सतगुरु डोलता नजर नहीं आया ।
सतगुरु बोलता नजर नहीं आया ।
बिना पाल तरुवर कहिए ।
नीर नजर नहीं आया ।
जब सतगुरु हुआ दीवाना ।
वाही में मलमल नहाया ॥
बिना नीव एक मन्दिर कहिए ।
देव नजर नहीं आया ।
जब सतगुरु हुआ दीवाना ।
वाही में हरि गुण गाया ॥
बिना मूल एक दरखत कहिए ।
पात एक नजर नहीं आया ।
जब सतगुरु हुआ दीवाना ।
अमर फल खाया ॥
बिना गुफा एक तपसी कहिए ।
तपता नजर नहीं आया ।
जब सतगुरु हुआ दीवाना ।
वाही में दर्शन पाया ॥
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
जब सतगुरु हुआ दीवाना
घट अन्दर ही दर्श दिखाया ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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