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रामायण - बालकाण्ड (भाग -2)

Ramayan
बालकाण्ड (भाग -2) दो0 असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।। व्याख्या : तब उस अवस्था में आसुरी भावों को मारकर सात्विक भावों की रक्षा करके वेद नीति की पालना करते हैं अर्थात् साधक को सतमार्ग पर चलने की प्रेरणा करते हैं। इसी अवस्था को संसार में परमात्मा की जन्म कथा के प्रतीकों के माध्यम से विस्तारपूर्वक कहा गया है। सोई जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।। राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।। व्याख्या : परमात्मा साधक के कल्याण के लिए ज्ञान के रूप में आत्मा में अवतरित होते हैं। अत: उनका जो यशोगान करते हैं, वे लोग भाव रूपी भव सागर को पार कर जाते हैं। परमात्मा के अवतरण के अनेक कारण होते हैं, जो एक से एक परम विचित्र होते हैं। अर्थात् परमात्मा किसी भी कारण से द्रवित होकर भक्त की आत्मा में ज्ञान, ध्यान व भक्ति या अन्य कोई रूप में अवतरित हो जाते हैं। जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।। द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अ डिग्री बिजय जान सब कोऊ।। व्याख्या : फिर भी परमात्मा के अवतरण के एक दो कारण बताता हूँ। हे श्रद्धा रूपी भवानी! तुम सावधानी पूर्वक सुनो। परमात्मा के जय और विजय नाम के दो द्वारपाल होते हैं। जय और विजय ये वास्तव में साधक के राग-द्वेष के भाव होते हैं, जो नर (नड़) रूपी चित के द्वारपाल होते हैं। जय और विजय अर्थात् राग और द्वेष से ही पुन: समस्त आसुरी भाव पैदा होते हैं। बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।। कनक कसिपु अ डिग्री हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।। व्याख्या : जब साधक का विशुद्ध प्रकाश मिट जाता है तो जय (राग) और विजय (द्वेष) दोनों भावों से तामसिक आसुरी भाव (काम, क्रोध, मद, मोह आदि) पैदा होने लग जाते हैं। उन्हीं आसुरी भावों को प्रतीकात्मक दृष्टि से हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष कहा गया है। हिरण्य अ कशिपु अर्थात् माया के भावों में पड़कर संग्रह का विकार ही हिरण्यकशिपु कहलाता है और संग्रह के प्रति लोभ की दृष्टि ही हिरण्या अ अक्ष उ हिरण्याक्ष का प्रतीक है। इसलिए इन दोनों भाइयों की उत्पत्ति दिति और कश्यप से मानी गयी है क्योंकि जब द्वैत भाव पैदा होता है, तब ही राग का भाव पैदा होता है और राग से संग्रहादि के विकार आते हैं और जब कश्यप की तरह इन्द्रियों का विस्तार होता है तो लोभ की दृष्टि बढ़ती है। अत: इन्हीं प्रतीकों का सहारा लेकर यह कथा लिखी गयी है। बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।। होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रह्लाद सुजस बिस्तारा।। व्याख्या : संग्रह और लोभ रूपी असुर बाकी भावों को युद्ध में जीत लेते हैं। परन्तु साधक दस इन्द्रियाँ और मन व बुद्धि को चित में समाहित करके लोभ रूपी आसुरी भाव का वध कर देता है। बारह रास्ते (दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि) संसार में जाने के होते हैं परन्तु इन सब बारह रास्तों को चित में समाहित कर लेते हैं तो लोभ रूपी असुर मर जाता है। बारह रास्तों को चित में समाहित करना ही बराह अवतार कहलाता है। जब बारह रास्ते चित में समा जाते हैं तो नर ही अर्थात् चित ही माया का हरण करने वाला हरि बन जाता है। इसलिए चितस्य निरोध योग: कहा गया है। जब नर हरि अर्थात् चित माया का हरण करने लग जाता है तो प्र अ आहलाद अर्थात् प्रकृति में आनन्द छा जाता है। उसी अवस्था को प्रहलाद का सुयश विस्तार कहा गया है। दो0 भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान। कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान।।122।। व्याख्या : जब राग व द्वेष से उत्पन्न संग्रह व लोभ के आसुरी भाव शान्त हो जाते हैं तो पुन: नए आसुरी भावों के रूप में प्रकट हो जाते हैं। भाव विज्ञान के अनुसार प्रत्येक भाव का जीवाणु होता है और प्रत्येक जीवाणु में आत्मा होती है। प्रत्येक आत्मा का भाव के अनुरूप देह धारण करना एक सतत् प्रक्रिया है। अत: जब राग-द्वेष के भाव संग्रह और लोभ में रूपान्तरित होते हैं तो संग्रह और लोभ के भाव काम, आलस्य में रूपान्तरित हो जाते हैं। ये सारे आसुरी भाव बहुत बलवान होते हैं। इसलिए आलस्य रूपी कुंभकर्ण और काम रूपी रावण के भाव पैदा होकर सभी देवता रूपी भावों को जीत लेते हैं। मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।। एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।। व्याख्या : आसुरी भावों का हरण हो जाने पर भी ये तीन बार रूपान्तरित होते हैं। इन्हीं को विद्वानों ने तीन जन्म लेना बताया गया है। अत: इन आसुरी भावों से मुक्त कराने के लिए भी साधक की आत्मा में ज्ञान का अवतरण होता है, जिससे परमात्मा के प्रति अनुराग पैदा हो जाता है। कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।। एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा।। व्याख्या : नर-नाड़ी की सहज अवस्था कश्यप और अदिति की होती है। अत: नर का प्रतीक कश्यप और नारी का प्रतीक अदिति होते हैं। जब नर में समस्त इन्द्रियाँ समाहित रहती हैं तब वह चितवत अवस्था कश्यप की होती है और जब चित का विस्तार हो जाता है और इन्द्रियाँ सक्रिय हो जाती हैं, तो कश्यप की अवस्था दशरथ अर्थात् दस इन्द्रियों रूपी रथ की हो जाती है। जब इन्द्रियों के साथ क्रिया का मिलन हो जाता है तो अदिति से अर्थात् अद्वैत से सक्रियता अर्थात् कौशल्या (कोशिकाओं में क्रिया का आभास) की अवस्था आ जाती है। इस प्रकार कल्पना द्वारा अवतार की घटना घटती है। ये सब समझ में आ जाने पर संसार की सांसारिकता पवित्र हो जाती है अर्थात् साधक का मन निर्मल हो जाता है। एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।। संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।। व्याख्या : जब साधक का किसी से मोह हो जाता है तो उसकी मोह की कल्पना से उसके स्वरों से पैदा होने वाले भाव दुखी हो जाते हैं। जलंधर मोह रूपी राक्षस होता है जिससे युद्ध में सारे सात्विक देव भाव हार जाते हैं। मोह रूपी जलंधर को तो विश्वास रूपी शिव भी नहीं जीत पाते हैं। मोह रूपी जलंधर असुर महाबली होता है, इसलिए मारा नहीं जाता है। परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी।। व्याख्या : जलंधर रूपी आसुरी मोह का भाव एक अति सूक्ष्म नारी (नाड़ी) से बल प्राप्त करता रहता है, जो अनाहत चक्र में धड़कती है। वह नाड़ी सुष्मना से भी सूक्ष्म होती है और अनाहत चक्र से होकर सहस्रसार चक्र तक जाती है। यह नाड़ी वृन्द अर्थात् गुच्छे की तरह होती है, इसलिए इसे वृन्दा नाम दिया गया है। इस नारी में जब तक प्राण का संचार होता रहता है, तब तक मोह का भाव अमर बना रहता है। यह नाड़ी गुच्छ (वृन्द) की तरह होने के कारण प्राणायाम से भी वश में नहीं आती है। इसका द्वार केवल सुरता द्वारा ही खुलता है। दो0 छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह। जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।। व्याख्या : जब प्राणायाम द्वारा नाड़ी का द्वार नहीं खुलता है, तो परमात्मा से मिलने की ललक से अति उत्साह में नाड़ी का द्वार खुल जाता है और द्वार खुलते ही मोह का भाव समाप्त हो जाता है और नाड़ी में परमात्मा के प्रति सुरता लग जाती है, जिससे सभी भाव रूपी देवता मोह के भय से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जब अचानक नाड़ी को आभास होता है कि अब मोह का भाव नहीं रहेगा और सुरता परमात्मा में लग गयी है, तो मोह रूपी जलंधर का भाव रूपान्तरित होकर काम का रूप धारण कर लेता है। जैसा कि मैंने पहले भी बताया कि भाव का मरण नहीं रूपान्तरण होता है। अत: मोह का भाव अब काम रूपी रावण में रूपान्तरित हो जाता है। यही वृन्दा के शाप का मर्म है। तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।। तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।। व्याख्या : उसी वृन्दा नाड़ी के शाप को ही सत्य करने के लिए कृपालु भगवान ने लीला करी। अर्थात् मोह का रूपन्तरण काम के रूप में हो गया और काम के विकारों से जब हृदय में ग्लानि हुई तो माया का हरण करने के लिए साधक की आत्मा से ही राम रूपी परमात्मा का अवतरण हुआ। काम का भाव ही रावण रूपी राक्षस है और आत्मा रूपी राम हैं जिन्होंने भावों के युद्ध में काम रूपी रावण को मार दिया। एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नरदेहा।। प्रति अवतार कथा प्रभुकेरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।। व्याख्या : एक जन्म का कारण यह था, जिसके कारण आत्मा रूपी राम का देह स्थित चित में अवतरण हुआ। इस प्रकार परमात्मा के अवतरण की अनेक कथाएँ हैं अर्थात् अनेक कारण हैं जिनका मुनि व कवियों ने बहुत सा वर्णन किया है। नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।। गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नु भगत पुनि ग्यानी।। व्याख्या : एक बार नारद मुनि ने श्राप दिया, जिसके कारण एक बार अवतार हुआ। अर्थात् मन के नारद रूपी भाव में जब ग्लानि पैदा हो जाती है, तो कल्पना हो जाने पर आत्मा में परमात्मा का अवतरण हो जाता है। नारद द्वारा श्राप की बात को सुनकर श्रद्धा रूपी पार्वती बहुत आश्चर्य चकित हो गयी कि नारद रूपी भाव तो भयहीन (भक्त) होता है और ज्ञान का आधार लिए होता है फिर कैसे नारद रूपी भाव को ग्लानि (शाप) हो सकती है। वास्तव में हृदय की ग्लानि ही श्राप होती है और हृदय की प्रसन्नता ही वरदान होती है। कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।। यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी।। व्याख्या : हे प्रभु! किस कारण से नारद रूपी मन के भाव के हृदय में ग्लानि हुई और रमण करने वाले प्राण से ऐसा क्या अपराध हुआ? यह रहस्य मुझे समझाइये कि नारद रूपी मन के भाव को मोह कैसे हो गया? दो0 बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।। व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव हँस करके बोले कि कोई भी ज्ञानी व मूर्ख नहीं होता है। जिसको परमात्मा जैसी प्रेरणा करते हैं, वह उस समय वैसा ही हो जाता है। सो0 कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124 (ख)।। व्याख्या : याज्ञवलक्य रूपी परमविवेकी भाव ने कहा कि हे विवेक रूपी भरद्वाज! तुम आदरपूर्वक परमात्मा के गुणों की गाथा को सुनिए। परमात्मा का भजन भावों के भय को दूर करनेवाला होता है। अत: मान व मद को त्याग करके परमात्मा का भजन करना चाहिये। हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।। आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।। व्याख्या : जब चितका निरोध हो जाता है तो वह बर्फ के समान शीतल हो जाता है। उसी चित की अवस्था को हिमगिरी के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब चित शीतल हो जाता है, तो शरीर में आनन्द की सुरसरी उठने लग जाती है, जो बहुत सुखद होती है। उस परम पवित्र अवस्था में मन का नारद रूपी भाव भी स्थिर होने लग जाता है। यह अवस्था भृकुटि से ऊपर और सहस्रसार के बीच में ध्यान लगाने पर प्राप्त होती है। निरखि सेल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।। सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।। व्याख्या : उस प्रगाढ़ ध्यान की अवस्था में मन के नारद रूपी भाव को चित की स्थिर अवस्था को देखकर परमात्मा के चरणों में अनुराग पैदा हो गया और परमात्मा का स्मरण करते हुए मन की सब ग्लानि मिट गयी, जिससे निर्मल चित होने के कारण सहज समाधी लग गयी। मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सन्माना।। सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचर केतू।। व्याख्या : मन के नारद रूपी भाव की स्थिरता को देखकर स्वरों के ईश्वर अर्थात् चित रूपी इन्द्र डर गया। इसलिए काम के भाव को बुलाकर बहुत सम्मान किया अर्थात् काम के भाव को प्रेरित किया। जब साधक का ध्यान गहरा होने लग जाता है तो कई बार भीतर से यह भय पैदा हो जाता है कि कहीं शरीर नहीं छूट जाए। उस अवस्था में काम का भाव साधक को ध्यान से बाहर लाने का प्रयास करता है। उसी अवस्था को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। उस समय चित रूपी इन्द्र ने काम के भाव को अपने सहायकों सहित नारद रूपी भाव के ध्यान को भंग करने के लिए भेजा। चित रूपी इन्द्र की आज्ञा पाकर जल तत्व में निवास करने वाला काम का भाव चला। सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।। जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।। व्याख्या : चित रूपी इन्द्र ने कहा कि हे काम रूपी भाव! मेरे मन में बहुत भय है कि कहीं नारद रूपी भाव मेरे लोक में निवास तो नहीं करना चाहता है। जो लोग संसार में कामी व लोलुप होते हैं, वे कुटिल कौआ की तरह डरते रहते हैं। दो0 सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।। व्याख्या : जैसे कोई कुत्ता अगर सूखी हड्डियों को लेकर भाग रहा हो कि कहीं शेर छीन नहीं ले। उसी प्रकार चित रूपी इन्द्र व्यर्थ में भयभीत होता रहता है। तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।। कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा।। व्याख्या : उस अवस्था (प्रगाढ़ ध्यान) में जब काम का भाव प्रवेश किया तो स्वयं की कल्पना से बसंत ऋतु का आगमन हो गया और काम के भाव ने वहाँ देखा कि बहुत से इच्छा रूपी वृक्षों पर नाना प्रकार की वासना रूपी फूल खिले हुए हैं तथा जिन पर भोग रूपी कोयल और भ्रमर रूपी आसक्ति के भाव मँडरा रहे हैं। चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनि हारी।। रंभादिक सुर नारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना।। व्याख्या : उस प्रगाढ़ ध्यान की अवस्था में तीनों गुणों की सुहावनि हवा चलने लगी अर्थात् गुण-गुणों में बरतने का आभास होने लगा, जिससे कामाग्नि बढ़ने लगी। रम्भा आदि भावों को संचालित करने वाली नाड़ियाँ नए सिरे से प्रवाहित होने लगी, जो काम कला के नाना भावों का प्रवाह करने लगी। सुष्मना नाड़ी में कई अति सूक्ष्म नाड़ियाँ होती हैं। उन्हीं सूक्ष्म नाड़ियों में रम्भा, मेनका व उर्वशी आदि नाड़ियाँ होती हैं, जिनको अप्सराओं के प्रतीकों द्वारा समझाया जाता है। जब ध्यान में काम रूपी भाव कल्पना करने लगता है, तो रम्भादिक नाड़ियों के द्वार खुल जाते हैं, जिससे साधक को बहुत सुखद लगने लगता है। कभी-कभी तो कल्पना के अनुसार अप्सराएँ नाचने भी लगती हैं और साधक इसी को इन्द्र द्वारा अप्सरा भेजना मान बैठता है। वास्तव में तो वह साधक की कल्पना ही होती है। जितना ध्यान प्रगाढ़ होता चला जायेगा, उतनी ही सूक्ष्म नाड़ियाँ खुलती चली जायेंेगी तथा कल्पना भी उतनी ही साकार होती चली जायेंगी। करहिं गान बहु तान तरंगा। बहु बिधि क्रीडहिं पानि पतंगा।। देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।। व्याख्या : उस प्रगाढ़ ध्यान में रम्भादिक सूक्ष्म नाड़ियों में प्राण की तरंगे उठने लगती हैं, जिससे भाव नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करने लगते हैं। इस प्रकार अन्य कामुक भावों की सहायता को देखकर काम रूपी कामदेव बहुत हर्षित हो उठा और फिर नाना प्रकार के प्रपंच करने लगा। अर्थात् नाना प्रकार की कल्पनाओं को बल प्रदान करने लगा। जब ध्यान में कभी काम की कल्पना हो उठती है, तो वह कल्पना ही नाना रूप धारण करती चली जाती है। काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।। सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू।। व्याख्या : परन्तु जब ध्यान परमात्मा में लगा हो तो काम के भाव की कल्पना मन को प्रभावित नहीं कर सकती है, जिससे काम का भाव अपने ही मन के भावों से डर जाता है। जब मन परमात्मा में लगा होता है, तो उसकी सीमा में कोई प्रवेश नहीं कर पाता है। दो0 सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।। व्याख्या : तब अपने सहायकों सहित काम के भाव ने हार मानकर मन के नारद रूपी भाव के सामने समर्पण कर दिया और विनय पूर्वक बोला। अर्थात् जब ध्यान प्रगाढ़ होता है तो काम का भाव अपनी कल्पानाओं सहित हार जाता है और स्वत: समर्पण कर देता है। भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।। नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।। व्याख्या : काम के भाव द्वारा उत्पात करने पर भी मन के नारद रूपी भाव को क्रोध नहीं आया और काम के भाव को प्रिय बचन बोलकर ढाँढ़स बँधाया। तब काम का भाव पूरी तरह समर्पण करते हुए अपने सहायकों सहित चला गया अर्थात् काम शान्त हो गया। मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।। सुनि सब के मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सि डिग्री नावा।। व्याख्या : तब काम के भाव ने चित रूपी इन्द्र की सभा में जाकर नारद रूपी भाव की सुशीलता और अपनी स्वयं की करनी को बताया। यह सुनकर चित रूपी इन्द्र की सभा के सभी भावों को आश्चर्य हुआ और परमात्मा को सीस झुकाते हुए सभी ने मन के नारद रूपी भाव की प्रशंसा की। तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।। मार चरित संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।। व्याख्या : तब मन का नारद भाव विश्वास रूपी शिव के पास गए परन्तु मन में काम को जीत लेने का अहंकार था। इसलिए काम के भाव के चरित को विश्वास रूपी शिव को बताया। तब विश्वास रूपी भाव ने नारद रूपी भाव को अपना प्रिय जानकर शिक्षा दी। बार - बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही।। तिनि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ ।। व्याख्या : विश्वासरूपी शिव ने मन के नारद भाव को प्रार्थना करते हुए समझाया कि यह काम को जीतने की कथा जो मुझे सुनायी है, उसको तुम माया का हरण करने वाले हरि भाव को कभी मत सुनाना। अगर इसका प्रसंग चले तो भी छुपा लेना। चित की स्थिर अवस्था हरि कहलाती है। जब नर की धड़कन स्थिर होने लग जाती है तो उसी अवस्था को चित निरोध की अवस्था कहा जाता है। विश्वास का भाव भी नारद रूपी भाव को इसलिए ही कहते हैं कि तुम चित की स्थिर अवस्था में भी काम का स्मरण मत करना वरना काम की कल्पना तुरन्त प्रबल हो उठेगी। अत: इसी प्रसंग को प्रतीकों के माध्यम से नारद को विष्णु से काम विजय की चर्चा नहीं करने की बात कही है। दो0 संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।। व्याख्या : विश्वास रुपी शिव ने नारद रूपी भाव के हित के लिए उपदेश दिया था परन्तु नारद रूपी भाव को अच्छा नहीं लगा। हे विवेक रूपी भरद्वाज मुनि! चित (हरि) की इच्छा बलवान होती है। अर्थात् स्थिर चित की अवस्था में जो इच्छा पैदा होती है, वह बहुत बलवान होती है। इसलिए स्थिर चितावस्था में अगर काम की कल्पना हो जाती है, तो वह बहुत बलवान होती है। राम कीन्ह चाहहिं सोइ होइ। करै अन्यथा अस नहीं कोई।। संभु बचन मुनि मन नहीं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।। व्याख्या : परमात्मा आर्थात् निर्मल स्थिर चित में जो कल्पना उठ जाती है, वही होकर रहता है, अन्यथा कुछ भी नहीं होता है। विश्वास रूपी शिव के वचन नारद रूपी भाव को अच्छे नहीं लगे, तो नारद भाव ब्रह्म के लोक अर्थात् सतोगुणी भावों के पास गया। एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।। छीर सिंधु गवने मुनि नाथा। जहँ बस श्री निवास श्रुतिमाथा।। व्याख्या : एक बार नारद रूपी मन का भाव परमात्मा के गुणों का बखान करता-करता छीर सिंधु अर्थात् उदर मण्डल में पहुँच गया जहाँ पर श्री अर्थात्त कुण्डलनि शक्ति का निवास होता है और जहाँ पर भोग रूपी विष्णु निवास करते हैं। अर्थात् नाभी मण्डल में प्राण गति चलने पर रजोगुणी भाव पैदा होते हैं। जब मन का नारद रूपी भाव उदर की प्राण ऊर्जा के सम्पर्क में आता है तो रजोगुणी भावों का आभास होने लग जाता है। हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।। बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।। व्याख्या : उदर मण्डल की प्राण शक्ति के नारद रूपी भाव के सम्पर्क में आने पर तुरन्त रजोगुण रूपी विष्णु जो रमण करने वाला होता है बहुत हर्षित होता है और नारद रूपी भाव को अपने पास बैठा लेता है अर्थात् नारद रूपी मन के बैराग्यवान भाव को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। तब हँस कर समस्त चराचर को भोग में फँसाने वाला विष्णुरूपी रजोगुणी भाव बोला कि हे नारद (वैराग्यवान) रूपी भाव! आप तो बहुत दिनों में आए हो। काम चरति नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।। अति प्रचण्ड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।। व्याख्या : रजोगुणी विष्णु रूपी भाव के सम्पर्क में आते ही नारद रूपी भाव ने काम की समस्त विशेषताओं का वर्णन करना शु डिग्री कर दिया अर्थात् काम का चिन्तन शु डिग्री कर दिया। काम के भाव की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि इसके चिन्तन से ही यह बल को प्राप्त करता है। इसलिए विश्वास रूपी शिव ने पहले ही काम का चिन्तन नहीं करने की सलाह दी थी। परमात्मा की माया बहुत प्रबल होती है। अत: संसार में कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिस पर माया का असर नहीं होता हो। दो0 रूख बदन करि बचन मृदु बोले भगवान। तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।। व्याख्या : तब रजोगुण रूपी विष्णु का भाव तटस्था दिखाते हुए बोला कि हे नारद रूपी मन के भाव! आपके सुमिरण से तो मोह, काम, मद व मान के भाव मिट जाते हैं। अर्थात् वैराग्य के भाव को याद करने पर माया का असर निष्प्रभावी हो जाता है। सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें।। ब्रह्म चरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।। व्याख्या : हे मन के नारद रूपी भाव! मोह तो उनके हृदय में होता है, जिनके हृदय में ज्ञान व वैराग्य के भाव नहीं होते हैं। तुम तो ब्रह्म का चिन्तन करने वाले व धीर बुद्धि वाले हो, अत: तुमको मन के भावों का कष्ट कैसे हो सकता है। नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।। करूनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब त डिग्री भारी।। व्याख्या : तब मन के नारद रूपी भाव ने अभिमान करते हुए कहा कि प्रभु यह तो सब आपकी कृपा है। तब करूणा के समुद्र ने मन में विचार किया कि नारद रूपी भाव के हृदय में अहंकार पैदा हो गया है। साधक को साधना की गहराई में यह भावों की स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो पाती है। परन्तु पूर्ण रूप से वर्णन करना कठिन होता है। साधक की आत्मा जब निर्मल हो जाती है तब वह दृष्टा बनकर समस्त भावों की गतिविधियों को देखने वाली हो जाती है। उसी अनुभूति को संकेतों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।। मुनि कर हित मम कोतुक होई। अवस उपाय करबि मैं सोई।। व्याख्या : अणु-अणु में व्यापक विष्णु रूपी भाव तब विचार करता है कि नारद रूपी भाव के हृदय से अहंकार रूपी वृक्ष को तुरन्त उखाड़ना उचित होगा क्योंकि आत्मा के कल्याण के लिए अहंकार को उखाड़ फेंकना ही हमारा सहज स्वभाव है। इसलिए विष्णु रूपी भाव ने सोचा कि नारद रूपी भाव के कल्याण के लिए मुझे लीला करनी होगी, जिससे अहंकार का नाश हो सके। तब नारद हरि पद सिर नाईं। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।। श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।। व्याख्या : तब नारद रूपी मन के भाव ने माया के हरण करने वाले अणु-अणु में व्यापक विष्णु रूपी भाव को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हृदय में अहंकार बढ़ा कर चले। तब श्री अर्थात् यश की इच्छा वाले माया के पति ने अपनी माया की प्रेरणा की। श्रीपति का तात्पर्य भाव की उस अवस्था से होता है, जिसमें श्री यश की इच्छा के लिए माया की प्रेरणा होती है। यश की इच्छा होने पर मान-सम्मान व भोग इच्छा प्रबल हो उठती हैं, जो बहुत कष्ट देने वाली होती है। उसी को कठिन करनी बोलकर लिखा गया है। दो0 बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।। व्याख्या : जब यश की इच्छा पैदा हो जाती है तो कल्पना द्वारा निर्मित माया रूपी नगर का सत योजन अर्थात् सौ भावों तक विस्तार हो जाता है। ये सौ भाव काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सरादि के होते हैं। इन भावों के द्वारा उत्पन्न माया रूपी नगर श्री निवासपुर (अर्थात् यश व वैभव की मूल इच्छा से भी) से भी ज्यादा विस्तारित हो जाता है। बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।। तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा।। व्याख्या : इस शरीर रूपी नगर में बहुत से सुंदर नर (नड़) और नाड़ियाँ बसती हैं जिनसे बहुत से भाव पैदा होकर मन का निर्माण करते हैं और वे भाव ही शरीर को धारण करते हैं। उसी शरीर रूपी नगर में शीलता का समुद्र रूपी भाव नाना प्रकार की इच्छाओं रूपी समाज सहित निवास करता है। सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा।। बिस्व मोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।। व्याख्या : उस शीलता के समुद्र रूपी भाव का वैभव व विलास सैकड़ों इन्द्रों के समान होता है और रूप, तेज, बल व नीति का उसमें निवास होता है। शीलता का भाव सब प्रकार से वैभव व विलास को बढ़ाने वाला होता है और जो शीलवान होता है, उसमें तेज, रूप, बल व नीति का अपने-आप समागम हो जाता है। परन्तु शीलता के भाव से पैदा होने वाली माया विश्व को मोहित करने वाली होती है। उसी को विश्वमोहनी कुमारी के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। क्योंकि शीलता से उत्पन्न झीनी माया इतनी सुन्दर लगती है कि भोगों से उत्पन्न माया (श्री) भी उसके सामने कुछ नहीं होती है। सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।। करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला।। व्याख्या : वह शीलता से उत्पन्न माया सब गुणों की खान होती है। जिसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। वास्तविकता में यही होता है कि शील आदि सात्विक भावों से उत्पन्न होने वाली माया ऊपर से देखने पर बहुत सुखद लगती है। इसी झीनी माया का त्याग कबीरदास ने भी बहुत मुश्किल बताया है। यह शीलता के लक्षणों से उत्पन्न माया रूपी पुत्री स्वयं ही अपने वर का वरण करती रहती है जिसका वरण करने के लिए शरीर के बहुत से भाव आकर्षित होते रहते हैं। शरीर के भाव ही मही अ पाल अर्थात् शरीर के भाव कहलाते हैं। मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।। सुनि सब चरित भूप गृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।। व्याख्या : नारद रूपी मन का वैरागी भाव भी शीलता रूपी माया के नगर में प्रवेश करता है अर्थात् नारद को भी झीनी माया का आकर्षण होता है। इसलिए नारद रूपी भाव शरीर स्थित भावों से पूछता है कि क्या हुआ? तब नारद रूपी भाव ने भावों के आने की सब विशेषताओं को जान लिया तो शीलता रूपी राजा के घर में आए और शीलता रूपी राजा ने नारद रूपी भाव की पूजा करके अपने पास बैठाया अर्थात् शीलता के भाव ने वैराग्य रूपी नारद के भाव को अपनी और आकर्षित किया। दो0 आनि देखाइ नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारी।।130।। व्याख्या : तब शीलता रूपी राजा ने विश्व को मोहित करने वाली झीनी माया रूपी पुत्री को नारद रूपी वैराग्य भाव को दिखायी और हृदय में झीनी माया (विश्वमोहनी) के गुण-दोषों का विचार करने को कहा। देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।। लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।। व्याख्या : वैराग्य रूपी नारद ने विश्वमोहनी रूपी झीनी माया को देखा तो वैराग्यता चली गयी और नारद का भाव झीनी माया को बहुत देर तक देखता रहा अर्थात् माया में आसक्ति हो गयी। झीनी माया के लक्षणों को देखकर वैराग्य रूपी नारद का भाव स्वयं को भूल गया और नारद रूपी भाव के हृदय में माया भोग का हर्ष पैदा हो गया परन्तु प्रकट नहीं हो पा रहा था। यह मन की वह अवस्था होती है, जिसमें साधक को भोग भोगने की लालसा तो पैदा हो जाती है परन्तु लोक-लाज के कारण अपनी इच्छा को प्रकट नहीं होने देता है। यहाँ पर उसी मनोस्थिति की सूक्ष्मता को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समर भूमि तेहि जीत न कोई।। सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।। व्याख्या : नारद रूपी भाव मन में विचार करने लगा कि जो शीलता के समुद्र से उत्पन्न विश्व को मोहित करने वाली सद्गुणों की खान माया रूपी पुत्री को अगर प्राप्त कर लिया जाए तो अमरता मिल जायेगी अर्थात् चारों तरफ सुयश छा जायेगा। सद्गुणों से युक्त माया रूपी पुत्री का वरन करने पर अन्य भाव भी जीत नहीं पायेंगे और समस्त चराचर के जीव सेवा करेंगे। साधक को साधना में ये भाव आते ही रहते हैं कि अगर मैं लोक-कल्याण करूँ, परोपकार करूँ, दया करूँ और दान आदि के पुण्य कार्य करूँ तो मैं अमर हो जाऊँगा और मुझे कोई युद्ध में जीत भी नहीं पायेगा। इन सद्गुणों से उत्पन्न माया ही झीनी माया होती है, जो विश्व को मोहित किए हुए है। लच्छन सब बिचारी उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।। सुता लच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।। व्याख्या : नारद रूपी भाव ने शीलता से उत्पन्न माया रूपी पुत्री के लक्षणों का विचार करके हृदय में रख लिए परन्तु कुछ बनावटी लक्षणों का वर्णन करने लगा। साधक के साथ यही होता है, जब वह यश व लोकप्रतिष्ठा की झीनी माया में फँसता है, तो यथार्थ को छुपाकर रख लेता है और पाखण्ड करना शु डिग्री कर देता है। वास्तविक उद्देश्य तो यश प्राप्त करना होता है और उपदेश मान-सम्मान से परे होने का देता है। यहाँ उसी मनोदशा का वर्णन किया गया है। इसलिए नारद रूपी भाव ने शीलता की माया रूपी पुत्री के बनावटी लक्षण बता दिए और स्वयं विचार करने लगा कि कैसे मैं इसे प्राप्त करूँ? करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।। जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।। व्याख्या : नारद रूपी वैराग्य का भाव विचार करने लगता है कि ऐसा उपाय करूँ, जिससे मोहनी माया रूपी पुत्री मुझे वरन कर ले। जब साधक सद्गुणों से उत्पन्न माया के जाल में फँस जाता है, तब उसका मन उसको नाना तर्क देने लगता है। वही मनोदशा यहाँ है। उस अवस्था में साधक जप व तप कुछ नहीं कर पाता है और उसको केवल यही लगता रहता है कि मोहनी माया रूपी पुत्री के सुख को कैसे प्राप्त करूँ? दो0 एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल। जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।। व्याख्या : नारद रूपी वैराग्य का भाव विचार करने लगता है कि मोहनी माया रूपी राजकुमारी मुझ पर रीझ जाए इसलिए विशाल शोभावाला रूप चाहिये। अर्थात् सद्गुणों का बखान करके साधक मोहनी माया के जाल में फँस जाता है। ऐसी अवस्था में वह बड़े-बड़े जग-कल्याण की योजना बनाता है, मधुर वाणी बोलने का प्रयास करता है। बात-बात में त्याग व वैराग्य के उपदेश देता है परन्तु उसके हृदय में लोक प्रतिष्ठा और वैभव की लालसा ही रहती है। यहाँ उसी मनोदशा का चित्रण किया गया है। हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गह डिग्री अति भाई।। मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।। व्याख्या : इसलिए नारद रूपी भाव सोचता है कि मैं माया के हरण करने वाले हरि अर्थात् चित से लोक-कल्याण, दया, करूणा व दान आदि सुन्दर भावों की सुन्दरता माँगूगा क्योंकि इन सद्गुणों से मेरा वैराग्यभाव और प्रबल होगा। साधना में कभी-कभी साधक को भ्रान्ति हो जाती है कि पुण्य कार्य करने से उसका यश बढ़ेगा व वैराग्य प्रबल होगा। परन्तु वास्तविकता में उल्टा हो जाता है और साधक झीनी माया में फँस जाता है। नारद रूपी वैराग्य भाव सोचता है कि मेरा हित करने वाला हरि (अर्थात् चित की स्थिर अवस्था) के समान कोई नहीं है। अत: ऐसे शिव संकल्प में मेरा स्थिर चित ही सहायक हो सकता है। बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहिकाला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।। प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हियँ हरषाने।। व्याख्या : जब साधक के मन में झीनी माया का आकर्षण हो जाता है, तो उसमें प्रार्थना का भाव उमगने लगता है और नाना प्रकार से प्रार्थना करने लगता है, तब उसके हृदय में परमात्मा की लीला का खेल प्रकट हो जाता है। अगली चौपाई में साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वह यह है कि जब साधक दोनों नयनों को जोड़ लेता है अर्थात् स्थिर कर लेता है तो उसकी चितवत् अवस्था हो जाती है और वही चितवत् अवस्था परमात्मा का प्रकट होना होता है। जब साधक की चितवत् अवस्था हो जाती है तो उसका शुभ संकल्प पूर्ण होने का बल मिलने लगता है। यहाँ पाठकों को बता दूँ कि शुभ संकल्प भी झीनी माया का ही एक प्रकार होता है। जब तक चित में संकल्प का भाव रहेगा तब तक माया का अस्तित्व रहता ही है। अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई।। आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।। व्याख्या : उस अवस्था में नारद रूपी वैराग्य का भाव आर्त पुकार करने लगता है कि मेरा शुभ संकलप् पूर्ण हो। हे प्रभु! आप मुझे अपना रूप दीजिए वरना दूसरे किसी भी प्रकार से मैं झीनी माया रूपी राजकुमारी को प्राप्त नहीं कर पाऊँगा। साधक साधारणत: इसी अवस्था में भटकते हैं। वे झीनी माया को न्यायसंगत बनाने के लिए अपने आपको भगवान के तुल्य बताने लगते हैं। अकारण ही लोगों के कष्टहर्ता बनने का प्रयास करते हैं। बात ही बातों में त्याग-वैराग्य की बात करते हैं। अगर किसी साधक की ऐसी अवस्था होती है तो जान लेना चाहिये इसका वैराग्य रूपी नारद भाव झीनी माया (विश्वमोहनी) में फँस गया है। जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।। निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।। व्याख्या : जब साधक का नारद रूपी वैराग्य का भाव झीनी माया रूपी विश्वमोहनी राजकुमारी के मोह में फँस जाता है तब उसका मन स्वयं ही स्वयं को तर्क देने लगता है और परमात्मा को भी पता नहीं चले ऐसा व्यवहार करने की कोशिश करता है। उस अवस्था में प्रार्थना करता है कि प्रभु! मैं तो आपका दास हूँ, अत: जिसमें मेरा कल्याण हो वैसा ही कीजिए। हालाँकि उसके मन में झीनी माया का आकर्षण बना रहता है। तब स्वयं की माया का विशाल बल देखकर साधक की अन्तरात्मा हृदय में हँस कर बोलने लगती है। दो0 जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।