ओ मन बैरी तू मोकू, जग में मत भरमावै रे।।
हरि भजन की मेरी लगन लगी, या कू तू मत तुड़वावै रे।।
ओ मन बैरी…..
चार दिना का हैं भोग भोगणा, पाछे तू बिरथा पछतावै रे।।
काया महल है नश्वर तेरा, फिर काहे विषयन में तड़फावै रे।।
ओ मन बैरी…..
हरि भजन की तू लगन लगाले, परम शान्ति तुझे मिल जावै रे।।
काम, क्रोध, मद को तू तज दे, तेरी चदरिया निर्मल हो जावै रे।।
ओ मन बैरी…..
सतगुरु की शरण में आ जा मनवा, तू खूब सुख पावै रे।।
हरि भजन ही है मारग सत का, लक्ष्मीनारायण तोकू समझावै रे।।
ओ मन बैरी…..