मन को समझना दुष्कर काज रे।
सब पर यह संशय करता, खुद पर करता नाज रे।।
मन को समझना…..
विषय-वासना में यह ललचाता, इसको नहिं आती कोई लाज रे।।
पर निंदा में यह रस लेता, काम, क्रोध, मद, लोभ का यह उस्ताज रे।।
मन को समझना…..
पर प्रशंसा से इसको जुड़ि चढ़ती, उत्साह संग करता यह कुकाज रे।।
हर पल यह यौवन में रहता, दम्भ अभिमान का पहने ताज रे।।
मन को समझना…..
मन को कोई बिरला जीते जगत में, जीतने वाला ही बादशाह असली बेताज रे।।
मन को समझना…..