्राम।।
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
तुम्हरे जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी भवानी सात रसों रूपी सप्त ऋषियों की बात सुनकर मुस्कराई कि आप लोगों ने ठीक ही कहा है। यहाँ सप्त ऋषियों को मुनि विज्ञानी कहने का मतलब यह है कि सात रस ही मन का वर्ण निर्धारित करते हैं, यही मन का विज्ञान है। अर्थात् जैसे हार्मोन होते हैं, वैसा ही मन का आवरण बनता है। श्रद्धा रूपी भवानी कहती हैं कि तुम्हारे अनुसार काम अब भस्म हुआ है, वरना विश्वास रूपी शिव तो अभी तक काम विषयी थे। वास्तविकता यह है कि हार्मोन्स को भावों के बाद में समझ आता है कि काम भाव की वास्तविकता क्या है? विश्वास रूपी शिव की वास्तविकता क्या है?
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवध अकाम अभोगी।।
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
व्याख्या : मेरे विचार में तो विश्वास रूपी शिव सदा परमात्मा से जुड़े ही रहते हैं, इसलिए वे अजन्मा, अमर, निष्काम व भोगों से सदा परे ही है। अगर मैंने (श्रद्धा) शिव को ऐसा ही निष्कामी जान कर चाहा है और मन, वचन व कर्म से सच्चा प्रेम किया है तो --
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।।
व्याख्या : हे मुनिवरों! मेरे प्रण को कृपा के समुद्र परमात्मा पूर्ण करेंगे। जो आप लोग कह रहे हैं कि शिव ने काम को भस्म कर दिया है, तो यह तुम्हारा अविवेक है। कहने का मतलब है कि काम कभी भस्म नहीं होता है, उसका रूपान्तरण हो जाता है और साधना के बल पर साधक सहज हो जाता है। अज्ञानता की अवस्था में तो काम जीव को व्याकुल कर देता है परन्तु साधना में परिपक्वता आने पर काम का भाव सहज होकर साधक के अधीन हो जाता है।
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।
गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई ।।
व्याख्या : हे सात रस रूपी मुनियों! अग्नि का सहज स्वभाव जलाना होता है, इसलिए बर्फ उसकें निकट नहीं जाती है क्योंकि बर्फ अगर अग्नि की पास जायेगी तो अवश्य नष्ट हो जायेगी। उसी प्रकार विश्वास रूपी शिव के पास अगर काम का भाव जायेगा तो वह नष्ट हो जायेगा। कहने का मतलब यह है कि जब साधक अपने दृढ़ विश्वास के बल पर महाऐश्वर्य (महेश) की अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तो वहाँ मन्मथ अर्थात् मन का मन्थन बन्द हो जाता है।
दो0 हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास।।90।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी भवानी की विश्वास रूपी शिव के प्रति प्रेम को देखकर सात रस रूपी सप्त ऋषि हर्षित हो गए तथा श्रद्धा रूपी भाव को सिर झुकाकर नर रूपी राजा के पास गए।
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना।।
व्याख्या : सात रस रूपी ऋषियों ने सब बात नर रूपी राजा को बतायी तो नर रूपी राजा को काम का मरण सुनकर बहुत दु:ख हुआ, परन्तु रति के वरदान की बात सुनकर नर रूपी राजा को बहुत सुख मिला। जब काम के भाव का रूपान्तरण हो जाता है, तो नर की धड़कन वासनाओं के प्रभाव से मुक्त होकर हिमवंत अर्थात शीतल हो जाती है और वह शीतलता (हिमवंत) सुख दायक होती है। इसलिए यहाँ हिमवंत का सुख मानना बोलकर लिखा है।
हृदयँ बिचारी संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई।।
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिदि लगन धराई।।
व्याख्या : तब नर रूपी राजा ने हृदय में विश्वास रूपी शिव की महिमा का विचार करके आदरपूर्वक मुनिबर (अर्थात् मन के हार्मोन्स के रस का आवरण) को बुलाया और अच्छा दिन, अच्छा नक्षत्र व शुभ घड़ी का विचार करके वेद विधि अर्थात् अनुभव की क्रिया द्वारा हृदय में लग्न लगाई। इसी को यहाँ पार्वती की लगन धराना बोलकर लिखा गया है। वास्तविकता में तो मन के आवरणों को हटाकर परमात्मा के प्रति श्रद्धापूर्वक लग्न लगाना ही वेद विधि अर्थात् अनुभव की क्रिया होती है।
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही।।
जाइ बिधि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।
व्याख्या : जब परमात्मा के चरणों में लग्न लग जाती है, तब हार्मोन्स (सप्त रसों) के माध्यम से ही विश्वास रूपी शिव तक पहुँचा जा सकता है। उसी को सप्त ऋषियों के हाथ में पत्री देना कहा गया है। उस समय नर रूपी राजा अर्थात् नर की धड़कन भी सात रसों के अनुसार चलने लगती है, उसी अवस्था को नर रूपी राजा हिमाचल का सात ऋषियों के चरणों में समर्पण करना बोलकर लिखा है। उस अवस्था में सप्त रस सबसे पहले सतोगुण रूपी ब्रह्मा के पास जाते हैं और पत्री को देते हैं, जिसे पढ़कर सतोगुण रूपी ब्रह्मा की प्रीत उमगने लगती है। अर्थात् परमात्मा के प्रति श्रद्धापूर्वक लगन लगने पर सतोगुण के भाव अपने आप उमड़ने लगते हैं। सत्यवती, सद्इच्छा, सदभावना, तनुमानसी, आसंसक्ति, पदार्थ भावना व समर्पण भावना रूपी सात रस ही सप्तऋषि कहलाते हैं।
लगन बाचि अज सबिह सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई।।
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।
व्याख्या : उस अवस्था में सतोगुण का भाव परमात्मा के प्रति लगी हुई लग्न को सभी भावों को प्रकट करने लगता है। उसी को लग्न का सबको सुनाना बताया गया है। परमात्मा के प्रति लग्न के भाव को देखकर मन के सब भाव हर्षित हो जाते हैं, जिससे आनन्द रूपी पुष्पों की वर्षा होने लग जाती है और मंगल की भावना से दसों प्राण भर जाते हैं अर्थात् साधक की भावना पूरी तरह मंगलमय हो जाती है।
दो0 लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।91।।
व्याख्या : उस अवस्था में समस्त स्वर निर्मल हो जाते हैं और स्वरों में संचरित प्राण वायु उर्ध्वगामी हो जाती है, जिससे सद्गुण और मंगल की भावना पैदा हो जाती है, जो शुभदाई होती है और सात्विक इच्छाएँ नाच-गान करने लगती हैं।
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौ डिग्री सँवारा।।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।
व्याख्या : परमात्मा में श्रद्धापूर्वक लग्न लग जाने पर विश्वासरूप शिव को भी भृंगी अर्थात् भ्रमर की तरह परमात्मा के चरण कमलों में मँडराना, नन्दी अर्थात् परमात्मा के आनन्द रस में डूबना और हुहा हो अर्थात परमात्मा के मिलने का उत्साह व उमंग रूपी शिवगण सँवारने लगते हैं अर्थात् विश्वास को और दृढ़ करने में सहायक बन जाते हैं। उस समय विषय वासना रूपी सर्पों को साधक कुण्डल-कंकन की तरह धारण कर लेता है अर्थात् पूरी तरह अनासक्त हो जाता है और साधक के शरीर में परमात्मा की विभूतियाँ प्रकट होने लग जाती हैं और वासनाओं को हरने सम्बन्धि क्षमता रूपी वस्त्र को धारण कर लेता है।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिव धाम कृपाला।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव के ललाट पर चन्द्रमा रूपी शीतलता और परमात्मा की भक्ति रस रूपी गंगा विराजित होती है। जब परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास हो जाता है तो ज्ञान रूपी तीसरा नेत्र खुल जाता है और वासनाएँ वश में आ जाती हैं, जिसे सर्पों का भुजबन्ध होना बताया गया है। जब साधक का विश्वास परमात्मामय हो जाता है, तो विषयों की आसक्ति रूपी जहर से साधक बच पाता है। उसी को कण्ठ में विष को धारण करना बताया गया है। उस समय नर की धड़कन हृदय से लेकर मस्तिष्क तक एक माला के धागे के समान हो जाती है। इस प्रकार विश्वास रूपी शिव विषयों के भेष को त्याग देते हैं और वे परम कृपालु कल्याण का घर बन जाते हैं।
कर त्रिसूल अ डिग्री डम डिग्री बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
व्याख्या : उस गम्भीर ध्यान की अवस्था में दृढ़ विश्वास के साथ परमात्मा में लीन हो जाने पर साधक दैेहिक, दैविक व भौतिक कष्टों पर विजय प्राप्त कर लेता है और अहंकार रूपी डम डिग्री के बन्धन से भी मुक्त हो जाता है। बिराजा का तात्पर्य है बिअराजा अर्थात् अहंकार के राजत्व से मुक्त होना। उस अवस्था में ध्यान चढ़ने लगता है और अनहद नाद आदि बाजे बजने लगते हैं। उस अवस्था को देखकर तीनों स्वरों की नाड़ियाँ (इड़ा, पिंगला और सुष्मना) मुस्कुराने लगी अर्थात् निर्मल होकर विकार रहित हो गयी। ""बर लायक दुलहिनि जग नाहीं"" का तात्पर्य है कि विश्वास रूपी शिव का वरण करने के लिए शरीर रूपी संसार में अब कोई इच्छा रूपी दुल्हन नहीं है। अर्थात् विश्वास रूपी सिव पूरी तरह परमात्मा में लीन हो जाने पर शरीर रूपी संसार में कोई इच्छा बचती ही नहीं है।
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता।।
सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।
व्याख्या : विष्णु व ब्रह्मा रूपी रजो गुणी व सतोगुणी भाव विश्वास रूपी शिव की बरात में अपने-अपने वाहनों अर्थात् वृतियों पर आरूड़ होकर चले। भाव रूपी देवताओं का समाज सब प्रकार से अनुपम होता है परन्तु भाव रूपी बारात विश्वास रूपी दूल्हा के अनुरूप नहीं होती है।
दो0 बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।
बिलग बिलग होई चलहु सब निज निज सहित समाज।।92।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में रजोगुण रूपी विष्णु का भाव हँस कर के सब प्राणों को बोला अर्थात रजोगुणी भाव समस्त प्राणों (व्यान, समान, उदान, अपान, पान, कूर्म, देवदत्त, धनंजय, कृकर, नाग) को प्रभावित करने लगता है और साधक में रजोगुणी इच्छा पैदा करने का प्रयास करता है। इसी को अलग होकर चलना कह कर लिखा गया है। ध्यान की गम्भीर अवस्था में भी कभी-कभी अचानक रजोगुणी इच्छाएँ पैदा हो जाती हैं, जो साधक को परमात्मा के चिन्तन से दूर ले जाने का प्रयास करती रहती हैं। परन्तु विश्वास की दृढ़ता होती है, तो साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेता है।
बर अनुहारी बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई ।।
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने।।
व्याख्या : विश्वास रूपी दूल्हे के अनुरूप भाव रूपी देवताओं की बारात नहीं है, इसलिए पर पुर अर्थात् परमात्मा के लोक में जाने पर जग हँसी होगी अर्थात् रजोगुणी और सतोगुणी भावों का परमात्मा के लोक में मेल नहीं होगा। रजोगुण रूपी विष्णु के वचनों को सुनकर भाव रूपी देवता मुस्कुराने लगे और अपनी-अपनी वृतियों के अनुरूप अलग-अलग होने लग गए। ध्यान में समझ आता है कि भाव से भाव और फिर भाव से भाव पैदा होकर अलग-अलग चलते रहते हैं।
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।।
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगहि प्रेरि सकल गन टेरे।।
व्याख्या : रजोगुण रूपी विष्णु के वचन सुनकर विश्वास रूपी शिव मुस्कुराने लगे कि माया के भावों का हरण होते हुए भी रजोगुण रूपी भाव की भोग इच्छा नहीं गयी है। रजोगुण का भाव सभी भावों को प्रिय लगता है, इसलिए विश्वास रूपी शिव के भी रजोगुण रूपी विष्णु प्रिय होते हैं। साधक के मन में जब भोग इच्छा जागृत होने लगती है, तो वह सावधान होकर परमात्मा के चरण कमलों में अपने भृंग अर्थात् भ्रमर रूपी वृति को लगाकर संसार से मुक्त होना चाहता है। उसी भावावस्था को यहाँ भृंगी द्वारा सभी गणों को बुलाने के प्रतीक द्वारा लिखा गया है।
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।।
नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव की परमात्मा के प्रति दृढ़ता को देखकर सब गण आए अर्थात सब वृतियाँ परमात्मामयी हो गयी। सब गणों अर्थात् वृतियों ने विश्वास रूपी शिव के चरण कमलों में शीश झुकाया अर्थात् समर्पण कर दिया। विश्वास रूपी शिव स्वयं के गणों अर्थात् वृतियों को देखकर हँसे क्योंकि वृतियों के नाना साधन व नाना रूप होते हैं। ये गुण वृतियाँ बहुत ही सूक्ष्मता से समझने पर साधक को स्वयं को ही समझ आ सकती हैं।
कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्ट पुष्ट कोउ अति तन खीना।।
व्याख्या : कुछ-कुछ गुणों की वृतियाँ तो मुखहीन होती है और कुछ-कुछ के बहुत मुख होते हैं। कुछ बिना पैरों वाली और कुछ-कुछ के बहुत पैर व हाथ होते हैं। वेदों में भी एक पदी, दो पदी, तीन पदी, चार पदी और बहु पदी जीवों का वर्णन आया है। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक भाव का जीवाणु होता है। इसलिए कुछ भाव ऐसे होते हैं, जिनके मुख ही नहीं होते और कुछ बहुमुखी भाव होते हैं। यह भाव अवस्था ध्यान में ही अनुभव की जा सकती है। वर्णन करके पूरी तरह समझाना बहुत मुश्किल कार्य है। कुछ भाव बहुत आँखों वाले तो कुछ नयन हीन ही होते हैं। कुछ भाव मोटे-ताजे तो कुछ एकदम क्षीण होते हैं।
छ0 तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें।।
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहुत जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै।।
व्याख्या : कुछ भाव क्षीण तो कुछ पवित्र व कुछ अपवित्र गति वाले होते हैं। ये समस्त भाव भृकुटि से पैदा होकर शरीर के रक्त में होते हैं। इन भावों की गधे, कुत्ते, सुअर, सियार आदि अनगिनत वृतियाँ होती हैं। बहुत प्रकार के भाव प्रेत, पिशाच व योगियों की जमात वाली वृतियों के होते हैं। अर्थात् भाव अनन्त होते हैं और उनकी वृतियाँ भी अनन्त होती हैं।
सो0 नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।
देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि।।93।।