132।। व्याख्या : तब परमकृपालु अन्तरात्मा बोलती है कि हे नारद रूपी वैराग्य भाव! मैं वही करूँगा जिससे तुम्हारा कल्याण हो। मेरा यह वचन सत्य है और दूसरा कुछ नहीं करूँगा। साधक का योगक्षेम फिर परमात्मा स्वयं करने लग जाते हैं और साधक को कुपथ से बचाकर सुपथ पर अग्रसर कर देते हैं। यहाँ पर उसी अनुभूति का वर्णन किया जा रहा है। जब तक साधक पूरी तरह समर्पण नहीं करता है तब तक तो नियम संयमों द्वारा उसको स्वयं ही आगे बढ़ना पड़ता है परन्तु जब वह पूरी तरह परमात्मा के प्रति समर्पित हो जाता है, तो उसका योगक्षेम परमात्मा स्वयं करने लगते हैं। कुपथ माग रूज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।। एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।। व्याख्या : जैसे रोगी परहेज नहीं करना चाहता है परन्तु वैद्य उसे कुपथ पर जाने से रोकता है, उसी प्रकार अन्तरात्मा नारद रूपी वैराग्य के भाव को विश्वमोहनी माया रूपी कुमारी से बचाना चाहता है। इस प्रकार हरि नारद रूपी भाव को झीनी माया से बचाने का प्रयास करते हैं। यह आभास क्षणिक होता है। इसलिए उसी को परमात्मा का प्रकट होना और अन्तर्ध्यान हो जाना कहते हैं। माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।। गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।। व्याख्या : जब नारद रूपी मन का वैराग्य भाव झीनी माया के आकर्षण में पड़ जाता है, तो ज्ञान नहीं रह पाता है इसलिए अन्तरात्मा की गूढ़ वाणी को समझ नहीं पाता है और झीनी माया की तरफ खींचा चला जाता है। झीनी माया के चिन्तन में रस आने लगता है और यह रस स्वयं साधक अपनी कल्पना से ही बनाता है। उसी को स्वयंबर अर्थात् स्वयं ही कल्पना करके माया का निर्माण करना कहा जाता है। निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।। मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें।। व्याख्या : नारद रूपी वैराग्य भाव ने देखा कि सारे भाव रूपी राजा अपना अपना आवरण बनाकर झीनी माया की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। नारद रूपी वैराग्य का भाव बहुत हर्षित हो रहा है कि मेरे अलावा और किसी भाव को विश्वमोहनी माया रूपी राजकुमारी वरण नहीं करेगी। क्योंकि वैराग्य के भाव को लगता है कि करूणा, दया, दान व लोक-कल्याण आदि के सद्कार्य तो मेरे द्वारा ही सम्भव हो पायेंगे। अन्य भाव ऐसे सद्कार्य नहीं कर सकते हैं। मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।। सो चरित लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा।। व्याख्या : परन्तु मन के नारद रूपी वैराग्य के भाव के हित के लिए परमात्मा ने कृपा करके वैराग्य रूपी नारद को कुरूप दे दिया। कुरूप देने का तात्पर्य है कि वैराग्य के भाव से वासनाएँ आकर्षित नहीं हो सकती हैं, इसलिए उसी को कुरूप का प्रतीक बताया गया है। परमात्मा की उस विशेषता को कोई समझ नहीं पाता है और सभी भाव नारद रूपी वैराग्य के भाव को देखकर नमन करते हैं। जब वैराग्य दृढ़ हो जाता है तो वह विषय वासनाओं के लिए कुरूप हो जाता है। दो0 रहे तहाँ दुइ रूद्र गन ते जानहिं सब भेउ। बिप्रवेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।133।। व्याख्या : जब अन्तरात्मा द्रवित हो जाती है, तो उससे निकलने वाले गुण समस्त रहस्य को जानने वाले होते हैं, जो विशुद्ध प्रकाश के कारण वैराग्य रूपी नारद के सब रहस्य को जानते हैं। उसी अन्तरात्मा (रुह द्रवहि सो रुह) के द्रवित होने को ही रूद्र कहा जाता है। जेहि समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।। तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।। व्याख्या : वैराग्य रूपी नारद का भाव अहंकार के साथ भावों के समाज में बैठ गए। वहाँ पर महाऐश्वर्य के गण बैठे थे, परन्तु विशुद्ध प्रकाश के कारण उनकी गति को कोई भी भाव पहचान नहीं पाया। करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई ।। रीझहिं राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।। व्याख्या : महेश के गण नारद रूपी वैराग्य को सुनाकर कटुक्ति कर रहे हैं कि हरि (माया का हरण करने वाले) ने अच्छी सुंदरता दी है, इसलिए विश्वमोहनी माया रूपी राजकुमारी इनकी छवि देखकर जरूर रीझेंगी और इन्हें माया का हरण करने वाला जानकर इनका जरूर वरण करेंगी। यहाँ गूढ़ार्थ यह है कि माया रूपी राजकुमारी वैराग्य रूपी भाव को देखकर जरूर रीझेंगी अर्थात् माया निष्प्रभावी हो जायेगी और माया का निष्प्रभावी हो जाना ही वैराग्य रूपी भाव का वरण करना होगा। मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।। जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।। व्याख्या : वैराग्य रूपी नारद का मन झीनी माया के मोह में पड़ गया। अत: यह देखकर स्वयं के विशुद्ध प्रकाश वाले गण हँसने लगे। वैराग्य रूपी भाव उन विशुद्ध प्रकाश वाले गणों की अटपट बानी को सुनता तो है, परन्तु मोह का भ्रम पड़ जाने के कारण समझ नहीं पाता है। यह अवस्था साधक को बहुत मुश्किल से समझ में आती है। एक तरफ साधक का मन झीनी माया की तरफ खींचता चला जाता है और दूसरी तरफ विशुद्ध प्रकाश के कुछ भाव साधक को माया से सावधान रहने की चेतावनी देते रहते हैं। यही अवस्था अटपट बानी को समझने में असमर्थ हो जाती है। उसी को यहाँ लिखा है। काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।। मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।। व्याख्या : वैराग्य रूपी नारद की उस अवस्था को दूसरे कोई भाव उस समय समझ नहीं पाते हैं परन्तु झीनी माया रूपी राजकुमारी वैराग्य के उस मर्कट स्वरूप भयंकर शरीर को देखकर हृदय में क्रोधित हो उठती है। वैराग्य का भाव अगर विषय वासनाओं के आकर्षण में फँस जाता है, तो वह बन्दर की तरह चंचल हो उठता है और उसमें विरोधाभास रूपी कुरूपता आ जाती है, जिससे झीनी माया रूपी राजकुमारी क्रोधित हो उठती है अर्थात् वैराग्य और झीनी माया में विरोधाभास पैदा हो जाता है। दो0 सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।134।। व्याख्या : तब उस अवस्था में झीनी माया रूपी विश्वमोहनी अपने साथ कीर्ति, व क्षमा रूपी सखियों को लेकर ऐसे चली जैसे कोई राजहंस चल रहा हो तथा हाथ में जयमाला लेकर शरीर के सब भावों को देखती हुई चलने लगी। जेहि दिसि बैठे नारद फूली । सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली।। पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं।। व्याख्या : परन्तु जिधर को वैराग्य रूपी नारद बैठे हुए थे, उधर को झीनी माया रूपी विश्वमोहनी ने भूलकर के भी नहीं देखा। इसलिए वैराग्य रूपी नारद बार-बार अपने आपको दिखाने का प्रयास करते हैं अर्थात् झीनी माया को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। यह दशा देखकर स्वयं के विशुद्ध प्रकाश वाले गण अर्थात् भाव वैराग्य रूपी नारद पर हँसने लगते हैं। धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।। दुलहिनि लै गे लच्छि निवासा। नृप समाज सब भयउ निरासा।। व्याख्या : उस द्वन्द्व की अवस्था में चित की चेतना नर (नड़) अर्थात् चित में समाहित हो जाती है, जिससे झीनी माया रूपी विश्वमोहनी जयमाला गले में डाल देती है अर्थात् माया समर्पण कर देती है। माया का समर्पण करना ही हरि के गले में विश्वमोहनी द्वारा जयमाला डालना बताया गया है। उस अवस्था में हरि अर्थात् निर्मल चित माया रूपी विश्वमोहनी को वहाँ ले गए जहाँ से लक्षणों की उत्पत्ति होती है। उस अवस्था में सभी अन्य माया के भाव निराश हो गए। मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।। तब हर गन बोले मुसुकाई । निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।। व्याख्या : तब वैराग्य रूपी नारद का भाव बहुत व्याकुल हो गया क्योंकि वैराग्य भाव की बुद्धि मोह के कारण नष्ट हो गयी। उस अवस्था में वैराग्य रूपी नारद को ऐसा लगा जैसे गाँठ खुलकर मणि खो गयी हो। तब माया का हरण करने वाले हर के गण बोले कि हे वैराग्य रूपी नारद! स्वयं को दर्पण में देखो तो सही। अर्थात् वैराग्य के वास्तविक स्वरूप का चिंतन तो करो। असि कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।। बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।। व्याख्या : ऐसा कहकर हर (माया का हरण करने वाले) के गण भयभीतर होकर भागे। जब किसी वासना में साधक का मन चला जाता है और वह वासना पूर्ण नहीं होती है तो वैराग्य के भाव में अचानक क्रोध की झूँझलाहट पैदा हो जाती है क्योंकि वैराग्य रूपी नारद भाव रूपी जल में अपनी छवि को देखकर क्रोधित हो उठता है और उसी क्रोध की अवस्था में श्राप दे देता है। श्राप का मतलब है हृदय में तीव्र ग्लानि हो आना। दो0 होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।। व्याख्या : तीव्र ग्लानी होने पर वैराग्य का भाव हर के गणों से कह उठता है कि तुम माया में विचरने वाले हो जाओ क्योंकि तुम दोनों कपटी व पापी हो। तुम हम पर हँसे हो उसका फल लो, जिससे कभी किसी के मन के भाव पर नहीं हँसोगे। मन के भावों में आपस में बहुत ही सूक्ष्म प्रतिक्रिया होती रहती है और जिस भाव का जितना दमन करने की कोशिश की जाती है, वो उतना ही वेग से उठने का प्रयास करता है। और भावों का यह विज्ञान होता है कि जो भाव जैसा चिन्तन करता है, वो वैसा ही हो जाता है। दो0 पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।। फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं।। व्याख्या : दोबारा ग्लानी कम होने पर भाव रूपी जल में अपनी परछाई देखी तो वैराग्य के भाव ने अपना रूप देखा परन्तु फिर भी हृदय में संतोष नहीं आया। वैराग्य रूपी नारद के होठ फड़फड़ा रहे थे और मन में क्रोध था, इसलिए मायापति हरि अर्थात् चित प्रदेश में जाने के लिए चल दिए। देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई।। बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी।। व्याख्या : वैराग्य रूपी नारद हृदय में विचार करता हुआ जा रहा था कि या तो हरि (चित) को श्राप दूँगा अर्थात् ग्लानि से भर दूँगा या जाकर चित में लीन हो जाऊँगा यानी मर जाऊँगा। अन्यथा भाव रूपी संसार में मेरी हँसी होगी। ऐसा विचार करता हुआ वैराग्य रूपी नारद जब चित प्रदेश के लिए जा रहा था तो रास्ते में ही माया रूपी दानव को मारने वाले हरि मिले और उनके साथ विश्वमोहनी रूपी राजकुमारी रमण कर रही थी। अर्थात् चित की तरंग में विश्वमोहनी रूपी माया लीन थी। बोले मधुर बचन सुरसाईं । मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।। सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा।। व्याख्या : तब सुरों के स्वामी चित ने मधुरता पूर्वक वैराग्य रूपी नारद से पूछा कि आप व्याकुल होकर कहाँ जा रहे हो। वैराग्य रूपी नारद को ये वचन सुनकर क्रोध आ गया और माया के प्रवाह के कारण स्वयं को बोध नहीं रहा। पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।। मथत सिंधु रूद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु।। व्याख्या : वैराग्य रूपी नारद क्रोधित होता हुआ बोला कि हे चित रूप हरि तुम्हें पर अर्थात् प्रकृति की सम्पदा यानी सुख भोग देखे नहीं जाते हैं क्योंकि तुम्हारे मन में ईर्ष्या और कपट होता है। मन रूपी समुद्र का मंथन करने पर रूद्रहि अर्थात् परमात्मा द्रवित होकर बौराय अर्थात् बारह रास्तों में (दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि) विस्तारित हो जाते हैं और स्वरों के माध्यम से फिर विषय रूपी वासनाओं का पान शु डिग्री कर देते हैं। यहाँ पर साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। दो0 असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारू। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट व्यवहारू।।136।। व्याख्या : जब विषय वासनाओं का विस्तार होने लग जाता है तो आसुरी भाव स्वरों द्वारा पैदा होने लगते हैं और विषय रस रूपी विष विश्वास रूपी शंकर के गले में पड़ जाता है और आप हरि अर्थात् चित तो मणि रूप होकर रमण करने लगता है। अत: हे चित रूपी हरि! तुम तो स्वार्थरत और कुटिल व्यवहार करने वाले हो। अर्थात् चित से ही विषयवासना पैदा होती है और चित ही विषय वासनाओं से बचने की प्रेरणा करता है। यही चित रूपी हरि का कपटपूर्ण व्यवहार कहा गया है। परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।। भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू।। व्याख्या : हे चित रूपी हरि! तुम परम स्वतंत्र हो इसलिए जो मन में भाव आता है वैसा ही करते हो। इसलिए तुम बुरे को अच्छा, अच्छे को बुरा कर देते हो और तुम्हें ऐसा करते हुए हर्ष व शोक कुछ भी नहीं होता है। डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू।। करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।। व्याख्या : ठग-ठग करके तुम सबको जान लिए हो, इसलिए तुम सदा नि:शंक बने रहते हो और उत्साहित रहते हो। तुमको अच्छे-बुरे कर्मों का बन्धन भी नहीं होता है और आज तक तुमको किसी ने वश में भी नहीं किया है। यहाँ चित के स्वरूप की विशेषताएँ बताई गयी हैं। भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा।। बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।। व्याख्या : अब आपने अच्छे भाव के साथ छेड़छाड़ की है। अत: उसका फल भोगना पड़ेगा और जिस प्रकार मुझे (वैराग्य) ठगा है उसी प्रकार का शरीर धारण करना होगा। यह मेरा श्राप है। अर्थात् वैराग्य भाव कहता है कि जिस प्रकार हे हरि (चित) आपने मुझे मोहनी माया का आकर्षण दिखाया वैसा ही आकर्षण अब आपको होगा अर्थात् चित में भी वही मोहनी माया के भाव आवेंगे। कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।। मम अपकार कीन्ह तुम भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।। व्याख्या : हे चित रूपी हरि! आपने मेरी गति कपि की तरह जैसे चंचला कर दी थी, वो कपि रूपी चंचल बुद्धि के समूह ही आपकी सहायता करेंगे। आपने मेरा जैसे अहित किया है वैसे ही तुम भी नारी (अर्थात् नाड़ी की चंचलता से) विरह में ऐसे ही दु:खी होवोगे। दो0 श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि। निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।। व्याख्या : वैराग्य रूपी भाव की ग्लानी (श्राप) को चित रूप हरि ने स्वीकार करके वैराग्य के भाव से नाना प्रकार से विनती की अर्थात् अन्तरात्मा ने वैराग्य के भाव को नाना प्रकार से समझाया और चित रूप हरि ने स्वयं की माया की प्रबलता का हरण कर लिया। जब ग्लानी ज्यादा हो जाती है, तो फिर अचानक भावों में शान्ति आ जाती है और वह अवस्था माया के हरण की अवस्था कहलाती है। जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।। तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारित चरना।। व्याख्या : जब चित से माया दूर हो गयी अर्थात् जब चित स्थिर हो गया तो उसमें विश्वमोहनी रूपी माया का रमण भी नहीं रहा। तब वैराग्य रूपी भाव भयभीत होकर चित में समाहित हो गया और पूरी तरह समर्पण कर दिया। मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला ।। मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे । कह मुनि पाप मिटहिं किमि मेरे।। व्याख्या : हे चित रूप हरि! मेरी ग्लानी (श्राप) मिथ्या हो जाए ऐसी मेरी इच्छा है। मैंने बहुत प्रकार के बुरे वचन कहें हैं। अत: उनका पाप अर्थात् चिन्ता कैसे मिटे? भाव विज्ञान को समझने पर पता चलता है कि प्रत्येक सूक्ष्म भाव में वैसे ही भाव होते हैं जैसे जीव के होते हैं क्योंकि प्रत्येक भाव में जीव के पूर्ण लक्षण होते हैं। जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा।। कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।। व्याख्या : हे वैराग्य रूपी भाव! तुम विश्वास रूपी शंकर के सौ नामों का जप करो। तुम्हें तुरन्त शान्ति मिल जायेगी। सौ नाम जपने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक जीव के सौ भाव होते हैं। अत: प्रत्येक भाव को विश्वास करवाओ की परमात्मा ही सब कुछ करने वाले हैं, तो उससे तुरन्त भावों में शान्ति आ जायेगी। हे वैराग्य रूपी भाव! मुझे (चित रूप हरि) विश्वास रूपी शिव के समान दूसरा कोई प्रिय नहीं है। जेहिं पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।। अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।। व्याख्या : हे वैराग्य रूपी भाव! जिस पर विश्वास रूपी शिव कृपा नहीं करते हैं, वो मन का भाव भयहीन अवस्था को प्राप्त नहीं हो पाता है। अत: ऐसा हृदय में दृढ़ करके समस्त शरीर में विचरण करो, माया तुम्हारे पास नहीं आयेगी। कृपा का तात्पर्य है करि अ पा अर्थात् करके प्राप्त करो। अत: विश्वास करके भयहीन गति अर्थात् भक्ति को प्राप्त किया जा सकता है। दो0 बहु बिधि मुनिहि प्रबोदि प्रभु तब भए अंतरधान। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।। व्याख्या : बहुत प्रकार से वैराग्य रूपी भाव को समझाकर चित रूपी हरि अन्तर्ध्यान हो गए अर्थात् चित सहज हो गया और नारद रूपी वैराग्य भाव परमात्मा के गुण गाते हुए सत्य लोक अर्थात् सात्विक अवस्था में विचरण करने लगा। हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत मोह मन हरष विसेषी।। अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।। व्याख्या : हर गणों ने वैराग्य रूपी नारद को जाते हुए रास्ते में देखा कि उनका मोह दूर हो गया और मन में हर्ष हो रहा था। तब वे वैराग्य रूपी नारद के पास भयभीत से आए और वैराग्य रूपी नारद को दु:खी होकर बोले। हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फलपाया।। श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।। व्याख्या : हे वैराग्य रूपी नारद! हम विशुद्ध प्रकाश के भाव नहीं हैं, हम तो हर अर्थात् स्थिर चित के गण अर्थात् तरंग हैं। हमने जो अपराध किया अर्थात् आपको मोहनी माया में फँसा देखकर जो खुश हुए, उसका फल पा लिया है। अब आप हमारी ग्लानी को दूर कर दीजिए। इतना सुनकर कृपालु वैराग्य रूपी नारद बोले। निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ । वैभव बिपुल तेज बल होऊ।। भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ।। व्याख्या : तुम दोनों निशाचर हो जाओ अर्थात् माया में विचरण करो और बहुत वैभव, तेज व बल वाले हो जाओ। तुम तुम्हारे बल से समस्त भाव रूपी संसार को वश में कर लोगे, तब अणु-अणु में व्यापक चित रूपी हरि शरीर में ही मनुज अर्थात् मनअअनुज यानी मन के सूक्ष्म रूप में प्रकट होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब माया के भाव समस्त भावों को वश में कर लेंगे, तब हृदय में ग्लानी होगी तब अन्तरात्मा अर्थात् सूक्ष्म मन की प्रेरणा से चित रूपी हरि ही माया का निवारण करेंगे। दो0 समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।। चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।। व्याख्या : तब तुम्हारा चित रूपी हरि के द्वारा युद्ध में मरण होगा। तब तुम माया रूपी संसार से मुक्त हो जावोगे। फिर दोनों हर गण वैराग्य रूपी भाव को नमस्कार करके चले गए और समय पाकर माया में निवास करने लगे अर्थात् निशाचर हो गए। दो0 एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार। सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार।।139।। व्याख्या : इस प्रकार की कल्पना होने पर अर्थात् कल्पना से माया में फँस जाने पर परमात्मा का अवतरण होता है, जो स्वरों के माध्यम से सुखकारी भाव पैदा करके माया के भावों का हरण कर देते हैं और शरीर रूपी धरती के कष्टों का निवारण कर देते हैं। एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे ।। कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चा डिग्री चरित नाना बिधि करहीं।। व्याख्या : इस प्रकार भावों की माया का हरण करने के लिए परमात्मा का अवतरण होता है, जो समझने में सुंदर, सुखद व बहुत प्रकार से विचित्र लगता है। प्रति कल्पना के भावों के अनुसार ही परमात्मा का अवतरण होता है, जो बहुत रोचक चरित करते हैं। तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई ।। बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अनुभूति को सुन्दर भाषा में रचकर समय-समय पर साधना में लगे हुए मुनियों ने गाया है। उन्होंने अपनी अनुभूति के नाना प्रसंगों का वर्णन किया है, इसलिए सुनकर समझदार लोग आश्चर्य नहीं करते हैं। हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।। रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।। व्याख्या : माया का हरण अनंत प्रकार से होता है इसलिए साधकों ने माया के हरण की अनन्त अनुभूतियों का बखान किया है। संत लोग अपनी माया हरण की अनुभूति को नाना प्रकार से कहते और सुनते हैं। अत: आत्मा रूपी राम के चरित का करोड़ों कल्पना करके भी पूरी तरह वर्णन नहीं किया जा सकता है। यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी।। प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी। सेवत सुलभ सकल दुख हारी।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी भवानी! मैंने यह अनुभूति बता दी है कि परमात्मा की माया ज्ञानी मुनियों को भी मोह में डाल देती है। परमात्मा तो लीला करने वाले व प्राण के माध्यम से रमने वाले, हितकारी, आसानी से प्राप्त होने वाले व दु:खों को दूर करने वाले होते हैं। सो0 सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल। असि बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।140।। व्याख्या : देवता, मनुष्य व मुनियों में ऐसा कोई नहीं होता है, जिसको मोह की माया व्याप्त नहीं होती है। अत: ऐसा मन में विचार कर महामाया के स्वामी परमात्मा का भजन करना चाहिये। अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।। जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा।। व्याख्या : हे कोशिकाओं से उत्पन्न श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा के अवतरण का दूसरा कारण बताता हूँ, जो बहुत ही विशेष (विचित्र) प्रकार का है, जिसके कारण अजन्मा, गुणों से परें व रूप से परे ब्रह्म शरीर रूपी कोसल देश में राजा बनकर अवतरित होता है। जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।। जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! जिस परमात्मा को शरीर रूपी वन में अपने लक्षणों रूपी भाई के साथ मन के भावों के भेष के रूप में देखा था और जिसकी विशेषताओं को देखकर तुम सती के शरीर में बावली जैसी हो गयी थी अर्थात् चातुर्य रूपी श्रद्धा के भाव से परमात्मा की विशेषताओं को समझने का प्रयास करने पर श्रद्धा का भाव स्वयं भ्रमित हो जाता है। अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रूज हारी।। लीला कीन्हि जो देहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा।। व्याख्या : चातुर्यु रूपी श्रद्धा भाव से परमात्मा को समझने का प्रयास करने से जो भ्रम रूपी छाया पड़ी थी वह आज भी तुम्हारी नहीं मिट पायी है। अत: हे श्रद्धा रूपी पार्वती! उसी आत्मा रूपी राम के चरित्र को सुनो जो भ्रम रूपी रोग को दूर करने वाला है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा अवतरित होकर जो लीला करते हैं, उसी अनुभूति को मैं मेरी बुद्धि के अनुसार तुम्हें बताता हूँ। भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी।। लगे बहुरि बरनै बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।। व्याख्या : परमविवेकी ज्ञान के भाव ने कहा कि हे विवेक रूपी भरद्वाज! विश्वास रूपी शंकर की बात सुनकर श्रद्धा रूपी पार्वती शर्माती हुई मुस्कराने लगी और वासनाओं के शत्रु (वृषकेतू) रूपी विश्वास परमात्मा के अवतरण की अनुभूति का वर्णन करने लगे। सो0 सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ। राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ।।141।। व्याख्या : परमविवेक याज्ञवल्क्य रूपी भाव बोले कि हे भरद्वाज! मैं वो सब अनुभूति तुमको बताता हूँ, जो शरीर के विकारों का हरण करने वाली व मंगल करने वाली है। अत: तुम मन लगाकर सुनो। स्वायंभू मनु अ डिग्री सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।। दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका।। व्याख्या : यहाँ इन चौपाइयों में सृष्टि के रहस्य से पर्दा उठाया गया है कि जीव को कैसे सृष्टि का आभास होता है? यहाँ कहा गया है कि साधक के स्वयं का मन ही सृष्टि का मूल होता है और मन की शत् अर्थात् सौ वृत्तियाँ होती हैं। अत: ये सौ वृत्तियां ही मन (मनु) रूपी राजा की पत्नी शतरूपा अर्थात् सौ वृत्तियाँ हैं। मन और मन के शत्रूपों से ही नर की धड़कन की गति निर्धारित होती है और धड़कन से प्राण पैदा होते हैं और प्राणों से भावों की उत्पत्ति होती है तथा भावों के अनुरूप ही सृष्टि का आभास होता है। इसलिए मन रूपी राजा अपनी शतवृत्ति रूपी शतरूपा के साथ शरीर रूपी राज्य पर राज करता रहता है। मन और मन की शतवृत्तियों के आचरण की अनुभूति को ही आज तक सब वेदों व पुराणों ने गाया है। अर्थात् मन और मन की शतवृत्तियों के रहस्य को जान लेना ही परमज्ञान होता है और उसी परमज्ञान की अनुभूति को ही संतों व वेद-पुराणों ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार बताया है। नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू।। लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही ।। व्याख्या : जैसा कि पहले बताया गया है कि नर की धड़कन से प्राण और प्राणों से भाव और भावों से मन पैदा होता है। इसलिए जब परमात्मा की साधना गहरी होती चली जाती है तो मन सूक्ष्म होता चला जाता है क्योंकि परमात्मा के प्रति स्नेह बढ़ने पर प्राण उर्ध्वगामी होने लग जाते हैं। इसलिए मन रूपी मनु के पुत्र के रूप में उत्तानपाद (यानी उर्ध्वगामी प्राण) को बताया गया है। जब प्राण उर्ध्वगामी (उत्तानपाद) हो जाते हैं, तो परमात्मा के प्रति भक्ति भाव में स्थिरता आने लग जाती है। इसलिए स्थिरता के प्रतीक के रूप में ध्रुव को उत्तानपाद (उर्ध्वप्राण) का पुत्र बताया गया है। ज्यों-ज्यों प्राण उर्ध्वगामी होगा त्यों-त्यों मन निर्मल होकर सूक्ष्म होता चला जाता है और उसमें प्रिय बोलने के भाव आने लग जाते हैं, इसलिए छोटे पुत्र के प्रतीक के रूप में प्रियव्रत (अर्थात् मधुरवाणी) को बताया गया है। मधुरवाणी के लक्षण की तो सभी वेद व पुराण प्रशंसा करते ही हैं। देवहुति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी।। आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।। व्याख्या : ज्यों-ज्यों मन निर्मल होकर सूक्ष्म होता जाता है, त्यों-त्यों भाव शान्त होते चले जाते हैं अर्थात् भावों की आहूति सी पड़ने लग जाती है। अत: उस अवस्था को ही देवहूति के प्रतीक के रूप में बताया गया है, जो कर्दम ऋषि की नारी बतायी गयी है। कर्दम का तात्पर्य है कर अ दम अर्थात् इन्द्रियों का दमन करने पर भाव शान्त होना शु डिग्री हो जाते हैं, इसलिए देवहूति को कर्दम नारी बताया गया है। जब भाव शान्त होने लग जाते हैं और इन्द्रियों का दम हो जाता है, तब आत्मा में कृपालु परमात्मा प्रकट होते हैं और उसी संयम व दम की अवस्था से ही कपिल अर्थात् परमज्ञान की अवस्था आती है। सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना ।। तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।। व्याख्या : परम ज्ञान की अवस्था आने पर ही सांख्य शास्त्र प्रकट हो जाता है, जिससे साधक तत्व का विचार करने में निपुण हो जाता है। इस प्रकार मन रूपी राजा बहुत समय तक राज करता है और सब प्रकार से परमात्मा की आज्ञा का ही पालन करता है अर्थात् सभी अच्छे व बुरे भाव आत्म तत्व से ही उत्पन्न होते हैं। सो0 होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन। हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।। व्याख्या : मन रूपी राजा शरीर रूपी राज्य पर बहुत समय तक राज करते हुए चौथेपन में प्रवेश कर जाने पर भी विषयों से विरक्त नहीं होता है तो साधक के हृदय में ग्लानी हो उठती है कि बिना परमात्मा के भजन के जीवन व्यर्थ ही निकल गया। बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।। तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।। व्याख्या : जब हृदय में ग्लानि हो जाती है तो मन विषयों से विरक्त होकर स्वत: सूक्ष्म होता चला जात है, उसी सूक्ष्मता को सुतों को जबरदस्ती राज देना कहा गया है। जब मन निर्मल हो जाता है तो अपनी सौ वृत्तियों को भी अपने संग ले लेता है अर्थात् मन की वृत्तियाँ भी शान्त होना शु डिग्री हो जाती हैं। उसी को मन रूपी राजा का अपनी पत्नी रूपी शतरूपा के साथ शरीर रूपी वन में जाना कहा गया है। इस शरीर रूपी वन में त्रिकुटि रूपी तीर्थ होता है, जो नैमिष अर्थात् अंधकार का नाश करने वाला होता है तथा परम पवित्र व साधक को सिद्धि देने वाला होता है। बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।। पंथ जात सोहहिं मति धीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।। व्याख्या : त्रिकुटि रूपी तीर्थ पर सिद्धियों का समाज निवास करता है। अत: मन रूपी राजा हर्षित होकर वहाँ चले गए। भृकुटि को साधना का परम सिद्ध स्थान माना गया है। अत: ध्यान के अभ्यास करते हुए भी मन भृकुटि में जाकर हर्षित हो उठता है अर्थात् मन की चिन्ताएँ मिट जाती हैं। भृकुटि में ध्यान स्थिर करने पर बुद्धि धीर हो जाती है अर्थात् बुद्धि स्थिर होने लग जाती है और ज्ञान व भक्ति के भाव भी प्रकट होने लग जाते हैं। पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा।। आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।। व्याख्या : जब साधक का मन भृकुटि में स्थिर होने लगता है, तो साधक को धेनुमति अर्थात् इच्छाओं की उत्पत्ति का ज्ञान होने लग जाता है। उस अवस्था में साधक समझने में समर्थ हो जाता है कि इच्छाएँ कैसे पैदा होती हैं तथा कैसे विस्तार को प्राप्त करती हैं। उस समय इच्छाओं की आसक्ति मिट जाती है, उसी को मन का निर्मल नीर में नहाना बताया गया है। उस अवस्था में साधक के सामने नाना प्रकार की सिद्धियाँ आने लग जाती हैं और नाना प्रकार से ज्ञान समझ में आने लग जाता है और नृपरिषि अर्थात् नर की धड़कन से निकलने वाला हार्मोन धारणा को धारण करने लग जाता है। अर्थात् जो ध्यान में आभास होता है, उसको धारण करने की क्षमता आ जाती है। जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।। कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहि पुराना।