ओ बन्धु समझ अपने मन की चाल, कैसे उठे रे भावों का भूचाल।।
दया दान करुणा से सुख पाता, काम, क्रोध के भाव करें बबाल।।
ओ बन्धु समझ…..
लोभ-लालच में मन जब फँस जाता, तो कर देता जीव को कंगाल।।
मोह की चाल जब मन चलता, कर देता जीव को बदहाल।।
ओ बन्धु समझ…..
परमारथ पथ पर जो मन चल रे, तो कर दे जीव की खुशहाल।।
मन की चाल टेढ़ी घणी होती, मन के कारण ही जग में जंजाल।।
ओ बन्धु समझ…..
भगति में जिसका मन रम जाए, उसका खुलजाता कपाल।
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, मन को समझो होवेंगे निहाल।।
ओ बन्धु समझ….