ध्यान है सतयुग में मारग, हरि को पाने को।
गुणातीत अवस्था साधक की, अवस्था सोई सतयुग समझाने को।।
ध्यान है सतयुग में…..
त्रेता युग यज्ञ ही मारग है, हरि को पाने को।।
पान में अपान का जो हवन करे, सोई सच्ची विधि यज्ञ करने को ।।
ध्यान है सतयुग में…..
सतगुण में रमण करे जब साधक, सोई अवस्था त्रेता जाने को।।
द्वापर है रजोगुण की अवस्था, मन में चाह विषय भोग पाने को।।
ध्यान है सतयुग में…..
भगति भाव से जप तप पूजन करते, यही तो मारग द्वापर में हरि पाने को।
कलियुग तो होती अवस्था तमोगुण की, नाम जप ही मारग हरि रिझाने को।।
ध्यान है सतयुग में…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, नाम रूप ईशारा हरि पाने को।
ध्यान है सतयुग में…..