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जहाँ-जहाँ त्रिगुणों की सन्धि रहती है, वो सब समझ में आ जाती है। उसी अवस्था को मन को सादर तीर्थ करवाना कहा जाता है। जब मन निर्मल हो जाता है तो वह मन की कृष अर्थात् मन की सूक्ष्म अवस्था होती है उसी को मन पर सूक्ष्म परिधान होना कहा जाता है। उस अवस्था में मन सात्विक हो जाता है, अत: वही सत समाज अर्थात् भावों की सात्विक अवस्था कहा गया है। इड़ा, पिंगला और सुष्मना नाड़ियों के जाल के माध्यम से तीनों गुणों का प्रवाह होता है। अत: ये तीनों नाड़ियाँ ही तीन रथ अर्थात् तीर्थ का प्रतीक हैं। दो0 द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरूह दंपति मन अति लाग।।143।। व्याख्या : ध्यान में साधक जब अनुराग सहित द्वादसी मंत्र का जप करता है तो वासुदेव अर्थात् जो परमात्मा इस शरीर में बसता है। उसके चरण कमलों में मन और मन की शतरूपा वृतियों का प्रेम हो जाता है। मन और मन की वृतियों का परमात्मा में लग जाना ही दम्पति का मन लग जाना कहा गया है। करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।। पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।। व्याख्या : इन चौपाइयों में साधक की साधना की यात्रा का वर्णन किया गया है कि जब मन व मन की वृतियाँ परमात्मा से अनुराग करने लग जाती हैं, तब विषय वासना रूपी आसक्ति को छोड़ कर केवल सात्विक रूप से सहज होकर परमात्मा के चरणों में प्रेम करनेे लग जाती हैं और निरन्तर सत्चितानन्द ब्रह्म का ही चिन्तन करने लगती हैं। ज्यों-ज्यों साधना और परिपक्व होने लगती है, तो भावों की माया का हरण करने के लिए तप की वृति दृढ़ हो जाती है। तप का मतलब है मन व इन्द्रियों का एकीकरण हो जाना। उस अवस्था में केवल भोगों की खुशबू से ही जीवात्मा बल प्राप्त करती रहती है और भोगों की आसक्ति का पूरी तरह त्याग हो जाता है। उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई।। अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथ बादी।। व्याख्या : तब साधक की इच्छा होने लगती है कि जिस परमात्मा को परमार्थवादी लोगों ने अगुन, अखंड, अनंत व अनादि के रूप में चिंतन किया है, उसी परमात्मा को आँखों से देखूँ। साधना में प्रत्येक साधक की यह इच्छा की अवस्था आती है कि वो परमात्मा का साक्षात्कार दर्शन करे। नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरूपाधि अनूपा।। संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।। व्याख्या : जिस परमात्मा को वेदों ने ऐसा भी नहीं ""ऐसा भी नहीं"" कहकर बताया है तथा जो स्वयं के आनन्द का विषय है, निरूपादि व अनुपम है तथा जिसके अंश से ब्रह्मा, शंकर व विष्णु आदि भगवान पैदा हुए हैं। ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीला तनु गहई।। जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा।। व्याख्या : ऐसे अनन्त व अनादि परमात्मा सेवक के वश में होते हैं तथा भक्त के कल्याण के लिए भक्त के शरीर में ही नाना लीला करने के लिए अवतरित होते हैं। साधक शु डिग्री में जब साधना करता है, तो वह शास्त्रों के वचनों को सत्य मानता है इसलिए वह अपने आपको संतुष्टि दिलाते हुए कहता है कि अगर वेदों ने जैसा बोला है, वो सब सत्य है तो मेरी आँखों से परमात्मा के दर्शन की अभिलाषा पूर्ण होगी। दो0 एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार। संबत सहस्र सहस्र पुनि रहे समीर आधार।।144।। व्याख्या : इस प्रकार साधना करते-करते षट भावों के रस समाप्त हो जाते हैं अर्थात् काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह व मत्सर के छ: भावों के रस शेष हो जाते हैं और केवल सतोगुणी जल का पान करके ही जीवात्मा बल प्राप्त करती रहती है और फिर सात चक्रों का भेदन हो जाने पर केवल प्राण वायु ही प्राण वायु का आधार बनकर रह जाती है। बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।। बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा।। व्याख्या : फिर धीरे-धीरे साधना और परिपक्व होती-होती इस स्तर पर पहुँच जाती है कि दसों इन्द्रियाँ भी विषयों के रसपान का त्याग कर देती हैं। उस अवस्था में मन व मन की शतरूपा वृतियाँ सब एक हो जाती हैं और परमात्मा के चरणों में अनुराग करने लग जाती हैं। उस अवस्था में जब साधना पहुँच जाती है, तो तप के प्रभाव से माया का हरण करने की विधि बहुत प्रकार से मन में ही समझ आ जाती है। उसी को ब्रह्मा, विष्णु व महेश का मन रूपी मनु के पास बार-बार आना बताया गया है। मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए।। अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा।। व्याख्या : साधक को साधना की परिपक्व अवस्था में पहुँच जाने पर नाना प्रकार की वर माँगने की इच्छा सत, रज व तम गुणों के प्रभाव के कारण हो सकती है परन्तु जो साधक धैर्यवान होता है वो साधना पथ से डिगाए भी नहीं डिगता है। ऐसे परमधीर साधकों के लिए तो शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र होता है तथा उनके मन में तनिक भी कष्ट नहीं होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि साधना में तप के प्रभाव के कारण सत, रज व तम के गुण व गुणों की प्रेरणा भी निष्प्रभावी हो जाती है। प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी।। मागु मागु ब डिग्री भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी।। व्याख्या : जब तप के द्वारा मन व मन की शतरूपा वृतियाँ एक होकर नर की धड़कन (नृप) में समा जाते हैं, तब परमात्मा साधक को अपना भक्त समझकर आकाशवाणी करते हैं कि वर माँगिए, वर माँगिए। वह आकाशवाणी बहुत गम्भीर व अमृतमय होती है। मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई।। हृष्ट-पुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए।। व्याख्या : वह अमृतमय आकाशवाणी अमर कराने वाली होती है, जो कानों द्वारा जब हृदय में पहुँचती है तो शरीर के समस्त विकार मिट जाते हैं, जिससे परम स्वस्थता का आभास होने लगता है और ऐसा लगने लगता है जैसे अभी जन्म लिया हो अर्थात् एकदम बाल स्वभाव की अवस्था हो जाती है। दो0 श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात। बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।। व्याख्या : अमृतमय आकाशवाणी को सुनकर शरीर के सभी अंग पुलकित हो उठते हैं, तब मन रूपी राजा का हृदय प्रेम से भर जाता है और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण आ जाता है। सुनु सेवक सुरत डिग्री सुरधेनु । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।। सेवत सुलभ सकल सुखदायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।। व्याख्या : तब मन रूपी राजा पूर्ण समर्पण करते हुए परमात्मा से कहता है कि हे प्रभु! आप सेवकों के लिए कल्पत डिग्री हो अर्थात् कल्पना के मूल हो और काम धेनु अर्थात् समस्त इच्छाओं के भी मूल हो। ब्रह्मा, विष्णु व महेश सभी आपके चरणों की वंदना करते हैं। आपको प्राप्त करना सुलभ है और आप समस्त सुखों को देने वाले, प्राण को पैदा करने वाले, समस्त चराचर जगत के स्वामी हैं। जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।। जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहिं कारन मुनि जतन कराहीं।। व्याख्या : हे अनाथों का कल्याण करने वाले प्रभु! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो यह वरदान दीजिए कि जो स्वरूप विश्वास रूपी शिव के हृदय में निवास करता है और जिसे देखने के लिए मुनि लोग प्रयास करते हैं। जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा।। देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारित मोचन।। व्याख्या : जो सात्विक अहंकार रूपी भुसुंडि के मन रूपी सरोवर के हंस है और सगुण व निर्गुण के रूप में जिस परमात्मा की वेदों में प्रशंसा की है। मन व मन की शतरूपा वृतियाँ अब उसी परमात्मा को आँखों से देखना चाहते हैं। अत: हे प्राण के रूप में व्यापक प्रभु! कृपा कीजिए। दंपति बचन परम प्रिय लागे। मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे।। भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।। व्याख्या : मन व मन की शतरूपा पत्नी के वचन परमात्मा को बहुत प्रिय लगे क्योंकि वे मधुर विनययुक्त व प्रेम के रस में सने हुए थे। परमात्मा तो भक्तवत्सल स्वभाव के होते हैं, जो विश्वास होने पर प्रकट होते हैं। दो0 नील सरोरूह नील मनि नील नीरधर स्याम। लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि-कोटि सत काम।।146।। व्याख्या : साधक की भावना अनुसार परमात्मा अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं। इसिलए जैसा मन रूपी राजा और शतरूपा रूपी रानी कल्पना करते हैं, वैसा ही स्वरूप परमात्मा दिखाते हैं। मन रूपी राजा ने देखा कि परमात्मा नीले कमल, नीलमणि और नीले मेघ के समान हैं। उनके शरीर की शोभा देखकर करोड़ों काम देव भी लज्जित हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि जब मन व मन की वृत्तियाँ परमात्मा में लीन हो जाती हैं, तो समस्त काम वासनाएँ स्वत: ही शान्त हो जाती है और कामवासनाओं का शान्त होना ही काम का लज्जित होना माना जाता है। सरद मयंक बदन छबि सींवा। चा डिग्री कपोल चिबुक दर ग्रीवा।। अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा।। व्याख्या : जब कामवासनाएँ शान्त हो जाती हैं तो परमशान्ति छा जाती है इसलिए परमात्मा का स्वरूप शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान लगता है और गाल और ठोढ़ी सुन्दर, गला शंख के समान लगता है। लाल ओठ, दाँत और नाक बहुत सुन्दर थे। ये सब सुन्दरता चन्द्रमा की किरणों को भी नीचा दिखाने वाली थी अर्थात् बहुत ज्यादा सुन्दरता थी। नव अंबुज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की।। भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी।। व्याख्या : नये खिले हुए कमल के समान आँखें सुन्दर थी अर्थात् उस अवस्था में विवेकरूपी आँखें कमल के समान खिलना शु डिग्री हो गयी थी। चित की तरंगें बहुत सुखद होकर जीव को मनोहर लगने वाले भाव पैदा कर रही थी। भृकुटि पर ध्यान केन्द्रित होने के कारण काम का प्रभाव (चाप) समाप्त हो गया था जिससे ललाट पर चमक आ गयी थी और तीनों गुण एक होकर परमात्मा में लीन हो रहे थे। तीनों गुणों का एक होना ही तिलक का प्रतीक होता है। कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा।। उर श्रीबत्स रूचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनि जाला।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में साधक को नाना प्रकार से भावों का रहस्य समझ में आने लगता है और नाना प्रकार की काम इच्छाओं का रहस्य भी समझ में आने लगता है। उन्हीं को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर कहा गया है कि इच्छाएँ मछलियों की तरह चंचल होती हैं, जो कानों के कुण्डलों की तरह उलझी हुई रहती हैं तथा भावों का मुकुट सिर पर सुशोभित रहता है। काम रूपी इच्छाएँ घुँघराले बालों की तरह उलझकर रहती हैं, जिन पर भोग रूपी भ्रमर गुंजायमान करते रहते हैं। हृदय में परमात्मा का स्मरण सुन्दर माला की तरह आभासित होता है और मन के भावों का जाल रत्नभूषित आभूषणों की तरह लगता है। केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषण सुंदर तेऊ।। करि कर सरिस सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदडां।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समझ में आने लगता है कि वासनाएँ शरीर में सुन्दर जनेउ की तरह लिपटी रहती है और वासनाओं के भाव ही वासनाओं को भूषित करते रहते हैं। परन्तु जब भाव सुभग अर्थात् अच्छी वृत्ति वाले होने लग जाते हैं तो सुभग (अच्छे भाव) भाव ही वासनाओं के लिए दंड का काम करने लग जाते हैं। उस अवस्था में विषयों के प्रति निसंगता की भावना पैदा हो जाती है। उसी अवस्था को निसंग बाणों का कमर में तुनिर होना बताया गया है। दो0 तड़ित बनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि। नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भँवर छबि छीनि।।147।। व्याख्या : ध्यान की गम्भीरता में कुण्डलिनि शक्ति बिजली की तरह चमक उठती है, मानों पीले वस्त्र धारण कर रखे हों और उदर पर तीन गुणों की रेखा मानों अंकित हो रही हों और नाभी से उठने वाले भाव जमुना नदी के भँवर के समान लगते हैं। पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।। बाम भाग सोभति अनुकूला। आदि सक्ति छबि निधि जगमूला।। व्याख्या : उस अवस्था में व्यष्टि का अस्तित्व समष्टि के अस्तित्व से मिल जाता है, तो ऐसा लगने लगता है कि परमात्मा के चरण कमलों के समान हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जाता है क्योंकि साधक का मन तो परमात्मा के चरण कमलों में लगा रहता है। उस समय लगने लगता है कि परमात्मा के बाएँ अंग में आदिशक्ति शोभा पा रही है, जो कि समस्त जगत का मूल होती है। कुण्डलिनि शक्ति का उस अवस्था में आभास हो जाता है। अत: उसी अनुभूति को व्यक्त करने के लिए मुनियों को आदिशक्ति के प्रतीकों का सहारा लेना पड़ता है। जासु अंश उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।। भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।। व्याख्या : आदिशक्ति के अंश से ही समस्त गुणों की उत्पत्ति होती है। कुण्डलिनि शक्ति ही व्यष्टि रूप में शक्ति कहलाती है और समष्टि की शक्ति के रूप में उसी शक्ति को आदिशक्ति कहा जाता है। व्यष्टि की कुण्डलिनि शक्ति जो कि जीवात्मा की नारी की धड़कन होती है, से ही समस्त गुणों की उत्पत्ति होती है। उसी आदि शक्ति से लक्ष्मी अर्थात् समस्त लक्षणों की उत्पत्ति होती है, उसी से उमा अर्थात् भाव पैदा होते हैं और उसी कुण्डलिनि की धड़कन से रसायन पैदा होकर बीज ब्रह्म पैदा होता है। जब कुण्डलिनि शक्ति की धड़कन भृकुटि से समस्त भावों को पैदा करके जगत का आभास कराती है और वही कुण्डलिनि शक्ति बाएँ दिशा में हृदय के रूप में धड़कर प्राण पैदा करती है और प्राण ही श्वास बनकर जीव का आभास कराते हैं। अत: वही शक्ति श्वास रूपी सीता है। छबि समुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।। चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनुशतरूपा।। व्याख्या : परमात्मा की समुद्र के समान छवि को देखकर मन व मन की पत्नी शतरूपा रूपी वृतियाँ एक हो गयी। उसी एक होने की अवस्था को एकटक नयनों द्वारा देखना कहा गया है। परमात्मा के उस अनुपम रूप को मन व शतरूपा वृतियाँ सादर देखने लगते हैं। हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इब गहि पद पानी।। सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करूना पुंजा।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में साधक हर्ष के कारण शरीर की सुध-बुध खो देता है और परमात्मा के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाता है। उसी अवस्था को चरणों में दण्डवत् हो जाना कहा गया है। उस समय परमात्मा स्वंय साधक की भावना के अनुसार रूप प्रकट भी कर देते हैं। अत: उस भाव-विभोर अवस्था में साधक को आभास हो जाता है कि परमात्मा उसके सिर पर अपने कमल रूपी हाथों को फेर रहे हैं और उठाकर हृदय से लगा रहे हैं। यह अवस्था सगुण भक्ति की पराकाष्ठा होती है। दो0 बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि। मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।। व्याख्या : परमात्मा उस भावविभोर आनन्द की अवस्था में मनुरूपी साधक से बोले कि मुझे प्रसन्न समझकर व महादान करने वाला जानकर अपनी इच्छा के अनुसार वरदान माँग लो। सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।। नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे।। व्याख्या : परमात्मा की वाणी को सुनकर मनु रूपी राज दोनों हाथ जोड़कर मधुरवाणी बोला कि हे प्रभु! आपके चरण कमलों को देखकर अब मेरी सब इच्छाएँ पूर्ण हो गयी हैं अर्थात् इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं। चरण कमलों से तात्पर्य परमात्मा की सत्ता से है। जब परमात्मा की सत्ता का अहसास हो जाता है तब सब इच्छाएँ शान्त हो जाता है। एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं।। तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृप नाईं।। व्याख्या : हे प्रभु! मेरे हृदय में बस अब एक लालसा है, जो सुगम व अगम दोनों होने के कारण कहने में नहीं आ रही है। हे प्रभु! आपके द्वारा देने में तो वह बहुत सुगम है परन्तु मेरी कृपणता के कारण ही वह अगम (दुर्लभ) लग रही है। जथा दरिद्र बिबुध त डिग्री पाई। बहु संपति मागत सकुचाई।। तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई।। व्याख्या : जैसे दरिद्र व्यक्ति को कल्पत डिग्री मिल जाने पर भी वह बहुत धन माँगने में संकोच करता है क्योंकि वह कल्पत डिग्री के प्रभाव को नहीं जान पाता है। इसी प्रकार मेरे हृदय में भी संशय हो रहा है। यह अवस्था प्रत्येक साधक की होती है। जब साधक को सर्वसमर्थ परमात्मा की शरण मिल जाती है, तब भी उसके मन में संशय बना ही रहता है। अत: उसी मनोभाव को यहाँ सूक्ष्मता से लिखा गया है। सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी।। सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही।। व्याख्या : हे अन्तर्यामी प्रभु! आप तो मेरे मन की इच्छा को जानते ही हैं। तब परमात्मा मनु रूपी राजा को समझाते हुए कहते हैं कि तुम संकोच छोड़ कर माँगों क्योंकि मेरे लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तुमको नहीं दे सकता। दो0 दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ। चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।। व्याख्या : साधक जब साधना की परिपक्व अवस्था में आ जाता है, तब उसके मन की समस्त इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं और उस समय उसके हृदय में परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव भी आ जाता है और वह परमात्मा को सब कुछ देने वाला कृपा सिन्धु भी मान लेता है। अब उसके हृदय में एक ही लालसा बच जाती है कि वह परमात्म स्वरूप को प्राप्त कर उसमें लीन रहना चाहता है। अत: उसी भाव को प्रकट करता हुआ मनु रूपी राजा कहता है कि हे प्रभु! मैं आपके समान लक्षणों से युक्त होकर आपके पुत्र के रूप में रहना चाहता हूँ। अर्थात् मैं आपके (परमात्मा) स्वरूप को प्राप्त करना चाहता हूँ। देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करूनानिधि बोले।। आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तब तनय होब मैं आई।। व्याख्या : तब परमात्मा साधक के अनमोल प्रीतिपूर्वक वचनों को सुनकर कह उठते हैं कि ऐसा ही होगा। मैं मेरे समान संसार में किसको खोजूँगा। मैं तो नृप उ नर अ प तुम्हारे शरीर के नर (धड़कन) में ही आकर प्रकट होकर मेरे लक्षणों से तुम्हें युक्त करूँगा। सतरूपहिं बिलोकि कर जोरें। देबि मागु ब डिग्री जो रूचि तोरें।। जो ब डिग्री नाथ चुतर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अतिप्रिय लागा।। व्याख्या : मन की शतरूपा वृतियाँ भी उस समय परमात्मा के प्रति समर्पण कर देती हैं। उसी को शतरूपा का हाथ जोड़कर खड़ा रहना बताया गया है। शतवृतियों के समर्पण को देखकर परमात्मा कहते हैं कि हे शतरूपा रूपी देवी! तुम तुम्हारी इच्छानुसार वर माँग लो। तब शतरूपा रूपी वृतियाँ कहती हैं कि जो चतुर नृप अर्थात् विशुद्ध नर की धड़कन ने जो माँगा है वही मुझे बहुत प्रिय है। अर्थात् परमात्मा का निज स्वरूप ही शतवृतियों को भी प्रिय लगने लग जाता है। प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई।। तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी ।। व्याख्या : हे प्रभु! यद्यपि मैं ढिठाई कर रहा हूँ परन्तु भक्तों के हित के लिए आपको तो ढिठाई भी अच्छी ही लगती है। हे प्रभु! आप तो ब्रह्मा आदि को पैदा करनेवाले जगत के स्वामी हैं और आप सबके हृदय में निवास करने वाले अन्तर्यामी ब्रह्म हैं। अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।। जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।। व्याख्या : ऐसा समझने पर भी मन में संशय होता है अत: जो आपने कहा है वही प्रमाण है। परमात्मा के तो अनन्त रूप होते हैं इसलिए साधक के मन में संशय हो आना स्वाभाविक होता है। इसलिए साधक जो वाणी सुनता है, उसी को प्रमाण मानता है और परमात्मा की अनन्त सत्ता को स्वीकार करके अपनी समझने की असमर्थता दिखाते हुए कहता है कि हे प्रभु! जो गति आपके भक्तों को मिलती है और जो सुख उनको मिलता है। दो0 सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु। सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु।।150।। व्याख्या : अत: हे प्रभु! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही आपके चरणों में प्रेम, वही विवेक और वही रहने का ढंग कृपा करके हमें दीजिए। यहाँ पर साधक का पूर्ण समर्पण होता है। इसी अवस्था में जीवात्मा और परमात्मा का वार्तालाप शु डिग्री हो जाता है। इस अवस्था को वास्तविक रूप में तो साधना पथ पर अनुभव करके ही समझा जा सकता है। सुनि मृदु गूढ़ रूचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।। जो कछु रूचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।। व्याख्या : साधक के मन की शतरूपा वृतियों के गूढ़ रूचिर वाक्य रचना को सुनकर कृपा के समुद्र परमात्मा मधुर वचन बोले कि जो कुछ भी तुम्हारी इच्छा है वो सब मैंने तुमको दे दिया है, इसमें संशय नहीं है। जब साधक साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है, तब उसकी मन की इच्छा के अनुसार ही कार्य व्यवहार होना शु डिग्री हो जाता है। जो चिन्तन साधक के मन में आता है, वो सब पूर्ण होता चला जाता है। मातु बिबेक अलौकिक तोरें। कबहुँ न मिटहि अनुग्रह मोरें।। बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक विनती प्रभु मोरी।। व्याख्या : उस अवस्था में कुण्डलिनि शक्ति रूपी माता से परमात्मा कहते हैं कि तुम्हारा अलौकिक विवेक मेरी कृपा से कभी नहीं मिटेगा। तब मन रूपी मनु राजा परमात्मा के प्रति समर्पण दिखाते हुए कहता है कि हे प्रभु! मेरी एक प्रार्थना है। सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ।। मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना।। व्याख्या : हे प्रभु! आपके चरणों में मेरी पुत्र के समान रूचि होनी चाहिये, चाहे लोग मुझे महामूढ़ ही क्यों नहीं कहें। जैसे बिना मणि के नाग और बिना जल के मछली नहीं रह सकती है, वैसे ही मेरा जीवन भी आपके अधीन ही होना चाहिये, जिससे आपके बिना मैं एक पल भी जीवित नहीं रह सकूँ। जब साधक को परमात्मा की अनुभूति हो जाती है, तो उसका मन सदैव परमात्मा में ही लीन रहना चाहता है, उसी मनोदशा का यहाँ वर्णन किया गया है। अस ब डिग्री मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करूनानिधि कहेऊ।। अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी।। व्याख्या : साधक का मन रूपी मनु राजा परमात्मा में लीनता का वरदान माँग कर परमात्मा के चरणों में पूरी तरह समर्पण कर देता है। तब परमात्मा उसको अपना लेते हैं और एवमस्तु अर्थात् ऐसा ही हो बोलकर साधक को प्रेरणा करते हैं कि अब तुम मेरी आज्ञा मानों और सुरपति अर्थात् जहाँ से स्वर पैदा होते हैं यानी भृकुटि में अपनी चेतना को स्थिर करके रहो। भृकुटि में चेतना को स्थिर करना ही सुरपति की राजधानी में निवास बताया गया है। स्वरों से ही इन्द्रियों का विस्तार होता है, इसलिए इन्द्रियों के पति यानी चित को ही इन्द्र कहा जाता है। चित अर्थात् इन्द्र और इन्द्रियों का मिलन ही सुरपति की राजधानी के भोग विलास होते हैं। सो0 तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि। होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।।151।। व्याख्या : परमात्मा कहते हैं कि तुम सुरपति अर्थात् चित प्रदेश में चेतना अनुसार भोगों का भोग करो तब कुछ समय पश्चात् जब भोगों के कारण तुम्हारे हृदय में ग्लानी होगी तब तुम अवधी रूपी शरीर के राजा होवोगे तब मैं तुम्हारी आत्मा में ही अवतरण करूँगा। इच्छामय नरबेष सँवारें । होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें।। अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता।। व्याख्या : परमात्मा कैसे जीव के हृदय में अवतरित होते हैं, उसी को यहाँ लिखा गया है। जीव के हृदय स्थित नर की धड़कन के रूप में इच्छाओं के अनुरूप साधक के हृदय में प्रकट होते हैं। उसी को यहाँ कहते हैं कि हे वत्स! मैं तुम्हारे हृदय रूपी घर में नर की धड़कन के रूप में तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार अपना रूप प्रकट करूँगा और मेरे भाव रूपी अंशों के सहित तुम्हारे शरीर में प्रवेश करूँगा और तब भक्तों को सुख देने वाले चरित करूँगा। यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि परमात्मा कोई शरीर धारण करके अवतार नहीं लेते हैं। वे तो साधक के हृदय में ही भावना के अनुरूप प्रकट होते हैं। जे सुनि सादर नर बड़ भागी। भव तरिहहि ममता मद त्यागी।। आदि सक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया।। व्याख्या : उन्हीं पावन चरितों को सुनकर भाग्यवान पुरुष भाव रूपी भव सागर को पार कर जायेंगे और ममता व मद का त्याग कर देंगे। जिस आदिशक्ति अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति से समस्त जगत पैदा हुआ है, वो भी मेरी माया अवतरित हो जायेगी अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति का रहस्य भी साधक को समझ में आ जायेगा। पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा।। पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना।। व्याख्या : परमात्मा कहते हैं कि मैं तुम्हारी सभी इच्छाओं को पूर्ण करूँगा। यह मेरा सत्य प्रण है। इस प्रकार बार-बार साधक से कहकर परमात्मा अन्तर्ध्यान हो गए। दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला।। समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा।। व्याख्या : इस प्रकार मन व मन की शतरूपा वृतियों ने परमात्मा को हृदय में याद करके उसी अवस्था में कुछ समय रहे। फिर समय आने पर शरीर का त्याग करके अमरावति में निवास करने लगे अर्थात् साधना द्वारा साधक का मन विदेह हो गया और विदेह अर्थात् देह आभास से ऊपर उठ जाना ही अमरावति में निवास कहलाता है। दो0 यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृष केतु। भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।।152।। व्याख्या : परम विवेक रूपी याज्ञवलक्य ऋषि कहते हैं कि हे विवेक रूपी भरद्वाज! यह राम जन्म का पवित्र इतिहास विश्वास रूपी शिव ने श्रद्धा रूपी पार्वती को बताया है। अब तुम राम के जन्म का अर्थात् परमात्मा के अवतरण का दूसरा कारण सुनो। ।। मास परायण, पाँचवाँ विश्राम।। सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।। बिस्ब बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू।। व्याख्या : हे विवेक रूपी मुनि! तुम उस पवित्र कथा को सुनो जिसे विश्वास रूपी शिव ने श्रद्धा रूपी पार्वती को सुनाया था। जग में जाहिर कैकय देश है जहाँ पर सत्यकेतु नाम का राजा निवास करता है। पाठकों को यहाँ बता देना चाहता हूँ कि कैकय देश साधक का नाभी प्रदेश होता है जिसमें सत्यकेतु रूपी राजा राज करता है। यह सत्यकेतु रजोगुणी व सतोगुणी भावों का मूल होता है। यहीं पर कुण्डलिनि शक्ति का निवास होता है। अत: इसी कैकय प्रदेश से ही समस्त भावों का उद्गम होता है। सत्यकेतु साधक का सहजगुण अवस्था का प्रतीक होता है और फिर सत्यकेतु के भाव से यश अर्थात् प्रताप का भाव पैदा होता है जो प्रतापभानु रूपी पुत्र कहलाता है। जब यश इच्छा प्रबल हो जाती है, तो शत्रुदमन की इच्छा स्वत: पैदा हो जाती है। अत: अरिमर्दन को प्रतापभानु का छोटा भाई प्रतीक स्वरूप बताया गया है। उसी भावास्था का वर्णन करते हुए आगे कहा गया है कि -- धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना।। तेहि के भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा।। व्याख्या : सत्यकेतु रूपी राजा धर्म को धारण करने वाला और नीति को जानने वाला, तेज प्रतापवान, शीलवान व बलवान था। उसके दो पुत्र हुए जो सब गुणों के घर और युद्ध क्षेत्र में धैर्य रखने वाले थे। सत्य जीव की सहज अवस्था होती है, परन्तु रजोगुण के भाव जीव को सत्य से दूर कर देते हैं, इसलिए सत्य के लिए रजोगुणी भाव केतु ग्रह की तरह होता है। राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रताप भानु अस ताही।। अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा।। व्याख्या : सत्यकेतु रूपी राजा के प्रतापभानु रूपी बड़ा पुत्र हुआ जो राज धनी था। इस चौपाइ का रहस्य यह है कि जब राज धनी अर्थात् रजोगुण का प्रभाव ज्यादा होता है तो यश प्राप्ति की इच्छा प्रबल हो उठती है। उसी अवस्था को प्रतीक रूप में प्रतापभानु अर्थात् यश रूपी सूर्य कहा जाता है। यश के भाव के साथ ही शत्रुदमन का भाव पैदा होता है, इसलिए छोटे पुत्र का नाम अरिमर्दन के प्रतीक के रूप में कहा गया है। अरिमर्दन का भाव बहुत बलवान व भावों के संग्राम में अचल रहने वाला होता है। भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीति।। जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा।। व्याख्या : यश रूपी प्रतापभानु और अरिमर्दन रूपी भावों में सहमति होती है और दोनों भावों में निष्कपट प्रेम होता है। सत्यकेतु रूपी भाव से यश प्राप्त करने का रजोगुणी भाव पहले पैदा होता है। अत: यश की चाह प्रबल होने पर सत्यकेतु रूपी भाव शान्त हो जाता है, उसी को सत्यकेतु का परमात्मा के भजन के लिए वन गमन करना बताया गया है। सत्य और केतु को अलग-अलग समझने पर पाठकों को स्पष्ट समझ में आ जायेगा कि सत्य तो सहज गुणधर्म का द्योतक होता है और केतु रजोगुण या माया के गुणों का प्रतीक होता है। अत: सत्य का भाव तो सहज में परमात्मा के भजन में लग जायेगा और केतु का भाव रजोगुण में रूपान्तरित होकर साधक के हृदय में यश व लोकप्रतिष्ठा की प्रबल इच्छा पैदा कर देता है। उसी सूक्ष्म भाव अवस्था को यहाँ प्रतापभानु राजा के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। दो0 जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस। प्रजा पाल अति बेद बिधि कतहुँ नहिं अब लेस।।