ओ बन्धु मरम नाम का देऊँ समुझाई रे।।
वर्ण से नाम बने, नाम का अर्थ बनाई रे।
अर्थ से रस बनता, शब्द का सत्य बताई रे।।
रस से छन्द का बन्ध, बने रस में भाव समाई रे।
भाव से भल मन्द लगे, भाव ही सुख-दुख उपजाई रे।
विनय का रस जिस वाणी में, वो वाणी सुखदाई रे।
विनय भाव गुण प्रधान जगत में, गणेश कहाई रे।
विनय की पूजा सब दुनिया करती, संशय नाई रे।
विनय गुण-गुण प्रधान सोई, प्रथम पूजा जगत कराई रे।
यही मरम है नाम का, बिरथा मत जग भरमाई रे।।
विनय का गुण जो धारण करता, सब काज बन जाई रे।
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, विनय ही विनायक कहाई रे।।