मेरो सतगुरु घणो दयालू
मेरो सतगुरु घणो दयालू
मोहि करुणा में नहलाय दियो रे ।
मोह मद जब मैंने त्यागा
गुरु आया भागा भागा
मोहे गले लगाय लियो रे ।
मेरो सतगुरु घणो……………….
सेवा भावना जब उठी मन में
कर दी सतगुरु ने कृपा क्षण में ।
मोहे मानव सेवक बनाय दियो रे ।
मेरो सतगुरु घणो……………….
प्रेम का भाव उठा जब दिल में
सतगुरु हुआ प्रगट पल में
मोहि प्रेम रस पान कराय दियो रे ।
मेरो सतगुरु घणो……………….
धन दौलत का मोह जब छूटा
सतगुरु हुआ प्रसन्न जो था रुठा ।
मोहे तुरत कुबेर पद दिलाय दियो रे ।
मेरो सतगुरु घणो……………….
जब गुरु चरणों में लगी लग्न
सतगुरु हो गये मुझ पर मगन
मोहे भजन का मर्म सिखाय दियो रे ।
मेरो सतगुरु घणो……………….
सबकी ममता जब त्याग बटोरी
गुरु के चरणों में बाँधी श्रद्धा की डोरी
मोहे तुरत सतगुरु अपनाय लियो रे ।
मेरो सतगुरु घणो……………….
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
गुरु शरण में मैंने सब रस पाय लियो रे ।
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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