153।। व्याख्या : जब यश रूपी सूर्य का उदय होता है तो यश की लालसा नर की धड़कन में समाकर सारे शरीर रूपी राज्य में छा जाती है। उस अवस्था में नीति का पालन आदि सब कार्य यश की इच्छा से ही होने लगते हैं। समस्त भावों में नीति की प्रधानता आ जाती है, इसलिए पाप अर्थात् चिन्ता कहीं पर भी नहीं होती है। नृप हितकारक सचिव समाना। नाम धरम रूचि सुक्र समाना।। सचिव समान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा ।। व्याख्या : जब नर की धड़कन हित करने वाली होती है अर्थात् सात्विक होती है, तो समझदार भाव रूपी मंत्री पैदा होने लगते हैं तथा उन सयाने भावों की धर्म में रूचि होती है और वे भाव शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान होते हैं। जब भाव रूपी मंत्री सयाने होते हैं और काम, क्रोध, मद व लोभादि शत्रुओं का दमन करने वाला अरिमर्दन रूपी भाव होता है, तो अपने आप प्रताप का प्रकाश हो उठता है, जो भावों के संग्राम में धैर्यवान बना रहता है। सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा।। सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना।। व्याख्या : उस अवस्था में सत, रज, तम व गुणातीत भावों रूपी अपार चतुरंगी सेना और नाना भावों रूपी योद्धा होते हैं, जिनके रहस्य को जानकर साधक का मन हर्षित हो उठता है तथा ध्यान में ही अनहद नाद के नाना बाजे बजने की ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है। बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई।। जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआईं।। व्याख्या : उस अवस्था में प्रताप भानुरूपी भाव अन्य समस्त भावों को जीतना चाहता है इसलिए नर की धड़कन को प्रभावित करके यश प्राप्त की इच्छाओं की सेना बनाकर अन्य भावों को जीतने के लिए चला। उस समय जहाँ-तहाँ भावों में द्वन्द्व रूपी संग्राम शु डिग्री हो जाता है। उस समय भाव संग्राम में यश की प्राप्ति की इच्छा रूपी प्रताप भानु का भाव अन्य समस्त भावों को जीत लेता है। सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे।। सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रताप भानु महिपाला।। व्याख्या : प्रतापभानु रूपी यश के भाव ने सप्त द्वीप अर्थात् शरीर के समस्त सातों चक्रों को प्रभावित कर दिया और सातों चक्रों पर नर की धड़कन को प्रभावित करके अपने वश में कर लिया। उस अवस्था में शरीर रूपी पृथ्वी के समस्त मंडलों में प्रतापभानु रूपी यश के भाव का प्रभाव छा गया। चक्र विज्ञान के अनुसार शरीर में सात चक्र प्रधान होते हैं और इन सातों चक्र पर नर की धड़कन की गति के अनुसार ही भाव पैदा होते हैं। अत: जब यश की लालसा का भाव सातों चक्रों पर नर की धड़कन को प्रभावित कर देता है, तो समस्त शरीर के मण्डलों में यश प्राप्ति का सूर्य उदित हो उठता है। साधक को भावों के अनुरूप यश की प्राप्त भी होना शु डिग्री हो जाती है। दो0 स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु। अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु।।154।। व्याख्या : प्रतापभानु रूपी भाव ने (अर्थात यश लालसा) जब शरीर रूपी विश्व को अपने वश में कर लिया, तो यश रूपी प्रतापभानु ने शरीर में अपनी सहज अवस्था बना ली और धर्म, अर्थ व काम आदि के सुखों का भोग भोगने लगा। भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।। सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी।। व्याख्या : जब प्रतापभानु रूपी यश की लालसा का भाव प्रबल हो जाता है तो शरीर रूपी भूमि में काम की नाना इच्छाएँ पैदा होने लग जाती हैं, जो कभी दु:ख नहीं चाहती और केवल समस्त भावों का सुख चाहती हैं। उस समय धर्म व शीलता के लक्षणों से युक्त होकर नर व नाड़ी धड़कने लगते हैं। सचिव धरमरूचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती।। गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में भाव रूपी मंत्री की धर्म में रूचि होती है तथा परमात्मा के चरणों में प्रेम पैदा हो जाता है तथा मंत्री रूपी भाव अर्थात् साधक का अन्त: मन नृप अर्थात् नर की धड़कन को प्रभावित कर नीति के भाव पैदा करवाने का प्रयास करता है। गुरु अर्थात् ज्ञान रूपी प्रकाश, स्वर, संशयों का अंत अर्थात् संत और शरीर में स्थित सभी भाव नर की धड़कन की गति के अनुसार पैदा होते हैं। भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने।। दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना। सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना।। व्याख्या : भावों रूपी राजा के धर्म का जिसका वर्णन वेदों ने किया है, उसका सहज अवस्था में सुख पूर्वक पालन होने लग जाता है। साधक को जब भावों का मर्म समझ में आ जाता है, तब वह संग्रह की वृति को छोड़कर त्याग की वृतिवाला हो जाता है और शास्त्र व वेदों को सुनने में उसकी रूचि बढ़ जाती है। नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा।। बिप्र भवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक का मन सुमन अर्थात अच्छा मन यानी निर्मल मन हो जाता है। अत: उस अवस्था में निर्मल मन के नाना भाव व इच्छाएँ ही बावडी, कुआ, तालाब व सुंदर बगीचे के रूप में लगने लगते हैं। उस समय विशुद्ध प्रकाश के भाव सुरभवन अर्थात् स्वरों के माध्यम से संचरित होने लगते हैं। तब समस्त तीनों गुणों से ये विचित्र सुखद अवस्था पैदा होती है। साधना की परिपक्वता में तीनों गुणों के भाव भी निर्मलता से युक्त हो जाते हैं और ये सब मिलकर सुमन अर्थात् निर्मल मन बनाते हैं। दो0 जहँ लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग। बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग।।155।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक हजारों-हजारों यज्ञ अनुराग सहित करने लगता है, जिनका वर्णन वेदों व पुराणों में नाना प्रकार से किया गया है। यज्ञ का मतलब अग्नि में घी डालना नहीं है। वास्तविक यज्ञ तो अपान का पान में हवन करना माना गया है। अत: जब साधक ध्यान में परमात्मा के साथ जुड़ जाता है, तो उसके हृदय में परमात्मा के प्रति विशेष अनुराग पैदा हो जाता है और उस समय स्वत: ही साधक की पान वायु में अपान वायु का हवन होने लग जाता है। उसी अनुभूति का यहाँ वर्णन किया गया है। हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।। करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी।। व्याख्या : जब साधक की पान वायु में अपान वायु का हवन होना शु डिग्री हो जाता है, तो उसके हृदय में फल प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं रहती क्योंकि उसका भाव परम विवेक वाला हो जाता है, जिससे सहजता आ जाती है। उस समय सहजता से ही मन, वचन व कर्म की धारणा शक्ति आ जाती है और उसी के अनुसार इस शरीर में नर की धड़कन ज्ञान के भाव पैदा करने लगती है। चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा।। बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ।। व्याख्या : साधक का जब तक अनुराग परमात्मा में बना रहता है, तब तक तो ठीक रहता है परन्तु तब भी बीच-बीच में कोई न कोई इच्छा अचानक मानस पटल पर आती रहती है और साधक थोड़ा सा भी असावधान हुआ कि इच्छा का भाव रूपी घोड़ा इच्छा रूपी मृग का शिकार करने को दौड़ पड़ता है। उस अवस्था में साधका इच्छा रूपी घोड़ा बिंद अ अचल अर्थात् ध्यान की गहराई में ही इच्छा पूर्ति की कल्पना साधक के मन रूपी घोड़े को ले जाती है और वहाँ बहुत सी सात्विक इच्छा रूपी मृगों का साधक वध भी करता रहता है अर्थात् इच्छाओं का समन करता हुआ भोग वासना में आगे बढ़ने की कल्पना करने लगता है। पुनीत मृग से तात्पर्य सात्विक इच्छाओं से ही है। क्योंकि भोग वासना की इच्छा पैदा होने से पहले अन्तर:मन में परमात्मा के भजन की या परोपकार आदि की सात्विक इच्छा पैदा होती है परन्तु भोगों की लालसा में आकर्षित हुआ मन इन सात्विक इच्छाओं का समन करता हुआ बिंध्याचल अर्थात् अज्ञानरूपी वन में चला जाता है। फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू।। बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगलित नाहीं।। व्याख्या : तब साधक का मन रूपी घोड़ा अज्ञान रूपी वन में घुस जाता है, तो वहाँ बाराह उ बा अ राह अर्थात् संसार रूपी (अज्ञान) वन में दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि रूपी बारह रास्ते दिखायी पड़ने लगते हैं। तब बारह (दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि) रास्ते दिखायी पड़ते हैं तो ऐसा लगने लगता है, जैसे चन्द्रमा रूपी मन की शान्ति को राहू (वासना) रूपी ग्रह ने खा लिया हो और उस समय वासना रूपी राहू का मुख ऐसे लगता है जैसे शान्ति रूपी बड़ा चन्द्रमा उसके मुख में नहीं आ रहा हो परन्तु क्रोध के कारण उसे छोड़ना भी नहीं चाह रहा हो। यहाँ पर बहुत ही सूक्ष्मता के साथ अनुभूति को लिखने का प्रयास किया गया है, जिसे ध्यान की अवस्था में ज्यादा अच्छी तरह से समझा जा सकता है। कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई।। घुरूघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ।। व्याख्या : जब मन रूपी घोड़ा किसी वासना भाव के पीछे हो जाता है तो वासना रूपी सर्प दस इन्द्रियों के द्वारा प्रकट होने लगते हैं और फिर शरीर में इनका प्रभाव बढ़ने लगता है जिससे शरीर की बाराह अर्थात् मन, बुद्धि व इन्द्रियों में ये वासना रूपी भाव और अधिक घुर्राने (गहराने) लगते हैं। तब ये बारह मन-बुद्धि सहित इन्द्रियाँ दृष्टि से व कानों से आश्चर्यचकित होकर देखते व सुनते हैं। दो0 नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु। चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में साधक को हालाँकि समझ में आता रहता है कि मन रूपी घोड़ा बाराह (मन, बुद्धि व इन्द्रियों) के पीछे अज्ञान रूपी वन में फँसता चला जा रहा है। उस समय साधक को शरीर में तमोगुण के प्रभाव का पता चल जाता है परन्तु फिर भी मन रूपी घोड़ा बाराह का पीछा करता हुआ अज्ञान रूपी जंगल में चला ही जाता है। आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरूत गति भाजी।। तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना।। व्याख्या : जब साधक का सात्विक भावों वाला मन बराह (मन, बुद्धि व इन्द्रियों) को मारने का प्रयास करता है अर्थात् इन्द्रियों के समन का प्रयास करता है तो इन्द्रियों सहित मन व बुद्धि प्राण वायु में लीन होकर तीव्रता से आभासित होने लगते हैं। तब साधक प्राण को स्थिर कर नर की धड़कन को नियंत्रित कर इन्द्रियों का समन करने का प्रयास करता है, तो इन्द्रियों सहित मन व बुद्धि शरीर रूपी धरती में लीन हो जाते हैं अर्थात् तन व मन की ग्रंथि इतनी जटिल हो जाती है कि समझ में ही नहीं आ पाता है कि बराह रूपी इन्द्रियों को कैसे वश में करें। तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा।। प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा।। व्याख्या : उस अवस्था में ध्यान में साधक का सात्विक मन रूपी राजा ज्ञान रूपी बाण चलाकर बराह (दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि) को मारना चाहता है परन्तु बराह तो शरीर में नाना प्रकार से वासनाओं व भोगों का लालच दिखाकर अपने-आपको बचाने का प्रयास करता है। उस अवस्था में स्वरों में वासना भोग के भाव संचरित होने से बराह मर नहीं पाता है, जिसके कारण मृग रूपी वासनाएँ कभी प्रकट होने लगती है, तो कभी शान्त सी दिखने लगती है। उस अवस्था में साधक का मन रूपी राजा उन मृग रूपी वासनाओं के पीछे चला जाता है। अर्थात् अज्ञान रूपी वन में सात्विक मन रूपी राजा फँसता चला जाता है। गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू।। अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू।। व्याख्या : इस प्रकार मृग रूपी वासना का पीछा करता-करता सात्विक मन गहन अंधकार रूपी अज्ञान वन में चला जाता है, जहाँ पर सात्विक बल व सात्विक इच्छाएँ भी नहीं पहुँच पाती हैं। इसलिए सात्विक मन अकेला अज्ञान रूपी वन के भयंकर कष्टों में फँस जाता है। फिर भी उस अवस्था में भी मन का चिंतन वासना रूपी बाराह के जाल से मुक्त नहीं हो पाता है। अर्थात् मन, बुद्धि व इन्द्रियों का जाल बहुत प्रबल होता है, जिसमें से साधक को निकलना बहुत दुर्गम होता है। कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरि गुहाँ गभीरा।। अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई।। व्याख्या : साधक को सात्विक मन रूपी घोड़े के धैर्य को देखकर भोगवासना रूपी बराह (अर्थात् मन, बुद्धि व इन्द्रियों सहित) गम्भीर गुफा में घुस गया अर्थात् मन, बुद्धि व इन्द्रियाँ कहाँ से पैदा होती हैं, वो साधक के समझ में नहीं आया क्योंकि ध्यान की अवस्था में तो मन इन्द्रियों सहित चित रूपी गुफा में छुप जाता है। चित रूपी गुफा को अगम्य जानकर भाव रूपी राजा घबरा गया और भोगवासना रूपी कल्पना के वन में रास्ता भूल गया। साधक का मन जब संसार के बारह रास्तों में (मन, बुद्धि व इन्द्रियाँ) भटक जाता है, तो भोगवासना के नाना भाव पैदा हो जाते हैं। उसी को प्रतीकात्मक रूप से राजा का घने जंगल में भटक जाना बोलकर लिखा है। उस अवस्था में साधक का मन पश्चाताप करने लगता है। दो0 खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत। खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत।।157।। व्याख्या : जब यश की लालसा वाला प्रताप रूपी भाव भोग वासना की लालसा वाले अज्ञान रूपी जंगल में फँस गया, तो वह दु:खी खिन्न, यश रूपी क्षुधा व प्यास से पीडित मन रूपी घोड़े सहित व्याकुल हो गया, तो संतोष रूपी जल के अभाव में अचेत हो गया। अचेत का तात्पर्य संसार में फँस जाने से है। जब साधक सचेत होता है तो वह विषय वासनाओं से अपने-आपको बचा लेता है परन्तु अचेत होने पर वह विषय-वासनाओं में फँसता ही चला जाता है। तब उसमें असंतोष रूपी प्यास व भूख बढ़ जाती है और संतोष रूपी जल का अभाव हो जाता है। फिरत बिपिन आश्रम एकदेखा। तहँ बस नृपति कपट मुनि बेषा।। जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।। व्याख्या : जब साधक का मन लालसा रूपी वन में भ्रमण करने लगता है, तब लालसा पूर्ण होने की क्षणिक आशा पैदा होती रहती है। उसी उम्मीद को जंगल में एक आश्रम का दिखायी पड़ना बताया गया है। उस अज्ञान रूपी जंगल में नर की धड़कन से कपट के भाव पैदा होकर मन का कपटी स्वरूप पैदा करते हैं। नर की धड़कन का विज्ञान यह है कि अगर वासना के भाव प्रबल होते हैं, तो नर की धड़कन की गति भी वैसी हो जायेगी और वासना के ही भाव पैदा होते चले जायेंगे और अगर मन में सात्विक भाव ज्यादा है, तो नर की धड़कन भी सात्विक भावों को ही पैदा करने लग जाती है। इसलिए यहाँ एक बार नर की धड़कन से कपटी मन का स्वरूप पैदा होना बताया गया है, तो दूसरी चौपाई मे सात्विक नर की धड़कन का वर्णन किया गया है जिससे सात्विक भाव पैदा होकर वासना रूपी अज्ञान के राज्य को जीत लेना बताया गया है। जब वासना रूपी राज्य छिन जाता है, तो वासना के भावों रूपी सेना भी पराई हो जाती है अर्थात् वासना के भाव शान्त हो जाते हैं। समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी।। गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी।। व्याख्या : जब यश रूपी सूर्य का प्रताप बढ़ता है तब कुछ विषय वासनाएँ दमित हो जाती हैं और वे समय आने के इंतजार में रहती हैं। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। यश रूपी सूर्य का प्रताप रजोगुण पर टिका रहता है। उस रजोगुणी अवस्था में साधक के मन में भोगों की लालसा जरूर रहती है परन्तु नीति का विचार करके लालसाओं का दमन करता रहता है। वे दमित वासनाएँ समय आने पर पुन: प्रकट हो उठती हैं। वे वासनाएँ पूरी तरह शांत नहीं होती हैं, इसलिए ""गयउ न गृह"" बोलकर लिखा गया है। वासनाओं का भाव रजोगुणी नर की धड़कन में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए नहीं मिल पाता है परन्तु असहाय होकर शान्त सा हो जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस के साजा।। तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा।। व्याख्या : वासना का यह स्वभाव होता है कि शरीर रूपी वन में तापस के भेष में छुपी रहती है। तापस भेष का तात्पर्य यह है कि वासना का मूल भाव तो भोग लालसा होती है परन्तु ऊपर से त्याग रूपी भेष धारण किए रहती है। जब वासना का दमन किया जाता है, तो वासना का भाव अपने हृदय में क्रोध को दबाकर रह जाता है। जब ऐसे वासना भाव के पास यश रूपी सूर्य का प्रताप पहुँचता है, तो वासना का भाव उसे तुरन्त पहचान लेता है। वासना का भाव अच्छी तरह जानता है कि यश रूपी सूर्य को भोगों की लालसा में फँसाया जा सकता है। यश और लालसा के भावों में बहुत सूक्ष्म अन्तर होता है। राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना।। उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा।। व्याख्या : यश रूपी सूर्य का भाव यश की इच्छा का प्यासा होने के कारण वासना के भाव को नहीं पहचान पाया और वासना की लालसा को ही महामुनी समझ लिया। वासना को जब समझने में भूल हो जाती है, तभी साधक की साधना भ्रष्ट होती है। प्रारम्भ में साधक को यश मिलता रहता है, तो उसे बहुत खुशी होती है परन्तु थोड़ा सा भी असावधान होने पर यश की चाह से काम, क्रोध, मद व लोभ आदि के विकार पैदा हो जाते हैं। जब ये विकार पैदा हो जाते हैं तो साधक का यश रूपी सूर्य सात्विक मन रूपी घोड़े से उतर जाता है और वासना के सामने प्रणाम करने लगता है परन्तु फिर भी चतुराई रखने की कोशिश करता है और अपना परिचय छुपाने का प्रयास करता है। यहाँ भावों को बहुत ही सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। यश की इच्छा जब होती है तब भी साधक ऊपर ऊपर से यही दिखाने की कोशिश करता है कि उसे यश आदि की कोई लालसा नहीं है। परन्तु भीतर तो यश की लालसा गहरी होती है। अत: उसी भाव अवस्था को राजा द्वारा अपना परिचय नहीं देना बोलकर बताया गया है। दो0 भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरब डिग्री दीन्ह देखाइ। मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ।।158।। व्याख्या : यश रूपी प्रतापभानु को यश की लालसा में प्यासा देखकर वासना रूपी कपटी मुनि ने भोग लालसा रूपी सरोवर दिखला दिया अर्थात् यश प्राप्ति की सांत्वना देदी। तब उस अवस्था में यश की लालसा में प्यासा प्रतापभानु और उसके मन रूपी घोड़े ने आशा रूपी जल पान करके हर्ष का अनुभव किया। वास्तविकता में प्रत्येक जीव के साथ यही होता है कि जब यश की लालसा में फँस कर मन व्याकुल हो जाता है, तो उस समय यदि कोई झूठी दिलासा दिला देता है, तो भी कुछ देर के लिए तो मन को शान्ति मिल जाती है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ प्रतीकों के रूप में लिखा गया है। गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।। आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी।। व्याख्या : दिलासा रूपी सरोवर में आशा रूपी जल का पान करने से प्रतापभानु रूपी यश के भाव को सब थकान दूर हो गयी और तब कपटी मुनि भेष धारी नृप (अर्थात् नर की धड़कन विकार युक्त धड़कने लगी) अपने आश्रम में ले गया। वहाँ ज्ञान रूपी सूर्य का अस्त हुआ जानकर कपटी मन रूपी तापस ने प्रतापभानु रूपी यश के भाव को आसन दिया और कपटी मन रूपी तापस मधुर वाणी में बोलने लगा। को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें ।। चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें।। व्याख्या : उस अवस्था में कपटी मन और सात्विक मन के भाव आपस में बातें करने लग जाते हैं। तब कपटी मन कहता है कि हे यश रूपी प्रतापभानु! तुम इस वासनारूपी जंगल में अकेले क्यों घूम रहे हो। तुम सुंदर व युवा हो और जीव की प्रकृति से उत्पन्न हो। तुम्हारे चक्रवर्ती राजा के लक्षणों को देखकर मुझे तुम पर दया आ रही है। यश का भाव ऐसा होता है, जो समस्त भावों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, इसलिए यश के भाव में चक्रवर्ती लक्षण दिखायी पड़ना स्वाभाविक होता है। नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा।। फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़े बाग देखऊँ पद आई।। व्याख्या : तब यश रूपी प्रतापभानु अपना परिचय छुपाकर परिचय देता है। यश के भाव की यही विशेषता होती है कि वह अपनी मूल इच्छा को कभी प्रकट नहीं होने देता है इसलिए यश की खूब चाह होते हुए भी जीव हमेशा यश प्राप्ति करने की इच्छा को छुपाए रखने का प्रयास करता रहता है। उसी सूक्ष्म भाव अवस्था को यहाँ लिखा गया है कि यश का भाव कहता है कि मैं यश रूपी प्रतापभानु राजा का सचिव हूँ और मैं यहाँ भोग लालसा रूपी शिकार करते हुए रास्ता भूल गया हूँ। परन्तु यह मेरा बड़ा भाग्य है कि आपके दर्शन हो गए हैं। हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा।। कह मुनि तात भयउ अँधिआरा। जोजन सत्तरि नग डिग्री तुम्हारा।। व्याख्या : भावों के आपसी वार्तालाप से आपस में ही भ्रम पैदा हो जाता है। अत: यश रूपी प्रतापभानु कहता है कि हे मुनि! आपका तो दर्शन ही दुर्लभ होता है परन्तु मेरा कुछ भला होगा इसलिए ही आपके दर्शन हुए हैं। तब कपटी मन रूपी भाव कहता है कि अब अज्ञान रूपी अंधकार हो गया है और आपका नगर भी सत्त योजन दूर है। शत योजन का रहस्य यह है कि जीव के मन की सौ वृतियाँ होती हैं और ये वृतियाँ ही सौ भाव पैदा करती हैं, जिसे बोलचाल की भाषा में सौभाव अर्थात् स्वभाव कहते हैं। ये वृतियाँ ही योजन कहलाती हैं। जब यश का भाव शत वृतियों को पार करके वासना रूपी जंगल में फँस जाता है, तो उसी अवस्था को प्रतीक के रूप में शत योजन दूर नगर होना बताया गया है। दो0 निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान। बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान।।159(क)।। व्याख्या : जब यश रूपी प्रतापभानु वासना रूपी घने जंगल में घोर अँधिआरी रात में फँस जाता है, तो कोई रास्ता दिखायी नहीं देता है। अत: कपटी मन रूपी तापस सलाह अर्थात् दिलासा देता है कि आज तो यहीं रूक जावो और जब ज्ञान रूपी सबेरा हो तब चले जाना। दो0 तुलसी जसि भवतव्यता तैसी मिलइ सहाइ। आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ।।159(ख)।। व्याख्या : तुलसीदास कहते हैं कि जैसी भावों की व्यवस्था होती है अर्थात् जिस प्रकार के भाव होते हैं, जीव को वैसी ही सहायता मिल जाती है। वह सहायता अपने आप चलकर नहीं आती है बल्कि जिसको सहायता मिलनी होती है, उसे ही वहाँ ले जाती है। भलेहिं नाथ आयुस धरि सीसा। बाँधि तुरग त डिग्री बैठ महीसा।। नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही।। व्याख्या : तब यश रूपी प्रतापभानु ने कपटी मन रूपी तापस की आज्ञा मानकर मन रूपी घोड़े को बांधकर पेड़ के नीचे बैठ गया अर्थात् कपटी मन रूपी तापस की झूठी दिलासा में विश्वास कर लिया। ऐसी अवस्था में कपटी मन के भाव नाना प्रकार के तर्क देकर दिलासा देने लगते हैं। उससे सात्विक मन वाले यश के भावों को विश्वास हो जाता है, इसलिए कपटी मन रूपी तापस की नाना प्रकार से मन ही मन प्रशंसा करने लगते हैं तथा चरण वन्दन अर्थात् समर्पण की भावना बढ़ती चली जाती है और भ्रम वश अपने भाग्य की सराहना करते हैं। पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।। मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।। व्याख्या : यश रूपी भाव उस अवस्था में और समर्पण करता हुआ मधुर वाणी बोलता है कि आप तो पिता के समान हैं, इसलिए मेरी मूढ़ता को क्षमा करना और मुझे अपना सेवक जानकर आप अपना नाम बता दीजिए। तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना।। बैरी पुनी छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।। व्याख्या : सात्विक मन का यश रूपी भाव कपटी मन रूपी तापस भेष धारी नर की धड़कन को नहीं जान पाता है परन्तु कपटी मन यश रूपी भाव को जान लेता है। क्योंकि यश रूपी प्रतापभानु तो सुहृदय होता है और कपटी मन चालाक होता है। कपटी मन रूपी धड़कन तो सात्विक भावों की दुश्मन होती ही है और फिर क्षत्रिय अर्थात् क्ष अ त्रिय उ यानी तीनों गुणों का क्षय करने वाली होती है, इसलिए स्वयं के प्रभाव को बनाए रखने के लिए छल-बल के भाव पैदा करती रहती है। समुझि राजसुख दुखित अराती। आंवाँ अनल इव सुलगइ छाती।। सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।। व्याख्या : कपटी मन के भावों वाली धड़कन राज सुख के भोगों की याद करके दु:खी हो जाती है और कुम्हार के आव की तरह सुलग उठती है अर्थात् कपटी भावों को पैदा करने वाली नर की धड़कन भोगों की कल्पना करके आँव की तरह तपने लग जाती है। तब उस अवस्था में सात्विक भावों वाली नर की धड़कन से उत्पन्न भावों के कारण कपटी भाव वाली धड़कन अपने विरोधीपन को छुपाकर हृदय में प्रसन्नता दिखाने का प्रयास करती है। भावों की गति का नर की धड़कन पर इतना सूक्ष्मता से प्रभाव होता है कि कोई बिरला ही उसे गुरु कृपा से समझ पाता है। दो0 कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत। नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहति निकेत।।160।। व्याख्या : भावों के सूक्ष्म वार्तालाप के दौरान समझ में आता है कि कपटी भावों वाली धड़कन से उत्पन्न भाव दिखाने के लिए कपटपूर्ण बात को भी मधुरतापूर्वक बोलने का प्रयास करते हैं। और कपटी भावों में त्याग व वैराग्य नहीं होता है फिर भी त्याग व वैराग्य का परिचय देने का प्रयास करते हैं। अत: उसी भाव अवस्था की सूक्ष्मता को यहाँ निर्धन व घर से रहति होना बोलकर लिखा है। कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।। सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।। व्याख्या : तब यश रूपी प्रतापभानु का भाव कहता है कि तुम्हारे जैसे विज्ञान के घर अभिमान से परे होते हैं और सदा अपने आपको छुपाकर रखते हैं। आप कुभेष धारण करके भी सब प्रकार से कुशल रहते हैं। जब सात्विक भाव कपटी भावों के प्रभाव में आ जाते हैं, तब भ्रम की अवस्था पैदा हो जाती है और सात्विक भाव भ्रमवश कपटी भावों को विज्ञान घन व कुशल मान बैठते हैं। भ्रमवश कपटी भावों में ज्ञान-वैराग्य का आभास हो जाता है और सात्विक भाव सोचने लगते हैं कि ये अपने आपको छुपाकर रखते हैं। उसी को यश रूपी प्रतापभानु कहता है कि आप अपने आपको छुपाकर रखते हो परन्तु कुभेष अर्थात् तापस का भेष धारण करके भी सब प्रकार से कुशल हैं। तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।। तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।। व्याख्या : भ्रम की अवस्था में सात्विक भाव नाना प्रकार के तर्क देकर अपने भ्रम को बढ़ाते रहते हैं। यहाँ उसी सूक्ष्म अनुभूति को लिखा गया है कि संत व वेद सभी कहते हैं कि जो परमात्मा के दास होते हैं, वे ही परमात्मा को प्रिय होते हैं। अत: तुम्हारे समान त्यागी, भिखारी और घर से रहित तपस्वी को देखकर तो ब्रह्मा और शिव को भी संदेह हो जाता है। यहाँ ब्रह्मा अर्थात् सतोगुण और शिव अर्थात् विश्वास के भावों को संदेह हो जाता है कि त्याग व वैराग्य का असली स्वरूप क्या है? कभी-कभी भ्रमवश कपटपूर्ण वैराग्य भी सत्य सा लगने लग जाता है। उसी भाव की सूक्ष्मता को यहाँ लिखने का प्रयास किया गया है। जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।। सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।। व्याख्या : भ्रम की अवस्था में जब भ्रम बढ़ जाता है, तो यश रूपी प्रताप भानु कपटी भावों के सामने पूरी तरह समर्पण कर देता है और कहता है कि आप जो भी हैं मैं आपके चरणों में नमन करता हूँ। आप मुझ पर कृपा कीजिए। यहाँ पूरी तरह समर्पण जब आ जाती है, तो कपटी मन के भाव सहज प्रेम जानकर और अपने पर सात्विक यश के भाव का पूर्ण विश्वास और प्रेम देखकर। सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।। सुनु सति भाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।। व्याख्या : उस अवस्था में कपटी मन रूपी तापस यश रूपी भाव को अपनापन दिखाकर प्रेम दिखाने लगता है और बनावटी मधुर वाणी में बोलता है कि हे शरीर रूपी पृथ्वी के यश रूपी राजा! मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ कि मुझे यहाँ रहते हुए बहुत समय हो गया है। दो0 अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु। लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।। व्याख्या : कपट रूपी मन कहता है कि अभी तक मुझे कोई नहीं मिला है और मैंने भी आज तक किसी को बताया नहीं है क्योंकि लोक यश की चाह अग्नि के समान होती है, जो शरीर रूपी वन को जलाती रहती है। सो0 तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।