ओ चल चल रे मन, सन्तन की शरणा में।
सत्संग का वहाँ मौका लगेगा, नहायेंगे आनन्द के झरणा में।।
ओ चल चल रे…..
सन्तन संग नहिं चिन्ता सतावै, अमृतवाणी पड़ेगी कर्णा में।
मोह का बन्धन सब खुल जायेगा, नहिं होगा दु:ख जन्म मरणा में।।
ओ चल चल रे…..
सन्तन की जब कृपा-दृष्टि पड़ेगी, नहिं लगेगी देर भव तरणा में।।
सन्तन की सेवा से अहंकार मिटेगा, ज्ञान मिलेगा सन्तन के वचना में।।
ओ चल चल रे…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, मुक्ति मिलती सन्तन के चरणा में।।
ओ चल चल रे…..