व्याख्या : सब भाव प्राण की तरंगों के माध्यम से उठते रहते हैं, उसी को भावों का नाचना गाना बोलकर बताया गया है। जब विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती के मिलन का अवसर आता है, तो सभी भावों में उमंग छा जाती है। उस समय एक भाव अपने विपरीत दूसरे भाव को देखकर विचित्र तरीके से आपस में बातें करते हैं। शरीर में भाव आपस में सदैव बातें करते रहते हैं। जीव का कोई क्षण ऐसा नहीं होता, जिसमें भाव आपस में बातें नहीं करते हों।
जस दूलहु तसि बनि बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग-जाता।।
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना।।
व्याख्या : जैसा विश्वास होता है, परमात्मा के प्रति साधक के भाव भी वैसे ही हो जाते हैं। इसलिए विश्वास रूपी शिव की वैसी बरात बनती है। परमात्मा के साधना पथ पर जाते हुए नाना प्रकार के कौतुक होते हैं। जब विश्वास रूपी भाव की बारात चलती है, तो जैसे भाव होते हैं, वैसा ही नर (धड़कन) रूपी राजा की धड़कन चलती है। जैसे भाव होंगे उन्हीं के अनुसार नर की धड़कन चलेगी। अत: उसी को हिमाचल द्वारा बारात की अगवानी की व्यवस्था करना बोलकर लिखा है। उस भाव अवस्था का वर्णन करना बहुत कठिन होता है।
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।।
बन सागरसब नदी तलावा । हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।
व्याख्या : शरीर रूपी संसार में जितनी भी सैल (कोशिका) छोटी या बड़ी हैं, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। शरीर में ही उदर रूपी सागर, नस जार ही नदी व तालाब होते हैं और बाल रूपी वन होते हैं। अत: ध्यान की गम्भीर अवस्था में केवल नर की धड़कन का आभास मात्र बच जाता है। उसी को नर रूपी राजा का सबको निमन्त्रण भेजना बताया गया है।
कामरूप सुंदर तन धारी । सहित समाज सहित बर नारी।।
गए सकल तुहिना चल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा।।
व्याख्या : समस्त सैल (कोशिकाएँ) इच्छाओं के कारण सुंदर शरीर धारण किए रहती हैं और सब भावों सहित नारी (नाड़ी) में समाहित रहती हैं। अर्थात् कोशिकाओं और भावों का सम्बन्ध नाड़ी से होता है। ध्यान की गम्भीर अवस्था में भाव व सैलों (कोशिकाओं) का आभास भी मिटता चला जाता है, उसी को तुहिनाचल अर्थात् तू अब ना चल यानी अब तो मन तू परमात्मा में स्थिर हो जा, बोलकर कहा गया है। उस समय सभी सैल व भाव मंगल की भावना को ग्रहण कर लेते हैं।
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।।
पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।
व्याख्या : ध्यान की गहरी अवस्था में नर की धड़कन प्रधान होकर समस्त भावों को लीन कर लेती है, उसे ही सब भावों का घर सँवारना बताया गया है। उस अवस्था में सब भाव अपने-आप शान्त होकर नर की धड़कन में समा जाते हैं। उस समय की परम शान्त व रम्य अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस समय तो बाहरी जगत की रचना छोटी लगने लग जाती है।
छ0 लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।
बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही।।
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।
बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं।।
व्याख्या : ध्यान की गहराई में क्रिया द्वारा रचित बाहरी जगत की सुंदरता परम लोक की सुन्दरता के आगे छोटी लगने लग जाती है। उस समय प्रसन्नता रूपी वन-बाग, कुआ, तालाब व नदियों का वर्णन कौन कर सकता है। उस समय साधक को चारों तरफ मंगल के प्रतीक दिखायी पड़ने लगते हैं और परम पुरुष व परम नारी अर्थात् विशुद्ध नर व नारी की धड़कन को देखकर मन के सब भाव शान्त हो जाते हैं।
दो0 जगदंबा जहँ अवतरी सो पु डिग्री बरनि कि जाइ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ।।94।।
व्याख्या : जगत की माता अर्थात् नारी की धड़कन जब नर की धड़कन में मिलने को अवतरित होती है, तब उस अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। नारी की धड़कन से ही भाव पैदा होते हैं, जिनसे संसार का आभास होता है, अत: व्यष्टि की नारी की धड़कन से शरीर रूपी संसार का आभास होता है। जब नारी की धड़कन नर की धड़कन में विलीन हो जाती है, तब साधक के पास नित्य समस्त रिद्धियाँ, सिद्धियाँ व सुख-सम्पत्ति आ जाती है।
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभ डिग्री सोभा अधिकाई।।
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना।।
व्याख्या : जब नर की धड़कन में भावों रूपी बारात समाने लगती है, तो सारे शरीर में खलबली मच जाती है और शान्ति रूपी शोभा बढ़ने लग जाती है। तब नर की धड़कन से निकलने वाली तरंगें भावों को अपनी ओर आकर्षित करने लगती हैं। उसी को भावों रूपी बारात की अगवानी करना बताया गया है।
हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी।।
सिव समाज जब देखने लागे। बिडरि चले वाहन सब भागे।।
व्याख्या : भावों रूपी देवताओं की सेना को देखकर नर की धड़कन से निकलने वाली तरंगे रूपी अगवान माया के हरण (हरि) की अवस्था को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। परन्तु जब विश्वास रूपी शिव के समाज (भृंगी, नंदी, हूहाहू आदि) को देखने लगे तो सब तरंगों रूपी अगवान भयभीत होकर भाग चले। अर्थात् उस अवस्था में लगने लग जाता है कि कहीं शरीर ही नहीं छूट जाए। जब ध्यान गहरा होता है, तो कभी-कभी साधक को अपने शरीर छूटने का भय हो जाता है। उसी को भयभीत होकर अगवानों का भागने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने।।
गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता।।
व्याख्या : परन्तु उस अवस्था में चतुर भाव धैर्य रखकर टिके रहते हैं और बालक रूपी भाव प्राण बचाकर भाग जाते हैं। बालक रूपी भाव घर में जाकर अपने माता-पिता से पूछते हैं और घबरा कर काँपते हुए अपनी बात बताते हैं। बालक रूपी भाव यथार्थ में नर की धड़कन से निकलने वाली तरंग ही होते हैं। भयभीत होने पर ये तरंगे नर रूपी घर में वापिस आकर समा जाती हैं।
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता।।
ब डिग्री बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।
व्याख्या : बालक रूपी भाव विश्वास रूपी शिव के समाज का वर्णन नहीं कर पाते हैं। इसलिए बालक रूपी भाव शिव समाज को यमराज का समाज बताते हैं और कहते हैं कि दूल्हा तो पागल है, जो बैल पर सवारी किए हुए है और गले में सर्प लपेटे व भभूती धारण किए हुए हैं। बैल अहंकार का प्रतीक है, इसलिए विश्वास रूपी शिव अहंकार रूपी बैल को अपने वश में करके सवारी करते हैं और वासना रूपी सर्प हैं, जिनको वश में करके गले में लपेटे हुए हैं। विश्वास रूपी शिव वैराग्य रूपी भभूती शरीर में लपेटे हुए रहते हैं। अत: ऐसा वेष देखकर बालक रूपी (भोग वादी) भावों का डरना स्वाभाविक ही है।
छ0 तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा।।
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही।।
व्याख्या : बालक रूपी भावों (भोगवादी) ने घर-घर में ये बात फैला दी अर्थात् समस्त भावों में यह बात फैला दी कि विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती के विवाह उत्सव (मिलन उत्सव) को वे ही भाव देख पायेंगे, जो जीवित रहेंगे अर्थात् जो भाव विश्वास और श्रद्धा के साथ लीन होने से बच जायेंगे। क्योंकि विश्वास रूपी शिव ने तो वासना रूपी सर्पों को गले में डाल लिया है और वैराग्य रूपी राख को शरीर पर लगा लिया है तथा साथ में भूत, प्रेत व पिशाच रूपी, वृतियाँ भी लीन कर ली हैं और विकराल आसुरी भावों को भी अपने साथ जोड़ लिया है। ऐसी अवस्था में कोई भाव बचना ही कठिन है। इसलिए भोग रूपी बालक भावों को लगता है कि अब विश्वास व श्रद्धा के मिलन को कौन देखेगा।
दो0 समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं।
बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु ड डिग्री नाहिं।।95।।
व्याख्या : नर की धड़कन से उठने वाली तरंगों से ही नाना भाव पैदा होते हैं। अत: तरंग रूपी माता-पिता बालक रूपी भावों को मुस्कुरा कर समझाते हैं कि ये अवस्था तो विश्वास रूपी शिव के समाज की है, अत: तुम निर्भय रहो।
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए।।
मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव की बारात को नर की धड़कन की तरंगों रूपी अगवान ध्यानावस्था में जनवास अर्थात् जहाँ से भाव पैदा होते हैं, उस अवस्था में लेकर आ गए। उस ध्यान की गम्भीर अवस्था में साधक को अनुभव होने लगता है कि मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। उसी मैं नहीं होने की अनुभूति को मैना के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। मैं नहीं अर्थात् मैना की अनुभूति होने पर नारी की धड़कन से मंगलकारी भाव पैदा होने लग जाते हैं।
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी।।
बिकट बेष रूद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।
व्याख्या : उस अवस्था में माया वश में होकर स्थिर हो जाती है, उसी को कंचन (माया) थार (थिर) के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। ध्यान की उस गहरी अवस्था में मैं नहीं का भाव तो आ जाता है परन्तु सोहं की ध्वनि प्राण में आने लग जाती है। उसी को सोह बर पानी कहा गया है। उस समय माया का हरण हो जाता है, जिससे प्रसन्नता (हर्ष) का आभास हो जाता है। उस समय विश्वास रूपी शिव की दृढ़ता को देखकर छोटी-मोटी इच्छाएँ (अबला) भयभीत हो जाती हैं अर्थात् इच्छाओं रूपी अबलाओं को लगने लग जाता है कि अब दाल नहीं गलेगी।
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा।।
मैना हृदय भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीस कुमारी।।
व्याख्या : अबला रूपी भोग की इच्छाएँ तो भयभीत होकर जहाँ से भाव पैदा हुए वहाँ जाकर छुप गयी और विश्वास रूपी शिव जनवास अर्थात् प्राण के उत्पत्ति स्थान पर चले गए। उस अवस्था में मैंना अर्थात् मैं नहीं हूँ के भाव ने श्रद्धा रूपी पार्वती को अपने पास बुला लिया। मैं नहीं का आभास होने पर श्रद्धा का ही एकमात्र भाव होता है, जो साधक को परमात्मा के लिए प्रेरित करता है।
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी।।
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ ब डिग्री बाउर कस कीन्हा।।
व्याख्या : जब साधक को मैं नहीं हूँ का आभास हो जाता है, तब उसका श्रद्धा भाव के प्रति ज्यादा प्रेम हो जाता है। अत: उसी को ज्यादा प्रेमपूर्वक श्रद्धा रूपी पार्वती को गोदी में बैठाना बोलकर लिखा गया है। उस समय ध्यान में आँखों में जल आ जाता है। उस क्रिया (विधि) द्वारा श्रद्धा का भाव बहुत अच्छा लगने लगता है और उसी क्रिया अर्थात् मैं नहीं हूँ का आभास होने से ही विश्वास रूपी शिव दृढ़ होकर स्थिर होते हैं। उसी को प्रतीकात्मक दृष्टि से जड़ ब डिग्री बाउर अर्थात् विश्वास की दृढ़ता की जड़ें हृदय में उग जाना बोलकर लिखा है।
छ0 कस कीन्ह ब डिग्री बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरूहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घ डिग्री जाउ अपजसु होउ जग जीवन बिबाहु न हौं करौं।।
व्याख्या : श्रद्धा का भाव हमेशा सुखद और मन को मोहित करने वाला होता है परन्तु विश्वास का भाव निरस व जड़ सा लगता है, हालाँकि विश्वास का भाव लक्ष्य प्राप्ति पर परमसुख को देने वाला हो जाता है, परन्तु प्रारम्भ में निरस सा लगता है। इसलिए साधक को ध्यान में अनुभव होता है कि जिस क्रिया (विधि) से परमात्मा के प्रति सुन्दर श्रद्धा का भाव पैदा हुआ है उसी क्रिया (विधि) से विश्वास रूपी दूल्हे को कैसे बौराह अर्थात् परमात्मा की राह पर चला दिया। जो ध्यान सुरत डिग्री अर्थात् स्वरों के मूल अर्थात् भृकुटि में लगाने पर लगता है, वही ध्यान परमात्मा के प्रति विश्वास दृढ़ हो जाने पर स्वत: बिना स्वरों के ही लग जाता है। उस अवस्था में मैं नहीं हूँ अर्थात् मैना रूपी रानी का भाव कहता है कि मैं नर की धड़कन सहित पर्वत अर्थात् प्रकृति से परे हो जाऊँगी और ज्ञान रूपी अग्नि में जल जाऊँगी और फिर परमात्मा के अनन्त सागर में गिर जाऊँगी। उसके बाद चाहे यह शरीर रहे या नहीं रहे तथा संसार में भले ही अपयश हो परन्तु मैं नहीं हूँ के रहते श्रद्धारूपी पार्वती का विश्वास रूपी शिव के साथ विवाह नहीं करूँगी। कहने का तात्पर्य यह है कि जब परमात्मा में विश्वास दृढ़ हो जाता है, तो साधक में मैं नहीं हूँ की भावना आ जाती है और श्रद्धा का भाव भी अच्छा लगने लग जाता है परन्तु जब तक मैं की भावना होती है, तब तक श्रद्धा और विश्वास का मिलन कठिन होता है। उसी भाव अवस्था को यहाँ लिखा गया है।
दो0 भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।
करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि।।96।।
व्याख्या : जब मैं नहीं हूँ का भाव भी मिटने लगता है, तो भोग रूपी अबला इच्छाएँ व्याकुल हो जाती हैं कि अब हमारा क्या होगा। इसलिए रोती हुई श्रद्धा के प्रति स्नेह को याद करती हुई बोलने लगती हैं।
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागु तप कीन्हा।।
व्याख्या : मैंना रूपी भाव कहने लगता है कि मन के नारद रूपी भाव का मैंने क्या बिगाड़ा था, जिसने भावों के आने की प्रक्रिया को ही रूकवा दिया। उसने श्रद्धा रूपी पार्वती को ऐसा उपदेश दिया, जिसके कारण विश्वास रूपी वर का बरण करने के लिए श्रद्धा रूपी पार्वती ने तप किया है। जब श्रद्धा का भाव परमात्मा में लग जाता है, तब भावों का आना बन्द होने लग जाता है, उसी को भवन उजाड़ना बोलकर लिखा है।
साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया।।
पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा।।
व्याख्या : सच में ही मन के नारद रूपी भाव में मोह व माया नहीं होती है, इसलिए वह धन व घर की आसक्ति से रहित उदासीन रहता है। इसलिए पर घर अर्थात् प्रकृति के आवरण को नष्ट करने में उसे कोई लज्जा व भय नहीं होता है। जैसे बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को नहीं जान पाती है, वैसे ही वैराग्यवान भाव माया रूपी स्त्री की पीड़ा को नहीं जान पाता है।
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी।।
अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती मैना रूपी माता को व्याकुल देखकर विवेक पूर्वक मधुरवाणी बोली कि हे माता! जो विधाता अर्थात् क्रिया कर्ता क्रिया करता है, वैसा ही होता है। ऐसा विचार कर आप चिन्ता मत कीजिए। अर्थात् साधना की जैसी क्रिया की जायेगी साधक को वैसा ही फल मिलेगा।
करम लिखा जौ बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू।।
तुम्ह सन मिटहिं की बिधि के अँका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।
व्याख्या : अगर कर्म में बाउर नाहू अर्थात् हृदय में बा अर्थात् परमात्मा के अलावा कोई नहीं है तो किसे दोष क्यों लगाती हो। तुम क्रिया (विधि) के फल को नहीं मिटा सकती हो। अत: व्यर्थ में ही कलंक मत लीजिए। कलंक का तात्पर्य है कल अअंक अर्थात देह भाव में मत बरतिए।
छ0 जनि लेहु मातु कलंकु करूना परिहरहु अवसर नहीं।
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं।।
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोच हीं।
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं।।
व्याख्या : जब साधक ध्यान में परमात्मा की प्राप्ति के पथ पर अग्रसर हो जाता है, तो लक्ष्य के नजदीक पहुँच जाने पर भोग की बची हुई इच्छाएँ व्याकुल हो जाती हैं और उस समय भावों में अति सूक्ष्म वार्तालाप होने लगता है। उसी को यहाँ कहा गया है। उस समय श्रद्दा रूपी भाव अपनी नारी (नाड़ी) रूपी माता से कहता है कि हे माता! आप अब देह भाव में मत बरतो क्योंकि अब परमात्मा से दूर होने का समय नहीं है। दुख व सुख तो जो कपाल में लिखा होगा, वो जहाँ भी जायेंगे वहाँ मिल जायेंगे। श्रद्धा रूपी पार्वती की बातें सुनकर भोग रूपी अबला (बलहीन) इच्छाएँ सोचने लगी और बहुत प्रकार से साधना की क्रिया (विधि) को दोष लगाने लगी तथा आँखों में आँसू भर लिए।
दो0 तेहि अवसर नारद सहित अ डिग्री रिषि सप्त समेत।
समाचार सुनि तुहिनगिरि गबने तुरत निकेत।।97।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मन का नारद रूपी भाव सप्त रस रूपी ऋषियों के साथ नर (नड़) रूपी राजा के घर प्रकट हो जाते हैं। भावों के सूक्ष्म वार्तालाप से शरीर में सात प्रकार के हार्मोन पैदा हो जाते हैं और वैराग्य को बल प्रदान करने लगते हैं। जिससे साधक की परमात्मा के प्रति लग्न और तीव्र हो उठती है।
तब नारद सबहीं समुझावा। पूरूब कथा प्रसंगु सुनावा।।
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी।।
व्याख्या : वैराग्य प्रबल होने की अवस्था में मन का नारद रूपी भाव सभी भावों को समझाते हुए भावों की पूर्व अवस्था के प्रसंग को सुनाते हैं और कहते हैं कि हे मयना (अर्थात् मैं नहीं हूँ)! श्रद्धा का भाव ही भावों को लाने वाला होता है इसलिए श्रद्धा भाव ही जगदम्बा है। भावों से ही सृष्टि का आभास होता है। इसलिए भवानी (श्रद्धा) को जगत को पैदा करने वाली माता कहा गया है।
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि।।
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।
व्याख्या : भावों को पैदा करनेवाली शक्ति अजन्मा, अनादि व अविनाशी होती है तथा सदैव विश्वास रूपी शिव की अर्द्धांगिनी होती है अर्थात् जैसा विश्वास होता है, वैसे ही भाव पैदा होते हैं। भावों को पैदा करनेवाली शक्ति से ही जगत की उत्पत्ति, पालन व प्रलय संभव हो पाता है। वह शक्ति स्वयं की इच्छा के अनुसार ही शरीर धारण करती है अर्थात् भावों के अनुसार जीव का शरीर बनता है।
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई ।।
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं।।
व्याख्या : सबसे पहले भावों को पैदा करने वाली शक्ति दक्षता (दक्ष) अर्थात् चतुराई से पैदा होती है, उसी को सती रूपी श्रद्धा कहा जाता है, जिससे सुन्दर शरीर की प्राप्ति होती है। तब भी श्रद्धा रूपी सती शंकाहीन विश्वास को ही अपने पति के रूप में प्राप्त करती हैं। यह अनुभव शरीर रूपी संसार में सिद्ध हो जाता है।
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा।।
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा।।
व्याख्या : सती रूपी श्रद्धा के भाव ने एकबार आत्मारूपी राम को देखा तो मोह हो गया और विश्वास रूपी शंकर का कहा नहीं मानकर श्रद्धा का भाव श्वास रूपी सीता का रूप धारण कर लिया। जब श्रद्धा का भाव प्राण का आधार छोड़कर श्वास का आधार ले लेता है, तो उसमें मोह आदि के विकार जुड़ जाते हैं, जिससे शंका पैदा हो जाती है। शंकाओं का पैदा होना श्रद्धा को विश्वास के भाव से दूर कर देता है। इसलिए जब श्रद्धा रूपी सती को संशय हुआ तो विश्वास रूपी शिव दु:खी हो गए और सती व शिव का विछोह हो गया।
छ0 सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं।
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु के जग्य जोगानल जरीं।।
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।
अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया।।
व्याख्या : इसलिए श्रद्धा रूपी सती ने जब श्वास रूपी सीता का रूप धारण किया तो विश्वास रूपी शंकर ने त्याग कर दिया। तब शिव के विरह के कारण अर्थात् श्रद्धा का भाव जब विश्वास के भाव से दूर हो जाता है, तो वह दक्षता रूपी (चतुरता) पिता के घर चली जाती हैं। परन्तु दक्षता रूपी पिता के घर पर विश्वास रूपी शिव के साथ रहने के कारण उचित सम्मान नहीं होता है, तो योग की अग्नि में (अर्थात् पुन: विश्वास के भाव से मिलने की लगन लग जाती है) अपने शरीर का त्याग कर देती हैं। फिर वही श्रद्धा का भाव नर की धड़कन से पैदा होकर विश्वास रूपी शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया है। उसी को गिरि भवन जनमीं बोलकर लिखा है। इसलिए अब यह जानकर कि श्रद्धा का भाव सदैव विश्वास का प्रिय होता है, सब संशयों का त्याग कर दो।
दो0 सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।
छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संवाद।।98।।
व्याख्या : उस ध्यानावस्था में मन के नारद रूपी भाव के इन वचनों को सुनकर सभी भावों का दु:ख दूर हो गया और क्षण भर में शरीर के प्रत्येक कोष में यह संवाद पहुँच गया अर्थात् सब भावों को हृदयंगम हो गया।
तब मयना हिमवंतु अनंदे । पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने।।
व्याख्या : जब विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती का मर्म समझ में आ जाता है, तब नर-नारी (मयना व हिमवंत) आन्नद से भर जाते हैं। माया के भाव नारी (नाड़ी) की धड़कन से पैदा होते हैं और माया के भावों से ही अहंकार पैदा होकर मैं हूँ का आभास कराता है परन्तु जब विश्वास और श्रद्धा का मिलन होने लगता है तो मैं हूँ का आभास मैं नहीं हूँ (अर्थात् मैंअनाउमयना) में बदल जाता है और नर की धड़कन भी शीतल हो जाती है। इसलिए उसे हिमवंत अर्थात् बर्फ की तरह शीतल के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब वासनाओं का नाश हो जाता है, तब नर की धड़कन हिमवंत हो जाती है। उस अवस्था में नर-नारी की धड़कन भी श्रद्धा रूपी भाव का वन्दन करने लगती है अर्थात् श्रद्धा का भाव प्रबल हो उठता है। उस समय नर-नारी की धड़कन से उठने वाले सभी बाल व चतुर भाव तथा शरीर रूपी नगर के सब भाव हर्षित हो उठते हैं।
लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना।।
भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा।।
व्याख्या : उस अवस्था में शरीर रूपी नगर में मंगल गान होने लग जाते हैं, जिससे हृदय के सभी घाट मंगल भावना से सज जाते हैं। हृदय नौ नाड़ियों की धड़कन का सामूहिक नाम होता है। ये नौ नाड़ियाँ ही हृदय के घाट होते हैं। इसी को सिद्धों ने ""नौ नाड़ी नरसिंह बसै"" बोला है। हृदय की धड़कन सप्त चक्र, हाथ व पैरों में होती है। उसी को नौ नाड़ी कहा जाता है। जब हृदय के घाट सज जाते हैं, तब नाना प्रकार के मंगल भाव पैदा होने लगते हैं और शरीर में नाना सात्विक हार्मोनों का रस पैदा होने लगता है। उसी को ""नाना भांति भयी जेवनारा"" बोला गया है। भावों का निर्मल हो जाना ही सूप शास्त्र का व्यवहार कहलाता है।
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।।
सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।।
व्याख्या : उस जेवनार का कौन वर्णन कर सकता है, जिसके सब भाव श्रद्धा रूपी भवानी से पैदा होते हों। रजोगुणी व सात्विक गुणों रूपी विष्णु व ब्रह्मा देव सहित सभी भाव रूपी बारातियों को आदरपूर्वक नर रूपी हिमाचल राजा ने बुलाया। अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में रजो व सतों गुणी भावों सहित सभी भाव नर की धड़कन में लीन होने लग जाते हैं। उसी को सादर भाव रूपी देवताओं को बुलाना कहा गया है।
बिबिध पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा।।
नारि बृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी।।
व्याख्या : नाना प्रकार से जेवनार बैठ गयी अर्थात् सभी भाव रूपी देवता आनन्द रस के पान के लिए बैठ गए और ध्यान में लगे हुए भाव अर्थात् निपुण सुआरा परोसने लगे। ध्यान की उस अवस्था में फिर नारिवृंद अर्थात् नाना नाड़ियों की धड़कन से भोग की आकर्षक-आकर्षक इच्छाएँ पैदा होने लगती हैं, जो भाव रूपी देवताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास करती हैं। उसी को मधुर वाणी में गाली देना बोला गया है।
छ0 गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं।।
जेवँत जो बढ़यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कहयौ।
अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रहयो।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में नाड़ियों की धड़कन से मधुर मधुर भोग की इच्छाएँ पैदा होने लगती हैं, जो भाव रूपी देवताओं को व्यंग्य कर करके अपनी तरफ खींचने के लिए प्रयास करती हैं। उस अवस्था में सात्विक व राजसिक भाव रूपी देवताओं के मन में द्विविधा पैदा हो जाती है कि भक्ति रस का पान करें या फिर मधुर-मधुर भोगों का भोग करें। उस समय न तो भक्ति के आनन्द रस को ही छोड़ने का मन करता है और न ही भोगों को त्यागने का मन करता है। इसलिए देरी से भोजन करने की बात को प्रतीकात्मक रूप से कहा गया है। ऐसी अवस्था में भक्ति के आनन्द रस का आनन्द भी बहुत बढ़ जाता है, जिसका वर्णन मुँह के द्वारा किसी भी स्तर का कहा नहीं जा सकता है। जब ध्यान में आनन्द रस का पान करके संतुष्टि मिल जाती है, तो सभी भाव अपनी-अपनी सहज अवस्था में पहुँच जाते हैं। उसी को आचमन करके अपने-अपने स्थानों पर जाना कहा गया है।
दो0 बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।
समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ।।99।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मन के भावों के नर रूपी हिमवंत को कहा कि अब विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती के मिलने की लग्न आ गयी है। अत: नर (धड़कन) रूपी राजा ने समय की अनुकूलता देख कर भाव रूपी देवताओं को बुलवा लिया। जब सब भाव भक्ति के आनन्द रस से तृप्त हो जाते हैं, तभी विश्वास व श्रद्धा के भावों का मिलन सम्भव हो पाता है। अत: यहाँ समय की अनुकूलता से मतलब भावों का भक्ति के आनन्द रस में तृप्त हो जाने से ही है।
बोली सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।।
बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभघ सुमंगल गावहिं नारी।।
सब देवताओं को आदर सहित बुलवा लिया और सबको यथायोग्य आसन दिये। वेदकी रीति से वेदी सजायी गयी और स्त्रियाँ सुन्दर श्रेष्ठ मङ्गल गीत गाने लगीं।।1।। वेद की रीति से तात्पर्य अनुभूतियों से है।
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा।।
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई।।
व्याख्या : वेदिका पर एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य सिंहासन था, जिस की सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजी का बनाया हुआ था। ब्रह्माजी द्वारा सिंहासन बााने का तात्पर्य सात्विक भावों द्वारा स्थिरता प्रदान करने से है। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने स्वामी श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गये। ब्राह्मणों को सिर नाने से तात्पर्य है कि ब्रह्म की अनुभूति करके समर्पण करते हुए परमात्मा का स्मरण करना।
बहुरि मुनीसन्स उमा बोलाई। करि सिंगारु सखईं लै आईं।।
देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।।
फिर मुनीश्वरोंने पार्वतीजी को बुलाया। सखियाँ श्रृंगार करके उन्हें ले आयीं। पार्वती जी के रूप को देखते ही सब देवता मोहित हो गये। संसार में ऐसा कवि कौन है जो उस सुन्दरता का वर्णन कर सके!