161(ख)।। व्याख्या : तुलसी दास कहते हैं कि सुभेष देखकर के मूढ़ लोग धोखा खा जाते हैं, परन्तु चतुर नर धोखा नहीं खाते हैं अर्थात् कपटी मन की बातों में मूढ़ भाव आ जाते हैं, परन्तु जो भाव चतुर होते हैं, वे नहीं भ्रमित होते हैं। मयूर को देखिए वचन तो मीठा बोलता है परन्तु सर्प का आहार करता है। तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।। प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।। व्याख्या : कपटी मन का भाव दिखावा करते हुए बोलता है कि मैं लोकमान्यता के कारण संसार में छुपकर रहता हूँ और मुझे परमात्मा के अलावा किसी की जरूरत नहीं है । क्योंकि परमात्मा तो बिना बताए ही सब कुछ जानते हैं फिर कहिए संसार को रिझाने के लिए कौन सी सिद्धि चाहिये। वास्तविकता में यही होता है जब मन में कपट होता है तभी बड़ी-बड़ी त्याग-वैराग्य की बातें की जाती हैं। परन्तु भीतर तो कपटपूर्ण वासनाएँ हिलोरा मारती रहती हैं। तुम्ह सुचि सुमति परम प्रयि मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।। अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारून दोष घटइ अति मोही।। व्याख्या : तब कपटी मन रूपी कपट का भाव कहता है कि हे तात! आप तो पवित्र, सुमति व मेरे परम प्रिय हो और तुम्हारा मुझ पर बहुत विश्वास भी है। इसलिए अगर तुम से मेरा मर्म छुपाऊँगा तो बहुत दोष लगेगा। जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।। देखा स्वबस कर्म मन बानी । तब बोला तापस बगध्यानी।। व्याख्या : कपटी मन की यह विशेषता होती है कि वो जितनी उदासीपूर्ण बातें करता है, सात्विक मन उस पर उतना ही विश्वास करता चला जाता है। जब कपटी रूपी मन अच्छी तरह देख लेता है कि यश रूपी प्रतापभानु पूरी तरह वश में आ गया है, तब वह बगुले के समान शिकार पर ध्यान रखने वाला कपटी भाव बोलता है कि -- नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोलेउ पुनि सि डिग्री नाई।। कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।। व्याख्या : मेरा नाम एकतनु है। एकतनु नाम सुनकर प्रतापभानु रूपी भाव बोला कि मुझे आपका सेवक जानकर आपके नाम का अर्थ बताइये। दो0 आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि। नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।। व्याख्या : तब कपटी मन रूपी भाव कहता है कि जब से सृष्टि पैदा हुई है तभी से मेरी उत्पत्ति हुई है और तब से मैंने दूसरा शरीर धारण नहीं किया है इसलिए मेरा नाम एकतनु है। कपटी मन ही वास्तव में एक तनु होता है क्योंकि जब तक वासनाओं का कपट रहता है तब तक ही जीव शरीर धारण करता रहता है और जब वासनाओं का कपट मिट जाता है तब वह शरीर का त्याग कर देता है। जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।। तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।। व्याख्या : कपटी मन का भाव कहता है कि एकतनु होने की बात सुनकर आश्चर्य मत कीजिए क्योंकि तप अर्थात मन व इन्द्रियों के एकीकरण से संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि अगर सात्विक मन व इन्द्रियाँ एक हो जाती हैं, तो परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है और अगर कपटी मन के साथ इन्द्रियों का एकीकरण हो जाता है, तो संसार में आसक्ति बढ़ जाती है और एकतनु की अवस्था आ जाती है अर्थात् निरन्तर शरीर धारण करने की प्रक्रिया चलती रहती है। तप के बल से अर्थात् मन व इन्द्रियों के एकीकरण होने पर ही सृजन की क्रिया होती है और तप के बल से ही अणु-अणु में व्यापक सत्ता पालन करती है। तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।। भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा।। व्याख्या : तप के बल से ही साधक स्वयं अपने आप में समस्त सृष्टि को लीन कर लेता है और तप के बल से संसार में सब कुछ जानना सम्भव हो जाता है। ऐसी पुरातन उ पुर अ तन अर्थात् शरीर की वैज्ञानिक सम्मत बातें सुनकर यश रूपी प्रतापभानु के हृदय में अनुराग पैदा हो गया। करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।। उद्भव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।। व्याख्या : कर्म व धारणा के इतिहास को नाना प्रकार से समझाया और विवेक व वैराग्य का भी मर्म समझाया। उत्पत्ति, पालन व प्रलय की प्रक्रिया का भी आश्चर्य के साथ वर्णन किया। ध्यान में एक अवस्था यह आती है कि साधक को शरीर का रहस्य अपने आप समझ में आने लग जाता है और उसे उत्पत्ति, पालन व प्रलय की भाव प्रक्रिया भी समझ में आने लग जाती है। उसे जानकर ही साधक को आश्चर्य होता है कि मैं तो किसी और को सृष्टि का सृजक, पालक व संहारक समझता था, परन्तु अब तो समझ आ रहा है कि मेरे भाव ही सृष्टि के सृजक, पालक व संहारक हैं। जैसे मेरे भाव हैं, वैसी ही मुझे सृष्टि दिखायी पड़ रही है। यही साधक का आश्चर्य होता है। सुनि महीप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयऊ।। कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।। व्याख्या : यश रूपी प्रताप भानु कपटी मन रूपी तापस की बातों से वश में आ गया, तब कपटी मन रूपी तापस कहने लगा कि हे प्रतापभानु रूपी यश! मैं तुम्हें जानता हूँ परन्तु तुमने अपने-आपको छुपाने का जो प्रयास किया है, वो मुझे (कपटी मन) अच्छा लगा है। सो0 सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप। मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारी तव।।163।। व्याख्या : तब कपटी मन का भाव कहता है कि हे प्रतापभानु रूपी यश! राजा जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं बोलता है। अत: तुम्हारी चतुरता को देखकर मुझे तुम से प्रेम हो गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी भाव अपनी लालसा को सीधा प्रकट नहीं करता है इसलिए कपट रूपी मन को उससे बल मिलता रहता है। यही यश रूपी भाव की चतुराई होती है। नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।। गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।। व्याख्या : कपटी मन रूपी भाव कहता है कि तुम्हारा नाम प्रतापभानु है अर्थात् यश की इच्छा है और तुम्हारा पिता रजोगुण रूपी सत्यकेतु है। क्योंकि रजोगुण का भाव सत्य के लिए केतु ग्रह की तरह होता है और रजोगुण से ही यश की इच्छा प्रबल होती है। गुर प्रभाव अर्थात् क्रिया (गुर) के द्वारा भावों के रहस्य को जाना जा सकता है। परन्तु उस भावों के मर्म को समझने का मन प्रयास नहीं करता है क्योंकि उससे मन के कपट का पर्दाफाश हो जाता है। इसलिए ""आपन जानि अकाजा"" बोलकर कपटी मन भावों के मर्म को छुपाना चाहता है। देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई।। उपजि परी ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछें तोरें।। व्याख्या : कपटी मन रूपी भाव कहता है कि हे यश रूपी प्रतापभानु! तुम्हारी सहजता, प्रेम औेर नीति में निपुणता देखकर मेरे मन में ममता पैदा हो गयी है। इसलिए अब मैं सब कथा को तुम्हें बताता हूँ। जब लोकप्रतिष्ठा की लालसा का भाव कपट के भावों के वश में आ जाता है, तब कपट प्रभावी होकर यश की लालसा को विकृत कर देता है अर्थात् उस समय यश पाने के लिए जीव कपट का सहारा लेने लगता है और वासनाओं के जाल में फँस जाता है। इसी भाव अवस्था को सूक्ष्मता के साथ यहाँ समझाया गया है। अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।। सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।। व्याख्या : कपट रूपी मन का भाव बोलता है कि अब मैं (कपट) प्रसन्न हूँ, इसमें संदेह नहीं है, अत: जो भी इच्छा हो, वो माँग लो। वास्तविकता में यही होता है कि जब वासनाओं का प्रभाव बढ़ जाता है तो मन का कपट भी बढ़ जाता है और यश आदि के भाव प्रबल हो उठते हैं। यश की लालसा की प्रबलता को ही प्रतापभानु रूपी राजा की प्रसन्नता कहा गया है। उस अवस्था में यश की लालसा का भाव कपट रूपी तापस के आगे पूरी तरह समर्पण कर देता है। उसी को चरणों में गिरना या चरण पकड़ना कहा गया है। कृपा सिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।। प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।। व्याख्या : यश के भाव को लालसा प्रबल हो जाने पर कपट का भाव ही अच्छा लगने लग जाता है। इसलिए कहता है कि मेरे पास धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फल हैं। यश का भ्रम पैदा हो जाने पर साधक को यही लगने लगता है कि वो तो सर्वश्रेष्ठ है, उसके पास तो सब कुछ है इसलिए संसार में सम्मान होना ही चाहिये। सब कुछ होने की प्रतीति होने पर भी यश की लालसा कभी संतुष्ट नहीं होती है। अत: उसी भाव अवस्था को अगम वर अर्थात् निरन्तर यशस्वी बने रहने की इच्छा पूर्ति का वर माँगना बोलकर लिखा गया है। दो0 जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।। व्याख्या : जब साधक के अन्दर यश रूपी सूर्य का उदय हो जाता है तब वह जन्म-मरण से मुक्त होकर अमर होना चाहता है तथा अजय भी रहना चाहता है। उस अवस्था में साधक की इच्छा होने लगती है कि वह पूरी पृथ्वी पर राज करे अर्थात् समस्त संसार उसे जाने व उसकी पूजा करे। साधना करते हुए वह ऐसी कल्पना को सत्य करना चाहता है। कह तापस नृप ऐसेइ होउ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।। कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।। व्याख्या : तब कपटी रूपी तापस यश की लालसा को आश्वासन देता है कि ऐसा ही होगा परन्तु एक बाधा है। काल भी तुमको शीश झुकाएगा परन्तु विप्रकुल अर्थात् ज्ञान का विशुद्ध प्रकाश इसमें बाधा है। क्योंकि साधक को अगर ज्ञान का विशुद्ध प्रकाश हो गया तो वह वासनाओं के जाल से मुक्त हो जायेगा और उसे यश आदि की इच्छाएँ प्रभावित नहीं कर पायेंगी। तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।। जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।। व्याख्या : तप के बल से अर्थात् मन व इन्द्रियों के एकीकरण करने से ज्ञान का विशुद्ध प्रकाश बलवान हो जाता है, जिसके सामने कोई भी अज्ञान रूपी वासनाएँ नहीं टिक पाती हैं। इसलिए यश रूपी राजा अगर विशुद्ध प्रकाश को अपने वश में कर लो तो ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी वश में हो जायेंगे अर्थात् सत, रज व तम अवस्था के भाव भी वश में हो जायेंगे। चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहुँ दोउ भुजा उठाई।। बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला।। व्याख्या : ब्रह्मकुल के सामने वश नहीं चलता है। ब्रह्म कुल से तात्पर्य भावों की उत्पत्ति की प्रक्रिया से है। जब कोई एक भाव पैदा हो जाता है तो भाव से भाव और फिर भाव से भाव अनवरत रूप से पैदा होते रहते हैं। इसलिए कपटी मन रूपी तापस कहता है कि विशुद्ध प्रकाश (विप्र) वाले भावों के सामने वासना व लालसा रूपी भावों का वश नहीं चलता है। इसलिए जब तक विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञान के भावों में ग्लानि (श्राप) नहीं होगी तब तक तेरा अन्त कभी नहीं हो सकता है। वास्तव में जब ज्ञान के विशुद्ध प्रकाश वाले भाव ग्लानि करने लग जाते हैं कि कहाँ विषयों के जाल में फँस गया, तब ही यश आदि के भावों से विरक्ति होती है और जब विरक्ति होने लग जाती है, तभी वासनाओं का अन्त होना शु डिग्री हो जाता है। हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू।। तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।। व्याख्या : कपटी मन रूपी तापस की बातें सुनकर यश रूपी भाव हर्षित हो उठा कि अब मेरा नाश नहीं होगा। जब कपट के भावों का साथ यश आदि के भावों को मिल जाता है तो यश आदि के भाव अपने आपको बलवान व अजय मान बैठते हैं। इसलिए उसी भाव मर्म को यहाँ कपटी मन रूपी तापस की कृपा बोलकर लिखा है। उस अवस्था में यश का भाव सोचने लग जाता है कि उसका सभी कालों में कल्याण ही होगा। यश की इच्छा का जाल जीव को बुरी तरह फँसा देता है जिससे बाहर निकलना बहुत दुर्गम हो जाता है। दो0 एवमस्तु कहि कपट मुनि बोला कुटिल बहोरि। मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि।।165।। व्याख्या : तब कपटी मन रूपी तापस कुटिलता के साथ बोला कि ऐसा ही होगा। परन्तु हमारे मिलन के बारे में भूलकर के भी किसी को मत बताना। वास्तव में यही होता है कि विकार के भाव अपने आपको छुपाकर रखना चाहते हैं क्योंकि ज्योंहिं विकार प्रकट होते हैं, तो उनका समाप्त होना शु डिग्री हो जाता है। विकार के भाव छुपे रहने पर ही बल दिखाते हैं। इसलिए कपटीमन रूपी तापस यश के लालसा वाले भाव से कहता है कि हमारे मिलन को और किसी को मत बताना। तातें मैं तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।। छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।। व्याख्या : कपटी मन रूपी तापस इसलिए यश के भाव को मिलने के प्रसंग को प्रकट करने के लिए मना करता है क्योंकि दो भावों का वार्तालाप अगर तीसरे भाव तक पहुँच जायेगा, तो भावों का अन्तर्द्वन्द्व शु डिग्री हो जायेगा और अन्तर्द्वन्द्व से ग्लानि पैदा हो जायेगी और ग्लानि पैदा होने पर हृदय में परमात्मा की प्रेरणा आनी शु डिग्री हो जाती है, जिससे वैराग्य के भाव प्रबल होने लग जाते हैं और वैराग्य के भावों के प्रबल होने पर कपट व वासना के भावों का मरना शु डिग्री हो जाता है। इसलिए कपटी मन रूपी तापस यश की लालसा के लिए प्रकट होने को मना करता है। यह प्रगटें अथवा द्विज श्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।। आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं।। व्याख्या : यश रूपी प्रताप भानु की लालसा का नाश या तो ज्ञान के विशुद्ध प्रकाश (विप्र) होने पर होता है या फिर यश की प्राप्ति की लालसा को प्रकट करने पर होता है। दूसरे किसी भी उपाय से प्रतापभानु रूपी लालसा का नाश नहीं हो सकता है, चाहे हरि अर्थात् माया के भावों का हरण करने की क्षमता आ जाए या स्वयं माया के भावों को वश में कर ले अर्थात् हर हो जाए। सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा।। राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। व्याख्या : तब यश रूपी प्रतापभानु के भाव ने कपटी मन रूपी तापस के भाव के सामने पूरी तरह समर्पण करते हुए कहा कि आपने सही कहा है कि जब साधक साधना द्वारा द्विज अर्थात विषय वासनाओं से मुक्त होकर दूसरा जन्म धारण कर लेता है और गुरु अर्थात् ज्ञान का प्रकाश हो जाता है तो वासना व लालसाओं को संसार में कौन बचा सकता है। अगर विधि (क्रिया) के करने में कोई भूल हो जाती है तो गुरु अर्थात् अन्त: करण के ज्ञान का प्रकाश साधक को बचा लेता है परन्तु अन्त:करण की प्रेरणा का विरोध करने पर संसार में कोई भी विषयों के जाल से बचा नहीं सकता है। जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।। एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा।। व्याख्या : प्रतापभानु रूपी यश लालसा का भाव कहता है कि हे नाथ! अगर मैं आपके कहे अनुसार नहीं चलूँगा तो मेरा जल्दी ही नाश हो जायेगा, इसका मुझे सोच नहीं है। परन्तु मेरा मन एक ही बात से डर रहा है कि शरीर रूपी पृथ्वी के विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों की ग्लानि बहुत कठिन होती है। भावों में ग्लानि पैदा होते ही वैराग्य की भावना प्रबल हो उठती है और वैराग्य से लालसाओं का पतन सुनिश्चित हो जाता है। दो0 होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ। तुम्ह तजि दीन दयाल निज हितू न देखउँ कोउ।।166।। व्याख्या : प्रतापभानु रूपी यश लालसा का भाव कपटी मन रूपी तापस से कहता है कि हे प्रभु! मैं विप्र अर्थात् विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश को भी वश में कर लूँ, ऐसा काई उपाय कृपा करके बताइये। क्योंकि आपके अलावा संसार में दूसरा कोई मुझे मेरा हित करने वाला नहीं दिख रहा है। सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।। अहइ एकअति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई।। व्याख्या : हे प्रतापभानु रूपी राजा! संसार में यश प्राप्ति करने के नाना उपाय हैं परन्तु उनको साधने में बहुत कष्ट है और फिर भी यश की प्राप्ति हो या नहीं भी हो सकती है। इसलिए एक बहुत सरल उपाय बताता हूँ परन्तु उसको करने में थोड़ी कठिनाई है। मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।। आजु लगें अ डिग्री जब ते भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।। व्याख्या : हे प्रतापभानु रूपी राजा! वो युक्ति मेरे पास है, जिससे यश की प्राप्ति हो सकती है परन्तु वह युक्ति मेरे (कपट) नगर अर्थात् शरीर में जाए बिना हो सकती नहीं है। मैं आज तक जब से पैदा हुआ हूँ, तब से किसी के घर या गाँव में नहीं गया हूँ। जौं न जाउँ तब होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू ।। सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम अति नीति बखानी।। व्याख्या : कपटी मन रूपी तापस बोला कि आज परन्तु बड़ा असमंजस की अवस्था हो गयी है, क्योंकि अगर मैं तुम्हारे नगर में नहीं जाऊँगा तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। ऐसी कपटपूर्ण बात सुनकर प्रतापभानु रूपी राजा बोला कि हे नाथ! वेदों ने ऐसी नीति बतायी है कि -- बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।। जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू।। व्याख्या : बड़े लोग सदा अपने से छोटों से स्नेह करते हैं जैसे पर्वत सदैव तिनकों को अपने सिर पर धारण करते हैं और जैसे अगाध समुद्र पानी के झागों को और धरती धूल के कणों को अपने ऊपर रखते हैं। दो0 अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल। मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।। व्याख्या : ऐसा कहकर प्रतापभानु रूपी राजा ने कपटी मन रूपी तापस के आगे पूरी तरह समर्पण कर दिया और कपटी तापस ही यश रूपी प्रतापभानु को अपना परम हितैषी लगने लग गया। वास्तव में जब यश की लालसा प्रबल हो उठती है तो विवेक का भाव कमजोर हो जाता है और साधक लोकमान्यता को प्राप्त करने के लिए छल-छद्म का सहारा लेने लगता है। लोकमान्यता की लालसा में बहुत से साधक फँस जाते हैं और आगे की साधना का मार्ग अवरूद्ध कर लेते हैं। उस अवस्था में कपट का भाव भी अच्छा, सज्जन व दयालु लगने लग जाता है। जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।। सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही।। व्याख्या : कपटी मन रूपी तापस प्रतापभानु रूपी यश की लालसा के भाव को पूरी तरह अपने अधीन जानकर कपटपूर्वक बोला कि हे राजा! मैं (कपट) सत्य कहता हूँ कि संसार में कुछ भी प्राप्त कर लेना मेरे लिए दुर्लभ नहीं होता है। यह व्यवहारिक सत्य है कि कपट के द्वारा सांसारिक सफलता प्राप्त करना आसान होता है। अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।। जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।। व्याख्या : कपटी मन रूपी तापस भाव कहता है कि मैं अवश्य ही तुम्हारा कार्य करूँगा क्योंकि तुम मन, वचन व कर्म से मेरे भक्त हो। परन्तु योग की युक्ति और मंत्र का प्रभाव तभी होता है, जब इन्हें छुपाकर किया जाता है। कपट का प्रभाव भी छुपा रहने तक ही होता है। जौं नरेस मैं करौं रसोई । तुम्ह परूसहु मोहि जान न कोई।। अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयुस अनुसरई।। व्याख्या : हे राजा! अगर मैं रसोई बनाउँ और तुम परसन करो तो मुझे कोई नहीं जान पायेगा। यहाँ भाव विज्ञान का रहस्य यह है कि कपट के भावों से जो रस पैदा होता है, अगर उस रस का पान विप्र अर्थात् विशुद्ध ज्ञान के भाव करते हैं तो वे भी कपट के भावों के प्रभाव में आकर लालसा के वश में हो जाते हैं। भावों से निकलने वाला हार्मोन ही भावों को पैदा करने वाला अन्न होता है। अत: जो-जो उस अन्न को खायेंगे, वे सब भाव कपट के भावों के अधीन हो जायेंगे। पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।। जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू।। व्याख्या : एक बार भावों के हार्मोन (रसायन) का असर होना शु डिग्री हो जाता है, तो उससे भावों से भाव और फिर भावों से भावों की प्रजनन क्रिया शु डिग्री हो जाती है। अत: उन भावों के सम्पर्क में जो भी भाव आते हैं, वे भी प्रभावित हो जाते हैं। इस प्रकार भावों की प्रक्रिया अनवरत रूप से चलती रहती है। इसलिए कपटी मन रूपी तापस प्रतापभानु रूपी यश के भाव को संवत भर के लिए संकल्प लेने की बात बोलता है। दो0 नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार। मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार।।168।। व्याख्या : इस प्रकार हजारों सैकड़ों नए-नए सात्विक भाव (द्विज) नित्य भोजन करेंगे और मैं (कपट रूपी तापस) संकल्प के अनुसार दिन में रसोई बना दूँगा। अर्थात् कपट के भावों से जो हार्मोन पैदा होंगे, उनसे नित्य नए-नए सैकड़ों हजारों सात्विक भाव भी प्रभावित होकर वासनाओं में लिप्त हो जायेंगे। सात्विक भावों का वासनाओं में लिप्त हो जाना ही कपट के भाव की विजय होती है। एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।। करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा।। व्याख्या : इस प्रकार हे राजन! थोड़े से ही कष्ट से सब विशुद्ध प्रकाश (वि अ प्र उ विप्र) के भाव तेरे वश में हो जायेंगे और विशुद्ध प्रकाश वाले भाव तो हवन अर्थात् पान का अपान में हवन करेंगे, उससे सभी देव भाव भी वश में हो जायेंगे। यहाँ पाठकों को समझने के लिए बता देना चाहता हूँ कि विशुद्ध प्रकाश (विप्र) के भाव सदैव प्राण को उर्ध्वगामी करते हैं और विवेक को बलवान बनाते हैं। परन्तु जब कपट के भावों के हार्मोन (रसायन) के प्रभाव के कारण विशुद्ध प्रकाश के भाव प्रभावित हो जाते हैं, तो प्राण व अपान की गति भी प्रभावित हो जाती है, जिससे प्राण से पैदा होने वाले भाव भी कपट के वश में आ जाते हैं। और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ।। तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया।। व्याख्या : मैं (कपट) एक और रहस्य बता देता हूँ कि मैं इस (कपट) भेष में नहीं आऊँगा। मैं तो तुम्हारे रसोइये को मेरी माया से हरण कर लूँगा। कपट का भाव कभी भी सीधा प्रकट नहीं होता है। वो तो किसी दूसरे भाव का आवरण बनाकर ही अपनी चाल चलता है। तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना।। मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा।। व्याख्या : तप के बल से उसको अपने ही समान करके मैं यहाँ वर्ष भर रखूँगा और मैं उसका भेष बनाकर तुम्हारे कार्य को सुधारूँगा। कपट का भाव इतना प्रबल होता है कि वह किसी भी भाव को अपनी ओर आकर्षित करके उसे अपने समान ही कपटी बना लेता है और कपट का भाव सहज में ही दूसरे भाव का आवरण धारण कर लेता है। गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे।। मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता ।। व्याख्या : हे प्रतापभानु रूपी राजन! अब अज्ञान रूपी रात्रि बहुत हो गयी है इसलिए सो जाइए। अब मेरी तुमसे तीसरे दिन भेंट होगी। मैं तुम्हें तपबल से मन रूपी घोड़े सहित सोते हुए ही (अर्थात् अज्ञान अवस्था में ही) तुम्हारे घर भेज दूँगा। इन चौपाइयों में बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। जब यश की लालसा का भाव कपट के भावों के प्रभाव में आ जाता है तो अज्ञान रूपी रात्रि गहराने लग जाती है और यश प्राप्ति के लिए साधक छल-कपट का सहारा लेना शु डिग्री कर देता है। उसी छल-कपट से पाखण्ड की शुरूआत होती है। इसलिए ज्यादातर साधक साधना से भटक कर पाखण्ड में फँसकर रह जाते हैं। जब अज्ञान ज्यादा बढ़ जाता है, तो मन व इन्द्रियों का एकीकरण होकर अज्ञान को और गहरा कर देता है, जिससे रग-रग में अज्ञान का प्रभाव हो जाता है। उसी को तुरग समेत हरना कहा गया है। दो0 मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि। जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहिं।।169।। व्याख्या : मैं तब तुम्हारे रसोइये का भेष धारण करके आऊँगा, तब मुझे पहचान लेना और एकांत में मैं तुम्हें तब सब बातें बता दूँगा। सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छल ग्यानी।। श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई।। व्याख्या : तब कपटी मन रूपी तापस की बात मानकर प्रतापभानु रूपी यश के भाव ने अज्ञान रूपी निद्रा ली और कपटी मन का भाव छल करने का विचार करने लगा। कपट के प्रभाव के कारण यश रूपी भाव अज्ञान रूपी निद्रा के आगोस में चला गया परन्तु कपट का भाव सोचने में लगा रहा। कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।। परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।। व्याख्या : उस अवस्था में कालकेतु रूपी असुर वहाँ प्रकट हो जाता है, जिसने बाराह अर्थात् संसार के बारह मार्गों (मन, बुद्धि व दस इन्द्रियों) द्वार यश रूपी प्रतापभानु को भटकाया था। कालकेतु का तात्पर्य उस काल अवस्था से है जिसमें साधक रजोगुण से तमोगुण के प्रभाव में आ जाता है। उस अवस्था में द्वेष व प्रतिशोध की ज्वाला जल उठती है। उसी को कालकेतु रूपी असुर के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। कालकेतु रूपी आसुरी अवस्था तो स्वाभाविक रूप से कपटी मन रूपी तापस का मित्र होती ही है। कालकेतु और कपट के मिलने पर कपट और गहरा हो जाता है। तेहि के सत सुत अ डिग्री दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई।। प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।। व्याख्या : कालकेतु रूपी आसुरी तामसिक अवस्था के सौ पुत्र अर्थात् तमोगुण से सौ भाव पैदा होते हैं और दस इन्द्रियों रूपी दस भाई होते हैं। जब तामसिक सौ भाव और दस इन्द्रियों का संयोग हो जाता है तो ये अजय हो जाते हैं और देव भावों को कष्ट देने वाले हो जाते हैं। पहले तो प्रतापभानु रूपी राजा ने विशुद्ध प्रकाश के ज्ञान भावों, संतों और देवभावों को दु:खी देखकर कालकेतु रूपी आसुरी भाव और उसके सहयोगियों को मार दिया था। तेहिं खल पाछिल बय डिग्री सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।। जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ।। व्याख्या : इसलिए कालकेतु रूपी आसुरी भाव और कपट रूपी तापस ने पिछले बैर को याद करके प्रतापभानु रूपी राजा का नुकसान करने का उपाय किया। साधना पथ में यह होता है कि जब सात्विक भावों के बढ़ने पर आसुरी भाव व कपट के भाव प्रारम्भ में शान्त तो हो जाते हैं परन्तु जब साधक को सिद्धियों की प्राप्ति होने लग जाती है तब ये आसुरी भाव पुन: प्रबल वेग से उठ खड़े होते हैं और साधक को नाना प्रकार से भटकाने की कोशिश करते हैं। उसी भाव अवस्था को यहाँ नाना प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। ऐसी अवस्था में भावों की प्रबलता के कारण साधक होश खो देता है, उसीको ""भावी बस न जान कछु राऊ"" बोलकर लिखा गया है। दो0 रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु। अजहुँ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।। व्याख्या : इसलिए साधक को सदा सावधान रहना चाहिये क्योंकि अकेला शत्रु को भी कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। अर्थात् छोटे-छोटे आसुरी भावों से भी सदैव सावधान रहना चाहिये वरना कभी भी साधक को भटका सकते हैं। जैसे सूर्य व चन्द्रमा को राहु ग्रह अभी भी कष्ट देता रहता है। तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलउ उठि भयउ सुखारी।। मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई।। व्याख्या : कपट रूपी तापस अपने कालकेतु रूपी तमोगुणी आसुरी भाव को देखकर हर्ष के साथ उठकर मिले और सुख का अनुभव किया। तब अपने कालकेतु रूपी आसुरी भाव को सब कथा सुख का अनुभव करते हुए सुनाई। अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।। परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधिखोई।। व्याख्या : तब कालकेतु रूपी आसुरी भाव बोला कि हे कपट रूपी राजा! अब मैं शत्रु को आपके कहे अनुसार वश में कर लूँगा। इसलिए तुम चिन्ता छोड़ दो क्योंकि अब तो बिना औषधि के ही रोग का नाश हो जायेगा अर्थात् शत्रु आसानी से मर जायेगा। कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई।। तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी।। व्याख्या : अब मैं कुल सहित शत्रुता की जड़ को ही मिटा दूँगा। अब मैं चौथे दिन आकर मिलूँगा। इस प्रकार कपट रूपी तापस ने यश रूपी राजा को बहुत प्रकार से सांत्वना दी तथा कालकेतू रूपी आसुरी भाव बहुत क्रोध करके चला। चौथे दिन मिलने का रहस्य यह है कि यम की साधना तीन दिन में होती है अर्थात् सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय के भावों में दृढ़ होने के लिए कम से कम साधक को तीन दिन का निरन्तर अभ्यास करना पड़ता है और साधक जब साधना में परिपक्व होने लगता है तो कोई भी आसुरी भाव उस पर तीन या चार दिन के निरन्तर चिन्तन होने पर प्रभाव डाल पाते हैं। वैज्ञानिक व व्यवहारिक सत्य यह है कि सुसंग का अभ्यास कम से कम तीन दिन करना पड़ता है, तब सुसंग के भाव प्रबल होने लगते हैं और कुसंग का अगर तीन दिन का साथ हो जाता है तो चौथे दिन साधक पूरी तरह आसूरी भावों के प्रभाव में आ जाता है। इसलिए यहाँ चौथे दिन भेंट करने की बात कही गयी है। भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता।। नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हय गृहँ बाँधेसि बाजि बनाई।। व्याख्या : तब कालकेतु रूपी आसुरी भाव ने प्रतापभानु रूपी यश के भाव को मन रूपी घोड़ा सहित घर पहुँचा दिया और भानुप्रताप रूपी राजा को नारी के पास सुला दिया और मन रूपी घोड़े को बाँध दिया। यहाँ साधना का बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। यश का भाव भी नर की धड़कन से पैदा होता है परन्तु जब यश का भाव नर की धड़कन से पैदा होगा तो वह सात्विक वृति वाला होगा परन्तु जब नारी (नाड़ी) की धड़कन से पैदा होगा तो वह तामसिक वृति वाला होगा। जब यश रूपी राजा कालकेतु व कपटी तापस रूपी आसुरी भावों के प्रभाव में आ जाता है तो नाड़ी की धड़कन से ही यश की लालसा पैदा होने लग जाती है जो तामसिक वृति वाली होती है। जब यश की वृति तामसिक हो जायेगी तो यश के भाव का मन रूपी घोड़ा भी तामसिक हो जायेगा। उसी को "बाजि बनाई"" अर्थात् तामसिक बनाकर बाँधना बोला गया है। दो0 राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि। लै राखेसि गिरि खोह महुँ माया करि मति भोरि।।171।। व्याख्या : तब प्रतापभानु रूपी राजा के रसोइए का हरण करके कालकेतू रूपी आसुरी भाव ले गया अर्थात् अब भावों का रसायन भी तामसिक हो गया। यह तो वैज्ञानिक तथ्य है कि जैसे भाव होते हैं, वैसे ही हार्मोन निकलना शु डिग्री हो जाते हैं। तब उस अवस्था में तामसिक रसायन (हार्मोन) यश रूपी राजा के रसोइये को गुफा में छुप देते हैं अर्थात् नर-नाड़ी की धड़कन से भी तब तामसिक हार्मोन (रस) निकलना शु डिग्री हो जाता है जिससे माया का प्रभाव बढ़ जाता है। आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।। जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना।। व्याख्या : तब कपट रूपी तापस ने रसोइये का रूप धारण कर लिया (अर्थात् कपट के भावों के अनुसार ही रसायन (हार्मोन) निकलना शु डिग्री हो गए) और उसी बिस्तर पर जाकर लेट गया। तब यश रूपी प्रतापभानु की नींद खुली तो अपने आपको भवन में देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। जहाँ से भाव पैदा होते हैं आध्यात्म में उसी अवस्था को भवन कहते हैं। यश का भाव जब कपटी रूपी तापस के प्रभाव में आ जाता है तो वह नारी (नाड़ी) के पास आ जाता है अर्थात् तामसिक हार्मोन्स के प्रभाव में आकर तामसिक यश की लालसा पैदा हो जाती है। मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गँवहिं जेहिं जान न रानी।। कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं।। व्याख्या : प्रतापभानु रूपी यश के भाव ने तब मन ही मन में कपट रूपी तापस की महिमा का अनुमान किया और नारी (नाड़ी) रूपी रानी के पास से उठकर मन रूपी घोड़े पर चढ़कर शरीर रूपी वन में गमन किया। जब यश भाव रूपी राजा नाड़ी की धड़कन से बल पाकर मन रूपी घोड़े पर चढ़कर शरीर रूपी जंगल में गया, तो शरीर के नर-नाड़ियों को इसका आभास भी नहीं होता है। भाव विज्ञान के अनुसार यश की लालसा का भाव नाड़ी की धड़कन के बल से ही समस्त शरीर में फैल जाता है परन्तु नर-नाड़ियों को इसका तनिक भी आभास नहीं हो पाता है। गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर-घर उत्सव बाज बधावा।। उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा।। व्याख्या : जब रात बीत गयी तो यश भाव रूपी प्रतापभानु घर को लौटकर आ गया तो घर-घर में उत्सव मनाने लगे अर्थात् प्रत्येक भाव में यश प्राप्ति की लालसा का प्रभाव हो गया। जब यश भाव रूपी राजा ने रसोइये को देखा तो अपने कार्य को याद करके आश्चर्य चकित हो गया। जब दूसरे सभी भावों में यश की लालसा का प्रभाव हो जाता है। भावों के अनुसार रस (हार्मोन्स) निकलना शु डिग्री हो जाता है, उसे ही प्रतीक रूप में रसोईया अर्थात् रस तैयार करने वाली अवस्था कहा जाता है। जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी।। समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा।। व्याख्या : जब कपट के भावों में बुद्धि लीन हो जाती है तो यश भाव रूपी राजा को तीन दिन युगों के समान बीते अर्थात् यश की लालसा प्रबल होने पर शीघ्र यश प्राप्ति की वासना पैदा हो जाती है, जिससे समय लम्बा लगने लग जाता है। उसी अवस्था में अर्थात् कपट में बुद्धि लीन रहने पर तामसिक रस (रसोईया) पैदा होने लग जाता है, जो यश की लालसा को और बलवती करने लगता है। उसी भाव अवस्था को रसोइये के आने के रूप में बताया गया है और यश भाव रूपी राजा को लालसा की बुद्धि के द्वारा समझाना कहकर बताया गया है। दो0 नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत। बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।। व्याख्या : यश भाव रूपी लालसा का गुरु कपट रूपी भाव ही होते हैं इसलिए यश भाव रूपी राजा को होश नहीं रहा और तुरन्त विशुद्ध प्रकाश के ज्ञान रूपी भावों को कुटुम्ब सहित निमन्त्रण दे दिया। वास्तविकता में यह होता है कि जब यश की वासना कपट के भावों के प्रभाव में आ जाती है तो तर्क के द्वारा विशुद्ध प्रकाश के ज्ञान रूपी भावों को अपने वश में करना चाहती है। उसी भाव अवस्था को कुटुम्ब सहित विप्रों को आमंत्रित करना बताया गया है। उपरोहित जेवनार बनाई । छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।। मायामय तेहिं कीन्हि रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई।। व्याख्या : कपट का प्रभाव होने पर रसोइये अर्थात् भावों का रसायन जेवनार यानी भावों की अनवरत धारा पैदा कर देता है, जिसका वेदों में छ: रस अर्थात् काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह व मत्सर के रूप में और चार प्रकार के गुणों सत, रज, तम व गुणातीत के रूप में बताया है। भावों के हार्मोन्स से समस्त भावों का रसायन मायामय हो जाता है अर्थात भावों से भाव पैदा होने लग जाते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार के बिं अ जन अर्थात् सूक्ष्म भाव पैदा होते रहते हैं, जिन्हें कोई गिन नहीं सकता है। बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा।। भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए।। व्याख्या : मृग इच्छाओं का प्रतीक होता है। अत: कालकेतु अर्थात् तमोगुण के आसुरी भाव के द्वारा नाना इच्छाओं को पैदा किया गया और उन्हीं आसुरी इच्छाओं के साथ विशुद्ध प्रकाश के ज्ञान रूपी भाव को भी मिला दिया और तब विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञान के भावों को भोजन करने अर्थात् तामसिक इच्छाओं के ग्रहण करने के लिए बुलाया और ऊपर-ऊपर से दिखावटी विनम्रता दिखाकर आदरपूर्वक बैठाया। परूसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला।। बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू।। व्याख्या : जब यश भाव रूपी प्रतापभानु तामसिक इच्छा रूपी भोजन को परोसने लगा तो तुरन्त आकाशवाणी हुई अर्थात् अन्त:करण में ग्लानि हुई कि विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञान के भावों को तामसिक इच्छाओं रूपी भोजन को ग्रहण नहीं करना चाहिये। अर्थात् विषय वासनाओं की इच्छा में नहीं बँधना चाहिए। क्योंकि वासना युक्त अन्न अर्थात् रसायन को ग्रहण करने से बड़ी हानि हो जायेगी। इसलिए विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञान के भाव अपने-अपने घर चले जाओ की आकाशवाणी हुई। भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू।। भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी।। व्याख्या : रसोई में भावों के स्वरों से निकलने वाला रसायन (हार्मोन्स) होता है अर्थात् तामसिक भावों का रसायन है, इस बात का विश्वास करके सभी ज्ञान के भाव उठ खड़े हो गए। उस अवस्था में यश रूपी भाव की मति भ्रमित हो गयी और भावों के वश में हो जाने के कारण कुछ भी बोलने में नहीं आ पा रहा था। दो0 बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार। जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार।।