ओ जीव तू मत खा गोते भावों के सागर में, तू बिरथा ही दु:ख पाय लियो।
काम, क्रोध, मद, लोभ भाव हैं तेरे जिनके कारण तू जग में तड़प रियो।।
ओ जीव…..
परनिंदा का जब भाव उठे तेरे मन में, तू बिरथा द्वैष में उलझ गियो।
अपना-पराया तेरे भाव ही बनाते, तू बिरथा भावों के जाल में उलझ रियो।।
ओ जीव…..
भावों ने ही मोह का बन्धन बनाया, मोह के कारण तू जग में भटक रियो।
भावों ने ही माया का जाल बनाया, माया कारण ही तू सतगुरु को भूल रिया।
ओ जीव…..
भावों को तू निर्मल करले, सतगुरु तोय चेताय रिया।।
निर्मल भाव होते हैं सुख की चाबी।।
ओ जीव…..
लक्ष्मीनारायण अनुभव गायरियो।।
ओ जीव…..