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा।।
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी।।
व्याख्या : भावों को पैदा करने वाली जानकर श्रद्धा रूपी जगदम्बिका को सभी भावों रूपी देवताओं ने मन ही मन में प्रणाम किया। भावों को लाने वाली श्रद्धा रूपी भवानी सुन्दरता की मर्यादा होती हैं, जिसका वर्णन करोड़ों मुखों से भी नहीं किया जा सकता है।
छ0 कोटिहुँ बरन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।
सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा।।
छबि बखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुक डिग्री तहाँ।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती जो कि जगत को पैदा करने वाली है कि शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। श्रद्धा के भाव की महिमा का वर्णन करने में तो वेद, शेष व शारदा भी संकोच करते हैं, फिर मैं मंद मति तुलसीदास कैसे वर्णन कर सकता हूँ। श्रद्धा रूपी माता भवानी जो शोभा की खान हैं, वो विश्वास रूपी शिव के पास मंडप (अर्थात् मन अ अप यानी मन की सीमा से परे) में गयी। वहाँ जाकर संकोच के कारण विश्वास रूपी पति के चरण कमलों को देख नहीं पा रही थी परन्तु मन भ्रमर तो वहाँ लगा हुआ था। पाठकों को जानकर आश्चर्य होगा कि प्रत्येक भाव का भी मन वैसे ही होता है, जैसा मन जीव का होता है। यह भावों की मन अवस्था ध्यान में ही सूक्ष्मता से समझ आ पाती है।
दो0 मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि।।100।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समझ में आता है कि विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती के मन के वश में आ जाने पर गुणों के स्वामी परमात्मा की पूजा अर्थात् मन की सीमा से बाहर निकलकर गुणों की उत्पत्ति को जान लिया। इसलिए कोई सुनकर मन में संशय नहीं करें क्योंकि स्वरों से गुणों की उत्पत्ति होती है। अत: गुणों को पैदा करने वाला अनादि है।
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।।
व्याख्या : जैसे विवाह की विधि का वेदों ने वर्णन किया है, वैसा ही महामुनियों ने करवाया अर्थात् जैसे विवाह के संस्कार में पति-पत्नी एक हो जाते हैं। उसी प्रकार महामुनि अर्थात् मन की महा अवस्था अर्थात् परमात्मा में लीनता की अवस्था में श्रद्धा व विश्वास के भाव एक हो जाते हैं। उसी अवस्था को नर रूपी गिरि के द्वारा कुश को हाथ में लेकर अर्थात् अहंकार को जीत कर श्रद्धा रूपी कन्या का हाथ पकड़ कर विश्वास रूपी शिव को सौंप देना बोलकर लिखा है। श्रद्धा रूपी भवानी को विश्वास रूपी शिव को सौंप दिया। इसका यही मतलब है कि ध्यान की उस गहरी अवस्था में श्रद्धा का भाव भी विश्वास के भाव के सामने समर्पण कर देता है।
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा।।
बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहिं। जय जय जय संकर सुर करहीं।।
व्याख्या : जब विश्वास रूपी शिव ने श्रद्धा रूपी पार्वती को ग्रहण किया अर्थात् स्वीकार किया तो तब सारे भाव हर्षित हो गए और मन के अन्दर वेदों की अनुभूति होने लग गयी तथा सभी भाव रूपी देवता शंका रहित विश्वास की अवस्था की जय जय जय करने लगे। ध्यान की गम्भीर अवस्था में जब श्रद्धा व विश्वास का मिलन होता है, तो मन में स्वत: मंत्रों का ज्ञान होने लग जाता है। उसी अवस्था को वेदमंत्रों का उच्चारण करना बोलकर लिखा है।
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमन बृष्टि नभ भै बिधि नाना।।
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू।।
व्याख्या : उस समय ध्यान में नाना प्रकार के ढोल, मृदंग, ताल आदि बाजे बजने लगते हैं और आनन्दरूपी फूलों की वर्षा होने लग जाती है। जब विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती का मिलन (विवाह) हो जाता है, तो सभी भुवनों अर्थात् शरीर के सब अंगों में आनन्द का उत्साह छा जाता है।
दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।।
अन्न कनक भाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।
व्याख्या : उस समय ध्यान की अवस्था में दास-दासी रूपी इच्छाओं के भाव, रगों में घूमने वाले भाव, इन्द्रियाँ व इन्द्रियों में रमण करने वाली इच्छाएँ व मन की भावना के नाना विभाग सब समझ में आ जाते हैं। उस समय अन्न की उत्पत्ति समझ में आ जाती है। अन्न से ही सब भूत पैदा होते हैं और भूतों से ही सब भाव पैदा होकर सृष्टि की सृजना को आगे बढ़ाते हैं। भूतों से भावों की उत्पत्ति की प्रक्रिया का वर्णन नहीं किया जा सकता है। अन्न से उत्पन्न माया का त्याग कर देना ही दहेज देना बोलकर लिखा है।
छ0 दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।
का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो।।
सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।
पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो।।
व्याख्या : सब प्रकार से माया के भावों का त्याग करके नर रूपी राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि पूर्णकाम व शंका से रहित विश्वास रूपी शिव को क्या दूँ? इसलिए विश्वास रूपी शिव के चरण कमलों को पकड़कर नर (धड़कन) रूपी राजा रह गया। ध्यान में नर की धड़कन भी धीरे-धीरे शान्त होकर विश्वास के भाव के साथ चेतना बनकर समर्पण कर देती हैं। उस अवस्था में विश्वास रूपी शिव नर (धड़कन) रूपी ससुर अर्थात् धड़कन से उठने वाले सब स्वरों में संतोष का भाव पैदा कर देता है। जब सब स्वरों में संतोष के भावों का प्रवाह हो जाता है, तो फिर मयना अर्थात् मैं नहीं हूँ का भाव भी पूरी तरह विश्वास के भाव के आगे समर्पण कर देता है। उसी को मयना का विश्वास रूपी शिव के चरण पकड़ना बोलकर लिखा है। जब मैं नहीं हूँ का भाव भी समर्पण कर देता है, तब हृदय में विशुद्ध प्रेम पैदा हो जाता है।
दो0 नाथ उमा मम प्राण सम गृहकिंकरी करेहु।
छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न ब डिग्री देहु।।101।।
व्याख्या : मयना रूपी भाव तब विश्वास के भाव से प्रार्थना करता है कि श्रद्धा का भाव मेरे प्राणों के समान है, इसलिए इसे सदैव आपकी दासी करके रखना। दासी करके रखने का मतलब यह है कि श्रद्धा का भाव जब तक विश्वास के अधीन रहता है तब तक ही वह विश्वास का अनुसरण करता है और अगर श्रद्धा का भाव स्वतंत्र हो जाए तो वह माया के भी साथ जा सकता है। अत: मयना रूपी भाव कहता है कि आप श्रद्धा के भाव के सब अपराधों को क्षमा कर देना और प्रसन्न होकर श्रद्धा को अपनी दासी स्वीकार करने का वर दीजिए।
बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सि डिग्री नाई।।
जननी उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव ने मयना रूपी सास को बहुत प्रकार से समझाया तथा तब मयना का भाव भी सहज अवस्था (भवन) में चला गया। तब मयना रूपी भाव ने श्रद्धा रूपी पार्वती को बुला लिया और गोदी में बैठाकर सुन्दर शिक्षा दी अर्थात् श्रद्धा के भाव को प्रेरणा करी।
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारि धरमु पति देउ न दूजा।।
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम सदैव शंका रहित विश्वास के चरणों की सेवा करना क्योंकि नारी का धर्म पति के चरणों की सेवा करना ही होता है। इस प्रकार कहते हुए मयना रूपी माता की आँखों में आँसू भर आए। तब बहुत प्रकार से श्रद्धा रूपी कुमारी को अपने हृदय से लगा लिया।
कत बिधी सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।।
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।।
व्याख्या : मयना रूपी माता सोचने लगी कि किस प्रकार नारी की धड़कन से संसार की सृजना हो जाती है अर्थात् नारी की धड़कन से माया के भाव पैदा होकर जीव को पराधीन बना देते हैं और पराधीनता में सपने में भी सुख नहीं होता है। जब ध्यान में माया का रहस्य समझ में आने लग जाता है, तो प्रेम पैदा होने लग जाता है। क्योंकि माया का स्वभाव ही ऐसी होता है कि जानकारी होते ही माया का नाश हो जाता है और जब माया का नाश हो जाता है, तो प्रेम स्वत: पैदा होने लग जाता है। मयना रूपी माता ने कुसमय अर्थात् श्रद्धा से बिछुरने के समय का विचार करके धैर्य धारण कर लिया।
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना।।
सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी । जाइ जननी उर पुनि लपटानी।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मयना रूपी भाव और श्रद्धा का भाव बार-बार मिलने लगते हैं और उस समय के परम प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस समय श्रद्धा का भाव समस्त नाड़ियों में संचरित होने लगता है और पुन: मयना रूपी भाव की छाती से लिपटने लगता है।
छ0 जननिहिं बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं।।
जाचक सकलसंतोषि संक डिग्री उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसा नभ बाजे भले।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में श्रद्धा रूपी पार्वती का भाव मयना रूपी जननी से बहुत प्रकार से मिलकर आशीष ले लिया और फिर मुड़-मुड़ कर मयना रूपी माता की तरफ देखने लगी, परन्तु उसी समय करूणा, मैत्री, दया व लग्न रूपी सखियाँ श्रद्धा रूपी पार्वती को विश्वास रूपी शिव के पास ले गयी। उस समय विश्वास रूपी शिव ने समस्त कामनाओं रूपी जाचकों को संतोष देकर श्रद्धा रूपी पार्वती के साथ चल दिए अर्थात् परमात्मा की भक्ति में लीन हो गए। इस अवस्था में समस्त भाव रूपी देवताओं में हर्ष छा जाता है क्योंकि परम संतोष की अवस्था आ जाती है। जब हर्ष छा जाता है, तो आनन्द रूपी फूलों की वर्षा होने लग जाती है तथा मस्तिष्क रूपी आकाश में अनहद नाद की ध्वनि आने लग जाती है।
दो0 चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।
बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु।।102।।
व्याख्या : ध्यान में विषय वासना जब एकदम शान्त हो जाती हैं, तो नर की धड़कन भी शान्त हो जाती है। उस शान्त अवस्था को ही हिमवंत अर्थात् बर्फ के तुल्य कहा जाता है। जब हिमवंत की अवस्था आ जाती है, तो श्रद्धा के भाव को और बल मिल जाता है। उसे ही श्रद्धा रूपी पार्वती को हिमवंत द्वारा पहुँचाना बोलकर लिखा है। परन्तु जब श्रद्धा और विश्वास के भाव मिल जाते हैं, तो हिमवंत अर्थात नर की धड़कन भी एकदम शान्त हो जाती है और श्रद्धा व विश्वास के भाव चेतना में समाकर परमात्मा में लीन हो जाते हैं, जिससे कैवल्य का उल्लास छा जाता है। उसी कैवल्य के उल्लास को कैलाश पर्वत पर पहुँचना बताया जाता है।
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।।
आदर दान बिनय बहुमाना। सब करबिदा कीन्ह हिमवाना।।
व्याख्या : जब चेतना परमात्मा में लीन हो जाती है, तो नर की धड़कन सूक्ष्म बनकर अपनी सहज अवस्था में आ जाती है। उसी अवस्था को गिरिराई (सूक्ष्म नर की धड़कन) का भवन आना बताया गया है। जब पुन: नर की धड़कन अपनी सहज अवस्था में आ जाती है, तो सभी कोशिकाएँ और स्वर आभासित होने लग जाते हैं। परन्तु नर की धड़कन शीतल हो जाने (हिमवान) पर कोशिकाओं और स्वरों से उत्पन्न मान-सम्मान, बिनय व अहंकार के सब भाव विदा हो जाते हैं अर्थात् समस्त विकारों का नाश हो जाता है।
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए।।
जगत मातु पितु संभु भवानी । तेहिं सिंगा डिग्री न कहउँ बखानी।।
व्याख्या : उधर को जब विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती कैवल्य के उल्लास को प्राप्त करते हैं, तो सभी भाव सहज होकर अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं। विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती समस्त जगत को पैदा करने वाले हैं अर्थात् श्रद्धा और विश्वास के अनुसार ही सब भाव पैदा होते हैं और भावों के अनुसार ही जगत दिखायी पड़ता है, इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती और विश्वास रूपी शिव जगत के माता-पिता होते हैं। इसलिए उनके श्रृंगार अर्थात् भाव प्रक्रिया का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ।।
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।।
व्याख्या : जब श्रद्धा व विश्वास के भावों का कैवल्य अवस्था में प्रवेश हो जाता है, तब साधक सहज होकर सब भोगों का सहज क्रियाओं द्वारा भोग करने लगता है। उस अवस्था में साधक सहज होकर भोग भोगते हुए भी चेतना द्वारा कैवल्य (कैलाश) के उल्लास में ही मग्न रहता है। उसी को गणों सहित कैलाश पर रहना बताया गया है। उस कैवल्य के उल्लास में नित्य श्रद्धा व विश्वास के भाव रमण करने लगते हैं। इस प्रकार साधक का समय व्यतीत होने लगता है।
तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असु डिग्री समर जेहिं मारा।।
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकलजग जाना।।
व्याख्या : जब श्रद्धा व विश्वास के भाव कैवल्य (मुक्ति) के उल्लास में मग्न रहने लगते हैं, तब साधक के अन्दर काम, क्रोध, मद, लोभ व मत्सर के भावों को पराजित करने की क्षमता पैदा होती है। तब षटवदन अर्थात् षट् विकारों को खाने वाला षड़ानन रूपी पुत्र पैदा होता है। जब षटरिपु को साधक वश में कर लेता है, तब ही वह तारक अर्थात तारणहार बनने के दम्भ से मुक्त हो पाता है। उसी अवस्था को तारक असुर का मारना बोलकर बताया गया है। इस प्रकार षड़ानन अर्थात् कार्तिकेय रूपी शिव के पुत्र के जन्म को वेद, पुराण व शास्त्र सभी ने बताया है।
छ0 जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषार्थु महा।
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा।।
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं।।
व्याख्या : समस्त संसार षडानन (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह व मत्सर को खाने वाला) के जन्म, कर्म, प्रताप व पुरुषार्थ को जानता है। अर्थात् जब षटरिपुओं को वश में करने की क्षमता आ जाती है, तो उस अवस्था के यश व पुरुषार्थ को सभी लोग जानते हैं। इसलिए श्रद्धा व विश्वास से उत्पन्न षडानन रूपी पुत्र की कथा का यहाँ विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया गया है। इसलिए जो भी साधक श्रद्धा व विश्वास रूपी पार्वती-शिव के विवाह को गाते हैं अर्थात् साधना द्वारा श्रद्धा व विश्वास के भावों का मिलन कर लेते हैं, उनका सदैव कल्याण होता है व मंगल कार्य होते हैं।
दो0 चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारू।
बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गँवारू।।103।।
व्याख्या : तुलसीदास कहते हैं कि श्रद्धा व विश्वास के भावों के मिलन का चरित्र समुद्र की तरह अथाह होता है। अत: उसका वेद भी पार नहीं पा सकते हैं अर्थात् पूरी तरह अनुभूति का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा।।
बहु लालसा कथा परबाढ़ी। नयनहि नी डिग्री रोमावलि ठाढ़ी।।
व्याख्या : भरद्वाज ऋषि ने विश्वास रूपी शिव के सरस चरित को सुनकर बहुत सुख अनुभव किया और शिव चरित की कथा सुनने में रूचि और बढ़ गयी, जिससे आँखों में जल भर आया और आनन्द से शरीर के रोम ठाढ़े हो गए।
प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी।।
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव के चरित्र को सुनकर प्रेम पैदा हो जाता है, जिससे बोला नहीं जाता है। अत: ऐसी प्रेम की दशा देखकर मन का ज्ञान भाव हर्षित हो उठता है। तब मन का भाव धन्य हो जाता है, जब विश्वास रूपी शिव प्राणों के समान प्रिय लगने लगता है। जब साधक का विश्वास परमात्मा में दृढ़ हो जाता है, तब वह गो यानी इन्द्रियों का स्वामी (गौरीसा) हो जाता है। इसलिए विश्वास रूपी शिव को गौरीसा भी कहा जाता है।
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।।
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू।।
व्याख्या : जिनकी विश्वास रूपी शिव के चरणों में प्रीत नहीं होती है, वे परमात्मा को सपने में भी अच्छे नहीं लगते हैं। परन्तु बिना छल कपट के विश्वास रूपी शिव से प्रेम करना परमात्मा के भक्तों के लक्षण होते हैं।
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी।।
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई।।
व्याख्या : विश्वास के भाव के समान कौन परमात्मा के व्रत को धारण कर सकता है। जब परमात्मा में दृढ़ विश्वास हो जाता है, तो छल-कपट एकदम मिट जाता है। अत: दृढ़ विश्वास की अवस्था आने पर चातुर्य पूर्ण श्रद्धा का भी साधक त्याग कर देता है। उस समय विश्वास की दृढ़ता से ही परमात्मा की भक्ति प्राप्त हो जाती है। इसलिए विश्वास के भाव के समान परमात्मा को कोई भाव प्रिय नहीं होता है।
दो0 प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार।।104।।
व्याख्या : सबसे पहले मैंने विश्वास रूपी शिव के चरित्र को तुम्हें बता दिया है और तुम्हारा रहस्य समझ गया हूँ कि तुम परमात्मा के पवित्र सच्चे विकार रहित सेवक हो। साधक को जब ध्यान में विश्वास और श्रद्धा का रहस्य समझ में आ जाता है तो भीतर से पवित्रता आ जाती है और परमपिता के प्रति हृदय में अनुराग पैदा हो जाता है। उस समय जीवात्मा और परमात्मा में वार्तालाप शु डिग्री हो जाता है और साधक भरद्वाज अर्थात् विशुद्ध प्रकाश से भर जाता है और उसमें याज्ञवलक्य अर्थात परमविवेक पैदा हो जाता है। उसी अनुभूति को जनसाधारण को समझाने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया जाता है।
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपित लीला।।
सुनु मुनि आजु समागम तोरे। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरे।।
व्याख्या : परमविवेक रूपी याज्ञवलक्य कहते हैं कि मैंने तुम्हारे (विवेक रूपी भरद्वाज) गुण और शीलता को जान लिया है। अब तुम सुनो। मैं तुम्हें परमात्मा के लीला चरित्र का वर्णन करता हूँ। हे मुनि! आज तुम्हारे मिलने से जो सुख मन को हुआ है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।।
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।।
व्याख्या : परमात्मा के चरित्र अनन्त हैं, इसलिए करोड़ों शेष भी उसका वर्णन नहीं कर सकते हैं। करोड़ों शेष का मतलब वेदों के नेति नेति से ही है। ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं कहकर शेष बचे हुए को परमात्मा के रूप में समझाने का प्रयास वेदों द्वारा किया गया है। परन्तु इसी प्रकार करोड़ों शेष अर्थात नेति नेति करने पर भी परमात्मा का पूरी तरह वर्णन नहीं किया जा सकता है। परन्तु फिर भी मैं वाणी के स्वामी परमात्मा का स्मरण करके जो मैंने सुना है, उसका वर्णन करता हूँ।
सारद दारूनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी ।।
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।।
व्याख्या : स्वरों से उठने वाले सभी भाव परमात्मा की कठपुतली के समान होते हैं और आत्मा रूपी राम भावों के सूत्रधार की तरह होते हैं। जिस पर परमात्मा अपना दास समझकर कृपा कर देते हैं, उसके कवि हृदय में वाणी कठपुतली की तरह नाचने लगती है।
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।।
परम रम्य गिरिब डिग्री कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू।।
व्याख्या : इसलिए मैं परम कृपालु परमात्मा को प्रणाम करता हूँ और उनके विशाल गुणों का वर्णन करता हूँ। परम कैवल्य के उल्लास की अवस्था बहुत ही रम्य होती है, जहाँ पर विश्वास रूपी शिव और श्रद्धा रूपी पार्वती सदा निवास करते रहते हैं।
दो0 सिद्ध तपोधन जोगि जन सुर किंनर मुनिबृंद।
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद।।105।।
व्याख्या : जब साधक के श्रद्धा व विश्वास के भाव कैवल्य अवस्था (मुक्ति) में पहुँच जाते हैं, तो साधक को सिद्धियाँ मिल जाती है और तप का धन प्राप्त हो जाता है और स्वरों के माध्यम से मन के भाव परमात्मा में लग जाते हैं, जिससे साधक अच्छे कार्य करने की प्रवृति से युक्त हो जाता है। उस अवस्था में सुख का मूल मिल जाता है, जिससे परमात्मा के प्रति विश्वास और दृढ़ हो जाता है।
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।।
तेहि गिरि पद बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला।।
व्याख्या : कैवल्य प्राप्ति की अवस्था में वे नर (मनुष्य) कभी नहीं जा सकते हैं, जिनकी हरि-हर के धर्म में रूचि नहीं होती है। इस चौपाई में गम्भीर साधना का रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि जब तक माया के भावों के हरण (हर) की क्षमता नहीं आती है और साधक जब तक माया के भावों को हरने वाला (हरि) नहीं बन जाता है, तब तक नर (नड़) की धड़कन सपने में भी कैवल्य प्राप्ति (कैलाश निवास) की अवस्था में नहीं पहुँच पाती है। जब कैवल्य की अवस्था में नर की धड़कन पहुँच जाती है, तो वह एकदम सहज हो जाती है और वहाँ बट वृक्ष की तरह स्थिर हो जाती है, जिसमें से नित्य नये प्रकार से भक्ति का रस निकलने लग जाता है।
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया।।
एक बार तेहि पर प्रभु गयऊ। त डिग्री बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।।
व्याख्या : जब नर की धड़कन सहज होकर कैवल्य अवस्था में होती है तब सत, रज व तम गुणों की हवा सहज हो जाती है, जिससे गुण-गुणों में बरतने लगते हैं और शान्ति रूपी छाया छा जाती है। उस अवस्था में विश्वास रूपी शिव परमात्मा में दृढ़ हो जाते हैं। उसी विश्वास की दृढ़ता को वेदों में बट वृक्ष कहा गया है। एक बार विश्वास रूपी शिव उसी बट वृक्ष के नीचे गए और नर (धड़कन) के मूल रूपी बटवृक्ष को देखकर बहुत सुख का अनुभव किया।
निज कर डासि नाग रिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला।।
कुंद इंदु दर गौर सरीरा । भुज प्रलंब परिधन मुनि चीरा।।
व्याख्या : उस बट वृक्ष के नीचे नागरिपु अर्थात वासनाओं का शत्रु रूपी आसन लगाकर सहज होकर विश्वास रूपी शिव दृढ़ होकर बैठ गए। उस समय समस्त इन्द्रियाँ सिमट गयी (कुंद इन्दु) और केवल शरीर का आभास (गौर) मात्र रह गया। उस अवस्था में मन के भावों से उत्पन्न प्रकृति (परिधन) का हरण हो गया और विश्वास के भाव को परमात्मा का आधार मिल गया।
तरून अरून अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।।
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।
व्याख्या : उस समय ऐसा आभास होता है कि परमात्मा के चरण पूर्ण खिले हुए कमल के समान हैं और परमात्मा के चरणों की चमक भक्त (साधक) के हृदय के अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करने वाली है। उस समय ऐसा लगता है, मानो तीनों गुणों को जीत लिया हो और वासनारूपी नाग भस्म होकर भभूति बन गए हों। उस समय लगता है, मानो परमात्मा का मुख शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान हो।
दो0 जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल।
नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल ।।106।।
व्याख्या : उस समय ध्यान में आभासित होता है कि सिर पर जटाओं का मुकुट है और स्वरों रूपी नदियाँ सिर से निकल रही है, जिनसे नेत्र रूपी कमलनि खिलती है। उस समय बाल भाव का भी आभास होता है, जो चन्द्रमा की तरह शीतलता देने वाला होता है। इसलिए उसे ही ललाट पर चन्द्रमा होना बताया जाता है। वह अवस्था जिसमें वासनाएँ कण्ठ में धारण कर ली जाती हैं अर्थात् इन्द्रियाँ भोगों में नहीं फँसती हैं, वह सुन्दरता का समुद्र होती है।
बैठे सोह कामरिपु कैसें । धरें सरी डिग्री सांतरसु जैसे।।
पारबती भल अवस डिग्री जानी। गईं संभु पहिं मातु भवानी।।
व्याख्या : वह काम के शत्रु की अवस्था ऐसी लगती है, जैसे शान्ति का रस मानों शरीर को धारण करके बैठा हो। अत: प्रकृति से परे वाली श्रद्धा रूपी पार्वती अच्छा समय जानकर विश्वास रूपी शिव के पास गयी।
जानि प्रिया आद डिग्री अतिकीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।।
बैठीं सिव समीप हरषाई । पुरूब जन्म कथा चित आई।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव ने श्रद्धा के भाव को अति प्रिय जानकर आदर किया और बाएँ तरफ बैठने काआसन दिया। श्रद्धा रूपी पार्वती प्रसन्न होकर विश्वास रूपी शिव के पास बैठ गयी, तो तुरन्त पूर्व जन्म की कथा चित में आ गयी। मैंने पहले भी बताया है कि भाव चाहे कितना भी सूक्ष्म हो, उसमें चित व चेतना दोनों ही होते हैं। अत: श्रद्धा के भाव के चित में तुरन्त पूर्व अवस्था की चेतना आ गयी।
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोली प्रिय बानी।।
कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैल कुमारी।।
व्याख्या : विश्वास रूपी पति के हृदय में प्रेम की अधिकता जानकर श्रद्धा रूपी पार्वती हँसकर बोली कि मैं शैल कुमारी अर्थात् कोशिकाओं से उत्पन्न श्रद्धा रूपी पार्वती आप से समस्त लोकों का हित करने वाली परमात्मा की कथा सुनना चाहती हूँ।
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।।
