सत्संग से हरि रिझै, वेद-पुराण महिमा गाई रे।
सत्संग से चिन्ता सब नाशै, यह अनुभव हम कराई रे।।
सत्संग से हरि…..
सत्संग से काम, क्रोध नहीं सतावे, आनन्द की लहर उठाई रे।।
सत्संग में प्रेम भाव उमगे, राग-द्वेष सब मिट जाई रे।।
सत्संग से हरि…..
सत्संग में होय ज्ञान उजियारा, जन्म-जन्म का अन्धकार मिटाई रे।।
सत्संग से लोभ, लालच मिट जाते, दया, दान में मन लगाई रे।।
सत्संग से हरि…..
सत्संग से गुरु प्रसन्न होते, सहजहि कृपा बरसाई रे।।
सत्संग से मन निर्मल होता, हृदय में दरस देते जगत गुँसाई रे।।
सत्संग से हरि…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, सत्संग सम लाभ किछु नाँई रे।।
सत्संग से हरि…..