हे रोम-रोम में रमने वाले राम, तुझे मेरा प्रणाम, तुझे मेरा प्रणाम।।
भवसागर में मेरी नैया गोता खाती, तू ही आए अटके में काम।।
हे रोम-रोम में …..
काम विवश मैं जग में भटका, कभी न किया सुमिरण तेरा राम।
विषय-वासना में मैं फँस गया, भीख माँगता रहा तेरा ले ले के नाम।।
हे रोम-रोम में …..
जगत के सब झूँठे रिश्ते नाते, जरूरत में कोई न आया काम।।
हार थक के अब मैंने तुझे पुकारा, अब करुणा कर दे हे करुणा के धाम।।
हे रोम-रोम में …..
जो मेरी बात बिगड़ गयी तो, हे राम तू ही होगा जग में बदनाम।।
लक्ष्मीनारायण विनती करता, सुनलो हे मेरे राम।।
तेरे चरणों में मुझे जगह दे दे, दे दे मुझे भक्ति निष्काम।।
हे रोम-रोम में …..