चर अ डिग्री अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।
व्याख्या : विश्वास का भाव ही विश्वनाथ होता है क्योंकि जैसा जीव का विश्वास होता है, उसे संसार वैसा ही दिखायी देता है। विश्वास के भाव की तीनों गुणों से उत्पन्न भावों में (त्रिभुवन) विशेष महिमा होती है। चर, अचर, नाग, मनुष्य व देव भाव सभी विश्वास के चरण कमलों की सेवा करते हैं अर्थात् विश्वास के भाव के अनुसार ही व्यवहार करते हैं। इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं हे विश्वनाथ! आप देह भाव के शत्रु (पुर अ अरि उ पुरारि) हैं और आपकी महिमा तीनों प्रकार के भावों में होती है। जड़-चेतन, नर, नाग व देवता सभी आपकी सेवा करते हैं।
दो0 प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपत डिग्री नाम।।107।।
व्याख्या : हे सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ प्रभु! आप समस्त कलाओं व गुणों का घर हैं (अर्थात् विश्वास के भाव से ही सब कला और गुण पैदा होते हैं। आप (अर्थात विश्वास) योग, ज्ञान व वैराग्य का समुद्र हैं तथा कल्पना का मूल भी आप ही हैं।
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।
तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।।
व्याख्या : अत: हे प्रभु! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझको (अर्थात् श्रद्धा के भाव को) अपनी दासी जानकर मेरे अज्ञान को दूर कर दीजिए और नाना प्रकार से परमात्मा की कथा को कहिए।
जासु भवनु सुर त डिग्री तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।।
ससि भूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं कि जिसका घर कल्पत डिग्री के नीचे होता है, वह क्या दरिद्रता का दु:ख पाता है? अर्थात् वह दरिद्र नहीं रह सकता है। यौगिक दृष्टि से इस चौपाई का बहुत गहरा रहस्य है। सुर त डिग्री का वास्तविक संकेत नर की धड़कन के मूल से होता है, जहाँ से स्वरों की उत्पत्ति होती है। स्वरों की उत्पत्ति का स्थान ही सुरत डिग्री तर होता है क्योंकि स्वरों से ही कल्पना पैदा होती हैं इसलिए इसे कल्पत डिग्री अर्थात कल्पना का मूल भी कहा जाता है। जो साधक कल्पत डिग्री अर्थात कल्पना के मूल को जान लेता है, वो परम ज्ञान की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। उसी अवस्था को शशि भूषण अर्थात् वासनाओं का शान्त होना कहा जाता है। उसी वासना शान्ति की अवस्था को शशिभूषण धारण करना कहा जाता है। अत: हे विश्वास रूपी स्वामी! आप मेरी बुद्धि के भ्रम को दूर कर दीजिए।
प्रभु जे मुनि परमारथ बादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।।
सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।।
व्याख्या : हे प्रभु! जो लोग परम अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं, वे राम को अनादि ब्रह्म कहते हैं। शेष, शारदा, वेद व पुराण भी सभी राम के गुणों का बखान करते हैं। राम का तात्पर्य यहाँ आत्मा के बल से ही है। आत्मा का बल ही अनादि ब्रह्म होता है। साधारण बोलचाल की भाषा में भी शरीर के बल को समझाने के लिए राम बोला जाता है। जैसे हाथ-पैरों में राम होना, राम नहीं होना साधारणत: बोला जाता है।
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती ।।
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलख गति कोई।।
व्याख्या : हे काम के शत्रु! आप रात-दिन राम राम जपते रहते हैं। वो राम क्या अवधी रूपी शरीर के नर अ पति उ नृपति हैं अर्थात शरीर स्थित नर की धड़कन हैं या नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण हैं। या फिर वो राम अजन्मा, अगुण व अलख गति वाले कोई हैं।
दो0 जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
व्याख्या : अगर राम नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण हैं, तो फिर शरीर में स्थित नाड़ी से कैसे विरह होकर माया पैदा हो जाती है। नर व नाड़ी के चरित को देखकर व सुनकर मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है। प्रारम्भ में सभी साधकों को यह सवाल परेशान करता रहता है कि राम आत्मा हैं या प्राण हैं या ब्रह्म हैं। आखिर नर की धड़कन ही राम हैं, तो फिर प्राण कैसे पैदा होते हैं और प्राण ही अगर राम हैं तो फिर माया कैसे पैदा हो जाती है। परन्तु ज्यों-ज्यों साधना परिपक्व हो जाती है त्यों-त्यों समाधान मिलता चला जाता है।
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।।
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।।
व्याख्या : जो इच्छा रहित, व्यापक व समर्थ ब्रह्म अगर कोई और है, तो उसे मुझे समझाकर कहिए। मुझे अज्ञानी समझकर मुझ पर क्रोध मत कीजिए और जिस भी विधि से मेरा मोह मिट जाए, वो कीजिए।
मैं बन दीखि राम प्रभुताई । अतिभय बिकल न तुम्हहि सुनाई।।
तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा।।
व्याख्या : मैंने राम की प्रभुता को देखा अर्थात जब श्रद्धा का भाव परमात्मा में लग जाता है, तो भावों के अनुसार परमात्मा की प्रभुता की झलक मिल जाती है परन्तु बिना दृढ़ विश्वास के वह अनुभव गम्य नहीं हो पाता है। इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं कि मैंने मैं बनकर अर्थात् चातुर्य पूर्ण श्रद्धा से राम की प्रभुता को देखा परन्तु देखकर भय से व्याकुल होने के कारण विश्वास रूपी शिव को नहीं बताया। उस समय मेरे मन में मलिनता थी इसलिए परमात्मा बोधगम्य नहीं हो पाए। इसलिए उस भूल का फल मैंने भली प्रकार पा लिया है।
अजहूँ कछु संसउ मन मोरें। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।।
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं कि मुझ पर कृपा कीजिए। विश्वास रूपी स्वामी आपने तो मुझे पहले भी समझाने का प्रयास किया था। अत: अब ऐसा जानकर मुझ पर क्रोध मत कीजिए।
तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रूचि मन माहीं।।
कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा।।
व्याख्या : अब मुझे पहले जैसा मोह नहीं है और अब मेरी राम की कथा सुनने की मन में इच्छा भी है। अत: आप पवित्र राम की कथा के गुणों का बखान कीजिए। आपने (विश्वास रूपी शिव ने) तो भु अ जग अ राज अर्थात् भावों के संसार को अपने वश में कर रखा है और भावों से उत्पन्न भू अ इषन अर्थात् भावों से उत्पन्न इच्छाओं को भी वश में करके स्वरों (सुर) को भी जीत रखा है।
दो0 बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्दांत निचोरि।।109।।
व्याख्या : इसलिए मैं आपके चरणों में जमीन पर सिर रखकर प्रार्थना करती हूँ कि मुझे परमात्मा के विशुद्ध यश की गाथा को जैसा वेदों में सुनने में आया है, वह निचोड़ कर बता दीजिए। इस दोहे में साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। मैं शरीर (धरनि) को धारण करने वाली प्राण शक्ति को सिर में धारण करके परमात्मा के चरित को जानना चाहती हूँ। वास्तविकता में जब ध्यान द्वारा प्राण शक्ति सिर में स्थिर हो जाती है, तब श्रद्धा का भाव नाना प्रकार से परमात्मा के रहस्य को जानना चाहता है। उसी को यहाँ शिव पार्वती के संवाद के रूप में लिखा गया है।
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।
गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।।
व्याख्या : हालाँकि जो अ ईषता अर्थात जब तक कुछ चाह होती है, तब तक साधक का श्रद्धा भाव परमतत्व को जानने का अधिकारी नहीं होता है। परन्तु मन, वचन व कर्म से विश्वास रूपी शिव के अधीन हो जाने पर साधना में लगे रहने से गूढ़ तत्व का रहस्य समझ में आ जाता है।
अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।।
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।।
व्याख्या : हे भाव रूपी देवताओं के स्वामी! मैं (श्रद्धा) बहुत ही दीनता अर्थात् समर्पण के साथ आपसे परमात्मा की कथा जानना चाहती हूँ। इसलिए पहले तो यह बताइये कि परमपिता गुणों से निर्लिप्त होते हैं, तो यह शरीर कैसे धारण करते हैं।
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा।।
कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।।
व्याख्या : पहले तो प्रभु यह बताइये कि शरीर में राम का अवतरण कैसे होता है और फिर राम (आत्मा, ब्रह्म, प्राण जो भी कहें) के शुरुआती (बाल चरित) चरित्र बताइये। फिर जानकी अर्थात् प्राणशक्ति से आत्मा रूपी राम का कैसे मिलन होता है और फिर किन कारणों से आत्मा रूपी राम और प्राणशक्ति रूपी सीता अलग होते हैं, को बताइये।
बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।।
राज बैठि कीन्ही बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखसीला।।
व्याख्या : फिर शरीर रूपी वन में राम ने क्या-क्या चरित किए हैं, को बताइये तथा काम रूपी रावण को कैसे मारा, वो भी बताइये। सहज अवस्था में आत्मा रूपी राम क्या-क्या चरित करते हैं। हे शंकाओ का नाश करने वाले शंकर! वो सब बताइये।
दो0 बहुरि कहहु करूनायतन कीन्ह जो अचरज राम।
प्रजा सहित रघुबंस मनि किमि गवने निज धाम।।110।।
व्याख्या : हे करूणा के धाम! फिर आश्चर्य चकित करने वाले चरित का वर्णन कीजिए कि किस प्रकार समस्त भावों सहित आत्मा रूपी राम अपने धाम अर्थात् सहज अवस्था में पहुँचते हैं।
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहि बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।।
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।।
व्याख्या : हे प्रभु! पुन: आप परम तत्व का वर्णन कीजिए, जिसके विज्ञान में ज्ञानी मुनि मग्न रहते हैं। भक्ति, ज्ञान, विज्ञान व वैराग्य क्या हैं? इन सबके अन्तर को समझा दीजिए।
औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका।।
जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।।
व्याख्या : परमात्मा के तो और भी अनेक चरित हैं, अत: हे नाथ! निर्मल विवेक द्वारा मुझे समझा दीजिए। हे कृपालु! जो कुछ मैंने पूछा नहीं भी हो, तो वो भी बता दीजिए।
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।।
प्रश्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई।।
व्याख्या : विश्वास का भाव त्रिभुवन अर्थात् तीनों प्रकार के सत, रज व तम भावों का गुरु होता है। अर्थात् जैसा विश्वास होता है, वैसे ही भाव क्रिया करते हैं, इसलिए विश्वास रूपी शिव को जगत गुरु कहा जाता है। इसलिए विश्वास के भाव के अलावा दूसरे भाव परमात्मा के रहस्य को नहीं जान पाते हैं। श्रद्धा रूपी पार्वती के मन में ये सब प्रश्न सहजता से ही आते हैं, अत: निष्कपटता को देखकर विश्वास रूपी शिव को बहुत पसन्द आते हैं।
हर हियँ राम चरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए।।
श्री रघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।
व्याख्या : जब श्रद्धा का भाव विश्वास के सामने पूरी तरह समर्पण कर देता है, तो विश्वास रूपी शिव के हृदय में राम अर्थात् परमात्मा का चरित प्रकट हो जाता है, जिससे प्रेम की पुलकावलि छा जाती है और आँखों में प्रेम के आँसू झलक आते हैं। उस अवस्था में परमात्मा का स्वरूप साधक के हृदय में आ जाता है, जिससे परमानंद की अवस्था प्राप्त करके साधक परम सुख को प्राप्त कर लेता है।
दो0 मगन ध्यान रस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।।
रघुपति चरति महेस तब हरषित बरनै लीन्ह।।111।।
व्याख्या : साधक का दो घड़ी के ध्यान के रस में मग्न होकर जब मन पुन: बाहर आता है, तो महाऐश्वर्य को प्राप्त साधक परमात्मा के चरित को हर्षित होकर नाना प्रकार से बखान करने लगता है। परम पथ की यात्रा में प्रत्येक साधक को इसका अनुभव होता है। तब तो साधक में इतना उत्साह आ जाता है कि वह जोर करके भी परमात्मा के चरित का वर्णन करने लगता है।
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।।
जेहि जाने जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई।।
व्याख्या : परमात्मा को बिना जाने झूठा भी सत्य सा प्रतीत होता है, जैसे रस्सी में भ्रमवश सर्प का आभास हो जाता है और जानने पर भ्रम मिट जाता है। उसी प्रकार परमात्मा को जाने बिना यह संसार झूठा होते हुए भी सत्य सा लगता है परन्तु जब परमात्मा का चरति हृदय में समझ आ जाता है, तो संसार का अस्तित्व ही मिट जाता है, जैसे जागने पर सपने का प्रभाव मिट जाता है।
बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू।।
