स्वार्थ गीत
हे गुरुदेव दयानिधि स्वार्थ के मैं गीत सुनाता हूँ ।
तुम हो कृपा सिंधु फिर भी मैं घाघर नहीं भर पाता हूँ ।
हे गुरुदेव…………………….
तुम हो परमारथ रत मैं स्वार्थ से प्रीत बढ़ाता हूँ ।
तुम देते ज्ञान मणि अनमोल मैं धन दौलत चाहता हूँ ।
हे गुरुदेव…………………….
तुम हो निज पर पार मैं मूढ़ निज पर उलझाता हूँ ।
तुम हो समता के सागर मैं मन्द मति राग द्वैष भरमाता हूँ ॥
हे गुरुदेव…………………….
तुम कराते अमृत पान मैं कुबुद्धि विष चाह रखता हूँ ।
तुम देते मुझको हीरा मोती मैं काच किरिच पर ललचाता हूँ ॥
हे गुरुदेव…………………….
तुम हो परम संतोषी मैं बिरथा संग्रह में उलझाता हूँ ।
तुम हो भवरोग के नाशक नाथ शरण अब तेरी आता हूँ ॥
हे गुरुदेव…………………….
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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