गुरु बिनु कोन भव तरा है भाई।
गुरु शरण में पापी भी तर गए, निगम-पुराण सब गाई।।
गुरु के बल से जीवन सुधरता, चिन्ता, शोक कबहुँ न सताई।।
गुरु बिनु कोन…..
रिद्धि-सिद्धि सेवा करें, गुरु भगत आनन्द पाई।।
नुगरा का तो कर्म फूटता, काम, क्रोध खूब सताई।।
गुरु बिनु कोन…..
नुगरा से तो दूरी भली, वाकी तो होती बुरी परछाई।।
गुरु शरण में जो रहता, वो तो चहुँदिसि सुख पाई।।
गुरु बिनु कोन…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, गुरु कृपा सब सुख मूल सुहाई।।
गुरु बिनु कोन…..