मंगल भवन अमंगलहारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी।।
व्याख्या : इसलिए बाल स्वरूप राम को मैं नमन करता हूँ। बाल रूप का तात्पर्य चित की मूल अवस्था से होता है क्योंकि ज्यों-ज्यों चित की धड़कन से प्राण पैदा होकर भाव पैदा करते रहते हैं, वैसे-वैसे माया का आवरण बढ़ता चला जाता है। इसलिए चित की मूल अवस्था ही परमात्मा का बाल रूप कही जाती है। चित की मूल अवस्था ही सहज में ही सब सिद्धियों व सुखों को देने वाली होती है। चित की मूल अवस्था में पहुँचना ही अजपा नाम की अवस्था होती है। वह चित की मूल अवस्था अर्थात् परमात्मा का बाल रूप मंगल को करने वाला व अमंगल को दूर करने वाला होता है। चित की मूल अवस्था में पहुँचने पर दसरथ अर्थात् दसों इन्द्रियाँ द्रवित हो जाती हैं अर्थात् इन्द्रियाँ मन में विलीन होकर चित की मूल अवस्था में समाहित हो जाती हैं। परमात्मा का वह बाल रूप अजिर अर्थात् चित के मूल में विहार करता है।
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी।।
धन्य धन्य गिरिराज कुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव ने चित की मूल अवस्था में आत्मा रूपी राम को प्रणाम करके हर्षित होते हुए अमृत के समान वाणी बोली कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम धन्य हो और तुम्हारे समान दूसरा कोई उपकार करने वाला नहीं है। क्योंकि बिना श्रद्धा के भाव के चित की मूल अवस्था में प्रवेश ही नहीं हो पाता है।
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा।।
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रश्न जगत हित लागी।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुमने परमात्मा की कथा के बारे में जानना चाहा है, जो समस्त लोकों को पवित्र करने के लिए पवित्र गंगा के समान है। तुम परमात्मा के चरणों में अनुराग रखने वाली हो। इसलिए तुमने जगत के कल्याण के लिए प्रश्न किया है।
दो0 रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं।।112।।
व्याख्या : विश्वास रूप शिव श्रद्धा रूपी पार्वती को कहते हैं कि राम की कृपा से तुम्हारे मन में मेरे विचार से सपने में भी शोक, मोह व भ्रम नहीं हैं। क्योंकि जब श्रद्धा का भाव पूरी तरह विश्वास के भाव के साथ परमात्मा में लीन होने लग जाता है, तब माया के विकार कैसे रह सकते हैं।
तदपि असंका कीन्हिहु सोई । कहत सुनत सब कर हित होई।।
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम्हारे मन में शंका नहीं है फिर भी तुमने शंका की है परन्तु तुम्हारी शंका के बारे में जो भी सुनेंगे व कहेंगे उन सबका भला होगा। क्योंकि तुमने परमात्मा को जानने के लिए शंका की है और मैं तुम्हें शंका समाधान करवाऊँगा, जिससे सुनने व कहने वाले सभी का कल्याण होगा। वास्तव में जब श्रद्धापूर्वक हृदय में जिज्ञासा का भाव पैदा हो जाता है, तो साधक का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। जिन लोगों ने परमात्मा की कथा को नहीं सुना है, उनके कान तो सर्प के बिल के समान समझने चाहिये।
नयनहिं संत दरस नहिं देखा। लोचन मोर पंख कर लेखा।।
ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला।।
व्याख्या : जिनके नयनों ने संत के दर्शन नहीं किए, वो तो मोर पंख की तरह समझो। और जो सिर परमात्मा व गुरु के चरणों में नहीं झूकता है, उसे तो कड़वी तूम्बी की तरह मानना चाहिये।
जिन्ह हरि भगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी।।
जे नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुरु जीह समाना।।
व्याख्या : जिनके हृदय में परमात्मा की भक्ति नहीं होती है, वे जीव तो मुर्दे के समान होते हैं, और जो लोग राम का गुणगान नहीं करते हैं, उनकी जीभ्या तो मेढ़क के समान समझनी चाहिये।
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरि चरित न जो हरषाती।।
गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुरहित दनुज बिमोहन सीला।।
व्याख्या : जिनका हृदय परमात्मा के चरित को सुनकर हर्षित नहीं होता है, उन्हें निष्ठुर हृदय वाले समझना चाहिये। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आप राम के चरित को सुनिए, जो सुरहित अर्थात् सात्विक भावों का कल्याण करने वाला और असुर भावों को मोहित करने वाला होता है।
दो0 रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।
सत समाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि।।113।।
व्याख्या : परमात्मा की कथा कामधेनु के समान होती है, जिसकी साधना करने पर सब सुखों की खान मिल जाती है। इसलिए सात्विक समाज अर्थात् सतोंगुणी भाव और स्वरों द्वारा रचित शरीर स्थित सब लोकों में ऐसा कोई भी सात्विक भाव नहीं है, जो परमात्मा की कथा को नहीं सुनना चाहे।
रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उड़ावनि हारी।।
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराज कुमारी।।
व्याख्या : राम की कथा सुंदर तालियों के समान होती है, जो संशयरूपी पक्षियों को उड़ा देती है। राम कथा कलियुग रूपी वृक्ष को काटने के लिए कुठार की तरह है। अत: हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम आदरपूर्वक सुनो।
राम नाम गुन चरित सुहाए। जन्म करम अगनित श्रुति गाए।।
जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन गाना।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के गुणों का जो चरित होता है वो जो जन्म व कर्म के अनुसार अनगिनत होते हैं। आत्मा रूपी राम अनन्त हैं, वैसे ही उनकी कीर्ति व यश की गाथा भी अनन्त हैं।
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी।।
उमा प्रश्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैंने जो परमात्मा के बारे में सुना है, उसे तुम्हारी प्रीत देखकर मेरी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ। तुम्हारे प्रश्न सहज हैं और ये प्रश्न सुखद व संत मत के अनुकूल है, इसलिए मुझे अच्छे लगे हैं। जब साधक की साधना प्रगाढ़ होने लगती है, तो साधक का श्रद्धा भाव सहज में ही जानना चाहता है कि परमात्मा का नाम व रूप क्या है? तथा परमात्मा के लीला चरित क्या हैं? जब साधक के मन में ये प्रश्न उठने लग जाते हैं, तो साधक को इनका उत्तर खोजने में सुख की अनुभूति होने लग जाती है।
एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी।।
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परन्तु मुझे तुम्हारी एक बात अच्छी नहीं लगी हालाँकि तुमने अज्ञान वश ही ऐसा कहा है कि राम कोई और शक्ति हैं या फिर वेद बताते हैं और मुनि लोग ध्यान करते हैं, वे हैं। जब परमात्मा में विश्वास दृढ़ हो जाता है, तो एक परमात्मा के अलावा संसार में दूसरा कोई नहीं बचता है। इसलिए यहाँ विश्वास रूपी शिव यही कह रहे हैं कि जब परमात्मा एक हैं, तो दूसरा कोई कैसे हो सकता है?
दो0 कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।।114।।
व्याख्या : परमात्मा को दूसरा कहने और सुनने वाले लोग अधम प्रकृति के होते हैं, जो मोह रूपी पिशाच से ग्रस्त होते हैं। ऐसे लोग पाखण्ड करने वाले और परमात्मा के विमुख काम करने वाले होते हैं। जो सही और गलत में अन्तर नहीं जान पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा से भिन्न संसार में कुछ भी नहीं हो सकता है।
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकुर मन लागी।।
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संत सभा नहिं देखी।।
व्याख्या : जो अज्ञानी, मूर्ख, अंध व भाग्यहीन हैं और जिनके मन रूपी दर्पण पर विषय रूपी काई लगी हुई है, वे ही परमात्मा को भिन्न मानते हैं। जो लंपट, कपटी व कुटिल होते हैं और कभी संत जनों का संग नहीं किया है, वे ही परमात्मा को भिन्न व दूसरा मानते हैं।
कहहिं ते बेद असंमत बानी । जिन्ह के सूझ लाभु नहिं हानी।।
मुकुर मलिन अ डिग्री नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना।।
व्याख्या : ऐसे अज्ञानी लोग ही वेद विरूद्ध बातें करते हैं, जो अपना हित-अनहित नहीं समझते हैं, जिनका हृदय रूपी दर्पण मलिन है और जो आँखों के अंधें हैं, वे कैसे राम के रूप को हृदय में देख सकते हैं।
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
व्याख्या : जो लोग निर्गुण और सगुण का विवेक नहीं कर पाते हैं, वे लोग ही परमात्म के बारे में नाना कल्पनाएँ करते हैं। जो परमात्मा की माया के कारण संसार में भ्रमित फिरते हैं, उनके लिए कुछ भी कह डालना असम्भव नहीं होता है।
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना।।
व्याख्या : जो लोग प्राण वायु को वश में नहीं कर पाते हैं, उनके भूत तत्व वायु के प्रभाव में विवश होकर मतवाले हो जाते हैं। इसलिए वे बिना विचार किए बोलते रहते हैं। भाव विज्ञान के अनुसार जब प्राण वायु निर्मल होती है, तो विवेक के भाव पैदा होकर परमात्मा की भक्ति पैदा करते हैं। परन्तु प्राण वायु अगर निर्मल नहीं होती है, तो चित की धड़कन से निकलने वाले रसायन माया के भाव पैदा कर देते हैं। और जब माया के भावों का प्रभाव हो जाता है, तो जीव विचारकर नहीं बोल पाता है। उन्हीं अविचारपूर्वक भावों से मोह व मद आदि के कुभाव पैदा हो जाते हैं। अत: ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिये।
सो0 अस निज हृदयँ बिचारी तजु संसय भजु राम पद।
सुनु गिरिराज कुमारी भ्रम तम रबि कर बचन मम।।115।।
व्याख्या : अत: हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम स्वयं के हृदय में ऐसा विचार करके सब संशयों का त्याग कर दो। यानी परमात्मा एक हैं, दूसरा कोई नहीं हो सकता है और प्राण की शुद्धता-अशुद्धता के अनुसार भाव-कुभाव पैदा होते हैं। हे पार्वती! मेरे ये वचन अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य के समान हैं।
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।
व्याख्या : वेद, पुराण व विद्वान लोग यही बताते हैं कि सगुण व निर्गुण में कोई अन्तर नहीं होता है। जिस परमात्मा को निर्गुण, अरूप, अलख व अजन्मा कहा जाता है, वही परमात्मा भक्त के भावों के प्रेम के अनुसार गुणों सहित प्रकट हो जाता है। अर्थात् परमपिता परमात्मा हैं तो एक ही शक्ति, परन्तु भक्तों की भावना के अनुसार भावों के गुणों के अनुरूप प्रकट हो जाते हैं।
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसे।।
जासु नामु भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा।।
व्याख्या : जो निर्गुण है, वो सगुण वैसे ही हो जाते हैं, जैसे जल से बर्फ अलग नहीं है, वैसे ही निर्गुण से सगुण अलग नहीं होता है। जिस परमात्मा का नाम भ्रम रूपी अंधकार पतंगे को मिटाने के लिए सूर्य के समान होता है। वहाँ मोह का प्रसंग कैसे हो सकता है। अर्थात् जब परमात्मा तत्व का ज्ञान हो जाता है और सगुण-निर्गुण का भेद मिट जाता है। वहाँ भ्रम रूपी अंधकार भी स्वत: मिट जाता है।
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा।।
सहज प्रकास रूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना।।
व्याख्या : परमात्मा राम तो सत्चित आनन्द रूपी सूर्य हैं, जहाँ पर मोह रूपी रात्री का नामोनिशान नहीं होता है। परमात्मा तो सहज प्रकाश स्वरूप होते हैं तथा वहाँ पर विज्ञान भी नहीं होता है। अर्थात् परमात्मा ज्ञान-विज्ञान दोनों से परे हैं।
हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना ।।
व्याख्या : हर्ष, विषाद, ज्ञान-अज्ञान, अहंकार व अभिमान ये सब तो जीव के धर्म हैं। राम तो ब्रह्म, सर्वव्यापक, परमानन्द स्वरूप, प्रकृति के ईश्वर (पर अ ईष) व पुराण पुरुष हैं, इस बात को सारा संसार जानता है।
दो0 पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।
रघुकुल मनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ।।116।।
व्याख्या : जो पुरुष प्रकृति को वश में किए (प्रकृति अ सिद्ध) हुए हैं और प्रकाश के समुद्र हैं तथा परावर उ पर अ अवर अ नाथ अर्थात् जो माया और जीव के स्वामी हैं, वे ही मेरे स्वामी हैं, ऐसा कहकर विश्वासरूपी शिव ने अपना सीस झुकाकर नमस्कार किया।
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।।
जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहि कुबिचारी।।
व्याख्या : अज्ञानी लोग अपने स्वयं के अज्ञान को नहीं समझते हैं और उल्टा परमात्मा पर आरोप लगाते हैं। जैसे बादलों का पटल देखकर अज्ञानी लोग कहते हैं कि बादलों ने सूर्य को ढँक लिया। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे सूर्य को कभी भी बादल नहीं ढँक सकते हैं, वैसे ही परमात्मा को काम, क्रोध आदि माया के विकार प्रभावित नहीं कर सकते हैं।
