ओ मन के घोड़ा कूँ, मारो ज्ञान के कोड़ा सूँ, विपद जाल कट जायेगा।।
नियम संयम का खूँटा गाड़ो, लगाम श्वास की बाँधो, सुख मिल जायेग।।
ओ मन के घोड़ा…..
मन घोड़ा कूँ सत्संग का जल पिलावो, भगति भाव का या कूँ भोजन करावो।
आनन्द बरसायेगा।।
सदबुद्धि को सवार बना दो, सुसंगत की काठी बँधा दो।
सतगुरु हरषायेगा।।
ओ मन के घोड़ा…..
सतगुरु सुमिरण राह चलाना, प्रेम-भाव का चाबुक लगाना।
सतगुरु घर पहुँचायेगा।।
जो मन का घोड़ा वश में कर लेगा, लक्ष्मीनारायण वो परम पद पा लेगा।
जीवन मुक्त वो कहलायेगा।।
ओ मन के घोड़ा…..