ओ बन्धु सुख का सुत्र बताऊँ, जीवन जीने का।।
भरी जावनी में करलो भजन, अपने सतगुरु का।।
ओ बन्धु …..
भजन भाव से निर्मलता आयेगी, मिटेगा तनाव तन मन का।।
जब तन-मन होगा निर्मल, तभी तो मिलेगा सुख जीवन का।।
ओ बन्धु …..
जवानी में इन्द्रियाँ जो आ गयी वश में, तो नहिं रहेगा डर बुढ़ापे में बिकल का।।
जिन्दगी है ढलती छाया, हो जायेगा ज्ञान नश्वरता का।।
ओ बन्धु …..
मोह, माया का सब जाल काटलो, करके सुमिरण सतगुरु का।।
ज्यों-ज्यों सुमिरण होगा सतगुरु का, त्यों-त्यों होगा आभास अमरता का।।
ओ बन्धु …..
सतगुरु भजन से चेतन जगेगा, चेतन अजर-अमर अंश सतगुरु का।।
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, भजन ही सच्चा सुत्र सुख का।।
ओ बन्धु …..