173।। व्याख्या : जब विशुद्ध प्रकाश के ज्ञान वाले भावों को ग्लानि हुई तो क्रोधित होते हुए बोले कि हे यश रूपी भाव! तुम परिवार सहित असुर हो जाओ। वास्तविकता में यही होता है कि जब वासनाओं का खेल ज्ञान के भावों को समझ में आ जाता है तो ज्ञान के भाव अपने आपको अलग कर लेते हैं और तामसिक भावों की वासना को और तामसिक होने के लिए प्रेरित करके स्वयं अलग हो जाते हैं। यह सूक्ष्म भावों की अवस्था गहरे ध्यान में ही समझ आ पाती है। छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई।। ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा।। व्याख्या : जब विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञान के भावों में ग्लानि होती है तो ज्ञान के भाव भृकुटि में इकट्ठे हो जाते हैं। उसी अवस्था को छत्रबंधु द्वारा सभी विप्रों को बुलाना बोलकर लिखा गया है। जब विशुद्ध प्रकाश के भाव भृकुटि में समूह बनाकर आ जाते हैं तब समझ में आने लगता है कि ईश्वर अर्थात् स्वरों की गति ने ही हमारे धर्म की रक्षा की है वरना समस्त परिवार सहित वासनाओं के जाल में पड़ जाते। उसी को ""जैहसि तैं समेत परिवारा"" बोलकर लिखा गया है। संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ।। नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा।। व्याख्या : विशुद्ध प्रकाश के (विप्र) भावों की ग्लानि से जब नासिका के मध्य में अर्थात् सुष्मना में प्राण संयत हो जाता है तो यश आदि की लालसा का नाश हो जाता है और यश लालसा को बढ़ाने वाले कोई भी भाव नहीं बच पाते हैं। यह अवस्था जब आती है, तब विशुद्ध प्रकाश के भाव भृकुटि में आकर ग्लानि से भर जाते हैं कि विषयों की वासना में क्यों फँस गए। तब सुष्मना नाड़ी में प्राण संयत हो जाते हैं, तो लालसा मिट जाती हैं। ऐसी अवस्था को देखकर यश लालसा रूपी प्रतापभानु दु:खी व व्याकुल हो उठता है। तब पुन: आकाशवाणी (अर्थात् अन्त:करण में प्रेरणा उठती है) होती है। बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा।। चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी।। व्याख्या : हे विशुद्ध प्रकाश वाले भावों! तुमने विचार करके श्राप नहीं दिया है क्योंकि यश भाव रूपी प्रतापभानु ने कुछ भी अपराध नहीं किया है। अर्थात् यश के भाव का कोई दोष नहीं है, यह तो कपट रूपी कुसंग का दुष्प्रभाव है। इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर सब विशुद्ध प्रकाश वाले भाव आश्चर्य चकित हो गए। तब यश रूपी राजा भोजन खाने में गया अर्थात् भावों में उत्पन्न हार्मोन्स का विचार किया। तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा।। सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई।। व्याख्या : तब वहाँ यश रूपी प्रतापभानु ने न तो वहाँ रसोइया देखा और न ही भोजन को देखा। इस प्रकार यश रूपी प्रतापभानु मन में अपार सोच करता हुआ लौटकर आ गया और ये सब बात शरीर में चलने वाले स्वरों तक पहुँचा गयी अर्थात् बता दी। तब यश का भाव सत, रज व तम के तीनों गुणों में फँसकर व्याकुल होकर शरीर रूपी पृथ्वी पर पड़ गया। दो0 भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर। किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर।।174।। व्याख्या : तब साधक के अन्त:करण में ही प्रेरणा होती है कि हे यश रूपी प्रतापभानु! भावों से उत्पन्न भावी अर्थात् होनहार कभी नहीं मिट पाता है। यद्यपि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। इसलिए विशुद्ध प्रकाश के भावों की जो ग्लानि (श्राप) हुई है, उसे कोई मिटा नहीं सकता है। अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए ।। सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किय जेहीं।। व्याख्या : ऐसा कहकर विशुद्ध प्रकाश वाले भाव भृकुटि से चले गए और फिर शरीर के सब भावों ने उस भाव अवस्था का अनुभव किया। सभी भाव दैव भावों को दोष देने लगे कि हंस की जगह कौआ पैदा कर दिए। अर्थात् सात्विक यश के भाव की जगह तामसिक यश की भावना को पैदा कर दिया। हंस और काग का यहाँ गहरा रहस्य है। ह कार और सकार प्राण वायु की गति चलने पर सात्विक भाव सहज रूप में पैदा होते रहते हैं परन्तु जब ह कार-सकार की गति में व्यवधान आ जाता है और वासनाओं से युक्त प्राण की गति हो जाती है तो तामसिक भावों की अवस्था आ जाती है। इसलिए सहज अवस्था हंस की होती है परन्तु असहज अवस्था कौए का प्रतीक होती है। उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई।। तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए।। व्याख्या : रसोइया लौटकर घर पहुँच गया अर्थात् भावों के अनुसार रसायन पैदा होने लग गए और तब आसुरी भावों ने कपटी रूपी तापस को सारी बात बता दी। तब कपट रूपी तापस ने सभी भावों को जहाँ-तहाँ पत्र भेजा अर्थात् सभी भावों में कपट का संचार किया, जिससे सभी भावों की सेना सज-सज करके आने लगी। घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई।। जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी।। व्याख्या : तब आसुरी व कपटी भावों ने शरीर रूपी नगर को घेर लिया और नाना प्रकार से यश रूपी राजा के साथ लड़ाई होने लगी। सारे भाव आपस में द्वन्द्व करने लगे, जिससे यश रूपी प्रतापभानु अपने अरिमर्दन रूपी भाई के साथ मारा गया अर्थात् सात्विक यश की लालसा का भाव आसुरी यश की लालसा में रूपान्तरित हो गया। सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।। रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई।। व्याख्या : सत्यकेतु अर्थात् सतोगुणी व रजोगुणी भावों के कुल में कोई भी भाव नहीं बचा क्योंकि विशुद्ध प्रकाश के भावों की ग्लानि झूठी कैसे हो सकती है। तब आसुरी व कपट रूपी भावों के राजाओं ने सात्विक व राजसिक भावों को जीत कर शरीर रूपी नगर को वश में कर लिया और सभी आसुरी व कपटी भाव अपने-अपने स्थानों पर चले गए। दो0 भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम। धूरि मेरूसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।175।। व्याख्या : परमविवेकी रूपी याज्ञवलक्य जी विवेक रूपी भरद्वाज से कहते हैं कि जब विधि अर्थात् क्रिया करने में उल्टी हो जाती है अर्थात तामसिक हो जाती है तो धूल रूपी वासनाएँ मे डिग्री पर्वत की तरह और पैदा करने वाले पिता रूपी भाव यम के समान और वासनाएँ रस्सी की तरह जकड़ने वाली हो जाती हैं। काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।। दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा।। व्याख्या : हे विवेक रूपी मुनि! समय पाकर यश रूपी प्रतापभानु अपने समाज सहित निशाचर हो गया। जब यश की लालसा तामसिक हो जाती है, तो यश का भाव ही काम रूपी रावण बन जाता है और यश के सहयोगी भाव काम रूपी रावण के कुटम्बि बन जाते हैं और दस इन्द्रियाँ व बीस भावों में रमण करने लगते हैं। उसी को काम रूपी रावण कहा गया है। भूप अनुज अरिमर्दन नामा । भयउ सो कुंभकरन बलधामा।। सचिव जो रहा धरमरूचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू।। व्याख्या : यश रूपी प्रतापभानु के छोटे भाई जिसका नाम अरिमर्दन था, वह अरिमर्दन का भाव तमोगुण के प्रभाव में आकर आलस्य रूपी कुम्भकर्ण हो गया। जो धर्म रूचि सात्विक भाव वाला सचिव था, वह विभीषण रूपी वैराग्य का भाव हो गया। इस प्रकार भावों का रूपान्तरण समय व गुणों के संयोग से होता रहता है। नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नु भगत बिग्यान निधाना।। रहे जो सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे।। व्याख्या : उसी धर्मरूचि भाव से उत्पन्न वैराग्य रूपी भाव को विभीषण (अर्थात् विशुद्धि का भूषण) के नाम से सारा जगत जानता है और जो विष्णु भक्त व विज्ञान का घर कहलाता है। वैराग्य का भाव आने पर अणु-अणु में परमात्मा की शक्ति का आभास होने लग जाता है और तब साधक को भावों का विज्ञान भी समझ में आने लग जाता है, इसलिए वैराग्य रूपी भाव को विष्णु भक्त व विज्ञान निधाना कहा गया है। जो यश रूपी भाव के सेवक थे, वे सब भाव आसुरी व कपटी वृतियों के प्रभाव में आकर निशाचर अर्थात् माया रूपी रात्रि में विचरने वाले बन गए। कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका।। कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी।। व्याख्या : विवेक से रहित आसुरी भाव काम के रूप में नाना रूप धारण करने वाले होते हैं। ये आसुरी कामी भाव कृपा रहित और हिंसक वृति वाले होते हैं। संसार को कष्ट देने वाले इन आसुरी भावों का वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप। तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।। व्याख्या : काम रूपी रावण हालाँकि मल रहित व पवित्र पुलस्त्यकुल से ही पैदा होता है। पुलस्त्यकुल से तात्पर्य नर-नारी की धड़कन से होता है क्योंकि सभी भाव नर-नारी की धड़कन से होते हैं क्योंकि सभी भाव नर-नारी की धड़कन से उत्पन्न हार्मोन से ही पैदा होते हैं परन्तु जब नारी की धड़कन ज्यादा प्रभावी हो जाती है, तो उसे ही कैकसी रूपी रावण की माता कहा जाता है, जिससे नाना प्रकार के काम, क्रोध व मदादि के भाव पैदा होने लग जाते हैं। नाड़ी के धड़कन से प्राण पैदा होकर महीसुर अर्थात् शरीर के स्वरों के सम्पर्क में आते हैं और स्वरों की गति के अनुसार तामसिक स्वरूप धारण कर लेते हैं। उसी को महीसुर श्राप बोलकर लिखा गया है। कीन्ह बिबिध तप तीनहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।। गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।। व्याख्या : जब महिसुर अर्थात् शरीर के स्वरों व नारी की तामसिक धड़कन रूपी कैकसी से काम रूपी रावण, आलस्य व प्रमाद रूपी कुम्भकर्ण व वैराग्य रूपी विभीषण पैदा हो जाते हैं, तो ये तीनों भाव मन व इऩ्िद्रयों को अपने-अपने स्वभाव के अनुसार तपाते हैं, जिससे बहुत उग्रता बढ़ जाती है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। तप को देखकर विधाता निकट गए और वर माँगने के लिए कहा। पाठकों के लिए यहाँ बता देना चाहता हूँ कि जो भी भाव मन व इन्द्रियों को एक कर लेता है, तो वही तप कहलाता है और उसी तप के बल से विधाता अर्थात् क्रिया करने वाला अन्तरात्मा फल दे देता है। अत: उसी भाव अवस्था को यहाँ ब्रह्म रूपी विधाता का प्रकट होना बताया गया है। वास्तविकता में तो यह सब साधक के अन्दर ही घटित होता है। करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।। हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।। व्याख्या : विधाता अर्थात् अन्तरात्मा के प्रकट होने पर काम रूपी रावण (दस इन्द्रियों में व्याप्त होने के कारण काम रूपी रावण को दससीसा, दशानन आदि नाम दिए गए हैं) प्रार्थना करते हुए बोला कि हे जगत के ईश्वर अन्तरात्मा! हम अर्थात् काम के भाव किसी भी प्रकार केवल वानर और मनुष्य के अलावा किसी से नहीं मरें। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वानर का तात्पर्य विशुद्ध नर की धड़कन से है क्योंकि नारी की धड़कन शुद्ध हो जाती है अर्थात् वा अ नर यानी विशुद्ध नर की धड़कन हो जाती है, तो काम के भाव मरना शु डिग्री हो जाते हैं। जब नर की धड़कन शुद्ध होना शु डिग्री हो जाती है तो मन का विस्तार भी कम होने लग जाता है, उसे मन अ अनुज अर्थात् मन की सूक्ष्मता का प्रतीक कहा जाता है। उसी मन की सूक्ष्म अवस्था में ही काम रूपी रावण मर सकता है अन्यथा नहीं। एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा।। पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।। व्याख्या : तब अन्तरात्मा रूपी ब्रह्म ने कहा कि ऐसा ही होगा अर्थात् वानर और मनुज द्वारा ही काम रूपी रावण का मरण होगा। फिर अन्तरात्मा रूपी विधाता आलस्य व प्रमाद रूपी कुम्भकर्ण के पास गए और उसे देखकर बहुत विस्मय हुआ। जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू।। सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षटकेरी।। व्याख्या : अन्तरात्मा रूपी विधाता ने सोचा कि अगर ये मूर्ख आलस्य का भाव नित्य सात्विक व राजसिक भावों का आहार करेगा तो शरीर रूपी संसार उजड़ जायेगा। आलस्य का भाव हमेशा तामसिकता को बढ़ाता है और राजसिकता व सात्विकता को नष्ट करता है, इसलिए विधाता की यही चिन्ता है कि इससे शरीर रूपी संसार का संतुलन बिगड़ जायेगा और शरीर रूपी संसार उजड़ जायेगा। इसलिए अन्तरात्मा रूपी विधाता ने सरस्वती के द्वारा आलस्य रूपी कुम्भकर्ण की बुद्धि को भ्रमित कर दिया और उसने छ: महीने की नींद का वरदान माँग लिया। सरस्वती वास्तविकता में सुरों (स्वरों) की अवस्था का ही प्रतीक है। यहाँ शरीर विज्ञान का रहस्य छुपा हुआ है क्योंकि सुरों की गति के अनुसार ही आलस्य व प्रमाद के भाव शरीर में घटते-बढ़ते रहते हैं। जब चन्द्र स्वर ज्यादा चलता है, तो आलस्य व प्रमाद बढ़ता है और सूर्य स्वर ज्यादा चलने पर राजसिकता के भाव बढ़ते हैं। अत: अन्तरात्मा रूपी विधाता ने शरीर रूपी संसार का संतुलन बनाए रखने के लिए सुरों के द्वारा (सरस्वती) आलस्य रूपी कुम्भकर्ण को संयत रखने का वरदान दिया। दो0 गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु। तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।177।। व्याख्या : फिर अन्तरात्मा रूपी विधाता वैराग्य रूपी विभीषण के पास गए और वर माँगने के लिए कहा तब वैराग्य रूपी विभीषण के भाव ने परमात्मा के चरणों में मल रहित अनुराग होने का वरदान माँगा। तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।। मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा।। व्याख्या : इस प्रकार काम रूपी रावण, आलस्य रूपी कुम्भकर्ण व वैराग्य रूपी विभीषण को वरदान देकर अन्तरात्मा रूपी विधाता चले गए और ये तीनों भाई प्रसन्नता के साथ घर को लौट आए अर्थात् अपने-अपने स्वभाव में सहज हो गए। मय अर्थात मैं अहंकार रूपी दानव के मन के अन्दर सात्विक बुद्धि रूपी कन्या होती है, जो परम सुंदरी होती है। नारी की सुलक्षणा धड़कन से कुछ सात्विक भाव भी पैदा होते हैं, इसलिए मन के अन्दर वे सात्विक भाव बुद्धि के रूप में छुपे रहते हैं। उसी सात्विक बुद्धि के भाव को मन के अंदरी अर्थात् मंदोदरी के प्रतीक के रूप में समझाया गया है। सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी।। हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।। व्याख्या : मय अर्थात् मैं दानव रूपी भाव मंदोदरी को काम रूपी रावण को दे देता है कि काम का भाव धन सम्पन्न राज्य का स्वामी होगा अर्थात् भोग वासनाओं का स्वामी होगा। काम रूपी रावण भी सात्विक बुद्धि रूपी मंदोदरी को प्राप्त करके हर्षित हो जाता है। फिर उसके बाद दोनों भाइयों कुम्भकर्ण व विभीषण का विवाह करा देता है। गिरि त्रिकुट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी।। सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा।। व्याख्या : त्रिकुट पर्वत शरीर में ही होता है जो गर्दन के ऊपर होता है। रीढ़ की हड्डी में स्थित चक्रों से भाव पैदा होते हैं और ये सब भाव त्रिकुट पर्वत पर भावों का भव सागर बनाते हैं। उन्हीं भावों के भव सागर से मैं (मय) दानव अपनी माया रूपी नगरी बना लेता है। वह माया निर्मित नगर मन की भावना के अनुसार रचित होता है। अर्थात् मैं मैं की भावना से ही माया रूपी लंका का निर्माण होता है। भोगवति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्र निवासा।। तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका।। व्याख्या : भोग की वृति होने पर वासनारूपी नागों का निवास स्थान बन जाता है और इन्द्रियों के भोग के लिए अमरावती रूपी वृति बन जाती है अर्थात् इन्द्रियाँ कभी भोगों से नहीं अघाती हैं। इन दोनों वृतियों से भी अधिक रम्य व मायावी वृति होती है, जिसे संसार में लंका नगरी के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। इस लंका नगरी का राजा काम रूपी रावण होता है। दो0 खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोटि मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178।। व्याख्या : शरीर स्थित लंका नगरी गर्दन के ऊपर त्रिकुट पर बनी होती है, जिसे विज्ञान की भाषा में प्रमस्तिष्क कहा जाता है। इस लंका नगरी के चारों ओर भाव रूपी समुद्र की खाई बनी होती है, जो लंका (माया) रूपी नगरी को चारों तरफ से घेरे हुए हैं। यह लंका नगरी अर्थात् माया नगरी मन के भावों से दृढ़ होकर बनी हुई है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ।।178(ख)।। व्याख्या : परमात्मा की प्रेरणा से जिस भाव की कल्पना प्रबल हो जाती है, वही भाव सभी भावों का राजा बन जाता है अर्थात् उस भाव की सत्ता को सभी भाव स्वीकार कर लेते हैं और फिर भाव की प्रबलता के अनुसार स्वर की गति हो जाती है। इस प्रकार सब भावों के दल उस आसुरी भाव के अधीन हो जाते हैं। रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।। अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे।। व्याख्या : लंका नगरी अर्थात् माया नगरी में आसुरी व दैवीय दोनों प्रकार के भाव रहते हैं। परन्तु जब दैव भाव प्रबल होते हैं, तो आसुरी भावों को परास्त कर देते हैं और जब आसुरी भाव प्रबल हो जाते हैं, तो दैवीय भावों को परास्त कर देते हैं। यह भावों का संघर्ष माया रूपी लंका नगरी में हमेशा चलता रहता है। इसलिए जब दैव भाव आसुरी भावों को मार भगाते हैं तो माया रूपी लंका नगरी पर इन्द्र अर्थात् चित की प्रेरणा से करोड़ों यक्ष रूपी रक्षक रक्षा करते हैं। दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।। देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई।। व्याख्या : परन्तु जब दस इन्द्रियों रूपी मुखों को धारण करने वाला काम रूपी रावण को माया रूपी लंका में आसुरी भावों की पराजय की सूचना मिली तो काम का भाव अपनी क्रोध, मद, लोभ व मोह रूपी सेना लेकर लंका नगर को घेर लेता है। उस अवस्था में काम रूपी आसुरी भावों की बड़ी सेना को देखकर यक्ष रूपी दैवीय भाव लंका नगरी को छोड़ कर भाग जाते हैं। फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।। सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।। व्याख्या : जब दैवी भाव परास्त हो जाते हैं, तो काम रूपी रावण ने माया रूपी लंका को देखा और देखकर चिन्ता मिट गयी और बहुत सुखी हुआ कि माया रूपी लंका नगरी आसुरी भावों के लिए सहज व सुंदर स्थान है अर्थात् माया रूपी नगरी में सहज में ही आसुरी भावों को बल मिलता है। इसलिए काम रूपी रावण ने माया रूपी लंका नगरी को अपनी राजधानी बना लिया। भाव विज्ञान के अनुसार जब काम की इच्छा प्रमस्तिष्क में चली जाती है, तो वह जीव के स्मृति पटल पर छा जाती है और काम का चिन्तन शु डिग्री हो जाता है तथा काम के चिन्तन से दैवीय भाव कमजोर होते चले जाते हैं और आसुरी भाव प्रबल होते चले जाते हैं। इसलिए माया रूपी लंका नगरी को आसुरी भावों के लिए सहज सुंदर नगर कहा गया है। जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे।। एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।। व्याख्या : माया रूपी लंका नगरी को जीतकर काम रूपी रावण ने आसुरी भावों को यथा योग्य घर बाँट दिए और समस्त आसुरी भावों को सुखी कर दिया। प्रमस्तिष्क में अनेक प्रकार की छोटी-छोटी सैल (कोशिकाएँ) होती है, जिनसे नाना प्रकार के भाव पैदा होते रहते हैं। अत: भावों के अनुसार कोशिकाओं पर आधिपत्य कर लेना ही यथायोग्य घरों का बँटवारा कहा गया है। काम रूपी रावण ने एक बार कुबेर रूपी संग्रह के भाव पर आक्रमण कर दिया और पुष्पक विमान को छीन कर ले आया। पुष्पक का तात्पर्य इच्छाओं से होता है। जब भोग इच्छाएँ राजसिक या सात्विक होती हैं, तो उसे कुबेर के प्रतीक के रूप में बताया गया है। इच्छाओं की एक और विशेषता होती है कि चाहे जितनी भी इच्चाएँ पूर्ण हो जाएँ परन्तु एक इच्छा फिर भी बच जाती है, इसलिए पुष्पक विमान में चाहे जितने लोग बैठ जाएँ फिर भी एक सीट खाली रहने की बात कही है। इसका कारण यही है कि पुष्पक विमान इच्छाओं का प्रतीक है और इच्छाएँ कभी भी पूर्ण नहीं हो पाती हैं। कोई न कोई इच्छा बच ही जाती है। वही अपूर्ण इच्छा पुष्पक विमान की एक सीट खाली रहने का प्रतीक है। जब इच्छाएँ दैवीय वृति वाली होती हैं, तो पुष्पक पर कुबेर का अधिकार माना जाता है और जब इच्छाएँ तामसिक हो जाती हैं, तो पुष्पक पर काम रूपी रावण का अधिकार हो जाता है। दो0 कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाई।।179।। व्याख्या : काम रूपी रावण ने खेल-खेल में ही कैलाश को उठा लिया अर्थात् कैवल्य के उल्लास को हिला दिया। जब काम का भाव प्रबल हो जाता है, तो जीव के आनन्द को हिला कर रख देता है। उसी को कैलाश पर्वत का उठाना कहा गया है। उस अवस्था में काम रूपी रावण अपने बल को बढ़ा हुआ जानकर बहुत खुश होता है। सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।। नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।। व्याख्या : जब काम रूपी रावण का भाव प्रबल होता है तो काम की सेना और काम से उत्पन्न होने वाले भाव तीव्रता से बढ़ने लगते हैं। काम की प्रबलता से आसुरी भावों का बल व प्रताप बढ़ने लग जाता है और नित्य नयी आसुरी सम्पदा वैसे ही बढ़ने लग जाती है जैसे लाभ अधिक होने पर लोभ बढ़ने लग जाता है। अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।। करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा।। व्याख्या : आलस्य व प्रमाद रूपी बलवान कुम्भकर्ण भाई होता है, जिसके समान संसार में दूसरा कोई योद्धा नहीं होता है। वह कुम्भकर्ण रूपी प्रमाद का भाव छ: महीने सोता है और जागने पर शरीर रूपी नगर में हलचल मच जाती है। जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।। समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।। व्याख्या : अगर आलस्य रूपी कुम्भकर्ण नित्य सात्विक भावों का आहार करेगा तो जल्दी ही संसार नष्ट हो जायेगा अर्थात शरीर रूपी संसार में असंतुलन हो जायेगा। आलस्य के भाव के समान अन्य कोई भाव धीर-वीर नहीं होता है और आसुरी भावों में ऐसे बलवान अनेक भाव होते हैं। बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।। जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई ।। व्याख्या : काम रूपी रावण का बड़ा पुत्र तामसिक अहंकार रूपी पुत्र होता है, जिसकी योद्धाओं में प्रथम गिनती होती है। तामसिक अहंकार रूपी मेघनाद के सामने कोई भी भाव युद्ध में ठहर नहीं सकता है क्योंकि तामसिक अहंकार का भाव नित्य सुरों के माध्यम से शरीर में परिपूरित होता रहता है। दो0 कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतू अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय।।180।। व्याख्या : कुवासनाओं व अज्ञान रूपी विशाल शरीर वाले स्थिर आसुरी भाव जो एक-एक भाव ही समस्त संसार को जीत सकता है। ऐसे योद्धाओं की आसुरी सेना माया रूपी लंका नगरी में रहती है। कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह के धरम न दाया।। दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा।। व्याख्या : काम के रूप में जितने भी भाव पैदा होते हैं, उन सबको माया जानना चाहिये। आसुरी भावों के सपने में भी धर्म व दया नहीं होती है। इस प्रकार माया रूपी लंका नगरी की सभा में एक बार काम रूपी रावण दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करके अपने आसुरी भावों के अपने परिवार को देखा। सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती।। सेन बिलोकि सहज अभिमानी । बोला बचन क्रोध मद सानी।। व्याख्या : काम रूपी रावण ने अपने पुत्रों के समूह को नातेदारों सहित देखा, जिनकी गणना करना कठिन है अर्थात् आसुरी भावों की वृद्धि को समझना बहुत मुश्किल काम है। आसुरी भावों की सेना को देखकर काम रूपी सहज अभिमानी रावण क्रोध व मद से युक्त वचन बोला। सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा।। ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई।। व्याख्या : काम रूपी रावण बोला कि हे आसुरी भावों के समूह! तुम सुनो। हमारे दुश्मन बहुत से दैवीय भावों का समूह होता है, जो हम आसुरी भावों के सामने लड़ाई नहीं करते हैं और हम आसुरी भावों को बलवान देखकर भागकर छुप जाते हैं। यहाँ बहुत सूक्ष्मता के साथ भाव अवस्था का वर्णन किया गया है। वास्तविकता में यही होता है कि जब काम व काम की वासना के भाव प्रबल हो उठते हैं, तो दैवीय भाव शान्त होकर छुप जाते हैं परन्तु अन्त: प्रेरणा के साथ मिलकर आसुरी भावों को कमजोर करने का प्रयास सदैव करते रहते हैं। इस प्रकार दैवीय व आसुरी भावों का संघर्ष नित्य चलता रहता है। तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई।। द्विज भोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।। व्याख्या : तब कामरूपी रावण अन्य आसुरी भावों को समझाकर कहता है कि दैवीय भावों का मरण एक ही तरीके से हो सकता है क्योंकि दैवीय भावों को बल यज्ञ अर्थात् अपान का पान में हवन करने से व श्रद्धा के भावों से मिलता है। अत: तुमलोग जाकर यज्ञ अर्थात् अपान का पान में हवन मत होने दो और श्रद्धा के भाव को पैदा मत होने दो। दो0 छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ।।181।। व्याख्या : जब दैवीय भावों को यज्ञ व श्रद्धा रूपी भोजन नहीं मिलेगा तो वे अपने आप हमारे पास आएँगे, तब हम तय करेंगे कि उन्हें मारा जाए या अच्छी तरह परख कर अपने में मिला लिया जाए। मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बय डिग्री बढ़ावा।। जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह के लरिबे कर अभिमाना।। व्याख्या : काम रूपी रावण ने तामसिक अहंकार रूपी मेघनाद को दैवीय भावों से बैर बढ़ाने की शिक्षा दी और कहा कि जो दैवीय भाव धीर व बलवान हो उनके साथ अभिमान पूर्वक लड़ाई लड़ना। तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।। एहि बिधि सबही आग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही।। व्याख्या : हे तामसिक अहंकार रूपी वत्स! तुम मुझ काम रूपी पिता की आज्ञा मानकर दैवीय भावों को युद्ध में जीतकर बाँधकर ले आवो। इस प्रकार सभी आसुरी भावों को आज्ञा देकर स्वंय काम रूपी रावण हाथ में गदा लेकर चला। चलत दसानन डोलत अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर खनी।। रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मे डिग्री गिरि खोहा।। व्याख्या : जब काम रूपी रावण का प्रभाव दसों इन्द्रियों पर पड़ता है, तो शरीर रूपी पृथ्वी हिल जाती है और दैवीय भावों को जन्म देने वाली प्राणवायु के गर्भ का नाश हो जाता है अर्थात् काम की प्रबलता से प्राण वायु से दैव भावों की उत्पत्ति ही रूक जाती है। उसी भाव अवस्था को देवताओं की पत्नियों के गर्भ का स्राव कहा गया है। जब काम रूपी रावण की प्रबलता का दैवीय भावों को पता चलता है, तो वे नस जारों का परित्याग कर भाग जाते हैं। अर्थात् सुष्मना, ईड़ा व पिगंला नारियों से दैव भावों की उत्पत्ति होना बन्द हो जाती है। दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए।। पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारिपचारी।। व्याख्या : काम रूपी रावण जब दिग्पालों के लोक में पहुँचा तो सभी लोकों को सूना पाया। दिग्पालों से तात्पर्य शरीर में स्थित सप्त चक्रों से है। जब काम का भाव इन्द्रियों रूपी दस मुख धारण करके चक्र स्थलों पर पहुँचता है, तो समस्त चक्र काम रूपी रावण के आगमन की आहट सुनकर सूनै हो जाते हैं अर्थात् आसुरी वृतियों के सामने दैवीय वृतियाँ शान्त हो जाती हैं। उस अवस्था में शरीर स्थित चक्रों की धड़कन की गति बदल जाती है, जिससे तीव्रता से आसुरी भाव पैदा होने लग जाते हैं। इसी को प्रतीक के रूप में रावण का सिंहनाद करना बताया गया है। रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा।। रबि ससि पवन बरून धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी।। व्याख्या : काम रूपी रावण दैवीय भावों को जीतकर शरीर रूपी संसार में अपने समान योद्धा खोजता हुआ दौड़ता फिरता है परन्तु काम का भाव अपने समान प्रबल कोई भाव को नहीं पाता है। काम का भाव जब प्रबल हो जाता है, तब वह सूर्य व चन्द्र स्वर को, प्राण वायु, जलतत्व अर्थात् शरीर के रसायन को, शरीर को धारण करने वाली शक्ति को, अग्नि तत्व को, काल को व यम नियम को प्रभावित करके व्याकुल कर देता है। किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबहीं के पंथहिं लागा।। ब्रह्म सृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।। व्याख्या : काम की प्रबलता से किन्नर प्राण वायु व नाग प्राण वायु, सिद्ध मनुष्य के स्वर ये सब अवरूद्ध हो जाते हैं अर्थात् व्याकुल हो जाते हैं। काम की प्रबलता से ब्रह्म बीज से उत्पन्न समस्त सृष्टि प्रभावित हो जाती है और नर-नाड़ी की धड़कन दस इन्द्रियों के वश में हो जाती है। आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता।। व्याख्या : काम रूपी रावण के आगे सभी सुर, नर, नारी व प्राण वायु दस इन्द्रियों सहित भयभीत होकर आज्ञा का पालन करते हैं और विनयपूर्वक काम रूपी रावण के आगे समर्पण करते हैं। दो0 भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र। मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(क)।। व्याख्या : अपने बल से काम रूपी रावण पूरे शरीर रूपी विश्व को अपने वश में कर लेता है और निज इच्छानुसार पूरे मन के मण्डल पर काम रूपी रावण का राज चलता है। दो0 देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि। जीति बरीं निज बाहु बल बहु सुंदर बर नारि।।