मेरा सतगुरु देखता है सारा, प्राण डोर से बाँध रखा है चराचर सारा।।
सभी रूप हैं मेरे सतगुरु के, सकल जगत उसका पसारा।।
मेरा सतगुरु देखता…..
सबके घट में सतगुरु रमता, नहिं कोई उससे न्यारा।।
सब कुछ मेरा सतगुरु करता, फिर भी वो कर्ता के पारा।।
मेरा सतगुरु देखता…..
मेरे सतगुरु की लीला अजब निराली, वे सब जगत का आधारा।।
राग-द्वेष नहिं मेरे सतगुरु के, सकल जगत ही उसको प्यारा।।
मेरा सतगुरु देखता…..
धर्म पंथ का जो पाखण्ड करता, उसको जानो मूढ़ गँवारा।।
लक्ष्मीनारायण ने ली शरण सतगुरु की, हो गया सहज उद्धारा।।
मेरा सतगुरु देखता…..