सतगुरु चरण शरण सुखदाई, लक्ष्मीनारायण अनुभव अपना गाई।।
विषय वन में मन जब भटके, सतगुरु ही राह दिखाई।।
सतगुरु चरण शरण…..
राग-द्वेष से जब मन घबराया, तब सतगुरु ने ही धीर बंधाई।।
चिन्ता अनल जली जब दिल में, तब सतगुरु ने ही कृपा बरसाई।।
सतगुरु चरण शरण…..
धन-दौलन की जब चाह उठी मन में, तब सतगुरु ने ही भण्डार भराई।।
जब काम बिकल हुआ मन मेरा, तब सतगुरु ने ही शान्त कराई।।
सतगुरु चरण शरण…..
जब जब विपदा आयी जगत में, तब सतगुरु ने ही रक्षा कराई।
जब अज्ञान निशा ने मुझको घेरा, तब सतगुरु ही ज्ञान प्रकाश कराई।।
सतगुरु चरण शरण…..
कहाँ तक गुणगान करूँ सतगुरु का, मैं सतगुरु चरण बलिहारी जाऊँ।।
सतगुरु चरण शरण…..