ओ ध्यान करुण का सूत्र बताऊँ, आओ बैठो बन्धु तुरत ध्यान लगवाऊँ।।
सुख आसन में तुम बैठो, इत उत तुम कुछ मत देखो,
आँख बन्द करो समझाऊँ।।
ओ ध्यान करुण…..
नहिं मैं पापी हूँ नहिं पुण्यात्मा, नहिं दुराचारी हूँ नहिं धर्मात्मा।
कुछ भी नहीं हूँ सत्य बताऊँ।।
ओ ध्यान करुण…..
कल्पना कुछ नहिं करो मन में, हो जावो मस्त मगन तन में।
तुम्हें ध्यान का रस पिलाऊँ।।
ओ ध्यान करुण…..
नहिं मैं शून्य नहिं मैं निराकार हूँ, मैं तो सतचित आनन्द निराधार हूँ।
अब तुम्हें ध्यान में मगन कराऊँ।।
ओ ध्यान करुण…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, सहज ध्यान का ज्ञान कराऊँ।।
ओ ध्यान करुण…..