गुण गान हरि के करना मेरे भाई।।
सरल रखना हृदय अपना, मत करना छल कपटाई।।
गुण गान हरि…..
सबके ही घट में हरि रहता, रखना यह बात याद सदाई।।
दान-दक्षिणा से हरि ना रीझै, हरि तो भाव का भूखा भाई।।
गुण गान हरि…..
प्रेम भावना से हरि सदा रीझै, यह है सन्त मत भाई।।
छल-कपट से कल्मषता बढ़े मन की, कल्मषता तो सदा दु:ख दाई।।
गुण गान हरि…..
निर्मल मन हरि गुण गाना, स्वारथ मत रखना भाई।।
निर्मल वाणी हरि रीझाणी, हृदय आनन्द उमगाई।।
गुण गान हरि…..
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, निर्मल हृदय में हरि प्रकटाई।।
गुण गान हरि…..