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ।।
उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।।
व्याख्या : अगर कोई अंगुली आँखों के बीच में लगाकर देखता है तो उसे दो चन्द्रमा दिखायी पड़ते हैं। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा राम के बारे में मोह की कल्पना करना वैसे ही है जैसे आकाश में अन्धकार, धूल और धुआँ का दिखायी देना। जैसे आकाश निर्मल और निर्लेप होता है, वैसे ही परमात्मा में भी मोहादि के विकार नहीं होते हैं। परन्तु अज्ञानताश लोग परमात्मा में माया के विकारों का आरोपण करते हैं।
विषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता।।
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपित सोई।।
व्याख्या : विषय, इन्द्रियाँ, स्वर व जीव सब एक से एक सचेत होते हैं अर्थात् विषय, इन्द्रियों, स्वर और जीव का चक्र चालू होने पर एक दूसरा-एक दूसरे को बल प्रदान करता रहता है। परन्तु इन सब को जो प्रकाशित करने वाली शक्ति है, वही अनादि राम हैं, जो अवधी रूपी शरीर के स्वामी हैं।
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।।
जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।
व्याख्या : यह समस्त जगत प्रकाशित होने वाला है और राम इस को प्रकाशित करने वाले हैं। राम तो माया के स्वामी, ज्ञान व गुणों के घर हैं। जिस परमात्मा की सत्ता से जड़ माया भी मोह की सहायता से सत्य सी आभासित होने लग जाती है।
दो0 रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि।।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।
व्याख्या : जैसे सीप में चाँदी का और सूर्य की किरणों में पानी का आभास होता है, हालाँकि यह पानी का आभास तीनों कालों में मिथ्या होता है, फिर भी कोई टाल नहीं सकता है।
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।
जौं सपने सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।।
व्याख्या : इसी प्रकार यह समस्त जगत परमात्मा में आभासित होता है। हालाँकि यह असत्य होता है परन्तु दु:ख देने वाला होता है। जैसे सपने में कोई सिर काट ले तो बिना जागे सिर कटने का दुख दूर नहीं होता है। वैसे ही परमात्मा में मिथ्या आभासित संसार के दु:ख भी जब तक ज्ञान नहीं होता तब तक दूर नहीं होते हैं।
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।।
आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमान निगम अस गावा।।
व्याख्या : जिसकी कृपा से ऐसा भ्रम मिट जाता है, हे श्रद्धा रूपी पार्वती! वही परमात्मा हैं। जिसका आरम्भ व अंत किसी ने नहीं जाना है। केवल अपनी बुद्धि के अनुसार वेदों ने बताया है।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
व्याख्या : वह परम शक्ति तो बिना पैरों के चलने वाली, बिना कानों के सुनने वाली व बिना हाथों के ही नाना प्रकार के कर्म करने वाली होती है। वह शक्ति बिना मुख के ही समस्त रसों का भोग भोगती है तथा बिना वाणी के ही बोलने में सिद्धस्त होती है।
तन बिनु परसु नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।
व्याख्या : वह बिना शरीर के ही स्पर्श करती है तथा बिना आँखों के ही देखने में समर्थ होती है। वह परमशक्ति बिना नाक के ही सुगन्ध ग्रहण कर लेती है। उसकी सब प्रकार से अलौकिक करनी होती है, अत: उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
दो0 जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।।118।।
व्याख्या : जिसे अकथनीय, अनादि, अगाध इस प्रकार कहकर वेद व विद्वान लोग बताते हैं और मुनि जन जिसका ध्यान करते हैं। वह परमशक्ति दस इन्द्रियों के रथ को संचालित करने वाली व भक्तों का कल्याण करने वाली है तथा वही शक्ति शरीर रूपी कोशल देश की स्वामी है।
कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।
व्याख्या : जिसके नाम के बल से काशी में मरते हुए प्राणियों को देखकर मैं शोक रहित कर देता हूँ, वे परमपिता परमेश्वर ही मेरे स्वामी है और सब जीवों के घट-घट की जानने वाले अन्तर्यामी हैं।
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।
सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
व्याख्या : विवशता में भी जो लोग परमात्मा का नाम जपते हैं, उनके भी अनेक जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। परन्तु जो लोग आदरपूर्वक सुमिरण करते हैं, वे तो भावों के समुद्र को पार कर जाते हैं और गो अ पद अर्थात् इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं।
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।।
अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! राम ही परमात्मा हैं। अत: जिनको इस बात में संशय होता है, वे ही झूठी बात करतें हैं। जो लोग राम को परमात्मा मानने में संशय करते हैं, उनके ज्ञान व वैराग्य के सब गुण चले जाते हैं। वास्तविकता में आत्मा ही राम होता है और जब आत्मा पूरी तरह माया के आवरणों से मुक्त हो जाती है, तो वह परमात्मा हो जाती है। अत: इसमें संशय नहीं करना चाहिये।
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।।
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारून असंभावना बीती ।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव के भ्रम नाशक वचनों को सुनकर श्रद्धा रूपी पार्वती के सब कुतर्कों का अन्त हो गया। कुतर्क मिट जाने पर परमात्मा के चरणों में अटूट प्रेम पैदा हो गया और अज्ञान का भय मिट गया।
दो0 पुनि-पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरूह पानि।
बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।
व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती बार-बार कमल रूपी हाथों को जोड़कर विश्वास रूपी स्वामी के चरणों में झूक गयी और प्रेम में सनी हुई वाणी बोलीं।
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।।
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ।।
व्याख्या : हे विश्वास रूपी स्वामी! आपके चन्द्रमा के समान शीतल वचनों को सुनकर मेरे मोह का ताप मिट गया है। आप तो कृपालु हैं। अत: मेरे सब संशय मिटा दिए हैं। मुझे आप आत्मा रूपी राम के रूप में ही दिखायी पड़ रहे हैं।
नाथ कृपा अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।।
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अय़ानी।।
व्याख्या : हे प्रभु! आपकी कृपा से मेरा विषाद मिट गया है और आपके चरणों की कृपा से मैं अब सुखी हो गयी हूँ। यहाँ पर श्रद्धा रूपी पार्वती विश्वास रूपी शिव के सामने पूर्ण रूप से समर्पण कर रही हैं। समर्पण करती हुई आगे कहती हैं कि आप मुझे अपनी दासी मानिए, हालाँकि मेरा नारी स्वभाव है। श्रद्धा का भाव नारी सुभाव में ही आता है क्योंकि श्रद्धा का भाव बहुत चंचल और कोमल होता है तथा तुरन्त प्रभावित भी हो जाता है। इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती अपने आप को अग्य नारी से तुलना करती हैं।
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।।
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।
व्याख्या : हे प्रभु! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो जो मैंने पहले पूछा था, उसे कहिए। राम ब्रह्म, चिन्मय व अविनाशी हैं तथा सबसे रहित और सबके हृदय रूपी पुर में निवास करने वाले भी हैं। चिनमय का तात्पर्य चित स्वरूप होने से है। क्योंकि आत्मा रूपी राम चित स्वरूप होने पर ब्रह्म हैं और सदा अविनाशी स्वरूप वाले हैं।
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।।
उमा बचन सुनि परम बिनीता। राम कथा पर प्रीति पुनीता।।
व्याख्या : हे प्रभु! जब राम चितस्वरूप हैं, तो ये नर (नड़) कैसे जीव के शरीर को धारण करता है। ये सब मुझे समझा कर कहिए। विश्वास रूपी शिव श्रद्धा रूपी पार्वती के विनय पूर्वक वचनों को सुनकर और परमात्मा की कथा पर पवित्र प्रेम देखकर।
दो0 हियँ हरषे कामादि तब संकर सहज सुजान।
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।
व्याख्या : उस पवित्र प्रेम को देखकर काम के शत्रु शंका रहित विश्वास रूपी शिव हृदय में बहुत हर्षित हुए और श्रद्धा रूपी पार्वती की नाना प्रकार से प्रशंसा करके कृपालु विश्वास रूपी शिव बोले।
।। मास परायण, चौथा विश्राम।।
सो0 सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरूड़।।120(ख)।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! अब तुम आत्मा रूपी राम के निर्मल चरित्र की शुभदायक कथा को सुनो, जो काक भुसुंडि ने पक्षियों के राजा गरूड़ को सुनायी थी। काकभुसुंडि ज्ञान की परमवृत्ति का प्रतीक है। काकभुसुंडि के पिता का नाम चण्ड बताया गया है और चण्ड के सात वृति रूपी रानियाँ बतायी गयी हैं। वास्तविकता में चण्ड सात्विक अहंकार की अवस्था होता है, जिसमें से सात वृतियाँ निकलती हैं और ये सात वृतियाँ फिर नाना उपवृतियों में बँट जाती हैं। सात्विक अहंकार से ही परमज्ञान की वृति रूपी काकभुसुंडि पैदा होता है। और गरूड़ राजसिक व तामसिक अहंकार के पक्षी रूपी भावों का नायक होता है। जब गरूड़ रूपी अहंकार मोहादि विकारों में फँस जाता है तब परमज्ञान की वृति रूपी भुसुंडि ही उसे बाहर निकालता है।
सो0 सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
सुनहु राम अवतार चरति परम सुंदर अनघ।।120(ग)।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैं उसी संवाद को जो आगे हुआ है, को कहता हूँ कि किस प्रकार आत्मा रूपी राम का अवतरण होता है। राम का चरित परम सुंदर और पाप रहित होता है।
सो0 हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ)।।
व्याख्या : परमात्मा के गुण व नाम की कथा अपार होती है और परमात्मा के अनगिनत व अमित रूप होते हैं। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैं अपनी मति के अनुसार कहता हूँ।
सुनु गिरिजा हरि चरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।।
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा के चरित्रों को वेदों व पुराणों ने नाना प्रकार से बताया है। परमात्मा का अवतार जिस कारण से होता है, उसे "यही कारण है" बोलकर कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि आत्मा में परमात्मा के अवतरण के तो अनेक कारण हो सकते हैं।
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।।
तदपि संतमुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! राम तो तर्क, मन, बुद्धि व वाणी से परे हैं, ऐसा मेरा मत है। परन्तु फिर भी संत जनों, मुनियों व वेद-पुराणों ने अपनी बुद्धि के अनुसार वर्णन किया है।
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही।।
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जैसा मुझे परमात्मा के बारे में समझ आया है वैसा मैं तुमको सुनाता हूँ। जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब अधर्म व अभिमानी प्रवृति के आसुरी भाव बढ़ने लग जाते हैं। धर्म की हानि से तात्पर्य जीव को विषय वासनाओं में फँस जाने से है। जीव का सहज सुभाव ही परम धर्म होता है परन्तु जब वासनाओं के कारण जीव की सहजता मिट जाती है तो आसुरी भाव बढ़ने लग जाते हैं और आसुरी भावों के बढ़ने से जीव के हृदय में ग्लानि होने लग जाती है और जब हृदय में ग्लानि होती है, तो हृदय के अन्दर ही परमात्मा की याद आने लगती है। उसी को गीता में भी लिखा है कि --
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानम् सृज्याम्यह्म।।
अर्थात् हृदय में ग्लानि होने पर साधक की आत्मा में ही धर्म का सृजन होता है।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
तब-तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।
व्याख्या : जब आसुरी भाव बढ़ने लग जाते हैं, तो उनकी अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि आसुरी भावों के प्रभाव से विशुद्ध प्रकाश, इच्छाएँ, स्वर और देह रूपी धरती सभी परेशान होने लग जाते हैं। तब हृदय में ग्लानि होने पर परमात्मा ही साधक के शरीर में अवतरित होकर कष्टों का निवारण करने लगते हैं। परमात्मा कोई शरीर धारण करके प्रकट नहीं होते हैं, वे तो ज्ञान के रूप में अवतरित होकर साधक को सतमार्ग पर लाने की प्ररेणा करते हैं।