नर तन बड़ा दुर्लभ है, या कू समझो मेरे भाई रे।।
विषयों में या कू मत लगावो, बिरथा अवसर गँवाई रे।।
नर तन बड़ा…..
क्षणिक सुख है विषयों का, तन को जर्जर देता कराई रे।।
भोग से रोग मिलता जग में, बिरथा जीव दु:ख पाई रे।।
नर तन बड़ा…..
सत्संग में या कू लगाले, नित नव आनन्द मिलाई रे।।
सत्संग से सब चिन्ता मिटेगी, तन का दिन-दिन तेज बढ़ाई रे।।
नर तन बड़ा…..
सत्संग से हृदय जाग उठेगा, जन्म मरण भरम मिट जाई रे।।
नर तन का बड़ा औसर मिला है, अब तो करलो हरि भजनाई रे।।
नर तन बड़ा…..
भजन जैसा सुख कहीं नहिं मिलेगा, लक्ष्मीनारायण अनुभव बताई रे।।
नर तन बड़ा…..