निर्गुण-सर्गुण में मत भरमा, घट का राम समझले भाई रे।
अकथ-अगाध अनन्त है ब्रह्म, वो ना मरै ना जन्माई रे।।
निर्गुण-सर्गुण में…..
सतचित आनन्द है ब्रह्म, चित में ही जानो ध्यान लगाई रे।।
घट-घट में ब्रह्म रम रहा है, सब जग में प्राण बनि समाई रे।।
निर्गुण-सर्गुण में…..
ओह्म-सोह्म भी है धुन ब्रह्म की, सब नाम ही ब्रह्म के नाम सुहाई रे।।
गुरु जो भी दे नाम ब्रह्म का, श्रद्धा से घट में लो जपाई रे।।
निर्गुण-सर्गुण में…..
गुरु मंत्र सब भरम मिटायेगा, हृदय में कर देगा ब्रह्म प्रगटाई रे।
अवधूत देवीदास ने करी बक्सीस, लक्ष्मीनारायण घट में ब्रह्म पाई रे।।
निर्गुण-सर्गुण में…..