ओ माटी के पुतले तुझे बहुत गुमान रे ।
कुटुम्ब कबीला तुझे लताड़े ।
भाई बन्धु तुझे लताड़े ।
अपने जन तुझे लताड़े ।
बेटा-बेटी तुझे लताड़े ।
फिर भी अटकी रहती तेरी उनमें जान रे ।
ओ माटी के पुतले………..
ओ धन दौलत जोड़ कर तू ।
ओ सोना चाँदी जोड़ कर तू ।
ओ हीरे मोती जोड़ कर तू ।
ओ भरके भण्डार तू ।
खुद को माने तू धनवान रे ।
फिर भी नहीं शान्ति मन को उबलें तेरे प्राण रे ।
ओ माटी के पुतले………..
सज धज के खुद को निरखे ।
पहन ओढ़कर खुद को निरखे ।
नहा धोकर खुद को निरखे ।
तिलक बिन्दी लगाकर खुद को निरखे ।
इत्र लगा कर खुद को निरखे ।
तुझे यौवन का बड़ा अभिमान रे ।
ओ माटी के पुतले………..
एक दिन काया का महल ढह जायेगा ।
एक दिन धन दौलत यहीं रह जायेगा ।
एक दिन रुप यौवन ढल जायेगा ।
एक दिन जग का संग छूट जायेगा ।
अब तो समझ मूढ़ मति अज्ञान रे ।
ओ माटी के पुतले………..
गुरु तुझको बुलाए ।
गुरु तुझको चेताए ।
गुरु तुझको राह दिखाए ।
गुरु तुझको समझाए ।
नाम गुरु का जपले नादान रे ।
ओ माटी के पुतले………..
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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