182(ख)।। व्याख्या : काम की प्रबल अवस्था में देव, यक्ष, गंधर्व, नर, किन्नर, नाग व कुर्म प्राण वायु पूरी तरह काम के अधीन हो जाती है और फिर शरीर की नारी(नाड़ी) से काम के ही भाव पैदा होने लग जाते हैं। इंद्रजीत सब जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।। प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।। व्याख्या : तामसिक अहंकार रूपी मेघनाद से काम रूपी रावण जो भी कहता था, वह सब मानों तामसिक अहंकार रूपी मेघनाद ने पहले से ही करके रखा हो। जब काम वासना प्रबल होती है तो तामसिक अहंकार उसे बल प्रदान करता रहता है। अब काम के भाव ने अन्य आसुरी भावों को जो करने की आज्ञा दी, उनके चरितों (विशेषताओं) को सुनिए। अर्थात् काम के भाव का अन्य आसुरी भावों पर क्या प्रभाव होता है, उस अनुभूति को सुनिए। देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकट देव परितापी।। करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।। व्याख्या : आसुरी भाव भीम रूप अर्थात् भारी आकार वाले चिन्ता पैदा करने वाले होते हैं, जो दैवीय भावों को कष्ट देने वाले होते हैं। आसुरी भाव नाना प्रकार के उपद्रव करते हैं तथा माया के नाना रूप धारण करते रहते हैं। जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।। व्याख्या : आसुरी भाव सब वो वो करते हैं, जिससे दैवीय भावों की धारणा नष्ट हो जाए और वे सब वेदों के प्रतिकूल व्यवहार करते हैं। वे शरीर के जिस जिस भी अंग में सात्विक इच्छाएँ व ज्ञान के भावों को पाते हैं, वे सब सात्विक भावों के रहने के स्थानों को आग लगा देते हैं अर्थात् आसुरी भाव पैदा करके चिन्ता रूपी अग्नि जला देते हैं। सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई।। नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।। व्याख्या : आसुरी भावों की प्रबलता की अवस्था में कभी भी शुभ आचरण नहीं होते हैं और विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश व गुरु का कोई सम्मान नहीं करता है। उस अवस्था में परमात्मा की भक्ति भी नहीं हो पाती है और न ही यज्ञ व तप का ज्ञान ही हो पाता है और सपने में भी वेद व पुराणों को सुनने का भाव नहीं आता है। छ0 जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।। अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।। व्याख्या : काम की प्रबलता होने पर जप, योग, वैराग्य, तप व यज्ञ के भाव भाग खड़े होते हैं अर्थात् जप, तप, यज्ञ व वैराग्य में उस समय मन ही नहीं लगता है। काम का भाव स्वयं दौड़कर जप, तप व यज्ञादि के भावों को पकड़ने लगता है अर्थात् मन को जप, तप में लगने ही नहीं देता है। काम की प्रबलता से शरीर रूपी संसार में भ्रष्ट आचरण फैल जाता है, जिससे धर्म की बात तो कानों में सुनाई नहीं पड़ती है। इस प्रकार काम रूपी रावण सात्विक भावों को शरीर रूपी देश से भगा देता है। सो0 बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।183।। व्याख्या : इस प्रकार आसुरी भाव जो अनीति करते हैं, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योंकि आसुरी भावों की तो हिंसा पर ही विशेष प्रीत होती है, अत: उनके पापों की क्या सीमा है? ।। मास पारायण, छठा विश्राम।। बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।। मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।। व्याख्या : काम की प्रबलता बढ़ जाने पर मूढ़ता, चोरी-जुआ, लंपटपना, परधन की चाह व परस्त्री गमन की आसुरी भावना बढ़ने लग जाती है, जिससे जीव माता-पिता व देव भावों का आदर व सम्मान नहीं करता है और सज्जनों या साधना में जो लगे हुए रहते हैं, उनसे सेवा करवाते हैं। अर्थात् साधना भी वासना पूर्ति के लिए ही करने की भावना रहती है। जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।। अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।। व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी भवानी! जिनके ऐसे आसुरी आचरण होते हैं, वे सब प्राणी राक्षस जानने चाहिये। आसुरी भावों की प्रबलता से धर्म अर्थात् जीव की सहजता की हानि होती है और शरीर रूपी पृथ्वी व्याकुल हो उठती है। गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।। सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भयभीता।। व्याख्या : परद्रोही अर्थात् प्रकृति विपरीत भाव का जितना भार होता है, उतना भार तो पर्वत, नदियों व समुद्र का भी नहीं होता है। क्योंकि प्रकृति के विपरीत चलने पर शरीर रूपी पृथ्वी असहज हो जाती है और काम रूपी रावण का भय पैदा हो जाता है। धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।। निज संताप सुनाएसि रोई। काहू ते कुछ काज न होई।। व्याख्या : उस भय की अवस्था में शरीर रूपी पृथ्वी इन्द्रियों का रूप धारण करके स्वरों और मन रूपी मुनि के पास गयी अर्थात् शरीर की चेतना धर्म की ग्लानि होने पर सात्विक मन व स्वरों के पास चली जाती है और निज संताप को बताती है परन्तु किसी से कहने से कोई कार्य नहीं होता है। अर्थात् आसुरी भावों के प्रबल होने पर स्वर साधना व मन के उपदेशों का कोई असर नहीं होता है। छ0 सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका। संग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।। ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई। जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।। व्याख्या : जब हृदय में धर्म की ग्लानि हो जाती है, तो सुर (स्वर) मुनि (मन) गंधर्ब (प्राण वायु) ये सब ब्रह्म लोक में जाते हैं अर्थात् सात्विकता की तरफ अग्रसर होने लगते हैं। उस समय शरीर को धारण करने वाली इन्द्रियाँ (गो अ तनु अ धारी) भी भयभीत व व्याकुल होकर ब्रह्मा लोक अर्थात सत्तोगुण की तरफ जाने लगती हैं। उस अवस्था में सतोगुण रूपी ब्रह्म सब कुछ जान जाता है, कि मेरा इस अवस्था में कोई बस नहीं चलेगा। इसलिए सतोगुणी रूपी ब्रह्मा कहते हैं कि जिस परमात्मा से माया पैदा होती है और माया जिसकी दासी होती है, वही परमशक्ति हमारी सहायता कर सकती है। अर्थात् परमात्मा की शरण के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है। सो0 धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरू। जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारून बिपति।।184।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक का मन सतोगुण रूपी ब्रह्मा और रजोगुणी रूपी विष्णु को याद करके शरीर रूपी पृथ्वी को धैर्य धारण करने को बोलता है और समझाता है कि परमात्मा जीव की पीड़ा को जानते हैं, इसलिए वे ही माया रूपी कष्टों का निवारण करेंगे। बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।। पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक के दैव भाव विचार करने लगते हैं कि परमात्मा को कैसे प्राप्त करें। तब साधक के मन में विचार आने लगता है कि परमात्मा तो बैकुण्ठ अर्थात् कुण्ठाहीन अवस्था में निवास करते हैं। कभी-कभी यह भी विचार आता है कि परमात्मा क्षीर सागर अर्थात् भाव रूपी सुख सागर में निवास करते हैं। जब साधक परमार्थ के पथ पर चलने की तैयारी करता है, तो उसके मन में परमात्मा के स्वरूप के सम्बन्ध में नाना विचार आने लगते हैं कि परमात्मा ऐसा होगा, परमात्मा वैसा होगा। इन्हीं भावों की अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहीं रीती।। तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेउँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।। व्याख्या : जिसके हृदय में जैसा भक्ति का प्रेम होता है, परमात्मा उसके हृदय में वैसे ही प्रकट हो जाते हैं। विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! उसी भाव रूपी समाज में मैं रहता हूँ और अवसर मिलने पर परमात्मा के बारे में एक बात कहता हूँ। अर्थात् विश्वास का भाव भी भाव रूपी समाज में ही रहता है परन्तु जब साधक की भावना दृढ़ हो जाती है, तो विश्वास का भाव परमात्मा के बारे में साधक को किसी एक मत पर दृढ़ कर देता है। हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।। व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि परमात्मा तो सर्वत्र एक समान व्यापक रहते हैं परन्तु मैंने तो यह जाना है कि वो प्रेम से प्रकट होते हैं। ऐसा कौन-सा समय व कौन-सी दिशा होती है, जहाँ परमात्मा नहीं होते हैं। अर्थात् सब काल व सब देश में परमात्मा एक समान रूप से रहते हैं। अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। मोर बचन सबके मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।। व्याख्या : अगम परमात्मा तो संसार के रूप में व सांसारिकता से रहित वैराग्यवान होकर प्रेम से वैसे ही प्रकट हो जाते हैं, जैसे लकड़ी व पत्थर से अपने-आप अग्नि प्रकट हो जाती है। हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मेरे ये वचन सभी भाव रूपी समाज को अच्छे लगे और सब भावों ने साधु-साधु कहकर समर्थन किया। दो0 सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।। व्याख्या : जब मन के भावों को परमात्मा से प्रेम व विश्वास हो जाता है, तो सतोगुण हर्षित हो उठता है और शरीर में पुलकावली छा जाती है तथा नयनों में जल आने लग जाता है। उस अवस्था में साधक के हृदय में अपने-आप परमात्मा की स्तुति उमगने लग जाती है और बुद्धि धैर्यवान हो जाती है। उसी स्तुति को यहाँ कहा गया है। छ0 जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता। गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रियकंता।। पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीन दयाला करउ अनुग्रह सोई।। व्याख्या : हे भावों को पैदा करने वाले! आप जीवों को सुख देने वाले व प्राण के रूप में सबका पालन करने वाले, प्रकृति के नियन्ता हैं। जब इन्द्रियाँ द्विज हो जाती हैं अर्थात विषय-वासनाओं को छोड़कर सात्विक हो जाती हैं, तब आप हित करने वाले हो जाते हो। हे आसुरी भावों के शत्रु! आपकी जय हो। आप सिंधुसुता अर्थात् भावों को पैदा करने वाली कुण्डलिनि शक्ति के प्रिय स्वामी हैं। आप शरीर रूपी पृथ्वी को धारण करने व रक्षा करने वाले हैं। यह आपकी अद्भुत करनी है। इसका रहस्य कोई नहीं जानता है कि आप स्वरोें को धरने वाली शक्ति का कैसे पालन करते हैं। अत: हे सहज में दया व कृपा करने वाले प्रभु! आप मुझ पर अनुग्रह कीजिए। छ0 जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा। अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं माया रहित मुकुंदा।। जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा। निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।। व्याख्या : हे अविनाशी प्रभु! आपकी जय हो। आप घट-घट में निवास करने वाले व परमानंद के रूप में व्यापक रहने वाले हैं। आप अविगत्, इन्द्रियों से परे, पवित्र चरित्र वाले व माया से रहित मुकुंद है। आप लगते तो वैराग्यवान हैं परन्तु हैं बहुत ही अनुराग करने वाले। आप तो प्रभु मोह आदि के भावों से परे हैं। इसलिए हम तो रात-दिन आपको याद करते हैं और आपका गुण-गान करते हैं। हे सत चित आनन्द प्रभु! आपकी जय हो। छ0 जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा। सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।। जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा।। व्याख्या : जिसने समस्त सृष्टि को तीन गुणों से युक्त बनाया है और किसी का साथ भी नहीं लिया है, वो ही पापों का नाश करने वाले प्रभु! हम पर कृपा कीजिए। हम न तो भक्ति ही जानते हैं और न ही हम पूजा जानते हैं। जो भावों से उत्पन्न भय का नाश करने वाले हैं तथा मुनियों के मन को संतुष्ट करने वाले हैं और विपदाओं का नाश करे वाले हैं। ऐसे प्रभु के हम समस्त भावों सहित मन, वचन व कर्म से सब चतुराई छोड़कर शरण में आते हैं। छ0 सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना। जेहि दीन पियारे बेद पुकारे द्रवउ सो श्री भगवाना।। भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुख पुंजा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।। व्याख्या : वाणी से, सुनने से, रस से अर्थात् स्वाद से भी जो अशेष बच जाता है और जिसे दीन अर्थात निर्मल हृदयवाले प्रिय हैं। वे ही भगवान हम पर कृपा करो। भावों रूपी भवसागर सब प्रकार से सुंदर होता है परन्तु गुणों का मन्दिर अर्थात् जहाँ से गुण पैदा होते हैं, वह चितस्वरूप अवस्था सुख की पुँज होती है। इसलिए हे प्रभु! सभी मुनिजन, सिद्धगण व देवगण भयभीत होकर आपके चरण कमलों में सिर झुकाते हैं। दो0 जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह। गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।186।। व्याख्या : जब साधक के हृदय में ग्लानि हो जाती है, तो उसके दैवीय भाव परमात्मा के प्रति समर्पित होने लग जाते हैं, तब हृदय में निर्मल प्रेम पैदा हो जाता है तो आकाश वाणी हो उठती है, जो समस्त शोक व भ्रम का नाश करने वाली होती है। अर्थात् उस अवस्था में साधक के अन्त:करण में ही परमात्मा की प्रेरणा होना शु डिग्री हो जाती है। जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।। अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा।। व्याख्या : तब परमात्मा प्रेरणा करते हैं कि हे मुनियों, सिद्धों व देवों! तुम डरो मत। मैं तुम्हारे लिए नर भेष धारण करूँगा। नर भेष से तात्पर्य नर की धड़कन में ही परमात्मा का अवतरण होना होता है। जब माया के भावों के कारण भय पैदा होकर हृदय में ग्लानि होने लग जाती है, तो परमात्मा की याद आने लगती है। परमात्मा की याद आने पर नर-नाड़ी की धड़कन की गति बदलने लग जाती है और नारी की धड़कन से उठने वाले भाव शान्त होने लग जाते हैं और नर की धड़कन प्रबल होकर दैवीय भावों को पैदा करने लगती है। उस अवस्था में परमात्मा अपनी दैव वृति रूपी अंशों सहित अन्तरात्मा में अवतरित होने लगता है और सूर्य की तरह अज्ञान का नाश करने लगता है। कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।। ते दसरथ कौसल्या रूपा । कोसलपुरीं प्रगट नर भूपा।। व्याख्या : जब साधक कश्चप की तरह अपनी इन्द्रियों को संसार से समेट कर अद्वैत वृति वाला हो जाता है, तो वह मन व इन्द्रियों का चित में समाहित होना महातप कहलाता है। उस अवस्था में पहुँचने पर परमात्मा की कृपा बरसने लग जाती है। वह अवस्था परम संयम-नियम की होती है, जिसमें परिपक्व होने पर साधक दस इन्द्रियों रूपी रथ का कुशलता पूर्वक संचालन करने लग जाता है। अत: साधक की वह परिपक्व अवस्था ही दसरथ (दस इन्द्रियों रूपी रथ) और कौसल्या (अर्थात् कुशलतापूर्वक इन्द्रियों के रथ का संचालक) के प्रतीक के रूप में लिखी गयी है। उस अवस्था में शरीर रूपी कौशलपुरी में नर की धड़कन के रूप में परमात्मा का अन्तरात्मा में अवतरण होना शु डिग्री हो जाता है। तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।। नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।। व्याख्या : जो साधक दसरथ व कौसल्या की तरह हो जाता है, उनके हृदय रूपी घर में परमात्मा का अवतरण होता है। रघुकुल (अर्थात् जीव का कुल) की चार अवस्था होती हैं। ये चार अवस्थाएँ जाग्रति, सुषुप्ति, स्वपन और तुरीयातीत हैं। जब परमात्मा का अवतरण होता है तो इन चारों अवस्थाओं में ही उसकी अनुभूति होने लगती है। उस अवस्था में मन के नारद रूपी वैराग्य के भाव की बात को सत्य करते हैं अर्थात् साधक उस समय माया व मोहादि के विकारों से परे हो जाता है। उस अवस्था में नर की धड़कन के साथ नारी की धड़कन भी सुलक्षणों को पैदा करने लग जाती है। उसी को परमशक्ति के साथ अवतरित होना कहा गया है। हरिहउँ सकल भूमि गरूआई। निर्भय होहु देव समुदाई।। गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना।। व्याख्या : जब अन्तरात्मा में परमात्मा का अवतरण हो जाता है, तो शरीर रूपी भूमि की चिन्ताओं का हरण हो जाता है, दैवीय भाव निर्भय हो जाते हैं। तब साधक के गगन मण्डल की ब्रह्मबानी को सुनकर समस्त दैवीय भाव हृदय की धड़कन से जुड़ जाते हैं अर्थात् सर्वत्र दैवीय वृतियाँ जागृत हो उठती हैं। तब ब्रह्माँ धरनिहि समुझावा। अभय भइ भरोस जियँ आवा।। व्याख्या : तब सतोगुण रूपी ब्रह्मा शरीर रूपी पृथ्वी को समझाते हैं, जिससे निर्भयता आ जाती है और हृदयं में परमात्मा का भरोसा बढ़ जाता है। दो0 निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ। बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।107।। व्याख्या : तब सतोगुण रूपी ब्रह्मा सब देवीय भावों को परमात्मा के बारे में बताकर अपने लोक को गए। अर्थात् सतोगुण की सहज अवस्था बढ़ने लगी। सतोगुण रूपी ब्रह्मा तब दैवीय भावों को प्रेरणा करते हैं कि तुम सब वानर अर्थात वा अ नर यानी नर की धड़कन से उत्पन्न विशुद्ध प्राण को ग्रहण करके शरीर रूपी पृथ्वी पर परमात्मा की सेवा करो अर्थात् परमात्मा का चिन्तन मनन करो। गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा।। जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा।। व्याख्या : जब सारे दैवीय भाव अपने-अपने घर चले गए अर्थात् अपने सहज रूप में परमात्मा का चिंतन करने लग गए, तो शरीर रूपी पृथ्वी और मन को भी शान्ति मिलने लग जाती है। उस अवस्था में सतोगुण रूपी ब्रह्मा की जो प्रेरणा होती है, उसका दैवीय भाव हर्षित होकर पालन करने लगते हैं। बनचर देह धरी छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं।। गिरि त डिग्री नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक के दैव भाव वानर रूप धारण कर लेते हैं अर्थात् दैव भावों के द्वन्द्व से चंचल सात्विक बुद्धि पैदा हो जाती है, जो अतुल बल व प्रताप वाली होती है। उस समय सात्विक बुद्धि रूपी वानरों के स्थिरता, दृढ़ता व जिज्ञासा रूपी हथियार होते हैं तथा परमात्मा के प्रकट होने का चिन्तन करते रहते हैं। गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी।। यह सब रूचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा।। व्याख्या : जब दैवीय भावों में परमात्मा का चिन्तन शु डिग्री हो जाता है, तब शरीर रूपी वन के नस-जारों में दैवीय वृतियाँ फैल जाती हैं। परम विवेकी भाव को यह रुचिर अनुभव होता है। अब वो अनुभव सुनिए जिसको बीच में ही छोड़ दिया था। अवधपुरी रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ।। धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी।। व्याख्या : शरीर रूपी अवधपुरी का जीवात्मा का मन रूपी राजा होता है, जिसको वेदों में दसरथ (अर्थात् दस इन्द्रियों के रथ) के नाम से बताया गया है। दशरथ रूपी राजा धारणा बनाने में धुरंधर, गुणों का समुद्र व ज्ञानी होता है। दशरथ के हृदय में भक्ति की मति का भी संयोग होता है। अर्थात दस इन्द्रियाँ संसार की तरफ भी ले जाती हैं तो ये सात्विक होने पर परमात्मा की तरफ भी ले जाती हैं। इसलिए दशरथ के हृदय में भक्ति की मति का सारंग पानी अर्थात् जैसी संगत वैसा प्रभाव की बात कही गयी है। दो0 कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत। पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत।।188।। व्याख्या : जब दैवीय वृतियाँ प्रबल हो जाती हैं और भावों में परमात्मा का चिन्तन चलने लग जाता है, तो कौसल्या अर्थात् सुष्मना आदि नाड़ियों का आचरन पवित्र हो जाता है और जीवात्मा रूपी पति के अनुकूल होकर परमात्मा के चरणों में दृढ़ प्रेम करने लगती हैं। एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।। गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।। व्याख्या : जब भावों के पति जीवात्मा के मन में ग्लानि होती है कि मेरा परमात्मा के चरणों में प्रेम नहीं है। पुत्र को मोह व प्रेम का प्रतीक माना जाता है इसलिए ""मोरे सुत नाहीं"" बोल कर लिखा गया है। जब हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम नहीं होने की ग्लानि होती है, तो जीवात्मा तुरन्त अन्त: गुरु की शरण में चली जाती है। उस अवस्था में भृकुटि में स्वत: ध्यान दृढ़ हो जाता है और परमात्मा के प्रति प्रार्थना का भाव पैदा हो जाता है। निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।। धरहु धीर होइहहिं सुत चारी । त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।। व्याख्या : जब साधक अपने अन्त: स्थित गुरु को अपने सुख-दु:ख बताता है, तो विशिष्ट ज्ञान का भाव नाना प्रकार से दशरथ रूपी जीवात्मा को समझाता है कि तुम धैर्य धारण करो। तुम्हें चारों अवस्था में ही परमात्मा का प्रेम प्राप्त होगा, जो तीनों गुणों से उत्पन्न भावों से प्रकट होगा तथा भक्त के वासना आदि से उत्पन्न भय को दूर करने वाला होगा। यहाँ से रामायण को सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है क्योंकि राम का अवतरण दशरथ रूपी साधक के हृदय में ही विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ गुरु की कृपा से चारों अवस्थाओं में होता है। उसी अनुभूति को नाना प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।। भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि च डिग्री कर लीन्हें।। व्याख्या : जब जीवात्मा रूपी दशरथ विशिष्ठ ज्ञान रूपी गुरु वशिष्ठ की शरण में आ जाता है, तो विशिष्ट ज्ञान की प्रेरणा से हृदय में श्रद्धा और अनुराग रूपी रस पैदा होने लग जाता है। उसे ही प्रतीक रूप में श्रृंगी ऋषि कहा गया है। श्रद्धा और अनुराग रूपी रस पैदा होने पर ही परमात्मा के चरणों में सच्चा प्रेम पैदा हो जाता है। उसी को पुत्रकाम यज्ञ कहा गया है। जब श्रद्धा व अनुराग से युक्त होकर अपान का पान में हवन शु डिग्री हो जाता है, तो वह अवस्था ही परमात्मा के प्रति प्रेम (पुत्र) प्राप्ति का यज्ञ कहा गया है। जब श्रद्धापूर्वक श्रृंगी ऋषि रूपी रस भक्ति पूर्वक पान में अपान का हवन करने लगता है, तो ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट हो जाती है, जो ज्ञान व भक्ति रूपी खीर हाथ में लिए होती है। जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।। यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।। व्याख्या : जो जो विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ भाव की प्रेरणा करते हैं, उस समय वो सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अत: हे दशरथ रूपी राजा! तुम यह भक्ति व ज्ञान मिश्रित खीर को जाकर अपनी ईड़ा, पिंगला व सुष्मना रूपी नारियों को बाँट दो। अर्थात् अनुराग व श्रद्धापूर्वक अपान का पान में हवन करने से जो ज्ञान रूपी अग्नि भक्ति व ज्ञान मिश्रित खीर लेकर प्रकट होती है, वो आधा भाग कौसल्या रूपी सुष्मना नाड़ी का हो जाता है और जो आधा भाग बचता है, वो कैकयी रूपी पिंगला नारी का तथा शेष भाग सुमित्रा रूपी ईड़ा नारी का हो जाता है। यज्ञ से उत्पन्न भाव सुष्मना, ईड़ा व पिंगला नाड़ियों के माध्यम से प्रवाहित होने लगते हैं। अत: यहाँ उसी भाव अवस्था की अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। दो0 तब अदृश्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ। परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।। व्याख्या : जब साधक को दृढ़ ध्यान की अवस्था में पान-अपान के हवन द्वारा ज्ञान रूपी अग्नि से भक्ति व श्रद्धा मिश्रित खीर प्राप्त हो जाती है, तो साधक के सभी भाव परमानन्द का अनुभव करने लगते हैं और ज्ञान रूपी अग्नि ध्यान में उतरने पर धीरे-धीरे शान्त होने लगती है परन्तु उसके द्वारा प्रदत्त ज्ञान व भक्ति रूपी खीर को प्राप्त करके दशरथ रूपी साधक आनन्द मगन होने लग जाता है। तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं।। अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा।। व्याख्या : दशरथ रूपी साधक जब ज्ञान व भक्ति मिश्रित खीर प्राप्त कर लेता है, तो ज्ञान व भक्ति के भावों का प्रवाह सुष्मना, ईड़ा व पिंगला नाड़ियों के माध्यम से होने लगता है। उसी भाव अवस्था को दशरथ की तीन रानियों कौसल्या (सुष्मना) कैकयी (पिंगला) और सुमित्रा (ईड़ा) के रूप में बताया गया है। भक्ति और ज्ञान के सबसे अधिक भाव सुष्मना नाड़ी में प्रवाहित होते हैं, इसलिए कौशल्या रूपी सुष्मना को खीर का आधा भाग देना बताया गया है। सुष्मना के बाद पिंगला व ईड़ा नारियों में भक्ति व ज्ञान के भाव अपेक्षाकृत कम होते हैं, इसलिए बची हुई खीर का आधे का भी आधा-आधा कैकयी रूपी पिंगला और सुमित्रा रूपी ईड़ा को देना कहा गया है। सुष्मना रूपी कौसल्या से सात्विक भाव पैदा होकर कुछ राजसिक और कुछ तामसिक हो जाते हैं। इसलिए कौसल्या के आधे भाग को भी कैकेई और सुमित्रा में बाँटने की बात कही गयी है। रजोगुणी रूपी कैकेई से भी तमो गुण के कुछ भाव पैदा हो जाते हैं, इसलिए कैकेई का अर्ध भाग भी सुमित्रा को देने की बात कही गयी है। कैकई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ।। कौसल्या कैकई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि।। व्याख्या : भक्ति व ज्ञान के आधे भाव पिंगला रूपी कैकेई नाड़ी में प्रवाहित होने लग गए और जो आधे भक्ति व ज्ञान के भाव बचे, वे फिर आधे-आधे हो गए। अर्थात् सतोगुण से रजोगुण और फिर सतोगुण व रजोगुण से सत्व-रज मिश्रित भाव पैदा होते रहते हैं। उसी को कौसल्या रूपी सुष्मना नाड़ी व पिंगलारूपी कैकेई नाड़ी को अपना आधा-आधा भाग देने की बात कही गयी है। भाव विज्ञान के अनुसार सतोगुण से धीरे-धीरे रजोगुण पैदा होने लग जाता है और फिर रजोगुण व सतोगुण के मिश्रण से तमोगुन पैदा होने लग जाता है। उसी प्रकार सात्विक ज्ञान व निष्काम भक्ति से राजसिक ज्ञान व सकाम भक्ति पैदा हो जाती है और सात्विक व राजसिक ज्ञान व भक्ति से तामसिक ज्ञान व भक्ति पैदा हो जाती है। उसी अवस्था को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से बताया गया है। एहि बिधि गर्भ सहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी।। जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपित छाए।। व्याख्या : इस प्रकार सभी नाड़ियाँ भक्ति व ज्ञान रूपी भावों को पैदा करने वाली हो जाती हैं, जिससे हृदय में हर्ष और सुख का अनुभव होने लगता है। जिस दिन से माया का हरन करने वाले भाव (हरि) पैदा होने लगते हैं, तभी से सुख की सम्पत्ति छाने लगती है। मंदिर महँ सब राजहिं रानीं। सोभा सील तेज की खानीं।। सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ।। व्याख्या : मंदिर अर्थात मन के अन्दर ही ये समस्त नाड़ियाँ भक्ति व ज्ञान के भाव पैदा करके शील व तेज की खान बन जाती हैं। इस प्रकार सुख से युक्त होकर समय व्यतीत होने लगता है और परमात्मा के प्रकट होने का समय भी आ जाता है। अर्थात् जब नाड़ियों से भक्ति व ज्ञान के भाव पैदा होने लग जाते हैं तो माया का स्वत: हरण होने लग जाता है और माया का हरण होने से सुख की वृद्धि होने लग जाती है तथा शील व तेज की वृद्धि होने लग जाती है तथा धीरे-धीरे हृदय में ही परमात्मा के अवतरण की अवस्था आ जाती है। दो0 जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल। चर अ डिग्री अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।।190।। व्याख्या : जब नाड़ियों से उत्पन्न भक्ति व ज्ञान के भावों से हृदय में परमात्मा से मिलने की लग्न लग जाती है और भावों द्वारा साधक जब परमात्मा से जुड़ जाता है और तीनों गुण जब स्थिर (ति अ थि उ तिथि अर्थात् तीन गुणों का थीर होना) हो जाते हैं, तो चर अर्थात् चंचल प्रकृति अचर अर्थात् स्थिर हो जाती है, जिससे सब कुछ अनुकूल हो जाता है। यह अवस्था ही साधक को आनन्दित कर देती है तथा यही राम का जन्म अर्थात् परमात्मा का हृदय में अवतरण के सुख का मूल होता है। नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।। मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा ।। व्याख्या : नौमी तिथि अर्थात जब शरीर स्थित नौ नाड़ियाँ में तीनों गुण स्थिर हो जाते हैं अर्थात् गुण गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है, तो पवित्र आनन्द की अनुभूति होने लग जाती है और अज्ञान का अंधकार मिट कर ज्ञान का शुक्ल पक्ष आ जाता है, जिससे माया के हरण पर प्रीत (हरिप्रीता) होने लग जाती है। तब उस अवस्था में मध्यम मार्ग की अवस्था अर्थात् सहज अवस्था आ जाती है, जिसमें न सुख होता है और न दु:ख होता है। वह पवित्र समय होता है, जिसमें शरीर के सभी अंग विश्राम को प्राप्त कर लेते हैं। सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।। बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिता%मृत धारा।। व्याख्या : उस अवस्था में शीतल व मन्द सुगन्धित वायु शरीर के नस जारों में बहने लगती है और सुर अर्थात् दैवीय भावों का संशय मिट जाता है और मन में प्रसन्नता छा जाती है। शरीर रूपी वन के समस्त नस जार फूलों की तरह खिल जाते हैं और सकल नाड़ियाँ अमृत की नदियाँ बनकर बहने लगती है। सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना।। गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।। व्याख्या : उस अवस्था को सतोगुण रूपी ब्रह्मा जब जान जाते हैं, तो समस्त दैवीय भाव नाना प्रकार से संचरित होने लगते हैं और साधक के निर्मल आकाश रूपी मस्तिष्क से दैवीय भाव समूहों में पैदा होने लगते हैं। उस समय की अवस्था का गन्धर्व प्राण वायु द्वारा संचरण होने लगता है। बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी।। अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।। व्याख्या : उस समय ध्यान अवस्था में पुष्पवृष्टि का सा आभास व आनन्द मिलने लगता है तथा आकाश मण्डल (मस्तिष्क) में ढोल नगाड़ों की आवाज आने लगती है। उस समय नाग प्राण वायु से उत्पन्न होने वाले दैवीय भाव परमात्मा की स्तुति करने लगते हैं। नाग प्राण वायु से उत्पन्न भाव नाना प्रकार से परमात्मा के प्रति समर्पण की प्रेरणा करने लगते हैं। दो0 सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम। जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।