ओ मनवा मत विषयन भटकाय, चारि दिनों की जवानी, फेर बुढ़ापा आय।।
जर्जर हो जायेगी तेरी काया, रोग-शोक जायेंगे लिपटाय।।
ओ मनवा मत…..
मनवा तू बिरथा तड़पेगा, मत विषयन में ललचाय।।
खान-पान तेरा वैद्य बंद करेगा, बिरथा देखि बिंजन बिकलाय।।
ओ मनवा मत…..
भोग करन की इच्छा तड़पेगी, तेरी काया नहिं साथ निभाय।।
बिनु भजन के मूढ़ मना, कोउ न जग में सुख पाय।।
ओ मनवा मत…..
जो करे भजन नित हरि का, वाको तन-मन हरषाय।।
ओ मनवा तू तजि दे विषयन को, लक्ष्मीनारायण कहता जो तू सुख चाय।।
ओ मनवा मत…..