प्रकृति तो नहीं है कोई गगन के पार, वो तो है मेरे भावों की धार।।
भावों से मेरी वृति बनती, वृति क्रिया सोई प्रकृति आधार।।।।
प्रकृति तो नहीं …..
भावों से ही भव सागर बनता, भावों से ही होता भव पार।।
जैसा भाव वैसी वृत्ति बनेगी, क्रिया होगी वृत्ति के अनुसार।।
प्रकृति तो नहीं …..
वृति क्रिया की प्रतिक्रिया जगत में, यही है प्रकृति का मरम अपार।।
प्रकृति से सुख-दु:ख मिलता है सबको, मूल प्रकृति का जानो भाव व्यवहार।।
प्रकृति तो नहीं …..
सुख जो चाहे जगत में, तो कर लो भावों को निर्विकार।।
भावो से ही सुख-दु:ख मिलेगा, कहता लक्ष्मीनारायण हृदय विचार।।
प्रकृति तो नहीं …..