191।। व्याख्या : उस अवस्था में देव भावों के समूह विनती करके स्वत: सहज हो जाते हैं, उसी को देवों का निज निज धाम जाना बताया गया है। उस परम विश्राम की अवस्था में जगत में निवास करने वाले परमात्मा हृदय में ही प्रकट हो जाते हैं, जिससे शरीर के समस्त लोकों को परम विश्राम मिल जाता है। छ0 भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।। लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुजचारी। भूषन बनमाला नयन बिसाल शोभा सिन्धु खरारी।। व्याख्या : समस्त भावों द्वारा जब परमात्मा के चरणों में समर्पण हो जाता है, तो परमात्मा साधक के हृदय में प्रकट हो जाता है। परमात्मा के प्रकट होने पर सृष्टि का महतन्त्र हर्षित हो उठता है और मन में परमात्मा के अद्भुत रूप का विचार आने लगता है। तब साधक को लगने लगता है कि मानों आँखों ने विश्राम प्राप्त कर लिया हो। उस समय शरीर की अनुभूति घने काले बादलों जैसी लगने लगती है और साधक को गुणों की चार अवस्था (तम, रज, सत व गुणातीत) ही भाव रूपी चार भुजाएँ लगती हैं। परमात्मा के अवतरण होने पर साधक की दृष्टि विशाल हो जाती है और भाव रूपी माला ही आभूषण बन जाती है। और भाव रूपी समुद्र की शोभा निखर आती है तथा अज्ञान का नाश करने की क्षमता आ जाती है। छ0 कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।। करूना सुख सागर सब गुन आगर जेहिं गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक स्वयं दोनों हाथ जोड़कर परमात्मा की स्तुति करने लग जाता है कि हे अनन्त प्रभु! मैं आपकी स्तुति कैसे गाउँ? आप तो गुण व ज्ञान से परे व मान से परे हैं, ऐसा वेद व पुराण भी बताते हैं। आपको वेद व संत सभी करूणा व सुख का सागर व समस्त गुणों का भण्डार बताते हैं। इसलिए आप मेरा कल्याण करने के लिए ही मेरे हृदय में प्रकट हुए हैं। छ0 ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै।। उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहु बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।। व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में ही साधक को समझ में आ जाता है कि मस्तिष्क से उत्पन्न भावों से ही माया पैदा होती है, जो रोम-रोम में निवास करती है। इसलिए वेद माया को रोम-रोम में बताते हैं। हे प्रभु! आप मेरे हृदय में निवास करते हैं, इसे सुनकर लोग उपहास करते हैं और अच्छे-अच्छे लोगों की बुद्धि इस बात पर विश्वास नहीं कर पाती है कि आप मेरे हृदय में निवास करते हैं। परन्तु जब इस बात का ज्ञान हुआ कि परमात्मा मेरे हृदय में ही निवास करते हैं, तो परमात्मा साधक को देखकर मुस्कुराते हैं और नाना प्रकार से साधक को अपनी विशेषताएँ समझाने लगते हैं। तब परमात्मा साधक को माता की तरह समझाने लगते हैं, जिससे साधक पुत्र की तरह सुख प्राप्त कर सके। अर्थात् परमात्मा साधक के पालन-पोषण का दायित्व ले लेते हैं और माता जैसे अपने पुत्र को सुखी रखने का प्रयास करती हैं, वैसे ही परमात्मा अपने भक्त को सुखी रखने का प्रयास करने लगता है। छ0 माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुर भूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में परमात्मा माता के समान साधक को प्रेरणा करने लगते हैं कि हे वत्स! तुम यह रूप त्याग दो और कर्तापन के भाव से ऊपर उठ जावो और बालक की तरह हो जावो अर्थात् समस्त कामादि के भावों का त्याग कर दो क्योंकि बाल स्वरूप बहुत सुखद होता है तथा परम सुख को देने वाला होता है। इस प्रकार परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त करके साधक पुत्रवत परमात्मा के सामने रोने लगता है तथा साधक में समस्त दैवीय वृतियाँ पैदा हो जाती हैं, जो साधक इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह माया के हरण की अवस्था अर्थात् हरिपद को प्राप्त कर लेता है और ऐसा साधक कभी भी भावों के कुएँ में नहीं पड़ता है। दो0 बिप्र धेनु सुर संतहित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।192।। व्याख्या : इस प्रकार विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के रूप में, सात्विक इच्छाओं व दैवीय वृतियों के रूप में व साधक के संशयों का अन्त करने के लिए सूक्ष्म मन के अर्थात् अन्तरात्मा के अन्दर ही परमात्मा का अवतरण होता है। इसलिए यह शरीर तो जीव की स्वयं की इच्छाओं के अनुसार आकार धारण करता है, क्योंकि परमात्मा तो माया, गुण व इऩ्िद्रयों से परे होते हैं। सुनि सिसु रूदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी।। हरषित जहँ तहँ धाईं दासी । आनन्द मगन सकल पुरबासी।। व्याख्या : जब अन्तरात्मा में परमात्मा का अवतरण हो जाता है, तो साधक बाल स्वरूप हो जाता है और उसके भाव निर्मल व प्रिय वाणी वाले हो जाते हैं। उस अवस्था में साधक की सुष्मना, पिंगला व ईड़ा नाड़ियाँ संभ्रम अर्थात् समता की अवस्था में आ गयी और बाकी अन्य सहायक नाड़ियाँ भी उत्साहित होकर दौड़ने लगती हैं। जिससे शरीर में स्थित सभी भाव आनन्दित हो उठते हैं। दसरथ पुत्र जन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना।। परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा।। व्याख्या : अन्तरात्मा में परमात्मा रूपी राम का अवतरण जानकर दस इन्द्रियों रूपी दसरथ ब्रह्मानन्द में समा गया और परम प्रेम की अवस्था पैदा हो गयी, जिससे शरीर पुलकित हो गया। ऐसी अवस्था में दशरथ रूपी इन्द्रियों का भाव भी परमात्मा के आनन्द को प्राप्त करने के लिए उठने का प्रयास करता है। अर्थात् इन्द्रियाँ भी ऐसी अवस्था में संसारिकता से विमुख होने का विचार करने लगती हैं। जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई।। परमानंद पुरी मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा।। व्याख्या : दसरथ रूपी भाव तब सोचने लगता है कि जिस परमात्मा के नाम का स्मरण करते ही कल्याण हो जाता है वो ही परमात्मा मेरे हृदय रूपी घर में अवतरित हुए हैं। इस प्रकार दसरथ रूपी राजा का मन परमानन्द से भर गया। इस आनन्द को उस समय जीवात्मा रूपी दसरथ बाजा बजाकर लोगों को बताते है। अर्थात् जब प्रारम्भ में साधक को परमात्मा की झलक मिल जाती है, तो वह उस आनन्द की अवस्था का सभी को वर्णन कर-करके सुनाने का प्रयास करता है। उसी को प्रतीकात्मक दृष्टि से बाजा बजाकर कहना बताया गया है। गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृप द्वारा।। अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई।। व्याख्या : परमात्मा के हृदय में अवतरण की अवस्था में विशिष्ट ज्ञान का भाव विशुद्ध प्रकाश के भावों को लेकर नर की धड़कन से तीव्रता से उठने लगते हैं तथा परमात्मा के बाल स्वरूप को देखते हैं। परमात्मा के उस बालस्वरूप के रूप व गुणों का वर्णन नहीं किया जा सकता है। दो0 नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह। हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।193।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में नंदीमुख अर्थात् खेचरी मुद्रा से अमृत का स्राव होने लग जाता है और दसरथ रूपी राजा मन की वासनाओं का त्याग कर देता है अर्थात् इच्छाएँ व वासनाएँ विशुद्ध ज्ञान प्रकाश के कारण शान्त हो जाती हैं। ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।। सुमन बृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई ।। व्याख्या : उस अवस्था में शरीर रूपी नगर में ज्ञान रूपी ध्वजा व संयम रूपी पताका छा जाती है, जिसका किसी भी प्रकार वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस समय साधक इतना आनन्द मग्न हो जाता है कि उसे आकाश से पुष्प वृष्टि का सा आभास होने लगता है और समस्त वासनाओं के बन्धन खुल जाते हैं और जीवात्मा ब्रह्मानन्द में मगन हो जाती है। बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज सिंगार किएँ उठि धाईं।। कनक कलस मंगल भरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा।। व्याख्या : उस परमानन्द की अवस्था में छोटी-छोटी नाड़ियों के समूह सहज होकर आनन्द के भावों को लेकर प्रवाहित होने लगती हैं और अपनी मनोकामनाओं के कलश व थाल भरकर नर की धड़कन से निकलने लगती हैं। अर्थात् मनोकामना के भाव नर की धड़कन से उठकर नाड़ियों के माध्यम से प्रवाहित होने लगते हैं। करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं।। मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक।। व्याख्या : उस समय हृदय से उठने वाली मनोकामना के भाव नाड़ियों के माध्यम से परमात्मा के चरणों में गिरने लगते हैं और परमात्मा से माँगने का भाव, चेतना का भाव, व वन्दना करने के भाव परमात्मा के पवित्र गुणों का गुणगान करने लगते हैं। सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू।। मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में समस्त विषय वासना के भावों का त्याग हो जाता है। उसी को प्रतीक रूप में सर्वस्व दान देने की बात कही गयी है। उस अवस्था में कोई भी भाव वासनाओं को ग्रहण नहीं करता है। उस समय मृगमद अर्थात् इच्छाओं का अहंकार अर्थात् आभास मिट जाता है और चंदन की सी शीतलता हृदय में आ जाती है तथा कुमकुम जैसा आनन्द छा जाता है। ये सब भाव नाड़ियों रूपी गलियों में प्रवाहित होने लगते हैं। अर्थात् प्रत्येक भाव व प्रत्येक नाड़ी में परमात्मा के अवतरण का आनन्द प्रवाहित होने लग जाता है। दो0 गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद।।194।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी के मूल से शुभ भाव प्रकट होकर प्रत्येक नाड़ी में प्रवाहित होने लगते हैं, जिससे नर और नाड़ियों के समूह हर्षित हो उठते हैं। अर्थात् प्रत्येक नाड़ी से शुभ वृति के भाव पैदा होने लग जाते हैं। कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ।। वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा।। व्याख्या : दस इन्द्रियों रूपी दसरथ की पिंगला रूपी कैकेई और ईड़ा रूपी सुमित्रा ने भी सुंदर पुत्रों को जन्म दिया अर्थात् पिंगला व ईड़ा नाड़ियों से भी परमात्मा को प्राप्त करने के भाव रूपी पुत्र पैदा हो गए। उस सुख, सम्पत्ति व भावों के समाज का वर्णन सरस्वती और शेषों के राजा अर्थात् वाणी और वाणी के इशारों द्वारा भी नहीं किया जा सकता है। क्योंकि परमात्मा के आनन्द को तो अनुभव किया जा सकता है। अवधपुरी सोहइ एहि भाँति। प्रभुहि मिलन आई जनु राती।। देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदिप बनी संध्या अनुमानी।। व्याख्या : उस अवस्था में शरीर रूपी अवधपुरी इस प्रकार सज जाती है, जैसे परमात्मा रूपी प्रियतम से मिलने के लिए रात्रि का समय आ गया हो। ज्ञानरूपी सूर्य को देखकर मन संकोच करने लगता है। हालाँकि ज्ञान रूपी सूर्य परमात्मा से मिलाने में सन्धि बन जाता है। अर्थात् ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने पर ही तो परमात्मा से मिलन संभव हो पाता है। अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरूनारी।। मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा।। व्याख्या : यश की वासना रूपी धूप मानो अज्ञान रूपी अंधकार होता है, जो मन और नाड़ियों में गुलाल की तरह उड़ता रहता है। मन के अन्दर जो ज्ञान का प्रकाश करने वाले भाव होते हैं, वे तारों के समान होते हैं और नर की धड़कन का घर हृदय मानो उदार चन्द्रमा के समान होता है। भवन बेदधुनि अति मृदुबानी। जनु खग मुखर समयँ जनु सानी।। कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना।। व्याख्या : जब हृदय में परमात्मा का अवतरण हो जाता है, तो भावों में वेदों की अनुभूति होने लग जाती है और वाणी मधुर हो जाती है। जैसे पक्षी समय आने पर अपने आप बोलने लग जाता है, उसी प्रकार हृदय में परमात्मा का अवतरण हो जाने पर साधक की मधुर वाणी प्रस्फुटित हो जाती है। ऐसा सुखद खेल देखकर पतंगा रूपी जीवात्मा अपने आपको भूल जाता है और वह सुखद अनुभूति का समय एक मास कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता है। दो0 मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोई। रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होई।।195।। व्याख्या : परमात्मा के हृदय में अवतरण की दशा में ज्ञान रूपी सूर्य स्थिर सा हो जाता है, इसलिए मास दिवस के प्रतीक द्वारा उस अनुभूति को समझाने का प्रयास किया गया है। जब ज्ञान रूपी सूर्य उदित होता है, तो उसके रहस्य को कोई जान नहीं पाता है और जब ज्ञान रूपी सूर्य स्थिर हो जाता है, तो अज्ञान रूपी रात्रि कैसे आ सकती है। यह रहस्य काहूँ नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुनगाना।। देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।। व्याख्या : ज्ञान रूपी सूर्य के प्रकाश के रहस्य को कोई नहीं जान पाता है और उस अवस्था में दिन मणि अर्थात् प्रकाश करते हुए समय व्यतीत होने लगता है और साधक परमात्मा के गुणगान करने में मस्त रहने लगता है। इस आनन्द अवस्था के महा उत्सव को देखकर स्वर, मन के भाव और नाग प्राण वायु अपने-अपने भाग्यों की सराहना करते हुए सहज होने लग जाते हैं। औरउ एक कहुँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।। काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।। व्याख्या : विश्वास रूपी शिव कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! तुम्हारी दृढ़ता देखकर एक गुप्त रहस्य और बताता हूँकि जब परमात्मा का अन्त:करण में अवतरण होता है, तो सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुंडि और मैं (विश्वास) मन अ अनुज अर्थात् साधक के सूक्ष्म मन में प्रवेश कर जाते हैं, जिसे कोई नहीं जान पाता है। परमानंद प्रेम सुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।। यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।। व्याख्या : उस अवस्था में सात्विक अहंकार रूपी भुसुंडि और मैं (विश्वास) परमानन्द में मग्न होकर शरीर रूपी नगर की नस जारों में घूमने लगते हैं। यह परम पवित्र चरित्र को तो वो ही जान पाते हैं, जिन पर परमात्मा की कृपा होती है अर्थात् जिनके हृदय में परमात्मा का अवतरण होता है, तभी यह परमानन्द का रहस्य समझ में आ पाता है। तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा।। गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नाना बिधि चीरा।। व्याख्या : उस परमानन्द की अवस्था में जो भी भाव पैदा होते हैं, उन्हीं के अनुसार मन की कामना पूर्ण होती चली जाती है। परमात्मा के अवतरण की अवस्था में जीवात्मा हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गाय व हीरा रूपी समस्त इच्छाओं का त्याग कर देता है। अर्थात् उसके हृदय में परम संतोष पैदा हो जाता है, जिससे वह माया के बन्धनों से मुक्त होता चला जाता है। दो0 मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस। सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसीदास के ईश।।196।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में सभी भावों के मन में संतोष की अवस्था आ जाती है और साधक जहँ-तहँ आशीर्वाद देने की क्षमता को प्राप्त कर लेता है। साधक उस समय परमात्मा से प्रार्थना करता है कि ये परमात्मा अवतरण की अवस्था मेरे हृदय में सदैव बनी रहे तथा सभी भावों में संतोष बना रहे। कछुक दिवस बीते एहि भाँति। जात न जानिअ दिन अ डिग्री राती।। नामकरन कर अवस डिग्री जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण होने पर साधक परमानन्द में मग्न हो जाता है और समता की दृष्टि में स्थिर हो जाता है। अत: उसको ज्ञान-अज्ञान रूपी दिन-रात का अब कोई आभास नहीं रहता है अर्थात साधक सहज होकर आनन्द में मग्न हो जाता है। धीरे-धीरे फिर साधक परमात्मा की विभूतियों को समझने का प्रयास करता है। उसी को नामकरण करना बोल कर लिखा गया है। परमात्मा के अवतरण की अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ प्रकट रहते हैं, जो साधक को परमार्थ पथ दिखाते रहते हैं। करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा।। इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा।। व्याख्या : जीवात्मा रूपी दसरथ विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ की पूजा करके अर्थात् विशिष्ट ज्ञान की सत्ता को स्वीकार करके बोला कि आप आपकी सोच के अनुसार परमात्मा के अवतरण की घटना को समझाकर कहिए। तब ज्ञान रूपी वसिष्ठ बोले कि हे दसरथ रूपी जीवात्मा! परमात्मा के वैसे तो अनन्त नाम हैं, परन्तु मैं मेरी बुद्धि के अनुसार इनके नाम बताता हूँ। सुनो -- जो आननंद सिंधु सुख रासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।। व्याख्या : जो आनन्द के समुद्र व सुख की राशि हैं और जो तीनों लोकों में उपलब्ध हैं, वे सुख के घर हैं। अत: उनका नाम राम है, जो अखिल ब्रह्माण्ड अर्थात् पूरे शरीर को बिश्राम देने वाले हैं। बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई।। जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।। व्याख्या : वह परमात्मा शरीर रूपी विश्व का पालन-पोषण करने वाला है, इसलिए उसका नाम भरत भी है और परमात्मा के स्मरण करने से काम, क्रोध व मदादि के शत्रुओं का नाश हो जाता है, इसलिए उसका नाम शत्रुघन है, जो वेदों का प्रकाश करने वाला है अर्थात् जब कामादि के शत्रुओं का नाश हो जाता है, तो स्वत: ही वेदों का प्रकाश हो जाता है। दो0 लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार। गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार।।197।। व्याख्या : लक्षणों का घर आत्मा रूपी राम का प्रिय होता है, क्योंकि लक्षण ही समस्त जगत के आधार होते हैं। अत: विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ ने लक्ष्मण नाम विचार कर रखा। वास्तविकता में तो परमात्मा की अनेक विशेषताएँ होती हैं, परन्तु विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ ने परमात्मा के अवतरण को राम, भरत, शत्रुघ्न व लक्ष्मण के नाम द्वारा समझाने का प्रयास किया है। इसलिए परमात्मा के अवतरण के लिए इन नामों के प्रतीकों का सहारा लिया गया है। क्योंकि वह परम ऊर्जा ही नाना अवस्थाओं में रुपान्तरित होनी है। धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुतचारी।। मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बालकेलि रस तेहिं सुख माना।। व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु बसिष्ठ ने हृदय में विचार करके वेद तत्व अर्थात् परमात्मा के अवतरण की अनुभूति का चार पुत्रों के रूप में प्रतीकात्मक दृष्टि से नाम रखा। वह परमात्म तत्व अर्थात् वेद तत्व समस्त ऋषि-मुनियों का धन व भक्तों का सर्वस्व होता है तथा वही वेद तत्व लोक-कल्याणकारी प्राण होता है। उसकी बाल क्रीड़ाओं के रस में ही सुख मिलता है। बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी।। भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई।। व्याख्या : बारेहि अर्थात् दस इन्द्रियों मन व बुद्धि ये सब संसार में जाने के बारह रास्ते होते हैं, परन्तु जब लक्षण इन बारह रास्तों को छोड़कर परमात्मा के चरणों में प्रेम करने लग जाते हैं, तो आत्मा रूपी राम से अटूट प्रेम हो जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ लक्ष्मण का राम के चरणों में प्रेम बताया गया है। भरत अर्थात् शरीर के भरण-पोषण का भाव और शत्रुघन अर्थात् काम, क्रोध व मदादि शत्रुओं का नाश करने वाला भाव परमात्मा राम के प्रति सहज में प्रीत रखने लगते हैं। भरत व शत्रुघन के भाव जब परमात्मा के भाव के सामने पूरी तरह समर्पण कर देते हैं, तो इनका सम्बन्ध स्वामी सेवक का हो जाता है। स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।। चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अनुभूति को राम, भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न के प्रतीकों का सहारा लेकर बताने का प्रयास किया गया है। राम को श्याम वर्ण बताने का रहस्य यह है कि आत्मा जब लक्षणों से ढँकी रहती है, तो उसका वर्ण श्याम लगता है। अत: आत्मा रूपी राम को श्याम वर्ण बताया गया है तथा भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न के भाव गौरवर्ण बताए गए हैं क्योंकि ये भाव आत्मा की शोभा को बढ़ाने वाले होते हैं और आत्मा को निर्मल करके परमात्मा स्वरूप करने में सहायक होते हैं। इसलिए श्याम व गौर वर्ण की सुन्दर जोड़ी बताया गया है। ये सब भाव नाड़ियों के माध्यम से पैदा होते हैं, इसलिए सुष्मना, पिंगला व ईड़ा रूपी कौसल्या, कैकयी व सुमित्रा रानियाँ इन भावों को निहारती हैं। वैसे तो परमात्मा के अवतरण की चारों अवस्थाएँ ही सुखद, शील व गुणों का घर होती हैं, परन्तु आत्मा रूपी राम सुख का समुद्र होते हैं। क्योंकि आत्मा की निर्मलता पर ही अन्य भाव निर्भर करते हैं। हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा।। कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना।। व्याख्या : जब हृदय में परमात्मा का अवतरण हो जाता है, तो हृदय में कृपा रूपी चन्द्रमा का प्रकाश हो जाता है और साधक के चेहरे पर चन्द्रमा की किरणों जैसे शान्ति की मुस्कान आ जाती है। उस अवस्था में साधक कभी उमंग से भर जाता है, तो कभी उसको मनोवांछित वर मिल जाता है और साधक को ऐसा लगने लग जाता है कि परमात्मा स्वयं उसे माता की तरह दुलार कर रहे हैं। दो0 ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद।।198।। व्याख्या : जो परमात्मा सर्वव्यापक, ब्रह्म, निरंजन, गुणों से परे, विनोद रहित व अजन्मा है, वो ही परमात्मा साधक की प्रेमा भक्ति के वश में होकर सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या के गोद में खेलने लगते हैं। अर्थात् सुष्मना नाड़ी का द्वार खुल जाने पर परमात्मा की अनुभूति होने लगती है। काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।। अरून चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के शरीर की शोभा नील कमल व गम्भीर जल की तरह करोड़ों कामदेवों के समान होती है। परमात्मा रूपी राम का जब हृदय में अवतरण होता है, तो उनके चरण कमलों के नाखूनों की ज्योति ऐसी लगती है, मानो कमल के दल पर मोती बैठे हों। अर्थात् उस अवस्था में ज्ञान रूपी कमल पर आनन्दरूपी मोती स्थिर हो जाते हैं। रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे।। कटि किंकनी उदर त्रथ रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा।। व्याख्या : जब परमात्मा का हृदय में अवतरण होता है तो साधक को ध्यान की गहराई में नूपुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, जिसे सुनकर साधक का मन मोहित हो जाता है। उस अवस्था में चेतना की रेखा स्थिर हो जाती है और अंकुश रूपी ध्वज लहराने लग जाता है अर्थात् मन पूरी तरह परमात्मा में लीन हो जाता है। उस अवस्था में कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जाती है। उसी अनुभूति को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है कि कमर से उठकर कुण्डलिनि शक्ति उदर में नाभी मण्डल पर आकर जागृत हो जाती है और तीनों गुणों की त्रय रेखा तब समझ में आने लग जाती है। उस समय नाभी मण्डल से रहस्यों से पर्दा उठना शु डिग्री हो जाता है। अत: नाभी मण्डल की गहराई को तो वे ही समझ सकते हैं, जिन्होंने स्वयं कुण्डलिनि जागरण के अनुभव को देखा हो। भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी।। उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में भाव रूपी भुजाएँ विशाल हो जाती हैं और सद्गुणों से युक्त भाव जीवात्मा के आभूषण बन जाते हैं तथा साधक के हृदय में माया का हरण हो जाने से रूचिकर शोभा बढ़ जाती है। उस अवस्था में हृदय में मन के सद्भावों की माला शोभायमान हो उठती है, जिसे देखकर विशुद्ध प्रकाश वाले साधकों का मन लालायित हो उठता है। कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई।। दुइ दुइ दसन अधर अरूनारे। नासा तिलक को बरनै पारे।। व्याख्या : जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो कर उर्ध्वगामी होती है, तो कण्ठ पर जार शंखाकार जैसी हो जाती है और वह शक्ति साधक के संयम के लिए चाबुक का कार्य करती है, जिससे साधक के मुखमण्डल पर दिव्य तेज छा जाता है। उस कुण्डलिनि जागरण की अवस्था में कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के दो-दो जोड़े अधर अर्थात् प्रकृति के बन्धन से मुक्त होकर सहज हो जाते हैं अर्थात् कर्म और ज्ञान इन्द्रियाँ दोनों सहज हो जाती हैं और तीनों नाड़ियाँ एक होकर बहने लगती हैं। उस अवस्था में तीनों गुणों में साम्यता आ जाती है, इसलिए तीनों एक अर्थात् तिलक की अवस्था आ जाती है। उस तिलक (तीन गुणों की एक अवस्था) की अनुभूति का कौन वर्णन कर सकता है। सुन्दर श्रवन सुचा डिग्री कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला।। चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे।। जब माता प्रकृति शक्ति अनुकूल होने लग जाती है तो प्रकृति के गंभीर से गंभीर रहस्य साधक के सामने रूचि के अनुसार प्रकट होने लग जाते हैं। व्याख्या : उस अवस्था में साधक अपनी अन्तरात्मा की आवाज को सुनने लग जाता है। उसे ही प्रतीक रूप में सुंदर श्रवन बोला गया है और गुण गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है, जिससे धीरे-धीरे सहजता बढ़ने लग जाती है और परमात्मा मधुर भाषा में तोतले बोलकर साधक को समझाने का प्रयास करने लगते हैं। तोतला बोलने का मतलब परमात्मा द्वारा साधक को प्रकृति के संकेतों द्वारा समझाने से है। ज्यों-ज्यों साधक साधना में परिपक्व होने लगता है, वैसे-वैसे ही परमात्मा प्रकृति के संकेतों द्वारा साधक से बातें करने लगते हैं। उस अवस्था में परमात्मा अपनी कृपा रूपी झगुलिया साधक को पहना देते हैं अर्थात् पल-पल व कदम-कदम पर परमात्मा रक्षा करने लगते हैं। उस अवस्था में साधक के प्राण सहज होकर विचरण करने लगते हैं अर्थात् साधक धीरे-धीरे सहजता को प्राप्त करने लग जाता है, जिससे प्राण का संचार भी सहज हो जाता है। पीत झगुलिया तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई।। रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण रूप का वर्णन वेद व शेष भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि परमात्मा को तो वही जानता है, जिसने स्वयं अनुभूति की हो, चाहे सपने में ही की हो। दो0 सुख संदोह मोह पर ग्यान गिरा गोतीत। दंपति परम प्रेम बस कर सिसु चरित पुनीत।।199।। व्याख्या : वह परमात्मा तो सुख, संदेह, मोह, ज्ञान, वाणी व इन्द्रियों से परे होता है। परन्तु दम्पत्ति अर्थात् जब साधक दम-यम द्वारा दसरथ अर्थात् दस इन्द्रियों को वश में कर लेता है और कुशलता पूर्वक कौसल्यारूपी सुष्मना नाड़ी में ध्यान स्थिर कर लेता है। तब परमात्मा के प्रति अटूट प्रेम पैदा हो जाता है और साधक बाल स्वरूप को प्राप्त करके पवित्र चरित करने लगता है अर्थात परम सहज हो जाता है। एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।। जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी।। व्याख्या : इस प्रकार परमात्मा राम जगत के माता-पिता हैं और कौशलपुर अर्थात् सुष्मना नाड़ी में जिनके प्राण निवास करते हैं, वे उनको सुख देने वाले होते हैं। विश्वास रूपी शंकर कहते हैं कि हे श्रद्धा रूपी भवानी! जो परमात्मा के चरणों में अनुराग रखते हैं, वे ही सुष्मना रूपी कौशलपुर में निवास कर पाते हैं और वे ही परमात्मा की कृपा का अनुभव कर पाते हैं। रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी।। जीव चराचर बस कै राखै। सो माया प्रभु सों भय भाखे।। व्याख्या : जो परमात्मा के विमुख होकर केवल संसार से मुक्त होने का प्रयास करते हैं, वे कैसे भाव रूपी बंधन को छोड़ सकते हैं? क्योंकि समस्त चराचरों को जिस माया ने वश में कर रखा है, वह माया भी परमात्मा से भय खाती है। भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही।। मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई।। व्याख्या : परमात्मा माया को भृकुटि पर नचाते हैं। अत: ऐसे प्रभु का भजन छोड़कर और किसका भजन करें? अत: मन, वचन व कर्म से चतुराई छोड़कर परमात्मा का भजन करना चाहिए क्योंकि भजन करते ही परमात्मा कृपा कर देते हैं। एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगर बासिन्ह सुख दीन्हा।। लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालने घालि झुलावै।। व्याख्या : इस प्रकार परमात्मा का अन्त:करण में अवतरण हो जाने पर साधक बालवत क्रीड़ा का आनन्द लेता है और शरीर रूपी नगर के सभी भाव रूपी निवासियों को सुख मिलता है। परमात्मा के अवतरण की अवस्था में कभी तो साधक उमंग से हिल उठता है और कभी परमात्मा के आनन्द में झूमने लगता है। दो0 प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान। सुत सनेह बस माता बाल चरित कर गान।।200।। व्याख्या : जब प्राण सुष्मना नाड़ी रूपी कौसल्या में स्थिर हो जाते हैं, तो कौसल्या रूपी सुष्मना नाड़ी से प्रेम के भावों की धारा बह उठती है, जिसके कारण रात-दिन कब पार हो जाते हैं, पता ही नहीं चल पाता है अर्थात् परमानन्द में समय व्यतीत होने लगता है। उस अवस्था में साधक रूपी सुत के परमात्मा रूपी माता वश में हो जाती है और परमात्मा रूपी माता बालक रूपी साधक के गुणगान करने लगती है। एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।। निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।। व्याख्या : जब साधक का ध्यान सुष्मना नाड़ी में लग जाता है तो परमात्मा के प्रति प्रेम और अनुराग बढ़ने लग जाता है तथा परमात्मा के प्रति नाना प्रकार से समर्पण के भाव पैदा होने लगते हैं और प्रार्थना के भाव भी पैदा होने लगते हैं। तब उस अवस्था में परमात्मा की साधक नाना प्रकार से भावना द्वारा पूजा करने लगता है। उसी को ""करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए"" बोलकर लिखा है। निज कुल इष्टदेव का तात्पर्य साधक की स्वयं की आत्मा से ही होता है क्योंकि जब आत्मा पूरी तरह निर्मल हो जाती है, तो आत्मा प्रकृति को वश में कर लेती है। प्रकृति को वश में कर लेना ही भग अ वान अर्थात् प्रकृति को वश में करने वाली अवस्था होती है। करि पूजा नैवेध चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा।। बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।। व्याख्या : उस अवस्था में साधक भावपूर्वक पूजा करके भाव पूर्वक निवेदन करता है और साधक की सुरता रूपी माता पवित्र हो कर परमात्मा में लग जाती है। जब सुरता परमात्मा में लग जाती है, तो संसार के कार्य व्यवहार में भी परमात्मा की ही झलक दिखने लग जाती है। साधक धीरे-धीरे इतना लीन होने लग जाता है कि सोते-जागते, खाते-पीते परमात्मा को ही भावपूर्वक देखने लगता है। गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।। बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।। व्याख्या : ध्यान की गहन अवस्था में जब सुरता परमात्मा में लग जाती है, तो सुष्मना नाड़ी में प्राणों का गमनागमन होने लग जाता है। सुष्मना रूपी कौसल्या माता भयभीत होकर परमात्मा रूपी बालक के पास जाती है, तो देखती हैं अर्थात् आभास होता है कि मानो बालरूप में परमात्मा सो रहे हैं। फिर प्राण की गति के अनुसार आभास होता है कि परमात्मा खा रहे हैं, या बैठे हैं। ऐसी भाव अवस्था देखकर साधक के हृदय में कम्पन होने लग जाता है और मन हिल जाता है। ध्यान की अवस्था में कई बार भय की स्थिति पैदा हो जाती है तो कभी आनन्द की उमंग छा जाती है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मति भ्रम मोर कि आन बिसेषा।। देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी में ध्यान की अवस्था में साधक परमात्मा के बालक रूप को जगत में और जगत से परे दोनों जगह देखकर मति भ्रम की सी अवस्था में फँस जाता है। उस मतिभ्रम की सी अवस्था में सुष्मना रूपी माता ब्याकुल हो जाती है, तो परमात्मा अन्त:करण में ही मधुर मुस्कान सी देने लगते हैं अर्थात् प्रेरणा कर मतिभ्रम से बाहर निकालने का प्रयास करते हैं।
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